Transcript
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते कल हमने देखा कि किस तरह से महापुरुष लोगों के साथ में तीर्थ यात्रा पर जाने का मने एक बहुत बड़ा एक बेनिफिट भी है आध्यात्मिक एक बहुमानम वो है और उसके डेंजर भी कितने दोनों चीजें हमने कल देख ली अने एक के बाद एक छोटी-छोटी चीजों में डांट भी सुननी पड़ती है और दूसरी ओर है जब ऐसे महापुरुषों को राजा महाराज जैसे उनके साथ में उनको देवी के दर्शन करते करते जो भावा वेश होता है वह जब अब जैसे कल हमने देखा कि रामेश्वरम में राजा महाराज बैठ गए शिवलिंग के सामने शिव सनि ध्यान में मग शरीर पूरा स्थिर मन कहां समाधि की भूमि में विराज कर रहा है तो ेर करके यह लोग जो चारों ओर बैठे हैं उन लोगों को भी लगा कि कुछ ही देर में उन लोगों का मन भी कहीं वह समाधि रूपी अवकाश में वो समाधि रूपी गगन में मुक्त पंछी की तरह वह भी उड़ रहा है उनका मन भी यहां पर मैं अपना खुद का एक पर्सनल एक उदाहरण कहूंगा मैं नागपुर में था उस समय और मैंने बेलूर मठ में जवाइन किया था बेलूर मठ में पीपीटीसी बोलक एक जगह है तो वहां पर मैंने जवाइन किया था और वहां से मेरा पोस्टिंग हुआ था नागपुर में तो 2006 की बात है नागपुर में मंदिर का उद्घाटन होने वाला था तो उसके दो-तीन महीने पहले ही मुझे भेजा गया कि मंदिर उद्घाटन में बहुत सारे काम होंगे तो किसी ब्रह्मचारी की जरूरत होगी तो तुम जाओ मंदिर में काम करना तो ठीक है मंदिर में काम करता था सुबह को जब मंगल आरती होती है तो वह जो मंगल आरती के लिए जो भी दिया है वगैरह जो हमको कपूर का दिया तैयार करना होता है वह घंटी लगानी होती है शंख बजाना होता है वह सब मैं करता था और जैसे ही पुजारी महाराज जाकर के और फिर जब पाच बज जाएंगे 5:00 बजे का मंगलारती का समय पुजारी महाराज और मैं हम दोनों वह दरवाजा खोलते थे वो बड़े दरवाजे होते दो लोगों को खोलने पड़ते हैं और दरवाजा खोलने का एक नियम है रामकृष्ण संघ में जब आप सुबह को श्राइन का गर्भगृह का जो द्वार है उसको खोलेंगे तब इस तरह से खोलना है कि जो भक्त लोग बैठे हुए हैं उनकी दृष्टि सर्वप्रथम ठाकुर के ऊपर में जाए नहीं कि हमारे ऊपर में ऐसा सामने खड़ा रह कर के ऐसे दरवाजा नहीं खोलना है हमारा दर्शन करने के लिए थोड़ी ना ये लोग सुबह को इतना जल्दी से उठ कर के लोग आए हैं तो ठाकुर का दर्शन करने के लिए आए तो हमको दरवाजा द्वार इस तरह से खोलना है कि हम लोग पीछे छुपे रहे और दरवाजा खोल जाए बेलूरमठ में बढ़िया है अभी जो स्लाइडिंग डोर आ गया है ना दो लोगों को खोलना पड़ता है एक एक साधु एक महाराज जी इस साइड में से खोलेंगे दूसरे महाराज जी इस साइड से खोलेंगे बेलूरमठ में अभी भी वो इस तरह से खोलने वाला दरवाजा है तो वहां पर किस तरह से दरवाजा खोलते पता है वो पुजारी महाराज हो ना कि वो भंडारी महाराज हो वो क्या करेंगे पहले तो वो ये जो है कड़ी वो कड़ी खोल देंगे फिर एक हाथ से उस दरवाजे को ऐसा धक्का मार के छुप जाएंगे दूसरा दरवाजे के पीछे में और ऐसा माने ऐसा लगेगा जैसे दोनों दरवाजे खुल र है साथ में और खोलेंगे एक ही महाराज जैसे दो अलग-अलग महाराज जी नहीं किंतु एक दरवाजे को खोल के धक्का मार देंगे तो व ऐसा करके व खुल जाएगा दूसरे दूसरे दरवाजे के पीछे वो महाराज रहेंगे तो वो बेलर मट का यहां पर अभी स्लाइडिंग डोर है बड़े-बड़े दरवाजे हैं अभी तो श्राइन की साइज सब जगह पर बड़ी हो रही है तो दो महाराज जी को खोलना पड़ता है तो मैं वहां पर महाराज पुजारी महाराज में दरवा दरवाजा खोलते थे फिर मैं जाकर के वहां पर बैठ जाता था व मंदिर में और फिर पुजारी महाराज गर्भ ग्रह में बैठ कर के वो छोटी सी जो पूजा करनी होती है विधि और उसके बाद में आरती करेंगे तो मैं जब जाकर के बैठता था और बाकी सब साधु ब्रह्मचारी आते थे आरती अटेंड करने के लिए और वहां पर तो हॉस्टल भी था तो हॉस्टल के स्टूडेंट भी आएंगे तो उसमें कुछ पाच मिनट का तकरीबन ऐसा कुछ गैप रहता था कि मैं जाकर के बैठ हूं और धीरे-धीरे करके बाकी सब आ रहे हैं और मंदिर में तो नाट मंदिर में तो अंधेरा रहेगा उस समय उस समय लाइट नहीं की जाती वो गर्भगृह में ठाकुर के ऊपर में जो प्रकाश है वही हमारे लिए सफिशिएंट है सुबह के समय तो वो मैं जाकर के बैठा था अभी उस समय ऐसा था कि आत्मस्थानंद जी महाराज व उस समय वाइस प्रेसिडेंट महाराज थे परम पूज्य प्रेसिडेंट महाराज थे उस समय हमारे संघ के तो वो नागपुर आए थे दीक्षा देने के लिए तो अभी क्या है कि महाराज तो आए हैं तो महाराज का तो जो भी है आना जाना वह तो उनके सेवक महाराज करेंगे मैं मेरा तो मंदिर में ड्यूटी है मुझे तो पता ही नहीं कि महाराज का क्या रूटीन होगा मुझे तो सिर्फ मंदिर का ही देखना है तो ऐसा कोई भी ख्याल मेरे मन में नहीं था कि महाराज है नहीं है क्योंकि मंदिर का काम ऐसा होता है फिर उसके बाद में आप और किसी काम में आप वो मन लगा ही नहीं सकते आपके पास समय ही नहीं रहेगा तो मैं अपने रूटीन की तरह वहां पर जाकर के बैठा हूं और मंदिर में उस समय कोई नहीं है थोड़ी देर के बाद में सब आना शुरू होंगे और उस समय मैं तो नया नया था जप करना वगैरा एकदम मैं तो उसी समय सीख रहा था ध्यान कैसे करें जप कैसे करें ऐसा नए आए हुए ब्रह्मचार्य को थोड़ी ना फटाफट यह सब कुछ अनुभूति होने वाली है तो मैं तो ठाकुर की ओर मुंह करके बैठा था एकाएक मुझे ऐसा हुआ कि फट करके मेरा मेरा मन जो है वो एकाएक अंतर्मुखी जें मन के भीतर में घूमती है ना कि ये यह है वो आज दो सुबह को इस तरह से फल फल प्रसाद फल काटना है तो फल है कि नहीं वह मंगवाना है कि नहीं बाजार में से फूलों की माला देनी है तो माला हम लोग हमारे एक डिवोटा बनाते थे तो फूल लाना है कि नहीं लाना है वो सब जो 10 चीजें रहती है वोह सब समय घूमती रहती है हमारे मन में सब चीजें चली गई और जैसे कि मन एकदम शांत हो गया और शांत होने के साथ-साथ में ही एकदम अंतर्मुखी मार ली मैं तो सोचता था कि 12 साल के बाद में वो जैसे हमने भगवान बुद्ध की किताब में पढ़ते हैं ना कि ठाकुर के लीला प्रसंग में पढ़ते हैं कि 12 साल तपस्या कठिन तपस्या करने के बाद में समाधि प्राप्त होती है या तो फिर निर्वाण या कैवल्य प्राप्ति जो भी आप बोले उसको तो आज तो मतलब एकाएक इतना मेरा मन एकाग्र हो गया है बस आज तो मैं समाधि में चला ही जाऊंगा ऐसा मैं एकदम बड़ा खुश खुश हो गया ऐसा करके मैं बैठा हूं एकदम मजे से और थोड़ी देर हुई एकाएक किसी ने लाइट की तो अब क्या होता है कि हम तो हमेशा से अभ्यस्त होते हैं ना नाट मंदिर में लाइट बंद होकर के अंधेरे में ही जब ध्यान करना लाइट करने से थोड़ा विक्षेप पड़ता है और आज तो मेरा मन विशेष रूप से एकाग्र था तो नाट मंदिर में लाइट करने की क्या भाई जरूरत है तो मैंने थोड़ा नाराज होकर के पीछे देखा तो मैंने क्या देखा पता है कि आत्मस्थानंद जी महाराज मेरे एजेक्ट पीछे में बैठे थे कुर्सी के ऊपर जमीन पर तो नहीं बैठ सकते थे किंतु कुर्सी पहले से ही लगाई गई थी मैंने ही लगाई थी किंतु मुझे पता नहीं था महाराज कब आएंगे कब नहीं आने वाले पीछे मुड़ के देखा तो महाराज बैठे थे और फिर महाराज के सेवक महाराज भी वो कुर्सी के नीचे में पास में बैठे थे वो तो चुपचाप आ कर के बैठ गए किंतु वो दूसरे लोग जो होते हैं उनको लगता है कि अरे आज महाराज आए तो महाराज को और ज्यादा लाइट में उनको ठाकुर के दर्शन करवाओ ऐसा किसी ने सोच लिया होगा और किसी ने लाइट कर दी किंतु मैं जो पीछे मुड़ के देखा तब मुझे पता चला कि जब मेरा मन जो एकाग्र हुआ था उस समय आवाज हुई थी थोड़ी सी जैसे कि कोई आकर के बैठा हो मेरे पीछे किंतु मैंने ध्यान नहीं दिया मैंने सोचा भी नहीं कि इतना जल्दी कोई क्यों आ जाएगा अभी तो लोगों को आने में देर है तब मुझे किंतु लाइट हुई कि ना महाराज स्वयं उस समय आक के बैठे थे और यह जो मेरा मन एकदम एकाग्र हो गया वो उनकी उपस्थिति का प्रभाव था अब मुझे पता ही नहीं है कि वो है नहीं है मुझे यह भी नहीं पता था कि वह मंदिर में आने वाले हैं कि नहीं आने वाले देखिए बिल्कुल अनजान रूप से मेरे मन के ऊपर में उनकी उपस्थिति का यह प्रभाव हुआ और मैंने जदी में मेरी जल्दी ऐसी गलती ना हो जाए कि नहीं वो तो जैसे में काक ताली न्याय कहते हैं ना वो संस्कृत में कि वो डाल तो गिरने वाली थी उसी समय वो कौवा जाकर के बैठा तो ऐसा नहीं है कि कोवा जाक के बैठा बोल कर के डाल गिरि है डाल तो गिरने ही वाली थी वो तो इसको काक ताली कहते तो मुझे तो ऐसा वो अंतर वो मतलब वो समाधि होने ही वाली थी महाराज आए नहीं आए वो तो एक मने कोइंसिडेंस है तो किंतु यदि मेरे मन में यह भ्रम होगा तो दूसरे दिन से वो भ्रम टूट गया क्योंकि दूसरे दिन से वह जैसे आकाश से गिरा जमीन पर आकाश से गिरा जमीन पर अटका वैसे ही व जैसा वो विक्षिप्त मन था दूसरे दिन से विक्षिप्त ही रहा वो दूसरे दिन से कोई एकाग्र फ काग्र नहीं होने वाला था तो देखिए कि महापुरुष के साथ में अ यात्रा करते हैं तीर्थ यात्रा करते हैं या तो उनकी उपस्थिति का यह प्रभाव जीवन में होता है मेरा एक छोटा सा उदाहरण यदि इतना मतलब इसको क्या कहेंगे क्षुद्र घटना कहेंगे मेरे जीवन में तो यह लोग तो मने राजा महाराज तो ठाकुर के मानस पुत्र स्वयं मुहर मुह समाधि मग्न हो जाते थे बार-बार भाव में मग्न हो जाते थे तो उनके साथ में जब वे लोगों के मन में ये एक प्रचंड भाव का एक आवेश आता है तो उनके आसपास की जो परिस्थिति सर्जन होती होगी उसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते तो माने महापुरुष के साथ में रहने से और और जैसे जैसे वो डांट खाने की बात है ना तो वैसे मेरा ही एक दूसरा एक अनुभव है ठाकुर की कृपा से मेरे साथ नहीं हुआ है किंतु मैंने ये प्रत्यक्ष नजर मैंने प्रत्यक्ष मैंने देखा है हम लोग बेलूर मठ में थे ट्रेनिंग सेंटर में और ट्रेनिंग सेंटर में ऐसा आत्मस्थानंद जी की ही बात है ट्रेनिंग सेंटर में ऐसा होता है कि कभी-कभी बीच-बीच में प्रेसिडेंट पूजनीय परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज के साथ में कभी-कभी वो इंटरेक्शन होता था हमारा तो फिर वो बीच-बीच में प्रणाम वगैरह भी होता है तो अभी मुझे एगजैक्टली याद नहीं कि क्या ओकेज था किंतु हम टीसी के सब ब्रह्मचारी 40 50 ब्रह्मचारी वो प्रेसिडेंट महाराज क्वार्टर में महाराज को प्रणाम करने के लिए आए थे अभी पता चला कि महाराज बाहर गए हैं अभी पाच मिनट में आएंगे तो हम लोग सब बाहर में खड़े भीतर में जाने से तो कोई लाभ नहीं अभी का तो प्रेसिडेंट भवन जो है बहुत बड़ा है पहले का जो गिरीश भवन आपने देखा होगा बड़ा ही छोटा था आप लाइन में जाइए प्रणाम करके दूसरी ओर से निकल जाइए ऐसा ही था तो हम लोग अभी संध्या का समय था सूर्यास्त हो चुका था और अंधेरा था तो हम लोग सब एक साइड में खड़े हैं गप लगा रहे हैं अभी हम प्रेसिडेंट महाराज की गाड़ी आई तो अभी हम लोग एकदम शांत हो गए चुप हो गए महाराज स्वयं उपस्थित है तो महाराज गाड़ी से निकले और वह महाराज के जो दो सेवक महाराज प्रेसिडेंट महाराज को उस समय चलने में थोड़ी तकलीफ होती थी तो दोनों सेवक महाराज के कंधे पे इस तरह से हाथ रख कर के वह धीरे-धीरे चल रहे है हम लोग बिल्कुल चुपचाप खड़े हैं हमको पता ही कि आत्मस्थानंद जी का टेंपर कैसा है यानी कि बिना मतलब कुछ भी बोलना नहीं है उनकी उपस्थिति में अभी महाराज को शायद पता नहीं होगा हम है कि नहीं और यदि हम है भी तो भी उनको कोई फर्क नहीं पड़ता बाद अभी वो व जा रहे हैं गाड़ी बाहर खड़ी है और थोड़ा सा रास्ता है और चलकर के व गिरीश भवन में जाना है तो पता नहीं किसी बात से वह सेवक महाराज पर नाराज हो गए तो ऐसा करके हाथ रखा था कंधे पर तो उनकी पीठ पर फट करके चाटा मार दिया नाराज हो कर के किसी बात से और भूम कर के जो आवाज हुआ हम लोग जो साइड में खड़ थे हम लोग डर गए मैंने कहा तो देखिए किंतु आशीर्वाद और डांट यह दोनों से हमारे जीवन का हमारे कर्म का जो यह वाशिंग मशीन है यह कर्मों का वाशिंग मशीन है व वाशिंग मशीन में पढ़कर के जो हमारी चित्त शुद्धि जो होती है जैसे महापुरुष के साथ में जो इनके साथ में रहे हैं वह धन्य है मुझे यह नसीब नहीं हुआ कि किसी भी प्रेसिडेंट महाराज पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज या पूजनीय वाइस प्रेसिडेंट महाराज के साथ में रहने का बातें की है साथ में काम किया है वगैरह सब ठीक है किंतु एज सेवक के रूप में जाना या तो उनके साथ में तीर्थ यात्रा करने का ऐसा कोई सद् भाग्य मुझे नहीं मिला क्यों तो ठीक है अभी आशा रख लेते हैं कि फिर से जब भी आएंगे तो जैसे रंगनाथ आनंद जी ने किसी ने रंगनाथ आनंद जी को किसी ने पूछा था कि महाराज आपकी तो मुक्ति अवश्यंभावी है इतने विद्वान है इतने बड़े साधक है तो रंगनाथ आनंद जी ने क्या कहा कि बार-बार पृथ्वी पर जन्म लू बार-बार रामकृष्ण मिशन में साधु हो बारबार ठाकुर का काम करो मुक्ति फक्ति जिसको चाहिए वो मुझे नहीं चाहिए तो मेरा भी ऐसा है कि बार-बार आएंगे बार-बार साधु होंगे रामकृष्ण मिशन में ठाकुर का काम करेंगे और यदि इस बार-बार आने में कभी किसी पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज का संग मिल जाए एज अ सेवक के रूप में तो अपना जीवन धन्य हो जाएगा तो यह कुछ अविज्ञता तो इसी तरह से कल हमने देखा रामेश्वरम का आज हम देखते हैं मदुराई का रामेश्वरम गए थे यह लोग तीर्थ यात्रा करने के वापस आ रहे हैं चेन्नई मद्रास और वहां पर मदुराई में रुके अभी मदुराई की भी बहुत ही सुंदर सिमिलर घटना है अभी कल देखिए कंट्रास्ट देखिए मदुराई आए और आने के साथ में ही राजा महाराज एकदम शांत एकदम गंभीर हो गए हैं किसी के साथ बात नहीं कर रहे हैं चुपचाप बैठे हैं तो सभी लोग थोड़ा सा महाराज की ंभ भीर का प्रभाव जो है वो ऐसा है कि दूसरे लोग कुछ बोल नहीं रहे हैं अभी यहां पर जैसे कल हुआ था कल बार-बार डांट खाई है इन लोगों ने कि वह सामान की चिंता नहीं करके लोगों के साथ में गप लगा खड़े थे किसी ने बोल दिया अरे यहां पर चोरों का बड़ा उपद्रव है तो राजा महाराज ने सुन लिया कि सेवक लोग वो सामान की चिंता करने की बजाय वो गप लगा रहे है तो एकदम नाराज होक कर के वो सिंह की तरह गरज उठे क्या कर रहे हो तुम लोग ये सब तो ये ओवर कंपनसेटर के लिए सेवक लोगों ने क्या किया जब वह रामेश्वरम चले गए तो जैसे धुलो पाय तीर्थ पथ जो है उसकी धूल जो पैर में लगी है उसी पैर के साथ में तीर्थ दर्शन को मंदिर दर्शन को जाना है तो धुलो पाय दर्शन करने के लिए शशि महाराज राजा महाराज तो चले गए सेवक लोग सब बड़े ही मतलब जिसको बोलते हैं ना कि ओवर कंपन सेट करके सब सामान पत्र सजा रहे हैं अब ये लोग वहां पर रह देख रहे हैं वापस आ कर के देखा कि ये लोग निकले नहीं है तो पूछा कि भाई क्यों क्या कर रहे थे थोड़ा सा स्मग निस होता है ना यहां पर लिखा है भए भए उत्तर दिया उ डरते डरते किंतु मुझे लग रहा है भीतर में थोड़ा स् मगनेर भी होगा कि हां अभी उस समय सामान की चिंता नहीं की यहां पर हम लोग सामान की चिंता कर रहे थे मब वो थोड़ा खुश हो जाए तो राजा महाराज ने क्या कहा कि लाओ तो एक बत्ती सब सामान जला दूं सब दफा यहीं पे मिट जाए तो अभी वहां पे ऐसा अभी यहां पे आए तो मदुराई में तो देखा कि वो धुलो पाई दर्शन नहीं गए हैं वहीं पे आवास में ही बैठे रहे तो अभी हमको आश्चर्य होगा कि इन लोगों को बेचार को तो डाट लगा दी और अभी आज खुद नहीं गए किंतु देखिए कि महापुरुषों का जो वर्तन होता है है उसमें हम लोग कंट्रास्ट खोजने को हमको बड़ा आनंद आता है किंतु मोर देन दैट ज उनके शिष्यों का चरित्र गठन करना कैसे करना और उनके खुद के मन की जो भावा वस्था है वह सबके ऊपर में डिपेंड करता है उनका नेचर उनका बिहेवियर उनकी एक्शंस तो हम लोग प्रश्न कर सकते हैं कि वहां पर रामेश्वरम में डांट दिया आज मधुरई में आए हैं तो खुद वो धुलो पाई दर्शन नहीं गए क्यों नहीं गए तो वो तो अभी वही बता सकते हैं जो भी है वहां पर बैठे हैं जहां पर उनका निवास स्थान था और वहां पर बैठ कर के क्या कह रहे हैं देखिए जितेंद्र महाराज लिखते हैं राजा महाराज कहते हैं देखो पा फेलर संगे संगे बुजलाना प्रति अणु परमाणु ते देवीर शक्ति विराज कोर छ देखो मैंने यहां पर पैर रखने के साथ-साथ में ही देखा कि यहां की मिट्टी की प्रति अणु परमाणु में देवी की शक्ति विराज कर रही है माने प्रेजेंस जो होती है ईश्वर की वो ईश्वर की प्रेजेंस जो ईश्वर के आशीर्वाद से धन्य संतान है वह कैसे समझ जाते हैं मां अपने कमरे में वह बच्चा खेल रहा है छोटा सा मां कमरे में प्रवेश करती है बच्चे का पूरा ध्यान मां की ओर चला जाएगा क्योंकि मां के साथ में बच्चे का जो संबंध है वह अत संबंध है हम थोड़े बड़े हो जाएंगे फिर ऐसा नहीं होगा किंतु हम जब छोटे होते हैं एक साल के दो साल के तब मां की प्रेजेंस हमारे जीवन का एक सबसे बड़ा एक फैक्ट है एक सबसे बड़ा एक एक प्रेजेंस है जिसको कि हम कभी इग्नोर नहीं करेंगे मां की प्रेजेंस से ही हमारे हृदय में हर्षत फूल भाव प्रकट होगा तो वैसे ही यहां पे जैसे ही आए देवी की प्रेजेंस उन्होंने अनुभूति की उसके बाद में किंतु दूसरे दिन फिर दर्शन करने के लिए गए अभी जैसे कि दर्शन करते हैं तो अभी राजा महाराज का ऐसा था कि वह जब भी दर्शन के लिए जाते थे अपने हृदय के ऊपर में एक हाथ रख कर के जप करते थे अभी हमको पता है जिन लोगों ने दीक्षा ली है जप करने की प्रणाली जो हमको सिखाई गई है वह कुछ इस तरह से है यहां से हम स्टार्ट करते हैं 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 इस तरह से चार उंगली पे हम लोग जप करते हैं राजा मार और फिर हम जद हाथ से जप करते हैं कर जप करते हैं तो हाथ को ढक कर के रख देते हैं ठाकुर क्या कहते थे साधना करवे मने वने और कोण अर्थात कि मन के भीतर में करना है किसी रिट्रीट में जाकर के करना है या तो किसी कॉर्नर में करनी है साधना ईश्वर का नाम जप लोगों को दिखा कर के नहीं करना ये जो राजसिक भक्ति के लक्षण ठाकुर कहते थे कि रुद्राक्ष की माला पहनी हुई है बीच-बीच में सोने के दाने हैं फिर वो पीतांबरी पहनी हुई है सर के ऊपर में बड़ा सा तिलक है और बीच-बीच में जय श्री राम या ऐसा कुछ ना कुछ वो बोलते रहते हैं तो वो राजसिक भक्ति का जो लक्षण वो ऐसे लोग अपनी भक्ति का दिखावा करते हैं सात्विक भक्ति है कि हमेशा से वो ईश्वर के साथ में उनका जो आलाप है ईश्वर के साथ में उनका वार्तालाप है वो हमेशा गुप्त रहेगा हमेशा सीक्रेट रहेगा और साथ में ठाकुर किंतु तामसिक भक्ति की भी बात करते हैं कि मारो काटो जैसे डाकू लोग वो कहीं प डकती करने के लिए जाते हैं और तलवार लेकर के वो चालू हो जाते हैं जो भी सामने आए उसको काट दो जो भी के सामने उसको मार दो तो ठाकुर कहते हैं कि गिरीश घोष का इस तरह से भैरव की भक्ति थी तो वो भी एक भक्ति है तो हमको देखना है कि हमारी भक्ति कौन सी है राजा महाराज का ऐसा था किंतु कि जब दर्शन करने के लिए जाते थे मंदिर में तो कर जप करते थे हाथ कर अपने हृदय के ऊपर में रख कर के और वो ढकते नहीं थे हाथ को और वो तीन उंगली से जप करते थे अभी मुझे पता नहीं कि तीन अ कनिष्ठा मध्यमा अनामिका और मध्यमा तीन उंगली से मुझे पता नहीं कैसे होता है तीन उंगली से शायद 1 2 3 4 5 6 7 8 9 इस तरह से मुझे पता नहीं किंतु तीन उंगली से जप करते थे उनकी एक खासियत थी मैंने यहीं पे ही नहीं और भी कई जगह प पढ़ा है और वो ऐसा कर अपने हृदय के ऊपर में रख कर के जप करते और जप जैसे ही मंदिर में प्रवेश किए और शशि महाराज सब लोग अभी उनको अनुभव हो गया है पता है कि राजा महाराज मंदिर में जाएंगे तो क्या होगा तो शशि महाराज ने पहले ही सबको इंस्ट्रक्शन दे दिया है कि महाराज को घिर कर के खड़े रहो चारों ओर खड़े रहो जैसे कि कोई भीड़ में महाराज को धक्का ना लग जाए महाराज के श्री अंग पे कहीं हानि ना हो जाए तो ऐसा करके ये लोग महाराज को चारों ओर सरा सर्कल करके चल रहे है किंतु महाराज जैसे ही श्री मंदिर में प्रवेश किए मीनाक्षी देवी के सामने वो गए साथ में ही वो कर पे माला जपते जपते वो समाधि मग्न हो गए और वो जो एकदम वो अश्रु कंप पुलक जो सात्विक भाव है उनके भीतर में वह एक के बाद एक प्रकट होना शुरू हो गए और वह जो सुंदर व वर्णन है जितेंद्र महाराज लिखते हैं मुहूर मुह अश्रु कंप पुलक देखा दिलो बार-बार उनके शरीर में अष्ट सात्विक भाव जिसको कहते हैं अश्रु यानी कि आंखों में से आंसू आना कंप यानी कि शरीर में ध्रु जारी होना और यानी कि शरीर के जितने भी बाल है वह खड़े हो जाना वो जो लोम हर्षण जिसको कहते हैं रोमांच जिसको कहते हैं वो पुलक व अश्रु कंप पुलक जैसे बार-बार उनके शरीर में दिखाई देने लगा तार भाव गति देखे आगे मने हुए छलो मां के जड़िए धरते चाई छेन उनको देख कर के ऐसा लग रहा था जैसे कि मां को आलिंगन करना जाता है जैसे छोटा बच्चा होता है मां के सामने जाता है मां को कैसे ऐसा पकड़ लेता है दोनों हाथों से वैसे ही मां को धर आलिंगन करना चाहते हैं इस तरह से मतलब उन लगता है कि उनका जो उनके मन का उनके शरीर का चेहरे का भाव देख कर के मार बुके झापी पड़वार जन्नो कातर होए पड़े छ आर देरी सोई ना मां के हाथों में मां के खल में वो बैठना चाहते हैं इस तरह से मन में हो रहा था महाराज को देख कर के जैसे कि अभी मां से दूरत व सहन नहीं हो रहा है एको दाए पड़वार पर मोने होलो श तीव्र व्याकुलता जेनो बांध मान छे ना देहो खानी मार दिके झुके रलो देह जैसे कि पूरा मां की ओर झुक गया जैसे कि वो मां से दरवन नहीं हो रहा है मार्बल पाथरे मेज पड़े गेले रखा नहीं अभी शशि महाराज ने सबको बोला कि अरे महाराष्ट्र तो एकदम मां की ओर इस तरह से झुक गए हैं जैसे कि मां को आलिंगन करना चाहते हैं मां की गोद में बैठना चाहते हैं किंतु अभी ऐसा तो संभव नहीं है मंदिर में तो किंतु अभी जिस तरह से वह झुक कर के खड़े व गिर गए तो यह मार्बल का यह पत्थर की ये जो फर्श है लगेगा महाराज को तो बहुत ही बुरा होगा क्या करेंगे तो शशि महाराज ने सबको कहा कि महाराज को अच्छे से गर के खड़े हो जाओ जैसे कि वह गिरे नहीं कतो खण परे अश्रु कंप और झुके थाक उपशम होलो कितनी देर के बाद में यसे जो झुक कर के खड़े थे अश्र कंप पुलक दिखाई दे रहे थे उसका उपशम हुआ किंतु जैसे ही अष्ट सात्विक भाव का उपसम हुआ साथ में ही क्या हुआ एकन संपूर्ण स्थिर बाह्य शून्य समाधि स्थ अभी संपूर्ण रूप से स्थिर हो गए हैं बाह्य ज्ञान संपूर्ण लोप हो गया है समाधि स्थ हो गए हैं आहा की मुख श्री आहा मुख का जो भाव है मुख श्री उनका कितना सुंदर मधुर दिखाई दे रहा है आनंदो आर धरे उप च पड़ से आनंद जैसे कि उनके शरीर में धर नहीं रहा है वो जैसे कि वोह पानी उबल कर के बाहर आ जाता है वैसे ही आनंद जैसे कि उनके शरीर के भीतर में से बाहर आकर के चारों ओर बिखर रहा है ई दिव्य भाव प्राय आध घंटा थाक लो आमरा दर्शन करे जीवन सार्थक करलो वह दिव्य भाव लगभग आधे घंटे तक रहा हमने यह दर्शन करके हमारा जीवन सार्थक किया क्रम नेक सहज अस्थाई ने में ऐसे खूब मृदु स्व बोलले थोड़ी देर के बाद में धीरे-धीरे करके सहज अवस्था प्राप्त की और बड़े ही शांत भाव से कहा शशि भाई एक खानी गाड़ी डाक ब ना शशि भाई एक थोड़ी गाड़ी बुला दो हम चलो निवास स्थान पे वापस चलते हैं देखिए कितना सुंदर दृश्य जाकर के वो मां के सामने उपस्थित हुए कर जप अपने हृदय पर कर रख कर के जप करते-करते आंखों में से आंसू आ रहे हैं पूरे शरीर में रोमांच के चिन्ह है भाव समाधि के सभी लक्षण उनके शरीर में प्रकट हो रहे हैं मां के सामने झुक गए हैं जैसे कि मां से दूर रहना अभी वो सहन नहीं कर पा रहे हैं अभी जाकर के मां की गोद में बैठ जाएंगे अभी जाकर के दौड़ कर के मां को आलिंगन कर लेंगे इस तरह का भाव उनके पूरे शरीर में प्रकट हो रहा है और जैसे ये भाव उपशम हुआ साथ-साथ में समाधि में चले गए वो देह स्थिर आंख के जो पत्ते हैं वो पड़ नहीं रहे जो आंख की पलक है वो मीट मट नहीं कर रही है पूरे स्थिर समाधि मग्न कितनी देर तक यह भाव चला भीतर का जो आनंद है उनका शरीर मन उस आनंद को धर नहीं पा रहा है आनंद ये शरीर और मन का बांध तोड़ करके जैसे वो हम कभी-कभी वो वीडियो देखते हैं ना शरीर का जो है वह तोड़ करके वह धस मस करके जो पानी का प्रवाह फैलता है वैसे ही आनंद चारों ओर प्रवाहित हो रहा है और महाराज क्या लिखते हैं दर्शन करके हमने अपने जीवन को धन्य किया फिर धीरे-धीरे करके समाधि से नीचे आए भाव का उपशम हुआ और महाराज ने शशि महाराज को बोला कि भाई एक गाड़ी बुला दो चलो वास स्थान फिरते चलते हैं जहां पर निवास स्थान है निवास स्थान पे जाने के बाद में भी महाराज का जो भाव इतना उच्च अवस्था में चला गया है उसका जैसे कि वो सामान्य भूमि पर आ ही नहीं पा रहे कितनी देर तक यह सब चला फिर आखिर में उन्होंने पूछा अरे भाई किसी का खाना बना हुआ है कि नहीं हुआ है अभी खुद समाधि में है उनको खाने की जरूरत नहीं बाकी सब लोगों का क्या इसलिए देखिए उनका एक प्रैक्टिकल भी एक होता है एस्पेक्ट पूछते हैं सबको कि तुम्हारा खाना वगैरह हुआ है कि नहीं तो शशि महाराज कहते हैं कि राजा तुम्हारा तो खाना हुआ नहीं हम लोग कैसे खा ले संध्या के समय सुबह को गए थे दर्शन करने के लिए सांज वो शाम तक वो इत शाम तक का समय लगा मन को सहज अवस्था में आने के लिए फिर शशि महाराज ने कहा कि राजा तुम्हारा तो खाना हुआ नहीं हम लोग कैसे खा ले तब राजा महाराज कहते हैं अच्छा मुझे तेल लगा दो मने फिर वो स्नान करेंगे तेल लगा कर के शरीर पे तेल मालिश करके और फिर सबके साथ में खाना खाएंगे इसके बाद का किंतु दृश्य है वो इतना ही सुंदर है शशि महाराज का और राजा महाराज का देखिए जितेंद्र महाराज क्या लिखते हैं शशि महाराज बोलन शशि महाराज ने राजा महाराज को कहा आज तुम्हार खूब एकटा दिन की बोलो राजा आज तुम्हारा एक बहुत ही सुंदर दिन बीता बोलो राजा क्या कहते हो खूब दर्शन कर ले क्या दर्शन किया तो राजा महाराज ने बड़े ही शांत स्वर से उत्तर दिया मार कृपा मां की कृपा आहा मार कोले की आनंदे लाम की बोलव भाई आहा मां की गोद में कितने आनंद में था क्या बताऊं भाई शशि महाराज आर स्थिर थाक दे पारले ना शशि महाराज अभी स्थिर नहीं रह पाए अपने को वह संभाल नहीं पाए शशि महाराज राजा महाराज को साष्टांग प्रणाम किया और कहते हैं राजा तुम्हार पायर धुलो दाओ देहो मोन पवित्र करी कहते हैं शशि महाराज ने राजा को साष्टांग प्रणाम करके कहा राजा तुम्हारे चरणों की रज दो मैं अपना शरीर और मन पवित्र करूं देखिए शशि महाराज खुद ठाकुर के मानस पुत्र और खुद अपना भाव उपशम को कितना मतलब समझ सकते हैं कि राजा महाराज के भीतर में जो भाव का यह प्रचंड प्रवाह बहता होगा जितेंद्र महाराज जैसे जितेंद्र महाराज विशुद्धानंद जी महाराज उसी समय गए थे जॉइन करने के लिए इन लोगों का मन कहीं आकाश में उड़ता होगा उस समय शशि महाराज किंतु थे उनका रिस्पांसिबिलिटी था कि राजा महाराज को कहीं क्षति ना हो जाए वह गिर ना जाए कोई उनको धक्का ना मार दे राजा महाराज की रक्षा करना वोह शशि महाराज का कर्तव्य था तो अपने भाव को कितना उन्होंने मेहनत करके वश में रखा होगा शशि राजा महाराज की चिंता करते-करते राजा महाराज की रक्षा करते करते वो हम अनुमान करके कह सकते हैं और साथ में ही यह नहीं कि भाई तुम्हारी वजह से मेरा मैंने अपने भव को शांत रखा वरना मैं कोई कम नहीं हु ऐसा नहीं कहके राजा महाराज के सामने साष्टांग प्रणाम करके कहते हैं कि तुम्हारे श्री चरणों की चरण रज दो मैं अपना शरीर मन पवित्र करूंगा तो राजा महाराज कि राजा महाराज को पता है तो बोलते हैं कि की करो भाई की करो भाई अरे भाई तुम क्या कर रहे हो तुम क्या कर रहे हो मुझे पता है कि तुम्हारे मन की जो अवस्था थी तुम्हारा मन खुद जैसे कि वो बंधन तोड़ कर के वो मुक्त गगन में वो उड़ना चाहता मुझे पता है तुम यह क्या कर रहे हो किंतु ततो खण शशि महाराज बोल से पड़ो ना बेटा रा महाराज पाय लूटी है राजा महाराज शशि महाराज को मना कर रहे हैं शशि महाराज दूसरे लोगों को बोल रहे जाओ अरे तुम लोग खड़े खड़े क्या कर रहे हो महाराज के श्री चरणों में साष्टांग प्रणाम करो उनके जो चरण रज मिलेगी धन्य हो जाओगे आमरा तार पाए लूट धन्य होलो हम उनके पैरों में लूट कर के उनके पैरों में साष्टांग प्र प्रणाम कर कर के धन्य हुए देखो आर किछु ना होले हो उसके बाद में जितेंद्र महाराज अपनी अनुभूति बाद में कहते बहुत दिनों के बाद में जब यह स्मृति कथा ये होता है तब वह कहते हैं कि और आर किछु ना होले माने और कुछ जद हमने अपने जीवन में प्राप्त किया है नहीं किया है ए श महापुरुष दर्शने सौभाग्य होए छलो यह सब महापुरुषों के दर्शन का सौभाग्य हमको मिला था तोमरा बोए पड़े छो आमरा चोखे देखे छ देखिए कितनी बड़ी बात कह दी तुम लोग यह सब किताब में पढ़ते हो हमने अपनी नजरों से यह दर्शन किए थे तो चलो एटलीस्ट किताब पढ़ने का भी तो सौभाग्य हमको मिला है वह भी बहुत बड़ी बात है वरना तो गुजरात की ही पॉपुलेशन 7 करोड़ की है भारत की पॉपुलेशन 150 करोड़ की विश्व की पॉपुलेशन 750 800 करोड़ की कौन ये राजा महाराज के रेमनी पढ़ता है उद्बोधन से इतनी सस्ते में किताबें प्रकाशित हो रही है कौन पढ़ने को जाता है तो उनको जो नजरों से देखने का सौभाग्य मिला वह हमको नहीं मिला किंतु एटलीस्ट किताबों के माध्यम से पढ़ने का जो सौभाग्य अपने को मिल रहा है पूरे 700 800 करोड़ में से हम लोग कितने होंगे 1 पर प0 पर तो वह भी अपना कितना सद् भाग्य है वह हम याद करके ठाकुर को प्रणाम करके आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु