प्रार्थना
ओम स्थापकाायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोडा में से दिया हुआ एक प्रवचन जिसका नाम है माय प्लान ऑफ कैंपेन अभी आज जिस पॉइंट का हम डिस्कशन करने वाले हैं, उसकी एक पूर्व भूमिका यह है कि स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि किस तरह से प्रत्येक देश उनका अपना एक आईडिया होता है। एक हिस्टोरिकल वे ऑफ डेवलपमेंट होता है। किस तरह से प्रत्येक कंट्री अह अपने इतिहास के जो उसके संस्कार है, उसका जो कर्म प्रवाह है, उसके अनुसार वह डेवलप होता है। हमने एक चीज जो देखा था एक समय कि किस तरह के इवोल्यूशन होते हैं। तो हमने देखा था कि एक स्पिरिचुअल इवोल्यूशन होता है जिसमें कि एक आत्मन या तो फिर कहेंगे जीवात्मन इट इज अ बेटर वर्ड। एक के बाद एक देह धारण करता है और पिछले जन्म के जो संस्कार है, पिछले जन्म के जो कर्म है, उसके अनुसार वह नया देह धारण करता है। यदि बुरे कर्म किए हैं उसने तो फिर जो अगला जन्म होगा उसमें उस तरह से निम्न योनि में जन्म लेगा और अच्छे कर्म किए हैं यानी कि उसने ईश्वर प्राप्ति के लिए थोड़ी बहुत भी साधना की है तो उसका अगला जन्म उच्च योनि में होगा अच्छे कुल में जन्म लेगा तो यह हमको पता है और साथ में ही हमने देखा था कि किस तरह से सोसाइटल इवोल्यूशन होता है कि जनरेशन आफ्टर जनरेशन कोई भी एक सोसाइटी या कोई भी एक सिविलाइजेशन धीरे-धीरे करके या तो ज्यादा से ज्यादा सोफिस्टिकेटेड एडवांस बनती जाती है या तो फिर धीरे-धीरे करके वो बार्बेरिज्म की ओर आगे बढ़ती जाती है। जैसे कि हमने खास करके अफ्रीका के बारे में एक समय था कि अफ्रीका के फेरोस थे नाइल रिवर वैली सिविलाइजेशन कि जिन्होंने यह पिरामिड वगैरह बनाए। इतने एडवांस थे वे लोग साइंस में, टेक्नोलॉजी में वगैरह में मैन्युफैक्चरिंग में। किंतु धीरे-धीरे करके देखिए कि नॉर्थ अफ्रीका की सिविलाइजेशन है उसका डिटेरेशन होता ही गया। आखिर में एक के बाद एक जो विदेशी लोग आए उनके उन्होंने उस अफ्रीकन सिविलाइजेशन के ऊपर में जुल्म गुजारा। उनका शोषण किया। भारत में भी देखिए कि किस तरह से वैदिक सिविलाइजेशन के बाद में बुद्धिज्म के अंत के बाद में पिछले 1000 साल से हम देख रहे थे कि धीरे-धीरे करके डिग्रेडेशन आ रहा था। तो यह राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन जो होता है वह भी वो सिविलाइजेशन की यह जो इंटरनल डायनेमिक्स है, सिविलाइजेशन के जो कर्मों का प्रवाह है, इसकी वजह से यह सब होता है। काल का चक्र तो घूमता ही रहता है कि कभी अप, कभी डाउन। किंतु जो सिविलाइजेशन के खुद के कर्म है वहां के जो राजा हैं वहां के जो प्रजा हैं वहां के जो धनी विद्वान लोग हैं उन लोगों ने किस तरह से कर्म किए हैं उसका भी एक बहुत बड़ा असर उस सिविलाइजेशन के ऊपर में पड़ता है। तो अभी देखिए कि जनरेशन आफ्टर जनरेशन कोई एक सिविलाइजेशन कोई एक कर्म प्रवाह को लेकर के चल रही हो तो उस कर्म प्रवाह को बदलना इतना आसान नहीं होता है। जब भी कोई भी सिविलाइजेशन में फॉल आता है सिविलाइजेशन का डिग्रेडेशन होता है तो उसका जो राइज जो होना है वो तभी होगा जबकि वो अपना जो प्रवाह कर्मों का प्रवाह वो जनरेशन आफ्टर जनरेशन लेकर चला आता था उसी के माध्यम से उसी सूत्र को पकड़ करके यदि वह प्रयास करता है फिर से वो राइज होने का तो वह अच्छा है उस सिविलाइजेशन के लिए कुछ-कुछ सिविलाइजेशन का हमने ने देखा कि खास करके अगेन ये अफ्रीकन और ये मिडिल ईस्टर्न एंशिएंट सिविलाइजेशन पुरानी सभ्यताओं के बारे में कि जब यह इस्लाम और क्रिश्चियनिटी का आक्रमण प्रारंभ हुआ या तो फिर उनका आगमन जब हुआ तब यह पुरानी सिविलाइजेशन ने अपना जो कर्म का प्रवाह है उसको संपूर्ण रूप से छोड़कर के यह नए जो कर्म प्रवाह है उसको अपना लिया था। यह मिशनरी रिलीजन को अपना लिया था। भारत में किंतु देखिए कि स्वामी जी का जो आईडिया ऑफ भारत का जो प्रोग्रेस है, भविष्य का जो भारत का नवनिर्माण करना है, वह ना ही कोई विदेशी मिशनरी रिलीजन को पकड़ के करना है, ना ही हमको अपनी खुद की संस्कृति को भूल जाना है। स्वामी जी कहते हैं कि जो यह हजारों हजारों सालों का कर्म का प्रवाह हमारा चला आ रहा है, उसी के अनुसार हमको भविष्य में फिर से विकास करना है। और इसका प्रूफ भी हमारे सामने है कि किस तरह से श्री रामकृष्ण देव का आगमन हुआ और उन्होंने वही सनातन भारतीय परंपरा को फिर से पुनर्जीवित किया और इसी सिलसिले में हमने यह भी देखा था कि किस तरह से स्वामी जी ने दो आत्मसमर्पण किए थे। सर्वप्रथम तो आत्मसमर्पण था श्री रामकृष्ण के सामने किंतु एक दूसरा बहुत ही महत्वपूर्ण समर्पण उन्होंने किया था। यह सनातन भारतीय हिंदू धर्म के सामने जिस दिन उन्होंने मां काली को स्वीकार किया था। यानी कि श्री रामकृष्ण देव के साथ में जब प्रथम मुलाकात हुई तब उन्होंने अपने मन से ही तो श्री रामकृष्ण को समर्पण कर ही दिया था आत्मसमर्पण। किंतु यह यात्रा उनकी मां काली को आत्मसमर्पण करने के बाद में समाप्त हुई। तो यह जो स्वामी विवेक अभी यह निवेदिता के बारे में भी सिस्टर निवेदिता के बारे में भी हमने देखा कि किस तरह से सिस्टर निवेदिता ने स्वामी विवेकानंद को तो अपना गुरु के रूप में स्वीकार किया ही किंतु बाद में जब मां शारदा देवी को वह जो सुंदर पत्र लिखती है 1910 में तब हमको पता चलता है कि निवेदिता ने सनातन हिंदू धर्म को भी स्वीकार किया है। हालांकि देखिए कि रामकृष्ण संघ में कन्वर्शन का कोई कांसेप्ट नहीं है। हम ऐसा कभी नहीं कहते कि सिस्टर निवेदिता क्रिश्चियन क्रिश्चियनिटी में से हिंदूइज़्म में उसने कन्वर्शन किया है। हम नहीं कहते। हमारा कांसेप्ट बड़ा स्पष्ट है जो स्वामी जी कहते हैं हमको कि अ बुद्धिस्ट इज नॉट टू बिकम ए क्रिश्चियन और क्रिश्चियन इज नॉट टू बिकम ए मुस्लिम। बट अ क्रिश्चियन हैज़ टू बिकम ए बेटर क्रिश्चियन। अ हिंदू इज़ टू बिकम अ बेटर हिंदू। तो यह स्वामी जी का जो फंडामेंटल आईडिया है। सो इफ निवेदिता बिकम्स अ बेटर क्रिश्चियन शी विल ऑटोमेटिकली एक्सेप्ट हिंदूज़्म विद इन हर हार्ट। क्योंकि आखिर में देखिए कि जगत के जितने भी धर्म है, जितने भी रिलीजन है, उन सबका जो केंद्र बिंदु है, वह तो वही एक ईश्वर है। वही एक ईश्वर में से ही उनकी यह समग्र लीला या तो माया प्रकट हुई है। यदि हम द्वैतवादी होंगे तो कहेंगे लीला, अद्वैतवादी होंगे तो कहेंगे माया। या तो फिर यदि यह सांख्य वगैरह को फॉलो करेंगे तो कहेंगे अज्ञान। बट डज नॉट मैटर। यदि प्रश्न एक ही है कि यह पूरा संसार विश्व संसार एक ही ईश्वर में से प्रकट हुआ है। माने किस मुंह से हम इतने छोटे-छोटे चींटियों की तरह के रहने वाले मनुष्य हैं इस छोटे से पृथ्वी ग्रह के ऊपर में और हम सोच लेते हैं कि प्रत्येक देश के लिए प्रत्येक सभ्यता के लिए प्रत्येक राष्ट्र के लिए एक-एक ईश्वर खड़े होंगे। यह इतना यह सोचना, यह हमारी गलती के अलावा और क्या है? या तो फिर कहेंगे कंसीड इंग्लिश शब्द है। यानी कि हमको इतना बड़ा घमंड है कि हमारे खुद केेंस के ऊपर में कि यह छोटा सा एक कस्बा है। छोटा सा गांव है। हम लोग सोचते हैं कि हमारे ईश्वर अलग है और वो सामने वाला जो दूसरा गांव है उनके ईश्वर अलग है। जैसे कि ईश्वर को कामधाम नहीं है कि एक छोटे से पृथ्वी ग्रह के जो छोटे से जो चींटी की तरह हम जो रह रहे हैं उसके लिए अपने को मल्टीप्लाई करते रहे। प्रत्येक गांव के लिए, प्रत्येक विलेज के लिए तो यह देखिए कि यह 20थ सेंचुरी का सबसे बड़ा या तो फिर रेदर देन कहेंगे 20th सेंचुरी यह जो सिंस रहने सा यह जो प्रारंभ हुआ है बाह्य जगत के नॉलेज में अपनी जो बढ़ोतरी होती रही है वो क्या है पता है यह एक और अपना वेद वेदांत सनातन हिंदू धर्म कहता है कि यह सृष्टि अनंत है। अनंत काल तक चलती रहेगी। यह ब्रह्मा के एक दिन के अनुसार यह सृष्टि के इतने कोटि-कोटि दिन यह सब हम बातें करते हैं। यह सृष्टि, स्थिति, प्रलय यह साइकिल एक के बाद एक ब्रह्मांड प्रकट होते रहेंगे। उनका लय होता रहेगा और फिर से ब्रह्मांड प्रकट होंगे। तो इतना वास्ट अपना जो कॉनसेप्शन है थ्योरिटिकल कॉनसेप्शन। किंतु हम लोगों ने किस तरह से इसके ऊपर में कार्य करने की वजह प्रैक्टिकली स्पीकिंग अपने को एक इस तरह से दायरे में बंद कर दिया था नैरो माइंडेडनेस में कि जैसे कि हमारी थ्यरी सिर्फ थ्यरी ही रह गए। यह साइक्लिकल कांसेप्ट ऑफ यूनिवर्स यह थ्योरिटिकली स्पीकिंग इतना भव्य है कि उसके सामने देखिए कि बाइबल में जो कहा गया है कि 4000 साल पहले सृष्टि की रचना हुई। ईश्वर ने एक ही साथ में जादुई छड़ी घुमाई और जितने भी पशु पक्षी, प्राणी, पेड़, पौधे सब है एक ही साथ में प्रकट हो गए। इसके सामने आप हिंदूज़्म का यह कांसेप्ट ऑफ साइक्लिकल कासेप्ट ऑफ यूनिवर्स कि यह सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकिल चलती ही आ रही है। चलती ही आ रही है। जो इवन कि समय और अवकाश स्वयं इस ब्राह्मण के ब्राह्मण जो है वो इस समय और अवकाश की सीमाओं से परे है। कोजालिटी से परे है। ये जो ग्रांड कांसेप्ट है हमारे उसके सामने यह जो वेस्टर्न क्रिश्चियनिटी के जो एकदम नैरो माइंडेड कांसेप्ट है देखिए कि थ्योरिटिकली हम इतने ग्रेट है उनसे किंतु प्रैक्टिकली स्पीकिंग जब ब्रिटिश लोग भारत में आए बाय दैट टाइम उन्होंने पूरे पृथ्वी के ऊपर में प्रत्येक देश में अपना एंबेसी भेज चुके थे एंबेसी वे लोग कहेंगे हम लोग कहेंगे पायरेट्स भेज चुके थे या तो फिर यह एक्सप्लइटेटिव ट्रेड प्रैक्टिससेस उन्होंने प्रारंभ कर दी थी। तो देखिए कि उनका जो प्रैक्टिकल वर्ल्ड व्यू इतना विशाल हो गया था। जबकि अपना प्रैक्टिकल वर्ल्ड व्यू जैसे हमने डिस्कस किया था कि स्वामी जी साउथ इंडिया में घूम रहे थे। एक पंडित के साथ में बात कर रहे हैं। कह रहे हैं कि विदेश यात्रा करने की जरूरत है। तभी तो हम देखेंगे कि दूसरे देशों में किस तरह से प्रगति हो रही है। स्वामी जी जब भारत से निकले वह बॉम्बे से निकले अमेरिका जाने के लिए तो वह ईस्ट एशिया के रास्ते से गए थे। तो अमेरिका जाने से पहले ही जापान में उनको जो दिखा उसी से स्वामी जी आश्चर्यचकित हो गए थे। उनको थोड़ा बहुत तो पता था क्योंकि वह कोलकाता तो ब्रिटिश एंपायर का राजधानी है। इतने सारे ब्रिटिशर्स वहां पे आते-जाते रहते हैं। तो स्वामी जी को एक जनरल आईडिया तो था ही था कि यह वेस्टर्न सिविलाइजेशन कितना एडवांस हो चुका है। किंतु जापान में जाकर के उन्होंने जो देखा वो तो दंग ही हो गए। वो जो योकोहामा से जो पत्र लिखा है आलासिंगा पेरूमल को कहते हैं कि सी हाउ द नेशंस आर ऑन द मार्च। किस तरह से यह जगत के जो राष्ट्र है वह आगे बढ़ रहे हैं। जबकि हम लोग हैं कि वही बस एक छोटे से दायरे में अपने को संकोचित करके रखे हैं। तो देखिए कि स्वामी जी जो बेसिकली कहते हैं कि यह हमारी जो सनातन परंपरा है जो कि हमारे वेद में इतने भव्य कांसेप्ट है। तो उस भव्य कांसेप्ट को आत्मन स्वयं देखिए कि अहम ब्रह्मास्मि यह कहने वाली सिविलाइजेशन यदि यह कहे कि यदि आपने काला पानी क्रॉस किया है तो फिर आपको नाथ बाहर निकाल देंगे तो फिर उस सिविलाइजेशन के बारे में और क्या कहना? किंतु स्वामी जी कहते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं है कि यह जो 19th सेंचुरी का जो कचरा हमने अपने सर पर लेकर जो बैठे थे पिछले कुछ 200 300 सालों का उसको उसकी वजह से पूरा हिंदू धर्म ही हम फेंक दें। उसकी बजाय चलो क्रिश्चियनिटी को अपना लें। या तो फिर जैसे बात बाद बात बाद में कुछ लोगों ने किया कि बौद्ध धर्म को अपना लिया। इससे बेटर है कि वही हिंदू धर्म के जो ऊपर में यह जो आवरण लग गया है पिछले कुछ सेंचुरीज का यह अज्ञान का इसको दूर करके उसका जो प्रिस्टाइन प्योर स्वरूप है हिंदूइज़्म का उसको पुनर्जीवित करें। तो दिस वास स्वामी जीसस बेसिक आईडिया। स्वामी जी यह समझते थे अमेरिका जाकर के। उन्होंने देखा कि हालांकि अमेरिका दुनिया का सबसे धनी और सबसे धनी देश तो है ही है। किंतु उनका जो ये जो प्रैक्टिकल आउटलुक है उनका जो अंडरस्टैंडिंग ऑफ नेचर है जो प्रकृति के प्रति उनकी जो समझ है साइंस उन्होंने जो डेवलप किया है वो इतना विशाल है कि उसकी वजह से पृथ्वी पर बैठा हुआ मनुष्य यह कैलकुलेट कर सकता है कि जो दूसरे दूसरे जो ग्रह है यह चा जैसे कि यह मार्स है ना कि जुपिटर है ना कि सैटर्न है वह किस गति गति से सूर्य की आर चारों ओर घूमेंगे और यह तो सिर्फ स्वामी जी के समय में ऑलरेडी हो चुका था। बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बादबाद में जैसे ये जनरल रिलेटिविटी स्पेशल रिलेटिविटी और यह क्वांटम डायनेमिक्स उसने हमारे हाथ में इस तरह का पावर दिया है कि हम पूरे ब्रह्मांड का वेट कर सकते हैं। जस्ट इमेजिन कि यह कितना बड़ा सिद्धि है थ्योरिटिकल साइंस के लिए कि हम माने पृथ्वी का वेट क्या है? पूरे कॉस्मोस का वेट क्या है वो हम समझ सकते हैं और एक बहुत ही आश्चर्यजनक डिस्कवरी हमने किया है कि यदि ये कॉस्मोस का जो वेट है यानी कि कॉस्मोस के भीतर में जो मैटर है जो पदार्थ है उसका सिर्फ 4% मैटर ही हमको अपनी आंखों से दिखता है। 4% मैटर ही है जो कि लाइट एमिट करता है जो कि प्रकाशित है और हम अपने दूरबीन से उसको देख सकते हैं। दूरबीन से विजुअल स्पेक्ट्रम में इंफ्रारेड स्पेक्ट्रम में वगैरह में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रे जो एमिट करता है वो सिर्फ 4% मैटर है। अदर देन दैट मोर देन 95% मैटर इस ब्रह्मांड का इनविज़िबल है। जिसको कि डार्क मैटर डार्क एनर्जी कहते हैं। और वी डू नॉट नो कि व्हाट दैट इज। किंतु यहां तक पहुंच जाना कि जो जितना भी कुछ हम देख रहे हैं अपने टेलिस्कोप के माध्यम से, अपनी थरियों के माध्यम से इट इज बेयरली 4% ऑफ दिस एंटायर कॉस्मोस इज सच अ ग्रेट यू कैन से एटेनमेंट। सो स्वामी जी कहते हैं कि देखिए कि उन लोगों का एक स्पेसिफिक बेंट ऑफ माइंड है नेचर और नेचुरल स्टडीज को आगे बढ़ाने का। उन्होंने प्रयास किया है और उसी के अनुसार उनका प्रगति होगा। भारत में हमने यह आत्मत्व खोज निकाला है। जितना भव्य यह साइंटिफिक डिस्कवरी है जिसको पढ़कर के हम रोमांचित हो जाते हैं। यह जो एज ऑफ एक्सप्लोरेशन एक के बाद एक ग्रेट एक्सप्लोरर्स जिन्होंने उस समय यूरोपियंस को लगता था कि बस यूरोप ही है इस जगत में और फिर थोड़े बहुत कुछ देश होंगे आसपास में। किंतु जैसे-जैसे उन्होंने यह एक्सप्लोरेशन प्रारंभ किया, ओशन एक्सप्लोरेशन सी वोएजेस प्रारंभ की, वैसे-वैसे पता चलता गया कि उनको तो पता ही नहीं था कि ये नॉर्थ अमेरिका, साउथ अमेरिका है। इतने बड़े-बड़े कॉन्टिनेंट्स ऑस्ट्रेलिया था वह भी नहीं पता था। एशिया एक्चुअली कितना बड़ा है, वह उनको पता चला। अफ्रीका कितना बड़ा है, वह पता चला। सो, दैट वाज़ एन एक्साइटिंग एज ऑफ नेवल एक्सप्लोरेशंस एंड डिस्कवरीज। उसके बाद में ये एस्ट्रोनॉमी है, कॉस्मोलॉजी है, थ्योरेटिकल फिजिक्स है। इट्स सच एन एक्साइटिंग थिंग टू लर्न, अंडरस्टैंड एंड टू वंडर अबाउट। तो उनका वह जो जिसके भीतर में उन्होंने अपनी प्राण शक्ति डाली भारत में देखिए कि यह जो आत्म तत्व है आत्मन यदि मैं आत्म साक्षात्कार करता हूं तो यह पूरा विश्व ब्रह्मांड उसके सामने गोष्पद उसके तरह हो जाएगा। गाय का पैर जहां पर पड़ता है वह जो छोटा सा एक गड्ढा जैसा उसमें जब पानी डालेंगे वह उतना है यह पूरा विश्व ब्रह्मांड कंपेयर टू दिस एंटायर कॉस्मिक आत्मन मेरी जो आत्मन है या तो फिर इसको हम कहेंगे ब्राह्मण इट इज लाइक ए कॉस्मोस विद इटसेल्फ इसी के भीतर में या तो इसी के नीचे में तो सब यह स्पेस और टाइम है कोजालिटी है यह ब्रह्मांड में जो कुछ भी हो रहा है चांद चांद सितारे पृथ्वी ये जो कुछ भी है सब कुछ तो विद इन दिस आत्मन है। इट इज ऑल ए कंस्ट्रक्ट इन आवर ओन कॉन्शियसनेस। अपनी यह जो कॉन्शियसनेस है उसी के भीतर में तो यह सब कंस्ट्रक्ट हुआ है। यदि हम चाहे तो चुटकी बजा करके हम यह पूरे ब्रह्मांड को हम गायब कर दे सकते हैं। हम अपनी जो ग्लोरी ऑफ आवर ओन आत्मन है उसके भीतर में स्थित होकर के अनंत आनंद का आनंद अनंत ज्ञान का अनंत आनंद का आनंद उठा सकते हैं। यह जो आत्मन का स्वरूप सतित आनंद या तो फिर कहेंगे सच्चित आनंद को आत्मन का स्वरूप नहीं कह के कहते हैं। सच्चित आनंद ही आत्मन है। सो क्योंकि जिसका कोई एट्रिब्यूट होगा उसका फिर यह विकार भी उसमें हो सकता है। तो आत्मन में तो कोई विकार नहीं है। सो आत्मन का कोई एट्रिब्यूट भी नहीं होना चाहिए। सच्चित आनंद इट इज आत्मन इटसेल्फ। तो यह जो अपना ग्लोरियस जर्नी है जितना जितना आप वेदांत को एक्सप्लोर करते जाएंगे और वेदांत सिर्फ अद्वैत वेदांत ही नहीं यह द्वैत वेदांत जिसमें कि यह भक्ति की महिमा गाई गई है। यह गोपियों की भगवान कृष्ण के प्रति जो विरह व्यथा है, उसका जो आनंद है, यह जो राधिका और भगवान कृष्ण का जो प्रेम है, मधुर भाव है, महाभाव जो है ठाकुर के कथामृत में जो वर्णन है, ठाकुर को जब महाभाव होता है, तो कितना आनंद उनके पूरे देह में से प्रकट होता है। तो वह एव्री एक्सप्लोरेशन ऑफ रिलीजियस स्पिरिट इज ए वंडर इन इटसेल्फ। यहां पे यह जैसे यूरोपियन एक्सप्लोरर है, साइंटिस्ट है, उन्होंने दे एक्सप्लोरर्ड दिस यूनिवर्स एंड वी हैव एक्सप्लोरर्ड दिस इनर यूनिवर्स। दिस आउटर यूनिवर्स एंड इनर यूनिवर्स। यह दोनों स्ट्रीम चली आ रही है। यह ईस्टर्न रिलीजन और वेस्टर्न साइंस। तो स्वामी जी यहां पर तो ऐसा कहते हैं कि भारत का जो पुनरुत्थान होगा उसके फाउंडेशन में यह ईस्टर्न रिलीजन ही होने चाहिए। वेदांत योग उसी के माध्यम से ही उसी की इसी को भित्ति बनाकर ही भविष्य के भारत का नवनिर्माण होगा। किंतु साथ-साथ में ही स्वामी जी यह भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भविष्य की जो सिविलाइजेशन होगी उसमें यह जो स्प्लिट बनी हुई है बिटवीन ये आउटर यूनिवर्स एंड इनर यूनिवर्स आउटर कॉस्मोस एंड इनर कॉस्मोस बाहर का ब्रह्मांड और भीतर का ब्रह्मण ब्रह्मण और ब्रह्मांड यह जो स्प्लिट जो बनी हुई है दैट स्प्लिट वी नीड टू फिनिश दैट स्प्लिट वी नीड टू फुलफिल जैसे कि भगवान श्री रामकृष्ण के भीतर में ब्राह्मण का ब्रेन और क्षत्रिय का हृदय, क्षत्रिय का हार्ट यह दोनों का जिस तरह से हार्मोनी हुआ है, इन दोनों का जैसे संगम हुआ है, वैसे ही भगवान श्री रामकृष्ण के भीतर में यह ब्राह्मण और ब्रह्मांड इन दोनों का भी संगम हुआ है। क्योंकि देखिए कि यह जो ठाकुर ने केशव सेन को उपदेश दिया दैट इज़ दैट क्रिटिकल मोमेंट के ईस्ट मीट्स वेस्ट। नो डाउट ईस्ट मीट्स वेस्ट का वो एकदम क्रिटिकल पॉइंट तो स्वामी विवेकानंद ही है। किंतु स्वामी विवेकानंद जिस भावधारा में बड़े हुए थे एक वेस्टर्न थिंकिंग का उस भावधारा का सबसे पहला रिप्रेजेंटेटिव वैसे तो मथुर बाबू कहे जाएंगे। मथुर बाबू का था वेस्टर्न लर्निंग था। वेस्टर्न इंक्लिनेशन भी था। किंतु मथुर बाबू को हम इस तरह से नहीं देखते हैं क्योंकि ठाकुर के प्रति उनकी जो श्रद्धा थी वो दैट सोर्स उसका एक अलग था। मथुर बाबू का था कि मां काली के बहुत बड़े भक्त थे और ठाकुर के भीतर में उनको काली और शिव दोनों के दर्शन हुए थे। बोलकर के उन्होंने ठाकुर को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया था। तो मथुर बाबू की कहानी थोड़ी सी अलग हो जाती है। केशव सेन का ऐसा नहीं था। अभी केशवसेन यदि कोई भगवान में मानता भी है वह तो निराकार ईश्वर में मानता था। तो ऐसा नहीं है कि ठाकुर के भीतर में उनको ऐसा कोई दर्शन हुआ होगा और ठाकुर को उन्होंने स्वीकार किया होगा। ठाकुर को उन्होंने अपनी बुद्धि के माध्यम से पहले तो असेस करने का प्रयास किया है।
केशव सेन और श्री रामकृष्ण की पहली मुलाकात
वह जो पहली मुलाकात का जो वर्णन है ब्राह्म समाज के लिटरेचर में पाया जाता है कि वह केशवसेन एक बागान में अपने शिष्यों के साथ में कोई उत्सव का आयोजन कर रहा था। उस समय यह लोग वहां पर जलाशय में स्नान करके सब बाहर आए थे। यह केशव ने वह वहां पर उस समय केशव अपने सब ब्राह्मण बांधवों के साथ में बैठा हुआ था। उस समय यह हृदय आकर के कहता है कि महाशय मेरे मामा भी आप ही की तरह ईश्वर का नाम लेते हैं और वह भी ईश्वर के नाम से मतवाले हो जाते हैं। नृत्य कीर्तन करते हैं। तो वह आपका दर्शन करने के लिए आए हैं। आपको मिलने के लिए आए हैं। तो आप अनुमति दें तो मैं उनको ले आऊं। वो जो हृदय का था ना वह तो बड़ा कॉन्फिडेंट था। उसका हाइट और बॉडी भी एकदम जबरदस्त था। वो रेसलर की तरह था। और भीतर में ठाकुर की सेवा करके एक आत्म श्रद्धा आ गई थी उसके भीतर में। तो ये बड़े-बड़े लोग जो बैठे हैं इतने प्रेस्टीजियस समाज के उन लोगों के सामने जाकर के बिना किसी भय और संकोच के स्पष्ट रूप से अपनी बात रजू करना वो उसके लिए बड़ा आसान था। तो जैसे ही उसने ऐसा कहा तो मुझे लगता है कि पहले तो लोग हृदय से ही इंप्रेस हो गए होंगे। वो मतलब एक ब्राह्मण युवा है मतलब हाइट है बॉडी है उसका इतना अच्छा और एकदम स्पष्ट रूप से बात करता है तो फिर यह केशव ने कहा कि अच्छा ठीक है ले आइए अपने मामा को तो फिर ठाकुर आए और ठाकुर ने आकर केशव को देखकर के क्या कहा कि देखे जी तुम्हारी लेज खोश है अर्थात कि देखता हूं तुम्हारी ही पूंछ गिर गई है तो अभी सभी लोग हंसना शुरू कर दिए मजा करना शुरू कर दिए पहले तो उन्होंने यही सोच लिया था कि काली का पुजारी है तो निरक्षरण ब्राह्मीर होगा। निरक्षर ब्राह्मण होगा। तो किंतु जब इस तरह से बोला ठाकुर ने तो और भी ज्यादा हंसी मजाक चालू कर दिया कि यह पता ही था कि निरक्षर है। ब्राह्मण है तो अब यह उटपटांग बातें करेगा। तो किंतु केशव सबको कहता है कि नहीं नहीं पहले तो पूछिए उनसे कि ऐसा क्यों कहा है? तब ठाकुर ने कहा कि देखो तुम जैसे वो जो टेड पोल होता है तो वो उसकी पूंछ होती है तो वह सिर्फ पानी में ही रह सकता है। किंतु जब वो टेड पोल में से वह मेंढक बन जाता है फ्रॉग बन जाता है तब वह पानी में भी जमीन पे दोनों पे रह सकता है। तो वैसे ही तुम्हारे पास में संसार के बाहर और संसार के भीतर यह दोनों जगह पे रहने की कैपेसिटी तुम तुमने डेवलप की है। ये जो कहते हैं ना ब्राह्म समाज वाले कि हम हमारा तो राजा जनक का मत है। तब ठाकुर क्या कहते हैं कि वो सिर्फ मुंह से बोलने से तो राजा जनक नहीं हुआ जाएगा। सर नीचे करके पैर ऊपर करके उन्होंने कितने सालों तक तपस्या की थी तब कहीं जाकर के राजा जनक हुआ जाता है। हो आप हो सकते हैं। तो जिस तरह से राजा जनक ने तपस्या की थी उसी तरह यह केशव सेन ने भी तपस्या की नो डाउट उस तरह से ट्रेडिशनल सेंस में नहीं किंतु ठाकुर ही एक बार वर्णन करते हैं कि वो कहीं पर एक ब्राह्म समाज की सभा में गए थे देखा कि केशव वहां पर स्टेज के ऊपर में ध्यान कर रहा है तो ठाकुर ने देखा कि ध्यान में एकदम मग्न हो गया है और ठाकुर को ऐसा दर्शन हुआ मयूर का जैसे मयूर यानी कि यह पिकोक होता है अपनी यह जो पूंछ है अपने मोर पिच्छ है उसको फैला करके कैसे वह बैठता है तो वैसे ही यह मोर मोर पिच्छ की तरह केशव के पीछे में वो मयूर का यह दिखाई दिया जैसे कि अपने दल बल के साथ में बैठा है पूरा जो दल था ब्राह्म समाज का वो जैसे कि मयूर के पिच्छ मयूर के ये थे वो फिदर्स थे तो फिदर्स को फैला करके जैसे मयूर बैठता है नृत्य करता है वैसे ही ये केशव बैठा है ध्यान में मग्न है और चारों ओर ये अपने ब्राह्म समाजी लोग बैठे हैं तो ऑलरेडी ठाकुर ने कथामृत में कहा भी है कि केशव ध्यान में सिद्ध है तो यह केशव के भीतर में तपस्या थी बोलकर के ही वाज़ एबल टू लिव इन संसारा आल्सो एंड एज अ तपस्वी आल्सो तो जैसे ही ठाकुर ने कहा उसी समय केशव की उनके ऊपर में श्रद्धा बैठ गई। किंतु देखिए कि बाद में ठाकुर खुद कहते हैं कि केशव ने ठाकुर की परीक्षा करने के लिए दो-तीन ब्राह्म भक्तों को भेजा था। वे लोग ठाकुर के साथ में दिन रात रहेंगे और ठाकुर का असेसमेंट करके कि जो बोल रहे हैं उसके भीतर में उनके जीवन के साथ में कुछ मैच होता है कि भीतर में सब भ्रष्टाचार है और बाहर में सिर्फ बातें कर रहा है वही योगेंद्र महाराज वाला प्रश्न ठाकुर कहते हैं साधु के दिनें देखवी साधु के रातें देखवी तब साधु ऊपर भरोसा करवी साधु को दिन में देखना है साधु को रात में देखना है तब कहीं जाकर के साधु पर भरोसा करना है तो यह योगिन महाराज नहीं थे। प्रथम परीक्षा करने वाले इस तरह से इस तरह की प्रथम परीक्षा करने वाला तो केशव था। और केशव के यही जो दो-तीन डिसाइपल ठाकुर के साथ में ठाकुर के कमरे में ही दिन रात रहे थे। ठाकुर को ऑब्जर्व करते थे। और फिर इतना ही नहीं कि ठाकुर को ऑब्जर्व करते थे। वे लोग चाहते थे कि ठाकुर यह ब्राह्म समाज में कहीं कन्वर्ट हो जाए। वो दयामय दयामय बोलते रहते थे कि आप कन्वर्ट हो जाइए। आप केशवसेन के शरण में आ जाइए। आपको सिद्धि मिल जाएगा। प्रसिद्धि मिल जाएगा। वगैरह-वगैरह तब एक बार कहीं जाकर के ठाकुर ने नाराज होकर के कह दिया कि तुम लोग निकलो यहां से। तो किंतु देखिए कि यह टेस्टिंग करके जिसको कि स्वीकार करना है। यह मामला जो है यह वेस्टर्न साइंस का है। यह वेस्टर्न साइंस कहता है कि एक्सपेरिमेंट करके प्रूव होता है। तभी किसी चीज को आपको स्वीकार करना है। तो वो सिर्फ अपनी भक्ति के ऊपर में नहीं एक्सपेरिमेंट करके प्रूव हो तब कहीं जाकर स्वीकृत करना। यह जो मॉडर्न कांसेप्ट ऑफ साइंस है उसके साथ में ठाकुर केशवसेन के साथ में पहले ही परिचित हो गए थे। इसीलिए यह जब त्यागी संतान का आना शुरू हुआ। अभी यह नरेंद्र है, योगेंद्र महाराज है। ठाकुर की बार-बार परीक्षा कर रहे हैं तो ठाकुर बुरा नहीं मानते हैं। वह ऐसा नहीं कहते कि सनातन हिंदू परंपरा तो ऐसी है कि जिसको एक बार अपने गुरु के रूप में स्वीकार करो। उनके ऊपर में आंख बंद करके श्रद्धा करो। ठाकुर खुद कहते हैं ना अमरार गुरु यदि सुंडी बाड़ी जाए तब वह अमर गुरु नित्यानंद राय मेरे गुरु यदि वह शराब की दुकान के ऊपर में भी जाते हैं शराब भी पीते हैं व्याभचार भी करते हैं तो भी मेरे गुरु नित्यानंद राय है तो वह अपनी जो परंपरा है कि गुरु के ऊपर में अभी जैसे कि देखिए एक फनी एक आईडिया एक विचार कि मैंने जब शंकराचार्य को पहले पढ़ पढ़ना शुरू किया था। विवेक चिड़ामणि वगैरह उनका जो लेखन है। तो एक मुझे पहले तो हम सबको अभी जैसे कि आप अद्वैत वेदांत में प्रवेश नहीं करते हैं। उस समय तो आपको यही ऐसा लगता है कि अद्वैत वेदांत में ईश्वर है ही नहीं। बाद में पता चलता है कि नहीं ब्रह्म में से ईश्वर प्रकट हो सकते हैं। जब उसके ऊपर में समष्टि अज्ञान का लेयर आता है। तो जो भी है तो वो जब पहले पहले पढ़ना शुरू किया था तब ऐसा ही लगता था कि अद्वैत वेदांत के भीतर में ईश्वर है ही नहीं। किंतु जब यह विवेक चड़ामणि का प्रारंभ होता है और शंकराचार्य जिस तरह से गुरु की स्तुति प्रारंभ करते हैं तो आप यदि गुरु शब्द हटा के किसी देव देवी का नाम लिख देंगे तो कोई भी आपको किसी भी चीज आपको मिस नहीं होगी। ऐसा ही लगेगा भगवान विष्णु की स्तुति ठीक ही चल रही है। बस वह गुरु के नाम पे विष्णु या ऐसा कोई देव देवी का नाम लगा देना है। तो मुझे हंसी इसलिए आई थोड़ा सा फनी इसलिए लगा कि आप यदि ईश्वर को हटा दे रहे हैं तो ईश्वर के लिए जो स्तुति है आपके हृदय में जो शरणागति ईश्वर को करनी है वह आपने अपने गुरु के प्रति कर दी है। तो ये फर्क क्या हुआ? आप कैसे कह सकते हैं आप निराकारवादी हैं। यदि ईश्वर को जितनी श्रद्धा द्वैत वाले देते हैं उतनी ही श्रद्धा यदि अद्वैत वाले गुरु को देते होंगे तो तो यह क्या है कि इट्स जस्ट अ ह्यूमन नेचर कि आपको किसी के प्रति शरणागति करनी है। क्योंकि शरणागति या तो फिर अहंकार का निर्मलीकरण निशेषीकरण वही तो आध्यात्मिक जीवन का प्रारंभ है। भीतर में घमंड रह गया तो आप अपने आध्यात्मिक जीवन में ज्यादा कुछ कभी भी अटेन नहीं कर पाएंगे। सो तो वह जो एक भारतीय परंपरा है कि गुरु के प्रति इतनी शरणागति हो, इतनी श्रद्धा हो कि वह जो कहे वह सब कुछ हमारे लिए जैसे कि ईश्वर का ही आदेश है उसी तरह से हम पालन करें। वह बात जो थी वो किंतु ठाकुर यह त्यागी संतानों से इमीडिएटली एक्सपेक्ट नहीं करते थे। वो कहते थे कि हां ठीक है तुम मुझे दिन में देखकर के रात में देखकर के परीक्षा कर लो। फिर परीक्षा के अंत में यदि तुमको लगे कि हां मैं आपकी सभी परीक्षा में पास हुआ हूं। देन यू एक्सेप्ट मी एज अ गुरु। तो वो जो आइडिया था कि वेस्टर्न सिविलाइजेशन के साथ में यह अपना ईस्टर्न सिविलाइजेशन का मिलन या तो फिर संगम वो श्री रामकृष्ण देव के जीवन में ही हुआ था। उसके जो मथुर बाबू है फिर यह केशव सेन है। उसके बाद में स्वामी विवेकानंद है। यह जो जितने भी एनकाउंटर ठाकुर के जो मेजर एनकाउंटर थे कोलकाता में वो प्रत्येक स्टेप पे जैसे कि यह भारतीय सनातन धर्म आज का जो कटिंग एज मॉडर्न साइंटिफिक थिंकिंग है उसके वो उसके साथ में संपर्क में आ रहा है। इसके बाद में स्वामी जी अमेरिका गए और यह सबसे इम अह माने इसी एनकाउंटर में देखेंगे कि एक बहुत ही इंपॉर्टेंट कड़ी है। एक बहुत ही इंपॉर्टेंट इवेंट है स्वामी विवेकानंद का निकोला टेस्ला के साथ में संवाद और मेरी लुईस ने न्यू डिस्कवरीज में इसके बारे में लिखा है। काफी विस्तृत उसने डिस्कशन किया है कि किस तरह से स्वामी जी के जो आइडियाज है राजयोग और ज्ञान योग के किस तरह से अपनी जो इंद्रियां है अपनी जो सेंसेस है दे आर नॉट ए रिलायबल मीडियम टू कंडक्ट एक्सपेरिमेंट आप अब जितने भी एक्सपेरिमेंटल यह इंस्ट्रूमेंट है अल्टीमेटली तो अपनी इंद्रियों को ही अपनी सेंसेस को ही तो फीडबैक देते हैं। उसी के बेस पर तो हम यह सब कुछ डिटरमाइन करते हैं। किंतु देयर इज़ समथिंग मोर रिलायबल देन दिस सेंसेस एंड दैट इज़ आवर माइंड एंड देयर इज़ समथिंग इवन मोर रिलायबल देन माइंड। दैट इज़ आवर ओन जीवात्मन और द चेतन शक्ति वि इज इनाइड अस। यह जो इंद्रिय है उससे भी ज्यादा रिलायबल है मन। मन से भी ज्यादा रिलायबल है बुद्धि और बुद्धि से भी ज्यादा रिलायबल है। यह चेतन सत्ता हमारे भीतर में जो कि है कॉन्शियसनेस के यह लेवल है। तो किंतु जब स्वामी जी ने स्वामी जी के कुछ-कुछ आइडियाज को तो यह निकोला टेस्ला एक्सेप्ट करता है। किंतु स्वामी जी एट द एंड ऑफ द डे थोड़े से निराश इसलिए हो गए थे कि जो वेदांत के जो मोस्ट रेडिकल कंक्लूजन है वहां तक निकोला टेस्ला नहीं पहुंच पाया था। किंतु फिर बादबाद में आप देखेंगे कि किस तरह से यह जो आइंस्टाइन उसका जो थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी और यह क्वांटम डायनेमिक्स इन दोनों ने मिलकर के वेदांत के बहुत सारे कांसेप्ट को जैसे कि अपना लिया है। जैसे कि यूनिटी ऑफ़ मैटर। ये मैटर और एनर्जी दोनों एक ही है। दोनों इंटरचेंजबल है। तो दैट इज़ इट फीड्स डायरेक्टली विद इन आवर कांसेप्ट ऑफ यूनिटी इन स्पिरिचुअल रियल। तो अभी क्या है कि इस आईडिया पर किंतु हमको और ज्यादा काम करने की जरूरत है। यह ब्रह्म और ब्रह्मांड यह स्पिरिचुअल और यह मटेरियल यूनिवर्स इन दोनों का भी संगम होना चाहिए। एक को एक्सक्लूड करके दूसरा डेवलप हो उस माने स्पिरिचुअलिटी को हटा करके सिर्फ मटेरियल डेवलपमेंट करें। या तो फिर यह मटेरियल डेवलपमेंट को हटा करके सिर्फ स्पिरिचुअल डेवलपमेंट करें। दिस इज नॉट गोइंग टू बी फिजिबल इन कमिंग टाइम्स। दोनों का एक साथ में विकास होना चाहिए। दोनों एक दूसरे के कॉम्प्लीमेंट्री होने चाहिए। सो दैट इज स्वामी जीसस अल्टीमेट कांसेप्ट। किंतु यहां पर यह जो एक पॉइंट है, यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि भारत में हमारा धर्म ही हमारा आध्यात्म ही योग और वेदांत ही हमारी सही-सही धरोहर है। और इसी धरोहर के बेसिस पर हमको भारत के नवनिर्माण का फाउंडेशन डालना है। तो स्वामी जी क्या कहते हैं? वी मस्ट ग्रो अकॉर्डिंग टू आवर नेचर। हमको हमारे स्वभाव के अनुसार ही विकास करना होगा। व्हेन इज इट टू अटेम द लाइंस ऑफ एक्शन दैट फॉरेन सोसाइटीज हैव एनग्राफ्टेड अपॉन अस विदेशी सभ्यताओं ने विदेशी देशों ने खास करके ब्रिटेन ने हमारे सर के ऊपर में एक जो एक विचार थोप दिया है कि क्रिश्चियनिटी और साइंस यही असली चीजें हैं। आपका सनातन हिंदू धर्म पूरा गलत है। उसको हटा दीजिए। इस तरह से यदि हम विकास करने को जाएंगे तो वह बड़ी मूर्खामी ही होगी। इट इज इंपॉसिबल। वह असंभव है। ग्लोरियन टू गॉड दैट इट इज इंपॉसिबल दैट वी कैन नॉट बी ट्विस्टेड एंड टॉर्चरर्ड इनू द शेप ऑफ अदर नेशंस। भगवान की कृपा है। भगवान को हम भगवान का हम प्रशंसा करते हैं। क्यों? क्योंकि उन्हीं की कृपा से यह असंभव है कि कोई हमारे इतिहास को तोड़ मरोड़ करके हमारी यह जो कर्म का प्रवाह है आध्यात्मिक जो धार्मिक हमारी यह जो परंपरा है उसको तहसनहस करके उसके ऊपर में कोई विदेशी परंपरा बिठा दे यह असंभव है। दूसरी सिविलाइजेशन में ऐसा हुआ है। अफ्रीका में ऐसा हुआ है। मिडिल ईस्ट में ऐसा हुआ है। यह नॉर्थ और साउथ अफ्रीका के जो एबोरिजिनल सिविलाइज़ेशन थी वहां पे ऐसा हुआ है। ऑस्ट्रेलियन जो एबोरिजिनल वह जो ट्राइब्स थी उनके साथ में ऐसा हुआ है कि जब भी ये यूरोपियन कॉनकरर्स वहां पे गए उन्होंने स्थानिक सभ्यता का संपूर्ण रूप से निकंदन कर दिया। संपूर्ण रूप से उसको खत्म कर दिया और उसके ऊपर में क्रिश्चियनिटी और मॉडर्न साइंस मॉडर्न ऑर्गेनाइजेशन को बिठा दिया। भारत में किंतु ऐसा कभी नहीं होने वाला है और यही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है। आई डू नॉट कंडेम द इंस्टीटशंस ऑफ अदर रेसेस। दूसरे देशों के जो इंस्टीट्यूशन है, ऑर्गेनाइजेशन है, उनकी जो संस्थाएं हैं, उनका कल्चर है, उनका जो फिलॉसोफी है, उसको मैं कंडेम नहीं करता, क्रिटिसाइज नहीं करता। उसकी निंदा नहीं करता। दे आर गुड फॉर देम बट नॉट फॉर अस। वह उनके लिए ठीक है किंतु हमारे लिए नहीं। व्हाट इज मीट फॉर देम मे बी पोइजन फॉर अस। जो कि उनको उनके लिए जो आहार है वह हो सकता है कि हमारे लिए जहर हो जाए। दिस इज द फर्स्ट लेसन टू लर्न। यह सबसे पहला लेसन है। सबसे पहली शिक्षा है जो कि हमको सीखनी है। वि अदर सोसाइटीज, अदर इंस्टीटशंस एंड अदर ट्रेडिशंस बिहाइंड देम दे हैव गॉट देयर प्रेजेंट सिस्टम। दूसरी सोसाइटीज के लिए, दूसरे सिविलाइजेशन के लिए उनका विज्ञान, उनके इंस्टीट्यूशन और उनकी ट्रेडिशन जो उनके पीछे में है उसने उनकी वर्तमान सिस्टम का वर्तमान सोसाइटी का गठन किया है। वी वि आवर ट्रेडिशंस वि थाउजेंड्स ऑफ इयर्स ऑफ कर्मा बिहाइंड अस नेचुरली कैन ओनली फॉलो आवर ओन बैंड रन इन आवर ओन गुरुस एंड दैट वी शैल हैव टू डू। हम भारत देश हमारी ट्रेडिशंस के साथ में हजारों हजारों सालों के कर्म प्रवाह के साथ में हमारे लिए जो संभव है वही हम करेंगे। हमारे लिए जिस चैनल में आगे बढ़ना है उसी चैनल में हम आगे बढ़ेंगे और वही हम करेंगे भी सही। व्हाट इज माय प्लान देन?
मेरी योजना भारत के महान संतों का अनुसरण करने की है
तो फिर मेरा प्लान क्या है? माय प्लान इज टू फॉलो द आइडियाज ऑफ द ग्रेट एंशिएंट मास्टर्स। मेरा प्लान है जो हमारे भव्य जो गुरु थे, ऋषि मुनि थे, अवतार थे, प्रॉफेट थे, सेंट थे, उनका ही मार्गदर्शन के अनुसार कार्य आगे बढ़ाना है। आई हैव स्टडीड देयर वर्क एंड इट हैज़ बीन गिवन अनटू मी टू डिस्कवर द लाइन ऑफ एक्शन दे टूक। मैंने उनका कार्य विस्तृत रूप से अभ्यास किया है, स्टडी किया है और मैं मैंने खोज निकाला है कि मुझे कौन सी लाइन पे अपना प्लान आगे बढ़ाना है। दे वेर द ग्रेट ओरिजिनेटर्स ऑफ द सोसाइटी। वे लोग सभ्यता के बहुत बड़े निर्माता थे। दे वेर द ग्रेट गिवर्स ऑफ स्ट्रेंथ एंड प्यूरिटी एंड लाइफ। वे लोग थे कि जिन्होंने हमको स्ट्रेंथ, प्योरिटी एंड लाइफ। यह तीन चीज़ दी है। प्रचंड शक्ति दी है। प्रचंड उन्होंने प्यूरिटी अर्थात कि आध्यात्मिकता दी है। पवित्रता दी है। और जैसे कि जीवन बख्शा है। जैसे कि देखिए इन तीनों के भीतर में क्या है? स्ट्रेंथ है क्षत्रिय का कांसेप्ट कि प्रचंड आत्मश्रद्धा होनी चाहिए। उपनिषद का कांसेप्ट है कि प्रचंड आत्मश्रद्धा होनी चाहिए। प्योरिटी जैसे कि एक तरह से ब्राह्मण का कांसेप्ट है हमारे वेद का जो आधार ही है ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्य का जो पालन करता है वही है ब्राह्मण तो यह हो गया ब्रह्मचर्य और लाइफ और यह दोनों के बेस के ऊपर में उन्होंने हमको एक आध्यात्मिक जीवन दिया है। आध्यात्मिक जीवन का फाउंडेशन क्या है? ब्रह्मचर्य है और आत्मश्रद्धा है। इन दोनों के ऊपर में उन्होंने हमारे यह जो आध्यात्मिक जीवन है उसका गठन किया है। दे डीड मोस्ट मार्वेलस वर्क। उन्होंने बहुत ही सुंदर कार्य किया है। वी हैव टू डू मोस्ट मार्वेलस वर्क आल्सो। तो हमको भी इतना ही सुंदर कार्य करना है। सरकमस्ट्ससेस हैव गिव हैव बिकम ए लिटल डिफरेंट एंड इन क्सक्यूस द लाइंस ऑफ एक्शन हैव टू बी चेंज्ड ए लिटिल एंड दैट इज ऑल परिस्थितियां थोड़ी सी बदल गई है। वह वैदिक युग था। आज यह हम वेस्टर्न युग में रह रहे हैं। तो इसके अनुसार यह जो मटेरियल साइंस है, एज ऑफ एक्सप्लोरेशन है, एज ऑफ रीजनिंग है, एज ऑफ जो एनलाइटनमेंट है, उसके अनुसार हमको हमारी मेथड्स को भी थोड़ा सा बदलना होगा। बस इतना ही है। आई
धर्म भारत का मूलमंत्र है
सी दैट ईच नेशन लाइक ईच इंडिविजुअल हैज़ वन थीम इन दिस लाइफ वि इज इट्स सेंटर द प्रिंसिपल नोट राउंड व्हिच एव्री अदर नोट कम्स टू फॉर्म द हार्मोनी। मैं देखता हूं कि प्रत्येक इंडिविजुअल की तरह प्रत्येक इंसान की तरह प्रत्येक देश का भी एक सेंट्रल थीम होता है उसके जीवन में उसके जीवन के केंद्र में जो कि उसकी एक प्रिंसिपल नोट यानी कि म्यूजिक नोट्स जो होती है राग होते हैं सुर होते हैं तो उसके जीवन का एक मुख्य राग वो गठित करता है जिसके आसपास में जितने भी सुर स्वर राग हैं। वह उसी के इर्दगिर्द घूमते रहते हैं। उसी के आसपास में एक सुंदर हार्मोनी, एक सुंदर संगीत या तो फिर भजन की रचना करते हैं। इन इन वन नेशन पॉलिटिकल पावर इज इट्स वाइटालिटी एज इन इंग्लैंड। आर्टिस्टिक लाइफ इन अनदर एंड सो ऑन। कोई एक देश में जैसे कि इंग्लैंड में उसका केंद्र है पॉलिटिकल पावर। और कोई देश में होगा कि आर्टिस्टिक लाइफ। और इसी तरह से अभी देखिए कि आर्टिस्टिक लाइफ यह स्वामी जी मोस्ट प्रोबेबबली फ्रांस को ही यहां पे इंगित कर रहे हैं। और स्वामी जी का एक बड़ा सुंदर ऑब्जरवेशन भी था। देखिए कि फ्रांस है एक पुरानी सिविलाइजेशन पुराना देश और वहां पे कितने ही सैकड़ों सालों से अभी वो पुराना यानी कि हजारों सालों में तो काउंट नहीं होता है उनका वो इतिहास। सैकड़ों सालों में काउंट होता है। तो यूरोपियन स्टैंडर्ड के अनुसार सैकड़ों सालों पुराना फ्रेंच सिविल फ्रेंच सोसाइटी है। फ्रेंच सिविलाइजेशन था और अभी भी है। तो ये आर्टिस्ट्री जो है जो ग्रेट पेंटर, ग्रेट म्यूजिशियन, ग्रेट थिंकर, ग्रेट फिलॉसोफर जो फ्रांस में प्रकट हुए उन्होंने फ्रांस को बड़ा ही एनरच किया है। अभी जब स्वामी जी यूरोप का जर्नी कर रहे थे तो उन्होंने फ्रांस और जर्मनी दोनों को देखा। अभी जर्मनी क्या है कि वो नया-नया थोड़ा सा वो अनसिविलाइज या बारबेरिटी में से थोड़ा सा अभी खड़ा हुआ था। फ्रेंच वैसे जर्मन वैसे थे बड़े स्ट्रांग किंतु क्या था कि जर्मन नेशन एस सच को उसका कोई डेवलपमेंट नहीं हुआ था। इट वाज़ अ पार्ट ऑफ होली रोमन एंपायर। तो उसकी वजह से जो एक जर्मन आइडेंटिटी होनी चाहिए, जर्मन कल्चर होना चाहिए, जर्मन आर्ट होनी चाहिए वगैरह-वगैरह वो अभी उसी समय धीरे-धीरे करके डेवलप हो रही थी। हालांकि थे बड़े रिच यूरोपियन स्टैंडर्ड के अनुसार किंतु आर्टिस्ट्री उनके भीतर में इतनी नहीं थी। यही दिखाता है कि बाद में हिटलर का जन्म जर्मनी में हुआ या तो फिर नजिज्म का जन्म जर्मनी में हुआ। सो उनके भीतर में ब्रूटालिटी और बार्बेरिटी का एक स्ट्रिक उसी समय था। दिख रहा था स्वामी जी को स्पष्ट। तो स्वामी जी कहते हैं कि देखिए कि मैं फ्रांस में जाता हूं। वहां पर घोड़े रखने का जो अस्तबल होता है वह भी आपको एक पैलेस की तरह इतना सुंदर और भव्य दिखेगा और जर्मनी में जाता हूं तो वह पैलेस भी यदि एक होगा ना तो उसके भीतर में यह घोड़े का अस्तब घोड़े रखने के अस्तबल की तरह ब्रूटालिटी वहां पे दिखाई देगी। यानी कि यह स्वामी जी का ऑब्जरवेशन था। बाद में यह एकदम परफेक्ट ट्रू हुआ कि नाजिज्म पूरा वहीं पे जन्म लिया। सो यह स्वामी जी कहते हैं कि यह जो कहते हैं कि किसी किसी देश का वो सेंटर ट्यून है, सेंटर राग या तो यह धुन है, उसका पॉलिटिकल पावर और किसी देश का है आर्टिस्टिक पावर। तो यह आर्टिस्टिक पावर को यहां पे फ्रेंच का नाम नहीं लिखा है। किंतु आई गेस कि वह फ्रांस के बारे में ही बात कर रहे हैं। इन इंडिया रिलीजियस लाइफ फॉर्म्स द सेंटर द की नोट ऑफ द होल म्यूजिक ऑफ नेशनल लाइफ। भारत में किंतु धार्मिक जीवन ही है। आध्यात्मिकता ही है जो कि हमारा केंद्र है जो कि हमारी की नोट है जो हमारा मुख्य राग है जिसके इर्द-गिर्द जिसके आसपास में हमारा भारतीय संगीत बना हुआ है। एंड इफ एनी नेशन अटेमप्ट्स टू थ्रो ऑफ़ इट्स नेशनल वाइटालिटी, द डायरेक्शन व्हिच हैज़ बिकम इट्स ओन थ्रू द ट्रांसमिशन ऑफ़ सेंचुरीज़ दैट नेशन डाइस इफ इट सक्सीड्स इन द अटेम्प्ट। और यदि कोई देश उसके खुद का ये जो प्राण है उसकी प्राण शक्ति है ये जो सेंट्रल की नोट या तो मुख्य राग उसको फेंक करके दूसरे देशों को यदि अपनाने को प्रयास करता है। दूसरे देशों का अनुकरण करने का प्रयास करता है। दूसरे देशों की यह इंपोर्टेड आईडियोलॉजी को अपनाने का प्रयास करता है तो वह देश मृत्यु के घाट उतरता है। वह देश नेस्तनाबूत हो जाता है इतिहास के पन्नों से और हमने देखा भी सही कि किस तरह से यह नॉर्थ अमेरिकन साउथ अमेरिकन जो एबोरिजिनल सिविलाइजेशन थी यह नॉर्थ अफ्रीका की नाइल वैली सिविलाइजेशन मिडिल ईस्ट की ये यूफ्रेटिस टाइगरिस रिवर वैली सिविलाइजेशन यह ऑस्ट्रेलिया की एबोरिजिनल ट्राइब्स इनका किस तरह से सत्यानाश हो गया जबकि ये यूरोपियन सेटलर या तो फिर यह इस्लाम वहां पर प्रवेश हुआ था। तो स्वामी जी कहते हैं कि आपका खुद का जो नेशनल की नोट है, सिविलाइजेशनल सेंटर है, उसको छोड़कर के दूसरे देशों से यदि इंपोर्टेड आइडियोलॉजी मंगवाएंगे तो आपकी सिविलाइजेशन का खात्मा हो जाएगा। देश बचेगा जैसे कि अफ्रीका है, मिडिल ईस्ट है, अभी भी बचे हुए हैं। किंतु अपने ओरिजिनल स्वरूप में नहीं। एंड देयर फॉर इफ यू सक्सीड इन द अटेमप्ट टू थ्रो ऑफ योर रिलीजन एंड टेक अप आइदर पॉलिटिक्स और सोसाइटी और एनी अदर थिंग्स एज योर सेंटर एस द वाइटालिटी ऑफ योर नेशनल लाइफ द रिजल्ट विल बी दैट यू विल बिकम एक्सटिंक्ट। तो यदि आप इस अटेमप्ट में इस प्रयत्न में सफल हुए कि जो धर्म को हटा के दूसरे देशों से यह पॉलिटिक्स है या और कोई आईडियोलॉजी आपने इंपोर्ट की तो आपका जीवन आपके जो देश है आपका यह जो राष्ट्रीय प्राण है वह एक्सटिंक्ट हो जाएगा। उसका सत्यानाश हो जाएगा। अच्छा इसके बाद में भी बहुत कुछ है इसमें जिसको कि अभी हम कल स्टडी करते हैं। आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु हां हां बहुत कांसेप्ट और भी
प्रश्न: स्वामीजी का यह कितना महान कथन है कि धर्म ही भारत का मूलमंत्र है! Q: what a great observation by swamiji that religion is the keynote of india!
है और भी बड़े इंपॉर्टेंट इंपोर्टेंट कांसेप्ट है स्वामी जी के आएंगे इसमें किंतु एक बात याद रखनी है कि हम रिवर्स डायरेक्शन में ना चले जाए क्योंकि स्वामी जी एकदम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि आपको जिस तरह से अपना धर्म को बचाए रखना है, वैसे ही साइंस को भी हमको उठाना है। सो, दैट वी हैव टू अंडरस्टैंड दैट इज़ एसेंशियल पार्ट ऑफ स्वामी जीसस प्लान। यह
प्रश्न: हमें अपने धर्म को बनाए रखने और पश्चिम से नई चीजें सीखने के बीच एक अच्छा संतुलन बनाने की आवश्यकता है। Q: we need a fine balance between keeping our religion and also learn new things from west.
जो कुछ-कुछ देशों को हम देखते हैं ना जैसे जापान है फॉर एग्जांपल किस तरह से अपना ट्रेडिशन को भी बचाए रखा है और किस तरह से मॉडर्निटी को एक्सेप्ट किया है। किंतु देखिए कि जापान ने जो एक फेटल मिस्टेक शुरू में कर दिया था खुद के धर्म को छोड़ के ये जो होलसेल उन्होंने वेस्टर्नाइज करने का जो प्रयास किया था उसी की वजह से वो सेकंड वर्ल्ड वॉर में उन्होंने कितना अत्याचार किया था दूसरे देशों के ऊपर में। सो हमने वो वो गलती हमने नहीं की है ठाकुर की कृपा से। यह जापान का जो चाइना के ऊपर में युद्ध था और चाइना में उन्होंने जो रेप ऑफ नन किंग बोल के वह एक इवेंट है वो नैन किंग बोलकर के एक है वहां का सिटी या तो एरिया वहां पे जो जापानीज आर्मी गई और जो भयानक अब्यूज किए हैं मतलब पढ़कर के रोंगटे खड़े हो जाएंगे कि इतना ओल्ड सिविलाइजेशन इस तरह का अत्याचार कर सकता है मनुष्य के ऊपर में ये वो तो एटम बम गिरने के बाद की बात आप
प्रश्न: जापानी लोग बहुत सज्जन हैं। वे कभी अपनी आवाज ऊंची नहीं करते। Q: Japanese are very gentle people. they never rise their voice.
कर्सरी सर्च करके भी देखेंगे जापान अब्यूज ड्यूरिंग सेकंड वर्ल्ड वॉर मतलब भयानक भयानक कांड उन्होंने किया
प्रश्न: नई पीढ़ी मंदिर नहीं जाना चाहती। हम उन्हें आधुनिक दृष्टिकोण और धार्मिक भावना कैसे सिखा सकते हैं? हम उन्हें पश्चिमी विज्ञान और भारतीय आध्यात्मिकता के बीच संतुलन बनाए रखना कैसे सिखा सकते हैं? Q: the new generation doesnt want to go to temple. how can we teach them to be modern in outlook but religious in spirit? how can we teach them to maintain balance between western science and indian spirituality?
है। एक्चुअली क्या है ना कि हम इसको धर्म की एक कपड़े नहीं पहना करके लेट अस ट्रीट इट एज अ साइंस कि आप देखिए कि अभी जैसे कि योग है। योग इज परफेक्ट साइंस। इसको आप प्राणायाम करना, आसन करना, ध्यान करना यह यदि स्कूल के लेवल पे ही यदि हम बच्चों को सिखाते हैं तो दे विल नेवर हैव दिस टाइप ऑफ कंफ्लिक्ट के व्हाई डू आई बिलीव इन विष्णु व्हाई डू आई बिलीव इन मां काली? वो मां काली है कि नहीं किसको पता? स्वामी जी के खुद के मन में यह संदेह जो बना रहा था तो ठाकुर की कृपा से वह संदेह भंजन हुआ ना। हमारे पर तो कोई कृपा करने वाला है नहीं कि इस तरह के संदेह को कोई तोड़ने को आएगा। बट इन द फॉर्म ऑफ योगा देयर इज़ वी हैव अ परफेक्ट साइंस कि आप इसको साइंटिफिक बेसिस पे बचपन से ही बच्चों को सिखाइए। तो बाय द टाइम दे आर ग्रेजुएट दे विल बी सो डीपली स्पिरिचुअल और विदाउट सेइंग दैट आई एम स्पिरिचुअल। ऐसा कोई जरूरत नहीं है कि आप योगा कर रहे हैं। योगा प्रैक्टिस कर रहे हैं। यू विल लाइक टू कॉल योरसेल्फ कि हां मैं धर्म का पालन कर रहा हूं या मैं स्पिरिचुअल हूं। नो नीड टू से एनी ऑफ़ दिस थिंग। जिस तरह से आप फिजिक्स स्टडी करते हैं, फिजिक्स इज़ अ परफेक्ट साइंस। उसमें कोई बिलीफ सिस्टम का तो प्रश्न नहीं है कि हां, मैं फिजिक्स में बिलीव करता हूं। वो बिलीव क्या करना है? इट्स अ प्रैक्टिस। इट्स अ एक्सपेरिमेंट। प्रैक्टिकल। आपको विश्वास नहीं है प्रैक्टिकल करके देख लीजिए कि ये जो E = MC² या तो फिर F = मास * एक्सीलरेशन या तो PV = NRT प्रेशर एंड वॉल्यूम इक्वल्स टेंपरेचर। ये दिस आर द मैटर ऑफ़ एक्सपेरिमेंट। करके देख लीजिए, प्रूव कर लीजिए। सो, योगा इज़ आल्सो ए प्रैक्टिकल एक्सपेरिमेंट एक्स एक्सपेरिमेंटल साइंस यू प्रैक्टिस इट एंड यू विल सी हाउ इट गिव्स यू बेनिफिट। सो वंस वी योगा इज़ आई थिंक दैट जो कि एक मिडिल पॉइंट है जो कि एक और वेदांत का यदि आप बात करें कि यहां मैं ब्रह्मन हूं या आत्मन हूं तो प्रश्न हो सकता है कि इफ देयर इज ब्राह्मण और नॉट आई डू नॉट नो कि विश्वास नहीं हो रहा है। ईश्वर है कि नहीं विश्वास नहीं हो रहा है। बट योगा इज अ परफेक्ट साइंस। योगा इज अ मीटिंग पॉइंट बिटवीन ईस्ट एंड वेस्ट। कि जो आजकल जो विदेश में योगा का इतना जो पॉपुलैरिटी है दैट इज आल्सो कि उनको कहेंगे वेदांत को स्वीकार करो तो 10 बार सोचेंगे कि वो कहेंगे कि या जो यह जो भाव है या वैष्णव भावधारा है उसको स्वीकार करो तो 10 बार सोचेंगे। बट योगा इज़ अ साइंस। यू प्रैक्टिस इट एंड यू फाइंड आउट द बेनिफिट्स। सो आई थिंक दैट योगा शुड बी टॉट फ्रॉम द चाइल्डहुड टू एव्री स्कूल।
प्रश्न: हां, योग पश्चिमी विज्ञान और पूर्वी अध्यात्म का मिलन बिंदु है। Q: yes, yoga is the meeting point between western science and eastern spirituality.
आज जितने भी एडवांस मेडिकल प्रैक्टिससेस है सब में यह प्रूव हुआ है कि मेडिटेशन का मेंटल हेल्थ पे बड़ा ही पॉजिटिव असर है। यू डोंट हैव टू बिलीव इन समथिंग इन ऑर्डर टू डिराइव बेनिफिट फ्रॉम मेडिटेशन। इट्स अ कंप्लीटली सेकुलर। यदि आप सेकुलरिज्म में बिलीव करते हैं इट्स अ कंप्लीटली सेकुलर प्रैक्टिस।
प्रश्न: मैंने देखा है कि आजकल युवा लोग भी धर्म की ओर आकर्षित हो रहे हैं। समाज में धर्म का महत्व बढ़ता जा रहा है। Q: i have seen that even young people are attracted to religion nowadays. religion is becoming more prominent in the society.
वो जो मुझे वो वकर क्लब से बुलाया था ना वो बोला था वो नॉन रिलीजियस लेक्चर देना है तो मैं जैसे ही एंटर हुआ वो हॉल में वो देखा वो उस दिन रामनवमी थी तो रामनवमी की पूजा कर रहा है मैंने सोचा कि ये क्या हो रहा है फिर वो बोलना शुरू किया वो जो इंट्रोडक्शन वगैरह देते हैं ना तो शुरू करते हैं जय श्री राम तो सभी लोग बोलते हैं जय श्री राम आई आई एम सो कंफ्यूज्ड। समझ में नहीं आ रहा है कि ये क्या हो रहा है। फिर जय श्री राम बोलना है तो ऐसा क्यों कहा कि वो नॉन रिलीजियस टॉपिक पे बोलना है। [हंसी] नहीं मुझे ऐसा लग रहा है ना कि इन लोगों ने यह फॉर्मल और इनफॉर्मल ऐसा दो स्प्लिट कर दिया है। फॉर्मल जब बोलते हैं तो इंट्रोडक्शन क्या देखते हैं देते हैं कि हम लोग एक इंटरनेशनल वोकर सोसाइटी है उसके साथ में एसोसिएटेड है। उसके लोकल चैप्टर है। यानी कि वह अभी वो इंटरनेशनल सोसाइटी के साथ जुड़े हुए हैं तो थोड़ा सा तो सेकुलरिज्म दिखाना पड़ेगा। किंतु जैसे ही वो इंट्रोडक्शन खत्म हो गया वो भीतर वाला वो जय श्री राम बाहर आ गया। वो ठाकुर कहते हैं ना कि एक पंडित को पकड़ करके वो जोर जबरदस्ती मुस्लिम बना दिया। तो अभी वो अल्लाह नाम का जप कर रहा है। बीच में काली आ जाता है। तो वो वो मुस्लिम लोग उसको मारने को जाते हैं। तो बेचारा बोलता है कि मैं क्या करूं? गले तक का लिया गया
प्रश्न: दुनिया भर में अल्पसंख्यक अधिकार, मुक्त व्यापार आदि जैसी प्रगतिशील विचारधाराएं पराजित हो रही हैं। रूढ़िवादी फिर से जीत रहे हैं। Q: world over the progressive ideologies like minority rights, free trade, etc is getting defeated. conservatives are winning again.
है। एक बात जो हमको याद रखनी है कि यह जो यूरोपियन एनलाइटन थॉट है, यूरोपियन लिबरलिज्म है व्हिच इज व्हाट ब्रॉट इज रेनेसा रिबर्थ ऑफ लर्निंग जो कि पूरे विश्व में और कोई नहीं कर पाया है। इंक्लूडिंग इंडिया कि ये जो लेटेस्ट कटिंग गेज जो डेवलपमेंट होना है साइंटिफिक वो दैट इज ओनली वन सिविलाइजेशन करेंटली दैट इज अ वेस्टर्न सिविलाइजेशन। सो ऐसा ना हो जाए कि कहीं पर हम अपने रूट्स पर वापस जाने के चक्कर में वो वो पागल ब्राह्मण जो वो बोल रहा था कदापि ना कदापि उस तरह का वो अंधश्रद्धा में वापस ना डूब जाए दैट वी हैव टू बी एक्सट्रीमली केयरफुल क्योंकि फिर तो ऐसा हुआ ना माया मिली ना राम वो पुरानी वैदिक सिविलाइजेशन वैदिक ऋषियों की तरफ वापस जाने का तो हुआ ही नहीं ऊपर से ये जो आजकल का जो सेकुलरिज्म सेकुलरिज्म शब्द शब्द गलत है। यह यूरोपियन एनलाइटनमेंट है। जिसकी वजह से रेनेसा की वजह से जो आज के साइंस और टेक्नोलॉजी के फ्रूट हमको मिल रहे हैं खाने को वो भी जाए हाथ में से और यह उपनिषद का ऋषि लोग भी हाथ में ना आए। वो तो दोनों हाथ में से जाए ऐसा कहीं ना हो जाए।