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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार षय राम कृष्णा यते नमः मां और ठाकुर का जो रिलेशन है उसमें हमको बहुत सारा चीज कंट्रक्शन जैसा दिखेगा इस डिक्शन के बारे में हमने जब जब भी यह कंट्रक्शन आई है हमने डिस्कस किए हैं और यह भी एक है कि जब ठाकुर कहते हैं कि हृदय व सुधु आबे और जाब मानुष जीवन किछु करा होब कि ना किछुई करा कोखन होवे यह जो प्रश्न है अभी एक्चुअली क्या है कि अभी जो ठाकुर का यह जो सेंटेंस है उसको हम किस तरह से इंटरप्रेट करते हैं एक इंटरप्रिटेशन यह है कि मनुष्य जीवन का जो कर्तव्य जो है वह मां उसका पालन करेगी कि नहीं यह एक इंटरप्रिटेशन है हमारी ओर से इंटरप्रिटेशन है खास करके मैं मेरी बात कर रहा हूं यह मेरा इंटरप्रिटेशन है और ठाकुर ऐसा क्यों कहेंगे क्योंकि ठाकुर मुसे तो ठाकुर ऐसा कहते हैं दूसरी ओर ठाकुर ही मां को सब कुछ सिखाते हैं हमने देखा है कि किस तरह से ठाकुर ने मां को वोह दिया किस तरह से वह जो दिए की वाट है वह किस तरह से लगानी है वहां सेले लेकर के नौका में किस तरह से उठना है नौका में जाने के समय सबसे पहले उठना है आने के समय सबसे आखिर में उतरना है वह सब चीजें ठाकुर ने मां को एकदम बिल्कुल ध्यान रख कर के सिखाई है जब ध्यान तो सिखाया ही है साथ में संसार में किस तरह से रहना है लोगों के साथ में किस तरह से व्यवहार करना है ठाकुर ने सब कुछ मां को सिखाया है तो यह होने के बावजूद आखिर में ठाकुर ऐसा क्यों बोलते हैं तो वो एक है इस ये सब प्रश्नों की कोई सही सही मीमांसा नहीं होती है हम लोग अपना इंटरप्रिटेशन देते हैं जैसे मैंने कहा अब मेरा इंटरप्रिटेशन है कि ठाकुर शायद ऐसा सोचते होंगे कि मां शायद एक जगह पर रहेगी और फिर वही जो उनकी जब ध्यान वगैरह जो साधनाए वो करती रहेगी किंतु मां का जीवन तो अपने एक पैरेलल एक उद्देश्य से आया है तो ठाकुर को शायद ऐसा नहीं होगा कि सब समय यह पता हो कि मां के जीवन का जो महात्म है देखिए कि मां के जीवन का महात्म कितने धीरे-धीरे करके रामकृष्ण संघ के भक्तों में यह प्रसार हुआ है ठाकुर के साथ में भी ऐसा हो सकता है कि मां के जीवन का महात्म सर्वप्रथम एक साथ में पूरा न समझ पाए हो और धीरे-धीरे करके मां काली ने उनको समझाया हो कि हां एक साल इस तरह से नेक्स्ट ईयर थोड़ा सा और डिटेल में समझाया उसके नेक्स्ट ईयर और थोड़ा सा डिटेल में समझाया तो यह सब हम लोगों की इंटरप्रिटेशन है इंटरप्रिटेशन अ जिस जितनी अपनी बुद्धि चलती है जितना अपना यह यह चलता है क्या कहेंगे साधना उतना हम कर पाएंगे किंतु सही सही में इसका कोई उत्तर नहीं है यह सब जैसे मैंने हमने पहले भी डिस्कस किया था क्वांस की तरह है पजल्स जैन बुद्धिज्म में एक पजल देते हैं उसको कहते हैं क्वान इसका कोई सही उत्तर नहीं होता असंभव पजल होती है और उसके ऊपर में चिंतन करते-करते सडन एक दिन ऐसा आएगा कि पता चलेगा अरे भाई इसका तो बुद्धि की बुद्धि से हम इसका कोई उत्तर नहीं खोज पाएंगे इसको तो मन से और बुद्धि से परे जो अपना अस्तित्व है उससे इसको समझना है ठाकुर और मां का दोनों का देखिए भगवान और भगवती एक ही सत्ता के दो स्वरूप है दो किरण है एक ही सूरज की एक ही पर्पस के लिए आए हैं पृथ्वी के ऊपर में मनुष्य का कल्याण करने के लिए किंतु यह पृथ्वी रूपी रंग मंच है ना वहां पे भगवान विभिन्न वस्त्र धारण करके विभिन्न पात्रों का अभिनय करते हैं विभिन्न देह धारण करके तो अभी जदी इन लोगों में थोड़ा सा कंट्रक्शन नहीं होगा तो अभिनय तो एकदम एक जैसा दिखेगा बोरिंग दिखेगा जैसे कोई भी अभिनय देखिए वहां पे एक हीरो होता है फिर एक विलन होता है कभी कोई कॉमेडियन होता है कभी कोई बायस्टैंडर्स होते हैं कोई जोकर होता है बहुत सारे तरह के विभिन्न विभिन्न पात्र होते हैं और सभी पात्रों में कंट्रक्शन होती है वो कंट्रक्शन देख कर के हमको थोड़ा सा यह अभिनय देखना अच्छा लगता है यदि सभी एक ही तरह के होते हैं एक ऐसा अभिनय एक ऐसा कि जहां पर सभी लोग कॉमेडियन है या तो फिर सभी लोग विलन है नाक सभी लोग हीरो है तो फिर वो बोरिंग हो जाएगा वो भीन इसीलिए ये कंट्रक्शन खड़ी करके हमको उपदेश देने के लिए यह सब चीजें होती है जगदंबा होकर के जगदंबा के सामने धरना देना अभी आज ही मैं कहानी पढ़ रहा था मां की कि मां के वहां पर एक किसी ने एक गाय डोनेट की तो गाय की संभाल रखने के लिए एक बच्चे एक लड़के को रखा था अभी यह लड़का एक दिन मैदान में गया होगा किसी कार्य वश तः खेत में एक सांप ने उसको काट दिया तो यह सब लोग दौड़े दौड़े उसको लेकर आए घर में और वहां पर एक डॉक्टर भी था तो मां के घर में जयराम बाटी में वो कोई साधु ही होगा शायद तो उसने क्या किया कि जनरली सर्पदंश होता है तो उस भाग को काट कर के विष को निकाल लेते हैं तो उसने चाकू लिया और वहां पर काटा जैसे ही उसने काटना प्रारंभ किया मां दौड़ी दौड़ी आई बोली कि अरे यह सब क्या कर रहे हो इस तरह से इस तरह से नहीं इसको जगद धात्री देवी के वहां पर ले जाओ फिर उसको जगत धात्री के वहां पर ले गए वहां पर वो नाट्य मंडप में उसको सुलाया और माने उसके पूरे शरीर पर वो जो माटी है जगत दात्री देवी की सिंहवाहिनी की सॉरी जगत दात्री नहीं सिंहवाहिनी तो सिंहवाहिनी की जो मिट्टी है उसके पूरे देह में उसको लप ये कर दी उसको तो अभी पूरे देह पर सिंहवाहिनी की मिट्टी लगाई हुई है और वह पूरी रात वहां पर सो रहा है सोया हुआ है बीच-बीच में ऐसा होता है जहां पर सर्प दंश हुआ है वहां पर इतनी गर्मी प्रकट होती कि मिट्टी पूरी निकल जाती वो तो फिर फिर से मिट्टी लगानी पड़ती तो ऐसा पूरा दिन पूरी रात फिर अगले दिन सुबह को देखा कि वो लड़का बिल्कुल ठीक हो गया रात को तो ऐसी परिस्थिति हो गई थी कि देह पूरा फूल गया है और अभी फट जाएगा ऐसी परिस्थिति हो गई थी आंखें बिल्कुल बंद हो गई थी तो सुबह को देखा कि देह फिर से सुस्त हो गया है आंखें फिर से खुल गई है और बिल्कुल वह नॉर्मल लड़के की तरह हो गया है बस वही है कि जिस उंगली में विष को निकालने के लिए जो डॉक्टर ने काटा था चाकू से जैसे ही वहां की मिट्टी को हटाया गया वैसे ही जहां से काटा था वहां वहां से उंगली कट कर के निकल गई तो देखिए कि अभी यह है मॉडर्न मेडिसिन और यह है ट्रेडिशनल मेडिसिन या तो फिर कहे कि दैव औषध और यह आधुनिक औषध ये दोनों में से किसका प्रयोग किया जाए आज यदि हमारे पास में हमको कोई बीमारी होगी तो क्या हम लोग सिंहवाहिनी की मिट्टी खा कर के या तो सिंहवाहिनी की मिट्टी को अपने शरीर पर लगा कर के क्या हम मां को प्रार्थना करके बैठे रहेंगे कि मां इसका इलाज करो मां हमको बचा दो मेरे ख्याल से एक भी साधु को मैंने ऐसा आजकल करते हुए नहीं देखा हम लोग यदि बीमार होते हैं मां के ऊपर में हालांकि इतना भरोसा है हम सबको हमारा जीवन पूरा मां को हमने शरणागत कर दिया है डेडिकेट कर दिया है किंतु हम में से मुझे नहीं लगता कि एक भी साधु बीमार होने से वह सिंहवाहिनी की मिट्टी खा कर के बैठा रहे कि हां अभी यह मिट्टी खाली है शरीर पर लपेट दी है तो अभी मां सिंहवाहिनी ठीक कर देगी और ऐसा कोई नहीं करेगा यह कोरोना हुआ है ना कि यह फिर बुखार हुआ है ना कि कुछ भी हुआ है तो हम लोग यह जो मॉडर्न मेडिसिन है यह सब हम सभी लोग लेते हैं तो ये ऐसा है कि बहुत बार हमको लगता है कि हमारा आचरण और हमारी समझ यह दोनों एक साथ में नहीं चलते क्योंकि हमारी समझ हमेशा अधूरी है मां के ऊपर में इतनी संपूर्ण रूप से भक्ति किसकी है कि बीमार हो गया और सिंहवाहिनी की मिट्टी पर भरोसा रख के पड़ा रहा इतनी भक्ति किसके भीतर में है वो बड़ा ही रेर देखने को मिलता है क्योंकि यह सब भक्ति के ऊपर में ही होता है जैसे बेलूरमठ की एक घटना है एक स्वामी जी ने बेलूरमठ की स्थापना की है और स्वामी जी खुद वहां पर रह रहे हैं तो एक दिन ऐसा हुआ कि एक साधु बीमार हो गया तो अभी स्वामी जी तो अल्ट्रा मॉडर्न क्या विदेश से जाकर के स्वामी जी के लेटर्स पढ़ेंगे तो स्वामी जी सब मठ को कैसे संचालन करना है सब कुछ एकदम पॉइंट बाय पॉइंट लिखते हैं वहां पर लिखते हैं कि ये जितने भी रोग है सब वोटन वाटर बोन डिसीज है आपको सबको फिल्टर पानी पीना है फिल्टर पानी नहीं पिएंगे तो पता नहीं क्या होगा याद रखिए डेली एक्सरसाइज करनी है फिल्टर वाटर पीना है ये हेल्दी फूड खाना है यह जो लची कचोरी लची अर्थात की पूरी यह पूरी कचोरी यह सब तली हुई चीजें यह मैदा मैदे से बनी हुई यह पूरी जिसको लची कहते हैं ये तो मैदा फिर ये शुगर फिर ये ऑयल यह सबका त्याग करो और उस स्वामी जी बताते हैं किस तरह का हेल्दी फूड खाना है तो ये सब बताते हैं स्वामी जी तो हमको लगेगा कि जद स्वामी जी के रहते रहते बेलूर मठ में कोई साधु बीमार हुआ तो नेचुरली उसकी तो एक मॉडर्न ट्रीटमेंट की जाएगी तो उसकी व्यवस्था भी की होगी किंतु साथ-साथ में ही स्वामी जी ने एक ज्ञान महाराज करके थे वहां पर उनको कहा कि जाओ ठाकुर का चरणामृत ले आओ उसको पिलाओ तो अभी ज्ञान महाराज तो एकदम स्वामी जी की यह बात सोच कर के सुनकर के आश्चर्य चकित होए क्या स्वामी जी कहना चाहते हैं अभी तो इतनी अल्ट्रा मॉडर्न बातें करते हैं कि वटर बोन डिसीज होने से फिर ये फिल्टर वाटर पीना है वगैरह वगैरह अभी बोलते हैं ठाकुर का चरणामृत खिलाओ रोगी को वो ठीक हो जाएगा तो स्वामी जी की यह बात सुनक के ज्ञान महाराज को थोड़ा सा एक हंसी आ गया कटाक्ष रूपी तुच्छ का रूपी कि आखिर में स्वामी जी अमेरिका जाकर के यही बात सीख कर के आए यहां पे कि ये बीमार होने से ठाकुर का चरणामृत पिलाना है तो जैसे ही वो फिर जा तो रहे हैं स्वामी जी का आदेश है कि चरणामृत लेकर आओ तो चरणामृत लेने के लिए मंदिर में जा तो रहे हैं किंतु स्वामी जी ने देख ली ये कटाक्ष रूपी हसी कटाक्ष मय हसी जो स्वामी जी ने इमीडिएट कहा यदि तुमको विश्वास नहीं है तो तुमको चरणामृत लाने की जरूरत नहीं है तुम जाओ अपना काम करो मैं चरणामृत लाता हूं ठाकुर का मंदिर में जाकर के और मैं अपने हाथों से रोगी को चरणामृत पिलाऊंगी तो देखिए इस बात पर स्वामी जी को विश्वास है कि ठाकुर का चरणामृत खिला करके रोगी ठीक हो जाएगा आज हम में से कितने को विश्वास है कि बीमार हो गए हैं तो ठाकुर का चरणामृत खाया ना कि सिंहवाहिनी की मिट्टी खाई ना कि इस तरह का कोई औषध दैव औषध का व्यवहार करके हम ठीक होंगे ऐसा भरोसा ऐसा विश्वास बड़ा ही रेयरली मिलता है इसीलिए हम लोग सभी लोग जनरली क्या करते हैं कि मॉडर्न मेडिसिन है जो भी बुद्धि से जो होना है वो सब हम करते हैं दैव पे भरोसा है किंतु करते वही है जो कि बुद्धि से हमको लॉजिकली ठीक लगता है ठाकुर और मां का जो रिलेशन है मैं हमेशा जब भी ये प्रसंग एक के बाद एक आते हैं मैं मां का पक्ष लेकर के ठाकुर के साथ में झगड़ा करता हूं मां आती है जयराम बाटी से दक्षिणेश्वर तो कितना कठिन पथ है कितना वह यात्रा कितनी यह तो बीच में कभी डाकत बाबा मिल जाएंगे कभी मां बीमार हो जाएगी मां काली को खुद को आकर के दर्शन देना पड़ेगा मां को कि अच्छा तुम ठीक हो जाओगी और तुम्हारे लिए ही मैंने उनको वहां पर अभी बिठा के रखा है ठाकुर को तो मां काली ने स्वयं मां को ऐसा कहा था बाद में जब मां मां काली के दर्शन से मां ठीक हुई तो रास्ते में क्या भयानक परिस्थिति है ठाकुर को सब पता है कि तो फिर भी ठाकुर का हाथ फ्रैक्चर हो गया है मां आई है जयराम बाटी से ठाकुर ने पूछा कब यात्रा की थी तो मां ने कहा जो कि यात्रा का समय तो ठाकुर ने कहा वो बार बेला यात्रा करे छो अशुभ मुहूर्त में इसलिए मेरा हाथ फैक्चर हो गया जाओ जाकर के यात्रा बदल के आओ तो अभी ये ठाकुर ऐसा क्यों बोलेंगे मां को मां तो स्वयं शुद्ध स्वभाव स्वयं मां जदी कम मुहूर्त में भी यात्रा करें तो वो कम मुहूर्त सु मुहूर्त हो जाएगा जगदंबा के सामने कम मुहूर्त कहां टिक सकता है किंतु फिर भी यह मनुष्य लीला के भीतर में यह सब कुछ चलता है क्यों करते हैं ऐसा कुछ हमको सिखाने के लिए हमको उपदेश देने के लिए कि नहीं यह सब चीजें वह जो ठाकुर का कहना है ना कि पंचमहाभूते फांदे ब्रह्म पड़े काधे अर्थात कि ये पंच महाभूत का देह जब धारण किया है तो बेचारे ब्रह्म को भी रोना पड़ता है भगवान राम भी मां सीता के लिए रोए थे तो जब यह पंचमहाभूत का मिट्टी का बना हुआ देह है इसके भीतर में ये लोग अवती अवतरण करेंगे तो मनुष्य की तरह ही लीला करनी होगी फिर इस मनुष्य लीला में ही बीच-बीच में जैसे बिजली का चमकारे की तरह ऐसा कोई जादुई चमत्कारिक कार्य करके जाएंगे हम लोग अभिभूत हो जाएंगे अरे अभी तो यहां पर बिल्कुल मां छोटी बच्ची की तरह अपनी सहेलियों के साथ में खेल रही है अभी जगदंबा की मूर्ति के सामने ध्यान करने को बैठी और जगत धात्री की मूर्ति के सामने और जैसे ही ध्यान करने को बैठी पास के गांव का एक भक्त वो जगत धात्री को प्रणाम करने के लिए आया था उसके सामने छोटी सी बच्ची शारदा को ध्यान करते हुए देखा और वोह एकदम कंफ्यूज हो गया कि जगत धात्री कौन है यह मूर्ति के भीतर में जगत धात्री है ना किस बच्ची के भीतर में जगत धात्री है वो बेचारा ऐसा कंफ्यूज और डर भी गया कि दोदो जगत धात्री देवियां एक मानवी का स्वरूप धारण करके मिट्टी की मूर्ति के सामने ने बैठ कर के ध्यान कर रही है तो अभी देखता है कि बच्ची की तरह अपनी सहेलियों के साथ में खेल रही है अभी देखता है कि जगत धात्री होकर के जगत धात्री के सामने ध्यान कर रही है ये दोनों जो लीला है मानवीय लीला और दैवी लीला इन दोनों का संगम इनके जीवन में है और इसीलिए ठाकुर कभी-कभी जो कुछ कहते हैं हमको बहुत ही बुरा लगता है कि अरे हमारी मां को ठाकुर ने ऐसा क्यों कहा भाई हालांकि ठाकुर को सब पता है भीतर से फिर भी ये मुह मुसे ऐसी बातें क्यों करते हैं तो ऐसा हो गया ना कि रावण का वध तो पहले से ही हो चुका था भगवान राम ने उनका वध कर ही दिया था किंतु ये जो पूरी लीला है कि भगवान पुरुषोत्तम राम का जो यह चरित्र है उसको जगत के सामने रखने के लिए मां सीता का जो आदर्श स्वामी जी ने कहा ना कि वो सीता तो भारतीय इतिहास में सिर्फ एक ही बार लिख गई लिखी गई है सीता के जैसा चरित्र पूरे मानव जात के इतिहास में भारतवर्ष के इतिहास में दूसरा सीता के जैसा चरित्र लिखा नहीं जाएगा हमेशा हमेशा के लिए हमारी बेटियां हमारी बच्चियों के मां सीता आदर्श होकर के रहने वाली है तो और कितना सुंदर कहा कि मनुष्य भारतीय सभ्यता जदी चाहे नष्ट हो जाए किंतु जहां पर चंद भारतीय चार पांच भारतीय इकट्ठा होकर रहेंगे भले ही चाहे कितनी ही विकृत हुई हुई भाषा की भाषा में बात करेंगे किंतु जहां पर इतने चार-पांच भारतीय भी है उनके भीतर में मां सीता का चरित्र हमेशा रहने वाला है तो अभी क्यों इतनी भव्य जिनका जीवन है इतना उनका मैसेज है हमेशा हमेशा के लिए भारतवर्ष के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से वह लिपिबद्ध होने वाला है ऐसी सीता को एक राक्षस हरण करके ले जाए और उस राक्षस का वध करने के लिए भगवान राम पुरुष पुत्तम राम स्वयं को एक पूरी सेना खड़ी करनी पड़े और उसकी राजधानी पर आक्रमण करना पड़े यह सब लीला क्यों तो यह लीला इसीलिए कि जितने भी ये बंदर थे फिर ये वो भालुक थे इन सबको भगवान राम की सेवा करने का एक मौका मिले उनकी भगवान के प्रति आस्था है वह प्रकट करने का एक मौका मिले मनुष्य सभ्यता को देखे कि सही सही आदर्श क्या है मां और ठाकुर का जागत जगत में जो रिलेशन जैसा भी हो एक दैवी कंपोनेंट इसके भीतर में है तो वह दिव्यता का जो उच्च मानदंड है उस मानदंड को मान्य रख कर के इन दोनों को जीना है हमने एक जगह पर देखा कि मां ठाकुर के लिए खाना बनाती थी और अपने हाथों से वह थाली में खाना लेकर के ठाकुर के पास में आती थी किंतु होता ऐसा था कि कोई भी आकर के बीच में जैसे कि गुलाब मां उसने आकर के देखा मां खाना लेने के लेकर के जा रही है तो फट कर के मां के हाथ से थाली ले ली और बोला कि ठीक है मां मैं जाकर के उनको खिलाती हूं अभी मां को पूरे दिन भर में यही एक समय मिलता है कि ठाकुर के पास जाकर के बैठे ठाकुर का सत्संग करें ठाकुर की वाणी सुने अपने हाथों से ठाकुर की सेवा करें अदर वाइज यदि यह मौका नहीं मिलता तो छह छह महीने चले जाते थे मां ने खुद ने कहा है महीनों के महीनों चले जाते थे ठाकुर का दर्शन उपलब्ध नहीं होता था ठाकुर का दर्शन मेरे नसीब में नहीं होता था मां कहती है कि मन मां अपने मन को समझाती है कि अरे मन तू ऐसा तो कौन सा पुण्य लेकर के आया है कि तुमको प्रतिदिन ठाकुर का दर्शन होगा ऐसा मां अपने को समझाती थी तो देखिए कि अभी यदि मां चाहती या तो ठाकुर चाहते तो प्रतिदिन इनका सत्संग हो ही सकता था किंतु फिर भी येय आदर्श दिखाने के लिए उन्होंने बाहर से एक कठिन एक व्यवहार उन्होंने धारण किया है जिससे कि हम सभी लोग सीखे बुद्धि से जितना समझने का प्रयास करेंगे उतना ही हमारी बुद्धि और मन छोटे पड़ जाएंगे और इतना ही भीतर से शरणागति भीतर से अहो भाव भीतर से वह अभिभूत व बढ़ती जाएगी कि अरे हम लोग कितने नसीबदार है कि इनका जीवन इनका उपदेश वह फॉलो करने का चिंतन करने का हमको मौका मिला है और इससे हमारा जीवन कितना धन्य हो गया है नहीं परस नहीं मैं कहूंगा कि बुद्धि से हम जितना जितना समझने का प्रयास करेंगे एक समय आएगा कि हमारी बुद्धि कम पड़ जाएगी एक ऐसा कंट्रा क्शन होगा कि उस कंट्रक्शन एक ऐसी पहली खड़ी होगी कि उस पहली का उत्तर हम नहीं खोज पाएंगे उस समय हम अपने बुद्धि रूपी हथियार को डाल देंगे और सरेंडर हो जाएंगे कि आप ही हमको समझाइए जिस जिस क्षण हम अपनी बुद्धि से हार मान ले उस क्षण हमने सरेंडर कर लिया और उसी क्षण से हमारी आध्यात्मिक यात्रा शुरू हुई किंतु एक बात है कि यदि बुद्धि का उपयोग नहीं करके सब कुछ मान लेना यह भी इन लोगों को पसंद नहीं था कथामृत में है कि ठाकुर एक जगह पर गए हैं एक जज ना कि कोई प्रश्न कर रहा है बार-बार तो ठाकुर बड़े ही मने उत्साह से उसका उत्तर दे रहे हैं अभी वो एक पास में एक दूसरा व्यक्ति बैठा था वो कुछ प्रश्न करने के बाद में बोलने लगा अरे भाई तुम मान लो ना वो कहते हैं परमहंस महाशय कहते हैं तुम मान लो स्वीकार कर लो बिना मतलब के प्रश्न क्यों करते हो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा सुना इमीडिएट वो नाराज हो गए कि अरे यह क्या बात कर रहे हो सिर्फ मान लेना सिर्फ स्वीकार कर लेना ये तो बिल्कुल मने तो क्या है कि एक तरह का आपका एक तामसिक व्यवहार हो गया है ना तो जब तक बुद्धि चलती है बुद्धि को चलाना है तो शरणागति तब तक नहीं आएगी जब तक हम अपने जितने हथियार हैं वो उससे युद्ध करके हम लोग फिर आखिर में वो एग्जॉस्ट ना हो जाए यह तो ऐसा हो गया कि जैसे गीता में कृष्ण कहता अर्जुन कहता है युद्ध शुरू होने से पहले ही कहता है मैं सन्यास ले लेना चाहता हूं तो भगवान कृष्णा कहते हैं ऐसा नहीं युद्ध करना पड़ेगा युद्ध में हारो या जीतो ये तो जो कुछ होना है तो भगवान कृष्णा ने पहले से ही ठीक करके रखा है जिसकी हत्या होनी है भगवान कृष्णा ने उनको पहले से ही मार करके रखा है तुमको तो निमित्त मात्र होना है किंतु ये निमित मात्र होना होगा ये युद्ध संसार में हमको करना होगा ये बौद्धिक एक्सरसाइज हमको करनी पड़ेगी फिर जब यह बौद्धिक एक्सरसाइज करते-करते हमने हथियार डाल दिए वहां से यह रियल शरणागति प्रारंभ होगी यदि हम पहले से ही कहे अच्छा ठीक है कथामृत में जो लिखा है मान लेते हैं मां की जीवनी में जो लिखा है मान लेते हैं उसके बारे में चिंतन करके या उसके ऊपर में प्रश्न करने से क्या लाभ है तो ऐसा करने से ना कोई शरणागति आने वाली नहीं है हां फिर यह लाटू महाराज जैसी वो बात ही अलग है उन लोगों की हम लोगों का तो क्या बुद्धि का रोग लगा हुआ है जिनको बुद्धि का रोग नहीं लगा है उन लोगों की बात अलग है जिनको बुद्धि का रोग लगा हुआ है उनको तो यह बुद्धि से लड़ना होगा और फिर आखिर में जाकर के हार या जीत के बाद में सरेंडर होना है ये भी क्या है कि साधना के जितने स्टेप्स है ना उसके अनुसार है जैसे ठाकुर ने कहा कि जब हम साधना करते हैं तब नेति नेति करके सब कुछ त्याग करते हैं जैसे कि हम मकान की छत के ऊपर में चढ़ते हैं तो यह उस समय कहते हैं यह सीढ़ी है वोह भी मिथ्या है यह मकान के आजूबाजू का बगीचा है वो भी मिथ्या है अरे मकान भी मिथ्या है ऐसा बोलकर के मकान की छत के ऊपर में चले जाते हैं और फिर वहां पर देखते हैं उठ कर के छत के ऊपर में जिस ईंट जिस रेती और जिस मिट्टी से यह मकान बना हुआ है उसी रैत उसी मिट्टी और इसी ईंट का यह सीढ़ी भी बना हुआ है और उसी पदार्थ से यह पूरा जगत भी बना हुआ है तब इती इती करके सीढ़ी से नीचे आकर के जगत को स्वीकार करते हैं अर्थात कि जब साधना अवस्था में रहते हैं हमको सब कुछ त्याग करना होगा विषय के जितने भी यह सब चीजें हैं सबको धीरे-धीरे करके जिह्वा के विषय फिर चक्षु के विषय कर्ण के विषय ये जितने भी विषय है जो कि हमको अच्छे लगते हैं मन के विषय उसको त्याग करते-करते ईश्वर में हमारा मन लगता जाएगा लगता जाएगा आखिर में पता चलेगा कि ईश्वर ही सब कुछ बने हुए हैं यही जीहा का विषय जो कि ये गुलाब जामुन है वो भी ईश्वर का ही बना हुआ है ईश्वर ही गुलाब जामुन के रूप में आए हैं आंख के जो विषय है प्राकृतिक सौंदर्य कहो कि किसी व्यक्ति का रूप कहो वो भी ईश्वर ही वह वही रूप बन करर के आए हुए हैं तब हम सब कुछ को एक्सेप्ट कर लेंगे हमारा हृदय खुल जाएगा हमारे हृदय में से स्वार्थ चला जाएगा बिल्कुल परमहंस जैसे होता है ना बालक की तरह पिशाच की तरह वो इत जड़ की तरह जड़ वत बालक वत पिशाच वत इस तरह से हमारा बिल्कुल हृदय खुल जाएगा पूरे जगत को हम एक्सेप्ट करेंगे तब इति इति सब कुछ ईश्वर है सब कुछ ईश्वर है ऐसा करके हमको सब कुछ एंब्रेस करना है स्वीकार करना है आयन महाराज है ना अपने यूनिवर्सिटी के मेदान तो उसने वो किताब लिखी ी विज्ञान वाद विज्ञान वाद ऑफ श्री राम कृष्णा तो उसके साथ में मेरा आर्गुमेंट हो रहा था तब मैंने उसको कहा कि देखो वो कहता है कि ये जो विज्ञान वाद जो है ना वही सर्वश्रेष्ठ है वही सबसे मैंने अंतिम जो बात है ठाकुर की वो है तब मैंने उसको ये एग्जांपल दिया था मैंने कहा कि देखो यदि ठाकुर यह कहते कि विज्ञान वाद सर्वश्रेष्ठ है तो उन्होंने ऐसा क्यों कहा कि नेती नेती बोलकर के ऊपर जाना है फिर इ बोल कर के नीचे आना है यदि यह सर्वश्रेष्ठ रहता तो नीचे आने की बात क्यों होती भाई ऊपर जाने की बात तो ठाकुर ने नेति नेति में कही है तो व थोड़ा नाराज हो गया था हालांकि उसने अपनी किताब में मेंशन किया है बट दिस इज द थिंग कि देखिए ज्ञान विज्ञान शब्द हम लोग देते हैं ठाकुर भी देते हैं व कथामृत में भी लिखा है श्री राम कृष्ण देव का विज्ञान वाद ऐसा करके कुछ मेन चीज क्या है कि ठाकुर का या तो फिर यह सनातन साधना ऐसी है जब ज तक हमारे मन के भीतर में कामना और वासना का वह जो बीज है तब तक हमको त्याग करना ही पड़ेगा फिर आखिर में जैसे योग शास्त्र में कहते हैं यह अविद्या अस्मिता राग द्वेष और अभिनिवेश इनको पंच क्लेश कहते हैं अविद्या अर्थात की सर्वप्रथम तो यह अज्ञान प्रकट होता है कि इस जगत के ऊपर में यह माया का आवरण है और मैं जो हूं मैं मेरा सनातन स्वरूप नहीं हूं मैं अपना एक लिमिटेड स्वरूप हूं जो कि दोनों हाथ दोनों पैर के पंचमहाभूत के मिट्टी के बने हुए शरीर में समाहित हूं तो यह पहले तो यह अज्ञान प्रकट होता है इसके बाद में अस्मिता प्रकट होती है मैं कौन तो मैं वही जो कि मेरा एक छोटा सा आइडेंटिटी है फिर अस्मिता में से राग और द्वेष मुझे यह चीज अच्छी लगती है और यह चीज अच्छी नहीं लगती और आखिर में अभिनिवेश अर्थात की मृत्यु का डर अभी जिसका मृत्यु नहीं है उस किसका जिसका जन्म नहीं है जिसका मृत्यु नहीं है जो समय के पार है जो मृत्युंजय है उसको मृत्यु का डर लग गया तो यह पंच क्लेश सर्वप्रथम प्रकट होते हैं और यह पंच क्लेश तभी जाएंगे जब यह दग्ध बीज हो जाएंगे योगशास्त्र में दग्ध बीज शब्द यूज किया गया है अर्थात कि इसका बीज जब तक जल ना जाए तब तक यह रहेंगे जाएंगे नहीं तो जब तक यह पंच क्लेश है या तो फिर यह जो षड रिपु जिसको कहते हैं वो सब कुछ है तब तक आपको यह इंद्रियों के विषय का परिहार करना पड़ेगा तब उस समय ऐसा मुंह से बोलने से नहीं चलेगा कि अरे गुलाब जांब भी ये दिव्य आत्मन का बना हुआ है लाओ मैं खा लू जितना मुझे खाना चाहता हूं वो डायबिटीज हो जाएगा है ना वो तो संसार के नियम के अनुसार उसके भीतर में आपको रहना है तो जब तक आपके भीतर में यह पंच क्लेश है षड रिपु है आपको इंद्रियों के विषय का त्याग करते जाना है फिर जब समाधि प्राप्त होगी आपका देह पूर्ण ओजस का बन जाएगा एक दिव्य नियम के अनुसार आपका देह चलेगा अभी है कि ये मने एक कॉमन एक पृथ्वी का जो नियम है वह हमको लगता है समाधि के बाद में दिव्य नियम के अनुसार हम चलना शुरू होंगे फिर हम इस जगत को एंब्रेस कर सकते हैं फिर हमारा हृदय खुल जाता है ये गुलाब जामुन भी है वोह भी दिव्य सत्ता का बना हुआ है और ठाकुर कहते हैं ना कि कितना भर पेट खाया हो फिर भी जलेबी खा सकते हैं क्यों जलेबी है वाइस रय की गाड़ी का पहिया तो किंतु वो समाधि के बाद में उससे पहले नहीं वरना डटी हो जाएगा सो उस समय नियम बदल जाते हैं हमारे लिए तो उस बदले हुए नियम के अनुसार हमको सब कुछ इती इति करके एंब्रेस करना है स्वीकार करना है किंतु पहले में हमको नेति नेती करके त्याग करना है य ज्ञान और विज्ञान या त्याग करने को ठाकुर कहते हैं ज्ञान है और एक्सेप्ट करने को कहते हैं विज्ञान है किंतु हम लोग डायरेक्ट विज्ञान में कदम नहीं डाल पाएंगे हम लोग मुझसे बोलूंगा कि अ यह जो कि सुंदर शरीर है किसी का वह भी दिव्यता का बना हुआ है तो मैं उनके साथ में कितना ही मित्रता करूं कितना ही करूं मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा अरे ऐसा क्या हो सकता है आप जद ठाकुर क्या कहते हैं काजल की कोटरी में रहेंगे और फिर आपको काजल ना लगे ऐसा हो सकता है क्या तो यदि किसी जिसके ऊपर में हमारी वासना आती है उसके साथ में हम रहेंगे यह बोल कर के कि नहीं मैं तो यह सब चीजों से मुक्त हूं सब कुछ ईश्वर का बना हुआ है और भीतर में कुछ फर्क ना पड़े यह तो सब मुंह से बोलने की बातें हैं यह स्वामी जी अमेरिका गए थे तो जैसे मिसेस हेंस ब्रो है फिर ये जोसेफाइन मैक्लाउड है या तो इवन निवेदिता है इन सबके साथ में कितना घनिष्ठ रूप से उन वो रहते थे बातें करते थे और कार्य करते थे अभी हम लोग सोचे कि हम भी स्वामी जी के चेले हैं हम भी ऐसा करना प्रयास करेंगे तो स्वामी जी को तो निर्विकल्प समाधि काशीपुर में प्राप्त हो गई थी उनका प्रॉब्लम था मन को जमीन पर रखने का जोर करके हम लोगों का प्रॉब्लम है कि सुबह को उठ कर के ही क्या सब दुनिया भर के विचार आते हैं मेहनत करके उसको थोड़ा सा ऊपर उठाते हैं फिर हम स्वामी जी का अनुकरण करने को जाएंगे तो गड्ढे में ही गिरेंगे इसलिए हम जिस टेशन में है उस स्टेशन के नियम को हमको फॉलो करना है उस समय कहेंगे कि ये बुद्धिज्म ने सबको पकड़ कर के साधु भिक्खू बना दिया फिर तो जो करप्शन आया मोनेस्ट्री में उसी वजह से तो भारत डूब गया सो नेवर टू रिपीट दैट मिस्टेक अगेन एक्चुअली देखेंगे कि ये कर्म ज्ञान भक्ति और ध्यान जिसको कि हम जनरली चार तरह की साधना चतुर योग कहते हैं वो अब जैसे यह है ना कि मुझे सांस लेनी है तो सांस लेने के लिए मैं सोचता नहीं हूं सांस लेना मेरे लिए सहज है बहुत ही सहज है मैं इसके बारे में कभी सोचता भी नहीं हूं किंतु मुझे जप करना बड़ा ही मुश्किल है मेरे लिए क्योंकि उसके लिए मन को एकाग्र करना पड़ेगा और मन एकाग्र करने से ही अकेले बैठने से ही इतना भयानक एक अ अनइजनेस खड़ा होता है ना बहुत सारे लोग मुझे कहते हैं कि अरे महाराज जप यज्ञ करने यहां पे जप यज्ञ होता है कभी-कभी आश्रम में तो बैठते हैं ना 10 मिनट के बाद में हम जद बैठेंगे तो पागल हो जाएंगे खड़े होकर भाग जाना पड़ता है इतना भीतर से सब डिस्टरबेंस खड़ा होता है तो जप करना इतना कठिन है किंतु सांस लेना इतना सहज है अभी किंतु जो लोग नियमित जप करते हैं उनके साथ में एक समय ऐसा आएगा कि सांस के साथ में जप चलेगा जिसको अजपा जप कहते हैं तो यह प्रैक्टिस करके उन्होंने इस बात को सहज बना दिया है राइट तो ये योग जो है ना शुरू शुरू में योग को हमको मेहनत करके करना पड़ता है आज मैं कर्मयोग करूंगा तो भीतर के जो स्वार्थ वृत्ति है उसको हटाना कितना मुश्किल है आप आश्रम में आते हैं एज अ वॉलंटिली रिस्पेक्टफुल वर्क मिले उस की बजाय आपको कहा जाएगा कि अरे वो जो पुराने डिवटी है उसके पास जाओ और वो जो बताते हैं करो और वो यदि आपको ऐसा बताएंगे कि आप पानी के घड़े के पास में खड़े रहो जो भी आएगा पानी पिलाना है उसको तो हमको बड़ा ही छोटापन दिखेगा अरे मैं इंजीनियर हूं मैं इतनी बड़ी कंपनी में काम करता हूं और यहां पर मैं मिट्टी के घड़े के पास में खड़ा हूं लोगों को एक गिलास पानी पिलाने के लिए तो ये शुरू शुरू में अपना घमंड अपना अहंकार आता जाएगा किंतु यदि आप मेहनत करके नियम जब भी उत्सव होता है आश्रम में आप आएंगे एक समय ऐसा आएगा कि आपको यदि जूते घर में भी खड़े रहने को बोले कि भाई जितने भी भक्त आते हैं उनसे उनके जूते लेकर के इस बॉक्स में रखना है वो शेल्फ में रखना है वो भी आप खुश हसी खुशी करेंगे तो जो कार्य आपको कठिन लगता था वही कार्य अभी आपके लिए सहज हो गया स्वामी जी ने कहा ना वो प्रैक्टिस का कॉस्मस माइक्रो कजम में तो ये जो है ना साधनाएं हम जब प्रारंभ करते हैं हमारे लिए बड़ी कठिन होती है एक समय आता है हम साधना में सिद्ध हो जाते हैं तो उस समय जिसको कि कहेंगे निर्विकल्प समाधि कहो ना कि आध्यात्मिक अनुभव कहो ना कि ईश्वर दर्शन कहो जो कुछ भी आपकी बिलीफ है उसके अनुसार आप इसको दर्शाइए वो साधना में सिद्धि होने के बाद में हम लोग वही करेंगे वही कर्म योग करेंगे वही ज्ञान योग वही भक्ति योग वही राजयोग किंतु वह सांस लेने की तरह सहज हो जाएगा ठाकुर ने कहा है कि एक दुकान वाले को जेल में जाकर के पुर दिया किरानी बंगाली के शब्द है किरानी ऐसा किराने की दुकान वाला ना कि जो भी उसको बोलो वो मैदे की उस दुकान वाले को जेल में पूर दिया अभी वो जेल में से बाहर आएगा तो वो क्या धध कोरे नाच में माने अर्थात कि वो ना नाचेगा ना कि फिर वही दुकान पर बैठ जाएगा तो जो सिद्ध हो गए तो ऐसा थोड़ी ना है कि और कुछ नई चीज करना शुरू करेंगे वही कर्म वही ज्ञान वही भक्ति वही ध्यान किंतु अभी वो सहज हो गया है आपको सोचना नहीं पड़ता कि मैं कर्मयोग कर रहा हूं कि अभी हम लोग आज सुबह को उठकर के मंगलारती में जाकर के वो कितना मेहनत करके मन को एकाग्र करने का प्रयास करते हैं जो कि सिद्ध हो गए हैं ध्यान में वह अभी काम कर रहे हैं ऑफिस में 10 मिनट कुछ पाच मिनट फ्री मिला है तो आंख बंद करके बैठे तो मन एकाग्र हो गया सहज वो मने जागतिक जगत और यह आध्यात्मिक जगत इन दोनों के बीच की कोई भेद रेखा जैसा कुछ नहीं है सब कुछ ईश्वरम है सब कुछ साधना है व बैठे बैठे ऑफिस में अकाउंट भी लिख रहे है हमारे कितने अकाउंटेंट महाराज को देखा है इतना हंसी खुशी से अकाउंट मेंटेन करते हैं हमको लगेगा अरे भाई ऐसा डिफिकल्ट टिपिकल सब्जेक्ट वो करते करते मुंह पर हंसी है तो क्या सिद्धि उन्होंने प्राप्त कर ली होगी तो साधना शुरू करते हैं तब वोह कठिन लगता है फिर सिद्ध हो जाते हैं तो सहज हो जाता है सो आप ज्ञान और विज्ञान के बीच का यदि कोई फर्क करते हैं तो यही एक है साधना के समय में गलती ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता ऐसी कोई अपेक्षा आपसे नहीं रखता है कि आप साधना कर रहे हैं और आप 100% पहले ही दिल से हो गए हैं अपेक्षा क्या रखी जाती है पता है कि यदि गलती होती है ना खुले दिल से उसको स्वीकार कर लो हमारे संग में साधुओं की यदि कोई गलती होती है तो कोई ऐसा नहीं कहेगा कि अरे भाई तुमने गलती क्यों की अरे भाई पंच महाभूत का यह पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय का शरीर है तो गलती तो वो तो वो होने ही वाली है है कौन परफेक्ट होकर के जन्म लिया है प्रश्न यह है कि यदि गलती की है तो आपने उसको स्वीकार की है कि नहीं स्वामी जी कहते थे कि यदि मन में कोई गलत भाव आता है यदि मन में काम भाव आता है तो जहां पर 10 साधु लोग बैठे हैं वहां पर जाकर के निव स्त्र हो जाओ अपने कपड़े फेंक दो और सबके सामने खड़े रह कर के कहो कि देखो मेरे मन में यह काम भाव जागृत हुआ है इससे होगा क्या यह दिन का जो प्रकाश गिरेगा ना तो तो वैसे ही यह काम भाव चला जाएगा क्योंकि यह काम भाव है यह गलत विचार है यह सब अंधेरे में पनपते हैं यह सब सीक्रेट हम जब मन के भीतर में पोषण करते हैं तब ये सब विचार आते हैं 10 लोगों के सामने जाकर के नंगे हो जाओ तो फट कर के ये जो लोगों का ये जो हमने स्वीकार किया ना य स्वी स्वीकार एक ईश्वरीय एक वज्र प्रहार की तरह है जो कि फट कर के इस भाव को काट देगा अपने हमारे संग में कहा जाता है यदि गलती की तो ठीक है गलती ना करो ऐसा तो हो ही नहीं सकता बहुत सारे लोगों से गलती होती है किंतु भाई तुम स्वीकार कर लो एकदम ठीक जाकर के हमारे प्र मोस्ट रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज के सामने रिवर्ड जनरल सेक्रेटरी महाराज के सामने सीनियर साधुओं के सामने हाथ जोड़ कर के कहो महाराज गलती हो गई है आप जो दंड करें मैं स्वीकार करने को तैयार हूं तो वे लोग कहेंगे अच्छा ठीक है चलो तुम जाकर के कहीं पर तपस्या करके आओ या तो फिर कुछ ना कुछ दंड करेंगे उस दंड को ठाकुर का आदेश मान कर के स्वीकार कर लेना है और उसका पालन करना है जैसे ही आपने यह किया ना तो आपकी गलती की जो जो भी दुष्कर्म प्रकट हुए थे वह कट जाएंगे किंतु प्रॉब्लम कहां पर खड़ा होता है आपने गलती की और फिर गलती पकड़ी गई और फिर आपने कहा कि नहीं नहीं मैंने तो ऐसा कुछ किया ही नहीं है मेरे ऊपर में लोग यह मिथ्या आरोप लगा रहे हैं जैसा आपने ऐसा कहा तो यह फिर कंपाउंड इंटरेस्ट की तरह आपके पीछे में लगेगा यदि आपने गलती स्वीकार नहीं की उसका अर्थ है कि आपका घमंड हजार गुना बढ़ जाएगा और फिर यही घमंड अपनी साधु लाइफ को लेकर डूबेगा यानी यह चिंता कभी मत करो कि मेरे से गलती होती है गलती होगी मनुष्य जीवन ही तो सत्व रजस और तमस का बना हुआ है शुद्ध सात्विक सत्व लेकर के आते तो किसको साधना करने की जरूरत है हम तो ली परिपूर्ण होते हैं तो सत्वर रजस तमस का देह है यह सब कामनाएं वासना एं मन के भीतर में भरी हुई है इसीलिए तो हम इस पृथ्वी पर आए हैं मां वो कहानी कहती है ना कि सर्वप्रथम चार कुमार को ब्रह्मा ने प्रकट किए ये सनत सनन सुकुमार वगैरा फिर इन कुमारों ने आकर के देखा कि अरे ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या जगत के किसी मामलों में हमको जाना नहीं है तो उन्होंने तपस्या करके इमीडिएट ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करके ब्रह्मलोक में चले गए तो ब्रह्म ने सोचा भगवान ब्रह्मा ने सोचा कि अरे इस तरह से तो सृष्टि होगी नहीं तो फिर उन्होंने प्रजापति हों की सृष्टि की अभी प्रजापति हों ने संसार प्रारंभ करके इस सृष्टि की रचना को आगे बढ़ाया तो हम लोग क्या है कि इस इसी सब चीजों को लेकर के ही रहते हैं गलती होगी उससे घबराना नहीं है वही है कि मन में ठाकुर के पास में जाकर के सब कुछ बता देना है कि ठाकुर मेरे से ऐसा हुआ है आप मुझे सत बुद्धि दीजिए जैसे-जैसे ठाकुर के सामने जाकर के क्रिश्चियनिटी में एक बहुत ही सुंदर कांसेप्ट है कन्फेशन का यदि वहां पे एक चर्च में पादरी बैठते हैं उसके पास में जाकर के आपको मन के जितने भी पाप है उनके सामने खोल कर के बोल देने है कि मैंने यह पाप किया है मैंने वो पाप किया है वो पाप किया है वो स्वीकार कर लेने से ही मन का आधा भार लाघव हो जाएगा आधा भार कम हो जाएगा तो वैसे अपने यहां प ऐसा किसी को बताने की जरूरत नहीं है किसी व्यक्ति को ठाकुर के पास जाकर के पूरा कंफेस कर देना है कि ठाकुर मैंने ये ये गलती की है तो आप मुझे क्षमा कीजिए मुझे सद्बुद्धि दीजिए अच्छा रास्ता दिखाइए तो ट विल बी इनफ फॉर अस देखिए मैं विवेक जागृत रखना है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु साथ में यह क्या है कि ज्यादा टेंशन लेकर के नहीं घूमना है कि सब समय 24 घंटा विवेक जागृत नहीं होता नहीं रहेगा इवन मेरा भी नहीं रहता सब समय तो क्या है कि मनुष्य जीवन है जितना हो सका सकता है यथा संभव करना है फिर बाकी का ठाकुर के ऊपर दे देना है यदि मन के भीतर में यह रहा कि मैं तो शुद्ध एक जीवन पालन करने का प्रयास करता हूं किंतु यहां पर गलत हो गया वहां पर गलत हो गया तो वो गलती वो मेरे मन के भीतर में एक गिल्ट फीलिंग बन प मेरे सर पर खड़ी हो जा सवार हो जाएगी और भविष्य की साधना को गड़बड़ कर देंगी यानी कि यथाशक्ति विवेद जागृत रखना है किंतु यह ख्याल में रखना है कि आध्यात्मिक साधना में विकास और सिद्धि दोनों ही ठाकुर के हाथ में है वो हम मेहनत करके हमको कुछ नहीं मिल रहा है वो सब आखिर में ठाकुर के ही हाथ में है यानी करते जाना है विवेक वैराग्य त्याग तपस्या योग करते जाना है किंतु यह बात मन में ठीक रखनी है कि अल्टीमेट सक्सेस तो ठाकुर के ही हाथ में है जैसे गीता में कहा है ना कि अभ्यास वैराग्य ब्याम त निरोध माने यह मन को वश में करना तो कितना कठिन है तो किंतु उपाय है अभ्यास और वैराग्य ओम शांति शांति हरि ओम शरा