Invocation
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का प्रवचन भारत में दिया हुआ मद्रास में माय प्लान ऑफ कैंपेन मेरी समर नीति इस प्रवचन का 18th पॉइंट जो है वह हम देख रहे हैं। ये पॉइंट मैंने दिए हैं। किंतु इसके भीतर का जो टेक्स्ट है वो पूरा स्वामी जी का है। पॉइंट है हाउ टू बेटर इंडिया ग्लोरी ऑफ दी आत्मन। इसको हमने ऑलरेडी थोड़ा सा स्टडी कर ही लिया है। हम जहां तक पहुंचे हैं। स्वामी जी क्या कहते हैं? कल जो पैराग्राफ था उसको एक बार में दोहरा देता हूं। बेसिकली स्वामी जी जो कहना चाहते हैं कि भारत का
नचिकेता की आत्मश्रद्धा की कहानी
उत्थान तभी होगा जब हम में आत्मश्रद्धा प्रकट होगी। आत्मश्रद्धा की कहानी हम सबको पता है। वही बालक नचिकेता उसने जब देखा कि उसके पिताजी इस तरह की गई गाय यज्ञ में दान कर रहे थे जो कि जिसका कि दूध दोहा गया है। माने उसमें ना ही कोई दूध निकलने वाला है, कमजोर हो गई है, वृद्ध हो गई है। इस तरह की गाय सब उसके पिताजी दान कर रहे थे। तो यह बालक ने आकर के पिताजी को पूछा कि पिताजी आप मुझे किसको दान करेंगे? मुझे किसको दक्षिणा में देंगे? क्योंकि क्या है कि देखिए बच्चे के सामने दो समस्याएं हैं। सर्वप्रथम तो है कि हमारे शास्त्र कहते हैं कि आपको पिताजी के मान की रक्षा करनी है। उनकी मर्यादा रख के प्रोटेक्ट करके आपको उनके साथ में बात करना है। तो यह तो एक शास्त्र का वचन है। दूसरा शास्त्र का वचन है कि यदि गलत जहां पर भी आप देख रहे हैं उसका आपको मुकाबला करना है। असत का सहारा कभी नहीं लेना। सत के सहारे पे ही हमको जीवन निर्वाह करना है। तो यह दो बातें इस बालक के सामने थी। तो फिर यह बालक बेचारा सोच रहा है कि मैं अपने पिताजी के सामने जाकर के मैं कैसे कहूं कि पिताजी आप जो कर रहे हैं यह जो वृद्ध गायों का दान कर रहे हैं जिसमें से ना ही कोई दूध कभी निकलने वाला है। इस तरह की गाय का दान करके आप अधर्म का सहारा ले रहे हैं। तो यह बात मैं जाकर के करूं तो कैसे करूं? यह बात इस बालक के मन में थी। आप सीधा जाकर के पिताजी को कह भी नहीं सकते कि पिताजी आप गलत है। एट द सेम टाइम जो हो रहा है असत कार्य उसका आप साथी भी नहीं हो सकते हैं। अदरवाइज तो गिल्ट बाय एसोसिएशन अपने पर आ जाता है। तो यह बालक ने देखिए कि सल सरल हृदय जो होता है उसमें से एक सरल सॉल्यूशन इसके मन में प्रकट हुआ। ऐसा जाकर के नहीं कहता कि पिताजी आप जो गाय दे रहे हैं वह सब वृद्ध गाय हैं। इस तरह की गाय मत दीजिए। वह जाकर के कहता है कि आप मुझे किसको दान में देंगे? क्योंकि यह तो इस तरह का यज्ञ है जिस यज्ञ में आपको अपना सर्वस्व लुटा देना है। तो अभी बालक जो होता है वह भी नचिकेता जैसा एक सुरूप सुसंस्कृत बालक जो कि सरल है। भगवान पर विश्वासु है। वैदिक धर्म का पालन करता है। किस तरह का बालक किस पिताजी को प्रिय ना हो तो यदि और कहने का आशय फिर देखिए कि कितना गहराई से कितनी सूक्ष्मता से नचिकेता यह प्रश्न करता है। नचिकेता कहता है कि आपने जिस तरह से आपकी जो स्वस्थ गाय हैं इस तरह की गाय जिसका कि जो कि भरभर करके आपको दूध देती है। इस तरह की गाय का तो आपने दान दिया नहीं है। तो यह गाय जो आपकी जितनी प्रिय है उतना ही तो मैं आपका प्रिय होना चाहिए। मुझे आपका प्रिय होना चाहिए। तो फिर आपने उस गायों को नहीं दिया जो कि आपकी प्रिय है तो तो फिर आप मुझे भी तो शायद नहीं देंगे। किंतु मैं यह कहूंगा कि आप मुझे कब किसको देंगे दान में? यानी कि मैं इनडायरेक्टली यह कह रहा हूं कि जो स्वस्थ गाय हैं उनको आप किस में दान में देंगे? तो यह पिताजी भी तो बड़े चालाक थे, चतुर थे, शास्त्र के विद्वान थे। पुत्र के इस वचन का आशय तो समझ ही गए कि पुत्र कहना क्या चाहता है। तो इसलिए पहले तो भगा दिया उसको। बात ही नहीं सुनी तो फिर नची कहता बालक वो फिर से जाता है। फिर से जाता है। पूछता है कि आप मुझे किसको दान में देंगे? और कहने का अर्थ यह है कि मैं यदि आपको इतना प्रिय हूं और मुझे दान में देने को आपको यह रिलक्टेंस हो रहा है। आपकी इच्छा नहीं है। आप कतरा रहे हैं तो फिर यह स्वस्थ गायों को दान देने में भी आप इसी तरह से कतरा रहे हैं जो कि धर्म के विरुद्ध है। तो यह उसने जब दो-तीन बार जाकर के पूछा तो पिताजी नाराज हो गए। कहा कि मैं तुमको यमराज को दे रहा हूं। जाओ। तो अभी देखिए कि इस बालक में सत्व की शक्ति कितनी है। वह सीधा यमलोक में चला जाता है। पिता के वचन की रक्षा करने के लिए भी और शायद इसके मन में वो क्यूरियोसिटी भी होगा। क्योंकि यह जब भगवान यमराज इसको प्रश्न करते इसको जब यह यह देते हैं, आशीर्वाद देते हैं, कहते हैं कि मैं तुम्हारी तीन इच्छाएं पूर्ण करूंगा। तुम तीन दिन यहां पर रहे हो यमलोक में मेरे दर्शन प्राप्त हुए बिना अभी शुद्ध मति यह पवित्र ब्राह्मण बालक है जिसने कि वेद का अध्ययन किया है नियमित उपासना करता है तो इसके भीतर में जो तप की शक्ति है अभी यह तीन दिन तो यमराज उसको मिले नहीं वह कहीं नाराज हो जाएगा तो फिर उसके श्राप से शायद हो सकता है कि यह यमलोक भी जल जाए तो यह यमराज ने उसको तीन वरदान देते हुए कहा कि अच्छा मैं तुमको तीन वरदान देता हूं क्योंकि तुम तीन रात मेरे दर्शन पाए बिना रहे हो यहां पे। जब यह यमराज यह बात करते हैं तो नचिकेता के मन में देखिए कि किस तरह से यह सब थिंकिंग प्रोसेस चल रहा है। सर्वप्रथम तो कहता है कि मैं जब पृथ्वी लोक पर वापस जाऊंगा तो मेरे पिताजी मुझे पहचान पाए, मुझे ग्रहण कर पाए, मुझे फिर से वही प्रेम कर पाए। ऐसा कीजिएगा। यानी वह तो एक मेन कंडीशन उसने समाप्त कर दी। किंतु उसके बाद में जो वह प्रश्न करता है कि यह मृत्यु के परे क्या है? मृत्यु के अर्थात कि यह शास्त्र है, देवता है। यह सभी लोग यह प्रश्न करते हैं कि मृत्यु और मृत्यु के परे क्या है? तो अभी देखिए कि बालक नचिकेता के मन में यह क्यूरियोसिटी अवश्य होगी। इसीलिए जब पिताजी ने यह कहा कि तुम जाओ मृत्यु लोक में। अच्छा पिताजी ने ऐसा तो नहीं कहा। ऐसा कहा कि मैं तुमको मृत्यु को दे दूंगा, यमराज को दे दूंगा। तब यमराज के पास जाने का जो बालक का आशय होगा वह सिर्फ यह नहीं होगा कि पिता के वचन का पालन करें। किंतु साथ में यह भी होगा कि मृत्यु के परे क्या है? इस प्रश्न का उत्तर यमराज के अलावा और कौन दे सकता है? तो यहां पर देखिए कि बालक के मन में यह एक इस तरह का जो बालक है उसके मन में यह प्रश्न कहां से आ गया कि जीवन और मृत्यु का रहस्य क्या है? मृत्यु के बाद में फिर क्या आत्मन का अस्तित्व रहता है कि नहीं? मनुष्य का यह जन्म क्या पहला और आखिरी जन्म है। यह जन्म जन्मांतर की जो परंपरा है, इसका इससे मुक्त कैसे हुआ जाए? यह सब जो इतनी छोटी उम्र में इस बालक के मन में यह प्रश्न उठ रहे थे और जिस साहस से उसने यह यमराज इंद्र को यह प्रश्न करने का साहस किया इसी को कहते हैं आत्मश्रद्धा। देखिए आत्मश्रद्धा और एोगेंस
अंग्रेज में अहंकार है या आत्मश्रद्धा? आत्मश्रद्धा और अहंकार में क्या अंतर है?
इस दोनों में डिफरेंस क्या है? आत्मश्रद्धा हमको अपने खुद के डेवलपमेंट की ओर ले जाती है। जबकि एोगेंस हम जब डेवलप होते हैं दूसरों का शोषण करके अपने को डेवलप करने का प्रयास करते हैं। ये आध्यात्मिक डेवलपमेंट अर्थात कि स्व के प्रयास से स्व का डेवलपमेंट स्व का उन्नयन स्व की प्रगति और यह जो एोगेंस है दूसरों के शोषण से अपने आर्थिक उन्नति उसमें आध्यात्मिकता का कोई नामोनिशान ही नहीं है। इसलिए बहुत बार जब स्वामी जी आत्मश्रद्धा की बात करते हैं तो हम लोग यह सोच लेते हैं कि यह जो जनरल एोगेंस हम लोगों में देखते हैं सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स इसी को एक बात घुमा के स्वामी जी यह कह रहे हैं। और फिर कल हमने यह भी देखा कि एक इंग्लिश मैन में और हमारे में डिफरेंस क्या है? तो इंग्लिश मैन समझता है कि मैं इंग्लिश मैन हूं। मैं ब्रिटिश हूं। ब्रिटिश ब्रिटिश राज्य पूरे जगत पर छाया हुआ है और इसलिए मैं जो चाहूं वह कर सकता हूं। जबकि हम हिंदू हम हिंदुओं में इतना सा भी भरोसा नहीं कि हम लोग कुछ कर पाएंगे क्योंकि हजार साल से एक के बाद एक जितने भी आक्रमणकारी आए उन सब ने हमारा शोषण किया है। तो यह हम लोगों में एक इंफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स प्रवेश कर गया है। एक हीन भाव एक हीन ग्रंथि बैठ गई है। जबकि उन लोगों में है कि उन लोगों ने इस तरह से कभी डिफिट देखी नहीं। देखिए ब्रिटेन का इतिहास आप पढ़ेंगे तो आप उनको एडमायर किए बिना रह नहीं पाएंगे। उस समय यह एलिजाबेथ वो जब क्वीन थी एलिजाबेथ हां वही तो क्या है कि अ ऑलमोस्ट 1500 सेंचुरी की बात है। 1500 एडी की बात है। उसके आसपास के ही ये स्पेन और पोर्गल थे। वो उस समय के सबसे बड़े यह नेवल पावर्स थे। ज्यादातर उन्हीं का यह जहाज है। उसके माध्यम से यह सब पूरा चलता था कि इंटरनेशनल ट्रेड वगैरह। ब्रिटेन का उतना यह वर्चस्व नहीं था। और सबसे पहले यह जो सब स्टार्ट हुआ यह डच ईस्ट इंडिया कंपनी यानी कि नीदरलैंड वगैरह तो यह नीदरलैंड है, स्पेन है, पोर्तगल है। यह बहुत पहले से ही सी फेयरिंग नेशंस रहे हैं। अर्थात कि उनके जहाज टेक्नोलॉजिकली और इतने एडवांस थे और उनके ये जो खलासी वगैरह जो थे सेलर्स वगैरह इतने साहसिक थे कि वो इजीली लंबी यात्रा पर जा सकते थे। इसीलिए वास्कोडि गामा ना कि कोलंबस यह देखिए कि ओरिजिनल जिन्होंने पूरी पृथ्वी का भ्रमण किया एक्सप्लोरेशन किया वो वहीं स्पेन और पोर्तगल से ही आते हैं। तो वो उनका राज्य था उस समय वर्चस्व था और यह ब्रिटेन था। एक छोटा सा टापू था। एक छोटा सा आइलैंड था। वहां पर ठंडी बहुत पड़ती है और लोगों के भीतर में वैसे तो उत्साह बहुत है किंतु उस तरह का यह नेवल सुपीरियरिटी नहीं था। उस समय ये ब्रिटिश जो खलासी जो थे सेलर्स वो ज्यादातर पाइरेट हुआ करते थे। क्योंकि क्या है कि यह ज्यादातर ट्रेड जो है उसके ऊपर में मोनोपोली तो स्पेन पोर्तगल की थी। तो फिर ऐसा तो नहीं है कि आप उनकी मोनोपोली है यहां पे। जैसे कि यह अमेरिका के अमेरिका में ये लोग ट्रेड करते हैं तो ब्रिटिश लोग यदि वहां पे ट्रेड करने को जाएंगे तो ये लोग तो उनको मार के भगा देंगे। तो जमीन पे तो युद्ध करने की कैपेसिटी नहीं थी। तो ये लोग क्या करेंगे? पायरेट थे ज्यादातर ये ब्रिटिश सेलर जितने भी थे और फिर यह लोग क्या करेंगे? यह अमेरिका से यह सोना भर के ये जहाज जब यूरोप वापस आते थे स्पेन या पोर्तगल के तो उसके ऊपर में रेड करेंगे और यह सोना वगैरह लूट लेंगे। ऐसा करके उन्होंने प्रारंभ किया। फिर पता नहीं क्या हुआ। यह स्पेन का ना पोर्तगल का ही एक राजा बड़ा ही नाराज हो गया। उसने पूरा आरमाड़ा भेजा। बहुत बड़ा एक नेवल टास्क फोर्स आज की लैंग्वेज में कहेंगे तो यह ब्रिटिश लोगों पर हमला करने के लिए। तो यह गया यह पूरा जहाज का एक पूरा एक ग्रुप और जाकर के किंतु जैसे यह ब्रिटेन पर हमला करने का प्रयास करता है तो वही यह जो जितने भी पायरेट पायरेट थे छोटे-मोटे वो सब ने मिलकर के रॉयल ब्रिटिश नेवी थी उसके साथ में इस तरह का कहर बरसाया इन सब जहाजों के ऊपर में कि ज्यादातर जहाज जो है डूब गए और ब्रिटेन का विजय हुआ। तब से लेकर के ब्रिटेन का यह राइज हुआ है। तो देखिए कि एक इतनी बड़ी महाशक्ति उस समय की उन्होंने इतनी बड़ी आरमाड़ा लेकर के ब्रिटेन पर हमला किया किंतु फिर भी बिना हिम्मत हारे बिना रोते-रोते उनके सामने जाकर के आत्मसमर्पण कर दे कि भाई हम कमजोर है। हम पर राज्य करो हमारी पिटाई मत करना। ऐसा जो सब यहां पे जो चलता था वहां पर ऐसा नहीं था। भले ही चाहे कितनी ही बड़ी महासत्ता आए आक्रमण करने के लिए उन्होंने छोटे होकर के भी उनका सामना किया और विजय प्राप्त किया तो वी हैव टू एडमायर देम कि उनके भीतर में वो था किंतु वो क्या था वो है कि एक हेल्दी अस्मिता थी। एक हेल्दी अस्मिता एक हेल्दी सेल्फ कॉन्फिडेंस रहने से आप जगत में बहुत कुछ कर सकते हैं। आपकी टैलेंट है। आपकी क्रिएटिविटी है। आपका करेज है। इस जगत में कार्य करने की आपकी क्षमता है। वर्किंग कैपेसिटी जो है, वर्क कल्चर जो है इस सबको एक सीरियस बूस्ट आपको मिलता है। तो किंतु यह एक बात समझनी है। कल भी जैसे हमने डिस्कस किया था आत्मश्रद्धा और यह एक हेल्दी अस्मिता या तो फिर सेल्फ कॉन्फिडेंस इन दोनों में डिफरेंस क्या है? यह सेल्फ कॉन्फिडेंस या तो अस्मिता हमको लोगों के ये बाह्य जगत में कार्यक्षम होना हमको सिखाएगी और बाह्य जगत में अपने सामने एक सक्सेस ले आएगी और साथ-साथ में ही यदि हम आध्यात्मिक साधना करना चाहे तो हमको एक बूस्ट दे देगी। एक इनिशियल इंपेटस दे देगी। इतना यह कर लेगी। किंतु फिर आध्यात्मिकता के उच्च सोपान है उसको यदि सर करना है तो बाहर के जगत का यह कॉन्फिडेंस है वह फिर धीरे-धीरे करके अंतराई के रूप में हमारे सामने खड़ा होगा क्योंकि आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा प्रथम और सबसे इंपॉर्टेंट यह रूल है कि अपने ईगो को या तो फिर अपनी अस्मिता को ईश्वर के सामने बलि प्रदत्त कर देना है। बलि के रूप में इसका सैक्रिफाइस कर देना है। तो यही फिर यह सेल्फ कॉन्फिडेंस था जो कि मुझे यह ये आरमाडा ये पोर्तुगीज ना स्पेनिश आरमाडा के सामने लड़ने के लिए उसने जो मुझे प्रेरणा दी वही आखिर में वही सेल्फ कॉन्फिडेंस मेरे सामने आध्यात्मिक जगत में जंजीर बनके खड़ा हो जाएगा। वह मुझे इनिशियल पुश देता है किंतु इससे ज्यादा वह कुछ नहीं कर पाएगा। उसके बाद में मुझे अपने को रीइन्वेंट करना होगा। देखिए बहुत लोग अपने को रीइन्वेंट करते हैं। यह न 70ज और 80ज में इंजीनियरिंग किया है। अभी बाद में देखा 90ज में और 200 में कंप्यूटर आ गए। तो उन्होंने अपने से यह कंप्यूटर सीखा। कंप्यूटर के क्लास किए और अपनी जॉब है जहां पे अभी कंप्यूटराइजेशन हो रहा है डिजिटाइजेशन हो रहा है तो सक्सेसफुली सेट हो गए वरना बहुत सारे लोगों की ये 90 1993 95 उसके आसपास में बहुत सारे लोगों की जॉब चली गई थी क्योंकि ये दो-तीन चीजें हो रही है। एक तो ये ग्लोबलाइजेशन भारत में आ गया। उसके बाद में ये डिजिटाइजेशन आ गया। उसके बाद में यह शेयर मार्केट क्रैश हुआ। बहुत सारे लोगों के घर में समस्याएं उस समय खड़ी हुई थी। किंतु जिन लोगों ने अपने को रीइन्वेंट किया वे लोग बच गए। नई जनरेशन को भी हमेशा अभी यह एआई है। अभी जितने भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर कल तक ऐसा सोचा जाता था कि सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग आपने कर लिया तो आपका एक कंफर्टेबल करियर निश्चित है। आज देखिए कि यह एi है। इतना आसानी से सॉफ्टवेयर क्रिएट करता है। जनरेट करता है कि बहुत सारे सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स की जॉब अभी जा रही है। यह Microsoft है ना कि Google है ना कि यह जितनी भी बड़ी-बड़ी कंपनियां है जो कि सबसे ज्यादा सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स को हायर करती थी उन लोगों ने अभी सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स को रिलीज करना शुरू कर दिया है। फायर करना शुरू कर दिया है। तो देखिए कि इवन सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स को कोई भी क्षेत्र में आप हो आपको अपने को कंटीन्यूअस रीइन्वेंट करना होगा। एआई के युग में देखिए कि अभी इवन जर्नलिस्ट जो है, लॉयर्स जो है, ये डॉक्टर्स जो है, वे बहुत सारी इस तरह के प्रोफेशन है जो कि अपने को बड़ा ही सिक्योर मानते थे। वह सब अभी खतरे में आ गए हैं। एक जर्नलिस्ट जिस तरह से आर्टिकल लिखेगा, उसकी यह लैंग्वेज स्किल जो होनी चाहिए थी, उससे लाखों गुना ज्यादा बेटर आर्टिकल लैंग्वेज स्किल एक एआई की है। एक माने एक ही आदमी बैठकर के कुछ पॉइंट एक एआई में लिख दे कि इस इस पॉइंट डाल के आर्टिकल बनाना है तो देखिए कि एआई फटाक करके बना लेगा। हमने उस दिन ये शारदा कोष का देखा ये नोटबुक एलएम में अपने हमने यदि अपना लिटरेचर एंटर कर दिया है। अभी आप अपने लिटरेचर में से कोई भी एक टॉपिक सिलेलेक्ट कीजिए। अब जैसे कि एक टॉपिक है कि मां के जितने भी सेवक थे क्वालपाड़ा के उनकी एक कंपोजिट बायोग्राफी हमको लिख करके दो। तो इस तरह का टॉपिक आपको यदि बनाना है एक प्रबुद्ध भारत या उद्बोधन या वेदांत केसरी के लिए एक आर्टिकल तैयार करना है तो आपको महीने के महीनों भर तक बैठकर के अपने विभिन्न पुस्तकों में जो मां के सेवक जो महाराज थे उनकी कहानियां जो बिखरी हुई है ये अरूपानंद जी है ना कि ये फिर वरदा महाराज है गौरीश्वरानंद जी महाराज है ऐसे और भी कितने भी है उन सभी की कहानियां आपको इकट्ठी करके एक विधि ने सिंगल आर्टिकल आपको यह करना पड़ता। सब अह कंपोज़ करना पड़ता। एक बिगिनिंग उसका होना चाहिए था। एक मिडिल पार्ट होना चाहिए। उसका एक कंक्लूजन होना चाहिए। वो एक सिस्टमेटिक करने में आपको कितना टाइम जाता। अभी ये आप नोटबुक एलएम में आप एक कमांड डालिए। एक क्वेरी डालिए कि मां के जितने भी सेवक हैं तुमको जितना लग और नाम लिख दीजिए। ये ये सेवक है म और थोड़ा सा उसको आसान हो जाएगा तो फिर इनका एक बायोग्राफी लिख के मुझे दे दो एक आर्टिकल बना दो इनकी बायोग्राफी के रूप में इतना परफेक्ट आर्टिकल विदिन वन मिनट बना देगा कि हम साधु लोगों को भी अभी सोचना पड़ेगा कि ये प्रबुद्ध भारत वेदांत केसरी के लिए आर्टिकल हमारे से अच्छा तो यह एआई लिख देता है। यानी कि जो जॉब जो कि प्रोफेशन बड़े ही सिक्योर थे उनको भी आपको पूरा रीइन्वेंट अपने को करना पड़ेगा। यदि आपको भविष्य के मार्केट प्लेस में अपना एक रिलेवेंस रखना है तो तो यहां पे भी आप यदि एक अस्मिता हेल्दी अस्मिता से प्रारंभ करें। एक हेल्दी ईगो को लेकर के आप अपना लाइफ प्रारंभ करें। जैसे कि ब्रिटिश मैन के बारे में स्वामी जी कहते हैं। तो यदि इस तरह से प्रारंभ करते हैं तो किंतु थोड़ी ही समय के बाद में आपको अपने को रीइन्वेंट करना पड़ेगा। वह हेल्दी ईगो ने आपको इनिशियल बूस्ट तो दे दिया किंतु इससे ज्यादा वह आगे नहीं ले जाएगा। इसके बाद में आपको हेल्दी ईगो में से हेल्दी अस्मिता में से आत्मश्रद्धा की ओर आना पड़ेगा। अपना अपने को रीइन्वेंट करना पड़ेगा। तो यहां पर भी स्वामी जी भले ही चाहे ब्रिटिश लोगों के बारे में इस तरह से बात करते हो हमको यह समझना है कि आत्मश्रद्धा और आत्मविश्वास या तो सेल्फ कॉन्फिडेंस इन दोनों में बहुत बड़ा फर्क है। यह नचिकेता में आत्मश्रद्धा थी। आत्मश्रद्धा हमको साधना करने में करेज प्रदान करता है। बल प्रदान करता है। अभी मैं आज सुबह की ही बात करूं। आज मैं मंगल आरती के बाद में से आने से अपने कमरे में आया और बैठकर के थोड़ा सा जप करने का प्रयास किया। अभी थोड़ा आधा घंटा हुआ नहीं है कि नींद आने लगा। उस समय मैंने सोचा कि देखो आधा घंटा जप करना में तो एटलीस्ट मुझे 20 साल हुआ रामकृष्ण संघ में। इतनी ही देर के बाद में यदि मुझे नींद आ जाती है तो फिर तो फिर मेरा साधु जीवन किस काम का है? कैसे भी करके और एक आधा घंटा खींच ले बोल करके मैंने और ज्यादा बैठने का प्रयास किया तो यह और ज्यादा आधा घंटा खींच लेना पड़ेगा अदरवाइज तो मैं किस तरह से अपने साधु जीवन को मेंटेन कर पाऊंगा यह जो भीतर में जो स्ट्रगल होती है और यह तमस की शक्ति है एक तो एक कंटीन्यूअस मुझे नींद की ओर खींच रही है यहां पर सुंदर वातावरण है सुबह को 5:00 बजे का ठंडी हवा बह रही है समुंदर की सामने से और यहां पर सुंदर कमरा है जिसमें किसी भी तरह का डिस्टरबेंस नहीं तो नेचुरली नींद तो आएगी ही तो यह तमस की शक्ति मेरी जो कंटीन्यूस मुझे नींद की ओर खींच रही है सामने यह सत्व की शक्ति है जो कि मुझे बैठने के लिए प्रेरणा दे रही है। उस समय यह तमस और सत्व का जो ध्वंध होगा कंटिन्यूस उसमें सत्व की विजय हो। तमस की हार हो वह कैसे सत्व के पास में ऐसी कौन सी शक्ति है? ऐसी कौन सा खड़ग है? जैसे कि ठाकुर ठाकुर ने वो मां काली के हाथ में से खड़ग उठा के अपना खुद का गला काटने का प्रयास किया। कहा कि प्रयास क्या गला काटने ही वाले थे। कहा यदि तुम दर्शन नहीं दोगी तो अपना ही गला काट दूंगा। तो वो करेज कहां से आता है? वो साहस कहां से आता है? वो शक्ति कहां से आती है? तो वह शक्ति आती है आत्मश्रद्धा से। देखिए कि भारत के जितने भी साधक हैं सभी के जीवन में आपको आत्मश्रद्धा देखने को मिलेगी। इवन जिन लोगों के भीतर में यह वैष्णव दीनहीन भाव है उनके भीतर में भी यदि आप एक लेवल से ऊपर पहुंच गए हैं क्योंकि क्या है? देखिए यह चाहे आप अद्वैत की साधना करते हो ना कि द्वैत की साधना करते हो। एक चीज हमको हमेशा याद रखनी है और वह क्या है कि इंद्रियों का संयम किए बिना तमस के सामने लड़े बिना हम आध्यात्मिक जीवन में ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगे। यह हमको एकदम स्पष्ट रूप से ख्याल में रखना है। तो अभी यह प्रश्न होगा कि इंद्रियों का आकर्षण जब ये तमस की शक्ति हमारे मन के ऊपर में एकदम हावी हो जाती है तो उस समय हम कैसे अपने को बचाएंगे? वह चाहे वैष्णव हो चाहे जितना ही दीनहीन भाव हो उसका ना ही चाहे वह अद्वैत वेदांत को फॉलो करता हो ना कि चाहे वह इवन अजातवाद को फॉलो करता हो। कोई भी पंथा हो आपका वो चाहे क्रिश्चियन हो ना कि मुस्लिम हो ना कि जैन हो ना कि बौद्ध हो इंद्रियों का संयम करना कोई भी धर्म का एक फाउंडेशनल प्रिंसिपल है तो यदि आप अपने जो धर्म है उस धर्म में आगे बढ़ना चाहेंगे आगे बढ़ना प्रयास करेंगे तो इंद्रियों के साथ में तो युद्ध करना ही होगा इंद्रियों के जो आकर्षण है उसका उसके सामने आपको झुझना ना ही होगा। आपको विजय प्राप्त करनी ही होगी। तो आत्मश्रद्धा आपको यह विजय प्राप्त करने में सहाय करती है। आत्मश्रद्धा आपको यह वेपन देती है। यह करेज देती है कि इंद्रियों के सामने लड़े। तो देखिए कि आत्मविश्वास या तो जिनको हम जनरली एोगेंस या तो एक हेल्दी अस्मिता कहेंगे वो हमको बाहर की चैलेंज के सामने लड़ने के लिए वो एक शक्ति देंगे। अब जैसे ब्रिटिश का ही है कि इतनी बड़ी स्पेनिश आरमाड़ा आ रही है। इसके सामने आपको लड़ना है। बहुत ही कम संख्या में अल्पसंख्यक आपकी यह बोट वगैरह थी। युद्ध जहाज थे। इसके बावजूद सिर्फ और सिर्फ करेज के बहाने सिर्फ करेज के आधार पर साहस के माध्यम से आपने यह युद्ध कर लिया। यह ब्रिटिश लोगों की और एक कहानी है। अह यह अफगानिस्तान की कहानी है। अफगानिस्तान में एक किला था। वैसे तो अफगानिस्तान में यह मार खा के आए थे। किंतु इनका साहस बड़ा था। देखिए साहस की कहानी कैसी जाती है कि एक किला है किले में उसका जो दरवाजा है वो बड़ा ही हैवीली फोर्टिफाइड है यानी कि बहुत सारे ये जितने भी सैनिक हैं जितने भी उनके अस्त्र-शस्त्र है सब यह दरवाजे के सामने तैनात है। तो अभी इतनी बड़ी पहाड़ी उठकर के आप इस दरवाजे के सामने जाएंगे तो और ये जो सामने से अटैक करेंगे तो आपका तो मृत्यु निश्चित है। डिफिट निश्चित है। तो किया क्या जाए? तो उस समय यह जो वहां का वह जो ब्रिटिश कमांडर था उसने क्या सोचा कि पीछे से यदि इस किले पर हमला करें तो कैसा होगा? किले के पीछे का भाग जो है वहां पे इतना यह प्रोटेक्शन या तो फिर इतने अस्त्र-शस्त्र तैनात नहीं है। किंतु फिर प्रश्न यह है और ये अफगान लोग भी तो चालाक है ना। उनको तो इतनी तो स्ट्रेटजी समझ में आती है कि यह जो फ्रंट डोर है बड़ा हेवली फर्टिफाई किया है। बैक डोर को खुला छोड़ दिया है। तो वे लोग तो बैक डोर से आ जाएंगे। किंतु वे लोग बड़े निश्चिंत थे। क्यों? क्योंकि पीछे का भाग जो है किले का वो सीधी उठान थी। यह पहाड़ी के ऊपर में कोई भी उसको उठ वो ये नहीं कर सकता है। क्लाइम नहीं कर सकता है। इतनी सीधी ये उठान थी। तो अभी ये अफगानिस्तान वाले सोचते हैं अफगान ये जो सोल्जर थे कि पीछे से तो कोई इतनी ये जो माने सीधी ये जो ये पहाड़ी है उस पे उठना तो असंभव है। यानी कि ब्रिटिश लोगों को यदि आना होगा तो सामने से ही आएंगे। जहां पे चढ़ाई जो है आसान है। तो वो सामने से आएंगे। हम उनका मुकाबला करेंगे। ऑन दी अदर हैंड ये ब्रिटिश कमांडर ने ठीक किया कि पीछे से अटैक करेंगे। पीछे से सोल्जर भेजेंगे। किंतु यह जो स्ट्रेट क्लाइम है वह कौन कर पाएगा? तो फिर वह उसने एक पूरा टीम तैयार किया सोल्जर्स का और इन्होंने चढ़ना शुरू किया। ये वो एक पूरी कहानी है कि कितना डिफिकल्ट क्लाइम है। यह सीधा ऊपर उठना पहाड़ की चोट के ऊपर में चोटी के ऊपर में शिखर के ऊपर में वो जिन्होंने ये पहाड़ ये जो क्लाइंबिंग वगैरह किया होगा ये वही लोग समझ पाएंगे। तो यह सीधी उठान से उठकर के यह ब्रिटिश सोल्जर पीछे गए किले के और वहां से हमला किया। ये अफगान लोग इतने आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वहां से कोई दुश्मन इतने ऊपर उठकर के आ सकता है। तो देखिए वो तो एक साहस है। सीधा आपको ऊपर में उठना कितना प्रचंड आपको परिश्रम लगेगा। आपका जो अंग प्रत्यंग है कितना टूटना शुरू हो जाएगा। कितना कष्ट होगा और उसके बावजूद एक करेज बना करके आपको कंटीन्यूसली उठते रहना इस पहाड़ के शिखर तक वह कितना बड़ा एक साहस चाहिए कितना एक सेल्फ कॉन्फिडेंस चाहिए। तो स्वामी जी उस सेल्फ कॉन्फिडेंस की बात करते हैं जब स्वामी जी यह कहते हैं कि एक इंग्लिश मैन को पता है कि वह इंग्लिश मैन है और वह जो चाहे वो कर सकता है। यह स्पेनिश आरमाडा का भी मुकाबला कर सकता है और सीधी चढ़ाई वाले जो शिखर है वहां पर भी चढ़कर के दुश्मनों को मार सकता है। यह कॉन्फिडेंस उनमें है। किंतु यहां पर हमको अगेन यह नचिकेता का जो आत्मश्रद्धा है और इनकी यह जो करेज है इसमें यह डिफरेंस एकदम पक्का समझना है। ये जितने भी सोल्जर अह मैं इन जनरल नहीं कहूंगा मैं किंतु ज्यादातर सोल्जर को देखेंगे यह करेज तो होता है दुश्मन को सामना करने का। ये युद्ध के मैदान में सामने से कंटीन्यूअस ये गोला बारूद अपने पे आ रहा है। उसके सामने मृत्यु के मुंह में जाकर के ये उस अपने दुश्मनों का मुकाबला करने का। किंतु भीतर में जब इंद्रियों का मुकाबला इंद्रियों का आकर्षण है। यह काम कांचन का आकर्षण है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह का जब हमारे पे आवेश हो जाता है। तब उसके सामने लड़ने के लिए इनके पास में कोई हथियार नहीं होता। इनके पास में कोई टेक्निक नहीं होती। तो यह आत्मश्रद्धा हमको इसके सामने भीतर के शत्रुओं का मुकाबला करने के लिए शक्ति देते हैं। जबकि यह एक सोल्जर का करेज या तो इंग्लिश मैन का जो करेज है वो बाहर के दुश्मनों के सामने लड़ने के लिए करेज देते हैं। सो यह एक बड़ा डिफरेंस हमको याद रखना है।
कमजोर चरित्र वाले लोग अंधविश्वासों का शिकार होते हैं
क्या कहते हैं स्वामी जी? वी हैव बिकम वीक एंड दैट इज व्हाई ओकल्टिसिज्म एंड मिस्टिसिज्म कम टू अस दोज़ क्रपी थिंग्स दिस क्रपी थिंग्स अर्थात कि हमारी जब मानसिक कमजोरी हमको असहाय कर दे हमारे मन में एक अधम भावना से हमको ग्रस्त कर दे एक इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स हमारे मन पर सवार हो जाए तब यह ऑकल्टिसिज्म और मिस्टिसिज्म हमारे जीवन में प्रवेश करते हैं। ये घिनौनी चीजें हमारे जीवन में प्रवेश करती है। क्योंकि क्या है कि इस तरह के आदमी के पास में ना ही यह इंद्रियों के आक्रमण के सामना करने की कोई शक्ति है ना ही बाहर के शत्रुओं का आक्रमण करने की कोई शक्ति। यह हमारी परिस्थिति इस तरह की हो गई थी। दोनों ओर से हम मार खा रहे थे। बाहर के जगत में भी हम ब्रिटिश लोगों के गुलाम थे और भीतर के जगत में तमस के गुलाम हो गए थे। इंद्रियों के गुलाम हो गए थे। काम कांचन के गुलाम हो गए थे। तो फिर अब यह गुलामी की बात जो है हमको चुभती तो है। भले ही चाहे हम लोग मुंह से कुछ ना बोले तो इससे मुकाबला कैसे करेंगे? आत्मश्रद्धा तो है नहीं, करेज तो है नहीं, सेल्फ कॉन्फिडेंस तो है नहीं। तो फिर यह जितना ही ओकल्टिसिज्म है, मिस्टिसिज्म है, उसमें जाने का प्रयास करेंगे। देयर देयर मे बी ग्रेंस ऑफ ट्रुथ इन देम बट दे हैव नियरली डिस्ट्रयड अस। उनमें सत्य का कोई ना कोई अंश होगा शायद किंतु इस तरह की बातों ने इस तरह के पथ ने इस तरह की विधियों ने हमारा सर्वनाश कर दिया है। कल हमने मां की बात देखी कि किस तरह से मां भी इस तरह से तांत्रिक लोगों पर कुछ अधिक विश्वास रखती थी। किंतु यह बात हमको समझना है कि मां के भीतर में जो आत्मश्रद्धा थी इतनी प्रचंड थी कि भीतर का जो तमस है उसको संपूर्ण रूप से उसका विनाश करके रखा था। तो यह दुर्गा की तरह है। भीतर में बाहर में बालिका की तरह है। तो मां के लिए यह सब शोभा देता है। हम लोग भीतर में भी कमजोर है। बाहर में भी कमजोर है। हम लोग यदि यह सब पालन करने को जाएंगे यह विधि विधान तंत्र मंत्र में जाएंगे तो हमारा सर्वनाश ही होगा। हां, मां की तरह आत्मश्रद्धा डेवलप कीजिए। मां कहते हैं प्रतिदिन 10,000 जप करो। देखो कैसे मन को शांति नहीं मिलती है। वो लोग सब आकर के मां के सामने रोते हैं। कहते हैं मां शांति नहीं मिल रही है। मन की शांति चाहिए। मां फटाक करके उत्तर देती है। रोज 10,000 जप करो। देखो शांति कैसे नहीं मिलती है। तो हमारे में भी यदि हम 10,000 जप कर सकते हैं। इंद्रियों के आकर्षण पर हम कंट्रोल कर सकते हैं। तो फिर करो ना चाहे जितना तंत्र मंत्र करना है। कौन आपको रोकता है? किंतु बिकॉज़ कि हमारी इंद्रियों पर संयम नहीं है। रोज 10,000 जप करने की क्षमता नहीं है। और फिर हम तंत्र में जाएंगे, किसी तांत्रिक के पल्ले में पड़ेंगे तो हमारा सर्वनाश ही होगा। व्हाट वी वांट आर मसल्स ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टिल? क्या हमें चाहिए मसल्स ऑफ आयरन? अर्थात कि लोहे की मांसपेशियां और यह स्टिल की नर्व्स अर्थात कि यह जो अपनी नर्वस सिस्टम है वो स्टील की बनी होनी चाहिए। वी हैव वेप्ड लॉन्ग इनफ। बहुत रोना धोना कर लिया हमने। नो मोर विपिंग बट स्टैंड ऑन योर फिट एंड बी मैन। और रोना-धोना नहीं। अपने पैरों पर खड़े रहो और मर्द बनो। इट इज अ मैन मेकिंग रिलीजन दैट वी वांट। मनुष्य का निर्माण करें। इस तरह का धर्म चाहिए। मर्दानगी प्रकट करें। इस तरह का धर्म चाहिए। महावीर में विश्वास हो। महावीर जैसा तेज प्रकट हो। इस तरह का धर्म चाहिए। महादेव जैसी शक्ति प्रकट हो। इस तरह का धर्म चाहिए। इट इज अ मैन मेकिंग रिलीजन दैट वी वांट। इट इज मैन मेकिंग थरीज दैट वी वांट। इट इज मैन मेकिंग एजुकेशन ऑल अराउंड दैट वी वांट यह मनुष्यत्व दे मदानगी दे साहस दे करेज दे और यह करेज साहस मदानगी यह ब्रिटिश लोगों की अर्थ में नहीं ये ब्रिटिशों की तरह उन्होंने पूरे विश्व पे एक राज्य किया पूरे विश्व पे साम्राज्य स्थापित किया तो हम लोग अपना एक साम्राज्य स्थापित करेंगे भारत का इस अर्थ में नहीं किंतु हमारे हमारे भीतर के यह जो शत्रु है षड रिपु जो है हमारे भीतर के यह काम कांचन है हमारे भीतर में यह पंच कक्लेश है अष्ट रिपु है उसका सामना करने के लिए जो शक्ति चाहिए उसका सामना करने के लिए जो करेज चाहिए जो मर्दानगी चाहिए वो देने वाला धर्म हमको चाहिए वो देने वाली थरीज और फिलॉसोफी हमको चाहिए वो देने वाली वाली शिक्षण पद्धति हमको चाहिए। आज की शिक्षण पद्धति के बारे
भारत में सर्वोच्च फिलोसोफी है, किन्तु सबसे निम्न व्यावहारिक प्रयोग है
में अभी हम क्या कहेंगे? स्वामी जी ने इतना सब कुछ हम कह के गए हैं हमको। इसके बावजूद आप देखेंगे कि रट करके पास हो जाओ। यही एक चीज सिखाता है हमारा एजुकेशन। कहां योग, वेदांत और मेडिटेशन को हमारी एजुकेशन सिस्टम का एक इंटीग्रल पार्ट होना चाहिए था। तो वो नहीं होकर के एक धर्म का मिस इंटरप्रिटेशन एक फ्रीडम प्राप्त होने के बाद में हमने कर लिया। यह नेहरू का जो यह सेक्युलरिज्म है उसने हमको फायदा तो कुछ-कुछ पहुंचाया इस अर्थ में कि हम लोग धर्म जुनूनी नहीं हो गए। जिस तरह से पाकिस्तान हो गया है। जिस तरह का आज का बांग्लादेश होने को जा रहा है। उस तरह का धर्म जुनून तो वैसे हमारे पे नहीं सवार हो गया। किंतु साथ-साथ में ही एक जो पोटेंशियल हमारा था उस समय इमीडिएटली आफ्टर फ्रीडम प्राप्त करने के बाद में यह जो विक्रम साराभाई है होमी भाबा है इस तरह के जो बेस्ट साइंटिस्ट जहां पे अवेलेबल थे यह रामकृष्ण मिशन जैसी आध्यात्मिक धार्मिक संस्था वहां पे थी ये जो बेस्ट इन एव्री फील्ड यह कॉस्मोलॉजी कहो एस्ट्रोनॉमी कहो ना कि आप चाहे फिजिक्स कहो एटॉमिक साइंस कहो ना कि आर्ट्स एंड कल्चर कहो सभी क्षेत्रों में अपने पास में सम ऑफ द बेस्ट बेस्ट साइंटिस्ट अवेलेबल थे, बेस्ट आर्टिस्ट अवेलेबल थे, बेस्ट क्रिएटर्स अवेलेबल थे आज की लैंग्वेज में। इसके बावजूद यह जो बेस्ट ऑफ द बेस्ट टैलेंट थी हमारे सामने उसको लिवरेज करने की वजह हम लोग एक तरह के सूडो सेकुलर सोशलिज्म में प्रवेश कर गए और उसने 50 साल तक 60 साल तक हमारे प्रोग्रेस को बिल्कुल जैसे कि खत्म करके रख दिया है। अभी यह पिछले 15 20 साल में ये 93 में यह जो ग्लोबलाइजेशन हुआ वह भी करना क्यों पड़ा था? क्योंकि यह फॉरेक्स रिजर्व खत्म हो गया था अपने अपने सर के ऊपर में। यह जो डेट जो है उसका पहाड़ बैठ गया था। अभी यदि आप लिबरलाइज नहीं करेंगे तो हमको लोन नहीं मिलेगा। ऐसा कंडीशन इन लोगों ने जब रखा तब कहीं जाकर के जोर जबरदस्ती अपने को लिबरलाइज करना पड़ा। और इवन टुडे आप देखिए कि जिसको कि एक इकोनॉमिक सिचुएशन है भारत की वो कोई हेल्दी नहीं है। हजार तरह के रूल्स एंड रेगुलेशन है जो कि क्रिएटिविटी को ऊपर आने से रोकते हैं। तो ये देखिए कि भारत की जो दुरावस्था है किस तरह का यह सेकुलरिज्म सोशलिज्म में हम घुस गए। किंतु यदि यह स्वामी जी के उपदेश को समझ के ठीक-ठीक वेदांत और योग के ट्विन फाउंडेशन के ऊपर में भारत का एजुकेशन, भारत का इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट, भारत की इकोनॉमी, भारत का यह जो गवर्निंग सिस्टम, भारत का पॉलिटिक्स उसको यदि स्थापित किया होता तो आज हम कितने आगे बढ़ जाते। वो नहीं करके हमने एक गलत धारणा अपने मन में बिठा दी कि हम गरीब देश हैं। गरीब देशों को स्पेस प्रोग्राम में पैसा खर्च करने का कोई प्रयोजन नहीं है। गरीब देश को यह एटॉमिक एनर्जी में पैसा डालने की कोई जरूरत नहीं है। गरीब देश को यह कंप्यूटर मैन्युफैक्चर करने की आवश्यकता नहीं है। गरीब देश को यह माइक्रोपर डेवलप करने की जरूरत नहीं है। गरीब देश को ये यूनिवर्सिटी में आरएडी बजट जो होना चाहिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट उसमें पैसा डालने की जरूरत नहीं है। गरीब देश को क्या करना है? तो गरीब लोगों को फ्री में सब कुछ बांटना है। फ्री में यह अनाज बांटो, फ्री में यह फर्टिलाइजर बांटो, फ्री में यह बांटो, फ्री में वो बांटो। फ्री में बांट करके सामने वोट लो। यह एक मेंटालिटी जो प्रवेश की है, भिक्षा देख के वोट देना लेना। यह भिक्षा दो, वोट लो। इस इस पूरी मेंटालिटी ने हमको पूरा खत्म करके रख दिया है। हमेशा के लिए हमने अपने मन में वो जो दीनहीन भाव जिसको स्वामी जी भगाना चाहते थे वही दीनहीन भाव को जैसे कि हमने अपना गवर्निंग पॉलिसी बना लिया है। तो इससे परिस्थिति यह हुई जैसे स्वामी जी हमेशा कहते हैं कि बेस्ट फिलॉसोफी इन द वर्ल्ड अद्वैत वेदांत हमारे सामने है। हाईएस्ट ऑफ द फिलॉसोफिकल एटेटनमेंट और उसका जो वर्स्ट सॉर्ट ऑफ प्रैक्टिकल इंप्लिकेशन भी प्रैक्टिकल एप्लीकेशन भी यही भारत में ही है। तो यह अद्वैत वेदांत एक और है। ठाकुर मां स्वामी जी एक और है। इनके बावजूद हम लोगों ने पिछले जो आफ्टर फ्रीडम जो किया है उसको देखकर के मन में निराशा और हताशा के अलावा और कुछ नहीं आता। तो जो भी है अभी स्वामी जी ने तो कहा है कि मेरा मिशन 1500 साल तक चलने वाला है। अभी तो 150 साल ही हुए हैं। लेट अस सी कि और बाकी के समय में क्या होता है।
आध्यात्मिक शक्ति क्या है
किंतु स्वामी जी का कांसेप्ट बड़ा क्लियर है। मैन मेकिंग इट इज अ मैन मेकिंग रिलीजन दैट वी वांट। इट इज़ मैन मेकिंग थरीज़ दैट वी वांट। इट इज़ मैन मेकिंग एजुकेशन ऑल अराउंड दैट वी वांट। मेक योर नर्व स्ट्रांग। व्हाट वी वांट आर मसल्स ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टील। अगेन यहां पे एक बात बड़ी स्पष्ट समझने की जरूरत है। यह मसल्स ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टील का यह अर्थ नहीं कि हम बड़े ही पावरफुल योद्धा तैयार करें और इस योद्धाओं को दुश्मनों पर आक्रमण करने के लिए भेजें। या तो फिर कमजोर देशों की धन संपत्ति है। उसको हरण करने के लिए भेजें। यह राक्षसी शक्ति नहीं है। यह दैवी शक्ति है। यह दैवी शक्ति का एक ही इस्तेमाल होता है लोगों के रक्षण करने के लिए। देखिए यह भी एक कांसेप्ट समझने की जरूरत है। विश्व में हमेशा एक ऐसा होता है। खास करके आप देखिए कि रोम जब एक अपने एक चरम वह उपलब्धि पे था। चरम शिखर पे था। अपनी उपलब्धि के अपनी एटेनमेंट्स के उस समय क्या था? एक पेक्स रोमाना बोलकर के था कि अर्थात कि रोम के द्वारा स्थापित शांति अर्थात कि रोमन साम्राज्य अपने अंडर में जितने भी देश आते हैं छोटी-मोटी लोकालिटीज जो भी आता है किंगडम आते हैं उनको आपस में युद्ध नहीं करने देगा। वो भले ही चाहे एक बंदर और दो बिल्लियों वाली कहानी हो। यह बंदर भले ही चाहे बिल्लियों का शोषण करता हो किंतु एक तरह की शांति एक तरह का लॉ एंड ऑर्डर एस्टैब्लिश करके रखा था बोलकर के कॉमर्स जो है ये ट्रेडिंग जो है वो पूरा फ्लो होता रहे दुनिया में यदि प्रोग्रेस होना है तो आपको लॉ एंड ऑर्डर के बिना प्रोग्रेस नहीं होने वाला है। राजा का कार्य क्या है? यह जो जितने भी हाईवेज है, जितने भी वाटर वेज़ है, उस सबकी रक्षा करें। ये डाकू है। यह लुटेरे हैं। उनसे प्रजा को बचाए। यह जो ट्रेड और यह कॉमर्स जो है वो रूल्स एंड रेगुलेशन के अनुसार चलते रहे। कोई किसी का शोषण ना करें। यह सब मेंटेन करने का राजा का कार्य है। इसीलिए जब राज्य में लॉ एंड ऑर्डर होता है तब यह राज्य बड़ा ही प्रोस्पेरस होता है। क्योंकि वहां पे कॉमर्स, ट्रेड एंड इंडस्ट्री बड़ा ही अच्छे से कार्य करता है। जहां पे लॉ एंड ऑर्डर नहीं है, वहां पे कॉमर्स नहीं ठीक से काम करता, ट्रेडिंग नहीं काम करता, मैन्युफैक्चरिंग, इंडस्ट्री सब कुछ तबाह हो जाता है। और इसीलिए भले ही अभी एक कांसेप्ट है कि अपने देश के भीतर में लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करके रखना जो कि बहुत सारे देश करते भी हैं। किंतु एक कांसेप्ट है कि इंटरनेशनल लेवल पे ग्लोबल लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करके रखना। तो एक महासत्ता एक होती है जो कि अपने-अपने एरिया में लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करके रखती है। दो देश जब भी युद्ध करेंगे तो इमीडिएटली यह लोग पहुंच जाएंगे। भले ही चाहे अपना यह कमीशन वसूल करें किंतु यह युद्ध को अटकाएंगे क्योंकि युद्ध होता है, स्ट्राइफ होती है, सिविल वॉर होती है, टेररिज्म होता है। किसी के हित में नहीं है। वो हमेशा यह ट्रेड को हिंडर करता है। यह जो कॉमर्स है उसका यह उसका यह सत्यानाश करता है। तो अभी सबको प्रोस्पेरस होना है। सबको धनी होना है। तो सबको युद्ध अटकाना है। तो यह पहले तो था पेक्स रोमाना एक था। फिर यह नेपोलियन ने प्रयास किया। एक होली रोमन एंपायर हुआ यूरोप में। उसके बाद में नेपोलियन ने प्रयास किया कि आप पूरे यूरोप पे अपनी सत्ता जमा करके भले ही चाहे उसको धन प्राप्ति होती रहे किंतु यूरोप में अदरवाइज जो छोटे-मोटे लोकालिटीज हैं वो आपस में युद्ध करते हैं। वह सब अटक जाए। और अभी उसके बाद में यह पेक्स ब्रिटानी का ब्रिटेन का पूरे ग्लोब के ऊपर में इस तरह का कंट्रोल था कि यह जो वाटर वेज़ है इंटरनेशनल वाटरवेज उस पे यह जो पायरेट्स जो होते हैं वो सभी पर हमला करते हैं। वो जितने भी कमर्शियल जहाज है, शिपिंग इंडस्ट्री है उसको वो क्रिपल करने का ट्राई करते हैं। तो यह ब्रिटिश रॉयल नेवी थी जो कि ओपन सीज को प्रोटेक्ट करके रखती थी। तो वो एक समय था। अभी है पेक्स अमेरिकाना माने अमेरिका जो है यह ग्लोबल रूल्स एंड रेगुलेशंस ग्लोबल लॉ एंड यह ऑर्डर मेंटेन करता है। अभी स्वामी जी कहते हैं मसल्स ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टील। इसका क्या अर्थ है? अमेरिका जो अभी तक एक ग्लोबल एक जज के रूप में था, ग्लोबल पीस मेकर के रूप में था, एक रिस्पांसिबल सुपर पावर था। आज हम सबको पता है कि अभी यह उप अमेरिका नहीं रहा। सेकंड वर्ल्ड वॉर से प्रारंभ करके 1945 से प्रारंभ करके 19 2025 यह पेक्स अमेरिकाना यहां तक चला। अभी से आगे देखेंगे कि धीरे-धीरे करके अमेरिका अपना यह जो रोल है पूरे ग्लोब में लॉ एंड ऑर्डर को मेंटेन करना वहां से वह रिट्रीट हो रहा है। अभी वह ज्यादा से ज्यादा सेल्फिश हो रहा है। तो फिर यह जो गैप खड़ी होती है पूरी पृथ्वी पर शांति स्थापित करने की वो कौन करेगा? यदि चाइना के हाथ में यह चला गया तो देखिए कि उसका सबसे बड़ा नुकसान ये छोटे-मोटे जो कंट्री है उन्हीं का ही होगा। चाइना का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। डेट ट्रैप वगैरह करता है और भारत के सामने उसकी बड़ी यह पता नहीं कहां से उसके मन में यह दुश्मनावट खड़ी हो गई है। तो जो भी है यह रोल हमको फुलफिल करना होगा। स्वामी जी कहते हैं इंडिया मस्ट कॉनकर द वर्ल्ड बट नॉट वि द आर्मीज़ बट वि आवर स्पिरिचुअलिटी। जिस तरह से क्रिश्चियनिटी पूरे विश्व में फैला और जहां-जहां पर भी गया शांति और प्रेम का संदेश फैलाने का प्रयास किया। जिस तरह से बुद्धिज्म पूरे विश्व में फैला इसी तरह से हिंदू धर्म को भी और मैं हिंदू धर्म नहीं कह के स्वामी जी जो प्रेफर करते थे वेदांत को पूरे विश्व में फैलना होगा और वेदांत के पीछे भारतीय शक्ति को खड़ी रहना होगा। यह पेक्स वेदांता यह समय अभी इस विश्व में आ गया है। यह पेक्स वेदांता यह जो है पूरे विश्व में शांति स्थापित करेगा। जहां-जहां पे भी युद्ध हो रहा है, जहांजहां पे भी लोग बेचारे सफर कर रहे हैं, उन सबको जाकर के सहाय पहुंचानी होगी। प्रेम का संदेश देना होगा। स्वामी जी कहते हैं, आई एक्सपेक्ट नथिंग लेस फ्रॉम इंडिया। पूरे विश्व पर विजय प्राप्त करना है बट नॉट वि द आर्मीज़ बट वि द पावर ऑफ वेदांता। दिस इज नाउ द टाइम फॉर पेक्स वेदांता। इसलिए यहां पर स्वामी जी कहते हैं मसल्स ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टिल। इस अर्थ में नहीं कि कमजोर लोगों का शोषण करें। किंतु इस अर्थ में कि जहांजहां पर भी गरीबी है, जहांजहां सफरिंग है, वहांवहां जाकर के हम शांति, सहाय और प्रेम बटो बांटें। इस अर्थ में यहां पर स्वामी जी ने कहा है। वी हैव वेप्ड लॉन्ग इनफ। नो मोर विपिंग। बहुत रो लिया। अभी रोना धोना नहीं चलेगा। मैं गरीब हूं। मुझे यह सब नहीं मिलेगा। फ्री में सब कुछ। तो मेरा क्या होगा? यह सब रोना धोना छोड़ो। अपने पैरों पर खड़े हो। स्टैंड ऑन योर फीट एंड बी मैन। इट इज अ मैन मेकिंग रिलीजन दैट वी वांट। मैन मेकिंग थरीज दैट वी वांट मैन मेकिंग एजुकेशन ऑल अराउंड दैट वी वांट। तो आज यहीं तक अभी कल फिर से मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: हमें कैपेसिटी बिल्डिंग नहीं करना. बस मुफ़्त में बैठ कर खाना है. चीन कैसे आगे बढ़ रहा है! भारत में नेशनल अवेकनिंग नहीं है. भारत में ऐसे उच्च आदर्श हैं, लेकिन उन्हें जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया जाता है, वे व्यवहार में क्यों नहीं आ पाए है? स्वामीजी के आदर्श को जन-साधारण में फैलाए कैसे?
डिस्ट्रीब्यूट कैसे करें? डालोगे कैसे? इसको कोल्ड चेन बोलते हैं। वो वैक्सीन जो होता है ना वो वहां पे जो फ्रीजर में रखा होता है वो रांची में हमने वो कोल्ड चेन बनाया था। ठीक किया कि वैक्सीन इस दिन को देना है। तो वो फ्रीजर में से जैसे निकालेंगे हमारा गाड़ी पहुंच जाएगा। वो कोल्ड बॉक्स लेकर के आइस बॉक्स लेके उसमें वैक्सीन रखना है। अभी आइस बॉक्स का इतना 2 घंटे में पहुंचना चाहिए एंड पर्सन तक। तो हमने गाड़ी रूट फिर विलेज ऐसा सब किया था। एक महीना बैठ के प्लान किया था। एक ही दिन में हमने 15 2000 लोगों को तो वैक्सीन पहुंचाया था। इसको कोल्ड चेन एस्टैब्लिश करना। तो गवर्नमेंट का प्रोजेक्ट था वी वेर द पार्टनर। तो यू आर परफेक्टली राइट। ये अपने साथ में ये पहले देखिए 70ज में ये सेकुलरिज्म घुसा एक बिना मतलब का और ये 90ज में ना ये मंडल कमंडल घुस गया तो मतलब एक जो एस्पिरेशनल एक होना चाहिए अब मोदी ने प्रयास तो किया है किंतु आपने जैसे कि ठीक ही कहा कि ये सब प्रयास है ना जैसे कि लग रहा है ऊपर से बिठा दे रहा है भीतर में से वो नहीं आ रहा दूसरा क्या है पता है इंडिया का जो सबसे बड़ा प्रॉब्लम है वो है टैलेंट पाइपलाइन माने आदमी में टैलेंट है उसको अब जैसे देखिए ना ज्यादातर पार्टीज में नेपोटिज्म है। फादर ने पार्टी एस्टैब्लिश किया उसका लड़का उसका मालिक बन के बैठ जाएगा। जितनी भी पार्टीज है सब जगह पे नेपोटिज्म है। एक बीजेपी में आरएसएस में एक है कि एक टैलेंट पाइपलाइन है। किंतु दिस इज अ रेयर फिनोमिना। ज्यादातर जगह पे सब जगह पे नेपोटिज्म सब जगह पे आपका टॉप लेवल जो है ब्लॉक करके बिठा दिया है। क्यों यह सुंदर पिचाई और देखिए एक समय था आई यूज्ड टू फील वेरी प्राउड। आपने उसकी बात की ना सुंदर पिचाई की और सत्य नलेला की कि अमेरिका में जाकर के ये लोग टॉप मल्टीीनेशनल कंपनी के मालिक हो गए हैं और मैंने एक आर्टिकल पढ़ा था म उस समय मैं बहुत प्राउड फील कर रहा था तो फिर ये गुब्बारे में जैसे पंचर मारता है ना एक आर्टिकल मैंने पढ़ा तो उसमें एग्जैक्टली यही टॉपिक डिस्कस कर रहा है कि हम लोग देखते हैं कि इंडियन इंजीनियर है टॉप लेवल पे अमेरिका में पहुंचते किंतु चाइनीस इंजीनियर नहीं पहुंचते हैं। सो व्हाट इज द रीज़न फॉर दैट? उसमें एनालिसिस किया है। म बहुत अच्छा एनालिसिस है। हवाहवा में नहीं प्रॉपर एनालिसिस करके प्रूव करता है कि चाइना में आपकी टैलेंट को मैनिफेस्ट करने का अप्लाई करने का स्कोप है। इसलिए jकमा वगैरह जितने भी टॉप लेवल के इंजीनियर हैं वो अपने ही देश में बैठकर के अलीबा है, TST है, Huawei है, उस तरह बीवाईडी है। इस तरह की एकदम कंप्लीटली न्यू टेक्नोलॉजी पे बेस्ड कंपनी को एस्टैब्लिश कर सकते हैं। इंडिया में वह टैलेंट पाइपलाइन ही नहीं है। बोल के आपको यदि कुछ करना होगा तो आपको विदेश में ही जाना होगा। सो यह पढ़कर के पूरा एक गुब्बारे में से हवा निकल गई है। म यदि देखिए कि यह सुंदर पिचाई इंडिया में रहता तो व्हाट ही कुड नॉट हैव डन। उसको मैनिफेस्ट करने के लिए अप्लाई करने के लिए वहां पे जाना पड़ रहा है। अभी अमेरिका इस टेकिंग बेनिफिट ऑफ हिम रेदर देन अस। सो दिस इज अ मैटर ऑफ़ शेम कि अमेरिका में मल्टीीनेशनल कंपनी के टॉप पे इंडियन इंजीनियर बैठे हैं। इंडियन को वहां पे जाने की जरूरत ही क्यों पड़ गई? यहां पे बीवाईडी क्यों नहीं है? अपने यहां पे टेस्ला क्यों नहीं है? अपने यहां पे ये Microsoft Google क्यों नहीं है? अपने यहां पे अलीबाबा क्यों नहीं है? वो हो ही नहीं सकता क्योंकि टॉप टैलेंट यहां पे किसी काम का ही नहीं है। ये जो हमारे लिए सबसे बड़ी शर्म की बात क्या है? पता है अमेरिका में जो इललीगल क्रॉसिंग जो चलता है नंबर टू पे इंडियंस है। नंबर वन पे मेक्सिकनंस हैं। वो तो पास में ही रहते हैं। तो वो तो इललीगल क्रॉसिंग करेंगे। नंबर टू पे इंडियंस हैं। यहां से वहां तक की यात्रा करके इललीगल क्रॉसिंग करने का ट्राई कर रहे हैं। इतने सारे हैं। तब सोच लीजिए। देखिए इसका इसका यदि एक सॉल्यूशन ऐसा हो सकता है आई मीन नॉट इन अ स्पिरिचुअल वे स्पिरिचुअलिटी इज अ बेडक उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है बट गोइंग फर्दर कि स्वामी जी के आइडियाज पे ना कोई पॉलिटिकल पार्टी बने तो दैट विल बी अ वेरी पावरफुल सॉल्यूशन अ कि अब अब जैसे देखिए हम लोग हमेशा पॉलिटिक्स में जाने को कतराते हैं। स्वामी जी ने तो स्पष्ट मना किया है। किंतु जिस तरह से निवेदिता ने उस समय के पॉलिटिकल लीडर्स के साथ में वार्तालाप किया, ठाकुर मां स्वामी जी का मैसेज पहुंचाने का प्रयास किया, मुझे ऐसा नहीं लगता निवेदिता और स्वामी जी का जो रिलेशन था कि स्वामी जी के आशीर्वाद बिना निवेदिता ने यह किया हो। स्वामी जी स्पष्ट रूप से चाहते थे कि यह मैसेज फ्रंट रो में जितने भी फ्रंट यह जो लाइन में जितने भी लीडर्स हैं, वहां तक यह मैसेज जाए। वेदांत का, आत्मश्रद्धा का, आत्मनिष्ठा का किंतु नेचुरली रामकृष्ण मिशन नहीं करेगा। तो समवन हु इज ट्रेंड बाय रामकृष्ण मिशन एक इस तरह का पर्सनालिटी जिसको कि सभी रिस्पेक्ट करते हो। एंड इट्स अ परफेक्टली 100% ग्राउंडेड विद इन रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा ही कैन और शी कैन शी कैन स्प्रेड दिस मैसेज। तो मुझे ऐसा लगता है कि निवेदिता ने स्वामी जी के आशीर्वाद लेकर के ही यह सब कुछ किया होगा। टुडे आल्सो इफ सम पीपल इंस्पायर्ड बाय स्वामी जीसस आइडियोलॉजी एक नया पॉलिटिकल पार्टी एस्टैब्लिश करें वि इज 100% ग्राउंडेड विद इन रामकृष्ण विवेकानंद
प्रश्न: आध्यात्मिक होना और सामाजिक उत्थान की जिम्मेदारी लेना, दोनों एक साथ करना कठिन है। इन दोनों के बीच सामंजस्य क्या संभव भी है की नहीं?
लिटरेचर देखिए कि रामकृष्ण मिशन के जितने भी साधु हैं उन्होंने अपनी लाइफ में यह दोनों का रिकंसिलिएशन करके रखा है। हम लोग कर्म भी करते हैं और जप ध्यान भी करते हैं। सो इट्स नॉट ए दैट डिफिकल्ट ए प्रपोजिशन और किंतु ये बात है कि अपनी कैपेसिटी कहां तक जाती है? अपना ओरिएंटेशन क्या है? अब जैसे आरएसएस या विवेकानंद केंद्र इनको आप देखेंगे स्वामी जी को लेते हैं ठाकुर मां को नहीं लेंगे। सो वेरी गुड टू टेक स्वामी जी डज नॉट मैटर। इसमें गलत कुछ नहीं है। फिर अब जैसे है कि बहुत सारी धार्मिक संस्थाएं हैं जो कि वेदांत है, भक्ति है उसके ऊपर में कार्य करेगी किंतु यह कर्म योग वगैरह ये पेट्रियोटिज्म उसमें वो नहीं जाते हैं। डज नॉट मैटर। आप उसमें भी जाइए। चलिए रिकंसिलिएशन इज़ नॉट समथिंग व्हिच इज़ एब्सोलुटली नेसेसरी फॉर अस टू डेवलप इन आवर स्पिरिचुअल लाइफ। राइट? क्योंकि हजारों हजारों सालों से जो लोग अद्वैत साधना कर रहे हैं उन्होंने अद्वैत को ही फॉलो किया है। जिन्होंने भक्ति साधना की है उन्होंने भक्ति को ही फॉलो किया है और उसमें वो सिद्धि भी प्राप्त की है। यह जो हार्मोनी ऑफ़ फोर योगास या तो फिर हार्मोनी ऑफ़ ठाकुर मास्वामी जी दिस इज अ इज़िएस्ट वे फॉर अस टू प्रोग्रेस अहेड। अब मैं अपने खुद के जीवन में देखता हूं। आप यदि यह प्रश्न करेंगे कि एक ही दिन में यह कैसे पॉसिबल है? मैं सुबह को ठाकुर और मां के उपदेश के अनुसार साधना करूं और दिन के दरमियान स्वामी जी के कहे रास्ते के अनुसार कर्म योग करूं। यह शायद डिफिकल्ट हो सकता है। हम लोग करते हैं। बट आपको लगेगा कि यह डिफिकल्ट है। किंतु मेरा खुद का जो अनुभव है अपने जीवन में फेसेस आते हैं। एक समय था कि मैं स्वामी जी के कहे अनुसार वो गांव-गांव में जाकर के कर्म करता था। आज है। फिर एक समय ऐसा आया कि मुझे मंदिर में काम करना पड़ा क्योंकि हेड क्वार्टर से मुझे नागपुर में भेजा। कहा कि बहुत रूरल डेवलपमेंट हो गया। अभी तुम थोड़ा सा ठाकुर की सेवा करो तो वो भी कर लिया। इसके बाद में लिटरेचर का मेरे समय आया तो वो भी एक कर लिया। अभी है कि मैं इस क्लासेस वगैरह करता हूं। तो लिटरेचर है अभी एक जनरल लाइफ है मेरा। सो फेजेस मेरे जीवन में आए हैं। सो फेसेस आर वन वे कि आप अपना डेवलपमेंट हो सकता है। और इवन विद इन वन डे सुबह और शाम ठाकुर और मां को पढ़िए। वेदांत के अनुसार साधना कीजिए। दिन में आप यह सीपी क्लीनिक है, यह हॉस्पिटल है, यहां पर स्कूल है। उस सबकी मैं संभाल रखूं। इट्स नॉट दैट डिफिकल्ट ए वे टू डू। मनुष्य का जो लाइफ है ना हो सकता है हम फिलॉसोफिकली इन तीनों को रिकंसाइल ना कर पाए। एक्शन में हम आसानी से कर पाएंगे। आप अपनी ही ओर देखिए। आप सुबह को क्लास करते हैं बहुत अच्छा लगता है। किंतु यह क्लास यदि आपका हमारा 1 घंटे से डेढ़ घंटे से ज्यादा चला तो फिर हम बैठ नहीं पाएंगे। क्योंकि यह मनुष्य की कैपेसिटी ही इतनी है कि हम एक डेढ़ घंटा ही क्लास करेंगे। यदि जप ध्यान करने का प्रयास किया आधा घंटा बहुत अच्छा लगा। बियों्ड दैट मैं बैठ ही नहीं पाऊंगा। उसके बाद में मुझे खड़े होकर के अपनी जॉब करनी ही होगी। कर्म करना ही होगा। तो मुझे एनीवे मुझे कर्म करना है। तो मैं क्यों नहीं स्वामी जी के कहे रास्ते के अनुसार निष्काम कर्म करूं? दैट लेट मी व्हाई नॉट लेट मी ट्रांसफॉर्म कर्म इनू साधना। राइट? तो वह कर्म तो करना ही है। एवरीव वन ऑफ अस दिन के दौरान कर्म करते ही है। चाहे घर में बैठ के खाना बनाना हो ना कि वह अपनी जॉब करनी है ना कि जो कुछ भी है। सो वी आर ऑलरेडी डूइंग दैट। ओनली थिंग इज लेट अस पुट इट ऑन द आइडियाज ऑफ ठाकुर मास्वामी जी।
प्रश्न: गृहस्थ निःस्वार्थ कार्य कैसे कर सकता है?
मुझे ऐसा लग रहा है कि दैट इज अ ग नेक्स्ट ग्रेट फ्रंटियर। आप रामकृष्ण ऑर्डर ज्वाइन करते हैं तो आपका वर्क वरशिप ऑटोमेटिकली हो जाता है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। अब मैं सीपी क्लीनिक में जाता हूं। मुझे पर्सनली तो कुछ मिल नहीं रहा है। अब मैं राजकोट में पब्लिकेशन में काम किया छोड़ के चला आया तो पॉकेट तो खाली ही था। ऐसा नहीं है कि वहां पे बहुत बड़ा बैंक बैलेंस बना दिया है। सो रामकृष्ण मिशन में यह ऑटोमेटिक वर्क एंड वरशिप हो जा रहा है। मुझे लग रहा है कि गृहस्थ लोगों के लिए वर्क वरशिप वाला फ्रेमवर्क क्रिएट करना दैट्स अ नेक्स्ट ग्रेट चैलेंज फॉर अस। अ के एक सीनियर साधु के साथ बात हो रहा था। तो वो मुझे कहते हैं कि गृहस्थ लोगों का भी एक ऑर्डर होना चाहिए। इन दैट सेंस अपने सेंस में नहीं। अपने सेंस में रूल्स एंड रेगुलेशंस बहुत है साधुओं के। गृहस्थ लोगों के लिए ऐसा नहीं हो सकता। किंतु एक फ्रेमवर्क होना चाहिए। विद इन दैट फ्रेमवर्क दे कैन लीव देर गृहस्थ सांसारिक लाइफ एज वेल एज दे कैन कंट्रीब्यूट समथिंग फॉर द ग्रेटर गुड। अब आप जॉब तो करते ही हैं। आपकी कंपनी में आपको जो कहा जाए आप करते हैं। ओनली थिंग इज कि कंपनी का मोटिव है प्रॉफिट मेकिंग। इंस्टेड ऑफ़ दैट इस तरह की कंपनी हो। इस तरह का एक कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर हो। वहां पे आप वही काम करें जो कि आप बैंक में करते हैं या तो फिर आप फैक्ट्री में करते हैं या तो डिस्पेंसरी में हॉस्पिटल में करते हैं। वही काम करें। बट दैट पर्पस ऑफ़ द फ्रेमवर्क इज़ द सर्विस ऑफ़ पीपल। राइट? सो दैट्स व्हाट अ फ्रेमवर्क शुड बी मेड। दैट इज़ आवर ग्रेट नेक्स्ट फ्रंटियर, ग्रेट नेक्स्ट चैलेंज।
प्रश्न: मैं बैंक में काम करता हूँ और लोगों को लोन देता हूँ। देश के विकास में मेरा कोई योगदान नहीं है।
देखिए, एक सॉल्यूशन मैं आपको देता हूं कि ये विल ऑफ कॉमर्स जो है इट रंस ऑन क्रेडिट। इट रंस ऑन कैश। यदि लोगों के हाथ में कैश नहीं है तो पूरा कमर्शियल जो इंडस्ट्रियल स्ट्रक्चर जो है वो टूट जाएगा। इसलिए बहुत सारे जो देशों में डेवलपमेंटल इकोनॉमिस्ट जो कहते हैं कि लोगों के हाथ में पैसा दो तो लोग परचेस करेंगे। लोग परचेस करेंगे तो मैन्युफैक्चरिंग चलेगा। मैन्युफैक्चरिंग चलेगा तो जॉब क्रिएट होगा। तो चाइना में अभी क्या हो रहा है कि लोग परचेस नहीं करते। लोग परचेस नहीं करते तो उनका यह जो पूरा मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट है उनको सब्सिडाइज करके पूरे विश्व में भेजना है। तो सब जगह से चाइना पे टेरिफ बैरियर आ रहा है। तो अभी आप मैन्युफैक्चरिंग सेल नहीं कर पाएंगे तो फिर आपका वो जॉब चला जाएगा। जॉब जाएगा तो और प्रॉब्लम खड़ा होगा। सो दैट वे यू आर हेल्पिंग द नेशन कि अब क्रेडिट लाइन उनको दे रहे हैं तो पीपल विल परचेस। परचेस होगा तो यह मैन्युफैक्चरिंग होगा। मैन्युफैक्चरिंग होगा तो जॉब क्रिएशन होगा। सो जीडीपी बढ़ेगा। सो दैट इज वन थिंग बट यू आर राइट इन दैट वे कि यह जो सब कॉरपोरेशंस जो है वो कोई भी क्षेत्र में हो इनका मेन काम यह नहीं है कि वो देश की सेवा करें। मेन काम है प्रॉफिट मेकिंग। उनके जो शेयर होल्डर्स हैं उनका प्रॉफिट मैक्सिमाइज करना है। दैट इज देयर मेन वर्क ओनर्स और शेयर होल्डर्स का। रेदर देन दैट इस तरह का कॉप अभी देखिए कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने इस तरह से किया है एचएल है हिंदुस्तान एयररोनॉटिक्स लिमिटेड है ना कि भारत हेवी Industries लिमिटेड है बीएचएल वगैरह-वगैरह तो उनका कार्य है कि इस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर है इस तरह की प्रोडक्ट से जो क्रिएट करें व्हिच इज बेनिफिशियल फॉर इंडिया भले वो चाहे डिफेंस इक्विपमेंट हो ना कि एयनिक्स इक्विपमेंट हो ना कि ये फिर ये मासिव सिविल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट हो टनल बनाना है ना कि ब्रिज बनाना है ना कि पोर्ट बनाना है वगैरह-वगैरह बट गवर्नमेंट कॉरपोरेशंस सपोज टू बी वेरी गुड किंतु इनफिशिएंट कितने हैं हमको पता है। दूसरा गवर्नमेंट स्कूल अगेन स्वामी जी के आइडियल्स के बिल्कुल परफेक्ट गवर्नमेंट स्कूल काम करते हैं। माने फिलॉसोफी एग्जैक्टली वही है कि एजुकेशन एजुकेशन एजुकेशन एजुकेशन आप जितना देंगे उतना ही ये ग्रास रूट लेवल से इंडिया ऊपर आएगा। इंडिया को ऊपर लाने का भारत का उत्थान करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका यही है। किंतु गवर्नमेंट स्कूल कितनी इनएफिशिएंट है वह हम सबको पता है। सो, अह वी कैन क्रिएट अ फ्रेमवर्क व्हिच इज़ अह मेड ऑफ़ एजुकेशनल इंस्टीटश व्हिच इज़ मेड ऑफ़ हायर लर्निंग एकेडमीज़ व्हिच इज़ मेड ऑफ़ दिस अहम अह वेंचुर कैपिटलिज़्म अह और फिर व्हिच इज़ मेड ऑफ़ हेल्थ इंस्टीटशंस, हेल्थ क्लीनिक्स एंड हेल्थ फैसिलिटीज। ऐसा एक देश के जो कल्याण के लिए जो कोर इंडस्ट्रीज है उसको आप पहले आइडेंटिफाई कीजिए। हेल्थ, एजुकेशन एंड हायर लर्निंग एंड क्रिएटिविटी एंड दिस वेंचर कैपिटलिज्म वेंचर फंड वगैरह। और फिर देन क्रिएट अ फ्रेमवर्क अराउंड इट एंड जिसको फिर जो रामकृष्ण मिशन की भावधारा से प्रेरित है जो कि कर्म को वरशिप में परिणत करना चाहते हैं। दे कैन डू एन वर्क देयर। एनीवन कैन वर्क देयर। व्हाट इज देयर? सो दोज़ कॉरपोरेशंस कैन अब जैसे देखिए मैं यहां पे इंडिविजुअली तो कुछ नहीं कर रहा हूं ना। दिस वाज़ वन लर्न लेसन आई हैव लर्न हियर। पहले मैं जब घर में था, मैं सोचता था मैं लोगों की सेवा करूंगा। मुझे सेवा करनी है। किंतु बहुत कम समय में पता चल गया रांची में मुझे कि मैं अकेला ज्यादा कुछ नहीं कर सकता हूं। यह इंस्टीट्यूशनल बैकअप चाहिए। अभी मेरा यह रेजिस्टेंस क्या है? रामकृष्ण मिशन यदि मुझे कहेगा तुमको किचन में काम करना है तो मैं एकदम रेबेल करूंगा। किचन में काम करके मैं गांव वालों की ट्राइबल लोगों की सेवा कैसे कर सकता हूं? किंतु फिर तो मुझे मेरा अंडरस्टैंडिंग को ट्रांसेंड करना है ना कि आई एम नॉट डायरेक्टली वर्किंग आई एम हेल्पिंग आई एम सर्विंग द इंस्टीट्यूशन इंस्टीट्यूशन इज सर्विंग द सोसाइटी अभी इंस्टीट्यूशन की ओर से मुझे अकाउंट करने का भी कहे पूजा करने को भी कहे किचन में काम करने को भी कहे तो इवन देन आई एम हेल्पिंग ट्राइबल डेवलपमेंट रांची में मैं डायरेक्ट ट्राइबल डेवलपमेंट करता था किंतु वहां पे पुजारी महाराज भी थे वो भंडारी महाराज भी थे अकाउंट महाराज राज भी थे। तो वे लोग भी तो इतना ही हेल्प करते थे ना कि जितना मैं करता था क्योंकि मैं बिना इंस्टीट्यूशन के हु एम आई। राइट? सो इंस्टीट्यूशन विल हेल्प द सोसाइटी एंड वी विल बी द पार्ट ऑफ इंस्टीट्यूशन। सो जिस तरह से रामकृष्ण मिशन इंस्टीट्यूशन इज़ फॉर द मक्स सिमिलरली देयर शुड बी इंस्टीट्यूशन फॉर हाउसहोल्डर्स। दैट वे यू कैन कन्वर्ट वर्क इनू वरशिप।