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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 3 June 2025

Invocation

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन इसका हमने ऑलरेडी प्रारंभ कर दिया है। ये

भारत का प्राण है धर्म. यहाँ धर्म के आधार पर ही समाज, राष्ट्र, और अर्थनीति का नवनिर्माण होगा

जो 13th पॉइंट था हाउ टू बेटर इंडिया ग्रो अकॉर्डिंग टू आवर नेचर। इस पॉइंट को कल हमने समाप्त किया। इसमें हमने देखा कि किस तरह से स्वामी जी कहते हैं कि सभी देशों का एक केंद्र बिंदु होता है। सभी देशों की प्राण शक्ति कोई ना कोई एक थीम के अनुसार कोई ना कोई एक टॉपिक के अनुसार वह चारों ओर बुनी हुई है। जैसे कि प्रत्येक देश की प्रत्येक देश का एक मुख्य राग है जिसके आसपास में सब रागिणियां ताल लय सब बुने हुए हैं और उस देश का एक यूनिक सुमधुर संगीत बनाते हैं। तो जैसे कि अमेरिका का है कि बिजनेस लाइफ ना सोशल लाइफ, ब्रिटेन का है पॉलिटिक्स, फ्रांस का है आर्ट्स। तो इसी तरह से भारत का मुख्य सुर भारत का प्रधान संगीत है धर्म और आध्यात्मिकता। यदि भारत में कुछ भी आपको हासिल करना है। भारत में आपको अर्थ कोई इकोनॉमिक रिफॉर्मेशन लाना है। पॉलिटिकल रिफॉर्मेशन लाना है। आपको यदि ऐसा कहना है कि ये राजा जो है इतने सारे सैकड़ों राजा भारत में छोटे-छोटे राज्य बना के बैठ गए हैं तो वो सतयुग में ना कि द्वापर युग में ना त्रेता युग में ठीक था। इस कलयुग में या तो फिर श्री रामकृष्ण के द्वारा प्रवर्तित नए सतयुग में यह सतयुग की नई साइकिल में इस तरह से छोटे-छोटे राज्य नहीं चलेंगे। पूरे भारतवर्ष को एक सेंट्रल अथॉरिटी के अंडर में यूनाइट होना होगा। तो यह सब जो वर्ल्ड वाइड चेंजेस जिसको कहेंगे मेजर चेंजेस कहेंगे फंडामेंटल चेंजेस कहेंगे भारत की पॉलिटिकल सिस्टम में वो लाने से पहले सर्वप्रथम तो भारत में इसी आध्यात्मिकता का फिर से प्रचार करना पड़ेगा। भारतीयों को उनकी जो धार्मिक संस्कृति है, सनातन हिंदू धर्म है, वह फिर से उनके सामने देखिए हमारी रगों में तो यही खून दौड़ रहा है। भारतीय हिंदू सनातन धर्म हमारी रगों में बह ही रहा है। बस उसको पुनः जागृत करने की जरूरत है। पिछले 1000 साल में शायद ऐसा हुआ कि सबसे पहले तो बौद्ध धर्म में जो अवनति हुई उसके बाद में जो विदेशी आक्रमण प्रारंभ हुए इस दोनों कारण की वजह से शायद हम कुछ समय तक अपना जो सही कर्तव्य है अपना जो सही जो हमारा जो जिस दिशा में हमको आगे बढ़ना है वह कुछ समय के लिए शायद हम भूल गए तो उसको फिर से हमको रिमाइंड करवा देना है। जैसे कि हनुमान जी है। वहां पर सागर के किनारे खड़े हैं। उनको पता नहीं है कि वह सागर लंघन करने की शक्ति उनमें है। किंतु जैसे ही उनको रिमाइंड करवा दिया गया वैसे ही उन्होंने एक छलांग में सागर पार करके सीधे वह लंका में आ पहुंचे। तो वैसे ही हम लोगों में वह आध्यात्मिकता की शक्ति है। हमेशा से रहेगी। बस इस शक्ति को हमको थोड़ा बहुत बीच-बीच में रिमाइंड होते रहना पड़ेगा। किसी ना किसी महापुरुष को अवतरित होकर के हमको रिमाइंड करवाना पड़ेगा। तो वही बात है। अभी इसके बाद में जो नेक्स्ट

उपनिषद के प्रचार से भारत का नवनिर्माण

पॉइंट है स्वामी जी कहते हैं हाउ टू बेटर इंडिया प्रीच उपनिषद। अच्छा फिर से एक बार याद करवा दूं कि यह पॉइंट्स जो है वह मैंने बनाए हैं। वह ओरिजिनल अह लेक्चर का पार्ट नहीं है। तो मैंने सिर्फ यह पॉइंट ही ऐड किए हैं लेक्चर के भीतर में जिससे कि हमको इसको डिस्कस करने में क्योंकि लेक्चर तो बहुत लंबा है। तो इसलिए इसको पॉइंट बाय पॉइंट डिस्कस करने में हमको सुविधा हो। इसलिए मैंने पॉइंट्स बनाए हैं। तो अच्छा यहां पे स्वामी जी क्या कहते हैं? सो एव्री इंप्रूवमेंट इन इंडिया रिक्वायरर्स फर्स्ट ऑफ ऑल एन अपवल इन रिलीजन। भारत में जब कभी भी किसी भी तरह का इंप्रूवमेंट लाना है, किसी भी तरह का सुधार लाना है। आज की लैंग्वेज में कहे तो यदि हमारा जो यह अ सॉफ्टवेयर है उसको अपग्रेड करना है तो फिर हमको सर्वप्रथम धर्म के जगत में एक तुम आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा। धर्म के जगत में क्रांति लानी पड़ेगी। अभी देखिए कि यह अपहिवल शब्द है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पुराने धर्म को हटा के नए धर्म को ले आए। इसका अर्थ यही है। यह क्रांति यदि मैं इसका अपहिवल का ट्रांसलेशन क्रांति के रूप में करता हूं तो इसका अर्थ यही है कि जो पुराने धर्म के जो तत्व थे मूल सनातन तत्व या तो फर्स्ट प्रिंसिपल या तो फाउंडेशनल आइडियाज जैसे कि यह महावाक्य महावाक्य एक फाउंडेशनल आइडिया है। हमारे शास्त्रों का उपनिषदों का फर्स्ट प्रिंसिपल है कि अहम ब्रह्मास्मि। तो यह जो फाउंडेशनल फर्स्ट प्रिंसिपल है उनको लेकर के घरघर पहुंचाना क्योंकि जनरली कोई भी धर्म के यदि अवनति होती है या तो फिर किसी भी धर्म का जो प्रचार है वह कम हो जाता है राज होता है उसका कॉन्ट्रक्शन होता है तो उसके पीछे में कारण यही है कि उसके जो जो ज्वलंत प्रिंसिपल है उसके जो ज्वलंत विचार है जो कि मनुष्य को देवता बना दे सकते हैं। उन विचारों को उन आइडियाज को लोग विस्मृत हो जाते हैं, भूल जाते हैं और उसकी जगह अगड़म बगड़म कौन सा भी एक सब ये अंधश्रद्धाएं हैं, सुपरस्टिशन है, रूढ़ि चुस्त मान्यता है। इस तरह से कुछ उसको धर्म के नाम पर अपना लेते हैं। तो जो वह सब कचरा हमारे सनातन हिंदू धर्म पर लगा था, उसको हटा करके वही गिरी कंदराओं में छुपा हुआ यह जो महावाक्य था, कहां वह साधु सन्यासी लोग इसकी प्रैक्टिस कहां गुफा में बैठकर के कर रहे थे। उसी महावाक्य को फिर से वही आत्मन की यह जो महत उदारता है, आत्मन की यह महत्ता है, उसका पुनः प्रचार गांवगांव घर जाकर के करना है। उसको जैसे कि स्वामी जी ने कहा कि वेदांत को गिरी कंदराओं में से या तो फिर ज वन में से गुफाओं में से बाहर निकाल कर के किसान के खेत में गृहिणी की रसोई में विद्यार्थी की शाला में स्कूल में उसको ले जाना है। तब तो कहीं जाकर के वेदांत प्रैक्टिकल होगा। एक हो गया थ्योरेटिकल वेदांत या तो फिर इस तरह का वेदांत कि जिसका अनुसरण अल्पसंख्यक सन्यासी करते हैं जो कि अभी साधु कौन बनेगा कोई भी समाज चाहे कितना भी एडवांस हो सन्यास या तो फिर आध्यात्मिकता के लिए अपना संपूर्ण जीवन न्योछावर करना वह चाहे अपने हरि महाराज लाटू महाराज जैसे सन्यासी हो ना कि फिर यह नाग नाग महाशय न फिर ये गौर दासी जैसी वो ठाकुर की गुरु गृहस्थ भक्त हो तो इस तरह से संपूर्ण जीवन धर्म को अर्पित करना यह तो अल्पसंख्यक लोग ही कर पाएंगे। ज्यादातर लोगों के लिए जो यह वेद में जो रास्ता बताया गया है वही प्रशस्त है। यदि आपको धार्मिक होना है तो देखिए कि सर्वप्रथम 25 साल जो है आपके जीवन के वो विद्यार्थी तो ब्रह्मचर्य आश्रम यानी कि उस पहले 25 साल में आप विद्या अर्जन कीजिए। गुरु के गह पर रहकर के उसके बाद में गृहस्थ आश्रम 25 साल जो कि समाज की जवाबदारी है। काम और अर्थ का धर्म के माध्यम से उसका निवाह कीजिए। उसके माध्यम से उसका भोग कीजिए। धर्म को आधार बना करके धर्म को फाउंडेशन बना के अर्थ और काम का अनुष्ठान कीजिए। तो वह दूसरे 25 साल है। फिर तीसरे 25 साल है वानप्रस्थ आश्रम और फिर आखिर के 25 साल है। आपकी उम्र यदि 75 साल हो जाती है तब कहीं जाकर के वेद के अनुसार हमारी प्रथा के अनुसार आप सन्यास आश्रम में प्रवेश कर सकते हैं। तो यह एक बताया गया है मार्ग जो कि ज़्यादातर लोगों के लिए यही मार्ग उनके लिए अह करणीय है। उनका जो एलिजिबिलिटी है वो इसी मार्ग का है। या तो अल्पसंख्यक जो होते हैं वे लोगों के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद में सीधा सन्यास आश्रम है। गृहस्थ आश्रम और वानप्रस्थ आश्रम को स्किप करके। तो यह जो ज्यादातर लोग हैं मेजॉरिटी जो है इस समाज में उनके लिए यह जो अल्पसंख्यक सन्यासी है या साधक है उन लोगों ने यह जो ब्रह्म तत्व आविष्कार किया है जिस ब्रह्म तत्व का वे लोग अनुसरण कर रहे हैं। जिस ब्रह्म तत्व को वे लोग अपने जीवन में प्रैक्टिकल एप्लीकेशन करने के लिए जिस ब्रह्म तत्व की लोग साधना कर रहे हैं। उसी ब्रह्म तत्व को गांवगांव शहर-शहर पहुंचाना है। यह स्वामी जी का एक बहुत बड़ा मैसेज है। देखिए कि यहां पर स्वामी

भारत के नवनिर्माण के लिए भाव-साधना आवश्यक है न वेदांत का आत्मतत्त्व?

जी जब यह कहते हैं कि माय प्लान ऑफ कैंपेन यहां पर उन्होंने भाव साधना के बारे में बिल्कुल बात नहीं की। हालांकि देखिए कि जब स्वामी जी यही स्वामी जी जब ठाकुर के साथ में थे तो ठाकुर ने एक बार कहा नरन को वही स्वामी विवेकानंद यानी कि बचपन के नरन तो युवा नरन तो ठाकुर एक बार उनको गाने को कहते हैं तो नरन एक ऐसा ही कोई निराकार ना कि अद्वैत वेदांत वाला कोई एक जो स्तोत्र है उसका पाठ करता है तो साथ-साथ में ही यह प्रसंग कथामृत में है साथ-साथ में ही ठाकुर ने कहा, अरे वह तो सब नीचे का माने वह नीचा भाव है। अर्थात कि यह जो भाव है निराकार ना कि अद्वैत यानी कि यह जो ईश्वर के प्रति ईश्वर नहीं आत्म आत्म तत्व उसकी जो प्रशंसा करना या तो फिर इसके बारे में कोई गीत गाना यह तो कोई इतना उच्च भाव नहीं है। गोपी का जो प्रेम है भगवान कृष्ण के प्रति यह इससे भी उच्च भाव है। उस उच्च भाव का गीत गाओ। तब कहीं जाकर के स्वामी जी ने वह उच्च भाव का गोपी के भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम का गीत गाया तब कहीं ठाकुर खुश हुए। तो देखिए ठाकुर के साथ में रहकर के ही स्वामी जी को यह बात पता चल गई थी कि यह जो आप निराकार साधना या अद्वैत साधना की जो साधना है ऐसा नहीं है। देखिए इस बात को ठाकुर ने जो कहा कि वह नीचा भाव है या तो वह कहेंगे कि इससे जो मधुर भाव है यह इससे ज्यादा उच्च भाव है। इस इस स्टेटमेंट का तात्पर्य हमको समझना होगा। ठाकुर यह नहीं कह रहे हैं कि भाव साधना जो है वो अद्वैत साधना से ज्यादा श्रेष्ठ है। ठाकुर कह रहे हैं कि भाव साधना अद्वैत साधना से ज्यादा सुपाच्य है। वह ज्यादा सहज है फॉलो करने के लिए। वह हमारे लिए इजी है। इसलिए उस भाव का गीत गाओ। यदि अद्वैत साधना या निराकार साधना में आप प्रवेश करेंगे तो उसके लिए जो प्रचंड त्याग और वैराग्य चाहिए अल्पमात्र भी काम कांचन के प्रति हमारी स्प नहीं होनी चाहिए। अल्प मात्र में भी विषय के प्रति हमारा आकर्षण नहीं होना चाहिए। हमारा मन 100% शुद्ध परिशुद्ध होना चाहिए। जैसे कि यह सुखदेव का था। सुखदेव जैसा संपूर्ण पवित्र मन होगा। तभी कहीं जाकर के निराकार या तो फिर अद्वैत साधना के हम एलिजिबल होते हैं। तो उसी भाव के बारे में यदि बार-बार आप गीत गाएंगे, यदि उसी भाव की आप आराधना करेंगे तो क्या है कि जो ज्यादातर लोग जो थे ठाकुर के आसपास में वे लोग उसको फॉलो नहीं कर पाएंगे। इसलिए ठाकुर नरेंद्र को इस तरह से कहते हैं। तो नरेंद्र को ऑलरेडी यह पता था कि मधुर भाव है ठाकुर की दृष्टि से जैसे कि श्रेष्ठ भाव है। ठाकुर का जो भाव था ना वह भी हमको समझना है। वो इति इति वाले फेज में थे। नेति नेति करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर ली। अद्वैत वेदांत का जो सर्वोच्च जो है प्राप्तव्य ब्रह्म ज्ञान उसमें वह स्थित हो गए। किंतु फिर जब इति इति करके वापस आते हैं तब यह जो भाव जैसे कि उनको लेकर के रहता है। जब मां ने कहा था ना मां काली ने मां जगदंबा ने ठाकुर को निर्विकल्प समाधि में आदेश मिला था तो यह भाव मुख्य था तुम भाव भाव को लेकर के रहो। तो यह जो भाव को लेकर के रहना इसी के अनुसार ठाकुर क्या कहते हैं? आमी चीनी खेते चा मा चीनी होते चाइना मैं चीनी यानी कि शुगर मैं शुगर खाना चाहता हूं शुगर होना नहीं चाहता अर्थात यदि आप अद्वैत भाव में चले जाते हैं तो आप ईश्वर के साथ में ही एकीभूत हो जाते हैं या तो फिर कहेंगे कि आपका जो इंडिविजुअल अस्तित्व है वह चला जाएगा वह सबमर्ज हो जाएगा यह ब्रह्म समुद्र में जैसे कि ठाकुर कहते हैं कि यह जो नमक है नमक का आप छोटा सा एक गुड़िया बनाइए फिर उसको समुंदर में डालिए क्या होगा नमक अभी अल्प क्षण क्षण मात्रा में नमक पिघल जाएगा और समुद्र के साथ में एकाकार हो जाएगा अभी उस नमक को आप फिर से जिस गुड़िया को बनाने में नमक के जो दाने जो एटम्स जो मॉलिक्यूल्स इस्तेमाल हुए थे उस मॉलिक्यूल्स को आप समुंदर में से वापस कभी नहीं निकाल पाएंगे। आप समुंदर में से नमक खड़ा कर पाएंगे किंतु वह सेम जो मॉलिक्यूल थे जो कि ओरिजिनल वो गुड़िया में थे वह तो कभी भी वह आपको वापस नहीं मिलेंगे तो आपका जो इंडिविजुअलिटी जो है वो ब्रह्म समुद्र में मर्ज हो जाता है सबज्यूम हो जाता है एकीत हो जाता है उसके बाद में यदि फिर से यह इंडिविजुअल जागृत होता है अपने उसी संस्कार अपनी मेमोरीज के साथ में संस्कार तो चले गए किंतु मेम मेमोरी अभी भी रह गई है। तो इसी मेमोरीज के साथ में यदि आप वापस आते हैं तो किंतु आपके संस्कार जो है वो शुद्ध परिशुद्ध हो जाते हैं। उस क्षण में ठाकुर इति इति वाले फेज में भाव को लेकर के रहते थे। तो स्वामी जी को पता है कि नेति नेति इज अ फर्स्ट स्टेज। जबकि आप निराकार अद्वैत साधना करके आप ईश्वर के साथ में एक एकाकार हो जाते हैं। ब्रह्म साक्षात्कार प्राप्त करते हैं। किंतु इसके बाद में जो इति इति वाला फेज है वि इज इवन सेकंड स्टेप। ऐसा हायर नहीं कहूंगा। यह हायर और लोअर को लेकर के फिर कंट्रोवर्सी जैसे है अपने कुछ-कुछ लोग इस तरह से कहते हैं कि यह जो ठाकुर का यह जो भाव है इट इज हायर देन पहले वाला भाव। तो एनीवे इसको छोड़ देते हैं। मैं कहूंगा कि फर्स्ट फेज एंड सेकंड फेज। फर्स्ट फेज में अद्वैत साधना करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त करना। सेकंड फेज में है कि निर्विकल्प समाधि में से भाव का अवलंबन करके समाज में या तो पृथ्वी पर लोगों के बीच में वापस आना और भाव का प्रचार करना। देखिए कि ठाकुर ने अद्वैत साधना सिर्फ नरेंद्र को सिखाई थी। बाकी सबको ज्ञान मिश्रा भक्ति सिखाई है। भाव साधना करनी है। किंतु वो त्याग के फाउंडेशन पर करनी है। तो यही ज्यादातर ठाकुर ने लोगों को सिखाया था। अभी इतना सब कुछ समझ करके भी यहां पर देखिए कि स्वामी जी ने जो भाव साधना जो कि सहज सुपाच्य है उसके बारे में माय प्लान ऑफ कैंपेन में उन्होंने बात नहीं की। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि उपनिषदों का प्रचार होना चाहिए। उपनिषदों में जो शक्तिदाई अद्वैत साधना है, अद्वैत वेदांत है जो कि हमको सही-सही में मर्द बनाता है उसका प्रचार होना चाहिए। क्योंकि क्या है कि आप यदि वह मधुर भाव की साधना करेंगे उसके पहले इंद्रियों पर 1% संयम होना चाहिए। यदि यह नहीं होगा तो यह भाव साधनाएं महा विकृति का कारण बनेगी। प्रचंड त्याग और वैराग्य सर्वप्रथम साधित करना है आध्यात्मिक क्षेत्र में। उसके बाद में ही यह जो भाव साधना है या और कोई उच्च कक्षा की साधना है उसमें हम प्रवेश कर सकते हैं। इसीलिए स्वामी जी ने यह मर्दानगी सूचक अद्वैत भाव जो कि हमारे उपनिषदों में कहा गया है उसका सबसे वाइड प्रचार उन्होंने किया है। तो इसीलिए यहां पर स्वामी जी लिखते हैं कि हमको चाहिए सर्वप्रथम धर्म के क्षेत्र में क्रांति, आध्यात्मिक क्षेत्र में क्रांति। इस अर्थ में कि उपनिषद के जो महत्व संदेश है, उपनिषद का जो महावाक्य है, उपनिषद का जो सबसे बड़ा सीक्रेट या रहस्य है कि जिस ईश्वर को खोजने के लिए मैं मंदिर मंदिर जो तीर्थ तीर्थ यह सन्या साधु संत वो सबको खोजते हुए घूमता था। वही ईश्वर या तो आत्म तत्व मेरे ही हृदय में है। जस्ट मुझे उसके बारे में जानना है या तो फिर मुझे अपनी इंद्रियों के ऊपर में संयम करके उनकी उपासना करनी है। अपना मन इस दिव्य तत्व पे एकाग्र करना है। जैसे ही मैं यह कर पाऊंगा साथ में ही देखेंगे कि वही दिव्यता जैसे कि मध्याहन के सूर्य की तरह आफ्टरनून सन की तरह उसका जो प्रकाश है वो झलमल करके मेरे पूरे हृदय में फैल जाएगा। तो बस यही तो है धर्म। इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि यदि आपको भारत में किसी भी अभी यह जो हज़ार साल की गुलामी की वजह से साइंस टेक्नोलॉजी मैन्युफैक्चरिंग वगैरह में भारत बहुत ही पीछे पड़ गया था। इवन आज भी देखिए कि हम लोग यूरोप और अमेरिका को तो छोड़ ही दीजिए। यह जो स्वामी जी जापान जाकर के स्वामी जी ने देखा कि यह जो ईस्ट एशियन कंट्रीज है उन लोगों ने जिस तरह से यह वेस्टर्न आइडियाज अपनाए हैं तो हम लोग तो यह ईस्ट एशियन कंट्रीज से भी पीछे हैं। यूरोप और अमेरिका के साथ में कहां कंपटीशन करेंगे? यह जापान है, साउथ कोरिया है, सिंगापुर है, ताइवान है, चाइना है। इनके भी साथ में अभी तक तो हमारा कंपटीशन ठीक-ठीक नहीं हो रहा है। तो इसके लिए जो भारत में जो प्रचंड एक उद्योग प्रारंभ करने की उद्योग पर्व जैसे महाभारत में है, तो वैसे ही, तो भारत में भी वो जो फिर से कहेंगे कि एक तरह का रजस फैलाने की जरूरत है। जिससे कि ये तमस से बाहर आ पाए तो इसके पहले किंतु आध्यात्मिक अपहिवल आध्यात्मिक क्रांति लाने की आवश्यकता है। वही ब्रह्म तत्व को पूरे भारत में उसका फैलावा करना है। बिफोर फ्लडिंग इंडिया विद

पहले आध्यात्मिकता बाद में सामाजिक, राजनैतिक सुधार

सोशलिस्ट और पॉलिटिकल आइडियाज फर्स्ट डल्यूस द लैंड विद स्पिरिचुअल आइडियाज। भारत में सोशलिस्ट या तो फिर राजनैतिक आइडियाज पॉलिटिकल आइडियाज को फैलाने से पहले चलो आओ इस देश को आध्यात्मिक विचारों से जैसे कि प्लावित कर दे आध्यात्मिक विचारों का एक इस तरह का एक महा वेव आकर के महा तरंग आकर के पूरे भारतवर्ष पे छा जाए ऐसा करें तब कहीं जाकर के सेकंड फेज होगा सोशलिस्ट और पॉलिटिकल आइडियाज का इंप्ली इंप्लीमेंटेशन। देखिए ये जो स्टेटमेंट है इसके बारे में मैंने थोड़ा सा सोचा है। इसका अर्थ क्या है? स्वामी जी ऐसा क्यों कहते हैं कि यदि हमको पॉलिटिकल या तो इकोनॉमिकल डेवलपमेंट भारत में लाना है। उससे पहले भारत में स्पिरिचुअल डेवलपमेंट लाने की जरूरत है। यदि हम खास करके यह ईस्ट एशियन कंट्रीज है। यह चाइना खास करके भारत का कंपटीशन किसके साथ में अभी बनता है? तो चाइना के साथ में 1940 तक दोनों देश एक ही साथ में थे। इवन इनफैक्ट चाइना की परिस्थिति भारत से भी बदतर थी। किंतु यह जैसे ही कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन आया। इवन कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन आने के बाद में भी देखिए कि माओ ने इस तरह की जो कुछ-कुछ पगलामी की। यह जैसे कि यह कल्चरल रेवोल्यूशन है ना कि ग्रेटली फॉरवर्ड है यह वगैरह-वगैरह उसमें अपने ही करोड़ोंकरोड़ों देश बांधवों को माओ ने मार दिया था माओ ज़ेदोंग ने बाद में तो यह देंशियाओ पिंग ने यह इंडस्ट्रियलाइजेशन का पॉलिसी अपनाया और आज कहीं जाकर के चाइना मैन्युफैक्चरिंग सुपर पावर है। तो भारत का यदि एक कंपटीशन या कंपैरिजन करें तो चाइना के साथ में हो सकता है। अभी चाइना के बारे में हमने देखा कि उन्होंने स्प ये तो कम्युनिस्ट भले ही चाहे अभी उनका पूरा थिंकिंग सिस्टम कैपिटलिस्ट हो उनका बेसिक आइडियल्स तो कम्युनिस्ट है। तो यह रिलीजन को वो बहुत ज्यादा बढ़ावा नहीं देते। बुद्धिज्म है ना कि यह उनका जो ओरिजिनल टेोज़्म वगैरह जो था उसको यह लोग ज्यादा बढ़ावा नहीं देते। वो क्फ्यूशन कन्फशियस बोलकर के उनका एक फिलॉसोफर था। उसको वो थोड़ा बहुत मानते हैं क्योंकि क्फशियस कहता था कि आपको ऑथॉरिटी को सम्मान देना चाहिए। तो यह लोग कम्युनिस्ट पार्टी सोचती है कि अच्छा चलो इसको फॉलो करो। डज नॉट मैटर लोग ऑथॉरिटी को सम्मान देंगे। तो हमको ही सम्मान देना हुआ। आखिर में किसी वो कहीं वह रोम में बैठा हुआ पोप है ना कि कहीं पे बैठा हुआ कोई खलीफा है। उसको तो यह लोग अपना सम्मान नहीं देंगे। कन्फशियस को फॉलो करेंगे। तो वो सम्मान जो है प्रजा का वो उनका जो यह ओबिडियंस है वो तो वो चाइनीस कम्युनिस्ट पार्टी को प्राप्त होगा। बोल के उसको यह लोग थोड़ा बहुत टोलरेट करते हैं। किंतु देखिए कि उन्होंने पहले से ही सोच लिया कि हमको इंडस्ट्रियलाइजेशन करना है। मैन्युफैक्चरिंग सुपर पावर होना है। तो स्पिरिचुअलिटी चली गई कहां चली गई पता नहीं। मैन्युफैक्चरिंग सुपर पावर हो गए। और आज भारत में बहुत सारे लोग सोचते भी हैं कि यह जो स्वामी जी अभी देखिए कि स्वामी जी के कंट्रीब्यूशन जो है भारत के गढ़तर में बहुत ज्यादा लोग स्वीकार नहीं करते किंतु जिन लोगों ने हिस्ट्री पढ़ा है उनको पता है कि यह जो 1900 में जो अपना जो फ्रीडम मूवमेंट है वो पहली बार जो एक जोर पकड़ रहा था इट वाज़ गैदरिंग व्हेन इट वाज़ गैदरिंग मोमेंटम उस समय फाउंडेशन में स्वामी जी के आइडियाज अपनी फ्रीडम मूवमेंट में बड़ा ही गहराई पूर्वक प्रवेश कर चुके थे। यह जो गांधी जी का भगवान राम के प्रति श्रद्धा और सभी चीजों में भगवान राम को लेके आना यह अपने जो फ्रीडम मूवमेंट के जितने भी प्रथम पंक्ति के जितने भी फ्रीडम फाइटर थे सभी लोग डीपली रिलीजियस थे। कंपेयर टू आप चाइनीस कम्युनिस्ट पार्टी के ये जो देखेंगे उनकी लीडरशिप को वो लोग ज्यादातर ये लोग सेकुलर थे। वो कम्युनिस्ट सेकुलर थे और अपनी जो लीडरशिप थी वो सोशलिस्ट सेकुलर कहती थी तो थी अपने को मुंह से किंतु भीतर में तो यह जो हिंदू धर्म था काफी जागृत था और हमारे जो लीडर थे उस समय के महात्मा गांधी वो तो आउटराइट रिलीजियस थे। अभी उनकी पॉलिसीज के साथ में हम एग्री हो ना हो दैट इज अनदर मैटर किंतु धर्म को उन्होंने अपने जीवन का एक बहुत बड़ा आधार स्तंभ बनाया था। सो भारत में यह जो धार्मिक लीडरशिप और चाइना की यह जो सेकुलर लीडरशिप वो हमने काफी लंबे समय तक हम लोग सोच रहे हैं कि हमने क्या धर्म को बहुत ज्यादा बढ़ावा देकर के हमने अब ये जो मैन्युफैक्चरिंग वाली ट्रेन थी वो हमने मिस कर दी क्या चाइना की ये जो पर कैपिटा जीडीपी आज $15000 के आसपास है और हमारी $3000 भी नहीं है तो हमारे से जो पांच गुना जो उनका जो डेवलपमेंट हुआ वह भी पिछले पिछले 30 साल में 30-40 साल में तो क्या हमने कोई बहुत बड़ा गलती तो नहीं कर दिया धर्मधर्म करके तो यह प्रश्न काफी लोगों के मन में होता है। मेरे मन में भी होता था। अभी भी होता है वैसे किंतु क्या है कि देखिए कि यहां पे हमको एक डीपर आईडिया और एक गहन विचार को समझना है।

नागरिकों के बीच और राष्ट्रों के बीच सहानुभूति हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक है

क्यों सबसे पहले स्पिरिचुअलिटी चाहिए? बिफोर आप मैन्युफैक्चरिंग स्टार्ट करें कि बिफोर के आप एक इंडस्ट्रियल पावर बने। आपको स्पिरिचुअल होने की आवश्यकता क्या है? आवश्यकता है उसके पीछे में दो फैक्टर है। मैं दो फैक्टर कहूंगा। सबसे पहले तो है कि एंपैथी विदिन द नेशन। दूसरा है कि एंपैथी ऑन द इंटरनेशनल लेवल। क्या अर्थ है इसका? देखिए, सर्वप्रथम तो एंपैथी विद इन द नेशनल बाउंड्री। हमारे यह जो देश बांधव हैं उनके प्रति करुणा उनके प्रति सहानुभूति उनकी आंसुओं से उनका दुख देखकर के हमारी आंख में आंसू आना यह सर्वप्रथम आवश्यक है। गांधी जी का वो जो फेमस इंसिडेंट है कि वह उन्होंने देखा एक जलाशय के किनारे बैठे हुए थे। देखा एक स्त्री है उसके पास में एक ही वस्त्र है दूसरा वस्त्र है नहीं तो उसको धोने के लिए वह दिगंबर होकर के निवस्त्र होकर के वह वस्त्र धोती है सूख जाएगा तो उसको पहन करके वापस जाती है तो गांधी जी ने सोचा कि अरे भारतीयों की यह दशा है और मैं इतने सारे कपड़े पहनता हूं तो कैसे चलेगा तो वह पोतड़ी जिसको कहते हैं ना गुजराती में वो छोटा धोती वह पहनना गांधी जी ने शुरू किया था तो यह देश बांधवों के प्रति दया या तो फिर यह करुणा और यह सिर्फ गांधी जी नहीं अपने जितने भी अपने राज्य है जितने भी शहर है इवन सभी शहरों में यह जो फ्रीडम फाइटर्स थे अपने प्रथम पंक्ति के फर्स्ट लाइन के उस सबके भीतर में यह करुणा थी। तो यह करुणा जो भीतर में अपने देश बांधवों में होनी चाहिए। यह एक बहुत बड़ा इंपॉर्टेंट फैक्टर है। देखिए यह करुणा देश बांधवों के प्रति ना होती तो उसका परिणाम क्या आएगा? यह तीन उदाहरण हमारी नजर के सामने है। तीन भयानक राक्षस ये 20थ सेंचुरी ने खड़े किए हैं। एक तो है एडोल्फ हिटलर, दूसरा है कि स्टालिन और तीसरा है माओजेतों। इन तीनों को देखिए। इन तीनों के पेट्रियोटिज्म पे कोई शक नहीं करेगा। अपना देश चाहे जर्मनी या तो सोवियत यूनियन या तो कम्युनिस्ट चाइना वो नंबर वन बने इस देश इस वर्ल्ड में मिलिटरीली इंडस्ट्रियली नंबर वन हो। यह तीनों लोग चाहते थे। किंतु यह जो नंबर वन होने की जो उनकी रेस थी, अपने देश को महान बनाने की जो रेस थी, उसमें उन्होंने अपने ही देश बांधवों पर इतना अत्याचार किया। हिटलर ने कितने ही जर्मन नागरिक को मार दिया। स्टालिन ने करोड़ों-करोड़ों रशियनों की हत्या कर दी। यह माओदोंग ने करोड़ों-करोड़ों चाइनीस को मार दिया। सबसे ज्यादा चाइनीस की हत्या किसने की है? वह ना ही अमेरिका ने की है ना ही जापान ने की है ना ही भारत ने की है। वह तो की है ही माओजेदोंग ने। सबसे ज्यादा रशियन को किसने मारा है? सबसे बड़ा रशियन का मर्डरर कौन है? ना ही वह चंगेज़ खान है। ना ही वह उस समय का अमेरिका था ना ही रशिया के और कोई दुश्मन थे। वो तो उनका जो नेता था जोसेफ स्टालिन उसी ने सबसे ज्यादा रशियनों की हत्या की है। सबसे ज्यादा जर्मनों की हत्या किसने करवाई? सोवियत यूनियन या तो ब्रिटेन या तो अमेरिका वे लोग इंस्ट्रूमेंटल थे किंतु जर्मनी के भीतर में जो भयानक अत्याचार सबसे ज्यादा किया वो तो एडोल्फ हिटलर था। तो देखिए कि ये लोग क्या समझते हैं कि अपने देश को देश बांधवों से या तो देश के नागरिकों से अलग करके देखते हैं। वे लोग सोचते हैं कि देश महान होना चाहिए। देश को महान करने के लिए मैं अपने नागरिकों पे जितना भी अत्याचार करूं वो चलेगा। आज हम भारत में बैठकर के इस बात का हमको बहुत ज्यादा अंदाज नहीं आता क्योंकि हमने क्या है कि हमारा जो लिटरेचर है, हमारा न्यूज़ है वो सब ज्यादातर वेस्टर्न डेमोक्रेसीज के साथ में रिलेटेड है। भारत अमेरिका में क्या हो रहा है बहुत सारे लोग पढ़ते हैं। यूरोप में क्या हो रहा है अप टू एन एक्सटेंट बहुत सारे लोगों को पता है। किंतु यह चाइना के भीतर में उनकी प्रजा के ऊपर में जो अत्याचार अभी भी बिताए जाते हैं। जिस तरह से रशिया की आज की जो अवनति है, आज की जो करंट लीडरशिप के माध्यम से यह सब कुछ हम लोग या तो पढ़ते नहीं है या तो फिर जब पढ़ते हैं तो हम लोग यह मान लेते हैं कि यह वेस्टर्न प्रोपेगेंडा है। तो इसके ऊपर में ज्यादा कुछ ध्यान देने की जरूरत नहीं है। और यह वेस्टर्न प्रोपेगेंडा है। वे लोग आप वेस्टर्न जो न्यूयॉर्क टाइम्स या तो वगैरह सब पढ़ेंगे। उसमें भारत के बारे में पढ़ेंगे तो ऐसा ही लगेगा कि पूरे भारत में आग लगी हुई है। वो कश्मीर से कन्याकुमारी तक ये जितने भी ये जो विघटनवादी संगठन है भारत से अलग होना चाहते हैं। वो सब आए दिन यहां पे बमबार्डिंग करते हैं। ये करते हैं सिविल वॉर चल रहा है। ऐसा ही आपको लगेगा। किंतु क्या है कि भारत के बारे में उनका एकजरेशन है। किंतु यदि रशिया चाइना आज का करंट वहां के जो अत्याचार उनकी करंट लीडरशिप कर रही है वो सही में भयानक है और आज का करंट तो कुछ भी नहीं है जो 19th सेंचुरी के प्रारंभ में जो हुआ था मिडिल में जो हुआ था उसका कोई माने कोई पैरेलल नहीं है पूरे मनुष्य सभ्यता के इतिहास में ह्यूमन सिविलाइजेशन में इतने सारे लोगों की हत्या और किसी ने नहीं की अपने ही देश बांधवों की जितनी कि इन तीन राक्षसों ने की है। तो क्या है कि यह जो भयानक एक कांसेप्ट है कि आप अपने देश को देश के नागरिकों से अलग करके देखते हैं। देश महान होना चाहिए। देश के नागरिकों को आप चाहे कितना ही कुचड़ डालें, कितना ही भयानक उनका हत्याकांड कर ले कोई फर्क नहीं पड़ता। यह बात उस समय बड़ी पॉपुलर थी। और जितने भी कॉलोनियल कंट्रीज ये रशिया है। रशिया कॉलोनियल कंट्री नहीं था। किंतु उनका इकोनॉमिक डेवलपमेंट वेस्टर्न यूरोप जितना नहीं था। चाइना है, ये ये जो कंबोडिया है, अफ्रीका के जो कंट्रीज है, साउथ ईस्ट एशिया के जो कंट्रीज थे, इसमें वियतनाम आ जाएगा वगैरह-वगैरह। तो वहां पे सब जगह पे देश को महान करने के चक्कर में देश के ही नागरिकों के ऊपर में भयानक अत्याचार गुजारा गया। तो भारत में यह चीज नहीं हुई है। इंस्पाइट ऑफ बीइंग ए कॉलोनियल कंट्री इंस्पाइट ऑफ कमिंग आउट ऑफ मिडिल एजेस डायरेक्टली इनू मॉडर्न एजेस। यूरोप में तो क्या धीरे-धीरे करके मिडिल एजेस से मॉडर्न एज में इवोल्यूशन हुआ है। भारत ने सीधा मिडिल एजेस में से मॉडर्न एजेस में जंप लगाया है। तो यह डिसएडवांटेज होने के बाद में भी भारत के जो शासक हैं उन लोगों ने भारतीयों पे अत्याचार नहीं किया है। क्योंकि यह भारतीयों के प्रति अपना जो शासक वर्ग है उनका बड़ा ही गहरा एमैथी है। आप कहेंगे कि ये लोग करप्शन करते हैं। देश के जो डेवलपमेंट के लिए कुछ नहीं करते तो वो मान लेता हूं। किंतु एटलीस्ट जिस तरह का अत्याचार माओ और स्टालिन ने किया था उस तरह का तो हमारे शासक हमारे पे कभी नहीं करेंगे। क्योंकि भारत में डेमोक्रेसी है। भले ही चाहे कितनी भी इंपपरफेक्ट हो इट इज अ वर्किंग डेमोक्रेसी वि इज समथिंग वी ऑल शुड बी प्राउड ऑफ। तो यह एक बात है कि एमैथी विद इन द नेशन हमारी हमारे देश बांधवों के प्रति सहानुभूति और करुणा होनी चाहिए। और यह एंपैथी कहां से आएगी? यह स्पिरिचुअलिटी ही एक ऐसा माध्यम है जो कि हमारे हृदय के भीतर में कंपैजन करुणा का उदय कराता है। यदि हम लोग स्पिरिचुअल नहीं होंगे तो हम लोग क्रूर राक्षस की तरह हो जाएंगे तो बेटर है कि बी स्पिरिचुअल एंड बी कंपैजनेट टुवर्ड्स आवर नेशनल ऑल ब्रदर्स एंड सिस्टर्स। तो यह एक बात है। दूसरा है कि कंपैजन या तो फिर एमथी ऑन इंटरनेशनल लेवल कि यह जो इंटरनेशनल लेवल पे जैसे कि ये हिटलर का था कि मैं दूसरे देशों पे आक्रमण करके उनकी जमीन हथिया लूंगा। उनके नागरिकों का होलसेल मर्डर कर दूंगा और उनकी जितनी भी यह जो वेल्थ है वो मैं अपना लूंगा। तो यह जो राक्षसीपन था हिटलर के भीतर में था, नेपोलियन के भीतर में था, ब्रिटेन में था। ब्रिटेन ने यहां भारत में आकर के जो अत्याचार किया यह चर्चिल चर्चिल आज लोग सब करते हैं। उन लोगों को पता नहीं है कि यह चर्चिल ने सेकंड वर्ल्ड वॉर में भारत का जितना भी ग्रेन प्रोडक्शन था वो सब ब्रिटेन में ले गया और उसकी वजह से भारत में जो अकाल हुआ कितने लाखों लाखों लोग उसमें मर गए। तो यह ब्रिटेन जो कॉलोनियल पावर्स है ब्रिटेन है, फ्रांस है या तो फिर यह जर्मनी है या तो फिर यह इवन सोवियत यूनियन है। उन्होंने दूसरे देशों पे आक्रमण करके जापान उस समय का देखिए कि जापान ने यह जो बहुत बड़ा गलती कर दिया कि जो स्पिरिचुअलिटी को बिना जागृत किए उन्होंने वेस्टर्न आइडियाज को होलसेल अपना लिया। एंपैथी डेवलप नहीं की। बस एक ग्रीड एक लोभ एक भयानक लोलुपता ये जो विषयों के प्रति ये जो भयानक लोलुपता उन लोगों के भीतर में डेवलप हुई जापान ने जब चाइना के ऊपर में आक्रमण किया और जो चाइनीस लोगों का भयानक संहार किया उसके बारे में और जितना पढ़ेंगे उतना ही अपना खून ठंडा हो जाएगा। जहां-जहां पर यह जापानीज सोल्जर गए हैं, वहां वहां पर भयानक भयानक अत्याचार उन्होंने बिताया है। यह अच्छा है कि वे लोग भारत में नहीं घुस आए। वो वरना भारतीयों के साथ में जो करते हैं अपनी पूरी पॉलिसी वहां पे पता नहीं किस तरह की थी। व्हाटएवर दैट इज अनदर मैटर। किंतु ये जापानीज, ये ब्रिटेन, ब्रिटिश, ये फ्रेंच, ये जर्मन, ये सोवियत सब लोग महक्षस थे। जब उन्होंने दूसरे देशों पर आक्रमण किया तो इसके लिए दूसरे देशों पर आक्रमण करके आप अत्याचार बिताए अपने देश को एनरच करने के लिए। यह भी तो गलत है। सभी के भीतर में आत्मन है। आप ऐसा कैसे सोचेंगे कि वहां पे वहां के लोगों का मर्डर करके उनकी जमीन में हथिया लूंगा और मेरे देश वहां पर जाकर के राज करेगा। यह तो कंप्लीटली गलत है। आध्यात्मिकता की दृष्टि से। आप मनुष्य को इस तरह से डिवाइड क्यों करते हैं? यह चाइनीज़ है। यह कोरियन है। यह जर्मन है। यह फ्रेंच है। यह अफ्रीकन है। यह इंडियन है। इंडियन में भी यह बेंगली है। यह तमिलियन है। ऐसा डिवीजन आप क्यों करते हैं? मनुष्य मनुष्य है। मनुष्य के भीतर में भी वही आत्मन है। जैसे ही हमने यह डिवीजन करना शुरू किया। भारत ने तो भुगता है। ये ये जात, इसकी यह जात, उसका यह वर्ण, यह वर्ण ऐसा करके करके ही तो हमारा हजार साल का पतन हुआ। जैसे ही आप लोगों को डिवाइड करना शुरू करेंगे वैसे ही आपका पतन प्रारंभ होगा। और दूसरा कि मान लीजिए कि यह 19th सेंचुरी में 20थ सेंचुरी में इस तरह से युद्ध युद्ध का खेल आप कर सकते थे। छोटे बच्चे वो जो लकड़ी की तलवार लेकर के ये करते हैं ना आपस में ये ममारी करते हैं, फाइट करते हैं। वो ठीक है। वो मां-बाप ज्यादा किसी को लग गया और रोते-रोते अपनी मां के पास में जाएगा तो मां दोनों बच्चे को एकद झापट मार के ठिकाने लगा देगी। तो वो 19 सेंचुरी में ऐसा युद्ध युद्ध का खेल ममारी चलता था। अभी तो सबके पास में न्यूक्लियर वेपंस आ गए हैं। इवन कि ये टेररिस्ट लोग भी कहां से यह न्यूक्लियर वेपन जुगाड़ कर देंगे और जैसे कल हमने देखा कि कैसे वो रशिया में ड्रोन स्मगल करके रशिया में आक्रमण कर दिया इन्होंने। अभी इस तरह से कोई न्यूक्लियर बम स्मगल कर देगा और ऐसा न्यूक्लियर एक्सप्लोजन करेगा और फिर सामने-सामने न्यूक्लियर बम फेंकना शुरू हो जाएंगे। पूरी पृथ्वी ध्वस हो जाएगी। मनुष्य सभ्यता नेस्तनाभूत हो जाएगी। यानी कि यह जो छोटे बच्चे युद्ध युद्ध जो यह जो खेलते हैं वह सब खेलना अभी नहीं उचित है। क्योंकि फिर एक बार न्यूक्लियर बम किसी पागल ने फेंकना शुरू किया फिर उसका कहीं पे अंत नहीं है। तो यह एमैथी टुवर्ड्स विदिन आवर नेशन एंड एंपैथी ऑन इंटरनेशनल स्केल। खास करके आज के इंडस्ट्रियलाइजेशन न्यूक्लियर वेपंस के युग में यह बड़ी ही आवश्यक है और इसके लिए एंपैथी कहां से आएगी तो वो स्पिरिचुअलिटी में से आएगी। बाकी जितने भी देश हैं वह इररिस्पांसिबल कंट्रीज हैं। आज अमेरिका को आप देखिए एक समय था कि कहा जाता था अमेरिका एक बड़ा ही रिस्पांसिबल कंट्रीज है। उनके पास में 10,000 एटम बम भी क्यों ना हो वो आराम से 10,000 एटम बम की वो रक्षा कर सकता है। जब तक कोई महाविपद नहीं आएगी मनुष्य सभ्यता के सामने तब तक वो एटम बम यूज़ नहीं करेगा। और यदि हॉलीवुड के मूवीज देखेंगे तो वे लोग एटम बम कहां फेंकते हैं? तो वो जो आकाश में से एक स्टेरॉइड पृथ्वी की ओर धस करके आ रहा है दौड़ा हुआ यदि पृथ्वी से टकराएगा तो पूरी पृथ्वी का टुकड़े हो जाएंगे हजार टुकड़ों में बट जाएगी पृथ्वी तो इस तरह की एस्टेरॉयड के टुकड़े करने के लिए वो सामने एटम बम फेंकते हैं। तो यह हॉलीवुड हमको सिखाता था अभी तक कि यह जो अमेरिका है वह बड़ा ही वो रिस्पांसिबल न्यूक्लियर पावर है। हमारे पास में भले ही चाहे 10,000 न्यूक्लियर वेपंस हो और किसी को नहीं रखने हैं। ऐसा करके पूरे जगत को वो सिखाता था। आज देखिए कि अमेरिका की क्या हालत है। वो पगला कभी भी कुछ भी कर सकता है। और यह तो फिर भी ठीक है। यह तो प्रारंभ हुआ है पागलपन का। इसके बाद कौन सा बड़ा पागल आएगा कुछ ठीक नहीं है। इसके लिए यह जो न्यूक्लियर बम आपके पास में है और फिर बोलेंगे मैं स्पिरिचुअल नहीं हूं। मेरे में एमैथी नहीं है। जो भी मेरे दुश्मन है सबका मैं सफाया कर दूंगा। तो क्या होगा? फिर आप सोच लीजिए। आपका दुश्मन तो फिर चुपचाप हाथ पे हाथ रख के नहीं बैठने वाला है। चाइना के साथ में झगड़ लिया, रशिया के साथ में झगड़ लिया तो ये लोग तो आंख बंद करके आप जो भी करेंगे वो सहन नहीं करने वाले हैं। वे लोग भी जब सामने अटैक करेंगे तो फिर दुनिया का एक भी देश बचेगा नहीं इस फाइट में से। यह ग्लोबल वॉर में से ग्लोबल न्यूक्लिय न्यूक्लियर होलोकास्ट में से। इसलिए आज के युग में इंडिया एक ऐसा देश है जो कि सबसे ज्यादा रिस्पांसिबल हम लोग हैं। क्यों हम लोग रिस्पांसिबल है? या तो क्यों हम लोग रिस्पांसिबल हो सकते हैं? क्योंकि भारत में आध्यात्मिकता स्वामी जी ने जैसे कहा हम लोग बिफोर कि हम लोग मैन्युफैक्चरिंग सुपर पावर बने। बिफोर कि हम लोग टेक्नोलॉजिकल साइंटिफिक सुपर पावर बने। बिफोर कि हम लोग मिलिटरी सुपर पावर बने। हम लोगों को स्पिरिचुअल सुपर पावर होना है। पूरे विश्व में योग और वेदांत का प्रचार करना है। जैसे कि मनुष्य के हृदय में दूसरे मनुष्य के प्रति सहानुभूति, करुणा, प्रेम इसका उदय हो। तभी तो जाकर के हम टेक्नोलॉजी का एक रिस्पांसिबल यूज़ कर सकते हैं। मैंने बहुत सालों पहले एक साइंस फिक्शन पढ़ा था। उसमें ऐसा था कि ये पूरा जो विश्व ब्रह्मांड है उसमें बहुत सारी सभ्यताओं का जन्म हुआ है। जैसे कि ये जो पृथ्वी है तो पृथ्वी पे कैसे ह्यूमैनिटी ये जो ह्यूमन सिविलाइजेशन डेवलप हुई है तो वैसे ही बहुत सारे ग्रहों पे इस तरह से सिविलाइजेशन डेवलप हुई किंतु हुआ ऐसा कि ये जो सिविलाइजेशन है ना उसका एक एक्सपायरी डेट होता है। यानी कि अभी देखिए कि युद्ध करना मनुष्य के खून में है। तो, अभी वह जो हम यह ट्राइबल एग्ज़िस्टेंस था हमारा आदिमानव थे हम लोग। उस समय क्या करते थे? तो यह लकड़ियों से पत्थर से युद्ध करते थे आपस में। ठीक है? आप लकड़ी मार लकड़ी से पत्थर से अब दूसरों को मारेंगे। कितना मार कितने लोगों को मारेंगे? 50-100 लोगों को मारेंगे। ठीक है? इसके बाद में जैसे ही टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट हुआ। साथ में ही यह वॉरफेयर डेवलपमेंट होता है। एक्चुअली वॉरफेयर डेवलपमेंट ही टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट का आधार है। जब भी आपको युद्ध की सामग्री डेवलप करते हैं उसी के लिए बेसिकली ये टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट पीछे का इंपेटस क्या है? कौन रिसर्च के लिए पैसा देगा? यह जो अमेरिका की जितनी भी फंडामेंटल टेक्नोलॉजीस हैं इंटरनेट है ना कि ये न्यूक्लियर फिजिक्स है ना कि स्पेस साइंस है जो भी है वो सबके पीछे में अमेरिकन मिलिट्री का इन्वेस्टमेंट है क्योंकि मिलिट्री को बेटर बेटर वेपन चाहिए कम्युनिकेशन सिस्टम चाहिए वो सेफ्टी एंड सिक्योरिटी सिस्टम चाहिए इसलिए वे लोग इन्वेस्टमेंट करते हैं भयानक इन्वेस्टमेंट करते हैं और यही इन्वेस्टमेंट आखिर में टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट होता है इसमें से यानी कि टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट इज आइडेंटिकल वि डेवलपमेंट इन वॉरफेयर। युद्ध करने में जो डेवलपमेंट है, टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट है, दोनों एक दूसरे के साथ में अभिन्न है। तो यहां पे आप देखिए कि पहले तो हमारा जो टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट था पत्थर और लकड़ी के लेवल पर था। उसके बाद में यह स्वॉर्ड है, तीर है। यह हमने डेवलप कर लिए। वो स्वॉर्ड और तीर से आप कितने लोगों को मारेंगे? 1000,000 2000 को मारेंगे। इसके बाद में देखिए कि यह गन पाउडर का डेवलपमेंट हुआ। यह तोप है, बंदूक है। उसका डेवलपमेंट हुआ। इससे आप कितने लोगों को मारेंगे? 10-15,000 को मारेंगे ज्यादा से ज्यादा। उसके बाद में देखिए मिसाइल है, रॉकेट है, फाइटर प्लेन है, टैंक है। इसका सबका डेवलपमेंट हुआ। ठीक है? अब टैंक से और फाइटर प्लेन से कितने लोग? 10-15 लाख को मार देंगे ज्यादा से ज्यादा। ठीक है? चलो यह भी सही। किंतु फिर जब आखिर में न्यूक्लियर बम डेवलप हुआ है तो यह न्यूक्लियर बम है कि जब से जो सिविलाइजेशन न्यूक्लियर बम डेवलप करती है वहां से उनका एक्सपायरी डेट जो है वो स्टार्ट हो जाता है। एक ना एक दिन आएगा कि ये जितने भी ये साइंस फिक्शन की बात कर रहा हूं। जितने भी प्लेनेट है आज मान लीजिए कि एक प्लेनेट है अपनी जो गैलेक्सी है उसके दूसरे कोने में उन्होंने न्यूक्लियर बम डेवलप कर लिया। यानी कि अभी उनका जो काउंटडाउन है स्टार्ट हो गया। एक ना एक दिन तो आएगा वो युद्ध युद्ध का खेल जो उनको खेलना है तो आप एक दूसरे के ऊपर में न्यूक्लियर बम डाला सिविलाइजेशन हो गई खत्म चलो वहां पे उनकी एक्सपायरी डेट आ गई इसके बाद में दूसरी प्लेनेट पे गए वहां पे भी उन्होंने न्यूक्लियर बम डेवलप कर दिया यानी कि उनका काउंटडाउन शुरू हो गया एक समय आएगा युद्ध करेंगे युद्ध तो ब्लड में है एक दिन हुआ युद्ध किया एक दूसरे के ऊपर में न्यूक्लियर बम फेंके वो सिविलाइजेशन खत्म हो गई यानी कि यह जो स्टोरी का था कि जितनी भी सिविलाइजेशन है उन सबकी एक एक्सपायरी डेट है। जो न्यूक्लियर बम जब से डेवलप होता है तब से उनका एक्सपायरी डेट काउंटडाउन स्टार्ट हो जाता है। रेयरली कोई सिविलाइजेशन है कि जो कि ये न्यूक्लियर बम वाला जो थ्रेशहोल्ड है वो न्यूक्लियर बम मिलने के बाद में डेवलप करने के बाद में उन्होंने इससे भी आगे डेवलपमेंट किया है। अभी तक ऐसा कोई सिविलाइजेशन नहीं है। जितनी भी सिविलाइजेशन है वो न्यूक्लियर बम डेवलप करेगी। एटम बम फेंकेगी एक दूसरे के ऊपर में ध्वस हो जाएगी और फिर से यह सिविलाइजेशन का चक्र चालू होगा। वो जो आइंस्टाइन की फेमस बात है किसी ने पूछा ये सेकंड वर्ल्ड वॉर में तो अमेरिका ने जापान पे एटम बम फेंका था। दो पूरे सिटीज खत्म कर दिए। तो इतना बड़ा वेपन डेवलपमेंट हो गया। एक जर्नलिस्ट ना कोई जाकर के आइंस्टाइन को पूछता है कि अच्छा बताइए आप तो इतने बड़े साइंटिस्ट हैं। यह एटम बम का जो बेसिक कांसेप्ट वगैरह है तो आप ही लोगों ने डेवलप किया है। बताइए कि यह जो सेकंड वर्ल्ड वॉर हुई उसमें यदि एटम बम डेवलप किए तो थर्ड वर्ल्ड वॉर होगी तो उसमें कौन से भयानक आप वेपन डेवलप करेंगे? तो आइंस्टाइन का वो फेमस उत्तर है कि मुझे यह नहीं पता कि थर्ड वर्ल्ड वॉर में कौन से भयानक वेपंस डेवलप होंगे। किंतु मैं पक्का बता सकता हूं कि जो फोर्थ वर्ल्ड वॉर होगी वो फिर से हम लकड़ी और पत्थर से लड़ेंगे। क्यों? क्योंकि ये पूरा सिविलाइजेशन रिसेट हो गया। आपके थर्ड वर्ल्ड वॉर में यदि आप न्यूक्लियर बम फेंकेंगे तो फिर से वही आदि मानव के वो आप कक्षा में चले जाएंगे। फिर से वो पत्थर और लकड़ी से लड़ने की बारी आ जाएगी। यानी कि यह जो थ्रेशहोल्ड है, यह थ्रेशहोल्ड को क्रॉस करके एक हायर लेवल ऑफ सिविलाइजेशन पर जाना दैट इज पॉसिबल ओनली कि जब आप स्पिरिचुअल हैं। जबकि मनुष्य के प्रति हमारी सहानुभूति है। इस दृष्टि से देखें तो आज सबसे ज्यादा रिस्पांसिबिलिटी जो है इस विश्व में वो भारत के सर पर है। मैंने कुछ-कुछ जियोपॉलिटिकल ये जो आर्टिकल आते हैं ना उसमें मैंने कहीं-कहीं पे पढ़ा था कि आज भारत न्यूट्रल है। म कोल्ड वॉर के दौरान भारत न्यूट्रल था। ये इसका फायदा कितना बड़ा हुआ है। यदि भारत कैपिटलिस्ट हो जाता ना तो कैपिटलिस्ट कंट्रीज इतने पावरफुल हो जाते कि वे लोग सोचते कि हम लोग कम्युनिस्ट कंट्री पे अटैक करके उनको जीत सकते हैं। क्योंकि ये यूरोपियन अमेरिकन तो भले ही चाहे ह्यूमन राइट्स की बातें करें। आखिर में तो वो वही कॉलोनियलिस्ट वही एंपायर बिल्डर है जिन्होंने कि ऐशिया अफ्रीका का शोषण किया तो भारत यदि कैपिटलिस्ट बन जाता तो ये ब्लॉक इतना पावरफुल हो जाता कि वे लोग कम्युनिस्ट पे आक्रमण करते और यदि भारत कम्युनिस्ट हो जाता तो ये जो रशिया चाइना और भारत इन तीनों का जो बैठ जाता मेल तो ये लोग तीनों लोग मिलकर के सोचते कि यूरोप अमेरिका को खत्म कर दो तो इन लोगों के ऊपर मैं आक्रमण करता। अच्छा है कि भारत न्यूट्रल था बोलकर के विश्व में बैलेंस था। इतना महत्ता आज भारत का है। भले ही चाहे हम इसको देख नहीं पाते नजर से या तो फिर अनुभव नहीं कर पाते किंतु यह भारत काेंस है कि वी आर वेरी रिस्पांसिबल वर्ल्ड पावर। हमारे जो स्पिरिचुअल आध्यात्मिक तत्व है वह ना ही हमारे शासकों को अपने नागरिकों पर बियों्ड वन लिमिट अत्याचार करने देगा ना ही हमारे शासकों को दूसरे देशों पर आक्रमण करने देगा। करते हैं हम आक्रमण तभी जबकि हमारे पे आक्रमण होता है और अपने को हम डिफेंड करते हैं। नॉट बियों्ड दैट। तो यह जो बात है और भविष्य में भारत को यदि वर्ल्ड लीडरशिप लेनी है अमेरिका ने जैसे कि यह जो 20th सेंचुरी में बना करके रखा कि न्यूक्लियर वेपंस का ज्यादा स्प्रेड ना हो जिससे कि वर्ल्ड में एक बैलेंस बना रहे वो लीडरशिप रोल भविष्य में भारत को लेना होगा क्योंकि आज अमेरिका इज नो लगर रिस्पांसिबल सुपर पावर। तो हमको यह रिस्पांसिबल सुपर पावर बनना होगा। हमारे पास में वह मोरल ऑथॉरिटी चाहिए। तो वो मोरल ऑथॉरिटी कहां से आएगी? यह जो भगवान बुद्ध है, भगवान कृष्ण है, ये इनकी जो जन्मभूमि है, वही तो यह मोरल लीडरशिप जगत को दे पाएगी और किसी के पास में यह कैपेसिटी नहीं है। इसलिए यहां पे स्वामी जी कहते हैं कि बिफोर फ्लडिंग इंडिया विद सोशलिस्टिक और पॉलिटिकल आइडियाज फर्स्ट डल्यूस द लैंड विद स्पिरिचुअल आइडियाज। भारत में ये इंडस्ट्रियलाइजेशन, मैन्युफैक्चरिंग, साइंस एंड टेक्नोलॉजी इन सब में सुपर पावर होने से पहले सर्वप्रथम आओ हम लोग स्पिरिचुअल सुपर पावर बने। देन बेस्ड ऑन द स्पिरिचुअल ऑथॉरिटी स्पिरिचुअल मोरल ऑथॉरिटी कैन वी बिकम ए रिस्पांसिबल वर्ल्ड पावर। इसके बाद का जो है अभी इसको हम नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अत्यधिक बुद्धिमान लोग अपनी प्रतिभा का उपयोग लोगों को मारने के लिए हथियार बनाने में करते हैं। ऐसा लगता है कि केवल कमजोर लोग ही अच्छे या दयालु होते हैं।

लेट मी रिफ्रेश माय आईडिया। आपने एक बड़ा अच्छा पॉइंट किया कि घृणा या भय या तो फिर यह मिलिट्री यूसेज यह टेक्नोलॉजी ड्राइव करता है। यह मैंने कहा लेट मी रिफाइन दिस आईडिया। मिलिट्री जो नीड होती है वो टेक्नोलॉजी को अप्लाई करती है। टेक्नोलॉजी डेवलप कौन करते हैं? वो है साइंटिस्ट। और जो अच्छे से अच्छे जितने भी साइंटिस्ट हैं देखिए कि यह जो क्रिएटिविटी है वह कहां से आती है। दैट कम्स फ्रॉम इनर स्पिरिचुअलिटी। जितने भी ग्रेट साइंटिस्ट है जिन्होंने इस पृथ्वी पर जिनका एक सबसे बड़ा अवदान है टेक एनी ऑफ दैट साइंटिस्ट ऐसा कोई आपको नहीं मिलेगा जो कि पागल ये जो हम न्यूज़पेपर में जो नवेल्स में पढ़ते हैं ना कि देयर इज अ मेड साइंटिस्ट कि जिसने एक ऐसा कुछ खोज निकाला कि जिससे कि बहुत सारे लोगों को ये नुकसान होगा। ये मेड साइंटिस्ट होते हैं। किंतु ये मेड साइंटिस्ट क्या करते हैं? ऑलरेडी जो डेवलपमेंट हुआ है उसका इविल यूज़ करते हैं। तो डेवलपमेंट इटसेल्फ इज़ ऑलवेज डन बाय पीपल हु आर हाइली एंपैथिक, हाइली क्रिएटिव, हाइली स्पिरिचुअल। यह आइंस्टाइन है। फिर यह जो रुथरफोर्ड है, मैक्स प्लांक है, आइज़क न्यूटन है, जेम्स क्लार्क मैक्सवेल है, हइज़नबर्ग है, यू नेम इट। माने जितने भी ग्रेटेस्ट साइंटिस्ट जितने भी नोबेल प्राइज विनर देखेंगे कि सभी की लाइफ में एक ना एक अनस्पिरिचुअलिटी का रहता है। आइंस्टाइन मोस्ट फेमसली वो माने आउटराइट रिलीजन में विश्वास नहीं करता था। ही वाज़ अ जीव किंतु ही वाज़ हाइली स्पिरिचुअल। उसका जो स्पिरिचुअल उसका जो है सब बातें उसका कलेक्शन आप थोड़ा सा भी Google सर्च करेंगे इमीडिएटली आपको दिख जाएगा कि हाउ डीपली स्पिरिचुअल इज़। आज जिसको कि जगत के दो ग्रेटेस्ट साइंटिस्ट माने जाते हैं। आइजेक न्यूटन और अल्बर्ट आइंस्टाइन। दोनों को देखिए। आइज़क न्यूटन वाज़ एक्चुअली लिविंग इन अ सेमिनरी रिलीजियस सेमिनरी और ही वाज़ अनमैरिड थ्रूउ हिज लाइफ। और आइंस्टाइन के स्पिरिचुअल जो आइडियाज है दे आर वेरी फेमस। सो ओरिजिनल क्रिएटिविटी बिलोंग्स टू अ पर्सन हु इज़ स्पिरिचुअल। जैसे स्वामी जी ने कहा कि ये जो कंप्लीटली न्यू आइडियाज कहां से आएंगे? मेरा यह जो फोर कॉर्नर है मेरे माइंड का मेरे संस्कार, मेरा नॉलेज, मेरी मेमोरी, मेरी इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी इसको मैं जितना भी चाहे इधर-उधर कर लूं। एकदम हाईली ओरिजिनल आइडियाज उसमें से नहीं आएंगे। मैं उसको इधर-उधर करके खिचड़ी बना करके एप्लीकेशन कर सकता हूं। थोड़ा बहुत इनोवेशन कर सकता हूं। किंतु ग्राउंड ब्रेकिंग न्यू आइडियाज है। दे विल ऑलवेज कम फ्रॉम सुपरकॉन्शियस लेवल। तो यह सुपरकॉन्शियस लेवल पर जाने की क्षमता इट गिव्स अस ओनली स्पिरिचुअलिटी। भले ही चाहे आप उसको स्पिरिचुअलिटी का नाम ना दें बट दैट स्पिरिचुअलिटी हैज़ टू बी देयर। सो दिस इज़ वन डिस्टिंशन आई विल मेक कि ओरिजिनल डेवलपमेंट हैज़ ऑलवेज बी डन बाय स्पिरिचुअल पीपल। उसका जो मिसयूज़ है वो बाकी लोगों ने किया है।

प्रश्न: आमतौर पर नागरिक एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति रखते हैं, लेकिन राष्ट्रों के बीच बहुत अधिक शत्रुता है।

किंतु इसके लिए तो हमको मैच्योर होना होगा ना। देखिए कि बड़ा इजी है लोगों को हेट करना। बड़ा इजी है कि छोटी-छोटी बातों पे नाराज होकर के हथियार उठा लेना। किंतु इस न्यूक्लियर एज में वो ऑप्शन अपने पास में नहीं है। दैट मैंने कहा ना वो साइंस फिक्शन की बात कि ये जैसे ही एटम बम का इन्वेशन होता है वो अपना काउंटडाउन स्टार्ट हो जाता है। अभी तक जिस इंस्टिंक्ट को हमने इंडल्ज किया। देखिए मेरे मुझे चॉकलेट बड़ी पसंद है। मेरी नजर के सामने आ जाएगी। मैं मैंने एक ये किया है कि मैं स्वीट नहीं खाता हूं। रेयरली मैं कभी स्वीट खाऊंगा। रेयरली अदरवाइज मैं पिछले 5 साल से स्वीट खाना बिल्कुल बंद कर दिया। अभी किंतु मेरे सामने चॉकलेट आ जाएगी तो वो टेंप्टेशन होगा ना उसको रोकना बड़ा मुश्किल है। फिर मैं सोचूंगा अच्छा चलो यार एक चॉकलेट खा लेते हैं। बाकी और कुछ नहीं खाएंगे। इसको खा लेते हैं। ये क्या है? मेरी इंस्टिंक्ट है ना उसको मैंने इंडल्ज किया। तो आज तक अभी तक ऐसा हुआ है कि अपना वो जो ट्राइबल एग्जिस्टेंस था तब से लेकर के अप टू 20th सेंचुरी हमने अपनी ये जो इंस्टिंक्ट है जो ये बगल वाला देश या बगल वाला ट्राइब या बगल वाला शहर व्हिच एवर जिसको कि हम अधर मानते हैं जिसको कि ये दूसरे धर्म के हैं दूसरी जात के हैं ये जो अधर जिसको मानते हैं वो थोड़ी छोटी-छोटी बातों पे उसके ऊपर नाराज होकर हथियार उठा लिए वगैरह वी टिल नाउ वी इंडल्ज इन दैट इंस्टिंक्ट आफ्टर द इन्वेंशन ऑफ न्यूक्लियर डिवाइस दिस इंडलजेंस इज़ एक्सट्रीमली डेंजरस। वो सिर्फ हमारे लिए ही नहीं। दैट इज़ व्हाई इंडिया हैज़ टू बिकम वेरी रिस्पांसिबल सुपर पावर। आज मान लीजिए हम लोग कहते हैं कि रशिया यूक्रेन के बीच में जो होता है उससे हमारा कुछ लेना देना नहीं है। अभी जस्ट कुछ समय पहले चेनोबिल के बारे में शायद आपने सुना ही होगा। और रशिया का वो जो न्यूक्लियर पावर प्लांट था वहां पर डिजास्टर हुआ और कैसे वो चारों रेडियो एक्टिविटी फैल गई तो उसका एक है ना डॉक्यूमेंट्री सीरीज बना है उसके ऊपर में तो अभी पिछले कुछ दिनों में मैं देख रहा था चार पांच उसके एपिसोड है तो देख अभी देखिए पढ़ते हैं हम उसके बारे में और जब नजरों से इस तरह का ड्रामेटाइजेशन जो देखते हैं ना हमारा हृदय दहल जाता है कि कितना भयानक वो डिजास्टर था कैसे चारों आसपास के लोगों के भीतर में रेडिएशन बर्न जिसको कहते हैं ना रेडिएशन बर्न क्या है? अपना खून का जो ये जो यह है ना वेंस अपनी वो खुल जाएगी। यानी कि पूरे शरीर में खून फैल जाएगा। वो कहते हैं कि इस तरह का मौत ना सबसे ज्यादा पेनफुल डेथ है। आपका मॉर्फिन है, पेन किलर है आपके बॉडी में काम ही नहीं करेगा। क्योंकि खून जो ले जाने वाली जो यह शिराएं होती है, वेंस जो होती है वही फट जाती है। तो कहां से कहां वो मेडिसिन जाएगा। तो नजर के सामने इसको देखते हैं तब पता चलता है कि इस तरह की यह जो चालू हो जाए एक एक एक बार यदि एटम बम एक दूसरे के ओर फेंकना तो कोई नहीं बचेगा। आज हम बोलते हैं रशिया यूक्रेन में क्या हो रहा है हमको कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां मिडिल ईस्ट में क्या हो रहा है हमको फर्क नहीं पड़ता। चाइना ताइवान में क्या हो फर्क नहीं पड़ता। किंतु एक बार न्यूक्लियर वेपन आ जाएंगे प्ले में। फिर पूरा जगत वो न्यूक्लियर रेडिएशन से भर जाएगा। उसके बाद में कैंसर का प्रमाण थाउजेंड टाइम्स बढ़ जाएगा। न्यूक्लियर बर्न जो है जिसको लगेगा रेडिएशन बर्न वो भयानक मौत मरेगा। तो आज वो माने देयर इज अ प्रीन्यूक्लियर एंड पोस्ट न्यूक्लियर। वो प्रीनक्लियर जितना भी इंडलजेंस हमने कर दिया हमको नाराज हो गए तो सीधा करो उसके साथ में युद्ध। चलो वो सब एवरीथिंग वी डीड। पोस्ट न्यूक्लियर अभी काउंट डाउन वो क्लॉक स्टार्ट हो गया है। सो दैट वी हैव टू अपनी जितनी भी इंस्टिंक्ट है उसके ऊपर कंट्रोल करके एंड दैट कैन ओनली बी पॉसिबल बाय इंडिया क्योंकि भारत में ठाकुर मास्वामी जी आए और किसी देश में यह पावर अभी तक नहीं गया है। सो वी हैव टू बिकम दैट रिस्पांसिबल सुपर पावर।

प्रश्न: स्वामीजी कहते हैं कि उपनिषद शक्ति की महान खान हैं और हमें अपनी दिव्यता को अभिव्यक्त करना है। लेकिन शक्ति या अभिव्यक्ति माया के दायरे में है। एक साधक को ब्रह्मज्ञान में लीन होना चाहिए। यह नेति-नेति है और अभिव्यक्ति इति-इति है।

मुझे ऐसा नहीं लगता कि यह जो इति इति है दैट इज एनि म जैसे आपने कहा कि ओरिजिनल प्रीमाइस यदि यह है कि मैनिफेस्टेशन ऑफ द स्ट्रेंथ। सो इति इति इज़ अ मैनिफेस्टेशन ऑफ स्ट्रेंथ इन दैट सेंस ऐसा मुझे नहीं लग रहा है। देखिए मैनिफेस्टेशन ऑफ स्ट्रेंथ का लिटरल एग्जांपल देखना है। मैनिफेस्टेशन ऑफ डिविनिटी विदिन या तो फिर उपनिषद्स आर माइन ऑफ स्ट्रेंथ। इसका जो लिटरल एग्जांपल देखना है तो ठाकुर जब निर्विकल्प समाधि में जा रहे थे तो वह जो लॉन्ग स्टैंडिंग हैबिट था कि मां काली की मूर्ति नजर के सामने आ जाती थी। तो फिर ठाकुर ने क्या किया वो जो ज्ञान रूपी तलवार ज्ञान रूपी अ से मां काली को काट दिया और सीधे वो निर्विकल्प समाधि में चले गए। इन दैट सेंस दैट मैनिफेस्टेशन ऑफ स्ट्रेंथ। अब जैसे देखिए मैंने आपको एक पहले भी एक बार कहा था कि मैं बहुत साल पहले मैं स्कूल में पढ़ रहा था वो मैं वहां हमारे यहां पे एक योग निकेतन है वहां पे मैं यह राजयोग मैं योगिकेतन में जाता था योग सीखने के लिए बहुत ज्यादा कुछ पता नहीं था वहां पे किंतु स्वामी जी का राजयोग है वो वहां पे एक डॉक्टर है वो सिखाते थे तो वो डॉक्टर एक्चुअली हमारे डिवोटी थे वो सब बाद में पता चला व्हाटएवर राजयोग सिखाते हैं जो उसका जो प्रथम उसका जो है ना कि योगस चित्तवृत्ति निरोध योग है चित्त की वृत्तियों का निरोध तो एकदम मेरे माइंड में फिट हो गया था। मैंने कहा दिस इज़ अ प्यरेस्ट फॉर्म ऑफ़ योगा। दिस इज़ अ प्यरेस्ट फॉर्म ऑफ़ साधना। आपके माइंड को बाकी सब चीजों से हटा दीजिए तो ऑटोमेटिक विद इन डिनिटी है वो मैनिफेस्ट हो जाएगी। ओके चलो लेट मी ट्राई इट। मैं स्कूल में ही था ट्राई कर रहा हूं। 5 मिनट ऐसा मैं सोच रहा हूं कि ऑल थॉट्स आर गॉन फ्रॉम माय माइंड। सभी विचारों को मैंने हटा दिया। फिर वह सीधा 10-15 घंटा चला जाएगा। फिर मुझे याद आएगा। अरे वो तो मैं चित्त की वृत्ति का निरोध कर रहा था। क्या हुआ? तो क्या है कि वो मैंने उस समय किया। अभी देखिए जैसे वो साइकिल घूमती है ना यहां पे मेरे पास ऐसा कुछ काम नहीं है। पूरी एक्टिविटी भी ऐसी कुछ नहीं है। तो आई हैव इनफ टाइम। फिर से मैं सोचता हूं कि लेट मी ट्राई इट अगेन जो कि प्यरेस्ट फॉर्म ऑफ साधना है। द आरती के बाद में अपने कमरे में बैठूंगा। राजकोट में भी इस तरह का टाइम मिलता था वैसे किंतु यह क्या था ना कि पब्लिकेशन का टेंशन बहुत रहता था। यहां पे कुछ नहीं है। आपको यहां पे जैसे ही घर में आए कमरे में आए आरती खत्म करके वह सब बाकी सब वो जो दुकान है सब बंद हो गई है। पूरे रिटायर हो गए हैं। कल जो होना है वो कल देखा जाएगा। अभी और कुछ नहीं रहा। तो इन दिस सेंस आई हैव टाइम इनफ। डिजायर इनफ टू स्टार्ट इट अगेन। तो फिर से मैं अपने माइंड को ऑब्जर्व करता हूं कि दिस टाइम आई एम मच मोर मैं पूरा 20 साल का साधु जीवन है। 20 साल की साधना है अभी मेरे पीछे में। तो अभी पता है कि किस तरह के डेंजर आ सकते हैं। ऐसा कुछ करने से पता है कि किस तरह के स्लीपरी स्लोप में हम फंस जा सकते हैं। एटसेटरा एटसेटरा। सो विद दिस मैच्योरिटी विद दिस नॉलेज एक्सपीरियंस आई एम ट्राइंग टू डू इट अगेन। तो उस समय यह मैंने बार-बार देखा कि विचार जो है जैसे ही अपने मन को खाली करने का प्रयास करेंगे वि इज द हाईएस्ट फॉर्म ऑफ साधना नेति नेति दैट इज व्हाट कि नेति नेति करके आपको ब्रह्म साक्षात्कार करना है तो नेति नेति का अर्थ ही है कि आप बाकी सब चीजों को हटा दें क्योंकि जैसे वेदांत कहता है कि डिविनिटी को आप कहीं बाहर से भीतर में नहीं लाना। डिनिटी भीतर में ही है। उसके ऊपर में यह जो चित्तवृत्ति रूपी कचरा पड़ा हुआ है, उसको हटाना है। बस इतना ही है। सो जैसे ही हम लोग हटाने का प्रयास करते हैं ना, यह चित्त की वृत्तियां आसुरी स्वरूप धारण करके इतना भयानक आक्रमण हमारे पर करती है कि उस समय आपका विल पावर जो है उस आक्रमण को रोकने के लिए प्रचंड विल पावर चाहिए। कहां से वह आपको हिप्नोटाइज करके मोबाइल हाथ में पकड़ा देगी। एक घंटे के बाद में पता चलेगा अरे मैं तो YouTube पर वीडियो देख रहा हूं। मैं तो चित्तवृत्ति निरोध की साधना कर रहा था। ऐसा घंटा घंटा फटाफट करके उड़ा देगी। यदि आप अपने मन को ब्लैंक करने का प्रयास करेंगे। उस समय जो विल पावर चाहिए उस समय जो मैनिफेस्टेशन ऑफ स्ट्रेंथ चाहिए वो अद्भुत है। जैसे वो मां की लाइफ के वो उसमें हमने इंट्रोडक्टरी चैप्टर में पढ़ा था। गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं कि एक समय था कि मां दुर्गा को अवतरित होना पड़ता था। शुभ निशुंभ का वध करने के लिए इस बार मां दुर्गा को आना पड़ा है संशय राक्षस का वध करने के लिए। सो द रियल बैटल इज विद इन अस। और यह जो कॉस्मिक बैटल है देयर इज़ एन इनर कॉस्मोस। यह जो इनर कॉस्मिक बैटल इज़ देयर इन दैट यू हैव टू मैनिफेस्ट योर डिनिटी। दैट यू हैव टू मैनिफेस्ट योर इनर स्ट्रेंथ। दैट इज़ रियल चैलेंज। अभी प्रॉब्लम क्या होता है? है स्वामी जी का फेमस वो जो एक ऑब्जरवेशन है कि जब तक आप बाह्य क्षेत्र में बाह्य जगत में युद्ध करते हैं ना आपकी मर्दानगी है आपकी शौर्य वीरता है सबको दिखती है आपको भी दिखती है आप मेजर कर सकते हैं किंतु यह जो इनर वॉर जो है इनर बैटल फील्ड है वो ऐसा वो माने मन को भ्रमित कर देने वाला है कि इनर बैटल फील्ड में आकर के मनुष्य कभी-कभी ऐसा भ्रमित हो जाता है कि भयानक राक्षस उसके सर पर सवार होकर के उसको सम्मोहित करके उसके पास में से ऐसा भयानक दुष्कर्म करवाएंगे कि इस आदमी को पता भी नहीं चलेगा। यानी कि यह इनर बैटल और आउटर बैटल इन दोनों में बड़ा फर्क है। एक्सटर्नल बैटल में आप हीरोइज़्म है, स्ट्रेंथ है। ईजीली आप मैनिफेस्ट कर सकते हैं। दूसरे भी मेजर कर सकते हैं। हम भी मेजर कर सकते हैं। परमवीर चक्र है। किनको देते हैं? क्योंकि क्या है कि वो बैटल फील्ड में जो ब्रेवरी है सबको पता चलती है। वो कैप्टन कालिया की कहानी वो कारगिल में सीधा वो चट्टान के ऊपर में चढ़ गए और दुश्मनों को मार दिया। अभी कंपेयर दिस टू जैसे आपने हिमालय के साधु के बारे में कहा वो कंटीन्यूसली अपने माइंड में जो असुर है उसके साथ में युद्ध करता रहता है। क्योंकि बाहर से ऐसा लगता है जड़ है। बाहर से तामसिक दिखता है। बाहर से पता ही नहीं चलता। सो वो कैप्टन कालिया कि वो जो वहां पर वो बहादुरी पूरे जगत को समझ में आती है। मेजर कर सकते हैं। और यह जो बहादुरी है हमको दिखती नहीं है। सो दिस जो स्वामी जी कहते हैं मैनिफेस्टेशन ऑफ स्ट्रेंथ इन दिस सेंस। अभी देखिए कि कर्म योग इज आल्सो ए साधना। तो कर्म के क्षेत्र में यदि आप सेवा कार्य है सेवा कार्य किस तरह से अपने खुद के स्वार्थ के लिए नहीं निस्वार्थ हो करके जैसे मैंने वो डॉक्टर की कहानी बताई थी रांची में सेवा कार्य तो बहुत किया किंतु निस्वार्थ नहीं हो पाया तो वो फिर वहां पे एक बड़े एनजीओ में डायरेक्टर बन करके बैठ गया तो वो निष्काम सेवा करनी है दैट इटसेल्फ रिक्वायर्स अ लॉट ऑफ स्ट्रेंथ कि आपकी नजर के सामने आप किसी ट्राइबल एरिया में काम करेंगे अच्छी रिलीजियस ऑर्गेनाइजेशन के माध्यम से तो 10 एनजीओ आकर के आपको लुभाने को आएंगे। आप अब हमारे यहां पे आ जाइए। आपका नेटवर्क और क्रेडिबिलिटी अच्छा बन गया है ट्राइबल एरिया में। वो नेटवर्क और क्रेडिबिलिटी का हमारे लिए इस्तेमाल कीजिए। हम आपको इतना पैकेज दे देंगे। उस समय वो प्रलोभन को रोक के रखना। उस समय कहना कि मैं कोलकाता में प्रैक्टिस कर सकता था। मेरे कलीग आज कहां यूरोप अमेरिका में बैठे हुए हैं। उस लेवल पर मैं जा सकता था। वो छोड़ के मैं यहां पे आया हूं। फिर मैंने अपना ईमान इतने सस्ते में बेच दिया। 2025 हजार पर मंथ के पैकेज में मेरे कलीग से 2025 लाख 20-25 करोड़ कमा रहा है। वह छोड़ के मैं यहां पर आया। फिर 2025000 में अपना ईमान बेच दिया। सो दैट दैट मोरल स्ट्रेंथ दैट रिक्वायर्स दिस मैनिफेस्टेशन ऑफ इनर डिविनिटी।

प्रश्न: निर्विकल्प समाधि के बाद संस्कार कैसे लौट सकते हैं?

देखिए मैं जब बता रहा था उसी समय मैंने कहा था कि संस्कार वापस नहीं आएंगे। मेमोरीज वापस आएगी। अर्थात कि ठाकुर को पता है कि वह कौन है। इस अर्थ में कि कामारपुर में जन्म हुआ। खुदराम उनके पिताजी है। बचपन की जो सब यादें हैं, मां पिताजी का स्नेह प्राप्त हुआ। कामार पुकुर में जो उन्होंने अपने मित्रों के साथ में जो दिव्य लीला की कोलकाता आए, वहां पर पुजारी थे, यह मेमोरीज आर देयर। किंतु इसके साथ में जो संस्कार जुड़ा हुआ था इस मेमोरीज के जिस कर्म के माध्यम से यह मेमोरी बनी उस कर्म के साथ में जो कर्म का फल या संस्कार जुड़ा हुआ था वो कभी वापस नहीं आएगा दैट इज वे डिफरेंस वी हैव टू रिमेंबर कि मेमोरीज आर वन थिंग संस्कार आर अनदर ये चित्त जैसे कि चित्त की वृत्ति राइट हम जितनी भी चित्तवृत्ति अपने मन में अह प्रवेश करती है वह सब कुछ ना कुछ एक रेखापात करती है एक संस्कार बनाती है तो अभी अभी चित्त की वृत्ति तो रह गई किंतु उसके जो संस्कार थे वो चले गए। वो मुझे पता नहीं ये हिंदी या बंगाली में इस तरह की कहावत है कि नहीं गुजराती में है कि सांप गया ने लिसोटाया। व्हाट इज द मीनिंग ऑफ दैट? सांप जो है वो रेती पे रेंगता है। तो सांप चला गया किंतु उस वो रेती पे रेंगता है। वो जो रेती में वह जो बन गया है उसका वो जो यह वो रह गया। लिसोटा जिसको कहते हैं वो रेखाएं वो रह गई कि सांप यहां से गया है। आप समझ सकते हैं। यहां पर रिवर्स होता है। सांप रह जाता है किंतु उसकी जो रेखाएं हैं वो सब चली जाती है। जब तक देह रहेगा तब तक मेमोरीज रहेगी। किंतु ये जो सांप है ना वो पहले रेती पर रेंगता था तो वो जो निशान बना देता था। अभी वो वो रास्ते पर रेंगता है। वहां पर कोई निशान नहीं बनेगा। वो जो कंक्रीट का रास्ता है उसके ऊपर में साफ वो जाएगा तो किसी भी तरह के निशान नहीं बनेंगे। तो ऐसा है कि मेमोरीज या तो चित्तवृत्ति रह जाएगी किंतु उसका संस्कार नहीं रहेगा। बिल्कुल

प्रश्न: जैसा कि ठाकुर कहते हैं, जब तलवार सोने की हो जाती है तो उसका इस्तेमाल हत्या के लिए नहीं किया जा सकता।

ठीक बिल्कुल परफेक्ट एग्जांपल वो जो तोतापुरी के साथ में जो फेमस डिस्कशन कि तोतापुरी कहता है कि वो जो कमंडलू है प्रतिदिन उसको धोना लोटा जो है प्रतिदिन धोना पड़ेगा। तो ठाकुर कहते हैं कि यदि सोने का हो जाए तो फिर तो वह हंसते-हंसते कहते हैं फिर जरूरत नहीं है।