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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 6 Oct 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः इस सप्ताह से स्वामी विवेकानंद का लाइफ उसका हम पाठ करेंगे ऑलरेडी

हमारी भावधारा को समझने के लिए आवश्यक है कि हम ठाकुर, माँ और स्वामीजी — तीनों के जीवन और उपदेशों का समन्वित रूप से (एक साथ) अभ्यास करें।

अब जिस तरह से यदि आप अपने साहित्य के साथ में फमिलियर होंगे तो आपने देखा होगा कि अपने साहित्य को या तो फिर श्री रामकृष्ण भावधारा समस्त को एक साथ में स्टडी करने से हमको एक अलग ही तरह से इंसाइट प्राप्त होती है। यदि आप श्री रामकृष्ण का ही जीवन का स्टडी करेंगे, अध्ययन करेंगे तो आपको एक तरह का इंसाइट प्राप्त होगा। आपको ऐसा लगेगा कि जैसे कि ईश्वर प्राप्ति ही जीवन का सर्वस्व है। यदि आप मां के जीवन को स्टडी करेंगे तो एक पर्सपेक्टिव मिलता है कि किस तरह से यह कम्युनिटी लाइफ है। उसमें रहा जाता है। एक तो आंतरिक तपस्या तो है ही है। किंतु साथ में ही कम्युनिटी लाइफ एक बहुत बड़ा फैक्टर है कि जिसमें हमको रहना है मां का जैसे कि वो फेमस स्टेटमेंट सो शो शो जे शोए शेरो जे नाशोए शे नाय अर्थात कि बंगाली लैंग्वेज में और इन जनरल भी देखेंगे तो तीन स है स श श जो सहन करता है वह रहेगा जो नहीं सहन कर पाएगा नहीं रह पाएगा अर्थात कि सबके साथ में किस तरह से रहना है। अपना ईगो जो है, अपनी डिमांड जो है, उसको किस तरह से हमको साधना के माध्यम से उसको ईश्वर को बलिदान दे देना है। तो वह एक अंडरस्टैंडिंग हमको प्राप्त होती है। और फिर यदि स्वामी जी का स्वामी विवेकानंद के जीवन का स्टडी करेंगे तो एक बिल्कुल ही मैं कहूंगा कि जो लोग ऊपर ऊपर से स्टडी करते हैं खास करके उन लोगों के लिए एक बिल्कुल ही डिफरेंट टाइप का अंडरस्टैंडिंग प्राप्त होता है। पेट्रियोटिज्म और यह सेवा योग कर्म योग यह हमको समझने में आता है। देखिए कि ऐसे पूरे के पूरे ऑर्गेनाइजेशन है जो कि स्वामी जी के नाम से चलते हैं। जैसे कि एक है विवेकानंद केंद्र जैसे कि एक है आरएसएस। अभी वे लोग शायद स्वामी जी का नाम को इंटेंशनली या अनइटेंशनली यूज करेंगे नहीं करेंगे। किंतु स्वामी जी के जो पेट्रियोटिज्म और यह सेवा योग के जो आइडियल है वह उन्होंने अवश्य ग्रहण किए हैं। ऐसे किसी किसी को लगेगा कि यह जो ठाकुर और मां का जीवन है उनके जो उपदेश है वह हमारे लिए इतने रिलेवेंट नहीं है जितना कि स्वामी जी का खास करके यह लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा जो पोर्शन है वह हमारे लिए जितना रिलेवेंट है। तो एक क्या है कि तीनों के जीवन को पढ़कर के इंडिविजुअली पढ़ेंगे तो एक फ्रेगमेंटेड अंडरस्टैंडिंग होता है प्राप्त और फिर आप यदि देखेंगे कि किसी किसी के मन में यह प्रश्न भी होता है कि एक और ठाकुर कहते हैं कि कर्मनाशा नदी है। उसमें स्नान करने से ही मैं बचूंगा। उसमें डुबकी लगाने से ही मैं बचूंगा। यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि कर्म का प्रारंभ करो। यह रजस है। उससे इस देश को भर दो। रजस यानी तामसिक रजस नहीं सात्विक रजस। तो यह सब एक फ्रेगमेंटेड अंडरस्टैंडिंग प्राप्त होने से यह सब क्वेश्चन होता है। मैंने जब अपने साहित्य का स्टडी प्रारंभ किया तब मैंने देखा कि मैं वैसे समग्र जिस तरह से मैं स्टडी करता रहता हूं। ठाकुर का भी मैंने किताबें पढ़ी लीला प्रसंग कथामृत मां के जीवन को भी स्टडी किया मां की जो लाइफ है मां की जो स्मृति कथाएं हैं और स्वामी जी का जो लाइफ है रिसर्च है कंप्लीट वर्क्स है तो मुझे ऐसा पर्सनल मेरा एक अंडरस्टैंडिंग बना कि तीनों को एक साथ में स्टडी करना चाहिए और एक साथ में स्टडी करने के लिए एक फ्रेमवर्क डेवलप करनी चाहिए जिससे कि क्या हो कि हम एक इवोल्यूशन ऑफ आइडियाज देख पाए। हम एक कंटिन्यूटी ऑफ थॉट देख पाए। एक कंटिन्यूटी ऑफ कांसेप्ट देख पाए कि इस तरह से यह

FIrst 100 year timeline of Ramakrishna Mission. 1836 to 1936.

कांसेप्ट प्रारंभ हुआ। ठाकुर की साधना के साथ में ठाकुर की इस जगत के प्रति संपूर्ण निर्मोहता जो थी जगत के प्रति जो संपूर्ण रूप से उनका विराग जो था बचपन से ही जन्म से ही जो काम वासना जिसके पीछे में पूरा संसार दौड़ता है उससे उन्होंने अपने को विमुख करके एक आंतर जगत में प्रवेश किया एक उर्ध्व जगत में प्रवेश किया जहां पर ईश्वर सत्ता और ब्रह्म ज्ञान का राजत्व है। वहां पर ठाकुर की यह जर्नी जो प्रारंभ हुई, तो देखिए कि यह कलमिनेट किस तरह से होती है कि उनके कोलकाता आकर के दक्षिणेश्वर कालीवाड़ी में साधना करके साधना में परिसमाप्ति से उनका यह जो ईश्वर साक्षात्कार या तो फिर ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति का जो उनका उद्देश्य था और सिर्फ इतना ही नहीं जितने भी स्ट्रीम्स ऑफ रिलीजन है जितनी जित भी स्कूल्स ऑफ स्पिरिचुअल साधना है उन सबके माध्यम से उन प्रत्येक साधना का चरम लक्ष्य जो है अल्टीमेट एम है वो क्या है उसको प्राप्त करना वो जब ठाकुर ने प्राप्त किया और फिर आखिर में मां शारदा का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ ठाकुर ने मां की शोडशी के रूप में जो पूजा की आराधना की वहां से एक दूसरा फेज स्टार्ट होता है तो देखिए देखिए देखिए अभी हम लोगों का एम क्या है? हम लोगों का ऐ यह है कि हम पूरे तीनों के जीवन को एक साथ में स्टडी करते हैं। तो यहां से जो ठाकुर की संसार के प्रति विराग से जो साधना प्रारंभ हुई उनकी जो जर्नी प्रारंभ हुई प्रारंभ हुई वो कलमिनेट हुई शोडशी पूजा में। यह शोडशी पूजा जो है जैसे कि एक पाइवोटल पॉइंट है रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा में 1836 1836 से यह भावधारा जो प्रारंभ होती है तो उसके जो मोस्ट क्रूशियल 100 इयर्स है 1836 में श्री रामकृष्ण का जन्म होता है। वह पृथ्वी पर अवतरण करते हैं। और 1936 में बेलूर में गंगा के किनारे श्री रामकृष्ण देव का मंदिर का क्सिक्रेशन होता है। तो यह जो 1 ईयर की जो जर्नी है इस जर्नी में सबसे बड़ा पाइवोटल पॉइंट जो है वो है यह शोडशी पूजा। शोडशी पूजा के पहले श्री रामकृष्ण ईश्वर आराधना में ही ईश्वर साक्षात्कार में ही आध्यात्मिक जितने भी भाव है उसके रसास्वादन में ही मग्न थे। किंतु फिर शोडशी पूजा करके जैसे कि मां की शक्ति से शक्तिमान होकर के ठाकुर ने धर्म चक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया। इस पीरियड को हम नाम देंगे मिनिस्ट्री ऑफ श्री रामकृष्ण। कि किस तरह से ठाकुर ने कोलकाता में घर-घर जाकर के जो लोग घर-घर यानी कि सब सभी के घर नहीं ठाकुर को यह पता चलना शुरू हो गया था कि कोलकाता में कौन-कौन धर्म के प्रति आक्रुष्ट है। किसके भीतर में अध्यात्म का सही-सही पार्क वो चल रहा है। ज्वल रहा है। तो उनके घर जाकर के ठाकुर उनके साथ में वार्तालाप करते थे। तो इस सिलसिले में सबसे बड़ा नाम आता है केशव सेन का। जिस तरह जिस दिन ठाकुर ने केशव सेन के ठाकुर खुद उसके वहां पर गए थे। देखिए स्वामी जी का जो फेमस स्टेटमेंट इफ मोहम्मद डजंट गो टू माउंटेन देन माउंटेन कम्स टू मोहम्मद। सो इस स्टेटमेंट का सबसे बड़ा जो उदाहरण है वो है ठाकुर केशव के वहां पे केशव को मिलने के लिए सामने से गए थे। वो प्रथम मुलाकात केशव धीरे-धीरे ठाकुर के प्रति आकृष्ट हुआ। उसने अपनी ब्रह्म समाज की पत्र पत्रिकाओं में ब्राह्म समाज के प्रवचनों में उसने ठाकुर के महिमा का गुणगान गाना प्रारंभ किया और फिर इससे आकर्षित होकर के कोलकाता के यह जो कुछ युवान लड़के थे जिनके भीतर में धर्म के प्रति एक मुमुक्षुत्व क्यूरियोसिटी या तो फिर व्याकुलता जागृत हो चुकी थी वे लोग इस पपस के लिए ब्रह्म समाज में जो आते थे उन लोगों को धीरे-धीरे ठाकुर के बारे में पता चला और फिर वे लोग ठाकुर के पास आना शुरू हुए। इसमें ग्रही भी थे और भविष्य के त्यागी संतान भी थे। यह रामचंद्र दत्त, यह सुरेश मित्र, यह बलराम बाबू, यह मास्टर महाशय जो लोग ठाकुर के पास में यह ब्रह्म समाज के ही कहीं ना कहीं से जानकर के वे लोग आए हैं। और इसी सूत्र में इसी सिलसिले में बाद में यह राजा महाराज है, स्वामी जी है। उस समय के नरेंद्र या तो फिर शशि शरद, तारक यह सब लोग धीरे-धीरे करके ठाकुर के पास आना शुरू हुए। तो वो जो पाइवोटल मोमेंट था शोडशी पूजा का उसके बाद में उससे पहले था कि आत्म साक्षात्कार की ओर या तो फिर रियलाइजेशन की ओर अपनी भाव गंगा भावधारा बह रही थी किंतु शोडशी पूजा के बाद में इस रियलाइजेशन का मैनिफेस्टेशन हुआ श्री रामकृष्ण स्वयं जाकर के लोगों को जैसे कि पुकार रहे हैं और वह फेमस घटना हमको पता है कि वहां पर कुठीवाड़ी जो है दक्षिणेश्वर में उसकी उसकी छत पर जाकर के ठाकुर इनको पुकार रहे हैं कि तोरा कोथाई आशीष आए रे तुम लोग कहां पर हो आओ यह संसारी लोगों की बात सुनकर के मेरे कानों में ज्वलन हो गई है मैं ईश्वरीय वार्तालाप लेकर के रहना चाहता हूं और इसीलिए यह रियलाइजेशन की जो सर्वोच्च जो भूमि है उससे ठाकुर कॉन्शियसली अपने को एक स्टेप नीचे रखना चाहते थे। ठाकुर कहते थे चीनी खेते चाइना चीनी होते चीनी होते चाइना मां चीनी खेते चाहिए अर्थात कि मैं शुगर होना नहीं चाहता शुगर खाना चाहता हूं क्यों शुगर हो जाऊंगा ब्राह्मण यदि हो जाऊंगा तो ब्रह्म साक्षात्कार में ब्रह्म ज्ञान में फिर जगत को विस्मृत होकर के पड़ा रहूंगा किंतु यदि मैं ब्राह्मण से एक स्टेप दूर रहूंगा तो भक्त और भगवान यह संबंध बना रहेगा और इससे क्या होगा कि बाकी जो भक्तगण है उनके साथ में ईश्वरीय आलाप करके उनके मन को सांत्वना मिलेगी। तो यह जो सर्वोच्च रियलाइजेशन के एक स्टेप नीचे आकर के ठाकुर ने अपना मिनिस्ट्री प्रारंभ किया। इसको आप देखिए कि कलमिनेशन कहां पर आया? आत्म प्रकाश। जब ठाकुर को जब कैंसर होना प्रारंभ हुआ उस समय धीरे-धीरे करके ठाकुर ने जो अपना सही स्वरूप जो कि चंद कुछ एक दो भक्तों के सामने प्रकाशित करते थे जो कि एलिजिबल थे वहां से ठाकुर ने जैसे कि अपनी प्रतिभा अपना सही स्वरूप सबके सामने जैसे कि प्रकाशय रूप से कहना शुरू कर दिया और यह फेमस घटना 1 जनवरी जो 1886 ठाकुर कल्पतरु हुए थे तो अभी अभी देखिए उसके बाद में ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी जी का मिनिस्ट्री प्रारंभ होता है। तपस्या तो एक बार हो गई जो कि ठाकुर की जो तपस्या थी इसके बाद में जितने भी चरण है जितने भी फेस है उसमें अभी मैनिफेस्टेशन ही होना है। किंतु मैनिफेस्टेशन के तीन मुख्य जो है हमको विभाग दिखते हैं, फेजेस दिखते हैं क्रोनोलॉजिकली। तो पहला तो है कि ठाकुर का गुरु भाव। इसके बाद में स्वामी विवेकानंद का गुरु भाव। ठाकुर की महासमाधि से प्रारंभ करके स्वामी जी की महासमाधि तक 1886 से लेकर के 192 यह पूरा पीरियड है कि स्वामी जी ने जिस तरह से ठाकुर और वेदांत और योग यह जो तीन मुख्य भावधारा जिससे कि उनका आध्यात्मिक गठन हुआ था। इस तीनों भावधाराओं को स्वामी जी ने पूरे विश्व में जैसे कि फैला दिया तो वह स्वामी जी का गुरु भाव या तो फिर कहेंगे कि मिनिस्ट्री ऑफ स्वामी विवेकानंद और फिर स्वामी विवेकानंद की महासमाधि 1902 से प्रारंभ होकर के मां शारदा का गुरु भाव प्रारंभ होता है। या तो फिर मैं कहूंगा कि मां शारदा के गुरु भाव का जो जाहिर प्रकाश प्रारंभ होता है 1902 स्वामी जी की महासमाधि से प्रारंभ करके 1920 मां की महासमाधि तक यहां पर हमको यह नहीं समझना है कि मां का गुरु भाव 1902 के बाद में ही प्रारंभ होता है। तो जग जाहिर घटनाएं है सब कि ठाकुर ने शोडशी पूजा के समय ही जैसे कि मां के चरणों में अपना जो आध्यात्मिक उपलब्धि है वह समर्पित कर दिया था। किस तरह से ठाकुर को कैंसर की ट्रीटमेंट के लिए काशीपुर लाया गया था। तभी से मां ने जैसे कि त्यागी संतानों की लीडरशिप लेना शुरू कर दिया था। किस तरह से ठाकुर के अंतरंग भक्त मां के पास में आकर के अपने सबसे जटिल आध्यात्मिक प्रश्न थे। उसका समाधान प्राप्त करते थे। किस तरह से स्वामी जी ने अमेरिका जाने के पहले मां की अनुमति प्राप्त की थी। किस तरह से अमेरिका से वापस आने के बाद में यह जो अमेरिकन ब्रिटिश शिष्याएं थी ओलीबुल जोसेफाइन में क्लाउड निवेदिता इनको मां के चरणों में अर्पित किया था। वह सब जग जाहिर घटनाएं हैं। मां का गुरु भाव कहे तो बचपन से ही प्रकट हो गया था। तो वो वो दैट इज वेल नोन। यहां पर मैं 1902 से 1920 के पीरियड को मिनिस्ट्री ऑफ होली मदर या तो फिर मां के गुरु भाव के रूप में इस अर्थ में ले रहा हूं कि जनसाधारण के लिए मां प्रकाश में उस समय ही आती है। इससे पहले सिर्फ अंतरंग भक्तों के भीतर में ही मां की महिमा का प्रचार था। तो यह एक मेरा एक एक फ्रेमवर्क है। इस फ्रेमवर्क को चार फेज में बांट सकते हैं। फिर से दोहरा देता हूं। एक तो है कि पाथ टुवर्ड्स रियलाइजेशन एक अंतर यात्रा अंतर यात्रा जिसमें कि ठाकुर अपने जन्म से लेकर के शोडशी पूजा तक की पूरी घटनावली शामिल होती है। उसके बाद में शोडशी पूजा इज दैट पाइवोटल पॉइंट कि वहां से एक्सटर्नल मैनिफेस्टेशन प्रारंभ होता है। इस एक्सटर्नल मैनिफेस्टेशन को तीन डिवीजन में बांट लेंगे। श्री रामकृष्ण देव का गुरु भाव या तो फिर मिनिस्ट्री ऑफ श्री रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद का गुरु भाव मिनिस्ट्री ऑफ स्वामी विवेकानंद एंड मां शारदा का गुरु भाव मिनिस्ट्री ऑफ मदर शारदा अभी देखिए कि विदिन दिस थ्री और फोर फेजेस देयर आर जो पीरियड्स है उसको मैंने फिर पर्व में डिवाइड कर दिया है। मैं आपके साथ में यह एक स्क्रीन शेयर कर रहा हूं कि यह रियलाइजेशन ऑफ श्री रामकृष्ण यहां से प्रारंभ होता है। उसमें देखिए कि बाल्य पर्व सबसे पहला तो 11 पर्व में मैंने बांटा है। यह पूरे जो चार फ़ज़ है उसको तो सबसे पहला है बाल्य पर्व 1836 से 1852 188 1852 1836 से 1852 जबकि ठाकुर कामारपुकुर में थे और सुमधुर बाल्य लीला करते थे। जैसे कि बाल गोपाल की वृंदावन में जो लीलाएं हमको देखने को मिलती है। इसी तरह की लीलाएं हमको ठाकुर की कामार पुकुर में दर्शन आती है। उसके बाद में साधन पर्व कि ठाकुर कोलकाता में आए और काली मंदिर में उन्होंने साधना प्रारंभ की। तब से लेकर के शोडशी पूजा तक का समय। तो 1852 टू 1873 वह एक पूरा पर्व है। इसके बाद में ठाकुर का यह जो मिनिस्ट्री है वह यहां से प्रारंभ होता है। शक्ति पर्व मैंने उसका नाम दिया है। शक्ति पर्व में शोडशी पूजा है और फिर मां दक्षिणेश्वर और जयराम बाटी आती जाती रहती है। और ठाकुर किस तरह से मां की आध्यात्मिक शक्ति है उसको जागृत करने में मां का भक्तों के प्रति जो स्नेह है मातृभाव है वो किस तरह से जागृत हो इसके प्रयास में ठाकुर लगे हैं और इसका वर्णन अभी हम जो मां का जीवन है गंभीरानंद जी की मां की जीवनी उसमें हम पढ़ रहे हैं। तो, यह 1873 से 1879 इसके बाद में आता है आनंद पर्व। यह आनंद पर्व अर्थात कि ठाकुर के अंतरंग शिष्य एक बार उनके पास में आना प्रारंभ हुए तो उनको लेकर के जो हास्य, विनोद, नृत्य, कीर्तन, वार्तालाप, ऐश्वरीय वार्तालाप और हास्य, विनोदमय घटनाएं वो जो दक्षिणेश्वर के सुनहरे दिन गोल्डन डेज ऑफ दक्षिणेश्वर जो वो पूरा पीरियड था उसको मैंने नाम दिया है आनंद पर्व। इसके बाद में अभी आनंद पर्व में और इसके बाद में आत्म प्रकाश पर्व आत्म प्रकाश अर्थात कि ठाकुर को जब से कैंसर प्रारंभ हुआ तब और इससे पहले क्या है आनंद पर्व में फिर भी ठाकुर अपनी जो सही जो सत्ता है उनका जो सही महात्म है उसको छुपाते थे। कहते थे कि गुरुकर्ता और बाबा यह तीन शब्द यदि मुझे कोई कहता है तो ऐसा लगता है जैसे कि मेरे देह में कोई कांटे चुभ हो रहा है तो वह एक समय था किंतु कैंसर के बाद में ही जैसे कि ठाकुर के भीतर की जो दिव्य आध्यात्मिकता है वह उसका बह प्रकाश पूर्ण रूप से होने लगा और ठाकुर नरेंद्र के सामने स्वीकार करते हैं। जय राम जय कृष्णा श्री राम कृष्ण और सिर्फ नरेंद्र ही नहीं सबके सामने कल्पतरु दिन की फेमस घटना कि सबके सामने कल्पतरु रूप से आध्यात्मिक कल्पतरु आध्यात्मिक फल देने वाले कल्पतरु के रूप में प्रकट होते हैं। सो वो हो गया आत्म प्रकाश पर्व। इसके बाद में स्वामी विवेकानंद का गुरु भाव प्रारंभ होता है 1886 1902 1886 में ठाकुर की महासमाधि के बाद का। इसमें देखिए सर्वप्रथम है संघ पर्व किस तरह से 1886 टू 1890 किस तरह से वराह नगर मठ की स्थापना हुई। किस तरह से वराह नगर मठ में यह जो डायरेक्ट डिसाइपल थे ठाकुर के जिनकी संख्या कम ज्यादा होती रहती थी और विज्ञानानंद जी महाराज तो वराह नगर मठ में कभी रहे ही नहीं है। वह तो ठाकुर के स्वामी जी के अमेरिका से लौटने के बाद में उन्होंने संघ में योगदान दिया। तो जो भी है त्यागी संतानों ने एक साथ मिलकर के रहना सीखा। यह इंस्टीट्यूशनल सेटअप किस तरह से होता है? वैसे तो काशीपुर में ठाकुर ने सबको गेरवा प्रदान कर दिया था। किंतु वहां पर सभी लोग रहते थे ठाकुर की सेवा करने के लिए। वही सबसे बड़ा उद्देश्य था। किंतु ठाकुर के देह के अंतर्ध्य होने के बाद में दैहिक महासमाधि होने के बाद में जब एक साथ में रहना है तो किस तरह से ईगो क्लेश होता है ईगो क्लेश शब्द नहीं यूज करके कहेंगे पर्सनालिटी क्लेश किस तरह से होता है छोटी-छोटी बातों में एडजस्ट करना होता है हमको वो किस तरह से करना है तो एक इंस्टीट्यूशनल नॉर्म्स डेवलप होते हैं। इंस्टीट्यूशनल कन्वेंशंस डेवलप होते हैं। इंस्टीट्यूशनल मेमोरी डेवलप होती है। व्हिच इज़ अ मोस्टेंट पार्ट ऑफ़ एनी इंस्टीट्यूशन। आज आप पॉलिटिकल पार्टीज देखिए, नेशन स्टेट्स देखिए, कोई भी इंस्टीटशंस आप देखिए। उसके फंडामेंटल कुछ नॉर्म्स एंड कन्वेंशन होते हैं। कुछ आइडियाज एंड आइडियल्स होते हैं। एम्स एंड ऑब्जेक्टिव्स होते हैं जिसको कि सबको फॉलो करना होता है। यदि आप नहीं करेंगे तो उस इंस्टीट्यूशन में से आपको निकल जाना पड़ेगा। तो इसी तरह से जो रामकृष्ण संघ जो भविष्य का जो विस्तृत आकार धारण करने वाला था उसके नॉर्म्स एंड रूल्स एंड रेगुलेशंस एंड कन्वेंशंस एंड यह जो उसकी ट्रेडिशंस है वो वराह नगर मठ से उसका एस्टैब्लिशमेंट प्रारंभ हो गया था। तो वही संघ पर्व इसके बाद में स्वामी जी बराह नगर मठ त्याग करके पूरे भारत में तपश्चर्या करते-करते और भारत की परिस्थिति का दर्शन करते-करते उन्होंने जो भ्रमण किया वह फेस पूरा है भारत पर्व 1890 से 1893 1893 में स्वामी जी अमेरिका गए वही फेमस वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में उन्होंने प्रवचन दिया दैट इज विजय पर्व 1893 टू टू 1896 अमेरिका में जो स्वामी जी ने दिन बिताए उसके बाद में उद्योग पर्व स्वामी जी भारत में वापस आए तब से लेकर के 1902 कि उन्होंने सिर्फ रामकृष्ण संघ रामकृष्ण मिशन की स्थापना की ऐसे फॉर्मल कॉरपोरेट बॉडी के रूप में स्थापना तो वैसे वराह नगर काशीपुर में हो ही गई थी जिसको कि वराह नगर मठ में वराह नगर में एक इंस्टीट्यूशनल फॉर्म दिया गया था किंतु एक कॉर्पोरेट बॉडी के के रूप में भारत सरकार के लॉस के अनुसार जो एक स्थापना करनी थी वो हुई यहां पे स्वामी जी के भारत में आने के बाद उद्योग पर्व में और सिर्फ बात यह नहीं है कि रामकृष्ण मिशन की स्थापना की यह जो 1000 साल से जो भारतवासी यह जो तमस रूपी निद्रा में निद्रित थे उनको जगाने का कार्य भी स्वामी विवेकानंद ने किया। सो दैट इज व्हाई यह उद्योग पर्व 1897 कि अमेरिका से भारत प्रथम बार आए तब से लेकर के उनकी महासमाधि तक और उसके बाद में फिर मां का मिनिस्ट्री स्टार्ट होता है। मां का गुरु भाव प्रारंभ होता है 1902 से 1920। सो दिस इज कि एंटायर फ्रेमवर्क कि जिसके भीतर में हम अपने संघ के जो आइडियाज है उसका इवोल्यूशन देखना है जिससे कि क्या हो कि अपने मन में अननेसेसरी क्लेश प्रारंभ ना हो कि ठाकुर ने ऐसा किया था तो स्वामी जी ऐसा क्यों कर रहे हैं ठाकुर ने ऐसा कहा था तो स्वामी जी ने इस तरह से क्यों कहा है इवन हमको तो पता है कि स्वामी जी जब प्रथम बार भारत आए थे अमेरिका से और यह जो कर्म योग का उन्होंने प्रारंभ किया था। इवन स्वामी जी के गुरु भाइयों के कुछ-कुछ गुरु भाइयों के मन में संदेह प्रकट हो गया था कि ठाकुर के कहे अनुसार ठाकुर की जीवनी के अनुसार तो स्वामी जी कार्य नहीं कर रहे हैं। किंतु देखिए कि ठाकुर के जीवन को आप वो पाइवोटल मोमेंट है शोडशी पूजा। उससे पहले का ठाकुर का जीवन और उसके बाद का ठाकुर का जीवन आप क्लियरली डिवाइड कर सकते हैं। इससे पहले ठाकुर साधना के विभिन्न जो क्षेत्र है, साधना के जो विभिन्न आयाम है, उसके जो विभिन्न स्ट्रीम्स है, उसमें वह सिद्धि प्राप्त करने में ही जैसे कि उनकी पूरी प्राणशक्ति लगी थी और शोडशी पूजा के बाद में यह जग जाहिर है कि ठाकुर किस तरह से भक्तों के घर जाकर के जब अंतरंग भक्तों का आगमन हुआ तो कथामृत में तो हम पढ़ते हैं। आज बलराम के वहां पर उत्सव है। कल कहीं ब्राह्म समाज का उत्सव है। कल कहीं परसों कहीं यह रामचंद्र दत्त है। और फिर यह सुरेश मित्र है। उन्होंने उत्सव का आयोजन किया है। यह ठाकुर बार-बार कोलकाता आते हैं दक्षिणेश्वर से और सिर्फ इतना ही नहीं भक्तगण भी नियमित रूप से दक्षिणेश्वर आते हैं कोलकाता से और ठाकुर कितना समय उनके साथ में बिताते हैं। मां के साथ में झगड़ा करते हैं कि मां तुम मुझे बेहोश करके मत रखना। मैं इन लोगों के साथ में हरि कथा तुम्हारा मां मां की बातें करके मैं आनंद करना चाहता हूं। सो इवन ठाकुर के जीवन में भी देखिए कि स्पष्ट रूप से ईश्वर साक्षात्कार वाला एक फेज है और फिर यह जन कल्याण का जगत कल्याण वाला फेज है। ऑफ कोर्स बहुत सारी डिबेट इसके बाद में प्रारंभ होती है कि पहला ईश्वर साक्षात्कार करें बाद में जन कल्याण करें वगैरह-वगैरह। सो दैट वी विल सी कि ये जो पूरा फ्रेमवर्क है विद इन दिस फ्रेमवर्क जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जाएंगे उतना ही हम देखते जाएंगे। सो दैट इज वन स्क्रीन कि मैं आपके साथ शेयर कर रहा हूं। इसके बाद

An Outline of Swami Vivekananda’s Life

में एक दूसरा है। मैं शेयर करता हूं आपके साथ में। [गला साफ़ करने की आवाज़] अभी यह जो है यह है कि विदिन दिस यह पर्व वगैरह जो है अपने इसके भीतर में हम स्वामी जी का जीवन जो कि हम इस सप्ताह देखने वाले हैं। हम कहां से कहां स्टडी करने वाले हैं। यह जो पूरा अपना ये क्लास है स्वामी जी के ऊपर में। तो देखिए कि स्वामी जी के खुद के जीवन को आप कुछ-कुछ 10 टॉपिक में बांट सकते हैं। 10 में से पहला टॉपिक है आप देखिए यहां पे चाइल्डहुड डेज कि स्वामी जी के बचपन के दिनों की घटनावली। यह पूरा हुआ है कि जब साधन पर्व चल रहा था ठाकुर का उस समय शक्ति पर्व जब चल रहा था उस समय यह सब स्वामी जी के बचपन के दिन बीते थे। इसके बाद में देखिए आनंद पर्व में हमको तो स्पष्ट रूप से पता है कि स्वामी जी ठाकुर के पास में आए और फिर जैसे कि ठाकुर और स्वामी जी के जीवन में एक तरह के जो गुरु शिष्य जो भाव है वो किस तरह से ठाकुर ने जैसे कि अपने पूरे प्राण ढाल करके स्वामी जी अपनी साधना में सिद्धि प्राप्त करें उसके लिए प्रयास किया था। तो एक सेकंड टॉपिक स्वामी जी के जीवन का कि जो ठाकुर के पास में सर्वप्रथम आए ठाकुर के ऊपर में संदेह भी है किंतु ठाकुर के ऊपर में प्रचंड श्रद्धा भी है। तो यह संदेह और श्रद्धा और फिर आनंद ऑफ कोर्स स्वामी जी इतने सुंदर सु गायक थे कि ठाकुर उनके गीत सुनकर के भजन सुनकर के समाधि में मग्न हो जाते थे और उनको देखकर के ये जो भाव और आध्यात्मिकता की जो तरंग बहती थी। उस तरंग में स्नान करके नहा करके स्वामी जी भी जैसे कि आध्यात्मिकता से भरपूर हो जाते थे। तो वह पहले दिनों की बातें अह सेकंड टॉपिक में थर्ड टॉपिक हम देखेंगे कि स्वामी जी के जीवन में स्ट्रगल प्रारंभ होती है। जबकि उनके पिताजी का मृत्यु होता है। एकाएक उनको पता चलता है कि वह जो रिलेटिव कंफर्ट में रह रहे थे, वह सिर्फ एक इल्ल्युजन ही था। उनके पिताजी ना ही घर के लिए कुछ बंदोबस्त करके गए हैं। सिर्फ इतना ही नहीं कि कोई बैंक बैलेंस जैसा कुछ बचा था। किंतु साथ में यह लोग ऋण में भी थे और फिर इतना ही नहीं अपना जो पैतृुुक निवास जो है एनसेेस्ट्रल होम उसको भी छोड़ना पड़ा था। तो यह सब स्वामी जी के जीवन की जो स्ट्रगल है वो स्ट्रगल करतेकरते स्वामी जी के कलमिनेट कहां पर होती है? नरण काली मैंने ठाकुर कहते हैं ना कि नर ने मां काली को स्वीकार किया है। तो वह काली को स्वीकार करके स्वामी जी की यह स्ट्रगल है वह परिसमाप्ति होती है। यानी कि पहले दो टॉपिक जो है आनंद पर्व के स्वामी जी के जीवन के पहले जो पहले टॉपिक में तो कि ठाकुर पे संदेह है। मां काली पे संदेह है। श्रद्धा है किंतु संदेह भी है। और फिर सेकंड टॉपिक में संपूर्ण आत्मसमर्पण और इसके बाद में आत्म प्रकाश पर्व में फोर्थ टॉपिक जो है कि एक बार सरेंडर कर दिया स्वामी जी ने संपूर्ण रूप से शरणागति स्वीकार कर दी तो फिर साधना का उच्च आयाम प्रारंभ होता है। वह उच्च जो उनकी जो साधना है जो उर्ध्वगति की ओर उनको ले जाती है। निर्विकल्प समाधि में कलमिनेट होती है। यहां पर निर्विकल्प समाधि प्राप्त करते हैं और उसके कुछ ही समय के बाद में श्री रामकृष्ण देव पंचमहाभूत का जो देह है उसको त्याग करते हैं। इसके बाद में ठाकुर के देह त्याग के बाद में महासमाधि के बाद में स्वामी जी का गुरु भाव प्रारंभ होता है। और यह उसका जो संघ पर्व में यह जो टॉपिक है वराह नगर मठ के दिनों की बातें भारत पर्व यानी कि स्वामी जी प्रवरज्या के लिए पूरे भारत में उन्होंने भ्रमण किया था। विजय पर्व अर्थात कि फर्स्ट विजिट टू द वेस्ट उद्योग पर्व में तीन टॉपिक है। भारत में वापस आए। रामकृष्ण संघ की स्थापना की। भारत को जैसे कि तमस से जागृत किया। भारतवासियों को भारत को नहीं तमस रूपी निद्रा से जागृत किया और उसके बाद में सेकंड विजिट टू द वेस्ट और फिर रिटर्न टू इंडिया इन द लास्ट डेज। तो अभी जो हम यहां स्वामी जी के जीवन का जो स्टडी कर रहे हैं उसमें यह जो पूरा पीरियड है स्वामी जी के गुरु भाव उसको ही हम लेंगे। इसके पहले के जो चार टॉपिक है स्वामी जी के बचपन के दिनों की घटनावली और फिर श्री रामकृष्ण देव के साथ में प्रारंभिक दिन स्वामी जी की स्ट्रगल पिताजी की मृत्यु के बाद में मां काली को एक्सेप्ट करने के बारे में वह पूरी स्ट्रगल और फिर उन्होंने मां काली को स्वीकार करके श्री रामकृष्ण देव को स्वीकार करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त की वो वो जो चार टॉपिक है उसको अभी हम स्किप कर देते हैं। जब हम ठाकुर का जीवन स्टडी करेंगे, उस समय हम यह चार टॉपिक स्वामी जी के ले लेंगे। हम लोग प्रारंभ कर रहे हैं वराह नगर मठ से संघ पर्व से स्वामी जी का जीवन। तो यह एक ओवरऑल फ्रेमवर्क हो गया कि हम स्वामी जी के जीवन को और रामकृष्ण भावधारा है। उसको किस तरह से एक फ्रेमवर्क बनाकर के एनालिसिस कर रहे हैं। तो यह हो गया अभी वराह नगर मठ। यहां जो फिफ्थ टॉपिक मैंने लिस्ट किया है संघ पर्व का उसमें मैं चेंज करता हूं यह प्रेजेंटेशन यस एस यू कैन सी कि वराह नगर मठ के दिनों की जो घटनाएं हैं उसको हमने कुछ-कुछ चैप्टर्स में बांटा है उसमें जो सर्वप्रथम जो चैप्टर है वह है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद के कुछ दिन है जो कि काशीपुर के जो लास्ट डेज है कि 16 से 30 अगस्त 1886 वो वाले दिन यह चैप्टर हमने ऑलरेडी देख लिया है कि किस तरह से ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां को ठाकुर का दर्शन होता है। किस तरह से नरेंद्र को भी ठाकुर का दर्शन होता है। अर्थात कि ठाकुर की विदा से उनके हृदय में जो एक डर जैसा एक प्रवेश कर गया था। एक संदेह संदेह तो नहीं कहेंगे किंतु एक जो ए्जायटी है वह जो प्रवेश कर गई थी कि अभी ठाकुर तो चले गए किंतु हम सबको जो इकट्ठा करके गए हैं तो हम सबका क्या होगा तो ठाकुर के दर्शन से ही यह संदेह जो 01% भी किसी के हृदय में होगा वो मिट गया सब ने ठीक किया कि संघ होकर के रहना ही है किंतु किस तरह से रहे कहां पर रहे वह सब गढ़मथल वो सब चिंतन चल रहा था तो उसी के समय उसी समय ये ये सुरेश मित्र है। सुरेश मित्र को ठाकुर ने आकर के दर्शन दिए कि देखो कि मेरे लड़के जो है इधर-उधर भटक रहे हैं। तुम इनके लिए क्या कर रहे हो? तो वो जो सेकंड चैप्टर है अर्ली डेज ऑफ वराह नगर मठ अगस्त से दिसंबर 1886 यह चैप्टर भी हमने पूरा देख लिया है कि वराह नगर मठ की स्थापना हुई। कि सुरेश मित्र ने जो डोनेशन दिया जो दान दिया उसमें से और फिर किस तरह से वहां पर आहार का बंदोबस्त था किस तरह से सब शौचागार परिष्कार करना यह जो शौच जाने की जगह है वो किस तरह से ये लोग परिष्कार करते थे वो कुछ-कुछ सुंदर घटनाएं हमने इस समय देखी है। तो यह सेकंड चैप्टर भी हमने पूरे-पूरा देख लिया है। अभी हम थर्ड चैप्टर की ओर चलते हैं। मैंने इसको टाइटल दिया है कंफर्मेशन ऑफ फेथ। ये क्रिस क्रिसमस ईव से लेकर के विजा होम तक की ये कहानी है। देखिए फिर से एक बार दोहरा देता हूं। ये जो वराह नगर मठ के भीतर के तीन चैप्टर दो चैप्टर जो ऑलरेडी देख लिए। ठाकुर की महासमाधि के बाद के कुछ दिन जबकि ये अस्थि को लेकर के कुछ चल रहा था। फिर यह गृहस्थ और त्यागी संतानों के बीच में एक तरह की दरार प्रकट हो गई थी। एक आईडियोलॉजिकल डिफरेंस प्रकट हो गया था। किस तरह से गुरुही भक्तों ने यह रामचंद्र दत्त की आगेवाणी हेठ यह जो काकुड़गाची मठ है वहां पर जाकर के इकट्ठा हुए सब नहीं कुछ-कुछ चुनिंदा कुछ और यहां पे किस तरह से स्वामी जी और मां की लीडरशिप में यह त्यागी संतान और फिर कुछ भक्त है जैसे कि यह मास्टर महाशय वगैरह वे लोग वराह नगर के आसपास में वराह नगर मठ को केंद्रित करके उनका एक दल बना था और फिर किस तरह से वराह नगर मठ के अर्ली डेज जो है वह तपस्या त्यागमय अर्ली डेज थे। किंतु इसके बाद में ही दो महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। वराह नगर मठ की अर्ली हिस्ट्री में ही प्रारंभिक दिनों में ही जिसने कि रामकृष्ण भविष्य का जो रामकृष्ण संघ है उसको परिपुष्ट किया है। सर्वप्रथम घटना कि यह गुरु भाई जो है वह आठपुर गए थे। वहां पर क्रिसमस ई को जीसस का जो उपदेश है उसको लेकर के जीसस के जो एपोस्टल्स है सेंट पॉल सेंट पीटर वगैरह उन्होंने किस तरह से पूरी पृथ्वी में भ्रमण करके यह जीसस का जो न्यू टेस्टामेंट है न्यू मैसेज है उसको एस्टैब्लिश किया और किस तरह से इंस्टीटशंस प्रारंभ किया जो कि इंस्टीटशंस हजारों सालों तक एक ही आइडिया को लेकर के कार्यरत होता है और भविष्य की आने वाली वाली पीढ़ियों का यह जो एक तरह से चरित्र गठन करता है। तो वह जो पूरा आईडिया था इसको लेकर के स्वामी जी चर्चा कर रहे थे और स्वामी जी की जो उद्दीपनमय वाणी जो थी अग्नि गर्भमय वाणी उससे प्रेरित होकर के वो जितने भी त्यागी संतान वहां पर उपस्थित थे उन्होंने ठीक किया कि हां हम लोग भी इस तरह से अपने जीवन को श्री रामकृष्ण देव के उपदेशों की प्रचार के लिए हम लोग अर्पित करेंगे तो उसके बाद में पता चला कि जो जिस इवनिंग को जिस शाम को उन्होंने उन्होंने यह संकल्प किया था इट वास क्रिसमस ई 24 दिसंबर 1886 1896 सो 1886 तो यह एक आठपुर वाली घटना इंपॉर्टेंट है और उसके बाद में ही जब यह लोग वराह नगर मठ वापस आए ये त्यागी संतान तो उन्होंने विजा होम करके विधिवत सन्यास ग्रहण किया। तो यह जो दो इंपॉर्टेंट घटनाएं हैं, इस घटना को मैंने जिस चैप्टर में बांटा है, उसका नाम मैंने दिया है कंफर्मेशन ऑफ फेथ अर्थात कि श्रद्धा का दृढ़ीकरण। क्रिसमस यू टू वीर्जा होम दिसंबर टू फेब 1887।

Confirmation of faith: Christmas Eve to Viraja Homa : (Dec 1886 – Feb 1887) : 1) Naren’s Leadership

तो अभी हम इस चैप्टर को देखेंगे। इस चैप्टर का जो एक पहला पॉइंट है अह नरेंस लीडरशिप। किस तरह से यह चैप्टर प्रारंभ होता है। देखिए कि युगनायक में गंभीरानंद जी हमको कहते हैं कि ठाकुर ने कहा था कि यह जितने भी त्यागी संतान है उनकी लीडरशिप तुमको करनी होगी। ठाकुर ने स्वामी जी को कहा था और यह अपने घर ना चले जाए। सब लोग एक साथ में रहे। यह जिम्मा तुमको लेना होगा। तो नरेंद्र को ऑलरेडी एक तो घर का जो प्रॉब्लम है मां है, भाई है, बहन है उनको खाने की व्यवस्था करनी है। जो घर को लेकर के मुकदमा जो चल रहा है उस जो कोर्ट केस चल रहा है वहां पर उनको उपस्थित होना है। और यह जो इतना बड़ा एक सांसारिक बोझा लेकर के भी वो वराह नगर मठ को किस तरह से नरेंद्र परिपुष्ट कर रहा है। किस तरह से यह त्यागी संतान यदि इधर-उधर हो जाए तो उनको कैसे पकड़ पकड़ करके मठ में लाना है। इसके बारे में एक सुंदर पैसेज जो है अह गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं। मैं थोड़ा सा पाठ करता हूं। क्या लिखते हैं महाराज? कि दाना देर घर छिलो तहां देर साधन भजन ओ आलाप आलोचना दी प्रधान केंद्र अर्थात कि यह दाना दानव दैत्य दाना अर्थात कि दैत्य या तो दानव तो यह दानवों का जो कमरा था वही था उनके साधन भजन और आलाप आलोचना अर्थात कि वार्तालाप करने का प्रधान केंद्र यह दानवों का कमरा कहां पे तो वराह नगर मठ में एक कमरा था एक होल जैसा था। वहां पे ही बैठकर के यह गुरु भाई है। वह हंसी मजाक किया करते थे। साधन भजन किया करते थे। शास्त्र अध्यात्म को लेकर के उच्च चर्चा किया करते थे। वह सब उनका जो इंटेलेक्चुअल जो फोकस था इंटेलेक्चुअल एंड स्पिरिचुअल एपिसेंटर जो था वरह नगर मठ का वो था यह दानवों का कमरा। एकने नरेंद्रनाथ देवो दुर्लभ कंठे संगीत शून्या शकले मुग्ध होते यहां पर नरेंद्रनाथ के देव दुर्लभ कंठ से संगीत सुनकर के सभी मुग्ध होते भाबे विभोर होइते भाव में विभोर हो जाते हरि नाम कीर्तन आदि एकने हो तो हरि नाम और कीर्तन भी यहां पे होता आ संगीतो शिक्षखा शास्त्र पाठ भक्त दे शहीद श्रद्धालाप इत्यादि ओ ओ ग्रह खानी मुखर थकी तो और साथ में ही संगीत शिक्षा शास्त्र पाठ और भक्तों के साथ में सदालाप यह सबसे भी वह गृह जो है दानवों का कमरा वो बड़ा ही एक आध्यात्मिक तरंगों से भरा रहता आर ए शर्बोकार मध्यमणि छिलेन स्वयं नरेंद्रनाथ और यह सब कार्य के मध्यमणि थे स्वयं नरेंद्रनाथ सुंदर सुगठितोता हार समुन्नत और सबबल शरीर सुंदर सुगठित उनका समुन्नत और सबल शरीर समुन्नत अर्थात कि जो बुढ़ापे में देह झुक जाता है ऐसा नहीं सीधा चलने वाले सबल अर्थात कि सशक्त फिजिकली फिट सुंदर तो अर्थ समझ में ही आता है। सुगट अर्थात कि ये आज की लैंग्वेज में ये सिक्स पैक कहते हैं। [हंसी] अर्थात कि ये फिजिकली जो फिट होते हैं तो मसल जिस तरह से बनते हैं तो यहां पे भी सुंदर सुगठित उनका सम उन्नत और सबल शरीर उज्जवलताहार देह कांति उज्जवल थी उनकी देह कांति देह का जो वर्ण था उज्जवल था प्रशस्त ललाटे प्रतिभार चिन्ह सुंदर शब्द कितना सुंदर ये फ्रेज है प्रशस्त ललाट ललाट अर्थात कि ये फोरहेड ये फोरहेड प्रश प्रशस्त अर्थात कि वो सुपर विस्तृत था और उसमें प्रतिभा का चिन्ह था। प्रशांत बोधने विरत्व और दृढ़ संकल्प अंकितो प्रशांत वदन वदन अर्थात कि चेहरा प्रशांत चेहरे पे विरत्व और दृढ़ संकल्प अंकित थे। उनका चेहरा देखकर के श्री वदन देखकर के ही आपको विरत्व और फिर दृढ़ संकल्प का बोध होता था। आयत नयन ध्वय अपूर्व मोहिनी शक्ति यह सुंदर नयन ध्वय है उसमें थी अपूर्व मोहिनी शक्ति चलन बलनने एकटा शछंद और आत्मविश्वास पर परिस्ो चलन और चलने फिरने में उनके भीतर उनकी चाल चलन से एक स्वच्छंदता और आत्मविश्वास पर परिस्फुट होता था ये स्वामी जी का यह सुंदर विवरण है। स्वामी जी अमेरिका में थे। सेकंड टाइम अमेरिका में थे। कैलिफोर्निया में उनके मिशन का अंत आ ही चुका था। वो केम टेलर बोलकर के एक जगह पे है। वहां पर अपने कुछ सिलेक्टेड शिष्यों के साथ में वहां पे तपस्या करने के लिए गए थे। कहा कि जंगल में रहेंगे और भारतीय ऋषि मुनि जिस तरह से जप ध्यान साधन भजन करते हैं। ध्यान मेडिटेशन करते हैं हम लोग करेंगे। तो ठीक है। यह कुछ स्वामी जी के डिवोटी स्वामी जी के साथ में गए वहां पे कैंप टेलर में उस समय आईडा अनसेल जो थी उसको जाना था कैलिफोर्निया शहर में वापस इच्छा नहीं थी फिर भी जाना था उसको कुछ कार्य आ गया था तो स्वामी जी ने कहा अच्छा ठीक है चलो यहां पास में ही रेलवे का ट्रैक जाता है तो वैसे तो ऑफिशियल स्टेशन नहीं है ट्रेन रुकेगी नहीं किंतु फिर भी मैं तुमको ले जाता हूं हम लोग ऐसा फ्लैग ऑफ करेंगे ऐसा करके वेव वेव करेंगे तो ट्रेन खड़ी रह जाएगी तो उस ट्रेन में तुम चली जाना कैलिफोर्निया तो सैन फ्रांसिस्को तो शहर चली जाना तो ठीक है वो दोनों वहां पे गए वो ट्रेन का वो ट्रैक जो है रेल लाइन जो है वहां साइड में खड़े रहे जैसे ही वो ट्रेन आ रही है स्वामी जी ऐसा करके वो हाथ हिलाते हैं तो ये ट्रेन का जो आईड आंसल लिखती है कि जैसे वो ट्रेन खड़ी रही ना उसने यह ट्रेन के ड्राइवर का ड्राइवर की बात सुनी वो ड्राइवर बोलता है हु इज दिस स्काई पाइल पायलॉट तो आइड हंसल लिखती है कि यह शब्द मैंने पहली बार सुना स्काई पायलॉट व्हाट टाइप ऑफ वर्ड इज दिस ये किस तरह का शब्द है किंतु देखिए कि यह जो स्वामी जी ऐसा वहां पर खड़े थे और ये क्यों इस ट्रेन के ड्राइवर जिसको कि ना ही हिंदूइज़्म के साथ में कोई लेना देना ना ही भारतीयों के साथ में कोई लेना देना स्वामी जी का नाम पूरे जन्म में उसने कभी ना ही पहले सुना होगा ना ही बाद में सुना होगा वो ट्रेन का पायलट भी एक ही दृष्टि में स्वामी जी को वो जैसा ऐसा हाल वो जो वहां पे खड़े रह के ऐसा जो हाथ हिलाता है वो हिलाते हैं वो देखकर के ही जैसे ऑटोमेटिक उसके मुंह में यह बात आ गई हु इज दिस स्काई पायलट तो आइड आंसर लिखती है दिस इज अ कंप्लीटली न्यू एक्सप्रेशन फॉर मी कि स्काई पायलट का अर्थ क्या है समथिंग अब अभी अभी क्या है देखिए वहां के लोगों की मेंटालिटी जिस तरह की होती है तो यह जो ये जो पूरा है ना कि सुंदर सुगठित और समुन्नत सबल शरीर उज्जवल उनकी देह कांत प्रशस्त ललाट और उस ललाट पर प्रतिभा का चिन्ह प्रशांत वदन में विरत्व और दृढ़ संकल्प का अंकित होना आयत नयन ध्वय में अपूर्व मोहिनी शक्ति होनी और चलन चाल चलन में एक स्वांद्य और आत्मविश्वास पर परिस्फुट होना यह यह जो सब कुछ ये जो सुंदर डिस्क्रिप्शन जो गंभीरानंद जी महाराज ने लिखा है वो अमेरिका का रेलवे का ट्रेन ड्राइवर उसको इस सब चीजों से कोई मतलब कहीं पे भी उसको आध्यात्मिकता से इंडियन स्पिरिचुअलिटी से कहीं पर कोई संपर्क नहीं था। किंतु यह सब पूरा डिस्क्रिप्शन एक ही नजर में उसने पहचान करके स्वामी जी के बारे में यह शब्द प्रयोग किया। सो वी कैन इमेजिन कि जो लोग स्वामी जी का दर्शन करते होंगे तो यह जो पूरा डिस्क्रिप्शन है, यह उनको किस तरह से दिखता होगा। आगे क्या लिखते हैं महाराज? अथच वेशभूषाय वैराग्य सुस्पष्ट छाप यह इतना सब होने के बाद में भी स्वामी जी की जो वेशभूषा है उसमें वैराग्य की सुस्पष्ट छाप है। देखिए यह यही बात ठाकुर भी करते हैं। सेम वो जो ट्रेन ड्राइवर ने स्वामी जी को देखकर के एक ही नजर में उनको पहचाना और ठाकुर की भी तो अंतर्दृष्टि थी। ऑफ कोर्स वो कहां अमेरिका का ट्रेन ड्राइवर कहां ठाकुर किंतु ठाकुर कहते हैं अपने मुंह से यह बात कहते हैं लीला प्रसंग में वर्णन है क्या करते हैं ठाकुर कि नरेंद्र जब पहली बार आया था दक्षिणेश्वर हालांकि नरेंद्र को तो ठाकुर वो सुरेश मित्र के घर पे ऑलरेडी मिल चुके थे किंतु यह पहली दक्षिणेश्वर मुलाकात की बात ठाकुर कहते हैं। क्या कहते हैं कि इसी दरवाजे से नरेंद्र ने कमरे के भीतर में प्रवेश किया। देखा कि उसकी वेशभूषा है। वो उसका उसने जो शॉल वगैरह जो पहना है वो सब ऐसा है जिस जैसे कि उसके प्रति कोई दृष्टि ही नहीं है। वो उसकी वेशभूषा के ऊपर में कैसी भी हो उसको ठीक-ठाक अपने देह को रखना है। ठीक-ठाक वस्त्र पहनने हैं। वो सब चीजों के प्रति कोई दृष्टि नहीं है। मन है जैसे कि पूरा अंतर्मुख उर्ध्व दृष्टि तो ठाकुर कहते हैं कि ये जो भोगवादी कोलकाता नगरी है उसमें इतना बड़ा सात्विक आधार किस तरह से हो सकता है तो ठाकुर भी तो ये वेशभूषा को लेकर के है कि उसके पहने हुए कपड़ों के प्रति नरेंद्र की कोई भी दृष्टि नहीं थी। सो पहली ही दृष्टि में जो स्वामी जी अपना एक इंप्रेशन इस तरह से खड़ा करते थे। अथच वेशभूषाए वैराग्य सुस्पष्ट छाप इतना सब होने के बाद में भी वेशभूषा में पहनने के कपड़ों में वैराग्य की सुस्पष्ट छाप थी और आचार व्यवहार अकपटता उनका जो आचरण था उनका जो व्यवहार था अकपट था किसी भी तरह की कपटता नहीं किसी भी तरह से मेशियस इंटेंशन नहीं किसी भी तरह का हिडन एजेंडा नहीं मन मुख एक करा। ठाकुर जैसे कि कहते हैं कि वाणी और मन और वचन को मन और वाणी को एक करना। जो हृदय में है वही मुंह पे बोलना। जो मुंह पे बोलते हैं वही हृदय में होना। और जो हृदय में है मुंह पे बोलते हैं उसी को जैसे कि आचरण में लाना। तो यह जो स्ट्रेट फॉरवर्डनेस थी तो इसीलिए कि आचार और व्यवहार में अकपटता थी। सौहार्द्य ओ अपर प्रति श्रद्धा चिर प्रकटितो सौहार्द्य अर्थात कि फ्रेंडलीनेस और अपर प्रति श्रद्धा अर्थात कि दूसरों के प्रति श्रद्धा चिर प्रकटित अर्थात कि हमेशा प्रकटित होती रहती थी। अभी यह जो स्टेटमेंट है, उसका एक ऑोजिट डिस्क्रिप्शन हमको पता है कि शरद महाराज हमको देते हैं। शरद महाराज स्वामी शारदानंद ठाकुर ने कहा कि तुम जाकर के नरेंद्र को मिलना और ठाकुर कहते हैं कि जिनका एक सिमिलर जो नेचर होता है ऐसे लोगों को मैं मिला देता हूं। जिससे कि दोनों की आध्यात्मिक उन्नति हो। तो वैसे ही ठाकुर अपने जो त्यागी संतान थे उनको एक के आपस में मिला देते थे। आपस में भिड़ा देते थे। तो गंगाधर महाराज को कहा था कि जाकर के नरेंद्र को मिलना। ये गंगाधर महाराज बड़े आचारी थे ना ये वो ये स्नान करना फिर वो तेल नहीं लगाना फिर वो जो ये क्या-क्या सब उनके आचार थे तो ठाकुर उनको कहा प्राणायाम करना लंबे समय तक वगैरह वगैरह तो ठाकुर ने कहा था कि गंगाधर को नरेंद्र को जाकर मिलना वो 100 पान खाता है जो इच्छा हो वही खा लेता है किंतु उसका मन है संपूर्ण रूप से ईश्वर में निर्भर है तो यहां पे शरद महाराज को शारदानंद जी को भी कहा कि जाकर के नरेंद्र से मिलना। तो जब जैसे ही शरद महाराज नरेंद्र को मिले तो वैसे ही चौंक गए। यह वही लड़का है क्या? वही [हंसी] वही लड़का अर्थात कि एक्चुअली नरेंद्र को शरद महाराज पहले एक बार मिले थे। शरद महाराज अपने मित्र के वहां पर गए थे। जाकर देखा तो एक लड़का वहां पर बैठा था। वही नरेंद्र भविष्य का जिनके साथ में महाराज मिलने वाले थे। तो वह लड़का वहां पर बैठा है और शरद महाराज आए तो उनके साथ में ना ही उनके सामने देखता है ना ही उनके साथ में वार्तालाप करता है। तो ऑब्वियसली कोई आप एक कमरे में अपने मित्र का इंतजार कर रहे हैं कि वह अभी आएगा अभी मेरे साथ बात करेगा। तो जब दूसरा लड़का वहां पर होता है और आपको इग्नोर करता है तो अपने ईगो को थोड़ी सी तो ठेस पहुंचती है। तो शरद महाराज कहते हैं मुझे थोड़ा सा तो बुरा लगा कि जिस तरह से वो मुझे इग्नोर कर रहा है। थोड़ा सा एक फ्रेंडली ग्रीटिंग तो दे सकता था। किंतु नहीं नरेंद्र बस जैसे अपने में ही मत है। अपने में ही मस्त है। वो फिर उसका मित्र आया। तो अब शरद महाराज ऑब्वियसली अपेक्षा करेंगे कि वह मित्र को मिलने के लिए आए हैं तो मित्र थोड़ा सा तो उनके साथ वार्तालाप करें किंतु नहीं जैसे स्वामी जी ने नरेंद्र ने शरद महाराज को इग्नोर किया था वैसे ही उस मित्र ने भी शरद महाराज को इग्नोर करके इस नरेंद्र के साथ में ऐसा वार्तालाप में मत हो गया कि शरद महाराज अपने को नेगलेक्टेड फील करने लगे और फिर यह सोचने लगे कि किस तरह का यह लड़का है इतना घमंडी है इतना अपने को बड़ी एक तोप समझता है वगैरह-वगैरह तो जब नरेंद्र को पहली बार शरद महाराज मिले तो उन्होंने सोचा अरे यह तो वही लड़का है जिसको कि मैं घमंडी समझता था। किंतु जो भी है इसके बाद में शरद महाराज और स्वामी जी की जो मित्रता प्रारंभ हुई जग जाहिर सब किस्से हैं। किंतु यहां पे जब महाराज लिखते हैं कि सौहार्द्य और अपरे प्रति श्रद्धा चिर प्रगटितो तो सब केस में ऐसा नहीं होता था। ज्यादातर केस में था। किंतु कभी-कभी स्वामी जी इस अब क्योंकि क्या है कि मन जब इतना वैराग्य से परिपूर्ण रहता है। मन जब आध्यात्मिक या तो फिलॉसोफिकल एक उच्च कहेंगे कि शिखरों की ओर दौड़ता है। हायर थिंकिंग में मत रहता है। उस समय क्या होता है कि दूसरे लोगों का अस्तित्व है। कभी-कभी हम लोग भूल जाते हैं। सो ऐसा नहीं है कि स्वामी जी इंटेंशनली शरद महाराज को इग्नोर कर रहे थे या इंसल्ट कर रहे थे। वही बात है कि वो फिलॉसोफिकल कुछ पॉइंट को लेकर के चल रहा होगा उनके मन के भीतर में कुछ ना कुछ तो उसको लेकर के वो जैसे कि जगत ही भूल गए थे। तो वह एक चिंता तहार अद्भुत साहस जिस चिंता अर्थात कि विचार राज्य में स्वामी जी का अद्भुत साहस है और अद्भुत साहस इसका भी परिचय हमको तो यथेष्ठ पता है कि जब सभी ये प्रवीण ग्रही भक्त जो कि संसार में सक्सेसफुल थे। वे लोग जब त्यागी संतानों को कहा करते थे ठाकुर की महासमाधि के बाद में कि घर चले जाओ बस यह पर्व समाप्त हुआ मां पिताजी की सेवा करो संसार करो नौकरी करो यह सब कह रहे थे तो स्वामी जी ने पूरे संसार के सामने खड़े रहकर के रामकृष्ण वराह नगर मठ की जो स्थापना की दैट इज रियली कि उनको एक अद्भुत साहस चाहिए वरना तो यह सब होगा नहीं गांभीर्य ओ भयोद दर्शनेर समावेश गंभीरता और प्रिय दर्शन का उनमें समावेश था। कारजे महावीर सदृश्य क्रांतिहीनता ओ गुरु भक्ति कार्य में थी महावीर की तरह महावीर सदृश्य क्रांतिहीनता क्रांति अर्थात कि थकावट थकावट नहीं लगना क्रांतिहीनता यानी कि टायरलेसनेस टायरलेसली ही गोज ऑन वर्किंग जैसा हम इंग्लिश में कहते हैं क्रांतिहीनता टायरलेसनेस और गुरु भक्ति तो एक ही सेंटेंस मा मैंने देखिए कि कभी-कभी हम स्वामी जी के बारे में पूरे-पूरे एस्स पढ़ते हैं। पूरे-पूरे आर्टिकल पढ़ते हैं। पूरी-पूरी किताब पढ़ते हैं। जिसमें कि यह प्रयास किया गया है कि स्वामी जी के चरित्र, उनकी प्रतिभा, उनका जो सुदेह, उनका जो श्री अंग था, उसका वर्णन करें। हमको लगता है कि शब्द कम पड़ जाते हैं। किंतु यहां पर सिर्फ एक ही सेंटेंस में गंभीरानंद जी ने कितना सुंदर रूप से स्वामी जी का वर्णन किया है। तो आज यहीं तक अभी कल फिर से स्टार्ट करेंगे। इस सप्ताह स्वामी जी का ही जीवन पूरा देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम