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श्रीरामकृष्ण भावप्रवाह: पवित्र और उदार-हृदय | गुरु पूर्णिमा 2025 | 10 jul 2025

invocation

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन उसमें स्वामी जी हमको बता रहे हैं कि उनका जो एक प्लान है उनके प्लान का जो कोर कांसेप्ट है वह है कि ऑर्गेनाइजेशन या तो फिर इंस्टीट्यूशन प्रारंभ करना और इस इंस्टीट्यूशन के माध्यम से यंग लड़कों को तैयार करके ट्रेन करके स्पिरिचुअल साइंस में ट्रेन करके गांवगांव शहरश घरघर भेजना ईश्वरीय वाणी का प्रचार करने के लिए। तो यह हमने कल देखा था। आज मैंने कथामृत में से एक पैसेज को सिलेलेक्ट किया है। हमारा जो टॉपिक चल रहा है उसके साथ में उसका काफी अच्छे से मेल बैठ जाता है। और दूसरी बात कि आज गुरु पूर्णिमा है तो ठाकुर की वाणी ठाकुर स्वयं अपनी यह जो आध्यात्मिक शक्ति है हमको किस तरह से देना चाहते थे चाहते हैं उसका एक हमको अंदाज आएगा। तो यह कथामृत का पैसेज है 5th अक्टूबर 1884 यह समय है और यह काली पूजा के आसपास का ही समय है। श्री रामकृष्ण केशव और ब्रह्म समाज समन्वय उपदेश यह जो परिच्छेद है उसका टाइटल है श्री रामकृष्ण केशव और ब्रह्म समाज समन्वय उपदेश और उसके नीचे में इंग्लिश में मास्टर महाशय ने लिखा है यूनिवर्सल कैथोलिक चर्च ऑफ श्री रामकृष्ण श्री रामकृष्ण का यूनिवर्सल और कैथोलिक चर्च यूनिवर्सल यानी कि जो कि सबको अपनी वो बाहों में अपने आलिंगन में आवृत कर देता है। अपने हृदय में स्थान दे देता है। कैथोलिक का जनरल मीनिंग होता है लिबरल। तो एक लिबरल और यूनिवर्सल चर्च अर्थात कि ऑर्गेनाइजेशन। तो श्री रामकृष्ण की दृष्टि से अपना जो इंस्टीट्यूशन है उसका जो मुख्य बिंदु है या तो फिर उसके कोर कांसेप्ट है वह क्या होने चाहिए? कल हमने कुछ देखे थे। आज हम श्री रामकृष्ण की ही वाणी में श्री रामकृष्ण के साथ के ही वार्तालाप में देखेंगे कि इंस्टीट्यूशन कैसा होना चाहिए।

श्रीरामकृष्ण का दिव्य आकर्षण

श्री रामकृष्ण मणिर प्रति मणि अर्थात कि मास्टर महाशय तो मास्टर महाशय को श्री रामकृष्ण कहते हैं अच्छा लोग जे ए तो आकर्षण होए आशे एक खाने तार माने कि लोग जो इतने आकर्षित होकर के यहां पर आते हैं इसका अर्थ क्या है तो मणि क्या उत्तर देते हैं आार ब्रजेर लीला मने पड़े मुझे यह ब्रज की लीला है वह याद आ जाती है ब्रज की लीला अर्थात कि भगवान कृष्ण की लीला कृष्ण जोखन राखाल आर बोलेन तो राखाल दे ऊपर गोपी देर आर बोछो देर ऊपर गाभ दे बे आकर्षण होते लाो भगवान कृष्ण स्वयं राखाल बालक जितने भी राखाल अर्थात कि यह गोप बालक थे भगवान कृष्ण ने अपने को मल्टीप्लाई करके या तो फिर वहां के जो गोप बालक थे उनके भीतर में प्रवेश करके अपना स्वरूप वहां पर प्रकट किया गोप बालकों के भीतर में और यह जो गाय के बच्चे होते हैं वत्स उनके भीतर में तब क्या हुआ गोपियों का राखाल अर्थात कि यह सभी लड़के जिनके भीतर में भगवान कृष्ण प्रकट हुए थे उनके ऊपर में उनका प्रेम बढ़ गया और जो गाय थी उनका अपने खुद के वैसे तो खुद के संतान होते हैं। उनके प्रति प्रेम भी होता है। किंतु जब भगवान कृष्ण स्वयं उनके भीतर में प्रकट हुए जो दिव्यता का प्रकाश फैला तो गायों का अपने संतानों के ऊपर में प्रेम बढ़ गया। इसीलिए ठाकुर क्या कहते हैं कृष्ण जो राखाल आर बोलेन भगवान कृष्ण जब राखाल और वत्स अर्थात कि गाय के बछड़े हुए थे तो राखाल देर ऊपर गोपी देर तब राखाल के ऊपर में गोपियों का और बछो देर ऊपर गाभ देर अर्थात कि वत्स बछड़ों के ऊपर में गायों का बेशी आकर्षण होते लाो ज्यादा आकर्षण बढ़ गया देखिए देखिए मास्टर महाशय क्या कहना चाहते हैं? सबसे पहले तो ठाकुर ने प्रश्न किया कि यहां पर मेरे पास में जो इतने जो भक्त लोग आते हैं और अभी तो ज्यादातर भक्त नियमित हो चुके थे। यह देखिए कि 1884 का ऑलमोस्ट अंत आ चुका है। हमको पता है कि ठाकुर की यह जो अंत्य लीला यह जो आत्म प्रकाशय अभयदान अर्थात कि जब से कैंसर का प्रारंभ होगा तब से लेकर के ठाकुर की महासमाधि तक का अपने शिष्यों को लेकर के एक इंटेंसिव पीरियड जाने वाला है। जिसमें कि ठाकुर उनके जितने भी अंतरंग शिष्य हैं उनको एक उच्च आध्यात्मिक सुर पर बांध देने वाले हैं। तो वो पीरियड अभी ज्यादा दूर नहीं है। ठाकुर को कैंसर का प्रारंभ हुआ था 1885 के ग्रीष्म ऋतु में गर्मी के सीजन में और यह ऑलरेडी 1884 का अंत समय आ चुका है। यानी कि अपने सुस्त देह में ठाकुर अभी पांच छ सात महीने से ज्यादा समय नहीं रहने वाले हैं। दूसरी ओर हमको पता है कि एक बार जब नरेंद्र तैयार हो जाता है ठाकुर को अपने गुरु के रूप में स्वीकार करने के लिए तब माने दो साइन है। ठाकुर की अंत्य लीला कब से प्रारंभ होती है? सर्वप्रथम तो जब नरेंद्र उनके ऊपर में संपूर्ण रूप से आश्रित हो जाता है और दूसरा कि ठाकुर को जब कैंसर प्रारंभ होता है। जैसे ठाकुर ने मां को खुद को कहा था ना कि मैं जब कोलकाता में जिस किसी के घर रात बिताऊंगा जिस अपना अग्रभाग किसी को देकर के मैं जब खाना खाऊंगा यह जो सब साइन बताई थी तब जानना कि मेरा अंतिम समय आ चुका है। तो वो अपने गंभीरानंद जी की जीवनी में मां की जीवनी में हमने देखा कि एक बार नरेंद्र वहां पर आया हुआ था दक्षिणेश्वर और फिर जब ठाकुर ने कहा कि अच्छा इसमें से ही उनके ठाकुर के लिए जो आहार बनाया है उसी में से नरेंद्र खाएगा तब मां ने बड़ी आपत्ति उठाकर के कहा था कि क्यों ऐसा कर रहे हैं? मैं नरेंद्र के लिए अलग से खाना बना देती हूं। तो ठाकुर कहते हैं नहीं तो उसको खिला के खाने में मुझे कोई आपत्ति बोध नहीं लग रहा है। मुझे कुछ अननेचुरल कुछ नहीं लग रहा है। ऐसा जब ठाकुर ने कहा तब मां को अपने हृदय में यह पता चल गया था कि ठाकुर की अंत्य लीला प्रारंभ हो चुकी है। तो यह ठाकुर की अंत्य लीला का ऑलमोस्ट अभी समय आ चुका है। उस समय यह बात हो रही है। इसका अर्थ यह हुआ कि ठाकुर के पास में जो भक्त ठाकुर के पास में जो अंतरंग संतान गण आने वाले थे उनका ऑलमोस्ट आगमन हो चुका है और ठाकुर उनको एक इंटेंसिव ट्रेनिंग देने वाले हैं। उस समय ठाकुर जब प्रश्न करते हैं कि अच्छा मेरे पास में जो इतने सारे भक्त आते हैं और वह भी नियमित आते हैं। इसका क्या अर्थ है? तो मास्टर महाशय क्या उत्तर देते हैं कि मुझे ब्रज की लीला याद आ जाती है जिसमें कि भगवान कृष्ण गोप बालकों के भीतर में यह बछड़ों के भीतर में प्रवेश किए थे और इसकी वजह से गोप बालकों के ऊपर में और यह बछड़ों के ऊपर गोप बालकों के ऊपर में गोपियों का और यह बछड़ों के ऊपर में गायों का प्रेम बढ़ गया था। तो यह आकर्षण कब प्रकट होता है? जबकि भीतर में दिव्य तत्व प्रकट होते हैं। भगवान कृष्ण यदि किसी के हृदय में प्रकट होंगे तो उस व्यक्ति के प्रति हमारा आकर्षण तो बढ़ने ही वाला है। तो वैसे ही एग्जजेक्टली ऐसा यहां पर है कि भगवान रामकृष्ण के हृदय में भगवान कृष्ण भगवान राम वही आदि पुरुष नारायण स्वयं प्रकट हुए थे और इसीलिए भक्तों का श्री रामकृष्ण के ऊपर में आकर्षण इतना बढ़ रहा था। तो इसके उत्तर में ठाकुर क्या कहते हैं से ईश्वर आकर्षण वह ईश्वर का आकर्षण है कि जानो क्या जानते हो मां ए रूप भेल की लागी देन आर आकर्षण होए मां इसी तरह से मां अर्थात कि जगदंबा जगत जननी स्वयं मां इस तरह से भेल की लगा देती है यानी कि जादू टोना कर देती है जिसकी वजह से आकर्षण

श्रीरामकृष्ण और केशव सेन

होता है। अच्छा केशवसेनेर काचे जतो लोग जेतो एकने तो ततो आशे ना अच्छा केशवसेन के पास केशवसेन के पास में जितने लोग जाते थे इतने तो यहां पे आते नहीं है और केशवसेन के कतो लोग घने माने बिलाते पुर्जुन तो जाने और केशवसेन को तो कितने लोग रिस्पेक्ट करते हैं उसको कितने लोग मानते हैं विलायत में माने विलायत अर्थात कि ब्रिटेन में भी लोग उसको पहचानते क्वीन यानी कि रानी विक्टोरिया केशव शंगे कोथाकोए छ उस समय तो ब्रिटिश राज था और ब्रिटिश राज की वो जो सर्वोच्च ये जो ये होता है पोजीशन वो थी क्वीन विक्टोरिया तो क्वीन विक्टोरिया ने अपने से केशवसेन के साथ में बात की थी गीता तो बोल छे बोले छे जाके अनेके घने माने शेखाने ईश्वर शक्ति गीता में तो कहा है कि जिसको बहुत सारे लोग मानते हैं, स्वीकारते हैं। वहां पर ईश्वर की शक्ति है। एकने तो तत्व हो ना। यहां पे तो इतना होता नहीं है। देखिए जो ठाकुर जो अभी यहां पर क्या है? जैसे कथामृत में स्टार्टिंग में ही एक बार मास्टर महाशय, नरेंद्र और यह मास्टर महाशय का। ठाकुर क्या करते हैं? मास्टर महाशय और नरेंद्र का एक तरह से डिबेट स्टार्ट हो। इस तरह से वह प्रयास करते हैं। तो अभी यह दोनों लोग डिबेट कर नहीं रहे हैं। ठाकुर को देखना था कि दोनों का तर्क कैसा होता है। अंग्रेजी में तर्क कैसा होता है। तो जो ठाकुर दोनों को वो जैसे यह करते हैं ना ये करते हैं। एक्साइट करते हैं कि हां तुम इसके साथ डिबेट करो। इसके साथ में तुम तर्क करो। तो उस समय मास्टर महाशय कहते हैं कि ठाकुर ही इज आस्किंग लीडिंग क्वेश्चंस। अर्थात कि एक इस तरह का प्रश्न पूछ रहे हैं जिस तरह का प्रश्न करने से सामने वाले को कुछ उत्तर देना पड़े। हम लोग एक सामान्य वार्तालाप कर रहे हैं। उसमें मान लीजिए कि कोई एक व्यक्ति है वह कुछ बोल नहीं रहा है। तो हम लोग क्या करेंगे कि हम लोग चाहेंगे कि अच्छा उसको इस तरह से कुछ माने इस तरह का सेंसिटिव टॉपिक इस तरह से निकाला जाए कि जिससे वह बात करना शुरू कर दे। तो उसका साइकोलॉजी समझ करके आप इस तरह का एक प्रश्न करेंगे। वह प्रश्न जब करेंगे तो सामने वह वाला फटाफट करके बोलने लगेगा। ये शशोधर पंडित वो जब ठाकुर के साथ में बैठा है तो ठाकुर किसी को बोलते हैं एक-एक खोचा दाओ। इसको एक खोचा दो। खोचा का क्या अर्थ है? आप थोड़ा सा उसको पोक करेंगे। थोड़ा सा आप उसको आप एक तरह से यह करेंगे तो क्या है कि वह सामने से उसके भीतर में जो अमृत रूपी ज्ञान छुपा हुआ है वो बाहर निकलने लगेगा। तो यह क्या है कि एक लीडिंग क्वेश्चन एक सामने वाले को एक तरह से यह करना कि जिसकी वजह से वह कुछ बोले तो ठाकुर यहां पे भी मास्टर महाशय को एक तरह से लीडिंग क्वेश्चन कर रहे हैं। ठाकुर जानना चाहते हैं कि मास्टर महाशय के मन में क्या है? तो इसीलिए ठाकुर यहां पर कहते हैं कि वह जैसे कि मास्टर महाशय के भीतर की बात बाहर आए इसलिए ठाकुर इस तरह से पूछ रहे हैं। क्या पूछते हैं कि केशवसेन के पास में तो इतने लोग जाते थे तो यहां पर तो इतने लोग आते नहीं है और केशवसेन की सिद्धि देखो। उसकी प्रसिद्धि देखो। ब्रिटेन में, यूरोप में लोग उसको पहचानते हैं। क्वीन विक्टोरिया ने स्वयं उसके साथ में वार्तालाप किया है। और गीता में तो कहा है कि जिसको बहुत सारे लोग मानते हैं, जिसको बहुत सारे लोग रिस्पेक्ट करते हैं, वहां पर ईश्वर की शक्ति है। तो यहां पर तो इतना होता नहीं है। तो अभी देखिए कि हालांकि ऑफ़ कोर्स यह सब बातों का अभी यहां पे ठाकुर कहते हैं कि केशव को लोग विलायत में स्वीकार करते हैं। तो ठाकुर की महासमाधि के 10 साल के भीतर में पूरे विश्व में ठाकुर का नाम फैल गया था। स्वामी जी ने स्वयं कहा है कि जीसस की महासमाधि के बाद में 400 साल लगे थे पूरे विश्व में क्रिश्चियनिटी को फैलने के लिए। किंतु इस बार इस तरह की महाशक्ति ने जन्म लिया है कि विदिन द इयर्स ऑफ पासिंग अवे ऑफ श्री रामकृष्ण श्री रामकृष्ण देव की समाधि के सिर्फ 10 साल में इस महाशक्ति ने पूरी पृथ्वी की परिभ्रमण कर लिया है। तो यह शक्ति तो हमको पता है और यदि यह कहेंगे कि केशव के पास में इतने लोग आते थे आज देखिए कि ब्राह्म समाज का कहीं पर नामोनिशान नहीं है। ऑन दी अदर हैंड आज आप बेलूर मठ में दुर्गा पूजा के समय जाइए। शारदीय दुर्गा पूजा अभी आ रहा है। इवन आज का जो गुरु पूर्णिमा का उत्सव है। आप बेलूर मठ में जाकर देखेंगे कि कितने हजारों हजारों भक्त हमारे पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज का आशीर्वाद लेने के लिए बेलूर मठ में जाते हैं। और फिर यह जो आप कल्पतरु दिन को आप काशीपुर जाकर देखेंगे। कुमारी पूजा के दिन आप बेलूर मठ जाकर देखेंगे तो भीड़ देखकर के पता चलेगा कि देखिए कि रामकृष्ण मिशन और श्री रामकृष्ण के प्रति लोगों की कितनी श्रद्धा है। तो हमको तो पता है कि यहां पर केशव और ठाकुर का कोई कंपैरिजन नहीं है। और किंतु फिर भी ठाकुर सिर्फ यह देखना चाहते हैं कि मास्टर महाशय के भीतर में क्या है। तो मणि क्या उत्तर देते हैं? केशव सेनेर का छे संसारी लोग गए छ केशवसेन के पास में तो संसारी लोग गए हैं। यहां पर आपके पास में जो आ रहे हैं वह तो सब त्यागी है। देखिए

प्रारंभ के दिनों में रामकृष्ण संघ का संघर्ष

कि यह जो ठाकुर की और स्वामी जी की भी जो बात है। जब भी कोई भी एक मूवमेंट है, कोई भी एक संघ है, कोई भी एक भावधारा है, उसका जब फाउंडेशन डालना होता है तो पक्के लोग चाहिए। भले ही संख्या में कम हो किंतु वह जब उनका हृदय और उनका चरित्र पवित्र रहेगा। उनका यह जो मनोबल है उनका जो विल पावर है वह जब स्ट्रांग रहेगा उनकी ईश्वर के ऊपर में गुरु के ऊपर में जो भक्ति है वह दृढ़ रहेगी। तब वह जो भले ही संख्या में कम लोग होते हैं, वह इस तरह का मजबूत इस तरह का स्ट्रांग फाउंडेशन डालेंगे उस भावधारा का कि वह भावधारा इजीली भविष्य में कभी भी डिस्टर्ब नहीं होगी। उसको किसी भी तरह की हानि नहीं होंगी। ऑन दी अदर हैंड केशवसेन के साथ में तो क्या हुआ? हम सबको पता है कि उसकी लड़की का विवाह कुछ बिहार के राजा के वह लड़के के साथ में करवा दिया और उसी में यह विजय कृष्ण गोस्वामी और यह जो दो-तीन लोग थे इस तरह के शिवनाथ शास्त्री वगैरह उन लोगों ने सेपरेट होकर के फिर यह साधारण ब्राह्मण समाज की रचना कर दी और यह केशव जाकर के ठाकुर को कहता भी है कि महाशय इतना ही सिर्फ नहीं कि उन लोगों ने जाकर के एक सेपरेट समाज की रचना की है। वे लोग मेरे जो मेरे जो यह मेंबर्स थे मेरे समाज के उसको भी तोड़ कर के ले गए हैं और इतना ही नहीं मेरे विरुद्ध में समाचार पत्रों में वो लोग लिख रहे हैं वो भाषण दे रहे हैं। तो उसी समय ठाकुर ने उसको कहा था कि देखो तुम जो सोच समझ करके टेस्टिंग करके जब चेले नहीं बनाते हो तब ऐसा ही तो होगा। दूसरी बात देखिए कि अब मतलब इस तरह से तो ब्राह्म समाज में ऑलरेडी डिवीजन होना शुरू हो गया था। रामकृष्ण मूवमेंट के खुद के साथ में देखिए कि जब शुरू शुरू में बिल्कुल शुरूशुर में ठाकुर की महासमाधि के बाद में जिस तरह से भक्तों के बीच में एक तरह से डिवीजन ऑफ डिफरेंस ऑफ ओपिनियन होना स्टार्ट हुए थे। यहां पर रामबाबू एक बात कर रहे हैं। यहां पर नरेंद्र एक बात कर रहा है। किंतु ऐसा कभी नहीं हुआ कि हमारी मूवमेंट में इस तरह का कोई बहुत बड़ा दरार पड़ गया हो कि जिससे कि मूवमेंट इटसेल्फ थोड़ी सी कमजोर हो गई हो। ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ है। हमारे ऑर्डर में देखिए कि कितनी बार इस तरह की क्राइसिस आई है। ठाकुर की महासमाधि पहले तो पहली क्राइसिस तो ठाकुर के कैंसर होने से ही आ गई थी। कुछ-कुछ लोग थे। उन्होंने यह सोचना शुरू कर दिया कि अरे ठाकुर अपना खुद का कैंसर नहीं मिटा सकते तो फिर दूसरों को किस तरह से हेल्प करेंगे बोल के काफी लोग उस समय निकल गए थे तो ठाकुर ने क्या कहा कि भले ही चाहे यह जो कैंसर हुआ है उसका अर्थ है लोक बाछायर जन अर्थात कि लोगों को फिल्टर करने के लिए जो लोग सही-सही अंतरंग है वे लोग रह जाएंगे और जो सिर्फ तमाशा देखने के लिए आते थे या तो फिर ठाकुर से कोई बेनिफिट उठा लेंगे यह सोच के आते थे यह लोग निकल जाएंगे। तो फर्स्ट क्राइसिस तो वहां पर आई। उस क्राइसिस से हम आराम से पार हो गए। सेकंड क्राइसिस आई थी जब ठाकुर की महासमाधि हुई थी। और यह जो रामबाबू वगैरह कुछ गृहस्थ भक्त और यह फिर दूसरी ओर नरेंद्र वगैरह जो त्यागी संतान थे। इन लोगों के बीच में जब एक डिवीजन ऑफ एक डिफरेंस ऑफ ओपिनियन खड़ा हुआ। कुछ-कुछ लोग कहते हैं कि यह लड़कों को अभी अपने घर चले जाना चाहिए। मां-पिताजी की सेवा करनी चाहिए। यह झूठ-मूठ का यहां पर रह के क्यों यह इस तरह से आश्रम बनाते हैं वगैरह-वगैरह तो वह क्राइसिस भी जैसे ठाकुर की कृपा से वह पार हो गई। इसके बाद में हमको तो पता है कि यह जो वराह नगर मठ की स्थापना के बाद में सक्सेस के सफलता के एक के बाद एक सोपान हम सर करते ही गए। स्वामी जी जब अमेरिका से वापस आए तो पूरे भारत में जैसे कि ठाकुर का नाम फैल गया। रामकृष्ण मिशन स्वामी जी का नाम फैल गया। किंतु जब यही स्वामी जी की महासमाधि हुई तो अगेन एक तीसरा क्राइसिस खड़ा हुआ था। कुछ-कुछ लोग हैं। उनके मन में एक ऐसा बैठ गया कि राजा महाराज जिस तरह से संघ का परिचालना कर रहे हैं। संघ को जिस तरह से चला रहे हैं वह स्वामी जी के आदर्श के अनुसार नहीं है। जिस तरह से देखिए इसके पहले की एक क्राइसिस वो थी स्वामी जी और उनके गुरु भाइयों के बीच में जब स्वामी जी ने यह शिव ज्ञान जीव सेवा का यह जो मंत्र दिया तो कुछ-कुछ गुरु भाई थे वे लोग यह कहना शुरू कर दिए कुछ-कुछ ठाकुर के ही अंतरंग भक्तगण जिसमें कि यह मास्टर महाशय स्वयं आते थे उन्होंने ऐसा कहना या तो सोचना शुरू कर दिया कि ठाकुर ने तो कहा है कि कर्मकांड बाद में पहले तो शुद्ध भक्ति से ईश्वर का दर्शन हो ईश्वर ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त हो। बाद में जो कुछ करना है वह करना। कालीवाड़ी में काली मंदिर में यदि गए हैं तो पहले भिखारी को आप दक्षिणा देंगे कि कैसे भी करके धक्कामुक्की करके मां काली का दर्शन कर लेंगे। बाद में आप बाहर आकर के जो दक्षिणा देना हो दीजिए। कौन मना करता है? यहां पर नरेंद्र कहता है कि भिखारी को दक्षिणा देना। इट इज इक्विवेलेंट टू कि धक्कामुक्की करके आप मंदिर में जाकर मां काली को आप दर्शन करते हैं। तो यह कैसे संभव है? ठाकुर जो कह रहे थे या तो कह के गए थे उसका बिल्कुल ऑोजिट नरन कह रहा है। ऐसा कुछ संदेह लोगों के मन में उठा था। किंतु देखिए कि वही ठाकुर के यह स्वामी जी की शक्ति की वजह से कि ठाकुर की कृपा और मां स्वयं वहां पर थी उस समय यह जो आर्बिट्रेज करने के लिए यह जब यह लोगों में झगड़ा होता है तो हाई कोर्ट में से सुप्रीम कोर्ट में मामला जाता है तो यह सुप्रीम कोर्ट के रूप में मां शारदा स्वयं थी तो मां शारदा को तो मां शारदा ने स्वामी जी को सपोर्ट किया बोलकर के यह जो झगड़ा था वह भी मिट गया। झगड़ा नहीं करके जो डिफरेंस ऑफ ओपिनियन था वह भी मिट गया। अभी जब स्वामी जी की महासमाधि हुई तब यही बात एक रिवर्स रूप में प्रारंभ होना शुरू हुई थी। कोईकोई स्वामी जी के डिसाइपल मोस्ट प्रोबेबबली उसमें यह जोसेफाइन मैक्लड भी थी निवेदिता तो थी ही थी। माने निवेदिता उसका तो माने जग जाहिर है। उन लोगों के मन में ऐसा लगने लगा कि राजा महाराज जिस तरह से संघ की चालना कर रहे हैं वो स्वामी जी के जो बेसिक आइडियाज है उसके विरुद्ध में जा रही है। स्वामी जी कहां ये शिव ज्ञानी जीव सेवा ये 100 थाउजेंड मैन एंड वीमेन फायर्ड विद द ज़ील ऑफ होलीनेस वो ईश्वर की शक्ति से शक्तिमान होकर के 1 लाख नर नारी यंग लड़के वो घरघर जाकर के ये दिव्यत्व का मैसेज फैलाएंगे। कहां यह स्वामी जी का यह लोगों को उत्साहित करने वाला लोगों के हृदय और मन को परिपुष्ट करने वाला उपदेश था। नहीं यहां पर यह राजा महाराज है। चुपचाप यह सब लड़कों को मठ में बिठा के रखते हैं। कोई पूजा करता है। कोई भंडार में काम करता है। कोई ऑफिस में काम करता है। मतलब सबको रूटीन फॉलो करना है। घंटी बजने से मंदिर में जाना है। सुबह जप ध्यान करना है। यह सब क्या है? शास्त्र पाठ करना है। हालांकि स्वामी जी ने भी यह सब प्रारंभ करवाया था। किंतु स्वामी जी का वह वाला मैसेज जो था वो इतना पावरफुल था कि बाकी सब ढक जाता था। अभी बिकॉज़ के स्वामी जी की जो प्रचंड पर्सनालिटी थी वह जितने भी कंट्राडिक्शन होते थे छोटे-मोटे वो सबको जैसे कि वह स्टीम रोल करके चली जाती थी। अभी वह प्रचंड पर्सनालिटी राजा महाराज में थी नहीं। तो ऐसे कुछ-कुछ लोगों को लगने लगा कि बेलूर मठ जो है स्वामी जी के आदर्श से भटक गया है। तो चलिए कि ठाकुर की कृपा से वह मामला भी शांत हो गया। इसके बाद में जो एक क्राइसिस आई जब सब कुछ ठीक हो गया ऑर्गेनाइजेशन पर अपना कंट्रोल पूरे-पूरा आ गया था उस समय फिर यह बंग भंग की मूवमेंट स्टार्ट हुई कुछ-कुछ क्रांतिकारी लड़के वे लोग यह कहना शुरू कर दिए जिसमें कि यह निखिलंद जी थे हमको पता है कि राजा महाराज और बाबूराम महाराज वहां पे गए थे बांग्लादेश में ढाका में वहां पे कुछ क्रांतिकारी लड़के जिसमें कि निखिलंद जी भी थे उन्होंने जाकर के राजा राजा महाराज को कहा कि स्वामी जी को आपने ठीक से समझा नहीं है। अदरवाइज रामकृष्ण मिशन ही तो सर्वप्रथम यह क्रांति योग जो लोग हैं यह जो भारत का फ्रीडम मूवमेंट है सबसे बड़ा पहला उसमें कंट्रीब्यूशन तो रामकृष्ण मिशन का ही होना चाहिए। स्वामी जी को पढ़कर के तो हमको यही लगता है। तब यह बाबूराम महाराज नाराज होकर के बोले तुम क्या पागल जैसी बात कर रहे हो? जिनके साथ में हमने इतना समय बिताया, जिनके साथ में खाना खाया, जिनके साथ में साधना की, जिनके साथ में रहे। उस स्वामी जी को हम नहीं पहचानेंगे। तुम पहचाने साले वो घोड़ा हो ऐसा करके बाबू राम महाराज उसको कहते हैं। उनको घोड़ा बना करके उनकी पीठ पर बैठे तब कहीं जाकर के वो निखिल आनंद जी बाद में तो साधु हो गए। तो देखिए कि वो एक किंतु यह तो एक आइडियल सिचुएशन थी। अदरवाइज किंतु कुछ-कुछ लोगों के मन में यह बैठ गया था कि रामकृष्ण मिशन जो है उसको जिस तरह से कंट्रीब्यूशन करना चाहिए भारत के फ्रीडम में वो नहीं कर रहा है। किंतु देखिए कि अपने कांसेप्ट जो थे वो बड़े क्लियर थे और निवेदिता के साथ में जो रामकृष्ण मिशन या तो इवन स्वामी जी का जो डिफरेंस ऑफ ओपिनियन है वह भी धीरे-धीरे करके स्वामी जी के ही समय में यह स्पष्ट हो गया था। निवेदिता शायद सोचती थी कि यह जो पॉलिटिकल फ्रीडम जब तक नहीं मिलेगा तब तक भारत में यह आध्यात्मिक उन्नति करना संभव नहीं है। यानी कि जिस तरह से स्वामी जी सोचते थे शायद हो सकता है कि उससे रिवर्स निवेदिता सोचती होगी। स्वामी जी बार-बार कहते हैं माय प्लान ऑफ कैंपेन में कि पहले आध्यात्मिकता को फैलाइए और फिर यह आध्यात्मिकता के फाउंडेशन पे भारत में यह फ्रीडम पॉलिटिकल फ्रीडम आएगा। निवेदिता शायद ऐसा सोचती होगी कि पहले पॉलिटिकल फ्रीडम आए, पहले इकोनॉमिक प्रोस्पेरिटी आए, बाद में लोगों को धर्म सिखाइए। तो यह टिपिकल यूरोपियन थिंकिंग हो गया। तो इसकी वजह से निवेदिता को रामकृष्ण संघ छोड़ना पड़ा था। तो वो एक क्राइसिस था। तो चलो ठाकुर की कृपा से वो क्राइसिस भी पार हो गया। इसके बाद में यह जो सब रेवोल्यूशनरी लड़के जो थे वह रामकृष्ण मिशन के साथ में जॉइ होने को आ रहे थे। उस समय गवर्नमेंट को ऐसा संदेह हुआ कि रामकृष्ण मिशन जो है वह क्रांतिकारी गतिविधियों में पार्टिसिपेट कर रहा है। तो फिर रामकृष्ण मिशन के ऊपर में गवर्नमेंट की ये जो सीआईडी है उनकी नजर रहने लगी। कि वो तो जग जाहिर सब उदाहरण है कि मां जयराम बाटी में रहती है। वहां पर कोई भी लड़का मां के पास में दीक्षा लेने के लिए आता है और यदि वहां पर रात रहेगा तो गांव का एक चौकीदार है। वह आकर के उस लड़के का नाम पता लिख के जाएगा। सीआईडी की नजर है कि उन सबको पता है कि मां तो रामकृष्ण मिशन की ही पार्ट है। तो मां के पास में जो लोग आएंगे वह इसी तरह के क्रांतिकारी होंगे। वो एक फेमस एक सुंदर घटना है कि इसी तरह से एक लड़का मां के पास में आया। मोस्ट प्रोबेबबली यह क्वालपाड़ा की घटना है। तो केदार बाबू ने उसको कह दिया कि भाई तुम यहां पर रात को मत रहो। यह चौकीदार लोग जो है वहां पर आकर के परेशान करेंगे। मां यहां पे है। मां को बिना मतलब परेशानी होगी। तुम यहां से चले जाओ। अभी यह लड़का बेचारा उसकी तो दीक्षा लेने की बड़ी इच्छा थी। तो कैसे भी करके मां को विनती की तो मां ने कहा अच्छा ठीक है वो फिर वहां के ये वरदा महाराज के किसी को कह दिया कि कहीं पर छुपा करके इस लड़के को रख दो रात को अर्ली मॉर्निंग को मां जब जगदंबा आश्रम जा रही है तो रास्ते में उसको मेरे पास में ले आना तो वैसे ही मां जब सुबह अर्ली मॉर्निंग को जगदंबा आश्रम ना कि वहां पर जा रही थी कि वहां से वापस आ रही थी व्हाटएवर वहां पे रास्ते में वह लड़का आया महाराज ले आए लड़के ने मां को प्रणाम किया मां ने वहीं रास्ते की धार पे ही बैठ बैठ के पहले तो मां आसन खोज रही है। तो यह वर्दा महाराज कहते हैं यह खड़ वगैरह जो है उसका आसन बना दूं। तो मां कहती है नहीं जरूरत नहीं। वहीं पर वह रास्ते पे ही बैठकर के उसको मंत्र दीक्षा दी और यह लड़का खुश होकर के वहां से गया। तो वो एक बड़ा क्राइसिस था कि किस तरह से यह सीआईडी है। ब्रिटिश गवर्नमेंट है। हमारे पर नजर रखती है और यह रिसेंटली ये किताब भी पब्लिश हुई है। रामकृष्ण मिशन के बारे में सीआईडी के जो रिपोर्ट है यह गुप्तचर डिपार्टमेंट के ब्रिटिश गवर्नमेंट के जो रिपोर्ट है वह सब पब्लिश हुए हैं। यह किताब मैंने पढ़ी नहीं है। यह किताब मैंने बेलूर मठ की लाइब्रेरी में देखी थी। तो किंतु देखिए कि इस तरह के रिपोर्ट रामकृष्ण मिशन के बारे में कंपाइल होते रहते थे। और आखिर में एक बार यह गवर्नर ने कह भी दिया कि यह मिशन यह सब एंटी गवर्नमेंट एक्टिविटी में पार्टिसिपेट करता है। तो उस समय कुछ भक्त बड़े डर गए थे। किंतु यह जोसेफाइन मैक्लाउड और यह जो अमेरिकन एंबेसडर था वहां पर कोलकाता में उसकी जो वाइफ थी मिज पेटसन तो उन्होंने जाकर के वायसरॉय के पास में थोड़ा सा रिक्वेस्ट किया कि रामकृष्ण मिशन तो इस तरह की गतिविधियों में शामिल नहीं है। तो फिर यह वायसरॉय ने अपना जो यह बयान था यह जो अपना ये था वो डिक्लेरेशन उसको वापस ले लिया। तो जो भी है और एक कहानी हमने और भी देखी थी कि किस तरह से यह गुप्ताचर डिपार्टमेंट का वह जो हेड था वो एक रात को बेलूर मठ पर रेड करने के लिए आ रहा था छापा मारने के लिए बोट में बैठकर के गंगा नदी से तो यह न्यूज़ जो उस डिपार्टमेंट के जो कुछ भक्त होंगे और शाम को ही राजा महाराज के पास में यह न्यूज़ लेकर के आए। सो सब लोग डर गए थे बेलूर मठ में क्योंकि ये गुप्तचर डिपार्टमेंट सीआईडी ये लोग सब बेकार लोग हैं। उनका तो कोई भगवान पर भक्ति वगैरह तो छोड़ ही दीजिए। मारपीट भी करेंगे। मंदिर की पवित्रता भी नष्ट करेंगे। पता नहीं क्या से क्या ना करें। तो अभी सब लोग डरे हुए हैं। उस समय राजा महाराज के आसपास सब बैठे हुए हैं। मध्य रात्रि का समय है। पता चला है कि वहां से वह निकल गया है। बोट में बैठकर के गंगा नदी पर बेलूर मठ की ओर आ रहा है। तो राजा महाराज ने हवा में ऐसा करके कुछ साइन वगैरह कुछ किया और फिर फिर से शांत होकर के बैठ गए। उसी में पता अभी सब लोग देख रहे हैं। ऐसा आश्चर्यचकित होकर राजा महाराज ने ऐसा कुछ किया समझ देखा तो सही किंतु उसका अर्थ समझ में नहीं आया। जो भी है सब लोग वेट कर रहे हैं वेट कर रहे हैं वेट कर रहे हैं। सुबह हो गई कोई आया नहीं वो सीआईडी से तो फिर वो जो भक्त था जिन्होंने यह भीतर का समाचार ले आए थे वो जाकर के देखा वहां पे डिपार्टमेंट में तो पता चला कि ये मध्य गंगा में मध्य रास्ते पे आकर के पता नहीं उसके भीतर में क्या हुआ उसका जो हेड था उसने जा ये बोट जो है उसको रिवर्स करके वो वापस चला गया। तो देखिए कि ये ये एक बड़ी क्राइसिस थी। उसके बाद में राजा महाराज की महासमाधि हुई और शरद महाराज की महासमाधि हुई। उसके बाद में फिर से एक क्राइसिस आई थी। किस तरह से काली महाराज संघ छोड़ के चले गए थे। किस तरह से कुछ एक दल था उद्बोधन के ही भीतर में। उन्होंने कुछ ऐसा गड़बड़ करना शुरू कर दिया था। एक अलग से मठ की रचना की थी। उसको हम भांगा मठ कहते हैं। विवेकानंद रामकृष्ण विवेकानंद मठ ना कि ऐसा कुछ वहीं वो बाग बाजार में ही कहीं पे है। तो तो इस तरह से वो एक क्राइसिस थी। किंतु देखिए ठाकुर की कृपा से जितनी भी क्राइसिस रामकृष्ण मिशन के इतिहास में आई है वो सब एक के बाद एक हम लोग पार कर गए हैं। इसके पीछे का रहस्य क्या है कि जो ओरिजिनल ग्रुप था जिस जो कि ठाकुर के आसपास में इकट्ठा हुआ था। जो अंतरंग लोग थे देखिए ठाकुर को कैंसर ना हुआ होता। जस्ट एक थॉट एक्सपेरिमेंट करके देखते हैं कि ठाकुर को यदि कैंसर ना हुआ होता और जितने भी लोग थे उस समय के बहिरंग हो ना कि अंतरंग हो वो सभी अपने संघ में एक बार प्रवेश कर गए होते और उस समय यह सब क्राइसिस आती रामबाबू और नरेंद्र का झगड़ा नरेंद्र का शिव्ञानी जीवन सेवा का मामला यह क्रांतिकारियों का प्रवेश यह सब मामले जब खड़े होते भविष्य में बड़े-बड़े तो पता नहीं यह जो बहिरंग वाले जो थे वह कुछ ना कुछ गड़बड़ कैसे करते किसको पता यह एक उसका उदाहरण भी है। एक वैुंठनाथ सानियाल सानियाल महाशय थे उस समय के तो ये सानियाल महाशय को उस समय ऐसा था कि हम लोगों ने जो हमारे ऊपर में टैक्स लगा रहे थे बेलूर मठ की जमीन पे यह कह के ये तो बाबू लोगों का यह गार्डन है माने उद्यान गह है मठ नहीं है तो यहां पर टैक्स लगना चाहिए तो हमने टैक्स माफी के लिए वो केस किया था केस चल रहा है उस समय सबको एक के बाद एक जुबानी के लिए माने विटनेस बॉक्स में लाया जाता है बोलने के लिए और उस समय यह सानियाल महाशय को बुलाया गया और यह जो सामने वाला जो वकील होता है अपोजिशन वाले का वो जाकर के यह सानियाल महाशय को क्रॉस क्वेश्चन कर रहा है तो जो जिस तरह से उसने प्रारंभ किया पता नहीं सानियाल महाशय के माइंड में क्या हुआ जो पूछ रहा है सबका हां हां करके उत्तर दे रहा है तो हमारा जो लॉयर था हमारे हमारी ओर से जो साधु वहां पर बैठे थे कोर्ट में हम लोग तो बड़े डर गए कि ये सानियाल महाशय पता पता नहीं अभी उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई होगी कि बुढ़ापा उसके भीतर में है जो भी है। इस तरह से वह सभी बातों में हां बोल रहा है अपोजिशन की तो हम तो केस हार जाएंगे। तो हम लोग ऐसे बड़े टेंशन में बैठे हैं। एकाएक वो सानियाल महाशय को क्या हुआ? मूर्छित होकर के गिर गए। अनकॉन्शियस हो गए। तो इमीडिएटली अपना लॉयर खड़ा हो के बोलता है वो जज को कि देखिए वो तो मूर्छित हो गया। उसकी हेल्थ ठीक नहीं है। उसने जो जुबानी दी है सबको कैंसिल कर दिया जाए। और ठाकुर की कृपा भी देखिए कि जज ने वो जुबानी है उसकी कैंसिल कर दी। तो अभी देखिए सानियाल तो सानियाल महाशय तो राजा शरद महाराज के काफी तकरीबी थे और वो हमारे गुरु भाइयों के साथ में उन्हें प्रवरज्या भी की थी। इसके बावजूद इस तरह से एक दो वीक लिंक यदि घुस जाती है अपने ऑर्डर में फाउंडेशन के समय में बड़ा ही डेंजरस प्रूव होती है। आज आप रामकृष्ण मिशन पे 1000 केस कर दीजिए। मान लीजिए 10-15 केस हम हार भी जाते हैं। तो इससे मिशन को आज कोई तकलीफ नहीं होने वाली है। क्योंकि जैसे ठाकुर और स्वामी जी का दोनों का कहना था कि यह जो पौधा जब छोटा होता है उसी समय उसके आसपास में फेंसिंग करना होता है। उसके बाद में जब पौधा बड़ा होकर के वट वृक्ष हो जाता है तो उस वृक्ष के पास में आप जो चैन से लेकर के आप हाथी को भी बांध सकते हैं। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इवन हाथी भी वो खींचेगा वटवृक्ष को वैसे का वैसा खड़ा रहेगा। तो प्रारंभ के समय में फाउंडेशन जब डलता है तब एकदम प्योरिटी ऑफ पर्पस एंड विलिंगनेस एंड विल पावर ऑफ हार्ट यह सब होना चाहिए। तो इसीलिए यहां पे ठाकुर पूछते तो है कि केशव के पास में तो इतने सारे लोग आते हैं। तो क्या अर्थ हुआ इसका? फिर एक दूसरा एक इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट ठाकुर यहां पे देते हैं। कहते हैं कि गीता में तो कहा है कि जहां पर बहुत सारे लोग इकट्ठा होते हैं वहां पे ईश्वरीय शक्ति है। तो यह बात क्या गलत साबित हो गई? तो हमको यह बात याद रखनी है। देखिए कि आजकल के पॉलिटिशियन के पास में लोग लाखों लाखों लोग इकट्ठा होते हैं उनका प्रवचन सुनने के लिए। डजंट मैटर कि उस पॉलिटिशियन के भीतर में ईश्वरीय शक्ति है। देखिए यह सब सामाजिक मूवमेंट होती है। सडनली कोई कुछ ना कुछ वायरल ट्रेंड हो जाता है। क्योंकि वो वायरल ट्रेंड क्या होता है? उस समय के लोगों की जो नीड होती है, जो जरूरत होती है, उसको समहाऊ वो फुलफिल करता है। बोल के वो वायरल ट्रेंड होता है। अभी कुछ दिनों इंटरेस्टिंग उसका म उपमा कुछ दिनों पहले मैं एक ऑनलाइन लेक्चर सुन रहा था। एक साध्वी थी। विदेशी साध्वी थी और वेदांत के ऊपर में बोल रही थी। तो मैंने सोचा विदेशी लोग क्या बोलते हैं? सोच देखूं तो थोड़ा सा तो अच्छा बोल रही थी। वेरी गुड। उसका कांसेप्ट्स बड़े क्लियर थे वेदांत के। उसमें वो ये जो संसार जो होता है संसार के प्रति हमारा जो आकर्षण होता है उसको एक उपमा देख कर के बता रही। अभी वो विदेशी है तो तो विदेश में जो जिस चीज के साथ में उपमा किसको कहते हैं कि जो डे टू डे कोई एक्टिविटी ऐसी है जिसके साथ में आप काफी फमिलियर होते हैं उसको फिर आप उपमा के रूप में दे सकते हैं। अब जैसे ठाकुर जिस समय जीवित थे उस समय यह गांव में यह जो एक लेडी है वह लेडी अपने एक बच्चे को स्तनपान भी करा रही है। फिर वह कस्टमर है उसके साथ में वार्तालाप भी कर रही है। और फिर यह जो सब गेहूं जब उसका वह पाउडर होता है, आटा बनता है तो वह ढकी उसके ऊपर में जो गिरती है वह बड़ा वजनदार उसका जो वेट वेट जिसका होता है तो वह अपने हाथों से वह गेहूं भी उसमें डाल रही है। किंतु उसका पूरा नजर कहां पे है कि उसके हाथ के ऊपर में वो वेट ना गिरे। वरना तो हाथ क्रश हो जाएगा। यानी कि बच्चे को भी संभाल रख रही है। कस्टमर के साथ में भावल भी कर रही है। किंतु उसका जो माइंड है वह वहां पे है। अभी यह जो जिसने जो गांव में रहे होंगे, गांव के किसी बाजार की मुलाकात ली होगी। तो इस तरह के जो सीन है, इस तरह के जो दृश्य है उन्होंने कई बार देखे होंगे। तो फिर ठाकुर जब यह उपमा देते हैं तो बिल्कुल फिट अपने माइंड में बैठ जाता है। अच्छा अच्छा वो तो मुझे देख वो तो मैंने देखा था और ठाकुर की उपमा कि हां कि सब समय जो कुछ भी करें मन रहना चाहिए ईश्वर की ओर। तो यह लेडी भी अब वो तो अमेरिकन अमेरिकन जो भी है ब्रिटिश अमेरिकन व्हाटएवर वो विदेशी थी। तो अभी विदेश में सबसे ज्यादा लोगों जिस तरह से लोगों के सामने विदेशी लोगों के सामने कौन सा एक एक यूजुअल एक एक्सपीरियंस होता है जनरल एक्सपीरियंस होता है। वाइड स्प्रेड एक्सपीरियंस होता है। तो वहां पर लोग सोडा बहुत ज्यादा पीते हैं। तो ये लेडी उपमा देती है कि देखिए कि ये संसार के प्रति इस संसार का जो आकर्षण है ना कैसा है पता है? अभी आप सोडा का एक केन खोलेंगे ना तो उसमें से सोडा निकलेगी। अभी क्या है? उसके भीतर का यह जो ये गैस होता है वो वो गैस जो है कार्बन वो फट करके थोड़ी ही देर में वो गैस खत्म हो जाएगा। सोडा का बोतल या तो सोडा का केन आप खोलेंगे तो वह जैसे ऊपर भीतर में से उभरा आता है वो एकदम यह होता है पूरा ऊपर छलकता है। किंतु यह जो गैस है उसके भीतर का वो हो सकता है कि एकद मिनट के भीतर में ही खत्म हो जाए। तो जैसे ही आप केन खोल के आप सोडा पीना स्टार्ट करेंगे आपको एकदम लगेगा बड़ा ही अच्छा लगेगा क्योंकि वो गैस का उसमें टेस्ट आता है। किंतु कुछ समय के बाद में देखेंगे तो सोडा फ्लैट हो जाएगी। क्यों? क्योंकि वो गैस उसके भीतर में भरा था। वो गैस तो अभी हवा में चला गया। तो यह सोडा का बोतल खोलने के बाद में यह जो हमको उभरा दिखता है वह जो उच्छवास जो दिखता है वह दो-ती मिनट का ही है। उसके बाद में सोडा वैसे ही यह फ्लैट हो जाएगी। तो यहां पे भी देखिए कि एग्जजेक्टली वही उदाहरण ये जो वायरल ट्रेंड जो चलते हैं कि आज ये पॉलिटिशियन फेमस हो गया। आज ये फिल्म स्टार फेमस हो गया। आज ये क्रिकेटर फेमस हो गया। तो यह सोडा का केन खोल के जो जैसे वो यह आता है भीतर में से वो गैस एकदम फटाक करके निकलता है। बबल्स जो निकलते हैं वो उस तरह से है यह सब वायरल ट्रेंड। अब दो-ती मिनट सोडा को आप ओपन में रख दीजिए। कोल्ड ड्रिंक जो है उसको आप ओपन में रख दीजिए। पेप्सी है, कोला है, व्हाटएवर 2 मिनट में ही देखेंगे वह फ्लैट हो जाएगा। उसके बाद में आप उसको पिएंगे तो आप मीठा पानी पीते हैं वैसा ही आपको लगेगा। कुछ डिफरेंस उसमें नहीं लगेगा। तो वैसे ही यहां पर यहां पर जब ठाकुर कहते हैं पूछते हैं मास्टर महाशय को कि गीता में तो लिखा है कि बहुत सारे लोग जिसको स्वीकार करते हैं उसके भीतर में ईश्वरीय शक्ति है। तो मास्टर महाशय देखिए कि एक ही लाइन में उत्तर देते हैं। क्या सटीक उत्तर देते हैं? मास्टर महाशय भी तो ठाकुर के पास में ट्रेन हुए हैं ना। तो फिर मास्टर महाशय क्या उत्तर देते हैं? केशव सेनेर काछे संसारी लोग गए छ। केशव के पास में सब संसारी लोग गए हैं। संसारी लोग आने से क्या प्रॉब्लम होता है? फाउंडेशन में पहले तो उसका जो मूवमेंट है उसके टुकड़े होना शुरू हो गए। दूसरा कि एक सोडा का केन खोलते हैं और जैसे वह फट करके वह गैस और बबल्स सब निकलते हैं वो किंतु दो-ती मिनट तक रहेंगे बाद में फ्लैट हो जाएंगे। तो वैसे ही एक वायरल ट्रेंड चला था। वो वायरल ट्रेंड खत्म हो गया। किंतु ठाकुर के पास में यह सोडा का केन खोलने जैसा नहीं है। ठाकुर के पास में यह अमृत का केन खोलने की तरह है। अमृत का बोतल खोलने की तरह है। इसके भीतर का जो अमृत है वह हमेशा ऐसे का वैसा ही रहेगा। जैसे ठाकुर नरेंद्र को पूछते हैं। मान लो कि तुम यह अमृत सागर के सामने खड़े हो और यह मक्खी के रूप यहां पे अमृत सागर है। उसके किनारे तुम मक्खी के रूप में खड़े हो। तो किस तरह से अमृत का पान करोगे? तो नरेंद्र उत्तर देता है अब मुंह लंबा करके अपना मैं धीरे-धीरे करके सावधानी पूर्वक अमृत का पान करूंगा जिससे मैं उसके भीतर में गिर ना जाऊं। तो ठाकुर क्या कहते हैं भाई यह तो अमृत का सागर है। इसमें गिरने से मृत्यु नहीं होगी। तुम अमर हो जाओगे। तो वो सोडा का केन था। यह अमृत का केन है। वही यह ठाकुर का जो मूवमेंट भावधारा और केशव का भावधारा उसमें यह डिफरेंस है। तो मास्टर महाशय कहते हैं केशव सेन के पास में संसारी लोग गए थे। श्री रामकृष्ण हां ताहिक लोग हां यह बात सही है। अहिक अर्थात कि जिसका की नजर इस जगत के भोग सुख के प्रति है ऐसे अहिक लोग वहां पर गए थे। मणि केशव सेन जा को रेगन ताकी थकबे अभी मणि सामने प्रश्न करते हैं कि केशव जो करके गया है ब्राह्म समाज वगैरह वो क्या रहेगा लंबे समय तक रहेगा क्या श्री रामकृष्ण केनो संहिता को गए छ ताते का तो नियम अभी जब मणि जब प्रश्न करते हैं मास्टर महाशय प्रश्न करते हैं ठाकुर सामने काउंटर क्वेश्चन करते हैं अगेन मास्टर महाशय को टेस्ट करने के लिए क्यों कि वो तो बहुत सारे नियम कानून बना करके गया है संिता अर्थात कि ब्राह ब्राह्म समाज की जो नियमावली होगी वह बना करके गया है। यह

नरेन और राजा महाराज की कहानी: सत्य वचन पालन

नियमावली से बात याद आई। वो नरेंद्र कहता है ना वो नरेंद्र वो ब्राह्म समाज का वो प्रार्थना पत्र होता है। तो प्रार्थना पत्र पर आपको साइन करना है। यदि आपको मेंबरशिप मेंबरशिप स्वीकार करनी है तो वो साइन करेंगे तो आप मेंबर होंगे। अभी यह राजा महाराज ने भी साइन किया है, स्वामी जी ने भी साइन किया है, नरेंद्र ने भी किया है। किंतु राजा महाराज ने साइन करने के बाद में वह यानी कि निराकार ईश्वर को स्वीकार करने के बाद में वो किंतु ठाकुर के पास आकर के साकार ईश्वर को पूज रहे हैं। काली मंदिर में जा रहे हैं। देखकर के स्वामी जी नर राखाल पर नाराज हो जाकर के उसको डांटता है। जो भी है एक दो बार ऐसा हुआ होगा तब से राखाल नरेंद्र को अवॉइड कर रहा है। तो ठाकुर की नजर से तो यह सब वो जाएगा नहीं। ठाकुर की तो शार्प दृष्टि है। सब एक्सरे विजन है ठाकुर का। ठाकुर समझ गए कि ये राखाल नारायण को क्यों अवॉयड कर रहा है और अवॉयड करने से चलेगा नहीं। भविष्य में यही राजा महाराज को यही स्वामी जी की आगेवाणी में संघ का नेतृत्व स्वीकार करना है। तो ठाकुर ने नरेंद्र को बुला के कहा कि देखो तुम इसको इस तरह से उसके ऊपर में ये मत करो। गुस्सा नाराजगी मत जताओ। उसकी इच्छा है इसे बदी साकार को स्वीकार करने की तो उसको करने दो। क्या है उसमें तुम्हारा? तो उससे बाद में नरेंद्र फिर राजा महाराज को तंग नहीं करता है। उसके उनके पीछे नहीं लगता है। यह विजय कृष्ण गोस्वामी उसकी सास वो जाकर के ठाकुर को कहती है कि आप जाइए ना आप बलराम बाबू है। उसको कह दीजिए ना कि यह साकार ईश्वर की आराधना करने की क्या जरूरत है? निराकार ईश्वर को भजने से ही चल जाएगा। ठाकुर क्या उत्तर देते हैं? मैं क्यों बोलने को जाऊं? और यदि मैं बोलूं तो वह सुनने सुनेंगे ही क्यों? फिर यानी कि देखिए कि जिसकी जो इच्छा है, जिसका जो चरित्र है, जिसका जो कर्म प्रवाह है, उसके अनुसार वो अपने वो जो इष्ट की उपासना करेगा। अभी यहां पे ब्राह्म समाज में हजार नियम बना करके एक संहिता लिख के गए हैं। तो ठाकुर काउंटर क्वेश्चन करते हैं कि केशवसेन का समाज क्यों टिकेगा नहीं। इतने सारे तो नियम बना करके गया है। तो मणि क्या कहते हैं? अबतार जोख निजे काज को करेन तो आलादा को था अवतार जब स्वयं कार्य करते हैं तो बात अलग है जैमन चैतन्य देर काज जैसे कि चैतन्य देव का कार्य श्री रामकृष्ण हां हां ठीक मणि आपने तो बोले चैतन्य देव बोले छिले आ जा बीज छोड़िए दिए गलाम कोखन ना कोखन ए काज हो गए आपने तो कहा था कि चैतन्य देव का कहना था कि मैंने जो यह सीड्स मैं चारों ओर स्प्रेड करके गया हूं। यह जो बीज है चारों ओर मैं उसको बिखर करके गया हूं। कभी ना कभी तो उसका कार्य होगा ही होगा। कारण शेर ऊपर बीज रेखे छिलो बाड़ी पड़े गले से बीज आबार गाजच होवे। यह खिड़की के ऊपर मैंने कहीं पर वह एक बीज रखा होगा। सीड रखा होगा। अब यह बहुत सालों के बाद में यह मकान है वह गिर गया। यह जो बीज है वह भी जमीन पर गिरा। जमीन में गिरने से ही पोषक तत्व प्राप्त हुए। मिट्टी में प्रवेश किया और उसमें से यह पेड़ जो है उसमें से निकला। यानी कि बीज यदि 10 और आपने छोड़कर के गए हैं तो उसमें से कहीं ना कहीं फूल या तो पौधे होंगे ही होंगे। श्री रामकृष्ण अच्छा शिवनाथ राज समाज कोरे छे ताते वो तो अनेक लोग जाए। ठाकुर पूछते हैं अच्छा यह शिवनाथ ने जो समाज किया है उसमें भी तो बहुत सारे लोग जाते हैं। मणि आज्ञा तेम नहीं लोग जाए। मणि कहते हैं कि अच्छा जी उसमें वैसे ही लोग जाते हैं। तो ठाकुर सहास्य ठाकुर हंसते-हंसते कहते हैं हां हां संसारी लोग सब जाए हां हां संसारी लोग सब जाते हैं जरा ईश्वर जनो व्याकुल कामिनी कांचन त्याग करते चेष्टा कोर छे एमोन सब लोग कोम जाए बोटे जो लोग ईश्वर के लिए व्याकुल है, कामिनी कांचन का त्याग करने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह के लोग कम जाएंगे। मणि एकांत के एकटा स्रोत यदि बोए

श्रीरामकृष्ण भावप्रवाह: पवित्र और उदार हृदय

ताले बेश होए। मणि कहते हैं यहां से यदि एक स्रोत प्रवाहित होता है तो बहुत अच्छा होगा। श्रोते टाने ते शो भसे जावे। इस तरह का स्रोत यहां से प्रभावित प्रसारित होगा तो उसका यह जो यह ज्वार आएगा उसका यह जो प्रचंड शक्ति होगी उसमें सब बह जाएगा। सब लोग इसमें बह जाएंगे। अभी यहां पर यह देखना है कि सुनामी जब होती है और सुनामी सब कुछ बहा करके ले जाती है तो बहुत सारा नुकसान पहुंचा के जाती है। किंतु यह तो अमृत का स्रोत बह रहा है। तो जैसे ठाकुर ने नरेंद्र को कहा कि तुम अमृत के सागर में गिरोगे तुम मरोगे नहीं अमर हो जाओगे। तो वैसे ही यह अमृत का स्रोत यदि प्रवाहित होता है तो यह सुनामी है या तो अभी अमेरिका में जिस तरह से टेक्सास में फ्लड आया है तो इतने लोग मर गए इतना प्रॉपर्टी डैमेज हुआ अमृत का स्रोत यदि बहेगा तो लोगों का ना ही प्रॉपर्टी डैमेज होगा ना ही लोग मरेंगे इनफैक्ट सब कुछ अमर हो जाएगा इस स्रोत के प्रवाह में जो बहेंगे सब अमर हो जाएंगे एक थे के जा होवे से तो आर एक घेय होवे ना यहां से जो होगा वो एक घेय तो नहीं होगा एक घेय अर्थात कि एक ही तरह का थिंकिंग लेकर के यानी कि जिसको कहते हैं फनेटिसिज्म यहां से जो स्रोत बहेगा वो फनेटिसिज्म का तो नहीं होगा। जैसे कि देखिए कि कुछ-कुछ रिलीजियस मूवमेंट है। नाम देने की जरूरत नहीं है। सबको पता है कि जब वो उसका स्प्रेड होना शुरू हुआ तो तलवार से इसका स्प्रेड हुआ। या तो हमारा धर्म स्वीकार करो। हमारी धर्म की किताब को स्वीकार करो वरना तो आपका सर काट देंगे। तो वो फेनेटिसिज्म था। यदि फनेटिसिज्म फैलता है धर्म के नाम पे तो जहां पे भी वह जाएगा तो लोकल जितने भी कस्टम है लोकल जितनी भी ट्रेडिशन है सबको तहसनहस कर देगा तो किंतु यहां से तो जो स्रोत प्रवाहित होगा वह तो फनेटिसिज्म नहीं होगा। ठाकुर ने सभी धर्मों की धर्म की जितनी भी ब्रांचेस है सभी की साधना की थी। ठाकुर क्या कहते हैं कि जिसके जो अभी यहां पर वो ठाकुर उदाहरण देंगे कि मां जिसको जिसको जो खाना है मां उस तरह का खाना खिलाती है। उदाहरण देंगे यहां पे तो ठाकुर श्री रामकृष्ण सहास्य हंसते-हंसते ठाकुर कहते हैं आमी ज भाव तार से भाव रखा करी मैं जिसका जो भाव है उसका वही भाव की रक्षा करता हूं वैष्णव के वैष्णवेर भाव टी रखते बोली शाक्त के शाक्त भाव वैष्णव को वैष्णव का भाव ही रखने को कहता हूं शाक्त को शाक्त का भाव तब बोली तब मैं किंतु फिर भी मैं कहता हूं इसके बावजूद में कहता हूं ए कथा बोलो ना यह बात मत कहो हमारो ही पथ शो आर सब मिथ्या भूल मेरा ही पथ सत्य है और बाकी सब मिथ्या है भूल है हिंदू मुसलमान ख्रिश्चन नाना पथ दिए एक जाएगा ही जा हिंदू मुसलमान क्रिश्चियन विभिन्न पथों से एक ही उद्देश्य की ओर बह रहे हैं निजेर निजेर भाव रखा करें आंतरिक को ताके डाक ले भगवान लाभ होवे अपने अपने भाव की रक्षा करके अंतर्मन से ईश्वर को पुकारोगे तो ईश्वर प्राप्ति अवश्य होगी। विजय शासुड़ी बोले तुम ही बलराम देर बोले दाऊ ना शाकार पूज और की दरकार विजय की सास कहती है तुम बलराम को बोल दो ना बलराम के घर वालों को बोल दो ना कि साकार पूजा की क्या जरूरत है निराकार सच्चिदानंद के डाकले हो निराकार सच्चिदानंद को पुकारने से ही हुआ आमी बोललाम मैंने कहा अमन को था आमी बाक बोलते जाो केनो और तारा ही बात सुनबे केनो इस तरह की बात में मैं कहने को ही क्यों जाऊंगा और वह सुनेंगे भी क्यों मां माच र कोनो छले के पुलवा रह दे दे आर पेट भो नोए ताके माछे झोल करे दे मां खाना बना रही है किसी को पुलाव बना देती है और जिसका पेट अच्छा नहीं है उसको मछली का स्टू बना देती है जूस बना देती है रुचि भेद अधिकारी भेद एकई जीनिश नाना रूप करे दीते होए जिसकी रुचि भेद है जिसकी अधिकारी भेद रुचि अर्थात कि टेस्ट किसी किसी किसी का टेस्ट का डिफरेंस होता है। किसी किसी का एलिजिबिलिटी डिफरेंस होता है। अभी यह फर्स्ट जिसको मिला है रैंक और जिसको जो फेल हुआ है जो फेल हुआ है वो कहेगा मैं मेडिकल में जाऊंगा वो तो होने वाला नहीं। फर्स्ट रैंक वाला ही जाएगा। किंतु जिसका फर्स्ट सेकंड रैंक मिला है वे लोग कहेंगे मुझे मेडिकल में नहीं जाना। आर्ट्स में जाना है तो उसका रुचि भेद है। वहां पे फेल हुआ है वह मेडिकल में नहीं जा पाएगा। वह अधिकारी भेद है और जो फर्स्ट रैंक से पास हुआ है मेडिकल स्ट्रीम मिलती है किंतु उसको आर्ट में इंटरेस्ट है वह रुचि भेद है तो रुचि भेद भी होता है अधिकारी भेद भी होता है टेस्ट डिफरेंट होते हैं एलिजिबिलिटी डिफरेंट होती है एक ही जीनिश नाना रूप करे देते हो एक ही खाना है विभिन्न तरह से पका करके रखना है तो मणि क्या कहते हैं आज्ञे हां देश काल पात्र भेदे शब आलादा रास्ता देश काल और पात्र के भेद से डिफरेंस से अलग-अलग रास्ते हैं। तबे जे रास्ता दिए जावा होक ना केनो शुद्ध मन दिए आंतरिक को व्याकुल होए डाकले तबे ताके पावा जाए किंतु आप जो भी रास्ते से जाएंगे भले ना चाहे आप जो कोई भी रास्ते से जाए शुद्ध मन से अंतर हृदय के अंतरता पूर्वक व्याकुल होकर के यदि पुकारेंगे तो ईश्वर प्राप्ति होगी ही होगी यही कथा अपनी बोलेन आपने यही बात कही है तो देखिए यहां पर जो ठाकुर का जो यहां से जो स्रोत प्रवाहित होगा ठाकुर के यहां से उसके दो फंडामेंटल एस्पेक्ट है। यहां पे ऐसे ही लोग आएंगे कि जिनका हृदय पवित्र है जो सही-सही में त्याग कर सकते हैं जो सही-सही में ईश्वर प्राप्ति करना चाहते हैं। एक दूसरा कि यहां से जो इंस्टीट्यूशन है, यहां से जो एक भावधारा बहेगी, उसमें किसी भी तरह का फेनेटिसिसिज्म नहीं रहेगा। किसी भी तरह की धर्मांधता नहीं रहेगी। किसी भी तरह का धर्म जुनून नहीं रहेगा। सबके लिए यहां पर स्थान है। बस यही बात है कि आपको फिर यह क्लेम नहीं करना है कि मेरा ही रास्ता सही है और बाकी गलत है। आप यह स्वीकार कीजिए कि सभी रास्ते सही है। बस मेरा रुचि भेद है कि अधिकारी भेद है। मेरा टेस्ट इस तरह का है कि मेरी एलिजिबिलिटी इस तरह की है। इसके अनुसार मैं रास्ते चुनता हूं। तो यह जो रामकृष्ण संघ या तो फिर रामकृष्ण मिशन रूपी इंस्टीट्यूशन है जिसकी स्थापना स्वामी जी ने की है और जिसके बारे में कल हमने काफी डिस्कस किया था उसके जो कोर कांसेप्ट के रूप में ठाकुर स्वयं यह दो कोर कांसेप्ट को यहां पर वर्णित करते हैं। तो आज यहीं तक अभी कल मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु जय मां छमा जय मां ठीक है तो फिर अभी कल मिलते हैं।