Transcript
आज मैंने सोचा कि स्वामी जी का एक लेटर लेते हैं स्वामी जी जब पत्र लगते हैं तो स्वामी जी की जो बहुविध प्रतिभा उनके पत्रों में हमको दिखती है अभी जैसे कहते हैं ना कि बच्चों के साथ बात करेंगे तो बिल्कुल बच्चे जैसे हो जाएंगे ठाकुर को देखिए कि किसी कोई जैसे कि मास्टर महाशय का गंभीर स्वभाव था तो ऐसे गंभीर होकर के उनके साथ में हालांकि ठाकुर कभी गंभीर नहीं होते थे किंतु ऐसी सब वो फिलोसॉफिकल बातें मास्टर महाशय के साथ में किया करते थे और फिर वही कथामृत में मास्टर महाशय वही लिखते हैं जब दूसरी बार ठाकुर को मिलने के लिए गए और लड़कों के साथ में जो यह सब त्यागी संतान वो आए थे ठाकुर के सामने बैठे थे तो ठाकुर उनके साथ में बिल्कुल बच्चे जैसे जो हंसी मजाक कर रहे हैं तो मास्टर महाशय कथामृत में लिखते हैं कि क्या यह वही महापुरुष है जो कि अगले दिन समाधि में चले गए थे थे जो कि अगले दिन उनके आगे के दिन ऐसी सब उच्च आध्यात्मिक दार्शनिक बातें उनको किया करते थे तो मैंने मास्टर महाशय ऐसे आश्चर्य चकित हो गए कि ठाकुर के यह दो स्वभाव प्रथम दर्शन के दिन ठाकुर ने मास्टर महाशय को झड़ लगा दिया था बिल्कुल डांट दिया था जब मास्टर महाशय कहते हैं उनकी पत्नी के बारे में पूछा तो तुम्हारी पत्नी कैसी है तो मास्टर महाशय ने कहा कि अच्छा वह तो अच्छी है वैसे किंतु अज्ञानी है तो मास्टर ठाकुर ने इमीडिएट नाराज हो कर के कह दिया और क्या तुम ज्ञानी हो मैंने मास्टर महाशय को अभी तक यह नहीं पता कि ज्ञान किसको कहते हैं अज्ञान किसको कहते हैं और फिर बाद में ही देखा कि ठाकुर समाधि में जा रहे हैं तो अभी यह समाधि दर्शन यह सब देख कर के मास्टर महाशय को लगा कि अरे ठाकुर कैसी कोई आध्यात्मिक उच्च शिखर पर विराजमान है हिमालय के ऊपर में और दूसरे ही दिन आक के देखा कि क्या ये सब बच्चों के साथ में बिल्कुल बच्चे जैसे हो करके हंसी मजाक कर रहे है तो ये मास्टर महाश ये समझ नहीं पाए कि ये किस तरह का ठाकुर का यह व्यक्तित्व है जो सामने जैसा है उसी के जैसे हो जाते हैं बाद में ऑफकोर्स उनको समझ में आया तो यहां पर स्वामी जी का भी ऐसा है जिसके साथ में जिस तरह से बात करेंगे उनके साथ में उसी के जैसे हो जाएंगे अमेरिका गए थे यह हावर्ड के सब प्रोफेसर हैं उनके स्टूडेंट है तो वहां जाकर के हावर्ड फिलोसॉफिकल सोसाइटी में लेक्चर देना है तो बिल्कुल इस तरह से फिलोस बिल्कुल शेर की तरह फिलोसोफर होकर के उनके साथ में बात कर रहे हैं और वह स्वामी शिष्य संवाद में हम देखिए कि वो शरद चंद्र चक्रवर्ती उसकी वो बंगाल बोल कर के वोह हंसी मजाक भी किया करते हैं फिर कभी उ उसके साथ में हंसी मजाक करते हैं तो कभी कहीं वो माने वेद वेदांत की बातें किया करते हैं तो स्वामी जी का यह नेचर था स्वामी जी ठाकुर दोनों का कि जिसके साथ में बात करेंगे उनके जैसे हो जाएंगे उनको उनके जैसे होकर के उपदेश देंगे तो यह बात हमको स्वामी जी के लेटर्स में स्वामी जी के पत्रों में बड़ा ही स्पष्ट रूप से बड़ा ही सुंदर रूप से दिखता है अभी वह अमेरिकन डिसाइल को लेटर लिखेंगे तो इस तरह से डिग्निफाइड होकर के जैसे कि भारत की आध्यात्मिक संस्कृति को वह रिप्रेजेंट कर रहे हैं इस तरह से लेटर लिखेंगे और कहीं वह जो अपने मद्रास के डिसाइल है उनको एंकरेज करना है उनको प्रेरणा देनी है तो शौर्य पूर्ण लेटर लिखेंगे पत्र लिखेंगे और किंतु एक कैटेगरी है उनके पत्रों की जो कि बहुत ही स्पेशल है एक स्पेशल क्लास ऑफ कैटेगरी ऑफ स्वामी जीज लेटर्स उनके गुरु भाइयों को बंगोली में जो पत्र लिखे हैं उसका एक महत्व ही डिफरेंट है एक महत्व ही अलग से है किस तरह से क्योंकि अपने गुरु भाइयों को उनको प्रेरित करके संघ बद्ध करने के लिए उनको अ प्रेरणा देनी है उनको एनक करना है अभी जैसे कि राखल महाराज है बाबूराम महाराज है यह सब लोग तो कहां वह तपस्या करते व भ्रमण कर रहे थे तो सबको स्वामी जी ने बुला बुला करके कहा कि पत्र लिख करके उनको कहा कि अभी तुम सभी लोग एक मठ में इकट्ठा हो जाओ प्रव्रज्या का समय बीत चुका है अभी संघ बद्ध होने का समय है और यह संघ बद्ध होने का अर्थ क्या है सिर्फ यह नहीं है कि 1015 यंग लड़के सन्यास लेकर के एक साथ में रहते हैं या तो फिर तपस्या करते हैं सिर्फ यह नहीं है आपको तो ऑर्गेनाइजेशन क्रिएट करना है सिर्फ एक मठ हो तो वह एक चीज हो गई किंतु एक पूरा वर्ल्ड वाइड ऑर्गेनाइजेशन यदि क्रिएट करना है तो उसमें डिसिप्लिन होते हैं रूल्स एंड रेगुलेशंस होते हैं अकाउंट के बारे में आपको बिल्कुल अलर्ट रहना पड़ता है कि शाकिर कोड़ी माछ जावेना माछ कोड़ी शाके जावेना स्वामी जी कहा करते थे शाक का जो सब्जी के लिए सब्जी के लिए जो रुपया आया है वह मछली खरीदने के लिए नहीं व्यय होगा और मछली खरीदने के लिए जो पैसा आया है वह शाक सब्जी खरीदने के लिए व्यय नहीं होगा अभी धीरे-धीरे करके वह जो मछली का थोड़ा रेफरेंस हम लोग सब जगह से हटा रहे हैं किंतु जो भी है तो मैंने स्वामी जी का इतना बड़ा क्लियर था कि जिस पर्पस के लिए जो रुपया आया है वो उसी पर्पस के वहां पर इस्तेमाल होगा किंतु इससे भी मैंने ऑर्गेनाइजेशन यदि क्रिएट करना है तो सिर्फ रूल्स एंड रेगुलेशन से नहीं चलेगा वहां पे जो सन्यासी साधु यह जो यंग लड़के या तो फिर यह डिवोटा वॉलंटस जो लोग वहां पे आते हैं रहते हैं या तो फिर नियमित संपर्क में आते हैं उनका लाइफ ट्रांसफॉर्म करना पड़ेगा अभी यह जो डायरेक्ट डिसाइल है 16 उनका जीवन का परिवर्तन उनका लाइफ ट्रांसफॉर्मेशन तो ठाकुर ने कर दिया है उनका च चरित्र का घडतर तो ठाकुर ने कर दिया है किंतु यह संघ एक ऐसा मशीन है रामकृष्ण मिशन या तो फिर कहे राम कृष्ण मशीन ये एक ऐसा मशीन है कि जिसमें एक साइड से आप जद प्रवेश करेंगे एक दरवाजे से तो जैसे कि वो जमीन में से वो जो ये निकालते हैं ना रो डायमंड जो हीरा जब जमीन में से निकलता है तो रो होता है उसको तो पूरा घिस घिस करके उसके वो एकदम शेप देना पड़ता है तब ही वो उसकी एक मूल्य बनता है तो वैसे ही यहां पर जो लड़के आएंगे उनको पूरा शेप देना पड़ेगा उनको भट्ठी में पिघल कर के भट्ठी की आग में डाल कर के उनके चरित्र का निर्माण करना है तो यह रामकृष्ण संग सिर्फ एक जन कल्याण का एक ये एक साधन नहीं है ऑफकोर्स वो है आत्मा न मोक्षार्थम जगत हिताय च के यह जो स्वामी जी का सूत्र है उसके अनुसार यह सेवा का पूरे विश्व में रामकृष्ण संघ कर रहा है किंतु मोर देन ट यह जो आत्मन मोक्षार्थम यह जो अपने हृदय का परिवर्तन करना है यह सबसे बड़ा बात है क्योंकि हृदय का परिवर्तन ही नहीं होगा तो जगत का कल्याण कैसे होगा तो यह हृदय को परिवर्तन करने के लिए अपने मन को ट्रांसफॉर्म करने के लिए रामकृष्ण मशीन की स्थापना की गई तो अभी यह जो पत्र है यह जो पत्र आज मैं पढ़ रहा हू ये इतना सुंदर पत्र है स्वामी जी अपने गुरु भाई राजा महाराज को यह पत्र लिखते हैं और एक पत्र में रामकृष्ण संघ की आज का जो रामकृष्ण संघ है उसका फाउंडेशन आइडियाज क्या-क्या है स्वामी जी किस कल्पना से लेकर के किस कांसेप्ट को लेकर के इस ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना की है व एक पत्र में हमको बहुत ही सुंदर रूप से जानने को मिलता है तो यह पत्र में पढ़ता हूं बंगोली में है गुरु भाइयों को लिखा है और जैसे मैंने कहा कि स्वामी जी के पत्र जद इंग्लिश में पढ़ते हैं उनके अमेरिकन डिसाइल को लिखे हुए या तो इंग्लिश में उनके ये मद्रास के डिसाइल को लिखे हुए तो हमको एक तरह से दिखते हैं स्वामी जी किंतु बंगाली में अपने गुरु भाइयों को स्वामी जी जो लिखते हैं वो बिल्कुल एक स्वामी जी का एक शंकराचार्य जैसा एक स्वरूप सामने आता है ही इज अ वर्ल्ड बिल्डर ही इज द रेव री हु इज अरिंग अवर वर्ल्ड इन न्यू एज एक इस तरह के एक महापुरुष युग नायक युग युगा चार्य जो कि अपने विश्व को एक नए युग में ले जाने के लिए तत्पर है तो स्वामी जी का यह जो योगाचार्य स्वरूप है व किस तरह से इस पत्र में दिखता है मैं पढ़ता हूं स्वामी ब्रह्मानंद को लिखित 1815 का य पत्र है स्वामी जी शुरू करते हैं ओम नमो भगवते राम कृष्णाय प्राणा दि केशु इस तरह से संबोधन करते हैं राजा महाराज को अर्थात कि प्राण से भी जो अधिक जिनको वह प्रेम करते हैं वो प्राणा दि केशु एक खोने बहुत खबरेर कागज इत्यादि ए काटा होया गलो स्वामी जी लिखते हैं खबर के कागज न्यूजपेपर बहुत सारा आपने भेज दिया है आर पाठई बार आवश्यक नाई अभी भेजने की जरूरत नहीं है किस कॉन्टेक्स्ट में कहते हैं जब स्वामी जी अमेरिका गए तो फिर पता है ना कि अमेरिका में जो बेस्ट जो सर्वश्रेष्ठ लोग थे उन्होंने तो स्वामी जी को बड़ा ही प्रेम पूर्वक आदर यत्न किया किंतु हमेशा वह जो बैक बाइटिस रहते हैं रशाल लोग रहते हैं मिशनरी लोग कि जिनका बिजनेस बंद हो गया स्वामी जी के आने से वो पूरे अमेरिका में यह जो धनपति लोग थे वहां पर जाकर के कहते हैं कि भारत में अंधेरा है भारत में अज्ञान है वहां के लोग ये अंधश्रद्धा में डूबे हुए हैं तो उनको क्रिश्चियनिटी सिखाने के लिए हमको रुपया दीजिए तो ऐसा करके ये लोग पैसा कलेक्ट करते थे अभी वही भारत से ऐसे स्वामी जी जैसे महापुरुष अमेरिका आए तो सब लोग तो आश्चर्य चकित हो गए कि अरे इस तरह के महापुरुष जिस देश में रहते हैं वहां पर हमको क्या पैसा देकर के मिशनरी को भेजने की जरूरत है कि नहीं है यह प्रश्न होने से ही बहुत सारे मिशनरी को जो फंड कलेक्शन होता है वह फंड कलेक्ट करने में दिक्कत होने लगी तो उन्होंने स्वामी जी के बारे में जितना भी नेगेटिव बातें हैं जितनी भी खराब बातें हैं वह करनी शुरू कर दी तो स्वामी जी खास करके ऐसा कहते थे कि स्वामी जी के बारे में स्वामी जी जो अमेरिका आए हैं वो बिना किसी उनको किसी ने भेज नहीं है वो कोई कोई एक स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन के या तो हिंदू धर्म के वोह रिप्रेजेंटेटिव नहीं है तो स्वामी जी ने भारत में अपने ये जो डिसाइल है मद्रास में थे और यह कलकाता में थे उनको सबको पत्र लिख कर के कहा कि वहां के न्यूज़पेपर में तुम लोग सब सभा करो वहां के जो ख्यात नाम लोग है इनको इकट्ठा करो और ऐसा रेजोल्यूशन पास करो कि स्वामी विवेकानंद हिंदू धर्म के एक गणय माननीय प्रतिनिधि है और ऐसा करके यह रेजोल्यूशन तुम लोग सब अमेरिका भेजो तो इस रेजोल्यूशन को अमेरिका के न्यूज़पेपर में पब्लिश करने से वहां के लोग स्वीकार करेंगे कि हां स्वामी जी इज अ जेनुइन पर्सन ये शुरू शुरू की बात है जबक स्वामी जी को सही सही स्ट्रगल करनी पड़ी थी बाद बाद में स्वामी जी इतने एस्टेब्लिश हो गए थे कि ये सब करने की जरूरत नहीं थी तो इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि अभी स्वामी जी एस्टेब्लिश हो गए हैं अभी ये सब रेजोल्यूशन करना न्यूज़पेपर में समाचार देना कि हां स्वामी विवेकानंद भारत से अमेरिका गए हैं वो हमारे प्रतिनिधि हैं वगैरह वगैरह ये सबकी कोई जरूरत नहीं है इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि न्यूज़पेपर बहुत सारे कटिंग भेज दिए है अभी वो सब भेजने की जरूरत नहीं है हुजू एक खोने भारत मध्य चलू हुजू अर्थात की उहापोह या तो फिर कहेंगे कि हल्लागुल्ला यह अभी भारत में ही चलने दो अभी ये हुजू यानी कि ये हल्लागुल्ला कहो ना कि ये जोर शोर मचाना कहो यह भारत में ही चलो ऐसा स्वामी जी ने क्यों कहा है कि जिस तरह से जितना आप ठाकुर का स्वामी जी का प्रचार करेंगे उतना ही भारतवासियों में ठाकुर और स्वामी जी के बारे में एक एक अवेयरनेस फैले गी इसलिए एक हल्लागुल्ला मचाने को कहते हैं ये स्वामी जी का देखिए कि लिखने का बात करने का स्टाइल कैसा है ऐसा वह लिख सकते थे कि प्रचार प्रसार किंतु प्रचार प्रसार नहीं लिख कर के एक ह्यूमरस शब्द उन्होंने यूज किया है एक क्या कहेंगे कि एक स्वामी जी का जो एक शब्द का प्रयोग करते हैं ना वो स वेरी माने विजुअल प्रयोग करते हैं जो लोग राइटिंग ख माने जो कंपोजिशन इंग्लिश कंपोजीशन जो लोग सिखाते हैं स्टोरी टेलिंग जो लोग सिखाते हैं वे लोग हमेशा कहते हैं कि जब भी आपको कोई कहानी कहनी है जब भी आपको कोई राइटिंग या तो कुछ भी लिखना है तो आप ऐसे शब्दों का प्रयोग करें कि जैसे कि ये जो रीडर है वो उसको इस घटना को अपनी नजर के सामने देखता हुआ पाए माने उसकी नजर के सामने ये घटनाएं सब जीवित हो जाए इसीलिए स्वामी जी यह जो एलिस इन वंडरलैंड बोलकर के वो किताब उस समय चल रही थी आजकल आज तो यह किताब बड़ी ही फेमस है तो स्वामी जी ने उस किताब को पढ़ कर के कहा था कि इसका जो ममसिक एस्पेक्ट है वो सही सही में मैंने इस जिस किसी ने वेदांत को पढ़ा हो इसने लिखा है ऐसा लग रहा है तो अर्थ क्या है कि इस तरह के शब्दों का प्रयोग करना इस तरह से इमेजिनेशन को चलाना कि यह सब चीजें आपकी नजर के सामने सही सही हो रही है यह आपको लगे तो यहां पर स्वामी जी ने ऐसा नहीं कह के यह प्रचार प्रसार अभी भारत में ही चले ये स्वामी जी ने कहा हुज एकने भारत मही चल हुज यानी कि हल्लागुल्ला उहा पो हो शोर मचर या तो फिर यह दौड़ धाम यह सब भारत में ही चले बध करी तोमरा एतो दिने कोलकाता आशिया थाकी बे मैं आशा रखता हूं कि अभी तक तुम कोलकात्ता आ चुके होंगे अभी यह बात स्वामी जी ने अगेन क्यों कही क्योंकि राजा महाराज वगैरह यह जो परिभ्रमण कर रहे थे प्रव्रज्या कर रहे थे तो वहां से वे भारत वापस कोलकात्ता वापस आए और कलकत्ता वापस आकर के मठ में एक साथ में रहे और एक साथ में रह कर के धीरे-धीरे तभी तो जब स्वामी जी वापस आएंगे तो ऑर्गेनाइजेशन को स्टार्ट करने में उनको देरी नहीं लगेगा और बात भी सही है कि राजा महाराज को वो बार-बार लेटर लिखते थे किंतु फिर भी राजा महाराज वो कलकाता वापस आने को तैयार नहीं थे वह प्रव्रज्या करते ही रहते थे फिर जब किंतु वापस आए सब लोग इकट्ठा हुए तब कहीं जाकर के स्वामी जी भारत आकर के रामकृष्ण मिशन एसोसिएशन की स्थापना बलराम भवन में 1 म को उन्होंने कर दी तो यह स्वामी जी आकर के इमीडिएट रामकृष्ण मिशन की स्थापना हो जाए इसलिए वह सभी गुरु भाइयों को कह रहे हैं पत्र लिख कर के बार-बार बता रहे हैं अभी तुम सब लोग इकट्ठा हो जाओ मठ की स्थापना कर दो तारक दार पत्र शेष तार परर कोनो संवाद नाही मने तारक तारक द अर्थात की महापुरुष महाराज स्वामी जी इन सबको कहा करते थे कि वहां मठ में जो कुछ हो रहा है आपकी जो गतिविधियां है जो प्रवृत्ति है उसका संवाद उसका समाचार नियमित रूप से मुझे भेजते रहिए तो ऐसा कहने के बाद में भी स्वामी जी कहते हैं कि की तारक द अर्थात की महापुरुष महाराज का पत्र आया था बस वही आखिरी पत्र उसके बाद में आप लोगों का कोई संवाद नहीं है ऐसा स्वामी जी कहते है काली कोलकाता थाक कागज पत्र छपाई ते छ श बड़ो भलो कथा किंतु एखाने आर पाठई बार आवश्यक नहीं काली कलकत्ता में रह कर के समाचार पत्र में यह रेजोल्यूशन स्वामी जी की प्रशंसा वगैरह पब्लिश कर रहा है बहुत अच्छी बात है किंतु अभी यह सब यहां पर भेजने की जरूरत नहीं देखिए स्वामी जी को तो खुद को कोई यह प्रतिष्ठा वगैरह चाहिए नहीं उनको तो था कि ये एक बार सिर्फ ये भारत से अमेरिका यह सब न्यूज एक बार आ जाए जिससे कि क्या हो कि अमेरिका के लोग स्वीकार कर ले कि हां भाई स्वामी विवेकानंद इज अ जेनुइन रिप्रेजेंटेटिव ऑफ हिंदुइज्म सेंड फ्रॉम भारत इंडिया तो भारत से भेजे हुए जेनुइन रिप्रेजेंटेटिव है ये एक बार फेल जाए उससे बाद जरूरत नहीं है तो इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि एक बार भेज दिया सो भेज दिया अभी भेजने की जरूरत नहीं किंतु े देश म एकटा झुक उठिया छ ई हार आश्रय चारी दिके छोड़ाई या पड़ो स्वामी जी कहते हैं कि किंतु इस बात का आश्रय लेकर के कि स्वामी जी का स्वामी जी के बारे में सभा करके रेजोल्यूशन करना है अमेरिका के न्यूजपेपर में ना है इस बात का आश्रय लेकर के जब आपने इतनी सब सभाएं कर ही दी है सब गेस्ट वीआईपी गेस्ट को बुला ही दिया है बहुत सारे ख्यात नाम लोगों को निमंत्रण देकर के आपने यह हमारी बात कही ही है तो यह देश भर में जो एक जोर शोर मच गया है एक हल्लागुल्ला मच गया है तो इसका लाभ लेकर के चारों दिशाओं में फेल जाओ अर्थात स्थाने स्थान थाने ब्रांच स्थापन करी बार प्रयत्न करो अर्थात कि जगह-जगह पर हमारा ब्रांच सेंटर एस्टेब्लिश करने का प्रयास करो देखिए ऑन वन हैंड स्वामी जी परिव्राजक करते हुए सभी गुरु भाइयों को मठ में वापस बुलाते हैं और किंतु ऐसा नहीं है कि मठ में बैठ कर के खानी खाना पना चले और मने उत्सव वगैरह चले सिर्फ यह नहीं चारों दिशाओं में फेल जाओ माने वापस आओ और फिर से फेल जाओ किंतु इस बार जब जाओगे तो प्रव्रज्या के लिए नहीं जाओगे एक संपूर्ण रूप से निर्लिप्त सन्यासी जो भिक्षा मागता हुआ गांव-गांव घूमता है और बस अपने ही खुद के आत्म आत्म संयम के लिए आत्म रक्षा के लिए आत्मसाक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील रहता है वह पीरियड अपने जीवन में समाप्त हो गया अभी इस समाज के लिए समाज की रक्षा करने के लिए समाज का आत्म साक्षात्कार समाज में जितने भी साधक है उनको आत्मसाक्षात्कार का रास्ता दिखाने के लिए हमको अभी घूमना है माने अभी माने जिस तरह से हम लोग पहले घूमते थे अभी फिर से जाना है किंतु इस बार ब्रांच सेंटर का स्टार्टिंग एस्टेब्लिश करना है ब्रांच सेंटर्स को और लोगों को सहाय करनी है जे खबर कागज बाहर करि बार कथा होते छलो ताहर की होलो खबर कागज चालाई बार तुम्हार भावना की आमरा जानी ना एकन लोक जे अल्पो तुम लोग जो खबर एक न्यूजपेपर चलाने के बारे में बात कर रहे थे उसका क्या हुआ अभी मैंने स्वामी जी कहते हैं कि अपने पास में मेन पावर भी कम है तो इसको कैसे चलाएंगे प्रश्न भी करते हैं एक्चुअली हमको पता है कि स्वामी जी की प्रेरणा से ही यह ब्रह्मवादिनी पेपर तो नहीं कहेंगे मैगजीन स्टार्ट हुए थे तो स्वामी जी अभी से इन लोगों को कह रहे हैं कि पहली बात तो है कि उनके जो प्रवचन अभी प्रकाशित हो रहे हैं वह प्रवचन और इसके बाद में जो कुछ भी अभी रामकृष्ण के ठाकुर के बारे में स्वामी जी के बारे में जो कुछ संवाद है अपने शास्त्रों के शास्त्रों में से अच्छे-अच्छे पैसेज लेकर के यह सब पब्लिश करके इस सब मैगजीन में देने चाहिए तो इसलिए स्वामी जी इनकरेज कर रहे थे और इसीलिए पूछे हैं कि जो ये खबर का कागज अर्थात कि हालांकि उन्होंने यहां पर शब्द न्यूज़पेपर यूज किया है किंतु एक्चुअली तो वो मैगजीन ही स्टार्ट हुआ था तो इसके बारे में क्या हुआ चीठी लिखे इत्यादि कोरे शो कोलेर घाड़ गोती दाओ थार पर गड़ गोड़ कोरे चोले जावे स्वामी जी लिखते हैं चिठी लिख कर के अर्थात की पत्र लिख कर के वगैरा सब करके शो कोलेर घड़े गोती दव अर्थात कि किसी ना किसी के सर के ऊपर में इसको बिठा दो उस उसके बाद में यह गोड़ गोड़ करे चले जावे इसके बाद में धम धम करके चला जाएगा या तो फिर कहेंगे कि चलता जाएगा अर्थात क्या कहना चाहते हैं कि एक बार तो किसी के सर पर यह रिस्पांसिबिलिटी डाल दो जो रिस्पांसिबिलिटी लेगा वो इस मैगजीन या तो जो भी कार्य देंगे उसको फटाफट करके चलाता जाएगा जो लोग बेंगोली समझते हैं वह स्वामी जी जिस तरह से शब्द ले प्रयोग करते हैं वो सुनकर के उनको बड़ा ही आनंद आएगा बहादुरी दिखाओ देखी बहादुरी दिखाओ दादा मुक्ति चाई मुक्ति नाई बा हलो दई चार बार नरक कुंडे गले बा दादा मुक्ति न भे मिले तीन चार बार नरक में चले भी जाए एकथा की मिथ्य यह बात क्या गलत है मन स वच स काय पुण्य पियूष पूर्ण त्रिभुवन उपकार श्रेणी भी माण परगण परमाणु पर्वती कृत्य के चित निज हृद विक संत संती संत कि अंत मन स वच स काय पुण्य पियूष पूर्ण मन वचन और कार्य में जो पुण्य पियूष अर्थात की अमृत से पूर्ण है त्रिभुवन उपकार श्रेणी भी जो त्रिभुवन में सभी के ऊपर में उपकार कर रहे हैं और उपकार करके प्रिय माण सबके प्रिय हो रहे हैं परगण परमाणु पर्वती कृत्य के चित जो लोगों के परमाणु के जैसे यानी कि अत्यंत छोटे-छोटे सदगुण भी है उसको वह पर्वती कृत्य के चित पर्वत की तरह बड़ा करके देखते हैं निज हृद विक संत संती संत कि अंत इस तरह से लोगों के ऊपर का लोगों के ऊपर में कल्याण ण करके लोगों के छोटे-छोटे सद्गुण को भी पर्वत की तरह देख कर के जो अपने हृदय का विकास करते हैं संती संत कि अंतः ऐसे संत भी इस जगत में वर्तमान है देखिए यहां पर स्वामी जी ने एक बहुत बड़ी बात कह दी स्वामी जी कहते हैं सबसे पहले तो दो तीन चीजें हैं यहां पर कि किस तरह से एक साधक का हृदय होना चाहिए एक चीज और दूसरी बात कि साधक का एक एटीट्यूड क्या होना चाहिए तो साधक का हृदय कैसा होना चाहिए सर्वप्रथम तो वह दूसरों के छोटे-छोटे सद्गुण भी होंगे तो उसको पर्वत करके देखेगा आजकल जिस तरह से हम लोग देखते हैं बहुत बार क्या होता है कि जैसे वो कहा जाता है ना कि आप किसी के ऊपर में 100 अच्छा भी उसका करें और उसका एक बुरा भी कर दे तो वह व्यक्ति आपकी एक बुराई ही याद रखेगा वो उसके ऊपर में आपने 100 परोपकार किया वो बात वो वो भूल जाएगा तो ये एक सांसारिक व्यक्ति का एक एटीट्यूड होता है अभी सांसारिक शब्द से यह नहीं है कि जो संसार में रहते हैं और साधु शब्द से यह नहीं है कि जो कि आश्रम में रहते हैं अर्थ है कि जिसका सांसारिक एटीट्यूड है जिसका साधु एटीट्यूड है अभी ये एटीट्यूड संसार में रकर घर में रहकर भी भी आप किसी भी तरह का एटीट्यूड हो सकता है यहां आश्रम में भी किसी भी तरह का एटीट्यूड हो सकता है आश्रम में रह कर के भी ऐसे लोग हैं जो कि निंदा करते रहेंगे संसार में करके भी ऐसे लोग होंगे कि हमेशा लोगों की प्रशंसा किया करेंगे एक छोटा सा भी अच्छा काम किया तो कहेंगे कि अरे वाह भाई तुमने इतना सुंदर कार्य कर दिया बहुत अच्छा बधाई हो तुमको तो ऐसा कहने वाले इस तरह का एटीट्यूड कहने वाले लोगों को सा कहते हैं इस तरह के एटीट्यूड रखने वालों को कहते हैं कि उसको वो इस तरह का एटीट्यूड रख कर के अपने हृदय का विकास करेगा संती संत कि अंतः वो अपना हृदय को जद विकस सित करना है हम लोग बहुत बार सोचते हैं कि मंदिर में बैठ कर के या तो फिर जब ध्यान कर कर के या तो फिर साधन भजन करके हम अपने हृदय को डेवलप कर लेंगे या तो फिर हम आत्म साक्षात्कार की ओर चले जाएंगे तो हमको कर्म योग की जरूरत ही क्या है किंतु कर्म योग की जरूरत यहां पे है अपना जो एटीट्यूड है ना वो भी आपको क्लियर करना है आप सोचेंगे कि जब ध्यान साधन भजन करके अपने जितने भी कर्म के संस्कार बने हुए हैं वो कट जाएंगे यह बात बहुत ही कठिन है उसके लिए आपको दिन के प्रतिदिन लाख लाख जप करने पड़ेंगे इंद्रियों के विषयों से अपने को 100% विमुख कर देना पड़ेगा अभी कुछ दिन पहले किसी ने मुझे प्रश्न किया एक साधु ने ही मुझे प्रश्न किया कि एक हम कर्म योग कर रहे हैं उसका क्या प्रयोजन क्या है तात्पर्य क्या है तो यहां पर तात्पर्य यह आता है यदि आप कर्मयोग नहीं करेंगे अच्छा वेरी गुड आप ट्रेडिशनल जिस तरह से साधु सन्यासी साधक लोग साधक गण जिस तरह से साधना करते थे करते जाएंगे वेरी गुड किंतु इस तरह से साधना करने के लिए जो प्रचंड उसके लिए प्रयास चाहिए जो एक प्रचंड त्याग चाहिए उसका एक 1 पर भी आज के हमारे जीवन में नहीं है हमारा मन कोई भी छोटी घटना होती है उससे इमीडिएट विचलित हो जाता है कोई भी हमारे बारे में थोड़ा सा भी हमको लगता भी है बुरा नहीं कहा है किंतु लगेगा कि अरे वो मेरे बारे में बुरा कह रहा है इमीडिएट या तो हम डिप्रेशन में चले जाएंगे या तो हम क्रोधित हो जाएंगे यदि थोड़ा सा भी मेरी इच्छा के अनुसार नहीं हुआ यदि थोड़ा सा भी मुझे मान सम्मान नहीं मिला इमीडिएट हमको इतना बुरा लगने लगता है कि हमको लग हमको हमेशा अपने बारे में एक बड़ा ही एक हाई ओपिनियन रखते हैं कि हां मुझको इस तरह से सम्मान मिलना चाहिए मेरा इस तरह से मेरा कार्य इतना अच्छे से चलना चाहिए मैंने एक इतना हाई ओपिनियन और इस ओपिनियन में जैसे वो गुब्बारा होता है उसमें वो पंचर करते हैं जैसे पिन मार्कर के वैसे ही अपना यह जो बड़ा हाई ओपिनियन है उसमें थोड़ा सा भी पंचर होता है इमीडिएट अपना मन सीधा डिप्रेशन में चला जाता है इसके बाद में देखिए कि शारीरिक व्याधि तो है ही है संसार के जो जितने भी ताप है त्रता है वो तो है ही है यह सब मिलकर के अपने मन को कैसा डिप्रेसो क्रोधित या तो कामुक कैसा कर देते हैं तो इतना इजली अपना मन जद चलित हो जाए तो यह बैठ कर के दिन के चार-चार पांच पांच छछ घंटा जब ध्यान करना यह तो असंभव है हमारे लिए यदि हम इस तरह से बैठेंगे भी तो मानसिक विकृति आ जाएगी हां जो लोग बैठेंगे तो मान लीजिए कि इस तरह से सिद्धि प्राप्त करते हैं तो वह तो सर्वश्रेष्ठ है किंतु इस तरह से सिद्धि प्राप्त करने का रास्ता आजकल हमारे लिए बहुत ज्यादा कठिन हो जा रहा है तो इसीलिए यह कर्म का रास्ता कर्म कर ना है किंतु लोक कल्याण के लिए करना है यह तो एक बात है सभी लोग कहते हैं कि कर्म किस तरह से करना है तो फल की आकांक्षा रखे बिना कर्म करना है कोई भी होगा जिसने हिंदू धर्म का एक प्राइमर भी पढ़ा होगा प्राइमरी किताबें भी पढ़ी होगी तो वह भी बता देगा कि कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचन कर्म के ऊपर में आपका अधिकार है कर्म के फल के ऊपर में नहीं है कर्म योग का क्या अर्थ है तो फल की आशा त्याग करके कर्म करना है वेरी गुड मने बोलने में तो बड़ा आसान लगता है बोलने में तो बड़ा अच्छा लगता है बहुत सारे वॉलंटिली आते हैं बिना किसी फल की अपेक्षा लिटरली फल माने ठाकुर का प्रसाद आता है तो वो भी नहीं खाएंगे ऐसे वॉलंटूरिज्म में से कुछ नहीं लेना आश्रम को कुछ देना है ठाकुर को कुछ देना सेवा देनी है ठाकुर से कुछ ग्रहण नहीं करना ठाकुर से सिर्फ आशीर्वाद लेना है ऐसे एटीट्यूड वाले एकदम माने जिनको कहेंगे स्ट्रांग विल पावर वाले डिवटी यहां पर आते हैं मैंने उनको देखा है तो लिटरली फल की अपेक्षा रखे बिना ये लोग कार्य करते हैं किंतु कर्म योग का सिर्फ यह डेफिनेशन नहीं है कर्म योग का डेफिनेशन थोड़ा सा डीपर जाता है थोड़ा सा गहराई में जाता है आपको कर्म इस तरह से करना है जो कि आपके साथ में रहते हैं उनके छोटे-छोटे सद्गुण को भी बड़ा करके देखना है और बड़े-बड़े दुर्गुण को भी छोटा करके देखना है या तो फिर उसको नजर अंदाज करना है ऐसा करना यह सबसे कठिन है क्योंकि कर्म योग करना आप अकेले बैठ कर के कर्म योग नहीं करने कर पाएंगे साधना आप अकेले बैठ कर के कर पाएंगे मैं अपने रूम में बैठा हूं मान लीजिए या तो अपनी ऑफिस का दरवाजा बंद करके बैठा हूं या तो फिर मैं मंदिर में जाता हूं ना कि कहीं तीर्थ यात्रा में निर्जन स्थान पर जाकर के बैठ करके मैं जब करता हूं दैट इज वेरी गुड मैं यह बात मैं अकेले कर पाऊंगा किंतु कर्म करना कर्म आपको तो 10 लोगों के साथ में मिलकर के ही करना पड़ेगा और जैसे ही 10 लोग इकट्ठा हुए सबसे पहले स्टार्ट होगा ईगो क्लेश वो ईगो क्लेश होने ही वाला है आप कहीं पर भी जाइए मैंने ऐसी एक भी जगह नहीं देखी जहां पर 10 लोग इकट्ठा मिलकर काम करते हो और ईगो क्लेश ना हो वो होना ही होना है उस समय अपने ईगो को कंट्रोल में रख कर के दूसरे लोगों को अपना महत्व देकर के दूसरे लोगों की सराहना करके दूसरे लोगों को प्रेरित करके उनसे काम करवाना यह सही सही लीडर का लक्षण है हम लोग सोचते हैं कि यदि किस में टैलेंट ज्यादा है किसी में अग्रेशन ज्यादा है यह आजकल यह जो लीडरशिप के कोर्सेस यह पर्सनालिटी डेवलपमेंट के कोर्सेस जो चलते हैं उसको देख कर के फिर ये डिबेट वगैरह हो होती है यूनिवर्सिटीज में कॉलेज में तो य लोग यह समझ लेते हैं कि आपको बड़ा ही अग्रेसिव पर्सनालिटी चाहिए यदि आपको टीम वर्क करना है जिससे क्या होगा कि आप सतत अपने टीम मेंबर्स को कंट्रोल में रख पाए सतत अपने टीम मेंबर्स को डरा धमका करके उनके पास में से काम ले सके कार्य ले पाए यह जो मैं स्टीव जॉब्स का बायोग्राफी पढ़ रहा था वोल्टर आइजक सनस का है बहुत ही मैंने एक पढ़ने लायक बायोग्राफी है कि इस तरह से इंडस्ट्री में किस तरह से चलता है तो यह स्टीव जॉब्स का नेचर आज दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है यह एल उसका ये फाउंडर और इसका ये सीईओ उसका नेचर राक्षस जैसा था उसके साथ में काम करना माने कि आपके क्या कहेंगे वो एकदम वो बिल्कुल इस तरह के प्रस्तुत होता था आपके साथ में आपका इतना बार-बार इंसल्ट करेगा इतना आपकी निंदा करेगा मने इस तरह का राक्षस जैसा आदमी कि बहुत बत ज्यादा पैसा मिल रहा है इसीलिए यह लोग इसके साथ में काम करते थे तो यह सब कहानियां पढ़कर के लोगों के मन में यह हो जाता है कि टीम वर्क करना लीडरशिप करना इसका अर्थ है कि लोगों के ऊपर में अपना अधिकार स्थापित करना लोगों को कंट्रोल करके इनके पास में कार्य कराना अपना अग्रेशन दिखाना अपना एक एक्सट्रोवर्ट नेचर दिखाना ये अग्रेसिव नेचर ये एक्सट्रोवर्ट नेचर लोगों को कंट्रोल में करके टीम वर्क होता है यह पूरा आजकल देखेंगे या तो फिर यह कॉलेज में होता है ना डिबेट वगैरह चलती है तो यह कॉलेज के एक दो लड़कों के साथ मेरी बात हो रही थी कभी तो वे लोग सतत आर्गुमेंट करते रहेंगे बोलेंगे कि हम आपको प्रश्न करना चाहते हैं तो वेरी गुड प्रश्न करो फिर मैं जैसे ही उत्तर देता हूं तो फटाफट उसको सामने आर्गुमेंट करते हैं अभी आर्गुमेंट करना गलत नहीं है आप आर्गुमेंट करेंगे प्रश्न करेंगे प्रति प्रश्न करेंगे तो आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा एक्स्ट्रा किंतु प्रति प्रश्न या तो फिर आर्गुमेंट क्यों कर रहे हैं यह लोग बार-बार गोल गोल घुमा करके मुझे बाद में पता चला कि कॉलेज के लड़के हैं डिबेटिंग सोसाइटी में व लोग मेंबर थे और डिबेट का यही है कि कैसे भी करके सामने वाले का व्यू पॉइंट को तोड़ देना अब यह सही है गलत है अपने को कुछ समझना है नहीं समझना है वो दूर की बात है डिबेट फॉर द सेक ऑफ डिबेट तो यह सब एक आजकल क्या कहेंगे कि सोसाइटी में कॉर्पोरेट वर्ल्ड में यह सब कुछ चलता है तो देखिए कि यह भी एक यहां पर कॉर्पोरेट वर्ल्ड है जोक स्वामी जी ने इसकी स्थापना की है किंतु यह दिस इज अ स्पिरिचुअल कॉर्पोरेशन और यहां पर टीम वर्क करने के लिए सबसे पहले जरूरत है एक अंडरस्टैंडिंग की एक भतर में से प्रेम भाव की ये जो यहां पर स्वामी जी लिखते हैं मन स वच स काय पुण्य पियूष पूर्ण मन वचन कर्म में जो पुण्य पियूष से पूर्ण है पुण्य पियूष कितना सुंदर शब्द है अमृत से पूर्ण है अर्थात कि उनका हृदय प्रेम भाव से जो पूर्ण है त्रिभुवन उपकार श्रेणी भी ही प्रिय माण त्रिभुवन के ऊपर में उपकार करके सबके प्रिय माण हो रहे हैं सबके प्रिय हो रहे हैं परगण परमाणु पर्वती कृत्य के चेत दूसरों का जो परमाणु तुल्य सद्गुण है उसको बड़ा पर्वत करके देखते हैं निज रदी विक संत संती संत कि अंतः तो ऐसा करके वह अपने हृदय को विकसित करते हैं तो दो क्राइटेरिया यहां पर स्वामी जी ने कहे हैं यह स्पिरिचुअल कॉर्पोरेशन को किस तरह से चलाया जाए सर्वप्रथम तो आपका हृदय प्रीति से स्नेह से पूर्ण होना चाहिए दूसरा है कि हमेशा पर उपकार करने के लिए तत्पर होना चाहिए देखिए मैं यहां पे रामकृष्ण मिशन की ही बात करूं जब एक छोटा सा उदाहरण देकर के कि अभी कोई सामाजिक अभी कोई फेस्टिवल होता है जब कोई सेलिब्रेशन होता है साधु भंडारा होता है तो कोई कोई साधु क्या करते हैं कि सीधा आकर के वो पंगत है वहां पर बैठ जाएंगे खाना खाने के लिए उसमें मैं सबसे पहला हूं मैं सबसे पहले जाकर के खाना खाने के लिए बैठ जाऊंगा किंतु कोई कोई साधु को देखा है कि वो सबसे पहले जाकर के जहां प सर्विंग के लिए वॉलंटस खड़े रहते हैं वहां पर जाकर खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि हम लोग पहले सर्विंग करेंगे बाद में बैठ कर के खाना खाएंगे तो ऐसे साधुओं को मैंने कंसिस्टेंटली देखा है जहां-जहां पर भी कोई भी कार्यक्रम है फंक्शन है सेलिब्रेशन है फेस्टिवल है सबसे पहले जाकर के कहेंगे कि हम लोग वॉलंटूरिज्म मेरा यही एक रहता है और जद जिस तरह से ये वो जाहिर में भोजन है तो पहले ही जाकर के बैठ जाओ अच्छी जगह खोज करके और आहार करने का शुरू कर दो तो यह देखिए कि ऐसे लोग है जहां पर भी कोई भी कार्यक्रम है कोई भी फंक्शन है कोई भी कुछ भी है वह सबसे पहले जाकर कहेंगी कि हमको वॉलंटिली है तो यह सेवा देने का एक भाव होना चाहिए दूसरा कि हृदय में सबके प्रति प्रीति होनी चाहिए कोई कुछ भी बोलता है तो उसकी बात को तोड़ देना कोई कुछ भी कहता है तो पीछे पीछे में उसकी निंदा करते रहना किसी किसी के हम लोग क्या है ना कभी-कभी थ्रीटन हो जाता है हमको डर लगता है कि अरे ये कोई मेरी पोजीशन तो नहीं ले लेगा अरे ये आया है तो यदि मेरी जगह तो नहीं लेसा वो खास करके ये होता ही होता है कि आप यदि कोई एक ऑफिस में बैठे हैं एक ऑफिसर होक के तो आपका जूनियर जब नया आता है उसमें उसके भीतर में आपको टैलेंट दिखती है तो हमेशा ऐसा लगता है कि वह मेरा पोजीशन ले लेने के लिए षड्यंत्र बना रहा है यह होता ही होता है मैं एक समय में रांची में था तो रांची में हम लोग नाबार्ड बैंक के साथ में कार्य करते थे काम करते थे नाबार्ड अर्थात कि वो जो रूरल डेवलपमेंट के लिए जो बैंक है उसके साथ तो उसके एक दो मैनेजर के साथ में मेरी बातें होती थी तो अच्छा मुझे बड़ा अच्छा लगा नेचर उनका कि अरे वोह आते हैं बात करते हैं बड़ा ही श्रद्धापूर्वक अरे स्वामी जी आप मने क्या है कि ऐसे मने बैंक के मैनेजर उसके भीतर में इतना ये अच्छा नेचर हो साधुओं के प्रति श्रद्धा हो वगैरह तो तो बहुत अच्छी बात है मैंने मैं तो बड़ा खुश हो गया देख कर के कि चलो भारत में सब जगह पर करप्शन नहीं है ऐसे भी लोग हैं जो कि जेनुइनली बैंक के जो रूरल डेवलपमेंट पार्ट जो है वो रामकृष्ण मिशन जैसी संस्थाओं के साथ में मिलकर के अच्छा कार्य करना चाहते हैं ये बड़ा अच्छा लगा देख कर के फिर एक बार ऐसा हुआ कि ये जो मैनेजर था उसका एक जूनियर उसके साथ में आ गया तो मैंने उसके साथ में मेरी बात हो गई किसी कारण से तो अभी उसको पता चला मैनेजर को कि मैंने उसके जूनियर के साथ बात की है तो एकदम वो आ कर के मुझे बता रहा है अरे वो तो आदमी है ना आपको पता है स्वामी जी उसके साथ में बात मत कीजिए ऐसा है वैसा है वो ऐसे उसकी निंदा करना स्टार्ट कर दिया मैं तो एकदम आश्चर्य चकित हो गया कि अरे भाई यह तो इतनी अच्छी पोजीशन लेकर बैठा है इतना उसके हृदय में सहृदयता है लोगों को हेल्प करने की इतनी अच्छी उसकी मने डिजायर है और सडन इसके बारे में इतनी निंदा क्यों कर रहा है बाद में किंतु मुझे पता चला कि उसके साथ में इस तरह से कंपटीशन था और उसको लगता था कि उसकी पोस्ट वो उसके जूनियर को मिल जाएगी तो देखिए वो मने इतनी अच्छी-अच्छी बातें करता है इतना ठाकुर का डिवोटा है मंदिर में जाकर प्रणाम करता था हमारे साथ में इतना अच्छा रिलेशन था इतना हेल्पफुल था किंतु जैसे ही उसको लगा कि उसकी पोजीशन थ्रीटन हो रही है इमीडिएट उसके भीतर का ये जो नेगेटिव एटीट्यूड है उसके भीतर का जो राक्षस है वो जागृत हो गया तो देखिए कि कि इस तरह से अपने हृदय में नेगेटिव एटीट्यूड रख कर के हम लोग जदी सो इमेजिन करते हैं सोचते हैं कि हम लोग साधन भजन में सिद्धि प्राप्त कर लेंगे तो वह कभी नहीं होने वाला यह साधन भजन के नाम पे भारत देश तमस में डूब गया था यह इसका सबसे बड़ा यही कारण है हमको लगता है कि मैं सुबह को उठता हूं और बैठ कर के ठाकुर के सामने बैठ कर के इतना 1000 जप कर लेता हूं फिर ठाकुर की पूजा भी करता हूं और फिर इतने अच्छे वो पीतांबरी वगैरह कोई कोई लोग होते हैं ना इस तरह से बाह्य दिखावा करते हैं सर के ऊपर में तिलक करते हैं गले में रुद्राक्ष की माला पहनते हैं वगैरह वगैरह जो एक दिखावा भी होता है समाज के कोई भी फंक्शन होगा तो वहां पर धर्म की बड़ी-बड़ी बातें भी करेंगे तो मैं इतना सब कुछ कर रहा हूं तो मुझे ठाकुर का दर्शन क्यों नहीं हुआ तो ठाकुर का दर्शन इसलिए नहीं हुआ कि मन के भीतर का ये जो नेगेटिव एटीट्यूड है वो तो अभी तक गया नहीं है कैसे भी जब भी एक मौका ऐसा आ जाएगा कि आपकी पोजीशन खत में आ रही है ऐसा लगेगा फट कर के भीतर से यह भाव बाहर हो जाएगा तो जब तक इसको आप जड़ मूल से काट नहीं देंगे तब तक थोड़ी ना ईश्वर आकर के आपके हृदय में बैठने वाले हैं तो इसलिए स्वामी जी जब कर्म योग के बारे में कहते हैं तो यसा एक जो एक फार्मूला जो है कि फल की आकांक्षा रखे बिना कर्म करो यह नहीं मने इसके भीतर में और बहुत कुछ है सबसे बड़ी बात है कि अपना एटीट्यूड थरम से चेंज करना है फंडामेंटली चेंज करना है हृदय के भीतर में एक स्नेह और प्रीति का भाव प्रकट करना है और हमेशा एक हेल्पफुल रहने की एक रे तत्परता रखनी है तब कहीं जाकर के तो हम कर्मयोग में सिद्धि प्राप्त करेंगे और तब कहीं जाकर के हम जिसको ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी कहते हैं उसके रास्ते पर अग्रसर हो पाएंगे तो इसीलिए स्वामी जी ने एक चार सेंटेंस में कर्मयोग या तो फिर सन्यास जीवन या तो फिर राम कृष्ण संघ का यह जो कांस्टिट्यूशन कहते हैं यह पूरा कांस्टिट्यूशन इस चार लाइन में स्वामी जी ने हमारे सामने रख दिया है मन स वच स काय पुण्य पियूष पूर्ण मन वचन कर्म से पुण्य पियूष अर्थात की अमृत से पूर्ण होना है त्रिभुवन उपकार श्रेणी भी प्रिय माण त्रिभुवन का उपकार करके सबके सबका प्रिय पात्र है परगण परमाणु पर्वती कृत्य के चत दूसरों का जो सद्गुण छोटा सा भी है परमाणु तुल्य सद्गुण भी है पर्वत की तरह बड़ा करके देखना है निज रद विक संत संती संत कि अंत और ऐसा करके अपने हृदय का विकास करना है तो यह है असली साधु की डेफिनेशन तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्त