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Swami Vivekananda My Plan Of Campaign ·

मेरी क्रान्तिकारी योजना : स्वामी विवेकानन्द : भारतीय व्याख्यान || 11 jul 2025

Invocation

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन 17th पॉइंट हमारा चल रहा था रामकृष्ण मिशन स्वामी जी ने ऑलरेडी कहा कि किस तरह से एक संघ की स्थापना करके उनको वह वेदांत का और श्री रामकृष्ण देव का मैसेज पूरे विश्व में फैलाना चाहते थे। वो फेमस घटना है कि अमेरिका में स्वामी जी उनकी एक लेडी डिवोटी को कहते हैं कि आई हैव फॉलन इन लव। मैं प्रेम में पड़ गया हूं। तो वह लेडी कहती है कि वह कौन है ऐसी लड़की कि जिसके प्रेम में आप जिसके प्रति आपको प्रेम हुआ है। तो स्वामी जी ने कहा इट इज एन ऑर्गेनाइजेशन। यह जिस तरह से क्रिश्चियन ऑर्डर्स संघ होकर के यह क्रिश्चियनिटी का फैलावा करते हैं पूरे विश्व में तो इसी तरह से वो स्वामी जी भी चाहते थे कि रामकृष्ण संघ है उसके जो सन्यासी है संघ होकर के पूरे विश्व में फैले पूरे गांव-गांव शहरश जाकर के वेदांत और श्री रामकृष्ण देव की अमृतमय वाणी का प्रचार करें। तो यह हमने पहले दो पैराग्राफ ऑलरेडी देख लिए हैं। अभी यह थर्ड

संकल्प शक्ति (will power) सबसे बड़ी ताकत है

पैराग्राफ है। वह हम देखते हैं। क्या कहते हैं स्वामी जी? द विल इज स्ट्रांगर देन एनीथिंग एल्स। विल पावर है। संकल्प शक्ति है। इस जगत में सब चीजों से ज्यादा शक्तिशाली है। एवरीथिंग मस्ट गो डाउन बिफोर द विल। सब विल पावर के सामने संकल्प शक्ति के सामने सबको झुकना होगा। सभी चीजों को झुकना होगा। फॉर दैट कम्स फ्रॉम गॉड एंड गॉड हिमसेल्फ। क्यों? क्योंकि संकल्प शक्ति ईश्वर के पास में से ही प्राप्त होती है। और कहां से नहीं। अ प्योर एंड स्ट्रांग विल इज ओमनीपोटेंट। एक प्योर और स्ट्रांग विल होता है। वह सबके ऊपर में विजय प्राप्त करता है। डू यू नॉट बिलीव इन इट? क्या आप लोगों को इस बात के प्रति कोई विश्वास नहीं है क्या? क्या आप इसको आप इसके बारे में इसके ऊपर में आपकी श्रद्धा नहीं है क्या? प्रीच प्रीच अनटू द वर्ल्ड द ग्रेट ट्रुथ्स ऑफ ऑफ योर रिलीजन। द वर्ल्ड वेट्स फॉर देम। इस जगत में अपने धर्म के जो महान उपदेश है उसको प्रीच करो। उसको सिखाओ। उसका प्रचार करो। क्यों? क्योंकि जगत इसकी राह देख रहा है। देखिए यहां पर वैसे तो बात चल रही है ऑर्गेनाइजेशन की और भाव प्रचार की। अमृतमय वाणी के प्रचार की। उसमें यह विल पावर की बात कहां से आ गई? किंतु जैसे कि यहां पे हम देखते हैं कि यह जो तीन पैराग्राफ है, तीन पैराग्राफ में स्वामी जी स्टेप बाय स्टेप हमको पूरा जो यह मास्टर प्लान है, उसका ऑटोप्सी करके दिखाते हैं। किस तरह से? कि यदि किसी भी तरह का धर्म का प्रचार करना है, किसी भी तरह की भावधारा का सिस्टमैटिक प्रचार करना है तो आपको इंस्टिट्यूशन चाहिए। बिना इंस्टीट्यूशन के अकेले व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। वो जो फेमस कहानी है ना कि एक फादर अपने लड़कों को इकट्ठा करके वो बताता है कि सभी लड़कों को जो भाई है आपस में भाईचारे से रहना चाहिए। वरना तो क्या होगा? यदि इन लोगों में झगड़ा होगा तो यह लोग कमजोर हो जाएंगे। कैसे? तो वह उपमा देकर के एक एग्जांपल देकर के बताते हैं। वह छोटी-छोटी लकड़ियां इकट्ठा करके एक के बाद एक सिंगल लकड़ी तोड़ना प्रयास करते हैं। तो सिंगल जो लकड़ी होगी ब्रांच होगी पेड़ की आराम से टूट जाएगी। किंतु यह जितनी भी छोटी-छोटी ब्रांचेस है उन सबको आप इकट्ठा करके अच्छे से बंडल बनाइए। फिर उसको तोड़ने का प्रयास कीजिए। वो नहीं टूटेगी। क्यों? क्योंकि एकता में वो शक्ति है। तो वेरी गुड। यह इंस्टिट्यूशन का आवश्यकता तो हमको समझ में आया। उसके बाद में चलिए हमको पता है कि इंस्टीट्यूशन जो है वह तो कोई आपका बिल्डिंग है ना कि बैंक अकाउंट है ना कि यह सब इंस्टिट्यूशन नहीं बनाता। इंस्टीट्यूशन एक्चुअली बनाते हैं मैन पावर। मनुष्य जो होता है, इंसान जो होता है, वही संघ की रचना करता है। तो यदि वहां पे ठीक-ठीक ट्रेंड मैन पावर नहीं रहेगा, डेडिकेटेड मैन पावर नहीं रहेगा, तो इंस्टीट्यूशन नहीं चलेगा। तो यह सेकंड स्टेप में उन्होंने समझाया। किंतु फिर यहां पे प्रश्न होता है कि ये जो डेडिकेटेड विलिंग एंड स्ट्रांग एंड विगरस मैन पावर जो है वो स्ट्रेंथ एंड विगर कहां से आता है? वह थर्ड स्टेप में स्वामी जी कहते हैं विल पावर से आता है। विल पावर है ईश्वर के पास में से प्राप्त हुई डायरेक्ट शक्ति। यह विल पावर यदि नहीं रहेगा तो फिर हम किसी भी तरह का स्ट्रेंथ हमारे भीतर में नहीं डेवलप कर पाएंगे। अभी आप लोग कहेंगे कभी-कभी कि अच्छा ठीक है ठाकुर तो इतने मतलब यह जितनी भी डेफिनेशन है श्रेष्ठ मनुष्य की उन सभी डेफिनेशन में ठाकुर तो आ जाएंगे किंतु ठाकुर का देह कितना कोमल था पता है एक खास तरह की पूरी आती है लुची बंगाली में कहते हैं थोड़ी सी हार्ड होती है तो ठाकुर की हाथ इतने कोमल थे कि वह पूरी तोड़ते उनके हाथ में लग गई और खून बहने लगा जैसे वो कांटा चुभता है तो कैसे खून निकलता है तो पूरी या तो फिर यह लूची इसको काटने से ही इसको तोड़ने से ही खाने के समय उनके हाथ में लग गया और खून बहने लगा इतना कोमल ठाकुर का देह था तो ठाकुर निश्चय यदि स्वामी जी की जो डेफिनेशन है स्ट्रांग विगर एंड बिलीफ यानी कि स्ट्रेंथ विगर एंड बिलीफ ये ठाकुर में तो है ही है किंतु इनका देह इतना कोमल है तो फिर स्ट्रेंथ किसको कहते हैं तो यह स्ट्रेंथ आता है विल पावर का। अच्छा विल पावर की जो स्ट्रेंथ है जनरली स्ट्रेंथ या तो शक्ति होती है किसी दुश्मन के साथ में लड़ने के लिए जो हम इस्तेमाल करते हैं उसको हम शक्ति कहते हैं। शक्ति कहते हैं। जो कि एक ऑपोजिट फोर्स होती है। उसका मुकाबला करने के लिए हमारे पास में एक पॉजिटिव फोर्स होनी चाहिए। इस पॉजिटिव फोर्स को हम कहेंगे शक्ति। तो दैहिक शक्ति का अर्थ तो हम सबको समझ में आता है कि युद्ध के मैदान में रणक्षेत्र में जैसे कि अर्जुन ने गांडीव से जो शत्रुओं का वध किया था भीम ने गदा से जो वध किया था भगवान राम ने अपने बाणों से शत्रुओं का वध किया था या तो फिर यह दुर्गा या तो मां काली इनके हाथ में खड़ग रहता है त्रिशूल रहता है यह जो सब आयुध और अस्त्रशस्त्र होते उसका इस्तेमाल करने की जो क्षमता है उसको हम शक्ति कहेंगे। ठाकुर के पास में कौन सी शक्ति थी? हमारे रामकृष्ण संघ के जो यह 16 गुरु भाई थे वैसे तो सभी के सभी पहलवान थे रेसलिंग सीखते थे। किंतु दैट इज नॉट अ प्रॉपर डेफिनेशन ऑफ शक्ति इन आध्यात्मिक जगत। यहां पे हमारे सामने ऑोजिंग फोर्स है इंद्रियों के आकर्षण। इंद्रियों के आकर्षण के सामने टिकने के लिए हमारे मन के भीतर में प्रचंड विल पावर चाहिए। यह विल पावर यदि हमारे पास में नहीं होगा तो जैसे ही हम साधना करतेकरते हमारा भाव जैसे ही थोड़ा सा सूक्ष्म होगा वैसे ही इस सूक्ष्म भाव के माध्यम से यह सूक्ष्म भोग हमारे मन में प्रवेश करेंगे और अपने मन को तहसनहस कर देंगे। अपने मन को तबाह कर देंगे। बेटर है कि आप साधना ना करें। गृहस्थ का जीवन जिए। किंतु साधना करतेकरते जैसे ही अपनी इंद्रियां है, जैसे ही अपना मन है, जैसे ही हमारी ग्रहण शक्ति है, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाएगी, वैसे ही यह भोगों का जो प्रकोप है, वह बढ़ता जाएगा। और यह बढ़ता हुआ प्रकोप यदि हमारे मन में आकर के घर करके बैठ गया तो वह मनुष्य फिर इंसान नहीं रहेगा। हैवान हो जाएगा। जैसे कि हमको पता है यह जग जाहिर है कि इस विश्व में सबसे ज्यादा तबाही यदि किसी एक फोर्स कोई एक शक्ति है जिसने यह तबाही सबसे ज्यादा ले आई है तो वह धर्म है। धर्म एक दो धारी तलवार है। धर्म से पूरे जगत को बेनिफिट भी बहुत हुआ है। जबकि इस धर्म को प्रॉपर्ली अप्लाई किया गया है। और धर्म जब धर्म जुनून में परिणत होता है तो इसी धर्म जुनून ने पृथ्वी पे जितने लोगों की कत्ल की होगी जितने लोगों पर अत्याचार किया होगा उतना और किसी ने नहीं किया। ना ही यह कम्युनिज्म ना ही यह फासिज्म ना ही यह आजकल की जितनी भी आईडियोलॉजी है धर्म इन सबसे डेंजरस आईडियोलॉजी है। क्यों? क्योंकि एक बार कोई भी व्यक्ति धर्म का पालन करने का प्रयास करता है। किसी भी तरह की साधना या उपासना करने का प्रयास करता है। वैसे ही उसकी जो मन की जो क्षमताएं हैं वो विकसित होना शुरू हो जाती है। तो अभी जो एक सामान्य आदमी है तब तक उसकी क्षमता भी सामान्य है। किंतु धर्म का पालन करके उसकी जो कैपेसिटी है वो बिल्ड होना शुरू हो जाती है। कैपेसिटी बिल्डिंग जिसको कहते हैं तो यह उसकी क्षमता बढ़नी शुरू हो जाती है और एक बार यदि उसकी क्षमता बढ़ेगी उसके बाद में यदि उसके भीतर में यह जो सूक्ष्म रूप से यह हैवानियत प्रवेश करेगी तो फिर वह व्यक्ति क्या से क्या नहीं कर सकता है। इसलिए यह जो धर्म का रास्ता है वह डेंजरस भी बहुत है। यदि आप सक्सेसफुल इसमें हो गए तो आपका अस्तित्व है इस समाज के लिए आशीर्वादमय हो जाएगा। और यदि आप अनसक्सेसफुल रहते हैं, रास्ते में कहीं पर आपका पैर फिसल जाता है, अपना विल पावर इंद्रियों के आक्रमण के सामने कमजोर पड़ जाता है, तो फिर उस तरह के मनुष्य से बड़ा हैवान और कोई नहीं है। यह कितनी ही कहानियां भारत में है कि यह ब्राह्मण का लड़का था। उसके पिताजी इतने धार्मिक थे। फिर वही लड़का पता नहीं विधर्मी हो गया। कन्वर्जन कर लिया। फिर इसी आदमी ने अपने हिंदुओं पे ही सबसे ज्यादा अत्याचार करने का प्रारंभ किया। इस तरह की कहानियां बहुत मिलेगी। तो क्या है कि जो एक धर्म का पालन करने के समय या तो फिर इन जनरल कोई भी बड़ा काम आपको करना है तो इंद्रियों के जो आक्रमण है यह जो सूक्ष्म प्रलोभन है यह सूक्ष्म हैवानियत है यह सूक्ष्म वासनाएं है जो कि हमारे मन के ऊपर में सब समय एक सूक्ष्म आक्रमण करते रहते हैं उससे बचने की शक्ति चाहिए और जैसे-जैसे हम साधना करने में आगे बढ़ते जाएंगे या तो फिर जैसे जैसे-जैसे अपनी क्षमता का निर्माण होना शुरू होगा, वैसे ही यह आक्रमण कई गुना बढ़ जाएगा और उससे बचने के लिए हमको बड़ा ही प्रचंड विल पावर चाहिए। तो यहां पर देखिए और ठाकुर का देखिए ठाकुर के सामने कितने

कहानी: श्रीरामकृष्ण की संकल्प शक्ति (will power)

सारे प्रलोभन आकर के खड़े होते थे। यह जो मथुर बाबू है एक बार उन्होंने ठीक किया कि यह जो ठाकुर मां मा करके रोते रहते हैं पूरा दिन भर इसका क्यों ऐसा करते हैं तो मथुर तो संसारी था उसने सोचा कि यह जो अखंड ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं ठाकुर इसीलिए ऐसा कुछ कर रहे हैं इसीलिए उनका माथा मस्तिष्क है उनका विकृत हो गया है तो ब्रह्मचर्य का भंग यदि नहीं होगा तो फिर ठाकुर पूरे पागल पूरे हाथ से जाएंगे तो यह सोच सोच करके फिर वो क्या करते हैं मथुर बाबू वो ठाकुर को वहां पर ले जाते हैं वो जो जहां पर इस तरह की स्त्रियां रहती है और फिर किंतु ठाकुर ने जैसे ही इस तरह की स्त्रियों को देखा वैसे ही वह मां मां करना शुरू कर दिया उनके भीतर में भी जिनका चरित्र अच्छा नहीं है इनके भीतर में भी ठाकुर को जननी का आध्या शक्ति का जगदंबा का दर्शन होता था तो देखिए कि और फिर ठाकुर कहते कि उनका जो यह अंग होता है वह कुर्म की तरह सिकुड़ गया था। तो देखिए कि यह ठाकुर के भीतर में इतना प्रलोभन आने के बावजूद उसके सामने वह टिके रहे। क्यों? क्योंकि मां के ऊपर में श्रद्धा तो है ही है किंतु साथ-साथ में यह विल पावर भी ठाकुर का बड़ा ही प्रचंड है। यह जो इतनी तंत्र साधना की कहानी तो पता है हमको वो जो जिस तरह से युवती के साथ में बैठकर के सामने बैठकर के ठाकुर को जप करना हुआ था। तो भैरवी ब्राह्मणी है। वह कभी-कभी मधुर भाव का गीत गाना शुरू कर देती थी। तो ठाकुर कहते थे नहीं मैं तो मातृभाव ही समझता हूं। स्त्रियों के प्रति मधुर भाव नहीं। मधुर भाव रखना है तो आपको ईश्वर के साथ में रखना है। किसी मनुष्य के साथ में नहीं। देखिए मां शारदा देवी जब पहले पहली बार जब दक्षिणेश्वर आई थी। ठाकुर के साथ में एक ही कमरे में शयन कर रही थी। तो एक दिन ठाकुर ने सोती हुई मां को देखकर के कहा अपने मन को कहा क्या कि मन यह देख इसी को लोग कहते हैं स्त्री शरीर और इसी के लिए लोग लालायित होकर के घूमते रहते हैं इसके भोग करने के लिए। तुमको यदि इसका भोग करना है तो यह है मां सामने ही है। उसका भोग कर लो। मन में एक और फिर मुंह पे एक और मन में दूसरा ऐसा कभी मत करना। मुंह पर तो बोल रहे हो कि काम कांचन त्याग करना है किंतु मन के भीतर में वासना है। तो तो फिर यह तो बड़ा भयानक हो गया। ऐसा सोच कर के ठाकुर ने जैसे ही मां का स्पर्श करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया, वैसे ही ठाकुर समाधि में मग्न हो गए और फिर बड़ी मुश्किल से दूसरे दिन उस समाधि भंग हुई थी। तो देखिए कि ठाकुर के सामने प्रलोभन कितने आते रहते थे। यही मथुर बाबू हृदय के साथ में वार्तालाप करतेकरते मंदिर के सामने में ही कह रहे हैं हृदय को कि ठाकुर की सेवा के लिए तुमको एक जमींदारी लिख देता हूं। ठाकुर खुद तो कुछ मैनेज करेंगे नहीं तो हृदय यह जमींदारी मैनेज करेगा। तो यह दोनों वार्तालाप कर रहा है। उसी समय ठाकुर ने सब सुन लिया। तो आकर के मथुर बाबू को कहते हैं कि भाई तुम इस तरह से कुछ मत करना। मुझे यह सब पसंद नहीं है। इस तरह का किसी भी तरह का संग्रह या तो फिर यह जो जो भोग की चीज है उसको मैं अपने पास में नहीं रख पाऊंगा। तो ऐसे कितने ही सूक्ष्म प्रलोभन ठाकुर के सामने आते रहे। वह जो फेमस घटना है कि ठाकुर को पंचवटी के नीचे में दो स्त्रियों का सुंदरी स्त्रियों का दर्शन हुआ। एक ने नथ भी पहन के रखी थी और उसके बाद में एक गोरे खलासी का भी दर्शन हुआ था जिसके पास में इसके हाथ में एक थाला था। थाले में यह संदेश सोना महोर सुंदर वस्त्र सब पड़े थे। तो देखिए कि यह पूरे जगत का भोग ठाकुर के सामने आकर के खड़ा था और ठाकुर ने सब कुछ एक के बाद एक रिजेक्ट कर दिया। तो यहां पे हमारे सामने

शारीरिक शक्ति, साहस, और संकल्प शक्ति

यदि इस तरह का कोई प्रलोभन आ जाए तो हम क्या इसका मुकाबला कर पाएंगे कि नहीं यह कहना बड़ा ही मुश्किल है। तो इसीलिए यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि यह विल पावर चाहिए। यदि आपको एक स्ट्रांग विगरस एंड बिलीविंग यंग मैन ऊपर वाली जो कंडीशन है कि मजबूत शक्तिशाली उसके हृदय में और उसकी बाहों में शक्ति हो। बाहुओं में शक्ति हो और जिसके मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा भक्ति हो। इस तरह का यदि यंग मैन आपको चाहिए तो उसके भीतर में स्ट्रांग विल पावर होना चाहिए। क्योंकि बिना विल पावर के फिजिकल स्ट्रेंथ किसी काम की नहीं। स्वामी जी का जो फेमस स्टेटमेंट है कि ये जो इनका विज़न था अखंडानंद जी का एक रात को सोए हुए थे। देखा कि स्वामी जी बड़े ही बलिष्ठ मुस्लिम फकीर के वेश में जा रहे हैं। और ऐसा स्वामी जी को इस तरह का वेश सजाए हुए देखकर के वो अखंडानंद जी सपने में ही वो स्वामी जी को पूछते हैं कि क्यों स्वामी जी आपने मुस्लिम फकीर का वेश धारण किया है। तो स्वामी जी ने क्या कहा कि इस्लामिक बॉडी एंड वेदांतिक ब्रेन अर्थात कि वो मुगल को कहते थे मुगल रक्त है आत्मारसुरा अर्थात कि सूरा अर्थात कि मध्य शराब जो कि हमारे मन को एकदम स्ट्रांग कर देती है। इस अर्थ में सुरा का अर्थ किया है। आत्मा अर्थात कि यहां पे आत्मन वह आत्मन नहीं किंतु यह जो हिंदू जो धर्म था या तो फिर यह भारत देश था इसमें जो भारतवासी थे वो फिजिकली और मेंटली इस तरह से कमजोर हो गए थे कि एक स्ट्रांग मुगल रक्त जो है एक स्ट्रांग मुगल प्रेजेंस जो है वो हिंदुस्तान को हो सकता है कि हमारे कमजोर हिंदू भाइयों को फिर से स्ट्रेंथन करें। इसलिए स्वामी जी कहते थे मुघल रक्त है आत्मा की सुरा आत्मा और सुरा तो देखिए कि यह जो स्ट्रेंथ जो होती है फिजिकल स्ट्रेंथ किंतु वो कब काम करेगी हमको पता है कि जहांजहां पे ये जो बाकी अफगानिस्तान है या अब मिडिल ईस्ट देख लीजिए बहुत सारे कंट्री है वहां पे भी वह धर्म फैला है। किंतु वहां पे तो उन्होंने यह तहसनहस करने के अलावा और कुछ नहीं किया। इसलिए एक और चाहिए हमको फिजिकल स्ट्रेंथ चाहिए और दूसरी और इस फिजिकल स्ट्रेंथ को चैनलाइज करने के लिए आपको मेंटल स्ट्रेंथ चाहिए। सिर्फ यदि फिजिकल स्ट्रेंथ है तो इस तरह का आदमी यह मोंगोल हमलावर जैसे थे कि यह पूरे उसके वह जो वेव्स आफ्टर वेव्स की तरह वह आते रहते थे। लोकस्ट जिसको कहते हैं ना लोकस्ट जो गांव में जिन लोग रहते होंगे उन्होंने लोकस्ट देखा होगा वह क्या है वह छोटे-छोटे ये ये होते हैं उड़ने वाले ये होते हैं जिस खेत में जाकर के बैठेंगे उसका पूरा झुंड होता है जिस खेत में जाकर के बैठेगा उस खेत का जितना भी यह जो फसल उगाई हुई है सब खा के खत्म कर देगा और उसके यह जो यह होता है पूरा झुंड एक जगह से दूसरी ओर जाता है जहांजहां जाता है वहां वहां पे खेत के खेत वो बर्बाद करते रहता है। तो वैसे ही यह मुगल ये जो मोंगोल थे वो मंगोलिया से निकले। जहांजहां पे भी वो गए उनके वेव्स आफ्टर वेव्स ऑफ मिलिट्री पावर उनका जहां-जहां गया वहां वहां पे उन्होंने गांव के गांव शहर के शहर कत्लेआम की लोगों के सर काट करके वो जो कटे हुए सरों का पहाड़ बनाते थे और उसके बाद में पूरे गांव को जला देते थे। तो यह माने स्ट्रेंथ सिर्फ यदि होगी तो वह पावर जो है सिर्फ डिस्ट्रक्टिव पावर होगा। दूसरा है यहां पर भारत में जैसे इतने लंबे समय से होता आ रहा था कि हां अपने पास में वेदांत तो है। अपने पास में आत्मश्रद्धा तो है। अपने पास में ईश्वर के ऊपर में विश्वास भी है। इंद्रियों को संयम करने की शक्ति भी है। किंतु यह जो फिजिकल स्ट्रेंथ और यह करेज माने ये सिर्फ फिजिकल स्ट्रेंथ की बात नहीं है। एक करेज चाहिए। अभी जैसे देखिए जो लोग जहाज लेकर के दूसरे जगत एक देश से दूसरे देश की ओर जाते थे यह वाणिज्य करने ये जो एक ट्रेडिंग करने के लिए वास्कोडिगामा है कैप्टन कुक है मेजलान है कितने ही जो पायोनियर्स थे अभी ये जहाज लेकर के जाते थे उस समय कोईकोई लोग ऐसा मानता था कि पृथ्वी जो है फ्लैट है ये पृथ्वी एक ग्लोब नहीं है सर्कल नहीं है किंतु फ्लैट है यानी यानी कि एक सतह के ऊपर में ही है। वहां पर समुंदर जब उसकी जो उसके धार पे चला जाएगा उसके माने एज के ऊपर में चला जाएगा जहां पृथ्वी खत्म होती है वहां से सीधा वो अवकाश में वह समुंदर गिरता है और जो जहाज होगा वह भी खुले अवकाश में गिरेगा और फिर वह हमेशा के लिए गिरता ही रहेगा। ऐसी कोई कोई लोगों की मान्यता थी तो किंतु उस समय इस तरह से जहाज लेकर के यह जो नए जगत की खोज के लिए जाना न्यू वर्ल्ड अमेरिका को खोजना ये इंडिया को खोजना गए थे एक्चुअली इंडिया को खोजने के लिए किंतु जो भी अमेरिका मिल गया रास्ते में तो किंतु ये करेज कितना चाहिए आपको आप इतने लंबे समय तक अब खुले समुंदर में तैर रहे हैं कहीं पर चारों ओर कहीं पर जमीन का नामोनिशान नहीं है। इस तरह की जो भयानक माने मेंटल जो स्ट्रेस होता है अपने ऊपर में उसको फेस करने के लिए करेज चाहिए तो एंथूजियाज्म चाहिए तो भीतर में से एक लाइवलीनेस चाहिए तो ये जो एडममंड हिलरी वगैरह है जो कि ये एवरेस्ट सर किया। अभी ये आजकल के एस्ट्रोनॉट जो कि स्पेस में जाते हैं। ये सबसे पहले अपने एस्ट्रोनॉट जो कि चांद के ऊपर में गए। पहली बार मनुष्य ने दूसरे किसी पृथ्वी को छोड़कर के और किसी जगह पे पैर रखा है तो उस समय तो कौन-कौन सी माने कुछ भी हो सकता है ना यह लोग तो सेफली वापस आ गए किंतु कुछ भी हो सकता था। आज यहां पर पृथ्वी पर बैठकर कौन कह सकता है कि चांद के ऊपर में क्या हो सकता है? अपने पास में थिरीस है। अपने पास में साइंस है किंतु यह साइंस तो फिर थ्यरी ही तो है ना। जब तक आप वहां पे जाएंगे नहीं तब तक यह कैसे प्रूव होगा? बिल्कुल पहली पहली बार जब हमने अवकाश में रॉकेट भेजना शुरू किया था तो कुछ पता नहीं था हमको कि यह मनुष्य के ऊपर में यह जो ओपन स्पेस है जीरो ग्रेविटी या तो फिर कहेंगे माइक्रो ग्रेविटी। जीरो ग्रेविटी आजकल नहीं कहते। कहते हैं माइक्रो ग्रेविटी। तो यह माइक्रो ग्रेविटी में यदि अवकाश में भेजेंगे मनुष्य को तो उसके शरीर पर क्या असर होगी? किसको पता? तो फिर इन लोगों ने एक बंदर है। सोवियत यूनियन ने एक बंदर है। फिर एक कुत्ता है। इस सबको अवकाश में भेजा था एक्सपेरिमेंट करने के लिए कि वो जिंदा भी रहते हैं माइक्रो ग्रेविटी में कि वो मर जाते हैं। मनुष्य का शरीर क्या सिर्फ पृथ्वी पर रहने के लिए ही बना है ना कि फिर वो अवकाश में भी रह सकता है। भले ही चाहे कितना ही उसको प्रोटेक्ट करके रखे किंतु वो एक फिजिकल वो भी तो एक एक होता है ना कि हमने जो प्रोटेक्शन प्रोवाइड किया है एस्ट्रोनॉट को वो सफिशिएंट भी है कि नहीं। तो देखिए कि जो एकदम पायोनियरिंग वर्क करना है वेस्टर्न सिविलाइजेशन ने जो किया है इसकी वजह से उन्होंने बड़े लंबे समय तक उन्होंने सुपीरियरिटी है पृथ्वी पे उनका मेंटेन हुआ है बहुत सारे दूसरे देशों पे उन्होंने राज्य किया है तो एक तो फिजिकल स्ट्रेंथ होना चाहिए दूसरा एक करेज होना चाहिए तो यह सब कहां कहां से आएगा एक प्रचंड विल पावर होगा तो आएगा यदि विल पावर नहीं है सिर्फ करेज है तो इस तरह के जो लोग हैं जैसे कि मोंगोल जैसे कि हूण ना कि जैसे कि यह मुगल ना कि यह फिर ये जैसे कि एलेग्जेंडर की जो आर्मी थी हिटलर था वे लोग क्या करेंगे जहांजहां पे उनकी आर्मी जाएगी सिर्फ तबाही लोग लेकर के आएगी और यदि करेज है और फिर अपने पास में विल पावर भी है इस विल पावर की मदद से हम इस करेज को चैनलाइज कर सकते हैं। क्यों? क्योंकि स्वामी जी क्या कहते हैं? विल पावर आता है ईश्वर के पास से। तो यह पॉजिटिव विल पावर है। उसको लेकर के हम अपनी स्ट्रेंथ, अपना करेज, अपनी शारीरिक क्षमता, अपनी मेंटल कैपेसिटी इन सबको यदि चैनलाइज करें प्रॉपर्ली तो इस तरह का मनुष्य जगत के लिए आशीर्वादमय हो जाएगा। वो फिर चाहे कोई भी

ईश्वरीय संकल्प शक्ति और राक्षसी संकल्प शक्ति - 1

क्षेत्र में हो चाहे वह कोई पॉलिटिकल लीडर हो जैसे कि महात्मा गांधी थे या तो फिर यदि कोई बड़ा साइंटिस्ट हो जैसे कि अल्बर्ट आइंस्टाइन था ना कि वो कोई साधु संत हो जैसे कि यह इतने सारे भारत में उदाहरण है चैतन्य महाप्रभु है ना कि शंकराचार्य है ना कि मीराबाई है ना कि इतने सारे उदाहरण है। कोई भी क्षेत्र में आप जाइए, आपका यह जो पॉजिटिव विल पावर है, वह आपको आशीर्वादमय बनाएगा। तो इसीलिए स्वामी जी यहां पे सबसे पहले तो कहते हैं इंस्टीट्यूशन बनाना है। फिर कहते हैं इंस्टीट्यूशन को चलाने के लिए स्ट्रांग विगरस बिलीविंग यंग मैन चाहिए। और यदि स्ट्रांग विगरस और बिलीविंग यदि हमको होना है तो हमको प्रचंड विल पावर चाहिए। इस तरह का विल पावर जो कि ईश्वर के पास में से आया है। देखिए बहुत सारे लोग गुस्से में आकर के बहुत कुछ करते हैं। यह जितने भी यह क्रिमिनल देखते हैं हम लोगों को लगता है कि क्रिमिनल के पास में इतनी शक्ति कहां से आती है? टेररिस्ट को ही ले लीजिए। यह टेररिस्ट यदि एक दूसरे देश में इनफिल्ट्रेशन करता है, वहां की आर्मी होती है, बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स होती है। उस सबको अतिक्रम करके बॉर्डर कैसे भी करके क्रॉस करना यह तो कोई छोटी-मोटी बात तो है नहीं। आपको तो कितना करेज चाहिए होता है उस समय। सामने फायरिंग हो रहा है। या तो फिर सामने यह जो सैनिक लोग हैं बॉर्डर के ऊपर में सब तैनात खड़े हैं। वो बनोकुलर लेकर के ना आजकल तो ड्रोन वगैरह सब कुछ आ गया है। रेडार है, ड्रोन है, बनोकुलर है, कुत्ते होते हैं मनुष्यों को पकड़ने के लिए इस तरह के घुसपैठियों को पकड़ने के लिए। वह सब बाधा अतिक्रम करके उस देश में घुस जाना और फिर लोगों की हत्या करना इसके लिए भी तो करेज चाहिए। किंतु यह टेररिस्ट का जो करेज है या टेररिस्ट की जो स्ट्रेंथ है वह गुस्से में से प्रकट होती है। क्योंकि क्या है जो टेररिस्ट टेररिज्म का जो ट्रेनिंग लेते हैं उन लोगों को इस तरह के वीडियो दिखाए जाते हैं कि देखिए हमारे दुश्मन लोगों ने हमारी प्रजा पर इतना सारा अत्याचार किया है। इस तरह के उनको वीडियो दिखाते हैं। तो इस तरह के वीडियो देखकर के उनके मन में प्रचंड क्रोध प्रकट होता है। और यह लोग कहेंगे कि हां इसे दुश्मन को हम दिखा देंगे। सबक सिखाएंगे तो सबक तो आपकी आर्मी तो कमजोर है। वैसे तो आर्मी टू आर्मी आप फाइट करेंगे तो आपकी पिटाई होगी। तो बेटर है कि टेररिज्म का सहारा लिया जाए और निर्दोष मनुष्यों की हत्या की जाए। तो इस तरह से टेररिस्ट जो होता है उसको गुस्से के माध्यम से उसकी विल पावर को स्ट्रेंथन किया जाता है। उसका विल पावर स्ट्रेंथन होगा तो कोई भी करेजियस काम कर लेगा। किंतु देखिए कि वह विल पावर जो है क्रोध में से प्रकट हुआ है और यह क्रोध के साथ में उसकी कामना वासनाओं को भी भड़काया जाता है। उसको ड्रग्स दिया जाता है वगैरह-वगैरह कितना ही उसका ब्रेन वाश करने के लिए किया जाता है। सुसाइड बमबर की एक पूरी स्कूल थी। वही एक मैंने पढ़ा था एक जगह पे एक आर्टिकल में किस तरह से सुसाइड बमबर को मोटिवेट करते हैं। किस तरह से उनको ट्रेन करते हैं। वह भी एक है कि चलिए उसके लिए भी आपको विल पावर चाहिए। अपने बॉडी के ऊपर में बम है। आप बटन दबाएंगे। आपका तो मृत्यु निश्चित ही है। तो आप कैसे इस तरह के अपने को मोटिवेट करेंगे? तो जो भी है वो बड़ी लंबी उसका साइकोलॉजिकल प्रोफाइल था। ये स्कूल वाले जो होते हैं ना सुसाइड बमबर की स्कूल वाले मनुष्य की साइकोलॉजी को बड़े अच्छे से पहचानते हैं। मनुष्य की वीकनेस क्या है पकड़ लेते हैं और फिर उस वीकनेस के ऊपर में वे लोग काम करते हैं। इसकी यह वीकनेस है। इसको इस तरह से मोटिवेट करो। इसकी यह वीकनेस है। किसी किसी के घर में पॉवर्टी है तो उसको कहते हैं कि ये जो वैसे ही तुमको गरीबी में मरना है। बेटर है कि तुम यहां पे आकर मरो। किसी किसी का ये आइडियोलॉजिकल कन्विक्शन बड़ी स्ट्रांग होती है। तो कहते हैं तुमको आईडियोलॉजी ही फॉलो करनी है। तो नथिंग इज बेटर देन सुसाइड बमबर। तो इस तरह से वो किस तरह से किसकी क्या कमजोरी है किसका क्या बटन है उसको प्रेस करके यह लोग वो उनको मोटिवेट करते हैं। तो यहां पे देखिए कि यह जो साधु होना या तो फिर इस तरह से आइडियोलॉजी को लेकर के समाज में कुछ अच्छा कार्य करना यह भी एक तरह से सुसाइडल ट्रेनिंग ही है। स्वामी जी ने कहा ना कि यह जो अच्छा माने अपना सर जो नेता जो होता है वह यदि आपको यह कहे कि तुम पहले कुएं में कूद जाओ तो पहले यदि नेता कहता है कुएं में कूद जाओ तो पहले कुएं में कूदो उसके बाद में यदि प्रश्न करना है तो करो वरना तो फिर प्रश्न नहीं करना है ब्लाइंड ओबिडियंस चाहिए। स्वामी जी क्या कहते हैं

पूर्ण विश्वास और समर्पण आध्यात्मिक जीवन की बुनियाद हैं

कि रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई थी उस समय कि भारत में अभी डेमोक्रेसी के लिए उपयुक्त वातावरण नहीं है। यहां पे हमको चाहिए डिक्टेटरशिप। तो देखिए कि यहां पे भी एक तरह से देखें तो ब्लाइंड बिलीफ सिखाई जाती है। किंतु इसके पीछे का साइकोलॉजी कंप्लीटली डिफरेंट है। इसके पीछे का माइंडसेट है। इसके पीछे की फिलॉसोफी इज़ अ कंप्लीटली डिफरेंट। यह अपना जो विल पावर है जो कि हमको यह रिस्क लेने के लिए प्रेरित करता है। आज एक यंग मैन है अपना घर छोड़कर के वह साधु होने को निकला है। किस तरह की अनिश्चितता में से वह गुजरेगा। कल ही मैं एक सज्जन के साथ में बात कर रहा था कि उनकी उम्र 50 साल की है और अनमैरिड है और यहां पर एक स्कूल में काम करते हैं तो मुझे बता रहे हैं कि मैं हरिद्वार में जाकर के वो एक आश्रम में रहूंगा और सोचा है कि वहीं पर मैं अपना पूरा जीवन बिता दूं बाकी का और वह उसकी जो सैलरी है या पेंशन है जो कुछ भी उसने सेविंग्स करके रखा है सब कुछ उस आश्रम को मैं डोनेट कर दूंगा और वहां पर उस आश्रम में प्रस्थानत्रय का कोर्स चलता है तो वह मैं वहां पर जाकर के अटेंड करूंगा। शास्त्र सीखूंगा। शास्त्र का अध्ययन करूंगा। शास्त्र में बताई हुई उपासना पद्धति का मैं प्रैक्टिस करूंगा। तो मैंने कहा कि आपको यह डर नहीं है। आप अपनी पूरी जो सेविंग्स है वो किसी आश्रम में आप दे देंगे। फिर आप बीमार होंगे। आपको सर्जरी वगैरह करने की आवश्यकता पड़ी ठाकुर ना करें। किंतु ऐसा तो हो ही सकता है। तो फिर आपके पास में पैसा कहां से आएगा? यदि आपने अपनी सब सेविंग्स दे दी है तो आपके रिलेटिव्स तो ऐसा कुछ है नहीं कि आपको हेल्प करें बाद में। तो उन्होंने मुझे उत्तर दिया कि देखिए मैं इस तरह से कैलकुलेशन करके मैं वहां पर जाऊंगा तो फिर तो मैं साधु नहीं हो पाऊंगा। यदि मुझे साधु होना है तो सब आंख बंद करके जो पैसा है, जमीन जायदाद है सब मुझे दान कर देना है। मुझे अपने पास में कुछ नहीं रखना तभी तो मैं ठीक से साधु हो पाऊंगा ना। तो आप लोग कैसे माने हम लोग कैसे साधु होते हैं? तो अभी हमारे केस में क्या है कि हम लोग बड़ी यंग एज में साधु हुए हैं। माने जनरली जो रामकृष्ण मिशन में साधु होने को आते हैं तो 25 के आसपास की वो एवरेज एज होती है। 225 के आसपास की तो यह फिजिकल फिटनेस होती है। मेंटल फिटनेस होती है। एक रिस्क लेने की कैपेसिटी होती है। तो वह हम लोग यहां पे आते हैं। तो क्या है कि वह एक उम्र है। एज है। यंग एज में आप बहुत कुछ कर सकते हैं। किंतु अभी इस सज्जन की उम्र तो 50 साल क्रॉस हो गई है। इस उम्र में इस तरह का साहस करना किंतु फिर भी मैंने उनको डिसरेज नहीं किया। मैंने ऐसा नहीं कहा कि आप ऐसा मत कीजिए। मैंने कहा कि ठीक है जो भी कीजिएगा थोड़ा सोच समझ करके कीजिएगा। और यदि आपने ठीक कर लिया है कि नहीं यह रिस्क लेना ही है सन्यास लेने के लिए तो आप ले लीजिए। माने आंख बंद करके लगा दीजिए जंप। ईश्वर के नाम पे यदि संपूर्ण वैराग्य नहीं होगा। यदि ईश्वर पर संपूर्ण श्रद्धा नहीं आएगी तो फिर आप सही बात है कि आध्यात्मिक जीवन में आगे नहीं बढ़ पाएंगे। जो जैसे कहते हैं कि वैद्य नारायणो हरिह औषधम जानवी तुल्यम औषधम जाहनवी तोयंम अर्थात कि जब बीमार होते हैं तो औषध है यह जानवी अर्थात कि गंगा का पानी और वैद्य है यह नारायण हरि स्वयं तो फिर क्या है आपको एक तरह से यदि सोच समझ कर के सन्यास लेना है या आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ना है तो सही-सही में ईश्वर पर शरणागति या ईश्वर पर भरोसा नहीं आएगा। और जब तक ईश्वर पर भरोसा और शरणागति 100% नहीं आता है आप आध्यात्मिक जीवन में ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाएंगे। महापुरुष महाराज की एक मैं बात पढ़ रहा था महापुरुष महाराज कहते हैं कि वह वहीं कहीं पर वह भ्रमण के लिए गए थे उत्तर भारत में प्रवरज्या करते-करते तो हराण बोलकर के एक लड़का उनके साथ में था। तो अभी हुआ ऐसा कि उनके पास में थोड़ा बहुत रुपया वगैरह होगा। बेयर मिनिमम जो चाहिए तो उनके पॉकेट में था और उनका जो बैग जो होता है जिसमें एकद जोड़ी कपड़े होंगे तो वो उनकी बैग में थे अभी वे लोग कहां पर गए होंगे तो बैग चोरी हो गई तो यह हराण बोलकर के जो दूसरा लड़का था वह तो बड़ा ही परेशान हो गया बड़ा ही वह दुखित हो गया बिल्कुल डिप्रेस हो गया तो महापुरुष महाराज ने उसको पूछा अरे यह कपड़े ही तो गए हैं ना क्या बड़ी बात है तो यह लड़का कहता है कि उसमें मेरा ₹10 ₹1 का नोट था वो ₹10 का नोट चला गया। बोल कर के वह इस हद तक डिप्रेस हो गया कि अभी महापुरुष महाराज को भी आश्चर्य होने लगा कि अभी आदमी आया है साधु होने के लिए और ₹10 चोरी हो गए हो उसमें तो इस तरह से बिहेव कर रहा है जैसे कि उसके जीवन का ही अंत आ गया हो। तो इस तरह से यदि आपको पैसों की माया है, पैसा चोरी हो गया तो इतने आप डिप्रेस हो गए हैं तो फिर किस तरह से साधु होंगे? तो जो भी है

ईश्वरीय संकल्प शक्ति और राक्षसी संकल्प शक्ति - 2

मेन जो चीज है कि यदि आपको आध्यात्मिक जीवन है या इस तरह से एक मिशनरी लाइफ है वह लीड करना है तो आपको 100% कन्विक्शन चाहिए किंतु हम लोगों का जो कन्विक्शन है आध्यात्मिक क्षेत्र में वो कन्विक्शन वो श्रद्धा वो डडीिकेशन वो ईश्वरीय विल पावर से आता है। हम लोगों का विल पावर कहां पर यूटिलाइज होता है? अपनी कामना वासनाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए यह जो टेंपटेशन सूक्ष्म से सूक्ष्मतर टेंप्टेशन अपने सामने आते रहते हैं उसको काटने के लिए हमको विल पावर चाहिए और इस तरह का जो विल पावर होता है वो डिवाइन विल पावर होता है। जबकि यह जो टेररिस्ट होते हैं, सुसाइड बमबर होते हैं, लगता है कि इतना करेज कैसे आ गया इस आदमी के भीतर में? किंतु यह जो करेज है वह शैतानी विल पावर में से आता है। वहां पर आपको अपना गुस्सा है, अपना रेज है, आउटरेज जिसको कहते हैं उसको सतत बढ़ाते रहना है। जिससे कि आप इस तरह का कार्य करें। निर्दोष लोगों की भी हत्या करें तो आपके मन में इससे किसी भी तरह की मायूसी नहीं होगी। आज हम किसी को डांटते भी हैं तो हमारे मन पे उसका एक नेगेटिव असर होता है। तो वहां पे आपको तो लोगों की हत्या करनी है। उस समय आप अपने मन को कैसे संभालेंगे? तो इसके लिए का जो यह करेज और विल पावर होता है बिल्कुल नेगेटिव टाइप का होता है। तो इसलिए स्वामी जी ने यहां पर वह भी क्लियर करके रख दिया है कि इस तरह का जो विल पावर है जो कि हमको यह कामना वासनाओं से लड़ने के लिए प्रेरित करता है या तो हेल्प करता है जो कि लोगों को सहाय करने के लिए हेल्प करता है। जो कि साधना उपासना करने के लिए हेल्प करता है। वह ईश्वर के पास में से आता है। और यह प्योर एंड स्ट्रांग विल इज़ ओमनीपोटेंट। यहां पे सिर्फ यह नहीं कहा कि जो स्ट्रांग विल है वह सर्वशक्तिशाली है। यहां पे साथ-साथ में प्योरिटी का भी क्राइटेरिया रखा है। प्योर एंड स्ट्रांग पवित्र और शक्तिशाली विल पावर। इस तरह से दोनों का यदि कॉम्बिनेशन होगा तो देखिए कि पूरे विश्व पे आप विजय प्राप्त कर पाएंगे। ये जो जीसस के जो एपोस्टल है इनकी कहानियां आप देखेंगे एक के बाद एक कैसा एक छोटा सा पर्जीक्यूटेड सेक्ट था जीसस को खुद को तो क्रुसिफाई कर दिया गया था और उस ऐसा ही नहीं सिर्फ किंतु यह जो रोमन एंपायर था उस समय का और इस समय का ये जो पूरा ये जो मेडिटेरेनियन जो जगत था और यह जो मिडिल ईस्ट था जहां पे यह क्रिश्चियनिटी का जन्म हुआ था वो जगत पूरा की हेडोनिज्म की ओर जा रहा था। हेडोनिज्म अर्थात कि यह मटेरियल भोग जो है उसको मैक्सिमाइज करना यही मेरे जीवन का फिलॉसोफी है। इसको कहते हैं हेडोनिज्म। तो इस तरह का जगत के भीतर में आपको क्रिश्चियनिटी का प्रचार करना यह पीटर पॉल और बाकी जितने भी यह जो एपोस्टल थे जिस तरह से उन्होंने अपने जीवन का बलिदान देकर के भी यह जो डिवाइन वर्ल्ड है उसको प्रीच किया है। तो यह देखिए कि इसीलिए फिर यह बाद का जो यूरोप है वह इतना स्ट्रांग हुआ था। तो यहां पर भी यदि भारत को फिर से वह अपनी पुरातन भव्यता वापस लानी है सतयुग में फिर से वापस जाना है तो हमको इस तरह से रिलीजियस प्रीचर चाहिए जिनका कि हृदय प्योर हो जिनका विल पावर यह ईश्वरीय शक्ति से शक्तिमान हो और जिनके भीतर में यह लोगों के प्रति प्रचंड सहानुभूति हो इस तरह के मनुष्य इस तरह के यंग मैन एंड एंड वमेन हमारे पास में जब आएंगे तब यह पावरफुल इंस्टीट्यूशन बनेंगे और यह पावरफुल इंस्टीट्यूशन फिर भारत का कल्याण करेंगे। भारत को फिर से सतयुग की ओर ले जाएंगे।

भारत का उत्थान: आत्मन् की महिमा

तो यह पूरा टॉपिक रामकृष्ण मिशन वाला यहां पे होता है समाप्त। इसके बाद में दूसरा एक टॉपिक है हाउ टू बेटर इंडिया ग्लोरी ऑफ दी आत्मन। क्या कहते हैं स्वामी जी? फोर सेंचुरीज पीपल हैव बीन टॉट थरीज ऑफ डिग्रेडेशन। सैकड़ों सालों से हम मनुष्यों को एक तरह से निराशाजनक सब थ्यरीज सिखाते रहे हैं। डिग्रेडेशन यानी कि क्या कहेंगे? डिग्रेडेशन। यानी कि जो कि अवनति प्राप्त होती है। अपने मन को जो मायूस कर देता है। अपने मन को जो निराशा और डिप्रेशन की ओर लेता जाता है। इस तरह की थरीज हम पिछले कितने ही सैकड़ों सालों से मनुष्य को सिखा रहे हैं। दे हैव बीन टोल्ड दैट दे आर नथिंग। उनको कहा गया है कि वे लोग कुछ नहीं है। द मासेस हैव बीन टोल्ड ऑल ओवर द वर्ल्ड दैट दे आर नॉट ह्यूमन बीइंग्स। पूरे विश्व में जनसाधारण को कहा गया है कि तुम लोग मनुष्य ही नहीं हो। दे हैव बीन सो फ्राइटेंड फॉर सेंचुरीज टिल दे हैव नियरली बिकम एनिमल्स। सदियों से उनको इस तरह से डरा करके रखा गया है कि वे लोग मनुष्यत्व में से पशुत्व की ओर जा रहे हैं। पशुत्व को प्राप्त हुए हैं। नेवर वेयर दे अलाउड टू हियर ऑफ दी आत्मन। यह आत्म तत्व है। हमारे भीतर में यह ग्लोरियस आत्मन विराजमान है। इसके बारे में उनको कुछ बताया नहीं गया है। देखिए यह जो ठाकुर का वो जो फेमस वो स्टेटमेंट है कि किसी ने वो एक क्रिश्चियन किताब उनके सामने लाकर के रख दी। तो ठाकुर कहते हैं कि अच्छा ठीक है। पढ़ो तो इसमें क्या है? तो वह जो पढ़ रहा है तो ठाकुर कहते हैं पाप और पाप बस वही पापवाद ही है। मनुष्य पापी है। मनुष्य पापी है। तो ठाकुर क्या कहते हैं? जे साला पापी पापी बोले शेशा साला पापी होए जाए। माने जो पापी पापी बोलता रहता है कि मैं पापी हूं। मैं सीनर हूं। वो साला सीनर ही हो जाएगा। वो पापी ही हो जाएगा। यदि बोलो जे बी नाई बी नाई ताले बी चले जावे। अर्थात कि यदि मुझे सांप ने काटा है और जहर मेरे शरीर में फैल रहा है किंतु समझिए कि यहां पे सिर्फ बायोलॉजी नहीं है जो कि सर्वश्रेष्ठ है या तो सर्व सबसे पावरफुल है। विल इज ओमनीपोटेंट जैसे कि स्वामी जी ने कहा मनुष्य की जो ये जो संकल्प शक्ति है विल पावर है वो सर्वश्रेष्ठ है। यदि मेरे शहर में जहर भी फैल रहा है और यदि मैं विल पावर को स्ट्रेंथन करूं। अपनी बायोलॉजी को मैं चेंज कर सकता हूं, ऑल्टर कर सकता हूं। जैसे कि हमको पता है कि हमने यह राजयोग में ही पढ़ा कि यह प्राण का विज्ञान प्राण के माध्यम से आप आकाश पे कंट्रोल कर सकते हैं। आकाश क्या है? तो इस जगत में जितना भी कुछ पदार्थ दिख रहा है आपको इंक्लूडिंग ह्यूमन बॉडी। पंचमहाभूत का जो कुछ भी बना हुआ है वह सब आकाश से प्रकट होता है और उसको कंट्रोल करने के लिए जो फोर्स है वह है प्राण। यदि हम प्राण शक्ति पर नियमन प्राप्त कर ले तो यह आकाश अर्थात कि जितने भी भौतिक पदार्थ है इंक्लूडिंग ह्यूमन बॉडी इन सबके ऊपर में हम कंट्रोल प्राप्त कर लेंगे। तो और यह प्राण के ऊपर में कैसे कंट्रोल आएगा? तो विल पावर से ऑफ कोर्स यदि मेरे पास में यह जो सतत प्रैक्टिस करने की क्षमता है तभी तो मेरा मैं मैं प्राण को कंट्रोल कर पाऊंगा और तभी तो मैं फिर यह पदार्थ को कंट्रोल कर पाऊंगा। इसलिए जैसे यह वैष्णव धर्म है। जैसे विदेश में यह क्रिश्चियनिटी बहुत फैला था और दूसरे धर्म फैले थे। सब जगह पर मनुष्य को पापी ही कहा गया है। वैसे ही भारत में यह वैष्णव धर्म फैला था। और यह वैष्णव अपने को बड़ा दीनहीन मानते थे। तो यह स्वामी जी ठाकुर दोनों को इस बात के ऊपर में बड़ी नाराजगी थी कि ये क्या अपने को दीन हीन मान कर रहे हो। वो जो हमने स्वामी जी का एक लेटर पढ़ा था। स्वामी जी स्पष्ट रूप से कहते हैं जिसके भीतर में यह दीनहीन भाव है कि हां मैं कमजोर हूं। मैं पशुवत हूं। मैं पापी हूं। मुझे ईश्वर की कृपा चाहिए। अदरवाइज तो मैं पूरा रसातल में जाऊंगा। नरक में जाऊंगा। इस तरह से अपने प्रति जो हीन भावना पोषण करता है। इस तरह का साधक अपने जीवन में आध्यात्मिक जीवन में ज्यादा कुछ प्राप्त कभी नहीं कर पाएगा। हमको चाहिए वह प्रचंड विल पावर, प्रचंड आत्मविश्वास, आत्मश्रद्धा कि यस मैं पापी नहीं हूं। मेरे भीतर में वही ग्लोरियस आत्मन विराजमान है जो कि अनंत है, अजर है, अमर है। अवकाश ओलकार की सीमाओं से परे है। ना ही उसका जन्म है, ना ही उसका मृत्यु है। ना ही इसके भीतर में डिप्रेशन है, ना ही इसके भीतर में क्रोध है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से परे जो है जो कि सदा सत, चित आनंदमय है। या तो फिर जो सत चित आनंद स्वयं है अस्तिभाति प्रिय वो स्वयं है वो आत्मन में हूं यह भरोसा यह आत्मविश्वास जब तक नहीं होगा तब तक फिर जितना डर के डर के रहेंगे हम उतना ही हीन भावना इंफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स इसको कहते हैं। यह दो

क्रूरता और दासत्व inferiority complex and superiority complex

कॉम्प्लेक्स होते हैं। एक तो है इंफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स दूसरा है सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स। ये दोनों कॉम्प्लेक्स जो है एक सिक्के के ही दो पहलुएं हैं। स्वामी जी जैसे कि अपने लेटर में लिखते हैं आला सिंघा को जो वो जो मद्रास के डिसाइपल्स को जो लेटर लिखा है उसमें यह दासत्व और क्रूरता एक ही सिक्के के दो पहलू है। दासत्व अर्थात कि क्या कि पहले तो क्रूरता क्रूरता का क्या अर्थ है? जिसके जो गरीब है जो पददलित है जो कि अनफॉर्चूनेट है जो कि हमसे जो कि मिसफर्च्यून जिसके जीवन में है जिसके पास में खाना नहीं है रहने को घर नहीं है बड़ी तकलीफ से भुगत रहा है उसके प्रति यदि हमारी सहानुभूति नहीं होगी तो फिर क्या और सिर्फ सहानुभूति का एब्सेंस इतना ही नहीं उसके प्रति उसका शोषण करने की हमारे में यदि यह इच्छा रहेगी हमारी टेंडेंसी रहेगी तो हमारे भीतर में क्रूरता प्रकट होती है और जो आदमी क्रूर है नेचर ही उसको गुलाम बना करके रखता है। क्यों? क्योंकि दो क्रूर व्यक्ति कभी भी कोऑपरेशन करके साथ में काम नहीं कर सकते। यूनिटी जो है इंस्टीट्यूशन है। इंस्टीट्यूशन का फाउंडेशन ही है यूनिटी कॉन्सेंससेस। और यह कॉन्सेंससेस तभी बनेगा जब कि मनुष्य के हृदय में एक दूसरे के साथ में कंप्रोमाइज करने की कैपेसिटी है। एक दूसरे के साथ में एंपैथी है। कंपैशन है। एक दूसरे के साथ में मित्रता है। जो व्यक्ति क्रूर है वो बिल्कुल अकेला ही रहेगा। अभी कल ही एक डिवोटी के साथ में मेरी बात हो रही थी। कल वह बहुत सारे डिवोटी आए थे। वह यहां पे वह था ना वह गुरु पूर्णिमा। तो एक डिवोटी का कहना है कि उसके जो फादर है वो वो अलग से रहते हैं और उसके फादर जो है उसकी मां को बड़े टॉर्चर करते थे। तो फिर उसकी मां अपने लड़कों लड़कियों को लेकर के सेपरेट हो गई और उसके फादर अलग से रह रहे हैं। और उनका जो फादर का नेचर बड़ा ही क्रूर प्रकार का है। सेल्फिश प्रकार का है। अदरवाइज तो कौन अपनी बीवी को टॉर्चर करेगा? कौन बीवी पे अत्याचार करेगा? जो भी है। अभी उनकी उम्र हो गई है फादर की। कैंसर भी हो गया है। कहीं पर गेस्ट हाउस में रह रहे हैं। अकेले रह रहे हैं। वहां पर वह बाथरूम की भी सुविधा नहीं है। बाथरूम जाना है तो लंबा चल के जाना पड़ता है और कैंसर है। यानी कि वो फिजिकल सफरिंग तो है ही है। बूढ़े भी हो गए हैं। तो यह जो लेडी डिवोटी थी वो कहती है कि मैं जाकर के उनकी मेरी मां को तो पसंद नहीं है कि हम लोग अपने फादर के पास में जाएं। किंतु फिर भी अभी फादर है तो क्या है? तो वह जाकर के थोड़ी बहुत देखभाल करती है। तो वह कहती है कि देखिए वो इतने बूढ़े भी हो गए हैं। इतना सफरिंग भी है। इस तरह से कष्ट करके रह रहे हैं। किंतु ये जो क्रूरता और जो सेल्फिशनेस है ना वो जाती नहीं है। उसके आसपास में जो लोग रहते हैं ना उसके साथ में भी उसका नहीं पट रहा है। अच्छा किसी के किसी ना किसी के साथ में झगड़ा कर देंगे। यह कर देंगे वो कर देंगे। तो फिर देखिए कि यह जो क्रूरता होती है ना वह आपको किसी के भी साथ में आपको रहने नहीं देंगी। किसी के भी साथ में आपको कोपरेशन करके या आपको यूनिटी बना करके कोऑर्डिनेशन करके काम नहीं करने देगी। और जैसे ही हमारे भीतर में फुटफाट हुई यानी जो 10 क्रूर आदमी है उन 10 लोगों को यदि कोई बाहर से कोई आकर के हमला करेगा तो क्या है 10 से 10 लोग अलग-अलग लड़ेंगे और फिर क्या है अब एक दूसरे को बेच भी देंगे एक दूसरे के भीतर पीछे में पीठ पर चाकू भी मारेंगे गद्दारी भी करेंगे वे लोग कहेंगे बाहर के हमलावरों को एक काम करो हम दोनों इकट्ठा हो जाते हैं और तीसरे वाले को मारते हैं वो उसने मेरे साथ में बड़ा अन्याय किया है तो बाहर वाला हमलावर सोचेगा अच्छा ठीक है यह भी अच्छा एक मूर्ख पकड़ में आ गया है। तो वह दोनों मिलके पहले तो तीसरे वाले को मारा। अभी वह हमलावर कहेगा अभी तो तेरी भी तो मैं मुझे जरूरत नहीं है। तुमने जैसे उसकी पीठ में चाकू मारा था। कल कहीं जाकर के तुम मेरी पीठ में चाकू नहीं मारोगे इस बात की क्या गारंटी है? बोल के वो उसको भी मार देगा। तो ये क्रूर लोग जो होते हैं वह दासत्व के लिए ही योग्य है। वह दास ही रहेंगे हमेशा। तो यहां पर भी देखिए कि यह जो क्रूरता और दासत्व जिस तरह से साथ-साथ में चलता है तो वैसे ही यह जो पापी-पापी कहना अपने को मैं मैं पापी हूं मैं पापी हूं। इस तरह से जो डर रखते हैं उसके भीतर में यह काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह वगैरह जो है हमेशा बना ही रहेगा। और ऐसे लोग हमेशा कमजोर ही होंगे। फिजिकली, मेंटली सब तरह से यह लोग कमजोर होकर के रह जाएंगे। हीन भाव जो है यह हीन भाव और यह सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स इंफीरिटी कॉम्प्लेक्स, सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स यही एक सिक्के की दो आस माने एक ही सिक्के के दो पहलू है। क्रूरता और दासत्व जैसे कि एक सिक्के के दो पहलू है। वैसे ही ये इंफोरिटी कॉम्प्लेक्स और सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स एक ही सिक्के के दो पहलू है। क्यों? क्योंकि जो व्यक्ति अपने को हीन मानता है दूसरी क्षण माने जो शक्तिशाली है उसके सामने वो अपने को हीन मानेगा तो उससे जो कमजोर है कमजोर के सामने वो सुपीरियरिटी फील करेगा वो ना किसी के साथ में नॉर्मल रिलेशन नहीं बिठा पाएगा यदि मेरा एक नॉर्मल नेचर है तो मेरे से जो बड़ा है उसको मैं रिस्पेक्ट करूंगा मेरे से जो छोटा है उसके ऊपर में मेरी करुणा रहेगी दया रहेगी कंपैजन रहेगा किंतु जिसके भीतर में यह जो अपने को पापी मानता है, अपने को हीन मानता है तो जैसे ही उससे पावरफुल कोई आ गया तो उसके सामने बिल्कुल दास की तरह झुक जाएगा और उससे कमजोर जो आ गया तो उसके ऊपर में वह क्रूरता बरसाना प्रारंभ करेगा। यानी कि क्रूरता और दासत्व जैसे कि एक सिक्के के दो पहलू है वैसे ही यह हीन भावना और यह सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स इनफरिटी कॉम्प्लेक्स एक ही सिक्के के दो पहलू है और इसका एक ही काउंटर है कि आत्म तत्व का उपदेश जैसे ही हमको आत्म तत्व के बारे में समझाना शुरू किया वैसे ही देखिए कि हमारे मन में से जितने भी यह कूड़ा कचरा है अंकट बंकट है सब भाग जाएगा देखिए हमने इस तरह के लोगों को मिले भी होंगे कि वो थोड़ा सा भी कोई स्ट्रांग आदमी आ जाता है तो उसकी चमचागिरी करना शुरू कर देता है और थोड़ा सा कमजोर यदि उसके सामने आएगा तो सीधा उसके ऊपर में अत्याचार बिठाना शुरू करेगा तो इस तरह के लोगों की कमी नहीं है। इसका एक ही सॉल्यूशन है आत्मत्व सिखाइए। लोग यदि यह कहते हैं कि मुझे अहंकार नहीं बहुत सारे लोग कहते हैं कि आध्यात्मिक जीवन में अहंकार नहीं होना है। जो अद्वैत को फॉलो करता है वह घमंडी हो जाते हैं। यह सोचकर के कि मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूं। यह जो तोतापुरी का जो उदाहरण है कि वैसे तो तोतापुरी में त्याग, तपस्या, इंद्रिय, संयम, विल पावर इस सब का कोई कमी ही नहीं है। किंतु एक शक्ति तत्व को नहीं स्वीकार करते थे। अभी क्या है? जगत में यदि रहना है तो शक्ति तत्व स्वीकारना होगा। आपको शरणागति सीखनी होगी। आध्यात्मिक जगत में जैसे कि यह इनफोरिटी कॉम्प्लेक्स सुपरिटी कॉम्प्लेक्स एक सिक्के की दो पहलू है। क्रूरता दासत्व दो पहलू है एक ही सिक्के के वैसे ही यह शरणागति और आत्मश्रद्धा एक ही सिक्के के दो पहलू है। यदि आपको प्रॉपर स्पिरिचुअल आपको एक ऑल राउंड डेवलपमेंट यदि करना है। होलिस्टिक डेवलपमेंट जिसको आजकल हम कहते हैं। इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट यदि आजकल हम इसको कहते हैं तो वह हो- होलिस्टिक डेवलपमेंट या तो इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट आध्यात्मिक क्षेत्र में तभी होगा जबकि हमारे पास में यह सिमिंगली ऑपोजिट वैल्यू एक साथ में है। एक ओर है आत्मश्रद्धा दूसरी ओर है शरणागति। यह दोनों यदि हमारे भीतर में रहेगी तभी हमारी आध्यात्मिक जीवन जो है वह परिपुष्ट होगा। वरना एक ओर यदि हम तोतापुरी के रास्ते पर चले जाएंगे आत्मश्रद्धा ये इंद्रिय संयम ब्रह्मचर्य तपस्या की शक्ति ठाकुर के गुरु स्वयं इनमें जितनी होगी इस जगत में और किसकी होगी किंतु फिर भी उनको शरणागति सीखनी थी आत्महत्या करने के पेट में दर्द हो रहा है तो दर्द कम ही नहीं हो रहा तो उन्होंने सोचा इस तरह का शरीर क्या रख के करना है शरीर ही त्याग कर दो शरीर त्याग करने के लिए गंगा में गए जितना बढ़ते गए बढ़ते गए अभी गंगा तो वैसे इतनी गहरी होती है किंतु जितना आगे जाते हैं देखा कि पानी कमर से ऊपर ही नहीं आ रहा है तब क्या बोल उठे यह क्या दैवी माया है और फिर जब किनारे पर वापस आए ठाकुर के साथ में वार्तालाप हुआ ठाकुर के साथ में काली मंदिर में गए मां काली को प्रणाम किया उनकी जो साधना की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त साधना की परिसमाप्ति हुई यह ऑल राउंड डेवलपमेंट उनका हो गया तब कहीं नहीं जाकर के उन्होंने दक्षिणेश्वर को छोड़ा। दक्षिणेश्वर से विदाई ली। उससे पहले किंतु वह ठाकुर को रिक्वेस्ट करते हैं कि तुम मुझे छोड़ दो। क्यों? क्योंकि इतना तो वह समझ गए थे बाय दैट टाइम ठाकुर के साथ में रहते-रहते कि ठाकुर के भीतर में एक दिव्य शक्ति है जो कि उनको वहां से नहीं जाने देती। वरना तो वह परमहंस सन्यासी किसी एक जगह पर दो-ती दिन से ज्यादा रहेंगे नहीं। किंतु वहां पर इतना लंबा समय रह गए और सब समय जाने का भी सोचते हैं तो भीतर से कोई एक आकर्षण है काली मंदिर के प्रति ठाकुर के प्रति वो वहां से उनको जाने नहीं देता है तो जितनी बार ठाकुर को रिक्वेस्ट करते हैं तुम मुझे छोड़ दो तो ठाकुर भाव में आ जाते हैं दिव्य भाव में आकर के फिर वो उनको कहते हैं कि जब तक तुम्हारी साधना समाप्त नहीं होगी तब तक तुम यहां से जा नहीं पाओगे तो एक के जावार जोन आई इस तरह से ठाकुर उनको कहते कहते हैं। तो जिस दिन उन्होंने शक्ति को स्वीकार किया उस दिन साधना की परिसमाप्ति हुई और फिर आखिर में उन्होंने दक्षिणेश्वर को छोड़ा। तो यह जो पूरा एक यह है जब हम यह एनालिसिस करते हैं मनुष्य के हृदय का या तो फिर इंस्टीट्यूशन का ह्यूमन साइकोलॉजीस का देखिए कि जो सिमिंगली ऑोजिट क्वालिटीज जो दिखती है वो दोनों इकट्ठी होती है तभी एक पर्टिकुलर टाइप की पर्सनालिटी डेवलप होती है। अच्छा तो आज यहीं तक अभी कल तो छुट्टी है मंडे को मिलेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: क्रूरता और गुलामी वास्तव में एक साथ चलते हैं। जो व्यक्ति शांत है, वह आसानी से नहीं झुकेगा।

यह जो अफगानिस्तान में यह जो टेररिज्म फैलना शुरू हुआ था तो उन्होंने साइकोलॉजी क्या यूज किया पता है यह जो ट्राइब पूरा तो ट्राइब में बटा हुआ है तो तो ट्राइबल लीडर्स जो होते हैं वे लोग बड़े वाइज होते हैं। यूजुअली उस पोजीशन पर जो पहुंचता है वैसे ट्राइब में ब्लड फ्यूड होता है। यानी कि हमारे एक आदमी को मार दिया सामने वाली ट्राइब ने तो 100 साल तक उसके साथ में लड़ते रहेंगे। किंतु कोईकोई ट्राइबल लीडर होते हैं ना बड़े वाइस होते हैं। बोले अरे यार ये सब खत्म करो। झगड़ा झाटी ये जो वेंजिंस जो है ना क्वेस्ट फॉर वेंजिंस इसका रिवेंज लेना इसका बदला लेना। यह हम खुद तबाही के अलावा और कुछ नहीं लाएगा। यह सबको बंद कर दो। ब्लड फ्यूड है उसको हटा दो। यह वगैरह वगैरह ऐसा ही कोई वाइस एक एटीट्यूड रहता है। फिर टेररिस्ट लोगों ने क्या करना शुरू किया? यदि अफगानिस्तान पे कब्जा करना है, कंट्रोल करना है तो जितने भी ट्राइबल लीडर है ना उसका हत्या करना शुरू कर दो। जब तक ये लोग रहेंगे ना तब तक ये बाकी की ट्राइब्स अपने कंट्रोल में ही नहीं आएगी। क्योंकि उनको तो आपको उकसाना है ना। कौन नेगेटिव शक्ति कहां से आती है? रेज यानी कि क्रोध काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह वहां से आती है ना? तो इसके सामने जो खड़ा रहता है ना वह आदमी जब तक रहेगा तब तक वह समाज जो है वह इस तरह के ब्लैक होल में नहीं घुस जाएगा। तब तक वह समाज भी बैलेंस रहेगा। तो उन्होंने एक के बाद एक सब ट्राइबल लीडर का मर्डर कर दिया। इसके बाद में जो हुआ अभी सबके सामने है। माने पूरे पशुत्व की ओर चले गए। अभी आप पशु को जिस और आप डायरेक्ट करें। आप सुसाइड बमबर बनाना है तो वह बना दीजिए। इस पे हमला करवाना है उस पे हमला करवा दीजिए। खुद की जान की परवाह किए बिना बिना किसी पैसा कंफर्ट मिले बिना वे लोग यह सब पशु की तरह आक्रमण करेंगे।

प्रश्न: स्वतंत्र इच्छा (free will) और शरणागति में क्या अंतर है?

स्वामी जी ता बोले नहीं फ्री विल ऐसा नहीं कहे हैं। स्ट्रांग विल कहे हैं। अदरवाइज आप रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर पढ़ेंगे। कहीं पर भी फ्री विल का कांसेप्ट ही नहीं है। अल्टीमेट फ्रीडम है आत्मन में। जब तक हम यह इंद्रियों के मायाजाल में अष्टपाश में बंधे हुए हैं तब तक अपने पास में फ्री विल है ही नहीं। उस समय हमको स्ट्रांग विल डेवलप करना है। जैसे-जैसे विल स्ट्रांग होता जाएगा वैसे ही अष्टपाश को हम काटते जाएंगे। अष्टपाश कट गए आत्मन में स्थित हो गए तब ट्रू रियल फ्रीडम वहीं से स्टार्ट होता है। क्योंकि क्या है कि ये षडरी ही

प्रश्न: यदि हम स्वयं को और दूसरों को ब्रह्म मानना सीखें, तो इससे हमारी अधिकांश समस्याएं हल हो जाएंगी।

तो हमारे पास में यह सब करवाते हैं ना। ये भय है। भय है तो जैसे ही कोई स्ट्रांग आदमी मेरे सामने आता है फटाक करके मैं उसके सामने वो झुक जाता हूं। फिर डिजायर है तो कमजोर आदमी के पास में जो अच्छी-अच्छी चीजें हैं छीन के ले लूंगा। यह जो जितने भी ये बड़े-बड़े चक्रवर्ती एपरर वगैरह हुए हैं ये हमलावर हुए उनका क्या उद्देश्य था? यह मोंगोल होर्ड था वो पूरे एशिया में यूरोप तक चला गया। पूरा साउथ एशिया तक चला आया। क्या उद्देश्य था? सोना वहां से बटोरना है। यह बटोरना है। म सिल्क जो भोग की चीजों के लिए तो यह सब लोग कर रहे थे। तो भोग का और क्रोध, काम यह सब चीजें चली जाएगी। भय चला जाएगा तो फिर वह आदमी दूसरों पर अत्याचार करेगा ही क्यों? दूसरा कि वो खुद भी लोगों से डरेगा नहीं। हमारे पर अत्याचार करने को यदि आएगा तो ऐसे लोगों में कोपरेट करने की शक्ति होती है। देखिए स्ट्रेंथ आज खास करके मॉडर्न युग में स्ट्रेंथ कहां से आती है? इंस्टीट्यूशन से आती है। इंस्टीट्यूशन में कौन काम करेगा? आज इस आश्रम में हम पांच छह साधु जो रहते हैं सबका अपना-अपना एक इडसिंक्रासी है। कोई गुजराती है, कोई तेलुगु है, कोई बंगाली है, कोई मराठी है। एकदम डिफरेंट टाइप के बैकग्राउंड से आते हैं। किंतु फिर भी साथ में रह के काम करते हैं। तो अपनी ये जो ये जो ये होता है ना सब ये इओसिंक्रासिस उसको काट करके आपको कोपरेट करना है। वह कब होगा? जबकि आप काम क्रोध से माने कुछ कुछ हद तक मुक्ति पाते हैं। षडरी से कुछ हद तक मुक्ति पाते हैं। अष्टपाश से कुछ-कुछ आप मुक्ति पाते हैं। तब आप कोपरेट करके रह पाएंगे। तो यह कोऑपरेशन यदि हमारे में होगा तो स्ट्रेंथ आएगा। फिर सामने वाला अटैक भी करेगा तो मान लीजिए कि अटैक का फेस टू फेस यदि हम सामना ना भी कर पाए, कमजोर भी हो तो हमारे भीतर में गद्दार तो नहीं प्रकट होंगे। वरना यह जो क्रूर लोग होते हैं वही तो सबसे बड़े गद्दार होते हैं। वो कितनी ही कहानियां है अपने भारत में। यह राजा क्यों हार गया? तो उसी के भीतर का किसी आदमी ने वो जब यह अटैक हो रहा था तो वह जो उसका दरवाजा खोल दिया था पीछे से जाकर के वो फोर्ट का किले का तो खोल दिया तो शत्रु सेना भीतर में आ गई। ऐसे गद्दार लोग ही ने तो बहुत सारे राज्य को डूबाया है।

प्रश्न: यदि हममें भक्ति का "दीन-हीन भाव" है तो हम सफल कैसे हो सकते हैं? उत्तर: "दीन-हीन भाव" और शरणागति भिन्न हैं। आत्मश्रद्धा और शरणागति

दीनहीन भाव और शरणागति दोनों बिल्कुल अलग है। शरणागति इंफिरिटी कॉम्प्लेक्स से नहीं आती है। दीनहीन भाव इनफीरिटी कॉम्प्लेक्स से आता है। जैसे अभी हमने डिस्कस किया शरणागति और आत्मश्रद्धा एक ही सिक्के के दो पहलू है। आत्मश्रद्धा होगी तो शरणागति आएगी। जो तोतापुरी को एक बात आखिरी बात जो सीखनी बची थी। अभी तोतापुरी से ज्यादा दीनहीन म दीनहीन और तोतापुरी यह दोनों शब्द एक साथ में खड़े ही नहीं रह सकते। इतनी प्रचंड उनका विल पावर था। वही तोतापुरी को आखिर में शरणागति सीखनी पड़ी। किंतु यह दीनहीनता नहीं है। माने इंफिरिटी कॉम्प्लेक्स नहीं है। जो अपने को वह अधम नहीं महसूस करता है। उसका एक साम्य भाव है कि हां ईश्वर अभी बच्चा बच्चा और मां का संबंध मां बच्चे से बड़ी है। मां सब तरह से बच्चा सब तरह से मां पे डिपेंडेंट है। किंतु क्या बच्चे में हीन भावना थोड़ी ना होती है। बच्चे में ये जो अधम भावना थोड़ी ना होती है। मैं हीन हूं। मैं अधम हूं। मां के बिना मैं क्या करूंगा? अरे बच्चा तो मां के साथ में झगड़ता है। मां को मारता भी है कभी-कभी। मां के साथ ये खाना अच्छा नहीं है। ये वो जो ये अपना ये राम प्रसाद सेन माए पोए मुकदमा धूम होवे रामप्रसाद बोले तो तुम्हारे पे मैं केस कर दूंगा। क्या बोलती हो तुम? यदि तुमने मुझे मुक्ति नहीं दी तो। तो दैट इज शरणागति। ये दीनहीनता कहां से आती है? अधम भावना से आती है कि मैं कमजोर हूं। मैं पापी हूं। मैं निकम्मा हूं। मैं किसी काम का नहीं। व्हिच इज अ कंप्लीटली डिफरेंट एटीट्यूड। आत्मश्रद्धा और शरणागति यह दोनों साथ में जाएगी। एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक्चुअली ये द्वैत और अद्वैत में कोई विरोधाभास है ही नहीं। आप ठीक-ठीक से देखेंगे तो दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। एक्चुअली सही में देखा जाए तो जो लोग कहते हैं मैं प्योर अद्वैती हूं वो भी ठीक से धर्म तत्व या अध्यात्म तत्व नहीं समझे हैं। जो कहते हैं मैं प्योर द्वैतिष्ट हूं वो भी नहीं समझे हैं। क्यों? क्योंकि यह जो आत्मश्रद्धा है आत्मश्रद्धा सिर्फ अकेली होगी ना तो कहीं ना कहीं से यह क्रूरता आ जाएगी। लोगों के प्रति एक डिस्टेन आ जाएगा। अरे यह निकम्मा है। अरे वो किसी काम का नहीं। उसका विल पावर ही है नहीं। विल पावर देखो मेरे में है। एक घमंड आ जाएगा। एोगेंस आ जाएगा। यदि आप सिर्फ आत्मश्रद्धा को डेवलप करने को जाएंगे तो एक जैसे बहुत सारे ऋषि मुनि क्रोधित हो जाते थे। दुर्वासा मुनि बड़े तपस्वी है। किंतु फटफट करके क्रोधित हो जाते हैं। किसी को भी गाली दे देंगे। किसी का भी इंसल्ट कर देंगे। उनके हृदय में जैसे दया माया जैसा है ही नहीं। अभी थोड़ा सा भी उनको डर लगता है। थोड़ा सा भी दया लाएंगे थोड़ा सा भी मैं कमजोर हो जाऊंगा तो फिर क्या है? यह माया घुस जाएगी। तो माया के सामने मुझे खड़ग लेकर के तैयार लेकर रहना है। तो अभी माया के साथ में जो फाइट कर रहे हैं वही फाइट लोगों के साथ में करना शुरू कर देंगे। वि इज कंप्लीटली रॉन्ग। और यहां पर है कि आपको शरणागति लानी है किंतु शरणागति ही यदि लेते आएंगे और अपने को बिल्कुल हीन से हीनतर करते जाएंगे तो फिर होगा क्या कि आपके मन में अधम भाव प्रवेश कर जाएगा। अपने को आप संपूर्ण रूप से हीन बनाना इनफिरिटी कॉम्प्लेक्स आ जाएगा। व्हिच इज कंप्लीटली रॉन्ग। फिर कोई भी आपका आकर के आपकी पिटाई करेगा आप कुछ नहीं बोल पाएंगे। तो दोनों को किंतु साथ में ले आइए। तो देखिए कि परफेक्ट कॉम्बिनेशन होता है। यहां पर आत्मश्रद्धा भी है। यानी कि आपके भीतर में वह कैपेसिटी है माया से लड़ने के लिए। तो साथ में यहां पे शरणागति भी है कि उसका माने वो जो है ना वो दवाई लेते हैं तो साथ में वो एंटी एसिड दे देते हैं क्योंकि वो उसका यह नेगेटिव है उसको यह काटेगा और उसका यह नेगेटिव है उसको वो काटेगा। ऐसा वो कॉम्बिनेशन करना है यहां पे।

प्रश्न: किसी महापुरुष को बोलते सुना था "यदि ईश्वर मेरे साथ में है तो में कुछ भी कर सकता हु."

ठाकुर ने एक बात कही थी कि ज्ञान जो है ना वह पुरुष है और भक्ति है स्त्री अर्थात कि किसी के घर जाएंगे अभी पुराने जमाने की बात है वो अंदर महल हुआ करता था कि पुरुष और स्त्री स्त्रियों की पर्दा प्रथा थी तो स्त्रियां सिर्फ भीतर में रहेगी पुरुष खास करके जो बाहर के जो पुरुष है अनजाने है वह घर के भीतर में नहीं जा पाएंगे तो ठाकुर कहते हैं ज्ञान है पुरुष है घर के बाहर तक ही रह पाएगा ड्राइंग रूम तक ही रह पाएगा। भक्ति जो है स्त्री है वह अंदर महल तक जा सकती है। तो अभी इसी एनालॉजी को अब थोड़ा सा देखेंगे कि अपना जो पुराण वगैरह है ना यह भगवान शिव का अर्धनारी अर्धनारीश्वर स्वरूप है। आधा पुरुष आधी स्त्री तो देखिए कि परफेक्ट कॉम्बिनेशन ऑफ ज्ञान एंड भक्ति भगवान शिव के भीतर में। जनरली हम भगवान शिव को ज्ञान के ये मानते हैं कि वो ये है मतलब एपिटोम माने क्विंट एसेंशियल गॉड ऑफ ज्ञाना किंतु वो तो अर्धनारीश्वर है स्त्री रूपी भक्ति भी है इतना ही इक्वली जितना कि पुरुष रूपी ज्ञान है। यानी कि वो समाधि में होते हैं सोहम सोहम और नाचते हैं तब वो जो पूरा जो प्रकृति है उसी का स्वरूप धारण करते हैं। माया और ब्रह्मन दोनों ठाकुर क्या कहते हैं? स्थिर है तो ब्रह्मन है। वह जब कार्य करती है तब वह माया है।