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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 20 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन इस सप्ताह पाठ करेंगे वराह नगर मठ यह पीरियड हमारा चल रहा है। ठाकुर की महासमाधि हो चुकी है और मास्टर महाशय मठ में आए हुए हैं। तो कथामृत के अंत में आप यदि देखेंगे तो उन्होंने वराह नगर मठ के पीरियड का कुछ-कुछ विवरण किया है। तो उस विवरण में से हम पाठ कर रहे हैं। 25th मार्च 1887 का दिन है। मास्टर महाशय आए हैं मठ में और आज बड़ा ही सुंदर डिस्कशन होने वाला है। डिस्कशन से पहले थोड़ा सा मास्टर महाशय पूर्व भूमिका बनाते हैं। कहते हैं कि सुरेंद्र ठाकुर का जो अंतरंग भक्त थे उनके कहने के अनुसार उनके मतलब इच्छा से ही यह प्रथम मठ हुआ और ये जितने भी कौमार वैराग्यवान भक्त थे वह सब आकर के यहां पर रहने लगे। नरेंद्र, राखाल, निरंजन, बाबूराम, शरद, शशि, काली वगैरह सब मठ में ही रह गए। कुछ दिनों के बाद में सुबोध और प्रसन्न भी आए। योगिन और लाटू वृंदावन थे। वही जो हमने मां की कहानी जब पढ़ रहे थे उस समय हमने देखा था कि किस तरह से मां शारदा देवी वृंदावन गई थी जो हृदय में विरह अग्नि जो ज्वल रही थी वह यदि थोड़ा सा शांत हो पाए इस आशा को लेकर के तो योगिन महाराज लाटू महाराज उनके साथ में गए थे काली महाराज भी गए थे किंतु कुछ समय के बाद में मास्टर महाशय की जो पत्नी थी निकुंज देवी वो बीमार हो गई तो काली महाराज उनको लेकर के कोलकाता वापस लौट आए थे। तो लाटू महाराज और योगिन महाराज जब वृंदावन से वापस आए तब वे लोग मठ में रहने लगे। गंगाधर हमेशा मठ में यातायात करते थे। किंतु हमको तो पता है कि कुछ समय के बाद में गंगाधर महाराज अर्थात कि अखंडानंद जी महाराज किस तरह से पूर्व भारत के भ्रमण के लिए निकल गए थे। मठ छोड़कर के सर्वप्रथम भ्रमण करने वाले में आई थिंक कि गंगाधर महाराज ही है। फिर जब स्वामी जी को ये प्रवृजजा का भीतर में से आह्वान आया तब उन्होंने गंगाधर महाराज को पत्र लिखकर के बुलाया कि भाई तुम तो पूर्व भारत हिमालय तिबेट वगैरह बहुत घूमे हो। तुम आओ मुझे साथ लेकर के वही हिमालय वगैरह देखने के लिए ले जाओ। मैं वहां जाऊंगा तपस्या करूंगा। तो फिर वह वापस आए थे स्वामी जी के बुलाने से। अभी मास्टर महाशय जो लिखते हैं थोड़ा सा वर्णन पढ़ लेते हैं। गंगाधर

दिव्य स्नेह की नींव पर खड़ा वराहनगर मठ 1

शर्बदाई मठे जाता। गंगाधर हमेशा मठ में आना जाना कहते थे। नरेंद्र के ना देखिले तिनी थाकीते पार तेन ना। यदि नरेंद्र को न देखे तो वह रह नहीं पाएंगे। तिनी जय शिव ओमकार ए आरती स्तब आ्यादे जय शिव ओमकार आरती का यह स्तव वही लेके आए थे मठेर भाईरा वाह गुरु की फतेह ए जय जयकार ध्वनि जे माझ कर तेन ताहाओ गंगाधर शिखया छिले मठ के भाई वाह गुरु जी की फतह यह जय जयकार ध्वनि जो बीच-बीच में करते वह भी गंगाधर ने सिखाया आया था तिब्बत होते फरीवार पर त मठे रह गया छिले तिब्बेट से वापस आने के बाद में वह मठ में ही रह गए थे ठाकुर आर दुटी भक्तों हरि और तुलसी नरेंद्र और तहार मठेर भाई देर सर्वदा दर्शन करीते आशी देन ठाकुर के और दो भक्त है हरि और तुलसी हरि अर्थात कि अपने हरि महाराज तुरियानंद जी और तुलसी अर्थात कि निर्मलांद जी वह नरेंद्र और उनके और बाकी सब भाइयों के दर्शन करने के लिए हमेशा मठ में आना जाना करते थे। किु दिन पर अबोशेषे तहारा मठे था जान कुछ दिनों के बाद में आखिर में वह भी मठ में रह गए। आज शुक्रवार 25 मार्च 1887 ख्रिस्ताब्। आज शुक्रवार है 25 मार्च 1887 ख्रिस्ताब् मास्टर मठेर भाई दे दर्शन कोते आशिया छे मास्टर मठ के भाइयों के दर्शन करने के लिए आए हैं देवेंद्र आशिया छे देवेंद्र भी आए हैं मास्टर प्राय दर्शन करते आशेन ओ कोखन कोखन थाकिया जान मास्टर प्रायः नियमित रूप से दर्शन करने के लिए आते हैं और कभी कभी-कभी रह भी जाते हैं। गतो शनिवारे आशिया, शनि, रवि और सोम तीन दिन छिले। पिछले शनिवार को आकर के शनि, रवि और सोम इस तरह तीन दिन थे। ये शनि, रवि और सोम से याद आया

माँ सारदा के चरणों में बालक राममय महाराज की अनन्य भक्ति की कहानी

राममई महाराज वो वहां पे मां तो जयराम भाटी में रहती थी और राममई महाराज पास के ही एक गांव में रहते थे। तो क्या करते थे? स्कूल में जब जाएंगे तो घर छोड़कर के जब स्कूल के लिए निकलेंगे सैटरडे को तो साथ में अपने ये जो पढ़ाई की ये जो टेक्स्ट बुक के साथ में कपड़े वगैरह भी ले जाएंगे। फिर सैटरडे को तो क्या होगा कि स्कूल में हाफ डे होता है। जल्दी छुट्टी हो जाती है। तो फिर जैसे ही स्कूल में छुट्टी हुई सीधा दौड़ के जय राम भाटी चले जाएंगे मां के पास में। मां के साथ में सैटरडे हाफ डे, संडे फुल डे रहेंगे और मंडे मॉर्निंग को जैसे स्कूल चालू होता है फिर से चले आएंगे स्कूल में और फिर जैसे स्कूल से घर वापस जाते हैं ऐसा जाएंगे। तो वीक डेज में मंडे टू फ्राइडे अपने घर रहेंगे और सैटरडे हाफ डे और संडे फुल डे वो मां के घर में रहेंगे। मां की सेवा करेंगे। कभी-कभी यदि वह ना आ पाते तो फिर मां बड़ी चिंतित हो जाती और कहती कि देखो मेरा बच्चा तो बहुत बड़ा हो गया है। अभी तो क्या है उसके सर पर जिम्मा बहुत है। परीक्षा की तैयारी करनी है। इसलिए अपनी बूढ़ी मां को भूल गया है। तो ऐसा करके मां बैठी-बैठी बीच-बीच में बोलती रहती और फिर जैसे ही जिस सैटरडे संडे राम महाराज आते तो इतनी खुश-खश हो जाती। सो देखिए ये जिस तरह से मां का जो

दिव्य स्नेह की नींव पर खड़ा वराहनगर मठ 2

स्नेह था राममई महाराज के लिए एक आकर्षण था। यहां पर देखिए यह गुरु भाइयों का आपस में जो स्नेह का बंधन है मास्टर महाशय के लिए वह आकर्षण रूप है। हमने इसके पहले वाले में भी देखा कि जैसे ही मास्टर महाशय वो जो दाना देर घर दानवों का कमरा मठ में जो बैठक रूम जहां पर सब लोग साधन भजन करते थे हल्लागुल्ला करते थे वो कमरा तो जैसे ही मास्टर महाशय प्रवेश करते हैं वह साथ में ही तारकदा अर्थात स्वामी शिवंद जी वो नरेंद्र ने जो वो शिव भगवान के ऊपर में वो जो भजन उस समय रचना किया था वो गाने लगे और स्वामी ब्रह्मानंद साथ में ही नृत्य करने लगे। तो देखिए अह कि चाहे वराह नगर मठ हो ना कि जयराम भाटी हो और फिर बाद में आलम बाजार मठ बेलूर मठ ये जो उस समय का दक्षिणेश्वर ठाकुर जब थे लोग इसलिए नहीं आते थे कि उनको कोई मिरेकल की अपेक्षा रहती थी वि इज वेरी स्ट्रेंज जब भी यह जो अवतार का आगमन होता है तो स्नेह के सूत्र से अवतार अपने पार्षदों को बांधते हैं वो चाहे है जीसस आए हैं तो वह जो मछुआरे थे वह कारपेंटर थे वह सब किस तरह से आकर्षित होकर के जीसस के पास आते थे भगवान कृष्ण की ये जो वृंदावन लीला आप देखिए गोप गोपियों का भगवान कृष्ण के ऊपर में कितना स्नेह है ये जो मां यशोदा को किसी ने बताया आपका यह जो बच्चा है वह जगत चिंतामणि है तो जब वो भगवान कृष्ण वृंदावन त्याग करके चले गए थे तो मां यशोदा कहती है मुझे तुम्हारा चिंतामणि नहीं चाहिए। मुझे तो मेरा बाल गोपाल चाहिए। तो यह जो स्नेह का संबंध यह जो भाव साधना इसीलिए भारत में आप देखेंगे कि साधना का एक बहुत ही शुद्ध और बहुत ही इफेक्टिव तरीका है। ईश्वर के साथ में संबंध बनाना। वो जो ठाकुर ने कहा ना कि वह सिख आए थे कुछ वहां पे दक्षिणेश्वर में। उन्होंने ठाकुर को कहा कि महाशय महाराज ईश्वर तो दयामय है। तो ठाकुर कहते हैं वह दयामई क्यों है भाई? इनको आप दयामई क्यों कहते हैं? ईश्वर थोड़ी ना दयामई है। वह तो अपने स्वयं के हैं। वह तो अपने है। जो सिख लोग पूछते हैं क्या वो दयामई नहीं है। ठाकुर ने कहा वो दयामय है किंतु दयामय होना वो तो फिर भी एक क्या कहेंगे? उससे भी एक उच्च कक्षा का संबंध हमारा ईश्वर के साथ में है। मां बच्चे पे मां बच्चे को खिलाती है, मां बच्चे को स्नेह करती है। तो दया थोड़ी ना करती है। वो स्नेह का संबंध है। दया का संबंध तो फिर भी निम्न कक्षा का संबंध है। एक गरीब है, एक अपाहिज है, एक अनफॉर्चूनेट पर्सन है, पददलित है। उसके ऊपर आप दया करते हैं। किंतु जो अपने खुद अपने अपने खुद के जो होते हैं उनको तो आप स्नेह करते हैं। तो यह जो स्नेह का संबंध है जहांजहां पे भी यह दिव्य शक्ति का आविर्भाव होता है देखेंगे कि वहांवहां यह स्नेह का संबंध बनता है। तो यहां पे भी मास्टर महाशय कहते हैं कि पिछली बार जब आए थे तो फिर वह तीन दिन रहे थे सैटरडे, संडे और मंडे। मठेर भाई दे विशेषत हो नरेंद्र तो तीव्र वैराग्य मठ के भाइयों का खास करके नरेंद्र का उस समय तीव्र वैराग्य चल रहा था ताई तनी उत्सुक होइया शर्बदा तहा देर देखते आसन इसीलिए मास्टर महाशय हमेशा उत्सुक होकर के इनका दर्शन करने के लिए आते हैं रात्रि हुई अच्छे आज रात रे मास्टर थाकीब रात हुई है आज रात को मास्टर वहीं पे रुक जाएंगे संध पोर शशि मधुर नाम करते करते ठाकुर घरे आलोज वाली लेन उ धनादी लेन संध्या के बाद में शशि ने मधुर नाम करते करते ठाकुर घर में प्रकाश प्रदीप प्रज्वलित किया और धुना दिया श्री धनालैया जतो तो घरे पट आ प्रत्येके काछेिया प्रणाम करते छ वही धुना लेकर के घर में जितने भी पट है अर्थात की छवि है फोटोग्राफ है प्रत्येक के सामने जाकर के प्रणाम करते हैं ए बार आरती होते छे अभी आरती हो रही है शशि आरती करते छ शशि महाराज आरती कर रहे हैं मठेर भाईरा मास्टर ओ देवेंद्र शकले हाथ जोड़ करिया आरती देखते छे ओ शंगेशंगे आरती स्तब गते छ मठ के भाई मास्टर ओ देवेंद्र सब हाथ जोड़ करके आरती देख रहे हैं और साथ-साथ में आरती का स्तव गा रहे हैं। जय शिव ओमकार भज शिव ओमकार ब्रह्मा विष्णु सदा शिव हर हर हर महादेव

युवा विवेकानन्द और श्रीरामकृष्ण की अमिट स्मृतियाँ

नरेंद्र ओ मास्टर दुईजन दुईज जने कथा कहते छ अभी देखिए एक बड़ा ही सुंदर पैसेज यहां से स्टार्ट होता है। नरेंद्र स्वामी विवेकानंद अपने मन की बातें उनके जो अनुभव है वगैरह वर्णन करते हैं। नरेंद्र और मास्टर दोनों लोग वार्तालाप कर रहे हैं। नरेंद्र ठाकुर काछे जावा अबोधी अनेक पूर्व कथा मास्टर काछे बोलीते छ नरेंद्र ठाकुर के पास में आने के बाद की बहुत सारी पूर्व कहानियां मास्टर के सामने कहते हैं। नरेंद्र बोयो शेखन 24 बत्स दुईमाश होइबे नरेंद्र की उम्र अभी 24 साल और दो महीना है दो महीना भी मास्टर मास्टर ने मेंशन किए हैं नरेंद्र प्रथम प्रथम जोखन जाई तो एक दिन भाबे बोल ले तू ऐसे छिश प्रथम प्रथम जब मैं जाता था तब एक दिन भाव में कहा तुम आए हो देखिए अभी यह सब ठाकुर के बारे में नर नरन के रेमिनेशंस जो कि सब अंगत कहानियां है और बाद में हम देखेंगे कि नरेंद्र मास्टर महाशय को बीच-बीच में कहते हैं किंतु ना यह बात आप किसी को बताइएगा मत जो मैं आपको बता रहा हूं और मास्टर प्रॉमिस भी करते हैं कि नहीं मैं किसी को नहीं बताऊंगा। तो मास्टर महाशय ने जो बताया सब लिख भी दिया है। साथ-साथ में जो नरेंद्र ने जो निषेध किया था वह भी लिख दिया है। किंतु देखिए कि मास्टर महाशय ने नरेंद्र के मना करने के बावजूद जो लिखा इसके पीछे का लॉजिक वही है। यह लिखने के समय स्वामी जी की महासमाधि हो चुकी थी। उनका देह त्याग हो चुका था। यानी कि मत लिखिए मत बताइए। यह बात जो है वह जीवंत अवस्था तक ही वो मास्टर महाशय स्वीकार करते हैं। जैसे ही उनका देह त्याग हुआ सब सीक्रेट जैसे कि वो बाजार में जाकर के हांडी फोड़ते हैं। इस तरह से सबके सामने बता दिए। तो नरेंद्र कहता है कि मैं जब पहली पहली बार जाता था तो एक दिन भाव में उन्होंने कहा तुम आए हो? आमी भावलाम की आश्चर्य। मैंने सोचा क्या आश्चर्य है इन्हीं जेनो आमाए अनेक दिन थे के चेन यह वह तो जैसे कि मुझे अनेक दिन से पहचान रहे हैं। पहली पहली बार जब जाते हैं किसी के घर में तो वह पूछेंगे आपका नाम आपका बैकग्राउंड आप क्या करते हैं वो नहीं जैसे कि कितने स्नेह से कह रहे अच्छा तुम आए हो बहुत अच्छा हुआ जैसे वही मां और राममामई महाराज का जो संबंध था राममामई महाराज यदि वीकेंड में नहीं जाएंगे तो मां बेचारी व्यथित होकर के बोलती रहेगी मेरा बच्चा तो अभी बहुत बिजी हो गया है बड़ा हो गया है बहुत बुद्धिशाली है मां यह भी कहती है कि मेरा बेटा तो बहुत बुद्धिशाली है। उसको तो पढ़ाई लिखाई में ज्यादा ध्यान देना है। इसलिए अपनी बूढ़ी मां को भूल गया है। तो यहां पे भी ठाकुर कहते हैं तुम आए हो इतना स्नेह से प्रेम से उनको अवकार देते हैं। स्वामी जी कहते हैं क्या आश्चर्य की बात है। जैसे हमारा जन्म जन्मांतर का संबंध है। जैसे कितने दिनों से मुझे पहचानते हैं। इस तरह से मेरे साथ में स्नेह का इंस्टेंट जो रिलेशन है वह बन गया है। तार पर बोले तू की एक ज्योति देखते पास उसके बाद में उन्होंने पूछा तुम क्या एक ज्योति देख पा रहे हो आ बोलम आगे हां मैंने कहा जी हां घुमा बार आगे कपाल काछे की जेनो एक ज्योति घुरते थाके सोने के पहले कपाल के सामने क्या किस तरह की एक ज्योति घूमती रहती है मास्टर एककी देखो मास्टर ने पूछा अच्छा अभी देख रहे हो क्या नरेंद्र आगे खूब देखता हूं नरेंद्र कहता है पहले बहुत देखता था जदुमल्ली के रन्ना बाड़ी ते एक दिन आमा स्पर्श कोरे की मोनेमने बोल ले आमी अज्ञान होए ग यदुमल्ली का अर्थात कि दक्षिणेश्वर के पास का ही यह जो ये है घर इन लोगों का बागानवाड़ी वहां पे नरेंद्र कहता है कि मुझे एक दिन स्पर्श किया और मन मन में ही मन में कुछ बोले मैं अज्ञान हो गया मैं बेहोश हो गया शई नशाय ओमोन एक मास छिलू उस नशे में मैं एक मास था देखिए वो जो नरेंद्र के खुद के शब्दों में जो शरद महाराज लीला प्रसंग में जो वर्णना करते हैं कि नरेंद्र ठाकुर के साथ में जो पहली पहली बार मुलाकात करने को आया था और उनके मन में क्या यह सब चिंताधारा चल चल रही थी। जब ठाकुर ने उनको स्पर्श किया और वो चिल्ला उठे अरे क्या कर रहे हो? मेरे मां है बाबा है। तो यह सब जो घटनावली स्टार्टिंग स्टार्टिंग में हुई थी। उसके बाद में नरेंद्र अपने को प्रश्न करता है कि यह जो हिप्नोटिज्म है ना कि यह क्या है? और हिप्नोटिज्म है। यह बात नरेंद्र स्वीकार करने को तैयार नहीं। क्यों? उनके नरेंद्र स्पष्ट रूप से दृढ़ रूप से मानता है कि जो कमजोर चरित्र के हैं जिनका वीक पर्सनालिटी है वही लोग जो है वो हिप्नोटाइज ईजीली होते हैं और यहां पे नरेंद्र है ही इज़ प्राउडली सेल्फ कॉन्फिडेंट प्राउडली करजियस प्राउडली अ स्ट्रांग पर्सनालिटी तो नरेंद्र कहता है कि मेरे जैसी स्ट्रांग एक जिसका पर्सनालिटी है उसके माइंड को जैसे कि मिट्टी के एक घड़े को कैसे वो कुम्हार जो है गीली मिट्टी लेकर के घड़े को जिस तरह से वह आकार देना चाहता है उस तरह से दे सकता है। तो नरेंद्र कहता है मेरा मन क्या है गीली मिट्टी की तरह है। ठाकुर जैसे इच्छा मेरे मन के साथ में खेल सकते हैं। उसको शेप कर सकते हैं। तो नरेंद्र को जो उस समय शोक लगा था। ठाकुर के पावर की ये जो उनको अनुभूति हुई थी जो फर्स्ट एक्सपीरियंस हुआ था। तो यहां पर भी नरेंद्र वही कहता है कि जब एक दिन मुझे स्पर्श कर दिया और मन में ही मन में कुछ बोले मैं बेहोश हो गया और उस नशे में एक मास तक था एक महीने तक था आमार विवाह होबेश ने मां काली पा धरे कैदे छिलन मेरा विवाह होगा सुनकर के मां काली का पैर पकड़ कर के रोए थे कहदे बोले छिलेन रोते-रोते बोले थे मां वो सब घुरिए दे मां नरेंद्र जनो डूबे ना जाए मां वो सब घुमा दो घुरिय अर्थात कि वह सब उसको घुमा दो उसका पूरा चेंज कर दो नरेंद्र कहीं डूब ना जाए यह जो नरेंद्र के विवाह की बात इसके बारे में है थोड़ा सा वर्णन कि एक लड़की को देखा था और उस समय नरेंद्र के पिताजी जीवित थे तो पैसा वगैरह भी था घर में और नरेंद्र जैसा एलिजिबल लड़का तो अच्छा ही है अच्छा अच्छा पात्र है तो किसी के एक लड़की के साथ में विवाह की बात चल रही थी। ऑफ कोर्स नरेंद्र यह सब बंधन में बंधने वाला नहीं। किंतु फिर भी ठाकुर का जो नरेंद्र के प्रति स्नेह है प्रत्येक छोटी-छोटी आप तो ठीक ही है। आप की शंका भी यदि होती है ठाकुर को तो ठाकुर उससे भी नरेंद्र को जैसे कि रक्षा करते हैं। जोखन बाबा मारा गले मां

युवा विवेकानन्द के लिए श्रीरामकृष्ण का प्रेम: घर-घर भिक्षा माँगने को भी तैयार।

भाईरा खेते पाना तो एक दिन अन्नदा गुहर शंगे गए तार शंगे शाखात होलो जब पिताजी मर गए थे मां और भाई उनको खाना नहीं मिल रहा था तब एक दिन में अन्नदा गुह के साथ में जाकर के उनका साक्षात्कार मैंने किया अन्नदा गुह स्वामी जी का एक मित्र था पिताजी के मृत्यु के बाद में घर की जो दुरा अवस्था दुर अवस्था स्था प्रारंभ हो चुकी थी। उस दिनों की बात है अपने मित्र को लेकर के स्वामी जी उस समय के नरेंद्र दक्षिणेश्वर में ठाकुर को मिलने के लिए गए। त अन्नदा गुह के बोल तो उन्होंने अन्नदा गुह को कहा नरेंद्र बाबा महारा बो कोष्टो एक बंधु बांधवरा सहाजो करे तो बेश होए नरेंद्र के पिताजी मर गए हैं उनको बहुत कष्ट है अभी यह बंधु बांधव सहाय करें तो बहुत अच्छा होगा नरेंद्र यहां पे इतना प्राउड है इतना मतलब एक जो कहता है कि कहते हैं ना कि दूसरों के सामने कभी सहाय के लिए झुकना नहीं है तो वह प्राइड नरन में पूरा भर के पड़ा है। यहां पे ठाकुर नरेंद्र के लिए उसके मित्र से यह पूछ रहे हैं कि तुम अभी जो मित्र जितने भी है नरेंद्र के सहाय करें तो अच्छा है। देखिए स्वामी जी का बायोग्राफी इसी में मतलब हम अभी वो सब चैप्टर तो हमने स्किप कर दिए हैं। डायरेक्ट वरा नगर में आ गए हैं। किंतु जब पीछे वाले चैप्टर पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि नरेंद्र के साथ में जो हुआ था जिस मित्रों के साथ में नरेंद्र हमेशा इतना स्नेह और प्रेम से वार्तालाप करता था वो मित्र जैसे कि देख के भी नहीं देख रहे हैं समझ करके भी नहीं समझ रहे हैं कि नरेंद्र वैसे ही पहले की तरह ही वह संगीत की मजलिस में आए पहले की ही तरह गान करें यह सब एक्सपेक्टेशन कर रहे हैं और नरेंद्र को खाने का कष्ट कष्ट है। देख के भी नहीं देख रहे हैं। समझ करके भी सहाय करने की बात नहीं कर रहे हैं। तो यह नरेंद्र को खुद को थोड़ा कष्ट हुआ था। किंतु प्राइड इतना था कि यदि कोई सामने से सहाय का ऑफर ना करे वो क्यों दूसरों के पास में सहाय मांगने को जाएगा। नो डाउट नरेंद्र नौकरी खोज रहा था। तो नौकरी खोजना किंतु एक चीज है। और मित्रों के पास में जाकर सहाय मांगना कि भाई आज मेरे घर में खाने को कुछ नहीं है। थोड़ा सा खाने को दे दो। थोड़ा सा रुपया दे दो। वह तो भीख मांगने के बराबर हो गया। अभी परिवराजक होकर के प्रवज्या करना वह एक चीज है। भाई बहनों को खाना नहीं मिलता है। इसलिए भीख मांगना वो दूसरा चीज है। बहुत बार नरेंद्र क्या करता? पता है कि घर में थोड़ा सा ही खाना है। तो कहता घर में आकर के कि आप लोग खा लीजिए। मैं बाहर से खा के आया हूं। ऐसा बोलकर के जो थोड़ा सा खाना रहता था वह मां और भाई बहनों को खिला देता था। खुद जैसे कि बिना खाए उपवास करके रहता था। ऐसा करके करके सर दर्द है, चक्कर आना यह सब नरेंद्र को उस समय स्टार्ट हो गया था। यह पेट के जितने भी रोग बाद में स्वामी जी को हुए हैं स्वामी जी जब प्रवृजिया करते थे तो हमेशा वो रिक्वेस्ट करते यदि कोई पैसा देने को तैयार है ट्रेन की टिकट का तो स्वामी जी सेकंड क्लास की टिकट का पैसा मांगते थे। थर्ड क्लास तो जनरल होता था। फर्स्ट क्लास यूजुअली यह सब रिजर्व होता था। तो सेकंड क्लास ऐसा कोई अच्छा कंपार्टमेंट का स्वामी जी पैसा मांगेंगे। क्यों? क्योंकि उसमें साथ में टॉयलेट रहता है। तो बार-बार जो शौच के लिए जाना पड़ेगा स्वामी जी को तो वो टॉयलेट में जा सकते हैं। बोल कर के यह जो जितने भी पेट के रोग वगैरह स्वामी जी को स्टार्ट हुए उसी टाइम स्टार्ट हुए थे। तो यहां पे जब ठाकुर ने ऐसा कहा अब देखिए नरेंद्र खुद तो किसी से सहाय नहीं मांग रहा है तो ठाकुर उनका उसके होकर के सहाय मांगते हैं तो नरेंद्र तो गुस्सा हो ही जाएगा थोड़ा सा अन्नदा गुह चले गले आ ता के बोकते लाला अन्नदा गुह चले जाने के बाद में मैं उनको लड़ने लगा बोललाम कहा केनो अपनी और का वही सब कथा बोल ले क्यों आपने उसके सामने यह सब बातें कही त तिरस्कृत होए का लाले ओ बोलले ओरे तोर जो द्वारे द्वारे भिक्षा करते पारी नरेंद्र ने तिरस्कार किया तो वह तिरस्कृत होकर के कांदने रोने लगे ठाकुर देखिए तिरस्कृत होकर के रोने लगे और कहा उन्होंने अरे तुम्हारे लिए तो मैं द्वार द्वार घरघर जाकर के भिक्षा कर सकता हूं। देखिए नरेंद्र और ठाकुर [गला साफ़ करने की आवाज़] का रिश्ता वही जो काशीपुर में अस्थ काशीपुर में जब ये जो चंदा उघराने को लेकर के थोड़ा सा विवाद हुआ था। उस समय सुरेश मित्र ज्यादातर पैसा देता था। सुरेश मित्र रामदत्त वगैरह ज्यादा पैसा देते थे। उस समय कुछ ना कुछ यह डिस्टरबेंस चालू हो गया था त्यागी संतान और यह इन गृहस्थ लोगों के बीच में। तो ये त्यागी संतानों में से या तो फिर ठाकुर के इस ग्रुप वाले जो थे भक्त उन्होंने चंदा इकट्ठा करने का प्रयास किया था। तो वो उन लोगों को पता चला तो उनको नहीं अच्छा लगा। तो ठाकुर ने कहा नरेंद्र को उस समय कि अरे यह सब लोगों का पैसा लेकर के यहां पर रहने की जरूरत नहीं। चंदा उगराने की भी जरूरत नहीं। तुम मुझे अपने कंधे पर बिठा के जहां पर लेकर जाओगे मैं तुम्हारे साथ चलूंगा। तुम यदि भिक्षा का अन्न मुझे खिलाओगे तो भी मैं बड़े ही आदर पूर्वक खाऊंगा। तो यह ठाकुर नरेंद्र के लिए भिक्षा करने को तैयार है। नरेंद्र ठाकुर के लिए भिक्षा करने को तैयार। किंतु नरेंद्र का जो प्राइड है कि मित्रों को क्यों इस तरह से कहा? तो वो ठाकुर को लड़ने लगे कि आपको इस तरह से उसको कहने की आवश्यकता नहीं थी। तो ठाकुर रोते-रोते कहते हैं कि तुम्हारे लिए मैं घरघर जाकर के भिक्षा कर सकता हूं। त भो बेशे आमादे वशीभूत करे छिले देखिए ये वो जो महावाक्य जो अपने लिटरेचर के जो कुछ कुछ महावाक्य है उसमें से यह एक महावाक्य उन्होंने स्नेह से हम सबको वशीभूत किया था। कोई मिरेकुलस पावर बता के ना फर्स्ट जनवरी को वो कल्पतरु हुए थे मन की इच्छा मनोवांछा पूर्ण करके इसलिए वो उन्होंने सबको इकट्ठा करके नहीं रख पाए थे स्नेह के पास में बांध करके स्नेह के पास से वशीभूत करके देखिए वशीभूत शब्द यहां पे नरेंद्र प्रयोग करता है नरन वशीभूत शब्द हिप्नोटाइज्ड शब्द दो कॉन्टेक्स्ट में यूज करता है एक तो जब ठाकुर ने उनको स्पर्श कर दिया और फिर यह भयानक विचित्र अनुभूतियां होने लगी कि घटे भी ब्रह्म बाटे भी ब्रह्म सब कुछ जैसे कि शून्य में विलीन हो रहा है वगैरह वगैरह वो तो अनुभूति उनको हुई थी तो उनको यह मन में बहुत ही एक रिएक्शन आया था स्ट्रांग कि मेरे जैसी स्ट्रांग पर्सनालिटी को ठाकुर हिप्नोटाइज कैसे कर सकते हैं तो ठाकुर उनके जैसी स्ट्रांग पर्सनालिटी को तो हिप्नोटाइज कर ही सकते हैं जिसको कहते हैं बाय ब्रूट स्ट्रेंथ ब्रूट पावर पर माने एक सिर्फ शक्ति मात्र से ठाकुर उनको वश में कर सकते हैं। किंतु साथ-साथ में ही स्नेह के पास से भी वशीभूत कर सकते हैं। ठाकुर की यह सिद्धि है। यदि वह सिर्फ अनुभूति के माध्यम से मन को कंट्रोल करके ठाकुर ने वशीभूत किया होता तो नरेंद्र हमेशा इस तरह का वशीकरण अपने मन में से फेंक देने का प्रयास करता। हमेशा सामने रेबेल करता और किंतु जब स्नेह के पास में ठाकुर ने जब बांधा तो फिर इस तरह के स्नेह के वशीकरण को फेंकने की शक्ति स्वामी जी में भी नहीं है। इसका अर्थ देखिए ठाकुर की ये जो सब स्पिरिचुअल शक्तियां थी स्पिरिचुअल पावर थे जिस पावर से वो नरेंद्र जैसे नरेंद्र के अत्यंत स्ट्रांग माइंड को यह जो गीली मिट्टी की तरह शेप कर सकते थे उससे भी ज्यादा शक्ति ठाकुर के स्नेह में थी। वो वाला वशीकरण नरेंद्र के ऊपर में यदि किया होता मानसिक शक्तियों का प्रयोग करके तो नरेंद्र ने आजीवन उसके सामने फाइट किया होता। किंतु यह जो स्नेह का वशीकरण है नरेंद्र उसके सामने बेचारा निरुपाय हो जाता है। निहत्ता हो जाता है और उसके वशीकरण में संपूर्ण रूप से शरणागत हो जाता है। तो यह नरेंद्र कहता है उन्होंने स्नेह से हमको वशीभूत करके रखा है। आपने की बोले आप क्या कहते हैं? मास्टर अणु मात्र संदेह नहीं। मास्टर कहते हैं अणु मात्र संदेह नहीं है और अहेतु भालो भाषा उनका था अहेतुक भलो भाषा अहेतुक स्नेह देखिए स्नेह का भी प्रकार होता है यदि कोई रिलेटिव है हमको स्नेह करते हैं कोई फ्रेंड स्नेह करते हैं तो उसमें क्या है कभी-कभी एक रेसिप्रोसिटी का भी एक पीछे में एक रीजन रहता है एक भावना रहती है कि मुझे जब जरूरत पड़ेगी तो यह लोग सामने सामने मुझे हेल्प करेंगे तो किंतु ठाकुर का जो स्नेह है किसी रेसिप्रोसिटी के ऊपर में आधारित नहीं है। नरेंद्र सामने ठाकुर को श्रद्धा करें ना करें ठाकुर का नरेंद्र पे जो स्नेह है वह अहेतुक है विदाउट एनी एक्सपेक्टेशन ऑफ रेसिप्रोसिटी बिना किसी रिटर्न की आशा के ठाकुर नरेंद्र को स्नेह करते हैं। नरेंद्र

युवा विवेकानन्द और श्रीरामकृष्ण का आत्मीय संबंध: बिना झिझक मन की बात

आमा एक दिन एकला एकटी कथा बोलले मैं जब एक दिन अकेला था मुझे एक दिन अकेले में एक बात कही आर के छिलो ना और कोई था नहीं ई कथा अपनी आर कारू के बोलवे ना यह बात आप और किसी को बताइएगा मत देखिए नरेंद्र सीक्रेटली मास्टर महाशय के सामने ठाकुर के साथ में जो वार्तालाप हुआ उसमें से बता रहे हैं और साथ में ये वार्निंग भी दे रहे हैं कि और किसी को बताइएगा मत। मास्टर महाशय बताते तो है ही है किंतु साथ में जो वार्निंग जो दी थी वह भी लिखते हैं और यहां पर यह ब्रीच ऑफ फेथ नहीं है क्योंकि स्वामी जी की महासमाधि के बाद की यह सब घटना बाद में यह मास्टर महाशय ने लिपिबद्ध किया है मास्टर ना की बोले छ नहीं बताऊंगा बताओ क्या कहा था [हंसी] नरेंद्र तीन ही बोलले अमार तो सिद्धाई कर बार जो उन्होंने कहा था मुझे मुझे तो यह सब मिरेकुलस पावर है। उसकी कोई आवश्यकता नहीं है। तो भीतर दिए करो। तुम्हारे माध्यम से मैं यह सब करूंगा। की बोलिश क्या कहते हो? आमी बोललाम ना ता होवे ना। मैंने कहा नहीं वह करने की जरूरत नहीं है। देखिए ठाकुर कहते हैं कि उनके पास तो यह सब योगिक सिद्धियां थी। वह खुद तो प्रयोग करना नहीं चाहते। किंतु कहते हैं कि तुम्हारे माध्यम से मैं सिद्धियों का प्रयोग करना चाहता हूं। तो क्या कहते हो बताओ की बोलिश ठाकुर कहते हैं की बोलिश बताओ क्या कहते हो आ बोलम ना ता होवे ना मैंने कहा नहीं वो होगा नहीं और कथा उता उनकी बातें उड़ा देता और का सुने छ ईश्वर रूप दर्शन करें ए विषय आमी बोले बोले छिला मैं उनके पास में सुना था कि ईश्वर के रूप दर्शन करते हैं इस विषय में आ मैंने कहा था वही सब मने और भूल वह सब मन की भूल है। देखिए नरेंद्र की यह जो ठाकुर के साथ में जो स्वच्छंद जो वार्तालाप होता था श्रद्धा भी थी माने ठाकुर का इंसल्ट नहीं करते थे। श्रद्धा और स्नेह के माध्यम से जो वार्तालाप होता है वह था। नरेंद्र कभी ठाकुर का इंसल्ट कभी नहीं करेगा। किंतु स्नेह का संबंध इतना स्ट्रांग है। ठाकुर ने कहा ना कि ईश्वर तो हमारा अपने है। जो यदि वह दयामय है तो दयामय ईश्वर के साथ में आप इस तरह की माने बोल्ड बातें नहीं कर सकते। ठाकुर ने जैसे ही कहा तुम्हारे माध्यम से सिद्धि का प्रयोग करना चाहता हूं। नहीं वो सब नहीं होगा। मैंने उनके पास में सुना कि मेरे पास में ये सब मिरेकुलस पावर है। तो मैंने सीधा-सीधी कह दिया वह सब आपके मन की भूल है। यानी कि जो अपने हैं खुद के [हंसी] हैं उनके साथ में आप इतना बोल्डली बात कर सकते हैं। जो पराए हैं जो कि हमारे पर दया करते हैं उनके साथ में इतना बोल्डली वार्तालाप हम नहीं कर पाएंगे। तीन बोल लेन उन्होंने कहा ओरे आमी कुठी ऊपर चेंचिए बोलता। अरे मैं कुठी के ऊपर में चिल्ला करके कहता कुठी अर्थात कि दक्षिणेश्वर में कुठीवाड़ी बोलकर के एक है जहां पे मथुर बाबू जब दक्षिणेश्वर में आते थे तो वह रहते थे। ठाकुर पहले वहां पे ही रहते थे। किंतु फिर बाद में वो जब अपना जो अभी जो चिर परिचित कमरा है ठाकुर का वहां पर वह बाद में शिफ्ट हो गए थे। ठाकुर की मां चंद्रामणि देवी वह भी वही कुठी में ही रहती थी। किंतु फिर बाद में जब अक्षय की मृत्यु हुई तो फिर उनको वहां पर अच्छा नहीं लगने लगा तो फिर वह नहबत में शिफ्ट हो गई। ठाकुर चले गए वो जो उनका जो चिर परिचित कमरा है वहां और उनकी मां चली आई नबत में और फिर बाद में चंद्रामणि देवी के साथ में आकर के मां शारदा भी वहीं पर रह रही थी। तो ठाकुर कहते हैं कि मैं कुठी की छत के ऊपर में जाकर के चिल्ला के कहता ओरे कोथाई के भक्तो आशीष आए अरे कहां पे कौन भक्त हो आओ तो देर ना देखे हमार प्राण जाए तुमको ना देख के मेरे प्राण जा रहे हैं ये वही बात कि जय राम बाटी में मां पुकारती है यहां पे दक्षिणेश्वर में ठाकुर पुकारते हैं मां बोले छिलेन मां ने कहा था मां अर्थात मां काली ने मां ने कहा था भक्त तेरा शोभाश भक्त सब आएंगे ता देखो सब तो मिल छ तो देखो सब तो मिल रहा है देखिए ये क्यों बात कर रहे हैं नारायण ने पहले तो कहा कि ईश्वर के जो रूप दर्शन होते हैं वह सब आपके मन की भूल है तो ठाकुर ने सामने कहा कि मैं जब कुठी के ऊपर में जाकर के चिल्लाता था कि भक्तगण तुम कहां पे हो आओ मां ने कहा था कि सब लोग आकर के मिलेंगे तो देखो अभी तो सब मिल जा रहा है मैंने कहा था कि मां ने कहा कि भक्तगण आएंगे तो सब तो आ रहे हैं। पहले पहले ठाकुर को भी संदेह हो गया था। वह जब मथुर बाबू को कहते हैं कि मां ने तो मुझे कहा है कि बहुत सारे भक्त आएंगे किंतु अभी तो कोई आ नहीं रहे तो मथुर बाबू ने ठाकुर को सांत्वना देते कहा था कि बाबा मैं ही एक अकेले 100 भक्तों के बराबर हूं। तो ठाकुर ने सोचा मां को तो पता है कि मेरा मैथमेटिक्स गड़बड़ है। इसलिए क्या मेरे साथ में ऐसा कोई मजाक किया है क्या? किंतु देखिए कि सही में मां की वो जो भविष्यवाणी थी या तो मां का जो आशीर्वाद था वो सही में फुलफिल हुआ। कितने सारे भक्त आते थे और जब ठाकुर यह बात देकर के नरेंद्र की यह जो युक्ति को काटते हैं तो नरेंद्र क्या कहता है ठाकुर कहते हैं कि देखो सब तो मिल जा रहा है तो नरेंद्र क्या कहता है आमी तो खन और की बोलबो चुप करे रोलाम मैं तब और क्या कहूंगा चुप करके रहा देखिए नरेंद्र को भी चुप करवा दिया

विवेकानन्द वास्तव में कौन थे? उनके दिव्य स्वरूप की झलक

एक दिन घरे दरजा बंद करे देवेंद्र बाबू और गिरीश बाबू के हमार विषय बोले छिले एक दिन घर के दरवाजे बंद करके देवेंद्र बाबू और गिरीश बाबू को मेरे बारे में कहा था और घोर बोले दिलेले वो देहो रखबे ना उसका घर बता देने से वह देह नहीं रखेगा देखिए ठाकुर ने कमरे का दरवाजा बंद करके देवेंद्र बाबू और गिरीश बाबू को नरेंद्र के बारे में कहा कि नरेंद्र को यदि मैं बता दूं कि उसका घर कौन सा है तो वह देह नहीं रखेगा। ये ये जो है कि देह नहीं रखना इसको लेकर के हमारा थोड़ा एक डिस्कशन पहले भी हुआ था। हमको पता है कि ठाकुर वो गया नहीं गए थे। जगन्नाथ पुरी नहीं गए थे। तो ऑल ऑफ दिस है कि जहां से उनकी उत्पत्ति हुई हो। जो राखाल जो है वृंदावन जब गया था तो ठाकुर को एक थोड़ा सा डर लग गया था कि वह वृंदावन जाकर के जो स्वरूप का फिर से उद्दीपन हो जाए तो हो सकता है कि फिर वहां से ना आए वापस तो यह सब है कि उनका घर अर्थात कि उनकी उत्पत्ति कहां से हुई है किस पर्पस के लिए हुई है शायद यदि बता दे तो हो सकता है कि फिर से वो अपने वो धाम चले जाए वो जो विष्णु ने वराह अवतार लिया था ना फिर वो राक्षस का वध करने के बाद में वो बच्चे-बच्चियों को लेकर के बढ़िया मजे से थे। वह वैुंठ में स्वर्ग में वापस ही नहीं आ रहे। तो देवता सब चिंतित हो गए। तो फिर भगवान विष्णु ने जाकर के त्रिशूल से वराह का शरीर भांग दिया। तब भगवान ही ही करके हंसते-हंसते फिर से वैुंठ में चले गए। तो ठाकुर ने कहा नरेंद्र ने कहा कि हां ठाकुर कह रहे हैं देवेंद्र बाबू और गिरीश को कि यदि उसको बता दे कि उसका घर कौन सा है तो फिर वह देह नहीं रखेगा मास्टर हां सुने छी मास्टर महाशय कहते हैं हां मैंने सुना है आ रामादेव काछू अनेक बार बोले छिले और हमारे सामने भी अनेक बार कहा था काशीपुर थकते तो एक बार सही अवस्था होए छिलो ना काशीपुर में रहते-रहते तुम्हारी एक बार वह अवस्था हुई थी तो वह अवस्था अर्थात कि निर्विकल्प समाधि ये देखिए निर्विकल्प समाधि में जाने का नरेंद्र जितनी भी बार प्रयास करता है उतनी ही बार वो जैसे कि कुछ ना कुछ हो जाता है और ठाकुर उनको वापस खींच के ले आते हैं वो बाद में कहेंगे अभी आएगा वो चाबी वाली बात श अवस्थाएं बहुत हो हम शरीर ना शुद्ध मुक्ति देखते पाी उस अव अवस्था में ऐसा लगा कि मेरा शरीर नहीं है। सिर्फ अपना मुंह देख रहा हूं। जिसे मुंह का ही अनुभव हो रहा। अनुभूति हो रही है। ठाकुर ऊपर घोरे छिले। ठाकुर ऊपर वाले कमरे में थे। श्री काशीपुर में आपको पता होगा कि ठाकुर का कमरा था फर्स्ट फ्लोर पे और यह भक्तगण वगैरह ग्राउंड फ्लोर पर रहते थे। तो ठाकुर जब नरेंद्र को यह निर्विकल्प समाधि हुई थी। उस समय ठाकुर फर्स्ट फ्लोर पे अपने कमरे में थे। अमार नीचे उई अवस्था टी होो नीचे में मेरी वही अवस्था हुई आई अवस्था ते काते ला मैं उसी अवस्था में रोने लगा देखिए आश्चर्य की बात है कि और फिर क्या कहते हैं बोलते लाला अमार की हो बोलने लगा मेरा क्या हुआ मेरे साथ में क्या हो रहा है बूढ़ो गोपाल ऊपर गए ठाकुर के बोलने नरेंद्र कांद छे बूढ़ो गोपाल अर्थात कि अद्वैतानंद जी ने ऊपर जाकर के ठाकुर को कहा नरेंद्र रो रहा है तो आश्चर्य की बात है। देखिए नरेंद्र जैसा नरेंद्र इतना स्ट्रांग विल पावर है। इतनी आध्यात्मिक ऊंचाई पर बैठे हैं। फिर भी यह जो सब उच्च कक्षा की आध्यात्मिक अनुभूतियां है ना वो प्रथम तो एक तरह का डर ही मन में प्रकट करेगी। वही जो नरेंद्र के साथ में वो जो भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ था। नरेंद्र कहता है छोटा था। एक कमरे में मैं पढ़ाई कर रहा था। एक सौम्य दर्शन सन्यासी जैसे देखा कि मेरी ओर आ रहे हैं। जैसे ही देखा मैं ऐसा घबरा उठा कि मैं चिल्ला के कमरा छोड़कर के भाग खड़ा हुआ। फिर कहते हैं कि हो सकता है कि मुझे भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ होगा। राखाल स्वामी ब्रह्मानंद जब दक्षिणेश्वर में थे तो ठाकुर को बार-बार कह रहे हैं आपको मुझे कोई ना कोई अनुभूति करवा देनी होगी। मुझे कोई अनुभूति चाहिए। तो एक दिन ऐसा कुछ बोल के फिर जाकर के ठाकुर जा रहे हैं दक्षिण वो काली मंदिर में मां काली को प्रणाम करने के लिए एकाएक राजा महाराज ने देखा कि उनकी ओर से एक प्रचंड विराट शक्ति जैसे कि राजा महाराज की खुद की ओर मने दौड़ के चली उड़ के चली आ रही है तो वो देखकर के राजा महाराज चिल्ला करके वहां से उठो खड़े होकर के भाग गए तो देखिए कि नरेंद्र भी पहली बार निर् तीनचार बार नरेंद्र के साथ में तो हो ही गया है। पहली बार छुआ तो चिल्ला उठे है। मेरे मां है, मेरे बाबा है। फिर यह जो उसके पहले वाले में भी कि सब कुछ जैसे कि शून्य में मिलने लगा तो वो एक डर लग गया था। और फिर यहां पे भी देखिए कि जैसे ही उनको ऐसा लगा कि पूरा देह जैसे कि अदृश्य हो गया है। चेहरा ही सिर्फ अनुभव कर सकते हैं। तो वह रोने लगे थे। और यह बात नरेंद्र अपने खुद के मुंह से कहता है। सो दिस इज वेरी स्ट्रेंज कि यह जो आध्यात्मिक अनुभूतियां होती है उसमें शक्ति ऐसी होती है कि राजा महाराज और स्वामी जी अपने संघ के जो दो सर्वोच्च माने ठाकुर और मां के बाद में जो सर्वोच्च आध्यात्मिक शक्तियां है अपने संघ में वे लोग भी डर जाते हैं रोना शुरू कर देते हैं। तो बूढ़ो गोपाल ने ऊपर जाकर के ठाकुर को कहा कि नरेंद्र रो रहा है तार शंगे देखा होले त बोलले इसके बाद में नरेंद्र खुद ऊपर गया होगा तो उनके साथ में जब मुलाकात फिर से जब हुआ मुलाकात ना कि फिर से उनके कमरे में गया तीन ही बोल ले उन्होंने कहा एक टेरर पेली अभी समझ में आया चाबी अमार का छे रह लो चाबी मेरे पास में रही आमी बोल अमार की हो मैंने कहा मेरे साथ में क्या हुआ त्यो भक्तों दे द बोलले वो अपना के जानते पारले देहो राखबे ना आ भूलिए रखे छ जब स्वामी जी ने कहा कि मेरे साथ में क्या हुआ तो फिर ठाकुर सब अन्य भक्तों के सामने देख के कहते हैं कि वह यदि अपने आप को पहचान लेगा तो देह नहीं रख पाएगा। मैंने उसको भुला करके रखा है। एक दिन बोले छिलेन एक दिन उन्होंने कहा था तू जदी मोने कोिश कृष्ण के हृदय मध्य देखते पास तू यदि चाहो तुम यदि चाहो तो कृष्ण को अपने हृदय में देख पाओगे आमी बल्लम आमी केस्टोफेस्टो मानी ना [हंसी] मैंने कहा मैं ये कृष्ण कृष्ण केस्टोफेस्टो उसमें मैं मुझे विश्वास नहीं है मैं उनको मानता नहीं नरेंद्र और मास्टर दोनों का हास्य तो दोनों हंसने लगे आर एक देखे छ और एक देखा था एक एक जाएगा जिनश बा मानुष देख ले बोध होए जेनो आगे जन्मांतरे देखे छ एक-एक जगह कोई चीज या किसी मनुष्य को देख कर के ऐसा लगता है जैसे कि मैं जन्म जन्मांतर से उनको पहचानता हूं। आगे कितने जन्मों से मैं उनको देखता हूं। देखिए इंटरेस्टिंग ये जो सब संबंध कैसे बनते हैं ये जो हेल फैमिली जिनके घर स्वामी जी रहे थे तो एक बहुत सालों के बाद की बात है। फिर तो स्वामी जी की महासमाधि के कुछ समय के पहले की ही बात है। स्वामी जी जब उनको लेटर लिखते हैं तो उन्होंने कहा कि योर फैमिली हैज़ फॉर एवर बिकम ए पार्ट ऑफ माय माइंड। आपका जो फैमिली है हमेशा के लिए मेरे मन का एक भाग बन चुका है। तो इस तरह से ये जन्म जन्मांतर के संबंध स्टार्ट होते हैं। हमको तो पता है कि उन्होंने स्वामी जी को कितना हेल्प किया और यह जो हेल्थ सिस्टर्स जो थी वो स्वामी जी को कितना स्नेह करती थी। तो यह जो जन्म जन्मांतर का नाता जो है वो इस तरह से प्रारंभ होता है। स्वामी जी स्पष्ट लिखते हैं यू हैव बिकम फॉर एवर अ पार्ट ऑफ माय माइंड। मेरे मन का एक हिस्सा बन चुके हो। तो यहां पर भी यह जन्म जन्मांतर हमेशा ये ठाकुर के साथ में पार्षद आते हैं। तो तो जब भी किसी के साथ में ऐसा गहन संबंध आध्यात्मिक संबंध बनना है तो ऐसा लगता है जैसे कि जब फिर से जब आएंगे तो उनको जब देखेंगे फिर से मिलेंगे फिर से उस जगह पर जाएंगे तो लगेगा कि कितना जन्म जन्मांतर का नाता हमारा उनके साथ में है। चेनो चेना चेना जैसे कि सब पहचाना जाना पहचाना है। आम हार्ट स्ट्रीट जोखन शरद बाड़ी ते गलाम शरद के एक बार बोललाम वही बाड़ी जेनो आर सब जाना एम हार्ट स्ट्रीट में जब मैं शरद के घर गया था स्वामी शारदानंद तो मैंने शरद को कहा कि अरे भाई यह घर में सब जैसे कि मेरा जाना पहचाना है बाड़ी भीतरे पौथ गुली घोरगुली जेनो अनेक दिनर चेना चेना बाड़ी के घर के भीतर का रास्ता घर के भीतर के कमरे सब जैसे कि कितने दिनों से जाने पहचाने हैं। ये शरद महाराज के साथ में एक कहानी है। नरेंद्र के घर गए हैं तो नरेंद्र फिर वापस जाने का समय हुआ और वार्तालाप में इतने मशगूल हो गए कि कोई दूसरे दोनों एक दूसरे को छोड़ना नहीं चाहते। तो नरेंद्र कहता है चलो मैं तुम्हारे घर पे छोड़ आता हूं। ऐसे मतलब इतना थोड़ा सा और लंबा टाइम मिलेगा हमको बात करने के लिए। तो वो आए नरेंद्र के घर से शरद के घर वार्तालाप करते-करते। अभी वो बातों का सिलसिला ऐसा वो लग गया है तो शरद कहता है अच्छा ठीक है चलो तुम अपने घर जाओ मैं तुमको छोड़ के आता हूं तो फिर वो नरेंद्र के घर आए बातें करते करते फिर बात अभी भी खत्म नहीं हो रही तो फिर से वो शरद के घर आए ऐसा कितनी बार वो शरद के घर छोड़ने के लिए स्वामी जी जाते हैं वो स्वामी जी को अपने घर में छोड़ने के लिए शरद महाराज जाते हैं तो यह जो जन्म जन्मांतर का जो नाता है यह उनके मन में अच्छा इसके बाद जो है अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु [गला साफ़ करने की आवाज़] ओम