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ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णााय स्वामी विवेकानंद का कंप्लीट वक्स और कंप्लीट वक्स में हम लोग देख रहे थे ज्ञान योग के ऊपर में दी हुई सीरीज प्रवचन का नाम है कॉस्मोस मैक्रोकोजम। अभी इस प्रवचन में जैसे हमको पता है कि स्वामी जी का एक विजन था, एक दर्शन था जिसमें कि उन्होंने देखा था कि किस तरह से मनुष्य के अंतर्निहित जीवात्मा और पूरे विश्व ब्रह्मांड का नियंत्रक ब्राह्मण या तो फिर जो ब्रह्म को जिसको कि म एंथ्रोपोमॉर्फिक गॉड नहीं है। एंथ्रोपोमॉर्फिक गॉड अर्थात कि मनुष्य रूपी ईश्वर ब्रह्म तो मनुष्य रूपी नहीं है। ब्रह्मन इज़ अ कासेप्ट। ब्रह्मन इज एन आइडिया। यह विश्व ब्रह्मांड जो है वो ब्रह्म के ऊपर में एक माया का आवरण मात्र है। माया और ब्राह्मण को स्वामी विवेकानंद रेलवे की दो पटरी की तरह कंपेयर करते हैं। कहते हैं कि जिस तरह से वो ट्रेन की दो पटरियां एक ट्रैक्स जिसको इंग्लिश में कहेंगे दोनों साथ-साथ में चलते हैं ना ही कभी मिलते हैं ना ही कभी बिछड़ते हैं। तो इस तरह से यह ब्रह्म और माया दोनों सदा काल से अस्तित्व में है। माया कभी-कभी ब्रह्मण के भीतर में समाहित हो जाएगी शायद जिसको कि हम प्रलय कहेंगे और फिर सृष्टि कहेंगे कि ब्रह्म के भीतर में से फिर से शायद प्रोजेक्शन होगा। वो हमको पता नहीं। स्वामी जी तो कहते हैं पैरेलल ट्रैक की तरह कभी इकट्ठा नहीं होते। किंतु माया का अपने से अस्तित्व नहीं है। ब्राह्मण के ऊपर में भ्रम मात्र है। शंकराचार्य का जिस तरह से उदाहरण है रज्जू और सर्प एक रस्सी पड़ी हुई है रास्ते में। हम लोग अंधेरे में जा रहे हैं। एकाएक रस्सी को देखा हम लोग डर गए। अरे यह सांप हमको रास्ते में मिल गया। किंतु फिर थोड़ा सा प्रकाश उसके ऊपर में बैटरी का डाल के देखेंगे तो वह सर्प नहीं है। वह तो एक रस्सी का छोटा सा टुकड़ा है। तो वैसे ही जिस तरह से हमको रस्सी के ऊपर में सर्प या तो फिर सांप होने का जो भ्रम हुआ और इस भ्रम की वजह से हम डर गए तो वैसे ही यह विश्व ब्रह्मांड ब्राह्मण के ऊपर में एक लेयर मात्र है। एक स्तर मात्र है। उसको की देख के इस लीला को देख के इसको सत्य मान करके हम लोग इतने कभी-कभी डर जाते हैं। कभी-कभी खुशी हो जाते हैं। कभी-कभी रोना शुरू कर देते हैं। कभी-कभी डिप्रेशन में चले जाते हैं। तो यह अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह यह सब हमारे सद्गुण जो है वह माया को असत्य मान करके असत्य तो नहीं असत्य मान करके हम लोग यह सद्गुण को डेवलप करते हैं। वो सब दुर्गुणों को काटने के लिए द्वेष, हिंसा, क्रोध, काम, मद, लोभ, मोह, मत्सर ये जितने दुर्गुण है वो दुर्गुण क्या है? एक्चुअली ये जो रज्जू के ऊपर में सर्प का हमको भ्रम हो गया। रस्सी है तो रस्सी की जगह हमने सांप देख लिया। ये सांप देखने के बाद में जो हमको डर हुआ ये बाकी जितने भी हमारे दुर्गुण है वो इस तरह के हैं कि वो ब्राह्मण को नहीं देख के हम इस माया को देखते हैं। हम लोग देखते हैं कि अरे मेरा बैंक बैलेंस कम हो गया है। अभी मेरा मेडिकल बिल का पेमेंट कौन करेगा? अरे मेरे बच्चों को स्कूल में जाना है तो फिर एग्जामिनेशन की प्रिपरेशन वगैरह कौन करेगा? ये एक के बाद एक हम लोगों के टेंशन, हमारे भय, हमारे दुख और हमारे कष्ट, परिश्रम हमारे भीतर में यह सब नेगेटिव भावनाएं उत्पन्न करते हैं। तो उसको काटने के लिए ब्राह्मण का सही स्वरूप जानने की जरूरत है। तो, यह है वेदांत का फिलॉसोफी। ऑफकोर्स हमने इस बात को पहले भी देखा था कि यह चीज क्या प्रैक्टिकल है। मैं यदि ऐसा कहूंगा कि नहीं मुझे बैंक बैलेंस की भी फिक्र नहीं है, ना ही मुझे मेडिकल इंश्योरेंस की फिक्र है, ना ही मुझे फिक्र है मेरे बच्चों की पढ़ाई की, ना ही मुझे फिक्र है अपनी करियर की या तो फिर अपने फैमिली की। तो इस तरह से मैं बेफिक्र होकर के जी सकता हूं, नहीं जी सकता। ऑफकोर्स यह प्रैक्टिकल नहीं है। किंतु इसीलिए यहां पर हमको देखना है कि जब तक हम इस माया में बंधे हुए हैं तब तक हमको माया के रूल्स को फॉलो करना है। हम लोग रामकृष्ण मिशन में हम लोग साधुओं के ऊपर में इतना डिसिप्लिन है। हमारे बड़े महाराज जिस तरह से कहेंगे ऐसा करना पड़ेगा। हेड क्वार्टर हमको जहां पे पोस्ट करना चाहे हमको जाना पड़ेगा। जो काम जो ड्यूटी हमको देना चाहते हैं वो वो दिया जाता है हमको करना पड़ेगा। लोगों के साथ में किस तरह का व्यवहार करना है। उसके लिखित और अलिखित दोनों तरह के नियम है। समाज की अपेक्षाएं हैं। उस सब के भीतर में हमको यहां पर रहना है। मैं यदि यह सोचना शुरू कर दूं कि नहीं मैं तो ब्राह्मण हूं। माया से परे हूं। मुझे यह सब नियम बंधन कानून मुझे क्या लगेगा? तो कुछ ही देर में यह लोग मुझे ऑर्डर में से निकाल देंगे। यदि मैं इस तरह से बेफिक्र बेपरवाह वर्तन करना शुरू करूंगा तो संसारी लोगों के लिए तो सही इवन साधु लोगों के लिए भी जो लोग सर्वस्व त्याग करके यहां पर आए हैं ये माया के बंधन में जब तक हम है ये नियमों का पालन करना है। किंतु साथ-साथ में ही यह साधना चालू रखनी है। जैसे-जैसे साधना में आगे बढ़ते जाएंगे ब्रह्मन है। सिर्फ यह विश्वास नहीं यह साक्षात्कार जब होगा तब हमारे भीतर में जिस तरह के गुण जिस तरह की आभा ओजस सत्व का प्रकाश जब प्रकटित होगा ध्यान की शांति जब प्रकटित होंगी हमारे लिए नियम बदल जाएंगे और ठाकुर कहते हैं ना जो सत्य वचन का पालन करता है वो जब बात करता है तो उसकी वाणी से पहाड़ टल जाते हैं आसमान झुक जाता है भगवान बुद्ध को देखिए कि एक जब वो ध्यान कर रहे हैं उनकी ध्यान की जो प्रशांति जब चारों ओर फैलती है तो शेर और बकरी दोनों साथ-साथ में बैठकर के उनके शेर और गाय दोनों उनके सामने बैठे हैं। उनकी स्तुति कर रहे हैं। वो अपना एक शिकारी है। एक शिकार है। यह जगत का नियम वे लोग भूल गए हैं। ठाकुर का खुद का कि जिस तरह से कालीवाड़ी में वो व्यवहार कर रहे थे। ये खजंची लोगों ने यह मथुर बाबू को पत्र लिखा कि छो भट्टाचार्य जो महाशय मां को देने वाली जो लूची है वो अपने से खा लिए हैं। तो अभी इस तरह अभी आप सोच के देखिए कि मंदिर में इस तरह के सेवा के नियम कितने कठ मतलब स्ट्रिक्ट होने चाहिए। रामकृष्ण मिशन में जब ठाकुर की सेवा करते हैं पुजारी महाराज या तो फिर पुजारी महाराज के असिस्टेंट महाराज तो धुला हुआ वस्त्र पहन के गर्भगृह में जाएंगे। हाथ पैर को एकदम अच्छे से साबुन से धोकर के अपने सर के ऊपर में मुंह में गंगाजल छिटक करके जाएंगे। पूरा शुद्ध वर्तन ठाकुर के सामने करेंगे। ठाकुर को जब नैवेद्य निवेदन करना होगा तो एक चित्त बैठकर के जप करेंगे। स्थिर होकर के और इमेजिन करेंगे कि ठाकुर आहार ग्रहण कर रहे हैं और मैं उनके सामने हाथ जोड़ के खड़ा हूं। तो इस तरह से ठाकुर की पूजा अपने यहां पर होती है। पूजा के यह सब नियम है। पूजा में यदि आपका दोष हुआ, त्रुटि हुई तो उसका पाप जो है वो बड़ा ही भयानक भुगतना पड़ता है। तो पूजा के इतने सारे नियम और यहां पर ठाकुर को देख के मां को देने वाली लूची अपने से खा जा रहे हैं। या तो फिर वो बिलाड़ी बिल्ली को खिला दे रहे हैं। मां का जो बेड है मां का शयन गृह वहां पर जाकर के मां के साथ में लेट जा रहे हैं वो सो रहे हैं तो माने इस तरह का उनका जो वर्तन है पुष्प जो मां को अर्पण करना था अपने सर पर दे रहे हैं क्या से क्या पागलपन नहीं करते तो खजान जी ने मथुर बाबू को पत्र लिखा कि छोटू भट्टाचार्य महाशय यह सब कर रहे हैं ठाकुर को ये लोग भट्टाचार्य रामकुमार जो उनके बड़े भाई थे और वो उनके छोटे छोटे भाई थे ठाकुर इसलिए उनको छोट भट्टाचार्य कहते थे तो ये ये इस तरह से कर रहे हैं मथुर बाबू खुद आए देखने के लिए और जब देखा तो ठाकुर सही बात है कि जिस तरह से पुजारी को वर्तन करना चाहिए इस तरह से नहीं कर रहे किंतु उनके अलग तरह के वर्तन में भी इतनी प्रचंड निष्ठा इतना हृदय का भाव और उत्साह समाहित है कि मथुर बाबू जाकर के रानी रासण को कहते हैं कि हमको इतना परफेक्ट पूजक मिला है, इतना निष्ठावान पूजक मिला है कि मां अभी जाग्रता देवी जाग्रता होने वाली है। और फिर उन्होंने फिर पत्र में लिखा खजानची को किसी को बिना बताए आए थे। सीधे वहां पर चले गए थे मंदिर में। जब पत्र मिला तब देखूं मैं मैं खुद इन्वेस्टिगेशन करके देखूं कि क्या हो रहा है। कोई कोई बड़े लोग होते हैं तो वो क्या करते हैं? अपने से इन्वेस्टिगेशन नहीं करेंगे। अपने जो चमचे हैं उनकी बात सुन लेंगे। हां ये मेरा प्रिय व्यक्ति है। उसने किसी की कंप्लेंट की है तो सही होगा। कंप्लेंट सुनकर के एक्शन ले लेते हैं। अपनी नजरों से वे लोग जांच पड़ताल नहीं करेंगे। ऐसे बहुत लोग होते हैं जिनके पास में पावर होता है। दूसरों के लिए समय नहीं होता। किंतु मथुर बाबू का ऐसा नहीं था। मथुर बाबू वाज़ वन ऑफ द गुड एडमिनिस्ट्रेटर। आजकल जो एडमिनिस्ट्रेशन और मैनेजमेंट की ये जो सब क्लासेस चलते हैं मथुर बाबू का उदाहरण हम उसमें ले सकते हैं कि किस तरह से अपने कलीग्स या तो अपने साथ में काम करने वाले वर्कर की बात सुनकर के एक्शन लेने की बजाय उन्होंने जाकर के अपने से एग्जामिनेशन किया अपने से सुपरविजन जांच पड़ताल की कि सही-सही ठाकुर क्या कर रहा है तो बात सही है खजानची की कि ठाकुर का वर्तन जो है शास्त्र सम्मत नहीं है। पुजारी के लिए जो विधि निषेध लिखे गए हैं। किंतु साथ-साथ में ही यह भी देखा कि ठाकुर के हृदय की जो निष्ठा है वो शास्त्रों को कहां पीछे छोड़ गई है। तो इसीलिए फिर वो अपने घर वापस गए। घर वापस जाकर के खजान जी को पत्र लिखा कि छोट भट्टाचार्य जो महाशय जिस तरह से पूजा कर रहे हैं उनको करने दीजिए। उसमें किसी भी तरह का व्याघात मत कीजिए। हृदय ने हमको लिखा हृदय का वर्णन जो है लीला प्रसंग में शरद महाराज ने कहा है कि एक बार जिस अभी तो बातें फैलना शुरू हो जाएगी कि ये ठाकुर क्या कर रहे हैं सब पागलपन वहां गर्भ गृह में जाकर के तो हृदय के कान में भी यह बात आई तो वह भी देखने के लिए आया देखा कि ठाकुर नृत्य कर रहे हैं कीर्तन कर रहे हैं गा रहे हैं भजन के बाद भजन आंखों में से अश्रुओं की धारा बह करके उनके सीने को पूरा पूरा भिगो दे रही है। इतना मतलब ठाकुर का वर्तन किस तरह का था। मतलब जो विधि पूर्वक जो पूजा करनी चाहिए उसके ऊपर जैसे कि उनका ध्यान ही नहीं था। किंतु साथ में हृदय यह लिखता है कि उस समय जब मैं जाकर के खड़ा रहा ठाकुर का यह वर्तन देख रहा हूं। किंतु उस समय मेरा साहस नहीं हुआ कि मैं ठाकुर को चेतावनी दूं कि ठाकुर को कुछ कहूं कि अरे मामा वो तो भांजा था ठाकुर का। तो वो ऐसा बिल्कुल नहीं कह पाएगा कि मामा आप ये क्या कर रहे हैं? ये खजानची ये लोग जो मथुर बाबू ये बड़े लोग हैं जिनकी जिनकी कृपा से आपको ये नौकरी मिली है। नौकरी चली जाएगी। कामार पुकुर में तो खाने को कुछ नहीं था इसलिए हम लोग यहां पे आए। कोलकाता में कुछ पैसा कुछ बटोरे वहां पे परिवार है। उनका भरण पोषण करना है। इसलिए तो हम यहां पे आए हैं। तो यदि मथुर बाबू हमारी नौकरी ले लेंगे तो क्या होगा? हृदय की नौकरी तो सही में चली गई थी। हृदय ऐसे नौटंकी करने को गया था। उसने देखा कि ठाकुर इस तरह का वर्तन कर रहे तो मैं भी करूं तो जैसे ही वो द्वारिका बाबू की पुत्री की वो कुमारी पूजा की तो वैसे ही उन्होंने उसको भगा दिया। ये थोड़ी ना ठाकुर है। किंतु जब ठाकुर इस तरह का वर्तन कर रहे हैं तो हृदय कहता है कि मेरे मुंह से कुछ भी बोलने का साहस नहीं हुआ। मैं यदि बोलने को जाता तो ऐसा एक भय का वातावरण भय मेरे मन में प्रविष्ट हो गया। जैसे कि मां स्वयं वहां पर खड़ी हुई बोल रही है कि इनको डिस्टर्ब मत करो। तो देखिए कि जब तक हम संसार में रहते हैं संसार के नियमों का पालन करना है। किंतु जैसे-जैसे हम साधना तपस्या करते-करते अपना मन सूक्ष्म से सूक्ष्म तर में जाता है। तमस और रजस को पार करके सत्व के राज्य में प्रवेश करता है। तब संसार के नियम भी हमारे लिए बदल जाते हैं। यह सेंट टेरेसा ऑफ एिला का सुंदर उदाहरण है। ऐसे ही इस तरह का कि वहां पे तो अभी ये लोग विदेशी लोग क्या हम हिंदुओं को जंगली बारबेरियन ऐसा करके जो पुकारते हैं तो हम लोग भी बिना सब जांच पड़ताल किए ये सब सुन लेते हैं हां कि उन लोगों के पास में पैसा है माने वो बड़े ही सभ्य है हम लोग गरीब है माने हम लोग बार्बेरियन है किंतु एक्चुअली देखा जाए तो ये जो इंक्विजिशन बोल कर के देयर इज अ ब्लैक चैप्टर देयर इज अ डार्क चैप्टर इन द हिस्ट्री ऑफ कैथोलिक चर्च चर्च वहां पे जो कैथोलिक पॉप्स है और उसके चमचे लोग जो है उन्होंने ठीक किया कि चर्च की ऑथॉरिटी पे जो लोग खतरा है उन लोगों को शैतान घोषित करके या तो शैतान के अनुयाई घोषित करके उनको जिंदा जला दिया जाए और ऐसे लोगों के ऊपर मुकदमा चलाने के लिए इंक्विजिशन कोर्ट्स की स्थापना की थी। खास करके स्पेन पोर्तगल में ये सब बहुत चला था। तो उस समय बहुत सारे अच्छे-अच्छे साधु संत जो थे वे लोग उनको पता था कि चर्च में करप्शन है तो वे लोग आध्यात्मिकता के पथ से दूर चले गए हैं। बड़ी-बड़ी सेरेमोनीस करते हैं। राजाओं को इकट्ठा करते हैं। राजाओं के जो पाप है तो वो धो क्या पासपोर्ट टू हेवन माने स्वर्ग में जाने का पासपोर्ट देता है। यदि राजा कोई खराब काम करेगा, पाप कार्य करेगा तो वह पोप को ना कि वेटिकन को करोड़ों रुपयों का डोनेशन दे देगा। सामने उसको एक पासपोर्ट टू हेवन दे देंगे कि जाओ तुम स्वर्ग में जा सकते हो। तुम्हारे पाप तुमको रोकने वाले नहीं है। तो इस तरह का भयानक करप्शन चर्च में था तो बहुत सारे साधु संत सोचते थे कि हम लोग अपने एक अलग से आध्यात्मिक पंथ का प्रवर्तन करें। तो ऐसे लोगों को पकड़ पकड़ कर के ये लोग जिंदा जला देते थे। तो इस तरह से सेंट टेरेसा ऑफ एविला थी। उनको इस तरह की एक इंक्विजिशन कोर्ट में लाया गया। सेंट टेरेसा का लाइफ मैंने पढ़ा है। बहुत ही खूबसूरत बहुत ही पवित्र उनका जीवन था। और उनको जब कोर्ट में लाया गया और जज वहां पर बैठा है और वो सेंट टेरेसा को एक्यूज करने वाले उनके ऊपर में दोषारोपण करने वाले सामने में सब बेंच पर बैठे हुए हैं और सब लोग बड़े मजे ले रहे हैं कि हां जज तो हमारा ही चमचा है। वो तो क्या करेगा? सेंट टेरेसा को जला देने का एज ए विच वो जला देने का वो अवश्य इस तरह का एक चुकादा देगा। एक जजमेंट इस तरह का देगा। तो सब लोग बड़े मजे से खड़े हुए हैं। तो सेंट टेरेसा बेचारी वो तो एकदम धार्मिक आध्यात्मिक वो थी। वो उसका तो कोई डिफेंस भी नहीं था। क्या डिफेंस करेंगे शैतान लोगों के सामने क्या डिफेंस करना? वो तो चुपचाप वहां पर कठहरे में खड़ी हुई थी। अभी वो जज जो है वो जजमेंट प्रोनाउंस करने को जा रहा है, चुकादा देने को जा रहा है। सडनली उसने क्या देखा कि सेंट टेरेसा के ऊपर में जीसस स्वयं खड़े हुए हैं और जीसस ने एक उंगली जज के सामने ही रख के खड़े हुए। कह रहे हैं जैसे कि और चेहरे पर ऐसा क्रोध है जैसे कि लग रहा है कि सेंट टेरेसा को यदि वो दोषित घोषित करेंगे तो जज को जिंदा जला देंगे। यह दर्शन देखकर के जज बेचारा पूरा हिल गया। वो सोचता है कि अरे ये तो बड़ा ही मैं विपद में पड़ गया। यदि अभी सेंट टेरेसा को तो शैतान का अनुयाई घोषित कर दिया था। अभी मैं यदि ये ऐसा डिक्लेअर करूं कि मुझे जीसस दिखाई दे रहा है सेंट टेरेसा के ऊपर में तो ये लोग जो सब शैतान लोग जो है वो जिन लोगों ने सेंट टेरेसा को उसके ऊपर में इस तरह का मिथ्या आरोप डाला था। वे लोग मुझे ही शैतान का अनुयाई घोषित करके मुझे भी साथ में चला देंगे। तो मैं क्या करूं? ऐसा सोचते-सचते अभी उसको तो अपने को बचाना है और सेंट टेरेसा को कुछ कर नहीं पाएगा। जीसस का क्रोध एकदम चेहरे पे क्रोध ऐसे वो खड़े हैं। तो उसने क्या किया? जिन लोगों ने सेंट टेरेसा के ऊपर में इस तरह के मिथ्या आरोप लगाए थे उन्हीं की ओर उंगली करके बोल दिया कि यही लोग दोषी है। इन्हीं लोगों को जला दो। तो देखिए कि यह जगत संसार के नियम में रहना है। जब तक हमको लगता है कि हम उससे बंधे हुए हैं। मेरा बैंक बैलेंस, मेरा करियर, मेरा फैमिली, मेरे बच्चों की फिक्र, मेरा मेडिकल इंश्योरेंस यह सब चीजें मेरा मेरा जगत में रहना, यह रामकृष्ण मिशन में जब मैं रहता हूं तो जितने भी नियम का फॉलो करना है, जब तक हम इस सामान्य स्तर पर हैं, तब तक हम लोग यह सब करते हैं। जैसे ही साधना करते-करते हमारे भीतर में यह ओजस शक्ति का, आध्यात्मिक शक्ति का प्रवेश होता है, प्रागट्य होता है। हमारी कुंडलिनी एक के बाद एक चक्रों को भेद करके हृदय में कंठस्थ प्रदेश में या तो कपाल के ऊपर में ये एक के बाद एक उसका जो उर्ध्वगमन जो होता है तब यह नियम अपने आप हमारे सामने से चले जाते हैं। इसीलिए स्वामी जी जब यहां पर वेदांत फिलॉसोफी समझाते हैं। हमको लगेगा कि यह वेदांत कितना प्रैक्टिकल है। जगत को मिथ्या कह देना यह कह देना कि ब्राह्मण ही सत्य है। क्या हम लोग इस तरह से रह पाएंगे? क्या हम लोग इस तरह से जी पाएंगे? ऑफ कोर्स नहीं जी पाएंगे। ऑफ कोर्स नहीं रह पाएंगे। मैं जगत मिथ्या है बोलकर के किसी ने मेरे पर आघात किया, प्रहार किया और मैं उसके सामने प्रहार ना करूं। प्रति प्रहार अपने को डिफेंड ना करूं तो फिर तुम किस तरह का मैं व्यक्ति हूं? और चलो साधुओं के लिए तो सेल्फ डिफेंस का प्रयोजन नहीं है। सांसारिक गृहस्थ लोगों के ऊपर में कोई प्रहार करता है। और वो यदि अपने को डिफेंड नहीं करता है तो गृहस्थ किस काम का? जब गांधी जी गांधी जी अहिंसा अहिंसा इतना करते थे। पार्टीशन के बाद में वो पाकिस्तान से कुछ हिंदुओं का ग्रुप आया। गांधी जी को मिलने के लिए बोला कि हम लोगों ने तो अहिंसा का पालन किया। इसलिए जब वे लोग हमारे बीवी बच्चों को उठा के ले जा रहे हमने कुछ नहीं बोला। तो गांधी जी ने कहा कि अरे मूर्खों ये अहिंसा नहीं ये तो कायरता है। संसार में रहते हो शक्ति का प्रदर्शन तो करना ही होगा। स्वामी जी को खुद को देखिए कितनी बार उन्होंने शक्ति का प्रदर्शन किया है। अमेरिका गए हैं। ये क्रिश्चियन मिशनरी एक के बाद एक उनके ऊपर आक्रमण किए जा रहे हैं। और स्वामी जी ज्यों का जवा उत्तर त्यों माने माने टिट फॉर टेट जो जिस तरह से उनके ऊपर आक्रमण करेगा उसी ही भाषा में सभ्य सभ्य तरीके से उसी की तरह वो उसका उत्तर देते थे। स्वामी जी ने कभी भी अपने को एक डिफेंसलेस या तो फिर वलनेरेबल परिस्थिति में नहीं आने दिया। क्योंकि स्वामी जी सिर्फ अपने को नहीं डिफेंड कर रहे थे। स्वामी जी सनातन हिंदू धर्म का डिफेंस कर रहे थे। व्यक्तिगत आघात हो जाए। मेरे चरित्र के ऊपर में चलेगा। किंतु हिंदू धर्म के ऊपर में सनातन वैदिक संस्कृति के ऊपर में आघात होगा और हम लोग बैठकर के चुपचाप सहन कर ले। ऐसे तो कतई नहीं होने वाला है। जो ऐसा करता है वह कायर है और उसको सनातन संस्कृति को रिप्रेजेंट करने का अधिकार नहीं है। तो ये सब हमारे आइडियाज क्लियर है। जब तक हम माया में बंधे हुए हैं तब तक माया के रूल्स को फॉलो करना है। किंतु साथ-साथ में ही यह याद रखना है कि माया के जगत के ऊपर में एक मायातीत जगत है। और इस मायादित जगत के नियम माया के जगत से संपूर्ण रूप से भिन्न है। और कब हमको यह अधिकार मिलता है कि माया के नियम को छोड़कर के मायातीत राज्य के नियम को पालन करने का अधिकारित्व अधिकार हमको कब मिलता है? जबकि हमारी साधना हमको उस आयाम पे ले जाए। उस हायर डायमेंशन में हमको ले जाए। तब वो नियम हमको एक के बाद एक अप्लाई होते हैं। तब हमारा चाल चलन पूरा बदल जाता है। ठाकुर कहते हैं ना कि परमहंस कैसा होता है? जैसे कि जड़वत होता है, पिशाचवत होता है, बालकवत होता है। तो ये जड़, पिशाच या बालक इन तीनों का वर्तन जो है एक जनरल सामान्य व्यक्ति से पूरा डिफरेंट होता है। मुझे यह छोटे बच्चों के वीडियो देखना मुझे बड़ा पसंद है। वो माने क्या-क्या वो तूफान करते रहते हैं। अपनी मां को परेशान करते रहते हैं। वो क्या कुछ अपने खिलौनों को उठा के फेंकेंगे? क्या सब करेंगे? वो म उनको देखकर के हमको उनके ऊपर में कितना स्नेह और प्रेम हमारे हृदय में उमड़ता है। तो देखिए कि वो इस तरह से कर सकता है क्योंकि उसके उसको यह माता और पिता का प्रेम प्राप्त है। यदि आज मैं यहां मंदिर में जाकर के कोई चीजों को तोड़ना और फेंकना शुरू करूंगा यहां आश्रम में तो ये लोग मुझे इमीडिएटली भगा देंगे। किंतु यही तरह की इसी तरह की शैतानियत बच्चा यदि अपने घर में करता है तो मां-बाप और देखकर के वो खुश होंगे कि देखो मेरा जो छोटा बच्चा है वो कितना एक्टिव है वो कितना माने वो उसके भीतर में ये मतलब उत्साह और उमंग कितना है ये देखकर के माताजी और पिताजी खुश होंगे तो ये मायातीत जगत के नियम माया के जगत से भिन्न है कभी भी इस तरह के मूर्खामी नहीं करनी वेदांत को पढ़ के कि हां ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या तो जगत मिथ्या जगत में रह के मैं किसी भी तरह का ऐसा कोई कार्य करूं जो कि इललीगल है जो कि इमोरल है जो कि अनएथिकल है। इस तरह से कभी नहीं करना है। तो इसीलिए स्वामी जी वेदांत समझाते हैं तो उसके लिए यह पूर्व भूमिका अन्य सब प्रवचनों में उन्होंने बखूबी कह दी है। इसीलिए स्वामी जी ने सिर्फ ज्ञान योग हमको नहीं सिखाया। हमको कर्म योग और भक्ति योग भी साथ में सिखाए हैं। राजयोग और ज्ञान योग देखिए कि मायातीत जगत में ले जाने वाले या तो मायातीत जगत को डिस्क्राइब करने के पावरफुल तरीके हैं। किंतु इस जगत में रह के माया के जगत में रह के हमको क्या करना है? किस तरह से रहना है? तो वो है भक्ति योग और कर्म योग। ईश्वर के ऊपर में हमारी संपूर्ण निष्ठा होनी चाहिए और साथ में ही हमारे हृदय में अपने साथियों के प्रति करुणा और अनुकंपा होनी चाहिए जिससे कि हम लोग सेल्फिश या तो फिर क्रूरल ना हो जाए। कठोर या तो फिर क्रूर ना हो जाए। सबके प्रति सहानुभूति, मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा की भावना रखनी है। उपेक्षा की भावना जो कि हमारे शत्रु है, मुदिता की भावना जो कि हमसे आगे बढ़ जा रहे हैं तो उसके ऊपर में जेलसी ही नहीं होना चाहिए। उनके ऊपर में रिस्पेक्ट होना चाहिए। जो अपने से छोटे हैं उनके ऊपर में करुणा और जो हमारे साथी हैं उनके प्रति मैत्री का भाव। तो यह पूरा जो ग्राउंड वर्क है स्वामी जी ने कर्म योग भक्ति योग में डाल के रखा है। फिर जो कि हायर डायमेंशनल हायर कॉन्शियस लेवल पर जाने के जो योग है राजयोग और ज्ञान योग उसके बारे में वो साथ-साथ में बता रहे हैं। तो यह पूर्व भूमिका और साथ में देखिए कि अभी स्वामी जी यह बताने का प्रयत्न करते हैं कि विश्व का स्वरूप क्या है? पहले तो हमको यह बताया कि जब हम एक भव्य प्रकृति को देखते हैं तो हमारे मन में हायर प्रकार के विचार शुरू होते हैं। दिन प्रतिदिन का ये जो हमारा जीवन है उससे ऊपर उठकर के हम लोग सोचना शुरू करते हैं कि अरे सृष्टि इतना भव्य सुंदर सृष्टि का रचना किसने की? ये सौंदर्य कहां से आया? यह सोचना हम शुरू करते हैं। वहां से हायर थिंकिंग शुरू होता है और हायर थिंकिंग के उत्तर के रूप में स्वामी जी सृष्टि की सही स्वरूप का सृष्टि के सही स्वरूप का वर्णन करते हैं। तो वो वर्णन करने से पहले स्वामी जी उपमा के बाद उपमा देते जा रहे हैं। एग्जांपल के बाद में एग्जांपल देते जा रहा है कि हां ये पहला एग्जांपल कि बीच में से बड़ा वटवृक्ष हुआ बड़ा वृक्ष हुआ और ये वृक्ष फिर से बीच में समा गया बड़े-बड़े पहाड़ बड़ी-बड़ी चट्टाने पानी ने उसको तोड़-तोड़ कर के बालू में परिणत कर दिया। यही बालू, यही रेत, यही मिट्टी, धूल इस समुंदर की सतह में जाकर के जमा हुई। स्तर के बाद स्तर लेयर के बाद लेयर बना करके फिर से चट्टानों में परिणत हो जा रही है। किस तरह से अंडे में से पंखी निकलता है। पंखी अंडे को जन्म देता है और फिर इस तरह से अंडे में से फिर से पंखी निकलता है। तो जन्म मृत्यु जरा व्याधि का यह चक्र चलता रहता है। सभी इस जगत में हम जो कुछ भी देख रहे हैं सब कुछ किसी सूक्ष्म स्तर सतह से किसी सूक्ष्म स्वरूप में से बीज रूप में से प्रकट हुआ है। विकसित होता है। उसका एक परिणति होता है। विराट स्वरूप में और फिर वही जाकर के क्रमशः उसी बीज में उसी सूक्ष्म स्वरूप में समाहित हो जाता है। स्वामी जी ने शब्द यूज किया है ससाइड समाहित नहीं कि डिस्ट्रक्शन नहीं कि डेथ। तो ये बैकग्राउंड हमने देखा। आज भी हम देखते हैं कि स्वामी जी और भी एक के बाद एक उपमाएं अभी तो देते ही जा रहे हैं। उनकी उपमाओं का अभी समापन नहीं हुआ है। स्वामी जी कहते हैं इफ इट इज इफ इट बी ट्रू दैट नेचर इज यूनिफॉर्म थ्रू आउट इफ इट बी ट्रू यदि यह सही है कि प्रकृति पूरे जहां पे भी प्रकृति है जहां पे भी सुदूरव्यापी प्रकृति उसका स्वरूप एक ही तरह का है। नेचर इज यूनिफॉर्म थ्रू आउट। इसका जो स्वरूप है एक ही तरह का है। यूनिफॉर्म यानी कि एक ही तरह का जहां पे भी है एक ही नियम एक ही साइंस उसके ऊपर में अप्लाई होता है। ग्रेविटी जिस तरह से पृथ्वी पे अप्लाई होती है उसी तरह से चांद पे अप्लाई होती है। इसी तरह मंगल ग्रह पे होती है अप्लाई और इसी तरह से सूर्य के ऊपर में होती है। हां, मास के अनुसार ग्रेविटी बढ़ती कमती रहती है। पृथ्वी का जो मास है या तो फिर पदार्थ जत्थ जो है उससे चंद्र का मास थोड़ा कम है तो पृथ्वी पे ज़्यादा ग्रेविटी होगी। चांद के ऊपर में कम ग्रेविटी होगी। तो जुपिटर के ऊपर में जुपिटर का मास पृथ्वी से कई गुना ज्यादा है। तो जुपिटर के ऊपर में ग्रेविटी अनेक गुना होगी। आज हम पृथ्वी पर शांति से खड़े रह रहे हैं। चांद पर जाएंगे तो हम सीधे हो सकता है कि हवा में उठना शुरू कर दें। एक जंप लगाने से और जुपिटर या तो बृहस्पति ग्रह के ऊपर में जाएंगे तो हम जैसे वहां पर जाकर खड़े रहेंगे सीधे वह हम चौ हो जाएंगे मतलब क्रश हो जाएंगे क्योंकि जुपिटर की ग्रेविटी प्रचंड ग्रेविटी है। किंतु ग्रेविटी के नियम जो है वो पूरी सोलर सिस्टम में पूरे मिल्की वे गैलेक्सी में पूरे कॉस्मोस में एक ही तरह अप्लाई होते हैं। देयर इज अ यूनिफिटी ऑफ लॉस इन दिस यूनिवर्स इन दिस कॉस्मोस। तो इसलिए स्वामी जी कहते हैं इफ इट बी ट्रू दैट नेचर इज यूनिफॉर्म थ्रू आउट यदि ये सही है कि प्रकृति सर्व जहांजहां पर प्रकृति है उसका एक ही स्वरूप है। उसका स्वरूप एक समान है। इफ इट बी ट्रू यदि यह सही है। एंड सो फार नो ह्यूमन एक्सपीरियंस हैज़ कंट्राडिक्टेड इट। और अभी तक तो हमारा ऐसा कोई एक्सपीरियंस नहीं है कि जो हमको कहे कि प्रकृति के नियम समान नहीं है। प्रकृति के नियम पर वो अलग-अलग तरीके से अप्लाई होते हैं डिपेंडिंग अपॉन द पैराटर्स एंड फैक्टर्स। किंतु अप्लाई अवश्य होंगे। तो प्रकृति के नियम यदि सब जगह पर एक तरह के हैं और मनुष्य का अभी तक का तो ऐसा कोई अनुभव नहीं है कि कहीं पर ग्रेविटी या तो फिर ये इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म ना कि ये स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स ना कि वीक न्यूक्लियर फोर्स ये अलग तरह से काम कर रहा है। ऐसा तो हमारा अनुभव अभी तक नहीं है। दैट द सेम मेथड अंडर विच अ स्मॉल ग्रेन ऑफ सैंड इज क्रिएटेड वर्क्स इन क्रिएटिंग द जाइगेंटिक सनंस एंड स्टार्स एंड ऑल दिस यूनिवर्स। एक मिट्टी का छोटा सा दाना, एक रेत का छोटा सा कण। इसको सृष्टि करने के लिए जो नियम लगे हैं, उसी नियम के अनुसार इन प्रचंड ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, ताराओं की रचना हुई है। इस पूरे विश्व ब्रह्मांड की रचना उसी नियम से यदि हुई है। इफ इट बी ट्रू दैट द होल ऑफ दिस यूनिवर्स इज बिल्ट ऑन एग्जजेक्टली द सेम प्लान इज द एटम। यदि यह सही है कि यह पूरा विश्व ब्रह्मांड उसी एक नक्शे के ऊपर में बना है कि जिस नक्शे के ऊपर में एक छोटे से छोटा अणु एटम बना है। इफ इट बी ट्रू दैट द सेम लॉ प्रिवेल्स थ्रूउ द यूनिवर्स। यदि यह सही है कि एक ही साइंस पूरे विश्व ब्रह्मांड में काम करता है। देन एज इट हैज़ बीन सेड इन द वेदास। यदि यह सब कुछ सही है तो जिस तरह से वेद में कहा गया है नोइंग वन लंप ऑफ क्ले वी नो द नेचर ऑफ ऑल द क्ले दैट इज इन द यूनिवर्स मिट्टी के एक दाने को समझने से पूरे विश्व ब्रह्मांड में जितने भी मिट्टी के दाने हैं जितने भी मिट्टी है उसको हम समझ सकते हैं। देखिए व्हाट इफ इफ इफ करके स्वामी जी ने इस सेंटेंस की रचना की है और तर्कशास्त्र की दृष्टि से कहो ना कि ग्रामर या तो इंग्लिश इंग्लिश लैंग्वेज की दृष्टि से कहो यह सेंटेंस कॉम्प्लिकेटेड भी है और साथ-साथ में ही बड़ा ही इफेक्टिव है। कहते हैं कि यदि हमको लगता है यदि हमारा हम मानते हैं कि ये पूरा विश्व ब्रह्मांड सब जगह पर यूनिफॉर्म है। यदि हम ये मानते हैं कि साइंस के नियम सब जगह पर एक ही तरह से अप्लाई होते हैं। यदि हम मानते हैं कि जिस नियम के अनुसार एक एटम की रचना हुई है, रेती के एक दाने की रचना हुई है, उसी के उसी नियम के अनुसार विश्व ब्रह्मांड की रचना हुई है। तो इफ दिस दिस दिस देन दिस देन क्या? तो क्या कि जिस तरह से वेद में कहा गया है मिट्टी का एक छोटा सा कण को समझ करके पूरे विश्व ब्रह्मांड में जितनी मिट्टी है उन सबको हम समझ सकते हैं। इफ दिस देन दैट इस तरह से स्वामी जी ने इस सेंटेंस की रचना की है। तर्कशास्त्र की दृष्टि से लॉजिक न्याय शास्त्र की दृष्टि से बहुत ही खूबसूरत सेंटेंस और इस तरह के सेंटेंस के ऊपर में हम पूरे-पूरे क्लास ले सकते हैं। उतना खूबसूरत रूप से उन्होंने इसकी इसका कंपोजशन किया है। अभी ये देखिए कि यदि इस तरह का सेंटेंस हम लिखने को भी जाएंगे ना तो हमको बड़ा मतलब एक घंटा दो घंटा सोचने में लगेगा। स्वामी जी इस तरह के सेंटेंस खड़े-खड़े चलाते थे। माने वहां पर खड़े हैं और जैसे कि एक एक सर्वोच्च कक्षा का एक मान लीजिए कि कवि है। चैतन्य देव की एक बात है। एक विश्व माने उस समय तो क्या था कि लोग आर्गुममेंट करने के लिए तर्क करते-करते घूमते थे। सब जगह पे बड़े-बड़े शहरों में जाते थे और बड़े-बड़े विद्वानों के साथ में जाकर के तर्क करते कहते थे कि मैं आपके साथ तर्क करूंगा और तर्क करते-करते यदि मैं जीत जाऊंगा तो आपको मुझे लिख देना है कि मैं आप मैंने आपको हरा दिया है। फिर ऐसा करके इस तरह के मानपत्र लेकर के वे लोग अपने को बड़ा चक्रवर्ती घोषित करते थे और साथ-साथ में बड़ा एक सैन्य भी रखते थे। लोग वहां पे शंख नगारा वो बजा बजा करके उनके साथ में घूमेंगे। वो जाकर के अनाउंस करेंगे। अरे ये तर्क शिरोमणि आ गए हैं। अभी वो यहां पर तर्क करेंगे। तो ऐसा चैतन्य देव उस समय तो घर में थे वो विश्वंभर वो वहां पे पंडित विश्वंभर उनका तो टोल था विद्यार्थियों को पढ़ाते थे नदी के गंगा नदी के किनारे बैठे थे और ये चक्रवर्ती महाशय आ गए आकर के बोला कि मैं आपके साथ में तर्क करूंगा तो अभी विश्वंभर अपने माने आध्यात्मिक चेतना तो थी ही थी किंतु पंडितों के पंडित थे महापंडित प्रचंड उनकी मेधा शक्ति थी तो वो मन में मन में हंस करके बोले अच्छा ठीक है बड़ा विनय प्रगटित करके कि मैंने तो आपकी बड़ी बड़ी प्रशंसा सुनी है। मैं तो बड़ा उत्सुक हूं आपके पास में कुछ सीखने के लिए। आइए आप गंगा माता के ऊपर में कुछ श्लोकों की रचना कीजिए। उनका महात्म मुझे बताइए। पंडित बड़ा एकदम गर्व में आकर के शत श्लोकी 100 श्लोक मुंह पे ही फटाफट फटाफट करके बोल रहा है। और जिन लोगों ने वहां पर उपस्थित थे वे लोग तो आश्चर्यचकित हो गए। जैसे कि यह माने एक बिजली का तूफान जब गिरता है एक बड़ा सी बड़ी सी नदी में जब पूर आता है फ्लड आता है तो कितने प्रचंड गर्जन तर्जन के साथ में ये पूर बहता है। इस तरह से इस पंडित ने एक के बाद एक एकदम कठिन जटिल श्लोकों की रचना मां गंगा की स्तुति के करने के लिए करनी शुरू कर दी। 100 श्लोक यह देख करके लोग ऐसे डर गए इतने प्रभावित हो गए कि अरे बाप रे किस तरह का पांडित्य किस तरह की उनकी मेधाशक्ति किस तरह की उनकी विध्वत्तता कि विश्वंभर पंडित ने कहा कि गंगा की स्तुति के लिए श्लोक की रचना करो और ऐसे जटिल के बाद जटिल 100 श्लोकों की रचना कर दी। बाप रे बाप ये विश्वंभर पंडित इनके सामने कैसे जीतेंगे? तो ये उन्होंने चुपचाप पंडित अपने चैतन्य महाप्रभु ने सुन लिया। फिर आखिर में क्या कहा कि आपका ये जो पर्टिकुलर श्लोक था उसमें आपने ये ये ग्रामेटिकल मिस्टेक की है। ये सुनकर के वो चक्रवर्ती पंडित तो ऐसा भय प्राप्त हो गया। अरे किसी का साहस नहीं है। किसी में क्षमता नहीं है कि मैंने यह जटिल श्लोकों की रचना की है। उसको समझने का उसको म कॉम्प्रहेंड करने का। और ये पंडित जो है उसने नहीं मात्र कि 100 श्लोक मुख माने उसको जैसे-जैसे मैं बोलता गया वैसे-वैसे उसकी फोटोग्राफिक मेमोरी में फिट हो गए। उसको समझ भी लिया और उसमें से फिर ग्रामर की मिस्टेक निकालना शुरू कर दिया। और पहले तो इस तरह से उसको बड़ा ही आघात हुआ। उसके बाद में उसने ग्रामर को लेकर के आर्गुममेंट करना शुरू किया कि अरे तुम्हारा क्या साहस मेरे श्लोक में तुम ग्रामर की मिस्टेक निकालोगे। किंतु जितना जितना आर्गुमेंट करता गया उतना ही उसको समझ में आता गया कि नहीं सही-सही में उसकी ग्रामेटिकल मिस्टेक है। तब कहीं जाकर के वो ऐसा डर का मारा बैठ गया और ये विशंभर कहते हैं कि जाओ अभी अपने घर जाओ। अभी किसी पंडित का इस तरह से अपमान नहीं करना चाहिए। है तो सनातन हिंदू धर्म का ही प्रतिनिधि हिंदू धर्म का ही वो बात कर रहा है। उसने यदि हार मान ली तो जो तो कहते हैं ना कि रब हिज नोज माने और ज्यादा फिर वो जले के ऊपर में नमक डालना इस तरह का नहीं करना है। बड़ा ही सम्मान के साथ कहा पंडित जी अभी आप घर जाइए कल हम फिर से बात करेंगे। किंतु और ऐसा बोल के वो चैतन्य महाप्रभु अपने शिष्यों को लेकर के चले गए कि ये पंडित बेचारा इतना शोक में डूब गया था। इतना उसको आघात लगा था। आखिर रात गंगा के किनारे बैठा रहा। घर जाने की बात ही नहीं और दूसरे दिन सुबह को वो किसी को बिना बताए वहां से भाग गया। तो इस तरह की मेधा शक्ति इस तरह के लोगों में होती है। अभी स्वामी जी का भी इस तरह का मेधा है। इस तरह की सूक्ष्म बुद्धि है कि वो जब बोलेंगे तो श्लोकों की तरह बड़े-बड़े लंबे-लंबे सेंटेंस की रचना करते ही रहेंगे। और हमारे जैसे लोग वो सालों साल बैठकर के अपने सर पर हाथ रख के सोचते रहेंगे। अरे स्वामी जी क्या कह रहे हैं? उसका माने एक ही सेंटेंस समझने के लिए हो सकता है हमको दिनों महीनों चले जाए। स्वामी जी की पूरी मेधा शक्ति किस हद तक जाती है वो समझने को हमको कितने जन्म लगेंगे वो तो फिर अभी स्वामी जी ही बता पाएंगे। तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्ण