Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Bhagavad Gita ·

Ch. 2 || Sankhya Yoga || Bhagavad Gita || 24 may 2025

Transcript

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्रीमद् भगवत गीता का प्रथम अध्याय उसका एक सारांश हमने पिछले क्लास में देखा था। अभी इस क्लास में हम द्वितीय अध्याय का प्रारंभ करते हैं। द्वितीय अध्याय के प्रथम तीन श्लोक है। वह स्वामी जी ने भारत में आकर के हमारे देश को जो संदेश दिया उसके साथ में एग्जजेक्टली मैच हो जाते हैं। इसलिए सबसे पहले तो इन तीन श्लोकों का पाठ कर लेंगे और फिर देखेंगे कि स्वामी विवेकानंद की दृष्टि से हम इन तीन श्लोकों का अर्थ घटन किस तरह से कर सकते हैं। और दूसरी बात है कि गीता का जो पटभूमिका है, गीता का जो कॉन्टेक्स्ट है श्रीमद्भगवत गीता का वो हमको सबको पता है कि किस तरह से कौरवों और पांडवों में एक महायुद्ध होने वाला था। उसके प्रारंभ में पांडवों का जो सर्वश्रेष्ठ सेनापति वह है अर्जुन और उनके जो रथ के सारथी है वह है श्री कृष्ण। तो इन दोनों के बीच में यह संवाद होता है। युद्ध में अनंत वीर्य अनंत पराक्रम प्रकट करने की बात थी। किंतु इसकी वजह अर्जुन के हृदय में एक बहुत बड़ा संदेह एक बहुत बड़ा संशय प्रकट हुआ। यहां तक कि भगवान कृष्ण अर्जुन को कायर तक कह देते हैं। इतना मला वीर्यशाली जो योद्धा था पांडवों की सेना का उसको भी भगवान कृष्ण को जैसे कि दौर्बल्य हृदय या तो फिर यह कायर इस तरह से कहना पड़ा। तो क्यों ऐसा हुआ? इसका भी हमको थोड़ा बहुत पता है कि किस तरह से अपनी नजर के सामने अपने सगे संबंधी है। उनको देखकर के अर्जुन को लगा कि यदि मैं इनका वध करूंगा तो फिर मैं हमको यदि अह युद्ध में जीत भी प्राप्त होती है तो वो जीत किस काम की होगी। अपने जनरली देखिए कि मनुष्य जीवन है तो एक अच्छा मनुष्य जीवन इस इस बात को माने हमारा डेफिनेशन क्या रहेगा? देखिए जो लोग बहुत ज्यादा एंबिशियस होते हैं, बहुत ज्यादा राजसिक या तामसिक होते हैं, उन लोगों की एक गुड लाइफ जिसको आजकल कहते हैं, उनकी डेफिनेशन क्या होती है? तो बहुत सारे भोग भोगने को मिले। बहुत सारा पावर मिले, पोजीशन मिले, नेम एंड फेम मिले, इंद्रिय सुख मिले। यह इन लोगों का डेफिनेशन होता है। डेफिनेशन ऑफ ए गुड लाइफ। तो यह कौरवों का इस तरह का डेफिनेशन था कि पांडवों के पास में से उनके हक का जो राज्य है, वह छीन लिया था। द्रौपदी पे अत्याचार करने तक का उनका साहस आ पड़ा था। तो वह इंद्रिय सुख और यह जो नेम फेम और पावर पोजीशन यह सब उनके लिए एक गुड लाइफ था जिसके लिए यह लोग युद्ध करते थे। किंतु पांडवों की तो सात्विक प्रकृति थी। वे लोग तो कोई पावर पोजीशन लोगों पर राज करना है। लोगों की धन संपत्ति का शोषण करके हमको अपना ये खजाना बढ़ाना है। बढ़े हुए खजाने से और जितने भी दुनिया भर के भोग हैं वह हमको भुगत लेने हैं। यह मेंटालिटी से तो पांडव लोग युद्ध नहीं करते थे। एक सात्विक यदि योद्धा होता है या एक सात्विक व्यक्ति होता है। उसके लिए व्हाट इज द डेफिनेशन ऑफ ए गुड लाइफ? तो देखिए कि सुबह शाम दिन में जितनी बार हो सके ईश्वर का नाम स्मरण मनन चिंतन हो पाए। इसके अलावा जो हमारा धर्म है क्षत्रिय है तो क्षत्रिय धर्म लोगों पर अच्छे से ईमानदारी पूर्वक और न्याय पूर्वक शासन करना है। यदि ब्राह्मण है तो ब्राह्मण धर्म यजन याजन अध्यापन जिस तरह से शरद महाराज लीला प्रसंग में कहते हैं कि यह यज्ञ वगैरह विधि करवानी है। यजमान के लिए भिक्षा ग्रहण करके जीवन बिताना है और जो विद्या अर्जन की है वैदिक साहित्य वैदिक संस्कृति वो नई जनरेशन को पास ऑन करनी है। यदि वैश्य है तो वैश्य धर्म शूद्र है तो शूद्र धर्म। इस तरह से धर्म के अनुसार जीवन जिया जाए। यही तो पांडवों के लिए सबसे बड़ा मकसद था उनके जीवन का। धर्म के अनुसार सब कुछ हो और आखिर में मोक्ष मार्ग के लिए प्रयास किया जाए। हमको पता है कि महाभारत के अंत में सभी पांडवों ने और द्रौपदी ने भी धीरे-धीरे करके राज्य वगैरह सब त्याग करके फिर वह स्वर्गोहण की प्रवास किया था। और हमको यह भी पता है कि एक के बाद एक सभी वहां पे वह जो गिरी शिखर था उसमें एक के बाद एक देहपात होता गया। सर्वोच्च शिखर पर अपने युधिष्ठिर पहुंचे। उनको लेने के लिए वह रथ आया स्वर्ग में ले जाने के लिए। तब युधिष्ठिर ने कहा कि यह कुत्ता जो है मेरे साथ में पहले से ही यात्रा कर रहा है। मैं इसको छोड़कर के स्वर्ग में नहीं जाऊंगा। तब उस कुत्ते ने धर्मराज का स्वरूप धारण किया और कहा कि आपकी यह जो धर्म के प्रति निष्ठा है उससे हम लोग अभिभूत हो गए हैं। तो देखिए कि धर्म के लिए इनका जीवन है नहीं कि भोग सुख के लिए। तो यहां पर युद्ध में आप यदि अपने सगे संबंधियों का ही वध करेंगे तो फिर युद्ध समाप्त होने के बाद में यह उजड़े हुए संसार में रहने से क्या लाभ है? इस तरह का संसार हमको क्यों चाहिए? इस तरह का राज्य हमको क्यों चाहिए? कि जहां पर अपने जितने भी प्रिय बंधु बांधव हैं उनका ऑलरेडी मृत्यु हो चुका है। अभी कौरवों का मृत्यु होगा तो वह तो ठीक है। चलो उन लोगों ने जो सब कांड किए थे जो सब पागलपन किया था तो वो उनको तो यदि मृत्यु होता है युद्ध में तो उनके लिए न्याय है ही है। किंतु यह जो द्रोणाचार्य है, भीष्म पितामह है और फिर कौरवों की सेना में इतने क्योंकि यह तो सिविल वॉर था ना भाई-भाई में युद्ध है तो जितने भी सगे संबंधी जितने भी राज परिवार थे सभी तो इन लोगों से कहीं ना कहीं जुड़े हुए थे तो यदि इन लोगों में युद्ध होता है और तो फिर जो बचा हुआ उजड़ा हुआ राज्य भोग करके हमको करना भी क्या है तो वह अर्जुन के मन में था किंतु साथ में ही देखिए कि हम सबको एक बात तो बड़ा अच्छे से पता है। यह संसार रूपी युद्ध या तो फिर यह जगत संसार इस संसार में हम सबके लिए जो चैलेंजेस है दिन प्रतिदिन की यह जो स्ट्रेस प्रकट होता है उसके सामने हम लोग खुद कभी-कभी हार जाते हैं। अभी कुछ दिनों पहले मेरी एक डिवोटी के साथ में बात हो रही थी। उसने मुझे कहा कि देख वह एक बड़ी आईटी कंपनी में जॉब करती है। तो वहां पे क्या है कि उसके जो कलीग है वो कलीग का अभी पॉलिटिक्स होता है ना आपस में। किसको प्रमोशन चाहिए? किसको सैलरी राइज चाहिए? किसको ज्यादा वो मतलब आगे बढ़ना है? जो कॉर्पोरेट लेडर उसको कहते हैं। यह कॉरपोरेट जगत की यह सीढ़ी है। इस सीढ़ी के ऊपर में सबसे ज्यादा आगे किसको बढ़ना है? किसको अपनी सीवी स्ट्रांग बनानी है? वगैरह-वगैरह तो यह ऑफिस में इतना पॉलिटिक्स होता है। एक एक को कलीग है। वह झूठ-मूठ का आक्षेप इनके ऊपर में लगाता है। फिर यह मैनेजर भी कुछ नहीं कर पाता। तो यह डिवोटी ने मुझे कहा कि वह शाम को घर आकर के इतना एग्जॉस्ट हो जाती है कि क्या करें? तो देखिए कि हम सबके जीवन में युद्ध तो है ही है। अर्जुन के जीवन में वह सही-सही धर्म और अधर्म में युद्ध था। हमारे जीवन में देखें तो दिन प्रतिदिन की यह चैलेंज है। वह है हमारे लिए युद्ध। अभी इस युद्ध में हम किस तरह से जीत पाए। यदि कोई कलीग हमारे साथ में इस तरह से अन्याय करता है। हमारा मैनेजर या बॉस हमारे साथ में अन्याय करता है। डोमेस्टिक चैलेंज होती है। लड़की विवाह करके अपने पति के घर जाती है। तो वहां पर उसको सब चैलेंजेस का सामना करना पड़ता है। मदर इन लॉ, फादर इन लॉ का नेचर अच्छा नहीं है। कभी-कभी हस्बैंड का भी अच्छा नहीं होता नेचर। मुझे एक डिवोटी ने एक बार कहा था कि उसका हस्बैंड उसको मारता है। मैं तो एकदम आश्चर्यचकित हो गया था। पहली बार अभी न्यूज़पेपर में तो बहुत कुछ पढ़ते हैं किंतु पहली बार ऐसा किसी के मुंह से मैंने सुना कि यह सब कुछ हो रहा है इस जगत में। तो देखिए कि हमको इन सबको फेस करना है। स्टूडेंट है तो स्टूडेंट लाइफ में स्ट्रेस है। हम सबको पता है। किसी भी क्षेत्र में हो तो हाउ टू फेस दिस स्ट्रेस। हाउ टू फेस दिस चैलेंज। हमको कभी-कभी लगता है कि हम ही सही है बाकी सब गलत है। मैंने कुछ दिनों पहले एक साधक के साथ में मैं बात कर रहा था। भक्त ही है अपने बहुत अच्छे। तो वह जिस इंस्टट्यूट में काम करते हैं, वहां उनके जितने भी कोवर्कर्स हैं, कलीग है, वह सब उनके अगेंस्ट में है। तो यह मुझे बता रहे थे डिवोटी कि अच्छा वह भी मेरे साथ में ऐसा करता है। यह भी मेरे साथ में ऐसा करता है। सभी लोगों का नेचर खराब है। मैं कैसे वहां पर रहूंगा? तो मैंने अभी क्या है कि उम्र में थोड़े से सीनियर थे। इसलिए स्पष्ट शब्दों में नहीं कह के मैंने थोड़ा सा इनडायरेक्टली कहा कि देखिए यदि सभी लोग ऐसा कहते हैं कि हमारा नेचर म जगह पर यदि रहता हूं और वहां पर सभी के साथ में मेरा सतत झगड़ा हो रहा है तो कभी-कभी ना हमको नजर को घुमा करके अपनी ओर भी देखना चाहिए। ऐसा क्यों है कि सभी के साथ में मेरा झगड़ा होता है तो मेरे में कुछ कमी है कि नहीं? मेरे में कुछ इस तरह की एनोमली है कि नहीं। मेरा कुछ-कुछ कैरेक्टरिस्टिक, मेरा कुछ स्वभाव, मेरी कुछ आदतें, मेरी कुछ हैबिट्स, मेरा कुछ एटीट्यूड, मेरा कोई वर्तन, मेरा जो यह नेचर है, उसमें तो परिवर्तन करने की आवश्यकता है कि नहीं? यह भी हमको देखना है क्योंकि क्या है कि देखिए कि वेदांत तो स्पष्ट रूप से कहता है कि हमारी जो आत्मन है वही एकमात्र सच है और जगत में जो कुछ भी देख रहे हो वह क्या है कि नगणीय है। इस अर्थ में मिथ्या या असत्य ऐसा नहीं करके इस तरह से सोचना चाहिए कि जगत में जो कुछ भी देखते हैं हम लोग वो सब हमारे लिए एक लर्निंग प्रोसेस है। एक बड़ा इंटरेस्टिंग इंसिडेंट है कि स्वामी जी कैलिफोर्निया में थे तो वहां एक लेडी डिवोटी के साथ में बात कर रहे थे। तो इस लेडी डिवोटी का वो होम ऑफ ट्रुथ की वो संचालिका थी। तो यह उन लोगों का तो लेक्चर देने का एक नेचर होता है। यह होम ऑफ ट्रुथ अर्थात कि वहां पे यह जो ईस्टर्न और वेस्टर्न आइडियाज का खिचड़ी करके कोई नई टाइप की स्पिरिचुअलिटी ये लोग चला रहे थे जिसमें सब्सटेंस था नहीं। किंतु यह जो क्या है कि अमेरिका में लोगों को फैशन बड़ा अच्छा लगता है ना। यह नया फैशन है। यह नया फैशन है। तो रिलीजन में यह नया फैशन है। तो वो होम ऑफ ट्रुथ काफी चलता था। किंतु यह जो थी मिस लीडियाबेल मोस्ट प्रोबेबबली वही नाम है उसका। उसका स्वामी जी का प्रति बड़ी भक्ति थी। तो वो उसके लिए मतलब इट्स अ मैटर ऑफ सेविंग ग्रेस फॉर हर। तो वो एक बार स्वामी जी को कहती है कि दिस वर्ल्ड इज एन हम लोग इस जगत में आते हैं कुछ सीखने के लिए। दिस वर्ल्ड इज अ स्कूल टू टीच अस। ऐसा कुछ कहती है कि यह जो जगत है यह एक एजुकेशन इंस्टट्यूट है। एक स्कूल है। यहां पर हम सीखने के लिए आते हैं। तो स्वामी जी ने सामने पूछा अच्छा आपको यह बात किसने बताई? बताइए। तो तो वो चुप हो गई। अभी क्या है? यह सब खिचड़ी विचारों सब इकट्ठा किए तो कभी यहां से कभी वहां से। तो अभी ये उसके माइंड में यह बात थी। तो अभी एग्जैक्ट सोर्स क्या है? तो उसको तो पता नहीं। तो वो बेचारी चुप हो गई। तब स्वामी जी ने सामने कहा देखो द वर्ल्ड इज अ सर्कस एंड वी आर द क्लाउंस वी कम हियर टू टंबल एंड द डे वी स्टॉप टंबलिंग वी गेट टायर्ड ऑफ टंबलिंग वी विल गेट द रियलाइजेशन आत्म साक्षात्कार यह जगत है वो सर्कस है और हम सब लोग क्लाउन है यह जोकर है और हम लोग इस सर्कस में वह टंबल होने के लिए यानी कि इधर से उधर गिरने के लिए आते जिस समय हमारे भीतर में अकल आ जाएगी कि इस तरह से टंबलिंग करने की जरूरत नहीं है। चारों ओर दौड़ने की उठाकर बैठकर के उठकर के गिरने की यह सब कोई जरूरत नहीं है। उस दिन हमारी अकल ठिकाने आ जाएगी और हमको आत्म साक्षात्कार प्राप्त होगा। तो यह देखिए कि हम अपने जीवन में जहां कहीं पर भी हो जैसी भी परिस्थिति में हो हमको यह एक बात याद रखना है कि सब समय दूसरों की गलती भी नहीं होती या तो फिर दूसरों की गलती निकालने से हमको कोई लाभ नहीं है। देखिए दो चीज है। एक तो है कि फाइट करना है। यदि हमारे साथ में अन्याय हो तो अन्याय को चुपचाप सहन नहीं कर लेना है। उसके सामने फाइट करना है। सेकंड कि इस अपॉर्चुनिटी का लाभ उठा के बेनिफिट उठा के स्काल्पेल से अपने चरित्र खुद है उसको डसेक्ट करना है। उसको उसके ऊपर में सर्जरी करनी है और फिर सर्जरी करके उसको हमको थोड़ा सा ठिकाने लाना है। क्योंकि हमारा नेचर भी तो देखिए कि तमस और रजस से भरपूर है। सत्व कहीं एक कोने में चुपचाप बैठ बेचारा थोड़ा सा बैठा हुआ है। तो वो सत्व को परिशुद्ध करना है। परिपुष्ट करना है और यह तमस और रजस है उनकी अकल थोड़ी ठिकाने लानी है। तो क्या है कि यह संसार हमको दो चीज यदि संसार में चैलेंज है तो दो तरह से उसका सामना करना है। एक तो चैलेंज को फाइट करना है। यह जो हमारे भारत में 1000 साल से होता रहा कि यह जो एक के बाद एक विदेशी आक्रमणकारी आते गए और उनके सामने हम लोग हाथ जोड़कर के बैठे रहे कि हमारा जैसा कर्म है वैसे ही हम भुगतेंगे। व्हाट गोज़ अराउंड इट कम्स अराउंड। हमने पाप किए हैं तो अभी हमको यह कर्म भुगतने हैं। ऐसा बोलकर के जो बैठ गए तो 1000 साल तक हम गुलाम रहे। तो इस तरह की गलती फिर कभी नहीं करनी। जीवन के संग्राम में एक बार तो हथियार उठाकर के युद्ध कर लेना है। किसी को भी अपने साथ में अन्याय नहीं करने देना है। किंतु साथ-साथ में ही अपना जो चरित्र है उसको कि जैसे भट्टी में डालकर के तपा करके उसको शुद्ध परिशुद्ध करना है। यदि हम सिर्फ युद्ध ही करते रहेंगे तो आखिर में हमारे जीवन में बिटरनेस यानी कि एक तरह का क्या कहेंगे कि शोक संताप क्रोध या तो फिर द्वेष भाव रिजेंटमेंट जिसको इंग्लिश में कहते हैं। यह रिजेंटमेंट या तो द्वेष भाव से हमारा जीवन भर जाएगा। हम सिर्फ यदि युद्ध ही करते रहे तो तो इसीलिए ऐसा ना हो इसके लिए युद्ध करने के साथ-साथ में ही आत्म साक्षात्कार की भी चेष्टा करनी है। आत्म साक्षात्कार का भी प्रयास करना है। यदि ये दोनों चीजें हम एक साथ में ना करें। जैसे भारत के साथ में हुआ एक एक्सट्रीम या तो दूसरे एक्सट्रीम यह दोनों एक्सट्रीम में हम लोग इधर से उधर पटकते रहे। एक तो एक्सट्रीम है कि सिर्फ आध्यात्मिकता ही सही है। आध्यात्मिक ईश्वर प्राप्ति आत्म साक्षात्कार यही सही है। यदि विदेशी आक्रमणकारी आते हैं तो फिर उसका डट करके मुकाबला करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि यह सब हमारे कर्म के फल के अनुसार हमको पनिशमेंट देने के लिए आते हैं। तो, वह जैसे गलत था, हजार साल की गुलामी जिसका कि परिणाम रहा, तो उसके साथ-साथ में ही जैसे देखिए कि दूसरा जो एक्सट्रीम है, कि आत्म साक्षात्कार या तो फिर आध्यात्मिक यात्रा को भूल करके सिर्फ युद्ध ही करते रहना वह भी बहुत गलत काम होगा। हमने देखा कि किस तरह से फर्स्ट वर्ल्ड वॉर, सेकंड वर्ल्ड वॉर और यह न्यूक्लियर अटैक ऑन जापान इन तीन घटना ने क्या भयानक परिस्थिति लाकर के खड़ी की थी इन 194ज 1950ज में और उसके बाद में यह कोल्ड वॉर स्टार्ट हुआ रशिया और अमेरिका के पास में हजारों हजारों न्यूक्लियर वेपन है। एक दूसरों के सामने में न्यूक्लियर वेपन तान करके खड़े हैं। यदि एक एक्सीडेंट भी हो गया गलती से एक न्यूक्लियर मिसाइल भी छूट गया दूसरे देश के ऊपर गिरा तो सामने वाले सामने हजार मिसाइल भेजेंगे और फिर पूरी पृथ्वी का विनाश हो जाएगा। यानी कि न्यूक्लियर वेपंस के इस युग में सिर्फ युद्ध करना और साथ में आत्म साक्षात्कार की चिंता नहीं करना। इट विल बी सुसाइडल ऑन ए ग्लोबल स्केल। पूरी पृथ्वी के लिए आत्महत्या करने वाली बात हो जाएगी। इसीलिए गीता का जो संदेश है देखिए कि एक और तो यहां पर भगवान कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि तुम यह जो अपनी दुर्बलता है, कायरता है उन सबको फेंक करके फिर से उत्तिष्टता जागृत फिर से उठकर के युद्ध करने के लिए लग जाओ। अपने हृदय को फिर से फर्टिफाइड करो। फिर से अपने शरीर, मन, प्राण में साहस और वीर्य का संचार करो। इतना तो भगवान कृष्ण कहते हैं। किंतु साथ-साथ में ही फिर आत्म तत्व का फिर यह त्र तीन गुण क्या है? सांख्य क्या है? योग क्या है? वेदांत क्या है? आत्मन क्या है? भगवान कृष्ण का खुद का सही-सही स्वरूप क्या है? वह सब कुछ अर्जुन के सामने प्रकट करते हैं। यानी कि देखिए कि युद्ध भी करना है एक हाथ से और दूसरे हाथ से हमको आत्म साक्षात्कार के लिए जितना मेहनत हम युद्ध करने में लगाते हैं, उतनी ही मेहनत हमको आत्म साक्षात्कार करने में लगानी है। तो यह है भारतीय परंपरा। अनफॉर्चूनेटली जैसे स्वामी विवेकानंद ने कहा कि यह यूरोपियन है वह कृष्ण को फॉलो कर रहे हैं और हम भारतीय है वह क्राइस्ट को फॉलो कर रहे हैं। किस तरह से? क्राइस्ट ने कहा कि एक गाल पर कोई चांटा मारे तो दूसरा गाल दिखा दो। तो वह हम भारतीय लोग इस तरह का पागलपन करते रहे। जबकि भगवान कृष्ण कहते हैं कोई एक गाल पर चांटा मारे तो उसका हाथ तोड़ दो। तो यह यूरोपियन लोग हैं। वह भगवान कृष्ण को फॉलो करते हैं। तो यह अनफॉर्चूनेट सिचुएशन भारत में बड़े ही लंबे समय तक बनी रही है। एनीवे अभी हम देखते हैं कि यह जो पहले तीन श्लोक है कि अर्जुन एक तरह की कायरता से विमर्शता से और एक तरह के उदासीनता से ग्रस्त होकर के हथियार छोड़कर के भगवान कृष्ण के शरणागत होता है और क्या कहता है? संजय संजय क्या कहता है? हमको पता है कि संजय को दिव्य दृष्टि से पूरा कुरुक्षेत्र दिखाई दे रहा था। तो वो कहता है तम तथा कृपया विष्टम अश्रु पूर्णा कुलेक्षणम विषदंतम इदम वाक्यम उवाच मधुसूदन दूसरे अध्याय का प्रथम श्लोक कायरता से व्याप्त हुए अर्जुन के प्रति जो विषाद कर रहे हैं और आंसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है उस अर्जुन की ओर और भगवान मधुसूदन ने इस तरह के वाक्य कहे। देखिए कृपया विष्टम अर्थात कि कायरता से या तो फिर करुणा से जिसका हृदय भर गया है अश्रु पूर्णा कुले क्षणम आंखों आंखों में इतना आंसू आ गए हैं कि अभी उसको ठीक-ठीक दिखाई भी नहीं देता है। विषदंतम इदम वाक्यम जो विषाद कर रहे हैं। इस तरह के अर्जुन के प्रति मधुसूदन ने यह वाक्य कहे। क्या कहा भगवान कृष्ण ने कुतस्तवा कश्मलम इदम विषमे समुपस्थितम अनार्य जुष्टम अस्वर्ग्यम अकीर्ति करम अर्जुना हे अर्जुन इस विषम अवसर पर तुम्हें यह कायरता कहां से प्राप्त हुई जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते जो स्वर्ग को देने वाली नहीं है और कीर्ति करने वाली भी नहीं है। कश्मलम इदम यानी कि कायरता विषमे समुपस्थितम विषम घड़ी यह दोनों ओर सेना तैयार है। अभी जैसे ही शंख बजेगा साथ-साथ में ही युद्ध पार प्रारंभ होगा। इस विषम घड़ी में तुम्हारे हृदय में यह कश्मलम यानी कि कायरता कहां से प्रकट हुई? और यह कायरता कैसी है? अनार्य जुष्टम अस्वर्ग्यम अकीर्तम अर्जुनम जो कि आर्य जो है वह आर्य के लिए अच्छी नहीं जो स्वर्ग भी नहीं देती और जो कीर्ति को भी नहीं देती। इस तरह की काय कायरता देखिए तीन गुण जो है यहां पर भगवान कृष्ण कायरता के साथ में युक्त कर रहे हैं। सबसे पहले तो अनार्य यानी कि जो आर्य है आर्य का अर्थ क्या है? जिसका स्वभाव जो कि नोबल स्वभाव का है, जिसका उदात स्वभाव है, जिसका महत्व स्वभाव है, जो कि धर्म के लिए जीता है। इस तरह का आर्य व्यक्ति इस तरह की कायरता से कभी ग्रस्त नहीं होता। आर्य धर्म को ही फॉलो करता है। धर्म का ही पालन करता है। यदि तुम अधर्म का पालन करोगे तो फिर तुम आर्य नहीं कहलाओगे। अस्वर्ग्यम तुमको यह स्वर्गिक की प्राप्ति से वंचित कर देगा। अच्छा यहां पर स्वर्ग का अर्थ भी हमको समझना है। आध्यात्मिक जीवन में सफलता यानी कि एक जो स्वर्ग और नर्क की एक जनरल कल्पना है हमारे मन में इसको यहां पर नहीं लाना है क्योंकि हम सबको पता है कि क्षीण पुण्य मर्त्य लोके विषती यदि हम स्वर्ग में जाते भी हैं पुण्य कर्म करके तो पुण्य कर्म जब समाप्त हो जाएंगे तब इसी मर्त्य लोक में हम वापस आ जाएंगे हमारा हमारा लक्ष्य स्वर्ग नहीं है, मोक्ष है। और मोक्ष कर्म को यह जो संस्कार है कर्म के उसको काट करके ही प्राप्त होता है। इसलिए यदि यहां पर भगवान कृष्ण स्वर्ग की बात करते हैं तो यहां पर आध्यात्मिक जीवन का अंतिम लक्ष्य जो है उसी को हमको समझना है। और अकीर्ति करम अर्जुन यह कीर्ति भी नहीं करवा। देखिए ये कीर्ति का क्या अर्थ है? एक योद्धा होता है। एक योद्धा का सबसे बड़ा एक एसेट क्या है? तो वो है ओनर। देखिए स्वामी जी एक बहुत अच्छी बात करते हैं। यह जो भारत में यह कापुरुषता कायरता जो प्रवेश कर गई ना हमारी स्त्रियां पुरुषों को यह पुरुषत्व दिखाने के लिए उनको मजबूर नहीं करती। उनको आगे नहीं बढ़ाती। उनको एनकरेज नहीं करती। स्वामी जी कहते हैं कि यूरोप में खास करके ब्रिटेन में जाकर के देखा स्त्रियां यदि पुरुष में यह कापुरुषता देखेगी कायरता देखेगी तो इस हद से उसकी मजाक उड़ाएगी इस हद तक उसका अपमान करेगी कि उस पुरुष के भीतर में से सब तरह की कायरता या तो भाग जाएगी या तो फिर हमेशा के लिए वह डिसऑनरेबल होकर के रहेगा अकीर्तिक होकर के रहेगा तो यहां पे देखिए किस स्वामी जी कहते हैं कि जिस तरह से वहां पर होता है वैसे ही भारत की महिलाएं यदि पुरुषों को पुरुषत्व का यह मैनिफेस्टेशन करने के लिए यदि उनके पीछे में लगे उनको एनकरेज करें जो शब्दों के बाण भी उनके ऊपर में चलाए तो भी कोई दिक्कत नहीं है। हमारा पौरुषत्व फिर से वापस आना चाहिए। तो यह 1000 साल की गुलामी के बाद में यह हमारी परिस्थिति थी उस समय की भारत की। अभी तो भारत काफी एडवांस हो गया है इंटेलेक्चुअली, मोरली, इकोनॉमिकली किंतु फिर भी बहुत लंबा जर्नी हमको काटना है। यदि हम यह खास करके यूरोप, अमेरिका और चाइना के साथ में कंपटीशन करना चाहते हैं तो। तो यहां पर देखिए कि अकीर्तम हमेशा से यह बात रही है भारत में भी और विदेश में भी कि कोई भी स्त्री यदि कोई पुरुष के भीतर में का पुरुषता या तो फिर कायरता देखेगी तो बड़े ही कड़े शब्दों में उसकी निंदा करेगी। इस पुरुष का समाज में कोई स्थान नहीं रहेगा। हमेशा से वह बदनाम होकर के घूमेगा। तो तुमको क्या क्षत्रिय होने के बाद में इस तरह की बदनामी से तुमको रहना है पीछे का जीवन बिताना है कि इसने युद्ध क्षेत्र छोड़कर के भाग गया कायर की तरह 10 तरह के एक्सक्यूज दिखा के क्या तुमको इस तरह से रहना है क्या तो यह भगवान कृष्ण कर कहते हैं कश्मलम यानी कि कायरता विषम सम उपस्थितम इस विषम घड़ी में कहां से प्रगटित हुई अना अनार्य जुष्टम अस्वर्ग्यम अकीर्ति करम अर्जुन ना ही यह आर्य के लायक है ना ही यह तुम्हारी आध्यात्मिक सर्वोच्च सिद्धि है वहां तक तुमको ले जाएगा और ना ही तुमको यह कीर्ति प्रदान करेगा। यहां पे एक प्रश्न हो सकता है कि किस तरह से युद्ध करके हमको स्वर्ग प्राप्ति हो तो दो तरह से उसका उत्तर दे सकते हैं। एक तो है कि यदि धर्म के लिए आप युद्ध करते हैं तो फिर देखिए कि क्षत्रिय का तो धर्म यही कहता है कि धर्म की रक्षा करने के लिए यदि प्राण भी त्यागना पड़े प्राण भी यदि न्योछावर करने पड़े तो वह भी करना उचित है। यदि कौरव जीत जाते, तो पूरे भारतवर्ष में धीरे-धीरे करके अधर्म का प्रसार प्रारंभ हो जाता। अभी देखिए कि कौरव जो थे, वह विधि विधान करने में पीछे किसी के नहीं थे। वेद के होम, हवन, यज्ञ, ब्राह्मणों को बुलाकर के पूजा पाठ वगैरह जो कुछ भी करवाना है, वह सब करवाते थे। तो बाह्य दृष्टि से तो आपको ऐसा ही लगेगा कि वैदिक धर्म का पालन तो अर्जुन माने यह पांडव भी कर रहे हैं, कौरव भी कर रहे हैं। किंतु हमको यह बात जो कि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य से परिचित है जो कि भगवान श्री रामकृष्ण के शिष्य हैं। उन हम सबको पता है कि यदि किताब में कुछ लिखा है तो किताब में ही रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे जीवन में उसका इंप्लीमेंटेशन होना चाहिए। ठाकुर जो कहते हैं कि पंजीिका में यानी कि वह वो ज्योतिष शास्त्र की वह जो किताब है उसके भीतर में लिखा है कि इतना सारा बारिश इस दिन गिरेगा। किंतु इस पंजीिका को गोल घुमा करके आप इसको स्क्वीज़ करेंगे। आप इसको प्रेस भी करेंगे तो पंजिका के भीतर में से एक बूंद पानी नहीं गिरने वाला। यानी कि यदि आप वेद वेदांत उपनिषद सब कुछ उसमें जितना धर्म भरा पड़ा है उसको आप कितना ही स्क्वीज़ कर लीजिए उसके भीतर में से कोई सात्विकता बाहर नहीं आने वाली है। सात्विकता या तो फिर यह साधना या तो फिर ईश्वर के प्रति अनुराग ईश्वर के प्रति शरणागति एक प्रचंड वैराग्य मन प्राण शरीर के ऊपर में संपूर्ण संयमन नियमन यह सब तो हमको किसी एक साधक के भीतर में ही देखने को मिलने वाला है। एक और आप 1000 वेद वेदांत और प्रकरण ग्रंथों का ढग खड़ा कर दीजिए। उसके सामने एक साधक को खड़ा कर दीजिए। एक सामान्य साधक भी चाहे क्यों ना हो। उस साधक के भीतर में ज्यादा सात्विकता है बतौर कि कंपेयर टू ऑल दिस बुक्स वि आर नथिंग बट वर्ड्स। द वर्ड्स टीचर्स बट अंटिल एंड अनलेस वी इंप्लीमेंट दोज़ वर्ड्स इन आवर लाइफ दे आर मियर वर्ड्स। किताबें हमको सिखाती तो है किंतु जब तक उन उपदेशों को हम जीवन में परिवर्तित नहीं करते तब तक वह खाली उपदेश ही रह जाएंगे। तो वैसे ही कौरवों के जीवन में ऐसा ही कुछ था कि वह लोग चाहे वह रिचुअल्स है बाह्य रिचुअल हजार फॉलो कर लेते थे। किंतु नजर के भीतर में लोलूपता थी। ठाकुर की वो जो फेमस जो उदाहरण है कि एक गिद्ध है वह हवा में चाहे हजार फुट ऊपर में उड़ेगा उसकी नजर रहेगी हमेशा जमीन के ऊपर में जो कूड़ा पड़ा है वहां पे यह कौरवों चाहे हजार विधि विधान होम हवन करवा ले जिस क्षण उनके हाथ में यह मौका आया साथ-साथ में ही द्रौपदी का अपमान करना उन्होंने प्रारंभ कर दिया भगवान कृष्ण को स्वयं आकर के द्रौपदी की लाज की रक्षा करनी पड़ी थी। तो चाहे आप हजार विधि विधान कर दे आपकी नजर हमेशा यहीं पर रहेगी कि अपने भाइयों की पत्नी का अपमान करें तो फिर इनके जीवन में धर्म कहां पर रह गया? तो यहां पर भगवान कृष्ण कहते हैं कि जिस क्षण अपना जो धर्म है उसको यदि आप निभाएंगे तो आपकी उसी क्षण आध्यात्मिक उन्नति होनी प्रारंभ होगी और धर्म निभाने की वजह आप यदि युद्ध क्षेत्र छोड़कर के भाग जाएंगे तो आपका आध्यात्मिक विकास कभी नहीं होने वाला। वही जो फेमस घटना कि स्वामी जी के पास में एक लड़का आया। लड़के ने आकर के कहा कि स्वामी जी मैं ध्यान करने का बड़ा प्रयास कर रहा हूं। अपने कमरे में बैठकर के खिड़की दरवाजे सब बंद करके मैं ईश्वर के ऊपर में अपना मन एकाग्र करने का प्रयास करता हूं। किंतु फिर भी मेरा मन ईश्वर पर एकाग्र नहीं हो रहा है। तो मैं क्या करूं? आप मुझे कुछ बताइए। तो स्वामी जी ने फेमसली क्या कहा कि सबसे पहले तो खिड़की और दरवाजे खोलो। घर के बाहर आओ। बाहर आकर के जितने गरीब गुरबे आसपास में रहते हैं उनका कुछ सेवा करो। उनका कल्याण करो। तब कहीं जाकर के तुमको आध्यात्मिक कुछ सिद्धि प्राप्त होगी। तो मैंने जब इसको पहली बार पढ़ा था तो मुझे भी देखिए स्वामी जी के सेंटेंस में स्वामी जी के जीवन की घटनावली में कैसा एक शॉकिंग वैल्यू है। वो जो अमेरिका गए थे स्वामी जी ने कहा था कि स्वर्ग में जाना हमारा लक्ष्य नहीं है। इट इज नॉट आवर एम टू गो टू हेवन। तो वहां पे एकदम चारों ओर हलचल मच गई। क्रिश्चियनिटी का पूरा यह फाउंडेशन ही है कि एट द एंड ऑफ द एपोकालिप्स यू हैव टू आइदर गो टू हेवन और गो टू हेल। माने जब यह जीवन का अंत आएगा, सृष्टि का अंत आएगा, उस समय हमको या तो स्वर्ग में जाना है या तो नर्क में जाना है। बेस्ट है कि हम स्वर्ग में जाएं। अभी यहां पर एक ऐसा एक एक प्रीचर रिलीजियस प्रीचर प्रचारक आकर के धार्मिक प्रचारक आकर कहता है कि स्वर्ग में जाना जीवन का लक्ष्य नहीं है। तो सब लोग सोचते हैं तो फिर क्या है जीवन का लक्ष्य? एक और आध्यात्मिकता की बातें करते हैं। दूसरी ओर कहते हैं स्वर्ग में नहीं जाना है। तो स्वर्ग में जाना लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य है मोक्ष वि इज इवन हायर कांसेप्ट। स्वामी जी को पता है कि लोगों के मन में किस तरह से यह हलबल खड़ी की जाए। किस तरह से एक केओस खड़ा किया जाए। किस तरह से एक इंपैक्ट खड़ी की जाए जिससे कि लोग एकदम उनको अटेंशन देना शुरू करें। वरना क्या है? हजार प्रीचर आते हैं। हजार बातें करते कौन सुनने को जाता है? ऐसा यदि एक हलचल मचेगी तभी तो लोग एक अटेंशन देना शुरू करेंगे। तो यहां पर भी देखिए कि स्वामी जी का यह जो एक बात कि पहले तो खिड़की के दरवाजे खोलो। बाहर आओ लोगों की सेवा करो। तब तो कहीं जाकर के तुमको मोक्ष प्राप्ति का तुम्हारा जो रास्ता है वह बड़ा क्लियर हो जाएगा। तो यहां पर स्वामी जी ने क्यों कहा ऐसा उसको समझने की जरूरत है। उत्तर कोई बहुत बड़ा डिफिकल्ट नहीं है। यदि गीता या तो कोई भी हिंदू धर्म का पाठ किया होगा। हम सबको पता है कि कर्म करतेकरते कर्म का जो फल है वह आकर के हमको लगता है। बहुत सारा हमारा कर्म तामसिक और राजसिक रहता है और इसका जो फल है वह हमको बंधन में डालता रहता है। निष्काम कर्म या तो फिर एक महत उद्देश्य से किया हुआ कर्म हमारे तामसिक और राजसिक कर्मों को काटता है। तो जैसे ठाकुर कहते हैं कांटे से कांटा निकाल करके फिर दोनों कांटों को फेंक देना है। यदि हमने अपने जीवन में कभी भी किसी भी तरह का तामसिक राजसिक कर्म नहीं किया तो फिर हमको सात्विक कर्म कर्म करने की जरूरत नहीं है। जैसे मां ने वो जो कहानी बताई थी कि ब्रह्मा ने सर्वप्रथम चार कुमारों की रचना की और उसके बाद में इन कुमारों को तो पहले से ही पता था कि सृष्टि में लिप्त होने से सीधा हम माया में फंस जाएंगे। उन्होंने पहले से ही ब्रह्मा जी का ध्यान करना शुरू किया। कुछ ही समय में मुक्ति प्राप्त कर ली और ब्रह्म साक्षात्कार में विलीन हो गए। तब ब्रह्मा ने सोचा कि अरे इस तरह से तो सृष्टि चलने वाली नहीं है। फिर उन्होंने 12 प्रजापतियों की रचना की। प्रजापतियों ने फिर इस सृष्टि का प्रारंभ किया। तो किस तरह से किया? 100% 24 कैरेट सोना होता है तो उससे तो गहने नहीं बनेंगे। एक्चुअली यह पहले मैं सोचता था कि इस बात का अर्थ क्या है? किंतु फिर बाद में मैंने एक YouTube पर वीडियो देखा जो प्योर जो गोल्ड होता है ना उसको आप बड़ा आसानी से आप उसको दबा सकते हैं। जैसे कि यह रबर की तरह रहता है और इजीली उसको आप स्क्वीज़ कर सकते हैं। तो अभी आप गहने यदि महंगा चूड़ी है या तो फिर यह गले में पहनने का हार है कि या तो फिर यह कान में पहनने के लिए जो आता है सब इस तरह के महंगे-महंगे गहने 24 कैरेट के बनाएंगे। थोड़ा सा प्रेस करेंगे तो वह ट्विस्ट हो जाएंगे कि बिगड़ जाएंगे। तो फिर तो इसके महंगे गहने बनाने की क्या जरूरत है? क्या फर्क क्या पड़ता है? गहना तो ऐसा होना चाहिए ना कि हाथ में से गिरे कोई उसको थोड़ा सा प्रेस करे, स्क्वीज़ करे तो वैसे का वैसे बना रहना चाहिए। तो वो जो स्ट्रेंथ है उसका स्ट्रक्चर जो है वह तभी आएगा जब उसमें थोड़ा सा मिलावट होगा। तो यहां पर भी यदि हम सभी लोग कर्म, तामसिक और राजसिक करते ही हैं। सिर्फ साधना करने से यानी कि जिसको हम ट्रेडिशनल साधना करते हैं भक्ति है या तो ज्ञान है। उसके मात्र से भक्ति या तो ज्ञान या तो राज। राजयोग यानी कि ध्यान या यानी कि ईश्वर के प्रति शरणागति या तो फिर यह कहेंगे कि वैराग्य और त्याग या तो फिर एकाग्रता का प्रैक्टिस भक्ति योग, ज्ञान योग और राजयोग। यदि सिर्फ इन तीनों से यदि हम तामसिक और राजसिक कर्मों को काटने को जाएंगे ना तो यह ऐसा होगा कि हमने एक तामसिक कर्म कर दिया है उसको काटने के लिए एक महीना हमको साधना करनी पड़ी। अभी यदि हमने सिर्फ एक राजसिक तामसिक कर्म किया तो तो भी चल जाता। प्रॉब्लम यह है कि जीवन में प्राय ज्यादातर कर्म हमारे जब तक हमारी यह जो आध्यात्मिक दृष्टि नहीं ओपन होती और इवन आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त होने के बाद में भी बहुत सारा तामसिक राजसिक कर्म हम करते ही रहते हैं तो उसको काटने के लिए जो ट्रेडिशनल तपस्याएं हैं इतनी प्रचंड रूप से करनी पड़ेगी कि पता नहीं कितने जन्म जन्मांतर चले जाएंगे। तो यह तो ऐसा हो गया ना कि पैर में कांटा लगा है और उसको निकालने के लिए आप वैक्यूम क्लीनर का इस्तेमाल कर रहे हैं। वैक्यूम क्लीनर से आप कचरा साफ कर सकते हैं। पैर में लगा हुआ कांटा उसके सामने वैक्यूम क्लीनर का पाइप ले जाकर के आप फुल स्पीड पे भी चलाइए। वो कांटा नहीं निकलने वाला है। वैक्यूम क्लीनर में कांटा निकालने की ताकत नहीं है। वो जमीन पर जो कूड़ा कचरा पड़ा है उसको बटोर लेगा शायद। पैर में लगा हुआ कांटा नहीं निकालेगा। कांटे को निकालने के लिए उतना ही पावरफुल दूसरा कांटा चाहिए जो कि पूरा स्किन के भीतर में चमड़ी के भीतर में चला जाए उसको विध करके और दूसरा कांटा को खींच करके निकाल ले तो वो जो शक्ति है तामसिक और राजसिक कर्मों को अल्प समय में काटने की वो सात्विक कर्म में है महतर्मा जो कि धर्म के लिए किया गया है उस कर्म में है तो यहां पर भगवान कहते हैं अर्जुन को कि यदि तुम कौरवों का विनाश नहीं करोगे तो यह पवित्र भारत भूमि है। यह भारतवर्ष है वह अधर्म के अंधेरे में डूब जाएगा। और इससे बचकर के तुम भागोगे तो यह जो भाग जाने की वजह से तुम हजार यह जो तुम तामसिक कर्म करोगे अपने धर्म का पालन नहीं करके युद्ध क्षेत्र से भाग जाने का तो उस तामसिक कर्मों को काटने के लिए पता नहीं कितने कोटि-कोटि जन्म तुमको जप ध्यान साधन भजन शरणागति एकाग्रता वगैरह करना पड़े और इससे भी शायद तुम्हारा कांटा यह निकलेगा कि नहीं युद्ध क्षेत्र से भाग जाने का किसको पता तो बेटर है कि युद्ध करके इस पूरी बात को समाप्त कर दो। यदि जीतोगे तो राज्य का भोग करोगे। यदि मर जाओगे तो तुम स्वर्ग का भोग करोगे। एनीवे यू आर गुड। माने यू आर सेट अप नाउ। यदि युद्ध करोगे तो धर्म के रास्ते पे ही ज्यादा आगे बढ़ जाओगे। युद्ध नहीं करोगे तो सब कुछ तबाह हो जाएगा। भारत भी अधर्म में डूब जाएगा और तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन भी विच्छिन्न हो जाएगा। तो यहां पे वह भगवान कृष्ण इसलिए कहते हैं कि स्वर्ग को देने वाली नहीं है। यह जो तुम्हारा जो कश्मलम कायरता है वह है अस्वर्ग्यम। वो स्वर्ग को देने वाला नहीं है। अकीर्ति कर जो हमने ऑलरेडी देखा कि कीर्ति यानी कि यह जो ओनर होता है एक करेज और साहस होता है वह तो किसी भी एक पुरुष का पौरुषत्व एक है। यदि उसके ऊपर में आघात हो तो स्त्रियों को उस देश की स्त्रियों को कड़े से कड़े शब्दों में इस तरह के पुरुष की निंदा करनी चाहिए। स्वामी जी का खुद का और यह जो अनार्य जुष्ठम जुष्टम यह जो श्रेष्ठ पुरुष जो है जो कि इसका सेवन नहीं करते देखिए कि भारत की भूमि धर्म के ऊपर में बनी है। आप पूरे विश्व का इतिहास खोल करके देख लीजिए। यह अफ्रीका में इतने सारे देश हैं। यह तंजानिया नो नो नीड टू नेम नेम्स। नाम देने की जरूरत नहीं है। किंतु देखिए कि कितने सारे देश ऐसे हैं कि जैसे कि उनका फाउंडेशन ही है कि इस जगत में कैसे भी करके अपना प्रॉफिट मैक्सिमाइजेशन कर दे या तो फिर इस जगत में कैसे भी करके भोग सुख की जो हमारी वासना है उसको मैक्सिमाइज कर दे। हम लोग जिस नेबरहुड में रहते हैं आसपास में देख लीजिए कि धर्म के नाम पर सब जगह पर अधर्म चल रहा है। भारत एक ऐसा देश है कि यहां पर हमारे जितने भी जो श्रेष्ठ राजनेताएं प्रकट हुए हैं उन सब ने धर्म का आशरा लेकर के राज्य शासन करने का प्रयास किया है। तो यह जो आर्य है सर्वश एक नोबल एक उदात महत स्वभाव वह भारत की स्पेशलिटी है और इसी स्पेशलिटी की वजह से भारत इतने हजार सालों के बाद में भी हजारों हजारों सालों की हमारी सभ्यता अभी भी बरकरार है। ये स्वामी जी का जो फेमस स्टेटमेंट है कि यह जो आज का जो फिलॉसोफर था सो ग्रीस देश के सोक्रेटिस वगैरह वे लोग यदि आज ग्रीस में जाएंगे तो क्या देखेंगे? यह जो कैपिटल वगैरह जो वहां के जो बड़े-बड़े मोन्यूमेंट है वहां पे यह जो स्पाइडर है वह अपनी वेब बना रहे हैं। यह जो उस समय की बात है मकड़ी जो है अपनी जाल बना रही है। अभी तो वह तो बड़े-बड़े क्या कहेंगे टूरिस्ट स्पोर्ट हो गए हैं। किंतु वो स्वामी जी के समय की यह बात है। तब कि ये स्वामी जी कहते हैं कि ये जो ऋषि थे मनु वो फिर से भारत में आ जाएंगे। तो वही भारतीय परंपरा, वही यह भारतीय आदर्श, वही आर्य का जो स्वभाव है, आर्य की उदारता और महत्ता है। आज भी इनको हमारे भारत देश के जो सर्वोच्च नागरिक हैं, उनमें देखने को मिलेगी। यह खुदराम की बात करें, ठाकुर के पिताजी। देखिए कि कितना महत आर्य शब्द यदि किसको अप्लाई होना है आज के युग में तो आप खुद हीराम को या परफेक्टली अप्लाई कर सकते हैं। कितना शुद्ध पवित्र उनका चरित्र था। देरे ग्राम में रहते थे। बात ऐसी आन पड़ी कि यदि झूठ जुबानी नहीं देंगे तो पुरखों की सभी संपत्ति गवाने का समय आ जाएगा। तो उन्होंने कहा कि पुरखों की संपत्ति, पुरखों की यह जमीन, पुरखों का यह गांव, हमारे सगे संबंधी सबका त्याग करूंगा। किंतु असत्य वचन कभी भी इस जुबान से नहीं निकलेगा। और देरेग्राम छोड़कर के कामार पुकुर आए। फिर से फ्रॉम द स्क्रैच पूरा जीवन फिर से गढ़तर करना पड़ा। और उसमें भी जो नीति नियम है ब्राह्मण के कि किसके घर से भिक्षा प्राप्त करनी है, किसके घर से नहीं करनी है और यदि जीवन में कष्ट संकट आ जाए तो जुबान पर सिर्फ एक ही बात जहां कोरेन रघुवीर जो करे रघुवीर बस रघुवीर की शरण में रहेंगे तो यह है आर्य एक सही सही आर्य किसको कहेंगे तो खुद ही राम तो यदि तुम इस युद्ध क्षेत्र से भाग यह अर्जुन का युद्ध क्षेत्र से भाग जाना और खुदीराम का अपने पुरखों की संपत्ति को भोग करने के लिए देरे ग्राम में झूठ जुबानी देकर के रहना यह दोनों इक्विवेलेंट हो जाता। ठाकुर की कृपा से ईश्वर की कृपा से ना ही अर्जुन ने युद्ध क्षेत्र से कायरता पूर्ण भाग गया ना ही यह खुद ही राम ने असत्य जुबानी देकर के देरेग्राम रहने का प्रयास किया। तो यह है भारत की महत्ता। यह है भारत का एक ऐतिह्य भारत का यह आध्यात्मिक वारसा। अच्छा इसके बाद में काम करते हैं। मैंने सोचा था आज तीनों श्लोक कंप्लीट करके फिर स्वामी जी इसके बारे में क्या कहते हैं वह देखेंगे। किंतु फिर बहुत समय हो जाएगा। तो आज यहीं पर समाप्त करते हैं। नेक्स्ट क्लास जब होगा तो यह तीनों श्लोकों का फिर से एक बार तीसरा श्लोक का पाठ करेंगे। तीनों श्लोकों का एक बार एक साथ में विचार करेंगे और साथ में ही स्वामी जी का क्या कहना है इस पूरे मामले में उसका एक विषद रूप से एनालिसिस करेंगे। तो आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु