prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः
बेलूर मठ में दुर्गा पूजा का आनंद
शारदीय दुर्गा पूजा अभी आ रही है और मैंने बेलूर मठ में जो समय बिताया उसमें से सर्वश्रेष्ठ समय था कि मेरी सर्वप्रथम दुर्गा पूजा बिलूर मठ में 2003 में बिलूर मठ ज्वाइन करने के लिए गया था। उस समय की जो दुर्गा पूजा है आई थिंक दैट इज द बेस्ट वन ऑफ द बेस्ट टाइम इन माय लाइफ। उसमें भी यह जो आगमनी संगीत जो कि प्रारंभ में गाया जाता है। तो उसका जो भाव है उसका जो है। मुझे इतना अच्छा लगा था उस समय जनरली क्या होता है कि ब्रह्मचारी तो बहुत सारे नॉन बेंगली होते हैं। उनको तो दुर्गा पूजा के बारे में इतना कुछ आईडिया नहीं होता। प्लस ये आगमनी और काली कीर्तन यह कभी किसी ने म जो नॉन बेंगली है वो शायद ज्यादातर लोगों ने नहीं सुना होगा। जैसे कि मैंने मैंने ना ही कभी काली कीर्तन सुना था ना ही आगमनी सुना था। बेलूर मट ज्वाइन करने से पहले तो वहां पर क्या है ऑलमोस्ट एक महीने पहले से ब्रह्मचारियों के लिए अलग से ये प्रैक्टिस सेशंस स्टार्ट हो जाते हैं। उस समय अह यह जो अपने प्रमेयानंद जी के जो सेवक महाराज थे आशीष महाराज वह मठ में थे और वो लीड करते थे हमको सिखाते थे आगमनी और काली कीर्तन आप यदि बेलूर मठ गए होंगे तो वहां पे मैनेजर महाराज की जो ऑफिस है उस बिल्डिंग में जहां पे भी जहां पे स्वामी जी का बेडरूम है स्वामी जी का बेडरूम है फर्स्ट फ्लोर पे ओल्ड शाइन के बगल में यह मठ कंपाउंड के भीतर में वो मैनेजर महाराज की ऑफिस है। उसके आप बाहर में जाएंगे गंगा की साइड में देखेंगे कि एक वरांडा जैसा है। वहां पर एक बेंच रखा है। वो वुडन बेंच एक रखा है लकड़ी का और वहां पर सभी डायरेक्ट डिसाइपल्स के फोटो टंगे हुए हैं। तो वहां पे साइड में एक विजिटर्स रूम है। तो उस विजिटर रूम में शाम को वहां पर आशीष महाराज हमको यह काली कीर्तन वगैरह सुना सिखाते थे और फिर कुछ समय जाएगा तो फिर जो साधुओं का डाइनिंग हॉल है उसके ऊपर में पहले लाइब्रेरी हुआ करता था। अभी मीटिंग हॉल जैसा है साधुओं के लिए। तो वहां पर वह लाइब्रेरी हॉल में ट्रेनिंग सेंटर के ब्रह्मचारी और जो हम लोग नए ज्वॉइ करने के लिए आए हैं। सब ब्रह्मचारियों को मिलकर के शाम को खाने के पहले आधा एक घंटा वहां पर काली कीर्तन और यह आगमनी संगीत का वो प्रैक्टिस होता है। तो, इतना सुंदर वातावरण बनता है और उसके बाद में अल्टीमेटली जैसे ही यह अह कल्पारंभ प्रारंभ होगा, घट स्थापना होगी, मेन अह पेंडोल में, जहां पर भी सभी भक्त उपस्थित है। अपने सभी साधु भक्त उपस्थित है, वहां पर फिर वह आगमनी संगीत गाया जाएगा। तो ऑलमोस्ट एक महीने का प्रैक्टिस तो हो गया। हम जैसे नौ सिखियों के लिए जिन्होंने पहली बार यह आगमनी और काली कीर्तन सुना है तो फिर उसके बाद में एक महीने का कंटीन्यूअस प्रैक्टिस के बाद में जब वह पेंडोल में काली कीर्तन और आगमनी गाते हैं तो इतना सुंदर भाव खड़ा होता है क्योंकि सभी ब्रह्मचारी साधु साधुओं को तो ऑलरेडी प्रैक्टिस है काली कीर्तन और आगमनी की और भक्त तो ज्यादातर बेंगली होते हैं। उसमें से कोई गाएंगे, कोई नहीं गाएंगे। किंतु जो कोई भी गाएगा तो उनको तो अभी सॉलिड प्रैक्टिस है। आगमनी किस तरह से गाया जाए तो इतने सारे भक्तों के साधकों के वाणी से यह एक सम स्वर में जो आगमनी संगीत जो होता है वहां पर गान इतना सुंदर वातावरण बनता है। ऑलमोस्ट आई थिंक के बहुत सारे लोगों ने आपको यह मिला होगा। ओपॉर्चुनिटी बेलूर मठ का यह काली कीर्तन और आगमनी संगीत सुनने का। तो अभी मैं कल सुन रहा था। उस समय जब मैं बेलूर मठ में था तो यह सब गीत वगैरह मुझे मुखस्थ हो गए थे। आगमनी के काली कीर्तन के बहुत सारे तो मुझे फिर वह किताब देखने की भी जरूरत नहीं पड़ती थी। यहां पर संध्या आरती के समय यह खंडना है वगैरह। तो कैसे हम वैसे ही गा लेते हैं सिंगर के साथ में तो वहां पर भी जब तक बाय दैट टाइम वो मंडप में शिफ्ट हुआ यह काली कीर्तन और आगमनी तो मुझे वो किताब की भी जरूरत नहीं रही थी। ऐसा मैंने वो सब मेमोराइज हो गया था। किंतु खैर अभी बहुत साल बीत गए उस बात को बाद में मेरा गुजरात में पोस्टिंग हुआ तो वैसे तो राजकोट में होता है काली कीर्तन वगैरह वहां पे बेंगली ट्रेडिशन है, बेंगली साधु भी है। किंतु बेलूर मठ जैसा आनंद तो कभी नहीं आएगा। और यहां पर तो साउथ इंडिया है। यहां पर तो प्रश्न ही नहीं आगमन ही काली कीर्तन का। तो एनीवे मैं कल सुन रहा था वो रिकॉर्ड मेरे पास में है कुछ गीत। तो
किसने रखा है तुम्हारा नाम अन्नदा: माँ दुर्गा और माँ सारदा का समन्वय
अभी क्या होता है कि पहले तो सुना बहुत कुछ है यह सब। किंतु जब हम जैसे धीरे-धीरे करके रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में हम गहराई से प्रवेश करते हैं। उस समय जैसे अपना एक के बाद एक आवरण हटते जाते हैं। यह जो गहन तत्व है धीरे-धीरे करके यह गुलाब के फूल की तरह प्रस्फुटित होते जाते हैं। तो वैसे ही यह जैसा हम रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में गहराई से प्रवेश करेंगे। उसके बाद में यह जो गीत है, यह भजन है, इसको फिर से सुनेंगे ना तो उन सबके भीतर में गहन तात्पर्य दिखता है। एक डीप फिलॉसोफी दिखती है। पहले तो हम गीत गाते हैं। भजन ये वगैरह गाते हैं। क्यों? क्योंकि हमको इसका रागुर्य है। उसमें बड़ा हमको रस आता है। इसका यह जो भाव प्रकट होता है इन जनरल वो हमको बड़ा अच्छा लगता है। बोल कर के हम लोग यह भजन कीर्तन सुनते हैं। किंतु जैसे-जैसे आपका इंटरेस्ट रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में गहरा होता जाएगा। जितना आप डीपली उसको स्टडी करने का प्रयास करेंगे तब पता चलेगा कि इन सब गानों के पीछे कितना गहन एक तत्व विचार छुपा हुआ है और खास करके यह आगमनी जो है वो वैसे तो मां और ठाकुर के जीवन को लक्ष्य करके नहीं लिखा गया किंतु यह जो सनातन धारा जो है भारत ये जो अपना सनातन धर्म है उसके यह जो मूल तत्व जो है वो वो हमेशा से वैसे के वैसे ही रहे हैं। ठाकुर माने आकर के स्वामी जी ने आकर के कोई बिल्कुल नया यहां पर एडिशन नहीं किया है। वैल्यू एडिशन किया है। नए कोर कांसेप्ट ऐड नहीं किए हैं। कोर कांसेप्ट तो वही है जो कि उपनिषद में थे। जो कि हमारी वैष्णव साधना में थे, जो कि शक्ति साधना में थे। वही कोर कांसेप्ट है जो कि चले आ रहे हैं सनातन काल से। तो रामकृष्ण मां शारदा स्वामी विवेकानंद का जीवन भी इसी कुछ कोर कांसेप्ट्स के ऊपर में ही मूलभूत तत्वों के ऊपर में ही बना है। तो देखिए एक मैं सुन रहा था गीत उसमें एक लाइन जैसे ही मैंने सुनी ना मुझे इतना स्ट्रक हुआ। मैंने बार-बार उसको सुन रहा था। क्या है सदानंदर घर अन्न शून्य सदा के रखे छ तोर नाम टी अन्नदा सदानंद का घर है अन्न शून्य सदा किसने रखा है तुम्हारा नाम अन्नदा देखिए यह उमा अर्थात कि भगवान शिव की शक्ति जब हिमालय का घर छोड़कर के भगवान शिव के घर रहने को जाती है तो उनकी मां जो है इतनी इतनी व्यथित हो जाती है कि देखिए कहां मेरी लाडली सुंदर लड़की जो कि इतनी मतलब कंफर्ट में इतना केयर में उसका वो जो बचपन बीता है मां-बाप का इतना स्नेह प्राप्त हुआ है। उसको जो चाहे वो वही उसी समय उसको मिला है। उसको इतना लग्जरी में रखा गया है। जैसे कि एक सुंदर उद्यान हो। इस उद्यान में पुष्पों की जतन माली जिस तरह से करता है प्राण डाल के तो वैसे ही यह हिमालय और उनकी उमा की मां ने इनकी परवरिश की है अपना प्राण डाल के। इसके बावजूद जब विवाह किसके साथ में होता है? तो वही है शशान वासी शिव जिनके यहां पर ना ही आपको अब श्मशान में रहते हैं कैलाश पर्वत पर रहते हैं उनके सहचर है तो कौन है भूत पिशाच प्रेत वगैरह आभूषण क्या है तो यह सर्प का हार पहने हुए हैं। सर के ऊपर में जटा है और जटा में से चंद्र और गंगा बह रही है। तो यह जिनके आभूषण है ऐसे एक महाभैरव के साथ में हमारी लाडली प्रिय पुत्री का हमने विवाह करवाया तो उसके सर पर पता नहीं क्या-क्या सब कष्ट बीतता होगा। तो यह गीत में यह भाव व्यक्त किया गया है और इसकी यह जो लाइन है सदानंदर घर अन्न शून्य सदा ये सदानंद है इसका घर तो हमेशा अन्न शून्य है तो फिर के रखे छे तोर नाम टी अन्नदा तो घर में खाने को नहीं है और इस जगत में हमने सुना है कि लोगों ने तुम्हारा नाम रख दिया है अन्नदा तो यह कंट्राडिक्शन किस तरह से संभव है तो इस तरह से एक के बाद एक भाव लेकर के एक गीत की जो रचना हुई है। अभी आप देखिए कि मां शारदा और ठाकुर का जीवन किस तरह से मतलब आपको एक लाइन में यदि व्यक्त करना है गीत की कोई एक लाइन में कि ठाकुर और मां का जो जीवन था किस तरह से था। दांपत्य जीवन इनका था। तो एक लाइन में आप कह सकते हैं ठाकुर थे जैसे कि बेफिक्र इस जगत में किसी चीज की उनको चिंता नहीं है। यह जगत में क्या हो रहा है उसके साथ में कोई उनका नाता नहीं। मां जैसे कि मां काली उनको जिस तरह से चलाती है उस तरह से चलते हैं। और यहां पर है मां शारदा जो कि पास में ही रहती है। यहां पर ठाकुर अपने कमरे में रहते हैं। दक्षिणेश्वर में और पास में नहबत में रहती है मां शारदा। इन दोनों के जीवन में कंट्रास्ट देखिए। यहां पर ठाकुर है टाका माटी माटी टाका बोल के पैसा मिट्टी है पैसा पत्थर है पत्थर पैसा है ऐसा बोलकर के पैसे को गंगा में बहा दे रहे हैं यहां पर मां शारदा है जो कि सब चीजों की संभाल रखती है जितने भी भक्त आते हैं उनके लिए अन्न का ये करना आहार प्रस्तुत करना जब स्त्री भक्त आती है बालक भक्त आते हैं वो फिर ठाकुर के ठाकुर जब उन इन लोगों के ऊपर में ज्यादा अत्याचार करेंगे तो यह बेचारे मां के पास में आएंगे। ठाकुर कहेंगे बच्चों को ज्यादा रोटी नहीं खिलाना रात को। यह गोपाल मां अघोरमणि देवी की कहानी कि वहां पर बलराम बाबू के घर गई थी और बलराम बाबू ने उनकी जो घर की स्त्रियां है। देखा कि यह तो बेचारी गरीब ब्राह्मणी है। घर में तो कुछ है नहीं खाने को। एक पोटली में सब कुछ बांध करके दे दिया। अभी वस्त्र होगा, यह जो अनाज होगा, तेल वगैरह होगा, जो भी है वो पोटली लेकर के यह गोपाल की मां ठाकुर के साथ में नौका में आ रही है। दक्षिणेश्वर तो ठाकुर ने जैसे ही वह पोटली को देखा समझ गए कि यहां से सब चीजें लेकर के आ रही है। अभी ठाकुर का तो है अपरिग्रह व्रत। कुछ भी परिग्रह ग्राह्य नहीं करना है किसी से। तो फिर यह गोपाल मां ने यह सब ले लिया तो उनके सामने कतराती नजरों से देखते हैं। नाराज होकर के कतराती नजरों से देखते रहते हैं। मुंह से कुछ बोलते नहीं है। तो गोपाल की मां बेचारी समझ गई कि अभी ठाकुर नाराज हो गए हैं। तो अभी क्या करेंगे? वह तो बड़ी दुखी होकर के जैसे ही नौका दक्षिणेश्वर में आई वैसे ही वह बेचारी गई सीधी मां के पास में नौबत में कहती है मां यह पुटली मुझे तो दी है कुछ गिफ्ट है उसमें उपहार वगैरह बलराम बाबू के घर से मिला है किंतु ठाकुर बड़े नाराज हो गए मैं इसको फेंक देती हूं गंगा में तो मां कहती है कि अरे उनको संसार के बारे में क्या पता है ठाकुर को कि किस तरह से कष्ट करके किया जाता है एक काम करो तुम इसको अपने पास में रखो तुमको को इससे कोई दोष होगा नहीं। तो देखिए कि ठाकुर और मां ब्राह्मण के बारे में क्या कहा जाता है? एक विशेषण है अव्यवहार्य अर्थात कि ब्रह्म किसी तरह का व्यवहार नहीं करता। किसी चीज के साथ में संलग्न नहीं होता। किसी ऑब्जेक्ट के साथ में ऑब्वियसली कि ब्रह्मन तो सब्जेक्ट है। ऑब्जेक्ट जैसा कुछ है ही नहीं। ब्रह्मण के साथ में यह सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डलिटी जो है वह तो माया के राज्य से प्रारंभ होती है। तो यह जो व्यवहार है वो सब व्यवहार क्या है? रिलेशनशिप या तो यह लेनदेन कब होता है? जब तो आपको तो दो लोक चाहिए दो पदार्थ चाहिए। तभी तो उसमें इंटरेक्शन होगा। यदि एक ही पदार्थ है तो किस चीज के साथ में इंटरेक्शन होगा? इंटरेक्शन होगा ही नहीं। वो बस अपने आप में स्थित होकर के रहेगा। इसीलिए ब्रह्मन के बारे में कहा गया है वह है अव्यवहार्य। तो किंतु देखिए कि हम लोग तो संसार में रहते हैं। हमको तो व्यवहार करना ही करना है। खाने का जुगाड़ करना है। शरीर के स्वास्थ्य की चिंता करनी है। परिवार जनों की चिंता करनी है। यदि साधु होकर के रामकृष्ण मिशन में आए हैं तो आपको यह जो जितना भी कार्य दिया जाता है रिस्पांसिबिलिटीज वो उसका निर्वाह आपको करना है। तो यह सब कुछ आपको करना है। तो फिर आप यदि अव्यवहार होकर के बैठे रहेंगे तो यह सब काम कैसे चलेगा? तो यदि व्यवहार करना है तो आपको शक्ति के इलाके में प्रवेश करना है और जिस तरह से शक्ति आपको मार्गदर्शन देती है शक्ति जिस तरह से आशीर्वाद देती है उस तरह से आपको इस जगत में रहना है तो जैसे ही जग ये व्यवहार के आपने उसमें प्रवेश किया जगत में वैसे ही शक्ति के इलाके में आ गए और यदि व्यवहार जिस दिन समाप्त हो गया उस दिन आप चले गए है ब्राह्मण के इलाके में ब्राह्मण के राज्य में तो यहां पे कि सदानानंद का घर है अन्न शून्य सदा अर्थात कि म एक तो म एक तो लिटरली इसका मीनिंग बैठता है कहां वो श्मशान वासी शिव और कहां यह लाडली उमा जो कि इतने प्रेम में पली बड़ी हुई है तो वह तो एक कंट्रास्ट है ही है जो कि हमको मां और ठाकुर के जीवन में दिखता ही दिखता है ठाकुर कहां वो काम कांचन त्यागी और कहां मां ये सोने के गहने पहन के रखती थी और देखिए लोगों की ईर्ष्या भी कैसी थी पता है ये मोस्ट प्रोबेबबली गोलापमा ने ऐसा कहा गोलापमा की योगेनमा मोस्ट प्रोबेबबली गोलापमा कि जब ठाकुर को कैंसर हुआ उस समय ठाकुर को जब ट्रीटमेंट के लिए ले जाया गया था ना उसके पहले की बात है वैसे ही ये जो भक्तों में ये जब बातें चलती है तो तो किस तरह से बात चलती है गुलाब मां कहती है कि देखो ठाकुर तो इतने बड़े काम कांचन त्यागी है किंतु मां को तो मैं देखती हूं यह सब सोने के गहने पहन करके रखती है तो इस तरह से कंट्रास्ट क्यों है मां मां को क्या यह शोभा देता है कि इतने बड़े त्यागी की अर्धांगिनी होकर के सहधर्मिणी होकर के वो इस तरह से सोने के गहने पहने यह क्या अच्छा दिखेगा गंभीरानंद जी के जीवन में हमने इसका ये कहानी पढ़ी थी जब हम पाठ कर रहे थे। उसका तो मां इतनी दुखित हो गई कि मां ने यह जो चूड़ियां है और एक दो गहने छोड़कर के यह जो नथ पहनती थी वगैरह वगैरह सब मां ने निकाल दिया। अभी देखिए कि यह कितना बड़ा अपराध हमने मां के साथ में किया है। जो कि अन्नदात्री स्वयं है। उसको कहना कि आपके पास में वैभव क्यों है? तो यह तो अपराध हो गया ना और देखिए कि पता नहीं यही अपराध का फल कहो ना कि जो भी है ठाकुर ने अपने पर ले लिया और फिर गंभीरानंद जी कहते हैं इस घटना के मां को फिर इस इस दिन के बाद में ना मां ने सब गहने फिर कभी पहने नहीं क्यों अभी यदि ठाकुर की नजर में आता तो ठाकुर इमीडिएटली कहते जैसे कि अपने महासमाधि के बाद में मां अपनी चूड़ियां निकाल रही थी ठाकुर ने इमीडिएटली आकर के मां का हाथ पकड़ के कहा कि अरे यह तुम क्या कर रही हो? मैं मरा थोड़ी ना हूं। मैं तो एक कमरे से दूसरे कमरे में गया हूं। तो ठाकुर इमीडिएटली नोट करते और मां को तो गहने भी तो ठाकुर ने ही बनवा के दिए हैं। तो मां गहने नहीं पहनेगी। यह तो बहुत बड़ा अपराध हो गया। संसार में तो प्रलय आ जाएगा। तो ठाकुर यदि देखते नोट करते तो मां को इमीडिएटली कहते हैं और गुलाब मां को डांट भी देते हैं। ऐसा फालतू की बातें कर रहे हो। तो जो भी है किंतु अनफॉर्चूनेटली गंभीरानंद जी लिखते हैं कि इस घटना के बाद में मां को वो गहने फिर से पहनने कभी नहीं हुए। क्यों? ठाकुर को हो गया कैंसर और उनको ले ले जाया गया कोलकाता में ट्रीटमेंट के लिए। और फिर ऑब्वियसली है कि जब इतनी बड़ी आप नजर के सामने आन पड़ती है तो मां बेचारी किस तरह से वो गहने फिर से पहनेगी। तो अभी जैसे कि मां का चित्र हम देखते हैं फोटोग्राफ हम देखते हैं कि सिर्फ वह चूड़ियां पहन करके रही है। तो वही एक कुछ आभूषण मां ने इस घटना के बाद में पहने थे। देखिए कि कितना बड़ा यह अपराध जिसने भी इस तरह की यह कमेंट की होगी यह हुआ है तो जो भी है यहां पे एक तो वो लिटरल कंट्रास्ट है ही है कि कहां वो और लोग नोट भी करते थे इस तरह से कहां त्यागीश्वर ठाकुर और कहां पे यह भक्त जननी ये अन्नदात्री श्री श्री मां तो वो एक लिटरल कंट्रास्ट है ही है और फिर मेटाफोरिकल या तो फिलॉसोफिकल कॉन्ट्रा राष्ट्र भी कि ब्राह्मण यदि अव्यवहार्य है अर्थात कि किसी भी तरह की लेनदेन में किसी भी तरह के इंटरेक्शन में वह व्यापृत नहीं होते तो शक्ति है इस जगत की संचालिका या तो फिर जगत की नियमन करत्री शक्ति के इस इलाके में ही जो कुछ भी इंटरेक्शन होता है जो कोई भी व्यवहार होता है सब शक्ति के इलाके में ही होता है तो यह एक तो लिटरल मां के जीवन के साथ में ठाकुर के जीवन के साथ में जिस तरह से मिलता है वैसे ही फिलॉसोफिकली भी आप बैठ जाता है। जितना हम जाएंगे डीप में और ऑब्वियसली मां के जीवन में हम इसमें डीप में जा ही रहे हैं। गंभीरानंद जी ने इतनी सुंदर किताब लिखी है। प्रत्येक पहलुओं को बड़ा ही डिटेल में वो डिस्कस करते हैं महाराज जी। हम भी करेंगे। तो यह एक लाइन में यदि आपको मां और ठाकुर का यदि जीवन किस तरह से है प्रदर्शित करना है तो दिस इज वन लाइन कि सदानंदर घर अन्न शून्य सदा के रेखे छ तोर नाम टी अन्नदा तो एनीवे मैं मैं मैं सोच रहा हूं कि आगमनी ज्ञान के ऊपर में कुछ क्लास करेंगे क्योंकि इन सबके भीतर में इतने गढ़ तत्व है और खास करके देखिए हमको तो कोई शक्ति साधना की दृष्टि से यह सब आलोचना करने की आवश्यकता नहीं। मेरी वह क्वालिफिकेशन भी नहीं। शक्ति साधना का कोई ऐसा मैंने गहनता से अभ्यास नहीं किया। किंतु ठाकुर मां स्वामी जी खास करके मां के जीवन में तो शक्ति साधना अर्थात कि मां तो मां के जीवन को केंद्रित करके यह जो आगमनी गान या काली कीर्तन है खास करके आगमनी गान। तो किस तरह से मां का जीवन इस गान के ऊपर में आलोकपात कर सकता है। प्रकाश डाल सकता है। वो थोड़ा सा मैं सोच रहा हूं। यदि होगा म दुर्गा पूजा से पहले एक दो क्लास यदि होंगे तो हम करेंगे। तो
श्री रामकृष्ण की महासमाधि (1886) के पश्चात् रामकृष्ण संघ के प्रथम केंद्र वराहनगर मठ की स्थापना
एनीवे इस सप्ताह स्वामी जी का जीवन हम देख रहे हैं और जैसे हमने डिस्कस किया था मैं स्वामी जी का जीवन किसी कोई एक इंडिविजुअल किताब में से नहीं किंतु क्योंकि बात ऐसा है कि स्वामी जी का जो जीवन है इतना विस्तृत है जीवन और कार्य कि कोई एक किताब को अनुसरण करके आपको फुल पिक्चर मिलेगा नहीं। इसलिए बहुत सारी किताबों में से कंपाइल करके कलेक्शन करके मैं यह क्लासेस स्वामी जी के जीवन पे ले रहा हूं ऑलरेडी हमने और मैंने स्टार्ट किया है ठाकुर की महासमाधि के बाद से इससे होगा प्रॉब्लम क्या है हम लोग बड़े स्लो म स्पीड से चलते हैं यदि ठाकुर और स्वामी जी इस रिलेशन में यदि हम प्रवेश कर जाते हैं तो मुझे नहीं लगता कि इस लाइफ टाइम में हम उसमें से निकल पाते और और मैं और स्पेसिफिकली फोकस करना चाहता हूं स्वामी जी का जो मिशन एस्पेक्ट है कि किस तरह से उन्होंने ये पूरे रामकृष्ण संघ भारत और मनुष्य जाति ये ह्यूमैनिटी इसके भविष्य की क्या कल्पना की है स्वामी जी ने उस बात के ऊपर में मैं ज्यादा फोकस करना चाहता हूं। ठाकुर और स्वामी जी का जो जीवन है या ठाकुर और स्वामी जी का जो पूरा एक यह है प्रसंग वह हम जब ठाकुर का जीवन पाठ कर रहे हैं लीला प्रसंग में उस समय हम यह सब देख लेंगे। तो यहां पर मेनली ठाकुर की महासमाधि के बाद में प्रसंग प्रारंभ होते हैं। पहला चैप्टर हमने ऑलरेडी दे दिया और चैप्टर और पॉइंट मैंने बनाए हैं। तो चैप्टर पहला जो हमने ऑलरेडी देख लिया कि किस तरह से ठाकुर की महासमाधि के बाद में जो जो कुछ प्रसंग हुए दो-तीन प्रसंग मुख्य है। एक तो भक्तों के मन में मां शारदा के मन में विषाद फैल गया। वे लोग बड़े ही मायूस हो गए। उसी समय किंतु ठाकुर आकर के दर्शन देने की परंपरा प्रारंभ कर देते हैं। पहला तो दर्शन मां शारदा को महासमाधि के दिन ही दिया था और फिर दूसरा दर्शन स्वामी जी को कुछ ही दिनों के बाद में तीन-चार दिन के भीतर में स्वामी जी को भी दर्शन प्राप्त हुआ और इस दर्शन परंपरा से भक्तों के हृदय में भी फिर से एक तरह की आशा पुनर्जीवित हुई कि हां ठाकुर सदेह हमारे बीच में वर्तमान नहीं है। किंतु जैसे कि स्वर्ग में रहकर के या तो फिर हमारे हृदय में रहकर के हमको वो संचालित कर रहे हैं, प्रेरणा दे रहे हैं और हृदय में रहना यह भी लिटरल और मेटाफोरिकल दोनों है। मेटाफोरिकल तो हमको समझ में आता है कि ईश्वर भक्त के हृदय में रहते हैं। ठाकुर ने ही कहा कि भक्त का हृदय है ईश्वर का बैठक खाना। तो ब्रह्म भक्तों को बड़ी खुशी हुई थी। तो तो मेटाफोरिकल है ही है। किंतु लिटरल भी इतना सत्य है। हमने देखा कि जो ठाकुर की अस्थियां थी उस अस्थियों में से एक-एक कण ये सभी जो गुरु भाई थे डायरेक्ट डिसाइपल थे उन्होंने ग्रहण किया था और उस दिन रात को उनको गहन समाधि हुई थी। यानी कि ठाकुर लिटरली गुरु भाइयों के अपने त्यागी संतानों के हृदय में वर्तमान थे, विराजमान थे और उन्हीं के कंधों पे रामकृष्ण संघ की भविष्य किस तरह से निर्मित किया जाए, किस तरह से आयोजित किया जाए, इसका रिस्पांसिबिलिटी आन पड़ा था। और फिर यह अस्थियों को लेकर के जो कुछ भी यह हुआ प्रसंग वह भी हमने देखा। अभी बात प्रारंभ होती है द्वितीय चैप्टर सेकंड चैप्टर कि वराह नगर मठ की स्थापना उसमें भी हमने जो त्यागी संतानों के भविष्य को लेकर के जो डिबेट चल रही थी जो संसारी भक्तों का जो गृहस्थ भक्तों का जो मंतव्य था मतामत था और वो किस तरह से नरेंद्र के मत के साथ में क्लेश होता था वगैरह वगैरह हमने ऑलरेडी देख लिया उसके बाद में ठाकुर ठाकुर ही जैसे कि इस पूरी डिबेट का रेजोल्यूशन ला देते हैं। सुरेश मित्र को जाकर के सपने में आदेश देते हैं कि अरे मेरे संतान जो है दर-बदर भटक रहे हैं। तुम यहां पर मेरी पूजा कर रहे हो। मंदिर में बैठकर के जाओ जाकर के उनके लिए कुछ व्यवस्था करो। तो सुरेश मित्र दौड़ा दौड़ा आया। नरेंद्र उन्हीं के वो जो एक ही गली में एक ही स्ट्रीट में रहते थे। सिमुलिया सिमुलिया स्ट्रीट वहीं पे वो सुरेश मित्र का भी घर है। वहीं यह नरेंद्र का भी घर था। तो सुरेश मित्र इमीडिएटली दौड़ के नरेंद्र के घर में आया। कहा कि भाई इस तरह से ठाकुर ने आदेश दिया है। तुम लोग कैसे भी करके एक जगह का ठिकाना ठीक करो। एक ठिकाना ठीक करो कि जहां पे आकर के जहां पर ठाकुर के व्यवहार व्यवहृत सब चीजें रखी जाए। जैसे कि उनके वस्त्र है जैसे कि उनके जूते हैं वगैरह-वगैरह और फिर उनकी अस्थियां रखी जाए और नित्य नियमित पूजा चलती रहे। आप त्यागी संतान भी वहां पर रहो और हम गृहस्थ भक्तों के लिए भी एक हृदय में शीतलता प्राप्त करने का हृदय को म प्राण जुड़ाने का म बेंगली में जैसे कि कहते हैं एक हमको एक आस्ताना मिलता है एक अड्डा मिलता है हमको एक ऐसी जगह कि जब संसार के ताप से दग्ध हो जाए तो वहां पर आकर के ठाकुर की वही पुरानी बातें याद करेंगे मन को शीतलता प्राप्त होगी और काशीपुर में मैं जितना देता था वो इतना ही मैं आप लोगों को भी दूंगा। तो यह खुशखबर सुनकर के नरेंद्र और यह भवनाथ थे। नरेंद्र का मित्र उन दोनों ने संधान प्रारंभ कर दिया। भवनाथ ऑलरेडी वराह नगर एरिया में ही रहता था और दोनों ने मिलकर के वह जो पोड़ोबाड़ी अर्थात कि टूटा फूटा भूतिया मकान वो ठीक कर लिया। सस्ते में मिलता था तो टूटा फूटा मकान था। और फिर क्या है इन लोगों के मन में वैराग्य इतना था कि वैसे ही एक स्मशान वत एक जगह देख कर के एक साधु का जो एक सन्यासी का एक साधक का जो एक इनर एक अट्रैक्शन प्रकट होता है वह भी यहां पे था तो फिर उस पोड़ोबाड़ी या तो फिर टूटा फूटा भग्ना भूतिया घर इसमें आकर के सब लोग रहने लगे तो वो कहानी हमारी चल रही थी उसके बीच में ही है अभी हम सुरेश मित्र ने जैसे ही कहा तो वैसे ही यह लोग खरीद कर लिए या तो फिर भाड़े पर कर लिए। स्वामी जी कहते हैं कि देखो कि किस इसी तरह से सुरेश मित्र को ही इंस्ट्रूमेंट बना के सुरेश मित्र ने ही हमको यह घर का भाड़ा दिया था। मास्टर महाशय ने भी यह कथामृत में लिखा है कि तुम तुमको ही जैसे कि यंत्र स्वरूप बना के ठाकुर ने वराह नगर मठ की स्थापना करवाई। तो यहां तक पहुंचे थे। इसके बाद में थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं।
वराहनगर मठ के प्रथम निवासी
गंभीरानंद जी महाराज की युगनायक विवेकानंद किताब में से यह पैसेज जो है उसको मैं पढ़ रहा हूं। उसमें से कोट लिया है हमने। यह क्या कहते हैं गंभीरानंद जी? बाड़ी भाड़ा होया गले सुरेंद्र बाबू निर्देशानुसारे छोट गोपाल ठाकुर जिनिश पत्र शो कोई बाड़ी ते बाश कोते गलेन यह घर जब भाड़े पे हो गया मिल गया तब सुरेंद्र बाबू के निर्देश अनुसार उनके कहे अनुसार यह जो छोटो गोपाल है हुटको गोपाल जिसको स्वामी जी कहते थे वो ठाकुर के यह जो जितने भी चीज वगैरह है व्यवहृत वगैरह जो है सब सामान बलराम बसु के घर में पड़े हुए थे। बलराम बाबू के घर में यह सब रखा हुआ था। उसको लेकर के उस घर में गए। मठ में गए वराह नगर मठ में और वहां पे वास करने लगे। रहने लगे। आरताहार शंगे रोहिलेन शशि नामक एक पाचक ब्राह्मण तो उनके साथ में रहने लगे शशि नाम का एक ब्राह्मण जो कि वहां पर खाना बनाता था। रात्रे शरतो आशिया थाकी लेन उसी दिन रात को शरद भी अर्थात कि स्वामी शारदानंद भी आकर के रहने लगे ए द के नरेंद्र तारपाया तारकनाथ श फिरिया आशिया बलराम भवन नरेंद्र शहीद साक्षात कर लेन एवं तनी स्टेशन हो ते जे घोड़ा गाड़ी ते आशिया छिले से गाड़ी ते तत्णात नरेंद्र और राखा शहीद बराह नगर मठे उपस्थित होले पिछली बार जो हम डिस्क्रिप्शन पढ़ रहे थे। उसमें हमने देखा था कि जब यह घर भाड़ा करने की बात हुई है। उसी समय स्वामी जी ने नरेंद्र ने तारकदा को अर्थात कि भविष्य के स्वामी शिवंद जी महापुरुष महाराज को ऑलरेडी एक टेलीग्राम भेज दिया था। उस समय वे लोग वृंदावन कहीं पर थे कि आप आइए घर भाड़ा लेने की बात है। मठ बनाएंगे सब साधन भजन करेंगे। तो तारकदा भी उस समय प्रस्तुत होकर के बैठे थे। जैसे ही यह तार मिले एक टेलीग्राम मिले कि हां घर भाड़े पे ले लिया गया है तो वे इमीडिएटली वह कोलकाता आ जाएंगे। तो जब यह घर भाड़े पर सही में ले लिया गया तो दूसरा टेलीग्राम गया। साथ में ही तारकदा वहां पर कोलकाता आकर के उपस्थित हुए और जिस घोड़ागाड़ी में वह रेलवे स्टेशन से बलराम बाबू के घर आए थे नरेंद्र के साथ में मिलने के लिए उसी घोड़ा गाड़ी में बैठकर के नरेंद्र तारकदा और राखाल भविष्य के स्वामी ब्रह्मानंद इस घर पर आकर के उपस्थित हुए। वराह नगर मठ में आकर के उपस्थित हुए तारक पूर्वे गृह त्याग करिया छिलेन सुतरान तिनी होलेन उक्त मठेर प्रथम स्थाई त्यागी अधिवासी तारक ने पहले ही घरत्या त्याग कर दिया था इसलिए वही हुए इस मठ के प्रथम स्थाई त्यागी अधिवासी त्यागी अधिवासी क्यों क्योंकि यहां पर ऐसा भी लिखा है कि यह छोटू गोपाल जो है वह उस बाड़ी में रहने के लिए गया था। देखिए यह जो नया मठ
रामकृष्ण मिशन, वडोदरा, के प्रारम्भिक दिनों की कहानी
प्रारंभ होता है और वहां पर रहने का जो सौभाग्य म केयरटेकर के रूप में जिनको मिलता है वे लोग बड़े सद्भाग्यवान हैं। वड़ोदरा की बात करता हूं। वडोदरा अर्थात गुजरात का एक सिटी है जहां पर स्वामी जी गए थे और वहां का राजा गायकवाड़। ये गायकवाड़ के संबंध में स्वामी जी ने कहा है। वेरी इंटरेस्टिंग। मुझे पता नहीं था। बहुत दिनों तक पता नहीं था। बात बाद बात में पता चला कि क्योंकि मेरा घर भी वड़ोदरा में है इसलिए कि किसी ने पूछा स्वामी जी को कि अच्छा आपने पूरा भारत फिर लिया घूम लिया तो आपको सबसे अच्छा राजा कौन लगा जो कि अपनी प्रजा की चिंता करता है वगैरह-वगैरह जो कि स्वामी जी के जो विचार थे कि राजा का मेन कार्य तो है प्रजा का रक्षण और उनका पालन पोषण और उनको शिक्षण वगैरह देना तो आपको सबसे अच्छा राजा कौन लगा तो इंटरेस्टिंगली स्वामी जी ने कहा कि वड़ोदरा के गायकवाड़ उस समय नाम था बरोड़ा इंग्लिश नेम तो बरोड़ा के राजा गायकवाड़ अभी आश्चर्य की बात यह है कि मैंने कहीं पे भी यह उल्लेख नहीं पाया कि स्वामी जी का यह राजा गायकवाड़ के साथ में कोई मुलाकात हुई है कि नहीं इस तरह का रिकॉर्ड मुझे अभी तक नहीं मिला होगा शायद किंतु मुझे नहीं मिला व्हाटएवर किंतु उनके जो दीवान थे उनके साथ में स्वामी जी का अच्छे से वार्तालाप हुआ था अच्छे से मुलाकात हुई थी और जब बरोड़ा उस समय का बरोड़ा आज का वड़ोदरा वहां पर जब स्वामी जी गए थे तो दिलाराम बंगलो बोलकर के एक जगह है। वहां पे स्वामी जी को रहने को निवास स्थान दिया गया था। अभी हुआ ऐसा कि बहुत सालों के बाद में अभी ये वर्तमान की बात करते हैं। मैं बात करता हूं ये 2005 की। ये 2005 में मैं ऑलरेडी बेलूर मठ में आ गया था ज्वाइन करने के लिए। मैं जब अपने घर में था तो वहां पे एक प्राइवेट सेंटर चल रहा था। तो प्राइवेट सेंटर में ही वो वहां के लोगों के साथ में मेरी मुलाकात हुई थी। यह भाव प्रचार का जो सेंटर होता है। किंतु मैं जब ज्वॉइ करने के लिए आया था बेलूरमठ में था 2005 में उस समय गवर्नमेंट ने यह दिलाराम बंगलो रामकृष्ण मिशन को दे दिया और वहां पर अपना एक ऑफिशियल सेंटर रामकृष्ण मिशन का प्रारंभ होने वाला था और उस समय अ निखिलेश्वरानंद जी महाराज पोरबंदर के अध्यक्ष थे तो हेड क्वार्टर से मैसेज गया कि आपको वड़ोदरा जाकर के चार्ज लेना है नए सेंटर का तो अभी क्या है कि यह पूरा तो एक ऑफिशियल प्रोसेस चल रहा है कि दिलाराम बंगलो हमको दिया जाएगा तो फिर तो पहले तो यह भूतिया मकान जैसा ही था पता नहीं यह एक पुराना एक था बंगलो जैसा अभी गेस्ट हाउस के रूप में वह यूज़ हो रहा था और इसका कोई मरम्मत मेंटेनेंस केयर वगैरह ऐसा कुछ ज्यादा कुछ नहीं था। तो वहां के जो प्राइवेट सेंटर है वो भाव प्रचार का जो केंद्र है वहां के वॉलंटियर्स को फिर वो जैसे ये हैंडओवर प्रोसेस कंप्लीट हो गया और ऑफिशियली एक इनोगोशन होगा क्सक्रेशन होगा। मठ सेंडर के रूप में आत्मस्थानंद जी उस समय थे तो आत्मस्थानंद जी का आगमन होगा। निखिलेश्वरानंद जी चार्ज लेंगे तो वो बीच में एक पीरियड था। कुछ समय का कुछ सप्ताह का कि अभी ऑफिशियली हमको बंगलो मिल गया है किंतु क्सक्रेशन होना है मठ मिशन सेंटर के रूप में वो अभी देरी है तो उस समय वहां के कुछ वॉलंटियर्स उनको यह फॉर्च्यून ग्रेट गुड फॉर्च्यून हुआ था कि उस बंगलों में जाकर के रात्रि निवास करने का और वहीं पर रहने का वो मेंटेनेंस देखना क्लीनिंग वगैरह करना वो तो माने मठ के हाथ में अपने ऑर्डर के हाथ में जब सेंटर आता है तो आपको तो बहुत कुछ उसको यह करना पड़ेगा ना अपग्रेड करना पड़ेगा परफेक्टली क्लीन होना चाहिए ठाकुर का एक शाइन एस्टैब्लिश करना है ठाकुर मास्वामी जी के फोटो क्सक्रेशन तो उसी दिन होगा जिस दिन रिवर्ड आत्मस्थानंद जी आएंगे किंतु मने आपको व्यवस्था सब कुछ रेडी कर देनी है तो वो व्यवस्था करने के लिए कुछ भक्तों को वहां पर रहने का मौका मिला था उस भक्तों में से एक लड़का जो कि बाद में अपने यहां पर साधु भी हो गया उसने मुझे कहा था कि महाराज देखिए मुझे वहां पर रहने का मौका मिला था और पता है कि अभी यह यहां पर स्वामी जी भी रुके थे और अभी यह अपना सेंटर भी होने वाला है। तो वहां पर मैं रात को रहता था। इट वास सच ए पीसफुल फीलिंग। और देखिए त्यागी लड़का है तो भविष्य में साधु होने वाला है। अभी तो भले ही चाहे वो अपने घर में रह रहा है। तो ऑलरेडी ठाकुर मां स्वामी जी के प्रति भक्ति भी है और त्याग के बीज भी उसके हृदय में लग गए हैं। उस समय ठाकुर ने ऑलरेडी उसको बेचारे को ब्रेन वाश कर दिया है। तो वो कहता था कि मुझे वहां पर उस समय में अकेला रहता था कि पूरे बंगलो में। रात को दिन में तो दूसरे लोग आएंगे। रात को जैसे मुझे में एज अ केयरटेकर अकेला रहना पड़ता था कुछ समय के लिए और पूरी रात इतनी आनंद में जाती थी तो मैंने कहा देखो भाई तुम तो बड़े नसीबदार हो इवन दो कि मैं उसी शहर से हूं यह पूरा प्रोग्राम है मैं तो देख नहीं पाया रिवड़ आत्मस्थानंद जी आए थे सब क्सक्रेशन हुआ था हमको एज ए ऑफिशियल सेंटर स्टार्ट हुआ उस समय मैं बेलूर मठ में था तो ऑब्वियसली वहां पर जाने का कोई प्रश्न नहीं सो आई टोल्ड हिम मैंने उसको कहा कि यू आर वेरी फॉर फर्चूनेट कि तुमको एक मठ स्टार्ट हो रहा है तो तुम तुम्हारा वहां पर कंट्रीब्यूशन है कि ये तुमने उसको स्टार्ट करने में सहाय की तो यहां पे भी देखिए कि
वराहनगर मठ के प्रथम निवासी 2
कहा है ये छोटू गोपाल जो है उसने पहली बार वो वहां पे वो सुरेंद्र बाबू के निर्देश अनुसार बलराम भवन में जो सब ठाकुर की व्यवहृत जो सब आइटम्स थी वस्त्र होंगे जूते होंगे अभी आप यदि बेलूर मठ जाएंगे पब्लिक सेलिब्रेट अर्थात कि ठाकुर तिथि पूजा जिस दिन को होती है उसके बाद में जो पहला संडे जो आता है मार्च में आता है ऑलमोस्ट मोस्टली फरवरी के लास्ट वीक में या तो फिर मार्च के फर्स्ट सेकंड वीक में ऐसा जो ठाकुर की तिथि पूजा होती है उसके बाद का जो फर्स्ट संडे है वहां पर पब्लिक सेलिब्रेशन होता है तो उस पब्लिक सेलिब्रेशन में ठाकुर की ये जो व्यवहार जो कुछ-कुछ चीजें हैं जो कि म्यूजियम में रखी होती है कुछ-कुछ और कुछ-कुछ है कि ठाकुर के बेडरूम में रखी है मेन टेंपल में तो उनको सबके सामने वहां पर डिस्प्ले के लिए रखा जाता है और आई थिंक काफी सालों से ये आत्मा प्रियानंद जी का रिस्पांसिबिलिटी है कि म उसको केयर करें म कुछ चोरी ना हो जाए वगैरह ऑलरेडी ठाकुर की बहुत सारी चीजें बलराम भवन में ही चोरी हुई थी और वहां से ये ठाकुर की काफी चीजें चली गई थी तो वो फिर से ना हो जाए मां की ये जो चूड़ियां है म वर्ल्ड फेमस चूड़ियां अनफॉर्चूनेटली बेलूर मठ म्यूजियम में से वो चोरी हो गई। तो देखिए कि ऐसे भी पागल लोग होते हैं। तो जो भी है अभी सोने का दाम नहीं है ना उसका तो हिस्टोरिकल वैल्यू है। अभी चोर कहेगा कि आप वापस ले लीजिए तो चूड़ियों का जो दाम होगा उससे हजार गुना देकर के हम वापस लेने को तैयार हैं। किंतु क्या करेंगे? व्हाटएवर। तो इस तरह से यह एक सीरियस रिस्पांसिबिलिटी मिलना कि ठाकुर के यह सब वस्तुएं लेकर के वराह नगर मठ आना और वहां पर रहना जब तक ये सब त्यागी संतान इकट्ठा नहीं हो जाते सच अ ग्रेट ओनर तो वहां पे वो छोटू गोपाल भी गया रात को शरद भी आ गया यहां पर महापुरुष महाराज भी आ गए और राजा राजा महाराज और स्वामी जी को लेकर के वह भी मठ में आकर के रहने लगे और इसलिए यहां पर गंभीरानंद जी कहते हैं स्पष्ट लिखते हैं कि मठ के प्रथम स्थाई त्यागी अधिवासी थे तारकदा अर्थात कि ये महापुरुष महाराज बूढ़ो गोपाल इहार कोनो एक समय मठे आशिले बूढ़ो गोपाल अर्थात कि अद्वैतानंद जी महाराज इसी को एक समय में मठ में आए कालियो एक मास परे वृंदावन हो ते फिरिया मठवासी होयलेन काली अर्थात स्वामी अभदानंद जी भी एक महीने के बाद में वृंदावन से वापस आकर के मठ में रहने लगे। नरेंद्र शशि राखाल शरद बाबूराम एवं निरंजन प्रभुतिर प्रभुतिर ओ मठे जाता चलिते लागीो नरेंद्र शशि राखाल शरद बाबूराम और निरंजन इन सबका भी मठ में आना जाना चलने लगा लाटू और जोगिंद्र तखनो वृंदावन है लाटू और योगिन महाराज उस समय वृंदावन में थे उस समय भी वृंदावन में थे वृंदावन में क्यों क्यों? क्योंकि मां वहां पर गई थी। ठाकुर की जो ठाकुर का यह जो ये है शोक उनके पंचमहाभूत के देह त्याग करने का जो शोक है उससे निवारण प्राप्त करने के लिए बलराम बाबू ने मां को वृंदावन भेजा था और साथ में यह सब त्यागी संतान भी गए थे। तो उस समय यह लाटू और काली उस समय भी उस समय वहां पर वृंदावन में ही थे। लाटू और योगिन उस समय वृंदावन में ही थे ए रूप आश्रयहीन
कौन साधु बन सकता है? - वह जो आत्मरक्षा के प्रति पूरी तरह लापरवाह है
ओ सहाय शल शून्य काली लाटू तारक ओ बुढ़ो गोपाले बाशोपयोगी स्थानेर व्यवस्था करा मठ स्थापने अन्नतम उद्देश होइले क्रमे उहार अधिबासी शंखा बाड़ी ते लागीो इस तरह से आश्रयहीन और सहाय संबल शून्य आश्रयहीन अर्थात कि रहने रहने के लिए कोई घर नहीं था। ऑलरेडी घरत्या त्याग करके इन लोगों ने काशीपुर में आकर के ठाकुर की सेवा में सब कुछ लगा दिया था। घर वापस जाने की कोई चिंता नहीं की थी। घर ऑलरेडी त्याग कर दिया था। और सहाय संबल शून्य अर्थात कि घर से पैसा नहीं लेना है। नौकरी फोकरी यदि है तारकदा की वह सब त्याग कर देना है। सब कुछ समर्पण करके काशीपुर में आकर के ठाकुर की सेवा में जिन्होंने अपना मनोनिवेश किया था या तो फिर जीवन समर्पित किया था। इस तरह के कौन थे? काली था, लाटू था, तारक और बूढ़ो गोपाल। अभेदानंद जी, अद्भुतानंद जी, महापुरुष महाराज और अद्वैतानंद जी इन लोगों ने चार लोगों के पास में अभी वापस जाने के लिए कुछ बचा नहीं था। तो उनके वास के लिए निवास के लिए उपयोगी स्थान की व्यवस्था करना मठ की स्थापना का एक मुख्य उद्देश्य तो था ही था। किंतु उसके बावजूद जिन लोगों के पास में घर था वे लोग भी धीरे-धीरे करके मठ में ही अपना ज्यादा से ज्यादातर समय बिताने लगे। देखिए यह जो बात कही है ना आश्रयहीन और सहाय संबल शून्य यह बड़ी इंपॉर्टेंट है कि ईश्वर प्राप्ति के रास्ते में आगे कौन बढ़ सकता है तो अभी आप यह रामबाबू वगैरह की तरह यह सोचेंगे कि हां मेरी नौकरी चलती रहे यहां पर मैं ठाकुर की सहाय भी करता रहूं अब ठाकुर का तो मृत्यु निश्चित है महासमाधि निश्चित है कुछ समय के बाद में तो फिर से हम अपनी नौकरी प्रारंभ कर देंगे तो ऐसा जो कैलकुलेटिंग बुद्धि वाले जितने भी थे वे लोग घर संसार में ही रह गए और इन लोगों ने बूढ़ों उम्र का भी कोई भेद नहीं है। शादीशुदा है कि नहीं है उसका भी कोई भेद नहीं है। देखिए जो चार नाम यहां पर लिए गए हैं उसमें से दो तो मैरिड थे। हालांकि निश्चित पत्नी का वियोग हो चुका था। किंतु विवाह तो एक बार किया था। था बूढ़ो गोपाल म अद्वैतानंद जी महाराज और तारक दान है तो उसके बावजूद कि एक संसार के भीतर में थे माने ऊपर ऊपर से तो थे किंतु जब ठाकुर का यह परिस्थिति आन पड़ा लीला संवरण की ओर ठाकुर आगे बढ़ने लगे तब उनको यह पता चल गया कि यदि आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करना है तो सब त्याग करके ठाकुर की सेवा में ही मनोनिवेश करना होगा ठाकुर की सेवा में ही तन मन धन सब लगा देना होगा। तो इस तरह के जो थे उस तरह के चार थे। अभी देखिए यहां पर ठाकुर क्या कहते हैं कि साधु या साधक ठीक ठीक कौन बन सकता है कि खजूर के पेड़ से दोनों हाथ छोड़कर के जो छलांग लगा सकता है वो ठीक-ठीक साधु हो सकता है। खजूर जो है अह बंगाली शब्द खिजूर और हिंदी में कहेंगे तो खजूर या तो फिर डेड तो उसका जो पेड़ होता है लंबा होता है तो उसके ऊपर में से यदि आपको जंप लगाना है तो आप समझ लीजिए जमीन पर गिरने से हाथ पैर टूटने ही वाले हैं तो इस तरह के आप यदि आप देखेंगे ना वो नारियल तोड़ने के लिए ना कि इस तरह के लंबे पेड़ पर जो चढ़ते हैं वे लोग हमेशा एक रस्सी की सहाय लेकर के चढ़ते हैं जिससे कि क्या होगा हाथ पैर फिसल भी जाए तो यह रस्सी जो उनको पकड़ करके रखती है। आपने वह वीडियो भी देखे होंगे। अब हमारे लिए तो वीडियो देखना है। जो लोग गांव या इस तरह की जगह पर रहते होंगे उन्होंने तो रियल लाइव देखा होगा। किस तरह से वो रस्सी जो है वो पेड़ के साथ में और अपनी कमर के साथ में बांध देते हैं। फिर जैसे वह धीरे-धीरे करके ऊपर चढ़ते हैं। हाथ और पैरों की सहाय से वैसे ही रस्सी को भी ऊपर ऊपर खींचते रहते हैं। तो हाथ और पैर कभी स्लिप हो भी गए तो रस्सी उनको बचा करके रखेगी। इस तरह का दृश्य तो बड़ा कॉमन है। रूरल एरिया में भी और आजकल तो YouTube पे भी देखने को मिल जाएगा। तो ठाकुर कहते हैं बिना रस्सी की सहाय के जो इस तरह से ईश्वर रूपी फल प्राप्त करने के लिए इतने लंबे पैर पर चढ़ सकता है और हाथ पैर फिसलेंगे और गिरेगा तो मन में यह भरोसा रहता है कि ईश्वर ही उसको बचा लेंगे। तो वही आदमी ठीक साधक या साधु हो सकता है। जब तक मैं रस्सी की सहाय रखता हूं तब तक यह अंदेशा है मुझे कि मां मेरा इस मेरी रक्षा करेगी कि नहीं करेगी। जब तक यह संदेह का एक म तिनका भी अपने मन में है तब तक जो है मां फिर रक्षा करने के लिए नहीं आएगी। जैसे वह फेमस कहानी ठाकुर की कि एक आदमी जा रहा था। धोबियों ने कपड़े सुखाए हैं। पैर पड़ गया। धोबी लोग उसको मारने को गए तो यहां पर भगवान दौड़े दौड़े गए उसकी रक्षा करने के लिए। किंतु थोड़ी ही देर में वापस आ गए। तो देवी ने पूछा क्यों भगवान आप गए और वापस भी आ गए? तो उन्होंने क्या उत्तर दिया? मेरा भक्त है तो उसकी रक्षा करनी मेरी फर्ज है। तो भी यह तो मारने के लिए आ रहे थे उसको। किंतु जैसे ही उसने अपने स्वब बचाव में स्वर के लिए पत्थर उठा लिया। तो वैसे ही मैं वापस चला आया। तो यह स्व बचाव में पत्थर नहीं उठाना या तो फिर यह बिना रस्सी की सहाय के यह ईश्वर रूपी फल प्राप्त करने के लिए लंबे पैर पर चढ़ना और हाथ पैर फिसलने से मां स्वयं रक्षा करेगी यह भरोसा होना तभी ठीक-ठीक साधक या साधु हुआ जाता है। तो वैसे ही ठाकुर की जब यह अंतिम अवस्था अंत्य लीला अहम प्रभानंद जी की किताब है श्री श्री रामकृष्ण अंत्य लीला तो यह ठाकुर की अंत्य लीला जब चल रही थी उस समय ये चार थे कि जिन्होंने सब कुछ छोड़ दिया कि अभी वापस जाना नौकरी करना अपना एक घर रखना कोई जरूरत नहीं है ठाकुर के श्री चरण में आ जाते हैं बाद में ठाकुर जैसा करेंगे वैसा करेंगे तो इस तरह के जो चार थे लाटू तारक बूढ़ो गोपाल और काली लाटू तारक और बूढ़ो गोपाल तो उनके लिए सर्वप्रथम रहने के लिए कोई जगह मिले इस उद्देश्य से पहले तो यह मठ की स्थापना की गई किंतु एक बार जैसे ही मठ की स्थापना हो गई उसके बाद में जिन लोगों का घर अभी भी था तो वे सभी त्यागी संतान धीरे-धीरे करके मठ में आना जाना करने लगे और कुछ समय के बाद में प्राय सभी वहां पर परमानेंटली रह गए। नरेंद्र के बारे में बाद में आएगी
वराहनगर मठ के दिनों की रूपरेखा
बात कि वह नरेंद्र को तो यह मामला मुकदमा था घर का। उसके लिए बीच-बीच में जाना पड़ता था। किंतु धीरे-धीरे करके समय ऐसा आया कि नरेंद्र ज्यादातर समय मठ में ही रहने लगा। और फिर ऐसा समय आया कि रात को मठ में ही रहेगा। दिन में फिर काम के लिए जाएगा। और फिर हमको तो पता है कि आखिर में सभी लोग परमानेंटली मठ में रह ही गए थे। कब तक? जब तक कि यह बलराम बाबू और सुरेश बाबू इन दोनों का निधन ना हो गया और मठ में जो आर्थिक सहाय इन दोनों के माध्यम से मिल रही थी वह जब तक बंद ना हो गई तब तक सभी गुरु भाई है इकट्ठा होकर के मठ में रहे थे किंतु जैसे ही यह आर्थिक संकट सर के ऊपर आन पड़ा तो फिर से यह मठ जैसे कि टूट गया टूट गया इस अर्थ में कि स्वामी जी ने ही एनकरेज किया कि अभी आर्थिक सहाय तो है नहीं तो चलो हम पूरे पूरे भारत में बिखर जाते हैं। वैसे ही तो हृदय का अंतर का आह्वान है सन्यासी के हृदय का कि जहां पर ईश्वर पुकारेंगे वहां पर निसंबल होकर के घूमेंगे। बिना किसी भरोसा माने बिना किसी सहाय के घूमेंगे। तो वो अंतर की आह्वान सुनकर के प्रवजजा तो सभी भक्त त्यागी संतानों ने प्रारंभ की वो ऑलमोस्ट 1889 1890 1888 उस समय की बात है किंतु वो जो अभी ये 86 से लेकर के ये 89 तक का ये जो पीरियड है 86 से 87 88 89 ऑलमोस्ट 3 साल का ये 3 साल की घटनावली जो है उसका अभी हम एक के बाद एक धीरे पाठ करेंगे। बहुत सुंदर-सुंदर प्रसंग है वराह नगर मठ के बारे में। अनफॉर्चूनेटली बहुत सारी स्मृति कथाएं उपलब्ध नहीं है। बाद में जब ये अपने विरजानंद जी महाराज है, शुद्धानंद जी महाराज है। इन लोगों का जब आगमन हुआ तो वे लोग पहले तो वराह नगर मठ में आए थे। तो वहां से कुछ-कुछ वर्णन हमको मिलता है। किंतु ये जो इनिशियल डेज है वराह नगर मठ के और वैसे भी प्रॉब्लम क्या था कि विजानंद जी शुद्धानंद जी जब आए बाय दैट टाइम स्वामी जी तो मठ त्याग करके प्रवृजजा के लिए निकल गए थे तो स्वामी जी के रहते-रहते जो मठ था उसका विवरण हमको मिलता है मोस्ट ऑथेंटिक विवरण हमको ऑब्वियसली मिलता है कथामृत में मास्टर महाशय बीच-बीच में आकर के रहते थे और बड़ा सुंदर विवरण उन्होंने दिया है। तो वह तो विवरण हम देखेंगे ही देखेंगे। साथ में ही एक जो सोर्स है जिसको कि इतना ऑथेंटिक नहीं समझा जाता वह है स्वामी जी के खुद के ही छोटे भाई महेंद्रनाथ तो महेंद्रनाथ या तो फिर मोहिन बाबू जैसे उनको सब मठ में पुकारा करते थे तो मोहिन बाबू की ये जो रेमिनेशंस है वह एक किताब में वर्णित है श्रीमद स्वामी विवेकानंदर जिबोनेर घटनावली तो उस किताब में बहुत सारे प्रसंग है वराह नगर मठ तो वह प्रसंग हम देखेंगे। ऑथेंटिसिटी वगैरह की चिंता हम नहीं करेंगे उस समय। बस एक जो स्मृति कथा का आनंद होता है वो रस माधुर्य का आस्वादन हम सिर्फ करेंगे। तो अभी कल से यह पूरा वराह नगर मठ का ये जो स्मृति कथा है वगैरह प्रारंभ होगा। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
स्वामीजी अखण्ड के राज्य में रहते थे। जगत कल्याण के लिए उन्हें संसार में लाना में ठाकुर को बड़ी महेनत करनी पड़ी होंगी।
अभी यह जो बलभद्रानंद जी है ना उन्होंने एक लेक्चर दिया है नरेंद्र काली मैनेज अर्थात कि वो फेमस घटना कि नरन ने मां काली को स्वीकार किया फिर उसके बाद में वो जो डिवोटी कुछ गए थे ना वहां दक्षिणेश्वर ठाकुर बड़े ही खुशी होकर के उनको कहते हैं नरन काली मैने नरन काली मैनेज से तो अच्छा सुंदर उनका बलभद्र जी का प्रेजेंटेशन स्पेशली जब बेंगली में बोलते हैं बड़ा अच्छा होता है तो मैं सुन रहा था तो कंट्रास्ट थ्रो करते हैं कि किस तरह से तोतापुरी ने काली को माना और किस तरह से नरेंद्र ने काली को माना तो कहते हैं कि तोतापुरी ने काली को माना तो वो भी तो ठाकुर को बड़ा खुशी हुआ था किंतु नरेंद्र ने जो काली को माना तो ठाकुर की खुशी जैसे छलक उठती है। बार-बार वो भक्तों को जाकर के कहते हैं वो जो रात को सोने को गए थे ना तो उनको उठाते हैं बीच-बीच में उठाते हैं कि देखो नरेंद्र काली मैनेज है। नर काली मैनेज है। वो फेमस वो रेमिनेशनंस है। तो बलभद्रानंद जी कहते हैं क्यों इतना डिफरेंस क्यों है कि तोतापुरी ने काली को स्वीकार किया तो ऑब्वियसली ठाकुर को तो यह खुशी हुई होगी कि उनकी साधना की परिसमाप्ति हुई। किंतु नरेंद्र ने जो माना काली को तो इतना जो उनकी खुशी छलक उठती है। व्हाट इज द रीज़न? तो नरेंद्र के माध्यम से उनको पूरा कार्य करवाना है। इसलिए नरेंद्र को कैसे भी करके कान पकड़ करके काली के पास में लेकर आना है। खुद तो अव्यवहार्य है तो तो नरेंद्र के माध्यम से सब करेंगे। नहीं तो ठाकुर का स्ट्रेटेजी कैसा था? देखिए वो भी तो ठाकुर का चालाक ही बड़ा था। एक छोटे बच्चे के रूप में गए। देखिए अखंड में हो कि कोई भी हो। बच्चों के प्रति एक स्नेह ममता सभी का रहता है। तो ठाकुर भी ऐसा वो ब्रेन वाश करने का टेक्निक है। सब छोटे बच्चे के रूप में गए। जैसे कि उसके ऊपर में ममत्व प्रकट हो। फिर जैसे ही ममत्व प्रकट हो गया अभी गुजराती में कहते हैं ना कि आंगड़ी आपो तो हाथ पकड़े म खास करके तोतापुरी के साथ कंट्रास्ट करें मैंने ऐसा कंट्रास्ट कभी सोचा नहीं था ये बहुत अच्छा उन्होंने कंट्रास्ट किया तोतापुरी भी काली को माने हैं और नरेंद्र ने भी काली को माना है पूरा भविष्य बदल
नरेन द्वारा काली को स्वीकार करना मानवता के लिए कितनी महत्वपूर्ण घटना थी!
गया ना मनुष्य समाज का पूरा भविष्य बदल गया आज आप प्री क्रिश्चियनिटी यूरोप को देखें और पोस्ट क्रिश्चियनिटी यूरोप को देखें माने आसमान जमीन का फर्क दिखेगा प्री इस्लामिक अरेबिया एंड पोस्ट इस्लामिक अरेबिया माने मिडिल ईस्ट है ना वो कहां वो जंगली ट्राइब्स थी और कहां वन ऑफ द बिगेस्ट एंपायर इन द हिस्ट्री ऐसा उन्होंने खड़ा कर दिया ये फथ का जो पावर है ना मनुष्य से सब कुछ भुला देता है आज हमारे पैर में कांटा चुभेगा ना और एक बूंद खून भी निकलेगा हम रोना शुरू कर देंगे सर पर हाथ देके बैठ जाएंगे और जब फेद हृदय में प्रवेश करता है तो एक अर्ली क्रिश्चियन को बोला गया कि रनाउंस जीसस तो नहीं करेंगे जीसस को रनाउंस नहीं करेंगे तो जिंदा स्टेक पे जला देते थे हंसते-हंसते जल जाते थे जीसस को रनाउंस नहीं करेंगे सो वो कहां से आता है वो सफरिंग की शक्ति कहां से आती है ओनली फेथ कैन गिव यू दैट पावर
जिस भाषा में हमारा साहित्य लिखा गया है, उसी भाषा में उसे पढ़ने का अपना ही महत्व है।
सहाय संबल शून्य देख लेता हूं देख लेता हूं देख लेता हूं क्या है हां आश्रयहीन सहाय संबल शून्य अब मुझे यह सब देखिए ओरिजिनल में पढ़ने का यह फायदा है कि उन्हें प्रॉपर वर्ड मिलते हैं। ट्रांसलेशन में पता नहीं क्या किया होगा उसका। मैंने आपको बताया था ना गुजराती का जो प्रथम ट्रांसलेट हुआ था कंप्लीट वर्क्स तो डिक्शनरी देख के किया था सब कुछ प्रोफेसर को बिठाया था इन 1963 स्वामी जी का सेंटनरी चल रहा था तो गुजरात गवर्नमेंट ने पैसा दिया राजकोट आश्रम को कि कंप्लीट वर्ड्स ट्रांसलेट करके पब्लिश कीजिए। बाय दैट टाइम एक्चुअली क्या है कि कुछ-कुछ पोर्शन तो ये सस्तु साहित्य है अखंडानंद का वहां से कुछ हो गए थे और हमने भी यह छुटकमुटक कर्म योग वगैरह किया था किंतु जो कंप्लीट वर्क्स था वो एस सच नहीं हुआ था और इट्स अ बिग टास्क तो कहा कि ठीक है तो उस समय मोस्ट प्रोबेबबली भूतेश आनंद जी ही थे वहां पे तो भूतेश आनंद जी के गाइडेंस में कुछ प्रोफेसर थे ये ये आई थिंक नवजीवन प्रेस के ही कुछ लोग होंगे तो जो भी है अभी तो उन्होंने स्टार्ट किया ट्रांसलेशन अभी अभी क्या है? भूतेश आनंद जी इज नॉट ऑलवेज अवेलेबल एव्री वर्ड के लिए प्रत्येक शब्द के लिए बड़ा काम है तो आपको फटाफट और क्या फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग है नहीं इन लोगों का जो लोग कर रहे हैं वे लोग को लिटर लिटरेचर के लोग हैं इंग्लिश बेंगली आती है गुजराती अच्छे से आती है तो कुछ-कुछ शब्द डिक्शनरी देकर ट्रांसलेट किया है तो वो फेमस स्टेटमेंट कि दंट इज अवेकनिंग आफ्टर अ थाउजेंड इयर्स स्लीप हजार साल की निद्रा के बाद में यह जॉइंट उठ रहा है भारत के बारे में स्वामी जी कहते हैं लेक्चर फ्रॉम कोल नंबर टू अल्मोड़ा में तो अभी जॉयंट शब्द है तो उसका ट्रांसलेशन क्या होना चाहिए एक विराट महामानव ऐसा कुछ होना चाहिए कि विराट शक्ति थी 1000 साल से सुशुप्त थी तो अभी फिर से जागृत हो गई है तो अभी जॉइंट का अभी उनको समझ में नहीं आया कि क्या ट्रांसलेट करें। डिक्शनरी में देखा तो जॉइंट का अर्थ लिखा है राक्षस। तो कंप्लीट वर्स में लिख दिया कि 1000 साल के बाद में राक्षस फिर से जागृत हो गया है। तो गवर्नमेंट के प्रोजेक्ट में क्या है कि आपका डेडलाइन है पैसा यूटिलाइज करना है बाय मर्चेंट वगैरह वगैरह जो होता है ना वी
इससे बढ़िया अनुवाद तो ChatGPT भी कर सकता है!
विल हैव टू सी म ये सब देखिए वो स्वामी जी का कंप्लीट वर्क्स डाल के देख किंतु क्या है यहां पे पता है ना बहुत कुछ कॉन्टेक्स्चुअल है अब जैसे कि देखिए हमने वो नोटबुक एलएम के बारे में देखा राइट कि हम अपना जो सोर्स डालते हैं उसको मल्टीलिंगुअल करके देता है तो वो क्या है कि जो सोर्स डाला है हमने उसी के कॉन्टेक्स्ट पे वो लैंग्वेज ठीक करता है। तो इट इज़ मच मोर एक्यूरेट क्योंकि हमने उसको यह फोर कॉर्नर दे दिया है कि इसी के भीतर में तुमको सब कुछ करना है। अभी ये जनरल जो चैट ये रहते हैं एआई वहां पे क्या पूरे इंटरनेट को रेफर करता है। तो कहां से क्या लेके आएगा ठीक नहीं। बट एआई का इतना तो अभी है यूटिलिटी मतलब पावर है कि यदि हम उसको सोर्स दें तो सोर्स के बेस पर वह करके देगा।
जैसा आपने कहा, यदि हम आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना चाहते हैं, तो हमें बिना किसी सहारे के खजूर के पेड़ से कूदने में सक्षम होना चाहिए। वह क्या है जो हमें ऐसी शक्ति देता है? क्या यह ज्ञान है या भक्ति?
अब जैसे देखिए हमारे लेवल पर क्या है कि नॉलेज इज नॉट इनफ। ठाकुर ने कहा ना कि जो ज्ञान है वह पुरुष है, भक्ति स्त्री है। तो अब उस समय की जो बात है कि जो पर्दा प्रथा वगैरह थी कि पुरुष जब जाएगा किसी घर पे तो वो बाहर के वो जो बैठकखाना है वहीं तक उसको प्रवेश मिलेगा। किंतु स्त्री है वह अंदर महल तक जा सकती है। अर्थात कि घर का वो जो सेंटर है वहां तक स्त्री जा सकती है। पुरुष को नहीं जाने देंगे। सो ठाकुर के इस दृष्टि से तो क्लियर है कि नॉलेज जो है अप टू वन एक्सटेंट ही हमको ले जाएगा कि दो हाथ पैर छोड़कर के गिरेंगे तो मां बचा लेगी किंतु वो नॉलेज इज नेवर इनफ नॉलेज सबको है किंतु ऐसा करता कौन है? सो अल्टीमेटली जो लास्ट माइल जो है वो तो आपको फेद ही ले जाता है। सो दैट इज वन थिंग किंतु अब जैसे यह हमारे केस में है। ठाकुर वगैरह का उदाहरण में बात क्या है? या तो फिर जो उच्च कक्षा का साधक है उनके जीवन में क्या है कि शुद्ध ज्ञान शुद्ध भक्ति एक जैसे ठाकुर कहते हैं तो शंकराचार्य का जो प्योर ज्ञान मार्ग है उसको भी यदि आप ठीक-ठीक फॉलो करें देन इट विल गिव यू इनक्रेडिबल करेज उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है एक्चुअली कि भारत का आध्यात्मिक इतिहास आप देखेंगे तो जो ज्ञान मार्गी साधु है उन्होंने जो त्याग तपस्या ततीक्षा की है उस उस माने इट इज बेजोड़ है कि शंकराचार्य की जो और शंकराचार्य से पहले भी जो यह जो त्याग की परंपरा है, त्यागी साधुओं की परंपरा है, प्रचंड त्याग एक म तोतापुरी स्वयं तो उसका उदाहरण है कि मां को तो बाद में स्वीकार किया किंतु जो पहले उन्होंने जो तपस्या की जो प्रचंड तपस्या की उसके लिए आपको क्या चाहिए? माने ये एक तरह का करेज है कि आपको अब जैसे ये क्रिश्चियन लोगों के साथ में करेज की ही बात करें तो ये अर्ली क्रिश्चियनिटी का मुकाबला करना मुश्किल है क्योंकि रोमन एंपायर ने ठीक किया कि उस समय का जो रोमन एपरर थे कि ये क्रिश्च क्योंकि उनकी अ इनएफिशिएंसी की वजह से पूरे रोमन एंपायर में जगह-जगह पे सब प्रॉब्लम हो रहा है। कहां फेमिन, कहां बार्बेरियन का अटैक, कहां यह कहां वह तो उन्होंने ठीक किया कि स्केप गोट तो कोई खोजना होगा। तो क्रिश्चियन लोगों को स्केप गोट बनाते हैं। उनको पकड़ पकड़ करके वो जो ये था उस समय का सीजर उसके वो गार्डन में ले आते थे। कहते थे रनाउंस जीसस। नहीं रनांस करें जिंदा जला देंगे। उस समय कितने लोगों ने यह सिलेलेक्ट किया कि हम लोग जिंदा जल जाएंगे बट वी विल नेवर रनाउंस जीसस। अभी भारतीय परंपरा में इस तरह का कष्ट तो किसी को मिला नहीं है। वो फेमस वो स्वामी जी का जो वार्तालाप है किसी ने स्वामी जी को कहा कि बुद्ध उनका मृत्यु हुआ बुढ़ापे की वजह से उनको तो क्रुसिफाई नहीं किया गया। तो स्वामी जी कहते हैं यह कोई भारतवर्ष के ऊपर में लांछन नहीं है भारतवर्ष का या तो फिर हिंदू धर्म की यह महानता आप कह रहे हैं कि जो हमारे साथ में जो जिनका ओपिनियन मैच नहीं हो रहा है उनको हमने बूढ़े उम्र तक जीने जीते रहने दिया उनको क्रिसिफाई नहीं कर दिया। सो उस तरह का कष्ट भारत में धर्म को लेकर के नहीं हुआ है। मुस्लिम आक्रमण के समय सब हुआ था। किंतु अदरवाइज नहीं हुआ है। इवन ब्रिटिश लोगों का भी पॉलिसी बड़ा क्लियर था कि इनके धर्म पर हाथ नहीं डालना है। एक एक्सपेरिमेंट करके उन्होंने देख लिया तो उसमें वो 1857 का जो फर्स्ट बैटल ऑफ इंडिपेंडेंस हो गया। उसके बाद में उन्होंने ठीक किया कि इनको लूटना है किंतु धर्म पे हाथ नहीं लगाना है। सो धर्म को लेकर के राजा लोग अत्याचार करें लोगों पे। ऐसा कुछ-कुछ केसेस में हुआ है। थ्रू आउट नहीं हुआ। बट जो धर्म के लिए जो कष्ट स्वीकार करना अपनी इंद्रियों के जो आकर्षण है उसके सामने खड़े रहना दैट इज फार ग्रेटर करेज कि आपको जिंदा जला दे एक बार आपने कष्ट सहन कर लिया फिर परमानेंटली आप स्वर्ग में चले गए सो दैट इज अ परमानेंट आपने वो स्वर्ग प्राप्ति के लिए कष्ट स्वीकार किया यहां पलपल इंद्रियों के जो विषय है आपको खींच रहे हैं पल-पल आपको जैसे कि फाइट करनी है व्हिच इज आई कंसीडर मुझे जो मेरा खुद का जिस तरह तरह से अनुभव जा रहा है। फार ग्रेटर फाइट इन फार ग्रेटर करेज। तो त्याग की परंपरा में आप देखिए कि त्यागी जो अपने वेदांतिक जो है साधक प्रचंड त्याग उन्होंने किया है। सो प्योर ज्ञान के माध्यम से भी यदि आप जाएंगे तो आपके पास में वो करेज प्रकट होगा जो कि आपको प्योर भक्ति देता है। तो वो दैट इज वन पार्ट। किंतु हम जैसे सामान्य लोग हैं। तो ठाकुर का यह जो कथन है हम सबके लिए अप्लाई होता है कि ज्ञान आपको एक अप टू एन एक्सटेंट ले जाएगा। बियों्ड दैट यू विल नीड फायरी फेथ। कि माने मृत्यु के मुख का सामना करना दैट विल रिक्वायर फायरी फेथ।
हम सुनते रहते हैं कि धधकती हुई श्रद्धा को जागृत करो। पर ऐसी श्रद्धा जागृत कैसे हो?
ना स्वामी जी भी यही बात कहते हैं ना। स्वामी जी कहते हैं विद्यासागर अपनी किताब में लिखते हैं कि चोरी मत करो। किंतु बच्चे को सिर्फ यह कहना कि चोरी मत करो। करो इट इज़ नॉट इनफ। उसके चरित्र का गठन किस तरह से करें कि वह चरित्र की शक्ति उसको चोरी करने से बचा है। सो उपदेश देने से तो कोई लाभ नहीं है। जब तक आपको उसको मींस ऑफ अप्लाइंग इट ना दे। सो दैट इज ऑब्वियस क्वेश्चन कि सिर्फ अदरवाइज विद्यासागर की किताब में सब कुछ लिखा है। किंतु दैट इज नेवर इनफ फॉर अस। हमको तो वो चोरी कैसे ना करनी? असत्य के रास्ते से कैसे बच के सत्य के रास्ते पर चले? थाउजेंड टेंप्टेशन आएंगे। उसका सामना कैसे करें? चरित्र की शक्ति जब तक नहीं मिलती कुछ काम का नहीं। सो तो स्वामी जी ऑब्वियसली कहते हैं और देखिए उत्तर वैसे तो सहज है अपना लोगो है ही है। कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान चारों का यथाशक्ति अनुष्ठान करने से यह मिल जाएगा। किंतु देखिए मैं अपना खुद के एक्सपीरियंस से बताता हूं। मैंने घर छोड़ा था। मेरे मन में थोड़ा सा भी डाउट नहीं था कि मेरा भविष्य क्या होगा? यह शंका मेरे मन में एक सेकंड के लिए भी थ्रूउ मेरा ऑलमोस्ट मैंने घर छोड़ा था आई थिंक 2003 के प्रारंभ में तब से लेकर के आज तक मोर देन 20 इयर्स एक सेकंड के लिए भी यह डाउट कभी नहीं आया कि मेरा भविष्य क्या होने वाला है खाने पीने को मिलेगा कि भी नहीं यहां पे कुछ गड़बड़ कर दी इन लोगों ने भगा दिया तो माया मिली ना राम ऐसा हो जाएगा ना ही बैंक बैलेंस है और ना ही यहां पे रहने को मिला सो व्हाट विल हैपन टू मी एक सेकंड के लिए भी मैंने मैंने नहीं सोचा। सो आई डू नॉट नो कि वो बात कहां से आई। मैं उसको फेथ या करेज नहीं कहूंगा। कहूंगा कि स्टुपिडिटी या तो जो भी है। बट [हंसी] नेवर फॉर ए वन मोमेंट मैंने सोचा कि भविष्य क्या होगा? भविष्य के लिए कुछ सोच के जाते हैं। सो वो कहां से आया? आई डू नॉट नो। और यह तो उस समय था। जबकि मैं मैंने घर तो छोड़ा था अल्टीमेटली कि गांव के काम करने के लिए। तो ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़ा था बट दैट नेवर कि उस रास्ते पर मैं आगे बढूंगा वो तो बाद में आया सो आइदर इट इज इनबोर्न हमेशा से मेरे में ये कॉन्फिडेंस था कि गुजराती में कह ना कि जुवान छोकरो पत्थर ने पाटू मारी ने पानी निकाला पता नहीं वो शायद पहले से ही था कि कैसे आया अनडिफाइनेबल क्वेश्चन म आध्यात्मिक जीवन के जितने भी प्रश्न आपका है जैसे स्वामी जी खुद का यह प्रश्न चोरी मत करो यह कहना इनफ नहीं है। चोरी ना करे इसके लिए कैरेक्टर बनाना है। सो हाउ टू मेक दिस कैरेक्टर? तो हमारे ऑर्डर में सीक्रेट तो कुछ रखा नहीं है। वो सबके सामने जग जाहिर करके छोड़ दिया है। लोगों में ही सबसे पहले दे दिया है। ये चारों का अनुष्ठान करो। फिर बाकी सब प्रश्नों का उत्तर धीरे-धीरे करके मिलता जाएगा। माने रामानुज भी इससे ज्यादा कुछ नहीं करने पाने वाले थे। रामानुज ने चिल्लाचिल्ला करके मंत्र बता दिया। हमने तो पब्लिश करके करके बता रहा है। वेबसाइट पे जाइए तो पहले लोगो दिखेगा।
हमारा लोगो इतना सर्वव्यापी है कि हम कभी इस पर ध्यान नहीं देते। हम इसे बैकग्राउंड नॉइज़ की तरह ही इग्नोर करते हैं।
देखिए जो आपने साउंड और बैकग्राउंड का उदाहरण दिया ना अभी जस्ट दो-तीन दिन पहले ही मैं पढ़ रहा था कि एक ऐसे साइलेंट रूम की रचना की गई है कि वो जो थर्माकोल से वो जो पता है ना वो आपको साइलेंट रूम होता है ना जहां पे ये रिकॉर्डिंग वगैरह होता है वहां पे वो थर्मकोल के यह लगाते हैं दीवाल के ऊपर में जो कि साउंड अब्सॉर्बिंग मटेरियल होता है। हमने राजकोट का वह जो विवेक होल है ना उसको हमने इस तरह से वो इस तरह से किया था साउंड ट्रीटमेंट दिया था तो इस तरह का मटेरियल आता है जो कि जो ऑडिटोरियम होता है ना उस पे लगा देते हैं जिससे कि इको ना हो तो वॉइस अच्छे से सुन पाते हैं साउंड साइलेंट रूम ना कि ऐसा जो कुछ भी इसको कहते हैं। तो इस तरह का एक साइलेंट रूम है। वहां पे जो साउंड है ना ऑलमोस्ट जीरो है। माने कहते हैं कि एक नॉर्मल रूम होता है ना वहां पे 30 डेसीबल का बैकग्राउंड नॉइज़ रहता है। जिसको आप कंप्लीट साइलेंस भी कहते हैं ना तो वो बैकग्राउंड नॉइज़ तो होता ही है। किंतु इस साइलेंट रूम में इट्स अ जीरो साउंड माने -30 ऐसा डेसीिबल कुछ साउंड है। तो वो कहा कहते हैं कि इस कमरे में आप 1 घंटा ना 2 घंटा बिता देंगे ना आपको 1 मिलियन डॉलर प्राइस मिलेगा। क्यों? क्योंकि कहते हैं कि वहां पर आप जाएंगे ना तो लोगों को विचित्र अनुभव होते हैं। कोई कोई कहता है कि मेरे हृदय की आवाज सुनाई देती है। कोई कहता है मेरी ये जो बॉडी में जो खून बह रहा है ना उसकी आवाज मुझे सुनाई देती है। कोई कहता है कि म दिमाग की आवाज सुनाई देती है। माने हम लोग क्या है कि ये जो नॉइज़ के साथ में रहने को हैबचुएटेड है तो तो सब नॉइज़ चला जाएगा। तो नॉइज़ कहां से आएगा? अपने बॉडी में से आएगा। जो कि हम कभी सोच भी नहीं सकते कि अपने शरीर में खून बह रहा है उसका वॉइस नॉइज़ हो साउंड हो बट इट इज देयर ऑब्वियसली इट इज देयर और कंप्लीट जीरो साउंड एनवायरमेंट में उसका भी आवाज सुनाई देता है व्हिच इज सच अ वियर्ड एक्सपीरियंस कि दो-ती मिनट के बाद में लोग भाग खड़े होते हैं कि यहां पे नहीं रह सकते पागल हो जाएंगे ये जो पूर्ण ब्रह्म ये पूर्ण ब्रह्म का अनुभव जो नरेंद्र को हुआ वो मजाक जप कर रहा है घटी ब्रह्म बाटी ब्रह्म और तो ठाकुर ने आकर के स्पर्श कर दिया फिर जो दुरावस्था अवस्था बेचारे की हुई ठाकुर के आकर के पैर पकड़े छोड़ो मुझे इस भूत से तो ठाकुर ने कहा अच्छा ठीक है अभी समय है तुम्हारे लिए अभी नहीं तो मैंने पहली मुलाकात जब स्वामी जी दक्षिणेश्वर आए थे ठाकुर ने उनको स्पर्श कर दिया था तो चिल्लाने लगे अरे मेरे मामा मेरे मां है बाबा है अब क्या कर रहे हैं सो इट इज़ लाइक दैट कि ऑब्वियसली कि ब्रह्मानुभूति जीवन का सर्वोच्च धेय है किंतु जब आन खड़ी होती है तब ऐसा डर लगता है कि अरे बाप रे ये कहां आ गए ओम