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ओम स्थापा का धर्म स्वरूप ने अवतार वरिष्ठ रामकृष्ण यत नमः सबको बता दिया की राधु के विवाह में आप सबको आना है क्योंकि बात सिर्फ यह नहीं है की विवाह में जो सब लोग इकट्ठा होते हैं तो क्या एक हंसी मजाक का एक आनंद का एक वातावरण बंता है तो वो तो है ही है किंतु मां कहती है की इस देश में मैन इस विस्तार में इस गांव में अभी लोग मेरा भरोसा है आप ही के भरोसे पर जो है मैं यहां पर र रहे हो क्योंकि क्या है इतना सर कम होता है मां के घर में तो भक्तों का संसार है कितने लोग आएंगे जाएंगे यह सब कितने उनके फैमिली मेंबर्स हैं मां के सब अगली मम्मी वगैरा सब को लेकर रहना है तो कितना ही कम होगा और विवाह में तो और भी कितना होगा तो मैन सब को निमंत्रण दे दिया है अभी महाराज लिखने हैं वर्धा महाराज और विवाह और द्वितीय ब्रह्मचारी शहर कव्वाल पड़ा हुई या जयरामबाती उपस्थित हो ये जब बात हो गई मैन सबको आमंत्रण दे दिया की सबको विवाह में आना है कम करना है इस घटना के कुछ ही दिन के बाद में शरद महाराज आए योगेन मां गोलापमा और भी कुछ साधु ब्रह्मचारियो के साथ में जयरामबाती जाएंगे विवाह में उपस्थित रहेंगे अभी क्या है की जनरली देखेंगे तो साधुओं को तो विवाह में या तो फिर इस तरह से कोई सांसारिक प्रसंग है उसमें आ उपस्थित रहने की वो अनुमति नहीं है उपस्थित नहीं रहना चाहिए किंतु यह तो मां का संसार है मां का संसार तो देवी संसार है तो मां के घर में जब कोई भी कम होता है तो साधु ब्रह्मचारी ईश्वर का कम समझ करके ही वो उपस्थित हो जाते हैं तो इसीलिए यहां पर देखिए की वो शरद महाराज और कुछ साधु है सब लोग आकर के इकट्ठा हो गए राहु के विवाह में रहेंगे जो भी कम है जो भी वो सामाजिक वो आपकी वो व्यवहार है वो व्यवहार शब्द हमारे यहां उसे होता है यह जो सामाजिक व्यवहार सब व्यवहार यह लोग करेंगे मां खुद तो बेचारी क्या करेगी मां के पास में तो कुछ नहीं है जो भी व्यवहार करने वाले थे वह तो यही थे तो इसीलिए यह लोग सब यहां पर इकट्ठा हो गया है जस्ट मां शेर शेर दिखे ताजपुर ग्रामीण जमीदार चतुर्जे डर बड़ी ते महाश्मा राय राठौर विवाह हो गया मैन जेस्ट मास के अंत में ये जो ताजपुर के जो जमींदार थे उनके घर पे समारोह के साथ में महासमारों के साथ में ऐसे वैसे नहीं महा समारोह के साथ में राहु का विवाह हो गया पटरर नाम मनमत ना पत्र अर्थात जो उसका जो पति था उसका नाम था मनमत नाथ चट्टोपाध्याय पूजनीय प्रश्न मामा पुण्य संप्रदान कोरिलैंड प्रश्न मामा ने कन्यादान किया श्री श्री माहिर भाई डर व्यवस्था ताजपुर का जमींदार परिवार है उसके कॉम में उसकी तुलना में मां का जो फैमिली है मां के जो तीन भाई है उनके उनकी जो आर्थिक अवस्था तो वो उनसे कहानी गुना वो मतलब कमजोर है कहानी गुना निम्न है जमींदार के पास में तो वैसे ही धन वैभव रहने वाला है नौकर चक्र रहने वाले हैं जबकि ये मामा जो है मां के तीन भाई इनके पास में तो कुछ भी नहीं है तो अभी यहां पे महाराज लिखने हैं शरद महाराज खुद किंतु वहां पे उपस्थित है पूरे रामकृष्ण संघ के जनरल सेक्रेटरी वो खुद वहां पे उपस्थित रहकर के मां की और से प्रसंग में थोड़ा सा भी वो कमी नहीं आने दिया जो भी व्यवहार जी तरह से होना है सब कुछ उन्होंने किया है किस तरह से देखिए भक्ति राव अनेक मतलब विवाह में जो जाग झक होती है जहां जली उसमें थोड़ी सी भी कमी नहीं आने दी हां अभी हमको ये बात याद रखती है की अब जब हम ये कहेंगे की वो उसे समय के गांव की जा को जल ली विवाह की या लग्न प्रसंग की और आज हम जो देखते हैं तो उसके साथ में कभी कंपेयर नहीं करना है आज जो है शादी ब्याह में पता नहीं करोड़ करोड़ रुपया लोग डालते हैं वो क्या-क्या सब नाटक होता है अभी वो तो कुछ समय के विवाह था वो सात्विक पद्धति से ही होता होगा ज्यादा से ज्यादा कुछ यात्रा गण का अभी नहीं हुआ होगा और फिर जो है वो उसके साथ में वो जो गने वगैरा देते हैं वो सब होता है वो ब्राह्मण को बुलाकर के वो जो आचार्य विधि व्यवहार जो करना है वो जो विधि करते हैं विवाह की वो है और फिर वही बात है की गांव में जितने भी लोग हैं सबको खिलाया जाता है इसी में हो गया अभी इसके साथ में यदि हम यहां पे पढ़ते ऐसा सोचेंगे की हां यहां पर महाराज ने है की विवाह में पूरा जाग चमक करके पूरा जो जली के साथ में वो संपन्न हुआ है तो आज के जो विवाह प्रसंग होते हैं इसके साथ में इसको कंपेयर नहीं करना है वरना क्या है एक पूरा ही एक गलत छवि हमारे मां में उपस्थित होगा तो ये उसे गांव की बात है वो 19वीं साड़ी की बात है आज से 100 साल पहले की वो जब भारत में पैसा ही कहा था आज पैसा है हमारे पास मिडिल क्लास के पास में उसे समय मिडिल क्लास के पास में पैसा ही कहा था जो भी था ये जमींदार यह राजा यह ब्रिटिश ऑफिसर ये फिर कुछ मिडिल में यही लोग पैसा ढाबा करके बैठ गए थे बाकी ज्यादातर हमारे जो लोग थे भारतीय जनवासी हुआ तो गरीब थे और गरीब से भी गरीब थे ऐसा नहीं है की अपार क्लास और मिडिल क्लास और लोअर क्लास वो ऐसा अपार क्लास था फिर लोअर क्लास था फिर लोअर से भी लोअर क्लास था मिडिल क्लास जैसा कुछ था ही नहीं ये सब तो अपने वो इंडिपेंडेंस के बाद बना है भक्ति राव आने के नाना भी अलंकार राधु के उपहार दिया छीलन भक्ति लोग ने भी राधा को बहुत सारे सोनी के गने चांदी के गने अलंकार जो है वो उपहार में दिए थे एक तो अलंकार हुए लोग ये सोनार मुकुट शोहोशामोश तो गोहाना पुरिया हा दूर हटाए कासन को रुपए याचिलो मैन देखिए कहां बेचारी के पास में कुछ भी नहीं है राजू के पास में और किंतु फिर भी इतना सर गने हो गए इतने सारे अलंकार हो गए की सब अलंकार पहनकर के वो सोनी का मुफ्त एक दिया था वो सोनी का मुकुट पहन के सब अलंकार पहन के राजू जब चलने की शुरुआत कारी है वो बेचारी चल नहीं का रही है राजू का फोटो देखा होगा कभी वो दुबली पतली है वो मां के साथ में खड़ी है उसमें भी वो छोटी दिखती है मां की खुद की साइज तो कोई ज्यादा नहीं थी हाइट वो उसके साथ में भी यदि राजू खड़ी है तो उसकी हाइट कम दिखती है और एकदम दुबली पतली दिखती है तो वो बचता रही है आप देख लीजिए की इतने सारे भक्तों ने अलंकार बहाने वगैरा दिए हैं वो पहन करके ऊपर में सोनी का मूड भी है तो इतना पहन करके बेचारी को चलना भी मुश्किल हो रहा था मैंने ये तो वो बात होगी ना वो श्याम सुंदरी देवी एक बार बोल रही थी किसी को ठाकुर तो संसार करने वाले नहीं है अपनी लड़की के बड़े में तो दुख करेंगे ना की वो मां को तो श्याम सुंदरी देवी को तो पता नहीं था इतना की ठाकुर कौन है और माता असली स्वरूप कौन है मां को तो अपनी बेटी की अंग तरक्की वो देखेगी तो वो दुख करके बीच-बीच में बोलते थे की मेरी बेटी शारदा को कोई मां करके भी बुलाया बुलाया बुलाएगी नहीं इस तरह से मां मां पुकार भी वो नहीं सुन पाएगी बच्चे जब होते तो मां मां करते हैं तो मां का मां कैसा वो एकदम खुशी से एक हद से भर जाता है तो मेरी बेटी जो है वो मां की पुकार भी बेचारी कभी नहीं सुनेगी ऐसा वो बोल रही थी उसे समय ठाकुर ने क्या कहा था की देखवे मुझे इतने सारे लोग मामा बोल करके वो होता की बेटी के सामने आपकी लड़की के सामने चले जाएंगे की वो बेचारी मां की आवाज सुनकर के मां की पुकार सुनकर के आखिर में वो ट्रस्ट हो जाएगी आखिर में वो बेचारी वो मां परेशान हो जाएगी और आखिर में हुआ भी सही इतने सारे भक्ति जय जय राम बाटी में कोलकाता में महेरवादी में और सब भक्तों का अपना अपना एक नाटक है बेचारे जब मां बोलते हैं तो मां का सीन मां के हृदय में इतना वो आनंद पिया आता है एक मातृ प्रेम का एक जो एक उच्च है वो भी तो मां के हृदय में है किंतु साथ-साथ में ही वो ये सब भक्तों की जो पगलानी जो है वो पागलपन वो भी तो बेचारी को सहन करना पद रहा है तो ऐसा वो जो कहा वो श्याम सुंदरी देवी बोल रही थी की मेरी लड़की वो मां शब्द जो है वो पुकार ही नहीं सुन पाएगी और उल्टा हो गया की कितने लोग मां मां बोल करके वो मां के पास में ए गए तो यहां राजू के साथ में भी वो थोड़ा रिवर्स कंडीशन में कहा जाएगा वो स्पिरिचुअल था ये मटेरियल मतलब वो है उदाहरण की वो राधु के पास में तो कुछ नहीं था मामा के पास में कुछ नहीं था किंतु फिर भी शादी के समय में इतने सारे गने इकट्ठा हो गए की वो बेचारी सब बहनों को पहन करके वो चल भी नहीं का रही है और यहां एक बहुत बड़ा एक हमारे लिए एक सोने की बात है देखिए की हम ठाकुर के पास जो मांगते हैं वो हमको मिल जाता है राहत के हृदय में अभी नो डाउट वो तो योग माया है किंतु फिर भी शरीर धरण किया है तो शरीर धरण करने के लिए सत्व रजत तमस तीनों गन होने चाहिए अदर वाइस शरीर धरण नहीं होता तो उसके मां में भी कहानी ना कहानी यह एक वासना होगी की मैं संसार करूं और संसार की ये जो सब ये साथ-साथ में जो जितना भी कुछ है वो उसका उसका भी मैं आनंद उपभोग करूं ऐसा राजू के मां में वो एक वासना होगी तो वो वासना जो है उसकी जो इच्छा है ठाकुर ने इस तरह से मैन इस तरह से संपूर्ण कर दी तो अभी हमको भी बहुत ख्याल रखना है की जब हम ठाकुर के पास में मां के पास में जो कुछ मांगेंगे वो हमको मिल जाएगा क्योंकि ठाकुर और मां तो कल पत्र है किंतु हमको फिर यह ख्याल रखना है की क्या मैं सही सही वो ठाकुर और मां के पास में यह करना चाहता हूं कोई बहुत बड़े राजा के पास चले गए और बोल दिया की राजा मुझे दो रोटी दे दो तो वो राजा के पास में तो देने के लिए सोना चांदी जवाहरलाल तो बहुत कुछ है वो तो पूरा राज्य भी आपको दे सकता है यदि राजा आपके ऊपर खुश हो तो राजा और यदि खुश होगा तो ऐसा थोड़ी ना बोलेंगे की चलो आज मुझे भिक्षा दे दो मुझे खाने को नहीं मिला है अब तो और भी कितना सब कुछ मां सकते हैं तो वैसे ही यहां पे है ठाकुर और मां हमारे सामने कल्पतरु हो करके खड़े हैं तो हम क्या थोड़ी ना उनसे ये सब सांसारिक चीज मांगेंगे हम तो मांगेंगे की ज्ञान दो भक्ति दो वैराग्य दो और ठाकुर साथ-साथ में ठाकुर का ये आशीर्वाद तो रहेगा की रहेगा की जो भगवान को मतलब अच्छे हृदय से जो भगवान को शुद्ध हृदय से बिना किसी कामना वासना के पुकारता है उसकी जितने भी ये जो मोटा भारत का पड़े और बहुत मेहनत ठाकुर ने स्वामी जी को कहा था अर्थात की ये जो पहने के लिए कपड़ा रहने के लिए मकान और खाने के लिए रोटी या तो बहुत इसका अभाव नहीं रहेगा फिर हो सकता है आप इतनी जो जली में ना जिए हो सकता है की आप इतने बड़े महल जैसे मकान में अप में आज की वो जो बड़ी-बड़ी गाड़ियां आई है ना वो क्या सब नाम राहत है वो मिनट टाटा की गाड़ी है महिंद्रा की गाड़ी है वो सव जिसको बोलते हैं मतलब वो इस तरह से वो कोई बहुत बड़ी लग्जरी है इस गाड़ी आपको शायद ना मिल जाए हो सकता है की प्रतिदिन कोई अच्छी-अच्छी फाइव स्टार होटल में आपको खाने को ना मिले वो सब ठीक है आपको किंतु खाना पौष्टिक आहार मिल जाएगा आपको जो भी जी तरह से जीवन व्यवहार के लिए जो सामान्य चीज चाहिए वो सब आपको मिल जाएगी किंतु आपको यह ख्याल में रखना है की वह सब चीज मांगना नहीं है ठाकुर से जो ज्ञान भक्ति बैरागी ये तीन चढ़ी मांग लिया तो बाकी का सब अपने आप ए मिलेगा अभी जैसे मास्टर महाशय ने ठाकुर के साथ में पहले वो एक बार आए थे दक्षिणेश्वर में और ठाकुर के साथ बात कर रहे हैं तो बात बात में मास्टर महाशय ने पूछा की ये जो पूजा की छुट्टी हो गई है तो क्या कर रहे हो मतलब दक्षिणेश्वर में नहीं आते मेरे पास में तो ठाकुर मेरे पास में तो नहीं बोलते थे कभी यहां पे वो मंदिर में नहीं आते हो दक्षिणेश्वर में ठाकुर कुछ है भाई ठाकुर का भी ऐसा है की उनके भक्ति जो है इधर-उधर जान से वो कान पकड़ देते हैं तो मास्टर महाशय ने कहा की पूजा की छुट्टी है दुर्गा पूजा की तो मैं वहां पर केशव सेन के वहां पे गया था ब्राह्मी समाज में वहां पर उन्होंने भी पूछा किया था और उन्होंने भी वो उपदेश वगैरा दे रहे थे तो केशव सेन का उपदेश सुना मुझे बहुत अच्छा लगा तो ठाकुर ने पूछा की अच्छा बताओ सर ने क्या कहा तो मास्टर महाशय कहते हैं की केशव ने कहा की मेरी मां अपने घर में आई है मतलब मां दुर्गा तो साथ में ही यह कार्तिकेय है गणेश है यह लक्ष्मी है सरस्वती है वो भी साथ साथ में चले आते हैं अभी आपने पुनर यहां गुजरात में वगैरा तो दुर्गा पूजा का इतना नहीं है वह भी चालान और इतना वो मतलब बड़े पैमाने पे नहीं होता है किंतु जो लोग बंगाल में है उनको पता है की जब मां दुर्गा की मूर्ति का स्थापना होता है तो वहां साथ में ही लक्ष्मी सरस्वती कहो फिर वो जो कार्तिकेय गणेश को हो वगैरा सब की मूर्तियां स्थापित करके उनकी भी साथ-साथ में पूजा की जाति है वो भी पूजा ग्रहण करते हैं वो भी नैवेद्य ग्रहण करते हैं तो इस तरह से वो जब मा आई है तो साथ में कार्तिकेय गणेश लक्ष्मी सरस्वती सब ए जाते हैं तो फिर अभी केशव से रिश्ता अर्थ समझता है की यदि आपके हृदय में मां के प्रति मां दुर्गा के प्रति सही-सही निष्ठा भक्ति और समर्पण है तो आपको लक्ष्मी सरस्वती वगैरा जो कुछ मोहम्मद लक्ष्मी यानी की धन सरस्वती यानी की विद्या कार्तिकेय यानी के शक्ति गणेश यानी की शुभ ये शुभ शक्ति बुद्धि ये वैभव सब कुछ आपको मिलेगा यदि आपके हृदय में अपने मां दुर्गा की स्थापना की है तो मास्टर महाशय कहते हैं की केशव सैया ऐसा कहां मुझे बहुत अच्छा लगा तो ये बात सुनकर के ठाकुर क्या बोलते हैं ठाकुर ने भी शायद ऐसा सोचा होगा की बात तो ठीक है किंतु ठाकुर क्या कहते हैं अच्छा तुम इधर-उधर मत जाना जो मेरे अपने हैं जरा एक खकनार और नारायाश है मैन जो मेरे अपने हैं वह सिर्फ यहां पे ही आते हैं मेरे पास नहीं आते हैं इधर उधर नहीं जाते ये देखिए की ठाकुर इस तरह से गुरु निष्ठा जो है वो सीखने थे गुरु निष्ठा की बहुत अभी आपको हमको आश्चर्य होगा की एक और है की सर्वधर्म समन्वय की बात जल्दी ठाकुर कहते हैं की सभी धर्म एक समाज है तो फिर एक ही गुरु के पास में आपको क्या आशीर्वाद लेना शिक्षा लेनी वह मतलब साधना किस तरह से करनी है वह सीखनी ऐसा क्यों इंसिस्ट करते हैं तो इसके पीछे भी क्या है की गुरु शक्ति जो है यह गुरु शिष्य परंपरा जो है अपनी वह बहुत प्राचीन परंपरा है एक एन अपने ऑर्डर में कहा जाता है की देखिए की दीक्षा गुरु हमेशा एक ही हो सकते हैं शिक्षा गुरु अब जितने चाहे कर सकते हैं तो अब विभिन्न प्रकार की विद्या जो है वो आप किसी से भी सीखे अभी नरेंद्र जो है वो स्कूल में जाता है कॉलेज में जाता है वहां पे वो लैंग्वेज सीखने होंगे फिर वो मैथमेटिक्स सीखने होंगे फिर हिस्ट्री वगैरा फिलासफी है वो वहां के जो टीचर है उनके पास में वो सब सीखना है किंतु जो आध्यात्मिक शिक्षक है वो सिर्फ ठाकुर के पास लेना है गुरु के प्रति ये जो निष्ठा जो है वो अपनी गुरु शिष्य परंपरा के द्वारा हिंदू धर्म में बहुत ही अच्छे से स्थापित की गई है इसका एक उदाहरण है स्वामी जी जब गाजीपुर जाते हैं तो पहाड़ी बाबा को मिलते हैं तो पोहरी बाबा से बड़े ही वह मैन खुश हो जाते बड़े ही प्रभावित हो जाते हैं और हरि बाबा उनका नाम था पोहरी बाबा इसका अर्थ है जो पवन का आहार करते हैं वो आवाहारी इस तरह से मतलब बहुत कम खाता थे और फिर योग साधना करके ही उन्होंने अपने शरीर को टिकाया था धरण किया था तो उनकी साधना देखकर के उनकी बातें सुनकर के स्वामी जी बड़े ही प्रभावित हो गए और उन्होंने सोचा की ये जो बंगाल का शरीर है उनका तो बंगाली शरीर में तो बहुत सारे बीमारियां वगैरा ए जाति है तो मैं थोड़ा सा योग साधना उनसे उसकी दीक्षा लेकर के योग साधना सिख करके अपने शरीर को थोड़ा सा स्वस्थ रखना हूं स्वस्थ रखना का पर्यटन करता हूं ऐसा स्वामी जी सोचें फिर अभी वो सोच ही रहे थे की दीक्षा लेंगे दीक्षा लेंगे सीखेंगे योग साधना वगैरा उसमें क्या हुआ वो रात को लेते हुए अपने बचाने पे देखा की ठाकुर सामने आके खड़े हैं अभी इस समय तो यह तो 1886 में अगस्त में ठाकुर का तो महासम्मती हो गया था ठाकुर ने मा समाधि ग्रहण कर ली थी यह उसके बाद की बात है जब स्वामी जी वरंगर मठ की स्थापना हुई बाद में फिर वाराणसी नगर मठ में से वो परिवर्जक के रूप में स्वामी जी जब भारत भ्रमण कर रहे थे उसे समय की ये बात है तो अभी तो ठाकुर ने तो अभी नो डाउट सदैव भौतिक शरीर में पांच महाभूत के बने हुए शरीर में पृथ्वी पे नहीं है किंतु उनका वह जो आध्यात्मिक प्रेजेंस जो है स्पिरिचुअल प्रेजेंस वह तो भक्तों के हृदय में सदैव बनी रहेगी जब भी वो नरेंद्र वो जान का पर्यटन करेगा वो सीधे रास्ते से निकाल कर के और कहानी पे जान का और कुछ सीखने का ठाकुर सीधा कान पड़कर के सीधे रास्ते पे ले आएंगे तो अभी उन नरेंद्र स्वामी जी सोए हुए हैं देखा की ठाकुर साहब ने आकर के खड़े हैं बचाने के पास में ही कोई बोल कुछ नहीं रहे किंतु चेहरा बड़ा ही करूं हो गया है तो स्वामी जी सोचते हैं अरे ठाकुर इस तरह से करूं बना करके क्यों खड़े हैं फिर उन्होंने कुछ सोचा की होगा कुछ समझ में नहीं ए रहा दूसरे दिन फिर से ऐसा हुआ फिर से ठाकुर ए करके खड़े बड़े ही करूं चेहरे के साथ में स्वामी जी के सामने एक दृष्टि से देख रहे हैं स्वामी जी सोच रहे हैं की ठाकुर मुझे कहना क्या चाहते हैं दर्शन दे रहे हैं इसका अर्थ है की मुझे कुछ बताना चाहते हैं किंतु मुंह से कुछ बता नहीं रहे हैं मैं कुछ समझ नहीं का रहा जब तीसरी दिन फिर से ऐसा हुआ फिर आकर के स्वामी जी सोए हुए थे लेते हुए थे ठाकुर ए करके खड़े हुए बड़े ही करोड़ दृष्टि से नरेंद्र के सामने एक दृष्टि से देख रहे हैं तब स्वामी जी समझ गए की उनकी इच्छा नहीं है की मैं पहरी बाबा से दीक्षा लूं और योग साधना सीखो तो ये समझ करके फिर स्वामी जी ने जो है वो गाजीपुर में थे उसे समय तो गाजीपुर का त्याग करके फिर और कहानी चले गए तो देखिए की यहां पे भी एक निष्ठा जो है गुरु के प्रति वो किस तरह से हमारे सॉन्ग में वो बताई गई तो फिर हमने कहां से कहां निकाल गए बात ये थी की राजू को इतने सारे गने मिल गए हैं की वह बेचारी गने पहन करके चल भी नहीं का रही है रेडर विवाह प्रथम जय राम के दर्शन उतार कच्चे कच्चे ता किया छोटो खातों कांच परिवार यह पहले बार जो है वर्धा महाराज राधु के विवाह के उपलक्ष्य में मैन सब को लापरा के लड़कों को बता दिया था की तुम सबको आना है विवाह में कार्य कम करना है इनके अलावा तो कम और कौन करेगा वो खाना परोसने है वो भजन जो बन रहा है उसमें सहायता करनी है वो कितना कम राहत है वो कोई शुभ प्रसंग में यहां मंदिर में भी अब ठाकुर जी की तिथि पूजा आएगी या कोई भी फंक्शन है सब साधु ब्रह्मचारी भक्ति लोग मिलकर के कितना वो मतलब हृदय में श्रद्धा भक्ति के साथ में वो मंदिर में कम में ग जाते हैं अभी गुरु पूर्णिमा है तो अभी एक संडे को मैं इस संडे को देख रहा था की सब देवोटी मिलकर के मंदिर की सफाई कर रही है कर रहे हैं पूरा पानी दाल दिया फिर वो वाइपर से वो पानी क्लीन करना पड़ता है घर-घरू में जो क्लीनिंग वगैरा करना है वह जो पर्दा जो है वह ठाकुर के पीछे का वह बदलना होता है ठाकुर के वस्त्र जो है वो तो प्रतिदिन धोने हैं स्त्री करने हैं वो तो है किंतु साथ-साथ में ही वो बेदी जो है बड़े अच्छे से क्लीन करनी पड़ती है तो कितना सब कार्य है और वो फिर वो भोग करोगाधना है पकाना है वो सब तो हुए सब चीज इकट्ठा करनी है बाजार में से सब कितना सब कुछ है कितने सारे देवोटी इकट्ठा हो जाएंगे कितना सुंदर माहौल बनेगा यहां पे तो वैसे कोई भी शुभ प्रसंग आता है और सांसारिक होना की आध्यात्मिक और उसके साथ में एक आनंद तो राहत ही है की चलो सब भगत है या तो सब मित्र है सब मिलकर के कार्य कर रहा है तो वर्धा महाराज कहते हैं की राजू के विवाह के उपलक्ष्य में मैन सब को इकट्ठा किया था वहां पर जय रामबाती में और यही पहले बार वो खुद वहां पर गए और मां का मां की सेवा की मां का सब कार्य किया ऐसा वो यहां पे का रहा है जिसके बड़े में मैंने भी बहुत सोचा मैंने भी इसके बड़े में बहुत चिंतन किया की किस तरह का एक प्रसंग वह हो गया वो विवाह के बाद की ही घटना है और मतलब हम प्रसंग का डिस्कशन करेंगे तब पता चलेगा महाराज ने शुरुआत इस तरह से की है थोड़ा सा मिसालीडिंग है तो मैंने भी जब पहले सेंटेंस पढ़ा था तो मुझे लगा था अरे वो पता नहीं क्या होगा किंतु बाद में पता चला की ये तो कुछ अलग ही है पहले सेंटेंस है महाराज लिखने हैं राधुर विवाह पर एक्टिव मजार घटना गोट राजू के विवाह के बाद में एक बहुत मजे की घटना घाट गई बहुत ही मजे की एक घटना हुई अभी एक घटना मजे की नहीं है वो बड़ी दुखदायक है और महाराज ने ऐसा क्यों लिखा है वो पता नहीं तो जो भी है विवाह से बर और मधु जैन दिन चोलिया जेलो शरद महाराज अनेकता निश्चित तो हुई या स्कूलर संगे नाना रंगो का उपयोग जी दिन विवाह के बाद में राहु और राहु का पति अपने घर चले गए अभी तो जैसे वो अपने भारत की जो प्रथम है की लड़की जब अपने ससुराल जाति है अपने पति के घर जाति है तो वो रोना धोना वगैरा कितना होता है तो हम भी इमेजिन कर सकते हैं हालांकि मैंने कहानी पे ये सब पढ़ा नहीं है इस तरह का डिस्क्रिप्शन मां मां के साथ में क्या वह मैन किस तरह से वह हुई होगी की भी नहीं क्या आशीर्वाद दिया होगा यह सब मैंने कहानी नहीं पढ़ा यदि इसका वर्णन होता तो हमको सही-सही पता चला की मां को जो हम एक गुरु के रूप में जो देखते हैं एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में देखते हैं उनका ये जो एक एस्पेक्ट था राधु के साथ में माहौल आ महामाया के साथ में मां का यह जो संबंध था वो किस तरह से वो एक जो अपनी वो विदाई ग्रहण कर रही है क्योंकि हम हिंदू जो हमारी संस्कृति में यह दृश्य सभी लोगों ने पराई देखा होगा की लड़की अपने पति के घर जा रही है शादी के बाद में और मां और पिताजी उसको विदाई दे रहे हैं ये दृश्य प्राय हमने यदि हमारे घर में नहीं हुआ होगा तो ये टीवी वगैरा में सिनेमा में तो देखा ही होगा बड़ा ही एक आम दृश्य है तो मां के साथ में मां किस तरह से वो राधु को विदाई दी होगी वो वर्णन यदि राहत तो पढ़ने का बहुत मजा आता है तो जो भी है यहां पे महाराज ने और ही एक घटना का वर्णन किया है लिखने हैं की जी दिन राधा ने विदाई ली उसे दिन और कुछ हुआ की शरद महाराज बड़े ही निश्चित होकर के सब साधु ब्रह्मचर्य के साथ में मां के घर का जो वंदना है वहां पे जाकर के बेटे हैं और फिर जैसा होता है बड़ा प्रशांत खत्म हो जाता है तो मां के ऊपर में से जो बाहर और चिंता है वो चली जाति है तो वो एक हंसी मजाक का एक वातावरण बंता है उसे समय क्या हुआ संध्या हुई और बड़े ही जोर से वृष्टि है बारिश है वो होने लगी आकाश जो है कल बादलों से छ गया और जोर-जोर से वज्रपात हो रहा है वो बचाना पाठ जिसने सुना है ऐसा जोर से होता है तो पता चला है कितना डर लगता है मुझे याद है मैं लिमडी आश्रम में था उसे दिन ऐसा जोर से वो बिजली गिरी थी की मैं एकदम डर गया था मैंने ऐसा लगता था की जैसे पूरा पृथ्वी जो है वो फैट जाएगी ऐसा कभी-कभी वो इतने जोरो से बिजली गिरती है तो यहां पर महाराज लिखने हैं की जी दिन राधा ने विदाई ग्रहण की मां के घर से उसे दिन इतना भयानक बारिश हुआ था की इतना जोर से वो वज्रपात हो रहा था की कोई सामान्य आदमी तो जो है वो बेचारा उसका हार्ट फेल हो जाएगा इतना भयानक जो स्वरूप है प्रकृति ने कर लो जिसको कहते हैं ना बहुत स्वरूप वो प्रकृति ने वो भाया वह स्वरूप उसे दिन ग्रहण किया था उसे समय ब्रह्मचारी जादू शरद महाराज के तंबख्त बीते आशा चयन उसे समय जादू नाम का एक ब्रह्मचारी वो बांग मतलब आज का बांग्ला देश उसे समय का इश्कबांगोल वो उसे ईस्ट बंगाल का ब्रह्मचर्य जादू उसका नाम जादू वो मुशरत महाराज को तंबाकू देने के लिए आया है अभी वो मैंने बहुत सारे लोगों को थोड़ा आश्चर्य होता है पहले बार यह जब अपूर्वा स्वामी जी की बातें सुनते हैं तो ये लोग तो हुक्का या तो फिर ये चिलम वगैरा ये लोग पीते थे तो क्या है की ये तो अपनी भारतीय परंपरा है की सन्यासी लोग जो है वो चिलम है तो चिरू चिरप तो नहीं उसको तमाम तमाम खाता हैं वगैरा वो तंबाकू का सेवन करते हैं वगैरा स्मोक स्मोकिंग जिसको कहते हैं उसे स्मोक करते हैं तो ये तो अपनी चेरियन तन भारतीय परंपरा है तो इसमें नया कुछ नहीं है तो एक बहुत सुंदर उदाहरण मैंने शायद पहले भी बताया होगा की अपने विश्वविद्यालय जी महाराज चेन्नई में थे उसे समय का शशि महाराज के साथ में तो शशि महाराज के पास में जॉइन किया है किंतु शशि महाराज का स्वभाव जो है इतना मतलब डिसीप्लिनरी स्वभाव है की बीच-बीच में छोटी-छोटी चीजों में ही उनको बड़ा हिप कर देते थे बड़ा ही उनकी जोर से उनको ये दांत देते थे की मतलब इन सब कुछ परफेक्ट होना चाहिए तो अभी एक दिन क्या हुआ की विशुद्ध आनंद जी जो की बाद में तो हमारे प्रेसिडेंट हुए थे अपने संघ के परम पूजने प्रेसिडेंट महाराज हुए थे तो उसे समय तो नए-नए जॉइन करने के लिए आए थे किचन में बैठ करके वो सिगरेट पी रहे थे स्मोकिंग कर रहे थे तो सिगरेट नहीं कहेंगे उसको वो बीड़ी वगैरा जो बनाते हैं ना अपने हाथों से वो तंबाकू के पेट में थोड़ा सा तंबाकू दाल करके और देसी वो जो बनाते हैं बीड़ी ऐसा कुछ पी रहे थे तो सुद्दनली शशि महाराज वहां पे आकर के उन्होंने देख लिया की विशुद्ध आनंद जी जो है वो बीड़ी पी रहे हैं तो बड़े ही वो सीरियस हो गए बोले की मुझे पता नहीं था की तुम स्मोकिंग करते हो फिर बोला चलो फिर राजा महाराजा उसे समय कोलकाता से चेन्नई मद्रास आए हुए थे दक्षिण भारत के तीर्थ की यात्रा करने के लिए दर्शन करवाने के लिए शशि महाराज ने उनको आमंत्रण दिया था तो राजा महाराज अर्थात स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज ठाकुर के मानस पुत्र अपने संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट सर्वो प्रथम अध्यक्ष प्रमोद अध्यक्ष तो वो उसे समय मद्रास मठ में थे तो शशि महाराज विशुद्ध जी को पकड़ करके ले आए राजा महाराज के पास में बोला राजा देखो ये अभी से ब्रह्मचारी है और वो धूम्रपान कर रहा है बोलो तुम उसको नाटो इसको तो राजा महाराज बड़े ही शांत स्वभाव से बोलते हैं अरे भाई मैं तो जब छोटा था तभी से मैंने धूम्रपान आरंभ किया है तो मैं अभी किस मुंह से इस लड़के को बोलूं की तुम धूम्रपान मत करो तो ये बात सुनकर के शशि महाराज बोलते हैं अच्छा ठीक है राजा महाराज के पास कंप्लेन करने का कोई लाभ नहीं है जो तुम छूटा तो वैसे ही अपने ऑर्डर में जब किसी साधु को धूम्रपान करते देखते हैं तो यह है की ठाकुर मतलब आजकल भी थोड़ा बहुत चला है किंतु क्या है की हम जहर में पब्लिक में ऐसा ज्यादा कुछ बोलते नहीं है अच्छा महाराज ने महाराज बोली लेना शरद जब ये जादू जो है वो तमाम कुका लेकर के श्री श्री महाराज शरद महाराज को देने के लिए आया तब शरद मारा जब ये हंसी मजाक का मूड है तो हंसते हंसते वो जादू को बोल दिया की जोड़ो अभी वो ईस्ट बंगाल की वो जो एक अलग तरह की बंगाली है अलग तरह से बोलने का ढंग है तो वो उसको उसे ढंग में जोड़ो करके बुलाया उसका नाम था जादू नाथ तो जादू शॉर्ट में बोलते थे और ईस्ट बंगाल की वो जो बोलने की स्टाइल है उसमें उन्होंने कहा जो दो जो दो ट्यूशन जोड़ी एक शॉट आठवीं नई तार अवशेष को ऋण वो आशीर्वाद लाभ पर भी एवं तोर जो दिए पूजा कोरा ए एक दिन ऐसा तक अब उसको अभी क्या है की महाराज जो ये जो थे ब्रह्मचारी हेतु प्रतिदिन पदमा फूल लाकर के मां के चरणों में रखना था मां की पूजा करता था अभी उसका नाम है पदमा फूल तो बंगाल की वो ईस्ट बंगाल की भाषा में उसको कहेंगे तो अभी ये पद्मफुल को जादू ना जादू महाराज जो है वो बोलेंगे और उनका नाम है जो शरद महाराज ने इस तरह से एक प्र बिठाकर के उनको कहा की जो दो तुम यदि आज इतनी भयानक बारिश हो रही है इतना वो मतलब जो रास्ता घाट सब कुछ जो है वो पूरा पानी में बा जा रहा है इतनी भयानक जो ये जो है जो बाजरो पाठ हो रहा है बिजली जो गिर रही है इस समय तुम आज तक तो प्रतिदिन मां के चरणों में एक पदम फूल देकर के मां की पूजा करते थे किंतु इस भयावाद तूफान में तुम यदि 108 पद्मफुल लेकर के आओगे और मां के चरणों में देव के तो देखो की तुम्हारी यह जो मां आराधना है साधना है वो आज सफल हो जाएगी अभी देखिए की हंसी मजाक में शरद महाराज ने कितनी बड़ी बात का दी सबसे पहले तो इतना भाया हुआ है तूफान इसमें घर से बाहर निकालना रास्ता घाट ये जो कुकर ये जो तालाब जिसमें ये पद्मफुल निकलते है वो पूरा वो पूरा पानी से बा रहा है और इतना पानी का प्रवाह है कोई कोई आदमी इस तरह से बाहर निकले रहेगा साहस नहीं करेगा फिर जो है बिजली गिर रही है बिजली कभी किसी के सर पे गिर गई अभी अपने सर पे नहीं गिरी तो पेड़ के पेड़ के ऊपर गिरी पेड़ अपने ऊपर गिर गया मैन जान हनी का कितना भयानक खतरा है इस समय किंतु यदि तुम प्रतिदिन एक पद्मफुल लाकर के मां के पैरों में रखते हो तो आज तुम यदि 108 लेकर के आओगे एक-दो नहीं 108 इतना भाया वह बारिश में वो तो एक तो तालाब में जाना फिर वहां से 108 पदमा फूल इकट्ठा करना मैन सोच के देखिए की कितना बिना असंभव कार्य जो है यह शरद महाराज ने हंसी मजाक में बोल दिया की आज यदि तुम इतने वृष्टि भारी बिजली गिर रही है जो सैलाब आया है इसमें यदि तुम जाकर के अंधेरा है कुछ नहीं दिखाई दे रहा है इस समय में तुम यदि कोई भी तालाब में जाकर के कोई सोच सकता है हम किसी तालाब में पर रखेंगे इस समय तुम तालाब में जाकर के 108 पड़ा को लेकर के आओगे मां के चरणों में रखोगे तो तुम्हारी मां की पूजा जो है आज सार्थक हो जाएगी ऐसा शरद महाराज ने उसको का दिया और खाने के बाद में क्या हुआ वो हम कल देखते हैं क्योंकि कहानी थोड़ी लंबी है और वो मतलब उसका अंत भी थोड़ा सा ट्रे है अच्छे से हम उसको डिस्कस करेंगे ओम शांति