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Swami Vivekananda Great Summer ·

भव्य ग्रीष्म: रिजली मैनर में स्वामी विवेकानन्द 12 sep 2024

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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार बिषय कृष्णा हमने देखा कि किस तरह से स्वामी विवेकानंद रिजली मैनर में रह रहे हैं उस समय का नाम द ग्रेट समर भव्य ग्रीष्मा और इस तरह से जोसेफाइन मैक्लाउड उसको कैलिफोर्निया जाना हुआ और जोसेफाइन की जगह पर वहां पर रिजली मैनर में रहने के लिए आई है निवेदिता और निवेदिता का स्वामी जी का जिस तरह से रिलेशन था स्वामी जी जिन लोगों को अपने मन की गहराइयां जिनके सामने व्यक्त कर सकते थे अपने इंटेलेक्चुअल फिलोसॉफिकल और आध्यात्मिक अनुभव एक्सपीरियंस और इनसाइट दोनों बिना किसी द्विधा के जिनके साथ में शेयर कर सकते थे उसमें से एक थी यह निवेदिता और इसमें भी यह देखने की बात है कि निवेदिता शी इज अ वेस्टर्न उसका माइंड सेट है शी इज वो तो ब्रिटेन में उसका जन्म हुआ था उसका तो नाम था मार्गरेट नोबल तो उसका एक पूरा वेस्टर्न माइंड सेट से जो स्वामी जी को क्वेश्चन करती है और स्वामी जी उसको जिस तरह से उत्तर देते हैं इफ वी कंट्रास्ट दिस विथ शरद चंद्र चक्रवर्ती विथ विरजानंद जी महाराज विथ शुद्ध जी महाराज विथ हिज आला सिं पेरूमल एंड अदर दूसरे जो मद्रास के डिसाइल है और उनके जो गुरु भाई है जैसे कि राजा महाराज है शरद महाराज है शशि महाराज है वगैरह तो यहां पर एक स्पष्ट कंट्रास्ट भी हमको देखने को मिलता है बात यह नहीं है कि स्वामी जी दोनों ग्रुप को डिफरेंट डिफरेंट बातें बताते हैं बेसिक प्रिंसिपल तो वही है किंतु जो उनको समझाने की जो कांसेप्ट है समझाने का जो तरीका है समझाने के जो शब्द है वो वर्ड्स और कांसेप्ट और वो जो आइडियाज वो थोड़े से डिफर हो जाते हैं वेस्टर्न माइंड को जो आसानी से समझ में आए इसके लिए वेस्टर्न तरीके से समझाना पड़ता है ईस्टर्न माइंड को या तो फिर इंडियन माइंड को जो आसानी से समझ में आए उसके लिए इंडियन तरीके से समझाना पड़ता है तो यहां पर निवेदिता रिजली मैनर में स्वामी जी के साथ में रहे बिताए हुए दिनों के बारे में जो कह रही है उसके बारे में जो उनके रेमसंस से लेटर्स से उसका एक संकलन यहां पर है जिस तरह से यह मेरी लुईस इस किताब में लिखती है तो कल हमने देखा एक एक बड़ा ही आश्चर्यजनक एक बड़ा ही पावरफुल स्वामी जी का थॉट तो मेडिटेशन इज द ग्रेटेस्ट सर्विस द मोस्ट डायरेक्ट ट कैन बी रेंडर्ड मेडिटेशन या तो ध्यान है वह सर्वश्रेष्ठ सेवा है और यह मनुष्य जो ध्यान की सेवा करता है ध्यान के माध्यम से दूसरों की सेवा करता है वह सर्वश्रेष्ठ ध्यानी भी है और कर्मयोगी भी है जैसे कि भगवान शिव इसके साथ-साथ में स्वामी जी बताते हैं कि किस तरह से श्री रामकृष्ण के साथ में उन्होंने जो दिन बिताए हैं उन दिनों में उन दिनों के बारे में बड़ा ही सुंदर पैसेज है किस तरह से गंगा के किनारे पंचवटी के नीचे बैठ कर के स्वामी जी ठाकुर की बातें सुना करते थे मंत्र मुक्त होकर के किस तरह से स्वामी जी ने अपने जीवन के फॉर्मेटिव डेज जिसको कहा जाता है युवावस्था के दिन उन्होंने अपना चरित्र घडतर ठाकुर की शिक्षा के माध्यम से किया तो यहां पर स्वामी जी क्या लिखते हैं जब वो उस दिनों के बारे में जबक गंगा के किनारे परफेक्ट साइलेंस ब्रोकन ओनली बाय द क्राइस ऑफ द जैकल्स इन द डार्कनेस अंडर द ग्रेट ट्री वी सेड नाइट आफ्टर नाइट द होल नाइट थ्रू एंड ही टॉक टू मी वन आई वाज ए बॉय जब गंगा के किनारे रुद्र शांति प्रचंड शांति थी यह जो दक्षिणेश्वर तो वैसे भी तो कोलकात्ता से थोड़ा सा दूर था और आज वैसे उस दिनों में देखा जाए तो आजकल की तरह शहरों में जो घूघाट जो नोइज पोल्यूशन जो एयर पोल्यूशन जो लाइट पोल्यूशन यह जो सब होता है उस दिनों में इतना नहीं था लाइट पोल्यूशन जैसे कि पता है जो लोग एस्ट्रोनोवा का स्टडी करते हैं स्पे का स्टडी करते हैं यूनिवर्स का स्टडी करते हैं वे लोग बड़े-बड़े दूरबीन बनाते हैं उस दूरबीन के माध्यम से वे लोग आकाश में किस तरह के तारे हैं किस तरह की गैलेक्सी है और किस तरह से उन मने वो सब व लोग ऑब्जर्वेशन करके यह लोग पूरा साइंस डेवलप करते हैं एस्ट्रोनॉमी का अभी ये एस्ट्रोनॉमिकली स्कोप डेवलप हो रहे थे और उससे पहले भी यह रिफ्रैक्टर टेलिस्कोप है वैसे तो गैलीलियो ने गैलीलियो टेलिस्कोप के माध्यम से उसने खोजा कि ये चंद्र के ऊपर में किस तरह से यह लाइंस वगैरह है चंद्र के ऊपर में पहाड़ है कैनल है वगैरह और कैनल अर्थात पानी का नहीं वो जस्ट खैर चंद्र के ऊपर में पहाड़ भी नहीं है वो है मार्स के ऊपर में मंगल के ऊपर में मंगल ग्रह के ऊपर में किंतु न्यूटन ने ये रिफ्रैक्टर टेलिस्कोप जो है आजकल जो सबसे ज्यादा पॉपुलर जो टेलिस्कोप कहा जाता है न्यूटन ने खोजा तो न्यूटन के समय से 1930 40 तक का ऐसा समय था कि शहर में बहुत ज्यादा लाइट्स नहीं थी ज्यादातर तो गैस के दिए या तो ऑयल के दिए जला करते थे तो क्या होता था रात में अंधेरा बहुत होता था स्ट्रीट लाइट्स बहुत ज्यादा नहीं थी तो जब भी आप टेलिस्कोप के माध्यम से रात्रि को आकाश का अवलोकन करेंगे तब क्या होगा एकदम घनघोर रात्रि है तो घनघोर और अंधेरा है तारे बड़े ही स्पष्ट रूप से आपको दिखाई देंगे किंतु अभी रिसेंटली खास करके आखिरी 102 सालों में अभी सिटी में इतनी सारी लाइट्स बढ़ गई है इतने और फिर यह ग्लेयर वाली लाइट ये फिर ये लोजन लाइट और इतनी तीव्र प्रकाश शहरों में रात को चारों ओर नियोन लाइट है वो चारों ओर इतना फैलता है कि अपना जो पृथ्वी का अपर एटमॉस्फियर है उसमें से यह प्रकाश उसमें जाकर के उसके साथ में टकराता है और पृथ्वी का जो पूरा अपर एटमॉस्फियर है उसको उसमें उसका जो अंधेरा है अंधेरा कम कर देता है यानी कि ये जो बड़े-बड़े टेलिस्कोप है वो सीधा जद तारों की ओर देखेंगे तो उनको जो अंधेरा चाहिए रात का अंधेरा वो रात का अंधेरा उनको इतना नहीं मिलता क्योंकि सिटी का शहरों का प्रकाश चारों ओ फैल जाता है अंधेरी रात को वो उजाले में परिणत कर देते हैं तो इसीलिए सितारों का अवलोकन करने में उन लोगों को तकलीफ होती है उसमें भी एक दूसरा देखिए आजकल दुनिया भर के सेटेलाइट पृथ्वी के चारों ओर घूमते रहते हैं और उनके जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल होते हैं वो भी ये टेलिस्कोप में इंटरफेयर करते हैं तो आजकल अवकाश का अवलोकन करना स्पेस का निरीक्षण करना तकलीफ देय हो गया है आपको कहीं दूर सुदूर जंगल में पहाड़ पर टेलिस्कोप बनाना होगा तब कहीं जाकर के आपको स्वच्छ आकाश मिलेगा वरना शहरों के आसपास में तो प्रकाश का प्रदूषण इतना मिलेगा तो आजकल यह ने कितने तरह के प्रदूषण है एक तो नोइज पोल्यूशन है जो कि हम सबको पता है साउंड सब समय कुछ ना कुछ कहीं पे यह गाना कहीं पे वो वगैरह फिर दूसरा है एयर पोल्यूशन उसके बारे में भी हमको पता है कि जो यह गाड़ी है यह फैक्ट्री है ये सब में से कितना धुआ निकलता है कार्बन डाइऑक्साइड निकलता है और तीसरा है लाइट पोल्यूशन अर्थात कि प्रकाश का भी एक प्रदूषण होता है स्वच्छ आकाश जिसको चाहिए तारों का निरीक्षण करने के लिए उनको सब समय उनको एक प्रकार लाइट लाइट जैसा एक दिखता है स्वच्छ निर्मल आकाश उनको देखने को नहीं मिलता तो ये आजकल देखिए कि स्पिरिचुअलिटी भी हम लोगों की धीरे-धीरे करके खत्म हो रही है रिलीजियस एक एक क्या कहेंगे कि एक्सप्रेशन है कि हां मैं मंदिर में जा हूं मैं व सब विधि विधान करता हूं किंतु एक सहज सरल शांत शीतल पवित्र स्पिरिचुअलिटी जो होती है आध्यात्मिकता अपने जीवन में कि हां मैं कहीं एक प्राकृतिक वीरान स्थान में जाकर के बैठूं कहीं पर बगीचा है कहीं पर एक शांत जगह है कहीं पर मंदिर है जहां पर ज्यादा लोग नहीं आते हैं वहां पर जाकर के मैं बैठूं और आंख बंद करके प्राकृतिक जो सौंदर्य है प्राकृतिक जो शांति है उसमें मैं अपने को मग्न कर दूं इस तरह से आजकल मिलना ही मुश्किल है जहां पर भी जाएंगे सब समय कुछ ना कुछ जोर-जोर से आवाज होता रहेगा कहीं पे नोइज पोल्यूशन तो कहीं हवा भी इतनी खराब होगी एयर पोल्यूशन भी अब शांति से बैठ नहीं पाएंगे तो किंतु स्वामी जी का समय था स्वामी जी इज लकी कि 1880 में 1880 18818 83 वो सब दिनों में ठाकुर को मिले थे तो उस समय ही था एयर पोल्यूशन ना ही था नोइज पोल्यूशन ना ही था लाइट पोल्यूशन तो जो प्रचंड शांति वहां पर जंगल में मिल देखने को मिलती है वह भी यहां पे गंगा के किनारे दक्षिणेश्वर मंदिर में देखने को मिलती थी शांति है बहुत ही कम आवाज होता है बहुत ही कम लोग वहां पर जाते हैं और स्वच्छ निर्मल शांत आकाश है और यहां पे यह गंगा का गंगा की नदी का कलरव कल कल कल के वो कलरव जो उसका जो सुमधुर संगीत है वो सुनने में आ रहा है और यहां पर पंचवटी है पंचवटी में वटवृक्ष है वटवृक्ष के तले में भगवान श्री राम कृष्ण स्वयं युगा वतार श्री राम कृष्ण स्वयं वो विराजमान है और यह युवा नरेण है उनको यह आध्यात्मिक जीवन के गभीर तथ्य गभीर सब रहस्य नरेद के सामने उत्पात कर रहे हैं वो उद्घाटित कर रहे हैं तो नरेण अभी तो यह स्वामी विवेकानंद बोलकर के जग विख्यात है किंतु जब भी वह आंख बंद कर के अपने मन को स्थिर करने का प्रयास करेंगे फिर से वही पंचवटी के नीचे में फिर से वही दक्षिणेश्वर में श्री राम कृष्ण के चरण कमल के पास में पहुंच जाएंगे श्री राम कृष्ण देव की अमृतम कथामृत श्रवण करते हुए उनके जो युवावस्था के दिन गए हैं वहां पर प्रचंड शांति के बीच में एकदम स्वच्छ निर्मल घनघोर अंधेरे से भरा हुआ आकाश जिसमें कि लाखों लाखों टिम टिम करते सितारे आजकल तो शहरों में आप आकाश में देखेंगे तो आपको सितारे दिखते ही नहीं है क्यों क्योंकि एक तो एयर पोल्यूशन है दूसरा लाइट पोल्यूशन है किंतु किसी गांव में या किसी जंगल में या तो किसी पहाड़ पर चले जाइए इतना स्पष्ट आकाश दिखेगा इतने लाखों लाखों सितारों से यह अपना आकाश भरा हुआ दिखेगा कि हम लोग आश्चर्य चकित हो जाएंगे मैं पहली बार मैं कन्याकुमारी में कुछ दिन रुका था वहां पर वो विवेकानंद केंद्र बोलकर के एक संस्थान है और उन लोगों का अपना एक बीच है तो मैं क्या करता था कि रात को मैं जाकर के बीच के ऊपर में लेटा रहता था जो और मैं आकाश के सामने देखता र ता था क्योंकि मैं तो वैसे तो मैं शहर में बड़ा हुआ हूं तो क्या है कि सब समय ये शहर में तारे देखना पोल्यूशन की वजह से तो बड़ा मुश्किल होता है बीच-बीच में गांव में जाते थे किंतु क्या है कि छोटे बच्चे होते हैं तो गांव में जाकर के सब समय मन तो वहीं प रहता है कि चलो अपने कजीन है अपने रिलेटिव्स है उनके साथ में गप लगाए उनके साथ में खेले उनके साथ में वहां पर अच्छी-अच्छी जो चीजें बनती है उसको खाए घूमने के लिए जाए आकाश के सामने आंख थोड़ा सा मन को शांत करके देखने का समय ही किसके पास में होता है जब छोटे बच्चे अपने गांव में जाते हैं तो तो मैं वैसे गांव में जाता था किंतु आकाश के सामने इस तरह से कभी देखा नहीं ये मैच्योरिटी चाहिए एज और आपकी अकल यह दोनों की एक मैच्योरिटी आती है तब आप अपने मन को शांत करके आकाश की ओर देखते हैं और वह मैच्योरिटी फिर सभी की आती भी नहीं है तो एनीवे मैं वहां कन्याकुमारी गया था और वहां प बीच के ऊपर में मैं वहां पर एक बेंच था बहुत ही सुंदर एक बेंच उसके ऊपर में मैं लेट करके आकाश के सामने देखा करता था क्योंकि इतना घनघोर अंधेरे से भरा हुआ आकाश मैंने देखा नहीं था कभी भी और इतने सारे सितारे इतने सारे सितारे कि आप आश्चर्य चकित हो जाएंगे कि आकाश में इतने सारे तारे है कि व स ही हमने पढ़ा है वैसे कि अपनी मिल्की वे गैलेक्सी में 100 बिलियन स्टार्स है यानी कि 100 करोड़ से भी ज्यादा हजार करोड़ से हजार करोड़ से भी ज्यादा इस ब्रह्मांड में सिर्फ अपनी मिल्की वे गैलेक्सी में इतने तारे हैं फिर ये जो इस तरह की मिल्की वे गैलेक्सी की तरह लाखों करोड़ों गैलेक्सी है तो मैंने वो गिन नहीं सकते आप इतने सारे सितारे ब्रह्मांड में है तो यह सब पढ़ा है हमने थियोरेटिकली कभी नजरों से प्रत्यक्ष नहीं किया तो वहां पर मैं इस तरह से लेटा हुआ था मैं आकाश पूरा तारों से भरा हुआ दे करके एकदम मन भर कर के उसको देखता रहता था मन एकदम शांत हो जाता था उस समय और समुंदर के जो ये वेव्स होते हैं ना उसका एक आवाज होता है एक भैरव ये जो ये ये है ना वो राग आप राग के बारे में मुझे इतना तो ख्याल नहीं है किंतु इतना तो मैं कह सकता हूं कि वो जो समुंदर के वो इसकी तरंगों की आवाज है जब वो बीच के साथ में टकराते हैं जैसे भैरव राग में कोई भगवान शिव की स्तुति कर रहा है ऐसा लग रहा है कि दूर समुंदर में समुंदर देवता स्वयं अपने इस मोजों के टकराव की आवाज से भैरव राग में भगवान शिव की आराधना कर रहा है इतना सुंदर दृश्य वो था एक दिन मैंने देखा कि एक तारा जैसे कि हवा में उड़ रहा है तारा आकाश में जैसे कि उड़ रहा है तो मैं तो आश्चर्य चकित हो गया मैंने सोचा कि ये ना ही एरोप्लेन है क्योंकि एरोप्लेन तो मैंने बहुत देखें एरोप्लेन आकाश में उड़ता है तो उसकी जो लैंडिंग लाइट्स होती है वो तो समझ में आती है कि एरोप्लेन की लाइट है उसके बाद में मैंने सोचा ये मेटराइड भी नहीं है क्योंकि मेटराइड जो आकाश में उड़ती है बहुत ही वो एकदम एक उसके पीछे में एक लंबी सी प्रकाश की पूंछ दिखाई देती है क्योंकि वह अपने एटमॉस्फियर के साथ में टकराती है तो वह जल जाती है तो जलने की वजह से उसकी एक उसकी जो अग्नि शिखा है एक लंबी पूंछ की तरह उसके पीछे में उड़ती रहती है तो ये मेटराइड नहीं है वो तारा नहीं हो सकता ग्रह नहीं हो सकता ग्रह वैसे तो आकाश में तारों की बजाय वह ज्यादा स्पीड से चलते हैं किंतु आप अपनी आंखों से समझ नहीं पाएंगे कि यह ग्रह है और वह चल रहा है और यह तारा भी नहीं हो सकता क्योंकि तारे तो स्थिर होते हैं तो दूसरे दिन सुबह को मैंने वहां पर रहने वाले दूसरे किसी एक भाई से पूछा मैंने कहा कि मैं वैसे तो मुझे एस्ट्रोनॉमी में काफी इंटरेस्ट है और आकाश में क्या-क्या देखने को मिलता है उसके बारे में मुझे काफी अंदाज है किंतु एक मैंने आश्चर्य चक चीज देखी एक ऐसा तारा जो कि आकाश में सही सही में अपनी जगह से ऐसा ऐसा करके चल रहा है ऐसा कैसे संभव है तो उन्होंने क्या कहा पता है अरे वो तो सेटेलाइट है मैंने कभी ऐसा सेटेलाइट अपनी आंखों से देखा नहीं था शहर में आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि यह जो सेटेलाइट होते हैं ना टेलीकम्युनिकेशन के जो कि आकाश में वो छोड़े जाते हैं वो पृथ्वी के आसपास में ऑर्बिट करते रहते हैं और ये अपने मोबाइल वगैरह सिग्नल जो होते हैं उन्हीं के माध्यम से वो ट्रांसमिट होते हैं तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि हम अपनी आंखों से सैटेलाइट देखेंगे किंतु वहां पर मुझे वो भी देखने को मिला एक स्वच्छ निर्मल आकाश और शुद्ध हवा पानी और नदी या समुंदर की य कलकल या तो फिर यह रुद्र आवाज उसके रुद्र संगीत यह सब जगह पर जाकर के मनुष्य का मन स्वतः शांत हो जाता है हम अपने कमरे में बैठ कर के 10 बार जद एक घंटा भी यदि जब ध्यान करने का प्रयास करें तो उससे मन को इतनी शांति नहीं मिलेगी जितनी शांति हमको इस तरह से प्राकृतिक नजारा है वहां पर जाकर के मिलेगी या तो किसी मंदिर में बैठ कर के मिलेगी क्योंकि वहां की तनमानिया जगह होती है हम देख लीजिए कि 100 हज 20 हज साल का यह जो भारतीय संस्कृति का इतिहास है वेदों की रचना होने के बाद में जो हमारे ऋषि मुनियों ने ज ध्यान साधन भजन का जो प्रवाह इस भूमि के ऊपर में किया है हमारी हमारे भारत देश की जड़ों तक जिस आध्यात्मिकता ने सिंचन किया है उस आध्यात्मिकता यह सभी रमणीय स्थान जितने भी मंदिर है सब जगह पर आपको कोई ना कोई ऋषि ने कोई ना कोई साधु संत ने तपस्या की ही होगी ऐसा हम पक्का कह सकते हैं तो इसीलिए यह सब जगह पर मन ऑटोमेटिक स्थिर हो जाता है और यहां पर स्वामी जी को देखिए वैसे तो रिजली मैनर जैसी बड़ी ही सुंदर जगह पर रह रहे थे प्राकृतिक दृश्य सौंदर्य ता सब कुछ था किंतु भारत की पुण्यभूमि में जिस तरह से एक के बाद एक संतों ने तपस्या की है पुण्यभूमि को सिंचित किया है ऐसा अभी तक अमेरिका में नहीं हुआ था अमेरिका में क्रिश्चियनिटी आई थी किंतु क्रिश्चियनिटी का पूरा एक डिफरेंट तरह का एटीट्यूड है और उसके पहले वो जो नेटिव इंडियन कल्चर थे तो वैसे तो वहां पर भी यह रिलीजन वगैरह था किंतु वो रिलीजन इतना डेवलप नहीं हो पाया था इसीलिए जब क्रिश्चियनिटी का आगमन हुआ यह यूरोपियन सेटलर्स का वहां पर आगमन हुआ तो उनका वह जो स्थानिक जो धर्म था स्थानिक संस्कृति थी उसका हमेशा के लिए विनाश हो गया तो इसीलिए स्वामी जी जब अपने मन को स्थिर करके जब कोई भी बात को चिंतन मनन स्मरण करने का प्रयास करते हैं ईश्वरीय इमीडिएट उनका मन फिर वहीं पर दक्षिणेश्वर में चला जाता है एक तो रुद्र शांति है पंखियो का कलरव होगा गंगा नदी का कलकल करके संगीत बह रहा है और भगवान श्री राम कृष्ण स्वयं आदि पुरुष आदि नारायण श्री राम कृष्ण स्वयं श्री राम कृष्ण का रूप धारण करके पृथ्वी पर अवती हुए हैं और उनके श्री चरण कमल के सामने बैठकर के यही युवा नर कॉलेज में पढ़ता हुआ लड़का उनकी अमृतवाणी का मंत्र मुग्ध होकर के स्मरण कर रहा है श्रवण कर रहा है अभी निवेदिता आगे लिखती है स्वामी विवेकानंद के बारे में वह कहती है आई नेवर हर्ड द प्रोफेट टॉक सो मच ऑफ श्री रामा कृष्णा प्रोफेट मैंने प्रोफेट को अर्थात कि पैगंबर को श्री राम कृष्ण देव के बारे में इतनी सारी बातें करते हुए पहले कभी नहीं सुना था अब यह पैगंबर या तो प्र पेट कौन तो स्वामी जी स्वयं स्वामी विवेकानंद को यह जोसेफाइन मैक्लाउड है ओली बूल है या तो फिर यह निवेदिता है ये लोग आपस में स्वामी जी को प्रोफेट या किंग करके पुकारा करते थे किंग अर्थात कि राजा तो प्रोफेट यानी कि पैगंबर तो सम्मानजनक रूप से इस तरह से वे लोग उनको पुकारा करते थे निवेदिता कभी लेटर में लिखे गी कि द किंग सेड दिस राजा ने यह कहा फिर प्रोफेट सेड दिस अर्थात कि पैगंबर ने ऐसा कहा तो स्वामी जी के बारे में प्रोफेट या किंग ऐसे शब्द यह लोग यूज करते थे तो यहां पे निवेदिता कहती है कि प्रोफेट को मैंने इससे पहले कभी भी ठाकुर के बारे में इतनी सारी बातें करते हुए नहीं सुना है और स्वामी जी का भी देखिए स्वामी जी का किस तरह से था कि वह चाहते थे कि किसी व्यक्ति की पूजा ना हो किंतु यह प्रिंसिपल्स यानी कि विचारों की पूजा हो विचार अर्थात कि आइडियाज पर्सन एंड प्रिंसिपल दो चीजें हैं पर्सन अर्थात कि अवतार अभी स्वामी जी अमेरिका आकर के या तो लंडन जाकर के ऐसा कहते कि मेरे भगवान श्री राम कृष्ण है उनकी आप पूजा कीजिए तो ये लोग कहेंगे हमारे जीसस क्राइस्ट है हम उनकी पूजा क्यों ना करें ऊपर से वो कहेंगे तुम भी उनकी पूजा करना चालू कर दो ज राम कृष्ण के पास में जो पावर है वही तो जीसस के पास में है तो यह व्यक्ति को लेकर के झगड़ा करने की बजाय स्वामी जी का पहले सबसे पहले आईडिया था कि इनको वेदांत में कहे गए सनातन सत्य सुनाए जाए आत्मन की अमरत्व के बारे में इनको बताया जाए क्योंकि यह उनके लिए एक नया विचार था अवतार की पूजा करना अपने पूरे विश्व में कोई नया विचार नहीं है इस विश्व में आप जहां पर भी जाएंगे कोई ना कोई एक महापुरुष संत या अवतार या तो फिर प्रोफेट ना कि इस सब की पूजा होती रहती है क्रिश्चियनिटी के अपने प्रोफेट है अपने अवतार है इस्लाम के अपने है फिर यह बुद्धिज्म में भगवान बुद्ध है जितने भी मेजर रिलीजन है उन सबके एक स्थापक है और उन सबके ईश्वर है देवी देवता एं हैं संत साधु महात्मा है तो उन सबकी तो पूजा ये लोग करते ही रहते हैं स्वामी जी कहेंगे कि आपके साधु संतों को हटा कर के हमारे साधु संतों की पूजा करना चालू कीजिए उसमें नई बात उन्होंने क्या कही है किंतु वेदांत के जो विचार है वो इस जगत के लिए बिल्कुल नए हैं एशिया के बाहर भारत के बाहर आत्मा का अमरत्व आत्मा का दिव्यत्वाची यह जो इम्मोर्टालिटी पावर कॉन्फिडेंस विल पावर यह जो सब गुण धर्म है वह भारत के बाहर में बिल्कुल नए थे तो स्वामी जी ने कहा कि भारत से बाहर जाकर के सर्व पहले तो आत्मन का जयघोष इनको सुनाना होगा आत्मन के अमरत्व के बारे में सबसे पहले इनको बताना होगा उसके बाद में बाकी सब बातें हैं उसके बाद में भगवान राम कृष्ण के बारे में हम बात करें उसके बाद में भारत के जितने बाकी सब साधु संत महात्मा है भगवान राम भगवान कृष्ण उनके बारे में उनके बारे में कथाएं कहानियां पुराण व सब हम बाद में कहेंगे सबसे पहले आत्मन के अमरत्व के बारे में उनको सुनाया जाए तो स्वामी जी पहली बार जब अमेरिका और लंडन गए थे तो ज्यादातर उन्होंने वेदांत के बारे में और यह चार योग कर्म योग ज्ञान योग भक्ति योग और राजयोग इसके बारे में उन्होंने सबसे ज्यादा बात की थी किंतु जब सेकंड टाइम अमेरिका आए हैं स्वामी जी और एक नया मैसेज लेकर के आए हैं स्वामी जी इस हमको ऐसा लगेगा कि पहली बार जब उन्होंने इस तरह से वेदांत और योग के बारे में बात किया तो सेकंड टाइम वो जाकर के ऐसा कहेंगे कि चलो अभी मैं भगवान श्री राम कृष्ण देव के बारे में बात करता हूं अभी ये वेदांत और योग बहुत हो गया अभी भगवान अभी अवतार तत्व के बारे में बात करते हैं किंतु नहीं एक्चुअली स्वामी जी का सेकंड टाइम का जो मैसेज था वो तो और भी ज्यादा रेडिकल था जद पहले वाला मैसेज रेडिकल था कि अवतार को छोड़िए और वेदांत और योग को पकड़िए फिलोसोफी को पकड़िए समझिए कि हमारे भीतर में आत्म तत्व है और ये चार योगों के माध्यम से आप उसको प्राप्त कर सकते हैं तो ये जद रेडिकल था तो ये अभी का जो सेकंड टाइम का जो मैसेज था और भी ज्यादा रेडिकल था स्वामी जी कहते हैं कि चरित्र ही एक सर्वश्रेष्ठ हमारा हमारी संपद है कैरेक्टर इज द ग्रेटेस्ट स्ट्रेंथ दैट अ ह्यूमन कैन हैव चरित्र के माध्यम से ही हम इस भवसागर को पार कर सकते हैं और और भी ज्यादा रेडिकल होकर के स्वामी जी कहते हैं यह बुद्ध है राम है कृष्णा है वगैरह अवतारों ने पृथ्वी पर आकर के मनुष्यों का कल्याण करने की बजाय उनकी हानि ज्यादा की है उनका बुरा ज्यादा किया है क्यों क्योंकि मनुष्य सब समय इस तरह के अवतारों के ऊपर में भरोसा करके बैठा रहता है कि हां यह भगवान है यह भगवान मुझे भवसागर पार करवा देंगे मुझे अपना चरित्र परिवर्तन करने की मुझे अपना स्वभाव परिवर्तन करने की अपनी इंद्रियों को संयमित करने की यह सब कोई आवश्यकता नहीं है मैं अभी शांति से उनका नाम लेकर के रहूंगा नाम लेना बुरा नहीं है शरणागति एक बहुत बड़ी सिद्धि है किंतु ज्यादातर हम किसी के पास में शरणागति होती नहीं है हृदय से हम लोग अपने को पूरे पूरा भगवान के श्रीपाद पद्म में सरेंडर करते नहीं है मुंह से सिर्फ बोलते रहते हैं कि हां जैसे भगवान जैसा जाहा कोरेन रघुवीर खुदीराम का था खुदीराम अर्थात की भगवान श्री राम कृष्ण देव के पिताजी व जब भी कोई भी मुसीबत आन पड़ती थी तो अपने प्रिंसिपल ऐसे अड़क है कि प्रिंसिपल में से कभी भी वो नहीं होंगे प्रिंसिपल को कभी भी वह त्याग नहीं करेंगे और यदि घर में खाने को नहीं है तो ऐसा नहीं है कि जिस तिस किसी के पास में से भिक्षा ग्रहण कर ले भिक्षा ग्रहण करने का भी उनका एक कड़ा नियम है जो कि शुद्ध आचारी ब्राह्मण है उसी के पास में से भिक्षा ग्रहण करनी है और किसी के पास में से नहीं भले ही चाहे मुझे भूखा रहना पड़े सत्य वचन का पालन करने के लिए झूठी जुबानी नहीं देनी है तो अपने पूर्वजों का घर त्याग करके अपने पूर्वजों का गांव त्याग करके नए गांव में जाकर के बसने लगे तो यह थे खुदीराम तो जब भी कोई मुसीबत आन पड़ती है तो खुदीराम अपने क्या कहते थे जहा कोरेन रघुवीर जैसा करे रघुवीर रघुवीर जैसा करेंगे वैसा होगा यदि घर में बीमारी है तो रघुवीर ही उसका उपाय करेंगे यदि घर में दारिद्र्य है घर में भूख खाने के लिए कुछ नहीं है तो जहा कोरेन रघुवीर जैसा रघुवीर करेंगे ऐसा होगा तो अभी खुद हीराम तो ऐसा कह सकते हैं कि जहा कोरेन रघुवीर जो करे रघुवीर हम लोग जद मुंह से ऐसा बोलने लगेंगे तो वह हास्यास्पद हो जाएगा क्यों क्योंकि हम लोग सभी चीजों का प्लान करके चलते हैं कल मुझे मेरा इतना बैंक बैलेंस होना चाहिए मुझे यह होना चाहिए इवन साधु लोगों के बारे में भी हम लोग भी अपना सब प्लान करते हैं कि हां मेरा भविष्य में मुझे इस तरह का कुछ हो ऐसा कुछ प्राप्त हो उसके लिए अभी से मुझे यह सब करना पड़ेगा य कोई कोई लोग सोशल नेटवर्किंग बढ़ाते हैं कोई कोई लोग प्रवचन देना शुरू करते हैं यह सब सब जगह पे जितने भी क्षेत्र है सब लोग भविष्य का तैयारी करते हैं कि भविष्य में मेरे साथ में कुछ गड़बड़ ना हो जाए मुझे एक तरह का सेफ्टी एक तरह का सिक्योरिटी चाहिए उसके लिए मुझे कुछ ना कुछ अभी से करना पड़ेगा ईश्वर के ऊपर में मुझे श्रद्धा है ईश्वर के ऊपर में मैं शरणागत हूं यह बात सिर्फ हम लोग ज्यादातर 99 पर लोग वो गृहस्थ हो न की सन्यासी सिर्फ मुंह से ही बोलते रहते हैं वो बात उनके हृदय तक जाती नहीं है तो वह संपूर्ण शरणागति होना वो एक अलग ही बात है जब तक हम लोग मुंह से बोलते रहेंगे कि हां भगवान राम है जहा करेन रघुवीर रघुवीर है वोह लोग सब देख लेंगे यह सब जब तक हम मुंह से बोलते रहेंगे तब तक शरणागति आती नहीं है और दूसरी बात है कि कुछ करने की बजाय पुरुषार्थ करने की बजाय हम ऐ सब झूठ मुठ का बोल कर के बैठे रहते हैं ऐसा नहीं कि आध्यात्मिक जगत में मुझे यदि आगे बढ़ना है तो जब ध्यान साधन भजन का एक जो अविरत प्रवाह है वो बहता रहे मेरे जीवन में प्रतिदिन संध्या और सुबह दोनों समय प्रातः काल और संध्या काल दो समय तो मिनिमम में बैठ कर के 10 से 15 मिनट जप करूं आज के समय में ऐसा कौन होगा जोक आधा घंटा 20 मिनट नहीं दे पाएगा ईश्वर को मोबाइल के ऊपर में घंटों घंटों तक बिता देते हैं किंतु जद ईश्वर का नाम लेने की बात आई तो 10 मिनट देने से भी अरे तो परेशानी हो जाती है मेरा यह काम है वो काम है जब हम टीवी देखते हैं मोबाइल देखते हैं तब हमको काम याद नहीं आता जैसा आंख बंद करके ईश्वर का नाम लेना शुरू करते हैं दुनिया भर का सब कुछ याद आने लगता है अच्छा यह खाना बनाना है वहां पर जाना है यह बिल भरना है वो काम यह दुनिया भर का 10 मिनट भी हम शांति से नहीं बैठ पाएंगे यह अपना जीवन परिवर्तित करने की बजाय साधन भजन जप ध्यान तपस्या करने की बजा यह योग और वेदांत में गहराई की जाने की वजह हम लोग सिर्फ मुंह से लिप सर्विस देंगे कि हां भगवान है भगवान सब कुछ करेंगे प्योर शरणागति भी नहीं है और पुरुषार्थ भी नहीं है देखिए दो चीज है पुरुषार्थ और परमार्थ आध्यात्मिक जीवन में परमार्थ अर्थात कि ईश्वर की कृपा से मुझे आध्यात्मिक जगत में मेरी उन्नति होगी और पुरुषार्थ अर्थात कि ये योग और वेदांत का आचरण करने से अनुष्ठान करने से मैं आध्यात्मिक जगत में आगे बढूंगा अभी ना ही है पुरुषार्थ ना ही है परमार्थ ना ही मैं अपने से कोई चेष्टा कर रहा हूं जप कर रहा हूं एटलीस्ट 15-20 मिनट बैठ कर के एटलीस्ट आधा घंटा में सद ग्रंथ का पाठ कर रहा हूं एटलीस्ट आधा पौना घंटा में कोई सत्संग में बीता रहा हूं ना ही वो है ना ही संपूर्ण रूप से शरणागति है तो सिर्फ नाम लेने से ईश्वर का क्या होने वाला है मेरे जीवन में झूठ मुठ के ईश्वर ने आकर के और मैंने एक भरोस एक अपना पागल मन जो होता है पाजी मन ये कपटी मन जो है वो सब समय ये एक्सक्यूज देता रहता है कि ये एक्सक्यूज है तुम्हारे पास में इसका सहारा लो और हार्ड वर्क करने से तुम बच जाओ तो यह मन को एक झूठ मूठ का सहारा देते हैं यह अवतार लोग पृथ्वी पर आकर के मात्र यदि अवतार नहीं होते तो हमको यदि यह ऋषि मुनियों की वेदांत और योग की थिरी सिर्फ यदि हमारे पास में होती यह आइडियाज हमारे पास में होते तो हमको हमको कंपलसरी कंपलसरी योग और वेदांत का अनुष्ठान करना पड़ता तो यह था स्वामी जी का नया मैसेज पहली बार का जद मैसेज रेडिकल था कि योग और वेदांत के माध्यम से अपना आध्यात्मिक जीवन गठित कीजिए तो सेकंड टाइप का मैसेज और भी ज्यादा रेडिकल है ऐसा नहीं कि चलो अभी भगवान के पास में वापस चले जाऊ नहीं और भी ज्यादा रेडिकल कि चरित्र एक मात्र ऐसी सत्ता है एक मात्र हमारे पास में ऐसी संपद है जो कि हमारा आध्यात्मिक जीवन गठित करेगी हमारा भविष्य का निर्माण करेगी हमारे भविष्य का निर्माण करेगी तो यह चरित्र कैरेक्टर इज स्वामी जीज न्यू मैसेज तो दोनों बार देखिए फर्स्ट विजिट में भी और सेकंड विजिट में भी स्वामी जी ने ठाकुर के बारे में अल्प ही कहा है ज्यादातर तो इस आइडियाज कांसेप्ट और यह आत्मविश्वास आत्मनिर्भरता आत्मन का जो सौंदर्य है आत्मन की जो भव्यता दिव्यता है इसके बारे में ही स्वामी जी ने सबसे ज्यादा कहा है किंतु हां पे रिजली मैनर में निवेदिता कहती है कि पहली बार मैंने स्वामी जी को सुना सब समय ऐसे हाई कांसेप्ट देते रहते हैं पहली बार मैंने सुना स्वामी जी को ठाकुर के बारे में इतनी सारी बातें करते हुए कि किस तरह से वो ठाकुर के पास में आते थे किस तरह से पहले पहले तो ठाकुर की मजाक उड़ाया करते थे ठाकुर के प्रति श्रद्धा है ठाकुर के भीतर में वो सरलता चरित्र उनका जो सत चरित्र है चरित्र की जो दृढ़ता है उनका विषय त्याग है वह सब सद्गुण राजी वो स्वामी जी देखते हैं इसी से मोहित होकर के ठाकुर के पास में आए हैं नरेंद्र को तो कोई मूर्ख नहीं बना सकता कोई जाकर के नरेंद्र को कुछ उल्टा पुल्टा कह दे मन को भ्रमित कर दे वशीभूत कर दे हिप्नोटाइज कर दे ऐसा तो नरेंद्र के साथ में नहीं हो सकता नरेंद्र जद किसी को श्रद्धा करेगा ज यदि किसी के प्रति नरेंद्र का रिस्पेक्ट होगा तो दैट पर्सन हैज टू बी जेनुइन 100% उसका कैरेक्टर ठीक होना चाहिए तो यह 100% परफेक्ट कैरेक्टर उन्होंने ठाकुर में देखा इसलिए ठाकुर से प्रभावित होकर के वो बार-बार ठाकुर के पास में आते हैं किंतु जब ठाकुर यह सब बातें करते हैं कि हां मैंने ईश्वर का दर्शन किया मां काली का दर्शन किया मुझे यह सब दर्शन हुए हैं तब नरेंद्र को थोड़ा सा लगता है कि यह उनके मन का भ्रम मात्र है ठाकुर है बालक जैसे शुद्ध पवित्र किंतु बच्चे की तरह वो उटपटांग बातें भी किया करते हैं बच्चा देखेंगे तो सब समय वो कल्पना के राज्य में रहेगा वो कल्पना करेगा कि मैं हवा में उड़ रहा हूं वो जो सपना देखेगा बच्चा और वो बाहर वो जो जागृत अवस्था में वो डिफरेंस भी नहीं समझ पाएगा सपने में जो देखा है वो सही मान कर के अपने मित्रों के साथ में बात करना शुरू करेगा अरे मैं उस देश में गया था दूसरे देश में वहां पर मैंने यह सब देखा वो समझ नहीं पा रहा है कि यह सपना है कि सच है उसका चरित्र शुद्ध निर्मल है किंतु बुद्धि जो है वो बड़ी अल्प है बालक बुद्धि है तो ठाकुर के प्रतिदिन नरेंद्र का थोड़ा बहुत इस तरह का वर्तन था कि शुद्ध निर्मल पवित्र चरित्र है किंतु बालक बुद्धि है इसलिए यह जो सब दर्शन की बातें किया करते हैं जो इस तरह से भगवान के बारे में कहा करते हैं वह सब उनके मन का भ्रम मात्र है तो इस तरह का नरन का वर्तन उनका आचरण किस तरह से ओवर ए पीरियड ऑफ टाइम धीरे-धीरे करके परिवर्तित होना शुरू हुआ किस तरह से नरन ने आखिर में माहा काली को स्वीकार किया वो जो एक एकम सुंदर घटना कि उस दिन रात उस दिन सुबह को ठाकुर के पास में जितने भी लोग आ रहे हैं सबके सामने ठाकुर बड़े ही उल्लास होकर के बार-बार कह रहे हैं नरेन काली मेने छ नरेन काली मैने छ नरन ने मां काली को स्वीकार किया है नरेंद ने मां काली को स्वीकार किया है और वह सुंदर घटना कि नरेंद बार-बार मां काली के पास में जाता है अपने घर की जो अव अवस्थिति थी जो बड़ी ही दुरावस्था थी पिताजी का देहांत हो गया है घर में छोटे भाई बहन है मां है खाने के लिए कुछ है नहीं ठाकुर के पास जाकर के प्रार्थना की कि घर के लिए कुछ खाने का रहने का व्यवस्था कर दीजिए तो ठाकुर कहते हैं जाओ मां काली के पास में जाकर के मांगो तो माहाकाली के पास में जाकर के क्या मांगते हैं रोटी दो कपड़ा दो मकान दो नहीं ज्ञान दो भक्ति दो वैराग्य दो तीन बार स्वामी जी गए तीनों बार उनके मुंह से यही बात निकली ठाकुर के पास आकर के नाराज हो कर के कहते हैं महाशय आप ही ने कुछ गड़बड़ कर दिया है इसी वजह से मैं माहाकाली के पास में रोटी कपड़ा मकान नहीं मांग पा रहा हूं तो ठाकुर कहते हैं बेटा मैं क्या करूं तुम्हारा चरित्र तुम्हारे डीएनए में यही लिखा हुआ है ज्ञान भक्ति वैराग्य इसके अलावा तुमको मां के पास से और कुछ मिलने वाला भी नहीं है तो आखिर में किंतु ठाकुर ने कहा जाओ तुम्हारे परिवार का थोड़ा बहुत व्यवस्था हो जाएगा तो ये जो नरेण का संपूर्ण रूप से जो परिवर्तन हुआ ठाकुर के प्रति आस्था थी किंतु आस्था संपूर्ण भक्ति में जो परिणत हो गई यह पुराने दिनों की बातें नरेंद्र य जो पहली बार स्वामी जी पहली बार अपने वेस्टर्न डिसाइल के सामने खुल करके बता रहे हैं बिना किसी द्विधा के बता रहे हैं यह सब पहली बार निवेदिता ने स्वामी जी के से सुना है अभी ठाकुर के बारे में नरेंद्र यानी कि स्वामी जी क्या-क्या कहते हैं इसके बारे में निवेदिता क्या लिखती है ही टोल्ड अस व्ट आई हैड हर्ड बिफोर ऑफ हिस मास्टर इन फेबल जजमेंट ऑफ मैन फाइंडिंग गुड एंड ग्रेटनेस इन द लीस्ट अपेरेंट एंड जजिंग एट वंस ऑफ द बैड वेट ऑफ कर्मा ट सो एंड सो हेड यट टू वर्क थ्रू बिफोर ही कुड कम टू एनीथिंग एंड सो स्वामी सेड यू सी माय डिवोशन इज द डॉग्स डिवोशन आई हैव बीन रंग सो ऑफें एंड ही हैज ऑलवेज बीन राइट एंड नाउ आई ट्रस्ट हिज जजमेंट ब्लाइंड ठाकुर की एक सिद्धि थी कि वह मनुष्य का चरित्र पहचान लेते थे एक नजर में ही कौन आध्यात्मिक दृष्टि से आध्यात्मिक जगत में जिसका कितना विकास हुआ है एक ही बार में ठाकुर पहचान लेते थे यदि लगेगा कि कोई कोई एकदम ही सामान्य व्यक्ति है चेहरे पर दिखेगा कि वो अरे मूर्ख जैसा लग रहा है उसके भीतर में कुछ नहीं है जैसे अनपढ़ है जैसे कि अपने लाटू महाराज लाटू महाराज तो नौकर थे उनके जो उनके जो डिसाइल थे शिष्य थे रामचंद्र दत्त ठाकुर के शिष्य रामचंद्र दत्त रामचंद्र दत्त गृहस्थ थे उनका एक बहुत अच्छा उनका नौकरी भी था ब्रिटिश गवर्नमेंट में पैसे वगैरह भी अच्छे से वो कमा लेते थे उन्होंने अपने नौकर के रूप में लाटू को रखा था लाटू बिहार से आया है अनपढ़ है उनके पिताजी का माताजी का नाम भी उनको पता होगा पता ही होगा उनका जन्म बर्थ डेट उनको शायद नहीं पता था तो इस तरह से लाटू वहां पर आया है और रामचंद्र दत्त क्या करते थे मिठाई है फल है वगैरह बीच-बीच में ठाकुर को देने के लिए लाटू को भेजते थे जाओ जाकर के परमहंस महाशय हे दक्षिणेश्वर में उनको जाकर के यह दे आओ और लाटू नौकर यह सब फल मिठाई वगैरह लेकर के ठाकुर के पास में आता था और यह सब उनको देता था किंतु यह सब देने के बाद में क्या वहां पर बैठकर के मंत्र मुक्त होकर के ठाकुर की बातों का श्रवण करता था कथामृत सुनता था और भजन कीर्तन जो कुछ भी होता था सबसे बड़ा ही उसमें मग्न हो जाता था घंटों के घंटों ठाकुर के पास में बैठा रहता था ठाकुर को कहना पड़ता था अरे तुम्हारे मालिक तो तुम्हारे जो एंप्लॉयर है वो तो राम है जाओ राम के घर में जाकर के कुछ काम करो तुम यहां पर बैठे रहोगे दिन भर तो कैसे चलेगा तो लाटू कहता था कि महाशय राम बाबू ने कहा है उनकी पत्नी ने भी कहा है कि मैं जितना समय चाहूं दक्षिणेश्वर में रह सकता हूं तो यह नौकर के भीतर में ठाकुर ने आध्यात्मिक स्पार्क देखा आध्यात्मिक वो होमाग नि का उन्होंने दर्शन किया और इसीलिए आज लाटू महाराज स्वामी अदभुता अंद के रूप में 16 डायरेक्ट डिसाइल में ठाक के त्यागी संतान सन्यासी संतान के रूप में एक है हमारे सामने 18 तो ये ये ये जो अपने सन्यासी शिष्यों का एक के बाद एक उन्होंने चयन किया है और फिर ऐसे लोग जिनके भीतर में बाहर से लगेगा कि बहुत ही आध्यात्मिक है जैसे कि हाजरा है तो हाजरा क्या करता था वो माला पहनता था तिलक लगाता था पीतांबरी पहनता था और घर के सामने बैठ करर के ठाकुर के घर के सामने बैठ करर के सब समय में माला जप करता रहता था तो जो कोई भी वहां पे आएगा ठाकुर का दर्शन करने के लिए वे लोग बड़े प्रभावित हो जाते थे कहते थे अरे वाह ये तो बड़ा ही एक सुंदर महात्मा यहां पे बड़े ही उच्च कक्षा के महात्मा यहां पे बैठे हैं चलो थोड़ा सा उनका भी संग करें तो ठाकुर किंतु पकड़ लेते थे कि हाजरा का क्या है वो थोड़ा सा ऋण है और ऋण चुकाने के लिए वो यहां पे आकर के बैठा है यदि कोई बड़ा आदमी धनी आदमी उसके चक्कर में आ जाए तो उसके पास में से पैसा निकाल कर के ऋण वो चुका करके कर दे खत्म तो ये मने कोई बाहर से बड़ा दिखावा करता था तो उसका नाटक भी ठाकुर पकड़ लेते थे और बाहर से बिल्कुल नौकर थे यह लाटू महाराज या तो ऐसे कोई भी बाहर से नहीं लिखेगा कि ये कोई आध्यात्मिक है या कोई उच्च कक्षा के साधक है किंतु उनके भीतर का सत्व उनके कर्मों का प्रवाह ठाकुर पकड़ लेते थे क्योंकि अल्टीमेटली तो क्या होता है कि पिछले जन्म के जितने भी कर्म है इस जन्म के जितने भी कर्म है शुद्ध पवित्र हमारा आचरण है वही तो गोल घुमा कर के अपना आध्यात्मिक जीवन डिसाइड करते हैं मैं मुंह से कितनी हजारों बातें कर लूं किंतु मेरा आचरण यदि अपवित्र है अपवित्र लोगों का मैं संग करता हूं तो मेरे कर्मों का बंधन बढ़ता ही जाएगा और मैं बाहर से भले चाहे भगवान के बारे में कुछ ना बोलू किंतु मेरा आचरण जद ठीक-ठीक है जद एथिक्स एंड मोरालिटी के रास्ते प मैं हमेशा चला हूं पवित्रता के रास्ते पे मैं यदि हमेशा चला हूं तो मेरे कर्म भी इतने हल्के हो जाएंगे कर्मों का बंधन भी मेरा इतना कम हो जाएगा तो किसके कर्मों का क्या प्रवाह है वह ठाकुर पकड़ लेते थे तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि मनुष्य चरित्र को समझने की जो अद्भुत क्षमता श्री रामकृष्ण देव में थी यह क्षमता मैंने और किसी में नहीं देखी है मैं हो सकता है कि किसी का चरित्र समझने में मेरी गलती हो गई हो किंतु मैंने देखा है कि श्री रामकृष्ण देव ने कभी भी किसी का चरित्र समझने में गलती नहीं की उनके पास में जो इतने सारे लोग आते थे त्यागी लड़के आते थे यह गृहस्थ भक्त आते थे उन सबके बारे में ठाकुर ने जो कहा है उस समय वही बात बहुत बाद में यही सब बातें सत्य होकर के स्वामी जी ने उसका निरीक्षण किया है कि ठाकुर ने इस व्यक्ति के बारे में जो कहा था बिल्कुल सही है एक भवनाथ बोलकर के एक आता था नरेंद्र के साथ में और उस ठाकुर का बड़ा ही प्रिय था किंतु बाद बाद में देखेंगे कि भवनाथ का के पास में आना बंद हो गया उसने विवाह करके फिर वो गृहस्थ हो गया फिर एक वो नृत्य गोपाल ना कि नित्य गोपाल दोनों नाम सुने जाते हैं उसके बारे में तो वो एक आता था बड़ा ही भाव में मग्न हो जाता था कीर्तन वगैरह होता था तब तो ठाकुर ने उसको कहा था कि साधु सावधान तो उसके भी साथ में बाद बाद में सब कुछ ना कुछ गड़बड़ सब वगैरह कुछ हुआ है तो ये देखिए कि ठाकुर जिसका चरित्र जो पकड़ लेते थे वो बात में कभी कुछ भी गलती नहीं होती थी किसका क्या कर्म का प्रवाह है वह पकड़ लेते थे तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं ठाकुर ने जिस व्यक्ति के बारे में जो कहा है उसके ऊपर में मेरा संपूर्ण विश्वास है मेरी गलती शायद हो सकती है लोगों का चरित्र समझने में किंतु ठाकुर की कभी गलती नहीं होगी और इस बात का प्रैक्टिकल एक एप्लीकेशन क्या है पता है जब रामकृष्ण संघ की स्थापना हुई तो शुरू शुरू में जो ट्रस्टी बॉडी थी उसमें स्वामी जी ने मिसेस ओली बुल को भी रखा था उस समय स्वामी जी का ऐसा था कि रामकृष्ण संघ या तो रामकृष्ण मिशन पूरा वर्ल्ड वाइड ऑर्गेनाइजेशन है तो जिस तरह से उनके गुरु भाई उस ऑर्गेनाइजेशन में रहेंगे तो वैसे हो सकता है कि यह मिसेस ओली बुल वगैरह जो अमेरिकन रिप्रेजेंटेटिव है वे लोग उन लोगों को भी ट्रस्टी बनाना चाहिए तभी तो इसका वर्ल्ड ग्लोबल एक कैरेक्टर है रामकृष्ण मिशन का वो ठीक-ठीक वो मने उसको ठीक-ठीक वो यह होगा मेनिफेस्ट होगा किंतु अल्टीमेटली जब स्वामी जी ने ट्रस्टी बॉडी बनाई उसमें उनके खुद के एक भी डिसाइल नहीं थे मद्रास के इतने डिवोेडली यह राजा सब उनके इतने डिवोटा थे यह वेस्टर्न डिसाइल उनके इतने सारे थे निवेदिता थी ओली बुल थी जोसेफाइन मैक्लाउड थी फ्रांसिस लगेट थे उनमें से अपने खुद के डिसाइल में से किसी को भी स्वामी जी ने ट्रस्टी नहीं बनाया रामकृष्ण मठ का रामकृष्ण संघ का ट्रस्टी किनको बनाया उन लोगों को जिनको कि ठाकुर ने सिलेक्ट किया था अपने अंतरंग त्यागी शिष्यों के रूप में जिनको कि ठाकुर ने स्वयं गरुवा दिया था जिनको कि स्वयं ठाकुर ने मन से त्यागी करके गए थे उन सभी को स्वामी जी ने रामकृष्ण संघ के ट्रस्टी के रूप में नियुक्त किए और राजा महाराज को बनाया प्रेसिडेंट क्यों क्योंकि ठाकुर कहा करते थे कि राजा राखल एक राज्य चला सकता है राखल था जमींदार का लड़का एकदम शांत इंट्रोवर्ट पर्सनालिटी थी और ठाकुर के पास में आकर के बहुत सारी साधनाएं उन्होंने की थी अभी यदि प्रेसिडेंट ही यदि किसी को बनाना है तो आपको ऐसा नहीं लगेगा कि महापुरुष महाराज है या तो शरद महाराज है शशि महाराज है जो कि बड़े ही कार्य दक्ष थे कार्य कुशल थे सभी चीजों में वे लोग अग्रणी होकर के जब वराह नगर मठ था आलम बाजार मठ था उन लोगों ने अग्रणी की भूमिका बजा कर के भूमिका निवाह करके मठ को चलाया है तो जब बेलर मठ की स्थापना होगी तो ये लोगों को क्या वो प्रश् डट नहीं बनाएंगे नहीं प्रेसिडेंट बनाया उनको जिनको ठाकुर अपना मानस पुत्र कहा करते थे तो ठाकुर की बातों का अक्षरशः स्वामी जी ने पालन किया है फॉलो किया है जिसके बारे में ठाकुर ने जो कहा उसी तरह का रोल उन्होंने बाद में रामकृष्ण संघ में उनको वह रोल दिया है और इसीलिए अपने एक भी डिसाइल को ट्रस्टी बॉडी में उन्होंने इंक्लूड नहीं किया इसलिए स्वामी जी कहते हैं यूसी माय डिवोशन इज द डॉग्स डिवोशन आई हैव बीन रंग सो ऑफ एंड ही हैज ऑलवेज बीन राइट एंड नाउ आई ट्रस्ट हिज जजमेंट ब्लाइंड स्वामी जी कहते हैं कि मेरा मेरी जो श्रद्धा है मेरी जो निष्ठा है ठाकुर के प्रति वो एक कुत्ते की अपने मालिक के प्रति जो निष्ठा होती है जो एक डेडिकेशन होता है एक डिवोशन होता है उस कुत्ते की अपने मालिक की तरफ की निष्ठा वशन डेडिकेशन मेरा ठाकुर के प्रति है मेरा जजमेंट लोगों के बारे में कभी-कभी गलत सिद्ध हुआ है किंतु ठाकुर ने लोगों के बारे में जो कुछ भी कहा वह कभी भी गलत सिद्ध नहीं हुआ हमेशा वह सही सही निकला है और फिर स्वामी जी कहते हैं ठाकुर वुड हिप्नोटाइज एनी वन हु केम टू हिम एंड इन टू मिनट्स नो ऑल अबाउट हिम एंड दैट फ्रॉम दिस ही हैड न टू काउंट अवर कॉन्शसनेस एज ए वेरी स्मॉल थिंग ठाकुर के पास में जो कोई भी आते थे दो मिनट में ठाकुर उनको सम्मोहित करके उसके जन्म जन्मांतर की सब बातें जान लिया करते थे यही बात स्वामी जी के साथ में हुई है स्वामी जी को सम्मोहित कर दिया स्वामी जी को भाव में डाल दिया और स्वामी जी के जन्म जन्मांतर की बातें वो कौन है किस लिए पृथ्वी पर आए हैं सब कुछ उन्होंने जान लिया था दो ही मिनट में यह सब कर सकते थे तो स्वामी जी कहते हैं कि यह सब मैंने प्रत्यक्ष किया है और इसके बाद से मनुष्य की जो कॉन्शसनेस है मनुष्य की जो चेतना है इसके बारे में मेरी बड़ी ही निम्न धारणा है मैं मनुष्य की चेतना या मनुष्य की कॉन्शसनेस को थोड़ा सा भी प्राधान्य नहीं दे सकता नहीं देता क्योंकि यह कॉन्शसनेस या तो अपना जो माइंड है अपना जो मन है वो कोई जो जिसका धड़ मनोबल है जिसका स्ट्रांग विल पावर है वो जिसका वीक विल पावर होता है उसको वे लोग आराम से वो हिप्नोटाइज करके उनके पास में से कठपुतली की तरह अपना काम करवा सकते हैं जैसे यह हिटलर है वगैरह जो बड़े-बड़े 20th सेंचुरी में बड़े-बड़े डिक्टेटर जो हुए हैं पूरे पूरे देश को भ्रमित करके युद्ध में झोंक दिया और लाखों करोड़ों लोगों की मृत्यु हो गई फिर भी यह युद्ध थम नहीं रहा है तो जिन लोगों का विल विक पावर होता है वे लोग जिसका स्ट्रांग विल पावर होता है उसके शिकार बड़े सहज रूप से हो जाते हैं इसीलिए मनुष्य का जो मन है मनुष्य की जो कॉन्शसनेस है इसकी कुछ भी विसात नहीं है उसका कुछ भी प्राधान्य नहीं है प्राधान्य है इस कॉन्शसनेस के परे इस मन के परे जो आत्मन है उसका सही सही प्राधान्य है उसका सही सही इंपोर्टेंस है दे बिलीव ऑन ग्राउंड्स ऑफ दिस सॉर्ट इन द मट दैट स्वामी इज अर्जुन एंड ट देर इन द गार्डन एट दक्षिणेश्वर दे हैव वंस मोर सिन कृष्णा टॉकिंग विथ हि डिसाइल गिविंग हिम एज इट वेर अ न्यू गीता मठ में जितने भी गुरु भाई है यह सब लोग गुरु भाई स्वामी जी के क्योंकि ठाकुर ने स्वामी जी के जन्म जन्मांतर जाने हैं उनका भूत भविष्य सब कुछ देखा है और इसीलिए मठ में ठाकुर के स्वामी जी के जितने गुरु भाई है ठाकुर के जितने भी अंतरंग शिष्य है वे सभी लोग स्वामी जी को अर्जुन के रूप में पहचानते हैं वही अर्जुन जो कि कुरुक्षेत्र में जिसने कि भगवान श्री कृष्ण से गीता श्रवण किया था वही अर्जुन स्वामी जी के रूप में नरेंद के रूप में फिर से उसने जन्म ग्रहण किया है और श्री राम कृष्ण ने दक्षिणेश्वर मंदिर में आज के नए अर्जुन को फिर से नई गीता सुनाई है यह मठ के गुरु भाई स्वामी जी के बारे में माना करते थे तो आज यही तो कल फिर से ही हरि ओ त श्री राम कणा परम एक्चुअली यह जो कोटेशन जहां से लिए गए हैं ना वो पैराग्राफ पूरे पूरे पढ़ेंगे ना तो हमको पता चलेगा किस कांटेक्ट में स्वामी जी कह रहे हैं अभी जैसे यह फेमस सेंटेंस है अरा अवे स्टॉप न ट द गोल रिच उठो जागो और ध प्राप्ति तक लगे रहो यह सब जो एजर्टन जिसको कहते हैं ना इंग्लिश में आपको एकदम बुट देते हैं प्रेरणा देते हैं वह सब तो स्वामी जी ने आध्यात्मिक साधना के कॉन्टेक्स्ट में कहा है कि आपको साधना करनी है साधना करते-करते मन विचलित होगा दुनिया भर की अवधान व्यवधान आएंगे किंतु वह सबको नजरअंदाज करके या तो फिर उन सबको ओवरकम करके कीप ऑन कंटिन्यूइंग साधना खास करके जब हम साधना करते हैं ना प्रॉब्लम क्या होता है साधना के साथ में अ किसी भी तरह की उपासना के साथ में उपासना का सर्व सबसे एक इंपॉर्टेंट एस्पेक्ट है अपने ईगो को शमन करना अपने ईगो का विनाश करना अब ये ईगो होता है ना हमको बुट देता है जगत में आज कोई लड़का स्कूल में जाता है उसके मित्र के साथ में उसका झगड़ा होता है तो ये बच्चा बड़े जोर से कहेगा अरे मेरे पिताजी इतने बड़े हैं मैं अपने पिताजी को कंप्लेन कर दूंगा तो आकर के तुम्हारे साथ में देखो फिर क्या होता है यानी कि हमको कुछ ना कुछ चाहिए सहारा जगत में रहने के लिए जगत में जीतने के लिए कि मेरे पास में इतनी संपत है मेरा इतना बड़ा फ्रेंड नेटवर्क है मेरा इतना पहचान है कोई मेरा कोई मेरे साथ में गड़बड़ करने को आएगा तो मैं यह कर दूंगा सामने इस ये उसको एक इगो बुट चाहिए मनुष्य को और उपासना में सबसे पहले इसी युगों का बलिदान देना है ये मेरे मेरे पिताजी बहुत बड़े मेरा बहुत बड़ा फ्रेंड नेटवर्क मेरा इतना सारा धन संपत्ति वो सबको त्याग करके मैं एकदम बच्चे की तरह ईश्वर के सामने खड़ा हूं मेरे मे पास में कुछ नहीं है सिर्फ ईश्वर ही मेरा सहारा है यह भाव हमको डेवलप करना है तो जब हम ईगो का धीरे-धीरे करके त्याग करते हैं उस समय हमारी बड़ी ही वल्नरेबल परिस्थिति हो जाती है क्योंकि उस समय ऐसा तो नहीं है कि मैंने साधन भजन करने की शुरुआत की तो जगत को मैंने त्याग कर दिया इवन हम साधु लोगों को भी यहां पर संसार में रहकर आश्रम में रहकर सब सेवा कार्य करना पड़ता है तो ये ईगो क्लेश तो होगा ही होगा तो अब आपने ईगो को आपको विनाश भी करना है और और जगत में काम भी करना है तो क्या चीज आपको कॉन्फिडेंस देगी ये शुरू का समय जो है ना वो बड़ा ही वल्नरेबल समय है बड़ा ही कठिन समय है उस समय आपको कैसे भी करके श्रद्धा भक्ति रख करके उस समय को निकाल देना है इसीलिए यह कॉन्फिडेंस देने के लिए यह सब बातें स्वामी जी करते हैं कि आपके पास में धन है उसका अहंकार छोड़ दिया आपके पास में सोशल नेटवर्क है उसका अहंकार छोड़ दिया आपके पास में पॉलिटिकल कने है उसका अहंकार आपने छोड़ दिया तो किस चीज को लेकर के आप रहेंगे क्या आपको संभाल करके रखेगा तो मेरे पास में ईश्वर है मैं अमृत का संतान हूं ईश्वर का संतान हूं वह बात जो है ट विल गिव यू स्ट्रेंथ फ्रॉम विदन टू सरवाइव इन द स्ट्रगल ऑफ दिस वर्ल्ड तो इसका यह उद्देश्य है स्वामी जी के एक्टेशन का अद्वैत वेदांत के साथ में बेसिक य कॉन्फिडेंस वाला बात कैसे मैच होता है वही तो अभी जै अभी जैसे दो एक इंसिडेंट पहले तो बताता हूं ये कैंप टेलर कैलिफोर्निया का कार्य समाप्त करके कैंप टेलर में स्वामी जी गए और यह आइड अनसेल वगैरह है वहां पर एक दिन रात को ध्यान करने को बैठे हैं तो स्वामी जी ने इन लोगों को कहा तुम लोगों को जिसके जिस ऑब्जेक्ट के ऊपर में ध्यान करना है करो आई विल मेडिटेटर्स दैट गिव्स इनफाइनों में नहा कर के उसमें भाषित होक के हम लोगों को इतना प्रचंड पावरफुल ध्यान हुआ था जिसके बारे में हम वर्णन भी नहीं कर सकते सो दैट इज वन इंसिडेंट सेकंड है कि गिरीश घोष ने कहा था कि नाग महाशय ने अपने को इतना छोटा कर दिया है कि माया जब जाल में बांधने के लिए आती है तो उसके जो छोटे-छोटे छिद्र होते हैं उसमें से महाशय निकल गए और स्वामी जी ने अपने को इतना विराट करके रख दिया है कि माया के पास में जो जाल है माया जाल वो छोटी पड़ जाती है उनको बांधने के लिए अच्छा अभी अद्वैत वेदांत एक्चुअली देखिए सबसे पहली बात है सेल्फ कॉन्फिडेंस जैसा कुछ हो अद्वैत वेदांत की दृष्टि से होना ही नहीं चाहिए आपके मन में अद्वैत वेदांत मींस क्या जगत माया है और आप आत्मन है यदि इस बात में आप स्थित हो गए तो अभी जैसे कि भगवान बुद्ध है जैसे एकदम शांत निर्मल होक के बैठे हैं उनके सामने यह गाय या बकरी और शेर यह भी एकदम अपनी पशुवैद्यकीय शांति पवित्रता णा यह सब मेनिफेस्टेशन होता है जितने भी अवतारों को देखेंगे उनके बारे में किस तरह का वर्णन है जीसस के बारे में देखेंगे या तो फिर यह भगवान श्री राम कृष्ण देव के स्वयं के बारे में देखेंगे कि उनकी जो पवित्रता है उस पवित्रता से मंत्र मुग्ध होकर के लोग उनके सामने जैसे ही जाते हैं रोना शुरू कर देते हैं उनके हृदय के जितने भी पाप है उनकी आशीर्वाद से सब धूल जाते हैं ठाकुर जब भजन गाते हैं एक डिवटी ठक के पास में गया पुत्र शो उसी दिन उसने अपने पुत्र को गंवा दिया है जवान पुत्र का मृत्यु हो गया है वोह ठाकुर के पास गया मन शोक से संतप्त और ठाकुर ने एक के बाद एक भजन गाना शुरू किया और इनकी आंखों से आंसू निकलते गए निकलते गए पुत्र शोक समाप्त हो गया तो ये जनरली आध्यात्मिक संत का आध्यात्मिक महापुरुषों का विवरण है कि उनके भीतर में दया करुणा प्रेम शांति पवित्रता यह भर भर करके बैठा है और उनके सामने जाने से हमारा मन भी शांत शुद्ध पवित्र हो जाएगा यह सेल्फ कॉन्फिडेंस की बात एक क्षत्रिय भाव कि हां मैं युद्ध में जाकर के शत्रुओं का दमन कर सकता हूं वो भाव ठाकुर में और दूसरे बुद्ध रूपी अवतारों में कहां है किंतु देखिए कि भारत में जैसे हैं आध्यात्मिकता दो ट्रीम में चली आई है एक तो ब्राह्मण अवतार ब्राह्मण देवता एक ब्राह्मण लोग की आध्यात्मिकता च इज एमप्लीफाइड इन श्री राम कृष्ण दूसरी है क्षत्रिय आध्यात्मिकता चच इज मेनिफेस्टेड इन श्री राम श्री कृष्णा एंड स्वामी विवेकानंद यह जो युद्ध के मैदान पर अर्जुन को जो उपदेश देना था कि युद्ध करो वरना तो फिर तुम्हारा त्याग करके तुम जाओगे तो भी तुम्हारे मन को शांति नहीं मिलेगी तो ये ट इज अ सेकंड आध्यात्मिकता विच इज मच मोर ज्ञान के ऊपर में बनी हुई है अध्यात्म के ऊपर में बनी हुई है अभी यहां पर देखिए कि आध्यात्मिक गुण राजी जो है आध्यात्मिक सिद्धि होने से जो आध्यात्मिक गुण राजी प्रकट होती है वो किस रूप में होती है यदि प्रेम के रूप में प्रकट होगी तो यह शक्ति भी प्रेम का एक दूसरा वही स्वरूप है यह जो सिक्के की दो बाजू कहते हैं ना हेड एंड टेल तो प्रेम करुणा शांति यह जो स्वरूप है आध्यात्मिकता के मेनिफेस्टेशन का तो स्ट्रेंथ सेल्फ कॉन्फिडेंस ये प्रचंड आत्मविश्वास यही उसी सिक्के का दूसरा स्वरूप है एक सेकंड टाइप ऑफ मेनिफेस्टेशन यानी कि आध्यात्मिक जगत में देखेंगे कि दो तरह के मेनिफेस्टेशन दिखते हैं एक तो शांति करुणा मुदिता प्रेम वगैरह दूसरा है ये स्ट्रेंथ सेल्फ कॉन्फिडेंस वगैरह तो अभी ब्रह्मण के खुद के तो कोई गुण नहीं है ब्राह्मण के गुण के बारे में ज्यादा से ज्यादा सत चित आनंद ऐसा कहा गया है तो सत चित आनंद के साथ में यह स्ट्रे सेल्फ कॉन्फिडेंस वगैरह जो है वो उसी के साथ में मेनिफेस्ट होने वाले गुण है वही है कि आप किस तरह के आध्यात्मिक लिटरेचर का अभ्यास करते हैं हम लोग इतने यूज टू हो गए हैं यह भक्ति साहित्य से भक्ति लिटरेचर से कि हमको लगता है कि हां प्रेम करुणा वगैरह तो संत में होना ही चाहिए किंतु ये स्ट्रेंथ है यह आत्मविश्वास है यह जो मने वही आध्यात्मिकता का मेनिफेस्टेशन यह क्यों वई दिस इ सो डिफरेंट इन स्वामी जी तो इट्स न डिफरेंट इन स्वामी जी वो ऑलरेडी अपनी क्षत्रिय परंपरा में था भगवान राम भगवान कृष्ण में और उसी बात को स्वामी जी ने उसको पुनः जीवित किया है यानी कि देयर आर टू टाइप्स ऑफ स्पिरिचुअल मेनिफेस्टेशंस और यह बात सिर्फ अद्वैत वेदांत में नहीं है यदि आप द्वैत वेदांत के बारे में भी देखेंगे द्वैत और अद्वैत को छोड़ कर के लेट मी यूज अनदर वर्ड आत्म साक्षात्कार या तो ईश्वर सा साक्षात्कार या तो फिर किसी भी तरह की आध्यात्मिक अनुभूति कोई भी आध्यात्मिक अनुभूति होगी तो साथ-साथ में उसके गुण मेनिफेस्ट होना शुरू हो जाएंगे यथा दहि का शक्ति अग्नि जब आप प्रकट करेंगे तो अग्नि के साथ में अग्नि के जो गुण है उसकी ऊर्जा उसकी उसका ताप उसकी हीट वो साथ-साथ में ही प्रकट होगी ब्रह्मण का जो साक्षात्कार हो गया किसी भी तरह की आध्यात्मिक साक्षात्कार उपलब्धि होगी तो उसके साथ में यह सब मेनिफेस्टेशन आना शुरू हो ही जाएंगे वही है कि एक तरह का लिटरेचर हमने पढ़ा है जिसमें प्रेम करुणा वगैरह के ऊपर में उस टाइप के मेनिफेस्टेशन पर ज्यादा भार दिया गया है जबकि यह सेल्फ कॉन्फिडेंस आत्मविश्वास यह सबको एक तरह से दूर रखा गया है यह भय पा कर के कि सेल्फ कॉन्फिडेंस के बारे में बात करेंगे तो ईगो आ जाएगा बीच में अब ये ईगो और सेल्फ कॉन्फिडेंस इतना ये जो पतला इसका ये डिफरेंस है उसका ये जो उसके बीच में कि कोई भी भ्रमित हो जाएगा तो सेल्फ कॉन्फिडेंस को अभी छोड़ो अभी ये प्रेम करुणा ये शरणागति ये सब मेनिफेस्टेशन के बारे में ज्यादा बात करो किंतु अग्नि जब आप प्रकट करेंगे और आप यह कहेंगे उसका उसका उजाला नहीं आना चाहिए सिर्फ उसकी उसकी हीट मुझे मिलनी चाहिए ऐसा कैसे हो सकता है उजाला यानी कि लाइट और हीट यानी कि एनर्जी या तो ऊर्जा ये दोनों तो अग्नि के गुणधर्म है दोनों एक साथ में मेनिफेस्ट होते हैं आपने सिर्फ ऊर्जा के बारे में बात की आपने उजाले के बारे में बात करना बंद कर दिया इसका तो अर्थ यह नहीं है कि उजाला नहीं मिलता है यानी कि कि हमने हम लोगों ने रिसेंटली यह पिछले 400 500 600 सालों में अपने मन को यह भ्रमित करके रखा है कि जिसको भी आध्यात्मिक उपलब्धि होगी उसके भीतर में प्रेम करुणा शरणागति प्रकट होंगे किंतु उसके भीतर में साथ-साथ में यह कॉन्फिडेंस आत्मविश्वास प्रकट होते हैं उसके बारे में बात करना हमने बंद कर दिया है इसलिए हमको ऐसा लगता है कि इसके साथ में इसका क्या कनेक्शन है किंतु कनेक्शन बड़ा ही स्पष्ट है अग्नि प्रकट करने से कोई भी अग्नि जलाने से दो तरह के उसके मेनिफेस्टेशन प्रकट होते हैं एक तो है लाइट दूसरा है एनर्जी यह दोनों उसी के साथ में ही प्रकट होते हैं तो उसका अर्थ यह है कि आध्यात्मिक कोई भी अनुभूति हो द्वैत हो कि अद्वैत हो कोई भी अनुभूति आएगी तो उसके साथ में दोनों तरह के लक्षण प्रकट होंगे ऑन वन हैंड सेल्फ कॉन्फिडेंस ऑन द अदर हैंड शरणागति येय थियोरेटिकल जो कनेक्शन है वह समझे तो जैसे कोई भी उपलब्धि होती है जैसे कि किसी व्यक्ति ने अभी एग्जामिनेशन में बोर्ड की एग्जाम में उसको एकदम फर्स्ट रैंक उसको मिल गया त उसका मेनिफेस्टेशन क्या होगा कि अच्छे से अच्छी यूनिवर्सिटी में उसको जॉब मिलेगा तो कोई भी एक उपलब्धि होती है उसके साथ में उसका एक मेनिफेस्टेशन होता है तो दो तरह के आध्यात्मिक उपलब्धि के मेनिफेस्टेशन है और दिस ज नथिंग टू डू विथ द्वैत और अद्वैत कोई भी उपलब्धि हो ईश्वर के दर्शन हो ना कि आत्म साक्षात्कार को ये शरणागति या तो फिर ये अहंकार का संपूर्ण रूप से विलीन हो जाना एक और दूसरा कि ये जो स्ट्रेंथ जो है स्ट्रेंथ जो है ना वो जीवन है स्वामी जी एक बहुत बड़ी बात कहते हैं द स्ट्रेंथ इज धर्म एंड वीकनेस इज अधर्म स्ट्रेंथ इज रिलीजन एंड वीकनेस इ इ हां तो स्ट्रेंथ इ लाइफ कनेस इ डेथ और साथ में यह भी कहते हैं कि स्ट्रेंथ इ धर्मा एंड वीकनेस इ अधर्म यह भी एक है उनका तो यह बात हम भूल जाते हैं कि स्ट्रेंथ तो मनुष्य को चाहिए ही चाहिए भले चाहे उसको अपने पैसों का उसको गुरुर हो ना कि उसको आध्यात्मिक उपलब्धि का गुरुर हो वो तो चाहिए ही अदर वाइज तो वो वल्नरेबल हो जाएगा इसीलिए ऑन वन हैंड है कि समुंदर है भवसागर भवसागर का ये जो किना है जिस किनारे प अभी हम है तो यह सोशल कनेक्शन सोशल नेटवर्किंग पैसा वगैरह का गुरु है उस भवसागर पार करके सामने के किनारे चले जाएंगे तो ईश्वर मैं ईश्वर का संतान हूं या मैं आत्मन हूं वो गुरु हमारे में प्रकट होगा किंतु बीच में जो है ना बीच में हम लोग बहुत ही वल्नरेबल हो जाते हैं ये क्योंकि मैंने पैसों का भी गुरु छोड़ दिया है और मैं आत्मन हूं या मैं ईश्वर का संतान हूं वो गुरु मेरे में आया नहीं है वो वो स्ट्रेंथ मेरे में आई नहीं उस समय में सबसे ज्यादा वल्नरेबल हो इसलिए आध्यात्मिक साधना छोड़ कर के चले जाने वाले लोगों की मने फिर लिप सर्विस देंगे किंतु जो रियल साधना करनी चाहिए व ड्रॉप आउट जिसको कहते हैं ना ड्रॉप आउट रेश यहां पर बहुत ज्यादा है किंतु य थियोरेटिकल कनेक्शन जो है स वेरी क्लियर के कोई भी आध्यात्मिक उपलब्धि हो उसका जो मेनिफेस्टेशन होगा तो वह अपने झुठ मुठ का अहंकार है व चला जाएगा और जो रियल क