Transcript
सो आज से हम लोग एक नई किताब स्टार्ट करेंगे किताब बहुत सुंदर है उसका नाम है श्री श्री मातृस नित्य और लेखक के स्वामी ईशानानंद जी महाराज तो अभी क्या है की ईशानंद जी महाराज तो मां के सेवक भी थे वर्धा महाराज बहुत आखिर तक मां के साथ में रहे थे और इन्होंने जो लिखा है मां के बड़े में यह बहुत ही मुझे अच्छा लगा तो बीच-बीच में जैसे एक दिन कथामृत एक दिन स्वामी जी के कोटेशन और एक दिन ये मां की इस तरह से हम लोग जो है एक के बाद एक हम स्टार्ट करेंगे और थोड़ा साथ-साथ में उसका हिंदी ट्रांसलेशन करता जाऊंगा तो निशानानंद जी महाराज लिखने हैं परम आराध्या श्री श्री मां के दर्शन करीब आहार प्रधान सेवक परम पूज्य बाद श्रीमद् स्वामी शारदानंद जी के प्रथम दर्शन करीबन सौभाग्य अमर हो मां के मां का जब दर्शन किया था ईशान नानजी महाराज ने हालांकि अभी तो यह सन्यासी नहीं है अभी तो ये बहुत पहले की बात है साधु होने के पहले की बात वो कवालपाड़ा में रहते थे और पड़ा यदि आप गए होंगे तो वहां पे सुंदर वो मंत्र मंदिर है और जगदंबा आश्रम है जगदंबा आश्रम और वहां पर आश्रम तो कल पड़ा आश्रम की शुरुआत कैसे हुई थी तो यह केदार बाबू वहां पे टीचर थे और उनके कुछ स्टूडेंट हैं तो वो जो स्वदेशी आंदोलन का जो यूके था की चलो अभी उन्होंने ब्रिटिश सरकार से हमको मुक्ति पानी है तो ये स्वदेशी आंदोलन करते हैं तो इस तरह से उन्होंने स्वदेशी आंदोलन करने के लिए और अपनी भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए और भारतीय अपने है जो आचार्य व्यवहार है हमारी भारतीय परंपरा है धर्मशास्त्र है उसका अध्ययन करने के लिए उन्होंने एक छोटा सा कैमरा लिया था और इस तरह से उन्होंने एक आरंभ किया था तो वो ये वर्धा महाराज भी जो थे वो उन लोगों में से एक थे और बाद में जो है उन्होंने सबसे पहले किंतु मां का दर्शन करने से पहले उन्होंने दर्शन किया था उनको मुलाकात सबसे पहले मुलाकात हुई थी उनकी और शरद महाराज के साथ 1 मैं कल एक दोपहर को कल पड़ा है और एक दोपहर की समय है मैन 2 पर कट टाइम है दोपहर का भाई कल यानी की संध्या का समय है तीन ही तो खून कोलकाता सृष्टि मेयर जाना 18 नूतन बड़ी निर्माण कराया श्री श्री मां के तथोई भैया जेबा जयरामबाती ते आशा चिलान एवं श्री श्री माया विशेष इच्छाएं डहर भाई डर व्यापारी मध्यस्थ जयराम भाटी ते कहां दिल संपत्ति भाग बंटवारा उसे समय क्या था की मां जब उद्बोधन कलकत्ता जाति थी तो 1909 के पहले क्या होता था की वह विभिन्न भक्तों के घर रुकना पड़ता था जैसे की मास्टर महाशय है वगैरा के वहां पे या तो फिर क्या है की कभी-कभी वो भाड़ा का घर लेना पड़ता था रेंट के ऊपर में अभी क्या है की ये सब जगह पे तो ठाकुर पूजा की व्यवस्था हनी चाहिए ठाकुर घर होना चाहिए एक किचन होना चाहिए अच्छा जहां पर जितने भी भक्ति आते हैं उन सबके लिए खाना वगैरा बना सके एक प्रणाम करने के लिए जगह हनी चाहिए इतने सारे उसे मां को मां का दर्शन करने के लिए धीरे-धीरे करके भक्तों की संख्या तो बाढ़ ही रही है साथ-साथ में साधु ब्रह्मचारियों की संख्या भी तो बाढ़ रही है 1897 में 1897 में स्वामी विवेकानंद जब अमेरिका से भारत लौटे तो भारत में पूरा एक सन्नाटा छ गया था पूरा एक मतलब एक उत्साह की लहर दौड़ गई थी की हां हमारी ये जो प्राचीन परंपरा है ये जो हमारी मां जननी भारत है वो फिर से जगराता हो रही है 1000 साल की नींद के बाद तो ये जागृत भारत माता के जो संतान है जो पुत्र है यह जो पटरिया है उनको तो एक आदर्श चाहिए उनको तो एक इस तरह का एक आध्यात्मिक शक्ति चाहिए जिससे की रिचार्ज हो करके वे लोग या तो राष्ट्र के उत्थान में अपना योगदान दे सके ना की एक आदर्श ग्रुप करके यह जो धर्म समझ एक जीवन जी सके तो एक पूरा लोगों को एक आदर्श चाहिए था उसे समय तो ठाकुर का तो महासम्मती हो गई थी ठाकुर की महासमाधि हो गई थी स्वामी जी की भी तो स्वामी जी भी तो चल बेस थे 1902 में जुलाई महीने में तो र गई थी मां और राजा मारा जो की राजा महाराज थे ठाकुर के मानस पुत्र और मां तो थी जगत जननी स्वयं और बहुत जैसे स्वामी जी खुद कहते हैं जैसे स्वामी जी खुद कहते हैं की मां तो ठाकुर मां की आध्यात्मिक शक्ति तो ठाकुर से भी ज्यादा है तो मैन वो कहते हैं ना की कोढ़ा राम कौन है सीता का जो सीता की जो आध्यात्मिक शक्ति कहो ना की एस्टा का वो जो अवदान को रामायण में डेट इस ग्रेटर डेन राम सो यहां पे भी स्वामी जी कहते हैं की मां की जो आध्यात्मिक शक्ति है वो ठाकुर से भी ज्यादा है और मां का जब भूकंप होगा तो मां की ये जो बंदर है हम लोग ये चलांग लगाकर के समुद्र पर कर कर अमेरिका जाकर के वेदांत का उपदेश देकर के आएंगे ऐसा स्वामी जी ने कहा था तो इसीलिए जब मां कोलकाता आई है तो रहने के लिए जगह नहीं होती थी और मतलब भाड़े का घर लेना दूसरों के घर में रहना इससे क्या होता है सबको असुविधा होती है और जगह भी भाड़े की तो सब समय अच्छी जगह नहीं मिलती है तो शर्ट महाराज ने क्या किया था उद्बोधन महेरवादी का निर्माण किया था जहां के भी ही रहेगी शरद महाराज भी रहेंगे और अपना यह जो बंगाली पब्लिकेशन जो है वो भी वहां से होगा आज यदि आप उद्बोधन मारवाड़ी यदि मुलाकात लेंगे तो कितना सुंदर छोटी सी जगह है बहुत ही एक संकरी गली में है किंतु फिर भी इतनी छोटी सी जगह में भी इतनी संकरी गली में भी जड़ी मां के वहां पे मंदिर के सामने बैठ करके ध्यान करेंगे ठाकुर करके सामने या तो फिर शरद महाराज जी कमरे में बैठने थे उसे कमरे के सामने बैठ करके तो मां इतना शांत हो जाता है की जैसे की चलो बाहर निकालने से ही पूरा मतलब कितना गला और कितना शोर वगैरा चला राहत है कितने लाखों लोग इतनी छोटी सी जगह में कंप्रेस हो करके र रहे कोलकाता में ये बैग बाजार में किंतु इसमें भी जैसे की एक किस तरह से वो उद्बोधन वो हमें प्रवेश करने से ही ऐसा लगता है मारवाड़ी में प्रवेश करने से ऐसा लगता है की वह पूरा शोर गोल है कोलकाता का वह पीछे छठ गया और जैसे हम स्वर्ग में प्रवेश किया था शरद महाराज ने तो शरद महाराज आए थे केवल पड़ा मां को लेने के लिए की मां को लेकर जाएंगे उद्बोधन में सर्वप्रथम मां के जो श्री चरण जो है वो मां के श्री चरणों की छाप वहां पे पड़ेगी मां के श्री चरणों की चरण राज है वो वहां पे गिरेगी उद्बोधन मारवाड़ी में मारवाड़ी कौनसी क्रीटेड हो जाएगी मारवाड़ी जो है पवित्र हो जाएगी मां के आगमन से जगदंबा के आगमन से तो इसलिए शरद महाराज आए थे और जब आए ही है तो मैन का दिया अभी मां के तो सोच जितने भाई थे तीन भाई थे काली मामा वधाम और प्रश्न मामा सब समय जैसे गांव में एक होता राहत है वो जमीन को लेकर के झगड़ा उसे संपत्ति को लेकर के झगड़ा अभी है इतना सब जमीन और इतना सा संपत्ति और इस में यह इतना मेरा इतना तुम्हारा यह सब लेकर पता चल रहा था तो मैन कहा शरद महाराज को की अच्छा तुम आते हो तो यह मेरे भाइयों के बीच में जमीन को लेकर के चल रहा है उसका थोड़ा सा सॉल्यूशन देकर जाना तो शरद महाराज जो थे वो इसकी जमीन इतनी और यह मामा की इतनी जमीन इन मामा की ऐसा सब वो करने के लिए कोई शरद महाराजा की तरह पूरे जगत की पूरे जगत को अपने सर पे धरण किया हुए हैं मैन खुद कहा था मेरा शरद जो है वासु की तरह सबका ललन पालनपुर करता है तो मां के जितने भी समस्याएं छोटी मोती सांसारिक जितनी भी समस्या है भक्तों की रहने की खाने की पैसों की सब जो है वो जैसे ही मां शर्ट महाराज को पत्र लिख देती है मां को तो पत्र लिखना नहीं आता किंतु यह जो राजू है मापू है ऐसा कोई जो साथ में रहेगा भक्ति उनको मां बोलेगी की लिखो पत्र तो वे लोग पत्र लिखेंगे शरद महाराज के पास जाएगा पत्र तो इस तरह से शरत महाराज आए हैं यह भाइयों का जो झगड़ा है उसको भी मिटाने के लिए उनके ये जो ये वर्धा मामा कहते हैं वर्धा महाराज कहते हैं अभी क्या है की मां के भाई का नाम भी वर्धा था और इनका नाम भी वर्धा था तो फिर क्या होता था जब ये वर्धा महाराज जयरामबाती जाते थे तो क्या है की राजू है मापू है वो तो उनको वर्धा अभी ऐसा होता है ना बड़े लोगों को नाम देकर के नहीं पुकारा है तो अभी वो मां के भाई यानी इन सबके तो बड़े ही हुए तो उनको ना उनका नाम कैसे मुंह से निकलेंगे तो फिर वर्धमान वर्धा महाराज को वे लोग गोपाल डा बोल करके पुकारते थे मैंने गोपाल डा यानी के इशानंद जी कभी कभी कन्फ्यूजन हो जाता है वर्धा मामा तो उनके एक संबंधित है उनका नाम था विष्णु भक्ति थे नाम था क्षेत्र नाथ बाबू और उनकी घर पर उनका वो जो मंदिर था ठाकुरबारी वहां पर महासमारों से धूमधाम पूर्वक नाम संकीर्तन का आयोजन जो है वो किया गया था ए उपलक्ष्य कव्वाल पड़ा आश्रम में प्रतिष्ठता केदार बाबू परेशान विशिष्ट भुगतेरा विशेष इच्छाएं अप परामर्श शरद महाराज निमंत्रित हो या जयरामबाती हुई पड़ा आशा अभी देखिए यहां पर महाराज क्या कहते हैं उनके जो शिक्षक महाशय है नामदेव के दरबार बाबू जिन्होंने बाद में सन्यास ग्रहण करके ये जो नाम ग्रहण किया स्वामी केशव आनंद तो केशव आनंद जी महाराज पता नहीं वो कुछ प्रॉब्लम हो रहा है बीच-बीच में कनेक्शन कट जा रहा है सुने दिया था अभी जो बोल रहा था इससे पहले पता नहीं सुद्दनली ब्लैक हो गया जो भी है केदार बाबू और वर्धा महाराज के ये जो पिताजी है इन दोनों ने क्या किया शरद महाराज को आमंत्रण दिया जय राम और इस उत्सव में भाग लीजिए और सबको जो है कुछ अच्छी बातें बताइए 11 साल की उम्र थी उनकी और स्कूल में पढ़ रहे थे शरद महाराष्ट्र के देखिलम एक जॉन स्थूलों के परिष्कार परीक्षणों गंभीर प्रकृति साधु रूप शरद महाराज को कैसा देखा एक खूब बहुत ही अभी साधु क्या है की वो इस साजिद तो नहीं करता है किंतु साधु जो है वो परिष्कार परीक्षण रूप से र सकते हैं और मैन धुले हुए कपड़े पहनेगी वो प्रतिदिन स्नान वगैरा करें ऐसा क्यों कहा उन्होंने अभी हमको ऐसा कोई विचित्र नहीं लगता की हम कपड़े धोते हैं प्रतिदिन प्रतिदिन स्नान करते हैं जो मुंडन है वो जो नियमित करते हैं तो क्या है की एक अच्छा सा एक इंप्रेशन होता है की रामकृष्ण मिशन के साधु है अभी ऐसा परिष्कार परीक्षण साधु के रूप में मैंने उनको देखा ऐसा क्यों कहा वर्धा महाराज ने क्योंकि उसे समय के जो साधु थे बहुत सारे साध तभी तो ऐसा नहीं तो यह जो रमता साधु जिसको कहते हैं उनका क्या था की दाढ़ी होती है जाता होती है कब स्नान करेंगे कुछ ठीक नहीं है कब कपड़े चेंज करेंगे या कपड़ों को धोएंगे वो भी कुछ ठीक नहीं है वो क्या पहने है उसका भी कुछ ठिकाना नहीं भिक्षा करके रहेंगे शरीर के ऊपर में धूल या तो भस्म ये सब लगा हुआ है तो ये ये एक राहत है ना की मतलब इस तरह का साधु होगा या होना चाहिए तो उन्होंने शरद महाराज को देखा की एकदम परेश कर और परेशान ना है स्थल का है हमारे जैसे स्वामी जी ने खुद कहा था की एक बार की जैसे वो अमेरिका में जाते हैं तो कैसे विचित्र पर्सनल लोग स्वामी जी को करते थे तो क्योंकि क्या था भारत के बड़े में इतनी साड़ी आदर्श श्रद्धा है वो चल रही थी अमेरिका में तो जैसे पैसा इकट्ठा करने के लिए अपने वो जो लोगों से ये मिशनरी लोग हैं ऐसा कहते थे की भारत में क्या है मां अपने बच्चे को मगरमच्छ को मिला देती है तो इस तरह अंधश्रद का जहां पे है वहां पे उसे बच्चे की रक्षा करने के लिए मां को क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट करना चाहिए और उसको क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट करने के लिए हमको डोनेशन चाहिए ऐसा करके ये लोग जो है क्रिश्चियन मिशनरी लोग डोनेशन कलेक्ट करते थे तो ये डोनेशन कलेक्ट करते थे जैसे उसे समय ये लोग जो है इस तरह के प्रश्न जो है लोग स्वामी जी को वो प्रवचन में करते थे की क्या यह स्वामी जी जो है की आपके भारत में जब छोटा बच्चा होता है तो छोटे बच्चे को क्या इस तरह से गंगा में फेक दिया जाता है यह अपनी मां जो है छोटे बच्चे को फेक देती है की नहीं गंगा में तो स्वामी जी क्या कहते हैं की मैं हां मुझे भी फेक दिया था किंतु मैं इतना मोटा था बचपन में की मगर मुझे खाने की वजह मुझे फिर से वो किनारे पे फेक दिया तो क्या है की इस तरह से कटाक्ष ही ये सब चीजों का एक उत्तर होता है तो स्वामी जी भी कहते थे की मैं स्कूल का ही हूं शरद महाराज भी स्कूल का है तो इसलिए अभी क्या है की साधुओं को कभी देखेंगे तो मतलब उन्हें डबल पतले हैं उपवास कर रहे हैं कितना मुंह चड्ढा करके बैठे हैं हमारे साधुओं को देखेंगे उसे फूल का भी है नहीं भी है शायद हंसना मुंह है हंसना चेहरा है सबके साथ में बात करते हैं तो ये क्या है की कंपलीटली एक नया एक इंप्रेशन लोगों के ऊपर में पड़ता है तो इसलिए यहां पे वर्धमाराज के तहत की शरद महाराज को देखा फुल्के है और परिष्कार और परीक्षण है गंभीर प्रति हालांकि शरद महाराज हंसी मजाक कम नहीं करते थे किंतु प्रसंग के अनुसार अभिभक्त के घर गए हैं तो उसे प्रसंग के अनुसार थोड़ा सा गंभीर है उन्होंने धरण किया था पितृ देवेन निकट चुनीलम टिनी बिलात अमेरिका जिया हिंदू धर्म प्रचार कोरिया आशिया वर्तमान रामकृष्ण मिशन संपादक एवं श्रेयस्री रामकृष्ण परमहंस देवीनी श्री शारदा देवी प्रधान सेवक पिताजी ने वर्धा महाराज को बताया अभी उसे समय यह पूरा एक नया एक चल रहा था ना शरद की पिताजी ने वर्धा महाराज को बताया की शरद महाराज जो है अमेरिका में ब्रिटेन में जाकर के वेदांत का प्रचार करके आए हैं तो अभी क्या था ये गुलाम भारत के लिए अमेरिका जाना ब्रिटेन जाना और ये गोरे लोगों को अपने शिष्य बनाना उनको भारतीय संस्कृति की ये जो शिक्षा देना भारतीय संस्कृति के जो संस्कार है वो उनको सीखना यह हमारे लिए कितनी बड़ी बात थी ये शरद चंद्र चक्रवर्ती जिसने स्वामी शिष्य संवाद लिखा है वो अपने उसमें वो स्वामी जी के साथ बात कर रहा है वो स्वामी जी को कहता है की स्वामी जी इस जगह इस समय यह जो आप अमेरिका जाकर के उनको आपने अमेरिकन शिष्य बनाई ये गोरे शिष्य बनाए ये गोरे शिष्यों को लेकर के अब भारत में आए यही हमारे लिए सबसे बड़ी आश्चर्य की बात है बहुत सारे लोग स्वामी जी को श्रद्धा भक्ति से देखते थे या सलमान देते थे वो शायद इसलिए नहीं की उनके उपदेश जो है उन्होंने वेदांत के बड़े में ठाकुर के बड़े में जो कहा वो उनको कुछ समझ में ए रहा है किंतु सिर्फ इसीलिए की भारत में गुलाम देश है ये गोरे लोग हमारे पे राज्य कर रहे हैं उन्हें गोरे लोगों को उन्होंने अपने शिष्य बनाए अपने विषय पर बनाए तो ये एक बड़ी आश्चर्य की बात इनको देखने को मिली है बोलकर के बहुत सारे लोग हैं स्वामी जी को श्रद्धा भक्ति करते थे तो जो भी है यहां पे भी वो शरद महाराज लिखने हैं वर्धा महाराज लिखने हैं की उनके पिताजी ने उनको बताया की हां देखो की ये स्वामी जी जो है इस तरह से ये शरद महाराज जो है इस तरह से अमेरिका जाकर के वेदांत प्रचार करके आए हैं तो ये कितना मतलब बड़ा आश्चर्य की बात है और वर्तमान में रामकृष्ण मिशन संपादक और अभी जो है वर्तमान में रामकृष्ण मिशन के जनरल सेक्रेटरी है उसे समय जनरल सेक्रेटरी का वह जो है पोस्ट नहीं था सेक्रेटरी का पोस्ट था किंतु कम तो वही करते थे और मां शारदा देवी के प्रधान सेवक है मां है वो कहां वो अमेरिका में वेदांत प्रचार करके आए हैं कहां वो अमेरिका में जो है इतने लोगों को उन्होंने वो वेदांत सिखाया भारतीय धर्म की ये जो है की भारतीय धर्म की ये जो उन्होंने शिक्षा दी और साथ-साथ में ही रामकृष्ण मिशन के जनरल सेक्रेटरी भी है किंतु साथ-साथ में ही मां के प्रधान सेवक है तो मतलब शरद महाराज को शरत महाराज खुद कहते हैं की ई माहिर धारी तो रामकृष्ण मिशन के जनरल सेक्रेटरी होना पूरे विश्व में रामकृष्ण मिशन की जितनी भी एक्टिविटी है सबको गाइड करना सबके ऊपर में नजर रखना सबको ये जो है उसका ये जो है एक तो यह उसका मैनेजमेंट करना एडमिनिस्ट्रेशन करना फिर विदेश में जाकर के कितने शिष्य हैं वो अमेरिकन लोग वो भारत में आते हैं उनके साथ में बात करते हैं उनसे कुछ सीखना चाहते हैं इतना सम्मान प्रकार के भी शर्ट महाराज का असली परिचय की मां के जो है प्रधान सेवक है तो देखिए की मां की सेवा करना उसकी जो प्रतिष्ठा है उसका जो महत्व है उसका जो आध्यात्मिक इंर्पोटेंस जो है डेट इस पर ग्रेटर दें बीइंग दी एडमिनिस्ट्रेटर और बीइंग डी सेक्रेटरी ऑफ रामकृष्ण मिशन मां की सेवा करना या तो मां के प्रधान सेवक होना उसका वो जो महत्व है उसकी जो गरिमा है वो गरिमा रामकृष्ण मिशन के सेक्रेटरी की गरिमा से कहानी ज्यादा बाढ़ के हैं ये बात शरद महाराज को देखकर के हमको पता चलती है इसके बाद में बहुत सारे ऐसे इंसिडेंट आएंगे यहां पे की शर्ट महाराज मां का कार्य किस तरह से करते थे किस तरह से अपने को संपूर्ण पूर्ण रूप से जो है उनका अहंकार पूरा विस्मृति होकर के इतनी बड़ी पोस्ट पर है किंतु फिर भी मां के कार्य के लिए सामान्य लोगों के साथ में जब डेल करने का आएगा सामान्य लोगों के साथ में वो जो है कार्य करने की बात आएगी तो वो अपना कार्य नहीं कर रहे हैं की इतना गरिमामई हो करके एक इस तरह से उनके साथ बात करेंगे वो सोच रहे हैं की मैं मां की और से कार्य कर रहा हूं तो इतना विनम्रतापूर्वक कार्य करेंगे जैसे छोटे लोगों के साथ में भी छोटे लोग शब्द ठीक नहीं है किंतु यह जस्ट एक मतलब जिन लोगों का आध्यात्मिक या तो कहो ना की एक मोरल अथॉरिटी कहो स्वामी शारदानंद जी से मैन एक सवा भक्ति का भी नहीं होगा शरद महाराज की मोरल उनकी त्याग तपस्या उनकी विद्वत्ता ऐसे लोगों से लाखों गुना ज्यादा होगी किंतु फिर भी सिर्फ मां का कार्य कर रहे हैं ऐसे लोगों के साथ में मिलकर के बाहर के गवर्नमेंट ऑफिसर वगैरा के साथ में तो इतना विनम्र हो जाएंगे की जैसे उनके लेवल पर चले जाएंगे तो यह जो है शरद महाराज का एक कितना शरद महाराज ही नहीं वो जितने भी डायरेक्ट डिसीप्ल थे स्वामी जी से स्टार्ट करके मां के प्रति कितनी गंभीर श्रद्धा भक्ति थी इन लोगों की ये छोटे-छोटे इंसीडेंट हैं जन को मिलती है आरो सुनीलम मांस खाने कर मध्य कोलकाता में ही सुना की अभी कुछ ही समय के भीतर में वह मां को लेकर के कोलकाता जाएंगे वहां पे थोड़ी डर कुछ समय के लिए विश्राम करेंगे और फिर वहां से जो है कोलकाता चले जाएंगे अमर माता कहां के 80 रेखा सामान्य मुर्गी और अमर माता कहां के व्यक्ति रेखा भी थे सामान्य मूड की चोला पतली झोल खैट दिलाने क्या है मुझे नहीं पता किंतु रखा भी में जो है वार्ड महाराज के घर आए हैं शरद मारा तो उनकी माता जी ने एक जो प्लेट में वो मुड़ी और वो जो भी चोला पतली जल जो भी है वो शरद महाराज को खाने के लिए दिया पूर्वोत्तर नवरात्र बशूरे तीन दिन उपस्थित था क्या स्वामी शारदानंद जी धर्म पिपासु भक्तों डर शाहिद धर्मो प्रसंग कोरिया जय रामबाती प्रिया जो नवरात्रि के जो उत्सव था उसमें वह जो उपस्थित हुए थे उनको जो निमंत्रण देकर के वो पुकार गया था आह्वान किया गया था तो वहां पर वह तीन दिन रहे और जितने भी धर्म के पशु न नई है उनको उन्होंने बहुत अच्छे से वह धर्म के बड़े में ठाकुरमार स्वामी जी के बड़े में और हमारी ये जो उपनिषद है हमारे पुराण है उसके सार्थक क्या है यह सब बताएं और फिर तीन दोनों के बाद जयरामबाती वापस चले गए कौन से दिन की अभी क्या है की कॉइलपाड़ा के जितने भी भक्ति थे उन्होंने शरद महाराज ने इस तरह से इतना सुंदर रूप से इतना मतलब भावुक रूप से ये जो धर्म का ज्ञान दिया की ये जो पड़ा था ये जो युवक है खासकर के यह जो केदार बाबू के शिष्य है और उनके कुछ रिलेटिव से वगैरा तो वो उसे दिन की र देखने लगे की शरद महाराज वापस जाते हैं कोलकाता किंतु अभी सिर्फ इस बार वो अकेले नहीं है साथ में मां भी है और मां जो है रुकने वाली है विश्राम करने वाली है और सब लोग जो है उत्सुकता पूर्वक उसे दिन की अपेक्षा कर रहे हैं की मां आएगी मां विश्राम करेंगे मां के वो जो है दर्शन ग्रहण करेंगे मां के आशीर्वाद प्राप्त करेंगे 1909 कृष्णब जेस्ट मास के प्रथम जेष्ठम आश्रय प्रथम दिखे एक दिन पितृ देवेन मुख्य सुनील बोईकाल चरता नगर श्री श्रीमा शारदा देवी और स्वामी शारदानंद जोगेना गोलापमा प्रकृति के लिए कोलकाता पोथेवालपाड़ा पहुंची बेन आमदे विद्यालय शिक्षक श्री सूक्त केदारनाथ डेट महाशय बड़ी श्री माहिर एवं बड़ों रास्ता पैसे आमदर स्कूल व्यवस्था हुई है तो पिताजी के पास से उन्होंने सुना की 1909 के जेष्ठ महीने के शुरुआत के दोनों में शर्ट महाराज आएंगे साथ में होगी मां गोलापमा और योगेन और अभी कल पड़ा जो लोग गए होंगे तो वहां जगदंबा आश्रम भी है और वहां पर एक दूसरा में आश्रम भी है तो जगदंबा आश्रम अभी तो आश्रम के रूप में शुरुआत नहीं हुआ था किंतु वह जग टी तो वहां पर महा विश्राम करेगी और यहां जो रास्ते के किनारे जो है जहां पर बाद में में आश्रम जो हुआ कल पड़ा था वहां पर विश्राम करेंगे संध्या के समय आएंगे बोलकर के उन्होंने क्या किया भक्तों ने थोड़ी सी मिठाई और नारियल के जो लड्डू है नारियल के लड्डू जो है मैंने पहले बार बंगाल में ही बेलूर मठ में ही खाए थे वहां की ये जो विशिष्ट यह जो है वो एक मिठाई है तो वो उसका आयोजन करके रखा किंतु क्रमशः संध्या हो या अशुभ तथापि ठहरा एशिया पहुंची लेना संध्या होने को आई सूरज जो है दल रहा है फिर भी उन लोगों को आने में डेरी हो रही है गाड़ी नदी उसके बाद में समाचार आया किसी ने आकर के बताया किसी और के पास में शिहाद के पास में वह जो नदी के पास में वो जो कढ़व कीचड़ जो होता है वहां पर उनकी जो यह गुरु की गाड़ी है मैंने जिसको यहां पर गुजराती में कहते हैं तो वो जो उसका जो पहिया जो है वो वहां पर कढ़व में जो है फैंस गया है जैसे ही यह समाचार मिला तो जो केदार बाबू के वह जो बाकी के शिष्य बाकी के जो स्टूडेंट है राजेंद्र वगैरा राजेंद्र ही बाद में वो सन्यास ग्रहण करके परमेश्वर आनंद जी हुए थे तो वे लोग सब एक लालटेन लेकर के वहां पे जान लगे रात्रि आता नता सोकल एशिया गाड़ी जो वहां पे वो दलदल में फैंस गई थी उसको निकाला और रात को 8:00 बजे के आसपास में जो है कल पड़ा आकर के उपस्थित हुए