Transcript
ओ स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्मा स्प अवतार षय यह क्रोनोलॉजी है वह मैं जब टीसी में स्टडी करता था उस समय मैंने इसको बनाया था तो इसमें देखिए कि स्वामी जी का पूरा लाइफ है जैसे हमने डिस्कस किया कि कहां-कहां पर स्वामी जी की लाइफ के बारे में हमको कंप्लीट इंफॉर्मेशन मिलती है उने ज्यादातर इंफॉर्मेशन मिलती है तो एक है लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानंद बाय हिस इटन एंड वेस्टर्न डिसाइल स्वामी जी का जो कि प्रमाणित बायोग्राफी है और वह इंग्लिश में है और बंगोली में उसका अ अनुवाद तो नहीं है वो इंडिपेंडेंट रचना है गंभीरानंद जी महाराज की युग नायक स्वामी विवेका तो वो तो एक प्रमाणिक सोर्स है दूसरा है कंप्लीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद जिसमें कि स्वामी जी के सभी लेक्चर सभी लेटर्स और मैक्सिमम रेमसंस आ जाते हैं सभी नहीं आते ज्यादातर आते हैं किंतु फिर रेमसंस के बारे में और एक किताब है रेमसंस ऑफ स्वामी विवेकानंद जिसमें कि बहुत सारे रेमसंस एक्स्ट्रा ऐड किए गए हैं तो वह तीसरा हो गया चौथा है कि स्वामी विवेकानंद नंद इन द वेस्ट न्यू डिस्कवरीज मेरी लुई बोलकर के एक अमेरिकन डिवोटा थी स्वामी अशोकानंद जी की डिसाइल जिसने कि इस किताब के बारे में काफी कुछ संशोधन किया है स्वामी जी अमेरिका में थे तो कुछ कुछ चीजें हमको पता थी किंतु बहुत डिटेल में नहीं पता था तो मेरी लुईस की मेहनत की वजह से ज्यादातर इंफॉर्मेशन आज अपने पास में आई है तो वो फोर्थ सोर्स है फिफ्थ है कि जिस तरह से मेरी लुईस ने अ अमेरिका में स्वामी जी के ऊपर में रिसर्च किया वैसे ही शंकरी प्रसाद बसू ने स्वामी जी के ऊपर में इंडिया में रिसर्च किया और उस किताब का नाम है स्वामी विवेकानंद और समकालीन भारतवर्ष अर्थात कि कंटेंपररी इंडिया स्वामी जी जिस समय भारत वापस आए थे जब वह परिव्राजक के भारत में आए तो कहां-कहां पर उनका कैसा स्वागत किया गया किस तरह से उनको न्यूज़पेपर में उनके बारे में आर्टिकल आए बड़े-बड़े ऑथर्स ने राजनेताओं ने उनके बारे में क्या कहा क्या लिखा वो सब काफी अच्छे से रिसर्च करके यह आठ वॉल्यूम का है स्वामी विवेकानंद और समकालीन भारतवर्ष तो इतना जो कुछ है स्वामी जी के ऊपर में प्रामाणिक मटेरियल है ऑथेंटिक मटेरियल जिसको कि रामकृष्ण मिशन स्वीकार करता है इसके अलावा देखेंगे कि स्वामी विवेकानंद इन यूरोप बोल कर के एक सीरीज ऑफ आर्टिकल स्वामी विद्या मानंद जी ने लिखे थे ये बहुत पहले की बात है आई थिंक 1950 1960 के दशक की बात है तो इस तरह से स्वामी जी के किसी पार्टिकुलर फेजस के ऊपर में पार्टिकुलर रिसर्च करके काफी सारे आर्टिकल प्रबुद्ध भारत वेदांत केसरी या उद्बोधन में पब्लिश हुए हैं अभी कुछ ही समय पहले वेदांत केसरी में एक बहुत सुंदर आर्टिकल आया था स्वामी विवेकानंद एंड स्पोर्ट्स उनकी जो यह जो स्पोर्ट्स प्रियता जो है जैसे कि क्रिकेट खेलते थे स्वामी जी तो इस तरह से कौन-कौन से खेल स्वामी जी खेलते थे इसके बारे में बड़ा ही संशोधना क्मक सुंदर आर्टिकल वो एक आसम चौधरी बोल कर के है उसने उसका है मोस्ट प्रोबेबली उसी का है तो अभी इस तरह से रिसर्च काफी कुछ हुआ है जो कि अपनी जर्नल्स में बिखरा पड़ा है यह जो असीम चौधरी है उसने स्वामी विवेकानंद एंड इन अमेरिका न्यू फाइंडिंग्स बोलक के इतनी मोटी एक दूसरी किताब लिखी है अभी रिसेंटली ही पब्लिश हुई है रिसेंटली यानी कि आई थिंक 20 इयर्स हो गए हैं वे उसको तो इतना सब कुछ मटेरियल अपने पास में स्वामी जी के बारे में है किंतु जैसे कि हमने कल डिस्कस किया स्वामी जी के किसी एक पार्टिकुलर फेस को लेना है जैसे कि यहां पे है अभी देखिए कि शुरुआत के दिनों के बारे में तो हमारे पास ज्यादा जदा जानकारी नहीं किंतु जैसे कि यह है कि स्वामी जी त्रिशूर में थे नवंबर टू डिसंबर इसके बारे में लाइफ में क्या कहा गया है गंभीरानंद जी क्या कहते हैं या तो फिर विरजानंद जी क्या कहते हैं तो उनकी बायोग्राफी में देखना पड़ेगा तो वैसे ही डिफरेंट डिफरेंट जगहों प सब मटेरियल बिखरा पड़ा है मैं जब स्टडी कर रहा था तो मैंने क्या किया जहां पे कोई भी एक पार्टिकुलर टॉपिक के मैंने जितना भी मटेरियल है जितनी भी किताबों में सबको क्रोनोलॉजिकल सजाया अर्थात की और उसको फिर मैंने इस तरह से फेजस टॉपिक्स और चैप्टर तीन कैटेगरी आप देखते हैं तीन लेवल आप देखेंगे इस क्रोनोलॉजी में इस तरह से मैंने इसको सजा दिया जैसे कि यह चाइल्डहुड एंड यूथ यह स्वामी जी के जीवन का एक फेज है 18638 तक का उसमें टॉपिक है चाइल्डहुड एंड यूथ और ए ये सब चैप्टर्स है एंसे यानी कि स्वामी जी के पुरखे क्या करते थे कहां पे थे कैसे थे उनके बचपन के दिनों की कहानियां कि किस इस तरह से वो इतना मने तूफानी थे इतने वो मिस्टीविंदवल्ले एजुकेशन और कॉलेज डेज यानी कि ये स्कूल में और कॉलेज में ये जो कॉलेज डेज है अर्थात कि उन दिनों की बातें जबकि स्वामी जी की ये जो बौद्धिक क्षमता का जैसे धीरे-धीरे विकास हो रहा है फिलोसोफी क्या है यह मतलब एक हायर थिंकिंग क्या है सिविलाइजेशन क्या है भारत में पॉवर्टी क्यों है भारत गुलाम क्यों है यह जो हायर थिंकिंग जो यंग लोग करते हैं वो सब थिंकिंग उनका उस दिनों में शुरू हुआ तो इस तरह से जितना भी मटेरियल मिला उसका सबका मैंने क्रोनोलॉजी बनाया उसको टॉपिक वाइज फेज वाइज चैप्टर वाइज सजा करके ये दो दो तरह से क्रोनोलॉजी एक तो शॉर्ट वर्जन है जिसको कि मैंने आप सबके साथ में शेयर किया है और एक लार्जर वर्जन है बिगर वर्जन जिसमें कि मैंने बहुत ज्यादा एक्स्ट्रा डिटेल डाली है वो तकरीबन हजारों पेज में जाएगा उसको जद इसका पीडीएफ करने को जाएंगे तो तो जो भी है इस पूरे प्रोजेक्ट को मैंने नाम दिया था शारदा कोश तो उस समय क्योंकि मैं मां के नाम से कुछ रखना चाहता था और ऐसा कुछ रखना चाहता था जैसे कि पहले पहले तो मैंने सोचा था एनसाइक्लोपीडिया विवेकानंद ऐसा कुछ किंतु फिर मैंने कहा कि नहीं स्वामी जी के नाम से भी ज्यादा स्वामी जी के जीवन में देखिए कि वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ शिकागो में स्वामी जी बोलने के लिए खड़े हुए तो सबसे पहले मां सरस्वती का स्मरण किया नहीं कि अपने गुरु का तो इसके बारे में मैंने बहुत सोचा था उस समय फिर मुझे पता चला कि नहीं एक्चुअली ऐसा नहीं है कि स्वामी जी किसी ट्रेडिशनल डीटी को इवोक करते हैं यानी ट्रेडिशनल मां सरस्वती विद्या की देवी है तो प्रश्न तो होगा ही ठाकुर तो अवतार वरिष्ठ आया है विद्या की देवी होने से क्या हुआ किंतु यहां पर स्वामी जी एक्चुअली विद्या की देवी से भी ज्यादा मां शारदा को स्मरण करते हैं और स्वामी जी ने एक पत्र में लिखा भी है कि मां की मां का आदेश मिलने से मां के यह भूत और बंदर कुछ भी कर सकता है कुछ भी कर सकते हैं और उन्होंने कहा कि मैंने मां को एक पत्र लिखा विदेश में जाने से पहले आशीर्वाद मांगने के लिए और मां ने जैसे ही आशीर्वाद दिया वैसे ही मैंने एक एक जंप लगा कर के एक छलांग लगा कर के समुंदर पार होक के मैं अमेरिका में आ गया तो तो स्वामी जी इस तरह से कहते हैं कि मां के आशीर्वाद से ही उनका जो विदेश यात्रा है वो सफल हुआ है स्वामी जी खुद इस तरह से एक्सेप्ट करते हैं तो इसके लिए फिर मैंने सोचा कि मां के नाम से रखा जाए तो फिर आखिर में नाम रखा था शारदा कोष एक पूरा सॉफ्टवेयर बनाया था इसके ऊपर में वो सर्च वगैरह सब कुछ हो सकता है अभी तो क्या है कि उसको बहुत दिनों से अपडेट नहीं किया और और अभी टेक्नोलॉजी भी जिस सॉफ्टवेयर में मैंने बनाया था वो अभी पुरानी हो गई इसको मैंने सोचा था कि मैं वेबसाइट पर रखूं किंतु वो एक पूरा एक जन्म भर का काम है कौन अभी इस समय हाथ में लेगा तो जो भी है तो इसको थोड़ा सा डिस्कस करते हैं स्वामी जी की जो फेज है फिर जो टॉपिक्स है और ये चैप्टर है देखिए कि पूरा लाइफ को तीन लेवल में मैंने बांट दिया है तो फेज कितने हैं सर्वप्रथम चाइल्डहुड एंड यूथ 18632 बचपन से जन्म लेकर के श्री राम कृष्ण के पास आने तक का उसके बाद में सेकंड फेज है विथ श्री रामकृष्ण 18818 6 ठाकुर के पास में जब से स्वामी जी आए तब से लेकर के स्वामी जी की अ ठाकुर की महासमाधि अगत 18 अगस्त 18864 मठ की स्थापना हुई और इस मठ में सभी गुरु भाई रहते थे और इस मने स्वामी जी इस मट से काफी बार वहां से पिलग्रिम मेज के लिए गए हैं किंतु वो जो आखिरी बार जो निकले कि फिर जब वह सीधे वोह शिकागो से ही वापस आएंगे तो तब तक की जो पूरी कहानी है अगस्ट 86 से लेकर के जुलाई 1890 जुलाई 1890 में स्वामी जी फाइनली वरा नगर मठ का त्याग किया इसके बाद में परिव्राजक फेज देखिए कि जुलाई 1890 मठ का त्याग करने के बाद में अखंडानंद जी को साथ में लेकर के वह जो उन्होंने प्रयाण किया तो पूरे भारत का भ्रमण करके आखिर में मे 1893 में उन्होंने विदेश यात्रा की तब तक के परिव्राजक देश का संपूर्ण विवरण इस फोर्थ फेज में है और उसके बाद में देखिए कि मिशन टू द वेस्ट अर्थात कि ये सब नाम मैंने दिए हुए थोड़ा सा इंप्रेसिव नाम लगे इस तरह से सोच कर के मैंने दिए है तो मिशन टू द वेस्ट इसका अर्थ है कि मे में जब स्वामी जी निकले और फिर सितंबर में तो वो वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन तब से लेकर के दिसंबर में और इसके बाद में है देखिए कि मिशन टू द ईस्ट अभी जब स्वामी जी अमेरिका से पहली बार भारत लौटे तो सिर्फ यह भारत लौटना सिर्फ इतना नहीं था देयर वाज अनदर मिशन वेस्ट में जैसे एक स्वामी जी का मिशन था तो इष्ट में भी स्वामी जी का मिशन था भारत में लौटे हैं अपने घर वापस आए हैं सिर्फ बात वो नहीं है भारत में उनको रामकृष्ण संघ की स्थापना करनी है और जिस तरह से अमेरिका में और लंडन में वेदांत सोसाइटी की स्थापना करके वह निकले थे वैसे ही भारत में रामकृष्ण मिशन की स्थापना करनी है और इस स्थापना करने के लिए भारतवासियों को तो सबसे पहले हजार साल की जो नींद है उसमें से उनको उठाना है तो यह जो महा भयानक कार्य उन्होंने अपने हाथ में लिया जैसे कि गांव-गांव शहर शहर अमेरिका में घूम कर के उन्होंने वेदांत का प्रचार किया वैसे ही भारत में उन्होंने रजस अर्थात कि कर्मयोग का प्रचार किया यह स्वामी जी का जो अमेरिका में जो मैसेज है और इंडिया में जो मैसेज है इन दोनों के बीच में ये एक बहुत बड़ा डिफरेंस हमको दिखता है अमेरिका में लोग ऑलरेडी भोग की चरम सीमा पर बैठे हुए थे उनको मन की शांति चाहिए थी और भारत में लोग तमस के अंधकार में डूबे हुए थे तो भारत में लोगों को कार्यक्षम बनाना था कार्यकर बनाना था तब तो कहीं जाकर के तमस में से रजस में जाएंगे तब तो कहीं जाकर के सत्व में जा पाएंगे तमस से सत्व में सीधा जंप लगाना संभव नहीं तो यह मिशन टू द ईस्ट जनुअरी 18971 199999 जून रीजन यह पता चलता है कि स्वामी जी की सेहत जो है धीरे-धीरे करके बिगड़ रही थी तो इस सेहत को लेकर के डॉक्टर लोग उनके गुरु भ्राता बड़े चिंतित थे सबने कहा विदेश चाहिए तो समुद्र यात्रा से थोड़ा सा शांति मिलेगा थोड़ा सा स्वास्थ्य उपकार होगा तो उसके लिए तो निकले थे किंतु एक डीपर एनालिसिस करेंगे तो हमको पता चलेगा कि ये जो सेकंड विजिट है उसके पीछे भी ईश्वरीय एक बहुत बड़ा हाथ है क्यों क्योंकि ईश्वरीय एक बहुत बड़ा एक एक क्या कहेंगे प्लान है क्योंकि फर्स्ट विजिट के दौरान जो स्वामी जी ने ईस्ट कोस्ट पे काम किया न्यूयॉर्क है शिकागो है वगैरह जो सब राज्य है वहां पे तो सेकंड विजिट में स्वामी जी ने वेस्ट कोस्ट की मुलाकात ली कैलिफोर्निया की और कैलिफोर्निया में वेदांत का झंडा गाड़ा वेदांत का विजय स्तंभ रोपित किया आज देखिए कि यह वही कैलिफोर्निया है मैं जब रामकृष्ण ज्योत में था उस समय में सीरीज ऑफ आर्टिकल लिखे थे कि स्वामी विवेकानंद इन कैलिफोर्निया बोलक के इसी में से सब मटेरियल इकट्ठा करके तो देखिए कि आज उसकी जो पूर्व भूमिका में मैंने लिखा था कि कैलिफोर्निया आज यदि एक सेपरेट कंट्री होता तो दुनिया की सिक्सथ लार्जेस्ट इकोनॉमी होता इतना इतना मतलब उसका इकोनॉमिकल ये कहेंगे कि पावर इतना ज्यादा है आज सिलिकॉन वैली ना कि हॉलीवुड का एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री ना कि यह जो एरोस्मिथ ऑफ अमेरिकन इंडस्ट्रीज यह जो काल टेक वगैरह जो यूनिवर्सिटीज है सर्व मन विश्व की सबसे जानी मानी यूनिव सिटस में आती है वह सब कैलिफोर्निया में है यानी कि कैलिफोर्निया का अमेरिका के विकास में एक बहुत ही बड़ा योगदान है आजकल कैलिफोर्निया की हालत जो है थोड़ी सी पॉलिटिकल कंडीशन वहां की थोड़ी गड़बड़ हो गई है तो जो भी है किंतु जब यह स्वामी जी जब थे वहां पे तब से लेकर के एटलीस्ट यह 2010 तक यह 2015 तक तो कैलिफोर्निया वन ऑफ द बेस्ट प्लेस इन द वर्ल्ड फॉर एंटरप्रेन्योरशिप फॉर द फ्रीडम ऑफ थॉट फॉर द फ्रीडम ऑफ आइडियाज ये टेक इनोवेशन एंड डिस्कवरी ये सबके लिए बेस्ट प्लेस था ये कैलिफोर्निया तो वहां पे कैलिफोर्निया जब कैलिफोर्निया नहीं था हॉलीवुड जब हॉलीवुड नहीं था ये जो सान होजे यानी कि ये जो सिलिकॉन वैली ये सिलिकॉन वैली नहीं था उस समय जाकर के स्वामी जी ने वहां पे वेदांत की स्थापना की और वे लोग तो कभी स्वीकार नहीं करेंगे किंतु स्वामी जी के डिसाइल होने की वजह से हम लोग तो ऐसा क्लेम करेंगे कि कैलिफोर्निया की जो सक्सेस है बात की सक्सेस उसके पीछे स्वामी जी का भी एक बहुत बड़ा हाथ है तो यह सेकंड मिशन टू द वेस्ट और आखिर में जब स्वामी जी भारत में लौटे डिसंबर 18 1890 में सो ट वाज दी एंड एक्चुअली ये दिसंबर 1900 है जो ऊपर में जो 1890 लिखा है वो स्पेलिंग मिस्टेक है नीचे में सही लिखा है दिसंबर 1900 क्योंकि ये जो फर्स्ट ये जो नया मिलेनियम था उसका पहला दिन स्वामी जी ने वहां पर मायावती जाने के रास्ते में थे तो दैट इज मिशन ओवर आखिर में स्वामी जी का कार्य समाप्त हुआ वह शांति से बैठते हैं और वह जो एक पावरफुल उनका स्टेटमेंट है कि अभी तक ठाकुर का काम किया था अभी अपना काम करता हूं हालांकि अपना ठाकुर का ऐसा कुछ है नहीं किंतु देखेंगे हम जद इस इसका जब डिस्कशन करेंगे तो किंतु ये धीरे-धीरे करके ये जो पूरे विश्व में घूम कर के यह जो आध्यात्मिक जो स्वामी जी ने कहा ना कि ठाकुर के आने से यह ब्रह्म कुंडली नहीं जागृत हो गई है पूरा विश्व आध्यात्मिकता की ओर जा रहा है किंतु इसके मतलब ठाकुर के आने से तो फिर हुआ नहीं स्वामी जी को जगह-जगह जाकर के वो उसको एक्टिवेट करना पड़ता है य सॉफ्टवेयर की लैंग्वेज में बोलेंगे सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करने से नहीं होगा सिर्फ उसको एक्टिवेट भी करना पड़ता है तो वो जो ब्रह्म कुंडली ने जागृत तो कर दी किंतु जगह जगह जाकर के उसको एक्टिवेट करने का काम य स्वामी जी ने किया है तो यह कार्य आखिर में समाप्त हुआ और ट इज द मिशन ओवर तो देखिए कि इस तरह से एट मेजर फेजस में मैंने स्वामी जी के जीवन को डिवाइड किया और इसके बाद में इसके भीतर में यदि टॉपिक्स देखे तो चाइल्डहुड में तो खैर वही एक है चाइल्डहुड एंड यूथ इसको मुझे दो टॉपिक करने चाहिए थे यह बहुत पहले मैंने सब किया है अभी ये जो फ्रेश आई से जब कुछ देखते हैं तो कुछ कुछ इंप्रूवमेंट करने को हमको लगता है कि इसमें होना चाहिए तो इसको दो टॉपिक कर देने चाहिए थे एंसे और चाइल्डहुड एक टॉपिक में और अर्ली एजुकेशन एंड कॉलेज डेज उसको की यूथ वाले टॉपिक में डाल देने चाहिए थे इसके बारे में तो काफी कुछ हमको पता ही है विथ श्री राम कृष्ण देखिए कि यहां पे दो टॉपिक में स्वामी जी का जीवन पटा हुआ है एक तो सबसे पहले कि पहली बार जब ठाकुर के साथ में मुलाकात हुई तो कैसे स्वामी जी एकदम बेफिक्र थे बिल्कुल बिंदास होक के ठाकुर के साथ में बात करते थे गप लगाते थे जैसे कि जीवन भर का कोई उनको चिंता ही नहीं है टेंशन ही नहीं है जब ठाकुर पहली मुलाकात पहली बार जब दक्षिणेश्वर गए स्वामी जी पहली मुलाकात तो नहीं कहेंगे वो तो सुरेश मित्र के वहां पेने की कहां पे हुई थी किंतु जब स्वामी जी पहली बार दक्षिणेश्वर गए तो ठाकुर उनके सामने उनको वो जो बाहर का बरामदा है वहां ले जाकर के उनके सामने हाथ जोड़ कर के जो कहने लगे कि आप कहां पर थे अभी तक मैं आपकी राह देख कर के व कितना परेशान हो गया यह सब नर नारायण ऋषि क्या क्या सब बोलना शुरू कर दिया तो नरन एकदम टेंशन में आ गया कि ये पगला बामुन क्या करेगा अभी कुछ ठिकाना नहीं है मार भी देगा ना कि क्या करेगा कुछ ठिकाना नहीं तो उस समय स्वामी जी को कुछ भी पता नहीं था या तो बिल्कुल बेफिक्र थे अपनी डेस्टिनी के बारे में अपना क्या कार्य है ठाकुर की क्या महत्ता है उसके बारे में किंतु जैसे-जैसे दिन बीतते गए ठाकुर से जदा से ज्यादा प्रभावित होते गए ठाकुर ने एक बार नरेंद्र की परीक्षा की थी ऐसा तो नहीं है कि मैं उसको इतना प्रेम करता हूं बोलकर के वो मेरे पास में आता है जद मैं उसको एक दिन ठाकुर ने कैसा टेस्ट किया कि स्वामी जी के साथ में बात करना ही बंद कर दिया जैसे ही न वैसे तो जनरली जब नरेण आता तो कथामृत में कितना सुंदर वर्णन कई जगह प है ठाकुर आज महानंद आज है नरेण शश छन कालीबाड़ी थे ठाकुर आज महानंद में है क्यों क्योंकि नरेंद्र काली मंदिर में आए हुए हैं तो ऐसा तो कितना ही वर्णन दिखेगा किंतु ठाकुर ने परीक्षा करते हुए एक बार नरेंद्र के साथ में बात करना ही बंद कर दिया जब नरेण आ कर के बैठेगा तो ठाकुर कुछ बोलेंगे नहीं कुछ बोलेंगे नहीं उसके सामने देखेंगे नहीं उसको कंपलीटली इग्नोर करेंगे तो नरेण भी कुछ कम नहीं था वो ठाकुर के सामने थोड़ा समय बैठा रहेगा फिर देखेगा कि ठाकुर बात नहीं कर रहे ना कि उसको भजन गाने को बोलते हैं ना ही कुछ कहते हैं तो बाहर में जाकर के हाजरा के साथ में गप लगाएगा और हुक्का पीना शुरू कर देगा उसके साथ में चिलम पीना शुरू कर देगा तो एक बार ठाकुर ने फिर पूछा कि मैं तो तुम्हारे साथ बात नहीं कर रहा फिर भी यहां पर क्यों आते हो तो नर ने कहा कि महाशय मैं तो सिर्फ इसीलिए आता हूं कि मैं आपको आपको चाहता हूं आपकी बातें सुनना मुझे अच्छा लगता है आपको देखना आपका दर्शन करना अच्छा लगता है तो तब कहीं जाकर के मतलब ये देखिए कि बात सिर्फ ये नहीं है कि नरेंद्र ने वो तो बाद की बात है कि अपने गुरु के रूप में स्वीक स्वीकृत किया किंतु उससे पहले भी दोनों का स्नेह संबंध स्थापित हो गया था इसके बाद में किंतु जो सही प्रॉब्लम नरेण के साथ में स्टार्ट हुआ यह जो डेज ऑफ एक्सी एक दक्षिणेश्वर वाला जो है एक चैप्टर यह साधना टॉपिक में इसको मुझे ऊपर में ले लेना था यह अभी इतने दिनों के बाद फ्रेश दृष्टि से देखने से ऐसा लगता है कि एक्चुअली यह जो साधना है वो नरेण की स्ट्रगल से स्टार्ट होती है फेब्रुअरी जो स्वामी जी के साथ में स्ट्रगल प्रारंभ हुआ और यह साधना वैसे मैंने यहां पर जो लिखा है 81 उसको मुझे 84 करना चाहिए था तो यह थोड़ा सा इंप्रूवमेंट करने की जरूरत है इसमें तो नरेंद्र की साधना ठाकुर के साथ में सही सही प्रारंभ हुई उनके पिताजी के देहांत के बाद में और उसके बाद में ठाकुर को खुद को कैंसर हो गया पहले तो उनको श्यामपुर लाया गया फिर उनको काशीपुर लाया गया और फिर वो आखिरी दिन जबकि ठाकुर ने अपनी सभी शक्ति नरेण के भीतर में संचारित कर दी तो और फिर ठाकुर ने महासमाधि ग्रहण की उस दिन का एक बड़ा सुंदर एक वर्णन है अखंडानंद जी अपने शब्दों से करते हैं कि उन्होंने चांद के इर्दगिर्द एक एक एक रिंग देखी एक वर्तुल जैसा देखा अभी यह जो रिंग होती है चांद के आसपास बादलों की या प्रकाश की वो तभी दिखती है जबक कोई बहुत बड़ा अपशकुन होने वाली हो जैसे कि किसी का मृत्यु तो जैसे ही अखंडानंद जी ने ऐको देखा वो स्वामी जी के पास में गए देखा कि भाई मुझे इस तरह से आकाश में दिख रहा है तो नरेंद्र ने इमीडिएट उनको शांत कर दिया बोला कि भाई तुम इसके बारे में और किसी को मत बताना बिना मतलब जैसे ये मां मां भी वहां पर रहती थी बाकी सब गृहस्थ भक्त भी थे अभी इस तरह का आप शुकन वाली बात उनको कहेंगे तो बिना मतलब टेंशन में आ जाएंगे तो जो भी है उसी दिन मध्य रात को 1 बजे के आसपास में ठाकुर ने महासमाधि ग्रहण कर ली थी तो वह आखिरी दिन ठाकुर के साथ में और उसके बाद में किंतु देखिए कि जीसस के बारे में है ना कि वो जीसस का जब क्रूसिफिकेशन थोड़े से यह सोच में पड़ गए कि जीसस को हम जद अवतार या तो फिर प्रोफेट मानते थे वह जद सन ऑफ गॉड उनकी भाषा में तो यह जो सन ऑफ गॉड यदि मानते थे तो उनको एक एक एक आम अपराधी की तरह क्रूसिफिकेशन दिया सबसे पहले तो मेरी मैगडेलीन को दिया और फिर वो जाकर के बाकी सब डिसाइल को खींच के ले आए कि देखिए देखिए जीसस हैज कम बैक तो उसके बाद में सभी का विश्वास ढ हो गया तो यहां पे भी हालांकि नरेंद्र का कभी अविश्वास ठाकुर पर कभी था ही नहीं किंतु जब ठाकुर की महासमाधि हुई उसके कुछ दिनों के बाद में अ जब तक काशीपुर का भाड़ा अभी भी दिया हुआ था पता है कि वह जो लीस्ट थी वह उसी महीने के आखिर में समाप्त हो गई थी अगस्ट में ही तो सिंबर में ही उनको घर खाली करके चले जाना था काशीपुर उद्यान गृह तो काशीपुर अ 18 तारीख को ठाकुर की महासमाधि हुई तो उसके बाद में जो कुछ दिन बचे हैं लिस के भाड़े के तो यह लोग वहीं पे रह रहे थे उसी दिनों के दौरान नरेण उस समय रात को पैदल चलते चलते टहलते टहलते उसी गार्डन में एकाएक देखा कि सामने कोई खड़ा है और खड़ा है तो उनका आकार उनका मतलब अंधेरे में खड़े हैं चेहरा तो नहीं नहीं दिखाई दे रहा किंतु उनका जो शरीर है पूरा जो आउटलाइन है पूरा ठाकुर जैसा दिखता है तो नरेन एकदम जोर से चिल्ला उठा कौन है कौन है बोल कर के एकदम दौड़ कर के गया देखने के लिए कि कौन खड़ा है अंधेरे में किंतु देखा कि वहां जाकर के कोई नहीं है तब उसने कहा कि देखिए ठाकुर ने वापस आकर के हमको दर्शन दिए और यही दर्शन ठाकुर ने मां को भी दिए थे वही काशीपुर में ही मां जब अपनी चूड़ियां श्रृंगार वगैरह सब निकाल रही है उस समय ठाकुर ने आकर के मां का हाथ पकड़ लिया कहा कि मैं गया कहां हूं एक कमरे में से दूसरे कमरे में ही तो उससे अलावा तो मैं कहीं नहीं गया तो यह देखिए कि ठाकुर ने दर्शन देकर के इमीडिएट महासमाधि के बाद में सबको भरोसा दिलवाया कि नहीं उनका जो भाव प्रवाह है वो वैसे ही बहता रहेगा जैसे कि वह सदेव वर्तमान ते जीवित थे तब की बात है तो यह हो गए ठाकुर के साथ में आखिरी दिन उसके बाद में हमको पता है फेमस कहानी कि सुरेश मित्र अपने घर में विश्राम कर रहा था और ठाकुर ने आ कर के कहा कि अरे देखो मेरे लड़के सब मारे मारे इधर-उधर घूम रहे हैं तुम उनके लिए कुछ एक जगह की व्यवस्था करो तो दौड़ कर के वो आकर के नरेंद्र के पास गया नरेंद्र को कहा कि भाई मैं 80 देता था काशीपुर में तो मैं 80 तुम लोगों को भी दूंगा तुम कहीं जगह की व्यवस्था करो तो यह वराह नगर मठ का प्रारंभ हुआ उससे पहले टको गोपाल बोलकर के एक था टको गोपाल के बारे में कथामृत में वगैरह काफी कुछ आता है तो टको अर्थात की हटात एकाएक एकाएक आएगा एकाएक चला जाएगा और तो उसका नाम स्वामी जी ने हुडको गोपाल दिया था तो ये हुडको गोपाल घर-घर जाकर के सभी बाकी सब तो घर चले गए थे ठाकुर की अस्थ को लेकर के जो विवाद हुआ था उसके बाद में तो टको गोपाल था कि स्वामी जी के घर जाकर के शरद महाराज के घर जाकर के उनको उत्साह देता था भाई ठाकुर ने हमको एक बंधन में बांधा है प्रेम के एक सूत्र में बांदा है तो इस सूत्र को प्रेम की इस दौर को तोड़ मत देना बोलकर के वो था इनिशियली कि सभी गुरु भाइयों के साथ में बात करके उनको इंस्पायर करता था नरेंद्र को लेकर के चलता था चलो शरद के साथ में गप लगाते हैं शरद महाराज के घर लेकर आता था शरद महाराज को लेकर के नरेंद्र के घर जाता था इसको इकट्ठा करेगा उसको इकट्ठा करेगा वो इनिशियल लेज में वो जो सघ बद्ध होने में उसका भी एक बहुत बड़ा अवदान है और वैसे भी स्वामी जी ने अपने पत्र में राजा महाराज को लिखा है कि राजा तुमको याद है तो कि जब ठाकुर की महासमाधि हुई और उसके बाद में सभी लोगों ने हमको तर छोड़ दिया था यह सोच कर के कि यह साधना तपस्या त्याग वैराग्य की जो हम बातें कर रहे हैं हमारा मस्तिष्क बिगड़ गया है विकृत मस्तिष्क हो गए हैं हम लोग सिर्फ वेग है ये जो सब ये रामचंद्र दत्त वगैरह जो मानते थे उस समय ये चुनी बाबू है मास्टर महाशय है ये सुरेश मित्र है इन्हीं लोगों ने बलराम बाबू है इन्हीं लोगों ने हमारा साथ दिया था इनका ऋण हम कभी भी भूल नहीं पाएंगे तो ये इन सभ के प्रयास से वराह नगर मठ का प्रारंभ हुआ और वराह नगर मठ के बारे में वैसे जितने भी फेजस है स्वामी जी के जीवन के ठाकुर के जीवन के बहुत सारा मटेरियल उपलब्ध है वराह नगर मठ के बारे में ही ऑफिशियल ज्यादा कुछ पता नहीं है हमको किंतु अनऑफिशियल देखा जाए तो स्वामी जी के जो भाई थे छोटे भाई महेंद्रनाथ दत्त तो उन्होंने उस दिनों के बारे में काफी कुछ लिखा है यानी कि एक भी पीरियड ऐसा नहीं है कि जबकि हमारे पास में उसके बारे में इंफॉर्मेशन ना हो बस वही बातें है कि किसी किसी किताबों को हम ऑफिशियल एक्सेप्ट करते हैं किसी को नहीं करते किंतु ये जो महेंद्रनाथ दत्त की जो किताब है स्वामी विवेकानंद घोटना बली तीन वॉल्यूम में है और इसमें इतना सुंदर वर्णन है उन दिनों का कि कैसे वो वरा नगर मठ में जाते थे मठ में गुरु भाइयों ने सब विभिन्न तरह की साधना करते हैं ना तो एक साधना करने के दौरान गुरु भाइयों ने ठीक किया कि हम लोग दिगंबर रहेंगे वस्त्र धारण नहीं करेंगे परमहंस सन्यासी की तरह तो ये जब महाराज ये जो महेंद्रनाथ जब वहां पर जाते हैं मठ में तो सभी लोग दिगंबर तो देख कर के वो बड़े परेशान हो जाते हैं अरे भाई आप कुछ तो कपड़े पहनी तो बोलते है कि तुमको यहां पे आने को किसने बोला यदि तुमको नहीं अच्छा लगता है तो तो जो भी है ऐसा शब्दों में नहीं बोला किंतु मैं कहता हूं े साधना जो होती है वो होती है अब क्या करेंगे तो मने ऐसी कैसी साधना है टॉयलेट क्लीन करना है तो कंपटीशन लगता था कि पास के वहां प पास में ही एक कुआ है कुए में से पानी लाकर के कौन सबसे पहले टॉयलेट क्लीन कर देगा तो जो सबसे मैंने सबसे पहले अर्ली मॉर्निंग को कोई उठेगा तो दूसरे दिन कोई मध्य रात को उठक क्लीन करेगा तो तीसरे दिन कोई रात को सोते हैं उसी समय जाकर क्लीन कर लेगा मने ऐसा कंपटीशन लगता था ऐसी एक इंटेंस साधना चलती थी कभी-कभी काली वेदांती यानी कि अभेदानंद जी महाराज और स्वामी जी इन दोनों में कंपटीशन चलता था डिबेट का काली महाराज कुछ कहेंगे और स्वामी जी उसका उत्तर देंगे तो एक दिन ऐसा हुआ काली महाराज तो सब समय हर जाते थे एक दिन ऐसा हुआ कि यह काली महाराज ने खुद ने वर्णन किया है कि मैंने नरेंद्र को कॉर्नर कर दिया अर्थात कि एक ऐसा पॉइंट नि हालाकि नरेद उसका उत्तर नहीं दे पा रहा है तो मैं इतना खुश हो गया कि पहली बार मैंने नरेण को हराया एकदम मतलब जीवन भर में ऐसा मौका स्वामी जी को डिबेट में हराना यानी कि तो छोटी बात तो है नहीं तो मैंने हराया बोल कर के बड़ा खुश हो गया तो नरेद कहता है कि अच्छा ठीक है आज का दिन जाने दो मैं कल तुमको उसका उत्तर देता हूं तो स्वामी जी उस दिन रात को तो सो गए फिर दूसरे दिन जाकर के काली के महाराज के पॉइंट का जो ऐसा उत्तर दिया है ऐसा तोड़ दिया है उनके पॉइंट को कि महाराज कहते हैं कि भाई तुम्हारे सामने में कभी नहीं जीत पाऊंगा ऐसा ही अपने लाटू महाराज के साथ में भी इसी दिनों की घटना है लाटू महाराज कहते हैं कि नरेण इतना जब ध्यान करता है तो मैं नरेण के साथ में कंपटीशन करता हूं लोरेन लाटू महाराज कहा करते थे थोड़ी अपनी वो हिंदी मिश्रित बंगाली में लोरेन तो लोरेन को मैं हरा दूंगा जप करने में तो बस वो बैठ कर के जप कर रहे हैं जप कर रहे हैं लाटू महाराज बोलेंगे कि नरेंद्र को तो हरा ही देना है तो आखिर में जप करने के बाद में आंख खोल कर के या तो फिर यह जो अंतर दृष्टि होती है उस अंतर दृष्टि से देखा कि उन्होंने इतना घंटे सतत बैठ कर के जो जब ध्यान किया है उतनी देर में नरेंद्र तो कितना आगे निकल गया है कितना आगे निकल गया है कि उसको कभी भी पकड़ नहीं पाएंगे आप तो लाटू महाराज ने भी उनके सामने हार मान ली और इसी दिनों के दौरान की बड़ी सुंदर घटना है यह जो शशि महाराज ठाकुर की जो पूजा किया करते थे उस समय स्वामी जी बड़े नाराज हो जाते थे तो बोलते थे कि अरे यह तुम्हारा ठाकुर घर हम लोगों को खाने को नहीं मिल रहा तूही ठाकुर के लची भोग रावी अर्थात कि हम लोगों को खाने को नहीं मिल रहा है और तुम ठाकुर को पूरी का भोग धरा हो यह सब बंद करो ये ठाकुर घर वगैरह यानी कि क्या है कि स्वामी जी को एक डर था कि यह जो विधि विधान में बहुत ज्यादा फिर चले जाएंगे तो बाद में कहते थे ना कि वो वहां पर वृंदावन में वो जो ठाकुरक का अर्थात कि भगवान कृष्ण का वो पर्दा गिरता है और खुलता है गिरता है और खुलता है और भोग के बाद भोग लगाए जा बाहर में लोगों की क्या परिस्थिति है भारतवर्ष की क्या परिस्थिति है उसके साथ में उनका कोई लेना देना नहीं तो एक ऐसा एक गोंडा वैष्णव जैसे हम ना बन जाए एक ऑर्थोडॉक्स उसकी तरह हम न हो जाए इसके लिए स्वामी जी बड़ा विरोध किया करते थे तो एक दिन स्वामी जी का और शशि महाराज का झगड़ा इतना ज्यादा बढ़ गया कि लाटू महाराज वहां पर बैठे थे वो चिल्ला उठे कि अरे ठाकुर ने हमारे लिए कुछ पैसा रख कर के गए नहीं है सिर्फ अस्थि रख कर गए हैं उसी में तुम लोग इतना झगड़ा कर रहे हो तो पैसा रख के जाते तो तुम लोग तो मारामारी चालू कर देते तो लाडू महाराज ने जैसा ऐसा ही कहा सब लोग हो हो करके हंस पड़े तो एक्चुअली और इससे पहले किंतु ये जो झगड़ा चल रहा था उस समय स्वामी जी एकदम गुस्सा करके झूट मुट का गुस्सा करके खड़े हुए बोले ठाकुर घर की ओर जाते हुए कि मैं तुम्हारे ठाकुर को फेंक देता हूं यह सब ये जो घट पट वगैरह जो कुछ भी है तो शशि महाराज ने पकड़ा उनको दोनों तो कुश्ती वर थे तो शशि महाराज ने उनको पकड़ा और बालों से खींच कर के घसीटते घसीटते ठाकुर घर से बाहर ले आए यानी कि देखिए कि ये जो फिलोसॉफिकल डिस्कशन उस समय चल रहा था संघ के भविष्य का कि फिलोसोफी होनी चाहिए भक्ति भी होनी चाहिए किंतु कहीं वो उस तरह की ऑर्थोडॉक्सी हमारे में ना आ जाए जिसकी वजह से भारत को 1000 साल तक गुलाम बनना पड़ा था तो वो पूरा थिंकिंग पूरा फाउंडेशन वराह नगर मठ में डाला गया उसके बाद में प्रारंभ होते हैं परिव्राजक डेज परिव्राजक डेज इसके भी पीछे छो छोटा सा स्टोरी है स्वामी जी नहीं चाहते थे कि उनके गुरु भाई इधर उधर घूमते हुए फिरे वहां पर उसमें देखेंगे कथामृत में एक सुंदर वर्णन है कि मास्टर महाशय गए हैं और सभी लोग टेंशन में बैठे हुए हैं कि शारदा महाराज शारदा अपने त्रिगुणा तिता नंद जी बिना किसी को बताए हुए कहीं पर चले गए हैं उन्होंने पत्र लिख कर के गए हैं कि काफी दिनों से मेरा मन आकुल व्याकुल होता रहता है परिवार जन यहीं पर है उसके बाद में मुझे सपने में एक माया की मूर्ति दिखी और इसीलिए मैं जा रहा हूं ऐसा बोल कर के वो चले गए हैं यहां पे ये लोग सब परेशान है तो मास्टर महाशय आ कर के देखते हैं तो फिर कुछ समय के बाद में किंतु ये वो त्रिगुणा तान जी वापस आ गए और सब लोग उनको लेकर के हंसी मजाक करने लगे तो जो भी है स्वामी जी उस समय नहीं चाहते थे कि उनके गुरु भाई इधर उधर जाए स्वामी जी ने खुद कहा था मास्टर महाशय को कि ठाकुर उनका जिम्मा इनका भार मेरे सर पर सौंप के गए हैं किंतु जैसे कि एक अंतर की आह्वान होती है ना पॉल ऑफ इटरनल एक आत्मन की आह्वान कि चलो कहीं पर खुले जंगल में खुले मैदान में खुले खेत में पहाड़ में वन में नदी के किनारे झरने के किनारे बैठ कर के भ्रमण करें तपस्या करें तो एक जो सन्यासी के हृदय की जो एक आवाज होती है तो और स्वामी जी को ऐसे टान लिया दूसरा है कि ये सुरेश बाबू है बलराम बाबू है ये सब इन दोनों के देहांत से फिर मठ चलाना मुश्किल हो गया था तो ये मास्टर महाशय तो थे वैसे किंतु क्या है कि उनके घर की परिस्थिति भी तो कोई इतनी अच्छी नहीं थी वो बार-बार वो उसी समय आई थिंक विद्यासागर के साथ में झगड़ा होक के उनको नौकरी चेंज करनी पड़ी थी तो वो भी स्ट्रगल कर रहे थे फाइनेंशियलीईएक्सप्रेस जुगाड़ करते हैं तो बोल कर के स्वामी जी के कहने पर ही सभी लोग धीरे-धीरे करके निकल गए कोई वापस भी आता था तो ज्यादा रहता नहीं था बाद में फिर से वापस निकल जाते थे राजा महाराज निकल गए वृंदावन वगैरह सुबोधनंद जी के साथ और फिर स्वामी जी ने खुद ने अखंडानंद जी तो पहले ही निकल गए थे ठाकुर की महासमाधि के बाद में ही और हिमालय तिबेट वगैरह बहुत घूमे थे वहां से पत्र भी लिखते थे तो स्वामी जी ने उनको पत्र लिख कर के बुलाया कहा कि चलो तुम हिमालय में बहुत घूमे हो तो मुझे भी तुम्हारे साथ में ले चलो एज ए गाइड में तुमको ले जाना चाहता हूं मां के आशीर्वाद लेकर के परिवन के लिए प्रव्रज्या के लिए निकले और वो जो पीरियड था भागलपुर वैद्यनाथ गाजीपुर वाराणसी अयोध्या वहां से हिमालय हिमालय में जहां पे अल्मोड़ा में उन्होंने तपस्या की और अल्मोड़ा में ही वो दु संवाद उनको प्राप्त हुआ कि उनकी बहन की मृत्यु हुई है और फिर वहां से स्वामी जी वापस आए तो मेरठ में वो जब गए तो मेरठ में एक ऐसा हो गया कि बहुत सारे गुरु भाई उस समय हिमालय में तपस्या कर रहे थे आसपास में सभी गुरु भाई वहां पे इकट्ठा हो गए और ये शरद महाराज थे अखंडानंद जी थे हरि महाराज थे व काफी कोई थे मतलब सात आठ गुरु भाई इकट्ठा हो गए जैसे कि एक छोटा सा मिनी वराह नगर मठ ही हो गया उस दिन की बहुत सुंदर कहानी है स्वामी जी ने बहुत ही खाना बनाना अच्छा लगता था तो बहुत ही सुंदर एक उन्होंने कोई पकवान बनाया बना कर के सबको खिला रहे हैं तो हरि भाई को बहुत अच्छा लगा तो हरि भाई प्रशंसा हरि भाई अर्थात की तुर्या अंद जी महाराज तो तुर्या अंद जी महाराज प्रशंसा कर रहे हैं तो स्वामी जी ने कहा भाई जितना भी बचा है सब तुम खा लो तो तुम्हारे लिए ही तो बनाया है तो हरि महाराज बोलते हैं कि भाई तुम क्या खाओगे तुम्हारे लिए तो कुछ बचेगा नहीं तो स्वामी जी ने कहा भाई मैंने तो पूरा जीवन ये सब बहुत कुछ खाया है ये इस बार इसको तुम खाओ बोलकर के सब कुछ हरी भाई को खिला दिया तो ये हरि महाराज स्वयं इस घटना का वर्णन करके लिखते हैं कि स्वामी जी की जो उदार हृदय ता है वो देखिए सिर्फ वो साधु सन्यासी या प्रोफेट या तो साधक ये सिर्फ नहीं थे उनके हृदय की उदारता इतनी थी जैसे कि अपने भाइयों के प्रति अपने मित्रों के प्रति अपने देशवासियों के प्रति पूरा अपनी पूरी जान नो छावर कर देंगे अपने लिए कुछ रखेंगे नहीं ऐसा उदार उनका हृदय था तो वो सब घटनाएं हुई वहीं पे मेरठ में डिसंबर 1890 और वहीं पे फिर आखिर में स्वामी जी ने कहा कि देखो कि मैंने ऐसा ठीक किया है कि मैं यह सब कुछ त्याग करके यह पूरा जो तुम लोगों का सघ है मठ है सब त्याग करके अकेले भ्रमण करना चाहता हूं तुम लोग मेरा पीछा मत करना ऐसा करके स्वामी जी अपने बुढो भाइयों को त्याग करके वहीं से अकेले भ्रमण की शुरुआत की हालांकि अकेले भ्रमण करना संभव नहीं अखंडानंद जी उनका पीछा कर रहे थे काली महाराज उनका पीछा कर रहे थे और बीच-बीच में फिर यह राजा महाराज है हरि महाराज है उन सबके साथ में मुलाकात हो जाती थी क्योंकि ये लोग भी सब वेस्ट इंडिया की ओर ही निकले थे किंतु जो भी है स्वामी जी वहां से मेरठ वाज द कटिंग पॉइंट कि जो ठाकुर के साथ में आए ठाकुर के गुरु भाइयों के साथ में रहे एक पार्टिकुलर उनका थिंकिंग चला मेरट वज दैट कटिंग पॉइंट कि जब से स्वामी जी ने इंडिपेंडेंटली सोचना भ्रमण करना कार्य करना प्रारंभ किया सबसे पहले गए दिल्ली में फिर अलवर में फिर राजपूताना में जयपुर अजमेर माउंट अबू खेतड़ी और फिर से अजमेर यह सब जगह पर जाकर के इनके बारे में कितनी सुंदर सुंदर कहानियां हमारे पास में है वो खास करके वो जो नर्तकी की कहानी वो नृत्य प्रारंभ किया तो स्वामी जी खड़े होकर के चले गए तो जब नर्तकी ने ऐसा गाना गाया कि क्या मतलब इतना सुंदर गाना वो मैं भूल गया एक समय था सब कुछ याद था जब है स्वामी जी वापस आकर के बैठे जद सभी के भीतर में ब्रह्म है तो नर्तकी के भीतर में क्यों नहीं होगा वो छिल की कहानी चिलम की कहानी और बंगी की और वो सब घटनाएं प्रभु जी मैंने अव हां प्रभु जी मेरे अवगुण चित्त न धरो यस मीरा भाई का गाना इतना सुंदर गाना तो ये सब घटनाएं एक के बाद एक जैसे कि दिल्ली फिर राजपूताना फिर बम्बे प्रेसिडेंसी में पहले गए अहमदाबाद फिर वडवानल मडी वो जो लिंबड़ी की वो फेमस कहानी कि तांत्रिक लोगों ने उनको बंदी बनाकर रख दिया था फिर भावनगर फिर सिहोर फिर जूनागढ़ फिर गिरनार कच्छ भुज फिर से जूनागढ़ वेराव सोमनाथ जूनागढ़ पोरबंदर द्वारका कच्छ भुज पोरबंदर जूनागढ़ पालीताणा नडियाद और फिर आखिर में वड़ोदरा गुजरात त्याग करने की बारी ये इतना सब कुछ स्वामी जी ने भ्रमण किया इसके बारे में फिर थोड़ा सा यह भी है कि स्वामी जी गुजरात में कितना दिन रहे थे उसको लेकर के भी दो तीन मत है किंतु जो भी है मैं उस फॉलो किया है जो कि अपनी ऑफिशियल बायोग्राफी में है तो उसके बाद में महाबलेश्वर गए महाबलेश्वर से पत्र लिखा था फिर वहां से पुना खंडा इंदौर बम्बे पुना कोल्हापुर फिर वहां से बेलगाम गोवा मैसूर फिर त्रिशूर कोडुंगलूर फिर णा कुलम फिर त्रिवेंद्रम और फिर आखिर में कन्याकुमारी वो वर्ल्ड फेमस घटना कि स्वामी जी वहां पर उनके हृदय की जो उताप था व्याकुल थी आक्रोश ता तो वोह समुंदर तेर करके य फि सुबह को जाता हूं किनारे पर घूमने के लिए पैर रखता हूं तो मुझे डर लगता है तैरना तो भूल ही जाओ मैं जब थोड़ा सा यंग था उम्र में तब कन्याकुमारी गया था तो मैंने सोच लिया कि मैं भी चलो तैरने का प्रयास करता हूं रोक तक तो नहीं जा पाएंगे किंतु जो भी है थोड़ा बहुत 10 फुट 20 फुट इतना तो तेर ले किंतु जैसे ही समुंदर में मैंने जंप लगाया थोड़ा सा तैरना शुरू किया हे राम तीन समुंदर इकट्ठा होते हैं और जो वेव्स है इतने पावरफुल पांच ही मिनट में मुझे लगा कि बस गया अभी मैं वापस नहीं आ पाऊंगा मेरे साथ में जो लड़के थे वो किनारे प खड़े चिल्ला रहे किसका साहस भीतर में आके बचा है तो मैं तो मैंने तो सोच ही लिया कि गया गया गया आखिर में हो सकता है कि शायद जैसे कि स्वामी जी के पास ठाकुर को कुछ काम करवाना था तो स्वामी जी को अपनी एक क्रोनोलॉजी बनवानी होगी तो जो भी है मुझे वापस लेके आए और एक बार मैं किनारे पे आया फिर 10 मिनट तक पड़ा रहा मैंने हाथ पैर हिलाने की ताकत नहीं है इतना एनर्जी लगता है तो उसमें स्वामी जी कैसे वो रोक तर के रोक पे तर के गए होंगे वो इमेजिन करना मुश्किल है और उस समय में बहुत अच्छा स्विमर था मैं बहुत रेगुलरली स्विमिंग करता था मेरे मैं जहां पे रहता था वहां पे एक बहुत बड़ा स्विमिंग पूल है ओलिंपिक साइज का वहां पे स्टेट कंपटीशन वगैरह भी होती थी तो वहां पे मैं रेगुलर स्विमिंग के लिए जाता था तो वैसा वैसा तो नहीं था मेरा स्विमिंग स्किल बहुत अच्छा था उसमें भी जद ये हालत हो गई तो सोचिए कि स्वामी जी में कितना साहस कितना अदम्य ये शक्ति और शौर्य होगा तो फिर गए कन्याकुमारी तीन दिन तपस्या की आदेश मिला पश्चिम की ओर जाना है और पूरा की युवा शक्ति को जगाना है ये जो एक बेसिक आइडिया है भारत में और विश्व में ये आइडिया उनको वहां पर मिला फिर वहां से वो निकले मदुराई रामेश्वरम पडि चरी फिर मद्रास मद्रास में ये जो वो जो ट्रिपली के एंड लिटरेरी सोसाइटी जो थी उनके सदस्य जितने भी थे ये लड़के आला सिंगा जीसी वो कीड़ी वगैरह जो उनके जो मद्रासी चमचे गोले सब चेला गुले उन सबके साथ में मुलाकात हुई फिर वहां से एक बार हैदराबाद गए थे फिर वहां से वापस मद्रास आए फिर मद्रास जाकर के सेकंड टाइम जब लौटे तब उन्होंने कहा कि मुझे वहां पर जाना है ऐ आदेश प्राप्त हुआ है बहुत सारी घटनाएं उस समय की है कि किस तरह से उनकी मां के देहांत के बारे में एक फेक न्यूज़ आज जैसे फेक न्यूज़ चलता है उस समय भी एक ऐसा फेक न्यूज़ आ गया था तो कैसे वो एक तांत्रिक को जा कर के मिले थे फिर कैसे एक्चुअली उन्होंने अपने डिसाइल्स को कहा कि तुम लोग पैसा इकट्ठा करो तो पैसा इकट्ठा किया इन लोगों ने थोड़ा बहुत मसूर के महाराजा ने भी कुछ मदद की किंतु फिर स्वामी जी को था ना कि जब तक आदेश नहीं मिलेगा नहीं जाएंगे यह नहीं होगा नहीं जाएंगे बार-बार आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं तो स्वामी जी ने कहा कि पैसा लौटा दो जितना भी हुआ है ऐसा चंदा इकट्ठा करके नहीं जाना यह चंदा इकट्ठा करना स्वामी जी को भी नहीं पता अच्छा लगता था ठाकुर को भी नहीं अच्छा लगता था जब वो काशीपुर में जब ऐसी बात होने लगी ये रामचंद्र दत्त वगैरह जो रुपए देते थे उस समय की ये लड़के लोग यहां पर रहते हैं तो ठाकुर का खर्चा बहुत बढ़ जाता है घर का खर्चा हम लोग ठाकुर का खर्चा देंगे किंतु ये राखल है नरेद है इनका तो घर है घर पे खाके आए यहां पे दिन रात क्यों रहते हैं तो उस समय ठाकुर बड़े ही दुखित हो गए थे नरेद को कहा था मैं यहां पर नहीं रहूंगा तुम मुझे लेकर चलो तुम्हारे कंधे प बिठा करके तुम मुझे जहां प ले जाओगे मैं जाऊंगा तो इसी बात को याद करके जब वो जो काशीपुर बेलून मठ की जमीन जब खरीदी गई और वो जो नीलांबर गार्डन में से ठाकुर के अस्थि बेलूर मठ में स्थापित करने की बारी आई उस समय स्वामी जी ने ठाकुर के अस्थियों को अपने कंधों पर उठा लिया था और उस समय ये शरद चंद्र चक्रवर्ती को कहा था कि ठाकुर ने खुद मुझे कहा है कि अपने कंधों पर बिठा कर के जहां प ले चलोगे मैं जाऊंगा तो उस समय कंधों पर बिठा कर के बेलूर मठ में स्थापित किया तो उस समय काशीपुर में फिर ऐसा हुआ कि गिरीश घोष को कहा गया कि तुम पैसा दो तो गिरीश कहता है कि मेरे पास इतना रुपया नहीं है किंतु फिर भी मैं अपना थिएटर बेच कर के घर बेच करके सब कुछ दूंगा यहां पे फिर आखिर में ये जो सुरेश मित्र है उसने पूरा जिम्मा ले लिया था मां को भी मां उस समय जयराम बाटी में थी और कोई एक ब्रह्मचारी वहां पे आसपास में चंदा इकट्ठा कर रहा था रिलीफ वर्क के लिए तो मां ने उस ब्रह्मचारी महाराज को बुलाकर कहा कि देखो ये जो एरिया है जहां पर कामर कुकुर है जयराम बाटी है ठाकुर का निवास मेरा यहां से तुम चदा इकट्ठा मत करो तुम और कहीं जाकर के करो यहां से मत करो तो यह चंदा इकट्ठा करना किसी को अच्छा नहीं लगता था तो फिर स्वामी जी उसी समय खेतड़ी के महाराजा को संतान हुआ उन्होंने स्वामी जी को बुलाया अपने पुत्र को आशीर्वाद देने के लिए फिर उन्होंने ही पूरा खर्चा किया यानी कि चंदा नहीं इकट्ठा करना है किंतु स्पंस खोज लेना है मुझे पता नहीं कि क्या डिफरेंस है किंतु जो भी ये लोग डिफरेंस करते थे हो सकता है कि चंदा इकट्ठा करना वो जैसे वो जो होता है ना हमारे जिस सोसाइटी में मैं रहता था वहां प वो चलो गणेश उत्सव करना है यह करना है गरबा है इतना रुपया तो प्रत्येक घर से देना ही पड़ेगा ऐसा शर्म में डाल करके ना कि ऐसा करके वो इकट्ठा करते हैं इच्छा नहीं भी होती है तो उने दूसरों ने दिया तो मुझे देना पड़ेगा ऐसा अनिच्छा का जो पैसा है दिया हुआ धन उससे कोई काम का नहीं है बेटर है कि कोई अपनी इच्छा से पूरा पूरा खर्चा उठाए तो मुझे लगता है कि यह लॉजिक होगा तो जो भी है वो जद्दा इकट्ठा किया गया था सब वापस दे दिया और उसी समय यह खेतड़ी के राजा का आहवान हुआ खेतड़ी गए और खेतड़ी जाकर के उनके पुत्र संतान को आशीर्वाद दिया उस समय आबू में उनका हरि महाराज के साथ में राजा महाराज के साथ में मुलाकात हुई थी और उस समय स्वामी जी ने कहा कि हरि भाई मुझे ईश्वर प्राप्ति मुक्ति वगैरह कितना मिला पता नहीं किंतु हृदय पूरा खुल गया है मेरा ये जो फेमस इंसिडेंट हरि महाराज ने उसका काफी बार उसका वर्णन करते थे वो उसी समय आबू में हुआ था कि जब स्वामी जी अमेरिका जाने से पहले खेतड़ी गए थे रास्ते में आगू में रुके थे उस समय की बात है उसके बाद में स्वामी जी बम्बे आए और फिर बम्बे से पश्चिम में जाने के लिए उन्होंने सफर किया इसके बाद का जो है थोड़ा विवरण हम कर देखेंगे आज हित तो श श शति ही हरि तस श्री राम कृष्णा यह जो शशि महाराज को चेन्नई भेजने से पहले स्वामी जी ने उनको कहा एक काम करो मुस्लिम बाजार जो है मुस्लिम बेकरी वहां से पाव रोटी खरीद के ले आओ तो शशि महाराज गए इतने ऑर्थोडॉक्स होने के बावजूद पाव रोटी खरीद के ले आए तो लेके आए तब स्वामी जी ने कहा कि तुमको एक काम देता हूं तुमको मद्रास जाकर के ठाकुर का प्रचार करना है तो ट वाज की उनकी जो ऑर्थोडॉक्सी है उसको टेस्ट करने के लिए और आश्चर्य बात है आपको विरोधाभास लगेगा कि स्वामी जी ने चेन्नई जाकर के कहा कि मैं आपको ऑर्थोडॉक्स से भी ऑर्थोडॉक्स किसी को भेजता हूं और भेजने से पहले ऑर्थोडॉक्सी तोड़ने का टेस्ट करवाया ये है स्वामी जी तुम ऑर्थोडॉक्स नहीं हो उसका सबसे पहले प्रमाण दो फिर जाकर के ऑर्थोडॉक्स लोगों के सर पर बैठ जाना अभी इसी का चिंतन करते करते आपको क्या क्या उसमें से विचार आएंगे क्योंकि दोनों में कोई भी मेल नहीं है यदि स्वामी जी ऑर्थोडॉक्सी का टेस्ट करते तो ठीक है या तो फिर कहते कि चलो मस में बहुत ज्यादा ऑर्थोडॉक्सी है उसको थोड़ा सा लिबरल एटमॉस्फियर क्रिएट किया जाए तो एक ठीक है ये पूरा अपोजिट और जहां तक स्वामी जी की भक्ति की बात है ये जो मैं बंगोली लेटर कल पढ़ रहा था कल परसो तो देखिए कि ठाकुर के बारे में स्वामी जी जो कहते हैं जिस तरह से स्वामी जी वर्णन करते हैं ठाकुर यदि चले जाते हैं तो इसका डर नहीं है किंतु मां यदि चली जाएगी तो महा सत्यानाश तो और बार-बार कहते हैं कि मां के बारे में जब मां की बात आती है तो मैं भी थोड़ा सा ऑर्थोडॉक्स हो जाता हूं खानी अर गोंडा म ये गोंडा म शब्द गोंडा गड़ा बंगाली शब्द है और ये जो खास करके जो ऑर्थोडॉक्स वैष्णव होते हैं उनके बारे में इसका गड़ा उनको बोला जाता है केशव सेन जब ठाकुर के पास में दक्षिणेश्वर जाता है तो ठाकुर कहता है ना कि बोलो कि क्या गुरु कृष्ण वैष्णव तो केशव कहता है कि नहीं नहीं महाशय ऐसा कहेंगे तो लोग हमको गोंडा कहेंगे तो यह गोंडा अर्थात की वो टिपिकल टाइप का एक ऑर्थोडॉक्स य वैष्णव ब्राह्मण लोग तो स्वामी जी कहते हैं कि जहां पर मां की बात आती है वहां पर ही हमारे गोंडा मया वहीं पर मेरी ऑर्थोडॉक्सी है तो मां के बारे में जो स्वामी जी की श्रद्धा थी तो ठाकुर के बारे में जो कुछ भी बोल लो स्वामी जी खुद बहुत कुछ उल्टा पुल्टा बोले कि एक जन्म ना होए य पागला बामने हाथे पड़े बथाई गलो ने एक जन्म इस पाल पागल ब्राह्मण के हाथ में पड़ कर के बिगड़ गया खराब ही हो गया चलो मने वृथा गया किंतु मां के बारे में हमेशा प्रचंड भक्ति से वो बात करते थे वो मां को मिलने के लिए जाते हैं वो बार-बार अपने हाथ गंगा में धो रहे हैं अमेरिका से वापस आने के समय तो उनके साथ में जो उनके जो शिष्य थे पूछते थे कि अरे स्वामी जी आप बार-बार इस तरह से हाथ धोएंगे तो बुखार हो जाएगा तो स्वामी जी कहते हैं कि नहीं मां के पास जा रहा हूं तो विदेश से आया हूं पता नहीं कितने दुष्कर्म लोगों के मेरे सर पर बैठे होंगे तो गंगा से बिल्कुल पवित्र होकर मां के पास जाना है तो वो जो मां के प्रति उनकी भक्ति हर जगह पर वो प्रकाश पाती है वो मां को वो मां के पास में कंप्लेन भी काफी करते हैं किंतु मां के बारे में हंसी मजाक कभी नहीं करते जैसे वो ठाकुर के बारे में करते हैं तो दैट इज के स्वामी जी का वो जो सबका एक एकलस हिल जैसा आपने कहा ना कि एक मिड पॉइंट कहो ना कि एक एकले सिल्क कहां पर जाकर के वो रुक जाता है मैं सब कुछ बोलूंगा सबकी मजाक करूंगा किंतु एक ऐसी बात है जिसके बारे में संपूर्ण श्रद्धा भक्ति हंसी मजाक में भी नहीं तो वो मां के बारे में वो सॉफ्टवेयर जो मैंने बनाया है ना उसके भीतर है तो उसको मुझे अभी इंस्टॉल करना पड़ेगा वहां से सब डाटा लेकर आया हूं अभी लैपटॉप में डालना पड़ेगा व धीरे-धीरे करके सब एक्टिवेट करना पड़ेगा प्लस क्या है उने बहुत पहले बनाया था तो सॉफ्टवेयर को भी हेली अपग्रेड करने की जरूरत है अभी अभी किसके अभी इसमें जाना माने इतना टाइम देना कि अभी मुझे डर लगता है सोच कर के ही डर लगता है खोलता हूं ना तो मेरे एकदम हार्टबीट बढ़ जाते हैं ये करना है वो करना है ये करना है वो टाइम नहीं है फिर छोड़ दो इसको बंद ही कर दो उसमें एक्चुअली सिर्फ स्वामी जी का नहीं है इतना बड़ा है इसलिए क्योंकि मैंने 100 इयर्स कवर किए हैं 1836 में ठाकुर का जन्म हुआ वहां से लेकर के 1936 में मेन टेंपल की स्थापना हुई मुख्य मंदिर की बेलूरमठ में तो वो 100 इयर्स कवर किया है और उसको भी पूरा फेजस में बांट दिया है इस तरह से जिसको कि मैंने स्वामी जी की लाइफ के साथ किया है तो उसमें उसको भी पूरा फेजस में बांट दिया है इसलिए वो इतना लंबा है और उसमें सभी किताबें लीला प्रसंग है मां का जीवन है फिर यह कथामृत है फिर यह हरि महाराज लाटू महाराज शशि महाराज राजा महाराज सब कुछ उसमें डाला हुआ इसलिए वह इतना बड़ा हो गया लेजेंड जिसको कहते हैं कि जो जो बिब्स यह बिब्स का भी एक पूरा है डिटेल मेरे पास में करूंगा मैं शेयर और बिबलियोग्राफी आई थिंक 200 300 किताबें है मैंने सोचा था कि वेबसाइट बना कर के सब कुछ रख दूं यह जो सॉफ्टवेयर था वो तो डेस्कटॉप सॉफ्टवेयर है मैं चाहता था कि वेबसाइट बना कर के खुला छोड़ दो कि तु अभी उसके लिए मेहनत करना पड़ेगा एडिशनल वर्क में अभी जैसे फ्रेश नजर से देखने से कुछ कुछ करेक्शन देखने को मिलते हैं वह है और बस इतना ही है मतलब ज्यादातर काम हो चुका है कुछ-कुछ किताबें मेरे पास में बाद में आई थी जैसे कि राजा महाराज के लेटर मेरे पास में बाद में आए तो वो उसमें डालना पड़ेगा कि इस तारीख को ये लेटर लिखा गया है इस तारीख को ये लेटर लिखा गया है यानी कि यह सब काम मैंने किया था मैं 2007 89 में टीसी में था और फिर 9 10 11 में फिर मैंने पोस्टिंग हुआ मेरा लिंगड़ राजकोट उस समय टाइपिंग किया था उसके बाद में जो कुछ किताबें पब्लिश हुई है काफी आई है मां के पत्र उसमें नहीं डाले गए राजा महाराज के पत्र उसमें नहीं है और कुछ-कुछ किताबें उस समय मेरे से छूट गई थी क्योंकि टाइम नहीं था इतना मेरे पास तो किताबों को मैंने एक बार सोचा था कि ये जो मेरा जो डेस्कटॉप सॉफ्टवेयर है उसमें से वेबसाइट में डाटा ट्रांसफर कर दूं इतना एटलीस्ट इतना करो किंतु फिर क्या है ना कि अकेले का काम नहीं है यह थोड़ा सा हेल्प चाहिए और फैक्टर्स है राजकोट में कर सकता था किंतु फिर राजकोट में क्या है कि दूसरा काम इतना सारा था मेरे पास में वहां पर पब्लिकेशन इतना बहुत बड़ा था यह सब चीजों में ना आपको टाइम भयानक चाहिए डालना पड़ता है टाइम डालना पड़ता है उस समय जब ब्रह्मचारी थे बेफिक्र थे तब बहुत कुछ हो गया एक्चुअली क्या है जब 19 सेंचुरी में रियल महात्म जो लिखा उस समय तो मैटर नहीं था उसके बाद में जब स्वामी जी के साथ मुलाकात हुआ तो स्वामी जी ने फिर शरद महाराज को कहा था कि तुम थोड़ा सा मटेरियल दो और उस मटेरियल के आधार पर फिर मैक्स मलर उसमें किताब लिखेगा तो यह जो मैक्स और फिर उसी समय स्वामी जी ने शरद महाराज को बड़ा डिटेल में समझाया कि ठाकुर का जो बायोग्राफी उसमें मिरेकल्स को बिल्कुल माइनस करके जो फिलोसॉफिकल स्पिरिचुअल जो सब बातें हैं उसको ज्यादा प्राधान्य देना है और उसी के आधार पर शरद महाराज ने वो बायोग्राफी लिख कर के उसको मैक्स मलर को दिया और मैक्स मलर ने एज इट इज ऑलमोस्ट एज इट इज उसको छाप दिया श्री राम कृष्णा एन डिसाइल्स को किताब में किंतु उस किताब के बारे में ना स्वामी जी को एक बहुत बड़ा डिसपिटर हुआ था कि मैक्स मूलर एक्चुअली ठाकुर के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करने की वजह बार-बार ऐसा कोई ना कोई एक नेगेटिव कमेंट डालते रहते हैं कि अभी यहां पर जो मैंने लिखा है वो तो उनके कहने से मैंने लिखा है मुझे इस पर विश्वास नहीं या तो फिर ये मॉडर्न साइंस के अनुसार यह सब बातें गलत लगती है ऐसा कुछ ना कुछ नेगेटिव कमेंट वो उसमें देता रहता है मैक्स मलर तो ये बात करके देख कर के स्वामी जी को काफी डिसपे थे और इसीलिए मैक्स मलर है या पोल डसन है पोल डोन के बारे में आप देखेंगे कि काफी कुछ मटेरियल अवेलेबल है स्वामी जी उनको जर्मनी में मिले थे तो तो फिर वो स्वामी जी के ही साथ में स्वामी जी से प्रभावित होकर के स्वामी जी के साथ में लंडन आए थे उनका संग करने के लिए किंतु जब वो अपनी बायोग्राफी लिखते हैं तो स्वामी जी के बारे में बहुत ही नेगेटिव कमेंट देते रहते हैं तो अभी उसके पीछे में ऐसा एक लॉजिक है कि ये लोग जो वेस्टर्न एकेडमी में थे तो अभी ये सब ये हिंदू काले हिंदू गुलाम हिंदू उनकी बात आंख बंद करके स्वीकार कर लेंगे तो फिर उनके जो कलीग है उनके साथ में फिर वो झगड़ा होगा वे लोग उनकी नींदा करेंगे बोलकर के मैक्स मलर का भी कुछ कुछ लोगों के साथ में बड़ा झगड़ा चल रहा था ऑक्सफोर्ड में कि क्यों वह यह ईस्टन स्पिरिचुअलिटी को इतना बढा चढ़ा करके बोलता है जबकि क्रिश्चियनिटी इज द ग्रेटेस्ट रिलीजन आपको यह कहना है कि बुद्धिज्म है न बुद्धिज्म है हिंदुइज्म है उसका वर्णन करो किंतु आखिर में वो फुटनोट हमेशा रखो कि क्रिश्चियनिटी इज बेटर देन ऑल ऑफ देम और यदि इनको साल्वेशन चाहिए तो हिंदुइज्म बुद्धिज्म छोड़कर के क्रिश्चियन बने तो ये सब समय साथ में रहना चाहिए तो इसलिए लगता है कि उनकी अनिच्छा होकर के भी उन्होंने जानबूझ कर के ऐसे नेगेटिव कमेंट लिखी जो भी है सच हमको पता नहीं कि वो मुंह से एक बात करते थे भीतर में ऑलरेडी नेगेटिव ओपिनियन रखते थे कि फिर अपने को बचाने के लिए उन्होंने नेगेटिव कमेंट डाली है जो भी है स्वामी जी का और अपने ऑर्डर का उनके प्रति काफी डिस अपॉइंटमेंट है और इसीलिए उनको फिर हम बहुत ज्यादा प्रमोट नहीं करते वो तो जी का नेचर ही था ना कि वशिष्ठ और अरुंधति फिर सायण ऐसा बोल कर के उनकी प्रशंसा की है और वो तो स्वामी जी का नेचर था कि अच्छी बात लेना और बुरी बातों को इग्नोर करना किंतु ऑफिशियल हम इसको एंडोर्स कभी स्वामी जी स्वामी जी हुए क्यों यदि वो ब्रिटिश लोगों के साथ में झगड़ा कर देते कि भाई तुम भारत को गुलाम बना कर के क्यों रखे हो तो कैसे वोह निवेदिता वगैरह को वो आकर्षित करके भारत में लेकर आते हैं अमेरिका जाकर के यदि झगड़ा करते हैं किय वर्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन बनाया ही इसीलिए है कि दूसरे धर्मों की निदा करने के लिए तो ऐसा तो उन्होंने किसी के सामने जब सामने जाते थे तो उनकी प्रशंसा ही करते थे अमेरिका जाकर के भारत की प्रशंसा करते थे भारत आक अमेरिका की प्रशंसा करते थे अमेरिका वासियों के सामने उनकी निंदा जरूर करेंगे भारतवासियों के सामने निंदा जरूर करेंगे कि भाई भारत में इतनी अंधश्रद्धा है अमेरिका में इतना मटेरियल जम है किंतु पीछे से निंदा कभी नहीं करेंगे यदि उनको किसी को क्रिटिसाइज करना है हमेशा मुंह पे करो पीछे से हमेशा प्रशंसा करो यह स्वामी जी के जीवन में सतत हमको दिखता है और यही य मैक्स मलर कहो पॉल डोन कहो मजूमदार कहो जिनको कि हम बड़े गणय मान्य कहते हैं उनमें और स्वामी जी में डिफरेंस यही प है वे लोग पीछे से निंदा करेंगे मुंह प अच्छी बातें करेंगे स्वामी जी उल्टा जितना स्वामी जी को पढ़ेंगे ना उतना ही पता चलेगा कि देखिए कि ह्यूमन लाइफ जो है हम किस तरह से जीते हैं हमको देखिए और स्वामी जी के जो आइडियल है उसको देखिए हमको कितना कितना इंप्रूव करना है अभी हमको अपने को खुद कोने क्या जो एक हाई एक बार रख कर के गए हैं एक स्टैंडर्ड बना कर के उसको अचीव करते करते कितने जन्म जाएंगे हमारे व जो आपने जो कोटेशन कहा ना कि सोसाइटी है टू पे होमेज टू ट्रुथ नॉट द ट्रुथ पे होमेज टू सोसाइटी ट सोसाइटी इज द हाईएस्ट च एंडोर्स द हाईएस्ट ट्रथ जब स्वामी जी मैक्स मलर को मिलने के लिए गए थे तो मैक्स मूलर अपना पूरा काम छोड़ कर के स्वामी जी के साथ में दिन बिताया यहां तक कि स्वामी जी जब वापस जा रहे तो उनको छोड़ने के लिए रेलवे स्टेशन तक गए तब स्वामी जी ने कहा कि अरे आप इतना कष्ट क्यों करते हैं उसी दिन उनकी बच्ची की बर्थडे भी थी तो उसका बर्थडे भी सेलिब्रेट किया फिर वो जो रेलवे स्टेशन गए तो स्वामी जी कहते हैं कि आप इतना कष्ट क्यों करते हैं तो मैक्स मलर इतना सुंदर उत्तर देते हैं इट इज नॉट एवरी डे दैट वन हैज अ गुड फॉर्चून टू मीट द डिसाइल ऑफ ग्रेट रामकृष्णा तो क्या है कि देखिए उस समय गुलाम भारत था तो आपको गुलाम की निंदा करनी ही पड़ेगी वरना लोग बोलेंगे कि रे ये कहां ब्रेन वश हो गया है इसका कि क्या क्या इतने सारे फैक्टर थे है ना स्वामी जी को उसी समय पता था कि जब तक गुलामी में से नहीं निकलेंगे तब तक हमारी इज्जत जो है वो बनने वाली नहीं है ये लोग हमारे मुंह पर इतनी अच्छी बातें करें पीछे से इतनी गाली भी देंगे तो दैट वाज अ फैक्ट और एक्चुअली क्या है ट्रेजेडी क्या है पता है कि हमने यह जो सेकुलरिज्म का एक जो झूठ मूठ का एक चलाया है ना स्वामी जी को हम लोगों ने ही छोड़ दिया है मैंने बाकी सबके इक्विवेलेंट कर दिया है हम लोग स्कूल में पढ़ते थे तो जैसे किय राम मोहन रोय के बारे में पढ़ते हैं जैसे ये तिलक के बारे में पढ़ते हैं तो वैसे ही एक जन स्वामी जी है एक्चुअली वे लोग कम नहीं है जो भी कहो उन लोग कम नहीं है किंतु स्वामी जी से डिफरेंट कैटेगरी ऑल टूगेदर तो उनकी जो गरिमा है हम ही भारतीय लोगों ने ही हमको छोड़ दिया है स्वामी जी के बारे में यहां पर आने से पहले मुझे क्या पता था अमेरिका जाकर के बोला कि अमेरिकन बहनों और भाइयों यही एक बात मुझे पता थी इससे ज्यादा कुछ नहीं और बहुत सारे लोग बोलते हैं वो जो ये थे राम तीर्थ वगैरह उन्होंने तो स्वामी जी से भी ज्यादा अच्छा काम कर लिया है ये वो ये जो परमहंस योगानंद है वगैरह तो ये सब झूठ मुटका स्वामी जी को इन सब के साथ में इक्विवेलेंट कर देना उनकी ग्लोरी को भूल जाना हम ही लोगों ने यह सब किया है और यह झूठ मुटका ये सेकुलरिज्म के नाम पे है स्वामी जी का असली उनका जो पावर है उसको प्रोजेक्ट करना ये देखिए ठाकुर को आप प्रोजेक्ट इजली कर सकते हैं ज ट्रेडिशनल जैसे राम है जैसे कृष्ण है वैसे एक राम कृष्ण है तो ऐसा काफी कोई मैंने उनके मतलब सिमिलरिटीज है कि उनके कैटेगरी में आप डाल दे जिनको कि कृष्णा पर विश्वास है उनको राम कृष्णा पर विश्वास वो कृष्णा की मूर्ति को हटा कर के राम कृष्ण की मूर्ति को बिठा दे बाकी सब कुछ वैसे का वैसे चलेगा स्वामी जी यूनिक उनका कहीं पर एनालॉजी देक के आप उनको नहीं बता सकते कि चलो यह भगत सिंह है वो इतने ग्रेट है तो यह स्वामी जी इतने ग्रेट है भगत सिंह से डिफरेंट कैटेगरी लाला लाजपत राय डिफरेंट कैटेगरी सुष चंद्र बोस डिफरेंट कैटेगरी स्वामी जी कंपलीटली डिफरेंट ल टूगेदर शंकराचार्य के साथ में भी नहीं क्योंकि वो तो सिर्फ भारत वेदांत के लिए स्वामी पूरे विश्व के लिए कंपलीटली डिफरेंट कैटेगरी ल टूगेदर स्वामी जी को समझने के लिए आपको पूरा एक माइंड सेट नया क्रिएट करना पड़ेगा