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जप ध्यान साधन और भजन के बारे में स्वामी ब्रह्मानन्द 5 Jan 2024

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ओ स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नम अभी आज आखिरी दिन है इस सप्ताह का तो मैंने इंस्टेड ऑफ की और कोई हमारी सीरीज चालू करें हम इस किता में से थोड़ा सा पाठ करते हैं स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज की किताब है नाम है धर्म प्रसंगे स्वामी ब्रह्मानंद बहुत ही सुंदर और बहुत ही धार्मिक जीवन के रिलेटेड एकदम छोटे-छोटे सूत्र के रूप में महाराज जी ने हमको बहुत ही अच्छे उपदेश दिए हैं जब ध्यान किस तरह से करना अध्यात्मिक जीवन हमारा किस तरह से होना चाहिए वह सब महाराज जी एक के बाद एक यहां पर वर्णन करते हैं तो इसमें से मैं थोड़ा सा पाठ करता हूं और उसके बाद में थोड़ी सी चर्चा करेंगे यहां पर लिखा है स्थान बेलूर मठ डिसंबर 1915 1915 का दिन है बेलर मठ की जगह है मठ एकन श्री श्री महाराज बाबूराम महाराज महापुरुष महाराज खोका महाराज प्रवृति रहे छ मठ में इस समय में श्री श्री महाराज अर्थात की राजा महाराज या तो राखल महाराज या तो फिर स्वामी ब्रह्मानंद इतने सारे उनके नाम है कभी-कभी मैं किसी डिवटी के साथ में बात करता हूं जिनको कि हमारी लिटरेचर हमारी ट्रेडिशनल नहीं है वे लोग कहते हैं कि आपके यहां पर इतने सारे लोग हैं इतने सारे नाम है कि हम लोग कभी-कभी कंफ्यूज हो जाते हैं कि कौन कौन है तो इसलिए यहां पर जब भी हमारे ट लिटरेचर में महाराज करके सिर्फ लिखा होगा इसका अर्थ है कि राजा महाराज अभी राजा महाराज का एक्चुअल नाम तो राजा नहीं था उनका नाम था राखल ठाकुर के पास आते थे जमींदार के लड़के थे ठाकुर ने पहली ही नजर में देख लिया कि उसके भीतर में आध्यात्मिक संपद भरपूर पड़ी हुई है तो फिर ठाकुर ने इनको अपना लिया कहा कि यह मेरा मानस पुत्र है ठाकुर को एक बार दर्शन हुआ था ठाकुर एक बार वहीं पंचवटी में बैठे थे वहां नीचे में देखा कि एकाएक मां काली ने दर्शन देकर के उनकी गोद में एक लड़के को रख दिया कहा कि यह तुम्हारा लड़का है तुम्हारा संतान है तो ठाकुर बड़े ही परेशान हो गए ठाकुर बोलने लगे मां को कहने लगे अरे मां मैं तो त्यागी हूं मेरा फिर से लड़का कहां होने वाला है तब मां ने कहा कि नहीं वह दैहिक संबंध से नहीं किंतु यह तुम्हारा ये मानस पुत्र है तो इस तरह से यह मानस पुत्र अर्थ था की ठाकुर का जो स्पिरिचुअल हेरिटेज था ठाकुर का जो स्पिरिचुअल वारसा था उसका अधिकारी उसके अधिकारी थे यह राखल राखल जब आए तो ठाकुर के पास में रहने लगे एक बार ठाकुर ने कहा कि राखल एक राज्य चला सकता है उस दिन से स्वामी जी ने कहा कि आज से हम राखल को राजा करके पुकारेंगे राजा अर्थात कि वो राज्य चला सकता है किंतु कौन सा राज्य ये जिस तरह के राज्य हम बाहर में देखते हैं उस तरह का नहीं आध्यात्मिक राज्य धार्मिक राज्य में राजा महाराज राजा हो सकते हैं भक्तों के राजा हो सकते हैं रामकृष्ण संघ के राजा हो सकते हैं और सही सही में स्वामी जी ने राजा महाराज को रामकृष्ण संघ का प्रथम अध्यक्ष रूप में नियुक्त किए थे तो वही राजा महाराज उनका असली नाम राखल बाद में नाम हुआ राजा महाराज और सन्यास के बाद में में उनका नाम हुआ स्वामी ब्रह्मानंद तो इनके चार नाम है राखल राजा स्वामी ब्रह्मानंद और अपने लिटरेचर में रामकृष्ण मठ में बेलूर मठ में जब महाराज करके किसी को पुकारा जाएगा तो वह भी राजा महाराज है जैसे स्वामी जी को स्वामी विवेकानंद को स्वामी जी कहते थे अभी बेलूरमठ में बहुत सारे स्वामी जी हैं किंतु जब कहेंगे कि मैं स्वामी जी को मिलने के लिए जा रहा हूं या तो मैंने स्वामी जी को पढ़ रहा हूं तब वो स्वामी जी अर्थात स्वामी विवेकानंद तो वैसे ही स्वामी जी शब्द जिस तरह से स्वामी विवेकानंद के साथ में युक्त है हमारे संघ में महाराज शब्द सिर्फ ऐसा कहेंगे कि हां मैं महाराज का दीक्षार्थी हूं या तो फिर मैं महाराज का दर्शन करने के लिए जा रहा हूं इसका अर्थ हुआ राजा महाराज या तो स्वामी ब्रह्मानंद तो यहां पर शुरुआत में लिखा है मठ में इस समय श्री श्री महाराज बाबूरा रा महाराज अर्थात की स्वामी प्रेमानंद महापुरुष महाराज अर्थात स्वामी शिवानंद खोका महाराज अर्थात स्वामी सुबोधा सभी ठाकुर के संतान सभी ठाकुर के सन्यासी शिष्य इस समय मठ में रह रहे हैं किछु दिन थके महाराज नियम करे छ रात्रि चारो टार समय उठे प्रातः कृत्य शेरे साढे चार टार मध्य सकल साधु ब्रह्मचारी के ध्यान जप करते सते हुए कुछ समय से राजा महाराज ने नियम बनाया है कि सुबह को 4 बजे सभी साधु ब्रह्मचारी नींद से जग जाएंगे प्रातः कृत्य समाप्त करेंगे और मंगलारती अटेंड करने के बाद में जब ध्यान करने के लिए बैठेंगे साढ़े का नियम यहां पर महाराज ने किया है अभी बेलूरमठ में तो पता है आप सबको कि मंगल आरती का समय अभी 400 बजे का है समर सीजन में 4 बजे होता है विंटर सीजन में 4:30 बजे तो यह दिसंबर है अर्थात कि विंटर सीजन है तो विंटर में समय 430 का होता है बेलून मठ में मंगलारती का घंटा दुई ध्यान जब कोरार पर घंटा खानेक महाराज घोरे बोसे भोजन गान होतो एक दो घंटा जब ध्यान करने के बाद में सभी लोग महाराज के रूम में एकत्र होते और वहां पर भजन कीर्तन गान वगैरा होता छले देर समय मतो जागा बार जन्नो महाराज निजे ही चारट आगे उठते एवं 41 मिनिटर समय एक जन सेवक के दिए घंटा बाजा बार व्यवस्था करते सब साधु ब्रह्मचारी प्रेरित हो ऐसा नहीं कि राजा महाराज ने नियम बना दिया अब राजा महाराज सो रहे हैं सभी साधु ब्रह्मचारी प्रेरित हो इसके लिए 430 को मंदिर में आने के लिए राजा महाराज स्वयं 4 बजे के आगे उठ जाते थे और 410 को सब कुछ रेडी करके एक सेवक के द्वारा घंटी बजाते थे 410 हुआ कि घंटी बजी बाकी सभी साधु ब्रह्मचार्य को अभी नींद से उठ जाना है यहां राजकोट आश्रम में अभी भी ऐसा होता है कि सुबह को 4:30 यहां पर तो 5:00 बजे का नियम है मंगलारती का आपको तो पता होगा कि जिस तरह से सूर्योदय होता है उसके अनुसार व ब्रह्म मुहूर्त में मंगलारती हो है तो यहां पर सूर्योदय का जो समय है वह वेस्ट इंडिया में थोड़ा देरी से होता है ईस्ट इंडिया में थोड़ा सा पहले होता है हालांकि इंडियन स्टैंडर्ड टाइम एक ही है किंतु एक्चुअली यहां पे दो टाइम जोन है भारत में एक्चुअली ईस्ट इंडिया में और वेस्ट इंडिया के बीच में ऑलमोस्ट एक घंटे का डिफरेंस है तो यहां पर गुजरात में सूर्योदय के अनुसार आरती मंगलारती का समय है सुबह को 5:00 बजे का तो यहां पे भी 4:30 को घंटा लगता है यहां बड़े महाराज ने नियम बनाया है ऐसा कौनो कोनो दिन भजनात साधन इत्यादि नाना विषय उपदेश दते तो एक मंगलारती अटेंड करने के बाद में ध्यान जप हुआ और इसके बाद में राजा महाराज के कमरे में सभी लोग इकट्ठा होते थोड़ा बहुत कीर्तन भजन वगैरह होता और उसके बाद में राजा महाराज सबको साधन भजन के संबंधित कुछ उपदेश देते तो वह जो उपदेश है इसका वर्णन अभी यहां पर है महाराज जी बोल रहे हैं इंद्रिय कोर्तादो इंद्रियों का जो अधिपति मन है उसको दमन करना चाहिए अबार मन बुद्धि उभय के आत्मा ते लोय कोते होवे इसके बाद में मन और बुद्धि दोनों को आत्मन में लय करना होगा मन के एकदम ना मेरे फ ना मेरे फेल्ले चोल बे ना मन को संपूर्ण रूप से उसकी मेरे फेल्ले यानी कि हत्या करना मन की हत्या नहीं करने से चलेगा नहीं मन को पूरा मार देना होगा साधु संगे इंद्रिय गुली चुप मेरे आछे मने करोना ओई गुली आर नाई साधु संग के परिणाम से इंद्रियों के जो स्वभाव है वह अपने अपने स्वभाव को छुप छुपा करके इंद्रिया बैठी हुई है किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि इंद्रियां शांत हो गई है समाधि ना होले ओई सब जाईना समाधि नहीं होने से इंद्रियों के विषयों के प्रति आकर्षण है वह समाप्त नहीं होता एक टू छेड़े दाव देख बे द्विगुण जोरे इंद्रिय गुली छब मारव थोड़ा सा छोड़ दो थोड़ा सा अपने मन के ऊपर में से लगाम हटा दो देखो कि यह इंद्रिया और जोर से वह अपनी शक्ति बढ़ाती है और इंद्रियों के विषय में डबल स्पीड से दौड़ती है श जनन खूब सावधान था का प्रयोजन इसीलिए बड़ी सावधानी से रहने का प्रयोजन है ज तो खण ना मन बुद्धिर पारे जाे जब तक कब तक सावधान रहने की जरूरत है जब तक कि मन बुद्धि के पार नहीं चला जाता देखिए यह एक पैसेज है इसके भीतर में महाराज जी ने कितना सब कुछ बता दिया है जैसे हमको पता है जो योगशास्त्र का स्टडी करते हैं तो शुरू में ही आते हैं यम और नियम और उसके बाद में आसन प्राणायाम प्रत्याहार यह तीन और इसके बाद में आते हैं धारणा ध्यान समाधि जिसको कि अष्टांग योग कहते हैं इस योग को इस तर तरह से तीन बेसिक फेजस में तीन बेसिक स्टेजेस में हम डिवाइड कर सकते हैं यम और नियम का अर्थ ही है अपने मन को संयम में लाना आसन प्राणायाम और प्रत्याहार का अर्थ है बेसिकली अपना जो शरीर और अपना मन है उसको सु नियंत्रित करना जिससे कि साधन भजन का जो सर्वोच्च स्टेज है जो सर्वोच्च आयाम है धारणा ध्यान समाधि इसकी ओर हमारा मन जाने के लिए तैयार हो जाए तो यहां पर सर्वप्रथम राजा महाराज कहते हैं कि मन और बुद्धि और यह जो आत्मन इसके बारे में पहले बताया ये इंद्रियों के बारे में इंद्रियों के विषय आप जितना उसको छुट्टी देंगे जितना इसके ऊपर में से आप लगाम हटाएंगे इतना ही मन इंद्रियों की ओर दौड़ेगा किंतु मान लीजिए कि आप कुछ समय साधन भजन करते हैं आश्रम में रहते हैं साधु संग करते हैं राजा महाराज ने तो यह बातें सब साधु ब्रह्मचार्य के लिए कही थी इसके लिए उन्होंने यहां पर साधु संग शब्द ऐड किया है जनरली ऐसा होता है कि सभी भक्त नियमित रूप से साधु संग नहीं कर पाते नियमित रूप से मंदिर में आना शायद सभी के लिए संभव ना हो किंतु जो लोग नियमित रूप से आश्रम में ही रहते हैं या तो आश्रम की नियमित मुलाकात लेते हैं उन लोगों के साथ में क्या होगा कि ये आरती संध्या आरती खास करके ज्यादातर भक्त अटेंड करते हैं और संध्या आरती के बाद में किसी ना किसी महाराज जी का प्रवचन होगा तो वह प्रवचन अटेंड करेंगे और फिर जो बड़े महाराज होते हैं उनको प्रणाम करके प्रसाद लेकर के घर जाते हैं ऐसे बहुत सारे भक्त नियमित रूप से करते हैं और जो लोग साधु ब्रह्मचारी आश्रम में ही रहते हैं उनकी तो बात ही नहीं है कि वे लोग तो सब समय ऐसे सीनियर साधुओं के संपर्क में मंदिर में जो भी उत्सव है पूजा है पाठ है भजन कीर्तन है वह सबका तो सब चलता ही रहता है तो ऐसे एक आध्यात्मिक वातावरण में रहने से इंद्रियां क्या करती है अपने सही स्वभाव को छुपा देती है वो फिर ऐसा नहीं है कि इंद्रियों का जो विषय की ओर का आकर्षण है वो आकर्षण मिट जाता है ऐसा नहीं होता वह आकर्षण छुप जाता है और यह छुपा हुआ आकर्षण कब प्रकाशित होगा थोड़े समय के लिए आप साधु संग है या या तो आश्रम में आना या तो फिर यह मंदिर में जो भी हमारे पूजा पाठ वगैरह कार्यक्रम होते हैं उससे दूर चले जाएंगे थोड़े दिन वैसे ही देखेंगे कि इंद्रियां अपने स्वभाव में वापस विरज जाती है जैसे ठाकुर ने कहा है ना कि गंगा के समय गंगा में स्नान करने के समय हमारे पाप क्या करते हैं तो पेड़ के ऊपर में बैठ जाएंगे फिर जैसे ही गंगा में से बाहर आएंगे सब पाप छलांग लगा कर के हमारे सिर के ऊपर में फिर से बैठ जाएंगे तो वैसा ये इंद्रियों के जो विषय है वह मंदिर में आने से आश्रम में आने से या साधु संग करने से या शास्त्र पाठ करने से वो छुप कर के रहते हैं किंतु जैसे ही यह सब चीजों से थोड़ा सा दूर जाए फट करके अपना सही स्वभाव प्रकट करते हैं अभी प्रश्न होता है कि क्या हम इस तरह से इस तरह की जो आध्यात्मिक साधना है उसमें तो बीच-बीच में रुकावट होती ही है उसमें तो कोई किसी कोई भी इस तरह का फॉर्चूनेटली नहीं है इवन हम साधु सन्यासी भी हमको कभी-कभी ऑफिस में लंबे समय तक बैठे रहना पड़ता है कोई कोई बड़ा काम चलता होता है तो मंदिर में नहीं जा पाते ऐसा होता है कभी-कभी रियल रेगुलर रूप से नहीं होता किंतु कभी-कभी होता है तो जैसे मेरा ही पब्लिकेशन में है कि कोई बहुत ज्यादा बड़ा काम आ गया तो फिर मैं अपने रूम में जाकर के वो नियमित रूप से मैं जो पाठ वगैरह करता हूं नहीं हो पाता तो उस समय एक बहुत बड़ा भय रहता है कि इतने दिनों के लिए कुछ चंद दिनों के लिए मैं जो मेरी साधना है साधन प्रवाह है उसमें थोड़ी सी भी रुकावट आ गई तो फट करके मेरी इंद्रियों का प्रभाव फिर से बढ़ जाएगा तो यह तो बड़ा ही डेंजरस है किंतु यह है यही है जीवन इसी जीवन के साथ में हमको रहना है जितना जितना दिन जाता जाएगा वैसे-वैसे इंद्रियों का प्रभाव धीरे-धीरे करके शिथिल होता जाएगा किंतु वो बहुत लंबे दिनों की साधना करने के बाद में इसीलिए आध्यात्मिक जीवन में जो रूटीन है इसका बहुत ज्यादा इंपॉर्टेंस है मैं जब पहली बार बेलूरमठ गया था तो मुझे बताया गया मैं ऐसा सोचता था कि पहली पहली बार मैं तो कोई आश्रम में ऐसा नियमित रूप से जाता नहीं था बहुत सारे अ यंग लड़के क्या करते हैं कि कोई ना कोई एक्टिविटी से वो आश्रम में जुड़ते हैं या तो फिर वह यंग लोगों के लिए वह कोई यूथ कन्वेंशन होगा या तो फिर वो स्टडी सर्कल होगा ऐसा कोई ना कोई एक्टिविटी में आकर के बाद में वे लोग साधु बनते हैं मेरा ऐसा नहीं है मैं बहुत कुछ पढ़ा था फिलोसोफी पढ़ कर के मैं यहां पर आया था तो रामकृष्ण संघ रामकृष्ण संघ के आश्रम में क्या चल रहा है मुझे तो ऐसा कोई जानकारी बहुत बैकग्राउंड नहीं था और सीधे में चला गया बेलूरमठ तो मैं सोच रहा हूं कि बेलूरमठ जाकर के वह जैसे हम लोग कहीं कभी-कभी ऐसा वो कोई किताबों में पढ़ते हैं ना कि कोई कोई एक धार्मिक जिज्ञासु व्यक्ति किसी गुरु के पास चला गया फिर गुरु उसको अपने सामने बिठाते हैं और उसको उपदेश देते हैं उसको उसकी जो गलतियां होती है तो उसको डांटते हैं थोड़ा अच्छा करते हैं तो उसको प्रेज करते हैं तो मैंने बेलूर मठ में देखा अरे ऐसा कुछ नहीं है वहां पे तो एक ट्रेनिंग सेंटर है ट्रेनिंग सेंटर में हमको रुकना है और वहां पे क्लासेस होते हैं आचार्य महाराज क्लासेस लेते हैं किंतु सबसे ज्यादा जो भार देते हैं वहां पे वो है आपका रूटीन कि सुबह को 3:30 बजे उठ जाना है और मैं तो समर सीजन में गया था विंटर सीजन में गया होता था तो 4:30 का मंगल आरती होता मैं तो समर सीजन में गया था तो 4:00 बजे का मंगलारती तो 3:30 को उठ जाना है कंपलसरी मंगलारती में जाना ही है और नहीं जाएंगे तो हमारे क्लास में एक मॉनिटर होता था वो मॉनिटर जाकर के हमारे जो इंचार्ज महाराज जी थे उनको बता देता था कंप्लेन कर देता था और महाराज हमको बुला कर के बोलेंगे यदि तुम मंगलारती नहीं जा सकते ये रूटीन नहीं फॉलो कर सकते तो तुम घर चले जाओ ऐसा सीधा सिंपल वहां का सिस्टम था तो मैं यह सोचता हूं कि अरे इस तरह से हमारा आध्यात्मिक जीवन का गठन कैसे होगा जबकि हमारे सामने गुरु नहीं है कोई एक सीनियर साधु नहीं है जिनको कि हम अपने सभी प्रश्नों पूछे और वह हमको स्टेप बाय स्टेप आध्यात्मिक साधना में गाइड करें हमको किस तरह से ध्यान करना है जप करना है यह सब हमको सिखाए यह सब सिखाते थे किंतु वो क्या है क्लासरूम जैसा एक एटमॉस्फियर है आचार्य महाराज बैठते हैं सामने हम लोग सब तो इस तरह से तो कैसे होगा इस तरह की चिंतन संशय दुविधा मेरे मन में सब समय चलता रहता था आज किंतु मैं इतने ने सालों के बाद में यह चीज मुझे समझ में आई है कि जो ट्रेनिंग सेंटर में हमको जो रूटीन फॉलो करना सिखाते हैं वही हमारी सबसे बड़ी संपद है वही हमारा सबसे बड़ा धन है क्योंकि एक बार हम लोग रूटीन फॉलो करना नहीं सीखेंगे जब तक हम रूटीन फॉलो करना नहीं सीखेंगे तब तक कोई भी गुरु हो कितने ही आध्यात्मिक उपदेश दे दे उससे ज्यादा कुछ होने वाला नहीं है यह जो हम एक इमेजिनेशन करके जाते हैं कि हां ये जोय लड़के यही राजा महाराज यही महापुरुष महाराज यही खोका महाराज यही लाटू महाराज जब यंग लड़के थे हमारी ही उम्र के 17 18 19 20 साल के ठाकुर के पास जाते थे दक्षिणेश्वर में और ठाकुर उनको स्पर्श करके ही कुछ ना कुछ आध्यात्मिक उपलब्धि करवा देते थे स्पर्श करके ही उनको कुछ ना कुछ जब ध्यान किए बिना ही पता नहीं वोह किस तरह से यह संभव है और फिर ठाकुर खुद उनको मॉनिटर करते थे कि हां तुम यहां पर जाकर किसी को बोलेंगे जाओ तुम पंचवटी में जाकर ध्यान ध्यान करो किसी को बोलेंगे जाओ तुम बेलतला के नीचे जाकर ध्यान करो किसी को बोलेंगे चांदनी में जा बैठ कर के ध्यान करो किसको क्या मंत्र देना है सबको अपनी यह रुचि के अनुसार सबको अपने संस्कार के अनुसार मंत्र देते थे यानी ठाकुर प्रत्येक शिष्य के ऊपर में कितना ध्यान रखते थे एक बार ठाकुर ने लाटू महाराज को कहा था कि वो बेलतला के नीचे जाकर ध्यान मत करना वहां पर एक भैरव है फिर भी लाटू महाराज जाकर ध्यान कर रहे हैं लाटू महाराज ध्यान कर रहे हैं और रेका एक भैरव आकर के विभीषिका दिखाने लगा तो ठाकुर अपने कमरे में बैठे हैं और कमरे में बैठ कर के उनको पता चला कि लाटू खतरे में है उसका जीवन वो कुछ भी हो सकता है भैरव वहां पर प्रकट हुआ है तो एकदम ठाकुर दौड़ के गए और लाटू महाराज तो ध्यान स्त थे तो जोर-जोर से चिल्लाने लगे अरे लाटू क्या कर रहे हो ध्यान में से बाहर आओ वरना तो बैरव अटैक करेगा तो ऐसा करके देखिए कि ठाकुर सबके ऊपर इंडिविजुअल नजर रखते थे तो हम लोग मैं खुद जब यहां पर आया था तो ऐसा सोचा करता था कि कोई सीनियर साधु होंगे हमको सामने बिठा कर के इस तरह से सभी को इंडिविजुअल जिस तरह की उसकी नीड है जिस तरह की उसकी नेसेसिटी है जिस तरह के उसके संस्कार है उसके अनुसार मंत्र देंगे उपदेश देंगे जब ध्यान करवाएंगे किंतु ऐसा नहीं जैसे एक क्लासरूम में होता है हमारे आचार्य महाराज बड़े ही विद्वान थे बड़े ही उनका उनको जो भी प्रश्न करेंगे वो उत्तर देंगे ऑफकोर्स किंतु वो एक ठाकुर के पास में जैसे ये डायरेक्ट डिसाइल जाते थे वो तो बात ही अलग है गुरु शिष्य परंपरा जो एक ट्रेडिशनल होती है तो ऐसा मैं अपेक्षा करके जब आया था तो मुझे थोड़ा डिसपिटर आ था किंतु आज इतने सालों के बाद में मैं देख रहा हूं देखिए कि दो मॉडल है एक तो है वह गुरु शिष्य गुरुकुल वाला मॉडल ठाकुर और अपने ये यंग लड़के उनके पास में आते थे और अभी ये क्लासरूम वाला रूटीन फॉलो करने वाला मॉडल जो कि हमारे संघ में अभी है यहां पे देखिए सिर्फ साधु ब्रह्मचार्य के साथ में ही नहीं भक्त लोग भी आते हैं इतना मंदिर भर के भक्त बैठे हैं तो ऐसा तो संभव ही नहीं कि बड़े महाराज सभी के साथ में इंडिविजुअल जाकर के मिले उनके परिवार में क्या हो रहा है वह खोज खबर रखे किसी किसी भक्त के साथ में हो सकता है सभी के साथ में ये संभव ही नहीं अपने यहां पर भक्तों की संख्या इतनी बढ़ गई है अभी तो मां का उत्सव था तो मैंने सुना 1600 लोगों ने प्रसाद लिया यहां पे आश्रम में तो तो कितनी बड़ी संख्या है कितने भक्तों को आप पर्सनली पहचान सकते हैं मिल सकते हैं उनके साथ में बैठकर बात कर सकते हैं संभव नहीं होता है तो सभी भक्त मंदिर में जाएंगे आरती अटेंड करेंगे सब पाठ होगा तो पाठ अटेंड करेंगे प्रवचन होगा किसी सीनियर सन्यासी महाराज को बुलाएंगे तो महाराज का प्रवचन अटेंड करेंगे यह सब संभव है किंतु इंडिविजुअली किसी को इंस्ट्रक्शन देना या इंडिविजुअल फॉलो अप करना वह अभी संभव नहीं रहा हम साधुओं के साथ में भी नहीं होता भक्तों के साथ में भी यह संभव नहीं है तो आज का जो युग है तो हमारे लिए क्या ठाकुर सिर्फ यह त्यागी संत ही नहीं मास्टर महाशय बलराम बसु यह गोलाप मां योगेन मां जितने भी भक्त आते थे सबके साथ में वो इंडिविजुअल संस्कार समझ कर के ठाकुर उनको उपदेश देते थे तो वो चीज तो अभी संभव नहीं तो हमारे लिए क्या पॉसिबल है हमारे लिए पॉसिबल है एक तो कि ये जो एक्टिविटी है रामकृष्ण आश्रम की प्रतिदिन की संध्या आरती वगैरह वो जितना संभव है अटेंड करें किंतु साथ-साथ में ही एक रूटीन बनाए ये रूटीन इज एक्सट्रीमली इंपॉर्टेंट जब तक हमारे जीवन में एक रूटीन नहीं रहेगा जब तक हमारा जीवन एक किसी एक फॉर्मेट में बंधेगा नहीं तब तक हमारा आध्यात्मिक जीवन लिफ्ट ऑफ नहीं होगा उससे पहले सब बातों की बातें हैं हां मैं यह थोड़ा बहुत आज मुझे इच्छा हो गई कि मैं मैं मंत्र लिया है मंत्र दीक्षा ली है पूजनीय परम प्र परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज ने कहा है कि इतना जप करना है और इस तरह से जप करना है तो जब इच्छा हो गई तो थोड़ा सा जप कर लिया और समय नहीं है या तो इच्छा नहीं है मैं जप नहीं कर पाया ऐसा वो क्या होता है फीट एंड स्टार्ट इंग्लिश में शब्द है फीट एंड स्टार्ट कभी हुआ तो कभी नहीं हुआ कभी हमने बहुत जोरों से जब ध्यान कर दिया तो कभी ऐसे कितने कितने दिन चले गए कि वह फिर माला हाथ में लेने की या उंगली पर जप करने की इच्छा ही नहीं होती तो यह फिट एंड स्टार्ट बीच-बीच में आरंभ किया बीच-बीच में छोड़ दिया तो सा करके आध्यात्मिक जीवन हमारा घित घडतर नहीं होगा लिफ्ट ऑफ नहीं होगा हमको चाहिए कि एक पक्का रूटीन बनाए पक्के रूटीन में ऐसा नहीं है कि एक घंटा बैठेंगे दो घंटा बैठेंगे बहुत कम लोगों के लिए संभव है किंतु यदि मैं एक समय निश्चित करूं और समय के अनुसार मैं यदि 10 15 20 मिनट भी बैठता हूं तो वह धीरे-धीरे करके बिल्ड अप होता है हमारा ब्रेन एक बायोलॉजिकल क्लॉक के अनुसार चलता हैय ये जो सब एंजाइम्स है जो हार्मोस है वो एक बायोलॉजिकल क्लॉक के अनुसार वह अपना काम करते हैं जैसे कि हमारे भोजन का समय है 12:30 या 1 बजे का तो उसी समय ये डाइजेस्टिव एंजाइम सीक्रेट होंगे तो वो डाइजेस्टिव एंजाइम उस समय आहार चाहते हैं खाना चाहेंगे यदि उस समय उनको खाना मिला तो बहुत अच्छे से डाइजेस्ट हो जाएगा और जो हमारा रूटीन खाने का समय है उसके अनुसार हम उस दिन खाना नहीं मिला तो हमको एसिडिटी होने का संभव है क्योंकि क्या है कि वह खाने के जो डाइजेस्टिव जो यह सब एंजाइम्स है यह सब ऑलरेडी अपना वह काम करना शुरू कर दिया है और यदि खाने पीने में जिनका बहुत ज्यादा डिस्टरबेंस होता है देखेंगे कि सब समय उनको पेट का रोग है वो नींद ठीक से नहीं होता है हाइपरटेंशन है यह सब लगा रहता है जिनका जीवन अनियमित होता है जैसे कोई कोई लोग बहुत ज्यादा ट्रेवल करते हैं कोई कोई लोगों का जॉब ही इस तरह का है बिजनेस ही इस तरह का है कि वो अनिश्चितता अनियमितता लगी ही रहती है तो यह हमारे साधक जीवन के लिए नॉट नेसेसरी कि आप सन्यास ले आप यदि अपने जीवन को किसी घड़ी के अनुसार नियंत्रित कर पाते हैं तो भी बहुत बड़ी बात है और ऐसा नहीं है कि पूरे दिन में आपको यह नियमन करना है यदि सुबह को या शाम का एक निश्चित समय आपने ले लिया और उसके अनुसार ठीक बैठ कर के आप आपने वो पाठ करना है और थोड़ा सा चैटिंग करना है थोड़ा सा जप करना है इतना जद कर पाए चैटिंग करके स्टार्ट करना है जिससे क्या है कि जहां पर बैठे हैं वहां का वातावरण एक शुद्ध हो जाए हवा अपना मन क्योंकि मंत्रों का उच्चारण होता है तो मन मन शुद्ध हो जाता है उसके बाद में बैठ कर के कथामृत का 1015 मिनट पाठ करना है बोल कर के वो भी मन में मन में नहीं बोल कर के कथामृत का पाठ करना है और इसके बाद में 1015 मिनट जप करना है यदि इतना भी हम कर पाए 5 मिनट जितना मंत्र पाठ चैटिंग 10 मिनट जितना कथामृत का पाठ और 10 मिनट जितना जप तो ये 10 दो 10 20 मिनट 25 मिनट इतने से ही यदि हम नियमित रूप से कर पाए तो देखिए कि ये बिल्ड अप करता है वो चक्रवृद्धि ब्याज कहते हैं ना वो सर्कुलर डेट इसको कहते हैं इसकी तरह से एक के ऊपर एक यह बिल्ड अप होगा और बिल्ड अप होते होते देखेंगे कि चार पाच साल में आप कहां से कहां चले गए कोई कोई लोग सोचता है कि अरे मैं वहां रिट्रीट में गया था रिट्रीट में मैंने पूरा दिन भर जब यहां पर अभी आजकल ऐसा होता है मेडिटेशन रिट्रीट होती है जप रिट्रीट होती है तो यहां पे राजकोट में भी होता है ऐसा भक्तों को इनकरेज किया जाता है पूरा दिन भर बैठ कर के जप करें बीच-बीच में थोड़ा सा भजन होगा थोड़ा सा प्रवचन या पाठ होगा किंतु अदर वाइज आपको पूरा टाइम बैठ कर के जप करना है तो कोई सोचेगा अरे मैं प्रति साल एवरी ईयर एक या दो रिट्रीट में जाता हूं रिट्रीट में जाने से कंटीन्यूअस वो पाठ भजन प्रवचन जप यह सब चलता रहता है तो उससे मैं जब वापस आ जाता हूं कुछ ही दिनों में इसका प्रभाव क्यों चला जाता है तो प्रभाव चला जाता है इसका रीजन यहां पर महाराज जी ने बताया है जब तक आप साधु संग करते हैं जब तक आप ऐसे आध्यात्मिक वातावरण में है तब तक इंद्रियां अपने सही स्वभाव को छुपा करके बैठी है इंद्रियों को यदि विषयों के आकर्षण से धीरे-धीरे करके उनको दूर करना है तो रूटीन इज एक्सट्रीमली इंपोर्टेंट रदर देन हां ऑफकोर्स रिट्रीट में जाना बहुत अच्छा है किंतु साथ-साथ में ही यदि आप एक रूटीन बना पाए 20 मिनट का 25 मिनट का प्रतिदिन अपने कमरे में अपने घर में एक समय बैठ कर के जो आप कर पाए थोड़ा सा चैटिंग थोड़ा सा पाठ थोड़ा सा जप देन ये जो रिट्रीट है ना वो मल्टीप्लाई होगा उसका बेनिफिट आज आप कहीं जाकर के अभी जैसे हिमालय में अपने अद्वैत आश्रम में रिट्रीट अपने वो सुधीर महाराज है नए जो महाराज वहां पर हुए हैं बड़े महाराज तो वो रेगुलर रिट्रीट वहां पर करते हैं मैं खुद साधना सदन बोलकर के कनखल में एक आश्रम है वहां पर 40 दिन का ज्ञान सत्र होता है वहां पर ट्रेडिशनल संस्कृत पंडित क्या करते हैं वो प्रस्थान त्रय 40 दिन में सिखाते हैं प्रस्थान त्रय अर्थात की गीता ब्रह्मसूत्र और उपनिषद तो ये तो सब संस्कृत के पंडित सीधे-सीधे संस्कृत में बोलेंगे संस्कृत में चैटिंग करेंगे और संस्कृत में ही उसका व्याख्या करेंगे फटाफट करके 700 प्लस श्लोकों की गीता है तो सभी श्लोक एक के बाद एक बोलते जाएंगे और उसकी व्याख्या करते जाएंगे तो 40 दिन का ज्ञान सत्र जिन लोगों ने पहले अच्छे से शास्त्रों को एक बार पढ़ा है उनके लिए रिफ्रेश करने के लिए बहुत ही सुंदर है तो मैं संन्यास के बाद में गया था वहां पर मैं और और कुछ साधु थे मेरे साथ में मेरे कलीग मेरे मित्र थे तो 40 दिन हमको इतना अच्छा लगा मेरी तो कैपेसिटी नहीं कि वोह दिन के पाच छ घंटे कंटीन्यूअस क्लास अटेंड कर पाऊं मैं कुछ-कुछ क्लास मिस कर देता था और वहां पर गंगा के किनारे जाकर बैठा रहता था किंतु जो भी है वो मैं कंप्लीट नहीं कर पाया अनफॉर्चूनेटली क्योंकि फिर मुझे बुला दिया गया वापस सेंटर में किसी कारण की वजह से य 30 दिन के आसपास में रहा था 40 दिन नहीं कर पाया तो किंतु 30 दिन तो रहा था 30 के आसपास और मुझे इतना अच्छा लगा यह मतलब ये हरिद्वार जैसा नगर है साधुओं के द्वारा पाठ अपने ट्रेडिशनल संस्कृत पंडितों के द्वारा शास्त्र सिखाया जाता है पास में ही गंगा है तो कहीं जाकर के गंगा के किनारे बैठ कर के वहां एक चाय का एक वो लारी होता है ना लारी गल्ला बोलते हैं हम जिसको वो तो वहां से मैं एक चाय का कप लेता था और वहां जाकर के गंगा के किनारे बैठ कर के थोड़ा चाय पीता था थोड़ा चिंतन मनन करता था और फिर बीच-बीच में आकर के क्लास अटेंड करता था तो इतना सुंदर लगा मुझे तो ऐसे रिट्रीट्स में बीच-बीच में जाना चाहिए किंतु रिट्रीट का बेनिफिट आपको कंटीन्यूअस करना है तो साथ-साथ में ही डेली रूटीन आपका होना ही चाहिए इस रूटीन के थ्रू इस रूटीन के माध्यम से आप रिट्रीट का बेनिफिट अपने प्रतिदिन में आप लेके आ पाएंगे वरना क्या होगा रिट्रीट जैसे ही खत्म हुआ जैसे ही आप प्रतिदिन के कार्य में आप डूब गए तो आपका मन भी वैसे ही जितना ऊपर उठा था उतना ही नीचे गिर जाएगा तो आपको कोई ऐसा बेनिफिट ज्यादा लॉन्ग टर्म के लिए नहीं होगा किंतु 202 मिनट का भी रूटीन यदि आप फॉलो करते हैं विदाउट एनी ब्रेक तो यह रिट्रीट आप जितनी ही करते रहेंगे वो सब मल्टीप्लाई होती रहेगी इसीलिए यहां पर राजा महाराज ने क कहा है इंद्रियों के कर्ता मन को दमन करना होगा क्योंकि यह इंद्रियों का करता है मन उसका जब तक दमन नहीं करेंगे मन के ऊपर में इंद्रियों के विषयों के आकर्षण के ऊपर में जब तक हम कंट्रोल नहीं लाएंगे तब तक हमारा आध्यात्मिक जीवन सिर्फ बातों बातों में ही बना रहेगा आबार मन बुद्धि उभय केही आत्मा ते लोय करते हुए मन और बुद्धि दोनों को आत्मन में लय करना होगा यह क्या है जैसे योग शस्त्र में यम और नियम अर्थात कि अपने मन को संयम में लाना उसके बाद में आसन प्राणायाम और प्रत्याहार यह अपने शरीर को संयम में लाना उसके बाद में ये जो धारणा ध्यान समाधि है अपने मन को एक ऐसे ऑब्जेक्ट के ऊपर में केंद्रित करना जो कि ईश्वर हो या तो अपने हृदय में या तो बाहर में जो ईश्वर का फोटो है या तो फिर किसी मंत्र के ऊपर में जैसे मैं कभी-कभी करता हूं उंगलियों से जप करता हूं तो यह जो जब यहां प जैसे ओम तो ओमकार का शब्द जैसे मैं उंगलियों प जप करता हूं तो ओम को मैं विजुलाइज करूंगा अपनी उंगली पर कि ओम ओम ओम ओम जहां जहां प मेरी उंगली स्पर्श होती है वहां वहां पर मैं ओम को विजुलाइज करता हूं मेरे मन को मैंने ओम के भीतर में समाहित कर दिया जद मैं अपने हृदय में ध्यान करता हूं तो मैं इमेजिन करता हूं कि हृदय में ठाकुर बैठे हुए हैं मेरा मन वहां पर एकाग्र हो रहा है तो मन को इस तरह से ईश्वरीय विषय में एकाग्र करना मन के मन को एकदम मार नहीं देंगे तब तक चलेगा नहीं साधु संग से इंद्रिय चुप होकर के बैठी है ऐसा मत मत सोचना कि वह उसका काम करना बंद कर दिया है समाधि जब तक नहीं होती तब तक इंद्रियां अपना कार्य करती ही रहेगी एक टू थोड़ा सा छोड़ दो देखना कि जितना अपने मन को ऊपर लेकर गए थे किसी रिट्रीट में या तो फिर माकी जन्म तिथि है तो आपने पूरा सुबह से लेकर के आपने सभी कार्यक्रम अटेंड किए सभी पूजा सभी पाठ सब अटेंड किए तो उस दिन तो लगा कि आहा जैसे हम स्वर्ग में चले गए किंतु घर आकर के जैसे यह सब कु छोड़ दिया थोड़ा सा भी मन को छूट दे दी तीन चार दिन में देखेंगे मन जितना ऊपर उठा है उतना ही गड्ढे में गिरेगा समाधि ना होले ए सबब जाए ना जब तक समाधि नहीं होती तब तक इंद्रिया अपने त्याग में दृढ़ नहीं होती इसीलिए बहुत ही सावधान से रहने की जरूरत है जब तक ना मन और बुद्धि के पार चले जाते हो तो मन बुद्धि और आत्मा में लय होना समाधि होना वह सब तो बहुत दूर की बात है अभी तो हमको यह करना है कि बीच-बीच में जैसे जो भी मंदिर के कार्यक्रम है या रिट्रीट है वहां पर जाना है और प्रतिदिन के लिए 20-2 मिनट का नियम बना कर के जब ध्यान तो करना ही इससे क्या होगा कि यह सब बेनिफिट्स मल्टीप्लाई होंगे तो आज यहीं तक अभी फिर मंडे को मिलेंगे ओम शांति शांति श हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु