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Sri Ramakrishna Teachings ·

श्री रामकृष्ण और माँ शारदा : षोडशी पूजा 3 Jan 2024

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ या राम कृष्णा यते नमः आज मां की तिथि पूजा है तो मैंने सोचा कि एक बहुत ही सुंदर प्रसंग स्वामी शारदानंद जी ने लीला प्रसंग में ित किया है शोड़ी पूजा का तो मां जब पहली बार दक्षिणेश्वर आई तो उस समय हमको पता है कि ठाकुर के साथ में ही बहुत सारे दिन एक साल से भी अधिक का समय ठाकुर के साथ में ही ठाकुर के ही कमरे में रुकी थी और ठाकुर ने उनको अपनी धर्म पत्नी के रूप में एक धर्म की आराधना करने के लिए धर्म की साधना करने के लिए अपने साथ में रखा था और जब मां उनके साथ में शयन करती थी तब ठाकुर ने अपनी परीक्षा भी की थी अपने मन को कहते भी थे कि देखो इसको स्त्री शरीर कहते हैं और स्त्री शरीर का वो बहुत सारे सुख उपभोग कर सकते हैं क्या तुम इसको चाहते हो या नहीं ठाकुर अपने मन को इस तरह से पूछते थे किंतु उनका मन कभी भी उस डायरेक्शन में आगे नहीं बढ़ा क्यों क्योंकि ठाकुर काम कांचन से संपूर्ण रूप से उर्ध्व उठ चुके थे किंतु यही ठाकुर यह भी कहते हैं कि यदि मां की तपस्या ना होती मां की साधना ना होती मां की पवित्रता ना होती और जद वह मुझ पर आक्रमण करती तो मैं क्या मेरे संयम का बांध व बना रहता कि टूट जाता कौन कह सकता है तो ठाकुर अपनी यह साधना में सिद्धि का श्रेय मां को देते हैं तो अल्टीमेटली ठाकुर ने जब मां को अपने साथ में रखा फिर ऐसा हुआ कि ठाकुर तो बार-बार समाधि में चले जाते थे और मां कभी-कभी डर जाती थी कि अरे क्योंकि जड़ समाधि या तो एकदम निर्विकल्प समाधि हो जाने से ऐसा ही लगता है कि शरीर जैसे कि अभी मृत हो चुका है शरीर में से प्राण निकल गए हैं ऐसा एक आभास होता है तो ऐसा बार-बार होने से मां बड़ी चिंतित हो जाती थी एक रात को जब ठाकुर समाधि में चले गए तो मां को ऐसा लगा कि ठाकुर ने प्राण त्याग कर दिए हैं तो बेचारी चिल्लाने लगी रोने लगी हृदय वगैरह सब वो सोए हुए थे उठ कर के आए फिर हृदय ने बहुत लंबे समय तक ठाकुर को भगवान का नाम सुनाया तब कहीं ठाकुर को फिर से बाह्य ज्ञान बाह्य संज्ञा हुई वह समाधि में से नीचे आए तो जब ठाकुर ने अभी यह सब पूरा विवरण सुना कि मां को तकलीफ होती है मां को डर लगता है मां चिंतित हो जाती है बार-बार समाधि देख कर के तो ठाकुर ने क्या किया नबत में उनकी मां चंद्र रावणी देवी रहती थी तो मां को मां शारदा देवी को अपनी मां के साथ में नबत में रहने के लिए भेज दिया अभी जो लोग दक्षिणेश्वर गए हैं उनको तो पता है कि ठाकुर का कमरा और नबत के बीच में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं है मैं यह सब पहले लीला प्रसंग कथामृत यह सब पढ़ता था यह पढ़कर के मेरे मन में दक्षिणेश्वर एक बहुत बड़ी जगह है और कहां पे मां का मंदिर होगा कहां पे ये द्वादश शिव मंदिर होंगे कहां गंगा का घाट होगा कहां नौबत कहां ठाकुर का घर ऐसा मैं बहुत बड़ी जगह सोचा करता था अपनी कल्पना में फिर जद एक्चुअली जा करके देखा तो बहुत छोटी जगह है एक्चुअली बहुत ज्यादा बड़ी नहीं है और ठाकुर का कमरा और मां का नबत जहां पर मां रहती थी व कुछ ही फिटों का फासला है तो बहुत ज्यादा कोई अंतर नहीं है तो मां को वहां पर भेज दिया नबत में रहने के लिए किंतु इस दौरान ठाकुर ने एक बहुत ही मह महत्त्वपूर्ण एक विधि का अनुष्ठान किया वह है सड़सी पूजा सड़सी पूजा का महात्म्य हम सबके लिए कितना है वह हम लोग अभी भी आज तक नहीं समझ पाए हमने मां की जीवनी में जब गंभीरानंद जी उसकी प्रस्तावना में लिखते हैं देवी का आगमन पृथ्वी पर क्यों होता है क्योंकि वह शक्ति बनकर के अवतार का जो मिशन है अवतार का जो जगत में कार्य है उस को निष्प्रभ तरित होती है अवतरण ग्रहण करती है तो अवतार की शक्ति तो है मां और शक्ति के द्वारा ही अवतार अपना संपूर्ण कार्य वो शेष करेंगे अपना कार्य निष्पक्ष और प्रकृति इस तरह से हमारे यहां पर कल्पना की गई है पुरुष है अचल अटल समाधि मग्न और चेतन स्वर सत्ता है और प्रकृति है वह शक्ति है और वह इस जगत में कार्य करती है प्रकृति के द्वारा ही जीवन संभव है जगत संभव है यदि शक्ति या तो प्रकृति या तो देवी आपको आशीर्वाद ना दे तो साधन पथ में आगे बढ़ना हमारे लिए असंभव है ठाकुर की जो एक सुंदर उपमा है कि ज वन में से भगवान राम मां सीता और लक्ष्मण जा रहे थे लक्ष्मण भगवान राम का दर्शन नहीं कर पा रहे क्योंकि बीच में मां सीता है तो लक्ष्मण ने मां को हाथ जोड़कर विनती की कि मां आप रास्ता छोड़ दीजिए तो भगवान राम का मुझे दर्शन हो तो वैसे यह शक्ति का कार्य है शक्ति हमको जब आशीर्वाद करेगी तभी हम इस जगत में आध्यात्मिक या तो किसी भी क्षेत्र में हम लोग सक्सेस हो पाएंगे बिना शक्ति की सहाय के यह संभव ही नहीं है इसीलिए स्वामी जी की वह प्रसिद्ध कहानी है कि कश्मीर में गए एक तांत्रिक था वहां पर तो तांत्रिक का चेला और स्वामी जी के पास आता था तो स्वामी जी तो जगत विख्यात स्वामी जी कहां पूरे विश्व में वह वेदांत का प्रचार करके आए हैं भगवान राम कृष्ण के साक्षात शिष्य है संतान है मां मां के प्रिय संतान है ऐसे स्वामी जी निर्विकल्प समाधि जिन्होंने प्राप्त की है नरनारायण ऋषि के जो अवतार है भगवान शिव के जो साक्षात अवतार ऐसे स्वामी जी को वो तांत्रिक ने कुछ श्राप दे दिया और स्वामी जी के खुद के शब्दों में कहे तो स्वामी जी कहते हैं आमी हकते हागते पालिए एलोम अर्थात कि उनको लूज मोशन हो गया और लूज मोशन से ही उनको वो वहां पर छोड़ कर के कश्मीर छोड़ कर के कोलकात्ता आना पड़ा मां को जाकर के उन्होंने कंप्लेन किया मां के पास जाकर के मां यह देखो कैसे है तुम्हारे ठाकुर ठाकुर की इतनी आराधना की ठाकुर का शिष्य होने के बाद में भी यह दो कोड़ी का दो टक्के का का तांत्रिक मुझे श्राप दे दे यह कैसी बात हो गई तब मां ने क्या उत्तर दिया था बाबा शक्ति मानते हुए बेटा शक्ति को मानना पड़ेगा जगत में आए हो जगत में सभी के पास में कुछ ना कुछ शक्ति है इस शक्ति से कोई भी व्यक्ति या तो खुद की उन्नति समाज की उन्नति साधित कर सकता है या तो फिर उसकी दुष्ट बुद्धि हुई तो वह शक्ति की वजह से शक्ति का इस्तेमा माल करके समग्र जगत को एक खूना मर्की की आग में डुबो दे सकता है जैसे कि हमने देखा 20th सेंचुरी में किस तरह के सब पागल आए थे एक के बाद एक एक था हिटलर दूसरा था स्टालिन यहां पे था माओ अपने ही खुद के हजारों लाखों करोड़ों लोगों को उन्होंने मार दिया था सिविल वॉर रेवोल्यूशन वर्ल्ड वॉर यह सब करके उन्होंने खूना मर की की थी तो ऐसे लोगों में भी आप देखिए कि एक शक्ति होती है मैं कभी-कभी सोचता था जब पहली बार ठाकुर महा स्वामी जी को पढ़ने की शुरुआत की कि मैं सोच रहा हूं कि जदी शक्ति तो भगवान की आराधना करके ही प्राप्त होती है तो फिर इस आराधना करके प्राप्त हुई शक्ति जिनके पास में है उसका मन मलिन कैसे हो सकता है किंतु यहां पर देखिए कि शक्ति के प्राप्त करने के लिए जो परमार्थ और पुरुषार्थ दोनों चाहिए एक पुरुषार्थ भी एक ऐसी चीज है जिसके द्वारा आप शक्ति प्राप्त कर सकते हैं और यदि दुष्ट बुद्धि हुई तो शक्ति का मिसयूज भी कर सकते हैं अपनी बुद्धि अपना धन अपनी प्रतिष्ठा अपना पावर यह सबसे आप मिसयूज भी उसका कर सकते हैं दूसरों को कष्ट देने में भी लगा सकते हैं तो शक्ति अपने आप में देखिए कि शक्ति प्राप्त होना ही इनफ नहीं है या तो फिर संपूर्ण नहीं है एक सद बुद्धि भी चाहिए एक आराधना करके साधना करके मन को एक पवित्र भाव मन में प्रकट भी करना पड़ेगा तभी यह शक्ति और साधना दोनों साथ-साथ में चलेगी तो ठाकुर ने देखिए कि अपनी साधना के अंत में मां को शोड़ी के रूप में पूजित किया और अपनी साधना का फल मां के श्री चरणों में अर्पित कर दिया यह जो संगम है सद्बुद्धि और शक्ति का सा धना और शक्ति का बिना साधना के प्राप्त की हुई शक्ति डिस्ट्रक्टिव हो सकती है और साधना के बाद में यदि शक्ति ना प्राप्त की जाए तो साधना में सिद्धि के अधिकारी सिर्फ आप होंगे यह जगत को जो आपको बदलना है जगत में जो धर्म चक्र प्रवर्तन करना है वह कैसे होगा तो उसके लिए तो आपको शक्ति चाहिए तो शक्ति और साधना दोनों का संगम उस दिन रात को जगत त्री पूजा में हुआ था और इसीलिए आज हम जो लोग यहां पर हैं ठाकुर ने जब वो कुठी घर के ऊपर में जाकर के पुकारा था सबको कि कहां हो भक्त लोग तुम आओ मेरे पास में मेरे पास साथ बैठकर के ईश्वरीय बातें करो यह सांसारिक बातें सुनक मेरे कान जल गए यह जो ठाकुर ने आह्वान किया था वोह काशीपुर में जहां पर ठाकुर ने कहा था तो मादे चैतन्य हो तुम सबको चैतन्य प्राप्त हो तो वह पुकार करके लोग आए और लोगों का जीवन परिवर्तन हो वह शक्ति कहां से आई ठाकुर तो निर्विकल्प समाधि में मग्न थे वो बीच-बीच में कहीं आते थे और फिर से समाधि में चले जाते थे वह एक सुंदर कहानी है ना कहानी घटना है कि तोतापुरी के जाने के बाद में ठाकुर ने ठीक किया कि मैं तो बस अभी समाधि में ही मग्न रहना चाहता हूं तो उस समय क्या हुआ एक साधु वहां पर आया और साधु को पता चला कि ये तो देखिए कि निर्विकल्प समाधि में तो 21 दिन के बाद में मृत्यु हो जाता है तो उस साधु को ऐसा दर्शन हुआ या तो फिर ऐसा एक भीतर से प्रेरणा हुई होगी कि अरे ठाकुर के शरीर के द्वारा तो जगत कल्याण के बहुत सारे कार्य होने वाले हैं वो यदि शरीर त्याग कर देंगे तो जगत का क्या होगा यह सोच कर के साधु ने क्या किया ठाकुर को बीच-बीच में जबरदस्ती कैसे भी करके थोड़ा निम्न भूमि के ऊपर में पृथ्वी पर ले आते थे समाधि में से उनको थोड़ा बाह्य ज्ञान उनको करवाते थे कैसे भी करके जोर जबरदस्ती करके थोड़ा बहुत खाना उनके मुंह में डाल दिया करते थे और ऐसा करके ठाकुर का शरीर धारण हुआ ठाकुर कहते हैं तकरीबन छ महीने से भी ज्यादा सतत वह इस तरह से निर्विकल्प समाधि में रहे थे बाद में जब उनको आदेश प्राप्त हुआ ई भाब मुख था तू भाव मुख में रहे भाव मुख का अर्थ यदि करने को जाएंगे वो एक बहुत लंबा एक डिस्कशन है एक सामान्य भाषा में कह सकते हैं कि सुपरकॉन्शियस और कॉन्शसनेस के कॉन्शसनेस के बीच की ये जो बॉर्डर है जो बीच की बाउंड्री है वहां पर रहना जब चाहे सुपरकॉन्शसनेस में चले जाएंगे जब चाहे नीचे आकर के भक्तों के साथ बात करेंगे ठाकुर ने क्या कहा था मां को बार-बार नति करते हैं चीनी होते चाई ना मा चीनी खेते चाई मैं शक्कर होना नहीं चाहता मैं शक्कर चीनी खाना चाहता हूं देखिए कि द्वैत और अद्वैत का कितना सुंदर अर्थ उन्होंने एक ही वाक्य में हमको बता दिया अद्वैत अर्थात की ईश्वर मय हो जाना ईश्वर स्वरूप हो जाना ईश्वर स्वयं हो जाना और द्वैत अर्थात कि भक्त और भगवान दोनों के बीच में एक डिफरेंस रहेगा भक्त भगवान की आराधना करेगा भगवान के साथ में वार्तालाप करके भगवान की प्रार्थना करके भगवान को साथ में वो कीर्तन भजन करके वो आनंद ईश्वरीय आनंद प्राप्त करेगा तो भक्ति और भक्त का जो आनंद है वो ठाकुर उसमें रहना चाहते थे नहीं कि वो ईश्वर स्वयं होकर के निर्विकल्प समाधि में रहना किंतु यह पृथ्वी पर वापस आक के जगत कल्याण का जो कार्य करना है वह वैसे ही थोड़ी ना होगा ठाकुर तो शिवमय शिव स्वयं है उनका तो नेचुरल टेंडेंसी ही है निर्विकल्प समाधि में जाकर के रहना कहां कैलाश पर्वत पे आप देखिए कि वो भूत गण से वो घिरे हुए गले में वो सर्प की माला डाले हुए स्मशान में महायोगी शिव विराजित है तो ऐसे शिव महायोगी शिव स्वयं ठाकुर है तो वो क्यों जमीन पर कैलाश से पृथ्वी पर आएंगे लोगों का कल्याण करेंगे इसके लिए एक पावर चाहिए एक शक्ति चाहिए एक फोर्स चाहिए व शक्ति है मां यथा जनेर दहि का शक्ति ही अग्नि की जो दाहिद है वह है मां तो मां की पूजा करके मां की आराधना करके ठाकुर ने शक्ति को अपने पास में बिठाया यह अपने रामकृष्ण संघ के जितने भी मंदिर देखेंगे ठाकुर के पास में मां विराजित है तो ये दोनों ने मिलकर के और ऑफकोर्स स्वामी जी तो उनके संतान है ही है तो यह शक्ति की आराधना करके शक्ति का साथ लेकर के ठाकुर ने नरेण को तैयार किया और यही नरेण स्वामी विवेकानंद बनकर के पूरे विश्व में वेदांत का प्रचार किया रामकृष्ण संघ की स्थापना की तो यह पूरा जो धर्मचक्र प्रवर्तन यह ठाकुर ने मां की सहाय से किया मां खुद बीच-बीच में कहती थी कि ठाकुर चले गए किंतु मुझे रख कर के गए मैं मैं सोचती हूं कि ठाकुर के जाने के बाद में अभी इस शरीर धारण करने का क्या प्रयोजन है चलो मैं भी चली जाती हूं ऐसा मां सोचती थी किंतु फिर मां ही कहती है कि नहीं ठाकुर ने मातृ भाव का प्रचार जगत में करने के लिए मुझे रख कर के गए हैं तो वो मातृभासा भाव ठाकुर ने खुद ने भी तो संतान भाव की साधना की ये जैसे-जैसे युग परिवर्तन होता है विभिन्न तरह की विभिन्न भावों की साधनाए वह साधक लोग किया करते हैं तो इस युग एक एक समय था जबकि भगवान महावीर ने दस्य भाव की साधना की थी ऋषि मुनियों ने शांत भाव की साधना की थी गोपियों ने मधुर भाव की साधना की थी सुदामा ने सख्य भाव की साधना की थी तो ऐसे युग के अनुसार विभिन्न भावों की साधनाए चलती रहती है तो इस युग में आज आज की साधना है सं तान भाव की जो कि ठाकुर ने की है ठाकुर और मां काली का मां काली को अपनी मां के रूप में देखते थे और इमेजिन करते थे साधना करते थे कि वह उनके संतान है तो संतान भाव की मातृ भाव की साधना वह जिस तरह से ठाकुर ने की उसी साधना हमारे हृदय में वही भाव हम भक्तों के हृदय में दृढ़ तर हो जाए इसके लिए ठाकुर मां को रख कर के गए हैं तो यह शोड़ी वो यज्ञ वो महा होम जहां से यह पूरा सब कुछ हमारा संघ स्टार्ट हुआ हमारे संघ की फाउंडेशन हमारे संघ की भित्ति रखी गई वो इस शोशी पूजा इसका वर्णन स्वामी शारदानंद जी महाराज ने लीला प्रसंग पुस्तक में किया है तो वो एक छोटा सा वर्णन आज मैं थोड़ा सा पाठ करता हूं बड़ा शुभ दिन है मां की तिथि पूजा है मां की जन्म जयंती है आज के ही शुभ पवित्र दिन मां पृथ्वी पर अवतरित हुई थी हम सबके कल्याण के लिए तो इस शुभ दिन को यह एक सुंदर एक छोटा सा प्रसंग हम पाठ करते हैं शरत महाराज लिखते हैं लीला प्रसंग में सन 1280 सालर जेष्ठ मास अर्धे के ऊपर गोतो होया 1280 बंगा बंगोली ईयर है उसके ज्येष्ठ मास का अर्धे से भी ज्यादा समय बीत गया है अभी यह जो समय है बंगोली समय वह इंग्लिश अपना कैलेंडर है उसके अनुसार 18735 18 18 73 की यह साल है आज अमावस्या फलहारी कालिका पुजार पुण्य दिवस आज अमावस्या है फल हारिणी काली पूजा का पुण्य दिवस है सतन दक्षिणेश्वर मंदिरे आज विशेष पर्व उपस्थित हो इसकी वजह से दक्षिणेश्वर काली मंदिर में आज एक विशेष पर्व का यह फेस्टिवल का सेलिब्रेशन हो रहा है एक विशेष पर्व आकर के वहां पर उपस्थित हुआ है ठाकुर श्री श्री जगदंबा के पूजा करि बार मान से आज विशेष आयोजन कोरिया छन ठाकुर श्री श्री जगदंबा की पूजा करने के लिए आज विशेष आयोजन कर रहे हैं ई आयोजन किंतु मंदिरे ना होईया तहर इच्छानुसार गुप्त भावे तहर गृहे होया छ यह आयोजन मां की पूजा का यह आयोजन ठाकुर की इच्छा से ठाकुर के कमरे में ही गुप्त भाव है सीक्रेट हो रहा है मंदिर में सबके सामने नहीं किंतु ठाकुर के ही कमरे में सबके अजान किसी को पता नहीं है कि इस दिन रात को कितनी महत्त्वपूर्ण घटना कितनी महत्त्वपूर्ण महत्त्वपूर्ण पूजा होने वाली है पूजा काले देवी के बसते दीवार जन्नो आलिम पन भूषित एक खानी पीठ पूज केर आसने दक्षिणे पार्श्व स्थापित होया छ पूजा के समय देवी को जहां पर आसित कराते हैं देवी को जहां पर विराजमान कराते हैं इस तरह की एक शक्ति पीठ एक पीठ या तो फिर एक बैठने का आसन ठाकुर के ही पास में वह स्थापित हुआ है सूरज अस्त गमन करीलो क्रम तिमिरा व गुंठे अमावस्या निशी स मागता होलो सूर्य अस्त गमन करी लो सूर्य धीरे-धीरे करके अस्त हुआ क्रम तिमि राव अवगुण ने अमावस्या निशि समा समाग लो धीरे धीरे करके गाढ़ रात्रि का प्रारंभ हुआ ठाकुरर भागने हृदय के अद्य रात्रि काले मंदिरे देवीर विशेष पूजा करते ईवे ठाकुर के भतीजे हृदय को आज रात देवी की विशेष पूजा करनी होगी सतन ठाकुरर पुजार आयोजन जथा साधे सहायता कोरिया से मंदिरे चालिया जायलो एवं राधा गोविंदे रात्रि काले शेवा पूजा समापन दिनु पूजारी आशिया ठाकुर के ई विषय सहायता कोरीते लागलो शरत महाराज के सेंटेंस इतने लंबे लंबे तो पहले तो हमको पता है कि ठाकुर हृदय ठाकुर का भागने था वो नेफ्यू था और फिर वह काली मंदिर में वह पूजा भी किया करता था तो ठाकुर को पूजा के समय जो आयोजन के लिए जो कुछ भी सहाय चाहिए जो कोई भी हेल्प चाहिए वह हृदय ने की शरू शू में किंतु मंदिर में पूजा भी तो उसको करनी है तो इसके लिए ठाकुर को थोड़ी बहुत मदद करके वह चला गया और उसके बाद में दीनू बोलकर के एक पुजारी वहां पर रहता था जिसका काम था राधा गोविंद की पूजा करना आप दक्षिणेश्वर मंदिर में गए होंगे आपने देखा होगा कि पहले तो मां काली का मंदिर है पास में ही राधा गोविंद का मंदिर है तो राधा गोविंद के मंदिर की पूजा यह दन किया करता था तो पहले राधा मंदिर राधा गोविंद के मंदिर की पूजा कर दी फिर वह आकर के ठाकुर को अपनी पूजा की सहायता करने लगा देबीर रहस्य पजार सकोल आयोजन संपूर्ण होते रात्रि नोटा बाजिया गेलो देवी के पूजा का आयोजन समाप्त करते-करते रात के 9 बज गए हैं श्रीमती माता माता ठाकुरानी के पूजा काले उपस्थित था कीते ठाकुर इत पूर्वे बोलिया पाठया लेन ठाकुर ने पहले ही मां को आह्वान किया था कि आज रात को पूजा है और उनको उपस्थित रहना तीनी ओई गृहे एकन आशिया उपस्थित होई लेन तो ठाकुर ने पुकारा था तो मां भी आकर के समय के अनुसार आकर के उपस्थित हुई ठाकुर पूजा बोशी लन ठाकुर पूजा के लिए बैठे पूजा द्रव्य सकोल संशोधित होया पूर्व कृत्य संपादित होलो पूजा का जो द्रव्य है वह सब संपादित होकर के पूजा का पूर्वक समाप्त हुआ जो पूजा करते हैं उनको पता है कि जो पूजा के उपकरण है उनको तो पहले पवित्र करना पड़ता है मंत्रोच्चारण के द्वारा और फिर जब देवी की प्रतिमा देवी की जब पूजा करते हैं उसके पहले की कुछ कुछ विधियां होती है तो पूजा द्रव्य की पवित्रता समाप्त हुई और फिर पूर्व पूजा के जो पूर्व अंग थे जो विधियां थी वह भी समाप्त हुई ठाकुर एई बार आलिम पन भूषित पीठे श्री श्री मा के उपदेश जनन इंगी तो करले ठाकुर ने अभी मां को इशारा किया कि आप देवी के आसन पर विराजित होइए पूजा दर्शन कोरीते कोरीते श्रीमती माता ठाकुरानी इत पूर्वे अर्ध बाच दशा प्राप्त होया छले पूजा का दर्शन करते करते श्री श्री माता ठाकुरानी अभी तक इस से पहले ही अर्ध बाह्य दशा प्राप्त हुए थे देखिए जो शब्द प्रयोग यहां पे है अर्ध बाह्य दशा अर्थात कि उनका मन ऑलरेडी समाधि के उच्च स्तरों पर उच्च शिखर पर विराजित हो रहा था बाहर क्या चल रहा है थोड़ा बहुत उनको पता चलता था जैसे हम लोगों का होता है हम लोग फुल्ली कॉन्शियस होते हैं कि बाहर के जगत में क्या हो रहा है हमारा मन बा बहिर की ओर ही वो ज्यादा चलता है किंतु मां जब पूजा दर्शन कर रही थी तो ऐसा एक जो एक आध्यात्मिक भाव जो ईश्वरीय भाव उनके भीतर में आवेश हुआ मां का भर हुआ ऐसा हम कह सकते हैं और ऑलरेडी उनका मन आधा तो समाधि में प्रवेश कर चुका था आधा ही मन बाहर में क्या हो रहा है उसके ऊपर में था तो ऐसी अर्ध बाह्य दशा में माने जाकर के इस पूजा के आसन पर देवी के आसन पर समारू हुई आरूढ़ हुई मंत्र मुधार न्याय यह भी एक महाराज ने लिखा है देखिए कि जनरली हमको पता है हमने पहले भी जब मां के जीवन की हम चर्चा कर रहे थे मां सब समय सोचती थी कि मानवत्वम उसमें से कौन सा प्रकाश ज्यादा किया जाए अभी मानवत्वम जब वोह मानव के रूप में वह पृथ्वी पर रह रही है तब कहीं जाकर के उनको कहा जाए कि अच्छा आप देवी के आसन पर विराजित हुई है तो वह संकोच होगी वह सोचेगी कि अरे मैं मनुष्य हूं मैं तो मानवी हूं देवी के आसन पर विराज करने का मुझे अधिकार क्या है किंतु वह तो मानव के रूप में जब है तब भीतर में से जब ईश्वरीय भाव प्रकट होता है तब ऑटोमेटिक वह जाकर के देवी के आसन पर आरूढ़ हो सकती है किंतु इसी के लिए इसीलिए मंत्र मुग्ध शब्द महाराज ने यूज किया है देवी के भाव में इस तरह से चली गई है कि अभी वह मानवी है मानवी का आधा स्वरूप है वह संपूर्ण रूप से विस्मृत हो गई है ठाकुर का ऐसा है ना वह सुंदर एक घटना है कि कहां पर वह जो गौरांग महाप्रभु के वह जहां पर बहुत सारे स्थल जहां पर उनके नाम का कीर्तन वगैरह होता है ऐसे सब जगह कोलकात्ता में हो है तो वहां पर क्या होता है गौरांग महाप्रभु का एक आसन रखा जाता है जहां जिसके सामने बैठ कर के फिर यह लोग पाठ भजन कीर्तन वगैरह करते हैं जो कि उनके शिष्य है जो कि उनके डिवोटा है तो अभी इस तरह से एक सभा में ठाकुर को ले उनको पुकारा गया और वहां पर जाने के बाद में क्या हुआ ठाकुर को भावा वेश हुआ और जाकर के गौरांग के आसन पर वोह सब बैठ गए तो यह देख कर के किंतु देखिए कि जितने भक्त वहां पर उपस्थित है उनको लग रहा है कि अरे ठाकुर के भीतर में ये तो देखिए कि गौरांग महाप्रभु का आविर्भाव हुआ है उनका उनके ऊपर में उनका भर हुआ है तो वे लोग तो बड़े ही भक्ति गदगद हो गए किंतु यह बात जब दूसरे वैष्णव आचार्यों को पता चली तो कुछ-कुछ थोड़े से नाराज हो गए थे कि अरे ये ठाकुर होते कौन है कितने ही बड़े साधक हो एक गौरांग की पीठ पर बैठने का अधिकार उनको किसने दिया है तो इस तरह से एक थे आचार्य भगवान दास बाबाजी आई थिंक यदि मुझे नाम ठीक से याद है तो वो सबसे ज्यादा ठाकुर का क्रिटिसिजम किया करते थे वह सबसे ज्यादा उस समय लोगों में प्रख्यात थे तो ठाकुर उनको भी मिलने को गए थे और वह खुद ठाकुर से इतने प्रभावित हो गए कि फिर उन्होंने भी स्वीकार किया कि ठाकुर उस आसन पर बैठने के लिए अधिकृत है तो यहां पर भी मां जैसे-जैसे ईश्वरीय भाव में प्रवेश करती गई वैसे ही मंत्र मुग्ध होकर के अर्थात कि जैसे कि वह अपना सही स्वरूप क्या है वह प्रकाशित करके प्रगट करके देवी के आसन पर जाकर के विराजित हुई सन्मुख हस्त कलो शेर मंत्र पूत बारी द्वारा ठाकुर बारंबार श्री श्री मां के जथा विधा ने अभिषिकता कोरी लेन जब मां देवी के आसन पर आसित हुई तब ठाकुर ने मंत्र से पवित्र जल से बारंबार मां को अभिषिक्त किया अन मंत्र श्रवण कराया तीनी एकन प्रार्थना मंत्र उच्चारण करी लेन अनंतर सतत मंत्रोचार और विधि चलने लगी और फिर उन्होंने प्रार्थना मंत्र से देवी का उन्होंने प्रार्थना की देवी का उन्होंने स्वागत किया ठाकुर क्या कहते हैं हे बाले हे सर्वशक्ति अधि री मात त्रिपुर सुंदरी सिद्धि द्वार उन्मुक्त करो अर्थात की सिद्धि द्वार को उन्मुक्त करो इ हार शरीर मन के पवित्र करिया इ हार अर्थात की श्री श्री मां के शरीर और मन को पवित्र करके इ हाते आबीर भूता होया सर्व कल्याण साधन करो मां के शरीर और मन को पवित्र करो और मां के भीतर में आविर्भव हो और सबका कल्याण साधित करो पृथ्वी पर आओ और पृथ्वी के जितने भी जनवाश है जनसाधारण है उनके त्रता आप भर लो सबके मन को शांति प्रदान करो इनकी आध्यात्मिक उन्नति के रास्ते में जो बाधाएं विपत्तियां है इसको दूर करो अतः पर श्री श्री मार अंगे मंत्र सकले जथा विधान न्यास पूर्वक ठाकुर साक्षात देवी ज्ञाने तहा के सोड़ शोप चारे पूजा करी ले इसके बाद में श्री श्री मां के अंग में य मंत्र के द्वारा न्यास जो किया जाता है जो पूजा जानते हैं उनको पता है कि न्यास विधि होती है तो श्री श्री मां के प्रत्येक अंग को एक एक न्यास करके वह विधि की जाती है तो इस विधि के बाद में ठाकुर साक्षात देवी ज्ञान है मां साक्षात देवी मां काली स्वयं है मां जगदंबा स्वयं है इस तरह से यह स्वीकार के उनको छोड़ो शो पचार से मां की पूजा की एवं भोग निवेदन करिया निवेदिता वस्तु सु कोलेर किय द अंश स्व हस्ते तहर मुखे प्रदान करी ले देवी को भोग प्रदान किया भोग ऑफर किया और भोग के जितने भी द्रव्य थे जितने भी चीजें थी वो सब अपने खुद के हाथ से देवी के मुंह में में थोड़ा-थोड़ा सा उन्होंने अर्पित किया बाह्य ज्ञान तिरोहित होया श्री श्री मां समाधि स्था होलेन इस तरह से जब पूजा हुई तो मां पहले तो अर्ध बाह्य दशा में थी ज्यादातर मन समाधि में था किंतु थोड़ा सा मन इस जगत की ओर था किंतु जिस तरह से पूजा चलने लगी मां संपूर्ण रूप से समाधि स्ता हो गई बाह्य ज्ञान शून्य हो गई संपूर्ण रूप से ठाकुरो अर्ध बाह्य दशा मंत्र उच्चारण करते करते संपूर्ण समाधि मग्न होई लेन पहले तो ठाकुर अर्ध बाह्य दशा में थे ज्यादातर समाधि में थे किंतु बाह्य ज्ञान थोड़ा सा था क्योंकि पूजा करनी थी विधि करनी थी मंत्रों का उच्चारण करना था तो अर्ध बाह्य दशा में उन्होंने मंत्रोच्चारण तो किया किंतु जैसे ही मंत्रोच्चार विधि पूजा समाप्त हुई वे भी संपूर्ण रूप से समाधि में मग्न हो गए समाधि तो पूजक समाधि स्था देवीर सहीत आत्म स्वरूपे पूर्ण भावे मिलतो व एकी भूतो होई लेन समाधि स्त पूजक समाधि स्था देवी के साथ में आत्म स्वरूप में पूर्ण भावे मिलित हुए और एकी भूत हो गए यह साधन जीवन की साधना की साधन साहित्य की सर्वोच्च एक रचना इस एक वाक्य में शरत महाराज ने कही है कि साधक जब ठीक ठीक साधना करता है तो जिस साध्य देवी है या तो साध्य ईश्वरी है उसके साथ में वह आत्म रूप से मिलित होता है और यही आत्म रूप मिलन के पीछे ही समग्र जगत दौड़ता रहता है हमको यह पता नहीं चलता कि हमको आत्म रूप से देवी के साथ में मिलित होना है हम जब बाह्य बुद्धि से यह देह ज्ञान से मटेरियल दृष्टि से जगत को देखते हैं तो यह आत्म स्वरूप का जो मिलन है उसी को हम यह बाह्य सुख उपभोग में परिणत करते हैं हम सोचते हैं कि मैं यह सब चीजों का भोग करूंगा यह सब चीजों में प्राप्त करूंगा तो उससे मुझे वो सर्वोच्च सुख है वह प्राप्त होगा अभी उसको पता नहीं है सर्वोच्च सुख क्या है हमारे डीएनए में है क्योंकि हमको पता है कि स्वामी जी का कॉस्मो मैक्रो कजम और माइक्रो कजम यह प्रवचन हमने देखा है कुछ ही समय पहले हमको पता है कि हमारा डीएनए ईश्वरीय डीएनए है ईश्वर ही इवॉल्व होकर के इस जगत ब्रह्मांड के बीज के स्वरूप में आते हैं और फिर इसी ईश्वरीय बीज से पूरा कॉस्मो पूरा विश्व ब्रह्मांड प्रकट होता है इवोल्व होता है तो हमारे डीएनए में ही ईश्वर है आज हमको शायद पता नहीं कि हमारी सही सत्ता ईश्वरीय सत्ता है तो इस ईश्वरीय सत्ता को भूल कर के हम यह मटेरियल जम में डूबे हुए इंद्रिय सुख के गुलाम होकर के बैठे हुए हैं और वही दिव्य सुख प्राप्त करने की चेष्टा हम यह सब बाह्य सुग में पदार्थों के सुख में कर रहे हैं किंतु यदि सही सही दिव्य ज्ञान हमको प्राप्त हो सही सही साधना करें सही सही आध्यात्मिक जीवन क्या है यह हम समझे तो यह परिस्थिति में हम भी आएंगे कि साधक समाधि स्थ होकर के देवी के साथ में आत्म रूप से मिलित होता है आध्यात्मिक जीवन की जो सर्वोच्च अवस्था उसको हम इस तरह से प्राप्त करेंगे कतो खण काटिया गेलो कितना समय हो गया किसी को कुछ पता नहीं निशर द्वितीय प्रहर बहु खण अतीत होइलो रात का द्वितीय प्रहर दूसरा प्रहर अतीत होने लगा आत्माराम ठाकुरर ई बाहर बाह्य सजार किछु किछु लक्षण देखा गलो आत्माराम ठाकुर के बाह्य ज्ञान का कुछ कुछ लक्षण देखा गया संपूर्ण समाधि में थे तो समाधि में से नीचे आए बाह्य जगत की ओर उनकी इंद्रियां थोड़ी सी वो फिरत वापस आई और बाह्य जगत में क्या हो रहा है वह थोड़ा उनको ज्ञान होने लगा पूर्वे न्याय अर्ध बाह्य दशा प्राप्त होया तीनी एक खन देवी के आत्म निवेदन करी लेन पहले की तरह अर्ध बाह्य दशा को प्राप्त होकर के अभी उन्होंने देवी को आत्म निवेदन किया अपना अहंकार अपनी साधना अपने कर्म अपना पुण्य सब कुछ उन्होंने देवी के श्री चरण को उन्होंने ऑफर कर दिया अन अपनार सहीत अपनार सहित साधना फल एवं जपर माला प्रवृति सर्वस्व श्री श्री देवी पादो पद्य चिरो कालेर निमित्त विसर्जन पूर्वक मंत्र उच्चारण करते करते तहा के प्रणाम कोरी लेन अभी तक उन्होंने अपने जीवन में जितनी सा साधना की थी साधना से जो सिद्धियां प्राप्त की थी जो अनुभूतियां प्राप्त की थी और उसके साथ-साथ में अपनी जपमाला स्वयं उन्होंने देवी के श्री चरणों को अर्पण की चीर कालेर निमित्त विसर्जन पूर्वक हमेशा के लिए विसर्जित की और मंत्र उच्चारण करते-करते देवी को प्रणाम किया हे सर्व मंगले मंगल स्वरूपे हे सर्व कर्म शरण दयनी त्रिनयनी श्रीव शिव गहिनीनाथ प्रणाम तुम्हा के प्रणाम करी तुमको प्रणाम करता हूं तुमको प्रणाम करता हूं सर्व मंगलम सर्वमंगलम मांगल्य जो कि हमारे राम कृष्ण सघ में प्रतिदिन आरती के समय जो मंत्र का पाठ होता है जो आरती गाई जाती है वही आरती वही प्रार्थना ठाकुर ने मां को की और अपना सब कुछ उन्होंने मां को समर्पित किया विसर्जित किया तो यह सुंदर घटना का इस तरह से शरत महाराज ने आलेखन किया है इस घटना को लेकर के हम बहुत सारा चिंतन कर सकते हैं वेदांत की दृष्टि से देख सकते हैं रामकृष्ण संघ की दृष्टि से स्वामी जी की दृष्टि से ठाकुर की दृष्टि से मां की दृष्टि से इसको देख सकते हैं जितना जितना हम यह जो भिन्न तरह की किताबों का पाठ करते हैं मैं इसीलिए किताबें बीच-बीच में चेंज करता हूं डिफरेंट डिफरेंट तरह की बातें हम करते हैं कभी हम स्वामी जी का कॉस्मो और ज्ञान योग देखते हैं कभी हम ठाकुर का लीला प्रसंग का पाठ करते हैं कभी मां के जीवन का कभी कथामृत का तो कभी और कोई लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा तो अभी स्टार्ट नहीं किया किंतु पहले ज रूपे देख्या छ श्री राम कृष्ण को हमने जिस तरह से देखा वो एक सीरीज हमारा चला था तो यह विभिन्न स्वरूपों से ठाकुर महा स्वामी जी का जीवन आलेख हुआ है और जैसे-जैसे हम विभिन्न दृष्टि से ठाकुर माहा स्वामी जी को देखते जाएंगे वैसे ही हमारे भीतर के कनेक्शन बैठते जाएंगे अभी जैसे इसका पाठ करते करते हम वो स्वामी जी का ज्ञान योग लेकर आए गंभीरानंद जी ने मां के बारे में जो लिखा है वोह इसका कनेक्शन यहां के साथ में हम बिठा रहे हैं तो हमारे जितनी भी किताबें हैं हमारे जितने ग्रंथ है वो सब एक दूसरे के साथ में मिलित है जितना जितना हम इन ग्रंथों का पाठ करते हैं इतना ही यह सभी चीजों के भीतर में हमको इंटरकनेक्शन मिलता है और इसीलिए यह जो मैं किताबें चेंज करता हूं ग्रंथ चेंज करता हूं इसीलिए कि हम यह सब इंटरकनेक्शन बिठा पाए तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शा हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु