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निःसंग भ्रमण या श्रीरामकृष्ण सभा की स्थापना 23 Feb 2024

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ओ स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय नम तो स्वामी जी का पत्र उसके बारे में हम चर्चा कर रहे थे स्वामी जी कल हमको बता रहे थे कि किस तरह से ठाकुर के जीवन के बारे में कल हमने थोड़ी सी चर्चा की कि किस तरह से स्वामी जी चाहते थे कि ठाकुर का जीवन रचित हो हम जितने भी महापुरुष अवतार इतिहास में आ गए हैं उनका जीवन और ठाकुर का जीवन कंपेयर करें तो हमको लगता है मुझे पर्सनली जिस तरह से मैं एनालाइज करता हूं कि भगवान बुद्ध का जीवन चरित्र जिस तरह से रचित हुआ है कि साधना और साधक जीवन के ऊपर में सबसे ज्यादा भार दिया गया है जीवन की रचना करने में वैसा ही भगवान श्री राम कृष्ण देव का जीवन लीला प्रसंग में देखेंगे कि साधना साधक और साध्य इन तीन टॉपिक के ऊपर में यह जीवन रचित है जबकि दूसरे अवतार का जीवन देखेंगे जैसे कि भगवान राम भगवान कृष्णा या तो फिर जीसस तो फिर देखेंगे कि चमत्कार है या तो फिर सिविलाइजेशनल जो इश्यूज है प्रॉब्लम्स है उसके पर में जो डिस्कशन है वह ज्यादा है नो डाउट आप जद भगवान राम या कृष्ण दोनों के जीवन में देखेंगे कि भगवत गीता जैसे अध्याय तो बहुत सारे हैं जिसमें कि साधकों के लिए बहुत ही इंपॉर्टेंट बातें की गई है किंतु जिस तरह से अवतार का खुद का जीवन हमारे सामने रिप्रेजेंट किया गया है वहां पर देखेंगे कि साधना जिसको कहते हैं उसके मतलब अ भगवान राम या भगवान कृष्ण ने जो साधना की ट्रेडिशनल रूप से जो कि स्टार्टिंग में होती है जीवन के प्रारंभ में उसके बारे में ज्यादा विवरण नहीं देकर के उनको पूर्ण पुरुषोत्तम के रूप में ही सीधा प्रेजेंट किया गया है नो डाउट उनका जीवन तपस्या मय धर्म के ऊपर में आधारित था यहां पर जो मुझे लग रहा है कि यदि दो शब्द मुझे चाहिए तो एक है धर्म दूसरा है साधना राम और कृष्ण यह दोनों हमको धर्म बताते हैं जबकि बुद्ध और भगवान राम कृष्ण यह हमको साधना बताते हैं यह डिफरेंस लगता है वैसे बड़ा ही माइनोट और वैसे नहीं भी हो सकता है सभी लोगों का जैसे मैंने कहा कि सभी का अपना-अपना एक तरीका होता है कि आप किस तरह से किसी भी चीज को एनालाइज करते हैं तो मुझे जो एनालिसिस करके लगता है कि धर्म अर्थात कि आपके जीवन को एक आदर्श जीवन किस तरह से परिणत करें अर्थात कि इस जगत में जितनी भी आपकी ड्यूटीज है जितनी भी सिचुएशन से जितने भी आपके सामने एक ये खड़ा होता है प्रॉब्लम्स खड़े होते हैं उसका क्या सोल्यूशन होना चाहिए यह हमको धर्म बताता है जैसे कि एक राज धर्म है राजा को किस तरह से राज्य करना चाहिए एक है सती धर्म स्त्री को अपना जीवन गृहस्थाश्रम किस तरह से उसको रहना चाहिए एक है विद्यार्थी धर्म एक है पति धर्म अने जितने भी क्षत्रिय धर्म है वैश्य धर्म है यह ब्राह्मण धर्म है सभी जो लोग जहां पर है उनको जिस तरह से ड्यूटीज जिस तरह से लाइफ लीड करना है वह है धर्म किंतु साधना क्या है साधना है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए पर्टिकुलर हमको क्या करना है वो हो गई साधना अभी आप कहेंगे कि साधना और धर्म में फर्क क्या है अल्टीमेटली धर्म तो वही है जो कि साधना हमको अर्थात धर्म तो हमको ईश्वर की ओर ही ले जाता है जिस तरह से साधना हमको ईश्वर की ओर ले जाती है वैसे ही तो धर्म भी ईश्वर की ओर ले जाता है शब्दों का ही तो फर्क है शब्दों के फर्क के अलावा और क्या फर्क है किंतु मुझे जो पर्सनली लगता है अगेन यह मेरा खुद का जो जो एनालिसिस है साधना इज अ पार्टिकुलर ब्रांच ऑफ धर्म व्हिच डायरेक्टली लीड्स यू टू ईश्वर प्राप्ति अर्थात कि मान लीजिए कि इवन कर्म योग है कर्मयोग और धर्म यह दोनों में मुझे जो डिफरेंस लग रहा है जैसे राजा है वह जिस तरह से राज्य धर्म निभाता है उसका ऑब्जेक्टिव क्या है राज्य धर्म का ऑब्जेक्टिव है प्रजा को सुशासन देना एक विद्यार्थी धर्म है या तो फिर ब्रह्मचारी धर्म है वह धर्म क्या है कि विद्या उसका ऑब्जेक्टिव क्या है ऑब्जेक्टिव है कि विद्याभ्यासम विद्या अर्जन करना एक गुरु का जो धर्म होता है वह क्या होता है उसका ऑब्जेक्टिव क्या होता है कि अपने शिष्य को जितना अच्छे से वह सिखा पाए उसने जीवन भर परिश्रम करके जो ज्ञान अर्जन किया है वह अपने शिष्य को दे पाए वह एक गुरु का धर्म है एक सैनिक का धर्म क्या है देश की सीमाओं की रक्षा करना उसका ऑब्जेक्टिव वही है कि दुश्मन अपने देश के भीतर में चले ना आए तो वो जो धर्म होता है उसका एक एक ऑब्जेक्टिव होता है साधना का डायरेक्ट ऑब्जेक्टिव है ईश्वर प्राप्ति अब आप कह सकेंगे कि राजा यदि अपनी प्रजा का अच्छे से पालन करता है तो वह अच्छे से लालन पालन करके भी तो वो ईश्वर को प्राप्त होगा होगा ऐसा नहीं है कि नहीं होगा हो सकता है किंतु यह एक इनडायरेक्ट वे हो गया देखने का जबकि साधना में एम एंड ऑब्जेक्टिव बड़ा ही क्लियर है बड़ा ही प्रेजेंट एंड बड़ा ही स्पष्ट है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए मुझे जो कुछ भी है वह सब कुछ करना है यदि मैं राजा हूं और मैं कर्मयोग कर रहा हूं तो मैं अपनी प्रजा के भीतर में ईश्वर को देखूंगा और उनकी सेवा करूंगा यदि गुरु कर्मयोग करता है तो गुरु अपने शिष्य के भीतर में भगवान शिव को देखेंगे भगवान शिव को शिक्षा दे रहे हैं केड़ी दे रहे हैं इस तरह से वह अपने शिष्य को सिखाएंगे धर्म और साधना धर्म है कि मुझे अपना लाइफ नि संयमित करना है अपना लाइफ नियमन अपने जीवन का नियमन करना है जबकि साधना है कि मुझे अपने सामने ईश्वर को देखना है जो जो कुछ मैं करूं जो जिसके साथ में मेरा इंटरेक्शन हो इन सबके भीतर में मुझे ईश्वर को देख कर के मुझे इनकी आराधना करनी है शिव ज्ञाने जीव सेवा यानी कि साधना के जितने भी रास्ते हैं या तो फिर ये ज्ञान योग या तो भक्ति योग या तो राज योग और इवेंचर योग तो इन सबके भीतर में आपका डायरेक्टिव आपका डायरेक्शन आपका ऑब्जेक्टिव बड़ा ही क्लियर है ईश्वर प्राप्ति ईश्वर प्राप्ति के लिए जो करना है वह है साधना जबकि धर्म अर्थात आप जिस जगह पर खड़े हैं आपका जो ड्यूटी है संसार में आपका जो स्थान है उस स्थान की गरिमा बढ़ाने के लिए उस स्थान को ठीक ठीक वह जो आपको ड्यूटी दी गई है उसको ठीक-ठीक निभाने के लिए जो आप करेंगे व धर्म हो गया इवेंचर कि सही सही धर्म का पालन करेंगे तो हम ईश्वर की ओर ही जाएंगे इसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु फिर भी बिकॉज कि हमको एनालिसिस करना थोड़ा सा अच्छा लगता है इसलिए मैंने इस तरह से सोचा कि साधना और धर्म इन दोनों में क्या डिफरेंस हो सकता है अभी देखिए कि इस दृष्टिकोण से हम भगवान बुद्ध और श्री राम कृष्ण देव का जीवन देखें तो साधना पर इन्होंने सर्वोपरि भार दिया है सर्वोपरि इसकी महत्व इसकी महत्व का इसका क्या महत्व है इसकी क्या महत्ता है इसका गुणगान इन्होंने किया है जब कि भगवान राम भगवान कृष्ण और जीसस इन तीनों का जीवन देखें तो धर्म क्या होना चाहिए इसके ऊपर में इन्होंने कहा है जैसे कि भगवान कृष्ण अर्जुन को कहते हैं तुम युद्ध के मैदान में खड़े हो तो तुम्हारा धर्म यही है कि युद्ध करना बाद में भले चाहे तुमको स्वर्ग प्राप्ति हो जैसे कि आखिरी प्रकरण में हम देखते हैं कि पांचों पांडव और द्रौपदी स्वर्गारोहण करते हैं तो स्वर्ग की प्राप्ति बाद में भले ही हो अभी धर्म है युद्ध करना तो ज हम जिस परिस्थिति में जहां पर होते हैं वहां पर अपना धर्म क्या है वह एक है और अल्टीमेटली साधना अर्थात की जीवन का अल्टीमेट एम अल्टीमेट ऑब्जेक्टिव वो जो ईश्वर प्राप्ति है उसको अपनी नजर के सामने रखना यानी कि धना के ऊपर साधना मय जीवन और धर्म मय जीवन यदि और एक मैं इस मेरे इस एनालिसिस को थोड़ा सा आगे बढ़ाऊ तो एक अपने इतिहास में एक सुंदर एक उदाहरण यदि मुझे दिखता है य भगवान शंकराचार्य का मुंडन मिश्र के साथ में जो डिस्कशन हुआ था तो मंडन मिश्र था वह एक वैदिक परंपरा को लेकर के रह रहे थे वैदिक परम परंपरा क्या है कि धर्म के आधार पर आपको अपना जीवन बिताना है जबकि शंकराचार्य का था सब कुछ त्याग करके निर्विकल्प समाधि में आपको डूब जाए ये तो एक वेदांतिका में हालांकि शंकराचार्य के डिसाइल ने जो लिखा है उसके अनुसार शंकराचार्य को विजेता दिखाया है और बाद में मंडन मिश्र ने भी संन्यास धर्म अंगीकार किया था किंतु दिस इज अ गुड एग्जांपल ऑफ व्हाट आई एम ट्राइट इलस्ट्रेट हियर जो मैं यहां पर दिखाना चाहता हूं इसका एक उदाहरण इस तरह से है कि शंकराचार्य का जीवन देखिए कि संपूर्ण साधना मय था जबकि मंडन मिश्र का जो जीवन था वह धर्म के ऊपर में आधारित था धर्म आपको बहुत सारी बातें बताता है इसको आपको फॉलो करना है जबकि साधना में एक क्लियर सिंपल डायरेक्टिव होता है जिसको कि आपको ईश्वर की ओर ले जाता है अभी हमको प्रश्न होगा कि जद ये मंडन मिश्र और शंकराचार्य के एग्जांपल को नजर के सामने रखें और साथ में ही भगवान बुद्ध और भगवान राम कृष्ण जीवन को भी रखे तो हमको तो ऐसा लगता है कि ये तीनों तो सन्यासी थे भगवान राम कृष्ण वैसे उन्होंने संन्यास ग्रहण किया था किंतु फिर बाद में तो संन्यास के भी वो परमहंस हो गए थे तो उस उस सिस्टम के भी तो वह परे चले गए थे किंतु ट्रेडिशनल स्पीकिंग उन्होंने सन्यास तो ग्रहण किया ही था तो तीनों तो सन्यासी बुद्ध शंकराचार्य और श्री राम कृष्णा तो क्या साधन भजन करने के लिए या तो फिर प्रॉपर साधना करने के लिए क्या हमको सन्यास लेने की आवश्यकता है क्योंकि आप भगवान राम भगवान कृष्ण और जीसस तीनों को देखिए हालांकि जीसस को आप ट्रेडिशनल रूप में गृहस्थ नहीं कह पाएंगे किंतु फिर फिर भी उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा कि त्याग ही सब कुछ है तो जिस तरह से राम और कृष्ण दोनों जिस तरह से गृहस्थाश्रम के भीतर में थे राजा थे राज्य धर्म का उन्होंने पालन किया था तो हम ऐसा क्या कह सकते हैं कि साधना सिर्फ सन्यास त्यागी लोगों के लिए है और धर्म गृहस्थ के लिए है मुझे लगता है कि इस तरह का डिवीजन करना उचित नहीं होगा क्योंकि बुद्ध और राम ठाकुर के ही जीवन में देखिए कि कितने सारे गृहस्थ भक्त थे जिन्होंने साधना भी की थी मास्टर महाशय है गौरी मां है गोलाप मां है फिर यह योगेन मां है फिर यह नाग महाशय है बलराम बसु है तो फिर उनके गृहस्थ शिष्य भी इवन रामचंद्र दत्त है जिन्होंने साधना तो की है तो ये साधना और धर्म यह जो हम एक एनालिसिस करते हैं इस एनालिसिस को हम गृहस्था आश्रम और सन्यास आश्रम के भीतर में डिवाइड नहीं करेंगे आप गृहस्थ होकर के भी साधना तो कर ही सकते हैं साधन साधना मय जीवन को अपना भी सकते हैं तो यह एक हो गया मेरा एक एनालिसिस तो कल हमने देखा कि किस तरह से स्वामी जी ने ठाकुर के जीवन के बारे में मास्ट शरत महाराज को बताया था कि इस तरह से इस तरह से ठाकुर का जीवन रचित होना चाए तो ठाकुर का जीवन रचित होगा साधना के माध्यम से साधना को मूल बना कर के साधना के फाउंडेशन पर नहीं कि धर्म के आधार पर धर्म इज पार्ट विदन पार्ट ऑफ साधना अभी थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं किछु कलेक्शन नेबे ताते दुई एक हजार टाका होते पार बे ता होले मां ठाकुरानीर जमीर ऊपर दस्तूर म तो घर द्वार होए जावे इति अभी कुछ दिनों पहले हमने देखा था कि अच्छा स्वामी जी क्या कहते हैं थोड़ा सा चंदा कलेक्ट करना थोड़ा सा पैसा कलेक्ट करना इससे क्या होगा कि मां के लिए हम जो जमीन खरीदेंगे इसके ऊपर में मकान का निर्माण भवन का निर्माण हो जाएगा अभी मैंने कुछ दिनों पहले इस तरह से डिस्कस किया था कि ठाकुर और स्वामी जी दोनों को चंदे के वैसे वैसे अच्छे नहीं लगते थे दोनों इस तरह से चाहते थे कि कोई धनी निष्ठावान कोई एक उनका भक्त हो जो कि पूरा खर्चा जो है वो दे किंतु सही सही में देखे तो क्या होगा पता है कि पूरा खर्चा तो कोई एक धनी नहीं दे सकता इवन ठाकुर के भी जो रसदार थे पहले मथुर बाबू थे उसके बाद में ये जो जदू मल्लिक था इसके बाद में जिस तरह से यह बलराम बसु थे तो कोई एक रसदार से भी काम नहीं होता बहुत सारे रसदार चाहिए तो हम इस तरह से कह सकते हैं कि कोई अपनी निष्ठा से अपनी इच्छा से यदि पैसा देता है तो उनको एक तरह का रसदार ही कहा जाएगा उनको एक तरह का इस तरह का भक्त कहा जाएगा कि अपनी निष्ठा से वह पैसा देता है तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि इस तरह से थोड़ा सा पैसा इस उत्सव में कलेक्ट करना जिससे कि मां के लिए जो मैंने जो ज जो स्वामी जी ने जो कहा था कि अप टू ₹ ₹ ज तक मैं दे सकता हूं और जिस तरह से स्वामी जी का एक लॉन्ग टर्म प्लानिंग था कि जमीन सबसे बड़ी पहले ले लेनी है उसके बाद उसके ऊपर में भवन निर्माण तो बाद में होता रहेगा जिससे कि क्या होगा पैसों का प्रॉपर यूटिलाइजेशन होगा क्योंकि यह मिशन तो अपना सालों साल तक चलने वाला है तो अपने लिए जितना जितना एक्सपेंशन होता रहे फ्यूचर में तो एक्सपेंशन करने के लिए नई नई प्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिए अपने पास में जमीन भी उपलब्ध हो स्वामी जी आगे लिखते हैं चौरस बुद्धि चाई तबे काज होए चौरस का लिटरल अर्थ है स्क्वेयर किंतु यहां पर हम करेंगे कि एक मैच्योर बुद्धि चाहिए तब काम होगा जे ग्रामे बा शहरे जाओ जेखाने द जन लोग परम देव के श्रद्धा भक्ति कोरे शेखाने एकटा सभा स्थापन करवे जिस गांव या शहर में जाओगे जहां पर 10 जन लोग इवन 10 लोग भी श्री राम कृष्ण देव को श्रद्धा भक्ति करते हुए मिलेंगे वहां पर भी वहां पर ही एक सभा का स्थापन कर देना एक सभा की स्थापना कर देना य तो ग्रामे ग्रामे की बेरेंड भाज लेना कीय ये जो तुम लोग गांव गांव घूमे तो भरें भाजा अर्थात की यह जो कैस्टर ऑयल है का तेल ये का तेल बनाया ना कि ऐसा स्वामी जी एक कटाक्ष करके कहते हैं ये कल हमने डिस्कस किया था कि स्वामी जी जब तमस देखते हैं कोई भी उत्तम गुरु जब तमस देखेगा तब वाणी का एक ऐसा प्रहार करेगा कि ये तमो नाश हो जाएगा तमस का विध्वंस हो जाएगा तो इसीलिए स्वामी जी कभी-कभी यह कटाक्ष मय भाषा यूज करते हैं यह प्रहार करके बात करते हैं यह आगे तो बहुत कुछ आने वाला है यह तो सिर्फ ट्रेलर है इसके बाद का जो दो तीन पैसेज के बाद में जो स्वामी जी प्रहार करना प्रारंभ करते हैं इससे हमको पता चलता है कि उत्तम गुरु के लक्षण क्या होने चाहिए तो स्वामी जी कहते हैं कि गांव-गांव घूम कर के तुमने क्या का तेल उका ना कि क्या अर्थात कि मैंने कुछ नहीं किया तुम लोगों ने इतने तुम गांव गांव घूमे स्वामी जी खुद को देखिए कि वह जिस तरह से पहली बार बराह नगर मठ छोड़ कर के अल्मोड़ा हिमालय की ओर चले थे तब उन्होंने उनके साथ में ये थे अखंडानंद जी य सुंदर स्टोरी है कि स्वामी अखंडानंद जी उस समय पूरा हिमालय वगैरह घूम रहे अखंडानंद जी थे सबसे पहले परिवन संघ जब ठाकुर की महासमाधि के बाद में वराह नगर मठ की स्थापना हुई तो मठ में से सबसे पहले निकल गए थे अखंडानंद जी हिमालय पूरा घूमे थे यहां तक कि तिबेट भी चले गए थे और फिर वहां से उनका प्लान था यह सेंट्रल एशिया वगैरह जगह पे जाकर के वहां की मुलाकात करने का वहां की यात्रा करने का और सेंट्रल एशिया आज देखिए कि अपना जो एक समय था ना कि भारतीय संस्कृति पूरे विश्व में फैल रही थी तो यह साउथ साथ ईस्ट एशिया ये यहां पर तिबेट चाइना यह थाईलैंड मलेशिया फिर यह सेंट्रल एशिया ताजिकिस्तान तुर्कमेनिस्तान वगैरह वगैरह कजाकिस्तान यह जो इतने सारे यहां पे अफगानिस्तान यहां पे ईरान ये ये जो पूरा एशिया में चारों ओर भारतीय संस्कृति का विस्तृत करण हो रहा था फिर पता नहीं हम लोग किस तरह के एक अंतर्मुखी जी ने आगे कहा था ना कि झूठ मूठ का वैराग्य कुछ भी काम करना है तो एक एक तमस को हम वैराग्य का मुखो पहना करके दिखा देंगे तो यह तमस हमारे भीतर में एक ऐसा प्रवेश हो गया कि हमारी यह सांस्कृतिक आदान प्रदान का पूरा रास्ता ही बंद हो गया आज हमको आश्चर्य होता है जद कोई कहेगा कि यह चलो यह इंडोनेशिया मलेशिया थाईलैंड म्यानमार यहां पे आपको चलो भारतीय संस्कृति के रूट्स दिख जाएंगे भगवान राम के यह रामायण के दृश्य वगैरह आपको शायद दिख जाएंगे किंतु यह सेंट्रल एशिया में भी क्या ऐसा था तो था यह जो बौद्ध भिक्खू थे इन्होंने यह जो सिल्क रूट था यह सिल्क रूट के माध्यम से पूरे सेंट्रल एशिया वेस्ट एशिया और ईस्ट एशिया में बुद्धिज्म का प्रचार किया था और इससे पहले भी अपनी वैदिक संस्कृति का प्रचार हुआ था बाद बाद में जब यह इस्लाम का आक्रमण हुआ इसकी वजह से यह अपनी भारतीय संस्कृति और यह बौद्धिक संस्कृति यह दोनों धीरे-धीरे होकर के लुप्त होने लगी एक्चुअली यह अपना टारगेट होना चाहिए यह अपना मिशन होना चाहिए कि जहां जहां पर भी ये प्राचीन भारतीय हिंदू और बौद्ध संस्कृति आं थी वहां पर जाकर के वहां पर फिर से उनको पुनः जागृत करने का प्रयास करें तो खैर अभी वो तो जो करेगा सो करेगा किंतु यह जो सेंट्रल एशिया यह अखंडानंद जी का जिस तरह से प्लान था कि तिबेट पूरा हिमालय घूम लिए तिबेट घूम लिए फिर यह सेंट्रल एशिया जाने का प्लान था तो उसमें क्या हुआ कि अभी क्या था कि ब्रिटिश गवर्नमेंट का राज था तो यह ब्रिटिश ऑफिसर यह ब्रिटिश रेसिडेंट यह लोग इनको क्या है कि इनको तो अपने एंपायर का एक्सपेंशन करना था भारत का जितना कंट्रक्शन हो रहा था उतना ही ब्रिटेन का एक्स एकशन हो रहा था हमने सांस्कृतिक वहां पर आदान प्रदान किया था यह तिबेट और सेंट्रल एशिया के साथ में ब्रिटिश गवर्नमेंट का था कि हम इनका शोषण करेंगे तो शोषण करने के लिए ब्रिटिश साम्राज्य का प्रसार करने के लिए उनको हमेशा एजेंट्स ये स्पाई कहते हैं यह सेबो टूर्स कहते हैं अर्थात कि जो अपने दुश्मन के देश में जाकर के भीतर से सेबो पेज करें जिससे कि भीतर से वे लोग कमजोर हो जाए और जब बाकी आक्रमण हो तो ठीक से अपनी रक्षा ना कर पाए तो ऐसे एजेंट उनको सब समय चाहिए थे तो इस तरह से स्पाई कम एजेंट जो कि वहां की सब खबर इकट्ठे करें और हो सके तो वहां पर जाकर के भीतर में आपस में इन लोगों का झगड़ा बना दे तो उन्होंने देखा कि यह एक अखंडानंद जी है यह एक साधु है हिंदू सन्यासी जो कि बड़े ही मुक्त रूप से पूरे तिबेट में यह घूम रहा है तो इनको ही क्यों नहीं हम अपना एक एजेंट बना दे अपना एक स्पाई बना दें तो जब अखंडानंद जी तिबेट से वापस आए और यह शिमला व कहां पे कहीं पे मैं एगजैक्टली भूल गया वहां पे जब वापस आए तो वहां का जो ब्रिटिश रेसिडेंट था उसने उनको कहा अखंडानंद जी को कि आप हमारे लिए एजेंट बन जाइए ब्रिटिश गवर्नमेंट के हम आपकी जितनी भी जर्नी से स्पंस करेंगे आप हमको वहां के भीतर की खबर दीजिएगा तो नेचुरली अखंडानंद जी तो यह बात सुनक के ही बड़े क्रोधित हो गए और तो स्पष्ट बोलने की उनकी तो जो हैबिट थी तो स्पष्ट इस ऑफिसर के मुंह पर कुछ ना कुछ बोल दिया तो यह लोग ब्रिटिश लोग नाराज हो गए और अखंडानंद जी को जेल में डाल दिया अभी अखंडानंद जी जेल में क्या करेंगे वो तो साधु है मुक्त होकर के वोह तो एक पंखी की तरह वो गगन में भ्रमण करने वाले उड़ने वाले मुक्त साधु जेल में डाल दिया बेचारे को तो उन्होंने क्या किया कि उपवास चालू कर दिया ब्रिटिश गवर्नमेंट के सामने प्रोटेस्ट करने के लिए और उन्होंने कहा कि मैं वराह नगर मठ वराह नगर में कलकाता में हमारा मठ है वहां पर मेरे गुरु भाई है उनको आप खबर दीजिए वो मेरे मुझे मदद करेंगे वकील की लॉयर की कोई भी व्यवस्था करेंगे तो मुझे लेटर लिखने के लिए आप मुझे कागज और कलम दीजिए तो ये लोग बोलेंगे कागज और कलम नहीं देंगे हम आपको क्यों लेटर लिखने देंगे ये वो ब्रिटिश लोग बोल रहे हैं तो अखंडानंद जी ने फिर उपवास आरंभ कर दिया तो उपवास करते-करते देखिए कि वहां पे वो जो पुलिस वाले थे वह जेलर था माने मेन जेलर के बाद में जो होता है उसकी जो बीवी थी व उसने देखा कि अरे यह तो एक युवा सन्यासी है चेहरे से ही तो दिखता है कि इतने तपस्वी ओजस और तपस्या दिखाई देती है तो उनको बड़ी दया आ गई और उन्होंने कहा कि बाबा तुम इतना उपवास करोगे कष्ट करोगे स्वास्थ्य भंग हो जाएगा मैं तुम्हारे लिए खाना लाती हूं तो ऐसा वो इस तरह से अखंडानंद जी का स्ट्रगल चल रहा था मीन वाइल आखिर में उनको परमिशन मिली कि कलकाता लेटर लिखे वरा नगर मठ में लेटर लिखा गया फिर वहां से कॉरेस्पोंडेंस हुआ फिर आखिर में इनको छोड़ दिया गया और फिर जब वो वराह नगर मठ आए थे तब यहां पे वराह नगर में एक पुलिस ऑफिसर गया ये जो सीआईडी ब्रांच वगैरह है ना स्वामी जी वगैरह वहां पे थे तो वहां पर जाकर के उन्होंने कहा स्वामी जी को कि हम अखंडानंद जी को आपके गुरु भाई को छोड़ देने को तो तैयार है किंतु आपको एक परिचय पत्र देना होगा उनका चरित्र कैरेक्टर सर्टिफिकेट देना होगा तो कैरेक्टर सर्टिफिकेट देंगे तो हम उनको छोड़ देंगे ऐसा कुछ उन्होंने कहा तो अभी क्या है कि पता है ना यह गुलाम देश एक गुलाम की तरह हमको रखा है जो एक मालिक होते हैं वो आपके गुलामों से चरित्र का सर्टिफिकेट मांगेंगे जो स्वाधीन प्रजा है वोह क्यों अपने चरित्र का सर्टिफिकेट देंगे भाई मैं तुम होते कौन हो कि मैं तुमको लिख करके बताऊं कि हां भाई मेरा जो गुरु भाई है वोह अच्छा आदमी है वो बरा नहीं है वो डाकू गुंडा चोर बदमाश नहीं है माने यह तो अपना अध पतन हो गया ना मानसिक इस तरह से हमको ये एक इफरिट कॉम्प्लेक्टेड नहीं है जब तक इसके पास में रिकमेंडेशन नहीं है जब तक इसके पास में इंट्रोडक्शन लेटर नहीं है तब तक इस आदमी का क्या है हमको कुछ पता नहीं गुंडा भी हो सकता है बदमाश भी हो सकता है माने ये एक एक मालिक और गुलाम की ये एक रिलेशनशिप तो स्वामी जी को तो पता है बहुत सारे लोगों ने एक्सेप्ट कर लिया था कि चलो इस तरह से रिकमेंडेशन लेटर तो चाहिए हमको इस तरह से चरित्र सर्टिफिकेट तो चाहिए हमको अदर वाइज कैसे काम होगा किंतु यह सब तो एक गुलाम के सर के भीतर में यह सब गलत गलत चीजें डाल देने जैसा हुआ ब्रिटिश लोग अपने को आपस में थोड़ी ना कोई चरित्र सर्टिफिकेट देता है एक ब्रिटिश सोल्जर थोड़ी ना कहेगा कि ये जो दूसरा ब्रिटिश सोल्जर है इसका चरित्र अच्छा है या तो रिकमेंडेशन लेटर वगैरह वगैरह हां आप किसी को को भला मण कर सकते हैं वो एक चीज हो गई कि किसी को जॉब चाहिए और मेरा पहचान वाला है तो हम रेफर कर सकते हैं तो वो तो रेफरल हो गया रेफरल और ये कैरेक्टर सर्टिफिकेट में बहुत बड़ा डिफरेंस है रेफरल एक स्वाधीन प्रजा होती है वो आपस में एक दूसरे को रेफर करते हैं किंतु एक गुलाम प्रजा होती है वही उसी को चरित्र का सर्टिफिकेट चाहिए तो स्वामी जी वो जो एक ब्रिटिश ऑफिसर आया वहां सीआईडी का कोई और वराह नगर मठ में कि आपके गुरु भाई के बारे में आप कुछ अच्छा लिख दी दीजिए तो हम उसको छोड़ देंगे तो फिर यह यहां पर स्वामी जी तो स्वामी जी का नेचर तो हमको पता है तो स्वामी जी ने पहले तो ऐसा कहा कि अच्छा ठीक है ठीक है चलो मैं तुमको लिख देता हूं ऐसा बोल कर के व कागज और कलम निकाला और वहां पर टेबल के ऊपर में बैठे अभी वोह ब्रिटिश ऑफिसर खड़ा है वहां पर गुरु भाई भी सोच रहे हैं कि नरेंद्र क्या लिखेगा तो नर ने पहले तो कागज और कलम लेकर के थोड़ा सा सोचा फिर वो भीतर से जो रुद्र रूप प्रकट हुआ जो भगवान शिव का जो आविर्भव हुआ वो खड़े होकर के ब्रिटिश ऑफिसर को जो डांटा है कि हां तुमको यह चरित्र स एकनी लिखे द लिख द बंगोली में वो स्वामी जी उसको डांटे हैं किंतु इस तरह से रुद्र स्वरूप लेकर के कि वह ऑफिसर वहां से सीधा भाग खड़ा हुआ और बिना चरित्र सर्टिफिकेट को ही आखिर में यह अखंडानंद जी को छोड़ दिया गया तो यह देखिए कि स्वामी जी किस तरह से हमको सिखाते हैं ये जो भीतर से स्वाधीनता है इवन नाउ इवन भारत के साथ में आज भी हम भारतीयों के साथ में आज भी ये ब्रिटिश लोगों के जो संस्कार हमारे भीतर में जो डाल दिए हैं इससे बाहर निकलना हमारे लिए कितना कभी-कभी मुश्किल होता है देखिए कल ही एक अच्छा उदाहरण यहां पर मैं ब्रह्मचार्य के क्लास लेता हूं तो मैं इस तरह की कोई बात कर रहा था तो जो ब्रह्मचारी महाराज यहां पे ये अपना ये बुक स्टोल देखते हैं तो उन्होंने कहा कि महाराज ये जो ब्रिटिश लोगों से से प्रभावित होक के हम लोग जो रहते हैं ना ये आज भी ऐसा हो रहा है मैंने कहा बता अच्छा कैसे तो बोले कि अभी यहां पर वो क्रिकेट मैच थी वो ब्रिटेन के साथ में येय ब्रिटेन यूके के साथ में तो कुछ-कुछ ये ब्रिटिश ब्रिटिशर्स यहां पे आए थे आश्रम की मुलाकात के लिए और ये गोरे लोग और ये बुक स्टोल में गए और बुक स्टोल में जाकर के किताब खोज रहे हैं और वहां प अपने देसी दो-तीन लोग भी खड़े थे तो अभ ये ब्रिटिशर क्या करता है कि वो देखा स्वामी जी का राजयोग तो इंग्लिश में तो बड़ा ही उसको पसंद आया बोला कि अच्छा अच्छा यह तो दिस इज अ वेरी गुड बुक वेरी गुड बुक एंड वेरी नाइस बुक वेरी नाइस राइटिंग अबाउट योगा एंड साधना एसेट एसेट सो वो काउंटर प जाकर के बोलता है कि प्लीज गिव मी दिस राजयोग बुक अभी वो अपना जो इंडियन खड़ा है पास में वो छोटी-छोटी दो-तीन किताबें लेकर खड़ा है वो सफलता ना वो स्टेप्स टू सक्सेस एंड थॉट्स ऑफ पावर ऐसी दो तीन छोटी-छोटी किताबें गुजराती में उसने जब ये देखा कि ये ब्रिटिश य है वो उसको राजयोग बड़ी पसंद आ गई है तो फिर वो जाकर के काउंटर पर बोलता है कि अच्छा अच्छा एक काम करो ये छोटी-छोटी अभी रहने दो मैं भी ये राजयोग ले लेता हूं मैंने जब सुना तो मुझे बड़ा हंसी आ गया अभी वो अपना जो ये इंडियन था उसने सब कुछ देख लिया आप पूरे बुक स्टोल में और एक दो छोटी किताबें लेकर के वो परचेस करने को जाने वाला था किंतु जैसे उसने यह देखा कि ब्रिटिशर को यह राजयोग बड़ी पसंद आ गई है बड़ी किताब है महंगी भी है किंतु जबी उसको पसंद आई है तो उसको किताब तो अच्छी होगी उसने अपने से लिी हुई किताब रख दी बगल में और यह राजयोग उसने भी खरीद कर ली तो ये जो मेंटालिटी जो अपनी है ये अभी भी उस तरह की है भले ही चाहे हम इसको स्वीकार करें ना करें ये कहीं ना कहीं से ये आ ही जाता है तो जो भी है ये स्वामी जी ने इस तरह से अखंडानंद जी को छुड़ाया अभी ऐसा था कि पहले पहले स्वामी जी अखंडानंद जी पर थोड़े से नाराज रहा करते थे कि अरे ये तुम चारों ओर जो घूम र हो तुम हिमालय वगैरह तुम मठ में आ जाओ तपस्या करो किंतु बाद में स्वामी जी को भी ऐसा मन में हुआ कि नहीं अभी यह जो इटरनल कॉल ऑफ इटरनल जो है अंतरात्मा की आह्वान परमेश्वर की आह्वान कि खुले जंगल में नदी के किनारे समुंद्र के किनारे निकल पड़ो ऐसा निसंग विचरण करेंगे भ्रमण करेंगे ईश्वर का स्मरण मनन निदिद्यासन करेंगे तो ये जो सन्यासी के भीतर में यह आह्वान तो हमेशा गूंजता ही रहता है जब उसको वो स्वीकार कर लेगा तब वह सब बंधन से मुक्त होकर के इसे भ्रमण करना शुरू कर देगा तो स्वामी जी ने फिर आखिर में अखंडानंद जी को कहा कि चलो मैं भी अभी हिमालय जाना चाहता हूं तो तुम तो हिमालय वगैरह बहुत घूमे हो तो तुम चलो मुझे ले चलो तुम्हारे साथ में क्योंकि तुम में यू विल बी द बेस्ट गाइड मुझे सबसे अच्छा गाइड तुम्हारे अलावा और कोई नहीं मिलेगा तो अखंडानंद जी और स्वामी जी ने इस तरह से ठीक किया कि हिमालय की यात्रा करेंगे तो अभी मां वहां उस समय कलकाता में थी घुस बोलकर के एक जगह है वहां पर वह भाड़े के मकान में रह रही थी तो यह अखंडानंद जी और स्वामी जी स्वामी विवेकानंद दोनों मां को प्रणाम करने के लिए गए और आशीर्वाद लेने के लिए स्वामी जी ने मां को निवेदन किया कि मां अभी मैं इस तरह से परिव्राजक होकर के पूरे भारत में भ्रमण करूंगा आप आशीर्वाद दीजिए ईश्वर की प्राप्ति हो ठाकुर का आशीर्वाद मिले अभी देखिए कि स्वामी जी को तो ऑलरेडी निर्विकल्प समाधि वगैरह मिल चुका है किंतु फिर ऐसा तो नहीं है ना ठाकुर ने कहा कि एक केरानीगंज ही घूमेगा नाचता कुत्ता ही घूमेगा ना फिर से वो संन्यासी गिरी करना शुरू कर दे तो सन्यासी गिरी तो उसको करनी ही है तो सन्यासी का काम ही है ट्रेडिशनल इस तरह से मठ में रहना या तो निसंग भ्रमण करना तो स्वामी जी ने जाकर के मां को कहा कि आशीर्वाद दीजिए कि मेरी यात्रा इस तरह से प्रजा सक्सेसफुल हो तो मां ने उस समय अखंडानंद जी को कहा था कि हम हमार सब कुछु तुम्हा के दिला तुम खूब जत्न करे नरेन जत्न करब अर्थात कि मैंने अपना संपूर्ण धन मेरी संपूर्ण जो मेरे पास में जो कुछ भी था सब कुछ तुमको दे दिया है मां अखंडानंद जी को ऐसा कहती है मैंने अपना सब कुछ तुमको दे दिया है तुम्हारे हाथ में तुम नरेद का बड़े ही प्रेम से जतन करना अर्थात कि नरेद मां और नरेद यह दोनों का जो रिलेशन था मां अपने मुंह से कहती है मेरा सब कुछ मेरा समग्र धन धन सर्वस्व यह नरेण है तो इस तरह से मां कहती है तो अखंडानंद जी ने भी कहा कि हां मां मैं नरन की ठीक-ठीक उसको केयर करूंगा और क्योंकि अखंडानंद जी को सब कुछ पता है कहां पर भिक्षा मिलती है कहां पर रात को रहना चाहिए कहां किस तरह की क्लाइमेट में किस तरह से अपने को बचाना चाहिए वगैरह वगैरह सब पता है तो अखंडानंद जी ने भार लिया कि स्वामी जी को ठीक-ठीक से हिमालय यात्रा करवाएंगे जिससे कि उनको बहुत ज्यादा कष्ट ना हो सन्यासी को तो कष्ट होने ही वाला है किंतु अननेसेसरी कष्ट ना हो अज्ञान वसत कष्ट ना हो यह अखंडानंद जी देखेंगे तो यह दोनों निकले बाहर भ्रमण का भी प्रव्रज्या के लिए तो स्वामी जी ने अखंडानंद जी को एकदम स्ट्रिक्ट वार्निंग दिया पहली स्वामी जी एक्चुअली दो बार वराह नगर मठ से निकल चुके थे पहली बार जो काशी यात्रा की थी तो प्रम दस मित्र को मिले थे और दूसरी बार जब निकले थे तो यह पहारी बाबा को मिले थे तो क्या है कि यह पहारी बाबा प्रम दादास मित्र देवघर यह सब जगह पर तो भगलपुर वगैरह तो वो भ्रमण कर ही चुके थे किंतु अभी उनके मन में था कि अभी नॉर्थ इंडिया के उत्तर भारत के जितने भी यह धार्मिक स्थान है वह सबको छोड़ कर के सीधा हिमालय जाना है क्योंकि यह सब जगह पर जाकर के हम इतने इंटरेस्टिंग लोगों को मिलते हैं तो मिलकर के क्या है कि उनके साथ में यह सब आध्यात्मिक धार्मिक वार्तालाप में ही हमारा फिर पूरा दिन व्यतीत हो जाता है इसके बाद में फिर यह हिमालय जाकर के साधना करने का उसका का समय नहीं मिलता तो स्वामी जी ने अखंडानंद जी को स्ट्रिक्ट वार्निंग दिया कि हम सीधा हिमालय जाएंगे रास्ते में और कहीं नहीं रुकना तो अखंडानंद जी का किंतु एक दूसरा प्लान था अखंडानंद जी का सोचना था कि एक महंत है अभी कहां पे मथुरा में शायद मैं एगजैक्टली भूल गया थोड़ा सा चेक करना पड़ेगा जानकी बल शरण वो वहां का एक अखाड़ा है ट्रेडिशनल उसके वो महंत है और इनका चरित्र इनकी साधना इनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली है ईश्वर के प्रति इनकी भक्ति निष्ठा प्रेम इतना गहन है कि स्वामी जी यदि इस जानकी बल शरण के साथ में मुलाकात करेंगे उनके साथ वार्तालाप करेंगे तो इनको बड़ा ही अच्छा लगेगा बोलक के अखंडानंद जी ने स्वामी जी को कहा कि हां हम हिमालय जाएंगे किंतु वाया जानकी बल शरण महंत है उनका दर्शन करके वार्तालाप करके जाएंगे तो अभी स्वामी जी यह बात सुनकर के बड़े ही नाराज हो गए उन्होंने कहा कि देखो पिछली बार भी इस तरह से मैं यह काशी यह देवघर यह भागलपुर वगैरह गया था तो वहां पर इस तरह से महात्मा को मिलकर के फिर इस तरह से मन में होता है कि धार्मिक बातें आध्यात्मिक बातें साधना की बातें करते ही रहे तो मेरा जो मुख्य हेतु है तीसरी बार निकलने का वरान अगर से व है कि हिमालय में जाकर के साधना समुद्र में डुबकी लगाना और फिर उसमें से बाहर ना आना और तुम मुझे कहां यह सब एक दूसरे महात्मा के दर्शन के लिए ले जा रहे हो किंतु अखंडानंद जी ने स्वामी जी की बात नहीं सुनी यहां तक कि जब यात्रा कर रहे थे स्वामी जी ने अखंडानंद जी के साथ में बात करना बंद कर दिया मौन व्रत धारण कर लिया नाराज होकर के उनके सामने देख रहे हैं तो इतना किंतु स्वामी जी का क्रोध इसको तो सहन करना कितना मुश्किल पता है किंतु अखंडानंद जी तो भीतर से वो शिव स्वरूप ही थे तो अखंडानंद जी आखिर में जानकी बल शरण महंत के पास में स्वामी जी को ले आए और इन दोनों का जब वार्तालाप हुआ तो स्वामी जी इतने प्रभावित हो गए कि स्वामी जी ने कहा कि अच्छा गंजे वो उनका नाम था अखंडानंद जी का नाम था गंगाधर हम उनको गंगाधर महाराज कहते हैं स्वामी जी अभी गंगा शब्द इंग्लिश में गंजे इस तरह से उसका प्रोनाउंस एशन होता है तो स्वामी जी उनको इस तरह से एक स्नेह से गंजे से पुकारा करते थे गंगाधर महाराज को अखंडानंद जी को तो स्वामी जी ने कहा कि गंजे तुम मुझे यहां पर ले आए बहुत अच्छा हुआ इनके साथ में बात करके मुझे सही में बहुत तृप्ति हुई किंतु अभी चलो हिमालय अभी और कहीं नहीं रुकना है तो आखिर में फिर वहां से उन्होंने हिमालय की यात्रा की तो यहां पर जब स्वामी जी यह कहते हैं कि तुम लोग गांव गांव जो घूम रहे हो तो गांव-गांव घूमते घूमते तुम लोगों ने क्या ये एरंड का तेल ही बनाया ना कि और कोई काम किया तो स्वामी जी जब इनको ऐसी बात करते हैं तो स्वामी जी को तो खुद के सामने भी तो एक बार देखना चाहिए था कि वो खुद एक बार इस तरह की मानसिक दशा में थे कि किसी का भी संग उनको अच्छा नहीं लगता था चाहते थे कि किसी तीर्थ स्थान पर जाके साधन समुद्र में डुबकी लगा दे साधना में मग्न हो जाए और किसी चीज से और किसी व्यक्ति से और किसी झंझट में नहीं पड़ना है और यह सभा बनाना ये फिर वह सभा का फिर 10 लोगों के साथ में काम करना सबका अपना बड़ा-बड़ा ईगो एक आदमी कहेगा कि अरे आपने मुझे इसको सम्मान दिया मुझे सम्मान नहीं दिया यह सब झंझट में पढना एक साधक किस तरह से इसको सहन कर सकता है किंतु स्वामी जी कहते हैं कि वो जो फेस था अपने जीवन का वह एक समय था कि हम लोग सब कुछ भूल कर के ईश्वर मय ठाकुर मय हो गए थे उस फेज का उस स्टेज का अभी समापन हुआ है अभी एक नया स्टेज हमारे जीवन में भारतवर्ष के इस इतिहास में एक नए चैप्टर का प्रारंभ हो रहा है एक नया सूर्योदय हो रहा है कि ठाकुर का उपदेश ठाकुर का जीवन ठाकुर की वाणी गांव गांव शहर शहर अबालम वनिता अर्थात की स्त्री पुरुष वृद्ध सबको बच्चे सबको यह ठाकुर की वाणी हमको पहुंचा है तो इसीलिए स्वामी जी इस तरह से कह रहे हैं कि जहां जहां पर जाओ जिस गांव जिस शहर में जाओ जहां पर 10 लोग भी आपको मिल जाएंगे जो कि ठाकुर की वाणी सुनकर के ठाकुर के ऊपर में श्रद्धा जिनके हृदय में प्रकट प्रकट हो उन को वहां पर ही मिला कर के एक सभा की रचना कर दो वरना तो फिर यह तुम लोग जो गांव-गांव घूम रहे हो वह मिथ्या है किसी काम का नहीं है आगे स्वामी जी कहते हैं हरि सभा प्रवृति गुलो के धीरे-धीरे स्वाहा करते होवे यह हरि सभा वगैरह बहुत सारी सभाए इस तरह से जो चैतन्य देव के समय से चली आ रही थी तो हरि सभा अर्थात कि इसी तरह से चैतन्य देव के जो भक्त थे वो इस तरह से सभाएं बनाए थे वैष्णव लोगों की तो यह जितनी भी सभा है वहां जाकर के हमको उनके ठाकुर के बारे में बात करना है एक्चुअली स्वामी जी जो शब्द यूज करते हैं धीरे-धीरे स्वाहा करते हुए अर्थात कि धीरे-धीरे इसका भक्षण कर देना होगा स्वाहा कर देना होगा अर्थात कि यह खा जाना होगा लिटरल जदी मीनिंग है खा जाने का अर्थ या तो स्वाहा कर देना का अर्थ ऐसा नहीं है कि उस सभा को तोड़ कर के अपनी नही सभा का गठन करना है किंतु यह एक नेचुरल इवोल्यूशन है ठाकुर गए थे वहां पर ये हरिसभा में उनको लेकर गए थे वहां पर देखें चैतन्य देव का एक आसन है अभी वहां पर तो और तो कोई बैठ नहीं सकता चैतन्य देव के लिए जब यह कीर्तन भजन होता है तो वह भी उपस्थित है ऐसा मान के उनके लिए एक आसन खाली छोड़ देते हैं तो ठाकुर भवा वेश में आ गए जैसे ही भजन कीर्तन चल रहा है और भाव में जा करके चैतन्य देव के आसन पर विराजित हो गए अभी वहां पर जो भक्त और कोई ऐसा करेगा आप या मैं तो हमारी तो ये लोग पिटाई ही कर देंगे ये तो ऐसा हो गया ना कि जैसे कोई जाकर के ठाकुर के श्राइन में जाकर के ठाकुर की वेदी पर चढ़ने का प्रयास करें हम तो कितने क्रोधित हो जाएंगे ऐसा कोई करेगा तो तो ऐसे ही चैतन्य देव के आसन पर यदि कोई और कोई जाकर के बैठ जाएगा तो चैतन्य देव के भक्त तो बड़े ही नाराज हो जाएंगे किंतु ठाकुर इस तरह से वो भाव समाधि में चले गए थे और जो ईश्वरीय आवेश उन सबके ऊपर में इस तरह से हो गया था कि किसी ने विरोध नहीं किया था और सभी ने स्वीकार कर लिया कि हां ठाकुर ही चैतन्य देव के नए अवतार है तो यह स्वाहा करने का यह अर्थ नहीं है कि पुरानी प्रथा को तोड़ कर के नई पुराने सभा को तोड़ कर के नई सभा का गठन करना किंतु यह एक नेचुरल इवोल्यूशन है भारत के धार्मिक समाज में भारत के धार्मिक प्रवाह में कि एक के बाद एक अवतार संत महापुरुष आते जाते हैं और वह आगे आगे आए हुए अवतार का संत का कार्य आगे बढ़ाते हैं उसको तोड़ के नया नहीं बनाते उसी कार्य को आगे बढ़ाते हैं इसलिए स्वामी जी अपने प्रवचन में कहते हैं कि जहां पे सीजर्स य राज कर रहे थे कैपिटल में वहां पे मकड़ी अपनी जाल गूंथ रही है अपनी जाल बना रही है किंतु यहां भारत में भगवान मनु फिर से आ जाए तो उनको वही भारतवर्ष फिर से दिखेगा अभी ऐसा नहीं है कि कैपिटल हिल जहां पर ये सीजर्स रूल करते थे वहां पर वह स्पाइडर सही सही अपनी जाले बना रहे हैं अभी क्या है टूरिज्म इतना बड़ा इंडस्ट्री है कि इटली में जहां पर आप जाएंगे सीजर्स का राज्य था रोम जहां पे है वहां रोम पे यह जितने भी हिस्टोरिकल मॉन्यूमेंट है बड़ी जतन करते हैं यह लोग जिससे कि टूरिजम बढ़े और ऐसा भी नहीं है कि भारत में जो वैदिक समय के जिस तरह से सब कुछ था ऐसा 100% आज भी है यह दोनों स्टेटमेंट यदि ऊपर ऊपर से देखेंगे तो गलत दिखेंगे किंतु थोड़ा सा डीप में जाएंगे तो पता चलेगा कितने सच है कितने सत्य है क्योंकि रोमन लोगों के समय पगेनिज्म बोलकर के धर्म था जो कि क्रिश्चियनिटी के आने से उसका संपूर्ण विलय हो गया वो संपूर्ण रूप से वो विक्षिप्त हो गया संपूर्ण रूप से उसका विनाश हो गया उसके बाद में क्रिश्चियनिटी ही रोम में और पूरे यूरोप में फैली तो इस तरह से जो उनका बेसिक धर्म था वह पूरा चला जाकर के एक नए धर्म ने आकर के वहां पर स्थान ग्रहण कर लिया यूरोप में रोम में इटली में जबकि भारत में वही जो वैदिक सनातन संस्कृति है वही संस्कृति आज भी हमारे सभी लोगों के जीवन में सभी के अपने जितने भी संस्कार है जन्म संस्कार मृत्यु संस्कार विवाह संस्कार यह जितने भी संस्कार है वो सभी संस्कारों के भीतर में यही भारतीय संस्कृति अभी भी जीवित है भले ही चाहे हम लोग ये इसरो के साइंटिस्ट बन जाए भले ही हम लोग चाहे ग के इंजीनियर बन जाएं किंतु इसरो के जो रॉकेट जब वोह जाते हैं अवकाश में भेजते हैं उससे पहले वहां के वैज्ञानिक जाकर के तिरुपति में श्रीफल ऑफर करते हैं अर्पित करते हैं भगवान को तो व संस्कृति अभी भी हमारी बरकरार है इस अर्थ में कि इसी अर्थ में यह सनातन परंपरा य हिंदू धर्म की वहां पर एक नया अवतार ऐसा कभी नहीं कहता कि पुराने अवतार ने सब गलत कहा है या तो उनकी बातों को सब भूल जाओ उनकी जो सभाएं हैं उसको तोड़ दो इसी के ऊपर में उन्हीं की बातों को आज के समय के अनुसार फिर से कही जाती है इसीलिए स्वामी जी यहां पर कहते हैं कि हरि सभा वगैरह को धीरे धीरे स्वाहा करना होगा धीरे-धीरे अपने संघ के भीतर में उनको समाहित कर देना होगा की बल बो तो देर मैं तुम लोगों को क्या कहूं आर एकटा भूत जती अर मतो पे तुम जद मेरे जैसा और एक भूत मुझे मिलता तो कितना सब कुछ में कर पाता स्वामी जी कितनी सुंदर बात करते यदि मेरे जैसा और एक भूत मिल जाता ठाकुर काले शब जुट देन ठाकुर समय के अनुसार समय आएगा कि ठाकुर सब जुगाड़ कर देंगे अर्थात कि ऐसा भी हो सकता है कि स्वामी जी के जैसा एक दूसरा भूत भी हो सकता है कि ठाकुर जुगाड़ कर दे किसको पता शक्ति थाक लेही विकास दिखाते हो बे यदि भीतर में शक्ति है तो शक्ति होने से ही विकास दिखाना पड़ेगा वरना तो बाहर के आक्रमणकारी आएंगे गुलाम बनाएंगे और पूरा सत्यानाश कर देंगे अपनी संस्कृति का अपने चरित्र का मुक्ति भक्ति भार दूर करे दे मुक्ति और भक्ति का भार अपने सर से हटा दो ही एक मात्र रास्ता छ दुनियाए दुनिया में यही एक मात्र रास्ता है परोपकाराय ही सतामटका के लिए ही साधु लोग जीते हैं परोपकार के लिए ही अपना जीवन उत्सर्जित करते हैं तोमार भालो करले अर भालो होए दूसरा आर उपाय नहीं एक बारे नहीं तुम्हारा भला करने से ही मेरा भला होगा और कोई उपाय नहीं है एके बारे नहीं है बिल्कुल नहीं है अभी यह स्टेटमेंट है उसका अंडरस्टैंडिंग उसके बारे में लंबी चर्चा होगी जो कि हम कल करेंगे आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कपण मस्तु