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Ma Sarada Life ·

Ma Sarada devi 3 July 2023 मातृसान्निध्ये : स्वामी ईशानानन्द लिखित

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ओम स्थापा का यॉट धर्मस्य सरवत धर्म स्वरूप रामकृष्णयातील नाम आज बहुत दोनों के बाद फिर से क्लास स्टार्ट हुआ है बीच में छुट्टी लेकर आया था तो जय हो मां की बातें जो है हम लोग पढ़ रहे थे और किस तरह महाराज तो महाराज जी पिछली बार हमने देखा की किस तरह से एक घटना का वर्णन जी महाराज कर रहा है एक बार हुआ हूं की राजू के विवाह के बाद में यदुनाथ बोलकर के एक ब्रह्मचारी था बांग्लादेश था उन्होंने उसे समय का इस्ट बेंगोल आज का बांग्लादेश जिसको की हम बंगाल भी बोलते हैं कई बार तो वहां से था और मां की बहुत भक्ति करता था वह क्या करता था कमर कुकर में तो बहुत सारे तालाब है तो तालाब में से वह पदमा फूल ला करके प्रतिदिन मां के श्री चरणों में एक फूल अर्पण करता था तो अभी हुआ हूं की जी दिन राधा का विवाह समाप्त हुआ और राजू जो है अपने पति के साथ में चली गई उसे दिन शाम को वहां पर जय राम भाटी में विवाह था तो कोलकाता से अपने शरद महाराज है और भी सब साधु ब्रह्मचारी आए थे क्योंकि मां के परिवार की अवस्था तो ऐसी नहीं थी की मां सब तरह से व्यवहार कर पे तो इसलिए शर्ट महाराज ने सब खुद वहां पर जाकर के व्यवहार किया था और भक्तों ने राधु को इतना सर सब गिफ्ट वगैरा दी थी जैसे होता है शादी ब्याह में इतने सारे अभी मां के परिवार की अवस्था तो पता है मां के भाइयों के परिवार की अवस्था बेचारे अपना यदि खाना भी तो झूठ पे तो बहुत हो गया किंतु यहां पे तो उल्टी बात होगी भक्तों ने राजू को इतने सारे गने इतने सारे अलंकार दिए की वो सब गने और अलंकार पहन करके राजू को चलना भी मुश्किल हो गया सर के ऊपर में एक सोनी का मुकुट भी पहने था और सब पहन करके उसको बेचारी चल भी नहीं का रही थी तो जो भी है तो राजू इस तरह से विवाह करके अपने पति के वहां चली गई और यहां पर शरद महाराज वगैरा जैसे होता है ना बहुत जैसे अभी आज गुरु पूर्णिमा है देखेंगे की हमारे सभी आश्रमों में साध ब्रह्मचारी और भक्ति इतना सब मेहनत करेंगे इतना सब जो है सुबह से लेकर के पूजा का आयोजन होता है भोग का आयोजन होता है उसके बाद में भक्तों को प्रसाद खिलौने की व्यवस्था होती है सभी सेंटर ने देख लीजिए की हो सकता है हजार दो जो है वो तो प्रसाद पाएंगे ही पाएंगे मिनिमम राजकोट में तो बहुत हो जाते हैं तो फिर क्या होता है की जब साधु ब्रह्मचारी और वॉलिंटियर ऐसा कोई बहुत बड़े उत्सव में इतना मेहनत करके कम करते हैं ठाकुर का नाम लेकर के और जब शाम को उत्सव समाप्त हो जाता है तो सब बैठ करके कैसे गैप लगाते हैं हंसी मजाक करते हैं तो वैसे ही जी दिन राजू अपने पति के वहां चली गई शरद महाराज घर के वरांडा में बैठे थे सब भक्तों के साथ में साधुओं के साथ में बैठकर के गैप लगा रहे थे तो हंसी मजाक ऐसा था की प्रकृति विकेट हो गई थी ऐसी जोरो से बारिश हो रही थी आंधी तूफान बादल बिजली गरज रही है कुछ भी नहीं दिखे रहा और यदि बिजली गिरती है इस तरह से किसी पेड़ के ऊपर में तो किस तरह से वो झन का संशय राहत है वो आप सोच के देखिए तुम बाहर में प्रकृति ने इस तरह से रिकॉर्ड कार स्वरूप धरण किया है और वहां मां के कमरे में के बरन में वो घर के वरांडे में सेफ जहां पे सब बैठे हैं हंसी मजाक कर रहे हैं तो सुद्दनली हसी मजाक में मजाक करते करते शरद महाराज ने स्वामी शारदानंद जी ने जो की मां के सेवक थे मां के द्वारपाल थे और रामकृष्ण संघ के जनरल सेक्रेटरी भी थे उन्होंने हंसी मजाक में जादू नाथ ब्रह्मचारी जो है उसको बोल दिया की देखो तुम प्रतिदिन तो मां के श्री चरणों की पूजा एक पद्मफुल से करते हो किंतु यदि आज ये आज जब प्रकृति ने इस तरह से विकेट स्वरूप धरण किया है आज यदि तुम जाकर के इस तरह से आंधी तूफान बारिश बिजली इसमें जाकर के तुम तालाब में जाकर के खुद करके 108 पदमा फूल मां के लिए जड़ी ले आओगे तो तुम्हारी तपस्या जो है तो तुम्हारी पूजा जो है वो सार्थक हो जाएगी ऐसा महाराज ने इसको बोल दिया चतुर्थ को और यदुनाथ ने जैसे ही सुना वो जैसे की हनुमान कैसे समुद्र को चलांग लगाकर के समुद्र लंगने को तैयार हो गए थे तो वैसे ही चुन्नट में चलांग लगाकर के वो वरांडा के ऊपर में से जंप लगाया और जहां पे वो घुटन भर पानी जहां कमर भर पानी जहां पर पानी का सैलाब इतना जोर से बा रहा है पानी का स्रोत की आदमी तो क्या ये गुरु है गे है भैंस है बेल है वो भी डर जाएंगे उसमें वो भी उसमें जो है इस तरह के विकेट जल के स्रोत में उसने जंप लगा दिया और जाकर के वह तालाब और कुकर की खोज में चला गया अभी यहां पर तो शरत महाराज ये लड़का क्या चल रहा है उन्होंने तो हंसी मजाक में कहा था उसको की जाकर के तुम 108 पदमाफुल ले आना वह तो कभी ऐसा नहीं चाहेंगे की हमारा कोई साधु है रामकृष्ण संगीत वो इस तरह से इस तरह की भाया वह विकेट स्थिति में इस तरह से कोई तालाब में या कोई सरोवर में जाकर के जंप लगाएं उसमें गिरने का अर्थ ही है प्राण का महासंसाय तो यहां पे शरद महाराज जोर से चिल्ला रहा है सब हंसी मजाक चली गई एकदम सब गुरु गंभीर हो गए डर गए सब लोग चिंता में पद गए महाराज चिल्ला रहे अरे जादू वापस आओ वापस आओ किंतु जरूर थोड़ी ना अभी किसी की बात सुनेगा एक और है मां की भक्ति और दूसरी और है की आचार्य स्वयं उसे दिन तो शरद महाराज तो मतलब वो दीक्षा देते थे वह शरद महाराज जो है होम वगैरा होता था वहां पे वो आचार्य का पद धरण करते थे और जनरल सेक्रेटरी संघ के ठाकुर के स्वयं मानस ठाकुर के राजा महाराजा ठाकुर के संतान है वह सन्यासी संतान है तो इस तरह से राजा महाराजा ने जब का दिया और शर्ट महाराज ने जब का दिया तो थोड़ी ना ये जादू ना तभी सुनने वाला है किसी की बात शरद महाराज चिल्ला रहे हैं नहीं बात सनी और वो जोर जोर से वहां से वो इतने भारी जो सैलाब है उसमें वो चला गया अभी यहां पे अभी बाकी सब लोग क्या करेंगे कोई जाकर के उसके पीछे नहीं जा सकता क्योंकि प्रकृति ने इतना भयावह विकेट स्वरूप धरण किया है तो अभी देखिए की यहां पे वरांडा में अभी तो सब हंसी मजाक चल रहा था सब लोग एकदम गुरु गंभीर हो गए चिंता में पद गए सब लोग बैठे रहे की अभी पता नहीं ठाकुर क्या नहीं करेंगे यह ब्रह्मचारी के साथ में मां भीतर में थी मां को भी पता चला की इस तरह से जगरूनाथ इस तरह से इस बारिश में इस भाया वह तूफान में वह 108 पदमा फूल लेने के लिए चुन्नी के लिए गया है अभी माफी बेचारी क्या बोलेगी सब लोग बेचारे बड़ी चिंता में र देख रहे हैं की जादू नाथ के साथ में क्या होगा अभी यह जो है ब्रह्मचारी वो जा रहा है जा रहा है दिखे नहीं रहा है कुछ भी सब जैसे वो कमर भर पानी होता है तो किस तरह से चारों और सैलाब जैसा चारों और विशाल समुद्र जैसा हो जाता है जस्ट कल्पना करके देखिए की पूरा समुद्र जैसी स्थिति है कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा बारिश घनघोर बारिश गिर रही है उसमें भी वो पता नहीं कैसे उसके पर उसकी मेमोरी जो है ना की उसकी गुरु के प्रति श्रद्धा भक्ति है कैसे किसी तालाब में ले गई अभी एक तालाब में शायद हो सकता है की 108 पद्मफुल ना भी मिले हो तो वहां से जितने मिले उतने चुने फिर और किसी तालाब में गया और फिर काउंटर ऐसे भी नहीं की ले लेना है तो 108 पद में एक पदमा फूल तो इतना बड़ा होता है तो 108 तो कितने ज्यादा होंगे तो मैंने तो देखा है जब बेलूर मठ में दुर्गा पूजा का उत्सव होता है तो क्या होता है की हम लोग कोई भी उत्सव होता है दुर्गा पूजा का की कोई भी तो पदमा फूल हमको देते हैं हम ब्रह्मचारी लोग जब वहां पे कम करते हैं तो प्रत्येक पद्मफुल काली की तरह होता है उसको एक-एक उसकी जो पंखुड़ी है उसको खोल करके उसको प्रस्तुति करना होता है क्योंकि बड़ी सभा को तुल्य होता है तो अभी एक-एक पद्मफुल इतने बड़े होते हैं तो ऐसे 108 पदमा फूल तो आप रे कितने ज्यादा हो जाएंगे तो ऐसी बारिश में 108 पदमा फूल चुना फिर उसको साथ में लेकर के चलना वो भी कितनी बड़ी एक कठिनाई है हम सोच करके कल्पना भी नहीं कर सकते मैन जस्ट एक बार कल्पना करके देखिए की जैसे समुद्र जैसे चारों और फैला हुआ है ऐसे समुद्र में जैसे कोई जहाज फस हुआ है भयानक को आंधी तूफान में वैसे ही ये अकेला चल रहा है जहां पर उसकी गुरु निष्ठा जहां पर उसकी ईश्वर के प्रति श्रद्धा भक्ति ले जाए और ठाकुर ने भी देखिए की किस तरह से उसके हाथ पड़कर के उसे दिन उसकी रक्षा की होगी कितने लोग टायर गए होंगे कितने ही लोग बा गए होंगे इस तरह के सैलाब में वो नहीं हो करके ठीक ठीक अपने गंतव्य स्थान पहुंच करके किसी तालाब में से एक तालाब नहीं तो दो तालाब दो नहीं तो तीन इतने तालाबों में से पदम फूल ग्रहण करके चुन करके ये सीट आंधी तूफान बारिश में फिर से मां के घर में आकर के उपस्थित हुआ और मां के श्री चरणों में 108 पड़ा फूल असमर्पित करके मां को प्रणाम किया साष्टांग प्रणाम किया अभी मैन उसके सर पर आशा हाथ रख करके अपने दिल से हृदय से आशीर्वाद दिया और बाकी जितने भी बाहर में बैठे थे शरद महाराज वगैरा उन्होंने सोचा की हर यह तो वापस ए गया पता नहीं आज क्या से क्या नहीं हो जाता तो शरत महाराज कहते हैं आखिर में सुंदर वर्णन है मैं थोड़ा सा वर्णन पढ़ना हूं घर अंधकार मूसलाधार दृष्टि पड़ी ते छे माझे माझे गुरु गंभीर वज्रपत्र अंधकार है मुश्किल बारिश गिर रही है बीच-बीच में गुरु गंभीर कोश से बिजली गिर रही है आलोट पाठ अतिक्रमण करीब थे ब्रह्मचारी जो है इसी में इसी घर अंधकार में विद्युत जो बिजली गिर रही है उसके आलोक ने उसके प्रकाश में रास्ता खोजना के लिए तैयार हो गया शरद महाराज ने देखा की वो जान को तत्पर हो गया है तो बड़े व्यस्त होकर के खड़े हो गए और चिल्लाने लगे वो जो तो इसका नाम और सब में वो मजाक तो नहीं कैसे वो जैसे एक डाक नाम होता है ना पुकारने का नाम तो उसको जोड़ो कहते थे तो अरे वापस आओ वापस आओ ऐसा करके चिल्लाने लगे बोलियां चीत्कार कोरिया दाटाइट लागेलें बोलकर के चिल्ला चिल्ला करके पुकारने लगे किंतु के कर कथा सोनी किंतु कौन किसकी बात सुनेगा जादू वो भरे चल आगे लो जादू है करके ज़िद करके चला गया आमीन तो खून माहिर निकट बरन दी बोस्नियन आता मक्खी तकी एवं मऊ कांच कर्मो शरिया घरेलू मत दे किया तब तो पशर ऊपर पांच जुलाई या अक्टूबर स्वामी इशानंद जी वर्धा महाराज जिन्होंने यह स्मृति का था लिखी है वर्धा महाराज का रहे हैं की उसे समय में जो वरांडा था उनमें जो मां का जो दरवाजा था वहां पर बैठ करके बनाना पड़ता है पहले तो आता बना रहा था और मां भी अपने कम में से थोड़ा सा विश्राम लेकर के अपने कमरे में जाकर के वह अपनी जो खाट है अपना बिस्तर है वहां पर जाकर के बैठी थी प्राय घंटा खाने पैर जादू भी जीते भी जीते शाह भीषण दर्ज गिर मत दे माइल खाने दूर-ए- माथे दिया साष्टांग प्रणाम कर ले प्राय एक घंटे के बाद में ढीले गले होते होते बारिश में भजते पिस्ते गांव के बाहर में एक तालाब था वहां से 108 पद्मफुल ला करके मां के कमरे में आया मां के श्री चरणों में रखा मां को प्रणाम किया और मां से आशीर्वाद मांगा आशीर्वाद रखकर के आशीर्वाद दिए शुद्ध शरद मारा जो आर विशेष की चुन बोलियां सूतू बोली लेने जा तार जा इच्छा ताई होवे अशोक भी सुख की ऊ नको रिबॉशे बांगर शरद महाराज ने भी और कुछ नहीं करके कहा और कुछ नहीं कहे के कहां जा ठाकुर की जो इच्छा है ईश्वर की जो इच्छा है मां की जो इच्छा है वही होगा वही इस तरह से आंधी तूफान में गया है तो लड़का कहानी कोई आसुख विशुखमने बुखार वगैरा एन कर उसको ग जाए वही ठाकुर से प्रार्थना अभी देखिए की इसके बाद में किंतु क्या होता है शून्याची बिहार क्रांति हो या किछु दिन फुग्या कनखल रामकृष्ण मिशन सेवा समिति त्याग करें सुना है की इसकी ये जो घटना हुई जी दिन रात को जी दिन शाम को वो पद्मफुल लाया था इसी घटना के कुछ दिन के बाद में यदुनाथ ब्रह्मचारी को मलेरिया हो गया फिर अब चेहरा बाकी तो छोटा सा गांव है वो वहां पे कहां कुछ ट्रीटमेंट होने वाला है और शायद हो सकता है जादू ना तो कोलकाता से शरद महाराज के साथ आया होगा तो शरद महाराज ने उसको जो है वहां पर भेज दिया कनखल में अपना बहुत अच्छा सुंदर सेवा आश्रम है बहुत सारे साधु भक्तों की और गरीब लोगों की साधु संतो की सेवा होती है तो कनखल सेवा शर्म में उसने संज्ञान शरीर त्यागोरिले मैन होश में रहकर के ठाकुर मां स्वामी जी का नाम स्मरण करते करते है उसने शरीर त्याग किया सोचकर के देखिए की किस तरह से गुरु भक्ति किस तरह से ईश्वर के प्रति श्रद्धा भक्ति मां के ऊपर में निष्ठा होने से कोई भी साधु ब्रह्मचारी या भक्ति इस तरह से जाकर के मां की आराधना करेगा मां की पूजा करेगा आज का ये जो गुरु पूर्णिमा का शुभ दिन है और ये स्मृति कथा भी किस तरह से ठाकुर ने आज जुगाड़ कर दी है मैंने तो प्लेन नहीं किया था की आज इस तरह से स्मृति कथा कहेंगे किंतु गुरु भक्ति का जो जलन तो उदाहरण अपने संघ में बहुत है एक बार दक्षिणेश्वर में काशीपुर में ऐसा हुआ था ठाकुर के आखिरी दिन है और अभी कैंसर तो अभी सभी लोग कैंसर रोगी की सेवा कर रहे ठाकुर को कैंसर हो गया है तो अभी किसी किसी ने ऐसा बोलना शुरू कर दिया उसे समय तो यह मेडिकल साइंस जो है या तो यह जो सभी लोगों को तो समझ में नहीं आता ना की यह रोग वगैरा कैसे कम कर सकते हैं किसी ने बात-बात में ऐसा बोल दिया होगा की यह ठाकुर का जो रोग है वो यदि संक्रामक हो तो ये जो लोग सेवा कर रहे हैं उनको भी यदि ये रोग हो जाएगा तो क्या इतना ठाकुर के इतना धनिष्ठा है ठाकुर के इतने पास र करके क्या ठाकुर की सेवा करना क्या ये ठीक है क्या ऐसा शायद किसी ने बात बात में बोल दिया होगा तो स्वामी जी ने जैसे ही सुना उन्होंने क्या किया की ठाकुर के गले में जो गाव हो गया है तो गाव में से 70 जो है वो जो एक सेक्रेशन होता है ना वो लिक्विड निकलता राहत है ठाकुर जो खाता भी थे तो वो गाव में से खाना निकाल जाता था तो वहां से उन्होंने जो जमा हुआ जो था गांव का ये जो ये जो बस जिसको कहते हैं वगैरा स्वामी जी ने एक गिलास में लिया और पी गए मतलब कितना घिनौना लगा होगा किंतु अभी देखिए की जल्दी स्वामी जी को रोग लगा था ठाकुर का ऊ करके अपने पास में बैठकर के जितना लगे की संभावना है उससे लाखूनी संभावना है इस तरह से ठाकुर के गाव से ये जो सब निकाला है उसको पिया ने से का कोर्स स्वामी जी को कुछ हुआ नहीं और सभी लोगों जो इस तरह से बातें करते थे उनका भी मुंह बैंड हो गया सोच करके देखिए की इस तरह का साहसपूर्ण करेगा साहस भी सही और इतनी घृणा की बात कहीं है वो भी सही दोनों चीज जी तरह से अभी अपने संघ में गुरु निष्ठा के गुरु भक्ति के कितने ही उदाहरण है उदाहरण के बाद उदाहरण है मैन ठाकुर की खुद की गुरु निष्ठा जो है गुरु भक्ति तो ठाकुर के प्रति है किंतु ठाकुर की खुद की अपने गुरुओं की प्रति तोता पुरी है जटाधारी है भैरवी ब्राह्मणी है फिर कहना राम भट्टाचार्य जिनके पास से ठाकुर ने जो सबसे पहले शक्ति मंत्र ग्रहण किया था जिससे की वह कालीबाड़ी में काली की पूजा कर सके कितने ही उदाहरण अपने संघ में है किंतु यह एक छोटा सा उदाहरण यह ब्रह्मचारी जादू नाथ जिसका नाम भी किसी ने नहीं सुना होगा जिसके बड़े में कोई पहचानता भी नहीं है जो नहीं अपने संघ में कोई बड़े अच्छे प्रतिष्ठित पद पे वो असिन हुआ है ना ही वो जनरल सेक्रेटरी या प्रेसिडेंट बना है ना ही कोई मटका अध्यक्ष हुआ है ना ही इसके उपदेशों की किताबें पब्लिश हुई है इसका नाम भी किसी को नहीं पता और ये यदि ईशानानंद जी महाराज उसको याद नहीं करते तो हमको इसका नाम भी नहीं पता होता ये इस किताब के अलावा इस ब्रह्मचारी का नाम और इस घटना का वर्णन किसी भी किताब में नहीं है किसी के मुंह से मैंने सुना नहीं है तो जस्ट वर्धा महाराज ने ऐसा बैठ करके सोचते सोचते इसकी कहानी लिख दी तो इसके बड़े में आज हमको पता है की हां ऐसा भी एक पागल था अपने सॉन्ग में की इस तरह से वो गुरु भक्ति जो है गुरु की मेरा जो है वह की थी उसने और इससे हमको सीखने को मिलता है देखिए की जब गुरु निष्ठा इतनी सशक्त मतलब अपने सर पे इतनी हेवी हो जाति है तब ये प्राण का भी जो है प्राण जो हमको सबसे प्रिया चीज है आज सब आदमी की सबसे प्रिया चीज क्या है प्राण है किंतु प्राण को भी जो है वो अपने वो हैक करके प्राण की भी बिना परवाह किया इस तरह से पदमा फूल लाकर के गुरु की पूजा करना यह तो हमको इसी से सीखना होगा छोटा सा ब्रह्मचारी जिसका नाम भी किसी को नहीं पता और वह गुरु भक्ति का इतना बड़ा आदर्श इतनी बड़ी शिक्षा इतना झूलंत्र उदाहरण हमारे सामने रख करके गया है तो मैन ये जो कहानी जब मैंने पहले बार सनी थी तो मैंने सही सही में अपने अंतर में आंख बैंड करके ठाकुर को मां को प्रार्थना की थी यदि इस जन्म में अगले जन्म में यदि मैं कुछ भी ना पाऊं मेरा संघ में कोई कंट्रीब्यूशन हो ना हो कोई पद ग्रहण करूं ना करूं मैं कोई लोक कल्याण का सॉन्ग सेवा का कोई कार्य करूं ना करूं किंतु यह जादू नाथ जैसी भक्ति है इस तरह की भक्ति गुरु के प्रति मेरे हृदय में अवश्य प्रस्तुति को यही एक ठाकुर मां स्वामी जी से हमारी प्रार्थना और इसी भक्ति से जल्दी देखिए की मैन और कुछ नहीं कहा महाराज क्या लिखने हैं मैन और किसी को कुछ कहा नहीं नहीं जादू नाथ को दांत नहीं शर्ट महाराज को दांत एकदम शांत होकर के अंतर्मुख हो करके हृदय के पूरे हृदय के अंत स्थल से अतः स्थल से उन्होंने जादू के सर पर हाथ रख कर के जादू को आशीर्वाद दिया हम हनुमान कर ही सकते हैं जब कनखल सेवा शर्म में जादू का देहाती हुआ होगा तो अवश्य मैन आकर के उसको दर्शन दिए होंगे क्योंकि अभी यदुनाथ महाराष्ट्र खुद तो अपनी बात कहानी लिखे नहीं है और वर्धा तुझे राम बाटी में है और कनखल में तो ऐसे कितने सब रोगी है वह सेवा के मतलब वह आरोग्य के लिए आते हैं सरवत के लिए आते हैं ट्रीटमेंट के लिए और उसमें से कितने ही फिर जिनका शरीर त्याग हो जाता होगा कनखल में किसको ये है की चलो जाकर के इस ब्रह्मचारी के साथ में बैठे हैं उसका अंतिम समय है उसका हाथ पकड़े शायद किसने किया भी होगा उसे समय ये जो निश्चलानंद जी महाराज उसे समय वहां एक ही नहीं देखना पड़ेगा चीनी चालान जी महाराज जो है वहां पे कब गए थे तो अभी कल्याणानंद जी महाराज कल्याणानंद जी महाराज उसे समय वो कनखल कब गए थे थोड़ा देखना पड़ेगा मुझे एक्जेक्टली याद नहीं है तो जो भी है क्योंकि जादू नाथ के साथ में कोई बैठा होगा की भी नहीं उसका हाथ भी किसी ने थम होगा की भी नहीं जो आखिरी समय में मैन दर्शन दिया भी होगा की नहीं होगा की मां आई है मुझे लेने के लिए अभी मेरे जान का समय हो गया है तो मां के साथ में का हाथ पकड़ करके या तो फिर अच्छे से ठाकुर कहते हैं ना बच्चा जल्दी पिता का हाथ पड़ता है तो बच्चा छोटा है उसका हाथ छठ जान की संभावना है किंतु पिता यदि बच्चे का हाथ पकाने तो बच्चे का गिरने का कोई संभावना नहीं है तो मैन जादू का हाथ पकड़ कर बैकुंठ लोक में मातृ लोक में ले गई की भी होगी की नहीं हमको कुछ पता नहीं किंतु हम अनुमान करके का सकते हैं जी तरह से मां की कृपा है जी तरह के मां का आशीर्वाद जी तरह से मां का स्नेहा भालोबाशा हमारे ऊपर है मां अवश्य आई होगी जादू नाथ को हाथ पकड़ कर के जय राम भाटी में यदि हम यदि हनुमान भी कर सकते हैं की हमारा स्वर्ग कौन सा है जैसे वैष्णो लोग बोलते हैं तो हम लोग क्या कहेंगे हम लोग कहेंगे चलो जय रामवती नमक एक स्वर्ग की रचना करते हैं स्वर्ग है ही है जहां पर जाकर के रहेंगे दक्षिणेश्वर नाम का है ये कर है हमारे सर्वोच्च तीर्थ स्थान यदि मृत्यु के बाद में यदि एक कुत्ते के रूप में भी यदि वापस आना पड़े यदि मैंने जयरामबाती कमर कुकर दक्षिणी ऐश्वर्या बेलूर मठ में रहने के लिए हमारे सामने इस तरह की शर्ट राखी जाए की मनुष्य जन्म नहीं मिलेगा कुत्ते का जन्म मिलेगा यदि वहां पे जाना है तो कुत्ते का जन्म लेकर के भी हम जय राम भट्ट ही कमरपुकुर दक्षिणेश्वर और बेलूर मठ में पड़े रहेंगे इतनी पवित्रम जगह ये चारों है चारों जगह पे मां के चरण राज पड़ी है चारों जगह पे कमर कुकर नहीं गए हैं तो दक्षिणेश्वर और बेलूर मठ में तो चलो स्वामी जी गए हैं अभी ठाकुर जो है वो बेलूर मठ में नहीं आए हालांकि ऑफ कोर्स वह प्रसिद्ध कहानी है कहानी क्या हमको तो पता है ठाकुर ने स्वामी जी को कहा था की तोर गंधे के खाने नहीं है स्वामी जी नीलांबर गार्डन से वो ठाकुर अस्थि कलश अपने कंधे पर लेकर के विलूर मठ में ले ए रहे थे बेलूर मठ का जी दिन भूमि पूजन था उसे दिन स्वामी जी यह बात शरदचंद्र चक्रवर्ती को कहते हैं की ठाकुर ने कहा था की तुम्हारे कंधे पे बिठाकर के मुझे जहां पे भी ले जाओगे वहां पे भी मैं जाऊंगा ऐसा करके स्वामी जी ने ठाकुर के अस्थि वहां पे स्थापित किया थे बेलूर मठ में तो हमको पता है की ठाकुर भी हो सकता है की चारों जगह पे गए हैं अभी अनुमान मैंने ऑफ कोर्स अनुमान तो क्या वो तो पक्का गए हैं तो अनुमान करने का कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु सदैव है मां अकेली है जो की कर महा तीर्थ में मां के चरण राज वो वहां पे वो आई है जय राम बाटी में भी ऑफ कोर्स मां का जन्म स्थान है ससुराल दक्षिणेश्वर में तुम्हारा ही है और बेलूर मठ में जहां पर नीलांबर गार्डन में वो थी वो वहां पर रही है और बैलून मठ में भी वो कई बार आई होगी तो देखिए की यह चारों तीर्थ स्थान ऐसे है जहां पर मां पवित्र उपस्थित वो सदैव थी स्वामी जी सब जगह पे नहीं गए और ठाकुर जो है बेलूर मठ में सेज नहीं आए अस्थि के रूप में सूक्ष्म रूप में आशीर्वाद बनकर के वहां पे उनकी स्थापना हुई है तो मां जो है कर महातीर्थ में रही थी उनकी चरण राज वहां पे गिरी है और हम ईश्वर को प्रार्थना करेंगे की हमको यदि पुनः जन्मजदी होता है तो इस कर महातीर्थ में रहने का मौका मिले और भगवान यदि यह कहता है की कुत्ते का जन्म लेना होगा तुमको मनुष्य यानी में वहां पे नहीं जा सकोगे तो वो भी हमको जो है वो भी हमको स्वीकार स्वीकार्य है स्वीकृत है हम कुत्ता बनकर के भी कुकर बने हो खाने अमृत ठाकुर कुत्ते का शरीर धरण करके भी हम इस कर महातीर्थ में किसी एक में या चारों में रहने के लिए बिल्कुल तैयार है तो आज गुरु पूर्णिमा का शुभ दिन सबको कल्याण के लिए ठाकुरमार स्वामी जी के पास में मेरी प्रार्थना और आज का प्रसंग भी इस तरह से योगाणु योग इतना सुंदर हो गया गुरु भक्ति की पराकाष्ठा अपने ओल्डर में कितने ही गुरु भक्ति की पराकाष्ठा दिखाने वाले कितने ही बड़े बड़े नाम हैं किंतु एक इस तरह से ब्रह्मचारी महाराज जिनका नाम भी किसी ने नहीं सुना इस तरह के एकदम जिसको की नगरी का सकते हैं नहीं कहना चाहिए किंतु फिर भी अब व्यवहारिक दृष्टि से नागाणिया का सकते हैं इस तरह का एक ब्रह्मचारी ने किस तरह से गुरु भक्ति की पराकाष्ठा दिखा दी वो हमने आज देखा सुना अभी कल फिर से ओम शांति शांति