मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन वराह नगर पीरियड का हम पाठ कर रहे हैं। देख रहे हैं विभिन्न सोर्स से कलेक्टेड जो मटेरियल है उस सबको मैंने पॉइंट बाय पॉइंट सजाया है। तो इसमें अभी मास्टर महाशय शिवरात्रि के दिन 1887 वराह नगर मठ में आए हैं। उस दिन का वर्णन चल रहा है। कल हमारा कुछ डिस्कशन हुआ था
स्त्री के प्रति आकर्षण का त्याग करना है, उनके प्रति घृणा नहीं रखनी
स्वामी जी ने कहा था कि कामिनी कांचन त्याग ना करने से होगा नहीं। कामिनी है नरक का द्वार। जितने भी लोग हैं सब स्त्री के वश है। ठाकुर कहते हैं ना कि क्यों बोले ना अमर परिवार मंदो शबाई बोले भो कोई ऐसा नहीं कहता कि मेरी पत्नी है वो खराब है सब कहेंगे अच्छी है तो शिव और कृष्ण एदेर आला को था शिव और कृष्ण की बात अलग है शिव ने शक्ति को शिव ने दासी करके रखा था श्री कृष्ण ने संसार किया था किंतु किस तरह से निर्लिप्त फट करके वृंदावन कैसे त्याग किए तो यह डिस्कस करने के समय यह भी हमने देखा था कि ठाकुर या स्वामी जी का शक्ति का या स्त्री का अपमान करने का थोड़ा सा भी आशय नहीं था। ये जो अपना फ्रेमवर्क है ना ओवरऑल फ्रेमवर्क कि किस तरह से एक तो है आध्यात्मिक जगत एक तो है कम्युनिटी लाइफ दैट इज कि एक सांसारिक जगत और एक है सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग यानी कि एक संस्कृति पूरी देश और संस्कृति तो यह जो तीन एस्पेक्ट है ह्यूमन लाइफ के उसमें जहां तक ईश्वर की ओर हमारी आराधना है। ईश्वर को प्राप्ति की जो हमारी साधना है वहां पर यह विजातीय आकर्षण स्त्री का पुरुष के प्रति या पुरुष का स्त्री के पति प्रति उसको संपूर्ण रूप से त्याग करना है। ईश्वर आराधना करने के लिए जब आप और ईश्वर इन दोनों का ही संबंध जहां तक है वहां पर थर्ड पर्सन कोई भी नहीं आना चाहिए। ठाकुर का एक ठाकुर तो ये सब ऑब्जरर्वेशन करते थे तो ऑब्जरर्वेशन करके सब उदाहरण खोज लेते थे तो एक उदाहरण देते हैं अनुभव ही अपना कि वो केशव के वहां पर वो एक नाटक देखने को गए तो अभी क्या है कि वो नव वृंदावन की ऐसा ही कुछ नाटक का नाम था तो पास में एक डेप्यूटी यानी कि एक गवर्नमेंट की ब्रिटिश राज की एक अच्छी गवर्नमेंट पोजीशन पे एक आदमी था इंडियन ही था वो वो था तो ठाकुर कह रहे हैं कि अरे वो कहां नाटक देखेगा? नाटक में क्या वो भगवान का पात्र वो कर रहा है? उससे कुछ सीखेगा ना कि वो उसका एक एक लड़के को लेकर के ही वो सब व्यतिस्त है। वो बिजी है। लड़के को कहां बिठाए क्या करें? कैसे करें उसी को लेकर के। तो ठाकुर नाराज होकर के बाद में कहते हैं नाटक देखो। तुमको यह भगवान का पात्र चल रहा है। भगवान का जो कुछ थोड़ा बहुत उपदेश मिल रहा है वो देखो। नहीं कि वह लड़के को लेकर के व्यस्त है। तो जहां तक हमारा और आत्म साक्षात्कार ब्रह्म ज्ञान ईश्वर दर्शन जो फिलॉसोफी में हम विश्वास करते हैं। जहां तक हमारा वह जर्नी है, उर्ध्व जर्नी है, उर्ध्व यात्रा है, तब तक बीच में कोई नहीं आना चाहिए। हमारा अफेक्शन हमारा अटैचमेंट, हमारा प्रेम, हमारा जो भी अटेंशन है सिर्फ ईश्वर या आत्मज्ञान उसी के ऊपर में केंद्रित होना चाहिए। तो इसलिए जब उसमें कोई बाधा देने को आता है तो फिर इस तरह से उनको नकार देना है। इस तरह से उनके साथ में फाइट करना है। इस तरह से उनको घृणा करनी है जैसे कि वह आकर के हमको फिर से डिस्टर्ब ना करें। वो ठाकुर का वो फेमस कि वो वहां पे अपने वरांडा में ही वह टहल रहे हैं और जोर-जोर से बोल रहे हैं तू या हमार की कोरे ने भी माने तू मेरा क्या बिगाड़ लोगी? तो फिर मास्टर महाशय वहां पर खड़े थे तो वह अनुमान करके कहते हैं कि क्या माया ठाकुर का मन लुभाने के लिए आई है क्या और इसीलिए क्या ठाकुर रुद्र स्वरूप धारण करके माया को काट दे रहे हैं क्या माया के साथ में झगड़ा कर रहे हैं क्या माया के साथ में फाइट कर रहे हैं क्या तो क्या है कि जहां तक हमारी आध्यात्मिक जर्नी का प्रश्न है हमको यह बात एकदम क्लियर रखनी है कि मैं और ईश्वर इन दोनों के बीच में तीसरा कोई नहीं आना चाहिए। मेरा अटेंशन, मेरा अफेक्शन, मेरा केयर, मेरा प्रेम सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की ओर ही जाना चाहिए। ईश्वर को ही मिलना चाहिए। 1% भी और किसी को ना मिले। एक बार ईश्वर साक्षात्कार हो जाता है। एक बार ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हो जाता है। फिर हम देखेंगे कि जो भी है इस संसार में समग्र संसार वही ईश्वर का ही बना हुआ है। जैसे मिट्टी है। मिट्टी में से यह कुम्हार जो है पोटर वो कभी घड़ा बनाता है तो कभी खिलौने बनाता है ना कभी यह कोई पात्र बनाता है। तो पहले तो यह हमको नेति नेति कि यह घड़ा भी मिट्टी नहीं है। यह पात्र भी मिट्टी नहीं है। यह खिलौने भी मिट्टी नहीं है। मिट्टी है। इन सबका सबस्ट्रेटम इन सबका अंडरलाइंग एलिमेंट इन सबका फाउंडेशन या इन सबका घटक जो इग्रेडिएंट तो ऐसा करके जो नाम रूप को नकारना है। नाम रूप के परे जाना है। उसके पीछे की जो अंडरलाइंग रियलिटी मिट्टी जो है उसको हमको समझना है कि हां सब कुछ मिट्टी से ही बना है। मैं भी मिट्टी से बना हूं। मिट्टी ही मेरा असली अस्तित्व मेरा असली स्वरूप है। एक बार यह पता चल जाए फिर विद दिस विज़डम विद दिस अंडरस्टैंडिंग फिर आप नाम रूप के जगत में आ जाइए। फिर आप घड़े को घड़े के रूप में नहीं देखेंगे। कहेंगे मिट्टी का घड़ा है। खिलौने को खिलौने के रूप में नहीं देखेंगे। कहेंगे कि यह मिट्टी का खिलौना है। वह पात्र है। पात्र के रूप में नहीं देखेंगे। कहेंगे मिट्टी का पात्र है। तो मिट्टी सर्वभूत में जितने भी मिट्टी के पदार्थ है उसमें विराजमान है। यह ज्ञान हो जाने के बाद में आप अपना अटेंशन हजार ओर फैलाइए कोई फर्क नहीं पड़ता। मिट्टी के घड़े की ओर यदि आपका स्नेह है तो वह तो मिट्टी की ओर ही है। क्योंकि आपको पता है वही मिट्टी का बना है। मिट्टी के खिलौने के प्रति आपका प्रेम है तो आपको यही पता है। एकदम पक्का पता है कि एक्चुअली वह खिलौना तो नाम रूप ही है। नेम एंड फॉर्म ही है। उसका जो बेसिक इंग्रेडिएंट है वह है मिट्टी ही और कुछ नहीं। तो फिर आपका अटेंशन बढ़ता है तो कोई फर्क नहीं पड़ता। तो यह नेति नेति करने के समय संसार त्याग करके संसार के नाम रूप के प्रति अपनी एक जो एक वासना कामना थी उसका त्याग करके नाम रूप के परे जो अल्टीमेट रियलिटी है उसको जहां तक प्राप्त करने का प्रश्न है तब यह कोई भी पदार्थ कोई भी ऑब्जेक्ट कोई भी व्यक्ति कोई भी पुरुष स्त्री हमारी नजर के सामने आते हैं तो घृणा घणा करके म हमारा अटेंशन वो खा जाने का प्रयास करते हैं। ठाकुर कहते हैं जब भी कोई स्त्री मेरे पास आती है तो उसके सभी छिद्र मैं बहुत बड़े-बड़े देखता हूं। जैसे कि मुझे खा जाने को आ रही है। तो क्या है कि जब नेति नेति वाला फज़ है उस समय इस तरह से त्याग करना है। और जैसे पुरुषों के लिए सही है तो स्त्रियों के लिए भी यह इतना ही सही है कि पुरुष संग या तो उनका उनके प्रति जो अफेक्शन है उसका इस तरह से त्याग करके अंडरलाइंग रियलिटी जो है पूरे जगत की उसको प्राप्त कर लेना है। और फिर चाहे संसार में आकर के राजा जनक की तरह वह ब्राह्म समाज वाले ठाकुर के पास जाके कहते हैं महाशय हमारा तो राजा जनक का मत है राजा जनक दो धारी तलवार चलाते थे वो संसार भी किए थे ब्रह्म ज्ञान भी प्राप्त किया था तो ठाकुर ने कहा कि ऐसा फर्स्ट करें जो फर्स्ट करे जिस तरह से मास्टर महाशय यहां पे लिखते हैं ना तो वैसे ही ऐसा फट करके क्या वो ब्रह्म ज्ञान जनक राजा हो जाएंगे क्या आप जनक राजा ने पहले तो सर नीचे पैर ऊपर करके कितनी तपस्या की थी। ईश्वर साक्षात्कार किया था। तब कहीं जाकर के उन्होंने यह राज्यत्व संभाला था। राज्य भोग किया था। तो वैसा फट करके तो जनक राजा होगा नहीं जाएगा कि मैं संसार भी करता हूं। ईश्वर प्राप्ति भी ईश्वर ज्ञान भी मैं अपनी मुट्ठी में रख के वो संसार की तलवार चलाता हूं। ऐसा तो होने नहीं वाला है। तो वह एक बात है कि इस सब के पीछे में क्या एनालिसिस किया है। तो वो हो गया कि जहां तक एक आध्यात्मिक जगत का प्रश्न है स्त्री को पुरुष का पुरुष को स्त्री का संग त्याग करना है। उनके प्रति घृणा भी करेंगे एक तरह से तो चलेगा। किंतु जहां तक यह कम्युनिटी लाइफ का प्रश्न है वहां पर स्त्री को संपूर्ण रूप से सम्मान देना है। यह जो स्वामी जी खुद भले ही चाहे इस तरह से बात करते हो किंतु स्वामी जी जिस स्त्रियों के संपर्क में आए थे उनके प्रति तो उनकी बहुत ही करुणा थी ही थी। यहां तक कि माने भक्त है, एडमायरर है, फॉलोअर है वह सबको तो छोड़ ही दीजिए। जब स्वामी जी के वही दूर दिन चल रहे थे तो एक लड़के ने स्वामी जी का ही मित्र था। बुरी संगत में फंस गया था। तो उसने देखा कि यह नरेंद्र का भी बुरा समय आज चल रहा है। तो चलो मैं जाकर उसको थोड़ा बहुत हेल्प कर लेता हूं। बोल कर के नरेंद्र को एक ऐसी स्त्री के पास ले गया जिसका चरित्र अच्छा नहीं था। तो नरेंद्र उसके साथ बात कर रहा है। किंतु अब नरेंद्र का भी क्या है ना ब्रह्म ज्ञान से तो वो झलझल कर रहा है। नहीं तो वो कहां पे जाएगा वो ठाकुर वो किस तरह से वो जो मारवाड़ी का वो जो खाना है और किसी को नहीं देते थे। नरेंद्र को देते थे। नरेंद्र खा लेता था। उसके पेट में यह ब्रह्म अग्नि प्रज्वलित है। भीतर में जो कुछ भी पड़ेगा सब शुद्ध पवित्र हो जाएगा। तो नरेंद्र जाता है किंतु भीतर में जो ब्रह्म अग्नि है तो पाप उसको स्पर्श नहीं करते हैं। पाप फेंकने से भी वो फट के स्वाहा हो जाएंगे अब ब्रह्मा अग्नि में तो नरेंद्र जाता है उस लड़की के साथ बात करता है और उसके प्रति कितनी करुणा कितना उसका प्रति दया कि देखो कौन से परिस्थिति में पड़कर के बेचारी को इस तरह का कार्य करना पड़ता है। आज कौन सी स्त्री सामने से जाकर के इस तरह के कार्य को स्वीकार करेगी। परिस्थिति बहुत ही खराब है। वो खानेपीने का भी कोई उपाय नहीं है। बोल के ही तो उसको यह सब करना पड़ता है। तो क्या है कि एक जहां तक आध्यात्मिक जगत का प्रश्न है स्त्रियों के प्रति घृणा पुरुष स्त्रियों के प्रति स्त्री पुरुष के प्रति घृणा करके उनको अपने मन में से धक्का मार के निकाल दे। यह उचित है। मां जैसी मां और किसकी बात हम करते हैं। मां वहां तारकेश्वर हत्या देने को गई। ठाकुर को कैंसर हो गया है। उनका जीवन प्रदीप जो है वह अभी अस्ताचल अभी वह बुझने वाला है। जीवन सूर्य अस्ताचल की ओर चल रहा है। तो सबको पता अभी धीरे-धीरे लग गया कि ठाकुर ने देह त्याग करने का निश्चय कर लिया है। तो मां जाती है तारकेश्वर हत्या देने के लिए कि यदि ईश्वर मेरी बात नहीं सुनेंगे तो और कौन सुनेगा? तो वहां पर हत्या देकर मां पड़ी है मंदिर में निर्जला उपवास खाया भी नहीं जल भी पान नहीं किया वहां पर वैसे ही पड़ी है और एकाएक ऐसी एक आवाज आई जैसे कि बहुत सारी मिट्टी के घट जो है एक के ऊपर एक सजाए हुए उसको लाठी मार के जोर से तोड़ दे तो भड़ांग करके आवाज होता है। इस तरह की आवाज आई और साथ में ही हृदय में से प्रकट हुआ। इस संसार में कौन किसका स्वामी, कौन किसकी पत्नी, किसके लिए मैं इस तरह से देह त्याग करने को यहां पर बैठी हूं। देखिए उस अल्टीमेट लेवल पर जब पहुंच जाते हैं तो यह सांसारिक रिश्तों को तो छोड़ ही दीजिए। वो दिव्य पवित्र रिश्ता था मां और ठाकुर का वह भी टूट जाता है। वह अल्टीमेट रियलिटी के पास में जाकर के संसार संसार के संबंध यह पति पुत्र भाई-बहन मां पिताजी चाचा चाची सब कहां हवा में विलीन हो जाएंगे। सिर्फ और सिर्फ मात्र वही अद्वय ब्रह्म वस्तु सतित आनंद ही झलझल करके ज्वलझल करके हमारे हृदय में वो प्रकाशित होगा। तो देखिए कि जहां तक आध्यात्मिक जीवन का प्रश्न है आप इस तरह से घृणा करके किसी को अपने मन में से निकाल दे वह भी उचित है क्योंकि कैसे भी करके आपको ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना है। नेति नेति मार्ग के समय में आपको एकदम क्लेरिटी रखनी है कि मेरा अफेक्शन मुझे किसी को देना नहीं। किंतु देखिए एक तो ठाकुर का बात है कि नेति नेति करके ब्रह्म ज्ञान सही-सही प्राप्त किया। उसके बाद में संसार में आकर के इति इति करके संसार में लौट के आए हैं। यही देख रहे हैं कि सभी के भीतर में वही मां जगदंबा ही विराजित है। वो एक रास्ते पर जा रहे हैं तो सब वो इस तरह की सब स्त्रियां खड़ी है बुरे चरित्र वाली। तो ठाकुर आश्चर्य के साथ में कहते हैं मां तुम क्या इस वेश में यहां पर खड़ी हो तो जगत में कोई भी है सांसारिक दृष्टि से जिसका चरित्र अच्छा नहीं जो लोगों की दृष्टि से तथाकथित लोगों की दृष्टि से यह लोगों का अपवित्र लोग जो है पापी लोग हैं उनके भीतर में भी यदि ठाकुर को मां जगदंबा का दर्शन होता है तो बाकी सब का तो प्रश्न ही कहां वो गड़े माठ एक मैदान है बड़ा सा वहां पर गए थे तो किला है और उसका मैदान है कोलकाता में तो वहां पर गए थे देखा एक साहिब का लड़का यह ब्रिटिश का लड़का एक ब्रिटिश बॉय वो वहां पेड़ के पेड़ से थोड़ा सा ये रेस्ट लेकर के खड़ा था पेड़ के सहारे खड़ा था त्रिभंग होकर के त्रिभंग मुद्रा पता है ना भगवान कृष्ण की तो ऐसे भगवान कृष्ण की त्रिभंग मुद्रा में खड़ा था तो यह ब्रिटिशर्स जो क्योंकि भारत पे इतना अत्याचार कर रहा है। भारतीयों का शोषण कर रहे हैं। भारतीयों को संपूर्ण रूप से तुच्छ समझ रहे हैं। ऐसा ब्रिटिश लड़के को देखकर के त्रिभंग मुद्रा में खड़ा है। तो फट करके ठाकुर को भगवान कृष्ण का उद्दीपन हो गया। तो देखिए कि यह इति इति मार्ग है। नेति नेति मार्ग पहले और फिर इति इति। अभी ठाकुर के लिए तो ठीक है। हम लोगों के लिए क्या हम लोग यदि एक म लिटरली इस बात को फॉलो करने को जाएंगे कि हां मैं पहले नेति नेति करके सबके प्रति घृणा अपने मन में भर लेता हूं। ईश्वर प्राप्ति करूंगा फिर कहीं जाकर मैं इति इति करूंगा तब फिर से लोगों को प्रेम करूंगा। मैं ऐसा करूंगा तो नहीं चलेगा। क्यों? क्योंकि ये नेति नेति करके ब्रह्म साक्षात्कार कब होगा? कितने जन्मों के बाद होगा? वह तो भाई अभी भगवान ही जाने ठाकुर ही जाने वो जो कहानी कि दो ऋषि मुनि तपस्या कर रहे हैं ठाकुर की कहानी नारद मुनि जा रहे हैं तो एक ऋषि ने पूछा आप जा रहे हैं वैुंठ लोक में भगवान को पूछिएगा अभी मुक्ति मिलने में और कितनी देर है तो नारद मुनि वहां से भगवान का उत्तर लेकर वापस आए कहा यह पेड़ के ऊपर में जितने पत्ते हैं उतने जन्म लगेंगे तो एक साधु बेचारा बड़ा ही डिप्रेशन में चला गया दूसरे ऋषि थे जो वो एकदम खुशख होकर के नाचना शुरू कर दिया कि अच्छा मतलब इतने जन्म के बाद में मुक्ति मिलेगी तो सही। तो देखिए कि हमको कौन से पेड़ के नीचे में बैठे हैं। हम तो पूरी पंचवटी के नीचे में बैठे हैं। 10 तरह के पेड़ है। 10 तरह के पेड़ पर लाखों शाखाएं लाखों करोड़ों ये पत्ते हैं। इतने जन्मों के बाद में मुक्ति मिलेगी। मैं यदि ऐसा सोचने को जाऊंगा कि यह जन्म तो नेति नेति करके ही बिताना है। स्त्रियों के प्रति घृणा करके ही बिताना है। और फिर जब ईश्वर साक्षात्कार होगा तब कहीं जाकर के स्त्रियों के भीतर में ब्रह्म ज्ञान के रूप से उनके भीतर में भी वही जगत जननी है बोलकर के उनको श्रद्धा करेंगे। तो ऐसा मेरे लिए नहीं चलेगा। क्यों? क्योंकि मुझे तीनों रियलिटी में एक साथ में रहना है। ठाकुर जब साधना करते थे तो वह यदि संसार को भूल जाते थे तो वह उनके लिए क्षम्य था। उनके लिए वह उचित भी था और उनको वो माने वो चल सहन हो जाता था। अब मैं संसार को भूल करके सिर्फ साधना करूंगा। मेरे में वह कैपेसिटी ही नहीं है। यह मैं इतनी प्रचंड साधना कर पाऊं। वह जो कहते हैं ना वह कांटा नहीं है नहीं है। वह जब लगेगा जब पैर में से खून बहेगा और फिर कह के दिखाइए कि नहीं है यह नहीं है सब मिथ्या है। है ना? तो वो जब लगेगा तो हम उसको मिथ्या बोल के निकाल नहीं देने वाले हैं। वो प्रचंड विल पावर मेरे में नहीं है। मुझे ये तीनों रियलिटी के साथ में रहना है। यहां पे मुझे आध्यात्मिक जर्नी भी करनी है। यहां पे पैरेलल यह जो कम्युनिटी लाइफ है ये भले ही चाहे मैं संसार में ना रहता हूं किंतु आश्रम में भी तो एक कम्युनिटी है। आश्रम में भी ये चारप साधु 101 साधु जो भी है यहां पे रहते हैं। स्टाफ है, वालंटियर है, डिवोटी है। हमारा भी तो एक छोटा सा संसार है। हमको भी तो यहां पे रहना है। और फिर एक ओवरऑल सिविलाइजेशनल एक हमारा अवेयरनेस तो रहता ही है। और हम लोग यदि सिविलाइजेशन को इग्नोर करें वो तो हमको इग्नोर नहीं करने वाला है। यह ट्रंप ने इंडिया पे टारिफ बिठा दिया। इकोनमी यदि डाउन जा रहा है, पैसा रुपया यदि 90 के ऊपर जा रहा है, रुपीस टू डॉलर तो फिर वो मुझे तो कहीं ना कहीं अफेक्ट करने ही वाला है। आई कैन नॉट जस्ट कह कहूं कि ये नहीं यह डॉलर और रुपीस का क्या एक्सचेंज रेट है? मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो फर्क पड़ने ही वाला है। सभी चीजें महंगी होगी तो मुझे फर्क नहीं पड़ेगा। ऐसे कैसे होगा? तो मुझे तो तीनों रियलिटी में पैरेलल जीना है। यह स्पिरिचुअल रियलिटी है। यह कम्युनिटी लाइफ है। यह सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट है। तीनों में मुझे पैरेलल जीना है। तो फिर मेरी स्ट्रेटजी क्या होनी चाहिए? जहां तक आध्यात्मिक जीवन है वहां पे नेति नेति। और जहां पे यह कम्युनिटी लाइफ सिविलाइजेशनल लाइफ है, वहां पर इति ईति। यह नेति नेति और इति इति दोनों मेरे लिए पैरेलल चलना चाहिए। मैं ऐसा कर ही नहीं पाऊंगा। मेरा वैराग्य मंद वैराग्य है वो जो उच्च वैराग्य तीव्र वैराग्य नहीं कि मैं कहूं कि संसार मिथ्या है तो संसार मिथ्या हो जाए। हो ही नहीं सकता। मैं बिना कर्म के रह ही नहीं सकता। सुबह को शाम को चलो थोड़ा बहुत जब ध्यान कर लिया पाठ वगैरह कर लिया। यह सब थोड़ा सा आध्यात्मिक डिस्कशन कर लिया। दिन के जो पांच छ घंटे मिनिमम जो मुझे मिलते हैं उसमें मैं क्या करूंगा? उसमें मैं ना ही इतने एक्सटेंसिवली जप भी कर पाऊंगा, ध्यान भी कर पाऊंगा ना ही मैं इतना स्वाध्याय पाठ ये तो अध्ययन कर पाऊंगा। उस समय तो मुझे कुछ ना कुछ कर्म चाहिए। मैं कर्म नहीं करूंगा तो मैं पागल हो जाऊंगा। तो क्या है कि यह कर्म रजस तमस मेरे में भरभ के भरा है। सत्व का उदय हुआ है। सत्वगुण का उदय हुआ है। बोलकर के ही ठाकुर मां स्वामी जी को मैंने अपने गुरु के रूप में इष्ट के रूप में चुना है। और उनकी कही साधन पद्धति के अनुसार मैं जीवन बिताने का प्रयास कर रहा हूं। किंतु अपार्ट फ्रॉम दैट मेरा कंस्टिट्यूशन है वह उसमें 2 थर्ड तमस और रजस भरा है। अभी यह जब तक तमस रजस वर्कआउट नहीं हो जाते तब तक तो यह संसार मेरे लिए यह सत्य ही है। तो फिर मैं समग्र संसार नेति नेति करके छोड़ दूं कभी संभव नहीं। जब मैं सुबह शाम ईश्वर की आराधना करता हूं। जब ध्यान पाठ स्वाध्याय करता हूं। तब मेरे मन में यह नेति नेति वाला भाव एकदम स्पष्ट रूप से प्रज्वलित होना चाहिए कि संसार मेरे लिए मिथ्या है और मैं संसार के लिए मिथ्या हूं। सन्यास जिस दिन लिया उसी के समय मैंने यह श्राद्ध भी कर दिया था अपने ही हाथों। मैं संसार के लिए मर गया हूं। संसार के लिए मैं मर गया हूं। तो वह सुबह शाम ठीक है। किंतु फिर दिन के दौरान ऑफिस में बैठकर के जब कार्य करते हैं उस समय इति इति कि हां वही ईश्वर ही इस संसार का गठन किए हैं। भले ही चाहे मुझे ठाकुर की तरह स्पष्ट ना दिखता हो। किंतु एटलीस्ट मेरा यह फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग तो है कि हां भाई यह तो ठाकुर के ही एक ब्रह्म ब्राह्मण की ही यह सब किरणें हैं। यह जो वेदांत के उदाहरण में सब समय बातें करते रहते हैं कि इसी मिट्टी का यह नाम रूप के आवरण लगा के ये सब बने हैं। घट है, खिलौने हैं। वही समुंदर मेरे ऑफिस के सामने ही समुंदर है। तो समुंदर के ऊपर में लहरें उठती है। तो वही जल का ही समुंदर जल की ही लहर है। नाम रूप विभिन्न है। तो मुझे इंटेलेक्चुअली उसको समझ करके इंटेलेक्चुअली सबके भीतर में ईश्वर है, ठाकुर है, मां है। ऐसा करके सबके साथ में बिहेव करना है। यानी कि मेरे लिए वो नेति नेति ब्रह्म ज्ञान और फिर इति इति यह वाला रास्ता मेरे लिए नहीं है। मेरे लिए नेति नेति भी और इति इति भी दोनों पैरेलल चलने चाहिए। तभी मेरा जीवन सुख रूप जाएगा। तो यह स्वामी जी का जो पूरा डिस्कशन हमने कल किया था। अभी आगे थोड़ा सा और पाठ करते
जहाँ-जहाँ ठाकुर, माँ और स्वामीजी ने ध्यान किया या विचरण किया, वे स्थान पवित्र तीर्थ बन गए
हैं। क्या लिखते हैं मास्टर महाशय? 21 फरवरी 1887 नरेंद्र गंगा स्नान कोरिया मठे फिरी। नरेंद्र ने गंगा स्नान किया और मठ में वापस आया। हाथ भिजे कापड़ और गमछा और हाथ में है गीला कपड़ा और गमछा यानी कि टोवेल शारदा ये तो खण शमोश तो गाय माटी माखा शारदा भविष्य के त्रिगुणातीतानंद जी अब भविष्य के क्या वर्तमान में विजा होम हो चुका है तो त्रिगुणातीनंद जी शारदा महाराज अभी तक समस्त देह पे मिट्टी लगा के राह देख रहे थे अपेक्षा कर रहे थे आशिया नरेंद्र के साष्टांग होइया नमस्कार कर ले जैसे ही नरेंद्र आया नरेंद्र को साष्टांग होकर के नमस्कार किया प्रणाम किया देखिए गुरु भाइयों का नरेंद्र के प्रति कितना श्रद्धा है और ये देह पर मिट्टी लगा के रहना वो गंगा स्नान से पहले यह अपना वो देसी सोप म ओरिजिनल सोप आजकल तो यह सब साबुन हम इस्तेमाल करते हैं ना वो ओरिजिनल साबुन है तो एंटीसेप्टिक तीनों शिवात्रि उपवास करिया छे उन्होंने भी शिवरात्रि का उपवास किया है। गंगा स्नाने जाईबेन गंगा स्नान के लिए जाएंगे। शारदा महाराज वह अभी तक पूरे देह पर मिट्टी लगा के राह देख रहे थे। कब नरेंद्र आए जैसे ही नरेंद्र आया साष्टांग प्रणाम किया। उन्होंने भी उपवास करके रखा है और अभी वह खुद गंगा स्नान के लिए जाएंगे। नरेंद्र ठाकुर घरे गया। ठाकुर प्रणाम को लेन ओ उपविष्ट होइया कितकाल ध्यान को लेन नरेंद्र ठाकुर घर में गया और ठाकुर को प्रणाम किया और फिर बैठकर के उपविष्ट होकर के कुछ समय के लिए ध्यान किया। देखिए इन लोगों का पूजा वगैरह करना ठाकुर घर में जाकर के वह भी तो एक देखने वाला होगा ना। मैंने एक स्मृति कथा पढ़ी है। मैं भूल गया किसने लिखी है। आई थिंक यतिश्वरानंद जी ना कि ऐसे ही किसी ने लिखी है। साउथ इंडिया की बात है। शशि महाराज चेन्नई मठ चला रहे हैं। उस समय का मद्रास राजा महाराज आए हुए हैं। तो वैसे तो शशि महाराज अभी शायद दैनिक डेली पूजा नहीं करते होंगे चेन्नई में। वो तो फिर और किसी को दे दिया होगा साधु ब्रह्मचारी को। किंतु अभी राजा महाराज आए हैं। तो शशि महाराज ने राजा महाराज को रिक्वेस्ट किया कि राजा आज तुम्हारे हाथ तुम्हारे अपने हाथों से तुम ठाकुर की पूजा करो। राजा महाराज तो ठाकुर के मानस पुत्र तो मद्रास में ठाकुर की स्थापना हुई है। शशि महाराज ने की है। शशि महाराज नियमित पूजा भी करते हैं। किंतु यह गुरु भाइयों का देखिए कि इन लोगों के प्रति श्रद्धा कितनी है। जिनको कि ठाकुर लीडर बना के गए थे। प्रथम लीडर तो थे स्वामी जी और फिर स्वामी जी की महासमाधि के बाद में लीडर थे राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद तो शशि महाराज राजा महाराज को रिक्वेस्ट करते हैं कि भाई तुम अपने हाथों से यहां पर ठाकुर की सेवा करो पूजा करो तो क्या है ना जैसे कि ठाकुर जागृत हो जाएंगे अभी ठाकुर तो जागृत है ही है शशि महाराज ने स्थापित किया है तो कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु फिर भी शशि महाराज की इच्छा थी तो जिन्होंने यह रेमिनेसेंस लिखा है मोस्ट प्रोबेबबली यतिश्वर ानंद जी की वैसा ही कोई था म फेमस साधु है अपने ऑर्डर के तो वो जब ये बातें चल रही है दोनों की तो बड़े खुश हो गए कि आज मुझे राजा महाराज की पूजा देखने का मौका मिलेगा। राजा महाराज ठाकुर के मानस पुत्र वो तो ठाकुर की गोद में बैठकर के बच्चा जैसे मां का स्तनपान करता है। इस तरह से वो ठाकुर का स्तनपान करते थे। यानी कि ठाकुर और राजा महाराज इन दोनों इतने उच्च भाव में रहते थे कि वो हमारे जो जड़ बुद्धि के समझ के परे हैं। तो अभी यदि राजा महाराज ठाकुर की पूजा करेंगे तो जो सुमधुर दृश्य का दर्शन करने का सौभाग्य गुरु भाइयों को मिला था। ठाकुर के शिष्यों को मिला था वो आज मुझे भी मिलेगा। बोलकर कि ये महाराज जी वो भी ठाकुर घर में जाते पीछे पीछे। अनफॉर्चूनेटली वो लिखते हैं कि मैं इतना हताश हो गया जब ये शशि महाराज और राजा महाराज दोनों एक बार गर्भगृह में चले गए फिर शशि महाराज ने गर्भगुरु का दरवाजा बंद कर दिया यानी कि बाहर से कोई भीतर ना जा सके ना ही किसी को दिख सके कि राजा महाराज कैसे पूजा करते हैं। तो यहां पे ये स्मृति कथा का तो अंत आ जाता है। किंतु देखिए कि हम अभी तो अनुमान करने के अलावा कोई उपाय नहीं है कि भीतर में क्या हुआ होगा कि राजा महाराज है ठाकुर है और शशि महाराज है तो अनुमान ही करना है किंतु देखिए यहां पे भी ये जो एक ही लाइन लिखी है मास्टर महाशय ने कि नरेंद्र ठाकुर घर में जाकर नरेंद्र ने ठाकुर घर में जाकर के ठाकुर को प्रणाम किया और फिर उपविष्ट होकर के कुछ समय तक ध्यान किया स्वामी जी ने ध्यान वहां बेलूर मठ में भी किया है वही जो ओल्ड शाइन फेमस ओल्ड शाइन अ मैं जब भी बेलूर मठ में था तो मेरा हमेशा के लिए यह रूटीन था कि इवनिंग आरती जब समाप्त हो जाती है उसके बाद में ओल्ड शाइन के भीतर में जाकर के बैठकर के वो पुराना मंदिर यदि आपको पता होगा तो जहां पे आज मठ ऑफिस है मैनेजर महाराज का जो कम ऑफिस है उसके ऊपर में स्वामी जी का बेडरूम है और उसके सामने जो बाकी जब जनरल जनरल ऑफिस है। उसके ऊपर में अपना पुराना मंदिर है ओल्ड शाइन। तो वहां पर ओल्ड शाइन में क्या है कि वैसे तो डिवोटीज को जाने के लिए जो रास्ता है सिर्फ बाहर तक ही है। बाहर ही जा पाएंगे। किंतु साधुओं के लिए भीतर में जाने के लिए और एक सीढ़ी है। वहां से यदि ऊपर जाएंगे तो पहले फिर महापुरुष महाराज का बेडरूम आता है और फिर वहां से आप ओल्ड शाइन के भीतर में प्रवेश कर सकते हैं। अभी हुआ ऐसा माने अह ऐसा था मैं जब जॉइ करने को गया था बेलूर मठ में तो पीपीटीसी तो वहां पे ऐसा नियम था कि संध्या आरती के बाद में हम सभी ब्रह्मचारियों को स्वामी जी का जो समाधि मंदिर है वहां पर फर्स्ट फ्लोर पर जाकर के हमको ध्यान करना है। एक घंटा पक्का बैठना है। किंतु वहां पर जाए उससे पहले जितने भी मंदिर है सब जगह पर प्रणाम कर लेना है। तो ओल्ड शाइन में प्रणाम करना है। फिर वह सब जगह पर प्रणाम करना है। तो मैं जॉइ करने को आया ही था ना। उस समय मैंने यह सब कहानियां पढ़ के रखी थी कि हां यह ओल्ड शाइन वही जगह है जहां पे भी राजा महाराज, स्वामी जी, महापुरुष महाराज ये जितने भी स्टोलवा्स है अपने ऑर्डर के सबने वहां पर बैठ के ध्यान किया है। तो मैं बाहर से देखता था। हमको अंदर जाने का अनुमति था। अंदर जाकर प्रणाम करते थे। किंतु बैठना वहां पर नहीं था। बैठना है वहां पे पक्का फिक्स जगह है वो स्वामी जी का समाधि मंदिर का फर्स्ट फ्लोर जहां पे ओमकार मंदिर है वहां पे ओमकार शाइन है वहां पे तो वो तो मेरा जब जॉइ करने को आया था तब की बात तब मुझे लगता था यहां पर बैठ के ध्यान करने को मिले ओल्ड शाइन में जहां पर स्वामी जी स्वयं बैठे थे तो कितना आनंद आएगा किंतु वो तो हमारा फिक्स था कि ऐसा ही रूटीन फॉलो करना है तो ठीक है चलो फिर मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में गया ट्रेनिंग सेंटर में हमको दो साल रहना करना है। वहां पर ऐसा नियम था कि संध्या आरती के बाद में ट्रेनिंग सेंटर में वापस आकर के वहां पे जो चटिंग हॉल है वहां पर जाकर के हमको ध्यान करना है। उस समय भी हमको वहां पर बैठने का परमिशन नहीं था। तो वो प्रणाम करते थे किंतु प्रणाम करके सिर्फ सोचता ही था मैं कि यहां पर बैठने को मिलेगा तो कितना अच्छा होगा। किंतु मेरा जब पोस्टिंग हुआ बेलूर मठ में कंप्लीट वर्क्स के लिए उस समय मुझे लगा कि यह गोल्डन चांस है। अभी मैं जाकर के ओल्ड शाइन में बैठकर के ध्यान कर सकता हूं। अभी तो मुझे रोकने वाला कोई नहीं। किंतु क्या है? आपको आपने यदि ओल्ड शाइन देखा होगा मुश्किल से आई थिंक 15 फुट बाय 10 फुट का साइज है। बहुत छोटा सा है। तो मैं उस समय इस इंप्रेशन में था। बिल्कुल पहली बार मैं पोस्टिंग के बाद में जब गया था कि यहां पर तो पता नहीं सब सीनियर साधु आकर के बैठते होंगे। वह तो मेरा तो अभी जस्ट सन्यास हुआ है। तो सीनियर साधुओं की तब जगह भी फिक्स होगी। मैं कहां पर बैठूंगा और मैं बैठ जाऊंगा। कोई आकर उठाएगा कहेगा अरे ये तो मेरी जगह है तो फिर अच्छा नहीं लगेगा। तो मैं दो-तीन दिन तो मैंने क्या किया? मैं बाहर बैठता था। जहां पे सब डिवोटियों को बैठने की जगह है वो बाहर बैठकर के मैं भीतर में देखता रहता था कि कौन सी जगह खाली होती है। पहले तो सब साधु आ जाएंगे बैठ जाएंगे सीनियर साधु फिर जो जगह खाली होगी वहां पर दूसरे दिन जाकर मैं बैठूंगा तीन चार एक सप्ताह ऑब्जर्व किया देखा कोई आकर के बैठता नहीं है मुश्किल से एक दो साधु आएंगे प्रणाम करेंगे दो-ती मिनट बैठेंगे चले जाएंगे तो मैंने सोचा अरे यह पूरा खाली ही रहता है संध्या आरती के बाद में ओल्ड शाइन कैसी बात है तो अच्छा है मेरे लिए तो अच्छा ही है फिर उसके बाद में मैं डेली जाकर के वहां पर बैठता था रेयरली कोई आता था दीप्ति महाराज बीच-बीच में कभी-कभी आते थे तो उनको छोड़कर के और किसी को मुझे याद नहीं आ रहा है कि वहां पर बैठे हुए देखा मैंने। तो दैट वास वन ऑफ द बेस्ट टाइम कि पता है कि यहां पे ही ठाकुर ओरिजिनली स्थापित हुए थे बेलूर मठ में। इसी शाइन में बैठकर के स्वामी जी ने भी ध्यान किया है। राजा महाराज ने भी ध्यान किया है। महापुरुष महाराज ने भी किया है। बाबूराम महाराज, शरद महाराज जितने भी अपने गुरु भाई थे बेलूर मठ स्थापित करने के समय में जीवित थे। सदेह वर्तमान थे। सभी ने यहां पर ध्यान किया है। सो योगानंद जी पता है ना योगानंद जी का सर्वप्रथम देहांत हुआ था। बेलूर मठ देखने के लिए आए थे। बेलूरमठ में आई थिंक जमीन पर पैर रखा था कि नहीं। आई एम नॉट श्योर किंतु इतना मुझे पक्का पता है कि बेलूर मठ की जमीन ले ली गई थी। उद्बोधन में वह बीमार थे। नौका में बिठा के उनको लाया गया था जमीन का दर्शन करवाने के लिए। तो मां को भी इस तरह से मां आई है नीलांबर गार्डन में। तो मां नीलांबर गार्डन में पहले भी शायद एक दो बार आई है। तो अभी जाने का समय है। उस समय मठ की जमीन तो खरीदी गई है और स्वामी जी वहां पे अपने से ऊपर स्वामी जी थे कि नहीं शायद मुझे याद नहीं। किंतु बाकी सब गुरु भाई थे। तो मां अभी नौका में बैठकर के वापस जा रही है कोलकाता। तो उस समय किसी ने मैसेज भेजा। मोस्ट प्रोबेब्ली राजा महाराज ने मैसेज भेजा कि मां को कहो कि बेलूर मठ की नई भूमि अभी हमने खरीद की है तो अपने श्री चरणों की रज वहां पे स्थापित करके जाए तो वो फिर सभी मां ने भी कहा हां चलते हैं फिर सभी लोग जो थे मां के सेवक मां को लेकर के बेलुरुर मठ की भूमि पे गए मां ने एकदम स्वामी जी स्वामी जी थे थे स्वामी जी स्वामी जी मां को कहते हैं मां तुम्हारे निजेर जाएगा तुम हाथ छेड़े एकने घरे बेड़ाओ माने मने एकदम तुम्हारी खुद की जगह है। तुम एकदम शांति से मतलब एकदम बिना किसी टेंशन के यहां पे हाप छेड़े। हाप छेड़े का क्या अर्थ है? एकदम विदाउट एनी टेंशन एकदम शांति से शांत चित्त से इस भूमि पे तुम विचरण करके घूमो। तो मां ने भी बड़े ही आनंद पूर्वक वहां पर विचरण किया था। सारा भूल वगैरह निवेदिता मे वगैरह वो वहां पे वो टेंट में रह रहे थे। उसी भूमि पे तो उनका भी उनके साथ में ही मुलाकात किया था। सो दैट इज बेलूर म्य उतना पावर है। तो यहां पे जो लिखते हैं
नए आश्रम कहाँ स्थापित किए जाएँ?
अपने मास्टर महाशय कि नरेंद्र ने ठाकुर घर में जाकर के ठाकुर को प्रणाम किया और उपविष्ट होकर के कुछ समय के लिए ध्यान किया। ये लोग जहां जज जहां भी ध्यान करेंगे वो भूमि एकदम पवित्र हो जाएगी। देखिए अपने जितने भी तीर्थ स्थान वो सब तो किसी ना किसी महात्मा की तपस्या पे बने गए हैं। तो मैं जब शुरू-शुर में जब संघ के बारे में यहां पे आने के बाद में अपनी ये जो एक्टिविटीज है जो न्यूज़ आता है जितना मैं सुनता था ना तो मेरे मन में एक प्रश्न होता था कि देखिए नई-नई जमीन लेना नए आश्रम बनाना तो कहां पे ये लोग बना रहे हैं? जैसे कि यह सब गुरु भाइयों का जन्म स्थान है। यह गुरु भाई जहां पे गए हैं, वह सब जगह पे यह लोग नए-नए सेंटर खोल रहे हैं। और जबकि अब जैसे बॉम्बे की बात करूं बॉम्बे है जैसे कि अपना क्या कहेंगे? हार्ट और ब्रेन भारत का म फाइनेंशियल कैपिटल। वहां पे कहां पे खार में एक सेंटर है। वहां पे तो एटलीस्ट एक डजन सेंटर बॉम्बे में होने चाहिए। जिस तरह से चेन्नई में हमारे इतने सारे सेंटर हैं। तो चेन्नई और कोलकाता चार तो मेट्रो सिटी है। चेन्नई और कोलकाता में इतने सारे सेंटर हैं। किंतु दिल्ली और बॉम्बे में देखेंगे कि अपना प्रेजेंस बहुत ही लिमिटेड है। तो कहां वहां पे मल्टीपल सेंटर ओपन करने हैं। उसकी बजाय कहां-कहां छोटे-छोटे गांव में कि चलो अभी लिमड़ी है। जैसे कि गुजरात का ही मुझे पता है। लिमड़ी है, पोरबंदर है, आदिपुर है, भुज है। वहां पे कुछ नहीं है। ऐसा यदि आप देखा जाए वहां पे हम लोग सेंटर खोल करके साधुओं को तीन-तीन चार-चार साधुओं को बिठा के रखे हैं। जबकि ये दिल्ली है या बॉम्बे है जहां पे एटलीस्ट एक डजन सेंटर हम एक्स्ट्रा करें ओपन आराम से वह अब्सॉर्ब कर लेगा सिटी। इतना एनर्जी है। इतना डिमांड है। इतना हमारे पास में देने का कैपेसिटी भी है। तो वह नहीं करके यहां पे स्वामी जी गए तो चलो यहां पे सेंटर ओपन कर लो। यहां पर स्वामी जी गए तो यहां पर सेंटर ओपन कर लो। ऐसा क्यों करते हैं? वहां पर सेंटर ओपन करने के बाद में कोई भी आता नहीं है। लोग पहले तो जाकर के बहुत हल्ला मचाएंगे बेलूर मठ में। महाराज जी ये जगह ले लीजिए। सेंटर बना दीजिए। हम पैसा दे देंगे। सब करेंगे। ऐसा हल्ला तो बहुत करते हैं। सेंटर ओपन करने के बाद में पता चला कि कोई आता नहीं है। तो यह बार-बार हम लोग इस तरह का क्यों करते हैं? ये एक प्रश्न मेरे मन में उठा था। किंतु फिर देखिए कि यह क्या है कि जहां तक बॉम्बे दिल्ली में सेंटर बनाने की बात है उसमें से तो कोई इंकार नहीं करेगा कि होना ही चाहिए। किंतु यहां पर सेंटर नहीं होना चाहिए। यह थिंकिंग मुझे लग रहा है कि मेरा जो था अभी तक वह गलत है। क्योंकि जहांजहां पर भी स्वामी जी गए हैं उनके चरणों की रजगिरी है। वहां पर यदि आश्रम बनता है तो मुझे लगता है कि उस आश्रम में ना एक आध्यात्मिक का वातावरण बनेगा। सहज रूप से बनेगा। जबकि यह अभी बॉम्बे में इतने सारे सबबर्ब है। सेंट्रल मुंबई है। वहां पे जाके हम वैसे तो स्वामी जी वहां पर भी गए थे आई थिंक। तो किंतु वहां पे क्या है कि यदि स्वामी जी का प्रेजेंस एस सच नहीं रहेगा तो वो आध्यात्मिक शक्ति खड़ा करने में ना बहुत टाइम भी लगेगा। बहुत एनर्जी भी डालनी पड़ेगी। तो दीज़ आर ऑल क्या है कि एजोटेरिक कंसीडरेशंस है जो कि अपनी बुद्धि के परे हैं। लॉजिकली सोचने को जाएंगे तो हमारा बुद्धि काम करना बंद कर देगा। किंतु आपको ना फिर एक हायर थिंकिंग की जरूरत है। यह सब हायर लेवल के डिसीजन लेने के लिए। तो
भवनाथ पर स्वामी विवेकानंद के दो अलग दृष्टिकोण
भवनाथ कोथा हो। अभी स्वामी जी ने कुछ समय ध्यान किया। फिर बाहर आए। फिर वो जो जैसा वहां पे वो मेला बनता है ना आनंद का बाजार। आनंद की हट तो वहां आनंद की हट बैठी है और सब हल्लागुल्ला चल रहा है। उसमें भवनाथ की कथा होते छ भवनाथ की बात हो रही है। भवनाथ विवाह करिया छे भवनाथ ने विवाह किया है। कर्मकाज कोते हो छे नौकरी करनी पड़ती है। अभी वह वही भवनाथ जो कि ठाकुर ने कहा था वह वर राजा सेजे यश लोहे खाने काशीपुर में थे ठाकुर तो वर राजा की तरह सजध करके वो गया था वहां पे और पूछता है महाशय कैसे हैं म ये तो एक जिसके साथ में कोई आप आंतरिक संबंध नहीं है म हृदय का संबंध नहीं है उनके साथ में तो आप इस तरह से कहेंगे ना उपलक दृष्टि से कैसे हैं आप अच्छे हैं तो मैं आपकी ज्यादा और बात नहीं सुनना चाहता ज्यादा ज्यादा आपकी समस्या सुन लूंगा तो फिर मुझे ऑब्लिगेशन में आ जाऊंगा आपको हेल्प करने के लिए। इसलिए ऊपर ऊपर से पूछता हूं। अच्छे हैं तो और आपको भी ऑब्लिगेशन में इसी तरह से उत्तर देना है कि हां माने मैं अच्छा हूं। बस वहीं पर बात खत्म। तो तो ठाकुर कहते हैं वर राजा सच करके आया था और पूछ रहा है कि महाशय अच्छे हैं तो आप तो वही भवनाथ तो भवनाथ ने विवाह किया है और फिर नौकरी की व्यवस्था उसको करनी पड़ती है नरेंद्र बोलते छे नरेंद्र कह रहा है यह यही नरेंद्र जिस भवनाथ ठाकुर ने कहा था एक है प्रकृति एक है पुरुष तो वो नरेंद्र और भवनाथ की जोड़ी थी वो भवनाथ की वो जोड़ी टूट गई क्या कहता है नरेंद्र और ओरा तो संसारी कीट वो तो है संसार का कीड़ा। नरेंद्र के भीतर में अभी वो जो वैराग्य अग्नि प्रज्वलित हो रहा है। तो वो तो है सांसारिक कीड़ा। देखिए यही नरेंद्र यही स्वामी जी जब अमेरिका जाते हैं पत्र लिखते हैं वहां पे भारत में तो फिर लिखते हैं पत्र में जो जो कर रहा है जो कुछ भी कर रहा है। कौन क्या कर रहा है? सबका मुझे खबर दो। तुम लोग पत्र क्या लिखते हो? ऊपर ऊपर से मैं जो प्रश्न करता हूं उसका उत्तर नहीं देते। के फालतू की बातें लिखते रहते हो। स्वामी जी अपने गुरु भाइयों को कहते हैं यही राजा महाराज, शशि महाराज वगैरह का सबकी खबर लो। हम लोगों का और फिर स्वामी जी कहते हैं ऐसा घमंड नहीं करना है कि मैं साधु हूं वह संसारी है। इस तरह का घमंड करने से नहीं चलेगा। सबकी खबर लेना है। सबको वेलकम करना है। सबका ध्यान रखना है। सबके प्रति स्नेह प्रीति का संबंध रखना है। तो वो अमेरिका वाले स्वामी जी और ये भैरव स्वामी जी वो त्यागी स्वामी जी श्मशान वासी स्वामी जी तो अभी वो अभी तो वीरजा होम किया है ना पिछले महीने वी विजा होम हुआ था। तो त्याग और वैराग्य का नेति नेति मार्ग का जो आकर्षण है, नेति नेति मार्ग का जो प्रभाव है, वह नरेंद्र के ऊपर में इतना सवार है तो ऐसा फट करके वो स्टेटमेंट मारता है। नरेंद्र का ऐसा था ना हथौड़ा छाप वो हथोड़ा मार स्टेटमेंट देगा बीच-बीच में। तो वैसे ही के ओरा तो संसारी कीट वो तो संसार के कीड़े हैं। उसके बारे में क्या बात करनी?
गंगा तट पर बेलूर मठ की संध्या: जब वातावरण दिव्यता से भर उठता है
अपराहन होो दोपहर हुई शिवरात्रि पूजा आयोजन होते छ शिवरात्रि की पूजा का आयोजन चल रहा है बेल काठ ओ बिलो पत्रो आहोण कोरा होलो बेल काठ अर्थात कि बेल की लकड़ी बेल के वृक्ष की लकड़ी और बिल्व पत्र उसका सब आहरण करना हुआ आहरण का क्या अर्थ है पता नहीं जो भी है पूजते होम होवे अच्छा वो वो होम करने के लिए जो लकड़ियों का जो बंदो बस करना है वह पूजा के बाद में होम होगा इसके लिए बिल बिल वृक्ष की लकड़ियों की व्यवस्था हो रही है संध्या हुई अच्छा ये तो दोपहर की बात हो गई अभी संध्या हुई है ठाकुर घरे धुना दिया शशि अन्ना घरे धुना लिया गले ठाकुर घर में धुना देकर के धुना पता है ना वो जो मुस्लिम फकीर लोग बहुत बार ऐसा करते हैं एक पात्र होता है पात्र के भीतर में कोयला वगैरह रखते हैं और उसके ऊपर में यह गुगड़ वगैरह रखा जाता है। क्रिस्टलाइज फॉर्म में पाउडर फॉर्म में भी होता है, क्रिस्टलाइज फॉर्म में भी होता है। तो उसको रख करके फिर उसमें से वो धुआं निकलता है। वाइट स्मोक निकलता है। बहुत ही सुंदर उसकी खुशबू होती है। और जनरली हम इसकी खुशबू को आध्यात्मिकता के साथ में एसोसिएट करते हैं। तो वही धुना लेकर के शशि महाराज ने ठाकुर घर में दिखाया और फिर अन्य-अ घर में भी जाकर के धुना दिखाने लगी। अभी तक हमारे सभी मंदिरों में यही प्रथा है कि आरती करने से पहले गर्भगृह में धुना दिखाया जाता है और फिर बाहर आकर के पूरे मंदिर में धुना घुमाया जाता है। यानी कि आरती से पहले पूरा वातावरण एकदम पवित्र हो जाता है। प्रत्येक देव देवीर पटेर काछे प्रणाम कोरिया अति भक्ति भरे नाम उच्चारण कोते छेन प्रत्येक देव देवी के पट अर्थात कि फोटोग्राफ के सामने जाकर के छवि के सामने जाकर के प्रणाम करके अत्यंत भक्ति भरे उनका नाम उच्चारण कर रहे हैं। श्री श्री गुरुदेवाय नमः श्री श्री कालिकाय नमः श्री श्री जगन्नाथ सुभद्रा बलरामेभो नमः श्री श्री षडभुजाय नमः श्री श्री राधा वल्लभाय नमः श्री श्री नित्यानंदाय श्री अद्वैताय श्री भक्तभ्यो नमः श्री गोपालाय श्री श्री यशोदाय नमः श्री रामाय श्री लक्ष्मणाय लक्षण लक्षणाय श्री विश्वामित्राय नमः देखिए बेलून मठ में हम लोगों का ऐसा ही कि जितने भी जगह है शराइन तो है समाधि मंदिर है वहां तो प्रणाम करना ही है। साथ में ही वो मैनेजर महाराज की ऑफिस है। इसके पीछे में एक वरांडा है। गंगा की ओर फेस करके वरांडा है। उसके सामने गार्डन है। गार्डन के बाद में गंगा है। तो वह जो वरांडा है स्वामी जी का बैडरूम है। उसके नीचे में तो वरांडा में क्या है जितने भी गुरु भाई है ना सबका फोटोग्राफ रखा है तो अभी जब आप मैं म जो कोई भी जॉइ करने को जाएगा ना बेलूर मठ में ट्रेनिंग सेंटर में या जॉइ करने के लिए पहली बार जब भी कोई जाता है तो एक सीनियर साधु कहां पर प्रणाम करना है वह दिखाता है तो मैं बिल्कुल पहली बार ज्वाइन करने को गया था तो मेरे वो सीनियर महाराज जी थे वो मुझे लेकर के बताते हैं संध्या आरती के बाद में पहले सीक्वेंस है एकदम एकदम सीक्वेंस को फॉलो करना है। ऐसा रैंडम प्रणाम करने से नहीं चलेगा। पहले वह ओल्ड शाइन में जाकर के वह पीछे से जाकर के महापुरुष महाराज के कमरे से क्रॉस करके ओल्ड शाइन में जाना है। वहां प्रणाम करना है। फिर दूसरे दरवाजे में से महापुरुष महाराज के बेडरूम में जाना है। वहां पर प्रणाम करना है। फिर नीचे आकर के वहां जो स्वामी जी के यही जो वरांडा की बात कर रहा हूं। गंगा की ओर ओपन होता है। वहां पे जाकर के जितने भी फोटोग्राफ है डायरेक्ट डिसाइपल के सबके सामने जाकर प्रणाम करना है। तो 16 15 फोटोग्राफ्स थे माइनस स्वामी जी तो सभी फोटोग्राफ्स के सामने जाकर के प्रणाम करना है। तो शुरू शुरू में क्या है कि लोग फॉलो करते हैं जिसको करना है। बाद में सभी बहुत सारे लोग अपना-अपना एक सिस्टम बना लेते हैं प्रणाम करने का। किंतु मुझे यह इतना अच्छा लगा था मुझे जब पहली बार बताया था कि 15 डायरेक्ट डिसाइपल का फोटो है। सभी के सामने जाकर के प्रणाम करना है। तो मैं आखिरी तक मैं जब भी बेलूर मठ में जितना टाइम रहा हूं मैंने एग्जैक्टली यही रूटीन फॉलो किया है। सभी फोटो के सामने जाकर उनका नाम अपने मन में लेके प्रणाम करना है। और फिर मैंने साथ-साथ में ही किया ना कि यह सब थोड़ा डेवलप कर दिया था। प्रणाम करने के समय राजा महाराज का फोटो है। राजा महाराज को प्रणाम कर रहा हूं। तो राजा महाराज का नाम उनका बर्थ ईयर उनका देह त्याग का ईयर कौन सा साल है तो उनका नाम लेके म सन्यास नाम फिर उनका वो डाक नाम यानी राजा महाराज और फिर उनका बर्थ ईयर और फिर उनका महासमाधि का साल ये चार चीजें मैं अपने मन में बोल रहा हूं वो बिल्कुल नया था ना मुझे तो इतना याद भी नहीं है पता भी नहीं किसका क्या नाम किसका क्या बर्थ ईयर किसका क्या डेथ ईयर तो ये मैं नाम सन्यास नाम फिर डाक नाम फिर बर्थ ईयर फिर डेथ ईयर यह चार अपने मन में वह आवृत्ति करता करता वह रटता रटता सबको प्रणाम करता था। तो ऐसा करते-करते एक ही महीने में मुझे पक्का याद हो गया था। शुरू-शुर में तो थोड़ा कंफ्यूजन होता है ना। शशि महाराज यानी रामकृष्णानंद जी की शारदानंद जी, शारदानंद जी यानी कि शरद महाराज ना कि काली महाराज, अभेदानंद जी यानी गंगाधर महाराज ना कि और कोई। शुरू-शुरु में थोड़ा कंफ्यूजन रहता है। थोड़ा समय तो लगेगा। बहुत सारे नाम है, बहुत सारी जगहें हैं। बहुत सारे फैक्ट्स हैं जो कि आपको याद रखने हैं। जो लोग बंगाली ही बचपन से ही यह सब सुनते देखते आ रहे हैं उन लोगों के लिए ठीक है। मैं तो बिल्कुल गुजरात से गया था। मेरा कोई बैकग्राउंड नहीं है यहां पे। तो याद रखने में थोड़ा सा कुछ समय लगा था जो तो इस तरह से मैं याद रखता था। सबका नाम लेके डाक नाम, सन्यास नाम, बर्थ ईयर, डेथ ईयर ऐसा मन में रटते रटते सभी को प्रणाम करता था। वंडरफुल वो जो संध्या का समय है वो जो येलो कलर का जो बल्ब है ना वो एक लगा रहता था ऊपर में और फिर यहां पे गंगा का किनारा है सुंदर गार्डन है बहुत कम लोग उस समय वहां पर रहते थे तो सबका नाम लेकर प्रणाम करना एक के बाद एक फोटो के सामने तो यहां पे भी यह जो शशि महाराज है धुना देते देते प्रत्येक फोटोग्राफ में जाकर के फोटोग्राफ के सामने जाकर के वह उस तरह से मंत्र पाठ करते-करते प्रणाम करते इसके बाद का अभी अपने नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
बेलूर मठ: मेरे जीवन के सबसे पावन क्षण
देखिए बेलूर मठ के इतनी सारी स्मृति है हम लोग मैं जब जॉइ करने को गया था उस समय समय क्या था? रूटीन फॉलो करना है। फिर वह सब रहता है ना आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत होती है। तो सब कुछ नया है मेरे लिए। ठाकुर मां स्वामी जी को सीरियसली पहली बार पढ़ रहा हूं। अब कौन राजा महाराज और कौन स्वामी जी यह भी कभी-कभी कंफ्यूज हो जाता था। तो वो उस समय क्या है कि बेलूर मठ एस सच एक एंजॉय करने का इतना मुझे नहीं हुआ। किंतु जब मेरा पोस्टिंग हुआ था चार साल तो बाय दैट टाइम अपने साहित्य के साथ में मैं बहुत ही अच्छे से परिचित हूं और फिर बेलूर मठ में रह रहा हूं। वो एक अलग ही आनंद था। ये चार साल मैंने बेलूर मठ के बाहर एक दिन भी पैर नहीं रखा। मुझे कोलकाता आना पड़ता था बीच-बीच में। वो अद्वैत आश्रम है वगैरह वो काम करना क्योंकि वह पब्लिकेशन का काम था तो अद्वैत आश्रम जाना पड़ेगा। तो उसको छोड़कर के मैं कहीं नहीं गया। एक भंडारे में नहीं गया। दैट इज वन ऑफ द बेस्ट टाइम इन माय लाइफ बेलून मठ के चार साल।
प्रश्न: स्वामी विवेकानंद के जीवन वो कौन से ट्रांसफॉर्मेशन आये — वराहनगर मठ के एक जगत-विरागी तपस्वी से युगनायक कैसे बने जो अमेरिका से भी प्रत्येक शिष्य के कल्याण के विषय में जानने की इच्छा रखते थे?
इसीलिए हमने कल बात की थी ना कि हम लोग माइलस्टोन का स्पेशल स्टडी करेंगे। वो अल्मोड़ा की गुफा इज वन ऑफ द माइलस्टोन। राजस्थान में उनको जो अनुभव हुए दैट इज अनदर माइलस्टोन। कन्याकुमारी इज़ वन ऑफ द बिगेस्ट माइलस्टोन इन स्वामी जीसस लाइफ। वन ऑफ द ग्रेटेस्ट माइलस्टोन कि पूरा उनका लाइफ जो है वह ट्रांसफॉर्म होना शुरू होता है। सो एव्री माइलस्टोन पे हम देखेंगे कि स्वामी जी के लाइफ में सीरियस ट्रांसफॉर्मेशन आता है। सो एंड स्वामी जी खुद लिखते हैं अपने लेटर में कि एक मेरे जीवन में तीन बड़े झंझवात आए हैं। एक झंझवात जो है जो कि मुझे ठाकुर के पास ले गया। दूसरा है जो कि मुझे अमेरिका ले गया। और तीसरा यह वाला है। यह स्वामी जी अपने जीवन के आखिरी समय में लिखते हैं कि यह पिछले एक दो साल से मैंने जो सफर किया है उसका कोई अंत नहीं है। मतलब नॉट फिजिकली मेंटली और किंतु अभी कहते हैं स्वामी जी कि अभी जो है मेरे मन में इतनी प्रचंड शांति फैल गई है। तो जितना बड़ा झंझवात था इतनी ही बड़ी शांति मेरे मन में है। किंतु प्रॉब्लम विद स्वामी जी इज कि जैसे ही शांति प्राप्त हुई परम शांति तो परम निर्वाण का टाइम आकर खड़ा हो गया। क्योंकि [हंसी] जब तक कर्म करना है तभी तो उनका देह है ना। तो आखिरी समय में स्वामी जी ये लेटर में लिखते हैं कि इस समय का जो झंझवत था मेरी लाइफ में जो स्टम था दैट वास द बिगेस्ट स्टम एंड एज अ रिजल्ट द पीस आई एम हैविंग इज द बिगेस्ट वन। किंतु हम लोगों को यह पत्र पढ़ के ही पता है कि अभी तो मतलब शांति मिली। दैट मींस अभी देह त्याग का समय हो गया। ना वह डिटेल हमको फिर इनफ करनी है ना क्योंकि स्वामी देखिए मन में क्या हां वो वो तो हां वो बिकॉज़ कि स्वामी जी के जीवन की घटनावली तो बहुत ही डिटेल में हमारे पास में अवेलेबल है तो जब उसका हम करेंगे डिस्कशन उस घटना का तो उसके रिलेवेंट सभी घटनाएं हम देख लेंगे किंतु यह सब एक्सटर्नली होगा ना इंटरनल उनके माइंड में क्या अब जैसे अमरनाथ का स्वामी जी ने अमरनाथ के बारे में इसमें मेंशन नहीं किया। किंतु मुझे लग रहा है कि जो इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था दैट इज़ अनदर सीरियस टर्निंग पॉइंट इन हिज लाइफ। तो जितने भी टर्निंग पॉइंट है फिर खीर भवानी का स्वामी जी कहते हैं कि मैं तुम्हारी रक्षा करता। मैं यदि होता तो मां कहती है तुम मेरी रक्षा करोगे ना कि मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी। तो वो जितने भी टर्निंग पॉइंट है ईच टर्निंग पॉइंट कंट्रीब्यूटेड समथिंग और देखिए यहां पे एक बात याद रखनी है आध्यात्मिक जीवन में तो जो सर्वोच्च प्राप्ति थी वो हो चुकी है किंतु ये सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग एक्सपंड हो रही है ना माने ये हजारों हजारों सालों की ये मनुष्य की यात्रा है सिविलाइजेशन और सिर्फ इंडियन सिविलाइजेशन नहीं पूरे विश्व में स्वामी जी घूमे हैं तो पूरे विश्व की सिविलाइजेशनल एक्सपीरियंस जो है जो कि हम कहेंगे कलेक्टिव कॉन्शियसनेस अपनी वो तो स्वामी जी के माइंड में प्रकट हो रही है। सो म इतने हजारों हजारों सालों से जितने भी देश है जितने भी धर्म है उनके जितने भी ऋषि मुनि जो अनुभूति उन्होंने की है सब स्वामी जी के मन में प्रकट हो रही है। व्हिच मस्ट बी सच ए ट्रेमेंडस वो एक्सपीरियंस रहा होगा। हम उसका एक तिनका भी कल्पना नहीं कर सकते। हम यह सोच मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में था तो ऐसे ब्रह कोईकोई ब्रह्मचार्य को ऐसा रिसर्च करने का एक होता है कि करेंगे कुछ रिसर्च तो एक ब्रह्मचारी महाराज रिसर्च कर रहे हैं। बोले कि मैंने स्वामी जी कहां-कहां पे गए हैं। मैंने सब मैप पे मेजरमेंट करके देखा है ना कि इतने हजार किमी उन्होंने यात्रा की है। तो वो मैं भूल गया एग्जैक्टली कि कौन फिगर है। बहुत बड़ी फिगर है। ऑब्वियसली पूरे भारत में घूमे विदेश में गए वगैरह। तो मुझे कहते हैं कि 39 इयर्स की एज में उसमें भी आप ठाकुर के साथ में थे वह तो दिन छोड़ ही दीजिए। माने 86 से माने 87 हां 1887 के आसपास में से स्वामी जी प्रारंभ करते हैं वहां से 192 यानी कि 15 साल 15 साल में इतना भ्रमण करना और कोई होता तो उसका माइंड बॉडी कहां पे ब्रेकअप हो जाता। स्वामी जी कैसे ये ले रहे हैं। सो, आई वाज़ इंप्रेस्ड कि हां माने हम लोग पढ़ते हैं यह इतना भ्रमण किया किंतु वो फिगर और ईयर यह दोनों जब साथ-साथ में देखते हैं तो लगता है अरे बाप रे इतना तो क्या है कि यह सब चीजें फिर भी हम रैशनली लॉजिकली समझ सकते हैं कि इतना कष्ट किया, इतना परिश्रम किया, इतना सब किया। तो भीतर में क्या चलता होगा, उसका तो कोई यही नहीं है हमारे सामने। कंप्लीटली कोई अंडरस्टैंडिंग नहीं है। वह अनुमान करके ही चलाना है कि भीतर में क्या उन्होंने स्ट्रगल किया होगा और क्या अचीव किया होगा।
प्रश्न: स्वामीजी का जीवन इतना संघर्षपूर्ण था — उन्हें आध्यात्मिक जीवन का आनंद लेने के लिए कभी कोई अवकाश नहीं मिला
ना हम यह मान करके सध्यारा ले सकते हैं। जैसे ठाकुर को मैंने कहा ना कि तुम इतने सारे मुंह से तो खा रहे हो। तो [हंसी] अपने गुरु भाई ठाकुर का जो आध्यात्मिक आनंद है वह भी तो स्वामी जी उन्हीं के द्वारा वो आनंद प्राप्त कर लेते होंगे। [हंसी]
प्रश्न: स्वामीजी रहते तो आज भारत की कितनी उन्नति होती!
देखिए ऐसा कहना कि स्वामी जी रहते तो क्या करते? प्रॉब्लम क्या है ना कि स्वामी जी के स्वामी जी ने जो आइडियाज दे दिए हैं एक बार वो एक्शन फिर हमको लेना है। यदि हम लोग एक्शन नहीं लेंगे तो फिर प्रॉब्लम क्या होगा ना कि सिर्फ स्वामी जी से अपने से कुछ होने वाला नहीं। इसलिए तो स्वामी जी ने कहा ना कि मेरे गुरु भाइयों को संघ का जिम्मा लेना है और बड़ा वट वृक्ष जो होता है उसके नीचे में फिर पौधे बड़े नहीं हो पाते बोलकर के उन्होंने पहले ही समाधि ले ली थी प्रश्न अभी यह नहीं है कि स्वामी जी होते तो क्या करते अभी तो हमको ही करना है जिम्मा अपने सर पर लेना है दैट क्योंकि देखिए ठाकुर ने कहा कि मैं चाहता तो पूरे कामरार पुकुर को सोने से मड़ के जाता किंतु मुझे पता है इससे कोई फायदा नहीं होने वाला जो आदमी मूड है वो मूड ही रहेगा और सोना है वह मुसलमान लोग दूसरे दिन वो खींच के ले जाएंगे अपने से वो कोई फर्क नहीं पड़ता है तो स्वामी जी हमको कुछ दे दे उससे हमारा कोई ज्यादा उन्नति नहीं देखिए फ्रीडम मूवमेंट क्या है फ्रीडम मूवमेंट सक्सेसफुल क्यों हुआ प्रत्येक गांव-गांव से फ्रीडम फाइटर निकले हैं। आज हम जो चार पांच बड़े नाम याद करके रखते हैं किंतु थोड़ा सा डिटेल में जाएंगे। प्रत्येक गांवगांव से फ्रीडम फाइटर्स निकले हैं। एक कलेक्टिव प्रयास था बोलकर के भारत मुक्त हुआ। तो यहां पर भी भारत की उन्नति होनी है तो कलेक्टिव सामूहिक प्रयास होना है। कोई एक स्वामी जी ठाकुर आकर के कुछ देते देकर चले जाए हम उसको रख नहीं पाएंगे। फिर से मुसलमान आएंगे फिर से सब छीन के चले जाएंगे। वो भिक्षा में मिली चीज वो ज्यादा टिकती नहीं। हमको आप अपना कर लेना है। राजा महाराज ने जो फेमस बात कि जैसे वो समाधि के बाद में भी क्यों साधन भजन कर रहे हैं? तो जो ठाकुर ने दिया है वो निज़र कोने जनों मुझे अपना बना लेना है। वैसे ही स्वामी जी की जो टीचिंग्स था हमको अपना करके वी हैव टू टेक द रिस्पांसिबिलिटी एंड देन वी हैव टू एक्ट अपॉन इट। दैट इज व्हाट इज नेसेसरी राइट नाउ। अपना जिम्मा अपने सर पे लो। जो दैट इज द मेन थिंग स्वामी जी का जो है आत्मदीपो भव जो भगवान बुद्ध का था यदि जब तक हम जिम्मा नहीं लेंगे तब तक हजार ठाकुर मास्वामी जी भी आकर चले जाए ना भारत का परिस्थिति ज्यादा चेंज नहीं होने वाला अभी अभी अभी जो बात है हम सबको विवेकानंद होना होगा दूसरे विवेकानंद आए ना आए ऐसी अपेक्षा रखने की बजाय हम सबको अपने से विवेकानंद होना होगा वही यही एक बात है हम ही को स्वामी जी को एप्रिशिएट करना है और हम ही को जिम्मा लेकर के भारत का भविष्य गठन करना है। ओम