प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन भारत में दिए हुए भाषणों में से एक जिस किताब में यह भाषण पब्लिश हुए हैं। इंग्लिश में उसका नाम है लेक्चर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा। इसमें कल हमने शंकराचार्य वाला पॉइंट समाप्त किया। आज एक
स्वामी विवेकानंद के समय में मूर्ति पूजा को गलत माना जाता था। आज, लोग मूर्ति पूजा को तो स्वीकार कर लेते हैं लेकिन ह्रदय में संदेह रखते हैं।
नया पॉइंट स्टार्ट कर रहे हैं। आइडोलेटरी एंड श्री रामकृष्णा। नाउ अभी देखने की बात यह है कि स्वामी जी ने अपने लेक्चर में कोई पॉइंट्स उन्होंने नहीं दिए हैं। यह पॉइंट्स दिए हैं मैंने जिससे कि हम ईजीली इस लेक्चर को कुछ रिलेवेंट टॉपिक्स में डिवाइड कर पाए और इस तरह से डिवाइड करके एव्री टॉपिक को हम इंडिविजुअली थोड़ा सा अटेंशन दे पाए। तो अपनी खुद की अंडरस्टैंडिंग के लिए इस पॉइंट्स को दिया गया है। तो स्वामी जी क्या कहते हैं? मैं पढ़ता हूं। इट हैज़ बिकम ए ट्राइड सेइंग दैट आइडोलेटरी इज रॉन्ग। अभी आजकल एक फैशन जैसा बन गया है कि आइडोलेटरी यानी कि मूर्ति पूजा गलत है। एंड एवरी मैन स्वेलोस इट एट द प्रेजेंट टाइम विदाउट क्वेश्चनिंग। और सभी लोग बिना किसी क्वेश्चन के इसको स्वीकृत कर रहे हैं। अभी आज का युग और स्वामी विवेकानंद का युग वह बड़ा ही डिफरेंट है। अभी आखिरी 10 साल में हमने देखा कि किस तरह से हिंदू धर्म में एक तरह से देखिए हिंदू धर्म में रहने सा हुआ या तो फिर पुनः जागरण हुआ वो एक दूसरा चीज है। आध्यात्मिक दृष्टि से जो हिंदू धर्म का पुनः जागरण हुआ वह तो शंकराचार्य के युग से ही प्रारंभ हो गया था और फिर धीरे-धीरे करके ठाकुर के आने तक ठाकुर ने उस पुनः जागरण में उन्होंने अल्टीमेट जो कंट्रीब्यूशन कहा जाएगा तो वो तो ठाकुर का है। किंतु एक चीज जो मिसिंग थी अभी तक कि एक पब्लिक अ एक्सेप्टेंस ऑफ हिंदूइज़्म इन अ पब्लिक लाइफ। तो वह हमने देखा कि आखिरी 10 साल में वह भी हो गया है। तो अभी का यह आज के जो हम लोग आज की जनरेशन के हैं हम लोगों को यह सब देखकर के स्वामी जी की यह सब बातें सुनकर के थोड़ा सा इररिलेवेंट लगे भी सही ऐसा लगे भी कि यह तो जब होना था तब वह हो गया। अभी का आज का युग तो बड़ा ही डिफरेंट है। तो अभी आज के युग के लिए यह जो डिस्कशन है कि मूर्ति पूजा गलत है और मूर्ति पूजा के माध्यम से हम सिर्फ अंधश्रद्धा में ही डूबेंगे। इस पॉइंट का आज का क्या तात्पर्य है? आज का क्या रिलेवेंस है? तो वह रिलेवेंस मुझे इस तरह से दिखता है कि अभी जो एक बाह्य प्रदर्शन जो धर्म का होना था वह तो हमने कर लिया। किंतु हमारे हृदय में एक तरह का स्केप्टिसिज्म, एक तरह का डिसबिलीफ अभी भी जैसे का वैसा ही बना हुआ है। बहुत सारे लोगों को ऐसा लगता है कि जो हिंदी में एक कहावत है ना कि मुख में राम बगल में छुरी। तो आप भले ही चाहे धर्म वगैरह जितना ही आप बाह्य दृष्टि से करते रहे। जहां तक आपका खुद का योगक्षेम का प्रश्न आता है अर्थात कि आपके खुद के जीवन निर्वाह का प्रश्न आता है। धर्म वहां पर नहीं चलने वाला है। धर्म को रखना है आपको मंदिरों में धर्म को आपको रखना है। पब्लिक सेलिब्रेशन में धर्म को आपको रखना है। यदि लोगों को धर्म के नाम पर कुछ बताना हो लोगों को कन्विंस करना हो तो लोगों को कन्विंस करने के लिए धर्म की आवश्यकता पड़ती है। किंतु जहां तक मेरे खुद के रोटी रोजगार का प्रश्न है, जहां तक मेरा खुद का पर्सनल लाइफ जाता है, जिसमें कि मेरा ऑब्जेक्टिव है मैक्सिमाइजेशन ऑफ सेंसुअल प्लेजर्स। इंद्रिय सुखों का महत्व सबसे ज्यादा इंद्रिय सुख मुझे कैसे मिले? वही यदि मेरे जीवन का उद्देश्य है, तो फिर होगा क्या? तो जैसे कि हाथी के जो दो दांत होते हैं एक तो दिखाने वाले एक चबाने के लिए तो धर्म कहीं दिखाने वाले दांत की तरह एक तरह से ड्राइंग रूम फिनोमिना बन के रह ना जाए कि हम तो दिखावा तो बड़ा करते हैं कि हम धार्मिक हैं। सभी जितने प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र है वहां पर दर्शन करके आए हैं। मंदिर में बीच-बीच में चढ़ावा भी दे देते हैं। प्रणामी दक्षिणा भी दे देते हैं। कुछ मीटिंग करके ना कि कुछ सेलिब्रेशन करके जिस तरह से धार्मिक व्यक्ति जो होते हैं उन लोगों को आमंत्रण करके हम दिखा देते हैं कि हां मैं कितना धार्मिक हूं। किंतु जहां तक ऑनेस्टी, इंटीग्रिटी, फेयर डीएलिंग, जस्टिस फॉर एवरीवन। इस तरह के जो एथिकल पॉइंट्स जाते हैं, उसको फिर मैं स्वीकार करने को तैयार नहीं हूं। जिसको इंग्लिश में कहते हैं ना कि एवरीथिंग इज फेयर इन लव एंड वॉर यानी कि युद्ध और प्रेम। यह दो क्षेत्र ऐसे हैं कि जहां पे आप किसी भी तरह का दुराचारी आचरण कर सकते हैं। आपको जीतने से ही मतलब है। साम, दाम, दंड, भेद यह किसी भी तरह के माध्यम से आप इस जीवन में प्रगति कीजिए। तो यह जो अनएथिकाटी जो है वह साथ-साथ में धर्म के साथ में कभी-कभी चलने लगती है। तो हमको
नैतिकता और सदाचार धर्म का आधार हैं
श्री रामकृष्ण शंकराचार्य से प्रारंभ होकर के श्री रामकृष्ण तक की यह जो हमारी आध्यात्मिक यात्रा है उस यात्रा का हमको सेंटर पॉइंट क्या दिखता है कि एथिक्स एंड मोरालिटी। यह दो है धर्म के फाउंडेशन। यदि आप एथिक्स और मोरालिटी को धर्म से अलग करके धर्म को एक पब्लिक स्पेक्टिकल बनाएंगे तो वही होगा जैसे कि वह बौद्ध युग में हुआ था कि मंदिर तो बहुत बड़े-बड़े बन गए किंतु फिर उसी मंदिरों में जिस तरह का दुराचार प्रारंभ हुआ उसने फिर पूरे भारत देश को डुबो दिया। तो यहां पर यह बात आज के युग में हमको स्पेसिफिकली थोड़ा सा ध्यान में रखना है कि धर्म के साथ में एथिक्स एंड मोरालिटी दोनों पक्के रूप से जड़े हुए हैं। ऐसा ना हो जाए कहीं कि दिखावा तो हम दुनिया भर का कर दें किंतु भीतर में हृदय खाली हो। तो ऐसा ना हो इसके लिए यह पॉइंट थोड़ा सा इंपॉर्टेंट है। इस पॉइंट को हमको दो तरह से समझना होगा। एक तो स्वामी जी अपने शब्दों में क्या कहते हैं वह एक चीज हमको समझनी है। दूसरा कि रीडिंग बिटवीन द लाइंस आज के युग के लिए हमको क्या कंक्लूजन ड्रॉ करने हैं उसको समझना है। तो इसीलिए स्वामी जी यहां पर कहते हैं उस समय का जो प्रॉब्लम था उसको कहते थे कि आइडोलेटरी इज रॉन्ग यानी कि किसी भी तरह की मूर्ति पूजा करना। उस वो किसी भी तरह यदि आप सही-सही धर्म का पालन कर रहे हैं तो मूर्ति पूजा गलत है। अभी यह आईडिया कहां से आया? यह सब ये जो अब्राहमिक रिलीजन है वहां पे यह सब आइडोलेटरी या तो फिर आइकोनोक्लास्ट इनको कहते हैं आइकोनोक्स्ट। अर्थात आइकॉन अर्थात कि मूर्ति क्लास्ट अर्थात कि उसको तोड़ने वाला। मूर्तियों को तोड़ने वाला जो होता है वह बहुत बड़ा संत समझा जाता है। तो वह सब अब्राहमिक रिलीजन है। तीन जुडाइज्म, इस्लाम और क्रिश्चियनिटी वहां से यह आईडिया आया है कि यह मूर्ति पूजा गलत है। तो यहां पर स्वामी जी इसको पूरा अच्छे से डिस्कस करेंगे। वो आगे कहते हैं,
यदि मूर्ति पूजा से रामकृष्ण पैदा हो सकते हैं, तो यह गलत कैसे हो सकती है?
आई वंस थॉट सो एंड टू पे द पेनल्टी ऑफ़ दैट आई हैड टू लर्न माय लेसन सिंग एट द फीट ऑफ अ मैन हु रियलाइज्ड एवरीथिंग थ्रू आइडोल्स। में भी एक समय था कि मैं भी इसी तरह से सोचता था कि मूर्ति पूजा गलत है और यह जो मैंने सोचा उस जो पाप किया उसका प्रायश्चित करने के लिए पाप का प्रायश्चित तो ठीक शब्द नहीं है। जस्ट के टू जस्ट टू ड्रॉ अ कंट्रास्ट स्वामी जी कहते हैं कि वह जो एक मैंने किया था उसके कंट्रास्ट में देखिए कि मुझे मेरे धार्मिक जीवन का जितना भी सत्य है मेरा जो आध्यात्मिक जीवन है वह मुझे एक ऐसे व्यक्ति के श्री चरणों के पास में बैठकर के गठित करना पड़ा कि जिन्होंने अपना पूरा जीवन आध्यात्मिकता उन्होंने ने मूर्ति पूजा करके ही गठित किया है। सो आई सिंग एट द फीट ऑफ अ मैन हु रियलाइज्ड एवरीथिंग थ्रू थ्रू आइडोल्स। मुझे सब कुछ उन्हीं के माध्यम से सीखना पड़ा जिन्होंने अपना पूरा आध्यात्मिक जीवन मूर्ति पूजा पर गठित किया है। आई अलड टू रामकृष्ण परमहंस। मैं श्री रामकृष्ण परमहंस के बारे में बात कर रहा हूं। इफ सच रामकृष्ण परमहंसास आर प्रोड्यूस बाय आइडोल वरशिप व्हाट विल यू हैव द रिफॉर्मर्स क्रीड और एनी नंबर ऑफ आइडोल्स यदि मूर्ति पूजा करके इस तरह के रामकृष्ण परमहंस जन्म ले सकते हैं तो आपको क्या चाहिए? यह जो सो कॉल्ड रिफॉर्मर है कहते हैं कि मूर्ति पूजा बंद कर दो किंतु यह रिफॉर्मर का खुद का पर्सनल लाइफ देखिए वो पूरा डिसोल्यूट लाइफ है उन लोगों का ना ही एथिक्स है ना ही मोरालिटी है ना ही कोई स्पिरिचुअल एटेनमेंट है भीतर से खोखले हैं यह लोग तो मूर्ति पूजा का विरोध करके इस तरह का खोखला आदमी आपको होना है ना कि एक सॉलिड स्पिरिचुअल फाउंडेशन आपको अपने जीवन में चाहिए वो भले ही चाहे है मूर्ति पूजा से आए डस नॉट मैटर वो जो मूर्ति पूजा करें देखिए हिंदू अभी ऐसा कहना कि ठाकुर ने सब कुछ मूर्ति पूजा के माध्यम से प्राप्त किया है वह भी स्वामी जी का एकजरेशन है क्योंकि हमको पता है कि ठाकुर ने सब तरह के जो स्कूल्स है हिंदूइज़्म की सब तरह की स्कूल्स में उन्होंने साधना की है। सब तरह की ब्रांचेस में उन्होंने साधना की है। तो उसमें अद्वैत वेदांत भी आ जाता है। जहां पे उनके गुरु तोतापुरी कहते थे ठाकुर जब ताली बजाते बजाते मां का नाम करते थे तो तोतापुरी कहते थे अरे यह रोटी क्यों ठोक रहे हो तो जो कि हार्ड कोर एंटी कहेंगे कि पर्सनल गॉड जो फिलॉसोफी है अद्वैत वेदांत उसकी भी ठाकुर ने साधना की है और फिर यहां तक कि इस्लाम और क्रिश्चियनिटी की भी साधना ठाकुर ने कर दी है। वही इस्लाम और क्रिश्चियनिटी जहां पे कि आइडोल्स यानी कि मूर्ति पूजा वर्जित कही गई है। मूर्ति पूजा नहीं करने को कहा गया है। यानी कि ठाकुर का तो एक पूरा स्पेक्ट्रम था। तंत्र साधना में भी देखिए कि जो मां काली की पूजा है तो सही किंतु उसमें भी जो इंटरनल एलिमेंट है साधना के वह कितने स्ट्रांग है। वैष्णविज्म या तो जो यह भक्ति पाथ ठाकुर फॉलो कर रहे थे। उसमें भी देखिए कि भाव के ऊपर में कितना जोर दिया जाता है। यानी कि इस तरह का स्टेटमेंट देना कि उन्होंने ठाकुर ने सब कुछ मूर्ति पूजा के माध्यम से ही प्राप्त किया था। उसको थोड़ा सा एक्जेजरेशन गिनेंगे या तो फिर हमको यदि स्वामी जी के शब्दों को इस तरह से इंटरप्रेट करना चाहे कि सबसे महत्वपूर्ण ठाकुर का जो दर्शन था, सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उपलब्धि थी, वह मूर्ति पूजा से हुई थी। ऐसा हम कह सकते हैं सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यानी कि प्रथम मां काली का जो उनको एक दर्शन हुआ। हालांकि ठाकुर के जीवन में दर्शन तो लगे ही रहते हैं। किंतु फिर भी वह जो दक्षिणेश्वर में आकर के उन्होंने मां काली का जो प्रथम दर्शन किया वह कब हुआ था कि जब मां काली की मूर्ति के सामने रोते-रोते उन्होंने कहा था कि तुम यदि दर्शन नहीं दोगी तो तुम्हारा ही खड़ग लेकर के मैं मेरा गला काट दूंगा। तो देयर आर मेनी वेज़ टू इंटरप्रेट स्वामी जीस दिस सेंटेंस। किंतु मुझे लगता है कि ठाकुर के जीवन में जो स्पेक्ट्रम है वाइड रेंज ऑफ स्पिरिचुअल प्रैक्टिससेस ठाकुर ने की है और सभी रास्तों के माध्यम से उन्होंने सिद्धि प्राप्त की है तो वो एक बात हमको खास अपने ध्यान में रखना है क्योंकि हिंदूइज़्म में देखिए कि भले ही चाहे विदेशी लोग हमको मूर्ति पूजक के रूप में देखते हो और ज्यादातर हिंदू मूर्ति पूजक है भी सही किंतु फिर भी हमको यह स्पष्ट स्पष्ट रूप से पता है कि हिंदू धर्म में ही मूर्ति पूजा की मूर्ति पूजा के अलावा भी और बहुत सारी साधनाएं हैं। यह राजयोग है। यह ज्ञान योग है। यह दोनों साधनाओं को आप देखिए। कर्म योग है। यह भक्ति योग, राजयोग, कर्म योग और ज्ञान योग जो चार मुख्य पथ है उसमें भक्ति योग ही है कि जिसमें कि मूर्ति पूजा का एक विशेष प्राधान्य है। अदरवाइज राजयोग में देखिए कि मुख्यत्व है आपके मन की एकाग्रता। ज्ञान योग में है आपकी त्याग और ब्रह्मचर्य की शक्ति और कर्म योग में है निष्काम रूप से कर्म करना। यानी कि यदि फॉर्मल हम एक दृष्टि से देखें कि हिंदू धर्म का अर्थ क्या है तो यह चार योगों का समन्वय तो वन क्वार्टर ऑफ हिंदूइज़्म इज द ओनली क्वार्टर कि जहां पर फॉर्मल मूर्ति पूजा है। बाकी आपको योग शास्त्र में भी ऐसा नहीं कहा जाएगा कि मूर्ति की स्थापना करके उसकी पूजा कीजिए। ना ही ज्ञान योग में कहा जाएगा ना ही कर्म योग में कहा जाएगा। तो यह अपना एक वाइड स्पेक्ट्रम है। सो दैट वी हैव टू अंडरस्टैंड। किंतु यहां पर क्योंकि स्वामी जी विदेशी लोगों के आक्रमण का उत्तर दे रहे हैं। उनको कुछ स्वीपिंग स्टेटमेंट्स जनरल स्टेटमेंट्स देने थे। इसलिए उन्होंने इस तरह से कहा है। आई वांट एन आंसर किस प्रश्न का कि यदि आपको हिंदू धर्म की निंदा करके हिंदू धर्म भारत देश का पुनः जागरण करना है। इस तरह के लोगों का चरित्र देखिए कितना खोखला है। तो ऐसे खोखले चरित्र वाले लोगों को फॉलो करना है कि फिर उनके द्वारा निंदित हिंदू धर्म में ही जो एक सर्वश्रेष्ठ मनुष्य रत्न मनुष्य माने सर्व अवतार वरिष्ठाएं जो हमारे बीच में प्रकट हुए हैं। वह यदि इस हिंदू धर्म में उपासना माध्यम उपासना पद्धति का आश्रय लेकर के इस तरह के महापुरुष प्रकट होते हैं तो हमको यह हिंदू धर्म चाहिए। क्या आपको डिसीजन लेना है? इसलिए स्वामी जी कह रहे हैं, आई वांट एन आंसर। मुझे इसका उत्तर चाहिए। टेक ए थाउजेंड आइडोल्स मोर इफ यू कैन प्रोड्यूस रामकृष्ण परमहंसास थ्रू आइडोल वरशिप एंड मे गॉड स्पीड यू। यदि आपको राम मूर्ति पूजा करके श्री रामकृष्ण परमहंस जैसे उदार चरित जिनका हृदय सोने का बना हुआ है। वही ठाकुर की बात वही ठाकुर और तोतापुरी का जो कन्वर्सेशन है कि लोटा है उसको प्रतिदिन आपको धोना पड़ेगा। यदि आपको उसको स्वच्छ रखना है, क्लीन रखना है। यहां पर ठाकुर कहते हैं लोटा यदि सोने का हो जाता है तो प्रतिदिन धोने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तो ठाकुर का हृदय निर्विकल्प समाधि के बाद में सोने का हो गया है। उनके ऊपर में किसी भी तरह का मेला नहीं चढ़ सकता है। तो जिनका हृदय सोने का है। इस तरह के श्री रामकृष्ण परमहंस यदि यह मूर्ति पूजा करके प्रकट हो रहे हैं तो मैं कहता हूं कि हजार मूर्ति पूजा कीजिए और जिससे यदि इतने और ज्यादा रामकृष्ण परमहंस प्रकट हो एंड मे गॉड स्पीड यू। और ईश्वर आपकी इस शुभकामना में आशीर्वाद दे। प्रोड्यूस सच नोबल नेचर्स बाय एनी मींस यू कैन। श्री रामकृष्ण देव जैसे शुद्ध पवित्र चरित्र वाले लोगों को जिस जो भी रास्ते से इस तरह से शुद्ध पवित्र चरित्र हृदय प्रकट होते हो उस रास्ते को आप अपनाइए। आप रास्ते बंद मत कर दीजिए। हां मूर्ति पूजा के नाम पर बहुत सारे विभत्स हत्याकांड हुए हैं। यह बात से हम अस्वीकार नहीं करते हैं। खास करके विदेश में ही ऐसा बहुत कुछ हुआ है कि हमारी मूर्ति आपकी मूर्ति से बड़ी है वगैरह-वगैरह। किंतु देखिए कि अल्टीमेटली गलती तो मूर्ति पूजा की नहीं है। गलती तो है मूर्ति पूजकों की जो उस मूर्ति के नाम पर अपना खुद का एक पर्सनल पावर हथियाना चाहते हैं। लोगों के ऊपर में राज करना चाहते हैं। उनका शोषण करके तो गलती तो ऐसे लोगों की है। ऐसे लोगों को आप हटाइए। ये तो अगेन वो हमारा जो उदाहरण है थ्रोइंग वाटर अलोंग थ्रोइंग बेबी अलोंग वि द बाथ वाटर। तो इसी तरह से ना हो जाए। इस तरह इसका बात इस बात का ख्याल रखना है। येट आइडोलेटरी इज कंडेम। किंतु इसके
ईसाई अपनी मूर्तियों को छोड़कर बाकी सभी की मूर्तियों की निंदा करते हैं
बावजूद मूर्ति पूजा की निंदा होती है। क्यों? नोबडी नोस। व्हाई नोबडी नोस? क्यों? किसी को पता नहीं है। बिकॉज़ सम हंड्रेड्स ऑफ इयर्स एगो सम मैन ऑफ जइश ब्लड हैपन टू कंडेम इट। क्या इसलिए हम मूर्ति पूजा बंद कर रहे हैं? या तो फिर मूर्ति पूजा की निंदा कर रहे हैं क्योंकि सैकड़ों सालों पहले एग्जजेक्टली कहें तो 2000 साल पहले एक जइश ब्लड वाले एक इंसान ने एक यहूदी ने मूर्ति पूजा की निंदा की थी। क्या इसलिए हम मूर्ति पूजा बंद कर रहे हैं। यहां पे स्वामी जी का इशारा है बाइबल की ओर। बाइबल में यदि ऐसा मुझे पता नहीं कि ऐसा लिखा गया है कि नहीं या तो जीसस ने कहा है कि नहीं यह स्वामी जी कह रहे हैं। तो स्वामी जी कहते हैं कि जीसस ने कहा है या बाइबल ने कहा है कि मूर्ति पूजा गलत है। इसलिए क्या हम लोग मूर्ति पूजा का विरोध कर रहे हैं? दैट इज ही हैपन टू कंडेम एवरीबॉडी एल्स हिस आइडोस एक्सेप्ट हिज ओन। या तो फिर अब्राहम या मोजेस ने कहा होगा किसी ने भी कहा हो। तो स्वामी जी आगे कहते हैं कि अच्छा यह जो 2000 साल पहले ना कि उतने साल पहले यह जो जइश प्रोफेट थे उन लोगों ने कहा कि मूर्ति पूजा गलत है। इसके लिए क्या हम मूर्ति पूजा का विरोध कर रहे हैं? या तो फिर कहेंगे कि इन लोगों ने ऐसा कहा कि हमारी मूर्तियों के अलावा बाकी सब मूर्ति पूजा गलत है। इसलिए हम इसका विरोध कर रहे हैं। इफ गॉड इज रिप्रेजेंटेड इन एनी ब्यूटीफुल फॉर्म और एनी सिंबॉलिक फॉर्म सेड द ज इट इज ओफुली बैड। यदि ईश्वर किसी भी तरह के सुंदर एक रूप में मूर्तिमंत है तो ज कहते हैं कि यह बिल्कुल गलत है। इट इज सीन। यह पाप है। बट इफ ही इज रिप्रेजेंटेड इन द फॉर्म ऑफ ए चेस्ट विद टू एंज्स सिंग ऑन ईच साइड एंड अ क्लाउड हैंगिंग ओवर इट इट इज द होली ऑफ होलीस। किंतु सब आइडोल गलत है। सब मूर्ति पूजा गलत है। किंतु आप यदि इस ईश्वर को या तो इस दिव्य तत्व को एक बक बॉक्स है या तो फिर एक बैग है। उसके उसके रूप में उसको प्रगट उसको रिप्रेजेंट कीजिए। उसके इस बॉक्स के दोनों साइड में दो एंजल खड़े हैं। यानी दो एंज्स को क्या कहेंगे? देवता खड़े हैं और उसके ऊपर में एक क्लाउड यानी कि एक बादल मंडरा रहा है। तो यदि इस तरह का आप इसको रिप्रेजेंट करेंगे ईश्वर को दिव्य तत्व को देन इट इज होली ऑफ द होलीज। तो सबसे ज्यादा पवित्र चीज हो गई। एक्चुअली यह क्या है? वो जो 10 कमांडमेंट्स ना कि ऐसा कुछ था ना कि होली ग्रेल इस तरह की एक बॉक्स में बंद करके इन लोगों ने रखा था। तो इस तरह के बॉक्स में यदि आप ईश्वर को रिप्रेजेंट करेंगे तो फिर लगेगा कि हां यह सबसे ज्यादा पवित्र है। एक्चुअली देखिए सिर्फ इतना ही नहीं है। स्वामी जी तो अमेरिका वहां पर यूरोप में बहुत घूमे थे। उन्होंने यूरोप के चर्च देखे हैं। बड़ा ही सुंदर एक डिस्क्रिप्शन भी है कि जब स्वामी जी यह मिज सेवियर वगैरह को लेकर के इंडिया आ रहे थे तो उससे पहले वह रोम में घूम रहे थे। अपने यह सब फॉरेन डिसाइपल के साथ में तो उन्होंने ही उन्हीं में से किसी ने लिखा है कि देखिए कि स्वामी जी जब हमको एक के बाद एक चर्च की मुलाकात के लिए ले जाते थे और उस चर्च का हिस्ट्री हमको बताते थे तो हम लोग मंत्रमुग्ध होकर के सुनते थे। क्यों? क्योंकि वहां के जो स्थानिक क्लर्जी है वह स्थानिक जो उन लोग चर्च वाले हैं उनसे ज्यादा अच्छा हिस्ट्री उस पार्टिकुलर स्पॉट का स्वामी जी को पता रहता था। तो रोम में घूमना यह जो वेटिकन सिटी कहा जाता है उसमें एक के बाद एक सेंट पीटर्स बजिलिका वगैरह-वगैरह जो भी वहां के लोकल लैंडमार्क है जो कि क्रिश्चियनिटी के साथ में हिस्टोरिकली कनेक्टेड है उस सबका हिस्ट्री तो स्वामी जी को हमसे ज्यादा पता था और इतना सुंदर से रस पूर्वक वो उसका वर्णन भी करते थे कि हम लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। तो देखिए कि स्वामी जी को तो क्रिश्चियनिटी का, जुडाइज्म का हिस्ट्री बहुत अच्छे से पता था। उन्होंने वह सब चर्च वगैरह की मुलाकात भी की थी। तो उन्होंने यह सब अपनी नजरों से देखा था कि किस तरह से यह लोग बाकी जगत को तो सिखाते हैं कि मूर्ति पूजा मत करो। किंतु खुद अपनेप तरह की मूर्तियां बना के पूजा करते हैं। एक्चुअली देखिए कि किसी भी चर्च में जाएंगे तो वह क्रॉस तो होगा ही होगा। क्रॉस के ऊपर में जीसस का भी एक दिखाई देगा कि जीसस वहां पर टंगे हुए क्रॉस के ऊपर में तो यह सब तो होता ही है। फिर यह जो फ्रेस्कोस होते हैं दीवाल के ऊपर में यह दौरे हुए पेंटिंग इसमें वो भगवान गॉड इन हेवन फादर इन हेवन या तो गॉड इसका भी पेंटिंग होता है। यह एडमम एंड ईयू इसका भी पेंटिंग होता है। सेंट्स का भी पेंटिंग होता है। सेंट्स के रेलिक्स भी रखे हुए होते हैं। सेंट्स का जो स्केलेटन है वह भी रखा हुआ होता है बहुत सारी जगहों पे। तो यह सब तो स्वामी जी ने होली सिंबॉलिज्म जिसको कहते हैं स्वामी जी ने देखा है। इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि इन लोगों का हैबिट ऐसा है कि मां काली की मूर्ति की पूजा कर रहे हो वह गलत है। किंतु यह जो हमारे सेंट पीटर सेंट पॉल इन लोगों का यह जो पेंटिंग दोरा हुआ है उसकी पूजा करेंगे आप या तो फिर उसके सामने जाकर के माथा टेकेंगे आप तो फिर वह सही है। तो यह दोहलापन जो है कि मुंह में एक दूसरा करना एक या दूसरों को कहना एक अपने हृदय में एक बात है मुंह पे बोलनी दूसरी बात है। तो यह बिल्कुल गलत है। तो यह स्वामी जी यहां पे कहते हैं इफ गॉड कम्स इन द फॉर्म ऑफ अ डव इट इज होली। यदि ईश्वर एक कबूतर के रूप में आते हैं तो बड़े पवित्र है। बट इफ ही कम्स इन द फॉर्म ऑफ अ काऊ इट इज हिडन सुपरस्टिशियन। किंतु यदि एक एक गाय के रूप में ईश्वर आते हैं। तो वह सब यह काले लोग हैं। इंडिया के इन लोगों की भयानक अंधश्रद्धा है। यह बिल्कुल स्वामी जी का परफेक्ट ऑब्जरवेशन है। यह क्रिश्चियनिटी में देखिए कि यह कबूतर होता है वह शांति का प्रतीक होता है। कबूतर की यह जो पेंटिंग वगैरह मिल जाएंगे। उसका सिंबॉलिज्म आपको दिख जाएगा। किंतु जैसे ही हम अपने हिंदू धर्म में गाय जैसे भगवान कृष्ण का गायों के प्रति प्रेम है। गाय को हम गौ माता करके उनकी पूजा करते हैं तो यह देखकर के यह लोग कहेंगे कि यह सब अंधश्रद्धा है। यानी कि हम जो करें वह सब ठीक। तुम लोग जो करो वह सब गलत। कंडेम इट। दैट इज हाउ द वर्ल्ड गोज़। जो भी यदि गाय की पूजा करते हैं तो उसकी निंदा करो और यही है जगत का नियम। दैट इज व्हाई द पोएट सेस व्हाट फुल्स वी मल्स बी। इसीलिए कवि कहते हैं कि कितने मूर्ख हम लोग हैं। देखिए कि ठाकुर के बारे में स्वामी जी यहां तक तो कहते ही है किंतु और अभी देखिए कि मैं इतना डिटेल में इस पॉइंट में नहीं जाना चाहता क्योंकि मां काली की पूजा करके ठाकुर ने किस तरह से सिद्धि प्राप्त की या तो फिर सिद्ध तो वह थे ही थे। उसको मैनिफेस्टेशन किस तरह से किया हमारे नॉलेज के लिए हमारे लर्निंग के लिए। यह बात तो इस तरह की कहानियां हमने बहुत सारी कर ली है। तो इस इस पर्टिकुलर पॉइंट में बहुत ज्यादा नहीं जाकर के और एक पॉइंट जिसका उल्लेख स्वामी जी यहां पर नहीं करते हैं इस पर्टिकुलर लेक्चर में किंतु अन्य जगह पर करते हैं और जो कि रनिंग थ्रीड है यह जो लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा या तो फिर भारत के इतिहास के बारे में स्वामी
श्रीरामकृष्ण ने ब्राह्मण की तीव्र मेधाशक्ति और क्षत्रिय के उदार हृदय के बीच की दरार को भर दिया
जी का जो रनिंग थिंकिंग है रनिंग कमेंट्री है उसमें यह बात बड़ा ही इंपॉर्टेंट है कि वैदिक युग के अंत में यह ब्राह्मण का ब्रेन ब्रेन ऑफ माने वेदांतिक ब्रेन जो है ब्राह्मण का और यह क्षत्रिय का उदार हृदय है। इन दोनों के बीच में एक बहुत बड़ी स्प्लिट एक बहुत बड़ी दरार आकर के बन गई। और यह दरार के पीछे क्या है? उसके बारे में तो बहुत ज्यादा डिटेल अभी ना ही मुझे लगता है कि स्वामी जी ने डिस्कस की है। एटलीस्ट आई डू नॉट नो या तो फिर हमको पता नहीं है। किंतु यह स्प्लिट आई यह बात तो सबको पता है। जग जाहिर है। ब्राह्मण लोगों ने एक के बाद एक इतनी इंट्रिकेट थिरीज़ और फिलॉसोफी धर्म के बारे में डेवलप करना शुरू की कि फिर आखिर में एक आम आदमी जो है वह इस तरह के वैदिक जो परंपराएं हैं उससे दूर होता गया। तो फिर यह वैदिक परंपरा का जो हार्ट है, उसके जो रत्न है, उस रत्नों को आम आदमी की भाषा में किस तरह से व्यक्त किया जाए? किस तरह से आम आदमी के भीतर में इसका प्रचार किया जाए वह कार्य फिर भगवान बुद्ध ने किया था। इस तरह का स्प्लिट आपको ना ही भगवान राम में दिखाई देगा ना ही भगवान कृष्ण में दिखाई देगा। क्योंकि इन दोनों में हृदय भी था। एक उदार हृदय भी था। जनसाधारण के लिए और तीक्ष्ण तीव्र बुद्धिमत्ता भी थी कि वेदांत के जो गढ़ रहस्य है उसको भेद करके उसके भीतर का जो आत्म तत्व है वह यह प्राप्त कर ले। एक बड़ी सुंदर कहानी है कि वह दो तरह के एक देवता और यह राक्षस यह दोनों एक ऋषि के पास में गए तो आत्म तत्व सीखने के लिए तो उनको कहा जाता है तत्वमसी तो तुम ही हो वह तो तो अभी यह जो राक्षस थे उन लोगों ने जाकर के यह सोचकर के बड़े खुश हो गए कि अच्छा मैं ही हूं वह ईश्वर तो फिर अभी मैं यदि ईश्वर हूं तो चलो अपना जीवन भोग विलास सुख उपभोग में बिता देते हैं क्योंकि मैं ही ईश्वर हूं। किंतु यह जो देवता थे उन्होंने जाकर के थोड़ा सा तपस्या किया। पता चला कि ऐसा तो नहीं लग रहा है कि यह पंचमहाभूत पंचकर्मेंद्रिय पंच ज्ञानेंद्रिय का जो देह है जो कि नश्वर देह है आज जन्म लेता है फिर कल उसमें डिटेरेशन होता है जन्म होता है मृत्यु होता है वह वृद्ध हो जाता है उसमें व्याधि का प्रकोप होता है तो यह कैसे वह अंतिम सत्ता हो सकता है हाउ कैन दिस बॉडी बी दी ब्राह्मण तो वापस आते हैं फिर से उनको वही कहते हैं तो वापस जाकर तपस्या करते हैं। फिर ऐसा बैक एंड फोर्थ चलता है कुछ समय तक। आखिर में उनको पता चलता है कि ना ही यह पंचमहाभूत ना ही यह पंचकर्मेंद्रिय ना ही यह पंच ज्ञानेंद्रिय ना ही यह मन बुद्धि चित्त अहंकार इस सबके परे जो है वही है सर्वश्रेष्ठ आत्म तत्व। तो वो एक जो डेप्थ होती है अंडरस्टैंडिंग की वो डेप्थ यह भगवान राम और भगवान कृष्ण दोनों में थी। ब्राह्मण लोगों ने यह समझ लिया कि यहां पे आध्यात्मिक जीवन में अहम ब्रह्मास्मि या तो तत्वमसी या तो प्रज्ञानम ब्रह्म यह जो वेद के जो महावाक्य है उपनिषद के इस महावाक्य का उपदेश आप जनसाधारण में देंगे तो बड़े भयानक परिणाम आ सकते हैं। ब्राह्मण लोगों को यह बात पता थी तीव्र मेधा शक्ति चाहिए यह समझने के लिए कि मेरे भीतर में देयर आर टू डिफरेंट एंटिटीज एक तो है कि यह जो चित्त ग्रंथि है ना एक जड़ यह जड़ देह के साथ में मिला हुआ जो मेरा चेतन तत्व है यह एक है जिसको कि हम अहंकार है या तो अस्मिता जिसको कि कहा जाता है अविद्या में से योग शास्त्र कहता है अविद्या में से प्रकट होती अस्मिता अस्मिता यानी कि यह देह में हूं वह भ्रम होना। यह अस्मिता में से प्रकट होते हैं राग और द्वेष। अर्थात कि कोई किसी चीज को मेरे किसी चीज के प्रति मेरा आकर्षण है। किसी चीज के प्रति मेरा द्वेष है। और राग और द्वेष में से प्रकट होते हैं अभिनिवेश अर्थात कि मृत्यु के प्रति भय और जीवन जीने की लालसा। तो यह अविद्या में से सबसे पहले अस्मिता प्रकट होता है। यह जो अस्मिता है वह अस्मिता यानी कि यह देह में हूं। वह उसके पीछे में जाकर के उस भाव को काट के यह देह में नहीं हूं। किंतु इसके पीछे चेतन तत्व है। वह मैं हूं। उसके लिए आपको प्रचंड तीव्र बुद्धिमत्ता चाहिए। ब्राह्मण लोगों में यह थी और यह लोग हमेशा डरते थे कि यह अहम ब्रह्मास्म इस बात का इस महावाक्य का जनसाधारण में प्रचार होगा तो भयानक दुराचार होगा। लोग अपने को ही ईश्वर मान के इतने भयानक यह भोग विलास में डूब जाएंगे कि वो मतलब जिस लेवल पर थे नॉर्मली योग वैदिक धर्म को समझने से पहले जिस लेवल पर थे उससे भी बड़े गहरे गड्ढे में जाकर के गिरेंगे। तो यह ब्राह्मण लोगों का डर था। किंतु यह डर भगवान राम भगवान कृष्ण को नहीं था। उन्होंने वही उपनिषद के तत्व जनसाधारण में प्रसारित किए थे। क्योंकि उनको पता था कि किस तरह से इस भयानक भ्रम से मुक्ति पा सके। तो उनका रास्ता था कि पहले भक्ति भक्ति करके अपने को अपने मन को संपूर्ण रूप से शरणागत कर दीजिए। इस तरह से इस मन को, इस बुद्धि को, इस चित्त को, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये अंतःकरण है अपना। उसको इस तरह से आप शरणागति की ओर ले जाइए। इसके भीतर में से अहंकार को इस तरह से निर्विशेष कर दीजिए। शरणागति भक्ति के माध्यम से कि उसके बाद में यदि वह आत्म तत्व सीखने को जाए तो घमंड कभी भी अपना सर ना उठाए। यह बात इनको पता थी। जबकि भगवान बुद्ध ने देखिए भगवान बुद्ध की खुद की बुद्धिमत्ता तीव्र होगी इस बारे में कोई संदेह नहीं है। किंतु बाद बात बाद बात बादबाद में जैसा हुआ उन लोगों ने ऐसा सोचना शुरू कर दिया उनके डिसाइपल्स ने कि यदि हम लोग इस आत्म तत्व का उपदेश देंगे तो वो जो राक्षस लोग के साथ में हुआ यह जो वीरचंद के संतान के साथ में जो हुआ अहम ब्रह्मास्म का अर्थ वही करेंगे कि देह ही ईश्वर है। उसी की आराधना आपको करनी है। भोग विलास के द्वारा तो बड़ा ही भयानक कांड होगा। तो इन लोगों ने ब्रह्म तत्व को हटा करके यह निर्वाण नाम का एक फिलॉसोफी स्टार्ट किया। शून्यता का उपदेश देना शुरू किया और उसी में फिर यह स्प्लिट बन गया कि ब्राह्मण की जो तीव्र मेधा शक्ति है वो एक साइड पर रह गई। वो ब्राह्मण परिवारों में ही रह गए सीमित होकर के कि यह अहम ब्रह्मास्म वैदिक महावाक्य का क्या असली तात्पर्य है वो उन्हीं कुछ फैमिली तक रह गया जनसाधारण में बुद्धिज्म फैलने लगा। तो वो जो स्प्लिट हुआ था वो स्प्लिट इवन शंकराचार्य के युग में भी वही स्प्लिट बना रहा। शंकराचार्य की खुद की तो बड़ी तीव्र मेधा शक्ति थी। किंतु उस तीव्र मेधा शक्ति को उन्होंने जनसाधारण में कैसे प्रचार करें वह शायद वह वर्कउ नहीं कर पाए। रामानुजाचार्य का हृदय तो बड़ा विशाल था किंतु उन्होंने ब्रह्म तत्व को त्याग त्याज त्याग करके उसको त्याज करके एक दूसरा ही विशिष्ट अद्वैत वाला एक नया सिद्धांत चालू किया। तो यह प्योर अद्वैत वेदांत है और साथ में ही इसी प्योर अद्वैत वेदांत को जनसाधारण में किस तरह से प्रचार किया जाना चाहिए। जो यह दोनों बात एक साथ में किसी के भीतर में हो कि ब्राह्मण की तीव्र मेधा शक्ति और जनसाधारण के लिए रोता हुआ मनुष्य हृदय तो वह भगवान राम में जिस तरह से था भगवान कृष्ण में जिस तरह से था वही स्प्लिट आखिर में भगवान श्री रामकृष्ण के आने से यह स्प्लिट भारत अपने हिंदू धर्म में से आखिर में अदृश्य हुई है। यह दोनों ब्रांचेस को भगवान श्री रामकृष्ण ने इकट्ठा किया है। दिस इज स्वामी जीसस कंक्लूजन। वह कंक्लूजन वह हमको इस लेक्चर में तो नहीं देते हैं। किंतु लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा के जो दूसरे दूसरे प्रवचन हम पढ़ेंगे तो स्वामी जी का यह आईडिया हमको बड़ा ही स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। तो यह हो गया कि स्वामी जी का जो इतिहास भारत का जो इतिहास है उसके प्रति स्वामी जी किस तरह से उसको एनालाइज करते हैं। यह एक पूरा आउटलाइन। इसके बाद में
How difficult it is to look through each other's eyes, and that is the bane of humanity. That is the basis of hatred and jealousy, of quarrel and of fight.
स्वामी जी और एक नए पॉइंट को प्रारंभ करते हैं। अभी देखिए कि अभी किस तरह से अह भारत का उत्थान किया जाए। हाउ टू बेटर इंडिया। यह जो थीम चल रहा है उसमें नया पॉइंट है। स्वामी जी कहते हैं डू नॉट कर्स ओनली ब्लेस। गाली देकर के निंदा करके क्रिटिसिज्म करके नहीं आशीर्वाद देकर के ही आप नए भारत का पुनरुत्थान कर सकते हैं। क्या कहते हैं? हाउ डिफिकल्ट इट इज टू लुक थ्रू ईच अदर्स आईज। दूसरों की दृष्टि से जगत को देखना कितना मुश्किल है। मैं हमेशा अपना ही एक पॉइंट ऑफ व्यू चलाता रहता हूं। दूसरों का पॉइंट ऑफ व्यू देखता ही नहीं हूं। फैमिली में भी इस तरह से होता है। भाई-बहन है, भाई-भाई है। वो दोनों झगड़ते हैं। यह खिलौना मेरा है। यह खिलौना मेरा है। हम अपने भाई की दृष्टि से उस खिलौने को नहीं देख सकते हैं कि चलो मेरे भाई को अच्छा लगता है खिलौना। तो मैंने थोड़ा सा सैक्रिफाइस करके अपने भाई को खुश रखने के लिए खिलौना दे दिया। तो वह जो अपना स्वार्थवृत्ति है वह इतना स्ट्रांग हो जाता है कभी-कभी कि सभी भोग मुझे ही भोग लेने हैं। मैं किसी के साथ में कुछ भी शेयर करने को तैयार नहीं हूं। दूसरों को मेरे किसी बात से या मेरे किसी कार्य से दूसरों को कष्ट होता है। वो समझने की एंपैथी जिसको कहते हैं वो एंपैथी ही मुझ में नहीं है। हमने ऐसे लोगों को देखा होगा। इतने सेल्फ सेंटर्ड होते हैं, इतने स्वार्थी होते हैं कि खुद के अलावा और किसी का जो पॉइंट ऑफ व्यू है समझ ही नहीं पाएंगे। और जब कोई जाकर के उनको बताएगा कि भाई तुम यह गलत कर रहे हो तो उनको बड़ा आश्चर्य होता है कि अरे मैंने ऐसा क्या गलत किया। मैं तो सीधा-साधा अपना जीवन जी रहा हूं। इतना इनोसेंट होकर के बात करेंगे। हम खुद कभी डाउट में आ जाएंगे कि क्या मेरा तो गलत गलतफहमी नहीं हो रहा कि वो इस तरह से इनोसेंट हो के कहता है कि अरे मेरी गलती ही क्या है? वो लोग इतने सेल्फ सेंटर्ड होते हैं। तो यहां पे स्वामी जी कहते हैं कि दूसरों की दृष्टि से जगत को देखना कितना मुश्किल है। उसके लिए आपको एंपैथी चाहिए, उदार हृदयता चाहिए। एंड दैट इज द बैन ऑफ ह्यूमैनिटी। यह मनुष्य जीवन की या तो मनुष्य सभ्यता का एक जो सबसे बड़ा एक कर्स है एक सबसे बड़ा एक क्या कहेंगे कि एक विकट एक एस्पेक्ट है वो यह है सेल्फ सेंटर्डनेस दूसरों की दृष्टि से आप देख ही नहीं दूसरों का पॉइंट ऑफ व्यू आप समझ ही नहीं सकते हैं। आपके भीतर में एंपैथी या तो फिर लार्ज हार्टेडनेस है ही नहीं। दैट इज द बेसिस ऑफ हेट्रेड एंड जेलसी ऑफ कोरल्स एंड फाइट। यह लार्ज हार्टेडनेस नहीं होना, एंपैथी नहीं होना, सेल्फ सेंटर्डनेस होना, सेल्फिशनेस होना यही कारण है कि इस जगत में जितनी भी ईर्ष्या और घृणा है, जितने भी युद्ध है, जितने भी झगड़े हैं, इन सबके पीछे में यही सेल्फिशनेस ही कारण भूत है। बॉयज मस्टाड
Reformers have no right to criticize India with its vast population and thousands of years of traditions.
बेबीज हु नेवर वेंट आउट ऑफ मद्रास स्टेंडिंग अप एंड वांटिंग टू डिक्टेट लॉस्ट टू 300 मिलियंस ऑफ पीपल वि थाउजेंड्स ऑफ ट्रेडिशंस एट देयर बैक। यह जो बच्चे हैं मूछों वाले बच्चे मस्टाज बेबीज जिन्होंने मद्रास छोड़कर के यानी कि अपने घर को छोड़कर के बाहर कभी कदम ही नहीं रखा। देखा ही नहीं कि यह जो 330 करोड़ का यह जो विराट भारत देश है इस विराट भारत देश का जो इतना हजारों हजारों सालों का भव्य इतिहास है। हजारों हजारों धर्म की शाखाएं प्रशाखाएं हैं। यह आध्यात्मिक ट्रेडिशंस है। उसको बिना सोचे समझे ही अपने घर में बैठे-बैठे कुछ इंग्लिश न्यूज़ पेपर पढ़कर के अपने ओपिनियंस बना दिए हैं। और यह 30 करोड़ के देश को उपदेश देने को निकले हैं कि यह मूर्ति पूजा बंद कर दो। मूर्ख लोग तुम हो सब। आर यू नॉट एशेम्ड। तुम लोगों को शर्म नहीं आती है। स्टैंड बैक फ्रॉम सच ब्लासफेमी एंड लर्न फर्स्ट योर लेसंस। इस तरह की मूर्खामी करना बंद करो। और सबसे पहले तो सीखो कि यह हिंदू धर्म क्या है? इररेवरेंट बॉयज सिंपली बिकॉज़ यू कैन स्क्रॉल अ फ्यू लाइंस अपॉन पेपर एंड गेट सम फूल टू पब्लिश देम फॉर यू यू थिंक यू आर द एजुकेटर्स ऑफ द वर्ल्ड। यू थिंक यू आर द पब्लिक ओपिनियन ऑफ इंडिया। इज इट सो? यह मूर्ख आदमी लोग इर्रेववरेंट बॉयज जिनके भीतर में थोड़ी सी भी श्रद्धा नहीं है। इस तरह के बच्चों तुम लोगों को एक पेपर के ऊपर में थोड़ा बहुत कुछ लिखने को आ जाता है। एक दो लाइन इसी से इतना घमंड बढ़ गया कि और एक एक पेपर के ऊपर में एक दो लाइन लिख ली और आपको इस एक दो लाइन लिखने वाले पब्लिश करने को मिल गए। इसी से आपका घमंड इतना बढ़ गया कि आपने यह समझ लिया कि पूरे जगत को शिक्षा देने के लिए आपके पास में एलिजिबिलिटी आ गई है। तुम लोग यह सोच रहे हो कि तुम ही लोग भारत का पब्लिक ओपिनियन बना रहे हो। यह बात क्या सही है? बिल्कुल नहीं। दिस आई हैव टू टेल टू द सोशल रिफॉर्मर्स ऑफ मद्रास दैट आई हैव द ग्रेटेस्ट रिस्पेक्ट एंड लव फॉर देम। यह मद्रास के जितने भी सोशल रिफॉर्मर्स हैं उन सबको मुझे कहना है कि तुम लोगों के प्रति मेरी श्रद्धा है। तुम लोगों के प्रति मेरी रिस्पेक्ट है। आई लव देम फॉर देयर ग्रेट हार्ट्स एंड देयर लव फॉर देयर कंट्री फॉर द पुअर फॉर द ओप्रेस्ड। उनके जो विशाल हृदय है, देश के प्रति जो उनका ममत्व है, देश के प्रति उनका प्रेम है, गरीबों और पदलितों के प्रति उनकी सहानुभूति है। इसके लिए मैं उनको प्रेम करता हूं। इसके लिए वह मेरे स्नेह के पात्र है। बट व्हाट आई वुड टेल देम विद अ ब्रदर्स लव इज दैट देयर मेथड इज नॉट राइट। किंतु एक भाई के प्रेम के साथ में मैं उनको कहना चाहता हूं कि यह जो भारत देश को जो आपने क्रिटिसाइज करने का एक जो एक रास्ता अपनाया है वह रास्ता बिल्कुल गलत है। इट हैज़ बीन ट्राइड 100 थाउज इट हैज़ बीन ट्राइड अ 100 इयर्स एंड फेल्ड। लेट अस ट्राई सम न्यू मेथड। 100 सालों तक हमने इसको अपनाया। यह कार्य नहीं किया। आओ हम कोई एक नई पद्धति का आविष्कार करते हैं। एक नई पद्धति के अनुसार हम कार्य करते हैं। अभी देखिए एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट बड़ा ही सुंदर स्टेटमेंट स्वामी जी देते
Greatest reformers of India: Ramanuja, Kabir, Dadu, Nanak, Chaitanya
हैं। डीड इंडिया एवर स्टैंड इन वांट ऑफ रिफॉर्मर्स? भारत में क्या कभी रिफॉर्मर्स की कमी रही है? डू यू रीड हिस्ट्री ऑफ इंडिया? भारत का इतिहास पढ़ा है कभी? हु वाज रामानुजा? हु वाज शंकरा? हु वाज़ नानक? हु वाज़ चैतन्य? हु वाज़ कबीर? हु वाज़ दादू? कौन थे रामानुज? कौन थे शंकर? कौन थे नानक? कौन थे चैतन्य? कौन थे कबीर? और कौन थे दादू? हु वेर ऑल दिस ग्रेट प्रीचर्स एंड फॉलोविंग वन फॉलोइंग द अदर अ गैलेक्सी ऑफ स्टार्स ऑफ द फर्स्ट मैग्नीट्यूड। कौन थे यह सब? ग्रेट प्रीचर्स। एक के बाद एक एक दूसरे को फॉलो करते आ रहे हैं। अ गैलेक्सी ऑफ स्टार्स ऑफ द फर्स्ट मैग्नीट्यूड। आकाश भरे हुए यह तारे आकाश को माने पूरा आकाश भर के इस एक के बाद एक तारों का जन्म हुआ है। फर्स्ट मैग्नीट्यूड सर्वश्रेष्ठ जिनका चरित्र है। सर्वश्रेष्ठ जिनकी बुद्धिमत्ता है। इस तरह के सितारों का एक के बाद एक जन्म होता रहा है। भारत में कौन थे यह सब? डिड नॉट रामानुज फील फॉर द लोअर क्लासेस? क्या रामानुज को जो जितने भी यह गरीब है जितना जिनका कि शोषण किया गया है उनके लिए क्या रामानुज का हृदय नहीं रोया था? डिड ही नॉट ट्राई ऑल हिज लाइफ टू एडमिट इवन द पराया टू हिज कम्युनिटी? पूरे जीवन भर उन्होंने यह कार्य करना नहीं किया क्या कि इवन एक पारिया है। उसको भी अपना यह जो धर्म है उसमें उसको स्थान मिले। डिड ही नॉट ट्राई टू एडमिट इवन मोहम्मेडंस टू हिज फोल्ड? इवन क्या मुस्लिम लोगों को भी अपने धर्म में स्थान देने का उन्होंने प्रयास नहीं किया था? डिड नॉट नानक कॉनफर विद हिंदूज एंड मोहम्मेडंस एंड ट्राई टू ब्रिंग अबाउट अ न्यू स्टेट ऑफ थिंग्स। क्या नानक ने हिंदू और मुसलमानों के साथ में वार्तालाप करके एक नया मोड़ देने का प्रयास नहीं किया था। उस समय के धर्म को दे ऑल ट्राइड एंड देयर वर्क इज स्टिल गोइंग ऑन। उन सब ने प्रयास किया है और उनका कार्य चलता ही रहा है। द डिफरेंस इज दिस। किंतु एक दोनों डिफरेंस है इन दोनों में। दे हैड नॉट अ फैन फेरोनेड ऑफ द रिफॉर्मर्स ऑफ टुडे। आज के जो रिफॉर्मर्स हैं उनकी तरह उन्होंने अपने खुद के नाम का ढंडोरा नहीं पीटा। अपना खुद का नाम सबसे आगे आए कि मैं यह कार्य कर रहा हूं। मैं यह सब कुछ कर रहा हूं। बोल के अपने घमंड को उन्होंने अपने कार्य के ऊपर में सवार नहीं होने दिया। दे हैड नो कर्स ऑन देयर लिप्स एज मॉडर्न रिफॉर्मर्स हैव। आजकल के मॉडर्न रिफॉर्मर की तरह उनकी जिह्हावा पे कर्स यानी कि श्राप नहीं थे। भारत देश को भारत के यह जो सर्वश्रेष्ठ ऐतिहासिक सब यह कैरेक्टर्स थे उनके प्रति किसी ना किसी तरह की अश्रद्धा प्रकट करना यह सब इन लोगों ने कभी नहीं किया। देयर लिप्स प्रोनाउंस्ड ओनली ब्लेसिंग्स दे नेवर कंडेम्ड। उनकी जिहवा से उनके होठों से हमेशा आशीर्वाद ही बरसते रहे हैं। कभी भी किसी का क्रिटिसिज्म उन्होंने नहीं किया। दे सेड टू द पीपल दैट द रेस मस्ट ऑलवेज ग्रो। उन्होंने कहा है लोगों को कि भारत देश यह हिंदू धर्म है। यह हिंदू प्रजाति है। वह हमेशा बढ़ती रहनी चाहिए। दे लुक्ड बैक एंड दे सेड ओ हिंदूस व्हाट यू हैव डन इज गुड बट माय ब्रदर्स लेट अस डू बेटर। उन्होंने इतिहास की ओर दृष्टिपात करके कहा कि हिंदुओं तुमने आज तक जो किया वह बहुत अच्छा है। किंतु मेरे भाइयों हम इससे भी ज्यादा कुछ कर सकते हैं। दे डिड नॉट से यू हैव नेवर यू हैव बीन विकेड नाउ लेट अस बी गुड। उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि तुम लोग बुरे थे। आओ अभी हम अच्छे बने। दे सेड यू हैव बीन गुड बट लेट अस नाउ बी बेटर। उन्होंने कहा कि आप अच्छे थे किंतु भविष्य में वर्तमान में और भी अच्छे बने। दैट मेक्स ए होल वर्ल्ड ऑफ डिफरेंस। और यही है कि यह आज के रिफॉर्मर और उस समय के यह जो संत महापुरुष इन दोनों में इतना बड़ा डिफरेंस है। तो आज यहीं तक अभी इससे आगे कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: आज यह समझना कठिन है कि स्वामीजी ने हमें आत्म-श्रद्धा देकर, पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव का प्रतिरोध करना सिखाकर भारत को कैसे बचाया।
स्वामी जी कहते हैं ना प्रॉफेट इज नेवर ओन ओनर्ड इन ह ओन कंट्री यानी कि वो प्रॉफेट है अपने खुद के देश को छोड़कर के बाकी सब जगह पर उसको रिस्पेक्ट किया जाता है। तो वो पूरा देश भर में घूमे इतना प्रचार किया किंतु बंगाल में जब आए तो वहां के न्यूज़पेपर लिख रहे हैं कि वो नरेंद्रनाथ दत्ता है। वो वेगे बॉन्ड की तरह इधर-उधर घूम रहा था। वह आज पॉपुलर हो गया है। तो बंगाल की हालत अभी भी वैसी बनी हुई है। पूरे देश ने स्वामी जी को स्वीकार किया। वही लोग हैं कि उसको नरेंद्रनाथ दत्ता ऐसा बोल करके बुला रहा है कि नाम बदल दिया है। विदेश में जाकर के उसने क्या प्रवचन क्या दे दिया? अभी पॉपुलर हो गया है। वो कोलकाता यूनिवर्सिटी का एक ग्रेजुएट था। उसके मार्क्स भी अच्छे नहीं थे। अरे ये तो कथामृत में ही है। ये तो कथामृत म स्वामी जी की जो निंदा करने वाले न्यूज़पेपर आर्टिकल तो उसमें तो थे ही था। कथामृत में है कि वो एक डिवोटिस्ट ठाकुर को बोलता है कि वो एक लड़के के कायदत के लड़के के लिए आप रोते क्यों है इतना वो तो पता है उसके मार्क्स भी इतने अच्छे नहीं है कि किंतु स्वामी जी का ऐसा था ना कि कि
प्रश्न: एक ओर स्वामीजी विश्वकोश को याद करने में सक्षम थे, वहीं दूसरी ओर उन्हें परीक्षाओं में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ता था! Q: on one hand swamiji was able to memorize encyclopaedia, on other hand he struggled to get good grades in exams!
उन्होंने जैसे उनकी लाइफ में ही वर्णन है कि परीक्षा के आखिरी आखिरी दिनों में तैयारी करते थे और जो तैयारी करते थे वो म जो पढ़ते थे सब लिख देते थे तो वो तो गलती फिर तो स्वामी जी की है कि वो तैयारी ही नहीं करते थे वो तैयारी करेंगे इफ यू रीड यू विल बी एबल टू रिमेंबर आप पढ़ पढ़ेंगे ही नहीं तो कहां से याद रहेगा ना एक्चुअली
प्रश्न: जैसे ठाकुर थे वैसे ही थे उनके चेले!
देखिए ठाकुर का क्यूरियोसिटी पूरा था ये जो मास्टर महाशय को पूछते हैं कि ये जो भर्ती वोट आता है वो कैसे आता है फिर वो एशियाटिक सोसाइटी देखने को जाते हैं वहां स्केलेटन लगाया हुआ है वायर किया हुआ वो सब देखने में फिर यह जो यह माइक्रोस्कोप है किसी ने ठाकुर को माइक्रोस्कोप के बारे में बताया तो ठाकुर ने कहा अच्छा मुझे दिखाओगे तो फिर वो माइक्रोस्कोप ले भी आया था अभी हुआ ऐसा कि उसी समय ठाकुर को भाव हो गया तो देख नहीं पाए किंतु ठाकुर ठाकुर का क्यूरियोसिटी पूरा था। सो दैट इज वन
प्रश्न: कभी-कभी हम बहुत अधिक उदार हो जाते हैं और दूसरों को लगातार हमारी आलोचना करने की अनुमति देते हैं। दूसरे लोग इसका लाभ उठाते हैं। हमें इस आलोचना को नियंत्रित करने की आवश्यकता है। Q: sometimes we become too liberal and allow others to criticize us continuously. others take benefit of this. we need to control this criticism.
थिंग। यह जो कुछ-कुछ देश है जैसे चाइना है, रशिया है, सऊदी अरेबिया है टू नेम फ्यू कि वहां पे ऐसा है कि आप गवर्नमेंट का क्रिटिसिज्म कर ही नहीं सकते। जैसे ही करेंगे सीधा आपको जेल में डाल देंगे। क्या-क्या अत्याचार करेंगे और फिर यह अमेरिका का यह जो यूनिवर्सिटी कैंपस कल्चर चालू हुआ था कि देश के जितने भी आइकॉन्स थे सभी आइकॉन्स के ऊपर में उन्होंने अटैक करना शुरू कर दिया था। म वाशिंगटन स्लेव ओनर था। अब्राहम लिंकन का यह था और ये माने वो जीसस मतलब क्रिश्चियनिटी के बारे में म जितने भी फाउंडेशनल आपके जो ये है आइडियोलॉजी सबके ऊपर में अटैक करना शुरू किया। सो देयर आर टू एक्सट्रीम्स एज यू सेड कि ये तो लेफ्ट का जो आखिर आखिर में जो पागलपन चालू हुआ कि ये स्त्रियों के स्पोर्ट्स में पुरुष लोगों को जगह देना ये दैट वास क्रॉसिंग अ लाइन कि वो इस तरह का लाइन क्रॉस कर गया। अभी ये तो अभी-अभी सब बाहर आ रहा है ना जब न्यूज़पेपर पढ़ते हैं कि यूएस एड है तो वो क्या करता है कि पूरे जगत में यह वोकिज्म फैलाने का प्रयास कर रहा है कि आपको ट्रांसजेंडर राइट देखने होंगे तभी आपको पैसा मिलेगा वगैरह-वगैरह। तो दैट वाज़ गोइंग कंप्लीटली क्रेजी। नो डाउट अबाउट दैट कि ये दोनों के बीच में एक बैलेंस होना चाहिए। देखिए आइडियल पर्सन है महात्मा गांधी यदि म पब्लिक लाइफ में यदि किसी को इस तरह से देखा जाए कि उनके अगेंस्ट में क्रिटिसिज्म जितना भी होता था ही यूज्ड टू वेलकम इट कभी भी उसका विरोध नहीं किया है। और दूसरी बात है कि ही हिमसेल्फ वाज़ वेरी कंजर्वेटिव पर्सन। इंस्पाइट ऑफ ही वाज़ लिबरल इन हज़ आउटलुक। भगवान राम के प्रति उनकी श्रद्धा थी। वो अद्भुत थी। किंतु वो कंजर्वेटिज्म भी था और फिर लिबरलिज्म भी था। सो यह जो परफेक्ट बैलेंस जो पब्लिक लाइफ में मैंने किसी का देखा है दैट इज महात्मा गांधी का। तो दैट इज व्हाट वी नीड टू लर्न कि देखिए कि कोई भी सोसाइटी हो ना उसके जो कंजर्वेटिव आइडियल्स है उसके ऊपर में आप अटैक करते ही जाएंगे। करते ही जाएंगे। अटैकिंग फॉर द सेक ऑफ अटैकिंग। ऐसा नहीं है। अभी जैसे स्वामी जी ने कहा ना कि आप इसको गाली दे रहे हैं। हृदय में सिंपैथी रख के आप उनको बताइए। दैट इज द सीक्रेट। अभी ऐसा नहीं है कि शंकराचार्य है, दादू है, नानक है, कबीर है, रामानुज है। इन लोगों ने नया कुछ चालू नहीं किया। उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि पुराना है, सब कुछ वैसे का वैसे ही रखे रहिए। टुडे आज हमको ठाकुर मां स्वामी जी के आईडियाज इतने रेडिकल नहीं लगते हैं। किंतु उस समय जबकि मां ने कहा कि एक लेडी डिवोटी आकर के मां को कहती है कि 11 साल की बच्ची हो गई है। अभी उसकी शादी नहीं हो रही है। क्या करूं? आज यह सुनकर के हमको हंसी आएगी। किंतु उस समय में एक बहुत बड़ा सीरियस मामला था कि यह 11 साल की हो गई है, 15 साल की हो रही है, शादी नहीं हो रही। तो मां ने कहा कि अरे तुम रोती क्यों हो? उसको निवेदिता स्कूल में भर्ती कर दो ना। उसका जीवन बन जाएगा। जिस घर में जाएगी उस घर में उजाला फैलाएगी। तो वो जिसने रेमिनेशंस लिखा है वो लिखती है लेडी डिवोटी कि वो कहने की जरूरत नहीं है कि लड़की की मां को यह सलाह पसंद नहीं आई। किंतु आज मां का वो जो उपदेश है हमको बड़ा सामान्य लगता है कि अरे 12-15 साल की लड़की को तो स्कूल में ही होना चाहिए, कॉलेज में ही होना चाहिए। किंतु एट दैट टाइम इट वाज़ रेवोल्यूशनरी थिंकिंग। एट द सेम टाइम नो वन कैन एक्यूज़ मदद ऑफ ब्रेकिंग एनी कंजर्वेटिव आइडियाज। दे वर एक्सट्रीमली कंजर्वेटिव। यह जो नहबत में रहना और अपना जीवन नहत में बिताना। किंतु दूसरों को यह कहना कि आपकी लड़की को निवेदिता स्कूल में रखिए। कहां निवेदिता कहां मदर यह जो कंट्रास्ट हम बार-बार देख रहे हैं कि कहां एकदम कंप्लीटली डिफरेंट वर्ल्ड से वे लोग दोनों आते हैं। किंतु मां का हृदय उदार था। क्यों? क्योंकि उन्होंने देख लिया कि जो कंजर्वेटिव आइडियाज होते हैं जिसकी किसी भी सोसाइटी के उस पे आप अटैक करने को जाएंगे ना तो आप फिर उस सोसाइटी आपको रिजेक्ट कर देगी। वो फिर वो सोसाइटी आपको किसी भी तरह का काम करने ही नहीं देगी। माने रिफॉर्म लाना है तो इस तरह से लाना है वो जैसे वो कहानी है ना कि अपने मित्र के सर के ऊपर में मच्छर बैठा है तो हथौड़ी मार दिया सीधा उसके सर के ऊपर में मच्छर तो मरतेमरा वो अपना मित्र भी मर गया तो ऐसा ना हो ना हम लोगों का जो हिंदू धर्म का एक जो
प्रश्न: श्रीरामकृष्ण जैसे महान संतों का सामाजिक योगदान वास्तव में महान है। Q: societal contribution of great saints like sri ramakrishna is really great.
है ना अभी उसको आप अपना प्लस पॉइंट कहेंगे कि माइनस पॉइंट कहेंगे एसेट कहेंगे कि अपना यह कहेंगे कि अपने यहां पे ना ऐसा कोई धर्म का सेंट्रल अथॉरिटी नहीं है। अभी वह जो मैं वो वेटिकन एंबेसडर को मिलने को गया था ना तो वहां पे वो जो लोकल लोग हैं उनके साथ में बात हो रही थी। एक्चुअली ओकेजन ऐसा था कि एक लोकल बिशप को ये लोग आर्च बिशप बनाने वाले हैं। तो आर्च बिशप इज अ बिग पोजीशन। तो उसके लिए वो पापाल एंबेसडर आ रहा था। रात को फिर सेमनी हुआ था। हजारों लोग आए थे वगैरह-वगैरह। हम लोगों का तो सिर्फ इंटरफेथ मीटिंग ही था। तो मैं ये जो जो आर्च बिशप होने वाला था उसी दिन को उसके साथ में मैंने काफी डिस्कशन किया। तो एक चीज मैंने देखा ना कि उनके वहां पर जो ऑर्गेनाइजेशनल सिस्टम है ना इट्स वेरी वेल ओइल्ड मशीन कि आप आपका जो यह इतने सारे पेरिश है पेरिश पृष्ठ है उसमें से किसको बिशप बनाना है तो एकदम एक सिस्टम है सिस्टम में टैलेंट को रिकॉग्नाइज किया जाता है कंट्रीब्यूशन को असेस किया जाता है असेसमेंट के बेस पे प्रमोशन होता है पेरिश प्रिस्ट में से बिशप बने बिशप में से आर्च बिशप बने आर्च बिशप में से कार्डिनल बने तो यह असेसमेंट अंडरस्टैंडिंग, एनालिसिस, प्रमोशन और इवन डिमोशन यह सिस्टम उन लोगों का इतना पावरफुल है कि चंद संख्या में होकर के भी वे लोग ना अपने जो लिवरेज कर पाते हैं अपनी पोजीशन को। हम लोगों का होता क्या है? हम लोग इतने स्कैटर्ड हैं कि हम लोग ना अपनी पोजीशन को लिवरेज नहीं कर पाते। अपने किसी के प्रेशर ग्रुप नहीं बना सकते। हिंदू अभी अमेरिका में देखिए इतने सारे हिंदू है आज वो मेक्सिकन के बाद में सबसे बड़ी संख्या हम माने फॉरेन बोन ये जो है वो अपने इंडियंस की ही है किंतु ये जो लोबिंग एफर्ट है ना वो बाकी सब लोग लगा देंगे हम लोग ही ये लोबिंग एफोर्ट नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि कोई कहेगा मैं गुजराती हूं कोई कहा बेंगली हूं कोई कहेगा वैष्णव हूं कोई कहेगा यह हूं तो ऐसा करके करके हम लोग ना एक कॉमन एजेंडा पे एक कॉमन प्लेटफार्म पे इकट्ठा हो के ऑर्गेनाइजेशन बनाना दिस इज समथिंग वेरी डिफिकल्ट फॉर अस। यह जो अपने हिंदू धर्म का जो हमेशा से जो एक रहा है माइनस पॉइंट माइनस पॉइंट भी नहीं कहेंगे। इट इज अ ट्रेट ऑफ आवर हिंदूस कि हमने हिंदू धर्म को इतना स्पिरिचुअलाइज किया है कि फिर यह जो जगत इसमें आता ही नहीं है। दैट इज व्हाई स्वामी जी ये जो कहते हैं कि आई हैव फॉलन इन लव। तो मैं देखिए अभी तक हम मैं पढ़ता ही था। किंतु उसके साथ में जब बात किया ना मैंने यह जो ऑर्गेनाइजेशन का मशीनरी कैसे चलता है वह सुना ना मैंने तब मुझे लगा कि यह स्वामी जी वह कह रहे हैं वो ठीक ही कह रहे हैं कि आपके पास में यदि 1000 लड़के हैं तो यू असेस देयर प्लस एंड माइनस यू असेस देयर स्ट्रेंथ एंड वीकनेस अकॉर्डिंगली यू प्रमोट देम अकॉर्डिंगली यू गैदर अ टीम अंडर देम एंड मेक देम वर्क अकॉर्डिंगली एज अ टीम टू इंप्लीमेंट सम पर्टिकुलर एजेंडा तो हम अपनी स्ट्रेंथ को लिवरेज कर पाएंगे अदरवाइज़ जैसे हम स्कैट र्ड ही हो जाएंगे।
प्रश्न: अधिकांश लोग केवल द्वैत के अधिकारी हैं। केवल मुट्ठी भर लोग ही अद्वैत के अधिकारी हैं। Q: most are eligible only for dvaita. only a handful are eligible for advaita.
यह जो हम जो रिलीजन को डिवाइड करें ना तो यह जो पक्का द्वैत है यह अब्राहमिक रिलीजन जुडाइज्म इस्लाम एंड क्रिश्चियनिटी पक्के द्वैत है। मैं हूं और भगवान है। यह दोनों अभी और कोई प्रश्न ही नहीं है। भगवान का एक देवदूत आता है। प्रॉफेट आता है। सन ऑफ गॉड आता है। व्हाटएवर जो कि हमको भगवान का मैसेज देता है। तो यह उनका आईडिया पक्का है। पक्के द्वैत रिलीजन है। उसके ऊपर में निराकार आता है। बुद्धिज्म यह श्रमण स्कूल जो है जिसको कि हम बुद्धिज्म और यह जैनिज्म कहते हैं। वे लोग कहते हैं कि ईश्वर की आपको आवश्यकता नहीं है। ईश्वर के बिना भी आप एनलाइटनमेंट प्राप्त कर सकते हैं। कि यह निराकार तो हो गया किंतु यह लोग यह नहीं कहते कि मैं ही ईश्वर हूं। कहते हैं कि भीतर में से जो साधना करके हम निर्वाण को प्राप्त करेंगे। उसके बाद में क्या होता है? निर्वाण के बाद में हमको पता चल जाएगा। पर यू डोंट हैव टू स्पेकुलेट कि व्हाट इज दी अल्टीमेट सिचुएशन? व्हाट इज द अल्टीमेट सत्ता? उसके बारे में स्पेकुलेशन नहीं करते हैं। तो इसको हम निराकार कहेंगे। जबकि यह अद्वैत वेदांत है व्हिच गोज़ इवन अबव दैट। कहते हैं अद्वैत ईश्वर को मानो या ना मानो, आत्मन को मानो ना मानो यह जो कुछ भी है सब हमारे भीतर में है। उसी को आपको मैनिफेस्ट करना है। तो ये तीन स्टेप है। द्वैत है, निराकार है और अद्वैत है। सो दिस इज़ हाउ द वर्ल्ड रिलीजंस हैव इवॉल्वड। ऑब्वियसली क्योंकि यह कहना कि अहम ब्रह्मास्मि तो ये दिस बॉडी इज नॉट मी यह देखिए यहां पे मैं स्कूल के बच्चों के साथ जो बात करता हूं कॉलेज के स्टूडेंट्स के साथ में अभी कैसे मैं समझाऊं कि ये जो ए्जायटी है परीक्षा में परफॉर्मेंस का जो आपका फियर है वगैरह इट इज़ ऑल रिलेटेड टू योर बॉडी यू डिसोसिएट योरसेल्फ यू विथ योर बॉडी एंड यू विल बिकम यू विल इनहेरिट योर ट्रू ट्रेजर किंतु यह समझाना इट इज़ एक्सट्रीमली ली डिफिकल्ट हमको भी इतना सारा साल के बाद साल लगे कि थ्योरेटिकली हमने चलो स्वीकार कर लिया किंतु तो इवन वन पॉइंट ऑफ रियलाइजेशन कि हां वी आर डिसोस वी आर नॉट दिस बॉडी वी आर सेपरेट फ्रॉम दिस बॉडी माय ट्रू नेचर इज़ नॉट दिस मटेरियल रियलिटी इज़ अ स्पिरिचुअल रियलिटी इट टेक्स लॉन्ग टाइम टू हैव इन अ लिटिल एक्सपीरियंस और इट टेक्स अ लॉन्ग टाइम यह जो अवतार और पंडित इन दोनों में
प्रश्न: वेदांत को व्यावहारिक कैसे बनाया जाए? कभी-कभी हमें प्रार्थना करने की आवश्यकता होती है, कभी-कभी हमें अध्ययन करने की आवश्यकता होती है। Q: how to make vedanta practival? sometimes we need to pray, sometimes we need to study.
डिफरेंस क्या है? जो पंडित होते हैं उन लोगों के लिए उनका फिलॉसोफी बेस्ट सर्वश्रेष्ठ होता है। मैं अद्वैत में मानता हूं अद्वैत ही सही है। मैं द्वैत में मानता हूं द्वैत ही सही है। जबकि अवतार के जीवन में इट्स अ प्रोग्रेसिव स्पेक्ट्रम जैसे आपने कहा। स्टेप बाय स्टेप आप द्वैत से स्टार्ट कीजिए। धीरे-धीरे शरणागति से स्टार्ट कीजिए। आत्मश्रद्धा तक आपका अंत लाइए। सो यह जो है कि अवतार के जीवन में इस तरह का फॉल्स वाटर टाइट कंपार्टमेंट नहीं होता है। दैट इज व्हाई ही इज एन अवतार कि एस पर नीड मनुष्य के माइंड की जो इवन विभिन्न मनुष्यों की आवश्यकता तो छोड़ ही दीजिए। अपने खुद के जीवन में सुबह को माइंड फ्रेश होता है तो लगता है चलो थोड़ा सा अपने हृदय पर ध्यान कर लेते हैं। शाम होने तक काम करते-करते थक गए हैं तो चलो थोड़ा कथामृत पढ़ लेते हैं। विद इन अ सिंगल डे अपने माइंड की जो फ्रेशनेस के अनुसार जो परिस्थिति होती है। सो हमको अभी मैं यदि सिर्फ अद्वैत को मानता तो फिर मैं रात को थक गया हूं। मैं क्या करूंगा? सो इट्स लाइक दैट कि यह जो अवतार समझते हैं कि माइंड इज़ इन अ डिफरेंट सिचुएशन। सो इट रिक्वायर्स डिफरेंट टाइप ऑफ फूड। जो ठाकुर कहते हैं ना मां अपने बच्चे के लिए किसी का डाइजेशन शक्ति अच्छा है तो उसके लिए वो पुलाव वगैरह बना देती है। जिसका डाइजेशन अच्छा नहीं है उसके लिए उस तरह का वो मंद मतलब वो सिंपल खाना बनाती है। सो अकॉर्डिंग टू हिज नीड हमको उसको वो पथ देना है। आध्यात्मिक साधना देनी है। ये अवतार को समझ में आता है। बिकॉज़ दे हैव एन एमैथी। यह स्वामी जी ने कहा ना कि दूसरों का पॉइंट ऑफ व्यू समझना कितना मुश्किल है। मैं कहता हूं कि अद्वैत ही सही है। अभी दूसरों का पॉइंट ऑफ व्यू डज नॉट मैटर। उसको नहीं समझ में आता है। उसको तकलीफ होती है। डज नॉट मैटर। अद्वैत ही सही है। दैट इज द डिफरेंस बिटवीन पंडित एंड एन अवतार। सब कुछ इंटरकनेक्टेड है अपने साहित्य में। बस वही बात है कि अपनी बुद्धि कहां तक जाती है कनेक्शन बिाने की।
प्रश्न: हमें लोगों की आवश्यकता के अनुसार शिक्षा देनी चाहिए, न कि किसी विशेष दर्शन के प्रति आपके प्रेम के अनुसार। Q: we need to teach according to peoples need, not according to our love for particular philosophy.
ये ये जो पंडित जी होते हैं ये वो लोग होते हैं ये फार्मास्यूटिकल कंपनी की तरह वे लोग कहते हैं हमारी ही दवा ठीक है आपको जो भी रोग होता है हमारी दवा ले लो ठीक हो जाएंगे जबकि ये अवतार होते हैं डॉक्टर की तरह पेशेंट की अवस्था देख के दवाई
प्रश्न: ठाकुर नरेन को ज्ञान और गोपाल की माँ को भक्ति सिखाते हैं। Q: thakur teaches jnana to naren and bhakti to gopal's mother.
देंगे दूसरों के पॉइंट ऑफ व्यू से देखना मैं अपना फिलॉसोफी प्रूव करने के लिए आया हूं कि आपकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए आया हूं दैट इज अ मेन थिंग यह देखिए मंडन मंडन मिश्र के साथ में शंकराचार्य का जो डिस्कशन है वो हम लोग कहते हैं कि बहुत अच्छा किया शंकराचार्य ने जीत गया किंतु आइडियली स्पीकिंग मंडन मिश्र का जो गृहस्थ आश्रम है दैट इटसेल्फ इज अ माने लेजिटमेट वे ऑफ साधना आप उसको ऐसा क्यों कह रहे हैं कि मैं जीतूंगा तो तुमको साधु होना है। तुम जीतोगे तो मैं गृहस्थ हो जाऊंगा। यह जो अपना एक डोमिनेंस स्थापित करना है, इसी की वजह से तो वह फिर अवतार के रूप में गिने नहीं जाते हैं। किंतु एक बात याद रखनी है कि शंकराचार्य इज़ नॉट सनातन हिंदू धर्म। सनातन हिंदू धर्म बिलोंग्स टू श्री राम एंड श्री कृष्णा एंड इट वाज़ रिकनेक्टेड बाय श्री रामकृष्ण। सो शंकराचार्य और बुद्धिज्म वगैरह एक मिडीवल एक एक मिडिल पीरियड एक ऐसा है कि जबकि वी लॉस्ट आवर प्लॉट टू बी वेरी फ्रैंक। सो दैट इज़ नॉट एक्चुअली सनातन धर्म। सो स्वामी जी का कंट्रीब्यूशन जो है इट इज नॉट कंप्लीटली यूनिक दे आर जस्ट रिजरेक्टेड ओरिजिनल वैदिक
हमारा लोगो -- ज्ञान, भक्ति, कर्म और योग का सामंजस्य -- गीता का सर्वोत्तम सारांश है। our logo -- harmony of jnana, bhakti, karma, and yoga -- is the best summary of gita.
एज ये गीता अल्टीमेटली क्या है ये जो गीता का आपको जो समराइज करना है व्हाट इज द बेस्ट समरी ऑफ गीता तो अपना यह जो लोगो है यह जो ज्ञान कर्म भक्ति ध्यान के समन्वय से हमको एनलाइटनमेंट प्राप्त होता है। दिस लोगो इज द बेस्ट समरी ऑफ गीता।