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Sri Ramakrishna's Disciples ·

Swami Akhandananda 22 June 2023 स्मृति कथा : स्वामी अखण्डानन्द लिखित

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यह खानदान जिस की कथा म्बार्ड दक्षिणेश्वर ठाकुर पिछली बार जब इसको प्रसंग को हमने आरंभ किया था स्टार्ट किया था तभी इसको थोड़ा सा कंटिन्यू करते हैं महाराज जो है दक्षिणी ईश्वर में कालीबाड़ी में ठाकुर को मिलने के लिए गए हैं ठाकुर ने महाराज को कहा अखंडानंद जी महाराज को उनका नाम था गंगाधर वो तो 15-16 साल की उम्र थी ठाकुर के पास में सर्वप्रथम आए थे तो अभी एक दो बार से ए रहे हैं अभी एक दिन ऐसा हुआ की बहुत ही दोपहर में और यह है तप है रुद्रा है और उसे समय में तरबूज लेकर के वाटर मिलन लेकर के वो उनके पास में आए हैं वो देखकर के ठाकुर बड़े ही खुश हो गए तो अभी ये सब प्रसंग ऑलरेडी हो चुका है अभी इसके बाद में आगे ठाकुर वो गंगाधर महाराज को लेकर के स्नान करने के लिए गए फिर गंगाधर महाराज ने ठाकुर को स्नान करवाने में मदद की फिर वो अपने कमरे में वापस आए फिर सभी जितने भी वह छवि है देवी देवताओं की सबके सामने ठाकुर प्रणाम कर रहे हैं ओम काली ओम काली बोलते बोलते इसके बाद की बात है भोग आरती पर एंड्राइड हो जान के बाद में ठाकुर ने वो अपना वरांडा है अपने कमरे का वहां पे जाकर के गंगाधर महाराज को कहा की कालीबाड़ी में जो वहां पे वहां एकदम गंगाजल में सब अन्नपता है मां काली का जो प्रसाद जो भोग होता है वो तो गंगाजल में बंता है तो गंगाजल में पकाया हुआ जो मा एन है महाभोक जो है जो की मां को निवेदन किया गया है वो जाकर के उसको ग्रहण करो अभी गंगाधर महाराज ने पहले ही का दिया है की वो कितना आचार्य के सहित कितनी निष्ठा के सहित सब नियमों का पालनपुर करते थे उसमें मांसाहारी शामिल होगा क्योंकि यहां पर ठाकुर है उनको कहा की जो जाकर के कालीबाड़ी में जाकर के मां काली का प्रसाद ग्रहण करो अभी यह तो पता है हमको की विष्णु घर यानी की भगवान विष्णु को जो अन्य निवत थे जो अर्पण होता है भोग जो अर्पण होता है वो शाकाहारी होता है वो वेजीटेरियन होता है और वो जो मां काली को जो भोग अर्पण होता है वो नॉन वेजीटेरियन होता है अर्थात उसमें मछली जो है वो रहती है जो मांसाहार जिसको कहते हैं तो अभी ठाकुर ने गंगाधर महाराज को कहा अभी क्या है की इन सभी संस्कृति है सभी राज्य है उसकी अपनी अपनी एक संस्कृति है अब जैसे देखेंगे गुजरात में है महाराष्ट्र में राजस्थान में यहां पर जैन धर्म वैष्णव धर्म का इन्फ्लुएंस थोड़ा सा ज्यादा है बोलकर के यहां के लोग उन लोगों को थोड़ा सा आश्चर्य होता है की किस तरह से भगवान को मंदिर में भगवान को आप वो जो है मछली वगैरा का वो भोग दे सकते हैं किंतु क्या है बंगाल की जो रिवाज है वहां की जो संस्कृति है उसके अनुसार शक्ति साधना में वह जो है वो मछली वगैरा का भोग धरना उसमें कोई बड़ी बात नहीं है वो तो उनके लिए सहज है सामान्य है वही वहां का नियम है तो ये संस्कृति के अनुसार हमको ये सब कुछ देखना है जैसे गुजरात में बहुत बार लोग कहते हैं की अरे ये किस तरह से वो ब्राह्मण है या तो फिर साधु है ये किस तरह से वो मांसाहार कर सकते हैं ये तो हमारी संस्कृति के विरुद्ध है किंतु एक्चुअली ये बात नहीं है हमारी संस्कृति जैसे सभी प्रदेश के लिए विभिन्न विभिन्न ये है संस्कृतियों इतनी साड़ी डाइवर्सिटी है इतनी साड़ी हमारी ये जो मतलब डिफरेंट डिफरेंट ट्रेडीशंस है और ये डाइवर्सिटी ही हमको स्ट्रैंथ देती है जैसे की बाकी सब कुछ कुछ संप्रदाय में देखेंगे की एक ही वो सेंट्रल ली डायरेक्टेड सब कुछ होता है जैसे क्रिश्चियनिटी में पॉप है पॉप जो है जितने भी वो क्रिश्चियन धर्म के रिलेटेड एलटीटी वह और छोड़ो ब्रांच में या तो फिर यह प्रोटेस्टेंट ब्रांच में नहीं चलती किंतु यह जो कैथोलिक ब्रांच है क्रिश्चियनिटी की उसमें पॉप की अथॉरिटी एब्सलूट होती है वो रहेगा की इस तरह से आपको ये जो आपके धर्म की जो बिलीव है वो इस तरह से आपको फॉलो करनी है इस तरह से आपको धर्म को जो रिलिजियस टेक्स्ट है उसको आपको इंटरप्रेट करना है इस तरह से आपकी ये जो ट्रेडीशंस है उसको आपको इस तरह से आपको स्वीकार करना है वो सब कुछ आपको बता देगा की जो फेस्टिवल्स से वो किस तरह से सेलिब्रेट होने चाहिए ये थियोलॉजी है उनकी जो क्रिश्चियन फिलासफी उसको किस तरह से अंडरस्टैंड करना है इंटरप्रेट करना है या तो फिर ये जो डिफरेंट डिफरेंट सेंस जो है अब सबको वो सेंड फूड देते हैं जैसे वो मदर टेरेसा को कोलकाता में उन्होंने कहा की सही इस सेंट तो अभी वो सेंट्रल पॉप जो होता है वो डिक्लेअर करता है की सही इस एन सेंट किंतु अभी देखिए भारत ने तो ऐसा है की जैसे इतने सारे सिद्ध महापुरुष संत हमारे गांव गांव में घूमते रहते हैं और मृत इस गांव में जाएंगे आपको इतनी सुंदर सुंदर कहानी सुनने को मिलेगी वो वहां के वो जो उसे ठाणे के जो संत महापुरुष है उनके बड़े में इतना सर वही विद्या पूर्ण हमारा लिटरेचर है इतना सर हमारा वह विद्या पूर्ण ट्रेडीशन से इतनी साड़ी इंटरप्रिटेशन से वेदांत में ही कितनी साड़ी ब्रांचेस है फिर हिंदू धर्म के भीतर में सिर्फ वेदंतु एक है फिर वे जो भक्ति स्कूल जो है वो एक मतलब इतना सर डाइवर्सिटी मतलब ये है हमारे यहां पे की वो हमारे धर्म को रिच बनाता है इसीलिए क्रिश्चियनिटी में क्या हुआ है की अभी आपको एक सर्टेन लेवल से ज्यादा ऊपर में महापुरुष आपको नहीं दिखेंगे वहां पर सेंट तो आएंगे जैसे की सेंट फ्रांसिस ऑफ एसीसी थे सेंट टेरेसा थॉमस थे वगैरह-वगैरह सेंटो सेंट अगस्टाइन थे वो सेंट तो आएंगे किंतु दूसरा नया अवतार जन्म नहीं ग्रहण करेगा और यदि कोई ऐसा डिक्लेअर भी करेगा की मैं हां मैं अवतार हूं ऐसा एक जीसस थे इस तरह उतार हूं तो क्या इसको पत्थर मार के ये लोग शायद मार देंगे या तो फिर उसकी बात को ये लोग बिल्कुल ही स्वीकार नहीं करेंगे जबकि भारत में क्या है की एक के बाद एक अवतारों का जन्म ग्रहण करना संभव है क्योंकि हमारी ये जो डायवोर्स ट्रेडीशन जो है ये हमारी जो विशाल और विद्या पूर्ण ये जो हिंदू महासमुद्राम जो है उसमें आप किसी भी तरह से वो आप नहीं है की वो एक छोटा सा संत महापुरुषों वहां से लेकर के सिद्ध फिर सिद्ध हो के सिद्ध और उसके ऊपर में भी अवतार भी जो है सबके लिए यहां पे जगह है इतना हमारे यहां जो उदार जो है हिंदू धर्म का वो है तो उदार हृदय की वजह से ही अवतार यहां पे जन्म ग्रहण करते हैं अवतार को क्या भगवान को क्या पड़ी है वो कहानी पे जाकर के वो जन्म ले लेंगे यदि हम उसको हृदयपूर्वक बुलाएंगे पुकारेंगे तभी तो औकात अवतार जन्म ग्रहण करेंगे ना वैसे तो अवतार नहीं आने वाले हैं तो क्रिश्चियनिटी ने पहले ही दरवाजा बैंड करके रख दिया है की यह जीसस एक थे उसके बाद में और कोई नहीं है अवतार वही जो हो सकते हैं ज्यादा से ज्यादा संत महापुरुष हो सकते हैं उससे ज्यादा और कोई नहीं हो सकते तो अवतार के आने पे पहले से उन्होंने रॉक लगा दी है भारत में ऐसा है की हिंदू धर्म कहता है की जितने अवतार आए सब वेलकम है ठाकुर कहते हैं ना दशावतार भी है 21 अवतार भी है और फिर अनंत अवतार भी है कथामृत में ठाकुर कहते हैं तो अनंत अवतारों के लिए हमने दरवाजा अपने हृदय का खुला रखा है अपनी भक्ति से हम उनको आमंत्रित करते हैं तो ये तभी संभव है जबकि इतनी साड़ी डायवर्स ट्रेडीशन भारत में हो जो की सब जगह पे सब तरह से ईश्वर को विभिन्न रूप से पुकार सके जैसे ठाकुर कहते हैं की विभिन्न रास्तों से नदियां जाकर के आखिर में तो एक ही महासमुद्राम में विलेन होती है जैसे वो शिवा महिमा स्तोत्र का वो जो श्लोक है इसके अनुसार तो यह जो अवतार को भी हम इतने विभिन्न नाम से इतने विभिन्न रूप से इतनी विभिन्न साधन पद्धतियों पद्धतियों से पुकारते हैं की अवतार को किसी एन किसी की बात तो मान्य रखती ही पड़ेगी किसी ने किसी की बात सुनकर के पृथ्वी पे तो आना ही पड़ेगा तो इसीलिए भारत में यह जो विभिन्न ट्रेडीशन है यहां पे गुजरात में मुझे कई बार कुछ कुछ लोग कहते हैं की अरे आप साधु लोग साधु होकर के मांसाहार किस तरह से कर सकते हैं अभी स्वामी विवेकानंद ने तो बड़ा ही स्पष्ट का दिया था की जी जगह पे अपना आश्रम है वहां पे उसे तरह की ट्रेडीशन को फॉलो करना है गुजरात के आश्रमों में मांसाहार कभी हुआ नहीं है कभी होगा नहीं तो यहां की ट्रेडीशन के अनुसार उसको हम फॉलो करते हैं किंतु यह जो पूरा भारत देश जो है ये भारत देश का हमको उसको अप्रिशिएट करना चाहिए नहीं की उसको हमको क्रिटिसाइज करना चाहिए अरे बंगाल में ऐसा हो रहा है अरे साउथ इंडिया में ऐसा हो रहा है अरे नॉर्थ इंडिया में ऐसा हो रहा है हम लोग जो है वह ठीक कर रहा है इस तरह से जो किसी का भी भाव राहत है तो वो क्या है अपने मां को संकुचित कर देता करता है और फिर वह जी धर्मपत से जी साधन पद्धति को लेकर के आगे बढ़ता है वो सदन पद्धति का रास्ता फिर वह अवरोधित हो जाता है वो साधन पद्धति जो है आखिर में एक डेड और में जाकर के वो खड़ी हो जाति है हमको जी किसी संप्रदाय के हो भारत के जी किसी प्रदेश में र रहे हो जी किसी राज्य में र रहे हो पूरे भारतवर्ष की यह जो वैद्यपूर्ण साधन पद्धतियां हैं संस्कृति है यह हमारी वह जो कस्टम और ट्रेडीशंस सबको हमको अप्रिशिएट करना चाहिए तभी हमारा हृदय खुला रहेगा तभी अवतार को आने के लिए एक बहुत ही सुंदर हम एक मंदिर अपने हृदय में स्थापित कर पाएंगे वो जो कथामृत में कहानी है ना एक पदमालोचन करके एक लड़का था उसने वो गांव के बाहर में एक मंदिर था वहां पर जाकर के शंकर फुटाने की शुरुआत कर दी तो गांव वाले सब दौड़े आए सोचा की अरे चलो कोई महापुरुष संत आए हैं उन्होंने वहां मंदिर तो बहुत पुराना पड़ा है वह तो धूल मिट्टी का रहा है तो मंदिर को पूरा एकदम परिवार एकदम क्लीन किया होगा और फिर वहां पर ईश्वर की वो जो किसी ईश्वरीय मूर्ति की स्थापना की होगी और अभी शंकर बजा रहा है तो अभी मंगल आरती होगी इवनिंग संध्या आरती होगी चलो इस संध्या आरती में हम लोग जो है सब भाग लेते हैं बोलकर के सब लोग ए गए देखा की मंदिर वैसे का वैसा धूल मिट्टी वाला है नहीं वो किसी भगवान की मूर्ति की स्थापना की है और वो पद्मलोचन जो है वो शंकर बजा रहा है तो वो गांव वाले बोलते हैं क्या बोलते हैं शंकर को फूंक ले तू ही शंकर को मैंने तुमने ये जो शंकर बजा करके ये क्या उल्टा पुल्टा कर दिया है पौधों करके उसको बुलेट हैं ये यहां पे ना ही तुम्हारे मंदिर में वो भगवान की मूर्ति की स्थापना है यहां पे ये जो चमगादड़ है वो अपना ये जो विस्थाप फेक रहे हैं वो जो मकड़ी है वो अपना झाला बना रही है तुमने मंदिर की क्लीनिंग तो किया नहीं है भगवान की स्थापना एक की है और यह शंकर बजाकर के वो हल्ला गला मचा रहे हो इस तरह से ये हो जाएगा यदि हम अपना हृदय विभिन्न डायवर्स ट्रेडीशन के प्रति बैंड कर देंगे तो अपना हृदय में जो ठाकुर का जो मंदिर है जी किसी भी ईश्वर की देवता की हम पूजा करते हो वो चाहे भगवान कृष्णा हो ना की भगवान महावीर हो जैन लोगों के ना की वो किसी भी वो भगवान या अवतार हो हम लोग यदि ये कहना शुरू कर देंगे की हमारी ट्रेडीशन हमारे ही अवतार ये हमारी ही है जो हिंदू धर्म की शाखा सही है बाकी सब लोग गलत है तो ये धूल मिट्टी वाला मकान हो जाएगा वहां पे चमगादड़ रहेंगे अपनी विस्तार फेखेंगे और मकड़ी अपना दाल बनाएगी तो इसीलिए उधर हृदय से भारत देश की सभी पद्धतियां सभी संस्कृति को हमको वेलकम करना चाहिए स्वीकार करना चाहिए तो अभी ठाकुर ने क्या कहा तुम मां काली के मंदिर में जो वहां पर महाप्रसाद है उसको ग्रहण करो अभी यह तो अभी महाराज आगे कहते हैं गंगाधर महाराज कहते हैं अच्छा चलो मैं काली मंदिर में जाता हूं मैं वो जो रास्ता है वहां पर काली मंदिर का वहां पर मैं जा रहा हूं पीछे मुड़कर देखा तो ठाकुर वहां पर खड़े हैं दक्षिण काली खड़े दक्षिण विष्णु खड़े चाचा अभी ठाकुर ने का दिया की जो तुम काली घर में जाकर के प्रसाद ग्रहण कर लो ठाकुर चाहते थे की यह जो अहंकार है के नाम में जो मांसाहार नहीं करता या तो मैं बड़ा पवित्र हूं या तो मैं जो हूं की बहुत ही मतलब मेरे इतनी साड़ी साधन कर साधन भजन कर रहा हूं की मैं दूसरों से ज्यादा श्रेष्ठ हूं इस तरह का भाव जो है किसी के मां में ना ए जाए इसलिए ठाकुर अहंकार को तोड़ने के लिए जो बहुत ही ट्रिक तपस्या करता था इस तरह से उनको कहते थे जो थोड़ा सा वो मां काली का प्रसाद ग्रहण कर लो मां काली का प्रसाद तो निरामिष है तो अमिश प्रसाद है अर्थात की उसमें मछली भी होगी वो प्रसाद में वो मां काली के तो उसको ग्रहण करके अपना अहंकार तोड़ दो देखो अपने ऑर्डर में इस तरह की बहुत साड़ी बातें हैं और बाबूराम महाराज की है बाबूराम महाराज का विष्णु भाव था तो अपना फरहान अगर मठ में एक बार उनके मां में ए गया की देखो मैं तो कितनी तपस्या करता हूं मैं कितना शुद्ध पवित्र हूं मैं तो कभी भी ये मछली यही कथा की मैं खाने-पीने में बड़ा ही संयम है मेरा वानिवर्तन में आचार्य विचार में मेरा बड़ा ही संयम है और दूसरे लोगों को देखो किस तरह से हटोला मचाते हैं जो भी मिलता है वो का लेते हैं मेट ज्यादा लगता है की उनको वो ठाकुर के प्रतिष्ठा इतनी नहीं है या तो फिर उनकी साधन के साधन भजन के ऊपर में उन लोगों की वो ऑनेस्टी नहीं है या तो फिर वो बहुत ज्यादा मेहनत करके साधन भजन नहीं करना चाहते अभी वो बाबूराम महाराज मुझे तो ऐसा नहीं बोलेंगे किंतु उनके मां में शायद इस तरह से ऐसा भाव ए गया तो इस दिन रात को ठाकुर ने स्वप्नो में आकर के उनको बोला की अरे मेरे जो बच्चे हैं वो थोड़ा सा मछली का लेते तो उसमें तुमको क्या इतना परेशानी हो जाति है वो मेरे बच्चे हैं वो तो वो जो चाहे करेंगे मैं जो कहूंगा वैसा वो करेंगे तो सुबह को उठकर के बाबू ने महाराज को लगा अरे ठाकुर ने मुझे इस तरह से दांत दिया ये तो ठीक नहीं हुआ तो उन्होंने क्या किया जिसको पत्र में मछली बनाई गई थी मछली राखी थी उसे पत्र में थोड़ा सा उंगली डालकर के वो अपनी जुबान पर स्पर्श यानी की थोड़ा सा तो मछली खाना मछली को ग्रहण करना हो गया तो उनका अहंकार टूट गया की हां चलो भाई इस तरह से मैं इतना भी शुद्ध पवित्र नहीं हूं की मैं कभी मछली या ही नहीं हूं मैंने भी मछली खाली है मेरी भी तपस्या टूट गई है तो एक्चुअली तपस्या का भी एक अहंकार होता है ठाकुर देखते थे की किसके मां में क्या है और उसके ऊपर में आघात कर देते थे यह बाबू राम महाराज का एक दूसरा एक उदाहरण है की यह नोखा में ए रहे थे तो कुछ लोग ठाकुर की निंदा कर रहे हैं वो बोल रहे हैं की इन दक्षिणेश्वर के परमहंस वहां से इस तरह से वो इससे ही कुछ उनके बड़े में नेगेटिव बोल रहे थे तो अभी बाबूराम मरण ने चुपचाप सुन लिया फिर वो वहां पे आए दक्षिणेश्वर में ठाकुर को बोला की मां से परमहंस महाशय में जब यहां पे रास्ते में ए रहा था तो कुछ लोग नोखा में आपकी निंदा कर रहे थे किंतु मैंने कुछ बोला नहीं मतलब वो सोचते हैं की वो अहिंसा का पालनपुर करते हैं और ठाकुर उनकी बड़ी प्रशंसा करेंगे की हां हां अपने मां पे संयम रखा है अपने क्रोध पर संयम रखा है अहिंसा का पालनपुर किया है बहुत अच्छी कम किया तुमने ऐसा करके ठाकुर प्रशंसा करेंगे ऐसा उन्होंने सोच लिया तो ठाकुर सामने क्या करता है अरे मूर्ख तो गुरु निंदा सुनकर के चुपचाप चला आया ये तो ठीक नहीं हुआ है ये तो तुम्हारा इस तरह से तो अहित होगा ये सुन करके बाबूराम महाराज बेचारे बड़े ही परेशान हो गया अरे ये क्या उनको प्रशंसा मिलने वाले थे ऊपर से वो दांत सनी पड़ी तो देखिए बात ये नहीं है की ठाकुर चाहते हैं की कोई उनकी जो निंदा कर रहा है तो उसके सामने जाकर के झगड़ा करें बात ये है की यदि उनके मां में इस तरह का कोई अहंकार है की हां मैं इस तरह से तपस्या कर रहा हूं मैं इस तरह से अपने मां को संयम में रख रहा हूं ये जो इस तरह से सोचना ये भी एक अहंकार का भाग्य और इतने सूक्ष्म सूक्ष्म अहंकार होते हैं उसको भी तोड़ना है तो उसके सामने ये निरंजन महाराज का बिल्कुल उल्टा था निरंजन महाराज वो इसी तरह से नोखा में ए रहा है कुछ लोगों ने ठाकुर की निंदा आर्मबीएच कर दी तो निरंजन महाराज बड़े ही क्रोधित हो करके मौका को इतना जोर-जोर से हिलाना शुरू कर दिया और महाराष्ट्र बहुत ही अच्छे वो मतलब स्विमर थे बड़ा अच्छे से वो तीर जाएंगे और यदि नौकर डब जाएगी वो तो गंगा पर करके वो सामने घर चले जाएंगे किंतु जो निंदा करने वाले थे वह बेचारे सीधे गंगा में डब जाएंगे तो अभी वो बाकी लोग बड़े ही डर गए अरे ये क्या कर रहे हो पागल सबको डूबा दे वो क्या तो फिर महाराज ने कहा की वो मेरे सामने मेरी नजर के सामने मेरे गुरु की निंदा करेंगे थोड़ी ना मैं चुपचाप सहन कर लूंगा अभी निरंजन महाराज ने जाकर के ठाकुर को ऐसा कहा की देखिए महाशय में जब रास्ते में ए रहा था तो नोखा में लोग आपकी निंदा कर रहे थे तो मैं तो उनको डूबने के लिए रेडी हो गया था गंगा नदी में जो ठाकुर उनके नाराज हो गए अरे साले तुम को पता नहीं है की इस तरह से लोगों को मतलब कष्ट नहीं देना चाहिए इस तरह से क्रोध नहीं करना चाहिए मेरी निंदा की तो मुझे देखना है उसको तुम्हारे तुमको क्या है इससे तो बात ये नहीं है की गुरु निंदा करने से उसके हमको झगड़ा करना है या तो फिर चुपचाप सुन लेना है अपने मां की ये जो अवस्था जो है की मैं क्रोध करता हूं तो क्रोध के ऊपर संयम करना है मैं क्रोध नहीं करता हूं तो मैं क्रोध नहीं करता हूं उसका जो अहंकार है उसको निर्मल करना है ठाकुर ने वह अंतर्यामी जो कहता है ना की जो मां की बात समझ लेते हैं साधन करने में भी यह जो हजरत था वो ठाकुर के कमरे के सामने दक्षिणेश्वर में बेटा राहत था और वह बैठ करके वो पितांभरी बहता था हाथ में एक माला थी सब समय जब करता राहत है और फिर क्या बोलना है ये जो राखल वगैरा आते हैं वो यहां पे हल्ला खुला करके वो घूमते रहते हैं मेरी तरह तो बैठ करके जाप करते ही नहीं है तो ठाकुर ने क्या कहा की लॉकर लाखो लोग को जोक करें पुली काटा है लॉकर लोको लोको जोक करें खानकी पर जो करें नीचे मैन कोलकाता में लोग लक्खा लक्खा जब करते हैं खानकी अर्थात की जिसका चरित्र अच्छा नहीं है इस तरह की औरतें भी जो है वो जब कर लेती है दिन भर बैठ करके इससे क्या होता है यदि चरित्र जो है उसको वो ठीक नहीं रखेंगे तो जब करने से कोई ज्यादा लाभ नहीं होने वाला है तो यह जो हाजरा था तो ठाकुर ने कहा की हजरत जब गांव में था तो उसके ऊपर में कुछ देना है मैंने कुछ उसने री किया है उधर उसने पैसे लिए तो अभी पैसे तो देने हैं वापस तो यहां एड आकर के वह देखा है की मैं जब करके बैठूंगा आंख बैंड करके तो ठाकुर के पास में ये जो धनी ये जो बड़े लोग जो आते हैं वो मेरे से इंप्रेस हो जाएंगे मेरे से बड़े ही वो मैंने खुश हो जाएगी देखो ये अच्छा अच्छा सा सही सही साधु है वो पितांबरी पहन कर के जब करता है दिन भर वो मिटाने जमीन पर बैठकर के चलो उसको कुछ दक्षिण दे दे तो ऐसा करके वो पैसा कलेक्ट करेगा और उसका जो सूद है वो वो जो वापस कर देगा ये उसके मां की वो भाव था ये जो सब उसका कैलकुलेशन था तो हमारे चरित्र क्या है उसके ऊपर में सब कुछ डिपेंड करता है नहीं की हम क्या करते हैं बाकी रूप से इसलिए ठाकुर सबके अंतर की बात सुन लेते थे अभी अखंडानंद जी का है की उनके मां में था की वह बड़े ही वो बाल ब्रह्मचारी है बड़े ही कठोर तपस्या करते हैं वो मांसाहार जो है या मछली नहीं खाएंगे ऐसा उनके मां का भाव था तो ठाकुर ने उनको कहा जो ये गंगाजल में पवित्र गंगाजल में बना हुआ मां का भविष्य भोग है जाकर के उसको ग्रहण करो तो अभी गंगाधर महाराज मुंह से तो बोल लिए अच्छा महाशय में जाता हूं वो जान भी लगे किंतु पीछे घूम कर के देख रहे हैं की ठाकुर खड़े हैं की वो कहां जा रहे हैं वो विष्णु घर जा रहा है जहां पे वो जो वो जो वे जो भोग मिलेगा उनको निरामिष भोग मिलेगा ना की वो मां काली के मंदिर की और जा रहे हैं वहां पे वो जो है नॉनवेज जो भोग लगता है वो अमिश भोग लगता है कहां पे वो जा रहा है और ठाकुर खड़े खड़े किंतु देख रहा है तो अभी गंगाधर महाराज कहते हैं मोने-मोने कर्ची ठाकुर विष्णु खर जैसे बोलते हो तो पाते हैं किंतु काली घर है जेखाने मच थाच हुए मां में मां में सोच रहे हैं की वह वहां पर भी वह काली घर में भी जान वो विष्णु घर में भी जान को बोल रहा है तो वहां पर वह मुझे क्यों उन्होंने यहां पे जान को बोला मां काली के मंदिर में जहां पर मछली वो बंटी है वो मुझे मछली का भोग लगता है मुझे ऐसा उन्होंने क्यों बोला ये गंगाधर महाराज सोच रहा है अपने मां में किंतु शेष प्रजातो काली जमा हलो किंतु देखिए अभी इन लोगों ने भी अपने मां का अहंकार शायद अपने मां का यह एक भाव होगा शायद की ना मैं इतनी तपस्या कर रहा हूं आखिर में तो यह जितने भी यह संज्ञा से थे त्यागी लड़के थे ठाकुर के ये जो 16 गुरु भाई उन्होंने तन मां धन सर्वस्व ठाकुर के श्री चरणों में अर्पित कर दिया था तो अभी जो ठाकुर कहेंगे जो ठाकुर की आजा है वो सर्वोपरि है फिर वो अपना मैं खुद जो सोचता हूं मेरी खुद की जो मान्यता है मेरा खुद का जो अहंकार है मैं खुद जो तपस्या करता हूं वह सब साइड में र जाएगा यह हरि महाराज का था ना वेदांत बहुत पढ़ने थे तो ठाकुर ने उनको कहा अरे तुम यह वेदांत इतना पढ़ने हो वेदांत में तुम्हारे क्या लिखा है ब्रह्मा सत्य जगत मिथ्या वही तो लिखा है इसके अलावा तो और कुछ नहीं है तो हरि महाराज सोचते हैं अरे हां ठाकुर तो ठीक ही का रहे हैं की ब्रह्मा सत्य जगत मिथ्या जितने भी यह पुस्तक पढ़ रहे हैं वेद वेदांत के उसमें तो उसका सर तो यही है तो यह सुनकर के उन्होंने क्या किया वेदांत के जितने भी पुस्तक पढ़ रहे थे मां में भी सूक्ष्म अहंकार होगा की देखो की बाकी सब जो है यह नरेंद्र वगैरा ये तो पढ़ाई लिखी कुछ करते नहीं है धर्मशास्त्रों की मैं कर रहा हूं ऐसा कुछ अहंकार होगा इसी अहंकार को ठाकुर ने देखा होगा वैसे ही ठाकुर किसी को ये नहीं कहेंगे की तुम यह मत पढ़ो क्योंकि ठाकुर अच्छा तो ठाकुर की बात सुनकर के हरि महाराज ने जितने भी पुस्तक हैं गंगा में उन्होंने वो स्वाहा कर दी गंगा में जो है उन्होंने फेक दी अभी ऐसा नहीं है की ठाकुर नहीं चाहते की ये लोग पढ़ाई लिखी ना करें स्वामी जी को उन्होंने कहा था की अष्टावक्र सही था तुमको पढ़नी है और जब स्वामी जी ने देखा की उसमें तो सब हम ब्राह्मणी इस तरह की बातें लिखी है की मैं ही ईश्वर हूं मैं ईश्वर नहीं मैं ही वो ब्राह्मण हूं जो की समय कल और ये जो मां की जो सीमाएं है उसके पैर है मेरे ही भीतर में सचित आनंदमय ये जो जितने भी असली स्वरूप है ब्राह्मण का वो मेरे ही भीतर में है मैं है की वह हूं वो सुनकर के वह स्वामी इस तरह की बात कैसे कर सकता है जबकि उसका मां जो है कम क्रोध मत लाभ मो वगैरा में डूबा हुआ है वो कैसे का सकता है की मैं ही सच्चिदानंद में वो ब्राह्मण हूं वो ऐसा कहना तो वो तो गलत होगा ब्लास्ट में ही होगा अभी हिंदू धर्म में ब्लास्ट में का कॉन्सेप्ट नहीं है किंतु एक मतलब वो एक जस्ट एक उदाहरण देने के लिए शब्द प्रयोग किया की ये तो एक गलत बात हो गई की मैं ये मेरा शरीर जो है सब समय विषय के भोग है उसके प्रति दौड़ रहा है और मैं मुंह से बोल रहा हूं की नहीं मैं तो सच्चिदानंद महेश्वरूप अमन हूं ये तो बिल्कुल मेरे व्यवहार के साथ में मेरी बात जो है कभी वो मैच नहीं होती मां मुख एक पराठा पूर्ण कहते है ना मां अर्थात की मेरा व्यवहार और मुख अर्थ की मेरी वाणी मैं जो अपने मुंह से बोलना हूं की भाई सबको पवित्र जीवन जीना चाहिए भाई सबको सत्य पालनपुर करना चाहिए भाई सब कुछ अपने दूसरों को अपने जो पड़ोसी है अपने मित्र हैं उनको मदद करनी चाहिए मुंह से तो मैं कितना ही वह बोलना राहत हूं किंतु जब यह करने की बड़ी ए जाति है मेरा पड़ोसी जब कष्टम है तो मैं उसको देखकर के वो मुंह घुमा करके चला जाता हूं अरे भाई मैं खड़ा रहूंगा उसके साथ में पूछूंगा की उसका मतलब उदास चेहरा है वो खड़े रहकर पूछूंगा की भाई क्या हुआ तो वो कुछ बोल देगा केयर है मेरे साथ में ये हो गया है हमारे घर के बगल में एक रिक्शा वाले रहते थे तो मुझे थोड़ा सा ये राहत था की अभी ये रिक्शावाला आदमी है वो उनको बेचारे को कितना कष्ट होगा जाकर के उनके साथ बात भी करेंगे अपने वो दुख की कहानी जो है वो अपने वो अपने कष्ट की कहानी वो सुनाना शुरू कर देंगे कहां जाकर के उसने चलो उसको अवॉइड करो मेरे खुद के मां में इस तरह का भाव था तो बहुत सारे लोग सोचते हैं किसी का उदास चेहरा है थोड़ा सा उसको अवॉइड करो वरना सब उसकी सब कहानी वो कष्ट की कहानी सनी पड़ेगी और तो अभी क्या है की ये हम मुंह से तो कितना ही बोलते रहते हैं किंतु हमारा व्यवहार जो है वो किस तरह का है वो मां मुख जो है वो जल्दी अगर डिफरेंट हो जाता है व्यवहार अलग है अब मेरे मुंह की वाणी अलग है तो वो तो बिल्कुल गलत बात है तो यहां पे भी स्वामी जी ये सोच रहे हैं की अष्टावक्र संहिता में लिखा है की मैं सच्चिदानंद स्वरूप आत्मन हूं और सही में तो मैं कम क्रोध मत सर में डूबा हूं एक सामान्य व्यक्ति होंगे कॉलेज का लड़का हूं दोनों का रिकॉन्सिलिएशन कहां है तो ये बोलकर के स्वामी जी अष्टाव का संहिता पढ़ना नहीं चाहते थे किंतु फिर ठाकुर ने क्या कहा उनको अच्छा देखो तुमको अपने लिए पढ़ने की जरूर नहीं है तुम मुझे पढ़कर के सुनाओ तो ऐसा नहीं है की ठाकुर नहीं चाहते थे की उनके लड़के जो है शास्त्र वगैरा का अभ्यास ना करें वो चाहते थे की शास्त्र अभ्यास का खमंड उनके सर में चला जाए तो इसके लिए वो हरि महाराज के भीतर में थोड़ा सा उन्होंने देखा होगा तो इसके लिए बोल दिया की ये जितनी भी किताबें हैं जाकर के गंगा में फेक दो पहले साधन भजन करके अपने चरित्र पर संपूर्ण कंट्रोल संपूर्ण उसका वो जो संयम हंसल करो संयम प्राप्त करो बात नहीं यह सब जितना चाहे वो तेरे ना यह विद्या का वैभव है यह ज्ञान का वैभव है यह तपस्या का वैभव है वह भी एक वैभव है जैसे की अपना बैंक बैलेंस एक वैभव है अपना एक सोशल स्टैंडिंग एक वैभव है यह विद्या का एक वैभव है और इस जैसे वो बैंक बैलेंस का एक घमंड राहत है मेरे पिताजी इतने बड़े आदमी हैं उसका एक घमंड राहत है मेरा समाज में इतना बड़ा स्थान है उसका जो घमंड राहत है वो सब राज्यसी और तामसिक घमंड होते हैं विद्या का जो घमंड होता है वो सूक्ष्म रूप से सात्विक घमंड राहत है तो उसको भी हमको जो है समझ करके सोच समझ कर के उससे मुक्ति पानी होगी वरना तो क्या है की ईश्वर के नाम पे हम दिन-रात ईश्वर का नाम लिए ही जा रहे हैं और फिर वो ठाकुर कहते हैं ना की एक जैसे स्क्विरल है और स्क्विरल यानी की वो रामायण में जो थी ना वो जिसने एक-एक इसको ली जिसको गुजराती में बोलते हैं जो एक-एक करके वो पत्थर वो राम से तो बनाने के लिए छोटा-छोटा पत्थर वो समुद्र में दाल देती थी तो एक्सपीरियंस है वो दीवार पर चढ़ रही है कुछ नटखट बच्चे हैं उसकी पूछ पर एक पत्थर बंद दिया है तो स्पाइरल बेचारी जितना ही ऊपर चढ़ना का पर्यटन करती है पत्थर का जो वजन है पत्थर का जो वेट है उसको नीचे खींच करके ला देता है तो वैसा ही हमारे साथ हो गए यदि इतना पढ़ाई लिखी कर लिया मेरा खुद की बात करो मैं जब पढ़ाई लिखी करता हूं तो मुझे लगता है की अच्छा बहुत अच्छा अभी मैं इतना अच्छा आर्टिकल लिख देता हूं अपने इस तरह से मैं सोच लेट हूं किंतु यदि मेरे मां में यह बात कहानी से भी ए गई की ऐसा कर कर के मैं दूसरों से श्रेष्ठ हो गया हूं तो इस क्षण मेरी जो पढ़ाई लिखी लिख दे जो भी है वो सब मिट्टी में मिल जाएगी मैं यह सब कर करके ईश्वर के प्रति मेरी जो बुद्धि है वो ईश्वर को मैं समर्पित कर रहा हूं मैं बुद्धि को ईश्वर के श्री चरणों में अर्पित कर रहा हूं और दूसरों को यदि ये कुछ पढ़ने सीखने की जरूर पड़े दूसरों को कुछ जन की जरूर पड़े तो मैं हमेशा उनको बताने के लिए तैयार हूं सक्षम हूं इस तरह का भाव मेरे मां होना चाहिए यदि दूसरे साधु ब्रह्मचारी है शायद मेरे जितनी किताब ना पढ़ने हो तो मैं उनसे बड़ा हूं जैसे ही ये घमंड हो गया तो खत्म हो गया की तब पढ़ने का कोई अर्थ नहीं राहत तो ठाकुर के पास आने से ठाकुर के संतानों को देखने से सन्यासी संतानों को हमको पता चला है की धार्मिक जीवन जो है वो कितना सूक्ष्म रूप से हमको उसको एनालाइज करना पड़ता है कितना सूक्ष्म रूप से हमको इसको समझना पड़ता है एडरवाइज घनाकर्मनों गति ही जैसे गीता में कहा है ये जो करमती गति है वो इतनी गान है अपना अहंकार कहां से वो ए जाएगा कहां से वो हमने जैसे की सब कुछ जैसे अहंकार का जो पेड़ है का पूरा कैट दिया है फिर वहां से उसके मूल में से कहां एक छोटा सा वो एक दो तीन पेट ग जाएंगे वो पता ही नहीं चलेगा तो इसके लिए ठाकुर को पढ़ने से ठाकुर के जो संतान है उनकी बातें पढ़ने से ये पता चला है की कितने सूक्ष्म रूप से अहंकार ए सकता है और इसको किस तरह से काउंट कर रहा है तो यहां पर गंगाधर महाराज देख रहा है पीछे मुड़कर के ठाकुर देख रहा है की मैं किस और जाता हूं मैं काली मंदिर की और जाता हूं ना की मैं विष्णु घर की और जाता हूं तो आखिर में देखा की अभी ठाकुर खड़े हैं देख रहे हैं तो अभी मुझे वो काली मंदिर की ही और जाना होगा मछली प्रसाद ही ग्रहण करना पड़ेगा काली घोड़े जिए अमी निरामिष प्रसादिक है चिलम चाप चाप चोला दाल इकोनो मैन एक अच्छा निरामिष यानी की नॉनवेज ओके जावे महाराज कहते हैं की उसे समय कालीबाड़ी में जितना चाहे जली था जितना ही वो घटकर के बंगाली शब्द है जितना वो मेहनत करके जितना ही वो मतलब उसको विस्तृत करके भोग वगैरा जो दिया जाता था वो आजकल के जो लोग देखेंगे तो आश्चर्यचकित हो जाएंगे क्योंकि यह बात है जब तक ठाकुर वह दक्षिणेश्वर में थे दक्षिणेश्वर की शोभा ही अलग थी दक्षिणेश्वर में जो ईश्वर की जो सेवा होती थी वह भी एक अलग ही सेवा थी उसका स्टार का था फिर ठाकुर के जान के बाद में इनके जो राष्ट्रमणि यह जो वंशज है उन सब में झगड़ा होना शुरू हो गया और फिर जो है वो आपस में धीरे-धीरे करके उसकी सेवा का जो भाव है पूरा ही नष्ट हो गया अभी तो ठीक है वो ट्रस्ट बनाया हुआ है और ट्रस्ट की मदद से जब चल रहा है किंतु ठाकुर के समय की वो जो ईश्वर की वो जो काली की विष्णु की जो सेवा होती थी वो बात ही अलग थी ये महापुरुष महाराज की वो स्मृति कथा में है की महापुरुष महाराज को जब पता चला की वो मां काली की सेवा ठीक से भोग राज वगैरा जो है हर वगैरा ठीक से नहीं हो रहा है नैवेद्य तो महापुरुष महाराज बड़े ही दुखित हो गए थे फिर वो अपने शिष्यों को कहते हैं की प्रतिदिन जो है वो भक का समय होने से मैं दक्षिणेश्वर की और देख करके मां काली को कहता हूं की मां यहां पे बेलूर मठ में आओ ठाकुर का जो भोग धराया हुआ है वो ठाकुर के साथ बैठकर के ग्रहण करो और फिर दक्षिणेश्वर में जो क्योंकि दक्षिणेश्वर में आपको खाने को कुछ मिलता ही नहीं है तो इस तरह से महापुरुष महाराज स्वयं यह बात कहते हैं वो ट्रस्ट हो जान के बाद में थोड़ा ठीक हुआ है किंतु वह जो ठाकुर के समय की बात जो है वो पुरी अलग ही है अच्छा तो आज यही तक ओम शांति शांति