Invocation
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः आज इंडिपेंडेंस डे है और हम स्वामी जी का माय प्लान ऑफ कैंपेन स्टडी कर रहे हैं। सो इट्स इससे अच्छा सुयोग और क्या हो सकता है? स्वामी जी को ही कहेंगे कि भारत के सर्वप्रथम फ्रीडम फाइटर और भारत के सबसे बड़े हितैषी युगनायक। ये जो गंभीरानंद जी ने स्वामी विवेकानंद की बायोग्राफी लिखी उसका जो टाइटल दिया है विवेकानंद युगनायक एकदम परफेक्ट टाइटल है युगनायक विवेकानंद। सो इंडिपेंडेंस डे का इससे अच्छा सेलिब्रेशन हो नहीं सकता कि स्वामी जी की वाणी का चिंतन करें। उसके ऊपर में चर्चा करें। ऑलरेडी हमने 18th पॉइंट तक पहुंच गए हैं। द ग्लोरी ऑफ द आत्मन इसके बारे में स्वामी जी जो कह रहे हैं अ इस पॉइंट को हमने आधा पढ़ा है। कल क्या हुआ था डिस्कस? ट्रुथ के बारे
सत्य हमें सशक्त बनाता है. यहाँ सत्य का अर्थ है संस्कृति, फिलोसोफी, या जीवन-शैली. सही जीवन-शैली हमें सशक्त बनाएगी, गलत जीवन-शैली हमें कमजोर बनाएगी.
में। हियर इज द टेस्ट ऑफ ट्रुथ। यह है सत्य की परीक्षा। एनीथिंग दैट मेक्स यू वीक फिजिकली इंटेलेक्चुअली एंड स्पिरिचुअली रिजेक्ट एस पोइजन जो कि हमको दैहिक बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टि से कमजोर बनाती है उसको जहर की तरह त्याग कर दो देयर इज नो लाइफ इन इट इट कैन नॉट बी ट्रू ऐसी कोई भी फिलॉसोफी जो कि हमारे मन को इस तरह से हमारे मन में हीन भावता भावना का प्रवेश करवाती है हमको यह कहती है कि हम लोग कुछ भी नहीं कर सकते। हम लोगों का कोई अस्तित्व नहीं है। हम लोग किसी काम के नहीं है। हम लोग वर्थलेस है। इस तरह की थरीज इस तरह की फिलॉसोफी किसी काम की नहीं है। उसमें किसी भी तरह की प्राणशक्ति नहीं है। ट्रुथ इज स्ट्रेंथनिंग। सत्य है बलप्रद। ट्रुथ इज प्योरिटी। सत्य है पवित्रता देने वाला। ट्रुथ इज ऑल नॉलेज। सत्य है हमको सब तरह की विद्या देने वाला। विद्या और विज़डम देने वाला। ट्रुथ मस्ट बी स्ट्रेंथनिंग मस्ट बी एनलाइटनिंग मस्ट बी इनविगोरेटिंग। सत्य हमको बलशाली बनाना ही। सत्य को हमको बलशाली बलशाली बनाना ही चाहिए। सत्य को हमको आत्मज्ञान देना ही चाहिए। सत्य को हमको अदम्य उत्साह से भर देना चाहिए। तभी तो वह सत्य है। वरना वह सत्य किस काम का? सत्य का अर्थ यहां पर स्वामी जी इस तरह से करते हैं कि यह जो फिलॉसोफीस है, जो थरीज है, यह जो अपना कल्चर है, यह सब कुछ सत्य के भीतर में आ जाता है। यह कल्चर भी जिस तरह किसी किसी जगह का कल्चर ऐसा होता है कि वो कल्चर हमको एक तरह से हीन भावना प्रदान करता है। एक तरह से हमको ऐसा कहता है कि तुम लोग किसी काम के नहीं हो। देखिए मैं
दो प्रकार के छात्र : आत्मविश्वास वाले - जो प्रश्न पूछते है, और कमजोर मन वाले - जो प्रश्न नहीं करते
स्कूल में जाता हूं ना कभी-कभी यहां पे तो मैं दो तरह की स्कूल मैंने देखी है। एक स्कूल में मतलब मेरा यह जो ऐसा रहता है कि पहले मैं 20 मिनट के ऐसा कुछ स्वामी जी के बारे में फिर मेडिटेशन के बारे में ऐसा कुछ बोलूंगा। उसके बाद में मैं स्टूडेंट्स को रिक्वेस्ट करूंगा कि अभी आपके कोई प्रश्न है तो आप सामने पूछिए। तो दो तरह की स्कूल दो तरह की कॉलेज मैंने देखी है। एक कॉलेज में अभी पिछले महीने ही मैं गया था। पूरे 1000 स्टूडेंट बैठे थे वह हॉल में वह मैंने जब मेरा जो कहना था वह समाप्त करके जब ऐसा कहा कि अभी आप प्रश्न कीजिए एक भी स्टूडेंट हाथ नहीं उठा रहा है। जैसे कि वह प्रश्न करने की कोई इच्छा नहीं है। जानने की कोई इच्छा नहीं है। भीतर से यह लोग मर चुके हैं। जैसे कि अभी इच्छा होगी भी ना शायद। तो मैंने जब वहां से निकले पहले तो वहां के टीचर जो थे प्रिंसिपल वो भी थोड़े से नाराज हो गए स्टूडेंट्स के ऊपर में कि ये स्वामी जी आए हैं वो कहते हैं प्रश्न करो कुछ तो आप लोगों के तो काफी करियर रिलेटेड पर्सनालिटी डेवलपमेंट रिलेटेड साइकोलॉजी रिलेटेड कोई भी बहुत सारे प्रश्न हो ही सकते हैं स्टूडेंट्स के तो आप प्रश्न क्यों नहीं कर रहे ऐसा बोलकर के प्रिंसिपल ने डांटा फिर भी एक भी स्टूडेंट ने एक भी प्रश्न नहीं किया फिर फिर जब हम रिटर्न आ रहे थे तो मेरे साथ में एक वॉलंटियर थे जो कि ये सब चीजों में काफी एक्टिव है। इनवॉल्व रहते हैं। तो मुझे कह रहे हैं कि मैंने उनको पूछा कि इन लोगों का साइकोलॉजी क्या है? क्यों ये लोग प्रश्न नहीं करते? तो उनका उत्तर यह है कि इतने सारे स्टूडेंट्स के सामने प्रश्न करने में उनको लज्जा होती है। शर्म आती है। बाद में यह भय रहता है कि यही स्टूडेंट मेरे जो मित्र हैं, मेरे ये जो क्लासमेट्स हैं ये लोग मेरी मजाक उड़ाएंगे। यदि मैं अपना कोई प्रश्न करूंगा तो और ऐसा भी एक डर लगता है कि प्रश्न करना यानी कि हमारे भीतर की वनरेबिलिटी को तो ओपन करना ना एक्सपोज करना। अभी मैं आज सबके सामने 1000 स्टूडेंट के सामने यह प्रश्न करूंगा कि मुझे परीक्षा का भय लग रहा है तो परीक्षा के समय में मुझे निर्भय होकर के मैं परीक्षा दे पाऊं। इसके लिए मुझे क्या करना है? अभी मैं 1000 स्टूडेंट के सामने यह प्रश्न करूंगा। तो बाकी स्टूडेंट है ना वो अभी बाद में मेरी मजाक उड़ाएंगे। अच्छा तुमको परीक्षा का डर लगता है। यह कैसी बात हो गई? तो एक्चुअली परीक्षा का डर सबको लगता है। किंतु अपनी ये जो व्नरेबिलिटी है वो पब्लिक में कोई एक्सपोज नहीं करना चाहता। इसलिए यह लोग प्रश्न नहीं करते हैं। यह उत्तर मुझे मिला। मैंने कहा यह लॉजिक तो ठीक है। साइकोलॉजी तो ठीक है। मैं खुद कभी क्लास में प्रश्न नहीं करता था। किंतु फिर मेरा क्या था कि मैं सेल्फ स्टडी भी बहुत करता था। मेरे खुद के जो प्रश्न होते थे उसका सॉल्यूशन लाने के लिए मैं जितनी भी किताब हो पाए जितना भी मेरे पास में स्टडी मटेरियल हो पाए वो सब रेफर करके मैं अपने खुद के प्रश्नों का सॉल्यूशन लाने का प्रयास करता था और इसी यात्रा में तो मुझे इस ये जो सेल्फ एक्सप्लोरेशन की जर्नी में तो मुझे स्वामी जी मिल गए ठाकुर और मां मिल गए। सो मेरे लिए फिर भी एक एक्सक्यूज है कि मैं यदि पब्लिक में क्वेश्चन नहीं करूंगा मेरे स्कूल लाइफ में तो फिर मेरे पास में एक दूसरा एवन्यू है फॉर द सेक ऑफ सेल्फ डेवलपमेंट। ये स्टूडेंट को मैं आजकल देखता हूं। मैं जब गया स्कूल में तो प्रिंसिपल जो थे वो पहले ही मुझे कहते हैं कि देखिए स्वामी जी आजकल किसी को पढ़ाई लिखाई लर्निंग की कोई इच्छा नहीं है। किस अर्थ में कि जो सब्जेक्ट मैटर है वो लोग स्टडी कर लेंगे। किंतु एक वाइड क्यूरियोसिटी होनी चाहिए बियों्ड योर सब्जेक्ट मैटर कि इस विश्व में क्या हो रहा है? इस जगत में क्या हो रहा है? क्या एक नया-नया इन्वेंशन डिस्कवरी हो रहा है? ये सब तो साइंस के स्टूडेंट हैं। ये जो नया-नया डिस्कवरी नई-नई थरीज ये जो ग्रेट साइंटिस्ट है उनका बायोग्राफी किस-किस कौन-कौन से इवेंट्स ने इन साइंटिस्ट को इंस्पायर किया टू डिस्कवर समथिंग ग्राउंड ब्रेकिंग समथिंग कंप्लीटली इनोवेटिव जो कि पहले किसी को पता नहीं था। तो ये जो क्यूरियोसिटी होती है ना आजकल के स्टूडेंट में ये क्यूरियोसिटी है ही नहीं। ये जो 10-15 सेकंड का वो रील्स जो होता है ना शॉर्ट वीडियो वही देखकर के ये लोग खुश हो जाते हैं। इससे आगे ये लोग जाते ही नहीं है। तो यह वो प्रिंसिपल मुझे पहले ही बोल रहे थे। बाद में यदि मैंने देखा जब मैंने देखा कि ये लोग प्रश्न नहीं कर रहे हैं। तभी मैं यह समझ गया कि अभी क्या है कि उनकी ये जो जीजीवी विषा है। अर्थात कि यह मुमुक्षत्व कहो ना कि एक एंबिशन कहो। इन लोगों में ना एंबिशन ही नहीं है। यदि मेरे में एंबिशन होगी तभी तो मैं कुछ मतलब प्रचंड कुछ कार्य करने का प्रयास करूंगा। मैं कुछ नया सीखने का प्रयास करूंगा। कुछ नई विद्या अर्जन करने का प्रयास करूंगा। कोई नई स्किल अर्जन करने का प्रयास करूंगा। किंतु यह हजार स्टूडेंट बैठे हैं। अभी मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि मैं कोई बहुत बड़ा विद्वान हूं या बहुत बड़ा साधु हूं तो मुझे प्रश्न नहीं करने से इन लोगों को कोई बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा। इट इज़ नॉट लाइक दैट। हो सकता है कि यह लोग क्वेश्चन नहीं कर रहे। उसमें मेरा भी एक शॉर्ट फॉल शॉर्ट कमिंग हो सकता है कि यह जो 20-30 मिनट का प्रेजेंटेशन मैंने दिया इन लोगों को वो शायद उनको इतना इंप्रेस ना कर पाया हो। तो इसकी वजह से यह लोग सोचते होंगे कि अरे इनको प्रश्न करने से क्या लाभ है? वैसे तो उनका नॉलेज लिमिटेड है। दैट मे आल्सो बी वन ऑफ द फैक्टर। किंतु यह तो एक कॉलेज हो गई। उसके एक सप्ताह के बाद में मैं एक दूसरी कॉलेज में गया। वहां पर भी इसी तरह से असेंबली हॉल में 200 500 स्टूडेंट को बिठाया और सेम वो मेरा वो प्लान है वो सेम मैं प्लान ऑफ कैंपेन कि वो पहले 2025 मिनट मैं बोलूंगा फिर स्टूडेंट्स को कहूंगा कि अभी आपको कोई प्रश्न है तो कीजिए। तो अभी इस सेकंड कॉलेज में मैंने 2025 मिनट बोल के जैसा ही स्टूडेंट को बोला एक के बाद एक स्टूडेंट्स ने क्वेश्चन करना शुरू किया बिना किसी झिझक के बिना किसी लाज शर्म के बिना किसी टेंशन लिए हुए मैंने अभी वो उनको ओमकार मेडिटेशन सिखाया था किस तरह से डीप ब्रीथ लेना और उसके बाद में ओमकार करना तो यह प्राणायाम भी हो जाता है और उसमें मेडिटेशन भी हो जाता है तो जैसे ही मैंने उनको को यह सिखाया तो एक लड़की ने क्वेश्चन किया कि अच्छा स्वामी जी मुझे तो यह ब्रीथिंग का प्रॉब्लम है। अस्थमा की बीमारी है तो क्या मैं इस तरह का प्राणायाम कर सकती हूं कि नहीं? मैंने कहा इमीडिएटली कि कोई इस तरह का प्राणायाम मत करो। क्योंकि जिसको ब्रीथिंग का प्रॉब्लम है, अस्थमा का ऑनसेट होने वाला है। ऐसा उसके डॉक्टर ने यदि कहा है तो किसी भी तरह की प्राणायाम रिलेटेड एक्सरसाइज मत करो। बिना किसी एक्सपर्ट की सलाह लिए और मैं इस बड़ी असेंबली में कोई पर्टिकुलर गाइडेंस नहीं दे पाऊंगा इंडिविजुअल गाइडेंस तो बेटर है कि मत करो। तो देखिए कि उसको यह शर्म नहीं आई। इतने 500 स्टूडेंट बैठे हुए हैं। उसमें यह डिक्लेअ करने की कि मुझे अस्थमा का ऑनसेट हो रहा है। डॉक्टर ने पहले ही वर्न कर दिया है। ब्रीथिंग का प्रॉब्लम स्टार्ट हो गया है। तो मैंने यह प्राणायाम मेडिटेशन जो सिखाया वह करना चाहिए कि नहीं? इस तरह से एक के बाद एक स्टूडेंट खड़े होकर के क्वेश्चन कर रहे हैं। कोई कोई शर्मा रहे हैं तो वे लोग क्या कर रहे हैं? टीचर को बुला रहे हैं। टीचर को बुलाएंगे कहेंगे कि मेरे ओर से मेरे ऑन माय बिहाफ यह क्वेश्चन आप कीजिए। और टीचर भी इतने कोपरेटिव है। वो माइक ले घूम रहे हैं। जो डायरेक्ट बोलना चाहेगा वो डायरेक्ट बोलेगा। जो डायरेक्ट नहीं बोलना चाहेगा वो टीचर को बोलेगा। टीचर मुझे क्वेश्चन करेंगे। उस दिन क्वेश्चन आंसर इतना लंबा चला कि आखिर में मेरे साथ में जो वालंटियर आए हुए थे इनको कहना पड़ा वो प्रिंसिपल मैडम को कि देखिए स्वामी जी को वापस भी जाना है आश्रम में इतना लंबा तो रुक नहीं सकते। ऑलमोस्ट डेढ़ घंटा क्वेश्चन आंसर चला था। फिर ऐसा जैसे कहा तो फिर प्रिंसिपल मैडम कहती है कि अभी और फर्दर क्वेश्चन आंसर नहीं होंगे। अभी जिसको क्वेश्चन करना है तो स्वामी जी को जाकर आश्रम में मिल सकते हैं। तो ऐसा करके फिर हमने विदाई ली। अभी कोई स्टूडेंट आश्रम में आकर क्वेश्चन किया नहीं है। किंतु देखिए कि विदिन वन वीक यह दोनों घटना मेरे साथ में हुई है। एक कॉलेज है। वहां पर मैं कहता हूं क्वेश्चन करो। ऐसा नहीं है कि मैं कोई बहुत बड़ा विद्वान हूं ना कि बहुत बड़ा ज्ञानी हूं। मैं आपके प्रश्नों का सॉल्यूशन कर दूंगा। बट इफ यू डिस्कस दिस विद मी और मैं आपको कुछ पॉइंट्स दूंगा तो यू इट इट गिव्स यू फोडर फॉर थॉट फूड फॉर थॉट उसको आप सोचिए उसके बारे में कि मैंने क्या उत्तर दिया यू फाइंड योर ओन वे हो सकता है मैं आपको कोई एक दो गुड हिंट्स दे सकता हूं फर्दर एक्सप्लोर करने के लिए आपको मैं रास्ता दिखा सकता हूं रेफर कर सकता हूं कि इस किताब को पढ़ो इस पर्सन के पास में से प्रेरणा लो मैंने खुद ने जो एक्सप्लोर किया है उसमें से थोड़ा बहुत मैं आपके साथ शेयर कर सकता हूं इतना ही तो हम लोग कर सकते हैं ना। तो किंतु 1000 स्टूडेंट में से वो प्रिंसिपल भी बार-बार रिक्वेस्ट कर रहे हैं। एक स्टूडेंट ने एक प्रश्न नहीं किया और दूसरी कॉलेज में विद इन वन वीक हम लोग गए थे। वहां पे क्वेश्चन आंसर इतने चले। स्टूडेंट्स के क्वेश्चन रुक ही नहीं रहे हैं। रुक ही नहीं रहे। आखिर में हमको कहना पड़ा कि अभी बहुत हो गया। अभी हमारे जाने का समय हो गया है। इतना लंबा समय मैं यहां पर नहीं रुक सकता। तो देखिए कि यह जो कहते हैं इसको आत्मश्रद्धा ये भारत में ना बहुत सारी स्कूल्स और कॉलेज में मैंने यह देखा है। बहुत सारे स्टूडेंट में मैंने देखा है। यहां पे भी मैं यह जो क्लासेस कंडक्ट करता हूं हमारा कंप्यूटर क्लासेस जो है वहां पर मैं प्रेयर का क्लास लेता हूं। गीता चेंटिंग सिखाता हूं। मेडिटेशन सिखाता हूं और बाद में कहूंगा कि आपके कोई क्वेश्चन है तो आप मुझे कर सकते हैं। एक स्टूडेंट ढेरली कोई स्टूडेंट क्वेश्चन करेगा। भारत में यह जो एजुकेशन सिस्टम है ना उस एजुकेशन सिस्टम ने हमारी क्यूरियोसिटी हमारा इंडिपेंडेंस हमारा यह जो गर्व है भीतर में हमारी जो अस्मिता है हमारा यह जो सेल्फ थिंकिंग प्रोसेस है इसको इस तरह से तोड़ दिया है कि अपने स्टूडेंट्स में ना वो तेज ही नहीं है। निस्तेज से दिखते हैं। कोई स्पार्क ही नहीं दिखता। स्पार्क ऑफ लाइफ रेयरली मुझे किसी में देखने को मिलेगा। मैं जब रांची में था तो मैं मुझे यह ओपॉर्चुनिटी मिला था कि आईआईटी दिल्ली में एक वर्कशॉप था। वह उसमें क्या था कि यह सेटेलाइट इमेजेस को फार्मर्स के साथ में शेयर करना है। तो फिर यह किस तरह से क्रॉप रोटेशन करें, किस तरह से वाटर शेड आप डेवलप करें। उसमें आपको सेटेलाइट इमेज हेल्प कर सकता है। तो हम लोग थे एक पार्टनर एनजीओ। तो मैं गया था आईआईटी दिल्ली में। तो फिर वहां पे एक दो स्टूडेंट्स के साथ में मेरी मुलाकात हुई आईआईटी के ही तो उनके साथ में मैंने बात करते-करते देखा कि क्या तेज है उन लोगों में क्या एक निष्ठा है क्या एक गुरूर है क्या एक सेल्फ कॉन्फिडेंस है तो वो लेवल पर जो लोग पहुंचे हैं आईआईटी जी वो जो एंट्रेंस एग्जाम है वो जॉइंट एंट्रेंस एग्जाम जो कहते हैं इंडिया में वो आईआईटी में एडमिशन लेने के लिए तो वो क्रॉस करके जो लोग वहां तक पहुंचे हैं उस लेवल पर उन लोगों में वह दम दिखता है। उन लोगों में वह स्पार्क दिखता है। क्यूरियोसिटी दिखता है कि आईआईटी दिल्ली के कैंपस में एक साधु के कपड़े पहन करके कौन घूम रहा है? एक दो लोगों ने तो मैं वो कॉन्फ्रेंस हॉल से हमारा जो रेजिडेंस था वहां पे मैं जाता था। तो उनमें मुझे रास्ते में रुक करके एक दो लोगों ने प्रश्न किया कि क्या स्वामी जी आप क्या कर रहे हैं यहां पे? क्यों आए हैं? बट आई लाइक टू टॉक विद देम कि स्टूडेंट्स में देखिए कि क्या क्यूरियोसिटी है। माने इसलिए नहीं कि मैं उनको कुछ कह सकता हूं या मैं उनको कुछ सिखा सकता हूं। मेरा आशय रिवर्स है कि मैं उनसे क्या सीख सकता हूं? इस अर्थ में कि स्टूडेंट्स का थिंकिंग प्रोसेस क्या है आज के युग में? मैं खुद स्टूडेंट था। उस बात को आज पूरा एक जमाना बीत गया। हम लोगों के समय में एक तरह का थिंकिंग प्रोसेस था। तो अभी क्या है ना कि यह स्टूडेंट लाइफ तो बड़ा ही डायनेमिक है। एव्री 20 ईयर, एव्री 10 ईयर एक थिंकिंग प्रोसेस स्टूडेंट्स का चेंज होता है और होना ही चाहिए। इसी को तो इवोल्यूशन कहते हैं। तो मैंने यह जो यहां पे आकर के जो स्टूडेंट्स के साथ में मेरा जो इंटरेक्शन हुआ इतने समय में मैंने दो तरह के स्टूडेंट देखे हैं। दो तरह के इंस्टीट्यूशन देखे हैं। एक तरह के स्टूडेंट जो कि बिल्कुल निस्तेज होकर के बैठे रहेंगे। ऐसा लगेगा कि जैसे मैं उनको कुछ सिखाना चाहता हूं स्वामी जी के बारे में, इंडियन कल्चर के बारे में, मेडिटेशन के बारे में जैसे कि उनको कोई इंटरेस्ट ही नहीं है। उनका मन, उनका बुद्धि, उनका प्राण किसी दूसरी ही दुनिया में है। और फिर मैं जब टीचर को पूछता हूं ना कि यह जो स्टूडेंट है मुझे कुछ नहीं पूछ रहे हैं कि आप लोगों को क्वेश्चन करते हैं। उनका एकेडमिक परफॉर्मेंस कैसा है? ऐसा हो सकता है कि उनका एकेडमिक परफॉर्मेंस इतना हाई हो। उनकी एकेडेमिक यह जो लर्निंग कैपेसिटी है इतनी हाई हो कि उनका ब्रेन जो है वह उसी से भरा हुआ है। फिजिक्स सीख रहे हैं तो फिजिक्स से ही माइंड भरा है। मैथमेटिक्स सीख रहे हैं, इंजीनियरिंग सीख रहे हैं तो उसी से माइंड पूरा भरा हुआ है। इसके बाद में यह स्पिरिचुअलिटी है, इंडियन कल्चर है, मेडिटेशन है, उन सब चीजों के लिए कोई जगह ही नहीं है। ऐसा भी हो सकता है। तो इन वेरिएबली जो मुझे सेम रिप्लाई मिला है कि जो लोग ऐसे बिल्कुल निस्तेज होकर के बैठे रहते हैं उनका एकेडमिक परफॉर्मेंस बहुत ही पुअर होता है। और दूसरी ओर देखिए इस तरह के इंस्टीट्यूशन जो कि ये टैलेंट को नर्चर करते हैं वहां पे जाने से ही आप जैसे ही करें कहेंगे कि क्वेश्चन करना शुरू कीजिए। फटाफट फटाफट करके स्टूडेंट्स क्वेश्चन करना शुरू करेंगे। चेहरे पे तेज दिखाई देगा। यह जो सेकंड कॉलेज की मैं बात कर रहा हूं हमारे यहां पे एव्री ईयर क्या होता है कि स्वामी जी की ये जो जन्म जयंती है एक्चुअली 12th जनवरी नेशनल यूथ डे गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने जो नेशनल यूथ डे डिक्लेअ किया है स्वामी जीसस बर्थडे अकॉर्डिंग टू इंग्लिश कैलेंडर। तो इन इस 12th जनवरी को हम लोग एक प्रोसेशन निकालते हैं। तो इस प्रोसेशन में यह जो सेकंड कॉलेज की मैं बात कर रहा हूं बड़ा ही एंथूजियास्टिकली पार्टिसिपेट करता है। वहां से बहुत सारे स्टूडेंट अपने प्रोसेशन में आते हैं। तो वो देखिए कि जीवन में आगे बढ़ने की इच्छा होती है। भीतर में एक स्पार्क होता है। क्या कुछ नया सीखे। नए डिफरेंट टाइप के व्यक्ति के साथ में मुलाकात होती है तो उसके पास में से क्यूरियोसिटी के माने आप एक साधु को देखते हैं। ऐसा नहीं है कि आप साधु को प्रतिदिन देखेंगे। वैसे तो आपको बहुत सारे साधु देखने को मिल जाएंगे। रास्ते पर चलते हुए वगैरह किंतु कोई एक इंस्टिट्यूशन के साथ में जुड़े हुए साधु आपको इतना इजीली देखने को नहीं मिलेंगे। अच्छे इंस्टीट्यूशन के साथ में जुड़े हुए साधु। तो इस तरह के किसी के साथ में मुलाकात होती है तो आउट ऑफ क्यूरियोसिटी उनको कोई क्वेश्चन करें। अच्छा आपका लाइफ स्टाइल कैसा है? आपने क्यों जॉइ किया? आपने क्या उपलब्धि हुई? इतने सालों में आपका क्या लर्निंग है? आप मेरे साथ क्या शेयर कर सकते हैं? वो इस तरह का बिल्कुल किसी में क्यूरोसिटी होता है। किसी में स्पार्क होता है, किसी में नहीं होता है। तो यहां पे भी देखिए कि यह जो स्वामी जी कहते हैं ना ट्रुथ इज स्ट्रेंथनिंग। ट्रुथ इज प्योरिटी। ट्रुथ इज ऑल नॉलेज। ट्रुथ मस्ट बी स्ट्रेंथनिंग, मस्ट बी एनलाइटनिंग, मस्ट बी इनविगोरेटिंग। यह देखिए स्ट्रेंथनिंग, एनलाइटनिंग एंड इनविगोरेटिंग। तीन यह कंडीशन है। ट्रुथ का अर्थ यदि हम एक स्पेसिफिक कल्चर करें, एक स्पेसिफिक फिलॉसोफी करें, एक स्पेसिफिक वे ऑफ लाइफ करें, एक इंस्टीट्यूशनल सेटअप करें, मैं इस इंस्टीट्यूशन का पार्ट हूं। अब जैसे कि
स्कूल के छात्रों को पढ़ाने का मेरा अनुभव
सरकारी स्कूलों में मैं जब हम लोग मैं लिमड़ी में था तो लिमड़ी में हम लोग गदाधर प्रोजेक्ट चलाते थे। स्वामी विवेकानंद की 150 बर्थ एनिवर्सरी उस समय सेलिब्रेट हो रही थी। तो गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने हमको कुछ करोड़ दिए थे। इस इतने रुपयों में से गदाधर प्रोजेक्ट गदाधर प्रकल्प प्रारंभ करना था। इसके तहत इसके अंतर्गत आपको 1 जो स्टूडेंट है उनको आपको न्यूट्रिशियस न्यूट्रिशियस फूड देना था और साथ में कुछ इंडियन कल्चर स्पिरिचुअलिटी ठाकुर मां स्वामी जी की कोई बातें करनी थी तो इसके उस समय में लिमड़ी में था तो लिमड़ी में लिमड़ी गुजरात में है मेरा पोस्टिंग था वहां पे तो वहां पे जो इंचार्ज स्वामी जी थे हमारे बड़े महाराज बापा महाराज तो बापा महाराज ने ठीक किया बापा हम हम लोग उनको बापा कहते थे। एक्चुअली उन्होंने जॉइ किया था आत्मस्थानंद जी के अंडर में तो थोड़ी बड़ी उम्र में ज्वॉइ किया था। तो उस समय राजकोट में थे आत्मस्थानंद जी तो आत्मस्थानंद जी उनको बापा करके करते थे। क्यों? क्योंकि थोड़ी बड़ी उम्र में ज्वॉइ किया है। तो फिर उनका नाम बापा ही हो गया। तो ये बाबा ने ठीक किया कि कोई गवर्नमेंट स्कूल को अडॉप करते हैं और वहां पे प्राइमरी स्कूल को और वहां पर यह सब हम करेंगे एक्टिविटी। तो हमको भी सुविधा रहेगी। एक ही जगह पर सब स्टूडेंट मिल जाएंगे। तो ठीक है। एक गवर्नमेंट स्कूल है। आश्रम के सामने ही है। पास में ही है। वॉकिंग 10 मिनट डिस्टेंस है। तो वहां पर हम लोग न्यूट्रिशियस फूड देते थे और मैं कुछ क्लासेस कंडक्ट करता था। योगा सिखाता था। बच्चों के लिए ठाकुर मां स्वामी जी की बच्चों की जो कहानियां है बुक है बालकोना स्वामी विवेकानंद। बालकोना मां शारदा वो जो चिल्ड्रंस स्वामी विवेकानंद चिल्ड्रंस टेल्स वो जो पिक्टोरियल बुक आती है हमारी तो उसका गुजराती ट्रांसलेशन उसमें से मैं कहानियां कहता था सो मुझे बड़ा अच्छा लगता था तो किंतु मैं मैं जब पहली पहली बार वहां पे जाना शुरू किया ना देखा बच्चे लोगों के इतना वो मायूस होकर के बैठे हैं जैसे कि ये पक्का गवर्नमेंट स्कूल का ये जो एक अपने माइंड में वो फिट बैठा हुआ है ना पिक्चर कि बेचारे यहां पे गरीब है और प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के लिए पैसे नहीं है मां पिताजी के पास में इसलिए बिना और कोई और कोई ऑप्शन नहीं है बोलकर के गवर्नमेंट स्कूल में भेजते हैं। तो इस तरह से शुरू शुरू में मैंने देखा कि वो टीचरों का भी भय बहुत है। एक दो टीचर तो मेरे सामने बच्चों को मारते थे। मैंने कहा मेरे सामने बच्चों को मत मारना। जो भी करना है बाद में करना। मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि बच्चों को मारना छोड़ दो। यानी कि क्या है इन लोगों की बुद्धि जड़ होती है। तो बच्चों को मारना पीटना यह सब तो वहां पर धमकाना वो सब आम चीजें हैं। मैंने कहा मेरी नजर के सामने यह सब मत करना। तो मैं जब शुरू-शुर में गया था ना तो टीचर लोगों का डर ऐसा था और वैसे ही आर्थिक सिचुएशन इन लोगों की ऐसी होती है कि पहले से ही यह लोग बेचारे बेचारे होकर के रहते हैं। अभी मैंने जाकर के ठाकुर मां स्वामी जी की बातें करना शुरू किया। शुरू में तो रिस्पांस नहीं मिला क्योंकि किंतु फॉर्चूनेटली यह प्रोजेक्ट एक साल ना कि ऐसा कुछ चला था उस समय एटलीस्ट मैं वहां पे एक साल के लिए था बाद में मेरा ट्रांसफर हो गया था राजकोट तो एटलीस्ट जो एक साल मैं वहां पर था रेगुलरली मैं जाकर के स्टूडेंट्स को यह सब ठाकुर मां स्वामी जी की कहानियां या और योगासन वगैरह करवाता था और उनको पूछता था कि इन टर्न कि अभी आप लोग मैंने जो कल जो कहानी कही अभी यहां पर आकर के खड़े रह के उसको रिसाइट कीजिए तो मैं देखता हूं कि कितनी याद रहती है। तो शुरू में तो जीरो रिस्पांस मैं तो एकदम फ्रस्ट्रेट हो गया था शुरू-शुर में। इस तरह से ब्लैंक चेहरा करके सब लोग बैठे हुए हैं। दूसरे तीसरे दिन बिल्कुल पहली बार में जाना शुरू किया था। पहले दूसरे तीसरे दिन तो मुझे एक डाउट होने लगा था कि मुझे जाने की जरूरत भी है कि नहीं? ऐसा लग रहा है कि जैसे मैं पत्थर को यह सब कहानियां सुना रहा हूं। भीतर में कोई स्पार्क ही नहीं दिख रहा है। क्या लाभ है कहानी सुनाने से? क्या बात है? क्या लाभ है? ठाकुर मां स्वामी जी की बातें करने से किंतु एक्चुअली देखिए कि बगल में ही एक बहुत बड़ा क्रिश्चियन स्कूल था वैसे होता है जैसे हर जगह पे और उन लोगों का ये जो लर्निंग टीचिंग में थर्ड वगैरह इतना अच्छा था कि बहुत सारे लोग उसकी प्रशंसा भी करते थे। अभी क्या है कि देखिए हम लोगों के साथ में वही तो एक प्रॉब्लम रह गया ना कि यह क्रिश्चियन स्कूल बहुत अच्छा कर रहा है तो उसको निंदा बहुत करेंगे कि ये देखो ये लोगों को उल्टा पुल्टा सिखा रहे हैं देखो ये लोगों को कन्वर्ट कर रहे हैं क्योंकि भाई हम में तो दम होना चाहिए हमारे स्टूडेंट्स को कुछ पॉजिटिव देने का हम लोग नहीं देंगे और वो देंगे तो फिर हम लोग उनको कोसने से क्या लाभ है तो मैंने ठीक किया कि नहीं सिखाना तो है ही चाहे कुछ भी हो जाए आई विल ट्राई माय मतलब आई विल डू इवन बेटर आई विल ट्राई माय बेस्ट तो फिर क्या है मैंने इनाम देना शुरू किया प्राइस देना शुरू किया कि यदि कोई बच्चा अच्छे से आज मैंने एक कहानी कही कल मैं गया और फिर से मैं कहूंगा कि वो कहानी को रिपीट करो तो वो आम्रकानन में ठाकुर जाकर के बालक गदाधर जाकर के वो जो अपने मित्रों के साथ में नाटक मंडली बनाता है और विभिन्न तरह के ऐतिहासिक पात्रों का अभिनय करता है। तो कल यह कहानी मैंने कही थी। अभी आज इस कहानी को कौन बताएगा? जो बताएगा उसको मैं यह पेंसिल दूंगा। ऐसा मैं कुछ प्राइस लेकर के गया था। पेंसिल है, रबर है, वो नोटबुक है जो कि बच्चों के लिए एकदम इमीडिएटली काम की चीजें हैं। यह सब तो अब जैसे मैंने प्राइस के बारे में बात किया ना तो ये कुछ बच्चे सोचने लगे कि अच्छा ये तो प्राइस तो मिलती है तो अच्छी बात है। तो फिर एक दो लड़कों ने बोलना शुरू किया कि और फिर पहले तो बोलते बोलते अचकाते हैं, डरते हैं। टीचर लोग खड़े हैं तो और बार-बार टीचर के सामने देख रहे हैं कि वो आकर के मारेंगे तो नहीं, धमकाएंगे तो नहीं। तो मैं समझ गया। तो मैंने टीचर्स को कहा कि मेरा जब क्लास चल रहा है कोई भी यहां पर खड़े मत रहो। आप सब निकलो यहां से। अभी उन लोगों को क्या है कि एक स्वामी जी आए हैं रामकृष्ण मिशन तो छोटा लिमड़ी तो छोटा शहर है। वहां से यदि कोई एक साधु आता है तो बहुत बड़ी इवेंट है। सभी टीचर को खड़े रहना चाहिए वहां पे इन माय ओनर। तो मैंने कहा कोई जरूरत नहीं है। सब अपना-अपना काम करो। अपना क्लास करो। व्हाटएवर मुझे यहां पे अकेला छोड़ दो। तो जैसे ही टीचर लोग गए और जैसे ही मैंने प्राइस देना शुरू किया यह दो क्रिटिकल डिसीजन मैंने लिए थे। इमीडिएटली बच्चे लोग रिसोंड करना शुरू कर दिए। एक के बाद एक फिर तो धक्का म 5 छ महीने के बाद में ऐसी परिस्थिति कि मैं कहानी कहूंगा तो वे लोग दूसरे दिन धक्कामुक्की करेंगे। इतना भीड़ हो जाएगा मेरे सामने कहूंगा कि बैठे-बैठे बोलना नहीं है। यहां पे आकर के सबके सामने खड़े रह के बोलना है। थोड़ा सा सेल्फ कॉन्फिडेंस बढ़ेगा आप लोगों का। ये लीडरशिप क्वालिटी आएंगी। तो मेरे पास में पहले तो एक स्टूडेंट दो स्टूडेंट मुश्किल से आकर के खड़े रहते थे। विद इन फाइव सिक्स मंथ ऐसा हुआ कि वह धक्कामुक्की होना शुरू हो गया। क्राउड होना शुरू हो गया मेरे पास में खड़े रह के बोलने के लिए। और फिर मेरे पास में यह भी पॉसिबल नहीं है कि मैं सबको प्राइस देना शुरू करूं। एक वन पॉइंट मैंने प्राइस देना बंद कर दिया। इनस्पाइट ऑफ दैट कि एक जो हैबिट हो गया है सबके सामने खड़ा रह के बोलने का वो हैबिट इस तरह से काम कर रहा है कि इवेंचुअली जब लास्ट डे आया वो छोड़ने का क्योंकि मेरा राजकोट पोस्टिंग हो गया था तो मैंने जाकर के कहा कि यह प्रोजेक्ट भी अभी समाप्त होने को है और मेरा भी अभी ट्रांसफर हो रहा है तो वे लोग भी इतने दुखी हो गए मेरी आंखों में भी थोड़ा सा आंसू जैसा आ गया कि देखिए एक साल का रिलेशन है इन लोगों के साथ में इन लोगों का एक जो जर्नी है कहां कहां निस्तेज होकर के मनमरा होकर के बैठे थे और आज देखिए कि क्या स्पार्क है। मैं जब आश्रम में जाऊंगा ना तो ये सब लड़के लड़कियां छोटे प्राइमरी स्कूल के ये सब लोग रेडी हो जाएंगे मेरे साथ में आश्रम में आने के लिए तो मेरे साथ में क्योंकि 10 मिनट वॉकिंग डिस्टेंस है मेरे साथ में आश्रम में आएंगे और फिर होता क्या था कि ये जो ये जो न्यूट्रिशियस फूड जो हम देते थे तो एक बड़ा सा वो दो-तीन बर्तन भर करके वो सब आश्रम से आता था किंतु आता था कार में तो नेचुरली कि शुरू में तो मैं कार में ही आता था कार में ही जाता था किंतु जब ये स्टूडेंट्स ने मेरे साथ में आश्रम में आना शुरू किया तो फिर मैंने सोचा कि मैं पैदल ही चलता हूं। तो मैं जा रहा हूं पैदल आश्रम की ओर। कार सेपरेटली निकल गई। उन लोगों को वो जो हम लोग दूध देते थे, मिल्क देते थे। कभी मिल्क की कोई प्रोडक्ट बनाएंगे। कभी कुछ ना कुछ बनाएंगे। हमने किसी को हायर किया था एक रसोइयों को कुक को तो यह सब ये अच्छा सा खाना बनाए तो वगैरह तो वो आकर के वो डिस्ट्रीब्यूट करके कार चली जाएगी। मैंने कहा ड्राइवर को अभी खड़े रहने की जरूरत नहीं है। तुम निकलो मैं अपने से आ जाऊंगा। 10 मिनट का तो है वॉकिंग डिस्टेंस और रास्ता भी बड़ा सुंदर है। लिमड़ी जो आश्रम है वह गांव के बाहर में है और रेलवे स्टेशन है तो रेलवे स्टेशन के आसपास तो आप देख ही सकते हैं कि खुली जमीन होती है। तो वहां पे और वैसे ही लिमड़ी की पॉपुलेशन इतनी नहीं है। तो बड़ा सुंदर रास्ता गांव का रास्ता जैसे होता है ना खुले खेत है। पेड़ है सुंदर और मैं रिटर्न होता था ऑलमोस्ट 6:00 बजे के आसपास में। यानी कि संध्या होने का समय है। सूर्य सूर्यास्त का समय है। तो कितना सुंदर वातावरण बनता है। तो मैं आ रहा हूं मेरे साथ में मेरा हाथ पकड़ करके वो स्टूडेंट्स मेरे आसपास में दौड़ते दौड़ते आ रहा है। सब आश्रम में जाएंगे। वो वहां पर आरती में कुछ-कुछ लोग बैठेंगे। आरती तक तो नहीं रुकते थे। बाबा महाराज ने मना कर दिया था कि कहते हैं कि इतना देरी तक यह लोग रुकेंगे तो फिर क्या है कि घर में जाते देरी होगा। अंधेरा हो जाता है। बच्चों को कुछ हुआ। हु विल बी रिस्पांसिबल। मुझे शुरू में नहीं अच्छा लगता था। बाबा का बहुत बड़ा बहुत सारे रिस्ट्रिकशंस थे। मुझे उस समय नहीं अच्छा लगता था। मैंने महाराज को कहा कि महाराज देखिए इतने एंथूजियाज्म से ये लड़के आते हैं। गरीब घर के हैं। ठाकुर मास्वामी जी की बातें सुन रहे हैं। इट विल बी वेरी गुड फॉर देयर फ्यूचर। किंतु वो कहते थे कि नहीं देखो एक लिमिट तो रखना चाहिए इन लोगों के साथ में इंटरेक्शन करने का आश्रम में आने का वगैरह का। सो इवेंचुअली आई एग्रीड कि वो होना ही चाहिए। आश्रम का वातावरण है और दूसरा कि हमारा संध्या आरती का समय ऐसा है कि आरती प्रारंभ होने के समय तो सूर्य सूर्यास्त के समय होता है। समाप्त होने के टाइम में अंधेरा हो जाता है। उस समय ये प्राइमरी स्कूल के बच्चे हैं फर्स्ट, सेकंड, थर्ड, फोर्थ स्टैंडर्ड के अकेले घर जाएंगे अंधेरे में। वह भी ठीक नहीं है। तो फिर वो लोग आएंगे आश्रम में थोड़ा वो वहां पे पहले प्लेग्राउंड था। आश्रम में प्लेग्राउंड बनाया था। वहां पर थोड़ा सा खेलेंगे। फिर मैं उनको कह देता था जाओ जाओ अभी घर चले जाओ कल मिलेंगे स्कूल में। तो देखिए कि यह जो मैंने अपनी नजरों से देखा आप एक नर्चरिंग एनवायरमेंट खड़ा करते हैं तो यह जो बेचारे स्टूडेंट मन मार के वहां पर जो बैठे हुए थे उन लोगों के भीतर में से क्या एक शक्ति प्रकट होती है? क्या एंथूजियाज्म प्रकट होता है? क्या ठाकुर मां स्वामी जी आध्यात्मिकता भारतीय कल्चर यह हिंदू संस्कृति इसको ग्रहण करने की क्या तमन्ना खड़ी होती है किंतु यू विल हैव टू गिव दैट नर्चरिंग एनवायरमेंट अदरवाइज ये सरकारी स्कूल है वो आपको कुछ भी बोलना नहीं है चुपचाप बैठे रहना है टीचर की इच्छा होगी तो पढ़ाएगा नहीं होगा तो मारेगा यह सब जो एक मन को खत्म कर देने वाला एटमॉस्फियर यदि हम खड़ा करेंगे तो फिर क्या होगा कि हमारे मन में पहले से हीन भावना प्रवेश कर जाएगी। तो
सत्य को जानें और फिर उसके आधार पर अपने जीवन और चरित्र का पुनर्निर्माण करें।
देखिए कि यह ट्रुथ इज स्ट्रेंथनिंग। ट्रुथ इज प्योरिटी। ट्रुथ इज ऑल नॉलेज। यहां पर ट्रुथ का अर्थ क्या है? बात यह सिर्फ नहीं है कि किताब में जो लिखा हुआ है अहम ब्रह्मास्म या ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या उसको पढ़ लेना। ठाकुर जो कहते हैं ना कि एक पंजिका में अर्थात कि एस्ट्रोलॉजी की किताब में लिखा है कि आज इतना पानी बरसेगा। किंतु आप इस किताब को कितना ही स्क्वीज कर लीजिए, ट्विस्ट कर लीजिए। किताब में से तो एक बूंद भी जल नहीं निकलने वाला है। वो बारिश गिरेगा, अंधाधुंध बारिश होगी, थंडरस्ट होगा, भाड़ आ जाएगी, सुनामी आ जाएगी। यह सब एस्ट्रोलॉजी की किताब में प्रेडिक्ट तो भले ही किया हो, वो किताब को स्क्वीज़ करने से एक बूंद भी पानी नहीं निकलने वाला। यानी कि ये जो सब थ्यरीज है ये थ्यरीज को यू हैव टू ब्रिंग इट टू लाइफ। ये जब तक आप इस सब सत्य को जीवन में परिणत नहीं करेंगे जगत में ग्राउंड लेवल पर आप उसको जब तक अप्लाई नहीं करेंगे इंप्लीमेंट नहीं करेंगे तब तक यह सब थ्यरी ही रह जाएगी। और जैसे ये जो एस्ट्रोलॉजी की किताब को स्क्वीज़ करने से एक बूंद भी पानी नहीं गिरता वैसे ही यह सब जितने उपनिषद है, वेद है, इवन ठाकुर मास्वामी जी की जो बातें हैं, इस किताब को स्क्वीज़ करने से एक बूंद भी सत्य उसमें से नहीं निकलेगा। आपको इस सत्य को पढ़ना होगा, आत्मसात करना होगा। उसके ऊपर में अपना जीवन गठन करना होगा। अपना लाइफ ट्रांसफॉर्म करना होगा। देन यू विल बिकम अ टॉर्च बेयरर। यू विल बिकम ए बिकॉन। आप एक जो ज्योत से ज्योत जले। कहते हैं ना कि ये ज्योत से हमारे भीतर में यह जो आत्मश्रद्धा रूपी यह सत्य रूपी जो ज्योत प्रज्वलित हुई है उस ज्योत से हम दूसरों ये बच्चे हैं ये स्टूडेंट्स हैं हमारे ये परिवारजन है ये नेबर्स हैं हमारे पड़ोसी है इनकी ज्योत हम अपने भीतर में प्रगटित प्रज्वलित ज्योत से जला सकते हैं। उनको सिर्फ यह कह देना कि यहां पे उस समय गदाधर प्रोजेक्ट प्रारंभ हुआ था। उस समय यदि हमने सिर्फ यह ठीक किया होता कि यह शक्तिदाई विचार किताब है। बच्चों में बांट दो और वहां से निकल जाओ। तो फिर होता क्या पता है? उस किताब को खोलकर के शक्तिदाई विचार म थॉट्स ऑफ पावर इंग्लिश में। यह बड़ी पॉपुलर किताब है। छोटी सी है। स्वामी जी के बलप्रद इस तरह के यह जो एटम बम यह बम शेल जो स्वामी जी के कोटेशन है ना उसका कलेक्शन है। तो बहुत सारे साधु जब भी कोई एजुकेशन इंस्टट्यूट में जाते हैं, स्टूडेंट्स के साथ में इंटरेक्ट करते हैं तो यह किताब गिफ्ट में देते हैं। पॉकेट बुक है, सस्ती भी है, अच्छा कलेक्शन है। तो मैं यदि यह किताब सब में बांट करके आ जाता और फिर वहां पर जाना बंद कर देता, स्टूडेंट्स के साथ में इंटरेक्शन करना बंद कर देता। तो वह जो मन मरा होकर के पहले दिन जो बैठे था ना वह एक साल में जितना हमारा यह प्रोजेक्ट चला वो पूरा विद एंटायर ड्यूरेशन कोई चेंज नहीं आता उनमें पहले दिन और आखिरी दिन में ऐसे के ऐसे ही बैठे रहते हैं। किंतु स्वामी जी को पढ़ के हमको अपना जीवन ट्रांसफॉर्म करना है और फिर यह ट्रांसफॉर्म लाइफ लेकर के दूसरों को प्रेरणा देनी है। दैट इज द मीनिंग ऑफ दिस एंटायर स्टेटमेंट।
रहस्यवाद हमें कमज़ोर बनाता है
आगे क्या कहते हैं स्वामी जी? दिस मिस्टिसिज्म्स इनस्पाइट ऑफ सम ग्रेंस ऑफ ट्रुथ इन देम आर जनरली विकनिंग। यह मिस्टिसिज्म जो है इसमें भले ही चाहे थोड़ा सा तो सत्य हो थोड़ा सी थोड़ी सी वास्तविकता हो थोड़ा सा फैक्ट उनमें भरा हो किंतु इन जनरल हमारे मन हमारी संकल्प शक्ति को कमजोर बना देता है। हमारी सिविलाइजेशन और कल्चर को उसके भीतर में सड़ा प्रवेश करवाता है। रोट कर देता है। इसको भीतर से। बिलीव मी विश्वास करो मुझ पे। आई हैव ए लाइफ लॉन्ग एक्सपीरियंस ऑफ इट। एंड द वन कंक्लूजन दैट आई ड्रॉ इज दैट इट इज विकनिंग। विश्वास करो मुझ पर मेरे इस बात के ऊपर में मेरा जीवन भर का अनुभव है। और यह जो मैंने कंक्लूजन ड्रॉ किया है इसमें से जो मैंने एक लर्निंग इसमें से लिया है, एक्सट्रैक्ट किया है, वो यह है कि मिस्टिसिज्म हमको कमजोर ही बनाता है। देखिए स्वामी जी जब यह कहते हैं कि लाइफ लॉन्ग एक्सपीरियंस ऑफ मिस्टिसिज्म हमको क्वेश्चन होगा कि ऐसा तो क्या स्वामी जी ने मिस्टिसिज्म का एक्सपीरियंस कर लिया। किंतु देखिए कि क्योंकि उन्होंने तो ये ठाकुर के पास में से वेदांत अद्वैत रूपी बलप्रद विचार ही तो ग्रहण किए हैं ना। ये मिस्टिसिज्म कहां पे आता है। किंतु हमको ये भी समझना होगा कि ठाकुर के आसपास में बहुत सारे लोगों का यह समावेश होता था। इसमें यह कर्ता भजा की बात हम लोग बार-बार करते हैं। कर्ता भजा संप्रदाय है। स्त्रियों को साथ में लेकर के साधना करनी है। फिर यह जो तंत्र है ये ये सब वहां पर बहुत चलता था। तो बंगाल में उस समय में बंगाल में मैं एक किताब पढ़ रहा था। मैं नाम भूल गया। उसी समय के बंगाल का एक हिस्ट्री था स्वामी जी के समय का ही म 19 सेंचुरी का। वहां पर लिखा था कि उस समय का बंगाल जो है उसमें यह तंत्र विद्या यह सब ज्योतिष विद्या ये मीडियम बनाना ये सियांस करना ये स्पिरिचुअलिज्म जो है ये थियोसोफी जो सब है ये ब्राह्म समाज इवन ये सब का काफी ये प्रभाव हो गया था जितना भी मिस्टिसिज्म है जितना भी यह म उल्टा पुल्टा है धर्म के नाम पर चलता है काफी यह फैलने लगा था और बहुत ही ख्यातनाम लोग जो है इन सब चीजों का अनुष्ठान करते थे। ये जो हृदय की बात तो पता ही है हमको कि वो वराह नगर मठ में गया था कपड़े बेचता था उस समय ठाकुर ने वहां से तो निकाल दिया था। ठाकुर ने नहीं वो जो त्रैलोक्य नाथ ने वहां से निकाल दिया था। उनकी लड़की की कुमारी पूजा करने का पूजा की उसके अपराध में तो वह तो निकाल दिया। उसके बाद में एक बार ठाकुर को मिलने को भी आया है। कथामृत में वर्णन है मास्टर महाशय और ठाकुर दोनों उसको गेट तक मिलने के लिए जाते हैं क्योंकि काली मंदिर में भीतर में प्रवेश करने की उसको अनुमति नहीं थी। तो गेट के पास में जाकर के वो ठाकुर उसके साथ में वार्तालाप करते हैं तो ठाकुर पूछते हैं कि तुम कैसे हो? तो वो कहता है कि अच्छा नहीं हूं। तो ठाकुर पूछे क्यों? कि आपका विरह मैं आपका आपके साथ में नहीं रह पाता हूं इसलिए मैं दुखी हूं। तो ठाकुर ने कहा तुमने ही तो कहा था ना कि तुम्हारा भाव तुम्हारे पास रखो। मेरा भाव मैं अपने पास में रखता हूं। उस समय तो उसका घमंड बहुत बढ़ गया था ना। ठाकुर को इस तरह से परेशान करता था। ठाकुर ने खुद कहा कि मैं गंगा में झा डुबकी मार करके आत्महत्या करने के लिए गया था। ठाकुर ने खुद ऐसी बात कही है। तो ठाकुर ने कहा कि उस समय तो घमंड बहुत ज्यादा था। उस समय तो कहते थे कि तुम्हारा भाव तुम अपने पास में रखो। मेरा भाव मैं अपने पास में रखता हूं। तो हृदय रोते-रोते कहता है कि उस समय मुझे थोड़ी ना यह सब पता था। आपकी शक्ति क्या है? आपकी महिमा क्या है? मुझे थोड़ी ना पता था। तो जो भी है वो उस समय तो गया वहां से। उसके बाद में वराह नगर मठ में उसको देखने को मिलता है कि वो एक बार गया राजा महाराज वगैरह सब बैठे थे। तो राजा महाराज ने उसको देखकर के पूछा कि अरे एक उस समय तो तुम बड़े गुंडाशुंडा छीले अर्थात कि यह मोटे-सोटे मतलब ये तगड़े पहलवान जैसे थे। गुंडे की तरह पहलवान जैसे थे। अब यह दुबले पतले यह तुम्हारा स्वास्थ्य टूट गया है। ऐसा क्यों हुआ? तो फिर यह हृदय क्या उत्तर देता है कि एक रात में तीनचार भैरवी चक्र करेंगे तो क्या होगा? भैरवी चक्र का क्या अर्थ है? स्त्रियों को साथ में लेकर साधना करनी है। तो राजा महाराज नाराज होकर के बोले अरे तुम्हारा लड़का यहां पे खड़ा है। उसको लेकर के तुम आए हो तो शर्म नहीं आती इस तरह की बात करने में। तो जो भी है यह हलधारी का भी यही प्रॉब्लम था कि वो स्त्रियों को लेकर के वो छुप करके छुप करके साधना करता था। तो ठाकुर वो सभी लोग पता तो चल गया सभी लोग उसकी पीछे से निंदा भी कर रहे हैं। किंतु क्या है कि हलधारी के बारे में ऐसी बात प्रचलित थी कि वह वाक सिद्ध है। इस अर्थ में कि वह यदि किसी के श्राप दे देगा तो वह श्राप सत्य होगा। इस डर के मारे कोई उसके मुंह पर कुछ नहीं बोल रहा था। अभी ठाकुर को यह बात सुनने में आई तो ठाकुर ने सोचा कि उसको जाकर के चेतावनी तो देनी चाहिए कि भाई तुम्हारे बारे में लोग इस तरह की बातें करते हैं। तो ठाकुर ने जाकर के उसको कहा हलदारी को तो हलधारी इतना नाराज हो गया कहता है कि तुम मेरे से छोटे होकर के मेरे कनिष्ठ होकर के कनिष्ठ ब्राता होकर के मेरे साथ में इस तरह से बात करते हो जाओ तुम श्राप देता हूं। तुम्हारे मुंह में से रक्त उठेगा। तो ठाकुर तो बड़े दुखित हो गए। कहा कि भाई तुम्हारे ही तो कल्याण के लिए मैं तुमको कह रहा हूं कि इस तरह की साधनाएं करनी अनुचित है। उसको बंद कर दो। लोगों में तुम्हारी निंदा हो रही है। तो जो भी है अभी तो मुंह से निकल गया है। क्या करेंगे? तो ठाकुर कुछ दिनों के बाद में सही में ऐसा हुआ। ठाकुर अपने कमरे में बैठे थे। एकाएक मुंह में से गाढ़ा काले कलर का खून बहने लगा। और इस तरह इतना गाढ़ा था कि जैसे वो नीचे वो निकलता है ना तो पूरे एक वो यह हो जाता था। माने जम जाता था उन मुंह में से निकलते निकलते इतना गाढ़ा खून तो ठाकुर तो अभी ठाकुर तो बालक स्वभाव है ना एकदम रोना शुरू कर दिया वो हलधारी भी उसको सुनने में आया तो ठाकुर के पास में दौड़ा दौड़ा आया तो ठाकुर ने रोते-रोते उसको कहा कि भाई देखो तुम्हारे श्राप की वजह से ही मेरे साथ में यह हो रहा है तो हलदारी भी बेचारा बड़ा दुखित हो गया बोला कि मैंने क्रोध में आकर क्या मेरे मुंह से निकल गया तो उस समय वो पंचवटी में एक साधु महात्मा आए थे वो जो तो जगन्नाथ महाप्रभु का दर्शन करने के लिए बहुत सारे साधु महात्मा वहां पे आते थे। एन रूट रास्ते में आता है दक्षिणेश्वर तो प्रख्यात था रानी रासमणि का यह काली मंदिर है। साधुओं की सेवा होती है। तो कई कई साधु काफी साधु वहां पर रुकते थे। तो एक साधु वहां पर थे। आए सुनकर के कि हल्लागुल्ला हो रहा है। ठाकुर के घर में क्या हुआ? देख फिर परीक्षा करके देखा वो तालू है ना ऊपर का मुंह में ऊपर का जो भाग है वहां से खून निकल रहा था तो यह साधु विद्वान थे अनुभवी भी थे कुछ अनुभूति भी थी तो उन्होंने कहा कि देखिए आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है आपकी जड़ आप यह जो हठ योग की साधना कर रहे हैं उसमें आपको जड़ समाधि होने वाली थी तो ये कुंडलिनी आपके सर सहस्त्रार चक्र जो होता है अपने सर के ऊपर में वहां पर यदि कुंडलिनी चली जाती तो आपकी आपकी जड़ समाधि होती और आपका मृत्यु होता। तो ऐसा नहीं हो के यह जो ऊर्जा जो नीचे से ऊपर में जा रही थी वहां उसकी वजह वो मुंह में से निकल गई। अर्थात कि जगदंबा ने आपके जीवन की रक्षा की है। जगदंबा को आपके पास में कोई महत कार्य करवाना है। इसलिए तो एनीवे यह श्राप भी आशीर्वाद में परिणत हुआ। किंतु हमारे कहने का जो आशय था इस तरह की साधनाएं पूरे समाज में व्याकृत थी। आध्यात्मिकता का फाउंडेशन ही है ब्रह्मचर्य। तो उसको छोड़कर के आप जो कुछ भी करेंगे एंटाई ब्रह्मचर्य अर्थात कि वो कामना वासना में प्रवेश करके आप यदि साधना करते हैं तो उससे भयानक परिस्थिति प्रकट होगी। उससे विनाश के अलावा और कुछ नहीं मिलेगा। तो स्वामी जी कहते हैं कि इंस्पाइट आई हैव ए लाइफ लॉन्ग एक्सपीरियंस ऑफ इट। बिलीव मी आई हैव अ लाइफ लॉन्ग एक्सपीरियंस ऑफ इट। विश्वास कीजिए कि यह मिस्टिसिज्म जो है दिस मिस्टिसिज्म इंस्पाइट ऑफ सम ग्रेंस ऑफ ट्रुथ इन देम आर जनरली विकनिंग। यह मिस्टिसिज्म जो है उसके भीतर में शायद थोड़ा सा सत्य हो सकता है। किंतु इन जनरल वो हमको कमजोर बना देता है। हमारी यह जो एथिक्स एंड मोरालिटी है उसको भीतर में से खा जाता है। बिलीव मी विश्वास करो। आई हैव अ लाइफ लॉन्ग एक्सपीरियंस ऑफ इट। मुझे पूरे जीवन भर का इसका अनुभव है। एंड द कंक्लूजन दैट आई ड्रॉ इज दैट इट इज विकनिंग। और जो कंक्लूजन मैं इसमें से निकालता हूं। वो यह है कि हमको कमजोर ही बनाता है। आई हैव ट्रेवल्ड ऑल ओवर इंडिया।
स्वामी विवेकानन्द अंधविश्वास और रहस्यवाद का विरोध करते है
सर्च ऑलमोस्ट एव्री केव हियर एंड लिव्ड इन द हिमालयज। मैंने पूरे भारत में भ्रमण किया है। ट्रैवल किया है। जितनी भी गुफाएं हैं यहां पर भी और वहां पर भी उसको मैंने छान उसमें छानबीन की है। एक्सप्लोर की है। मैं हिमालय में भी रहा हूं। आई नो पीपल हु लिव्ड देर ऑल देयर लाइव्स। मैं मैं ऐसे लोगों को पहचानता हूं कि जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिमालय में बिताया है। आई लव माय नेशन। आई कैन नॉट सी यू डिग्रेडेड। मैं अपने देश को प्रेम करता हूं। मैं आपकी अधोगति नहीं देख सकता। वी कंट बाय एनी मोर देन यू आर नाउ। ऑलरेडी जो अधोगति हुई है, इससे ज्यादा अधः पतन मैं आपका नहीं देख सकता। क्यों स्वामी जी यह कहते हैं क्योंकि ये भारत में बहुत सारा कुछ प्रचलित था। हिमालय में महात्मा रहते हैं। हिमालय की गुफाओं में सिद्ध योगी रहते हैं। उनके पास में यह जड़ी बूटी है। यह मंत्र है। जादुई शक्ति है। उनका कुछ कर देंगे। उनको खुश कर देंगे कैसे भी करके तो जीवन के जितने भी दुख है उससे वह मुक्ति दिलवा देंगे। वगैरह-वगैरह जो पागलपन चल रहा था स्वामी जी ने कहा कि पूरे भारत को मैंने एक्सप्लोर किया है। भारत की जितनी गुफाएं हैं सब छान मारी है और जिन हिमालय में भी जाकर के रहा हूं और जिन्होंने पूरा जीवन हिमालय में बिताया है ऐसे लोगों को भी मैं बड़े अच्छे से पहचानता हूं। किंतु मैं यह जितना भी मिस्टिसिज्म है उसमें से कुछ भी आपको रिकमेंड नहीं करूंगा। आई विल रिकमेंड कि मिस्टिसिज्म से आप मुक्ति पाए। यह जो मेरा प्रिय देश यह मेरा प्रिय भारत ऑलरेडी जो अध पतन हो चुका है। इससे ज्यादा अवनति मैं नहीं देख पाऊंगा। देयर फॉर आई एम बाउंड फॉर योर सेक एंड फॉर ट्रुथ सेक टू क्राई होल्ड। इसलिए यह मेरी फर्ज है। आपके लिए और सत्य के लिए मैं यह चिल्लाऊं कि ठहरो। होल्ड एंड टू रेज माय वॉइस अगेंस्ट दिस डिग्रेडेशन ऑफ माय रेस। और यह मेरे देश बांधवों की देशवासियों की जो अधोगति हो रही है, अधः पतन हो रहा है। इसके विरुद्ध में मैं आवाज उठाऊं। उस समय का भारत आध्यात्मिकता के नाम पर बहुत सारा उल्टा पुल्टा जो चल रहा था यह खास करके यह जो शुरू शुरू में ही कि स्वामी जी ने कहा ना ये एक और तो है यह रिफॉर्म सोसाइटीज वे लोग कहती है कि भारत में जितना भी आध्यात्मिकता है भारत का जितना भी यह इतिहास है सन हिंदू सनातन धर्म का सब गलत है सब झूठ है सब यह चोर उचकों ने तैयार किया है सब होल सेल उठा के फेंक दो ऐसा एक रिफॉर्म सोसाइटी वाले थे दूसरी ओर थे ये थियोसोफिकल सोसाइटी वाले ये ब्राह्म समाज थोड़ा बहुत इन लोगों में शामिल थे कि ये जितनी भी अंधश्रद्धाएं हैं भारत की वो सबको जैसे कि ये हिंदू सनातन धर्म का ही कोर कांसेप्ट है बोलकर के सर पर उठा रही थी तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी तो स्वामी जी ने कहा यह दोनों गलत है जो लोग हिंदू धर्म को अपनी ये जो आध्यात्मिकता है उसको होलसेल रिजेक्ट करते हैं इनको भी छोड़ो और दूसरे लोग कि भारत के जितनी भी अंधश्रद्धाएं हैं उसका हिंदू हिंदू सनातन धर्म के नाम पर प्रचार करता है। उनसे भी मुक्ति पाओ। सत्य जो है अपना प्रस्थान त्रय में छुपा हुआ है। सत्य एक ही है। वह है आत्मन की महानता। आत्मन का ऐश्वर्य आत्म साक्षात्कार ही है। जीवन का एकमात्र उद्देश्य। इसको छोड़कर के यह महात्मा है। यह जादू चमत्कार है। यह तंत्र मंत्र है। यह स्त्रियों को लेकर के साधना करनी है। यह कर्ता भजा संप्रदाय ये तो एक ही संप्रदाय इस तरह का जिसका कि नाम कथामृत में है। किंतु थोड़ा बहुत भी आप सीरियसली हिस्ट्री को स्टडी करेंगे। 18th सेंचुरी का 19th सेंचुरी का। इस तरह के कितने संप्रदाय यह जो पूरे पनप रहे थे भारत में वह कहना मुश्किल है। तो इन सबके विरुद्ध में स्वामी जी कहते हैं कि सत्य के लिए और आप लोगों के लिए मुझे चिल्लाना होगा कि ठहरो। बस इससे ज्यादा और अधोगति और अवनति नहीं होनी चाहिए।
प्रश्न: भारत में शिक्षा प्रणाली में पूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है। यह कैसे किया जाए? - अपना छोटा सा योगदान दें, सरकार के कदम उठाने का इंतजार न करें।
यह जो सिविलाइजेशन स्केल इश्यूज जो होते हैं ना इनका कोई इस तरह से सहज समाधान नहीं निकलता। मैंने रांची में भी यह सब काफी सोचा था और लिमड़ी में भी जब मैं यह गदाधर प्रोजेक्ट पे काम कर रहा था। ये गवर्नमेंट प्राइमरी स्कूल के बच्चों के साथ में उस समय भी काफी सोचा। अल्टीमेटली क्या है कि देखिए कि यह जो दक्षिणेश्वर मॉडल है कि ठाकुर जैसे सिद्ध गुरु है और स्वामी जी जैसे प्रचंड मुमुक्षत्व और प्रचंड अच्छे संस्कार लिए हुए स्टूडेंट हैं। तो वो जो एक एनवायरमेंट खड़ा होगा इस तरह का एनवायरमेंट काफी हमको खड़े करने की जरूरत है। एक आइडियलिज्म जो लोग जिन लोगों के भीतर में विद्या है, बुद्धि है, विज़डम है, अह एक हायर लाइफ प्राप्त करने की एक इच्छा है, ऐसे लोगों को ना अपना जीवन सेवा कार्य के लिए लगाना चाहिए। जैसे कि एक उदाहरण है अपने विनायक लोहानी बहुत अच्छा कार्य कर रहा है। माने अपनी कैरियर बना सकते थे। वह छोड़कर के अभी यह सब कर रहे हैं। सो मोर एंड मोर यंग मैन को यह सब करना चाहिए। क्योंकि प्रॉब्लम क्या है ना इंडिया में गवर्नमेंट जो है ना वो मुश्किल से 20-30% कैपेसिटी पर काम करती है। बाकी 6070% करप्शन है उसमें। तो अभी हमेशा हमेशा से ऐसा रहा है भारत में कि एक भगवान राम आए एक भगवान कृष्ण आए और बीच में जितने भी आए वो सब निकम्मे आए। तो ऐसा वह हमेशा अपना यह जो रूलिंग क्लास जो है ना इंडिया को डिसअपॉइंट ही करता रहा है। सो व्हाट इज़ द सॉल्यूशन टू दिस? हम नेक्स्ट अवतार की राह देख के तो नहीं बैठ सकते। एवरीवन विल हैव टू टेक देयर ओन वो जो उसकी तरह स्क्विरल की तरह रामसेतु बनाने में अपना-अपना एक छोटा सा एक अवदान करना होगा। एक पत्थर डालना होगा। अब मैंने मैं ऐसा नहीं कहता कि मैंने रांची में या लिमड़ी में जो किया इट वाज म रेवोल्यूशनरी या तो पूरा पूरा हिस्ट्री को चेंज कर देगा। इट्स अ वेरी स्मॉल कंट्रीब्यूशन बट आई एम सेटिस्फाइड कि मैंने किया है। सो आई डोंट थिंक कि इसके अलावा हम और कुछ कर सकते हैं बियों्ड दिस पॉइंट। कोई एक ऐसा लीडर आए स्वामी जी के जैसा पूरे भारत को इंस्पायर करें। पूरे भारत के सभी लोग माने मेजॉरिटी उसको फॉलो करें और इन शिक्षा ले। आई डू नॉट नो कि यह समय कब आएगा और यह समय आएगा बोलकर के बैठे रहने से कोई लाभ नहीं है। वह हम हमेशा बैठे रहे हैं। हमेशा बैठे-बैठे हमारे साथ में यही हुआ है आखिर में कि वो बाहर से लोग आकर के शोषण करके चले गए।
प्रश्न: जब बच्चे स्वामीजी के सिखाये हुए स्वदेश मंत्र का पाठ करते हैं, तो कितना प्रेरणादायक लगता है?
ये वो मैं लिमड़ी में यह भी सिखाता था बच्चों को। वो आखिर आखिर में तो कुछ कुछ मुखस्थ हो गई थी। ये मैंने रांची में देखा था। रांची में तो काम तो मेरे से पहले ही स्टार्ट हो गया था। वो नाइट स्कूल वगैरह का तो मैं पहली पहली बार जाके वो स्वदेश मंत्र वो एक लड़का वो लीड करेगा तो लड़का वो छोटा सा है रांची की बात कर रहा हूं ट्राइबल लड़का है और गांव की स्कूल है वो तो नाइट स्कूल है ना संध्या हो गई है अंधेरा हो गया है तो एक लड़का आकर के खड़ा होगा इतना छोटा सा है वो दुबला पतला तो स्वदेश मंत्र करेगा तो मैंने पूछा अरे हाथ में कुछ है नहीं है किताब वगैरह तो जरूरत नहीं है ऐसा बोल के वो सीधा स्वदेश मंत्र लीड करना शुरू कर दिया इतना छोटा बच्चा आवाज ऐसी आती कि मुझे एकदम म रोंगटे खड़े हो गए। मुखस्थ पूरा तब से मैंने यह सिखाए। बच्चों को यह सिखाना है। देखिए ऐसा हम सपना देख सकते हैं कि अभी नेक्स्ट अब परेड होगी। लाल किले पे ऐसा दिन आएगा कि वहां पे यह स्वदेश मंत्र का पाठ होगा। जब यह परेड चल रही है। अपने सोल्जर्स इसका पाठ कर रहे हैं। माने वह दिन आएगा तो देखिए कि कितना अच्छा होगा इस देश के लिए। एटलीस्ट इन स्पिरिट तो हमने स्वामी जी के वर्ड्स को लिया। डू नॉट नो कि अप्लाई जब कब होगा किंतु देखिए इस सब चीजों के लिए ना एक एक्सटर्नल चैलेंज बड़ा इंपॉर्टेंट है। भारत बड़ा कंफर्टेबल ही आज तक रह रहा था। पाकिस्तान के साथ में चैलेंज तो क्या है? पाकिस्तान तो छोटा-मोटा है। हम लोगों के माइंड पे अधिकार करके बैठा है कि पाकिस्तान पाकिस्तान। किंतु एज ए चैलेंज कोई बहुत बड़ी नहीं है। अभी अमेरिका यदि हमको चैलेंज करता है, चाइना चैलेंज करता है, देन वी विल हैव टू एक सेल्फ रिफ्लेक्शन करना होगा कि व्हेयर वी कैन इंप्रूव आवरसेल्फ कि इतनी बड़ी-बड़ी चैलेंज जब आ जाती है, अभी यह बोल रहे हैं कि सेंक्शन लगाएंगे सब इकट्ठा हो के अमेरिका और यूरोप। यदि ऐसा दिन आएगा तो देन वी सीरियसली हैव टू रिकंसीडर। यह लैंड रिफॉर्म, लेबर रिफॉर्म, एग्रीकल्चर रिफॉर्म जो कि बंद करके रखे हुए हैं वो सब रिफॉर्म्स को यदि नहीं स्टार्ट करेंगे तब तक क्या होगा कि भारत का इकोनमी वैसे का वैसा ही रहेगा। तो ये रिफॉर्म ये देखिए 93 में भी रिफॉर्म आया एक्स्ट्रा वो जो फॉरेक्स रिजर्व का चैलेंज आ गया था इसके लिए। सो एक्सटर्नल चैलेंजेस आर गुड इन अ वे। इट हेल्प्स अस टू थिंक एंड रिफॉर्म आवरसेल्फ।