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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नम पिछले सप्ताह हमने राजयोग देखा और थोड़ा सा ज्यादा ही फिलोसॉफिकल हो गया था तो मैंने सोचा कि आज थोड़ा सा ने पुराने दिनों की कुछ स्मृति कथा ले लेते हैं रामकृष्ण संघ में जैसे कि यह भागवत है या तो फिर यह रामायण है कितनी सारी सुंदर-सुंदर कहानियां अवतार के बारे में प्रभु की लीला के बारे में है पृथ्वी के ऊपर में तो वैसे ही अपने रामकृष्ण संघ में भी अनंत लीला कथाएं हैं सिर्फ हम लोग बीच-बीच में ठाकुर मां स्वामी जी के बारे में देखते तो उनको छोड़ कर के इनके जो डायरेक्ट डिसाइल है ठाकुर के अन्य सन्यासी शिष्य जैसे कि राजा महाराज जैसे कि हरि महाराज जैसे कि बाबूराम महाराज तो उनकी भी बहुत ही सुंदर सुंदर कहानियां है तो और होता क्या है कि हम लोगों को अभी हैबिट हो गया है तो ठाकुर की कहानी पढ़ते हैं तो उसमें ठाकुर समाधि में चले जाते हैं ईश्वर के साथ में वार्तालाप करते हैं स्वामी जी के बारे में पढ़ते हैं तो एकदम हाई फिलोसोफी हमको को पढ़ने को मिलती है तो यह सब पढ़ कर के हम यह सब अपेक्षाओं के साथ में डायरेक्ट डिसाइल की बातें पढ़ने का प्रयास करते हैं किंतु कुछ ही देर के बाद में पता चलेगा कि यहां पर ना ही तो ऐसा कोई हाई फिलोसोफी है ना ही यह लोग बार-बार ईश्वर के साथ में वार्तालाप करके समाधि मग्न हो जा रहे हैं ना ही कोई ऐसी कोई चमत्कारिक बात है तो फिर पता लगता तो भी सोचते हैं कि अच्छा तो यह सब पढ़कर क्या लाभ है किंतु जैसे जैसे हम राम कृष्ण संघ में राम कृष्ण साहित्य में गहराई में प्रवेश करना शुरू करेंगे श्री राम कृष्ण देव प्रदत साधना में हम आगे बढ़ना शुरू करेंगे वैसे-वैसे ही पता चलेगा कि यह सन्यासी शिष्य थे ठाकुर के इन सब की जो कहानियां थी उसका भी एक माधुर्य है भले ही चाहे बड़ी ही सामान्य घटना हो बड़ी ही चाहे सामान्य कोई भी बात हो किंतु यह सब बातों का भी एक बड़ा ही गहन माधुर्य है उसका अपने हृदय को छूने वाला उसके भीतर में एक अपनापन है तो यह अपनापन यह माधुर्य एक सहज सरल उनका स्वभाव सहज सरल उनका जीवन और उनकी तपस्या अभी हमारी कंपेयर में तो उन लोगों की तपस्या कहीं ज्यादा है लाखों गुना ज्यादा है किंतु जैसे मैंने कहा कि हमारा प्रॉब्लम वहीं पर हो जाता है कि ठाकुर महा स्वामी जी के साथ में हम कंपेयर करने को जाते हैं तो तो वो कंपैरिजन नहीं करके सिर्फ घटनाओं का माधुर्य उपभोग करें तो हमको बड़ा ही आनंद आएगा तो ऐसी कुछ कहानियां आज थोड़ा सा देखते हैं हरि महाराज एक बार दक्षिणेश्वर गए थे तो अभी दक्षिणेश्वर जाएंगे तो ठाकुर तो पता है कि इन अपने गृही भक्त जब आएंगे तो सबको बिठा कर के एक तरह की बात करेंगे कि हां संसार में रह कर के ही किल्ले में रह कर के युद्ध करने से और ज्यादा अच्छा है बाहर में मैदान में युद्ध करने से तो बहुत ही ज्यादा इंजरी होगी ये सब ठाकुर कहते हैं कि तुम लोग किल्ले में हो बड़े अच्छे हो किंतु जब यह सन्यासी संतान जाएंगे तो ठाकुर एक अलग तरह की उनके साथ में बात करेंगे कहेंगे कि त्याग ही जीवन का सर्वोच्च आध्यात्मिक रास्ता है सर्वोच्च आध्यात्मिक साधना है तो यह सब बात करने के बाद में ठाकुर ने हरि महाराज को कहा हरि महाराज यानी कि हमारे स्वामी तुर्या जी तुर्या जी अर्थात कि अपने संघ के एक बहुत बड़े वेदांती साधु एक बार हरि महाराज ठाकुर के पास में कुछ दिनों से नहीं जा रहे थे तो ठाकुर ने बुला कर के पूछा कि क्यों नहीं आ रहे हो ठाकुर ने हरि महाराज के किसी मित्र को पूछा कि वह लड़का क्यों नहीं आ रहा है तो मित्रा ने कहा कि हरि महाराज वह वेदांत के ग्रंथों का पाठ कर रहे हैं इसलिए शायद हो सकता है कि उनको यहां पर आने का समय ना मिला हो तो ठाकुर ने एक दिन हरि महाराज को बुला कर के कहा कि पूछा कि अच्छा तुम मुझे बताओ तुम्हारे यह जो वेदांत के जितने भी ग्रंथ है उसमें क्या लिखा है वो सब बातों का सार क्या है वही तो कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या इसके अलावा तो और कुछ है नहीं आप एक्चुअली यदि वेदांत के ग्रंथों का पाठ करेंगे देखेंगे कि उसका बहुत बड़ा हिस्सा यह जगत की रचना कैसे हुई है इस बात के साथ में संबंधित है किंतु जगत की रचना जो हो गई तो अभी इस माया जाल को भेद करके ईश्वर को प्राप्त कैसे करना या तो फिर ईश्वर या तो ब्रह्मण का सही स्वरूप क्या है इसके बारे में अल्प ही चर्चा है तो ठाकुर ने कहा ठाकुर ने एकदम बिल्कुल ठीक-ठीक बात कही कि तुम्हारे ग्रंथ जितने भी देखो तो उसमें जगत की रचना अभी ठाकुर ने ऐसा कहा नहीं किंतु मैं कह रहा हूं कि जगत की रचना कैसे हुई यह पंची करण विधि जो है वह किस तरह से हुई किस तरह पंच महा भूतों में से एक के बाद एक तत्व बनते गए और किस तरह से सत्व रजस तमस यह जो पूरा जो सृष्टि की उत्पत्ति का यह जो इतिहास है इसको लेकर के हमको क्या करना है बहुत ज्यादा वैसे तो ऑलरेडी हम लोग सृष्टि के भीतर में है अब सृष्टि से इस मायाजाल से छूटे यही तो अपना उद्देश्य है तो तो जैसे ही ठाकुर ने कहा कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या के अलावा तुम्हारे ग्रंथ में क्या है तो हरि महाराज ने कहा ठीक तो ठाकुर ने बिल्कुल ठीक कहा कि यदि जितना भी वेदांत पढ़ेंगे तो यही एक बात समझ में आएगी कि ब्रह्म सत्य है जगत मिथ्या है अभी बात यह है कि हमने यह तो देख लिया कि यहां पर बागान है बागान में पेड़ है बहुत सारे बहुत सारे पेड़ों पर हमने गिन करके देख लिया कि 1000 आम है किंतु वो उससे तो 1000 आम गिन कर के अपना तो पेट भरेगा नहीं हमको तो कैसे भी करके एक आम तोड़ कर के खाना है तब अपना पेट भरेगा तो पूरे सृष्टि की रचना किस तरह से होती है वह देख लिया किंतु बात यह है कि अभी इस सृष्टि की माया जाल को छिन्न भिन्न करके सृष्टि के परे जो ईश्वर है ईश्वर की प्राप्ति कैसे करें ईश्वर का दर्शन कैसे करें वही करने के लिए तो अभी पूरा जीवन पड़ा है सामने तो हरि महाराज ने वह सब ग्रंथ उठा कर के गंगा में फेंक दिए तो यही हरि महाराज ठाकुर के पास में आए हैं दक्षिणेश्वर में ठाकुर ने कहा चलो आहार करने के लिए बैठते हैं तो उस समय कालीबाड़ी में से ठाकुर के लिए मां काली का जो अन्न भोग होता था वह सब आता था विष्णु घर में से विष्णु घर में भी मा भगवान विष्णु को भोग चढ़ाया जाता था तो वह सब ठाकुर के पास आता था और बड़े थाल में विभिन्न कटोरिया में विभिन्न व्यंजन बड़े ही सुंदर रूप से सजा कर के ठाकुर के सामने प्रस्तुत किए जाते थे तो जैसे ही हरि महाराज ठाकुर के सामने खाने के लिए बैठे तो देखा कि ठाकुर इतना सुंदर बड़े थाल में इतनी छोटी-छोटी कटोरिया में कितने विभिन्न व्यंजन आहार कर रहे हैं यह क्या है यहां पर ठाकुर कामिनी कांचन के बारे की त्याग करने के बारे में बोलते हैं यहां पे इतना आहार का भोजन का इतना वैविध्य तो यह क्या दोनों विरोधाभासी नहीं है जद आप अभी आप तो ठीक है चलिए कालीवाड़ा करु उनको इस तरह से आहार सजा करके देने वाले लोग हैं अभी ठाकुर की बात सुन कर के हम लोगों ने घरबार छोड़ कर के जंगल में जाकर के तपस्या आरंभ कर दी और वहां पर खाने को नहीं मिला तो हमारे मन में क्या ऐसा नहीं होगा कि ठाकुर हमको मूर्ख बना गए वो खुद बढ़िया मजे से काली मंदिर में बैठ कर के इतने विभिन्न पकवान है व्यंजन है खा रहे हैं और हम यहां पर जंगल में भूखे मर रहे हैं तो हरि महाराज के मन में ऐसा कोई विचार आया होगा और साथ में ही हरि महाराज के साथ में और जो लोग बैठे थे उनके मन में भी शायद यह विचार आया होगा अभी ठाकुर है अंतर्यामी जैसे ही उन्होंने देखा कि यह लोग इस तरह से देख र हैं सोच रहे हैं इमीडिएट ठाकुर ने क्या कहा पता है कि देखो मैं तुम लोगों के लिए मेरे मन को जमीन पर पृथ्वी पर रखने के लिए यह सब एक तरह का रजस का एक आवरण खड़ा कर रहा हूं मेरा मन तो हमेशा अखंड की ओर दौड़ता है वहां पर मैं उस अखंड की ओर सहज उर्ध्व गति जो मेरा मन है उसको पकड़ कर के पृथ्वी पर रखने के लिए आप लोगों के साथ में रखने के लिए जिससे कि मैं आपके साथ में वार्तालाप कर सकूं ईश्वरीय बातें कर सकूं इसलिए मैं इस तरह से अच्छा सा राजसिक खाना मेरे सामने रखता हूं और फिर देखा कि ठाकुर खाते कैसा है पता है सभी जितने भी व्यंजन है जितने भी पकवान है कटोरी विभिन्न कटोरी हों में रखे हुए उसमें से थोड़ा थोड़ा थोड़ा सा एक-एक ग्रहण करते हैं ऐसा नहीं कि सब सामने आ गया तो पेट भर के खा लिया ठाकुर का खाना होता था बिल्कुल चिड़िया की तरह और ऐसे ही एग्जैक्ट ऐसी ही बात विज्ञान महाराज के साथ में भी हुई है विज्ञान महाराज यानी कि हरि प्रसन्न महाराज और जिनको हम कहेंगे कि विज्ञानानंद जी महाराज विज्ञानानंद जी महाराज के बारे में पता है कि ठाकुर के एक सन्यासी संतान थे ठाकुर के पास में जब प्रथम बार आए थे ठाकुर ने कहा था कि चलो कुश्ती करते हैं विज्ञानानंद जी महाराज हरि महाराज तो या तो फिर जैसे कि स्वामी जी उनको कहा करते थे पेशन तो हरिमा हरि प्रसन्न महाराज तो ऐसे बड़े ही तगड़े थे तो उन्होंने सोचा ठाकुर है इतने दुबले पतले कहां मेरे साथ में कुश्ती करेंगे तो चलो ठीक है अभी ठाकुर ने कहा है तो कुश्ती करके देख लेते हैं फिर कुश्ती का जो दाव पेच होता है ना जैसे दोनों को कंधों को एक दूसरे जो पहलवान है कुश्ती करने के लिए एक दूसरे के कंधों को पकड़ते हैं फिर देखते हैं कि कौन किसको जमीन पर पटक देता है तो उन दोनों ने उस मुद्रा में अपने एक दूसरे के कंधों को पकड़ा और जैसे ही पकड़ा वैसे ही हरि महाराज हरि प्रसन्न महाराज के मन में पेशन या तो फिर विज्ञान महाराज के मन में एक ऐसा एक ईश्वरीय आवेश हुआ जैसे कि ठाकुर के सामने बिल्कुल ही वह पराह्यून धक्का लगा कर के दीवाल के साथ में सटक दिया और साथ में ही हरि विज्ञान महाराज को ऐसी सब आध्यात्मिक अनुभूति हुई तो देखिए कि ठाकुर किस तरह से लोगों को आध्यात्मिक अनुभूति का संचार करवा दे थे तो यही विज्ञान महाराज एक बार ठाकुर के पास में आए फिर यही घटना रिपीट होती है पुनरावृत्ति होती है ठाकुर को एक बड़े थाल में बहुत सारी कटोरिया में विभिन्न तरह के व्यंजन परोसे गए तो जैसे ही हरि महाराज ने यह देखा तो वह सोच रहे हैं कि अरे वाह इस तरह का परमहंस तो मैं भी हो सकता हूं यदि परमहंस होकर के यदि साधु होकर के ी होकर के काम कांचन का त्याग करके इतने सुंदर थाल में इतने सारे पकवान खाने को मिलेंगे तो यह तो मैं भी कर सकता हूं तो इमीडिएट किंतु अभी देखिए कि विज्ञान महाराज का ऑब्जर्वेशन भी था वैसे ही तो वह डिस्ट्रिक्ट इंजीनियर नहीं हुए थे उस समय डिस्ट्रिक्ट इंजीनियर होना ब्रिटिश सरकार के समय वह बहुत बड़ी उसको उपलब्धि माना जाता था आज भी देखिए कि एक 1000 यदि सरकारी नौकरी यदि उसकी वैकेंसी होती है तो एक लाख लोग वहां पर वह भीड़ लगाकर खड़े हो जाते हैं तो सरकारी नौकरी का अपने भारत में बहुत बड़ा एक प्राधान्य है एक बहुत बड़ा सन्मान है तो उस समय उस जमाने में डिस्ट्रिक्ट इंजीनियर की नौकरी मिलना वह कोई सामान्य बात नहीं थी जब यह साधु लोग उस समय हरि विज्ञान महाराज का इलाहाबाद में जब पोस्टिंग था और यह सब बाकी साधु अलाहाबाद जाते थे तो देखते थे कि विज्ञान महाराज एक बड़े सी घोड़ा गाड़ी में बैठ करके भ्रमण के लिए जाते हैं वोह नौकरी के लिए भी जाएंगे तो उनके लिए एक बड़ी सी एक घोड़ा गाड़ी हमेशा वह पड़ी रहेगी उनके घर में सब तरह के आहार व्यंजन वो फिर यह जो यह होता है बावर जी खाना बनाने वाला सब लोग उपस्थित रहते थे तो बड़ा ही उनका एक धनी व्यक्तियों जैसा एक कंफर्टेबल मिडल क्लास वाला उनका एक लाइफ था वो सब छोड़ कर के बाद में वह रामकृष्ण संघ में आकर के उन्होंने सन्यासी के रूप में योगदान किया था किंतु यह उस समय की बात है जब भी वह अभी भी वह बालक थे अभी भी युवा थे तो विज्ञान महाराज का किंतु ऑब्जर्वेशन था ठाकुर को बताना नहीं पड़ा कि वह इस तरह से क्यों खा रहे हैं उन्होंने ठाकुर को आहार करते देखा तो देखा कि सब चीजों में से सभी कटोरी हों में से थोड़ा-थोड़ा एकदम अल्पाहार वो करते हैं एक व्यंजन है तो थोड़ा सा लिया उसको खाया दूसरे जैसे कि चिड़िया खाती है तो हरि महाराज ने इमीडिएट सोचा कि देखिए यहीं पे में तफावत है बाकी लोग जो सब बड़ी-बड़ी बातें भले चाहे करते होंगे किंतु बातों के साथ में उनका आचरण कभी भी मिलता नहीं यहां पर देखिए ठाकुर जिस तरह से त्याग की बात करते हैं तो वह काली मंदिर में पुजारी थे तो उस पद की गरिमा के रूप में और साथ में ही यह मथुर बाबू के गुरु भी थे मथुर बाबू उनको अपने गुरु के रूप में मानते थे और राणी रामनी भी उनको बड़ा सम्मान करती थी राणी रामनी यानी कि काली मंदिर की प्रति निष्ठा ता और मथुर बाबू हालांकि उनका देहांत हो गया था किंतु वह थे काली मंदिर के एक वो व्यवस्थापक तो एक उनका एक सन्मान था काली मंदिर में बोलकर के उनको यह सब प्रदत किया जाता था ऑफर किया जाता था किंतु बिल्कुल चिड़िया की तरह थोड़ा सा यहां प लेंगे थोड़ा सा यह खाएंगे तो यह तफावत है बाकी सबके साथ में ये विज्ञान महाराज ने ऑब्जर्वेशन करके देख लिया था उनको फिर ठाकुर को उनको बता की जरूरत नहीं पड़ी कि मैं क्यों इस तरह से खाता हूं अभी हरि महाराज की बात फिर से हरि महाराज एक बार आए काशीपुर में काशीपुर में बैठ कर के ठाकुर के साथ में बात कर रहे हैं हरि महाराज ने पूछा कि हरि महाराज यानी तुर आनंद जी महाराज तुर आनंद जी महाराज ने पूछा उस समय के हरि युवा हरि तो हरि महाराज ने पूछा कि महाशय आप कैसे हैं तो वैसे ही जैसे ही प्रश्न हुआ ठाकुर अपना जितना भी पीड़ा है दुख है सब बताने लगे कि देखो गले में यह गाव हो गया है मैं खा भी नहीं पा रहा हूं और इतनी जलन होती है इतना कष्ट होता है क्या करूं अभी तो अभी हरि महाराज ये ठाकुर की यह बात सुन रहे हैं सुनते सुनते ही एकाएक ऐसा लगा कि जैसे कि उनके ज्ञान चक्षु ज्ञान दृष्टि उनकी खुल गई हो एक तीसरा नेत्र कहा जाता है ना अपने शास्त्रों में एक तीसरा नेत्र है अपने कपाल में वह ज्ञान नेत्र है वह जब ज्ञान नेत्र जब खुल जाता है तो जो क्या सही है क्या गलत है वह सब हमको दिखने लगता है तो जैसे ही वैसे ठाकुर के साथ में बात करते-करते ही हरि महाराज को ऐसा लगा कि जैसे उनका तीसरा नेत्र ज्ञान नेत्र खुल गया है और देखा कि ठाकुर जैसे कि आनंद के समुंदर में बैठे हैं बड़े ही शांति से आराम से जैसे कि ये शेष नक्षी समुद्र में शेष सैया पर भगवान विष्णु कैसे शयन करते हैं और मां लक्ष्मी उनकी पद सेवा करती है तो वैसे ही ठाकुर जैसे कि क्षीर सागर में व आराम से वह बैठे हैं तो हरि महाराज तो एकदम आश्चर्य चकित हो गए ठाकुर यहां पर बोल रहे हैं कैंसर की बात यहां पर बोल रहे हैं गले में इतनी जलन हो रही है और यहां पर बोल रहा है कि अरे मुझे तो ऐसा दिख रहा है तो अपना भ्रम मिटाने के लिए यह देखने के लिए क्या मुझे कुछ गलत तो नहीं दिख रहा तो हरि महाराज ने फिर से ठाकुर को पूछा कि महाशय बताइए तो आपको क्या सही सही में ऐसा अनुभव हो रहा है बहुत कष्ट बहुत पीड़ा बहुत ज्वाला ज्वलन तो ठाकुर ने कहा हां फिर से वही बात कि कैंसर हो गया है गले में वहां पे बड़ा सा घाव हो गया है जैसे खाना खाएंगे वो गांव में से सब गले के गांव में से खाना निकल आएगा ठाकुर एकदम दुबले पतले हाड पिंजर की तरह हो गए स्केलेटन की तरह किंतु ठाकुर फिर से यह सब वर्णन कर रहे हैं फिर से हरि महाराज को वही दृश्य दिखने लग आनंद सागर में ठाकुर जैसे की शांति से वो यह कर रहे हैं विचरण कर रहे हैं तो इस बार हरि महाराज से नहीं रहा गया तो उन्होंने इमीडिएट ठाकुर को कहा महाशय आप मुंह से तो ऐसी बात करते हैं किंतु मुझे ऐसा दिख रहा है कि आप आनंद सागर स्वयं है तो जैसे ही हरि महाराज ने कहा ठाकुर अपने आप बोले कि साला धरे फेले छे रे इस साले ने पकड़ लिया मुझे क्योंकि उस समय भी ऐसा था बहुत सारे भक्त सोचते थे कि ठाकुर ने बीमारी का बहाना किया है जिससे कि वह भक्तों को सेवा करने का मौका दें हम लोग तो कोई साधन भजन करके ईश्वर प्राप्ति करने वाले नहीं है भगवान की ईश्वर के अवतार की सेवा की उसी में अपने कर्म खत्म हो जाएंगे नष्ट हो जाएंगे तो हमको सेवा करने का मौका देने के लिए हमारे कर्म नष्ट करने के लिए ठाकुर ने बीमारी का एक मुखो पहना है जैसे ही हम लोगों को कोई ना कोई आध्यात्मिक उन्नति आध्यात्मिक प्राप्ति हो जाएगी ठाकुर य मुखो हटा कर के फिर से अपने सही स्वरूप में आ जाएंगे किंतु नरेंद था वो कहता था कि मुझे ऐसा लग रहा है कि ठाकुर की बीमारी देख कर के ठाकुर ने अभी ठीक कर लिया है कि वह इस देह को रखेंगे नहीं महासमाधि की ओर वोह जा रहे हैं इसलिए हम सबको जी जान लगा कर के अपना घर वगैरह सब छोड़ कर के ठाकुर की सेवा करना हमारे लिए उचित है यह हमारा कर्तव्य है तो वैसे तो भक्त गृहस्थ भक्त सन्यासी भक्त दोनों ठाकुर की सेवा करते थे किंतु दोनों के विचार में यह फर्क था और कौन कहेगा कि नरेंद सही है नर और बाकी सब गलत है व गिरीश घोष वगैरह यहां पर हरि महाराज को ही ऐसा दर्शन हो रहा है कि बीमारी बाहर से है भीतर में जैसे कि आनंद सागर है भीतर में जैसे कि अमृत सागर अपने वह बिल्कुल वह उसके यह जो तरंग है तरंग बिल्कुल हवा में उड़ रही है आनंद सागर की ठाकुर के भीतर में तो ये हरि महाराज को यदि ऐसा दिखता है तो कौन कहेगा कि नरेंद्र सही और यह गिरीश घोष गलत दोनों अपनी अपनी जगह पर सही है विज्ञान महाराज का ऐसा था वो एक बार वो बेलर मठ में चर्चा आरंभ हुई दो तरह के भक्त एक कहता है कि पुरुषार्थ करके ही हमको ईश्वर मिलेगा दूसरा कहता है दूसरा एक ग्रुप था वे लोग कर कह रहे हैं कि नहीं ईश्वर की आशीर्वाद के बिना ईश्वर के उनके बिना उनके आशीष के बिना हमको ईश्वर प्राप्ति नहीं होगी तो अभी यह दोनों ग्रुप य परमार्थ और पुरुषार्थ पुरुषार्थ अर्थात कि हमको खुद को साधना करनी है जब ध्यान करना है परमार्थ अर्थात कि ईश्वर के आशीर्वाद होने कौन से आपको ईश्वर प्राप्ति होगी तो हरि महाराज के पास में आ विज्ञान महाराज के पास में आए तो विज्ञान महाराज ने क्या उत्तर दिया देखिए कि जो भक्त है उनके लिए भक्ति सही है जो साधक है उनके लिए यह साधना सही है ज्ञानी के लिए ज्ञान सही है अर्थात कि आप जिस रास्ते से ईश्वर को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं वही रास्ता उस समय तक आपके लिए ठीक है उचित है तो यहां पर भी वैसे हरि महाराज को इस तरह का दर्शन तो हुआ किंतु वह थे नरेण के ग्रुप में त्यागियो के ग्रुप में तो ठाकुर के दोनों चेहरे थे ठाकुर के दोनों स्वरूप थे भक्त के लिए भक्त का स्वरूप था साधकों के लिए त्यागियो के लिए त्यागी का स्वरूप था अभी और थोड़ा सा आगे चलते हैं ठाकुर की महासमाधि के बाद में सभी त्यागी संतान कुछ समय तो वराह नगर मठ में रहे किंतु उसके बाद में देखा कि मठ में रह कर के दो तरह की बात थी एक तो एक जगह पर रहकर के इतने साधुओं को वह भी एक उचित नहीं लग रहा था कार्य क्या करेंगे साधना आप कितने समय तक करते रहेंगे दूसरा कि पैसों का अभाव था तो इतने सब लोगों के लिए खाने पीने का वो किस तरह से जुगाड़ करेंगे तो नरेंद्र के मन में यानी कि भविष्य के स्वामी विवेकानंद के मन में ऑलरेडी ये त्याग और यह जो निसंग ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण भरोसा रख कर के भ्रमण करने की जो बात थी वो ऑलरेडी नरेण के मन में थी तो नरेण एक बार जैसे निकला वराह नगर मठ में से तो हरि महाराज है राजा महाराज है वह सब निकल पड़े पूरे भारत में भ्रमण करके प्रव्रज्या करके यानी कि भिक्षा करके वे लोग जहां पर जगह मिली जंगल में समुंदर के किनारे नदी के किनारे पेड़ के नीचे में बैठ कर के साधन भजन तपस्या करने लगे इसी तरह की एक बात है कि देहरादून से मसूरी जा रहे थे हरि महाराज और रास्ते में एक सीआईडी का एक गुप्तचर उनके पीछे में लग गया अभी वह ब्रिटिश सरकार का समय था और 1857 में जो हमने जो प्रथम युद्ध किया था इंडिपेंडेंस का ब्रिटिश लोगों के साथ में उस युद्ध के बाद में हमारे बहुत सारे सिपाही ब्रिटिश सरकार की नजर से बच कर के व उन्होंने क्या किया कि वे लोग 1857 के वह इस तरह के इंडिपेंडेंस के युद्ध के बाद में बहुत सारे जो सिपाही थे ब्रिटिश सरकार से बचने के लिए वह साधु हो गए थे सन्यासी हो गए थे तो ब्रिटिश सरकार की यह गुप्तचर विभाग को ऑलरेडी एक था कि यह जितने भी साधु है उसमें से बहुत सारे स्तर तरह के ये जो क्रांतिकारी है विप्लव है वगैरह तो हरि महाराज जा रहे थे हिमालय से तो एक गुप्तचर सीआईडी का उनके पीछे में लग गया और एक बार उनके सामने आकर के पूछा कि अभी आप अपना पता बताइए अपना नाम बताइए कहां से आए हैं क्या कर रहे हैं कहां से जा रहे हैं सब कुछ मुझे बताइए तो अभी हरि महाराज ने सोचा कि इसके साथ में झगड़ने से क्या लाभ है वो भी बेचारा आम आदमी है वो अपने भारतीय तो होते हैं ज्यादातर यह जो लो लेवल वो जो वर्कर जितने भी थे तो अपने इंडियन ही थे तो उसके साथ में क्या झगड़ा करना सिर्फ अपना कर्तव्य पालन कर रहा है तो यह सोच कर के हरि महाराज ने उसको बड़े शांति से अपने बारे में सब कुछ बता दिया कि हां यह मेरा घर है मैं यहां पर जा रहा हूं साधु हूं तपस्या करने के लिए तो यह सब बात करके यह गुप्तचर वहां से चला गया किंतु फिर भी अ हरि महाराज के पीछे पड़ा गए पड़ा रहा क्योंकि इन लोगों के ऊपर में ऊपर से भी प्रेशर होता है ना कि जितने भी साधु है उनकी खबर रखो वो झूठ बोलेंगे तो झूठ उनका स्वीकार नहीं कर लेना है ठीक-ठीक से जांच पड़ताल करनी है और समय आए तो मारपीट भी कर लेनी ये तो ब्रिटिश गवर्नमेंट है वो लोग तो कुछ भी कर सकते हैं तो अपने ऊपरी वालों के डर से अपने अधिकारी के डर से ना कि जो भी हो यह गुप्तचर फिर से हरि महाराज के पीछे लगा और फिर हरि महाराज को पता है कि ये मेरे पीछे पीछे आ रहा है मेरा पीछा कर रहा है तो उन्होंने ज्यादा तो कुछ बोला नहीं किंतु दूसरी बार हरि महाराज को अटका करके यह गुप्तचर फिर से उनको पूछने लगा आपका नाम क्या है पता क्या है सब लंबा-लंबा इंटरगी करने लगा तो फिर से हरि महाराज ने सब कुछ शांति से बता दिया अभी गुप्तचर वहां से गया तो सही किंतु उसके मन में या तो संदेह बहुत ही दृढ़ है या तो अपने ऊपर वाले अधिकारियों का बड़ा डर है कि जितने भी साधुओं को देखो सब समय उनको परेशान करते रहो जो भी है तीसरी बार जब वह हरि महाराज के पीछे लगा पीछा करते-करते उनको रोका और कहा कि आप अभी फिर से आपके बारे में सब कुछ बताइए तब हरि महाराज ने पहले तो शांति से कहा कि भाई दो बार तो मैं तुमको सब कुछ बता चुका हूं अभी ये तीसरी बार क्यों पूछ रहे हो तुम अभी कुछ जानना है तो तुम्हारी जो नोट्स थी पहले वाली उसी में से देख लो उसी में से जान लो तो गुप्तचर ने बात मानी नहीं और थोड़ा सा ज्यादा ही रुक्ष स्वभाव अपना करके बात करने लगा जैसे ही उसने ऐसा किया हरि महाराज तो वो वेदांत केसरी थे तो वेदांत सिंह जोर से गर्ज उठे कि तुमको पता नहीं है कि ये मैं साधु हूं और साधुओं को तुम इस तरह से परेशान करते हो ये वो करके ऐसा उसको डांटा कि वो गुप्तचर बेचारा ठंडा हो गया देखिए कि ये ब्रिटिश सरकार का समय है और इन लोगों के पास में पुलिस डिपार्टमेंट के पास में ऐसा पावर था कि किसी को भी पकड़ कर के उठा जाएंगे जितना चाहे पीट जितना समय चाहे जेल में रखेंगे हमारा कोई ह्यूमन राइट्स नहीं था किंतु फिर भी एक अकिंचन सन्यासी दरिद्र सन्यासी जिसके पास में कुछ नहीं है ना ही मनी पावर है ना ही मेन पावर है यह जो रानी रामनी उसके ऊपर में यह ब्रिटिश सरकार ने उसकी कुछ जमीन वगैरह कुछ हड़प लेने का प्रयास किया तो रास मणि ने कितना रुपया खर्च करके वकील को रखा वो ये सब एटर्नी को रखा और केस किया और वह जीत गई तो राणी रास मणि जैसे लोग ब्रिटिश सरकार के सामने पंगा ले ले यह तो एक चीज है कहां यह हरि महाराज कुछ भी नहीं उनके पास में किंतु फिर भी उनका ऐसा क्रोध ऐसी भीतर की आत्मशक्ति आत्म श्रद्धा कि उसको देख कर के यह गुप्तचर भी एकदम ठंडा हो गया और विनम्र भाव से बोलने लगा कि अरे महाशय आप तो साधु है महाराज जी आप तो सन्यासी है आपको इस तरह का क्रोध करना उचित नहीं है तो जैसे ही वह ठंडा हो गया तो हरि महाराज का गुस्सा भी ठंडा हो गया और उन्होंने शांति से कहा देखो भाई मुझे तुम मेरा अपना कर्तव्य मत सिखाओ मुझे पता है कि साधु का कर्तव्य क्या है तुम सिर्फ अपना कर्तव्य करते जाओ तुम अपना रास्ता देखो तो जब हरि महाराज के यह दोनों स्वरूप देखे शांत स्वरूप भी और यह क्रोध क्षात्र वीर्य भी क्षत्रिय स्वरूप भी तो यह सीआईडी का गुप्तचर महाराज का बड़ा ही अनुरागी हो गया था महाराज का भक्त हो गया था तो देखिए कि स्वामी जी के साथ में एगजैक्टली इस तरह की स्टोरी है स्वामी जी उस समय वो नॉर्थ इंडिया में भ्रमण कर रहे तो ऐसा ही एक गुप्तचर उनके पीछे लगा और स्वामी जी को स्वामी जी अर्थात कि स्वामी विवेकानंद तो स्वामी जी को कहने लगा कि आप एक काम कीजिए चलिए आप जेल में चलिए हमारे साथ में डराने के लिए साधुओं को हेरेस करने के के लिए जेल का नाम सुन कर के ही तो कोई भी डर जाएगा तो पुलिस वालों का नाम सुन कर के कोई भी डर जाएगा तो स्वामी जी को कह रहा है चलिए आप जेल में चलिए डराने के लिए हेरेस करने के लिए तो स्वामी जी बड़े ही शांति से बड़े ही प्रसन्नता पूर्वक कहे अरे वाह चलो मेरा तो नसीब खुल गया चलो चलो मुझे जेल में ले चलो जेल में ले चलो तो ये गुप्तचर बोलता है कि अरे ये बाकी लोग तो सब जेल का नाम सुन कर के तो बेचारे बेहोश जैसे हो जाते हैं यहां पे ये तो बड़े खुश हो गए हैं बोला कि क्या बात है भाई जेल का नाम सुनकर के इतना खुश क्यों हो रहा है तो स्वामी जी बड़ हंसते हंसते उत्तर देते प्रसन्न मन से कि देखो यहां पर तो मुझे खाने को भी नहीं मिलता 10 जगह पर भिक्षा करता हूं तो आधा एक रोटी का टुकड़ा मिलता है जेल में ले जाओगे तो मुझे खाने को तो मिलेगा भर पेट चलो अच्छा ही है जेल मेरे लिए तो व गुप्त चरवा बड़ा ही क्रोधित होकर के वहां से चला गया तो इन लोगों का देखिए कि जितना आपके भीतर में ये एक आध्यात्मिक शक्ति का जागरण होता है साथ में ही यह आत्म श्रद्धा का भी जागर होता है यह त्याग है वैराग्य है भक्ति है भाव है यह जो सब गुण हम जनरली आध्यात्मिकता के साथ में हम लोग एसोसिएट करते हैं किंतु हम लोग यह भूल जाते हैं कि हम तो वह वीर अर्जुन के संतान है महावीर के संतान है कि जो कि साहस और शौर्य जिनकी रग रग में बह रहा था आध्यात्मिक होना या धार्मिक होना यानी कि डरपोक हो जाना या तो फिर कायर हो जाना यह नहीं ये एक बाद बाद में बुद्धिज्म के आने ने के बाद में एक हो गया हमारे सर में कि अहिंसा है हमारे साथ में अन्याय हो तो अन्याय का कोई सामना नहीं करना है बिल्कुल बेचारे की तरह पड़े रहना है यह सब बात-बात की बातें हैं अपना सही सही य वैदिक संस्कृति देखेंगे पढ़ेंगे तो यह साहस और शौर्य और वीर्य यह जो ब्राह्मण के जितने भी गुण है विद्याभ्यासम एक सौम्यता है सभी के प्रति ममत्व का एक व्यवहार है उसके साथ में ही यह साहस शौर्य वीर्य भी वो बिल्कुल ही अभिन्न अंग है यह भले ही चाहे ब्राह्मण ब्राह्मण का कार्य करें क्षत्रिय क्षत्रिय का कार्य करें किंतु ब्राह्मण के भीतर में क्षत्रिय के भी गुण थे क्षत्रिय के भीतर में ब्राह्मण के भी गुण थे यह राजा जनक को देख लो ऋषि विश्वामित्र को देख लो या तो फिर परशुराम को देख लो दोनों तरह से आपको मिलेगा परशुराम ने जन्म ग्रहण किया था ब्राह्मण कुल में किंतु क्षत्रिय भी गुण थे राजा जनक जन्म थे क्षत्रिय कुल में किंतु ब्राह्मण के भी गुण थे ब्रह्मज्ञानी के भी गुण थे तो यह दोनों गुण भले ही बाहर से हम एक तरह का कार्य करें किंतु गुण तो दोनों ही अपने भीतर में रहने चाहिए तो यह सब कहानियों को पढ़ कर के फिर से वही वैदिक युग फिर से पुनः जीवित हो गया इस तरह से लग रहा है हरि महाराज की यह प्रव्रज्या की एक दूसरी भी एक सुंदर कहानी है कि राजा महाराज के साथ में बैजनाथ धाम गए थे हिमाचल प्रदेश में है बड़ा ही सुंदर मंदिर है भगवान शिव का पहाड़ के ऊपर में वहां पर रह रहे हैं तपस्या कर रहे हैं अभी उस समय ऐसा हुआ कि कुछ समय से अकाल चल रहा था बारिश नहीं हो पा रही थी तो आसपास के जितने भी गांव थे बेचारे बिल्कुल कष्ट में परेशान हो गए थे कष्ट में पड़े हुए थे तो अभी आम आदमी बेचारा क्या करेगा वो ब्रिटिश गवर्नमेंट तो आज की गवर्नमेंट की तरह है नहीं कि इमीडिएट रिलीफ एक्टिविटी चालू कर दे रामकृष्ण मिशन भी उस समय नहीं था हालांकि रामकृष्ण संघ के साधु थे वहां पे किंतु फिर वो इस तरह से एक ऑर्गेनाइज करके रिलीफ एक्टिविटी करना वो आइडियाज तो स्वामी जी ने बाद में दिए थे तो हरि महाराज और राजा महाराज दोनों थे उन्होंने देखा कि एक दिन बड़ी सुबह को अर्ली मॉर्निंग से जितने भी गांव वाले थे उन्होंने क्या किया कि भगवान शिव के पास में बारिश के लिए पानी के लिए प्रार्थना करते हैं तो उन्होंने पहाड़ के नीचे में जमीन के ऊपर में एक जलाशय था जलाशय में से घटी घटी पानी भर कर के पहाड़ के ऊपर में उठकर के शिवलिंग के ऊपर में पानी ढालना उसका यह करना अभिषेक करना प्रारंभ किया और साथ में ही जब भी अभिषेक करते हैं कहते हैं बाबा बरसाओ बाबा बरसाओ बाबा अर्थात कि भोलेनाथ और बरसाओ यानी कि पानी बरसाओ बारिश बरसाओ तो अभी यह हरि महाराज और राजा महाराज दोनों यह बात देख रहे हैं वह लोग भी बड़े ही प्रभावित हो गए कि गांव वालों का कैसा यह सरल सहज विश्वास है कि वह दो चीज है एक तो हतो उत्साह नहीं हो गए हैं रोना धोना नहीं चालू कर दिया है दूसरा कि भगवान के ऊपर में बिल्कुल ही अश्र ाल नहीं हो गए हैं तो ये दोनों ने भी बड़े ही प्रसन्न होकर के ठीक किया कि वह भी महादेव के पास में बारिश के लिए प्रार्थना करते हैं और शिवलिंग के पास में ही दोनों लोग बैठ गए जब ध्यान करने के लिए मेडिटेशन करने के लिए मन में वो प्रार्थना चल रही है कि भगवान इन लोगों का कष्ट समाप्त करो उनको पानी दो अदर वाइज तो फिर खाने के भी वह मुश्किल हो जाएगा रहना मुश्किल हो जाएगा तो अभी देखिए कि सुबह से यह जो पानी ढालना यह अविरत ध्यान यह जो चालू हुआ है तो उस दिन जैसे-जैसे दिन चलता गया पता चला कि प्रचंड रौद्र है एक भी बादल पूरे आकाश में कहीं पर नहीं दिख रहा किंतु जैसे देखिए कि गांव वालों का सहज विश्वास यहां पर दो ब्रह्मज्ञानी सन्यासी ध्यान कर रहे हैं यह दोनों ने मिलकर के भगवान शिव के मन में शायद एक ऐसी करुणा का उदय करवाया होगा कि जो भी कहो कि जैसे कहा जाता है न्याय न्याय शास्त्र में कहा जाता है काक ताली न्याय अर्थात कि एक ब्रांच होती है पेड़ की एक डाली होती है उसके ऊपर में जाकर के एक कौवा बैठता है अभी जैसे ही कौवा जाकर के बैठा वो डाली टूट गई तो अभी प्रश्न होगा कि कौवे के भर से डाली टूटी ना कि डाली जो थी वो जो ाल जो थी वो ऑलरेडी भीतर में से रोट हो गई थी भीतर में से वो खत्म हो गई थी और जैसे ही हल्का सा भी उसको उसके ऊपर में वेट रखे तो टूटने वाली थी तो किस तरह से वो डाल टूटी पता नहीं किंतु डाल टूटी सही कोब के बैठने से तो यहां पे भी जैसे ही शाम हुई घनघोर बादल पूरे आकाश में छा गए और रात होते-होते ही ऐसी बारिश चालू हुई कि आसपास के जितने भी गांव है उन सबको जितने भी जलाशय थे संपूर्ण रूप से वह भर गए तो यह सहज विश्वास और ध्यान का प्रताप इसका प्रताप कहो ना कि कहो कि वह बारिश होने ही वाली थी किसको पता किंतु इस तरह की कहानी पढ़कर के हमारे हृदय में भी थोड़ा सा एक आशा का संचार होता है प्रार्थना करने को जी करता है जो कि बहुत बड़ी समस्या आ जाए तो ऐसा नहीं कि अभी या तो फिर लोग बेड हैबिट में चले जाते हैं ड्रिंकिंग स्मोकिंग चालू कर देते हैं कोई कोई लोग अपने ही नसीब को कोसना शुरू कर देते हैं कोई कोई लोग इतने टेंशन में चले जाते हैं कि फिर आखिर में डायबिटीज ब्लड प्रेशर वगैरह हो जाता है तो वह नहीं करके ईश्वर पर विश्वास रख कर के ईश्वर को पुकारो देखो कि फल मिलता है कि नहीं ऐसा नहीं है कि पुरुषार्थ नहीं करना है बारिश आ गई तो फिर यह गांव वाले फिर बारिश लेकर के बैठे नहीं रहे थे खेत जो खेती करना हल जोतना वह तो उन्होंने किया ही किंतु पुरुषार्थ हम कितना कर सकते हैं परमार्थ कितना कर सकते हैं दोनों का बैलेंस होता है लाइफ में अभी बाबूराम महाराज की बात बाबूराम महाराज अर्थात की स्वामी प्रेमानंद तो बाबूराम महाराज राजा महाराज अर्थात की स्वामी ब्रह्मानंद जी के साथ में ढाका गए हैं यह बहुत स्वामी जी स्वामी विवेकानंद की महासमाधि के बाद की बात है अभी राजा महाराज अर्थात स्वामी ब्रह्मानंद ठाकुर के स्वयं मानस पुत्र ठाकुर ने खुद कहा था कि राजा राखल एक राज्य चला सकता है तो ठाकुर ने जिस दिन ऐसा कहा कि यह राखल राज्य चला सकता है तभी से स्वामीजी जी ने सबको कहा अपने गुरु भाइयों को कि राखल को हम राजा बोलक के पुकारना शुरू करते हैं और उनका नाम हो गया राजा महाराज सन्यास के बाद में स्वामी जी ने सन्यास नाम दिया था स्वामी ब्रह्मानंद और स्वामी ब्रह्मानंद को रामकृष्ण संघ का सर्वप्रथम प्रेसिडेंट उनको नियुक्त किया था तो यही राजा महाराज के साथ में बाबूराम महाराज ढाका गए अभी ढाका में थे निखिलानंद जी महाराज उनकी युवक अवस्था में और युवक अवस्था में कॉलेज में पढ़ रहे थे बाद में उन्होंने संघ में आकर के सन्यासी हुए थे निखिलानंद सन्यास नाम उनको प्राप्त हुआ था और अमेरिका में उन्होंने बहुत ही लंबे समय तक बड़े ही सुंदर रूप से वेदांत प्रचार किया था तो यही निखिलानंद जी महाराज इस कहानी को हमको बताते हैं कहते हैं कि जब यह बाबूराम महाराज और राजा महाराज ढाका आए तो हम लोग ढाका कॉलेज में पढ़ रहे थे थर्ड ईयर में तो हमने ठीक किया कि वहां पे हम लोग बाबूराम महाराज का प्रवचन आयोज भजन करते हैं और बाबूराम महाराज को जाकर के कहा तो वे भी बड़े खुश हो गए बाबूराम महाराज को लेकर के जब प्रवचन के लिए ये लोग निकल रहे हैं तब बाबूराम महाराज ने साष्टांग होकर के राजा महाराज को प्रणाम किया अभी देखिए कि राजा महाराज थे संघ के प्रेसिडेंट किंतु बाबूराम महाराज स्वयं तो कुछ कम नहीं थे ईश्वर कोटि थे ठाकुर ने खुद कहा है कि बाबूराम हाड़ शुद्ध उसका उसकी हड्डियां भी बाबूराम की शुद्ध है और ईश्वर कोटि तो यह ईश्वर कोटि प्रेमानंद जी महाराज राजा महाराज को साष्टांग प्रणाम करके उनके आशीर्वाद प्राप्त मांगते हैं और राजा महाराज भी करते हैं कि बाबू राम भाई तुम की को छो प्रभु कृपा सब ठीक होए जावे बाबूराम भाई ये तुम क्या कर रहे हो मुझे प्रणाम करने की क्या जरूरत है ईश्वर की कृपा से सब ठीक हो जाएगा किंतु बाबूराम महाराज का बड़े ही भाव प्रवण थे बड़े ही भावुक थे भक्तिमार्ग तो था ही किंतु भावुक भी बड़े थे तो बड़े ही भक्ति भाव पूर्वक प्रणाम किया कॉलेज में आए कॉलेज में सबको जिस तरह से मंच पर बिठा दिया जाता है एक सभापति रहते हैं जो कि सभा का संचालन करते हैं तो सभापति के रूप में कॉलेज के हिस्ट्री के प्रोफेसर को रखा गया था अब यह प्रोफेसर का एक ऐसा बैड हैबिट था कि बीच-बीच में अपनी घड़ी देखते रहेंगे तो अभी नेचुरली है कि वक्ता को वक्ता बोलने के लिए प्रारंभ कर रहे हैं और वह जो सभापति है बीच-बीच में घड़ी देख रहे हैं तो वक्ता को तो ऐसा लगेगा कि अरे मेरा समय समाप्त हो गया है तो अभी किंतु देखिए कि एक्चुअली समय समाप्त नहीं हुआ यह जो सभापति थे उनका बेड हैबिट था रोग था बार-बार घड़ी देखते रहने का किंतु यह बात बाबूराम महाराज को कहना निखिलानंद जी भूल गए थे तो निखिलानंद जी कहते हैं कि बाबूराम महाराज खड़े होकर के बड़े ही भाव प्रवण भाव में आकर के भाव के प्रवाह से भाव के प्रमाण में बड़ा ही सुंदर वक्तृत्व दे रहे थे बड़ी ही सुंदर प्रवचन दे रहे थे किंतु जैसे ही थोड़ी देर के बाद में सभापति ने घड़ी देखना बार-बार शुरू किया तो बाबूराम महाराज ने उनको पूछा अभी जो एकदम बड़े ही भाव से बात कर रहे हैं और उनकी बात में एकदम विक्षेप पड़ता है तो व लोग बड़े ही अपसेट हो जाते हैं तो बाबूराम महाराज के साथ में ऐसा ही हुआ बड़े ही अपसेट हो गए अपसेट होकर के उन्होंने सभापति को पूछा कि क्या आपको मेरा समय समाप्त हो गया है तो सभापति कहते नहीं नहीं नहीं नहीं अभी कहां स समय समाप्त नहीं हुआ आप आप बोलिए आप बोलिए मैं तो वैसे ही घड़ी देख रहा हूं तो बाबूराम महाराज फिर से बढ भाव में आकर के बोल रहे हैं फिर से यह प्रोफेसर थे वो घड़ी देख रहे हैं तो अभी बाबूराम महाराज से नहीं रह गया बाबूराम महाराज बैठ गए और कहा कि देखिए आप तो सब अंग्रेजी डब के आपको शिक्षा मिली है आपको सब घड़ी के अनुसार आपको सब चलना होता है मैं तो मुझे मैं तो कोई अंग्रेजी शिक्षा मुझे नहीं मिली और ना ही यह अंग्रेजी तरह से मुझे वक्तृत्व देना आता है घड़ी के अनुसार चालू करो घड़ी के अनुसार बंद करो जो टॉपिक दिया जाता है उसी के बारे में बात करो इस तरह से बात करो कि किसी को बुरा ना लगे किसी को खराब ना लगे लोगों के मन सब ठीक रहे इस तरह से बात करना मुझे नहीं आता मैं इस तरह से नहीं बोल पाऊंगा ऐसा करके वो बैठ गए किंतु उनके जो वक्तृत्व में जो विक्षेप पड़ा था वो विक्षेप की वजह से उनको कुछ दिनों के बाद में बीमारी हो गई और बीमारी से उन्होंने भुगता भी बहुत तो निखिलानंद जी कहते हैं कि देखिए कि बाबूराम महाराज का स्वभाव कैसा था यही बाबूराम महाराज के बारे में एक दूसरी भी बड़ी सुंदर बात थे निखिलानंद जी ने जाकर के उनको कहा कि महाराज जी मैं आपके साथ में बात करना चाहता हूं वही ढाका में ही उसी प्रवचन के कुछ दिनों के बाद की ही बात है तो बाबूराम महाराज ने जैसे ही निखिलानंद जी ने ऐसा कहा बाबूराम महाराज ने कहा क्या तुम विप्लव हो तो निखिलानंद जी बड़े ही आश्चर्य चकित हो गए कि किस तरह से महाराज ने मेरे मन की बात समझ ली तो महाराज कहते हैं देखो भाई यह सब चीजें हमको समझ में आती है किसके मन का क्या भाव है क्या संस्कार है किसके मन की क्या गति है हम लोग सब समझते हैं किंतु जो तुम मुझे प्रश्न करना चाहते हो तुम इस तरह से नहीं चलेगा तुम एक काम करो तुम एक दिन अपने जितने भी विप्लव मित्र हैं सबको लेकर के आओ मैं तुमको राजा महाराज के पास में ले जाऊंगा तो एक दिन निखिलानंद जी अपने दो-तीन विप्लव मित्रों के साथ में आए सब लोग राजा महाराज के कमरे में गए राजा महाराज के सेवक को कहा गया जाओ तुम बाहर चले जाओ फिर जैसे ही सेवक महाराज बाहर गए कमरे का दरवाजा बंद कर दिया गया अभी बाबूराम महाराज और राजा महाराज दोनों वहां प दो आसन थे दो आसन पर बैठे और बाकी जितने भी लड़के आए थे उनके सामने बैठे बाबूराम महाराज ने राजा महाराज को कहा कि देखो राजा ये लोग सब कैसा पागलपन कर रहे हैं ये विप्लव में पड़े हैं तुम इनको कुछ शिक्षा दो कुछ उनको समझ दो तो राजा महाराज कह रहे हैं कि देखो भाई चरित्र गठन ही सबसे बड़ा आवश्यक है यदि तुम लोगों को देश की सेवा करनी है यदि हमारा चरित्र ठीक नहीं रहेगा हमारा चरित्र यदि खराब रहेगा तो उस खराब चरित्र से व्यक्ति जो है चरित्रहीन व्यक्ति वह देश की सेवा तो नहीं ही करेगा ऊपर से वह देश का बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाएगा तुम लोगों के ये जो विप्लव कर रहे हो विप्लव के इतने दल है तुम्हारे दल इतने सक्सेसफुल क्यों नहीं हो रहे क्योंकि तुम्हारे बीच में कुछ कुछ चरित्रहीन लोग बैठे हैं ज्यादातर लोग तो चरित्रवान है किंतु कुछ-कुछ लोग चरित्रहीन है और उन्हीं की वजह से तुम्हारे विप्लव सक्सेसफुल नहीं हो रहे तुम लोग स्वामी जी के रास्ते का अनुसरण करो विप्लव का रास्ता छोड़ो सर्वप्रथम चरित्र का गठन करो बाद में तुम लोग देश सेवा करना और फिर इन लोगों की तो ये होती है ना स्पेशलिटी सामने किस तरह का व्यक्ति बैठा है उस तरह उसको उस तरह की उपमा देकर के समझाना तो निखिलानंद जी विप्लव थे मित्र सब विप्लव है तो उनको उनकी उपमा देकर के राजा महाराज समझाते हैं कि यदि बारूद तुम्हारा भीगा हुआ हो तो आप उसको कितना ही आगुण उसमें डाल दीजिए बारूद में विस्फोट नहीं होगा किंतु बारूद यदि सखा हुआ होता है है तो छोटी सी एक दिया सलाई भी है एक छोटी सी मैच स्टिक भी है वो भी जला कर के उसमें डालोगे तो भयानक विस्फोट हो जाएगा तो वैसे ही चरित्रहीन आप व्यक्ति कितना ही देश सेवा कर दे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला किंतु जो सही सही चरित्रवान व्यक्ति है थोड़ा सा भी देश के लिए करें तो देश की गरिमा महात्म कितना बढ़ जाएगा तो यह बात सुनकर के अभी निखिलेश्वरानंद जी तो यंग थे ना तो ये युवावस्था का एक रहता है एक जोश रहता है तो जोश ने आकर के कह दिया कि महाराज आपको पता नहीं है स्वामी जी क्या कहना चाहते हैं आप स्वामी जी को ठीक से समझे नहीं है हम लोगों ने स्वामी जी का किताबें पढ़ी है और हमको पता है किताबें पढ़ कर के हमने देखा है स्वामी जी ने कहा कि देश की मुक्ति के लिए रक्तपात करना चाहिए अभी मुझे पता नहीं कौन सी जगह पे स्वामी जी ने ऐसा लिखा है किंतु यदि सैक्रिफाइस करने की बात है रक्तपात अर्थात की खून बहाना चाहिए ऐसा शब्द तो स्वामी जी ने कहीं पर नहीं कहा सैक्रिफाइस करने की बात कही है किंतु सैक्रिफाइस तो अपनी कामना वासनाओं का नहीं कि दूसरों का नहीं कि दूसरों का मर्डर करके उनका सैक्रिफाइस करना है तो किंतु जैसे ही निखिलानंद जी ने ऐसा कहा बाबूराम महाराज बड़े ही क्रोधित हो गए बोला कि राजा देख छो की बोल से छे लेरा मने राजा देख रहे हो कि ये लड़के लोग क्या बोलते हैं हम स्वामी जी को समझ नहीं पा रहे हैं हम लोगों ने 20 साल से स्वामी जी के साथ में रहे हैं स्वामी जी के साथ में खाना खाया है स्वामी जी के साथ में आनंद किया है उनकी बातें सुनी है एक साथ रहे हैं और तुम बोल रहे रहे हो कि हमको स्वामी जी को समझ नहीं पा रहे हम लोग तुम्हारे सर के भीतर में क्या घोड़े की बुद्धि है क्या बताओ तो तुम मुझे घोड़ा बना कर के मुझे मेरा वहां पे ले जाओगे क्या कहीं पे बोला चलो घोड़ा बनो निखिलानंद जी तो थोड़े से डर भी गए और थोड़ा सा आश्चर्य भी हुआ कि क्या ये बाबूराम महाराज बोल रहे है तो ठीक है बाबूराम महाराज ने कहा घोड़ा बनने को तो जैसे ही वो घोड़े की तरह दो घुटन और दो हाथ के ऊपर में बैठ गए बाबूराम महाराज उनके ऊपर में बैठे बोला चलो अभी तो चले भी सही थोड़ी देर फिर बाबूराम महाराज ने कहा ठीक है चलो अभी इसका संस्कार शुद्ध हो गया है तुम्हारे साथ में सब ठीक हो जाएगा तो जैसे ही बाबूराम महाराज ने कहा निखिलानंद जी वहां से निकले उनका घर छोड़ कर के और उसी समय वहीं पर विप्लव दल के साथ में उनका संबंध समाप्त हो गया फिर बाद में वो बेलूरमठ जाकर के साधु बने थे साधु बन कर के फिर अमेरिका में उनका पोस्टिंग हुआ था अमेरिका में बड़ा ही सुंदर कार्य उन्होंने किया है तो देखिए कि इन लोगों के साथ में रह कर के यह हमारा चरित्र गठन भी होता है और देखिए कि चरित्र गठन के लिए और कुछ करे ना करें यह सब कहानियां सुंदर कहानियां भी यदि हम सुनेंगे तो इससे भी हमारे संस्कार और मन की शुद्धि होगी तो आज यही तक अभी कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु दुर्गा पूजा होगी किंतु मठ की तरह नहीं कि वह तीन दिन चलेगा ऐसा कुछ नहीं वो यहां पर यह रखा जाएगा मां का एक मूर्ति रखा जाएगा और एक दिन पूजा होगी व सामान्य रूप से जिस तरह से होती है वह अष्टमी हां हा हा बस अष्टमी के दिन वह होम होगा और श शोष उपचार से पूजा होगा बस व चंडी पाठ होगा इतना होगा एक्चुअली स्वामी जी ने कहा था कि ब्रिटिश सरकार की हिम्मत है तो मुझे गोली मार करके दिखाए मेरा मर्डर करके दिखाए देखो कि दूसरे ही दिन पूरा भारत देश चग जाएगा तो इस तरह से स्वामी जी ने अपने को गोली मारने को कहा था नहीं कि जाकर के ब्रिटिश लोगों को गोली मारने को