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Swami Vivekananda Raja Yoga ·

राजयोग : Ch.3 प्राण : स्‍वामी विवेकानन्द 18 nov 2024 | Raja Yoga | Swami Vivekananda

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः स्वामी विवेकानंद के राजयुग के बारे में हम देख रहे थे उसके ऊपर में हमारे काफी लेक्चर भी हुए हैं क्लासेस हुए हैं अभी तक और जैसे हम लोग इस क्लास को मैं जिस तरह से स्ट्रक्चर करता हूं एक सप्ताह यदि मान लीजिए कि स्वामी जी का होगा तो एक सप्ताह मां का तो एक सप्ताह और कुछ इस तरह से मैं अपने क्लासेस में थोड़ा सा डाइवर्सिटी लाने का प्रयास करता हूं जिससे क्या है कि कोई कोई लोग सोचते हैं कि मैं तो सिर्फ मां का ही डिवटी हूं कोई सोचेंगे मुझे ठाकुर ही अच्छे लगते हैं और ज्यादातर यंग लोग होते हैं वे लोग उनको स्वामी जी को पढ़ना ही अच्छा लगता है किंतु हम लोग जो कि रामकृष्ण संघ के साथ में जुड़े हुए हैं हमको पता है कि ठाकुर मां और स्वामी जी एक तीन तीन एक यानी कि इन तीनों का यह जो आइडियाज है तीनों के आइडियाज इन सबको एक साथ में स्टडी करना चाहिए जिससे कि क्या होगा कि क्योंकि इन तीनों का ऐसा है कि कोई ना वैसे तो तीनों ही सर्वांग संपूर्ण थे ही आध्यात्मिक रूप से किंतु फिर भी एक एक जीवन के मनुष्य जीवन के मनुष्य सभ्यता के एक एक एस्पेक्ट को लेकर के उन्होंने एक सर्वोच्च आदर्श स्थापित किया है मां के जीवन में देखिए कि अपना गृहस्थाश्रम को हमको किस तरह से एक विद्या का सं सार बना देना है क्योंकि अल्टीमेटली आप देखेंगे कि दो तरह से ठाकुर ने कहा है एक तो है विद्या का संसार दूसरा ठाकुर ने कहा है अविद्या का संसार अभी अविद्या का संसार क्या है गृहस्थाश्रम ही किंतु वहां पर काम क्रोध मद लोभ मोह वगैरे जो हमारी नेगेटिव इमोशंस है उसका ज्यादा प्राधान्य रहता है जबकि विद्या का जो संसार है उसको आप देखेंगे कि उसमें आपको मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा भालो भाषा प्रेम एक दूसरे के प्रति करुणा सहानुभूति इसका प्राधान्य रहता है तो यह जगत को विद्या का संसार किस तरह से बना देना अपने हम अभी देखिए कि बात सिर्फ गृहस्थ की भी नहीं है हम लोग भी तो आश्रम में भी तो हमारा एक संसार है सब साधु मिलकर के भक्त यह वर्कर्स यह वॉलंटस सब लोग तो मिलकर के हम लोग साथ में रहते हैं तो यह साथ में रहना तो साथ में रहने से तो जैसे कहते हैं ना कि दो बर्तन यदि साथ में रहेंगे तो दोनों में ट दोनों में वह आवाज तो होगा ही होगा बर्तन टकराएंगे और आवाज तो होगा ही होगा ऐसा कहा जाता है तो इसके लिए यदि हमको साथ में रहना है सोसाइटी में रहना है किसी ग्रुप में रहना है किसी समूह में रहना है तो उसको विद्या का संसार बनाना उचित है रदर देन की अविद्या का संसार तो वह तो हो गया मां ठाकुर को देखिए कि ठाकुर उनका एक जो एक इनर जर्नी मनुष्य सभ्यता का जो एक सेकंड एस्पेक्ट है यह मनुष्य मन का कॉन्शियस निस हम जब बाहर के जगत को छोड़ कर के भीतर के जगत में हम डाइव लगाएंगे डू डुबकी मारेंगे है क्षीर सागर जो अपने हृदय में है उसके भीतर में तो हमको एक के बाद एक कितने ही सारे आध्यात्मिक मुकाम आते रहते हैं अपनी जर्नी में और सभी मुकाम के बारे में सभी मंजिलों के बारे में ठाकुर ने बड़ा ही डिटेल से हमको बताया है हमको गाइड किया है कि आंतरिक जर्नी इनर लाइफ किस तरह से डेवलप की जाए और स्वामी जी का जो एस्पेक्ट है सिविलाइजेशन एस्पेक्ट एक लार्ज स्केल क्वेश्चन जो है कि राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन किस तरह से मनुष्य सभ्यता का उदय होता है किस तरह से सभ्यता का रास होता है स्वामी जी ने भारत में घूम कर के देखा कि जो परिस्थिति है और जब अमेरिका गए यूरोप गए तो वहां की परिस्थिति यह जो दो कंट्रास्ट है एक और उन्होंने देखा चाइना और इंडिया चाइना की भी उन्होंने मुलाकात ली थी भारत की तो हमको पता ही है बड़े ही अच्छे से अपने ही मातृभूमि को स्वामी जी पहचानते थे कंपेयर टू दैट स्वामी जी जब जापान गए और उनको जो शौक लगा कि अरे एक एशियन कंट्री इतना एडवांस हो सकता है तो फिर जब अमेरिका गए तो उनको तो फिर एक के बाद एक शौक लगने लगा कि अरे ये लोग कितने एडवांस है मटेरियल मटेरियल सिकली तो ये जो भारत और जो भारत जैसे समान बाकी जो सब देश है उनकी यह जो पार मर्थ पमा अभ्युदय और परमार्थ दो है तो अभ्युदय अर्थात कि ये सांसारिक उन्नति वह कैसे की जाए और यह जो इन जनरल ह्यूमन लाइफ है उसके ऊपर में फिलोसोफी वह हमको स्वामी जी ने बताया है तो इस सप्ताह पिछले सप्ताह हमने मां का जीवन स्टडी किया इस सप्ताह स्वामी जी का राजयोग स्टडी करेंगे जैसे कि हमने ऑलरेडी राज्य के ऊपर में कुछ-कुछ चैप्टर्स तो कर लिए हैं कुछ कुछ क्लासेस तो ले लिए हैं अभी आज से थोड़ा सा आगे बढ़ते हैं जिस चैप्टर का हम पाठ करके उसके ऊपर में चर्चा करेंगे उसका नाम है यह जो राजयोग पुस्तक में यह तृतीय चैप्टर है थर्ड चैप्टर और इसका नाम है प्राण अब यह चैप्टर का पूरा लिंक मैंने आपके साथ में शेयर किया है यह जो लिंक मैंने आपके साथ में शेयर किया है उसमें स्वामी जी के राजयोग का प्राण रूप नाम जो चैप्टर है उसका कंप्लीट टेक्स्ट वहां पे है उसका एक भी शब्द ना ही मैंने ऐड किया है ना ही मैंने रिमूव किया है बस वही कि उस चैप्टर में मैंने कुछ हेडिंग्स लगा दिए हैं कुछ टॉपिक्स दे दिए हैं जिससे कि हमको डिस्कशन करने में सुविधा हो कि एक टॉपिक चालू किया प्रारंभ किया तो फिर वो टॉप यहां से प्रारंभ होता है यहां पर समाप्त होता है ऐसा करके मैंने सिर्फ टॉपिक रूपी हेडिंग दिए हैं बाकी जो पूरा टेक्स्ट मैंने आपके साथ शेयर किया है वह पूरा पूरा स्वामी जी के पुस्तक में से ही मैंने कॉपी पेस्ट किया है राजयोग पुस्तक में से अच्छा अभी क्लास राजयोग का अपने से प्रारंभ करने से पहले थोड़ा सा एक स्वामी जी के जीवन के बारे में भी हम देख लेते हैं कि किस तरह से स्वामी जी यह राजयोग सिखाते थे हालांकि हमको पता है कि राजयोग पुस्तक जो हम प्रकाशित कर रहे हैं जिसको कि कंप्लीट वर्क्स में भी हमने राजयोग हेडिंग से दिया है उसमें से ज्यादातर लेक्चर न्यूयॉर्क और लंडन में ही दिए गए हैं किंतु इसके अलावा भी हमको पता है कि यह हो गई स्वामी जी की प्रथम मुलाकात पश्चिमी देशों की अमेरिका और यूरोप की सेकंड टाइम भी स्वामी जी आए हैं जो सेकंड टाइम जब पहली बार स्वामी जी भारत लौटे रामकृष्ण संघ की स्थापना की रामकृष्ण मिशन की सेवा कार्यों का प्रारंभ किया अपने विदेशी भक्तों को भारत में बुलाया उनको भारत से अवगत कराया जैसे जोसेफाइन मैक्लाउड पूछती है स्वामी जी को स्वामी जी व्हाट कैन वी डू फॉर यू स्वामी जी कहते हैं लव इंडिया भारत को प्रेम करो तो यह विदेश और यह भारत यह विदेशी लोग भारत को गुलाम बना कर के रखते थे उनका ये जो शासक वर्ग था किंतु जो स्वामी जी के फॉलोअर्स थे स्वामी जी के एडमाइन में भारत के साथ में मित्रता करना सीखा तो यह एक बड़ा ही एक महत्व परिवर्तन भारत के जीवन भारत की यह जो इतिहास में स्वामी जी लेकर आए थे तो वह अपने विदेशी डिसाइल्स को भारत में बुलाया उसके बाद में स्वामी जी सेकंड टाइम अमेरिका गए तो यह उसके बाद में 1902 में स्वामी जी का देहांत हो जाता है फोर्थ जुलाई को तो यहां पर सेकंड विजिट में हमको पता है कि स्वामी जी कैलिफोर्निया गए थे और कैलिफोर्निया में एलिस हेंस ब्रो करके स्वामी जी की एक डिवोटा थी उनके घर स्वामी जी रहे थे अभी देखिए कि स्वामी जी के फॉरेन डिसाइल्स के बारे में हम जब पढ़ते हैं सोचते हैं तो कुछ-कुछ नाम हम सबको पता है सर्वजन विदित है उसमें से जैसे कि निवेदिता का नाम सर्वप्रथम आएगा उसके बाद में जोसेफाइन मिकल उड सारा ओली बूल इवन यहां तक कि यह जो सेकंड विजिट में कैलिफोर्निया जब स्वामी जी गए थे और कैलिफोर्निया में आइड अंसेल से जो उनकी मुलाकात हुई थी आइड अनसेल के बारे में भी हम लोग काफी कुछ जानते हैं किंतु अभी ऐसा है कि फर्स्ट विजिट के दौरान जिनका स्वामी जी के साथ में संपर्क हुआ वे सबसे ज्यादा वेल नोन है क्योंकि स्वामी जी के साथ में सबसे ज्यादा वही लोग रहे थे और वह भारत में भी आए थे खास करके ये सारा ओली बुल निवेदिता और जोसेफाइन मैक्लाउड इन तीनों के साथ में स्वामी जी की मुलाकात फर्स्ट विजिट में ही हुई थी सेकंड विजिट में कैलिफोर्निया में आडा अनसेल के साथ में मुलाकात हुई ये आइड अनसेल का नाम भी हालांकि फेमस है किंतु इतना नहीं क्योंकि उसके बाद में स्वामी जी ज्यादा जिए ही नहीं है उनका जीवन बहुत ही कम समय के बाद में समाप्त होने वाला था किंतु यह सेकंड विजिट में स्वामी जी की ये जो एलिस हेंस ब्रो के साथ में मुलाकात हुई ये एलिस हेंस ब्रो के बारे में बहुत कम लोग पहचानते हैं उनको जानते हैं अ क्यों ऐसा मुझे पता नहीं हो सकता है कि उनके बारे एक्चुअली उनके बारे में बहुत ज्यादा मटेरियल है यह स्वामी विवेकानंद इन द वेस्ट न्यू डिस्कवरीज पुस्तक में देखेंगे छह वॉल्यूम का अशोकानंद जी के द्वारा प्रेरित मेरी लुईस बर्क बोलकर के स्वामी अशोकानंद जी की जो डिसाइल थी उसने इसको लिपिबद्ध किया है यह बात होगी 19 50 60 70 के दशकों की तो इसमें एलिस हेंस ब्रो का काफी विषद वर्णन आपको मिल जाएगा तो देखिए कि ये जो एलिस हेंब्रो थी वो लॉस एंजलिस के पास में गांव गांव तो नहीं कहेंगे एक शहर था टाउन था उसमें वह रहती थी स्वामी जी को इनवाइट किया कि आप मेरे घर पर आइए स्वामी जी उनके घर गए थे और वो तीन बहने थी हेलन और हेलन मीड एलिस हेंस ब्रो और एक वाइक ऑफ करके एक तीन बहने थी तीनों बहनों के साथ में स्वामी जी उनके घर पर रुके थे अभी देखिए कि यह जो एलिस हेंब्रो थी उसका स्वामी जी के ऊपर में इतना दिन प्रतिदिन भक्ति और निष्ठा बढ़ता गया कि स्वामी जी ने जब यह ठीक किया कि वह लॉस एंजेलिस शहर को छोड़ कर के कैलिफोर्निया बोलकर सैन फ्रांसिस्को बोलकर के दूसरे शहर में जाएंगे जो कि बड़ा मेट्रोपोलिस था उस समय का आज तो आप देखेंगे कि लॉस एंजलिस कै सैन फ्रांसिस्को यह बहुत ही बड़े मने पूरे विश्व के बड़े से बड़े सिटीज में इसको पहचाना जाता है वहीं पे यह सिलिकॉन वैली है वहीं पे यह एरो स्पेस इंडस्ट्रीज है वहीं पे यह हॉलीवुड है वो मने विश्व के जितने भी प्रख्यात और धनी और गण्य मान्य लोग हैं वहां पर रहते हैं उस समय यह आज से 100 साल सवा साल पहले की बात है यह 19 18999 की बात है जबकि यह लॉस एंजलिस और सैन फ्रांसिस्को का इतना डेवलपमेंट नहीं हुआ था तो यह किंतु फिर भी मतलब काफी एडवांस थे काफी काफी एडवांस थे तो स्वामी जी ने ठीक किया कि सन फ्रांसिस्को शहर जाएंगे वेदांत का प्रचार करने के लिए तो यह एलिस हेंस ब्रो उसका नेचर था काफी इंट्रोवर्ट था बहुत ही अंतर्मुखी सहज से किसी के साथ में बात नहीं कर पाती थी जैसे कि ये निवेदिता या तो फिर ये जोसेफाइन मैक्लाउड इन दोनों को देखेंगे कि वो एकदम फॉरवर्ड और एक्सट्रोवर्ट नेचर था कहां पर भी जाएंगे तो फटाफट लोगों के साथ में बात करके एक सनु सह हृदय उनके साथ में संपर्क बना कर के मित्रता करवा लेना अपना काम करवा लेना स्वामी जी का जो भी काम है वो उनसे निकलवा लेना ये दोनों में बड़ी महारत थी किंतु एलिस हेंस ब्रो का ऐसा नहीं था शी वाज वेरी इंट्रोवर्ट और सहजता से लोगों से अपना काम नहीं करवा पा रही थी तो जब उसने स्वामी जी को कहा कि स्वामी जी मैं आपके एडवांस एजेंट के रूप में सन फ्रांसिस्को जाती हूं और वहां पर जाकर के मैं आपके लिए जो एडवर्टाइज वगैरह करना है जो कि आपको आपके रहने की खाने की व्यवस्था करनी है लेक्चर का और क्लासेस का आयोजन करना है कुछ गणय मान्य लोगों में आपके बारे में बात करनी है जैसे कि एक इंटरेस्ट खड़ा हो स्वामी जी के आने से पहले ही एक जो माहौल बनाना है इस तरह से मैं आपका एडवांस एजेंट होकर के जाना चाहती हूं तो स्वामी जी तो बड़े खुश हो गए कि इतनी शाय है इतनी इंट्रोवर्ट है सामने से कह रही है तो अच्छा स्वामी जी ने कहा तुम जाओ किंतु अभी ये एलिस की जो दो बहने थी वह उसको परेशान करने लगी यह कह के कि अरे तुम तो इतनी अंतर्मुखी लज्जा शल हो किसी के साथ में सहजता से बात नहीं कर पाओगी यह एजेंट का काम जो होता है जो कि प्रोपेगेशन कर करता है पब्लिसिटी करता है वह तो बड़ा ही अग्रेसिव वर्क है तुम यह सब कैसे कर पाओगी तो वह बेचारी एलिस थोड़ी सी यह हो गई डिप्रेसो गई यह बात सलाह अपनी बहनों से सुनकर के और मायूस होकर के बैठी रही कुछ दिनों के बाद में स्वामी जी ने उसको पूछा कि अच्छा आप तो कह रही थी कि आप सैन फ्रांसिस को जाएंगी एज एडवांस पब्लिसिटी एजेंट तो क्या हुआ तो उसने कहा यह बात कि मेरी बहनें मुझे डिस्कस कर रही है तो स्वामी जी ने कहा कि अरे नहीं मेरा तुम परे विश्वा तुम जाओ जाकर के जितना हो सके करना तो एलिस हेस ब्रो वहां पर गई स्वामी जी की एडवांस पब्लिसिटी वगैरह की और फिर स्वामी जी जब आए तो होम ऑफ ट्रुथ बोलकर के एक जगह थी वहां प यह लोग रह रहे थे बाद में एलिस और होम ऑफ ट्रुथ की जो यह जो वहां की ये जो मुख्य वहां की संचालिका थी वह भी स्वामी जी की बड़ी डिवोटा हो गई थी इन दोनों ने मिलकर के सोचा कि होम ऑफ ट्रुथ तो जैसा एक हॉस्टल जैसा है काफी लोग आते जाते हैं स्वामी जी को एक प्राइवेट चाहिए एक उनका एक रूटीन है साधना करनी है तो यहां पर ठीक नहीं उनको सेट होगा तो टर्क स्ट्रीट बोल कर के एक जगह थी वहां पर स्वामी जी के लिए एक फ्लैट उन्होंने भाड़े पर किराए प लिया और यह जो होम ऑफ ट्रुथ की ये जो संचालिका और यह एलिस हेंस ब्रो वो दोनों स्वामी जी के साथ में उसी फ्लैट में रहने लगी तो देखिए कि वहां पर स्वामी जी ये मेडिटेशन के राजयोग के क्लासेस कंडक्ट करते थे एक दिन की बात है सुबह का क्लास होता है 910 के आसपास का तो स्वामी जी ने आकर के देखा क्लास चालू हो गया है और एलिस हेंस प्रो वहां क्लास में नहीं बैठी है तो स्वामी जी ने किचन में जाकर के देखा तो वह स्वामी जी के लिए खाना पका रही थी तो स्वामी जी ने कहा कि अरे क्लास चालू हो गया है अभी तक खाना नहीं बना है क्यों इतना देरी क्यों हो रहा है तो अभी ये एलिस कहती है कि मैं जो स्वामी जी के लिए जो सूप बनाती थी तो उसको को तीन चार घंटे तक उबालना पड़ता था जिससे कि क्या होगा जिस चीज का यह सूप बन रहा है उसमें से जितने भी पोषक द्रव्य है विटामिंस है और जो भी न्यूट्रिएंट्स है वो सब सूप के भीतर में आ जाए बहुत ही मेहनत करके यह सप बनाती थी उसको उस दिन थोड़ा सा देरी हो गया तो उसने स्वामी जी को कहा कि स्वामी जी गलती तो मेरी ही है आपका शप मैंने समय पर बनाना प्रारंभ नहीं किया अभी मैं क्या करूं या तो शुप बनाऊं या क्लास में आऊ आपका काम छोड़ कर के आपका क्लास अटेंड करना यह तो मुझे ठीक नहीं लग रहा है तो स्वामी जी ने भी सोचा कि बात तो सही है तो स्वामी जी ने क्या कहा डोंट वरी आई विल मेडिटेटर यू मैं तुम्हारे लिए ध्यान करूंगा इसके बाद में एलिस वहां किचन में यह सूप बना रही है और स्वामी जी क्लास में बैठ कर के इनको राजयोग सिखा रहे हैं राजयोग सिखाते सिखाते स्वामी जी खुद ध्यान मग्न हो गए अभी जितने भी वो क्लास में स्टूडेंट्स बैठे हैं वे लोग भी ध्यान कर रहे हैं स्वामी जी भी ध्यान कर रहे हैं किंतु जो स्वामी जी का जो ध्यान का पावर है वो इतना मतलब धीरे-धीरे करके आध्यात्मिक एकाग्रता एक प्रोफाउंड पीस और ब्लेसेडनेस जैसे कि चारों और प्रवाहित होने लगा यहां पर एलिस खाना बना रही है एकाएक उसको ऐसा महसूस हुआ कि स्वामी जी सही सही उसके लिए ध्यान कर रहे हैं और उनका जो ध्यान की जो शक्ति है उसकी की ओर में वो प्रवाहित कर रहे हैं और इसको पाक के एलिस के मन में एक ऐसी अनंत आनंदमय शांति फैल गई वो बना रही है खाना किंतु यहां पर उसका मन जैसे कि एकदम स्थिर हो गया निवाद निष्कपट शिखा की तरह जैसे कि वो सही सही खाना नहीं बना रही किंतु ध्यान कर रही है और यह जो प्रोफाउंड ध्यान का जो अनुभव था वो पूरा उसने आखिर जीवन के आखिरी तक उसने इस बात को याद रखा है बाद में भी जब स्वामी अशोकानंद जी वहां पर गए थे स्वामी अशोकानंद जी के बारे में तो हमको पता है वह प्रबुद्ध भारत के वह एडिटर थे और मायावती में रहते थे प्रबुद्ध भारत एडिट करते थे और महात्मा गांधी का यह जो फ्रीडम मूवमेंट असहद आंदोलन चल रहा था उसके विरोध में उनका काफी एक स्ट्रांग मत था तो अपने बेलूरमठ वालों को थोड़ा सा डर लग गया कि महात्मा गांधी तो इतने पॉपुलर है अभी उनका विरोध करने से पता नहीं कि हम लोग कहीं अन पॉपुलर ना हो जाए तो उन्होंने अशोकानंद जी को कैलिफोर्निया भेज दिया था तो बा अशोकानंद जी कैलिफोर्निया आए और फिर उन्होंने यह मेरी लुईस को कहा कि तुम अभी यह सब डिस्कवर अभी जो यह जो यह है रिसर्च चालू करो स्वामी जी के जीवन में उसी रिसर्च के दौरान पता चला था कि एलिस हेंस ब्रो जो कि स्वामी जी को ना 18990 बात होगी 19 1930 ना कि 40 के दशकों की तो अभी अभी भी जीवित है और उसकी मेमोरी एकदम शार्प है स्वामी जी के साथ में बिताए हुए दिनों की तो इमीडिएट अशोकानंद जी ने एलिस हैंस ब्रो का संपर्क किया और कहा कि हम आपके रेमसंस लिपिबद्ध करना चाहते हैं नोट डाउन करना चाहते हैं तो एलिस ने भी बड़ी खुशी से अपने पुराने दिनों की संस्मरण स्मृतियां उन्होंने बोलना शुरू किया और यहां पर अशोकानंद जी उसको लिपिबद्ध कर रहा है तो उस समय 3040 साल के बाद में यह एलिस हेंस ब्रो कहती है यह घटना का विवरण देकर के कि मुझे लगता है कि स्वामी विवेकानंद अभी भी मेरे लिए ध्यान कर रहे हैं इतना क्योंकि वह खुद इतना ध्यान नहीं कर पाती थी और एक दिन की बात है वहीं टर्क स्ट्रीट फ्लैट में ही कि व एक दिन बड़ी मायूस होकर के बैठी थी कोई भी कारण होगा स्वामी जी भी एक कारण हो सकते हैं क्योंकि स्वामी जी जब किसी भी छोटी चीज में नाराज होक के डांटना शुरू करेंगे तो फिर वह डांट सुनना बड़ा मुश्किल है तो हो सकता है स्वामी जी ही कारण हो या कोई भी कारण हो थोड़ी सी मायूस होकर के डिप्रेसो करर के बैठी थी और स्वामी जी ने उनको देखा कि ये थोड़ी डिप्रेसो मिलकर के ध्यान करते हैं तुम्हारा डिप्रेशन चला जाएगा तो एलिस कहती है कि स्वामी जी मैं तो ध्यान नहीं कर सकती मुझे ध्यान का ऐसा कोई अनुभव नहीं कोई प्रैक्टिस नहीं तो स्वामी जी कहते हैं अच्छा ठीक है मेरे साथ में बैठो मैं ध्यान करता हूं तो ठीक है स्वामी जी के साथ में वोह बैठी है यहां पर स्वामी जी बैठे हैं स्वामी जी ध्यान कर रहे हैं स्वामी जी ध्यान कर रहे हैं किंतु शांति और एक जो एक एकाग्रता और एक जो आध्यात्मिक अनुभूति होनी चाहिए वह हो रहा है एलिस को वो कहती है कि मेरा मन ऐसे जैसे कि आध्यात्मिक राज्य के एक के बाद एक उच्च से उच्चतर शिख प आरूढ़ होना शुरू हुआ जैसे लगता है कि जीवन के जितने भी दुख दर्द है जन्म जन्मांतर से जो भी क्लेश लेकर के हम लोग आए हैं वह सब कहां दूर हो गए समझ में नहीं आ रहा तो यह एलिस हेंस ब्रो का अनुभव था स्वामी जी के साथ में ध्यान करने का अच्छा यह जो कैलिफोर्निया का का ये सन फ्रांसिस्को का कार्य समाप्त हुआ इसके बाद में स्वामी जी ने कहा कि अभी मैं यह न्यूयॉर्क जाऊं अभी आपको पता होगा अमेरिका का नक्शा देखा होगा तो ईस्ट कोस्ट पे यह न्यूयॉर्क बोस्टन वगैरह आता है जहां पर स्वामी जी ने पहली मुलाकात में वहां पर रुके थे और ज्यादातर डिसाइल वहीं पर थे और न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी स्वामी जी ने वहीं पर प्रारंभ की थी और कैलिफोर्निया है अमेरिका के वेस्ट कोस्ट पे जहां प ये लॉस एंजलिस और सैन फ्रांसिस्को शहर है अभी यह लॉस एंजलिस से न्यूयॉर्क आना यानी कि अमेरिका के वेस्ट को कोस्ट से ईस्ट कोस्ट की ओर आना तो स्वामी जी ने कहा कि अभी मैं भारत फिरूं लौटू और भारत लौटने के लिए पहले न्यूयॉर्क जाऊं न्यूयॉर्क से यूरोप होकर के पूरा भ्रमण करते-करते भारत लोटू यह जो इजिप्त होकर के ये जो वहां से तो इससे पहले थोड़ा सा मैं विश्राम करना चाहता हूं तो फिर यह ठीक किया गया कि वहां पर कैंप टेलर बोलकर के एक जगह है जहां पर लोग कैंपिंग करने के लिए जाते अभी नेचरली अमेरिका में आप जिस जगह पर कैंपिंग करने के लिए जाएंगे उसका जो प्राकृतिक सौंदर्य होगा उसका तो वर्णन करते-करते आप थक जाएंगे उसको तो आपको वहां जाकर के सही में अनुभव करना पड़ेगा तो बड़ी ही सुंदर प्राकृतिक रमणीय जगह थी यह कैंप टेलर वहां पे स्वामी जी अपने डिसाइल्स के साथ में गए रहने के लिए कुछ दिन विश्रांति से बिताने के लिए उसमें यह डिसाइल्स में एलिस हेसब थी आइड अनसेल थी यह मिस लीडिया बेल जो कि वहां पर जो होम ऑफ ट्रुथ में वह जो कार्य करती थी वह थी ऐसे तीन-चार लेडी डिसाइल्स थे स्वामी जी के तो सब जाकर के कैम टेलर में रह रहे हैं अभी वहां की यह जो घटनाएं है कैम टेलर की उसका वर्णन भी आडा अनसेल और यह एलिस हेंस ब्रो ने किया है वे लोग कहती है कि जब रात को पूरा प्रकृति शांत हो जाएगा और यह जो वृक्ष से चारों ओर से ये तो घिरे हुए हैं तो और रेडवुड बोलकर के वृक्ष वहां पे होते थे रेडवुड अर्थात कि दुनिया का सबसे बड़ा वृक्ष उसका साइज मैंने पहली बार इसका नाम सुना था तो मैंने सोचा थोड़ा इंटरनेट प सर्च करके देख लूं कि किस तरह का है अरे बाप रे उसका साइज देख कर के मैं आश्चर्य जकित हो गया 10 आदमी ना 20 आदमी ऐसा करके ऐसा खड़े रहेंगे दोनों हाथ फैला कर के तब कहीं जाकर के वो रेडवुड का पूरा इसको सर्कल कर पाएंगे इतना विराट इसका यह है वृक्ष इतना ऊंचा उठता है इतना बड़ा है तो यह रेडवुड के वृक्ष थे वहां पर बीच में यह लोग जैसे कि धुनि ज प्रज्वलित करके ध्यान कर रहे हैं तो मैं ऐसा लग रहा है जैसे कि भारत के यह जो पुराने वैदिक युग के आश्रमों में ऋषि मुनि जिस तरह से धुनि प्रज्वलित करके जंगल के वन और वृक्षों के बीच में प्राकृतिक रमणीय शोभा के मध्य में बैठ करके विराजित होकर के जो लोग जब ध्यान ब्रह्मानंद प्राप्त किया करते थे ब्रह्म का अनु द्या किया करते थे आत्मा का संधान किया करते थे ऐसे ही जैसे कि आधुनिक युग में यह आधुनिक ऋषि अपने आज के डिसाइल्स के साथ में वही वन में बैठ कर के फिर से वही वैदिक युग के ध्यान साधना और आध्यात्मिकता के प्रवाह को पुनः जागृत किए हैं तो वहां पर यह लोग गए कैंप टेलर में रात को धुनि प्रज्वलित करके ध्यान कर रहे हैं और वह जो आनंद इन लोगों के मन में है उस आनंद का वर्णन भी कैसे करना तो स्वामी ये ंस ब्रो कहती है कि स्वामी जी जब इस तरह से ध्यान में बैठते थे तो ऐसा लगता था जैसे कि यह मार्बल का एक स्टैचू है एक संगे मरमर की एक मूर्ति है एकदम स्थिर होकर के बैठे हैं और जैसे कि बिल्कुल उनके शरीर में किसी भी तरह का कंपन या ध्रु जारी नहीं है अभी यह आइड अनसेल कहती है उसने वह जो डिस्क्रिप्शन लिखा है उसका थोड़ा सा दो-तीन लाइन में पाठ करता हूं आइड अनसेल कहती है आई क्लोज माय आइज एंड सी हिम स्टैंडिंग देयर इन द सॉफ्ट ब्लैकने विथ स्पार्क्स फ्रॉम द ब्लेजिंग लोक फायर फ्लाइंग थ्रू इट एंड अ डे ओल्ड मून अबाउ मैं जब अपनी आख आख बंद करती हूं तो फिर से मुझे वही स्वामी जी का दर्शन होता है कि वह जो धुनि यह जो धुनि जलाई गई है उसमें से ये जो चिंगारियां है वो चिंगारियां जैसे कि चारों ओर उड़ रही है आकाश में सुंदर एक चांद उगा है चांद दिख रहा है और इसके आलोक में इसकी ज्योति में स्वामी जी वहां पर खड़े हैं जैसे कि वही ऋषि मुनि फिर से भारत के वापस आ गए हो वी है हैड ग्लोरियस मेडिटेशन अराउंड द केम फायर हमारा इस धुनि के आसपास में जो हम ध्यान करते थे उसका अनुभूत उसकी अनुभूतियां वर्णन करना असंभव है ग्लोरियस मेडिटेशन भव्य ध्यान में हम लोग डूब जाते थे तो स्वामी जी एक बार क्या कहते हैं यू मे मेडिटेटर व्हाट एवर यू विश तुम लोगों को जिस ऑब्जेक्ट के ऊपर में जिसके ऊपर में ध्यान करना है करो जिस देवी देवताओं के ऊपर में यदि ओमकार के ऊपर में ध्यान करना है करो बट किंतु मैं आई शैल मेडिटेटर द हार्ट ऑफ अ लायन ट गिव्स स्ट्रेंथ किंतु मैं सिंह के हृदय के ऊपर में ध्यान करूंगा क्यों क्योंकि इससे अनंत शक्ति प्राप्त होती है आइड अंसेल लिखती है इसके सामने कि इट वाज ए नेवर टू बी फॉरगॉटेन नाइट वो जो रात थी उसको हम अपने जीवन में कभी भी नहीं भूल पाएंगे तो प्रोफ ंड स्टिलनेस ऑफ द फॉरेस्ट द ब्यूटी ऑफ द फायर एंड मोस्ट ऑफ ऑल स्वामी सिरिन एंड मैजेस्टिक एविडेंस वेरी हैप्पी टू बी देयर फ्री फ्रॉम लेक्चर एंड क्राउड्स ऑफ पीपल दो ही वाज टायर्ड एंड नीडेड ए रेस्ट हाउ अन अन अटर बली ग्रांड ही वाज वो एक ऐसी रात थी जिसको हम कभी भी नहीं भूल पाएंगे जो प्रचंड शांति उस वन में छाई हुई थी यह जो धुनि की जो ये धुनि का सौंदर्य था और सबसे ज्यादा तो स्वामी विवेकानंद सिरिन एंड मैजेस्टिक प्रशांत और भव्य एविडेंस वेरी हैप्पी टू बी देयर इतने खुश थे क्योंकि ये लेक्चर वगैरह देना समाप्त हो गया था और स्वामी जी का खुद का यह जो परिव्राजक का जो नेचर था कि गांव गांव शहर शहर घूमना वन में खेत में झोपड़ियों में रहना लोगों के साथ में बिना किसी फिक्र के आपका नेक्स्ट खाना कहां से आएगा अगले इस रात को कहां पर सोएंगे वो कुछ ठिकाना नहीं कहां पर रहेंगे कहां पर जाएंगे क्या खाएंगे सब ईश्वर भरोसे अपना हृदय मन प्राण सब कुछ जैसे कि उन्होंने शरणागत कर दिया हो वही ईश्वर को और बिल्कुल निसंग निसल होकर के भारत में जो भ्रमण करते थे वही स्वामी जी जैसे कि वापस आ गए अमेरिका में जाने के बाद में तो उनको फाइट करना पड़ा था ये मिशनरियों के साथ में जो लोग स्केप्टिक थे जो लोगों को डर लगता था कि यह भारतीय हिंदू आकर के हमारे लोगों को करप्ट कर देगा यह जो सब डर लगता था जिनको उनके साथ में स्वामी जी को काफी फाइट करनी पड़ी थी किंतु वह जो फाइट थी वह समाप्त हो गई युद्ध समाप्त हो गया यह कुरुक्षेत्र में युद्ध समाप्त होने के बाद में भगवान श्री कृष्ण के पैरों के पास में चरण युगल के पास में अर्जुन शांति से बैठकर ध्यान रत है ऐसा एक चि यहां पर हमको दिख रहा है कि कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो गया है युद्ध में विजय प्राप्त हो गई है अभी स्वामी जी फिर वही वही नरेण स्वामी जी एक पत्र में जोसेफाइन मैक्लाउड को लिखते हैं यही कैलिफोर्निया से ही लिखते हैं कि बस मैं फिर वही नरेण हो गया हूं जो कि पंचवटी में मंत्र मुग्ध होकर के ठाकुर की वाणी का श्रवण किया करता था फिर से मैं वही नरेण हो गया हूं भारत के खेतों में भारत के मैदानों में वन में नि संबल होकर के बिल्कुल सहाय होकर के घूमता रहता था वही नरेण फिर से यहां पर स्वामी जी यहां पर फिर से वही नरेण हो गए सब जितना भी युद्ध करना था जितना वेदांत की स्थापना करनी थी ठाकुर का मैसेज फैलाना था सब जैसे कि समाप्त हो गया और बस और स्वामी जी कहते क्या है वी एंड लाइफ इन द फॉरेस्ट एज वी बिगिन इट हम वन में ही अपना जीवन प्रारंभ करते हैं और वन में ही इसको समाप्त करते हैं बट व्ट ए वर्ल्ड ऑफ एक्सपीरियंस लाइ बिटवीन द टू स्टेट्स किंतु इन दोनों के बीच में कितना एक पूरा विश्व का अनुभव हमको प्राप्त होता है देखिए यह बड़ा ही प्रोफाउंड स्टेटमेंट है स्वामी जी कहते हैं वन में ही हमारा जीवन प्रारंभ होता है वन में ही समाप्त होता है किंतु यह जीवन का प्रारंभ और समाप्ति इन दोनों के बीच में पूरा जगत का अनुभव हम ग्रहण करते हैं तो प्रश्न होगा कि कहां मैं तो कोई वन में मेरा तो जन्म नहीं हुआ और मुझे नहीं लगता कि मेरा मृत्यु भी वन में होगा जद मेरा मृत्यु होगा आशा रखता हूं कि बेलूर मठ में होगा और बेलूर मठ में वहां पर गंगा के किनारे मृत साधुओं की चिता प्रज्वलित होती है तो मैं आशा रखता हूं कि मुझे भी वह सद्भाव प्राप्त होगा बेलूर मठ में मेरी चिता जल तो कहां मैं वन में से आया हूं कहां मैं वन में वापस जाने वाला हूं किंतु यहां पर स्वामी जी देखिए थोड़ा सा गहराई से सोचेंगे तो स्वामी जी सिर्फ एक व्यक्ति के बारे में नहीं पूरी सिविलाइजेशन के बारे में कह रहे हैं जब हम यह जो आदि मनुष्य थे जंगल में घूमते थे शिकार करते हुए हंटर गैदरर ट्राइब्स वह जो अपना यह जो था स्टेटस उस समय का यह जो शिकार कर लिया यह फल मूल वगैरह चुन लिए और फिर वहां पे वो धुनि जला करके हम लोग वहां पर उसके सामने बैठ कर के खा रहे हैं यह मनुष्य सभ्यता का प्रारंभ है इसके बाद में धीरे-धीरे एग्रीकल्चर प्रारंभ हुआ तो हमने छोटी-छोटी वसाहत बना ना शुरू किया छोटे-छोटे गांव बनने शुरू हुए बीच में गांव है और चारों ओर खेत है य कामर पुकुर का वर्णन स्वामी शारदानंद जी महाराज यह लीला प्रसंग में करते हैं वह गांव कैसे दिखते हैं पता है यह जो छोटे-छोटे गांव है और विराट विशाल खेतर है खेत है चारों ओर ये खेत में यह जो धान का यह जो यह है क्रॉप यह धान के ये जो पौधे वो ऐसे लहरा रहे हैं हवा में जैसे कि यह ग्रीन कलर का हरे कलर का समुंदर हो समुंदर में जैसे लहरें दिखती है ना तो वैसे ही यह जो धान के खेत होंगे हरे हरे धान के पौधे हजारों लाखों करोड़ों की संख्या में वो ऐसे लहराएंगे पवन में जैसे लगेगा कि हरे कलर का यह समुंदर हो और उसमें छोटे-छोटे गांव जैसे कि लगेगा कि इस हरे समुंदर के बीच में यह छोटी-छोटी नौका एं तैर रही है एक सुंदर पोएटिक वर्णन शारदानंद जी ने किया है तो यह हमारा पहला स्वरूप था हमारे सिविलाइजेशन का कि हां छोटे-छोटे गांव बने चारों ओर खेत है उसके बाद में और थोड़ा सा एडवांस हुए हम लोगों ने सिटी स्टेट बनाना प्रारंभ किया उसके बाद में अंपायर्स बनने शुरू हुए अंपायर्स के बाद में रिपब्लिक बने रिपब्लिक में भी फिर धीरे-धीरे करके ये इंडस्ट्रियल एज का प्रारंभ हुआ बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगाई गई धुएं से पूरा आसमान काला होने लगा और उसके बाद में ये डिजिटल रेवोल्यूशन आया यह जो मैन्युफैक्चरिंग और एयर पोल्यूशन धीरे-धीरे करके कम होने लगे अभी मैं भारत की बात नहीं कर रहा अभी एक डिवटी के साथ बात हो रही थी कहा दिल्ली में इतना पोल्यूशन है कि सांस लेने में भी तकलीफ है हम भारत अभी भी इंडस्ट्रियल एज में जी रहा है किंतु इवन चाइना को देखिए अमेरिका को देखिए यह जो एयर पोल्यूशन पोल्यूशन इन जनरल के बारे बारे में ये लोग बड़े सतर्क है और यह जो मैन्यूफैक्चरिंग और ये इंडस्ट्रियल एज को छोड़ कर के उनका इकोनॉमी अभी डिजिटल एज की ओर जा रहा है अमेरिका में देखेंगे खास करके बड़े-बड़े शहरों में से लोग अभी बाहर निकल करके यह सर्ब में जाना शुरू किए हैं क्यों सर्ब में कि वहां पे प्राकृतिक सौंदर्य होता है हवा पानी फ्रेश मिलता है सिटी का यह जो हलचल नॉइस पोल्यूशन वगैरह नहीं रहता शांति से आप जी सकते हैं तो ये सर्ब में जाना शुरू किया और अभी और भी ज्यादा एडवांस टेक्नोलॉजी होती गई खास करके पडेम के बाद में तो वर्क फ्रॉम होम क्योंकि अभी कंप्यूटर ऑनलाइन आप सब कुछ कहां पर भी बैठ कर के कर सकते हैं जैसे कि अपना क्लास ही हम ले रहे हैं मैं बैठा हूं साउथ इंडिया में कोई है ईस्ट इंडिया में कोई वेस्ट इंडिया में है तो कोई नॉर्थ इंडिया में तो यह जो डिजिटल टेक्नोलॉजी के माध्यम से हम पूरे विश्व में कहां पर भी बैठ कर के कार्य कर सकते हैं आपको वह बड़े-बड़े सिटी में बैठ कर के वह भीड़भाड़ के भीतर में ट्रैफिक नोइज पोल्यूशन उसके भीतर में जाकर के रहने की जरूरत नहीं तो अमेरिका में खास करके ये जो बड़ी-बड़ी कंपनियां है मने मल्टीनेशनल उनके बहुत सारे एंप्लॉई क्या प्रेफर करते हैं किसी सुंदर रमणीय जगह पे जाकर के रहे कोई तीर्थस्थान जैसा हो स्पिरिचुअल हो मोनेस्ट्री हो वहां पे जा करर के रहे और वहां पे लैपटॉप ले जाएंगे और वहीं से सब काम करेंगे तो देखिए कि जद यह ट्रेंड और आगे चलता है तो अपनी इकोनॉमी जो है वो यह पोस्ट इंडस्ट्रियल एज से निकल कर के यह डिजिटल की ओ फिर यह डिजिटल से भी ज्यादा मुझे ऐसा लगता है कि देयर विल बी अ स्पिरिचुअल एज ऑफ इकोनॉमी अभी हम ऐसा करते हैं कि अपना यह बिजनेस है इकोनॉमिस से उसको सेपरेट रखते हैं स्पिरिचुअलिटी को सेपरेट रखते हैं मुझे ऐसा लग रहा है कि एक ऐसा युग आएगा जबकि स्पिरिचुअलिटी विल कवर एवरी एस्पेक्ट ऑफ ह्यूमन सिविलाइजेशन वह सिर्फ अपना आंतरिक कॉन्शियस निस के सीमित नहीं रहेगा अपनी इकोनॉमी अपना पॉलिटिक्स अपना सोशियोलॉजी जितने भी एस्पेक्ट है साइंस टेक्नोलॉजी एवरीथिंग विल बी एनवेलप्ड बाय स्पिरिचुअलिटी तो फिर से ऐसा होगा कि हाईएस्ट लेवल ऑफ सिविलाइजेशन पर जाकर के हम फिर से वही प्राकृतिक आनंद के बीच में जाकर के रहना शुरू करेंगे तो दिस इज द प्रोफाउंडनेस ऑफ स्वामी जी स्टेटमेंट वी बिगिन अवर लाइफ इन अ फॉरेस्ट एंड वी एंड इट देयर आल्सो एंड सो और यह था पूरा की कैंप टेलर में आइड अनसेल लिखती है आई कैन नॉट रिमेंबर द डिटेल्स ऑफ सेड स्वामी जी जो कुछ कहते थे वह सब इतना प्रोफाउंड था और इतने सारे उनके आइडियाज थे वो सब कुछ तो लिपिबद्ध करना संभव नहीं तो वह कहती है कि आई कैन नॉट रिमेंबर ऑल द डिटेल्स बट आई कैन स्टिल फील द ग्रेट पीस एंड पावर ऑफ अवर मेडिटेशन दैट नाइट व्हेन एवर आई थिंक ऑफ इट मुझे सब कुछ तो याद नहीं है कि स्वामी जी ने उस उच्च आध्यात्मिक स्टेट में जाकर के स्थित होकर के क्या-क्या कहा किंतु मुझे एक चीज याद है वो क्या है ग्रेट पीस एक प्रोफाउंड क्वाट अपना मन एक गहन शांति से भर गया हो वो और पावर ऑफ अवर मेडिटेशन माने जिस घनता से हमने ध्यान करने में सक्षम हुए उस रात को वो दो चीज मुझे याद है स्वामी जी कहते हैं कि तुम लोगों को जिस चीज के ऊपर में ध्यान करना हो करो मैं सिंह के हृदय के ऊपर में ध्यान करता हूं और सिंह के हृदय के ऊपर में ध्यान करके स्वामी जी का ध्यान इतना पावरफुल हो गया कि आसपास में जितने लोग बैठे थे सबका ध्यान भी उन्हीं के ध्यान की वजह से गहन से गहन तर होता गया तो देखिए कि ये जो ग्रेट जो साधक होते हैं सिद्ध होते हैं संत महात्मा होते हैं उनके साथ में ध्यान करने का एक बहुत बड़ा यह एक बेनिफिट है हम लोग जब ट्रेनिंग सेंटर में थे तो हम लोगों का ऐसा था कि वहां पे सुबह को मंगल आरती तो मंदिर में अटेंड करना है किंतु मंगल आरती के बाद में ना संध्या आरती संध्या आरती तो हमको मंदिर में अटेंड करना है किंतु संध्या आरती के बाद में ट्रेनिंग सेंटर का जो बिल्डिंग है बेलूरमठ में वहां पर वापस आ जाना है वहां पर एक बहुत बड़ा हॉल है प्रेयर हॉल वहां पर सबको बैठ कर के एक साथ में ध्यान करना है एक घंटा डेढ़ घंटा दो घंटा जितना हमसे संभव हो तो उस समय हमारे जो प्रिंसिपल महाराज थे उन्होंने एक आचार महाराज को कहा था कि आप भी इन ब्रह्मचार्य के साथ में बैठ कर के ध्यान किया कीजिए तो अभी मैंने जब यह सुना उस महाराज को आते हुए आचार्य महाराज को हमारे साथ में बैठते हुए देखा मैंने कहा कि इन लोगों के ऊपर में यह सब य कंपलसरी बनाना क्यों हमारे लिए कंपलसरी है ध्यान ब्रह्मचारी के लिए किंतु आप जब ब्रह्मचारी के बाद में सन्यासी हो जाते हैं तो कोई फिर आपको यह नहीं कहेगा कि इस समय बैठिए इस समय ध्यान कीजिए यू आर फ्री जब भी ध्यान करना चाहे कर सकते हैं तो इन महाराज को ऐसा क्यों कहा प्रिंसिपल महाराज ने कि आप जाकर के इनके साथ में ध्यान कीजिए फिर बाद में मुझे पता चला कि जिन आचार्य महाराज को हमारे प्रिंसिपल महाराज ने कहा था वह आचार्य महाराज काफी समय नर्मदा के किनारे बिता चुके थे और मने 10 साल से भी ज्यादा समय वो नर्मदा के किनारे प ही रहते थे वहीं प साधन भजन किया और फिर वहां से अपने संघ में वापस आए थे फिर उनको ट्रेनिंग सेंटर में आचार्य बनाया गया था तो देखिए कि उनका जो जब ध्यान करने का अनुभव है अभी वह बैठ कर के बताने की जरूरत नहीं है कि यह जो ध्यान की पद्धति है आप इस तरह से ध्यान कीजिए किंतु ये जो महापुरुष होते हैं जो लोग ध्यान सिद्ध होते हैं उनके साथ में बैठ कर के ध्यान करने से उनके ध्यान का प्रभाव हमारे ध्यान पर होता है और यह बात यहां पर हमको पढ़ कर के यह बात मालूम होती है और देखिए उस समय स्वामी जी की क्या परिस्थिति थी स्वामी जी उस समय सिस्टर क्रिस्टीन को एक पत्र लिखते हैं पत्र में स्वामी जी क्या लिखते हैं आई एम द इनफाइनों मेरे ऊपर शायद हो सकता है छा जाए बीच-बीच में किंतु फिर भी इन बादलों से परे अनंत नील आकाश जो है वही मैं हूं यह वो दिन जबकि स्वामी जी का मिशन पृथ्वी पर समाप्त हो गया है और वह महासमाधि की ओर जा रहे हैं भारत में आएंगे कुछ साल दो डेढ़ साल वह रहेंगे जि जिंदा जीवित रहेंगे 1902 में उनका देह त्याग होगा फर्थ जुलाई को और यह लेटर लिखे गए हैं 18993 साल ही ज्यादा से ज्यादा बचा हुआ है उस समय स्वामी जी कहते हैं कि आई एम द मैं वही अनंत नील आकाश हूं बादल उसके ऊपर में मंडरा आएंगे बीच-बीच में कभी-कभी हताशा आ जाएगी कभी-कभी क्रोध आ जाएगा और खास करके अपने गुरु भाइयों के ऊपर में स्वामी जी की इच्छा थी कि रामकृष्ण मिशन बेलूरमठ की जो स्थापना हुई है उसको जल्दी से जल्दी एक बड़ा ही एक अच्छे से वो एक कॉर्पोरेट स्वरूप धारण कर ले और फिर ऑर्गेनाइज पक्का हो जाए उसके अकाउंट है उसकी एक्टिविटी से बड़ी ही सिस्टेट हो जाए एक के बाद एक यंग लोगों को वह इंडक्ट करना और ट्रेनिंग करना शुरू कर दे भर्ती करना साधु ब्रह्मचारी के रूप में ट्रेनिंग करना और पूरे भारत में जहां-जहां पर रिलीफ की जरूरत है जहां पर भक्तों को आध्यात्मिक चेतना उपदेश देने की जरूरत है वहां पर उनको भेजना शुरू हो जाए पूरे विश्व में भारत में ही क्यों तो वह स्वामी जी की इच्छा इतनी प्रबल थी और उनके गुरु भाई थे नेचुरली वैसे स्वामी जी के जितना उनका नॉलेज भी नहीं स्वामी जी के जितना उनका प्रतिभा भी नहीं तो अपने हिसाब से कर रहे थे तो स्वामी जी बड़े-बड़े ना उनके ऊपर में बड़े ही नाराज हो जाते थे और ऐसी गाली देते थे बीच-बीच में कि वो उनके अलावा और कोई सहन नहीं कर पाता था एक बार की बात है शरत महाराज शरत महाराज अर्थात स्वामी शारदानंद रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम जनरल सेक्रेटरी तो उनको स्वामी जी किसी बात को लेकर के डांट रहे हैं और जो स्वामी जी की डांट जो सुनेगा कच्चा पच्चा वो होगा आदमी उसका हार्ट फेल हो जाएगा तो शरत राज चुपचाप बैठे हैं मुंह में से एक अक्षर नहीं बोल रहे हैं बुरा तो बड़ा लग रहा है स्वामी जी की डांट सुननी पड़ रही है किंतु साथ में हृदय में यह भी विश्वास है कि स्वामी जी उनको प्रेम करते हैं बोलकर के उनको डांटते हैं जिससे कि इस तरह की गलतियां भविष्य में ना दोहराए रामकृष्ण संघ की जो प्रतिष्ठा है उसके ऊपर में किसी तरह की आंच ना आए इसके लिए स्वामी जी उनको डांट रहे हैं चुपचाप सुन रहे हैं उसमें एक डिवोटा आ गया ठाकुर का पुराने दिन का एक भक्त आ गया तो अब जैसे ही डिवटी आता है स्वामी जी ने अपना क्रोध संवरण कर लिया एकदम शांत हो गए फिर उसको बड़ा ही प्रेम पूर्वक बिठाया आइए आइए बैठिए महाशय कैसे हैं वगैरह वगैरह किसी को बोला कि अरे जाओ चाय लेकर के आओ और शरत महाराज भी बढ़िया आनंद से उस डिवोटा के साथ में बात कर रहे हैं जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं है चाय आई बिस्किट आया तो शरद महाराज को भी चाय दी गई चाय पी रहे हैं बिस्किट खा रहे हैं बढ़िया आनंद करके बातें कर रहे हैं स्वामी जी के साथ में डिवटी के साथ में और जैसे ही ये डिवटी खड़ा होकर के गया फिर से स्वामी जी ने डांटना शुरू किया और फिर से शरत महाराज चाय का गिलास साइड में रख कर के चुपचाप सुन रहे हैं तो आखिर में स्वामी जी परे नाराज हो गए उनके ऊपर में पहले तो गुस्सा थे अभी तो बिल्कुल मतलब ये हो गए अरे तुम्हार तो तोर तो माछ रक्त तुम्हारा तो मछली का रक्त है मछली का रक्त ना कभी गर्म नहीं होगा यानी कि मछली को कभी गुस्सा नहीं आएगा तो तुम्हारा खून इतना ठंडा है तुमको गुस्सा भी नहीं आता मैं इतना डांट रहा हूं बोलकर के स्वामी जी परेशान होकर के वहां से चल गए तो खैर यह तो शरत महाराज थे उनकी डांट सुन लेते थे स्वामी जी को बुरा भी बहुत लगता था जब भी अपने गुरु भाइयों को डांटते थे कुछ भी उनको डिसिप्लिन करने की बात है ये बाबूराम महाराज राम कृष्ण बेलूरमठ में नियम बनाया है स्वामी जी ने कि अर्ली मॉर्निंग आपको दिन के दौरान आपको सोना नहीं है सुबह को उठकर के जब ध्यान करना है फिर दिन में काम करना है दिन के दौरान सोना नहीं है यह जो दिन के समय में सोना यानी कि वो बड़ा ही तामसिक वो हो जाएगा अपना स्वभाव तो स्वामी जी ने नियम बनाया अभी एक दिन क्या हुआ बाबूराम महाराज थके होंगे बीमार होंगे जो भी है दिन के समय सो रहे थे तो स्वामी जी का एक चेला होगा वहां पे वो जैसा होता है चेलों का आकर के स्वामी जी को स समाचार दे दिया कि महाराज स्वामी जी देखिए बाबूराम महाराज खाट के ऊपर में सोए हुए हैं अभी दिन का समय आपने नियम बनाया तो स्वामी जी ने कहा एक काम करो जाओ उसके पैर खींच कर के उसको खाट के ऊपर में से नीचे गिरा दो तो ये गया साधु और महाराज सोए हुए बाबूराम महाराज अर्थात की स्वामी प्रेमानंद रा बेलूर मठ के मैनेजर राजा महाराज यानी कि स्वामी ब्रह्मानंद थे प्रेसिडेंट और स्वामी प्रेमानंद थे बेलूरमठ के मैनेजर और ठाकुर के अतिव प्रिय पात्र ठाकुर ने कहा था कि वह ईश्वर कोटि में से एक है छह ईश्वर कोटि को ठाकुर ने संगीत किया था उसमें से एक थे बाबूराम महाराज स्वामी प्रेमानंद इतनी उच्च आध्यात्मिकता थी उनके भीतर में किंतु फिर भी जब नियम है तो सबके लिए है तो ये दो दिन का साधु आया है अभी उसको कुछ पता भी नहीं ना ही ठाकुर कौन है स्वामी जी की महत्ता क्या है बाबूराम महाराज की महत्ता क्या है कुछ नहीं और स्वामी जी ने जैसे ही कहा पैर खींच कर के खाट के ऊपर में से उनको नीचे गिरा दो तो पैर पकड़ कर जोर-जोर से खींच रहा है तो बाबूराम महाराज की आंख खुल गई चिल्ला उठे अरे क्या कर रहा है क्या कर रहा है मुझे गिराए क्या क् साधु तो सुन ही नहीं रहा है स्वामी जी का आदेश है पालन करना है तो क जोर करके खींचा बाबूराम महाराज ट के ऊपर में से नीचे गिरे और फिर वो दौड़ कर के चला गया सा व से अभी बाबूराम महाराज को पता चल गया कि कोई भी साधु ऐसा साहस करेगा व तभी करेगा जबकि स्वामी जी का आदेश तो वह भी चुपचाप स्वीकार कर लिए कि अच्छा ठीक है स्वामी जी ने ही नियम बनाया है कि दिन के समय में सोना नहीं है मैं सो रहा था तो अभी वह जो पनिशमेंट है वह मुझे मिली अभी ऐसा सोच कर के वह कुछ बोले नहीं वह जा रहे हैं कुछ कारण से स्वामी जी के कमरे के सामने से वह पसार हो रहा है स्वामी जी अपने कमरे में बैठे हुए थे जैसे ही किंतु उन्होंने बाबूराम महाराज को जाते हुए देखा एकदम जाकर के बाबूराम महाराज को आलिंगन कर लिया आलिंगन करके एकदम जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया कहने लगे कि अरे बाबूराम ठाकुर तुमको इतना प्रेम से रखते थे ठाकुर ने तुमको इतना प्रेम करते थे तुम्हारे महत्ता के बारे में हमको ठाकुर ने इतना सब कुछ बताया है और मैं कैसा पापी हूं कि तुम जैसे पवित्र ठाकुर के संतान को आज मैं पैर खींच कर के खाट में से नीचे गिरा दे रहा हूं अरे बाबू भाई मुझे माफ कर दो अ बाबूराम महाराज परेशान हो गए कि नरे स्वामी जी इतने रो रहे हैं इतने रो रहे हैं कितना देरी के बाद में उनको शांत किया तब कहीं जाकर के स्वामी जी अपने कमरे में जाकर के वापस बैठे तो देखिए यह जो पूरा संघर्ष था स्वामी जी के मन में चल रहा है किंतु यह संघर्ष हो गया था अभी समाप्त अभी उनका जीवन अस्ताचल की ओर जा रहा है उस समय यह जो सिस्टर क्रिस्टिन को पत्र लिखते हैं उसमें वह कहते हैं कि आज आई एम द इनफाइनों आएंगे आकाश को हो सकता है कुछ समय तक वो ढक दे जैसे कि स्वामी जी को कभी-कभी क्रोध आ जाता था कभी-कभी डिप्रेसो जाते थे कि ठाकुर ने मुझे इतना बड़ा काम दिया है मैं तो कुछ भी नहीं कर पा रहा हूं ना ही यह रामकृष्ण संघ का प्रचार जितना रेपिडली होना चाहिए उतना तो नहीं हो रहा है तो कभी-कभी डिप्रेसो जाएंगे कभी-कभी क्रोधित हो जाएंगे किंतु यह बादल जो है वह आकर के मंडराते हैं कुछ क्षणों तक कि और इस बादल के परे जो नील आकाश स्वरूप मेरा जो सही स्वरूप है वह तो वैसे का वैसा ही है आई एम ट्राइट गेट अ टेस्ट ऑफ दैट पीस व्हिच आई नो इज माय नेचर मेरा जो सही स्वभाव है अनंत आनंदमय सत चित आनंदमय जो मेरा स्वभाव है उस स्वभाव को मैं फिर से प्राप्त करने का प्रयास कर रहा हूं एंड इट इज माय नेचर एंड एवरीवनस नेचर सत चित आनंद मेरा ही नहीं सभी का स्वभाव सही स्वभाव वही है और वही स्वभाव की ओर वापस जाने का मैं प्रयास कर रहा हूं इस कुरुक्षेत्र के युद्ध समाप्त होने के बाद में दिस टन पोर्ट्स ऑफ बॉडीज एंड फूलिश ड्रीम्स ऑफ हैप्पीनेस एंड मिजी व्हाट आर दे यह जो पंच महाभूत के शरीर टन पोट्स ऑफ बॉडी अर्थात की यह जो पीतल के यह शीशे के यह जो सब शरीर है क्या है यह सब यह फलिश ड्रीम्स ऑफ हैप्पीनेस यह जो आनंद ये जो जी संसार में सुख प्राप्त करना है यह एक पागलपन वाला जो एक आईडिया है विचार है कि मुझे संसार में सुख प्राप्त करना है यह सपना कभी साकार होगा संसार में सुख प्राप्त करने का नहीं और यह मिजी और यह जो दुख कष्ट जीवन के क्या है यह सब व्ट आर दे माय ड्रीम्स आर ब्रेकिंग ओम तत्सत ओम ये जो सब मेरे सपने थे कि संसार को मैं जगत हिताय च आत्मानम शार्थ जगत हिताय च स्वामी जी कहते हैं कि जगत के हित के लिए रामकृष्ण संघ की स्थापना की गई है ये गरीब दुखी पद दलित भूखे ये पागल जिनको कि संसार ने ठोकर मार कर के बाहर निकाल दिया है समाज में से उनका कल्याण करने के लिए रामकृष्ण संघ की स्थापना हुई है किंतु संसार में सुख कहां है आप लोगों को जितना ही अन्नदान दे दीजिए कितना विद्यादान दे दीजिए स्कूल्स मेडिकल हॉस्पिटल्स वगैरह बना दीजिए यहां पर सीपी क्लीनिक है सेरेब्रल पाल्सी क्लीनिक मैं जाता हूं वहां पर बच्चों की अवस्था देखता हूं बाप रे फिजिकली और मेंटली दोनों पैरालाइज है अब उनके लिए हम जो चाहे वो कर जितना हो सकता है करते हैं किंतु अभी एक बच्चा ग्रेजुएट हुआ तो 10 बच्चे और दूसरे लाइन में खड़े हैं एडमिशन लेने के लिए अब कितने लोगों को सहाय करेंगे अल्टीमेटली तो मन को तृप्ति तभी मिलेगी जबकि हम अपना आनंद स्वरूप आत्मन साक्षात्कार करेंगे तब सिर्फ यह अन्न प्राप्त करके विद्या प्राप्त करके ना कि यह फिजिकल हेल्थ प्राप्त करके हमारे मन को कतई तृप्ति नहीं मिलने वाली तो इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि यह जो मैंने खो दिया था मेरा सही स्वरूप यह जो युद्ध करते करते उस सही स्वरूप को मुझे से प्राप्त करना है व्हाट आर दिस टीन पोट्स ऑफ बॉडीज टीन पोट य सुंदर शब्द माने यह जो तकला दी यह जो हमारे शरीर है फूलिश ड्रीम्स ऑफ हैप्पीनेस यह जो पागलपन जैसे हमारे दिवा स्वप्न कि संसार में सुख प्राप्त करेंगे एंड मिजी और यह दुख कष्ट क्या है यह सब माय ड्रीम्स आर ब्रेकिंग मेरे यह दिवा स्वप्न अभी चूर मर हो रहे हैं ओम तत्सत ओम और यह यह पत्र लिखा था सिस्टर क्रिस्टिन को अभी यही एक ही एक दूसरा पत्र लिखते हैं मेरी हेल को क्या लिखते हैं आई एम अटेनिंग पीस ट पास अंडरस्टैंडिंग जो मन वचन वाणी और कर्म के परे जो अनंत आनंद है उसको मैं फिर से प्राप्त कर रहा हूं वही कैलिफोर्निया से ही स्वामी जी लिखते हैं जबकि उनका कार्य समाप्त हो रहा है जीवन अस्ताचल की ओर जा रहा है उस समय दिस अनंत आनंद विच इज नादर जॉय नोर सोरो बट समथिंग अबाउ देम बोथ वो ना ही सुख है ना ही दुख है किंतु सुख और दुख के परे है जो अनंत आनंद आध्यात्मिक आनंद है व इंद्रिय जनित जो सुख और दुख है इन दोनों के कहीं परे है माय पासिंग थ्रू द वैली ऑफ डेथ फिजिकल मेंटल लास्ट टू इयर्स जज हेल्प मी इन दिस यह जो पिछले दो सालों से यह वैली ऑफ डेथ मृत्यु रूपी यह खाई से जो मैं गुजर रहा था उससे अभी मैं बाहर आ गया हूं देखिए यह जो स्वामी जी का जो संघर्ष था भारत में बेलूरमठ को स्थापित करने का और उसमें स्वामी जी को बार-बार लोगों से यह जो बिट्रेड बाजी कुछ-कुछ लोगों ने स्वामी जी के साथ में की तो स्वामी जी का हृदय विदीर्ण हो गया था यह जो कृपानंद बोलकर के वह लियोन लैंडसबर्ग स्वामी जी का अमेरिकन डिसाइल ना कि अभयानंद बोलकर के एक और एक डिसाइल थी फिर ये जो मिस मुलर थी फिर ये इटी स्टर्डी था इन लोगों ने स्वामी जी के साथ में जो दगाबाजी की है जो उनके पीठ में जो चाकू मारा है उस सबसे स्वामी जी का हृदय विदीर्ण हो गया भारत में उनकी धन पतियों के प्रति जो आशा थी कि रामकृष्ण मिशन को वो धन देंगे कार्य करने में सहाय करेंगे वहां पर भी बात करने वाले लोगों की कमी नहीं भारत में किंतु सपोर्ट कौन करेगा इस तरह के मिशन को तो उन सबसे जो स्वामी जी को एक क्या कहेंगे ही फेल्ट लेट डाउन उनको उनके प्रति एक जो एक निराशा उत्पन्न हो गई उनकी इस सबसे स्वामी जी कहते हैं कि आई हैव पास्ट थ्रू द वैली ऑफ डेथ जैसे मृत्यु रूपी खाई में से मैं पसार हुआ हूं किंतु अभी यह पसार होकर के अभी ये मेरा जो मन शांत हो गया है इस शांति की वजह से यह जो मेरा सही आध्यात्मिक स्वरूप है उसको प्राप्त करने में स्वीकार करने में उसको फिर से अनुभव करने में मुझे बड़ी सहाय हो रही है ऐसा कभी नहीं था कि स्वामी जी आध्यात्मिक ऊंचाई से कहीं नीचे आ गए थे हमको तो पता है कि उनको तो निर्विकल्प समाधि काशीपुर में ही प्राप्त हो गई थी किंतु ठाकुर ने क्या कहा मैं ताला मार कर के चाबी मेरे पास रखता हूं तो वो चाबी अभी ठाकुर ने फिर से खोल दी है वो ताला अभी फिर से खुल गया है काशीपुर में जो ताला लगा था वो ताला अभी ये कैलिफोर्निया में खुल गया है काशीपुर टू कैलिफोर्निया यह स्वामी जी की ये जो संपूर्ण जर्नी थी वो पूरी समाप्त हुई अभी फिर से युद्ध करने के बाद में मृत्यु रूपी खाई में से पसार होने के बाद में वही आनंद जो कि ठाकुर के पास उनको प्राप्त हुआ था उसकी ओर वोह जा रहे हैं नाउ आई एम यरिंग दैट पीस अभी मैं वह अनंत आनंद के पास में आ गया हूं द इटरनल साइलेंस एक ऐसी शांति एक ऐसी नीरवता जो कभी भी भंग नहीं होती है नाउ आई मीन टू सी थिंग्स एस दे आर एवरीथिंग इन दैट पीस परफेट फेक्ट इन इट्स वे यह संसार जो है जैसे कि माया का समुद्र एक अनंत शांति के ऊपर में विराज है और वह समुंद्र में ये सब जितनी भी ये जो लहरें हैं आती रहती है किंतु पृथ्वी अटल अचल सुमेरु वत रहेगी आप आकाश में से पृथ्वी के चित्र देखेंगे फोटोग्राफ तो एक पृथ्वी का ये अपना यह है गोला पृथ्वी और उसके ऊपर में एक छोटे से लेयर है समुंदर के समुंदर वैसे हम मनुष्य को बड़े गहरे दिखते हैं अनंत दिखते हैं किंतु पृथ्वी का जो आकाश में से लिया फोटो देखेंगे ऊपर में से एक छोटा सा लेयर है समुंदर का तो ये स्वामी जी कहते हैं कि यह जो लहरें हैं समुंदर की इसकी गहराई में यह जो अचल अटल पृथ्वी है पृथ्वी रूपी जो प्रशांति है वह मुझे फिर से प्राप्त हो रही है मैं फिर से जो चीज जैसी है इस तरह से देखता हूं यानी कि मेरा सही आत्म स्वरूप है और ऊपर में से ये जो सब चीजें यह सब समस्याएं यह सब फ्रस्ट्रेशंस ये सब ये डिप्रेशन आते हैं और जाते हैं मैं फिर से वही परफेक्ट पीस में स्थापित हो जा रहा हूं ही हुज जॉय इज ओनली इन हिमसेल्फ वो जिसका आनंद सिर्फ आत्मन में है हुज डिजायर्स आर ओनली इन हिमसेल्फ जिसकी इच्छाएं जिसकी वासना एं आत्मन में ही है ही हैज लर्न दिस लेसन उसने यह सीख प्राप्त की है अलोन थ्रू टर्निन आई वाज फ्री एम फ्री एंड विल रिमन फ्री फॉर एवर मैं अकेला ही इस अनंत आत्मन की यह जो जर्नी है यात्रा है उसको मैं पार कर रहा हूं क्यों क्योंकि मैं मुक्त था मुक्त हूं और हमेशा मुक्त रहूंगा दिस इज वेदांत जम यह है वेदांत आई प्रीच द थियर सो लंग बट ओ जॉय मेरी माय डियर सिस्टर आई एम रियलाइफ सालों से य वेदांत लोगों को सिखा रहा था किंतु आनंद की बात है बहना मेरी मेरी बह है ना अभी मैं ये मेरे सिखाए हुए वेदांत को मैं खुद पहली बार पहली बार तो नहीं मैं खुद अनुभव कर रहा हूं मैं खुद उसका साक्षात्कार कर रहा हूं यस आई एम हां मैं उसका साक्षात्कार कर रहा हूं यस आई एम फ्री हां मैं मुक्त हूं अलोन अलोन आई एम द वन विदाउट ए सेकंड एक एक बिना किसी दो के अद्वैत मैं हूं वो अद्वैत जिसमें किसी भी तरह का दो नहीं है किसी भी तरह का द्वैत नहीं तो आज यहीं पर समाप्त करते हैं कल से हम राजयोग का जो प्राण रूपी चैप्टर है उसका प्रारंभ करेंगे और बीच-बीच में ऐसी स्मृति कथाए लेते जाएंगे जिससे कि कोई बहुत ज्यादा वह फिलोसॉफिकल वह ना हो जाए ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्ण पस्तु