प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा में से एक प्रवचन माय प्लान ऑफ कैंपेन हम शंकराचार्य का पॉइंट देख रहे थे कि किस तरह से शंकराचार्य ने आकर के भारत में इस तरह से रिफॉर्मेशन लाया बुद्धिस्टिक एज के अंत में जो डिग्रेडेशन भारत में फैल चुका था सोसाइटल और रिलीजियस तो उसमें किस तरह से शंकराचार्य ने इसको सुधार करने का प्रयास किया तो एक सेंटेंस हमने कल देखा था वि इज वेरी इंपॉर्टेंट उसको थोड़ा सा डिस्कस करेंगे हम आज तो शंकराचार्य यहां पर स्वामी जी क्या कहते हैं
the very fundamental doctrine of vedanta is evolution, the soul going towards the highest goal through all these various stages and phases which are necessary and helpful
सो द सडन चेंजेस कैन नॉट बी एंड शंकराचार्य न्यू इट। एक एकाएक करके आप समाज में परिवर्तन नहीं ला सकते हैं। जो समाज की अवनति जो चल रही थी लंबे समय से चल रही थी तो आप फटाक करके उसमें कोई चेंज आ जाए। उसमें कोई इंप्रूवमेंट आ जाए ऐसा होने वाला नहीं है। समय के साथ में सब कुछ होता है। इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि एकाएक किसी भी तरह का परिवर्तन लाना समाज में संभव नहीं है। और शंकराचार्य को यह बात पता थी। सो डिड रामानुज और रामानुजाचार्य को भी यह बात पता थी। द ओनली वे लेफ्ट टू देम वाज़ स्लोली टू ब्रिंग अप टू द हाईएस्ट आइडियल द एकिस्टिंग रिलीजन। उनके लिए जो एक काम बचा था वह था कि धीरे-धीरे करके इस समाज को धर्म या तो फिर आध्यात्मिकता का जो सर्वोच्च आदर्श है उस आदर्श तक सबको ले जाना। इफ दे हैड सॉर्ट टू अप्लाई द अदर मेथड दे वुड हैव बीन हाइपोक्राइट्स। यदि ये धीरे-धीरे करके प्रगति करके ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम यदि ऐसा ही ऐसा ही उन्होंने किया था और इसके अलावा यदि उन्होंने और कुछ किया होता तो वे लोग दंभी साबित होते हाइपोक्राइट यानी कि दंभी यानी कि जो लोग सोचते कुछ है मुंह से बोलते कुछ है क्यों इस तरह से दंभी साबित होते हाइपोक्राइट क्यों साबित होते हैं क्योंकि क्योंकि उनके धर्म में जो लिखा गया है वो अलग है और यदि यह लोग कोई रेवोल्यूशनरी चेंज लाना चाहेंगे तो वह तो धर्म के साथ मैच नहीं हो रहा इसलिए वे लोग दंभी या हाइपोक्राइट प्रूव होते फॉर द वेरी फंडामेंटल डॉक्ट्रिन ऑफ द रिलीजन इज इवोल्यूशन क्योंकि उनके धर्म का जो सबसे फंडामेंटल आइडिया है डॉक्ट्रिन यानी कि उनका नियम है या तो फिर उनका एक बेसिक आईडिया है वह है इवोल्यूशन उत्क्रांति द सोल गोइंग टुवर्ड्स द हाईएस्ट गोल थ्रू ऑल दिस वेरियस स्टेजेस एंड फेजेस विच आर देयर फॉर नेसेसरी एंड हेल्पफुल आत्मन की जो अभी आत्मन की नहीं यहां पर सोल लिखा है तो हमको जीवात्मन कहना होगा यह जीवात्मन है जो हमारे भीतर में जो कि आत्मन का ही प्रकाश की एक किरण है उसके ऊपर में व्यष्टि अज्ञान लगा हुआ है। इसके लिए मैं अपने को इस दो हाथ, दो पैर, एक सर वाला मनुष्य समझता हूं। किंतु यदि यह व्यष्टि अज्ञान मेरी नजर के सामने से मेरे जीवात्मन के ऊपर में से हट जाए तो फिर मैं वही अजर अमर या तो फिर समय और अवकाश के परे जो आत्मन है उसके साथ में अपने को एकीभूत महसूस करूंगा। अहम ब्रह्मास्मि मेरा जो सही स्वरूप है वह ब्रह्मन है वह मुझे अनुभूति होगी तो यह जो अनुभूति है उसके लिए मेरी नजर के सामने से अज्ञान का स्तर है धीरे-धीरे करके हटता जाएगा एक के बाद एक मेरी आध्यात्मिक यात्रा में माइलस्टोन आते जाएंगे और इस सब माइलस्टोन को क्रॉस करके आखिर में मैं जो आध्यात्मिक जगत का सर्वोच्च लक्ष्य है उपनिषद में जिसको कि महावाक्य कहा गया है अहम ब्रह्मास्मि उसकी उपलब्धि करूंगा विच आर नेसेसरी एंड हेल्पफुल मैं इस तरह से स्टेज बाय स्टेज ही जा सकता हूं एकाएक करके मुझे एनलाइटनमेंट या तो निर्वाण प्राप्त नहीं होने वाला है। एंड हु डेयर्स कंडेम देम और इस तरह से यह जो मेथड उन्होंने यूज किया उसके बारे में उनको दोष भी कौन दे सकता है? अच्छा इसके बारे में थोड़ा सा सोचते हैं। सबसे पहले तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि सडन चेंजेस नहीं हो सकते सोसाइटी में। इसका अर्थ क्या है? देखिए कि यह जो 18th सेंचुरी और 19th सेंचुरी में यह जर्मनी है या फ्रांस है या तो फिर यह सोवियत यूनियन रशिया उस समय का या तो फिर चाइना वहां के कुछ-कुछ लीडर्स इस तरह से प्रकट हुए कि उन्होंने देखा कि यहां पे अपने देश में जो अपनी परिस्थिति है वह इतनी भयावह परिस्थिति है, गरीबी है, बेकारी है और यह सब कुछ एक्चुअली कल भी जो हमने डिस्कस किया था कि इंडस्ट्रियलाइजेशन ने इस विश्व को संपूर्ण रूप से एक नया आकार पर प्रदान किया है। इंडस्ट्रियलाइजेशन ने जो सालों से सदियों से चले आए हुए जो हुनर है जो स्किल है उन सबकी जगह पे नए हुनर नई स्किल नए जो मैन्युफैक्चरिंग टेक्निक उसको यहां पे इंप्लीमेंट किया है। इसकी वजह से क्या होगा कि जो लोग हजारों लोग अपने घर-घर में बैठकर के साड़ियां बनाते थे या तो फिर यह कोई भी कार्य करते थे उनकी जगह यह सब फैक्ट्री ने ले ली, मशीनरी ने ले ली, मास प्रोडक्शन ने ले ली। अभी जैसे कि स्वामी जी ने बुद्धिज्म के बारे में जो कहा कि किस तरह से बुद्धिज्म का राइज हुआ भारत में। नो डाउट भगवान बुद्ध की जो अद्भुत पर्सनालिटी थी, उनके जीवन का जो सत्य था, उनके जीवन की जो उपलब्धि थी, उनके उपदेश थे, वह तो उसके पीछे में कारणभूत थे ही थे। किंतु इसके बाद में भी एक ऐसा था कि जैसे कि पब्लिक इवेंट्स यानी कि ये जो बड़े-बड़े मंदिर बनाए गए, उसमें बड़ी-बड़ी मूर्तियों की स्थापना की गई। नियमित रूप से वहां पर सेरेमोनी वह कंडक्ट होती थी जिसमें कि बहुत सारे लोग पार्टिसिपेट करते थे। तो यह पॉइंट जब हम डिस्कस कर रहे थे तो हमने देखा था कि किस तरह से हम अपने घर में बैठकर के एक ब्राह्मण है उसके पास में एक अग्नि है। घर में उस अग्नि में वह आहुति देता है। वह जो एक वैदिक युग की प्रथा थी और इसके बाद में देखिए कि इस तरह से बड़े टेंपल्स में बड़ी सेरेमोनी करके बहुत सारे लोगों को इकट्ठा करना वो कितना मतलब इफेक्टिव है। कोई जब जैसे कि दुर्गा पूजा की बात हमने की थी। वहां पे दुर्गा पूजा पेंडोल में जब ड्रम बजना या तो फिर यह शंख बजना यह सब प्रारंभ होता है। मंत्रोार होता है और बहुत सारे लोग भक्त इकट्ठा होते हैं। तो अपने-अपने कमरे में बैठकर के जप ध्यान करने को कौन पसंद करेगा? यह ह्यूमन नेचर है कि हमको जहां पे भी पब्लिक इवेंट हो रही है, पब्लिक सेरेमोनी हो रही है, वहां पे हमको अट्रैक्ट करता है। यानी कि यह वैदिक धर्म था वो कि एक इंडिविजुअलिस्टिक रिलीजन था। जबकि यह बुद्धिज्म था। उसने एक मास स्पेक्टकल यानी कि एक भव्य पब्लिक नजारा खड़ा किया और उससे आकर्षित होकर के बहुत सारे लोग बुद्धिस्ट हुए थे। तो यहां पर भी उसी तरह का कि एक इंडिविजुअल एक कारीगर है या तो फिर एक आर्टिजन है या तो फिर यह कोई एक एक्सपर्ट है। वह अपने घर में बैठकर के अपने परिवारजनों को लेकर के जिस तरह से वह कोई भी चीज प्रोड्यूस करता है उसके सामने उसको फैक्ट्री को देखिए। फैक्ट्री में जो मशीन के द्वारा मॉडर्न मेथड्स ऑफ मैनेजमेंट के द्वारा यह जो मास प्रोडक्शन होता है उसके सामने यह जो कोटेज इंडस्ट्रीज है हाउसहोल्ड ये जो वर्कर्स वर्कर है वो कभी भी कॉमपीट नहीं कर पाएंगे तो उससे जो मास एक जो बहुत सारे लोगों को अपना काम से हाथ धोना पड़ा उनकी जो प्रोडक्ट है बाजार में चलनी ही बंद हो गई क्योंकि मिल का कपड़ा है जो फैक्ट्री का जो भी प्रोडक्ट है वह बहुत ही ज्यादा सस्ते में वह बनेगा। तो फिर देखिए कि इस तरह से होने से बहुत सारे लोग बेकार हो गए और फिर यह प्रोलेटरिएट क्लास और यह कैपिटलिस्ट क्लास इस तरह से सोसाइटी में बने। जिन लोगों के पास में कैपिटल है यानी कि मींस ऑफ प्रोडक्शन है। जिनके पास में फैक्ट्रीज है, वर्कर्स है और जो लोग यह सब प्रोडक्ट बनाते हैं, मैन्युफैक्चरिंग करते हैं, वे लोगों के पास में धन कंसंट्रेट होने लगा और जो लोग वर्कर थे, आर्टिजन थे, वह सब लोग धीरे-धीरे करके काम से हाथ धो बैठे। तो, फिर यह वर्कर्स लोगों के साथ में क्या कुछ हो सकता है कि नहीं उनके भले के लिए? यह सोचते-सचते 18th सेंचुरी 19th सेंचुरी में यह कम्युनिज्म का एक कांसेप्ट चला। वे लोग कहते हैं वर्कर्स ऑफ द वर्ल्ड यूनाइट यू हैव नथिंग टू लॉस्ट अदर देन योर शकल्स। यानी कि दुनिया भर के जितने भी वर्कर हैं सब यूनाइट हो और यह कैपिटलिस्ट क्लास है जो कि हमारा शोषण करता है उनको फेंक दो। उनके आसन से उनकी यह जो फैक्ट्री में से उनके पास में धन है वगैरह लूट लो और हम अपने में बांट दें और यह स्टेट उसको उसमें कन्वर्ट कर दो। जितना भी इंडस्ट्रीज है उसकी मालिकी स्टेट को दे दो। तो फिर यह सब रेवोल्यूशन जो है कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन, सोशलिस्ट रेवोल्यूशन वगैरह 18th सेंचुरी में आने 19th सेंचुरी में हमने देखे। यहां पर किंतु स्वामी जी कहते हैं कि देखिए यह रामानुजाचार्य और शंकराचार्य या तो फिर उस समय के जितने भी आध्यात्मिक संत महापुरुष प्रकट हुए थे उन सबको पता था कि इस तरह से रेवोल्यूशन लाने से आप समाज में कोई परमानेंट चेंजेस नहीं करने आप नहीं कर पाएंगे। क्यों? क्योंकि इसका भी हमने देखा था कि जहांजहां पर जिस देश में रेवोल्यूशन आया है उस देश में जो लोग रेवोल्यूशन लाए हैं उन लोगों ने जो लोगों पर अत्याचार किया है वो इतना भयानक था कि लोग बोलते हैं कि भले ही चाहे हम प्रोलेटरिएट थे, भले ही चाहे हम पुअर थे, भले ही चाहे हम बेकार थे। इट वाज़ बेटर देन व्हाट इज हैपनिंग टुडे। जैसे कि फ्रांस का एक उदाहरण है कि फ्रांस का राजा वो बड़ा ही शैतान था। लोगों का बड़ा ही शोषण किया करता था। तो फ्रांस में रेवोल्यूशन आया तो पहले तो लोग बड़े खुश हो गए कि चलो अभी हमारी सत्ता है, डेमोक्रेसी है। किंतु जो लोग रेवोल्यूशन लाए थे उन लोगों ने फिर जो लोगों पर जो अत्याचार करना शुरू किया एक के बाद एक सबको पकड़-पकड़ करके गिलोटिन पे उनका सर काटना शुरू किया। तो लोग बोलते हैं कि अरे यह रेवोल्यूशन आया तो बड़ा ही बेकार हुआ। इससे तो पहले अच्छे थे। अभी हुआ ऐसा कि नेपोलियन ने क्या किया? ये जितने भी रेवोल्यूशन वाले थे उनको हटा करके वह खुद डिक्टेटर हो गया। तो लोग बोलते हैं अच्छा ठीक है चलो एटलीस्ट एक डिक्टेटर तो बेटर है। जो लोग रेवोल्यूशन लाए थे उनसे। किंतु नेपोलियन और भी बड़ा पागल निकला। उसने पूरे यूरोप के साथ में युद्ध करना शुरू कर दिया। और जहां-जहां पे भी फ्रेंच सेना गई है, शुरू में तो विक्ट्री मिली। किंतु बाद में स्पेन और यह रशिया इन दोनों में इनको जो भयानक डिफिट का सामना करना पड़ा कि आखिर में नेपोलियन हार गया और लाखों लाखों जो फ्रेंच मैन थे उनकी कत्ल हो गई युद्ध के मैदान पे। तो आखिर में उनको यह जो फ्रेंच राजा था जिसका कि सर गिलोटिन पे काट दिया गया था। उसी राजा का एक वंशज को उनको फिर से राजा बनाना पड़ा। यानी कि फ्राय पूरा एक चक्र घूम करके वापस उसी राजाशाही पे आ गया। जिन लोगों ने जोर जबरदस्ती करके एक एक फोर्सफुली रिवॉल्यूशन लाना चाहा था उन्होंने जो समाज पे अत्याचार किए हैं उससे तो बेटर है कि भाई हम पहले वाली जो स्थिति में थे वह अच्छे थे। यही बात सोवियत यूनियन में देखिए कि रशिया में से सोवियत यूनियन बना। बोल्शेविक लोगों ने करोड़ोंकरोड़ों लोगों को मार दिया है। इसी देखिए कि चाइना में कम्युनिस्ट रेिवोल्यूशन आया। यह माओजेदों कम्युनिस्ट पार्टी करोड़ों-करोड़ों अपने ही देश बांधवों की कत्ल कर दी। तो जब भी यह वायलेंट रेिवोल्यूशन आता है यह सोच के कि हम किसी बस कुछ ही साल में कुछ ही डिकेड्स में हम कुछ ही समय में हम अपने देश का नवनिर्माण कर देंगे। देश की परिस्थिति बदल देंगे। देश को सर्वश्रेष्ठ देश बना देंगे। उन लोगों के साथ में वही होता है कि इस तरह का रेवोल्यूशन लाने वाले आखिर में अपने देश पे जो अत्याचार गुजारते हैं, उससे तो बेटर था भाई कि हम पहले जिस परिस्थिति में थे, गरीब तो थे किंतु जिंदा तो थे। रेवोल्यूशन में जान गवाने के अलावा और कुछ दिया नहीं है हमको। सो यह सडन चेंजेस किसी भी सोसाइटी में नहीं हो सकते हैं। यह बात शंकराचार्य रामानुजाचार्य को पता थी। देखिए कि भारत का यह जो इवोल्यूशन हुआ है आखिरी कुछ 100 सालों में और कंपेयर टू जो बाकी जो देश जो कि देखिए कि हम इतिहास को देखेंगे तो इतिहास में हमको मॉडर्न हिस्ट्री को यदि देखेंगे पोस्ट रेनेसा यानी कि यूरोप में यह जो रिब्थ ऑफ लर्निंग हुआ इसके वो जो हुआ समथिंग ये 13थ सेंचुरी 14थ सेंचुरी वगैरह-वगैरह तो इसके बाद का जो इतिहास देखेंगे हमको दो तरह के देश दिखाई देंगे। दो तरह की सिविलाइजेशन दिखाई देगी। एक सिविलाइजेशन तो है कि जिन्होंने अपनी सोसाइटी में इस रेनेसा को लाकर के उन्होंने एक के बाद एक साइंटिफिक एडवेंचर करके जो अपने माइंड की जो होराइजन है उसको एक्सपैंड किया। किस तरह की नई मैन्युफैक्चरिंग मेथड्स, किस तरह का यह इंडस्ट्रियलाइजेशन, यह ओशन नेविगेशन, एक्सप्लोरेशन और कॉलोनाइजेशन वगैरह करके उन्होंने पूरे विश्व पे अपना आधिपत्य स्थापित किया। इस तरह के देश में कौन आएगा? सबसे पहले तो वह इटाली के सिटी स्टेट आएंगे। उसके बाद में स्पेन पोर्तगल आएगा। उसके बाद में यह फ्रांस आएगा। उसके बाद में यह ब्रिटेन आएगा। उसके बाद में यह अमेरिका आएगा। तो इन देशों ने जर्मनी आएगा। देखिए कि इन देशों ने ये किस तरह से इवोल्यूशन करके जर्मनी नहीं आएगा। ब्रिटेन आएगा, अमेरिका आएगा। इतने देशों ने इवोल्यूशन के माध्यम से अपने देश को सर्वश्रेष्ठ साबित किया। इसके बाद में देखिए कि ऐसे कुछ कंट्री जो कि यह रेनेसा का जो पूरा स्ट्रीम था उसको मिस कर गए। रेनेसा वाली पूरी ट्रेन थी उसको मिस कर गए। अभी ट्रेन तो स्टेशन से निकल चुकी है। और यह जो वेस्टर्न यूरोपियन कंट्री है स्पेन, पोर्तगल, ब्रिटेन या तो फिर अमेरिका वे लोग अभी बढ़िया मजे से हैं कि ट्रेन में उठ गए थे। फर्स्ट क्लास में एसी में जा रहे हैं। अभी जो स्टेशन पे बच गए उन लोगों का क्या है? उनको तो निकलना होगा। उनको भी तो सबके साथ में कंपटीशन करनी होगी। वरना उनके देश में कॉलोनी एस्टैब्लिश करके यह धनी लोग उनका खून चूसेंगे। तो इन लोगों ने फिर यह रेवोल्यूशन का आसरा लिया। जर्मनी को देखिए जर्मनी ट्रेन मिस हो गया। तो वहां पे यह फासिस्ट रेवोल्यूशन आया। यह हिट पहले तो यह बिस्मार्क और बाद में यह हिटलर दोनों पगले महापगले। तो उन्होंने जर्मनी को पूरा तबाह कर दिया युद्ध में डाल के। इसके बाद में देखिए कि यह सोवियत यूनियन सेम थिंग रेवोल्यूशन आया। करोड़ों-करोड़ लोगों को मार दिया। इसके बाद में चाइना इसके बाद में जापान ये इसके बाद में इटाली ये जितने भी देश है जिन्होंने रेवोल्यूशन लाकर के अपने को इंडस्ट्रियलाइज करने का प्रयास किया। उन सब में भयानक तबाही प्रसरित हुई है। और फिर ये तीसरी कैटेगरी है भारत की। भारत में देखिए कि एक्चुअली मैं मैं अभी तक ऐसा मानता था कि हमने ये रेनेसा वाली ट्रेन मिस कर दी है तो फिर भारत में भी पता नहीं कि इस तरह से हमने मिस कर दिया तो भारत में रेवोल्यूशन आया क्यों नहीं। किंतु देखिए कि जैसे-जैसे मैं रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का अभ्यास करता गया। वैसे-वैसे मुझे समझ में आया कि वहां पे जैसे रहने सा हुआ था। अपने यहां पे रीइनलाइटनमेंट जैसे कि यह आध्यात्मिक यह उन्नति आध्यात्मिक नवजागरण हुआ था और यह आध्यात्मिक नवजागरण का सर्वप्रथम शंखनाद किया था शंकराचार्य ने और उनके बाद में एक के बाद एक आचार्यों ने संतों ने सिद्ध महापुरुषों ने यह भारत में आध्यात्मिक सिंचन का कार्य पुनः प्रारंभ किया है। और इसी कड़ी में आखिर में आते हैं श्री रामकृष्ण जिनके आने से यह भारत जैसे कि यह जो पहली बार जो ट्रेन में बैठ के निकल गए थे रेनेसा सिविलाइजेशंस या तो फिर रेनेसा कंट्रीज उनके साथ में कदम मिलाने के लिए भारत आगे बढ़ रहा है। तो देखिए कि जिस तरह से यह रेनेसा नेशंस है उन उनके जैसे कि ब्रिटेन है जैसे कि अमेरिका है एक नेचुरल इवोल्यूशन हुआ है नॉलेज का एक नेचुरल इवोल्यूशन हुआ है जनरेशन आफ्टर जनरेशन एक के बाद एक साइंटिस्ट आते गए एक के बाद एक इनोवेटर्स आते गए और उन्होंने मेंटल होजोन को एक्सपैंड किया इंडस्ट्रियलाइजेशन तक अपने देश को लेके गए और जिन लोगों ने जोर जबरदस्ती इंडस्ट्रियलाइज करने का प्रयास किया है, वहां पे हमने देखा कि क्या भयानक हत्याकांड हुए हैं। भारत में देखिए कि यही बात जो स्टेप बाय स्टेप आपको इवोल्यूशन करना है वह आध्यात्मिक क्षेत्र में हुआ है। इन लोगों को पता है कि एक साइंटिस्ट ने एक इनोवेशन किया। उसके बाद में दूसरा साइंटिस्ट आएगा। वह उसके ऊपर में बिल्ड अप करेगा। उसके बाद में तीसरा साइंटिस्ट आएगा वह उसके ऊपर में बिल्ड अप करेगा। तो ऐसा करके जनरेशन आफ्टर जनरेशन नॉलेज है और यह फिर यह एक्सपीरियंस है। यह इंफॉर्मेशन है। इसको आपको स्किल है। इसको आपको बिल्ड अप करना पड़ेगा। तभी कहीं जाकर के एट द एंड ऑफ द डे हमको कोई रेवोल्यूशनरी रिजल्ट दिखेगा। यह आज का एआई है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। तो जिस दिन यह ओपन एआई ने चैट जीपीटी पब्लिश किया था उसको सबके सामने रखा था। लोग आश्चर्यचकित हो गए थे कि किस तरह से एआई के पास में माने जो एक आर्टिफिशियल है जो एंटिटी इसके पास में इंटेलिजेंस आ कैसे सकती है। किंतु जो लोग साइंटिफिक हिस्ट्री का स्टडी करते हैं उनको पता है कि 500 साल पहले ही यह सब तरह के विचारों का प्रारंभ हो गया था। माने जनरेशन आफ्टर जनरेशन साइंटिस्टों ने इसके ऊपर में बिल्ड अप किया है। तब कहीं जाकर के यह चैट जीपीटी हुआ है। आजकल के जितने भी बाकी एआई सिस्टम्स हैं वह उसी के माध्यम से बने हैं। यह ऐसा नहीं हुआ कि 101 साइंटिस्ट को पकड़ करके जेल में डाल दिया हो और उनको धमकी दी हो कि जब तक आप यह एआई नहीं बना देंगे तब तक आपको जेल में से निकालेंगे नहीं। ऐसा नहीं हुआ है। एक्चुअली सोवियत यूनियन रशिया में ऐसा ही होता था। यह जो साइंटिस्ट होते थे इनको पकड़ करके यह साइंटिफिक लेबोरेटरी होती है। वहां पे बंदी बना करके रखते थे। चारों ओर गार्ड्स रहते थे कि एटम बम नहीं बनाओगे तो तुमको मार डालेंगे। तुम्हारे फैमिली मेंबर को मार डालेंगे। किंतु इस तरह से तो प्रोग्रेस होता नहीं है धमकी देने से। यह जनरेशन आफ्टर जनरेशन इवोल्यूशन होता है। वि इज द प्रॉपर मेथड। तो यह हमारे आचार्य गण को पता था कि भारत जिस तरह के गड्ढे में गिरा है उस समय आज से 1000 साल पहले बुद्धिस्ट एज के अंत में उस गड्ढे में से निकलने के लिए जनरेशन आफ्टर जनरेशन आपको स्लो एंड स्टेडी प्रोग्रेस करना होगा। यह इवोल्यूशन ही उनके जो सिद्धांत धर्म है उसका मूल सिद्धांत है। अच्छा अभी हमने एक
Spiritual evolution. Gradual manifestation of divinity.
दृष्टि से इस इवोल्यूशन को देखा वही कि सोसाइटल दृष्टि से इवोल्यूशन को देखा। अभी हम स्पिरिचुअल दृष्टि से इवोल्यूशन को देखते हैं। तो देखिए कि हमारे हिंदू धर्म में स्पष्ट लिखा गया है कि यह कितने 84 कोटि जन्म ना कि कितने इतने जन्म तक यह जो अपना जीवात्मन है वह एक के बाद एक देह धारण करता जाता है। यदि उसने अच्छे कर्म किए तो उसका जो अगला जन्म होगा वो इन अ बेटर सिचुएशन होगा और यदि उसने बुरे कर्म किए तो उसका जो अगला जन्म होगा इट विल बी वर्स सिचुएशन तो ऐसा करके जन्मजन्मांतर के कर्म सिंचित करके आखिर में एक जन्म ऐसा आएगा जो कि हमारा आखिरी जन्म होगा उस समय जन्म से ही हमारे भीतर में यह विद्या है, प्रेम है ईश्वर के प्रति अनुराग है, वैराग्य है, तपस है, ब्रह्मचर्य है। यह जो सब गुण है, वह बचपन से ही हमको खिलते हुए दिखेंगे। तो और फिर हमारा आखिरी जन्म होगा। बचपन से ही हम इस तरह से तपस्या प्रारंभ करेंगे कि आखिर में उस जन्म में हमको मुक्ति मिल जाए। किंतु वह जो इस जन्म
स्मशान में शब-साधना: पूर्वजन्म में किए हुए पुण्य की कहानी
में जो मुक्ति मिली है वह तो कोई एकाएक नहीं मिल गई है। ठाकुर की वह जो कहानी है कि एक आदमी रास्ते से जा रहा था। रात का रात का समय था। पास में शशान था। उसने शशान में देखा कि और एक तांत्रिक साधक है। उसने शब साधना करने के लिए सब जुगाड़ करके रखा है। शब भी लेटा हुआ है और उसके ऊपर में वह आसित होकर के जप करने का प्रारंभ करने ही वाला है। एकाएक एक शेर आकर के इस तांत्रिक को खा पकड़ करके चला गया। उसको मार देगा और उसको खा जाएगा। तो अभी यह जो रास्ते में चल रहा था उस आदमी ने सोचा कि देखो सब कुछ तो तैयार है। शब भी तैयार है। उपकरण भी पूजा के तैयार है। तो फिर मैं जाकर के बैठ के जप करना शुरू कर देता हूं। बोल के वह वहां पर शब के ऊपर में बैठा और जैसा जप करने का प्रारंभ किया ही था कि मां जगदंबा ने आकर के प्रकट होकर के दर्शन दिया और आशीर्वाद दिया। कहा कि बेटा तुमको जो चाहिए वो मांग लो। तो सबसे पहले तो यह आदमी प्रश्न करता है कि मां मैंने तो कुछ किया नहीं है। बने बनाए सब पूजा उपकरण का मैं इस्तेमाल करके पूजा कर रहा हूं। तो तुमने आकर के फटाक करके मुझे दर्शन दे दिया। और वह जो तांत्रिक साधक बेचारा जिसने कि इतने सालों तक यह सब सोचा होगा, चिंतन किया होगा। फिर यह पूजा उपकरण का जुगाड़ किया होगा। उसको वाह करके खा के चला गया। यह तुम्हारा कैसा न्याय है? तब भगवती हंसते-हंसते कहती है कि बादशाह तू जन्मांतरे कथा जानिशना तुमको जन्मांतर अर्थात कि पहले पहले जन्मों की बात पता नहीं है। तुमने उस जन्म में अच्छे कर्म किए थे बोलकर के ही इस जन्म में तुमको सब रेडीमेड यह पूजा उपकरण मिले हैं। तो यह है हमारे हिंदू धर्म का कि जन्मजन्मांतर तक आपको शुभ कर्म करते जाने हैं। तब कहीं जाकर के आखिर में एक ऐसा जन्म आएगा जो कि आपका आखिरी जन्म होगा। बचपन से ही आपके भीतर में दिव्य गुणावली दिव्य गुणराजी प्रकट होना शुरू होगा और उसी जन्म में आप ईश्वर प्राप्ति या तो आत्म साक्षात्कार करेंगे। तो यह है अपना हिंदू धर्म का मूल उद्देश्य। तो अभी देखिए कि जिसको इवोल्यूशन कहते हैं यहां पर स्वामी जी उसके दो तरह के इवोल्यूशन है। वन इज द इवोल्यूशन ऑफ आवर जीवात्मन हमारे भीतर में जो चेतन सत्ता है उसके ऊपर में ये अज्ञान का जो स्तर है व्यष्टि अज्ञान राइट अज्ञान दो तरह के होते हैं। एक तो है समष्टि अज्ञान एक है व्यष्टि अज्ञान। जब ब्रह्मण के ऊपर में समष्टि अज्ञान प्रका स्तर आता है तब उसमें से ईश्वर प्रकट होते हैं और ब्रह्मन के ऊपर में व्यष्टि अज्ञान का जब यह लेयर आता है तब उसमें से यह जीव जगत अपना जो जीवात्मन है वो प्रकट होता है तो यह जीवात्मन है वही ब्रह्मण का एक किरण जिसके ऊपर में यह व्यष्टि अज्ञान का स्तर लगा हुआ है। धीरे-धीरे करके ये जो व्यष्टि अज्ञान है उसको आपको भेद करते जाना है। उसको आपको थिन करते जाना है। आखिर में देखेंगे ठाकुर जो एक सुंदर उपमा देते हैं ठाकुर कहते हैं आखिर में एक ऐसा समय आ जाएगा कि लटन में आपको दिया जलता हुआ दिखता है। किंतु आप उस दिए को स्पर्श करने को जाएंगे तो पता चलेगा वहां पे बीच में एक ट्रांसपेरेंट ग्लास लगा हुआ है। अभी यह ट्रांसपेरेंट ग्लास वह आपको दिए का स्पष्ट रूप से दर्शन तो करवाता है किंतु दिए को स्पर्श नहीं करने देता है। तो यह आखिरी समय में होगा आखिरी जन्म में और उस समय यदि हम साधना करने का प्रयास करेंगे तो फिर यह ट्रांसपेरेंट ग्लास रूपी जो आखिरी व्यवधान है वह भी अदृश्य हो जाएगा। दिए को हम एक्चुअली उसके समीप जा सकते हैं। उसके साथ में एकाकार हो सकते हैं। तो यह है हमारा एक स्पिरिचुअल इवोल्यूशन। यह अपनी स्पिरिचुअल इवोल्यूशन की जर्नी जर्नी ऑफ द जीवात्मन थ्रू दी बर्थ आफ्टर बर्थ। एक जन्म जन्म मृत्यु जरा व्याधि यह एक के बाद एक साइकिल को क्रॉस करती हुई करता हुआ अपना जीवात्मन आखिर में एनलाइटनमेंट मुक्ति मोक्ष केवल स्थिति या तो फिर ईश्वर साक्षात्कार यह जो भी आप जिस तरह की स्ट्रीम को फॉलो कर रहे हैं उस स्ट्रीम का जो अंतिम लक्ष्य है वहां तक पहुंचते हैं। सो दिस इज वन टाइप ऑफ इवोल्यूशन। दूसरा
Evolution of the species or evolution of civilizations प्रजातियों की उत्क्रांति या सभ्यताओं की उत्क्रांति
टाइप का इवोल्यूशन है इवोल्यूशन ऑफ द स्पीशीज या तो फिर इवोल्यूशन ऑफ द सोसाइटीज़ और या तो फिर सिविलाइजेशन। देखिए कि इवोल्यूशन ऑफ द स्पीशीज यह डार्विन ने जो इसको खोज निकाला है या तो फिर बेटर वर्ड है कि डार्विन ने जिसको कि पॉपुलराइज किया है यह क्या है कि एक के एक वन जनरेशन आफ्टर अनदर जनरेशन यह जो अपना जो डीएनए है उसमें जेनेटिक वेरिएशन आते जाएंगे। वो चाहे वो जेनेटिक ड्रिफ्ट हो ना कि यह जेनेटिक म्यूटेशन हो ना कि फिर कुछ भी हो। तो एक जनरेशन में आपकी यह कैरेक्टरिस्टिक थी। जब नेक्स्ट जनरेशन प्रकट होगी तब पता चलेगा कि जितनी भी संतति है उसमें कुछ ना कुछ वेरिएशन है और कुछ वेरिएशन है जो कि एनवायरमेंट को बेटर एडप्ट करते हैं तो वो वेरिएशन रह जाएंगे फूलेंगे फलेंगे उसमें वृद्धि होगी और जो वेरिएशन एनवायरमेंट को एडप्ट नहीं कर पाते हैं वो वेरिएशन एक्सटिंक्ट हो जाएंगे तो यह जेनेटिक ड्रिफ्ट जेनेटिक म्यूटेशन के माध्यम से जनरेशन आफ्टर जनरेशन चेंजेस आते जाते हैं। कुछ चेंजेस बेनिफिशियल होते हैं। कुछ चेंजेस डिट्रीमेंटल होते हैं। बेनिफिशियल चेंजेस रह जाएंगे। वह जनरेशन और ज्यादा संतति को प्रकट करेगी विद इवन मोर बेनिफिशियल ट्रेड्स। तो इस तरह से यह सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिज्म था। उसमें से मल्टीसेल्यूलर ऑर्गेनिज्म हुआ। उसमें से फिर यह मछलियां बनी। यानी कि यह जलचर पशु बने। जलचर में से ये स्थलचर यानी कि जमीन पर चलने वाले पशु बने। ये जमीन पे चलने वालों में जो पहले रेप्टाइल थे यानी कि ठंडे खून वाले थे। उनमें से यह मैमल्स बने। यानी कि गर्म खून वाले मैमल्स में भी एक के बाद एक जनरेशन आफ्टर जनरेशन स्पीशीज इवोल्यूशन होकर के एप बने। एप में भी इवोल्यूशन आकर के होमोजनस बना। होमोस्पीज और होमो में भी एक के बाद एक जनरेशन आफ्टर जनरेशन म्यूटेशन होते-होते होमोसेपियंस यानी कि यह इंटेलिजेंट ह्यूमन बीइंग बना। तो यह पिछले तीन 3 बिलियन इयर्स की यह जर्नी है। पृथ्वी को पृथ्वी अभी साइंटिस्ट लोग जिस तरह से कैलकुलेट करते हैं एस्ट्रोनॉमी एस्ट्रोफिजिक्स और जियोलॉजी हमको जो बताती है उसके अनुसार यह पृथ्वी फॉर्म हुई थी समवेयर अराउंड 4 बिलियन इयर्स एगो। और यह 4 बिलियन इयर्स से उसके बाद में 1 बिलियन ईयर तक पृथ्वी बस वही भयानक आग का गोला ही थी। किंतु धीरे-धीरे करके जब पृथ्वी सेटल होती गई तो समथिंग अराउंड 3 बिलियन इयर्स एगो सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिज्म यहां पे प्रकट हुए। अभी यहां पे भी कुछ-कुछ थ्यरी है। कोई थ्यरी कहती है कि यह जो सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिज्म है उसका जन्म पृथ्वी पे ही हुआ है। जन्म या तो फिर बेटर वर्ड है कि इवोल्यूशन। और कोई-कोई कहता है कि नहीं यह सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिज्म है। वह अवकाश में से कहीं पर से आए हैं। क्योंकि इसके पीछे में भी अपने पास में अच्छा प्रूफ मौजूद है। क्योंकि यदि आप इवोल्यूशन को देखेंगे तो सबसे पहले इनऑर्गेनिक केमिस्ट्री आएगी। बाद में ऑर्गेनिक केमिस्ट्री आएगा और उसमें से यह बायोलॉजिकल ऑर्गेनिज्म तैयार होते हैं। तो, यह जो ऑर्गेनिक कंपाउंड है, कार्बन है वगैरह-वगैरह जो कुछ ऑर्गेनिक कंपाउंड जिसमें से कि ये बायोलॉजिकल लाइफ बनती है, यह ऑर्गेनिक कंपाउंड को हमने स्पेस में भी पाया है। जो बड़े-बड़े इंटरस्टेलर क्लाउड होते हैं, उसका यह मास स्पेक्ट्रोस्कोपी से एनालिसिस करेंगे, तो पता चलेगा कि उसमें भी यह ऑर्गेनिक कंपाउंड मौजूद है। तो हो सकता है कि सबसे पहले ऑर्गेनिज्म जो है लिविंग बायोलॉजिकल ऑर्गेनिज्म उनका इवोल्यूशन इस तरह से किसी इंटरस्टेलर क्लाउड है। यह नर्सरी इसको बोलते हैं। एक्चुअली बड़ा सुंदर शब्द है। स्टेलर नर्सरी यानी कि यह जो बड़े-बड़े क्लाउड यानी कि जो बड़े-बड़े ऑर्गन यह जो एटम मॉलिक्यूल होते हैं उसके ये जो बड़े-बड़े ये ग्रुप रहते हैं आकाश में उसमें से यह फिर ग्रेविटेशनल कोलैप्स होकर के तारों का जन्म होता है। तो उसको कहते हैं नर्सरी ऑफ द स्टार्स। तो वहां पर यह जो क्लाउड होते हैं उसमें यह ऑर्गेनिक मैटर पाया गया है। तो हो सकता है कि यह नर्सरी जो कि तारों को जन्म देती है, हो सकता है कि यही नर्सरीज आखिर में किसी ना किसी तरह के बायोलॉजिकल ऑर्गेनिज्म को जन्म देगी। तो दिस पॉसिबिलिटी इज देयर। अभी तक डेफिनेट प्रूफ अपने पास में नहीं है। यहां तक हमने खोज निकाला है कि ऑर्गेनिक मैटर आकाश में मिलता है। बायोलॉजिकल मैटर हमको अभी तक नहीं मिला है। तो खैर इसके बाद में पूरा साइंस फिक्शन का स्पेककुलेशन स्टार्ट होता है कि जिस तरह से यह इंटरस्टेलर क्लाउड में से यह तो फिर यह नर्सरी में से यह बायोलॉजिकल ऑर्गेनिज्म यदि पृथ्वी पर आए हैं किसी उल्कापात के द्वारा ना कि किसी तरह से तो वह हो सकता है कि दूसरे ग्रह में भी गए होंगे और वहां पे भी इवोल्यूशन हो के वहां पे भी यह एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल लाइफ जिसको कहते हैं या तो फिर हम जिनको एलियन कहते हैं वह भी हो सकता है कि वहां पे उपस्थित हो वगैरह-वगैरह दैट इज़ अ मैटर ऑफ़ स्पेककुलेशन। किंतु यहां तक तो हम साइंस के साथ में है कि सिंगल सेल्यूलर में से मल्टीसेल्यूलर और फिर उसमें से आखिर में होमोसेपियंस। सो दिस इज़ कॉल्ड इवोल्यूशन ऑफ द स्पीशीज। तो अभी देखिए कि शंकराचार्य है, रामानुजाचार्य है। और फिर ये इवोल्यूशन ऑफ स्पीशीज तो हुआ। मनुष्य तो बना। किंतु फिर इसके बाद में ना इवोल्यूशन ऑफ द सिविलाइजेशन स्टार्ट होगा। या तो फिर कहेंगे कि सोसाइटल इवोल्यूशन स्टार्ट होगा। अभी मनुष्य हम तो चेंज नहीं हो रहे हैं एज ए इंडिविजुअल। किंतु मैं जिस सोसाइटी में रह रहा हूं वो सोसाइटी इवॉल्व हो रही है। स्टेप बाय स्टेप स्टेप बाय स्टेप। पहले जो अपना ट्राइबल एग्जिस्टेंस था उसमें से यह जो फार्मिंग कम्युनिटीज एस्टैब्लिश हुई। फार्मिंग कम्युनिटीज में से सिटी स्टेट बने। सिटी स्टेट में से किंगडम बने। किंगडम में से यह जो भारत में जो जनपद कहते हैं वो बने। उसमें से एंपायर्स बने। एंपायर्स में से फिर आखिर में यह मॉडर्न जिसको नेशन कहते हैं उनका जन्म हुआ। तो और फिर मॉडर्न नेशन में भी धीरे-धीरे करके यह जो गवर्निंग मेथड का इवोल्यूशन होता गया। कहीं पर डिक्टेटरशिप है, कहीं पर यह ओलगार्की है, कहीं पर फ्यूडल सिस्टम है। तो कहीं पे आखिर में एट द एंड ऑफ आवर जर्नी एज ऑफ टुडे हमारे पास में जो मोस्ट एडवांस मेथड ऑफ सोसाइटल ऑर्गेनाइजेशन है वो है डेमोक्रेसी इलेक्टोरल डेमोक्रेसी। तो यह है हमारा इवोल्यूशन। तो देखिए कि इवोल्यूशन को भी
Dangers of revolutionary change in the process of development. उत्क्रांति की प्रक्रिया में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के खतरे.
हम तीन कैटेगरी में बांट दे सकते हैं। पहले तो है इवोल्यूशन ऑफ दी इंडिविजुअल जीवात्मन टुवर्ड्स द जर्नी ऑफ एनलाइटनमेंट। दूसरा है इवोल्यूशन ऑफ द स्पीशीज टुवर्ड्स बिकमिंग ह्यूमंस। और तीसरा आएगा कि इवोल्यूशन ऑफ ह्यूमन सोसाइटीज टुवर्ड्स दिस मॉडर्न ऑर्गेनाइजेशनल सिस्टम कॉल्ड इलेक्टोरल डेमोक्रेसी और इंडस्ट्रियलाइजेशन। तो यह तीन तरह के इवोल्यूशन है। वह इवोल्यूशन अपनी गति से ही चलेंगे। जनरेशन आफ्टर जनरेशन ही उसमें कोई भी परिवर्तन आएगा। यदि आप सडन चेंजेस करना चाहे तो इस तरह का एक भयानक कुछ प्रकट होगा कि जो कि पूरी सोसाइटी को गड्ढे में डाल के रहेगा। अभी देखिए कि यहां पे देयर इज़ अ मैटर ऑफ कोशन। अभी यह इवोल्यूशन है स्पीशीज इवोल्यूशन वो इतने पिछले 3 बिलियन साल से यह देखिए कि जनरेशन आफ्टर जनरेशन चला आ रहा है। किंतु आज हमारे पास में यह जेनेटिक एडिटिंग की टेक्निक्स जो डेवलप हुई है जिसको कि यह लोग क्रिस्पर टेक्नोलॉजी कहते हैं। उसको नोबेल प्राइज भी मिले हैं। उसकी एक लेडी साइंटिस्ट है। उसको इसके डेवलपमेंट के लिए। अभी देखिए कि ह्यूमन जीन है। उसमें सभी ट्रेट्स अपनी है कि यह मेरी आंखों का कलर कैसा होगा? मेरे बालों का कलर कैसा होगा? मेरा जेंडर कौन सा होगा? मेरा फिजिकल बंधारण कैसा होगा? मैं स्ट्रांग होऊंगा, वीक होऊंगा। मेरी हाइट क्या होगी? मेरे जो इंटरनल ऑर्गन है, वह प्रॉपर्ली फंक्शन करेंगे कि नहीं करेंगे? तो यह सब कुछ डीएनए में कोड रहते हैं। डीएनए में इसका इंक्रिप्शन रहता है। तो यह साइंटिस्ट लोग अभी आजकल क्या कर रहे हैं? डीएनए को एडिट करके डिजाइनर बेबीज की कल्पना कर रहे हैं। और यह आपको यह साइंस फिक्शन लगता होगा। किंतु यह ट्रेंड ऑलरेडी चालू हो गया है कि यह देखिए कि डीएनए को एडिट करके मुझे इस तरह का बच्चा चाहिए। इस तरह की बच्ची चाहिए। उस तरह के उसमें कैरेक्टरिस्टिक होना चाहिए। उसी तरह से डीएनए को मॉडिफाई करके बच्चे को जन्म दिलवाते हैं। तो यह डिजाइनर बेबीज क्या है कि अभी देखिए अभी तो सब इनोसेंट चेंजेस है। स्किन कलर ना कि हेयर कलर ना कि फिजिकल स्ट्रेंथ ना कि हेल्थ वगैरह। यदि यदि ये जेनेटिकली देखेंगे इस फैमिली में कैंसर हो रहा है तो उस बच्चे का डीएनए में से वह कैंसर होने वाले डीएनए को थोड़ा मॉडिफाई कर दे तो इस बच्चे को कैंसर होने की प्रोबेबिलिटी में से बच जाएगा। यह जो जेनेटिक डिसीज होते हैं उसको मॉडिफाई करके एक हेल्दी बच्चे को जन्म देना। यह सब कुछ अभी तो इनोसेंट लग रहा है। किंतु सडनली कोई पागल साइंटिस्ट ये मूवीज वगैरह में देखता है ना एक पागल साइंटिस्ट कहीं एक गुफा में बैठकर के एक्सपेरिमेंट कर रहा है। तो अभी ये कोरोना वायरस ये कोरोना वायरस ऐसे ही एक लैब में से निकला है। भले ही चाहे लोग कुछ भी कहे। सबको पता है यह बात। तो यह एक्सपेरिमेंट करते-करते एक ऐसा राक्षस खड़ा कर दिया यह कोरोना वायरस जैसा कि जो कि पूरी पृथ्वी को पता नहीं किस डायरेक्शन में ले जाएगी। एक इस तरह के ह्यूमन बीइंग को जन्म दिया। उसका डीएनए इस तरह से ऑल्टर कर दिया है कि वह होमोसेपियंस की डेफिनेशन में बैठता ही नहीं है। इट्स कंप्लीटली डिफरेंट टाइप ऑफ स्पीशीज और यह स्पीशीज को इवोल्यूशन के माध्यम से अपना विज़डम डेवलप करने का समय नहीं मिला है। जैसे बचपन से ही जैसे कि उसने फटाक करके इवोल्यूशनरी जंप लगाया है। तो उसके भीतर में ना ही विज़डम है ना ही यह जनरेशनल एक्सपीरियंस है। तो इस तरह का डीएनए द्वारा मॉडिफाई किया हुआ जेनेटिकली मॉडिफाइड स्पीशीज किस तरह से बिहेव करेगा दैट वी डू नॉट नो। तो यह जितनी ही बार यह जरेसिक पार्क बोल के एक मूवी आया था। उसमें क्या किया था कि यह करोड़ों सालों से 6.5 मिलियन इयर्स एगो जो डायनासोर थे उस डायनासोर को फिलहाल डीएनए के माध्यम से पुनर्जीवित किया। अभी क्या है कि उस समय के जो डायनासोर थे उसके जनरेशनल विज़डम था तो वह उनको पता था किस तरह से रहना है। अभी यह जो डायनासोर जो कि जेनेटिक एक्सपेरिमेंट के माध्यम से प्रकट किए हैं उन लोगों में फेरोसिटी एक तरह का किलर इंस्टिंक्ट इतना भयानक था कि आसपास के जितने भी मनुष्य हैं उनका संहार करना शुरू कर दिया। तो नो डाउट इट वाज़ अ मूवी बट बेस्ड ऑन रियलिस्टिक सिनेरियो कि आप जब भी इस तरह से इवोल्यूशन के साथ में छेड़खानी करते हैं तो रिजल्ट कभी भी अच्छा नहीं हुआ है। यदि आप रिवॉल्यूशन के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाना चाहते हो ना कि ये जेनेटिक एक्सपेरिमेंट करके यदि आप अपने यह इवोल्यूशन को स्पीड अप करना चाहते हो या तो फिर यह तो चलिए सोसाइटल इवॉल्यूशन और स्पीशीज इवॉल्यूशन का मामला है। स्पिरिचुअल इवॉल्यूशन में भी इस तरह के एक्सपेरिमेंट ठीक नहीं है। मैं यहां पे आने से पहले रांची में था। तो रांची में मैं हेड क्वार्टर की परमिशन लेकर के ही गया था। मैं बेलूर मठ में था। मैंने कहा मुझे ट्राइबल डेवलपमेंट का काम करना है। तो फिर मुझे रांची भेजा गया था। अभी रांची में मेरा जो स्टे था मेरा जो था पूरा कार्य वो समाप्ति की ओर था और एक महीना मैंने सोचा कि क्या किया जाए। अभी उस समय तो ठीक नहीं था। मुझे नहीं लगता था कि यह लोग मुझे कभी वापस लेंगे अपने संघ में और फिर मैं संघ तो छोड़ ही दिया है और जिस तरह से यह संघ का जो सिस्टम है कि आपको स्टडी करना है, मेडिटेशन करना है, उस समय मेरा लाइफस्टाइल बड़ा ही एक्टिव था, बड़ा ही राजसिक था। मुझे नहीं लगता था कि मैं साधु के रूप में अपने संग में रह पाऊंगा। और यह भी था कि अभी रांची में रहना अभी संभव नहीं है। जो कि जिस तरह से सिचुएशन चल रहा था मेरे खुद के मन का वहां के बड़े महाराज तो चाहते थे मैं रुक जाऊं किंतु मेरा अभी इच्छा नहीं हो रहा था। तो मैंने सोचा मैं गांव में जाकर के रहूंगा और एक छोटा सा एक झोपड़ी बनाऊंगा। वहां पर सुबह शाम बच्चों को पढ़ाऊंगा। रात को मैं मेडिटेशन ना कि ऐसा कुछ करूंगा। ऐसा सोच कर के मैं सीरियसली सोच रहा था कि मैं गांव में ही शिफ्ट हो जाऊं आश्रम की बजाय। वैसे भी मैं प्रतिदिन गांव में जाता था। प्रतिदिन सुबह से लेकर के शाम तक तो मैं गांव में ही रहता था। गांव वालों के साथ में बड़ा अच्छा मेरा रिलेशन हो गया था। यदि मैं किसी भी गांव में जाकर के रहूं तो मेरे रहने के लिए खाने के लिए कोई भी समस्या नहीं होगी। यह तो मुझे पक्का पता था। बस मुझे यह सब सेवा कार्य करना है। मैं अकेले रह के बेटर कर पाऊंगा। ऐसा मैं सोच रहा था। तो मैंने बड़े महाराज को कहा कि मुझे 1 महीने का छुट्टी चाहिए। मैं वहीं पे गांव में ही अपना फार्म हाउस है। वहां पे मैं अकेला रहूंगा। अकेला रह के मैं यह सब कुछ सोचूंगा कि व्हाट इज माय नेक्स्ट स्टेप। तो एक महीना मैं बिल्कुल अकेला रहा था। वहां पर वो फार्म मैनेजर था। किंतु वो मुझे को इतना कोई डिस्टर्ब नहीं करता था। प्राय ऑलमोस्ट 30 डेज मैंने अकेले ही बिताए थे। आखिर में पता नहीं कि वहां के बड़े महाराज ने हेड क्वार्टर से बात की हो ना कि कैसे भी हो। एकाएक वहां से आदेश आया कि तुमको बेलमठ बुला रहा है। तुम बेलून मट वापस चले जाओ। मैं आई वास सो सरप्राइज। यह मेरे कैलकुलेशन में ही नहीं था। मैं सोच रहा था कौन से गांव में जाऊं, कैसे रहूं, क्या करूं? बेलूरमठ वापस मुझे ले सकता है, सोचा भी नहीं था। बट चलो अभी एक ओपोरर्चुनिटी आ गई है और मेरा भी माइंड एकाएक इस तरह से परिवर्तित हो गया तो मैं बेलूरमठ सीधा चला आया। अभी मैं बेलूरमठ आकर के सुहितानंद जी के साथ में बात कर रहा हूं। वह हमारे इंचार्ज थे पीपीटीसी के। तो उन्होंने पूछा कि अच्छा तुम वहां पर क्या-क्या करते थे? तो मैंने उनको इन जनरल बताया। फिर मैंने उनको कहा कि इस तरह से मैं एक महीना आखिर में इस तरह से अकेले रहा था और यह सब कुछ सोच रहा था कि अभी व्हाट इज द नेक्स्ट स्टेप ऑफ माय लाइफ। तो उन्होंने कहा कि अरे पगले तुम एक महीना बिल्कुल अकेले रहे इस तरह का चिंतन करते-करते कि तुम्हारा भविष्य क्या होने वाला है? तो मैंने कहा हां तो बोला कि ये तो बड़ा डेंजरस काम किया तुमने। कभी भी इस तरह से अकेले रह के चिंतन नहीं करना है। अकेला रहना ठीक है। वैसे अवॉइड करना है। और यदि रहते भी हो तो यह लाइफ और डेथ वाले चिंतन नहीं करने बैठकर के किसी एक जगह पे कुछ भी हो सकता है तुम्हारे साथ में। तो ठाकुर की कृपा है कि तुम वापस आ गए। एनीथिंग कुड हैव हैपेंड। वी डू नॉट नो। इस तरह का पागलपन कभी मत करना। वो मैं क्या सोच रहा था कि आई विल एक्सलरेट माय लाइफ कि एक महीना बैठकर के मैं ऐसा कुछ जप ध्यान कर लूंगा। ऐसा कुछ स्टडी कर लूंगा। माय लाइफ विल चेंज। समथिंग विल हैपन। आई आई माइट गेट एनलाइटनमेंट। गांव में जाऊंगा। आई विल बिकम एनलाइटन पर्सन। ऐसा करके गांव में जाऊंगा। यह सब कुछ चल रहा था। तो इमीडिएटली सुतानंद जी ने कहा कि इस तरह का पागलपन कभी नहीं करना है। अकेले रह के साधना करके एनलाइटनमेंट मिल जाएगा। या तो फिर तुम गांव में जाकर के रेवोल्यूशन ला दोगे। दिस आर वेरी डेंजरस थिंग्स। कभी करना मत अपने जीवन में इस तरह से। पागलपन या तो सुसाइड ऐसा ही कुछ होगा परिणाम आखिर में। तो उस समय मुझे पता चला कि देखिए कि इवन इन आवर स्पिरिचुअल लाइफ हम यदि डेंजरस एक्सपेरिमेंट करना प्रारंभ करते हैं देन रिजल्ट वुड बी वेरी डेंजरस। अब ये ठाकुर को देखकर के भगवान बुद्ध को देखकर के कि वे लोग तपस्या कर रहे हैं। 12 साल तपस्या की। आखिर में एनलाइटनमेंट मिल गया। उसके बाद में उन्होंने जगत में अपने संदेश का प्रसार प्रारंभ किया। यह सब कुछ हमारे लिए संभव ही नहीं है। ऑलरेडी यदि अवतारवाद की दृष्टि से देखें तो वे लोग अवतार हैं। और सिंपल ह्यूमन बीइंग की दृष्टि से देखें तो यह स्पिरिचुअल इवोल्यूशन का सिद्धांत कहता है कि उनका आखिरी जन्म होगा बोलकर के उनके भीतर में यह सब गुणराजी प्रगटित हो रही है। मैं मेरे में वैराग्य तो था बचपन से किंतु इस तरह से मैं आंख बंद करके बैठूंगा। मेरा मन शांत हो जाएगा वगैरह-वगैरह। इस तरह से तो मुझे कभी कुछ दिखा नहीं है। तो मैंने किस तरह से सोच लिया कि एक महीने में मैं कुछ ऐसा कुछ रेवोल्यूशन ला दूंगा। सो आइदर इट इज़ अ सोसाइटल इवोल्यूशन और अ स्पीशीज इवोल्यूशन और अ स्पिरिचुअल इवॉल्यूशन। किसी भी तरह का सडन चेंज किसी भी तरह का रेवोल्यूशन उसमें कभी नहीं जाना है। इट विल ब्रिंग नथिंग बट डिजास्टर। तो यह स्वामी जी का पूरा इस पैसेज का अर्थ है। और आखिर में स्वामी जी कहते हैं कि हु डेयर्स कंडेम देम और उन्होंने जो इस तरह से सोचा तो हम उसको निंदा भी कैसे कर सकते हैं? वे लोग तो हाइपोक्राइट नहीं थे। दम भी नहीं थे। उनको तो सोसाइटल इवोल्यूशन भी समझ में आता था। स्पीशीज इवोल्यूशन भी समझ में आता था। स्पिरिचुअल इवोल्यूशन भी समझ में आता था। तो आजकल की यह जो रिफॉर्म मूवमेंट है उसकी तरह उन्होंने समाज को गाली दे दे के कोई किसी भी तरह का सुधार करने का प्रयास ना किया। इसके बदल में उनको हम निंदा भी कैसे कर सकते हैं। यदि वे लोग ऐसा करते तो वे लोग दंभी कहलाते। वे लोग हाइपोक्राइट कहलाते क्योंकि उनके धर्म में इवोल्यूशन के बारे में स्पष्ट रूप से कहा गया है। तो आज यहीं तक अभी नेक्स्ट जो स्टेप चालू होता है इसके बाद का इसके बाद का जो पॉइंट है वो उसका नाम है हाउ टू बेटर इंडिया आइडोलेटरी एंड श्री रामकृष्णा 11th पॉइंट है जिसको कि अभी हम कल देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम
प्रश्न: अभेदानंदजी के जीवन में स्वामीजी द्वारा किये गए शक्ति संचार का बहुत नकारात्मक परिणाम हुआ था।
कृष्णपणमस्तु यह जो ये था नित्य गोपाल तो कीर्तन में भाव होता था तो उसी समय ठाकुर ने कह दिया था कि साधु सावधान अभी भाव होना अच्छी बात है किंतु भाव को कंटेन करने के लिए ब्रह्मचर्य चाहिए ब्रह्मचर्य नहीं है और भाव हो रहा है बार-बार यानी कि फिर आखिर में वह किसी महिला के चक्कर में वह फंस गया था। स्वामी जी ने कहा था यह भाव वगैरह ठीक है। पहले ज्ञान बाद में यह सब मधुर भाव वगैरह। वरना तो कीर्तन करते-करते बहुत ऊपर उठे। बाद में स्वामी जी ने जो इन्वेस्टिगेशन किया कि जो लोग का भाव हुआ है वो लोग बाद में उनके भीतर में काम भावना वो 10 गुना बढ़कर के वापस आई है। सो दैट इज वेरी डेंजरस। दूसरा कि चाइना का एग्जांपल चाइना का जो रैपिड ग्रोथ है इसके पीछे उन्होंने वो जो प्राइस जो पे किया है वो कल्चरल रेवोल्यूशन के दौरान जो इतने करोड़ों लोगों को माओ ज़ेदोंग ने मार दिया। अभी क्या है कि सोसाइटी में रेजिस्ट करने की कैपेसिटी नहीं रही है। तो ये कम्युनिस्ट पार्टी ने क्या किया है? चाइना को जैसे फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड बना दिया है। जितना भी लोगों को जो भी मैन्युफैक्चर करना है वहां पे आकर के मैन्युफैक्चरिंग आउटसोर्स कर सकते हैं। चाइनीस वर्कर बिल्कुल बिना रेजिस्टेंस के कार्य करते रहेंगे। उनके पास में जो कहने को तो कम्युनिस्ट कंट्री है किंतु जो वर्कर को जो सामान्य कंपनसेशन मिलना चाहिए वगैरह कुछ भी नहीं है। कोई भी तरह का सोशल सिक्योरिटी नहीं है। ना ही कोई इंश्योरेंस वगैरह है। तो उन लोगों ने इन लोगों का स्पिरिट तोड़ के यह सब कुछ वर्कर बना के यह सब किया है। इंडिया में यह संभव नहीं है। इंडिया में तो हमको ह्यूमन राइट्स सबसे पहले आप बोलेंगे कि भाई तुम 8 घंटे काम करो तो बोलेगा कि 8 घंटे वह जो अभी उसने कहा था ना वह क्या नाम है वो नारायण मूर्ति कि इतने घंटे काम करो तो कितना उसके ऊपर में बैकलेश आ गया था चाइना में तो आपको करना ही पड़ेगा वो कोई उपाय ही नहीं है। यह जो ताइवान का टीएसएमसी है जो कि माइक्रोपर बनाता है। यह लोग बोलते हैं अमेरिका वाले कि आप लोग अमेरिका में बनाइए। तो ठीक है अमेरिका में प्लांट डाला टीएसएमसी का। हुआ क्या? जितने भी ताइवानीज़ इंजीनियर है वो 24 आवर्स अवेलेबल है। कुछ भी प्रॉब्लम होने से उन लोगों को बोलना नहीं पड़ता शॉप मैनेजर को कि आप लोग आकर के प्रॉब्लम सॉल्व कीजिए। उनको वो अलर्ट पहुंच जाता है। अपने से आ जाते हैं। एज इफ दे आर 24 आवर्स ओन ड्यूटी। और अमेरिकन है कि उनको यह कंपनसेशन चाहिए, वह चाहिए, यह चाहिए, यह बोनस चाहिए। वे लोग बोलते हैं कि यह अमेरिकन वर्कर्स और ये ताइवानीज़ वर्कर ये जो टीएसएमसी का फैब्रिकेशन फेब जिसको बोलते हैं जहां पे माइक्रोपर बनते हैं। तो फेब में यह ऑलरेडी टेंशन है बिटवीन दिस टू ग्रुप्स। तो क्या है कि वर्क कल्चर जो है यह ईस्ट एशिया का वो भयानक है। माने आपको नहीं कंपनसेशन चाहिए ना ही कुछ चाहिए। वी आर ऑलवेज ऑन ड्यूटी व्हाटएवर हैपंस। तो इस तरह का वर्क कल्चर डेमोक्रेसी में खड़ा करना प्रॉब्लम है। और वो वर्क कल्चर आया कहां से कि ये कल्चरल रेवोल्यूशन में जो भयानक तबाही हुई है तो वहां पे अभी ऐसा घुस गया उनके माइंड में या तो इस तरह का वर्क कल्चर अपनाओ या तो फिर से कल्चरल रेवोल्यूशन की ओर जाएंगे। सो माने एव्री राइज हैज़ सम कॉस्ट बिहाइंड इट।
प्रश्न: मानव सभ्यता को समझने के लिए हमारी टाइम होराइजन बड़ी छोटी है । इसीलिए हम ऐतिहासिक उत्क्रांति को नहीं समझ पाते हैं।
यह जो चाइना का जो दो पीरियड है ग्रेटली फॉरवर्ड और कल्चरल रेवोल्यूशन यह कर्सरी स्टडी भी करेंगे ना तो पता चलेगा क्या पथेटिक हालत थी उस समय वहां की लोग चींटियों की तरह मरते थे गांव-गांव में आप जाएंगे पूरे गांव में डेड बॉडीज पड़े हुए हैं और कुछ नहीं है। ऐसी परिस्थिति थी। वहां से उन्होंने फिर अपने वर्क कल्चर को इस तरह का बनाया कि वी आर 24 आवर ऑन ड्यूटी। या तो वो करो या तो मरो। ये जो भयानक जो उनका जो साइकोलॉजिकल डिस्टरबेंस खड़ा हुआ है दैट इज द रीजन बिहाइंड देयर वर्क कल्चर टुडे। किंतु देखिए वेस्टर्न सिविलाइजेशन
प्रश्न: फ्रांस में वर्क कल्चर बिगड़ता जा रहा है। शनि, रवि को कर्मचारियों को कॉल करना गैरकानूनी है। यह ईस्ट एशियाई वर्क कल्चर से कितना भिन्न है!
के लिए रे ऑफ होपफ है स्वामी जी कि अपना जो इवोल्यूशन है कि फ्रॉम ए वर्कर टू ए स्पिरिचुअल बीइंग तो स्वामी जी वेस्ट में गए। उन्होंने अमेरिका में देखा कि अमेरिका जो आज जो वैभव और यह प्रोस्पेरिटी के जो शिखर पर बैठा हुआ है। दिस इज द परफेक्ट जंपिंग पॉइंट फ्रॉम देम टुवर्ड्स द वेदांता। तो वहां से यदि यह वेदांत को एक्सेप्ट करते हैं तो यह जो सेडेंटरी लाइफ स्टाइल हो गई है अर्जुन की इट विल बी ए बेनिफिट बेनिफिट टू देम दे कैन डिवोट मोर टाइम टू स्पिरिचुअल पर्स्यूड सीरियस स्पिरिचुअल्स पर्स्यूड और यदि यदि आप वेदांत में नहीं जाएंगे और सेडेंटरी लाइफस्टाइल बना के रखेंगे आपका वर्क कल्चर ऐसा ही लेजी रहा और मटेरियलिज्म में आप और ज्यादा डीप में जाएंगे आपका वीकेंड है तो आप वीकेंड में क्या करेंगे और ज्यादा भोग भोगेंगे तो तो फिर आप और बड़े गड्ढे में गिरेंगे यह जो वर्क कल्चर इतना एक्सट्रीम है ताइवान ईस्ट एशिया का तो भोग करने के लिए समय ही नहीं है। तो बोल के अल्टीमेटली तो जीवन यही है ना। भोग से कुछ बेटर रास्ते तमस में से रजस में जाए एटलीस्ट तो वे लोग तमस में से तो रजस में आ गए हैं। सत्व में जाए ना जाए दैट इज़ बट रजस इज़ बेटर देन तमस एनीवेयर। जबकि यह वेस्टर्न कंट्रीज है। वह रजस में तो है। अभी वहां से सत्व में नहीं जाएंगे और यदि तमस में जाएंगे देन दैट विल बी वेरी डेंजरस फॉर देम। सो दिस इज़ ए वह क्रॉस रोड ऑफ़ अपॉर्चुनिटी पे बैठे हैं। जब से स्वामी जी गए 1893 से लेकर के यह जो 100 साल ऐसा कुछ समय उनको मिला है ऑन द क्रॉस रोड ऑफ़ अपॉर्चुनिटी। इफ दे एंटर इंटू सत्व दैट विल बी वेरी गुड फॉर देम। यह जो लाइफस्टाइल आपने कहा कि मैं देखिए ना मैं अपने फादर को ही देखता था कि 5:00 बजे वह घर पे आ जाते थे। तो आज यह सब सुनकर के याद करके बड़ा आश्चर्य होता है कि वह भी एक समय था कि 9 टू 5 का जॉब था। 5:00 बजे छूटे वहां से जॉब में से तो 5:30 बजे तक तो घर पर आ गए। हमारे घर में रात को 8:00 बजे तक खाना पीना खा के हम लोग तो सोने को भी चले जाते थे। आजकल तो आप जॉब करेंगे तो आप 8:00 बजे 9:00 बजे तो घर आएंगे। तो अपना जो आजकल का जो एक्सट्रीम जो वर्क कल्चर हो गया है राजसिक इज़ अ गुड इन वन वे कि आप तमस में से बाहर आ गए हैं। किंतु यदि अभी आप वेस्टर्न कंट्रीज की तरह नाउ यू हैव अ बेटर अपॉर्चुनिटी कि चलो नाइन टू फाइव वर्क कल्चर है फिर से वीकेंड है आपके पास में फ्री है देन यू यूटिलाइज इट फॉर सम स्पिरिचुअल प्रोग्रेस इट इज़ वेरी गुड फॉर यू एंड इफ यू डू नॉट इफ यू गो फॉर भोग देन फिनिश यू विल गो रजस में से फिर से तमस में चले जाएंगे ना मुझे ऐसा लग रहा है देखिए कि
प्रश्न: स्वामीजी को पश्चिम गए हुए सौ वर्ष से अधिक हो गए हैं। ऐसा लगता है कि उन्होंने अभी तक स्वामीजी से कुछ भी नहीं सीखा है।
समाज का एक सेक्शन तो ऐसा है कि व्हिच इज टेकिंग दिस योगा पार्ट्स सीरियसली अमेरिका में देखिए ना कि बहुत सारे लोग योगा प्रैक्टिस करते हैं। तो प्रवचन और पूजा आर नॉट इनफ फॉर यू। उनको तो कोई आप अब जैसे ज़हन सेंटर जितने भी है वहां पे एक अच्छा उन लोगों का ये रहता है। माने लोगों का आगमन रहता है। क्यों? वी टीच मेडिटेशन। अभी उन लोगों का मेडिटेशन मेथड इतना इफेक्टिव हो कि ना हो। किंतु जब आप एक बार सेकुलर हो चुके हैं। आपने क्रिश्चियनिटी से नाता तोड़ दिया है। देन यू विल नीड समथिंग सब्सटेंशियल। फिर पूजा ही हमको देखनी थी। काली पूजा देखनी थी, दुर्गा पूजा देखनी थी। तो फिर हमारे चर्च के स्पेक्टकल तो आपसे हजार गुना बेटर है। वो वहां वेस्टर्न चर्च तो देखिए 50-50 फुट उसका सीलिंग है। वहां पे हजार लोग आ जाएंगे। उसका जो भव्यता है वहां की जो सेरेमोनी
प्रश्न: बहुत से लोग ठाकुर, मा, स्वामीजी के उपदेशो में गहराई से जाए बिना ही हमसे ध्यान सीखना चाहते हैं। Q: many people want to learn meditation from us, without going deeper into teachings of thakur, ma, swamiji.
है अपनी मेथोडोलॉजी है ना जो आज से 100 साल पहले जो परिस्थिति थी कि एक अंतरंग भक्तों का एक दल था। जिनके लिए ये सब पूजा सेरेमोनीज होती थी। ठाकुर खुद तो पुजारी थे। तो वो अपना चला आ रहा है कि शशि महाराज वो वरा नगर मठ में फिर यह आलम बाजार मठ में पूजा करते थे और दुर्गा पूजा जो बेलूर मठ में प्रारंभ हुआ तो अपना एक जो घनिष्ठ डिवोटियों का एक जो ग्रुप है उनके लिए यह सब पूजा है और जनसाधारण के लिए है यह सेवा कार्य तो अभी यह मेथोडोलॉजी जो आज से 100 साल पहले डेवलप हुई थी कि यहां पे सेवा कार्य चल रहा हैं, स्कूल चल रहा है, हॉस्पिटल चल रहा है, रूरल डेवलपमेंट चल रहा है वो है और यहां पे जो डिवोटी है उन लोगों के लिए पूजा है, सेल सेलिब्रेशन है वगैरह। बट टुडे आज का जो एक मिडिल क्लास जो तैयार हुआ है उनको ऑफर करने के लिए विचार आर अभी उनको सेवा की जरूरत नहीं है। वो बैंक मैनेजर है, BSNL में मैनेजर है उनको आप क्या सेवा करेंगे। एट द सेम टाइम दे आर नॉट दैट क्लोजली आइडेंटिफाइड विद श्री रामकृष्ण कि अपने फेस्टिवल में वो आए। तो यह जो मिडिल क्लास के लिए व्हिच आर नॉट वेरी क्लोजली एफिलिएटेड विथ अस उन लोगों के लिए जो होना चाहिए कि स्पिरिचुअलिटी इन डे टू डे लाइफ। तो हाउ टू हाउ डू वी डू दैट? तो अभी जैसे देखिए कि अपने यहां पर समर कैंप होगा। अभी पहली तारीख से मैं उसको ऑर्गेनाइज कर रहा हूं। तो मैंने जिस तरह से शेड्यूल बनाया है कि पहले चटिंग है। उसके बाद में मेडिटेशन है। उसके बाद में योगासन है। उसके बाद में फिर से गीता चटिंग है। उसके बाद में भजन है। उसके बाद में स्प स्टोरीज इंस्पिरेशनल स्टोरीज। फिर उसके बाद में कुछ ग्रुप एक्टिविटी। सो इसका मार्केट बहुत ज़्यादा है अभी कि क्या है कि यू नीड स्पिरिचुअल ओरिएंटेशन टुवर्ड्स योर लाइफ बट नॉट थ्रू द मीडियम ऑफ़ सेरेमोनीज़ नॉट थ्रू द मीडियम ऑफ़ सेवा दिस पीपल न नीड नाइदर ऑफ़ देम दे नीड अ स्पिरिचुअल ओरिएंटेशन टू देयर लाइफ। सो ये पूरा समर कैंप का यह है अपना। तो दिस थिंग्स नीड टू बी डन ऑन डेली बेसिस ऑन अ रेगुलर बेसिस फॉर एवरीवन नॉट जस्ट फॉर स्टूडेंट्स। सो दिस इज अ नीड ऑफ द आवर।
प्रश्न: बहुत से लोग तनाव से मुक्ति पाने, स्वास्थ्य सुधारने, याददाश्त सुधारने, अध्ययन में सुधार आदि के लिए हमसे ध्यान सीखना चाहते हैं। Q: many people want to learn meditation from us, in order to get rid of stress, improve health, improve memory, improve study, etc.
यह जो स्वामी जी कैलिफोर्निया में उन्होंने जो किया ना दैट इज दैट शुड बी द मॉडल फॉर अस जब फर्स्ट टाइम गए थे न्यूयॉर्क बोस्टन वगैरह तो क्या था कि एक तो एक वेदांत का एक मतलब भारत का ही जो एक दूरम था गुलाम देश है काले लोग वहां पे गुलाम है सब निग्रो की तरह उसको एक वो मिसकसेप्शन को हटाना था किंतु उस मिसकंसेप्शन को हटाते हटाते भी वो थाउजेंड आइलैंड पार्क वाला एक सीन अपने सामने है कि स्वामी जी उनको को रिट्रीट के लिए ले गए व्हिच इज वेरी गुड। किंतु यदि एक सब्सटेंशियल आज के संघ के लिए जो हमको एक एग्जांपल चाहिए ना तो स्वामी जी का सेकंड विजिट टू द कैलिफोर्निया। अभी कैलिफोर्निया में स्वामी जी गए सेकंड टाइम ऑलरेडी जो एक नेगेटिव एसोसिएशन था विद इंडिया एंड इंडियंस वो ऑलरेडी दूर हो चुका है। स्वामी जी का जो राजयोग पुस्तक है ऑलरेडी प्रसिद्ध हो चुका है। ऑलरेडी बहुत अभी ये जो स्वामी जी की क्लोजेस्ट डिसाइपल थी उस समय जो एलिस हेंसब्रो वो अलास्का जा रही थी। मतलब स्वामी जी के आने से कुछ समय पहले उनको कुछ समय अलास्का रहना पड़ा था। अभी अलास्का यानी कि इस वाइल्डरनेस ऑफ स्नो माने आइस म आइसोलेटेड है। बहुत कम जनसंख्या है। तो वहां पर वो क्या करेगी? सो शी टूक स्वामी जीसस राजयोग। वहां पे जाकर के अलास्का जाकर के वो स्वामी जी का राजयोग पढ़कर के जब कैलिफोर्निया वापस आती है तब पता चला स्वामी जी खुद वहां पे आ रहे हैं लॉस एंजेलस में तो स्वामी जी के मिलने के लिए गई और अपने घर पे ले आई। सो वो जो एक नेगेटिव एसोसिएशन दूर करने वाली बात थी वो ऑलरेडी हो चुका था। नाउ यह एजुकेटेड मिडिल क्लास लोग आपके सामने खड़े हैं। व्हाट आर यू गोइंग टू डू विथ देम? तो लॉस एंजेलिस और यह बाद में यह सन फ्रांसिस्को यह दो जगह पे स्वामी जी राजयोग का क्लास लेते थे। और उसका जो सक्सेस है उन्हें वो कैलिफोर्निया वाला चैप्टर नहीं इट इज़ मिसिंग फ्रॉम आवर पॉपुलर कंसेप्शन। ये फर्स्ट जो स्वामी जी वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन थाउजेंड आइलैंड पार्क ये जोसेफाइन मैक्लाउड ये ईटी स्टडी निवेदिता ये फर्स्ट विजिट वाला बड़ा पॉपुलर है बट सेकंड विजिट एंड स्पेसिफिकली ये कैलिफोर्निया इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। वी नीड टू स्टडी इट फ़र्दर और फिर दैट इज़ द मेथड दैट वी नीड टु अप्लाई टुडे। यह तपोवन है ना शारदा तपोवन
प्रश्न: मायावती रिट्रीट बहुत लोकप्रिय है। Q: mayavati retreat is very very popular.
अभी ना इट म देखिए अपने आश्रम देमसेल्व्स आर रिट्रीट फ्रॉम द सिटी। आप अपने घर में रहते हैं आश्रम में आएंगे दैट इटसेल्फ इज़ अ रिट्रीट। तो आश्रम में यदि रेगुलर बेसिस पर जैसे अपना आरती होता है ना डेली आरती होता है तो ऐसा रिट्रीट डेली हो ना इट वुड बी वेरी एटलीस्ट देखिए यदि डेली ना हो सके तो जैसे कि एक शेड्यूल आप बना दीजिए कि तीन महीने में एक बार रिट्रीट होगा वन वीक का रिट्रीट होगा यहां पे रहने खाने को सब मिलेगा अपने आश्रम में कोई आजकल फैसिलिटी का कोई अभाव नहीं है यू कैन इजीली गिव एसी रूम्स टू डिवोटीज तो इस तरह से वीकली रिट्रीट कीजिए ना क्वार्टरली नो इट विल बी वेरी पॉपुलर नहीं ये अपना रिट्रीट है ऑनलाइन रिट्रीट
प्रश्न: साधना में धैर्य की क्या भूमिका है? साधना की गति को कैसे बढ़ाए? धैर्य और तीव्रता दोनों को साथमे कैसे बढ़ाए ? Q: what is the role of patience in sadhana? how to intensify sadhana? How to increase both patience and intensity together?
है देखिए पेशेंस दो तरह के होते हैं एक तो स्पिरिचुअल और दूसरा है कि अपना वर्क और या तो फिर अपना कहेंगे कि रिलेटेड टू आवर अ मटेरियल तो मटेरियल वर्ल्ड में पेशेंस होना चाहिए क्योंकि इस अर्थ में कि यदि आप इस चीजों के पीछे में जितना जितना दौड़ेंगे उतना ही यह काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह बढ़ता जाएगा। तो बाह्य जगत में संतोष होना चाहिए कि भगवान ने हमको जो दिया है सो दिया है। जैसे कि यह नाग महाशय की कहानी है। उनके पिताजी ने कहा कि तुम मेडिकल करके अभी यह सब चालू नहीं करोगे तुम्हारा बिजनेस। तो फिर तुम क्या करोगे? नेक्टो बैंक खावे ना कि अर्थात कि नंगे होकर के ये जो मेंढक खाओगे? तो सही में नाग महाशय ने कपड़े उतार करके दिगंबर होकर के वहां से एक मेंढक जा रहा था उसको खा लिया। बोले तो मटेरियल जो अपना नीड्स है फॉर दैट वी नीड टू हैव संतोष संतोष समान धन नहीं कहते हैं ना कि जो दिया है ठाकुर ने दिया है वो ठाकुर कहते हैं ना कि अपने घर में बैठा है मशहरी में यानी कि मॉस्किटो नेट डाल के और फिर यदि देखेंगे तो बाहर से लगेगा कि यह सो गया है किंतु भीतर से देखेंगे तो बैठकर के जप कर रहा है। इस तरह का जो राजसिक साधक होता है, वह जो पीतांबरी पहनता है, फिर वह जो माला लेकर के जप करता हुआ सा दिखाई देता है। गले में माला है, सर पे तिलक है। जबकि सात्विक भक्त होता है। उसके घर में कुछ मरमत ठीक नहीं है। धूल मिट्टी पड़ी हुई है। किंतु बड़ा सात्विक आदमी है। वह अपना दिन जप करने में बिताता है। सो दैट इज रिलेटेड टू मटेरियल वर्ल्ड। यह संतोष होना चाहिए। बट एस फार एस आवर स्पिरिचुअल प्रोग्रेस गोज़ वी शुड बी एक्सट्रीमली इंपेशेंट। असंतोष होना चाहिए। बेटर वर्ड इज मुमुक्षुत्व। मुमुक्षुत्व प्रचंड होना चाहिए। जितना ही एंबिशन होगा उतना ही हम आगे बढ़ेंगे। सो द क्वेश्चन इज नॉट कि पेशेंस को रखते रखते कैसे आगे बढ़े? द क्वेश्चन इज कि मटेरियल पेशेंट रखना है। पेशेंस रखना है। धन के बारे में संतोष रखना है कि जो भगवान ने दिया है वो अपने लिए काफी है। किंतु आध्यात्मिक जीवन में असंतोष रखना है। मुमुक्षुत्व रखना है। दैट इज द क्वेश्चन। सो आध्यात्मिक जीवन में अब जितना ही मुमुक्षत्व बढ़ाते जाएंगे उतना ही देखेंगे कि वह इतना फास्ट बढ़ेगा आगे। ठाकुर ने कहा कि मैं चाहता हूं कि मैं भक्तों का राजा हूं। म ठाकुर की यह सात्विक एंबिशन थी। स्वामी जी ने कहा था द वे बुद्धा हैज़ अ मैसेज फॉर द ईस्ट। आई हैव अ मैसेज फॉर द वेस्ट। दैट वाज़ स्वामी जी का एंबिशन था। सो बेटर टू गुड टू हैव स्पिरिचुअल एंबिशन। कि मैं मां ने कहा है प्रतिदिन 1 लाख जप करो ना। देखो कैसे शांति नहीं मिलती है। तो चलो मैं एटलीस्ट इतना तो नियम कर सकता हूं कि मुझे 10,000 जप तो करना ही है। दैट इज माय टारगेट। दैट इज माय एंबिशन। अभी आज मैंने 100 से चालू किया। फिर एक सप्ताह के बाद में 200 किए। फिर उसके बाद में 300 किए। 1000 4 5000 पे यदि पहुंच गया तो उसी से मेरा तो जीवन धन्य हो जाएगा। एंबिशन रखना है कि मां ने कहा 1 लाख तो 1 लाख तक जाने का एंबिशन रखना है। तो दैट इज हाउ वी विल प्रोग्रेस। वहां पे फिर संतोष नहीं चाहिए। अभी 108 हो रहा है तो हो रहा है। लाख करने की क्या जरूरत है? वहां पे संतोष लेके आएंगे तो खत्म हो जाएगा। सो यह संतोष मटेरियल चीजों के बारे में और असंतोष स्पिरिचुअल चीजों के बारे में। कामना वासना ही यदि रखनी है तो यह कामना वासना रखिए कि मेरे जप को जप की संख्या कैसे बढ़े। वैुंठ की बैंक में मेरा बैंक बैलेंस कैसे बढ़े।
प्रश्न: जिस तरह लाटू महाराज स्वामीजी को जप में हराना चाहते थे! Q: the way latu maharaj wanted to defeat swamiji in doing japam!
दैट इज़ या या तो ऐसा करके ही तो आप आगे बढ़ेंगे ना स्वामी जी भी तो एनकरेज करते थे ना डिबेट करने के लिए एनकरेज करते थे साधना करने के लिए एनकरेज करते थे स्वामी जी की साधनाओं का वर्णन इतना नहीं है व्हिच इज अ लॉस्ट टू अस एक्चुअली देखिए कि वराह नगर मठ में ठाकुर के रहते रहते स्वामी जी ने साधना कर दी नो दैट किंतु वरा सॉरी काशीपुर में काशीपुर में ठाकुर के रहते-रते स्वामी जी ने साधना कर दी नो दैट किंतु वराह नगर मठ में जो स्वामी जी ने साधना की है उसके बारे में अभी भी हमको ज्यादा पता नहीं है। थैंकफुली स्वामी जी के जो भाई है महेंद्रनाथ महीन ये लोग मोहिन करके पुकारा करते थे उनको तो उन्होंने ये जो स्वामी जी का जो लाइफ लिखा है तीन वॉल्यूम में है श्रीमद स्वामी जी विवेकानंदर जिबोनेर घटनावली तीन वॉल्यूम में है। तो उस उन्होंने वराह नगर मठ का बड़ा ही सुंदर आलेखन किया है। तो वहां पर हमको देखने को मिलता है कि स्वामी जी क्या तपस्या करते थे। भयानक तपस्या वह रात-रात भर वो लोग वह बैठे रहते थे। खाने को कुछ नहीं है। वहां पर आए हैं। एक दिन एक रात का वर्णन है तो पूरी रात माने कपड़े भी ज्यादा कुछ ठीक से पहनने को नहीं है। सर्दी की रात थी। अभी अग्नि जलाने के लिए ऐसा कुछ नहीं है। और वह पानी वाली चाय पी रहे हैं। स्वामी जी और अभेदानंद जी ये वो तो माने वो पानी वाली चाय यानी वो चाय की पत्ती डाल दी है। थोड़ा शुगर डाल दिया है। वो पानी उबाल करके पी रहे हैं। माने शरीर को तो थोड़ा बहुत वो एनर्जी चाहिए। गर्मी चाहिए। तो इस तरह से उन लोगों ने रातों रातों की रात बिताई है। और इस तरह से उन्होंने तपस्या की है। बड़ा ही सुंदर वर्णन है उसमें। बहुत सारे वर्णन है इस तरह के। सो देखिए कि तपस्या इन्होंने की है। स्वामी जी एनकरेज करते थे। दैट एंबिशन हैज टू बी देयर। उस समय ऐसा माहौल हो गया था वराह नगर मठ में कि बस अभी किसी ना किसी तरह से ईश्वर प्राप्ति करनी ही करनी है। जगत को संपूर्ण रूप से भूल जाना है। सो दैट हाईली चार्ज एटमॉस्फियर वास देर एट दैट टाइम। त्रिगुणातीतानंद जी ने यह जो वरा नगर का फेमस फोटो है ना स्वामी जी वगैरह सब खड़े हैं। कोई कौपिन पहना है तो ऐसा ऐसा सब पहन के हां तो क्या है कि वो वरागर मठ का बड़ा फेमस फोटो है। आई थिंक एक ही फोटो है वहां का उस समय का। तो अभी त्रिगुणातीनंद जी ने इस फोटो को अमेरिका में पब्लिश करना था। किंतु क्या है वहां पे तो ये सब डिसेंसी का एक एटमॉस्फियर होता है ना। सब कॉपीिन पहन के खड़े थे वो महापुरुष महाराज तो कैसा लगेगा तो फिर उन्होंने वह पेन से लेकर के कपड़े ड्रॉ कर दिए उसके ऊपर में फिर उसको पब्लिश किया तो वो मैंने देखा है उनका द्वारा पब्लिश फोटो तो देखिए कि एक्चुअली क्या है ना हम लोग इस तरह से एक डिसेंसी के कपड़े पहना देते हैं क्योंकि जो एक स्टार्क रियलिटी है देखकर के लोग डर जाएंगे और सतत ब्रह्मचर्य की बातें करना सतत तपस्या की बातें करना सभी लोगों को ठीक नहीं रहेगा तो जब हम प्रोजेक्ट करते हैं ना कुछ-कुछ एस्पेक्ट को ही इस तरह से कपड़े पहना करके आर्टिफिशियल प्रोजेक्ट करते हैं। तो तो ये पॉपुलर प्रोजेक्शन को पढ़कर के हमको वही लगेगा कि अच्छा ठीक है वो बाय बर्थ ही ऐसे थे और फिर वो प्रोजेक्ट हो गए तो ऐसा नहीं है। वरा नगर मठ में जो क्रुसिबल जो था माने सही में अग्निकुंड था वो हमारे लिए जिसमें से यह लोग निकले हैं। बाद में भी सिर्फ वरा नगर नहीं स्वामी जी के जो स्वामी जी वापस आए 1897 में जनवरी में तब तक अब 1896 ठाकुर की महासमाधि से लेकर के स्वामी जी के वापस आने तक 10 साल थे 10 साल सभी ने तपस्या की है इंक्लूडिंग मां शारदा