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Asmita || Practice to be Vulnerable || 28 Jul 2025

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ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः यहां पर हम लोग एव्री सैटरडे एक विवेकानंद यूथ फोरम स्टार्ट किया है। तो कुछ स्टूडेंट्स आते हैं और उनके साथ में वार्तालाप भी होता है। अ मैं मैं जो उनको सिखाता हूं मेनली जो पूरा प्लान है जो सेशन होता है वन आवर वन एंड हाफ आवर का सेशन चलता है ऑलमोस्ट तो फर्स्ट हाफ में मैं उनको मेडिटेशन सिखाता हूं फंडामेंटल्स ऑफ मेडिटेशन ध्यान कैसे करें और फिर सेकंड हाफ में कुछ इंटरेक्शन करते हैं। तो मैं उनको ध्यान सिखा रहा था। ध्यान सिखाते सिखाते मैंने कहा कि बहुत बार हम लोग क्या करते हैं जब ध्यान करने का प्रयास करते हैं मेडिटेशन करने का तो जनरली मेडिटेशन दो तरह के ऑब्जेक्ट्स के ऊपर में किया जाता है। एक तो है कि एक्सटर्नल ऑब्जेक्ट दूसरा है कि इंटरनल ऑब्जेक्ट। तो जैसे कि मेडिटेशन ध्यान का डेफिनेशन है देश बंधितस्य धरणा तत प्रत्यय एकतानता ध्यानम किसी एक ऑब्जेक्ट को अपने किसी एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में अपने मन को एकाग्र करना वह है धारणा और उसके प्रति अपना मन एक तान हो जाए एक लय से एक धारा से बहने लगे अपना मन उस ऑब्जेक्ट के प्रति तो हो गया ध्यान तो अभी इस ऑब्जेक्ट का सिलेक्शन विभिन्न तरह से किया जाता है। जैसे कि एक्सटर्नल जितने भी ऑब्जेक्ट्स है जिसके ऊपर में हम ध्यान करते हैं तो उसमें बहुत सारा कुछ है। पूजा है, पाठ है। फिर यह कर्म योग है, स्वाध्याय है, जप है, भगवान की मूर्ति का दर्शन करना है, आरती में उपस्थित रहना है। एक्सटर्नल वर्ल्ड में जो कुछ भी है उसको हम ध्यान में परिणत कर सकते हैं। यदि हमको यह टेक्निक आता है तो किंतु जब यह इंटरनल ऑब्जेक्ट के ऊपर में हम मेडिटेशन करने का प्रयास करते हैं। जैसे कि हम एक कंस्ट्रक्ट खड़ा करते हैं। जैसे कि हम इमेजिनेशन करते हैं कि मैं समुंदर के किनारे बैठा हूं। या तो फिर मैं दक्षिणेश्वर में हूं या तो फिर मैं बेलूरमठ में हूं। सुबह का प्रकाश, सुबह की किरण फैल रही है। चारों ओर मेरा मन एकदम शांत हो जा रहा है। यह सब जब मैं इमेजिनेशन करता हूं तो मैं अपने भीतर में किसी एक इस इमेजिनेशन के ऊपर में मन को केंद्रित करता हूं। मैं जब यह कह रहा था तब मैंने एक सूचना दी थी। मैंने कहा कि देखिए बहुत बार हम लोग यह इंटर इंटरनल मेडिटेशन जब करते हैं अपने मन को या तो फिर अपने अटेंशन को रिवर्स करने का प्रयास करते हैं। हम लोग ज्यादातर समय यह काम अपने ब्रेन के भीतर में करते हैं। एज इफ फॉर एग्जांपल कि मैं यह इमेजिनेशन कर रहा हूं कि मैं श्री रामकृष्ण देव के सामने बैठा हूं। उनका सुंदर स्वरूप में दर्शन कर रहा हूं। तो जब मैं यह इमेजिनेशन करूंगा या तो श्री रामकृष्ण देव के उनके ऊपर में मैं मन को एकाग्र करने का प्रयास करूंगा तो मैं उनको विजुअलाइज कहां पर करूंगा? मैं अपने ब्रेन के भीतर में ही विजुअलाइज करूंगा। यह विजुअलाइजेशन का लोकेशन है जैसे कि मेरा ब्रेन है। हमेशा ऐसा ही होता आ रहा है। जब तक हमको कोई प्रॉपर सूचना देने वाला नहीं मिलता। एक्चुअली जब भी आप अपना इंटरनल ध्यान करते हैं, अपने मन को अंदर की ओर रिवर्स करते हैं, भीतर में किसी एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में ध्यान करते हैं। जैसे कि यह कंस्ट्रक्ट खड़ा करना या तो भगवान का रूप दर्शन करना या तो फिर मंत्र का दर्शन करना, ओमकार का दर्शन करना वगैरह। तो हमेशा हमेशा उसको हृदय में ही विजुअलाइज करना चाहिए। हार्ट के ऊपर में ही यह विजुअलाइजेशन होना चाहिए। क्यों? क्योंकि ब्रेन जो है इट्स अ सीट ऑफ केओस, इट्स अ सीट ऑफ डिस्ट्रक्शन। एक्चुअली ब्रेन जो है वह ड्यूल एजेड स्वर्ड है। जब तक हम बाहर के जगत के साथ में डीएल करते हैं। हमारा पूरा डीएलिंग ब्रेन के माध्यम से ही होता है। क्योंकि ब्रेन बना है ह्यूमन ब्रेन कि बाहर के जगत के साथ में डीएल करने के लिए। किंतु इस ब्रेन को आप जैसे ही रिवर्स करेंगे अपने ऊपर में तो एक भयानक केओ स्टार्ट होगा। तो एक आपने वीडियो देखा होगा YouTube में मैंने देखा कि एक जंगल में एक आईने को रख देते हैं। अब यह जंगली पशु जो है उनको यह खुद का स्वरूप क्या है या तो मेरा एक रिफ्लेक्शन हो सकता है यह कांसेप्ट ही उनको नहीं है। तो अभी यह गोरिल्ला आता है। वह जैसे ही आईने में अपने को देखता है, पहले तो बड़ा आश्चर्यचकित हो जाता है। किंतु सेकंड दूसरे ही पल बड़ा ही अलार्म हो जाता है। बड़ा ही यह वो चौक चौकन्ना हो जाता है और गुस्से में आकर के कि डर के मारे वह फटाक के इस आईने को तोड़ देता है। क्यों? क्योंकि वो जब अपने को खुद को देखता है तो वह ऐसा कुछ देखता है जिसको देखने का उसने कभी भी यह एक्सपेक्टेशन नहीं किया या तो यह ऐसा कुछ हो सकता है। मैं खुद हूं। यह उसको कभी इमेजिनेशन ही नहीं होता। वो पूरे जगत को देखने के लिए अभ्यस्त है। शेर को देखता है। बिजली को देखता है। जंगल में लगी हुई आग को देखता है। सांप को देखता है। बड़े-बड़े खतरे। इससे बड़े खतरे। जंगल में यही सब बड़े खतरे हैं। आग लग जाती है जंगल में तो फिर वह पशु पंखियों को खत्म करके ले जाती है। शेर या जंगली पशु है तो वह भी बड़े डेंजरस होते हैं। तो खतरा उसने पूरा जीवन भर देखा है। किंतु उसने अपने खुद के स्वरूप को नहीं देखा। जैसा ही वह अपना खुद का स्वरूप देखता है उसको वो जो अपना स्वरूप है वह शेर से भी ज्यादा भयानक दिखता है। जंगल में जो दावानल जो प्रकट होता है उससे भी ज्यादा भयानक दिखता है। सांप या नाग से भी बड़ा भयानक उसको अपना खुद का स्वरूप दिखता है। तो क्या है कि यह ब्रेन जो है अपना वो बाहर की चीजों के साथ में डील करने के लिए बना है। यदि आप इस ब्रेन को या तो फिर ये अपना फोकस से अपने खुद के ऊपर में ये आप रिवर्स करना चाहेंगे तो हमेशा जो कोई भी आप विजुअलाइजेशन करें जो कोई भी आप दर्शन करना चाहते हैं जो कोई भी इंटरनल ऑब्जेक्ट के ऊपर में आप ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं उसको हमेशा हमेशा अपने हृदय में कीजिए क्योंकि हृदय है आत्मा का किल्ला जैसे कि श्री रामकृष्ण कहते हैं और दूसरी वह जो फ़ेमस कहानी है काली कृष्ण महाराज की भविष्य के स्वामी विजानंद जी तो वह काली कृष्ण महाराज मां को एक बार कहते हैं नए-नए जब आए थे तो मां को कहते हैं कि मां मैं अपने ये जो भ्रूमध्य है ये जो तीन चक्र है ना अनाहत विशुद्ध और आज्ञा तो हम लोगों को ऐसा लगता है कि अनाहत पे माने थिअरी क्या कहती है जैसे-जैसे आप ऊपर जाएंगे वैसे-वैसे चक्र का पावर बढ़ता जाएगा। तो अनाहत चक्र पे हृदय में ध्यान करने को वैसे तो सब लोग कहते हैं किंतु यह विशुद्ध है या तो फिर यह आज्ञा चक्र है वह क्या और पावरफुल नहीं होगा वो क्योंकि ऊपर में है तो तो फिर यह जो भी हो जो कुछ भी सोच करके किंतु काली महाराज ने यह आज्ञा चक्र के ऊपर में भ्रू मध्य पे ध्यान करने का प्रारंभ कर दिया। कुछ ही समय के बाद में उनको बड़े ही भयानक हेडेक होने लगे। माइग्रेन स्टार्ट हो गया। सर दर्द इतना भयानक सर दर्द। क्या करें बेचारे? तो फिर मां के पास में जाकर के कहते हैं कि देखिए मां मैं भ्रू मध्य पर ध्यान करने का प्रयास कर रहा था। किंतु इससे मुझे बड़ा ही जोरों से सर दर्द होता है। तो इसका क्या सॉल्यूशन है? तो मां ने एकदम चौक करके कहा कि अरे बाबा तुम क्या कर रहे थे? कभी भी भ्रू मध्य पे ध्यान नहीं करना है। ध्यान करना है हमेशा हृदय के ऊपर में। अनाहत चक्र के ऊपर में। तो यह दो फेमस है अपना जो ऑर्डर का जो टीचिंग है कि जब भी आप इंटरनल ध्यान करते हैं आपके ध्यान का ऑब्जेक्ट यदि इंटरनल है तो हमेशा उसको अपने हृदय में ही विजुअलाइज कीजिए। कभी भी उसको या अपने ब्रेन के भीतर में या तो सर के भीतर में विजुअलाइज कभी मत कीजिए। वह एक भयानक एक क्या कहेंगे कि इस तरह का केओस खड़ा करेगा। इतना भयानक एक परिस्थिति खड़ा करेगा कि जिससे बचना हमारे लिए मुश्किल हो जाएगा। तो यह एक मैंने ऐसा यूथ फोरम में कहा था सैटरडे को। तो हुआ ऐसा कि दूसरे ही दिन एक स्टूडेंट आकर के मुझे कहता है कि देखिए स्वामी जी मैं काफी लंबे समय से ध्यान करने का प्रयास कर रहा था और किंतु यह ध्यान करने से मेरी लाइफ में बहुत ज्यादा डिस्टरबेंस आना शुरू हुआ था और उसकी जो मां है वो मां ने उसको कहा कि अरे तुम यह सब क्या ध्यान वगैरह करते हो क्या मेडिटेशन वगैरह यह सब छोड़ दो इसको करना उचित नहीं है इसी वजह से तुम्हारे नेचर में यह सब डिस्टरबेंस खड़ा होता है। तो फिर उस स्टूडेंट ने मुझे कहा कि देखिए मुझे पता नहीं था कि एक्चुअली जब आप ध्यान करते हैं तो सर के भीतर में कभी ध्यान नहीं करना है। हमेशा हृदय में ही ध्यान करना है। तो वह कहती थी कि वो एक ही दिन उसने ऐसा प्रयास किया। उसी में उसको इतना बेनिफिट हुआ। तो कहते हुए कि मुझे यदि यह बात पहले से पता होती तो मैं कितना जो ट्रबल है मेरी लाइफ में यह सब बच जाता। तो देखिए मैंने कहा उस समय उसको कि बहुत बार हम लोग ध्यान करना है या फिर यह स्पेशली जो पावरफुल मेडिटेशन टेक्निक है स्पिरिचुअल टेक्निक वो क्या है ना कि हम YouTube वीडियो देख के ना कि किसी किताब पढ़कर के सीख लेते हैं। किंतु किसी के साथ में जो इस तरह के नॉलेज जिनका होता है या जिन लोगों के पास में एक्सपीरियंस होता है उन लोगों के साथ में इंटरेक्शन करने का हमको मौका नहीं मिलता। यदि यह मौका आपको जब तक नहीं मिलता है तब तक इस तरह की प्रैक्टिस सिर्फ किसी मैनुअल में से YouTube वीडियो में से देख के करना उचित नहीं है। क्योंकि क्या है पता है यह ऐसा है जैसे आप मेडिकल साइंस सीखने को जाते हैं। आपको 4 साल 5 साल स्टडी करना होगा। उसके बाद में इंटर्नशिप करना होता है। एक किसी एक्सपीरियंस्ड डॉक्टर के अंडर में आपको काम करना होता है। तब कहीं जाकर के आपको का एक्चुअली मेडिकल प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिलता है। तो यह मेडिकल प्रैक्टिस जो है ह्यूमन बॉडी जो है उसकी जो कॉम्प्लेक्सिटी है उससे कई गुना ज्यादा हजार गुना ज्यादा कॉम्प्लेक्सिटी अपनी इस माइंड की है। अपनी कॉन्शियसनेस की है। तो फिर हम किस तरह से एक्सपेक्ट करें कि एक छोटी सी किताब पढ़ करके या तो फिर एक YouTube वीडियो देख करके या छोटा सा एक स्पीच सुनकर के हमने ध्यान करने की शुरुआत कर दी और इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं आएंगे। इसलिए हमेशा किसी टीचर के साथ में इंटरेक्शन हो दैट इज प्रेफरेबल। तो वह एक्चुअली उसने मुझे जब कहा तो मुझे भाई काफी अच्छा लगा कि चलो एटलीस्ट मैं कुछ कहता हूं यहां पर तो उसका कुछ असर तो हो रहा है। दूसरा एक किसी के साथ में मेरा बात हो रहा था। उन्होंने कहा मुझे कि देखिए कि उनके फैमिली या तो फिर सोशल जो रिलेटिव्स है सोशल सर्कल है उसमें काफी स्ट्रेस उनको पहुंचता है। तो इसका क्या सॉल्यूशन हो सकता है? अभी देखिए सॉल्यूशन देने को तो हम दे ही सकते हैं। 10 चीजें बता सकते हैं। उसमें कुछ नहीं है। मैं अपना खुद का अनुभव बताता हूं कि मैं बेलूर मठ ज्वाइन करने को गया था। दैट इज कि मैं जब रांची से वापस आया तो मैं बेलूर मठ में मुझे बुलाया था इन लोगों ने। फिर बेलूर मठ से मेरा पोस्टिंग हुआ नागपुर। तो अभी नागपुर पोस्टिंग हुआ। मुझे कुछ ही महीने हुए हैं। उस समय एकाएक मेरे पास में न्यूज़ आया कि मेरे पिताजी का हार्ट सर्जरी बाईपास सर्जरी हुआ है। तो अभी मैं इतना आश्चर्यचकित हो गया। उन्होंने मुझे बताया भी नहीं कि सर्जरी होना है इस दिन होगा या ऐसा कुछ नहीं। सर्जरी होने के बाद में मुझे फोन किया। तो मैं तो एकदम अपसेट हो गया। मैंने सोचा कि क्या करें? फिर मैंने सुहितानंद जी को मैसेज किया बेलूर मठ में। वो हमारे इंचार्ज थे। तो मैंने उनको कहा कि इस तरह से पिताजी का बाईपास ऑपरेशन हुआ है तो मुझे क्या करना उचित है? तो मुझे कहा उन्होंने कहा कि तुम यदि घर जाना चाहते हो तुम जाकर आओ। तो मैं आया घर आया। अभी देखिए कि हम लोग गरीब तो नहीं है किंतु ऐसा नहीं है कि बहुत ज्यादा पैसा है और घर में यदि कोई जॉब करने वाला नहीं तो कैसे घर चलेगा? तो मैं कुछ दिनों इस तरह से था। तो उसमें मेरे पिताजी खुद कह रहे हैं कि एक काम करो तुम चले जाओ साधु बनना है तुमको तो अननेसेसरी तुम यहां पर टाइम वेस्ट मत करो और इसलिए उन्होंने मुझे पहले नहीं बुलाया सर्जरी के समय में वो कितना दौड़ा करना होता उन्होंने सब अपने से ही कर दिया था सब कुछ तो मैंने कहा क्या करें क्या ना करें फिर आखिर में ठीक किया कि नहीं ठीक है चलो अभी पिताजी खुद इंसिस्ट कर रहे हैं कि तुम जाओ हम घर देख लेंगे तो फिर इससे अच्छा और क्या हो सकता है तो मैंने किया ठीक कि चलो जाते हैं वापस। किंतु फिर से मैंने सुहिता जी को मैसेज किया। मैंने लिखा उनको एक मेल करके ईमेल करके कि महाराज मैं अपने घर में हूं। मैं वापस आना चाहता हूं। किंतु मैं डायरेक्ट नागपुर नहीं जाना चाहता। क्यों? क्योंकि मेरा माइंड थोड़ा सा अपसेट है। मैं अभी इस सिचुएशन में नागपुर चला जाऊंगा। आई डोंट नो कि मैं अब जैसे मेरे साथ पहली बार हुआ था। पहले वो रूरल डेवलपमेंट का था बोल के मैं बेलूर मठ में टिक नहीं पाया। मुझे जाना पड़ा। अभी यह दूसरा एक टेंशन मेरे सर पर सवार है। अभी फिर से कहीं ऐसा ना हो जाए कि मुझे परमानेंटली ऑर्डर छोड़ देना पड़े। तो सुहितानंद जी ने कहा एक काम करो ठीक है तुम बेलूर मठ आओ। कामरारपुर जय राम भाटी घूमना। एक आध महीना छुट्टी लेना बाद में तुम नागपुर जाना। तो मैं बड़ा खुश होकर के बेलूर मठ आया। रहा वहां पे मन शांत हुआ। कामरार पुरु जय राम भाटी सब पिलगिरी मैच किया। फिर एक दिन सुितानंद जी के साथ बात हो रही थी। तो उन्होंने कहा देखो तुम्हें गार्डनिंग करना। गार्डन में काम करना। यह जो खाली दिमाग होता है ना शैतान का घर होता है। जितना तुम बैठे-बैठे सोचते रहोगे, उतना ही तुम्हारा यह जो टेंशन है, तुम जो अपसेट हुए हो, तुम्हारा जो स्ट्रेस है, घर को लेकर के चिंता है, वह बढ़ता जाएगा। अननेसेसरी यह तुम बैठा मत रहना का बिना काम के। वैसे ही तो मेरा काम है मंदिर में। मंदिर में मैं बिजी ही रहता हूं। किंतु इसके बावजूद जो थोड़ा सा टाइम मिलता है बेटर के तुम गार्डन में काम करना। तो आई टूक हिज एडवाइस वेरी सीरियसली। जैसे ही मैं नागपुर वापस आया इमीडिएटली मैं वहां के जो बड़े महाराज थे उनको कहा कि महाराज मैं गार्डन में काम करना चाहता हूं। मेरा फ्री टाइम मैं गार्डन में बिताऊंगा। तो महाराज कहते हैं ठीक है उनको गार्डन का काफी शौक था। तो फिर उसी दिन से मैं गार्डन में पौधों को पानी देना है। फिर यह जो नए पौधे लगाने के लिए जो गड्ढा करना होता है। फिर यह लोन मूविंग जो है तो वो सब जितना स्टनस फिजिकल वर्क हो सकता था वो मैं करता था। मैं ब्रह्मचारी के कपड़े थे। सफेद कपड़े पहनता था। तो अभी प्रॉब्लम है कि मेरा ड्यूटी तो है मंदिर में। मंदिर में यदि जाना है तो स्पॉटलेस एकदम क्लीन वस्त्र पहन करके जाना है और गार्डन में काम करेंगे धूल मिट्टी यह गोबर सब कुछ लगेगा तो मैंने एक सेपरेट एक पेयर रख दिया था गार्डनिंग के लिए कपड़ों का धोती और कुर्ता तो वह पूरा एकदम स्टेन हो गया था वो इतना गंदा हो गया था यदि आप उस समय आकर मुझे देखते तो आपको ऐसा ही लगेगा कोई माली गार्डन में काम कर रहा है तो जो भी है मैंने ऐसा ऑलमोस्ट सात 7 आठ महीने तक किया अपने को जैसे कि फिजिकल वर्क में फेंक दिया था जिससे कि क्या हो कि और 10 तरह के जो भी विचार है सब दिमाग में से चले जाए तो सही में यह जो गार्डन थेरेपी मैं उसको कहता था उस समय ये गार्डन थेरेपी मेरे लिए इतना अच्छा काम किया वैसे ही तो गार्डन सुनहरा सुंदर गार्डन है और फिर यह पूरा फेंक देना है हमको उसमें सो ऑलरेडी मेरा एक्सपीरियंस है रांची में ट्राइबल एरिया में काम करने का एग्रीकल्चर फील्ड में काम करने का मुझे ऑलरेडी बहुत कुछ पता था गार्डनिंग के बारे में। हालांकि वही है कि रांची में मैं दूसरों से सब करवाता था। यहां पे मैं खुद करता हूं। तो जो भी है। सो ऐसा 7 आठ महीने गए मेरा माइंड एक बैलेंस हो गया। फिर मैंने गार्डन में काम करना धीरे-धीरे कम करके फिर पानी ही देता था एक टाइम बस। बाकी फिर मैंने धीरे-धीरे करके स्टडी की ओर मैं अपना पूरा डायवर्जन किया। तो क्या है कि यह जो मेंटल स्ट्रेस जब बहुत ज्यादा खड़ा होता है तो फिर इसके सॉल्यूशन इस तरह से हम खोज सकते हैं। सुहितानंद जी का दूसरा एक सॉल्यूशन था कि आप सबको कहते थे नॉट टू मी पर्टिकुलरली जो लोग बेलूर मठ ज्वाइन करने के लिए जाते थे कि आप लोग कोई ना कोई एक लाइफ लॉन्ग प्रोजेक्ट अपने हाथ में ले लीजिए। तो जैसे ठाकुर मास्वामी जी के कोई भी टॉपिक के ऊपर में उनके सेंटेंस जो है उनके टीचिंग से उसको कंपाइल करना। स्वामी जी ने स्वयं शशि महाराज को एक पत्र में लिखा था कि देखो तुम लोग यह सब निकम्मे गप बाजी लगाते हो। ठाकुर को खिचड़ी भोग लगाते हो वगैरह-वगैरह इसकी वजह एक काम करो। ऐसा नहीं है कि स्वामी जी नहीं चाहते कि ठाकुर की सेवा हो। किंतु वह चाहते थे कि एकेडेमिक इंटेलेक्चुअल एलिमेंट मठ के साथ में ऐड हो। तो स्वामी जी क्या लिखते हैं कि विभिन्न टॉपिकों के टॉपिकों के ऊपर में जैसे कि जप है, ध्यान है, त्याग है, वैराग्य है, शास्त्र है। ऐसे डिफरेंट-डिफरेंट टॉपिक्स के ऊपर में ठाकुर के जो सेइंग्स है उसका कंपाइलेशन करो। तो कुछ सीरियस काम होगा। जैसा स्वामी जी खुद ऐसा लिखते हैं। तो उस समय मैं अगेन यही सब सिचुएशन में से जा रहा था तो मैंने शारदा कोष पर काम करने का प्रारंभ किया था। तो दैट शारदा कोष अगेन हेल्प मी अ लॉट इन क्या है कि अपना पूरा जीवन उसमें डाल देते हैं किसी एक प्रोजेक्ट में तो फिर क्या है कि बाकी सब चिंता करने का अपने को समय नहीं मिलता है। सो दीज़ आर द सॉलशंस नो डाउट। किंतु यहां पर यह जो सोशल सिचुएशन में से जो स्ट्रेस प्रकट होता है, यह जो जीवन में जो टेंशन जो रहता है, लो लेवल टेंशन ये इसको सॉल्यूशन लाने के लिए ना सबसे पहले तो हमको एक फंडामेंटल थ्यरी समझना होगा कि अपना साइकोलॉजी या अपनी कॉन्शियसनेस किस तरह से काम करती है। तो देखिए कि हमारे सबके भीतर में एक होती है अस्मिता। जैसे योग शास्त्र हमको कहता है कि अविद्या में से प्रकट होती है अस्मिता। अस्मिता में से प्रकट होते हैं राग और द्वेष और राग और द्वेष में से प्रकट होता है अभिनिवेश। यानी कि अविद्या क्या है? हमको पता है। मेरा जो सही स्वरूप है मैं भूल गया। उसके ऊपर में माया या अज्ञान का पर्दा आ गया। तो फिर जो सबसे पहले यह जो अनहोली अलायंस है उसमें से सबसे पहले प्रकट होता है सबसे पहला जिसका जन्म होता है वो है अस्मिता तो यह उसके बाद में राग और द्वेष राग और द्वेष यानी कि किसी चीज के प्रति किसी व्यक्ति के प्रति या किसी सिचुएशन के प्रति मेरा प्रेम है और द्वेष यानी कि यही किसी सिचुएशन व्यक्ति वो लोकेशन उसके प्रति मेरा द्वेष है या घृणा है तो राग द्वेष और अभिनिवेश अर्थात कि यह जीजीविष्या जीवन जीने की आकांक्षा मृत्यु का भय तो यह जो सब कुछ जो प्रकट होता है राग द्वेष और अभिनिवेश तो उसमें सबसे पहला आता है अस्मिता ये अस्मिता क्या है अस्मिता का अर्थ है माय सेंस ऑफ सेल्फ मैं अपने को किस तरह से देखता हूं मैं अपने को खुद को किस तरह से समझता हूं देखिए अस्मिता इतना सटल है कि ज्यादातर समय हमको यह सेंस ही नहीं होता है कि मेरे भीतर में यह एक अस्मिता है। किंतु यह अस्मिता जो होती है हमारी यह सबसे स्ट्रांगेस्ट एक्सपीरियंस होता है हमारे जीवन का। मेरे सामने जो कुछ भी आता है, जो कोई भी घटना मेरे सामने आती है, जो कुछ भी कोई भी व्यक्ति के साथ में मैं डीएल कर रहा हूं, मैं अपनी अस्मिता के माध्यम से डीएल करूंगा। फॉर एग्जांपल जैसे वो ठाकुर का ही उदाहरण है। दो लड़के हैं वह साथ में खेल रहे हैं। एक लड़का जो है वो उसकी मां है उस घर की मालकिन और दूसरा लड़का है उसकी मां है उस घर की नौकरानी। राइट? अभी ये सिचुएशन ठाकुर ने खड़ी की है वो ठाकुर जिस कंक्लूजन की ओर ले जाते हैं वो दूसरा है। मैं सिर्फ इस सिचुएशन को खड़ी करके और एक चीज एक्सप्लेन करना चाहता हूं। यहां पर जो घर की मालकिन है उसका जो लड़का है उसके भीतर में बड़ी स्ट्रांग अस्मिता होगी कि हां मैं धनवान का पुत्र हूं। मेरी मां जो है बड़ी पावरफुल है। मेरे पिताजी जो है घर के मालिक है। उनके पास में सभी लोग झुकते हैं। यानी कि मेरे पास में पावर है। जबकि यह नौकरानी का लड़का है। उसकी अस्मिता जो है वह बड़ी वीक होती है। बड़ी नेगेटिव होती है। उसको पहले से ही पता है कि वह नौकरानी का लड़का है। मालिक के लड़के के साथ में झगड़ा होता है तो मालिक का लड़का उसको मारेगा भी तो भी वह बेचारा ज्यादा कुछ नहीं करने वाला है। शायद ऐसा होगा हुआ हुआ होगा कि पहली पहली बार कि झगड़ा हुआ होगा मालिक के लड़के ने उसको मारा है तो उसने सामने मारा होगा किंतु फिर वो जो मालिक है उसने नौकरानी को बोला होगा तो नौकरानी ने ही अपने बच्चे को डांट दिया होगा यानी कि यह बच्चा कुछ ही समय में समझ जाता है कि उसका जो पोजीशन है जो सोशल स्टेटस है रिस्पेक्ट है वो बिल्कुल नहीं है इस घर के भीतर में खास करके इन रिलेशन और रिलेटिव यह मालिक के लड़के के रिलेशन में या रिलेटिव टू मालिक लड़का उसकी जो पोजीशन है वो बड़ी लो है बड़ी निम्न है। तो उसकी अस्मिता जो है ना उसके ऊपर में बार-बार आघात होता है और उसके उसकी वजह से उसके भीतर में यह इंफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स जन्म लेता है। सब समय वह डरा डरा सा सहमा सहमा सा रहेगा। तो देश के साथ में भी ऐसा होता है। भारत की अस्मिता के ऊपर में बहुत सारे आघात हुए हैं। पिछले 1000 साल से बोलकर के थोड़ा बहुत प्रोग्रेस भी जो हम कर रहे हैं आज के युग में कि फिफ्थ लार्जेस्ट इकोनमी ये आईआईटी यह वगैरह-वगैरह स्पेस प्रोग्राम किंतु हमारे मन को ऐसा कोई संतोष नहीं होता है। क्योंकि बहुत लंबे समय से हमारी अस्मिता पे बहुत सारे आघात हुए हैं। ऑन द अदर हैंड यह अमेरिकन को देखिए। इस तरह से यह लोग बिहेव करते हैं जैसे कि जगत के यह लोग मालिक ही हैं। स्वामी जी ने कहा है कि यह आयरलैंड से यह पीट है ना कि ऐसा कोई यह पीट वगैरह कॉमन नेम है वहां पे आयरलैंड में। तो ऐसा कोई आदमी वहां पे जाता है। अभी यह आयरलैंड यानी कि ब्रिटेन के अंडर में था और ब्रिटेन का शासन था बोलकर के क्या है कि वे लोग बड़े ही डरे डरे सहमेसहमे से रहते थे। तो स्वामी जी कहते हैं एक आयरलैंड से एक आदमी आया। पहली बार तो जब जहाज से उतरता है तो उसकी कमर झुकी हुई है। वह बड़ा भय में रहता है। कहीं कोई उसको डांट ना दे। कहीं कोई उसको धमका ना दे। इस तरह से उसका बिहेवियर रहता है। किंतु यह अमेरिका की हवा में जो फ्रीडम है, वह फ्रीडम जैसे ही वह ग्रहण करता है, उसकी कमर सीधी हो जाती है। उसके भीतर में आत्मविश्वास जागृत होता है। करेज आता है। सीधा मुंह पर बात करने की एक कैपेसिटी आती है और अपने को समथिंग समझता है। यह घमंड कहो कि अहंकार कहो कि आत्मश्रद्धा कहो कि सेल्फ कॉन्फिडेंस कहो। वह उसके भीतर में प्रकट होता है और वह मैन बनता है, मनुष्य बनता है, वीर बनता है। तो, यह जो है यह है हमारी अस्मिता। व्हाट इज माय सेंस ऑफ सेल्फ? क्या मैं अपने को कमजोर महसूस करता हूं? क्या मैं अपने को कायर महसूस करता हूं? क्या मेरा सोशल स्टेटस, मेरा इकोनॉमिक स्टेटस ना कि यह जो जगत जो है जैसे मुझे क्रश कर दिया है इस जगत ने। मैं डरा डरा सा सहमासहमा सा रहता हूं ना कि फिर मैं अपने को एक बड़ा ही माने एक बलशाली धनी पावरफुल इस तरह का एक सुपीरियर एक आदमी समझता हूं। व्हाट इज माय सेंस ऑफ सेल्फ? तो यह सेंस ऑफ सेल्फ जो होती है अपनी यदि वीक या नेगेटिव होती है तो उसमें से यह इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स प्रकट होगा। किंतु यदि मेरा सेंस ऑफ सेल्फ मैं बड़े बड़े पॉलिटिशियन का लड़का हूं। हम लोग वो जो मैं बहुत सालों पहले यह जो मूवीज वगैरह देखता था टीवी सीरियल तो उसमें देखता था कि बड़े पॉलिटिशियन का लड़का कॉलेज के कैंपस में जाता है। सबको डराता है, धमकाता है, रेगिंग करता है और कोई उसके सामने कुछ नहीं बोल पाता। तो ये जो उस ये जो लड़का है उसका अस्मिता जो है सेंस ऑफ सेल्फ है बड़ा ही विशाल है बड़ा ही स्ट्रांग है इसके भीतर में घमंड होगा एोगेंस होगा और एक सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स इसके भीतर में जन्म लेगा अभी एक्चुअली आध्यात्मिक जीवन क्या है जस्ट हम एक थ्यरी एक्सप्लोर कर रहे हैं। एक आम आदमी को देखेंगे तो उसकी अस्मिता या तो वो अपने को कमजोर समझेगा। उसका जो सेल्फ वर्थ है, सेंस ऑफ सेल्फ है, वह बड़ा ही निम्न होगा और इसके भीतर में इनफरिटी कॉम्प्लेक्स होगा। वह डर डर करके सहम एकदम यह करके वह जीवन जिएगा वह है ना कि फिर उसका एक सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स है। उसका जो सेल्फ वर्थ की एक जो सेंस ऑफ सेल्फ वर्थ है बहुत ज्यादा है। अपने को क्या एक 30 मारखा समझता है। दूसरों पर अत्याचार करना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। मेरा एक एक अनुभव मैंने एक बार पहले बताया था। ये सब ज्यादातर तो ये सब चीजें हम मूवीज में देखते हैं ना टीवी पे देखते हैं तो ये मैंने रियल लाइफ एक्सपीरियंस कि मैं रांची में ही मैं जा रहा था गाड़ी में बैठकर के एकाएक रास्ता में वो दो-तीन पुलिस की गाड़ी आई और रास्ते को ही ब्लॉक कर दिया और उसमें से एक नेता की गाड़ी आई उसमें वो लाल बत्ती जलती है ना लाल बत्ती वाली रास्ते के ऊपर में ही गाड़ी खड़ी करके नेताजी बाहर निकल कर के शॉपिंग करने को गए तो मैंने सोचा भाई आपको यदि शॉपिंग करना है तो आप गाड़ी को थोड़ा सा पार्क कर दीजिए। रास्ता को क्यों ब्लॉक करके रखे हैं? सीधा रास्ते पे ही गाड़ी कर दिया। खड़ा कर दिया। बोलो आप क्या कर लेंगे? सब लोग बेचारे जितने भी हैं सब लोग ट्रैफिक जाम हो रहा है। मैं पीछे में ही था। मैं देख रहा हूं। पुलिस वाले हैं। नेता की गाड़ी एग्जैक्ट रास्ते पे बीच के बीच बीचोंबीच खड़ी है। और वह भीतर जाकर के कुछ काम था जो भी है। काम खत्म करके वापस आया। गाड़ी में बैठा और गाड़ी निकल ली। तब तक सब लोग चुपचाप बैठे थे। तो देखिए कि वह नेता जो होगा इस तरह से उसमें वह एक दम है कि रास्ते के बीच में ही गाड़ी खड़ा करेगा। आप पार्किंग पार्किंग करने की कोई जरूरत नहीं। बोलिए आप क्या कर लेंगे? तो उसकी जो अस्मिता होती है, सेंस ऑफ सेल्फ वर्थ होता है, बड़ा ही हाई होता है। उसके भीतर में एक सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स होता है। और एक और बहुत सारे लोगों का होता है कि अस्मिता जो है वो बहुत ज्यादा यह भी नहीं होती, लो भी नहीं होती और बहुत हाई भी नहीं होती। एक न्यूट्रल गियर में यह लोग चलाते हैं। तो यह भी एक होता है। चलिए अभी जिस क्षण आप आध्यात्मिकता में प्रवेश करेंगे साथ में ही आपको कहा जाता है कि आपको यह अपना घमंड जो है उसका त्याग करना है। तो अभी देखिए कि जिन लोगों की अस्मिता पहले से ही सहमी हुई थी। जिन लोगों का पहले से ही सेल्फ वर्थ जो है इतना निम्न था कि वह बेचारे अपने को बेचारा अपने को एक हीन एक घिनौनापन अपने प्रति जो महसूस करते थे उन लोगों के लिए इस तरह के उपदेशों को ग्रहण करना बड़ा ही सहज है। वह बाहर में भी तमस में थे और आध्यात्मिक जीवन में जो प्रवेश किया वह तमस को लेकर के ही प्रवेश करते हैं। तो अभी उन लोगों को ऐसा लगता है कि आध्यात्मिक जीवन के जो फंडामेंटल कांसेप्ट है ब्रह्मचर्य का पालन करना है। शरणागति प्राप्त करनी है अपने जीवन में वह सब मेरे से अभी ब्रह्मचर्य तो एक दूसरी चीज है। किंतु यह शरणागति तो मैंने पहले से ही प्राप्त कर ली है। क्योंकि मेरे भीतर में घमंड था ही नहीं। किंतु यहां पर ऐसे लोगों के साथ में प्रॉब्लम क्या है कि घमंड नहीं था। बात ठीक है किंतु इन लोगों के भीतर में एक अधम भावना थी। एक इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स था। उनकी जो अस्मिता थी पूरी तामसिक हो चुकी थी। पूरी वो खत्म हो चुकी थी भीतर से। तो ऐसे लोग यदि आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करते हैं ना तो दिखावा बड़ा करते हैं कि देखिए हम बड़े धार्मिक हैं इस अर्थ में कि हमारे भीतर में घमंड नहीं है। हमारे भीतर में अहंकार नहीं है। हमारे भीतर में शरणागति है। इस तरह का यह लोग दिखावा करते हैं। किंतु इस तरह के लोगों से बहुत ज्यादा कुछ आगे बढ़ा जाएगा नहीं। क्योंकि अस्मिता भले ही चाहे अब जैसे योगसूत्र ही कहता है कि इस पांच को पंचक्लेश कहते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश इन पांचों को दग्ध बीज करना है। चलिए अच्छी बात है। किंतु दगधबीज कब होगा? एक हेल्दी अस्मिता होगी तब वह उसको आप दगधबीज कर सकते हैं। एक जजरित अस्मिता जिसकी है एक नेगेटिविटी की ओर जिसकी अस्मिता चली गई है उसको तो सबसे पहले एक सेल्फ वर्थ खड़ा करना होगा। उसको सबसे पहले तो एक क्या कहेंगे कि आत्मसन्मान आत्मश्रद्धा खड़ी करनी होगी। तब तो कहीं जाकर के वो उसको खत्म कर पाएगा। यानी कि तमस में से सत्व में गति कभी नहीं होने वाली है इन लोगों की। तमस में से पहले रजस में जाना होगा। उनकी जो अस्मिता है उसको थोड़ा सा हेल्दी बनाना होगा। स्ट्रांग करना होगा। तब कहीं जाकर के यह लोग अस्मिता के परे जा पाएंगे। तो यह जो तामसिक लोग हैं जिनकी अस्मिता जैसे कि मर गई है जिनका यह जो सेंस ऑफ सेल्फ वर्थ है बड़ा ही घिनौना हो चुका है उन लोगों को सबसे पहले तो सेल्फ कॉन्फिडेंस डेवलप करना होगा। यह भारत में बहुत लंबे समय से हम लोग इस बात को समझ ही नहीं रहे थे। बोल के हमको स्वामी जी का जो मैसेज है आत्मश्रद्धा का इतना यूनिक लगता है और फिर बहुत सारे लोग यह भी सोचते हैं कि स्वामी जी जैसे कि ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी है उससे काफी दूर चले गए हैं। ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी में आपको शरणागति सिखाते हैं। यहां पर स्वामी जी आपको घमंडी होना सिखाते हैं। तो इस तरह का थिंकिंग जो लोग करते हैं उन लोगों को स्पिरिचुअलिटी का जो बेसिक साइंस है वही समझ में नहीं आता। तो चलो ये हो गया आपका कि जिसकी अस्मिता कमजोर हो गई है उनके बारे में। अभी जिसकी अस्मिता बड़ी ही स्ट्रांग है उन लोगों के बारे में क्या उन लोगों का जिसके भीतर में बड़ा भयानक घमंड है। बड़ा ही स्ट्रांग सेंस ऑफ सुपीरियरिटी है। बड़ा ही स्ट्रांग एोगेंस है। उन लोगों को शरणागति की ओर जाना होगा। उन लोगों को रिवर्स गति करनी होगी। उन लोगों को अपना हृदय जो है उसको खोलना होगा। तभी यह लोग जो है आध्यात्मिक जीवन में थोड़ा सा आगे बढ़ पाएंगे। अभी यह तो उन लोगों के लिए हुआ जिन लोगों का अस्मिता या तो फिर बहुत ज्यादा घमंडी नहीं है या तो बहुत ही ज्यादा अधम भावना जिन लोगों में नहीं है। जो लोग ज्यादातर न्यूट्रल गियर में चलते हैं। जिसमें से न्यूट्रल गियर में चलने वाले ज्यादातर हम सभी लोग आ जाएंगे। जिनका थर्ड फोर्थ गियर में गाड़ी चलता है या तो जिनका रिवर्स गियर में गाड़ी चलता है। ऐसे लोगों की संख्या कम ही होती है। अस्मिता का जहां तक प्रश्न है ज्यादातर लोग न्यूट्रल गियर में ही चलते होते हैं। तो जैसे कि हम लोग हैं आम आदमी। हम लोगों के लिए भी शरणागति का रास्ता उचित है। शरणागति हम लोगों के लिए शरणागति और आत्मश्रद्धा दोनों कल्टीवेट करना होगा। किंतु जब हम इस साइंस को नहीं समझते हैं या तो फिर इस आध्यात्मिकता में सर्वप्रथम प्रवेश करते हैं तो पता है हमारे सामने एक बहुत बड़ा डेंजर क्या प्रकट होता है? यह हम अस्मिता से मुक्त होने का प्रयास जब करते हैं। मेरा जो एक सेंस ऑफ सेल्फ वर्थ है, मेरा जो एक सेंस ऑफ आइडेंटिटी है, मेरा यह जो शील्ड है इस जगत के सामने, उसको हम लोअर करने का प्रयास करते हैं। बाहर के जगत में मेरी एक अस्मिता है। कोई भी आकर मुझ मुझे कुछ कह देगा तो मैं कमजोर बच्चे की तरह रोना नहीं शुरू कर दूंगा। मेरे में यदि थोड़ी सी भी अस्मिता है, थोड़ा सा भी एक सेल्फ रिस्पेक्ट है, मैं फटाक करके उसको सामने उत्तर दूंगा। क्यों भाई? तुम मेरे साथ में इस तरह की बात क्यों करते हो? यदि तुमको बात करना है, तो थोड़ा रिस्पेक्ट देकर बात करो। वरना चलते बनो यहां से। ऐसा बोलने का ज्यादातर लोगों में थोड़ा तो साहस होता है। तो अभी यह अस्मिता क्या है ना बाहर के जगत में हमारे सामने शील्ड की तरह है। एक प्रोटेक्शन की तरह है। और हम लोग सब तरह के लोगों को देखते हैं। चाहे ना चाहे कॉन्शियसली सबकॉन्शियसली हम सबका सेल्फ हम सबका साइको एनालिसिस करते ही रहते हैं। हमको इंस्टिंक्टिवली पता है कि यह जो आदमी है उसकी अस्मिता जो है इतनी लो है। आप उसको डांटेंगे भी ना तो वह बेचारा डर के मारे कुछ बोल नहीं पाएगा और दूसरी तरह का एक आदमी है उसकी अस्मिता इतनी स्ट्रांग है कि आप कभी उसको डांटने का सपना भी नहीं देख सकते हैं। यदि आपने डांट भी दिया तो सामने वह जोर से झगड़ा करने को आएगा और नॉट नेसेसरी कि वह बड़ा आदमी है, धनी आदमी है। बहुत इवन कॉमन लेवल पर भी जो लोग रहते हैं उनको भी आप थोड़ा सा भी मिसट्रीट करेंगे ना तो बड़ा जोर से रिएक्ट करेंगे कि आपने मुझे मिसट्रीट क्यों किया? तो माने नॉट नेसेसरी कि आपके पीछे कोई बड़े आदमी का हाथ होना चाहिए। आपके पिताजी करोड़पति ना बड़े पॉलिटिशियन मिनिस्टर फिनिशर होने चाहिए। नॉट नेसेसरी यह जो सेंस ऑफ सेल्फ वर्थ कुछ कुछ लोगों में बड़ी ही स्ट्रांग होती है। गरीब का भी लड़का यदि होता है मजदूर भी होता है। ओके रिक्शा वाला जो होता है प्लंबर जो होता है इलेक्ट्रिशियन जो होता है आजकल देखिए आपके घर में लोग आते होते आते हैं तो उनके साथ में थोड़ा सा मिसट्रीट करने का प्रयास कर लीजिए। देखिए वो क्या फड़ाक करके वो गुस्सा करके उत्तर देंगे। तो आजकल क्या है कि बहुत सारे लोगों में स्ट्रांग अस्मिता हो गई है। तो अभी हम लोग सब कुछ देखते हैं। हम सब कुछ एनालाइज करते हैं और हमने यह लेसन सीखा है कि जिसके भीतर में यह अस्मिता स्ट्रांग नहीं है। इस तरह के आदमी को सभी शोषण कर लेते हैं। इस तरह के आदमी का सभी लोग बेनिफिट उठा जाते हैं। गैर फायदा उठा जाता है। लोग सभी लोग उसके ऊपर में जाकर के सवार हो जाते हैं। मुझे अपनी अस्मिता को मुझे घमंडी नहीं होना है। किंतु अपनी अस्मिता को इतना तो स्ट्रांग रखना है कि कोई भी आकर के मेरा डिसएडवांटेज मेरा एडवांटेज ना ले। कोई भी आकर के मेरा शोषण ना कर जाए। कोई भी आकर के मेरे पर अत्याचार ना कर जाए। इतना तो मुझे अपने को सेल्फ प्रिजर्व करके रखना है। यह हम सभी लोग देखते हैं। और हम सभी लोगों ने एज ए रिजल्ट कुछ ना कुछ डिफेंसेस होते हैं। साइकोलॉजिकल डिफेंसेस खड़े कर दिए हैं। यह सब इज अ पार्ट ऑफ अस्मिता। मेरा सेल्फ ऑफ आइड मेरा सेल्फ सेंस ऑफ सेल्फ। मेरा सेंस ऑफ सेल्फ वर्थ व्हाट इज हु एम आई? मैं कौन हूं? मैं किस तरह से जगत के साथ रिएक्ट करूंगा? यह मेरी पर्सनालिटी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है। इसके बाद में फिर बाकी सब कुछ आता है कि मेरी बुद्धि कितनी है? मेरी मेमोरी कितनी जाती है? मेरा यह जो सोशल स्टेटस कहां पे जाता है? मैं ये राग द्वेष, अभिनिवेश यह सब क्या है? सब बाद में आता है। सबसे पहले आंख जैसे बच्चा खोलता है जन्म के बाद में वैसे ही उसकी अस्मिता जागृत हो जाती है। मैं कौन हूं? हु एम आई उसी के ऊपर में फिर वह बाकी का उसका पूरा पर्सनालिटी उसका पूरा लाइफ बिल्ड अप होता है। अभी इतना समझने के बाद में अब जैसे ही हम आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करते हैं। सबसे पहला चीज हमको सिखाया जाता है कि ये जो आपका सेंस ऑफ सेल्फ जो है सेंस ऑफ सेल्फ वर्थ जो है आपकी जो अस्मिता है उसको आपको सबसे पहले तिलांजलि देनी होगी। उससे सबसे पहले आपको मुक्त होना होगा। जब तक आप अस्मिता से आपकी अपनी अस्मिता से आपका जो एक सेल्फ आइडेंटिफिकेशन है या सेल्फ आपकी जो पर्सनालिटी है व्हाटएवर शब्द आप यूज करना चाहे उससे यदि आप मुक्त नहीं होंगे तो फिर आप आध्यात्मिक जगत में बहुत ज्यादा कुछ आगे नहीं बढ़ पाएंगे। वह जो फेमस जैन मास्टर की कहानी एक राजकुमार जापान की कहानी है। एक राजकुमार एक जैन मास्टर के पास में गया। राजकुमार कि बड़ा आदमी हु एवर वह गया एक जैन मास्टर के पास में कहता है कि मैं आपके पास में से शिक्षा ग्रहण करना चाहता हूं। तो यह जैन मास्टर ने बोला शांति यह जैन मास्टर तो होते हैं ना बड़े शांत होते हैं। एकदम सिरीन होते हैं। जो कुछ भी ना हो जाए आसपास में वह एकदम शांत होकर के बैठे रहते हैं। तो और कोई होता और इस तरह का बड़ा आदमी आता है तो खड़ा हो जाएगा। कितना स्वागत करेगा इधर-उधर करेगा यह सब यहां पे ये जैन मास्टर एकदम शांति से बैठे हुए थे। तो उन्होंने कहा प्रिंस को कि अच्छा ठीक है। आपको जहन शिक्षा ग्रहण करनी है। ठीक है। आइए हम चाय पीते हैं। जापान में वह टी सेरेमोनी होता है। बड़ा ही इलेबोरेट होता है। सुंदर वो चाइना के कप होते हैं छोटे-छोटे। फिर यह किटली में चाय उबल रही है। वो चाय के भीतर में पत्ते डाले हैं। यह स्वामी जी एक बार कहते हैं हम इंडियन लोगों को ही दूध वाली चाय पीने की हैबिट है। बाकी आप चाइना जापान जाकर देखिए। जहां पर ओरिजिनल टी कल्चर डेवलप हुआ था। वे लोग कभी भी चाय के भीतर में दूध नहीं डालेंगे। चाय के भीतर में दूध डालना यानी कि चाय को पोइजन बना देना। तो जो भी है अब स्वामी जी को मैंने भी पढ़ा है किंतु फिर भी मैं दूध वाली चाय पीता हूं। तो व्हाटएवर जापान है चाइना है वहां पानी में पानी को उबाल करके उसमें चाय के पत्ते डाले जाते हैं। व्हिच इज कंसीडर्ड टू बी द प्रॉपर्टी न ओरिजिनल टी। तो इस तरह से टी सेरेमोनी होती है। तो ये ज़न मास्टर ने वो जो सिरामिक के जो कप है चाइना के कप वो लाए दोनों के सामने रखे। किटली में से वो जो उबल रहा था पानी चाय के पत्ते डाले। खुशबू आ रही है। सुंदर एरोमा फैल गया है। अभी वो क्या करता है? प्रिंस का वो जो कप होता है उसमें वह चाय डाल रहा है। अब यह चाय डाल रहा है। डाल रहा है। कप भर गया तो उसको तो स्टॉप हो जाना चाहिए। किंतु नहीं वह डाल ही रहा है, डाल ही रहा है। चाय निकल कर के चारों ओर फैल रही है कप में से। तो वह प्रिंस बोल उठा कि अरे सर मास्टर आप क्या कर रहे हैं? चाय तो चारों ओर फैल रही है। आप रुक जाइए। तो फिर यह जैन मास्टर कहता है देखो भाई ये चाय का कप जैसे एक बार मैंने चाय डाल के भर दिया। उसके बाद में मैं और ज्यादा चाय डालता ही रहूंगा। तो क्या होगा? चाय ओवरफ्लो हो जाएगी। इसके भीतर में कुछ जाएगा नहीं। यदि चाय को कप के भीतर में रहना है तो कप खाली होना चाहिए। जैसे ही वह भरे हुए कप में आप चाय डालेंगे तो ओवरफ्लो ही होगी। भीतर में कुछ जाएगी नहीं। तो वैसे ही आपका जो माइंड है ना ऑलरेडी इतनी सारी चीजों से भरा हुआ है। ऑलरेडी आपके भीतर में जो घमंड है, अस्मिता है, एोगेंस है कि हां मैं विद्वान हूं। बस मुझे और थोड़ा सा एक्स्ट्रा सीख लूं तो मुझे एक एक ये रिकॉग्निशन मिल जाएगा। बड़े मास्टर के पास में आप सीखने को जाते हैं। बहुत सारे लोग प्रेस्टीज के लिए कि हां मैं उस मास्टर के पास में सीखा हूं। मुझे नेम रिकॉग्निशन चाहिए। ऐसा नहीं है कि आप उस मास्टर के पास जाकर के शरणागति पूर्वक उसके जो उपदेश है वह ग्रहण करना चाहते हैं। बस वही है कि उस मास्टर के साथ में एसोसिएट होकर के जो एक सोशल प्रेस्टीज मिलती है वो हमको चाहिए होती है। वो राजा महाराज के पिताजी की कहानी पहले तो राजा महाराज को ठाकुर के पास में जाने से मना कर दे रहे हैं। फिर ठाकुर ने कहा कि बुला के ले आओ एक दो बार उनको यहां पे। अभी उनके पिताजी तो जमींदार थे। बड़े आदमी थे। सोचा है फकीर के पास में मैं क्यों जाऊं। फिर भी गए बच्चे के लिए तो फिर देखा तो वहां पर वह डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट ने वह अधर् ने वगैरह बैठे हुए थे गवर्नमेंट के ऑफिसर कोलकाता के धनी गनी मानी व्यक्ति तो वो बड़ा ही इंप्रेस हो गया कि यह जो परमहंस है उनके पास में ऐसे लोग भी आते हैं। फिर उसके बाद में वह फिर राखाल के पिताजी खुद वो बीच-बीच में दक्षिणेश्वर जाते थे। इसलिए नहीं कि ठाकुर के प्रति कोई श्रद्धा बढ़ गई थी। किंतु ठाकुर के पास में यह जो गवर्नमेंट ऑफिसर आते थे उन लोगों के साथ में सलाह मशवरा करने के लिए कोर्ट केस वगैरह तो जमींदारों का लगा ही रहता है। तो ऐसे ऑफिसर का कोई उपदेश ले ले कुछ एडवाइस ले ले तो फिर उनको वहां पर काम लगेगा। तो क्या है कि ठाकुर के पास में आते हैं इसलिए नहीं कि ठाकुर के उपदेश उनको बड़े पसंद आ गए हैं। ठाकुर के पास में आने से जो एक सोशल प्रेस्टीज मिलता है वो वो ग्रहण करना चाहता है। तो यहां पे भी जैन मास्टर ने उसको कहा कि तुम्हारा माइंड जो है ना इतना खुद के विचारों से खुद का अहंकार से इतना भरा हुआ है कि मैं जो कुछ कहूंगा तुम कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाओगे। तो यह देखिए कि स्पिरिचुअलिटी में प्रवेश करने के साथ में ही इस तरह की हजार कहानियां हम लोगों ने सुन ली है। तो फिर हम लोग कॉन्शियसली क्या करने का प्रयास करते हैं कि मेरी जो अस्मिता है, मेरा जो घमंड है, मेरा जो सेंस ऑफ सेल्फ वर्थ जो है उसको लोअर करने का प्रयास करते हैं। बाहर के जगत में जिसको कि मैंने प्रोटेक्शन के रूप में शील्ड के रूप में व्यवहार किया है, यूज किया है। उस शील्ड को उस प्रोटेक्शन को लोअर करते हैं। तो जैसे ही किंतु दिस इज़ पैराडॉक्सिकल जैसे ही हम अपना शील्ड लोअर करते हैं स्पिरिचुअल वर्ल्ड में प्रवेश करके साथ-साथ में ही हम बड़े ही व्नरेबल हो जाते हैं। यहां पे बाहर के जगत में कोई भी आदमी आकर के हमको गाली देगा हम लोग फटाक करके उसको दो गाली सामने दे देंगे। क्यों रे भाई तुम्हारा साहस कैसे हुआ मेरा अपमान करने का? किंतु एक बार हम स्पिरिचुअल हो गए तो हमको ऐसा लगता है कि दीनहीन भाव जो है यह शरणागति जो है जो लोगों की अस्मिता कमजोर थी जो लोग बेचारे इंफिरियरिटी कॉम्प्लेक्स से पीड़ित थे उन लोगों को हम आध्यात्मिक आइडियल मान लेते हैं और सोचते हैं कि अरे मैं तो अपना प्रोटेक्शन बड़ा इजीली कर पाता हूं। ऐसा मैं यदि करता रहूंगा तो मैं स्पिरिचुअल कैसे होऊंगा। बेटर है कि जो आदमी कमजोर है, जो कि इनफिरिटी कॉम्प्लेक्स से पीड़ित है, जो कि अपने को दीन हीन अधम समझता है, उसको मैं अनुसरण करने का प्रयास करूं। उसका मैं अनुकरण करने का प्रयास करूं। ऐसा जो एक मिसकंसेप्शन जो खड़ा हो जाता है बोलकर के हम लोग आध्यात्मिक जगत में बड़े ही व्नरेबल हो जाते हैं। यानी कि देखिए कि कहां आध्यात्मिकता हमको एक सेंस ऑफ स्ट्रांगर सेल्फ देनी चाहिए कि हां मैं यह पंचमहाभूत का देह नहीं। मैं तो यह समग्र विश्व ब्रह्मांड को जो आवृत्त करके रखता है या तो फिर यह विश्व ब्रह्मांड स्वयं एक तिनके के बराबर जो है इतनी महान आत्मा यह मेरा सही स्वरूप है। यह जो प्रचंड आत्मविश्वास जो प्रकट होना चाहिए उसकी वजह होता क्या है कि हम लोग कुछ समय के लिए बड़े ही व्नरेबल हो जाते हैं। अभी देखिए ऐसा वनरेबिलिटी का अह क्यों होती है और होता क्या है आगे जाके सबसे पहली बात है कि जैसे ही मैंने आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश प्रवेश किया तो ऐसा नहीं है कि मेरी जो अस्मिता है वो इसको जैसे कि परश मणि स्पर्श करके सोने की हो जाएगी। आज मैं घमंडी हूं या अध मेरे भीतर में जो अधम भावना है वो इमीडिएटली आत्मश्रद्धा में परिणत हो जाएगा। ऐसा तो होने वाला नहीं है। आपको कुछ समय के लिए अपने को वनरेबल रखना ही होगा। यह वलनेरेबिलिटी जो है वह अपना टेस्ट है। वह अपनी तपस्या है पैराडॉक्सिकली कि बाहर के जगत में हमको जो कष्ट सहन करना पड़ता है यह सब सोशल सोशल सिचुएशन की वजह से यह जो स्ट्रेस आता है उसकी वजह से उससे 10 गुना टेंशन स्ट्रेस और यह सोशल प्रॉब्लम आपको आध्यात्मिक जगत में फेस करने पड़ेंगे। क्योंकि बाहर के जगत में आपके पास में अस्मिता रूपी शील्ड है, प्रोटेक्शन है जो कि आध्यात्मिक जगत में आपके पास में नहीं रहने वाला है। आप बिल्कुल वल्नरेबल हो जाएंगे और आप उस समय सोचेंगे कि भाई यह तो आध्यात्मिक जगत बड़ा डेंजरस है। बेटर है कि चलो हम वहीं पर वापस चले जाए बाहर के जगत में। तो फिर होता क्या है? पता है दो चीज होगा। आइदर कि आप लिटरली स्पिरिचुअल फील्ड को छोड़ देंगे। दूसरा कि स्पिरिचुअल फील्ड को लिप सर्विस देंगे। दिखावा करेंगे कि मैं धार्मिक आध्यात्मिक स्पिरिचुअल हूं। किंतु भीतर में घोर संसारी ही है। भीतर में आप 10 तरह के वो तलवार और यह ढाल जो है यह शील्ड एंड स्वॉर्ड है। उसको ले खड़े हैं अपना प्रोटेक्शन करने के लिए। आपका हृदय खुला नहीं है। तो इस तरह की कुछ एब्नॉर्मेलिटीज आ जाएगी। आइडियली स्पीकिंग क्या होना चाहिए? जैसे ही आपने अपना शील्ड लोअर किया, जैसे ही आप अस्मिता के चंगुल से अपने को मुक्त करने का प्रयास करते हैं। साथ-साथ में ही आपकी वलनेरेबिलिटीज जो है एक्सपोज हो जाएगी। आपको जो छोटे-छोटे ये जो प्रसंग भी जो होते हैं ना छोटी-छोटी घटनाओं भी जो होती है आपके माइंड के भीतर में हजार गुना ज्यादा वो इको म वो मल्टीप्लाई करके वो उसका जो ये इफेक्ट आपके माइंड के भीतर में होगा। तो होने दीजिए। लेट योरसेल्फ बी वलनरेबल। यह हमारा सबसे बड़ा टेस्ट है। यदि हम अपने को ईश्वर प्राप्ति करने के लिए वनरेबल बना सकते हैं, तो ही ईश्वर हमारे पे प्रसन्न होंगे। यह टेस्ट हमको आध्यात्मिक जीवन में देना होगा। हमको यह व्नरेबल होना सीखना होगा। ईश्वर के प्रति शरणागति प्राप्त करनी होगी। किंतु यह जो व्नरेबिलिटी हमारी है वह हमारा अधम भाव नहीं है। इनफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स नहीं है। वह बिल्कुल अलग है। यह सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स और इनफीरिटी कॉम्प्लेक्स यह दोनों बिल्कुल अलग है। सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स को कभी भी आत्मश्रद्धा के साथ में इक्वेट मत कीजिए। आत्मश्रद्धा इस कंप्लीटली डिफरेंट। डिवाइन जो मेरा स्वरूप है उसके भीतर में से वह प्रकट होती है। तो साथ में ही शरणागति को इस अधम दीनहीन भावना के साथ में कभी भी कंपेयर मत कीजिए। क्योंकि शरणागति इज एन एक्टिव एक्ट ऑफ इज ए एक्टिव एक्ट ऑफ सेल्फ सैक्रिफाइस। यह जो मुझे ईश्वर के सामने बलि देना है तो दो तरह के बलि दिए जाते हैं। आप दूसरे को पकड़ कर के बलि देंगे। क्यों? क्योंकि बलिदान में तो कष्ट होता है ना। तलवार पड़ेगी तो गर्दन के ऊपर में और दूसरा बलिदान होता है अपना खुद का बलिदान। देखिए कि यह काली मंदिर में दो तरह के बलिदान हो चुके हैं। एक जगह तो है कथामृत में ही वर्णन है कि वो बकरे का बलि दे रहे थे तो ठाकुर देख नहीं पाए। ठाकुर का हृदय कोमल हो गया है। वह वहां से चले गए। तो वह तो एक तरह का बलिदान होता है। दूसरों को कष्ट देकर के बकरे का बलिदान हम देते हैं। दूसरा होता है अपना खुद का बलिदान जो कि श्रेष्ठ बलिदान है। ठाकुर ने स्वयं देना चाहा था। मां के हाथ में से खड़ग उठा के अपने गले के पास में लाकर कहते हैं कि मां दर्शन दो वरना तो मेरा ही गला काट दूंगा। उस समय ठाकुर ने ऐसा नहीं कहा कि मां आपको 1000 बकरे की बलि दूंगा। तब आप यदि आप मुझे दर्शन देंगे तो। ऐसा ठाकुर ने नहीं कहा क्योंकि यह जो आत्मबलिदान है वही सर्वश्रेष्ठ बलिदान है और ठाकुर की बलिदान की भावना से खुश होकर के मां ने ठाकुर को दर्शन दिया तो ये दो बाहर का जो जगत है भौतिक जगत उसमें हमारे सामने है इंफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स एक हीन अस्मिता और एक घमंड से भरी एोगेंस से भरी अस्मिता और आध्यात्मिक जगत में अपने पास में आता है शरणागति और आत्मश्रद्धा। जैसे ही हम शरणागति के रास्ते पर चलेंगे शुरू शुरू में तो हम एक्सपोज हो जाएंगे। अपनी व्नरेबिलिटी सब बाहर आ जाएगी। तो इस टेस्ट को हमको पार करना ही करना है। उस समय जो हम फेल हो गए आध्यात्मिक रास्ते पर चलने का प्रयास तो किया है। किंतु जैसे ही मेरी व्नरेबिलिटीज एक्सपोज हो जाती है। जैसे ही मेरे पर अटैक होना शुरू हो जाते हैं। वैसे ही मैं वही पुराने ढाल तलवार को लेकर के खड़ा हो जाऊंगा और चिल्लाना शुरू कर दूंगा कि कौन हो तुम मुझे डांटने वाले मेरा इंसल्ट करने वाले। पता नहीं है मैं कौन हूं। वगैरह-वगैरह जो संसार में होता है वही आध्यात्मिक जीवन में भी प्रारंभ हो जाएगा। किंतु प्रॉब्लम क्या है ना इस तरह का जो घमंड से भरा जो बिहेवियर है इस तरह की अस्मिता को आध्यात्मिक जगत में ले आ के आध्यात्मिक वाघा पहना करके आध्यात्मिक वस्त्र पहना करके जब आप उसको प्रोजेक्ट करते हैं तो एक धर्म की तो हानि होती ही है। लोगों के भीतर में धर्म के संबंध में बड़ी ही बुरी भावनाएं फैलती है। हम लोग खास करके मेरा जो एक सेकुलर अपब्रिंगिंग था मेरा एक सेकुलर आउटलुक था मेरे मन में यह दृढ़ बैठ गया था कि यह जितने साधु बाबा जी लोग हैं सब घमंडी है सब तामसिक है सब क्रूर है सब क्रोधी है सब निकम्मे है ऐसी एक मेरा वो एक पॉपुलर कल्चर को ग्रहण करके हो गया था मेरे माइंड में तो वो कब होता है पॉपुलर कल्चर भी तो हवा में से प्रकट नहीं होता है ऐसे इंसिडेंट के ऊपर में ही तो यह सब पॉपुलर कल्चर खड़ा है आध्यात्म त्मिक होने का प्रयास किया। अपने को वनरेबल बनाने का प्रयास किया। किंतु यह वलनेरेबिलिटी सहन नहीं हो सकती है। यह अटैक जो होते हैं, यह शार्प बार्ब्स जो होते हैं, हमारी कॉन्शियसनेस की ओर आते हैं। कोई हमारा इंसल्ट करता है, कोई हमको धमकाता है, कोई हमको तुच्छ ताक्षिल्य करता है। तो इमीडिएटली ये जो जन्म जन्मांतर के जो संस्कार है सेल्फ प्रिजर्वेशन के सेल्फ इवोल्यूशन जो हमने ये सब जो दिया है सेल्फ प्रिजर्वेशन जो है वो मनुष्य का सबसे स्ट्रांगेस्ट ये हमारे डीएनए के भीतर में बैठा हुआ है। तो ये जन्म जन्मांतर के सेल्फ प्रिजर्वेशन के संस्कार फटाक करके खड़े हो जाएंगे। फटाक करके हम ये सामने फाइट बैक करेंगे। किंतु जिस क्षण हमने फाइट बैक किया उसी क्षण हम फिर से वह संसार की ओर चले आए। इमीडिएटली भौतिक जगत की ओर चले आए। इमीडिएटली आध्यात्मिकता से दूर हो गए। तो आध्यात्मिक जगत में जब प्रवेश करते हैं और फिर आप यदि कंप्लेन करते हैं कि देखिए मुझे यह सोशल सिचुएशन बड़ी स्ट्रेस दे रही है तो फिर क्या है कि आपको आध्यात्मिक जगत क्या है? उसका ठीक-ठीक जानकारी लेना होगा। यह आपका टेस्ट है। आप इससे पार हो जाइए। पार कैसे होना है? टेस्ट में पास कैसे होंगे? देखिए, मैं खुद के एक्सपीरियंस से बताता हूं। जैसे ही आप अपनी अस्मिता को लोअर करते हैं, जैसे ही अपने शील्ड को लोअर करते हैं। जैसे ही यह सेल्फ डिफेंस को आप लोअर करते हैं। साथ-साथ में ही जो अटैक होगा, उसके सामने आपके भीतर में बड़ा ही ग्लानी प्रकट होगा, बड़ा ही पश्चाताप प्रकट होगा, बड़ा ही दुख प्रकट होगा, स्ट्रेस प्रकट होगा। किंतु इस ड्रेस को सहते जाइए, सहते जाइए, सहते जाइए। बिना फाइट बैक किए। जैसे ही आप फाइट बैक किए, सब खत्म। आप फिर से स्क्वायर वन की ओर चले आए। फिर से भौतिक जगत की ओर चले आए। किंतु यह स्ट्रेस आप सहन करते गए, करते गए, ईश्वर को प्रार्थना करते गए। शरणागति आपने जो भी हो जाए, मैं फाइट बैक नहीं करूंगा। जो भी हो जाए, मैं सेल्फ डिफेंस नहीं करूंगा। जो भी हो जाए, मैं सेल्फ प्रोटेक्शन नहीं करूंगा। भले ही स्ट्रेस चाहे मुझे मार दे, भले ही यह स्ट्रेस चाहे मुझे ब्लड प्रेशर, डायबिटीज की ओर ले जाए, डज नॉट मैटर। मैं ईश्वर की ये जो ईश्वर के प्रति श्रद्धा है, ईश्वर के प्रति जो मुझे विश्वास है, उसको मैं पकड़ करके रखूंगा। तो क्या होगा? पता है यह जो स्ट्रेस जो होता है सोशल सिचुएशन में से सामाजिक वो जो सब संबंधों में से प्रकट होता है एक ना एक दिन उसका अंत आना है और उस दिन सही-सही शरणागति और सही-सही आत्मश्रद्धा हमारे भीतर में प्रकट होगी और उस दिन हमारा मन दिव्य आनंद से भर जाएगा और वह जो दिव्य आनंद है एक बार जब प्राप्त होगा तब हमको पता चलेगा कि यह जो अपनी अस्मिता थी वो कितनी तुच्छ तुच्छ थी कि पशुवत थी। इस अस्मिता के सहारे क्या हम भवसागर पार करना चाहते थे? उस अस्मिता को छोटी सी तुच्छ तिनके भर अस्मिता को लेकर के यह सेल्फ आइडेंटिफिकेशन या सेंस ऑफ सेल्फ वर्थ को लेकर के क्या हम यह ब्रह्मांड में तैरना चाहते थे। भवसागर पार करना चाहते थे। कितना बड़ा मैं मूर्ख था वो सेंस आना शुरू होगा। किंतु यहां से यहां तक की जो जर्नी है आपने अस्मिता का त्याग किया और आपको दिव्य आनंद की प्राप्ति हुई। इसके बीच का यह जो जर्नी है ना वो बड़ा ही डेंजरस जर्नी है। बिना अस्मिता के, बिना सेल्फ डिफेंस के, बिना सेल्फ प्रोटेक्शन के आपको रहना है। भयानक स्ट्रेस आएगा। इस स्ट्रेस को कैसे भी करके सहन करना है। यह टेस्ट यदि आप पार हो जाएंगे। यही आपकी सही तपस्या है। श्मशान में रात भर जगना एक पैर पर खड़े रह के हजार साल तपस्या करना ना कि यह उपवास करते रहना। यह सब चीजों से ज्यादा कुछ होने वाला नहीं है। भगवान बुद्ध ने हमको बता दिया है। इसकी वजह सर्वश्रेष्ठ तपस्या यही है कि अपने शील्ड को लोअर कीजिए। अपनी अस्मिता जो है उसको जैसे कि तिलांजलि दे दीजिए ठाकुर के सामने मां काली के सामने बलि दे दीजिए उसका और व्नरेबल होकर के रहिए यह व्नरेबिलिटी आपको 1000 1 लाख एक करोड़ समस्याएं खड़ी करेगी डज नॉट मैटर इस टेस्ट को पार कर लीजिए जैसे ही ठाकुर का आशीर्वाद मिलेगा ठाकुर देखेंगे कि हां मेरा भक्त मेरे लिए वनरेबल होने को तैयार है तो वैसे ही ठाकुर के आशीर्वाद बरसेंगे और अपना हृदय जो है दिव्य आनंद से भर जाएगा। तो यह एक थोड़ा सा अपनी आध्यात्मिक जर्नी का एक सीक्रेट अभी कल मिलते हैं आज यहीं तक। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु। अस्मिता के बारे में जब हम बात करेंगे ना तो हमको ना इसको दो डिवीजन में बांट देना होगा। एक तो है कि जागतिक जगत में अस्मिता दूसरा है कि आध्यात्मिक जगत में। अभी जागतिक जगत में देखेंगे ना तो विकृत अस्मिता क्या है? तो वह है इंफरिटी कॉम्प्लेक्स और सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स। या तो मेरे भीतर में बहुत ही ज्यादा हीन भावना है या तो फिर मेरे भीतर में बहुत ही ज्यादा घमंड है। ये घमंड मुझे दूसरों का शोषण करने को प्रेरित करेगा और हीन भावना जो है मुझे ऐसा डरा डरा सहमा सहमा करके रखेगा कि इस जगत में कुछ मैं ज्यादा प्राप्ति नहीं कर पाऊंगा। पशुवत मेरा जीवन हो जाएगा। तो ये दोनों है एबनॉर्मल। एक हेल्दी अस्मिता क्या होनी चाहिए कि मुझे एक सेल्फ कॉन्फिडेंस होना चाहिए। करेज होना चाहिए। भले ही चाहे थोड़ा बहुत घमंड हो इसमें किंतु इसकी वजह से मैं दूसरों का शोषण ना करूं। मेरे में सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स ना हो। इसको एक हेल्दी अस्मिता कहेंगे। किंतु यह डेफिनेशन जो हो गया कि इंफरिटी कॉम्प्लेक्स, सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स और एक हेल्दी अस्मिता। यह हो गया आपका जागतिक जगत में। आध्यात्मिक जगत में जैसे ही आप प्रवेश करते हैं तो साथ-साथ में ही आपको अस्मिता का ही तिलांजलि देना है। जब तक आप अपनी अस्मिता का त्याग नहीं करेंगे हमने आध्यात्मिक जगत में प्रवेश ही नहीं किया है। आध्यात्मिक जगत में प्रवेश की साइन क्या है कि मैंने गिरवा पहन लिया है। तिलक लगा के घूमता हूं। पीतांबरी पहनता हूं। माला करता हूं। मंदिर में जाता हूं। यह सब साइन है ना कि आध्यात्मिक जगत में प्रवेश की साइन है कि अस्मिता को तिलांजलि दिया है, सैक्रिफाइस किया है, बलिदान किया है और त्याग का रास्ता अपनाया है। इंद्रियों के विषयों का त्याग और अस्मिता का बलिदान। यह है स्पिरिचुअल लाइफ की साइन। यह चाहे मैं गेरवा पहन के करूं ना कि मैं यह जींस और टीशर्ट पहन के करूं। डज नॉट मैटर। मेरे में यह दो चीज होनी चाहिए। तभी मैं आध्यात्मिक हूं। तो अब जैसे ही मैंने आध्यात्मिक जगत में प्रवेश किया अस्मिता का बलिदान दिया तो उस समय बीच का जो पीरियड है मैं बड़ा वनरेबल हो गया किंतु एक बार मुझे सिद्धि प्राप्त हुई ना तो आत्मश्रद्धा और शरणागति प्रकट होंगे। तो अभी देखिए कि इस पूरे आप तीन डिवीजन में बांट सकते हैं। एक तो है जागतिक जगत जिसमें कि इनफरिटी कॉम्प्लेक्स है, सुपरियो कॉम्प्लेक्स है और एक हेल्दी अस्मिता है। एक तो है बीच वाला पीरियड। जबकि आप वनरेबल है। यू हैव चूज टू बिकम वनरेबल। जिसमें अधम भावना है और जो साधक है उसमें डिफरेंस क्या है? जिसमें इंफरिटी कॉम्प्लेक्स है हीन भावना है उसके पास में बेचारे के पास में चॉइस नहीं है। जगत उसको हीन बना देता है। गरीब का लड़का है, भिखारी का लड़का है उसको जगत ही उसको हीन बना देता है। जबकि जो साधक है ही हैज़ चूज टू बिकम वनरेबल आउट ऑफ सेल्फ एफर्ट। मेहनत करके वो वनरेबल हो रहा है। तो वो सेकंड पीरियड है। थर्ड पीरियड है कि आपके भीतर में शरणागति और आत्मश्रद्धा प्रकट हुए है। सो दिस इज हाउ यू हैव टू सी स्वामी जी और रंगनाथानंद जी ने जो बार-बार लोगों को कहा करेज प्रकट करने को सेल्फ कॉन्फिडेंस प्रकट करने को। तो उसके लिए जो आत्मश्रद्धा जो कि एकदम उच्च आध्यात्मिक कांसेप्ट है वहां पर जाने से पहले जो आप जागतिक जगत में हीन भावना से जो पीड़ित है क्योंकि हजार साल की गुलामी सहन की है। इवन आज भी छोटे-मोटे आसपास के पड़ोसी देश आकर के कुछ ना कुछ कर जाते हैं। हम लोग उसका कुछ ठीक से उत्तर नहीं दे पाते। बोलकर के भारतीय लोगों में हीन भावना बड़ी प्रबल है। थी और है। तो उसका सॉल्यूशन है जागतिक जगत में ही एक हेल्दी ईगो डेवलप करें। एक हेल्दी अस्मिता डेवलप करें जो कि आपको इस जागतिक जगत में एटलीस्ट वो आपको हीन होने से बचाए। सो उस तरह से बहुत सारा इंटरप्रिटेशन स्वामी जी का और रंगनाथानंद जी का कर सकते हैं। स्वामी जी कहां-कहां वो आध्यात्मिक आत्मश्रद्धा की बात करते हैं। कहां यह जागतिक जगत में सेल्फ कॉन्फिडेंस की बात करते हैं। उसको तो आपको सेंटेंस बाय सेंटेंस देखना होगा। किंतु इन जनरल यह प्लान है। किंतु सांप वाली कहानी में ठाकुर साथ-साथ में कहते हैं कि साधु को फंकार भी नहीं करना है। इस अर्थ में कि साधक को अपने को पूरा वनरेबल करके रखना है। लाठी से मार रहे तो मार खाना है। वो सांप के लिए था। इस अर्थ में कि संसारी के लिए अपना का सेल्फ रिजर्वेशन का कांसेप्ट है। साधक के लिए सेल्फ रिजर्वेशन वाला कांसेप्ट ही नहीं है। यहां पे यहां पे आपको किस तरह से देखना है पता है? अब जैसे मैं अपना खुद का एग्जांपल देता हूं। हम लोग कभी मैं खास करके एक मास्क पहन लेता हूं कभी-कभी। जबकि मैं यह डीएल करता हूं। अभी यहां पे तो कुछ है नहीं ऐसा। किंतु मैं पब्लिकेशन में था तो सब तरह के लोगों के साथ में डीएल करना है। अभी कोई-कोई लोग अपने साथ में चीटिंग करने का भी प्रयास करेंगे। पब्ल प्रिंटिंग का क्वालिटी जो है जितना रुपया लिया उतना क्वालिटी नहीं मिलेगा। तो आपको तो उनको बोलना पड़ेगा कि भाई तुमने आश्रम का रुपया लिया है और जो काम स्टैंडर्ड करना चाहिए ऐसा क्यों नहीं किया? तो तो मुझे बोलना ही पड़ेगा। तो मुझे डीएल करना ही है उसके साथ में। आश्रम का रुपया देकर के फिर जो भी क्वालिटी सामने आए तो मैं दीनहीन होकर के ले लूं तो तो नहीं चलेगा। सो वो एक मास्क पहनना हम सभी लोग सीख जाते हैं। भीतर में वनरेबिलिटी रहती है तो बाहर में जगत के साथ में जब काम करते हैं तो एक मास्क पहन लेते हैं। तो वो एक है। ऐसा हो सकता है। दिस इज वन सॉल्यूशन दिस इज वन पॉसिबिलिटी। किंतु इवन हियर जो लोग इस तरह का मास्क पहन भी लेते हैं। देखिए आप यदि सिद्धि प्राप्त कर लिए या तो एक एडवांस हो गए सफिशिएंटली स्पिरिचुअल जगत में तो तो आत्मश्रद्धा प्रकट होगी। उस तो फिर तो स्वामी जी की तरह शेरपना वो भीतर में से वो लायन जागृत हो जाएगा वेदांत केसरी। फिर वो वो चाहे वो टिकट चेकर था ना कि ऐसे लोगों को तो स्वामी जी ऐसे ही डांट देते थे। माने आप आजकल के साधुओं को डांटते क्या देखते हैं? स्वामी जी जो डांटते थे सामने वाले का हार्ट फेल हो जाएगा। किंतु वो तो आत्मश्रद्धा की बात हो गई। वरना सफिशिएंटली आप एडवांस है स्पिरिचुअली तो वो आपके भीतर में प्रकट होगा। बिफोर दैट आप वनरेबिलिटी के फेज में जब तक है और फिर आप ये स्वामी जी का दिस इज वेरी यूनिक। राइट? अब ट्रेडिशनल साधु सन्यासी संप्रदाय है, ट्रेडिशनल साधना है। उसमें आपको वनरेबल होना ही होना है। वनरेबल होकर के आपको उपासना करनी है। किंतु यहां पे जैसे आपने बिल्कुल ठीक पॉइंट आउट किया कि एक एक्सटर्नल सेवा का कंपोनेंट भी है। और यदि आप सेवा करते हैं तो कोई हमको ठग ना जाए रामकृष्ण मिशन को वह तो हमको चौकन्ना रहना ही है। तो उस समय मेरा जो एक सॉल्यूशन है इस तरह से एक मास्क पहन लेना है। तो टेंपरेरी पहना उन सब लोगों के साथ में डीएल करने के लिए और फिर बाद में यह मास्क को उतार भी दिया। यह एबिलिटी एटलीस्ट मैंने डेवलप की है। काफी लोगों को डेवलप करते हुए देखा है। किंतु एक डेंजर है कि बहुत बार क्या होता है कि क्योंकि जगत के साथ में हमको डीएल करना है, इंटरेक्शन करना है। हम लोग ना जेनुइन व्नरेबिलिटी के फज़ में प्रवेश ही नहीं करेंगे। सो ये जो जेनुइन व्नरेबिलिटी वाला जो पीरियड है उसमें हम प्रवेश ही नहीं करेंगे। तो जब तक मैं उस एरिया में उस फील्ड में प्रवेश नहीं करूंगा मैंने तो साधना स्टार्ट ही नहीं की है। उसके बाद में क्या होगा पता है? मेरा एक एथिकल एक हो जाएगा पर्सनालिटी कि मैं साधु होने को तो आया हूं। तो मेरा एक एथिकल बिहेवियर है और साथ-साथ में सेवा करना है तो मैं सेवा के लिए जगत के साथ में जिस तरह से एक जागतिक हेल्दी अस्मिता रख के जो डीएल करना है वह मैं कर रहा हूं किंतु वो फिर हम जागतिक जगत में ही रह जाएंगे। जैसे मैंने पहले ही कहा आध्यात्मिक गेरवा पहन करके सन्यास या ब्रह्मचर्य दीक्षा लेकर के नहीं हुआ जाता है। आपने इवन यदि जींस और टीशर्ट भी पहने हैं यू कैन बी इनफ स्पिरिचुअल। क्योंकि स्पिरिचुअलिटी का डेफिनेशन ही यहीं से स्टार्ट होता है। इंद्रिय संयम और अस्मिता का बलिदान। तो जब तक यह हम स्टार्ट ही नहीं किए हम आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश ही नहीं किए। तो यानी कि रामकृष्ण ट्रेडिशनल यदि आप स्पिरिचुअलिटी देखने को जाएंगे तो आपको बड़ा क्लियर कट डिवीजन देखने को मिलेगा कि यह जागतिक जगत था। उसमें या तो वह हीन भावना से पीड़ित था या तो घमंड से पीड़ित था और अभी यह साधक हुआ है तो बड़ा व्नरेबल हो गया है और फिर जिसने सिद्धि प्राप्त की है तो उसमें आत्मश्रद्धा और शरणागति का उदय हुआ है। एक बड़ा क्लियर कट आपको यह प्रोग्रेशन देखने को मिलेगा। रामकृष्ण मिशन में बिल्कुल ठीक कि जैसे मिडिल लेवल पर हम लोग हैं ऑन वन हैंड व्नरेबल भी है। दूसरी दूसरी ही ओर हम जगत के साथ में भी डील कर रहे हैं। व्हिच इज वेरी इंटरेस्टिंग जो सही-सही में आपने यह ठाकुर मां स्वामी जी के उपदेश को पचाया है तो घर में आकर के आप वनरेबल होंगे। ऑफिस में बैठे होंगे तो शेर की तरह बिहेव करना सीखेंगे। ये डलिटी यू विल हैव टू डेवलप। देखिए हम हम लोगों के साथ में प्रॉब्लम कहां पर स्टार्ट होता है? एक तो अधम भावना थी। अभी स्वामी जी बोलते हैं आत्मश्रद्धा डेवलप करनी है। तो हम लोग क्या सोचते क्या है पता है? यह जो हीन भावना या तो अपनी अस्मिता जो वलनेरेबल मतलब एक कमजोर हो गई थी सेंचुरीज ऑफ ह्यूमिलिएशन तो वहां से ना हम सीधा वेदांत केसरी आत्मश्रद्धा की ओर जंप लगाएंगे। तो वह सीधा जंप कभी नहीं लगने वाला है। स्वामी जी ने कहा है तो स्वामी जी के जो स्टेटमेंट्स के साथ में स्वामी जी का खुद का लाइफ, ठाकुर और मां का लाइफ और टीचिंग सब कुछ हमको मिक्स करके एक ओवरऑल अंडरस्टैंडिंग प्राप्त करना है। यह जर्नी कैसे होगा? आज मेरी अस्मिता कमजोर है। वहां से मैं वेदांत केसरी रूपी आत्मश्रद्धा प्राप्त करूंगा। यह जर्नी कहां से जाता है? सबसे पहले तो जागतिक जगत में मुझे अपनी अस्मिता को हेल्दी बनाना होगा। उसके लिए मुझे कर्म योग करना होगा। चाहे मैं सेवा करूं ना कि चाहे मैं खुद के लिए पैसा कमाऊं ये अधम भावना से हीन हीन दीनहीन भावना से ऊपर आना होगा। इसलिए देखिए कि स्वामी जी ने वेदांत अमेरिकनंस को सिखाया क्योंकि उनका ईगो बड़ा हेल्दी था। भले ही चाहे घमंड सुपीरियरिटी था किंतु एक हेल्दी ईगो के लेवल पर पहुंच गए थे। जबकि भारत में उन्होंने वेदांत का एस सच प्रचार किया ही नहीं है रिटर्न आने के बाद में क्योंकि वह ले पाया उस तरह का हेल्दी ईगो ही नहीं है अपना तो वो तो एक बात हो गया पहले तो दीनहीन भावना से इंफरिटी कॉम्प्लेक्स से एक हेल्दी ईगो की ओर आप आइए जब तक वो नहीं होगा तब तक आप सीधा यदि एक व्नरेबल कमजोर अस्मिता लेकर के आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करेंगे तो सब खत्म हो जाएगा। फिर जो भारत का 1000 साल का पतन इसीलिए हुआ था। एक तो अस्मिता नहीं है। दूसरा कि हमने शरणागति रूपी वाघा पहन लिया। स्वामी जी कहते हैं ना कि तमस जो है वो जैसे कि वो सत्व का आवरण जैसे कि सत्व का भान करके प्रवेश करता है। सत्व है ही नहीं तमस है। तो वो हीन भावना लेकर के शरणागत हूं। इस तरह का दिखावा करना उसी ने ही हमको हजार साल तक मार दिया। तो वो तो एक सबसे बड़ा टीचिंग हमको ख्याल में रखना है। हीन भावना से सीधा आप स्पिरिचुअलिटी में प्रवेश कर ही नहीं पाएंगे। आपको एक हेल्दी ईगो, हेल्दी सेल्फ रिस्पेक्ट, हेल्दी आत्मसम्मान होना ही चाहिए। यदि आप आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करना चाहते हैं तो यह स्वामी जी का एक बहुत ही यूनिक मैसेज है। और यह मैसेज हमको आज यूनिक क्यों लगता है? क्यों वैदिक युग में नहीं लगता था? वैदिक युग में ऑलरेडी सबके हेल्दी ईगो थे। आज का जैसा अमेरिका अमेरिका को आपको जाकर सेल्फ कॉन्फिडेंस या करज की उपदेश देने की जरूरत नहीं है। दे ऑलरेडी हैव सेल्फ कॉन्फिडेंस। ये ऑलरेडी उन्होंने हिटलर पिटलर का वो सफाया करके बैठे हैं। पिटाई करके बैठे हैं। उन ऑलरेडी उनके पास में बी52 बमबर है जो कि आधा जगत घूम करके वो वहां पे अटैक करके वापस आ जाएंगे। उनको वो करेज आत्मश्रद्धा सिखाने की जरूरत नहीं। ऑलरेडी हेल हेल्दी ईगो लेके बैठे हैं। तो पहले तो वो लेवल पर आपको जाना पड़ेगा। देन बिगिंस योर स्पिरिचुअल जर्नी। फिर वह व्ल्नरेबल होने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। अब जैसे स्वामी जी ने कहा ना कि भगवान बुद्ध के पास में राज्य था त्याग करने के लिए तुम्हारे पास में क्या है? तो त्याग जो वनरेबल होना है तो अस्मिता का त्याग करना है। अस्मिता तो चाहिए। अस्मिता ही नहीं है। किस चीज का त्याग करेंगे? राइट? तो पहले तो अस्मिता डेवलप कीजिए। स्ट्रांग सेंस ऑफ सेल्फ वर्थ डेवलप कीजिए। फिर उसका त्याग कीजिए। सो दैट कांसेप्ट हैज़ टू बी क्लियर। फिर अब जब त्याग करते हैं तो दूसरा एक प्रश्न क्या आता है पता है कि खास करके रामकृष्ण मिशन के साधुओं को कि सेवा एक साधना के रूप में है। यदि आप ट्रेडिशनल साधना करते हैं महावाक्य विचार है या तो फिर यह संतान भाव मातृभाव वाली सब साधनाएं हैं तो आपको ऐसा कोई चिंता नहीं है। भले मैं आज वनरेबल हूं। साधना करते-करते सब ठीक हो जाएगा। हम लोगों के साथ में प्रॉब्लम होता है शिव ज्ञान जीव सेवा करते-करते पूरे जगत के साथ में डीएल करना है तो उस समय हम वनरेबल होकर के कैसे डीएल करेंगे उस समय क्या हमको स्वामी जी के आत्मश्रद्धा नहीं चाहिए क्या किंतु वो आत्मश्रद्धा प्रॉपर आत्मश्रद्धा जो कि अहम ब्रह्मास्म भाव में से प्रकट होती है उसको तो साधना के अंत में प्राप्त होगा एज ऑफ टुडे क्या एज ऑफ टुडे में जो शिव ज्ञान से जीव सेवा कर रहा हूं उस समय निर्विकल्प समाधि के बाद में या तो उच्च आध्या आध्यात्मिक अवस्था में से पहुंचने के बाद में जो आत्मश्रद्धा प्रकट होती है वह तो आज मेरे पास में है नहीं तो मुझे क्या करना है तब क्या करना होता है यह जो हेल्दी अस्मिता जो ऑलरेडी हमने डेवलप की है उसका मास्क पहन करके रखना है जब मैं ठाकुर के पास आता हूं तो मैं वनरेबल हो जाता हूं जगत के साथ डीएल करता हूं तो पहले तो दीन हीन भाव या तो फिर यह सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स दोनों में से निकल कर के एक हेल्दी अस्मिता मैंने डेवलप की थी आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करने की एलिजिबिलिटी के रूप में उसका एक मास्क पहन करके जगत के साथ डीएल करना है। और इसीलिए यह हेल्दी अस्मिता आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करने के लिए बड़ा ही इंपॉर्टेंट है। यदि आपने आध्यात्मिक जगत में इंफरियो कॉम्प्लेक्स ले प्रवेश किया या तो सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स ले प्रवेश किया। आध्यात्मिक जगत कभी भी ठीक नहीं होने वाला है आपका। हमेशा आखिर तक वो गड़बड़ गड़बड़ होती रहेगी। साधना में सिद्धि प्राप्त नहीं होगी। यानी कि पहले तो एलिजिबिलिटी डेवलप कीजिए। कम आउट ऑफ इंफरिटी कॉम्प्लेक्स, कम आउट ऑफ सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स एंड डेवलप ए हेल्दी ईगो, हेल्दी अस्मिता देन आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश कीजिए। किंतु किंतु हमेशा याद रखना है कि यह जो हेल्दी ईगो भी जो है जिसको कि हमने डेवलप किया है उस उसको आपको त्याग करना सीख आपको वनरेबल होना सीखना होगा। हाउ इज दिस पॉसिबल कि देखिए समझाना मुश्किल है। मेरा खुद का जो अनुभव जाता है मैं कभी भी मेरा जो ये पब्लिशर है, प्रिंटर है, बाहर के जगत वाले कार्य के रिलेटेड में जिन लोगों के साथ में मैंने डीएल किया है ना यह तो कुछ नहीं है पब्लिकेशन। रांची में तो मैं ट्राइबल लोगों के साथ में डायरेक्ट डीएल करता था। वही ट्राइबल जो कि वहां का जो डीएम है वो डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट वो जाने से डरता था। कहीं वह मार ना दे उसको। लिटरली मर्डरर्स जो है ऐसे लोगों के साथ मैं डे इन डे आउट डीएल करता था। मुझे कभी भी किसी भी तरह की वलनेरेबिलिटी महसूस नहीं हुई। उन लोगों के डीएल करने के सामने सब समय में एकदम तेजी से बात करता था। गुस्से से बात करता था। डांट देता था ऐसे ट्राइबल लोगों को जो कि दूसरे ही दिन मर्डर करने वाले हैं। ऐसे लोगों को डांटना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। सो एक बहुत ही स्ट्रांग एक आउटर लेयर मैंने बनाया था। बट इनसाइड आई वास एक्सट्रीमली वनरेबल। माने कोई भी मुझे कुछ बोल दे ना तो आई आई आई यूज्ड टू बिकम वेरी अपसेट। तो हाउ इज दिस बोथ थिंग्स पॉसिबल? वही जो ट्राइबल आदमी मुझे 1000 गाली देगा तो उसको मैं 10,000 गाली फटाक करके दे दूंगा। कोई फर्क नहीं पड़ता। बट ऐसा कोई आदमी जो कि उस कैटेगरी में नहीं आता है। यानी कि जिनकी मैं सेवा नहीं कर रहा हूं। वो यदि मुझे कुछ बोले देन आई बिकम अपसेट। सो वो मैंने ड्यूलिटी मेरे नेचर में देखी है। ऑन वन हैंड मैं बड़ा ही स्ट्रांग था। दूसरी ही ओर मैं बड़ा ही वनरेबल था। सो ये डलिटी वी हैव टू सम हाउ डेवलप ये अर्धनारी स्वरूप जो भगवान शिव का है ना मुझे बड़ा अच्छा लगता है। ये दोनों क्वालिटी आपको डेवलप करनी है। ऑन वन हैंड यू हैव टू बी वलनेरेबल। अदरवाइज यू विल नेवर प्रोग्रेस इन स्पिरिचुअल लाइफ। ऑन दी अदर हैंड खास करके रामकृष्ण विचारधारा को आप फॉलो कर रहे हैं तो एक वेदांत केसरी वाला भाव भी आपको थोड़ा सा साथ-साथ में ही साधना के रूप में डेवलप करना है। सिद्धि प्राप्त करने के बाद में जो मिलेगा वो मिलेगा आत्मश्रद्धा किंतु साधना के रूप में भी आत्मश्रद्धा को डेवलप करना है। व्हिच इज यूनिक टू श्री रामकृष्ण मूवमेंट। [हंसी] स्वामी जी ने आकर के सब ट्रेडिशनल कैलकुलेशन गड़बड़ कर दिए। ठीक है। किंतु देखिए स्वामी जी खुद कितने वल्लनरेबल थे। स्वामी जी ने बार-बार कहा है कि यह जो मेरा जो प्रेम है ना जगत के प्रति उसने मुझे इतना कमजोर बना करके रखा है। मैं भीतर में से इतना सफर कर रहा हूं। इसको मैं वाणी में व्यक्त नहीं कर सकता। स्वामी जी के लेटर पढ़ेंगे ना यू विल रियलाइज हाउ वल्नरेबल ही इज। सो दिस इज अ यू कैन से यूनिक विवेकानंद कि ऑन वन हैंड आप साधना के लिए आत्मश्रद्धा डेवलप करते हैं। साथ में ही साधना के लिए वनरेबिलिटी को भी डेवलप करते हैं। हाउ यू विल मेंटेन बैलेंस इट इज अ सीक्रेट टू रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर। ओम