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Swami Vivekananda's Macrocosm & Microcosm ·

ज्ञान योग: स्वामी विवेकानन्द Cosmos Macrocosm 20 Sept 2023

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कंप्लीट वर्कशॉप स्वामी विवेक आनंद हम लोग पाठ कर रहे हैं स्वामी जी का जो ज्ञान योग सीरीज का लेक्चर है उसका उसमें से भी हमारा पर्टिकुलर प्रवचन कॉसमॉस्प माइक्रो कोश स्वामी विवेकानंद का इसमें कल हमने देखा परसों दिन हमने देखा की किस तरह से स्वामी जी विश्व की यह जो सौंदर्य है विश्व का इसकी आ मानव मां के ऊपर में विश्व के सौंदर्य का क्या प्रभाव है उसका वर्णन करते हैं और कहते हैं की यह जो जन्म मृत्यु जरा व्याधि यह दिन प्रतिदिन का जो हमारा संसार का खेल है उसमें से ऊपर आकर के मनुष्य कभी कभी ये सोचता है की अरे यह सृष्टि की रसम रचना किसने की यह सृष्टि कहां से उत्पन्न हुई यह सृष्टि कहां जाएगी कौन है इस सृष्टि का रचयिता इस तरह के प्रश्न मनुष्य के मां में उत्पन्न होना शुरू होते हैं यह जो नचिकेता काठ उपनिषद में हमारा हिंदू धर्म का जो फाउंडेशन टेक्स्ट जिसको कहते हैं अर्थात की उपनिषद ब्रह्मास्त्र और गीता उसमें से जो उपनिषद है उसमें भी स्वामी जी का जो फेवरेट उपनिषद था कट उपनिषद उसमें ये बात आई है की नचिकेता जाकर के भगवान यह को यमराज को प्रश्न करता है की मृत्यु के बाद मनुष्य का क्या स्थिति होता है कोई कहता है की वो किसी लोक में जाता है कोई क्या कहता है लगता है की एवं देवताओं को भी पता नहीं शायद इस प्रश्न का उत्तर तो आप तो मृत्यु के राज मृत्यु के राजा या तो फिर मृत्यु के देवता स्वयं है तो यमराज आप मुझे इस प्रश्न का उत्तर दीजिए तो यह दिन प्रतिदिन की हमारी ये जो कंसर्न से छोटे-छोटे की आज क्या खाना बनेगा अभी इस बच्चे को स्कूल में परीक्षा है तो पहले तो क्या था की लड़कों के ऊपर में माता-पिता का इतना ध्यान नहीं राहत था किंतु आजकल तो क्या है की एग्जामिनेशन का टेंशन लड़कों का बच्चों का जितना होता है उससे ज्यादा टेंशन तो माताजी और पिताजी का होता है की अरे इसका परीक्षा ए गया तो अभी इसको पढ़ना के लिए हमको क्या करना पड़ेगा तो यह बच्चों की पढ़ाई का टेंशन घर में कोई बीमा है तो उसका ट्रीटमेंट ये वो दवा हॉस्पिटल में आना जाना और अपना बैंक बैलेंस की क्या स्थिति है सैलरी ये वो दुनिया भर का हमारा ये संसार के उसमें हम लोग फैंस हैं हम लोग भी राम कृष्णा आश्रम में भी यह प्रकाशन विभाग में अभी गौतम आनंद जी ए रहे हैं तो नेक्स्ट वीक तो अभी दो किताबें का विमोचन करना है तो अभी दिन रात हम लोग इस में लगे हुए हैं हमारा दीपक सभी अंक फर्स्ट नवंबर को पब्लिश होगा स्पेशल इशू बहुत बड़ा होगा जनरल इश्यूज से और रेगुलर इशू हमारा 50 पेज का है ये इशू 1128 पेज का है तो ये मैंने ये हम लोग भी देखिए की दिन प्रतिदिन की ये सब चीजों में फैंस हुए हैं किंतु जब भी हम ये नील सुनहरा आकाश देखते हैं आकाश में पंक्तियां की ये हर माला देखते हैं तो हमारे मां में भी प्रश्न होता है की अरे इतना खूबसूरत नजर किसने बनाया होगा और ठाकुर की बात तो हमको पता है की सर्वप्रथम ठाकुर को समाधि कब हुई थी यह सुंदर मग आकाश में मेघ छाई हुए हैं उसमें से यह सफेद जो पंक्तियां की हर माला वो उड़ रही है उसको देखकर के ठाकुर को सर्वप्रथम समाधि हुई थी अर्थात की यह प्रकृति का सौंदर्य देखिए की हमारे हिंदू धर्म में इसकी महिमा किस तरह फिर से वर्णित है ठाकुर के खुद के जीवन में सर्वप्रथम समाधि के पीछे भी यह प्रकृति का सौंदर्य कारंभ था तो इसको देखकर के हमारे मां में होता है प्रश्न ये सृष्टि की रचना किसने की क्योंकि सृष्टि का आदि अंत क्या है सृष्टि के रचयिता कौन है और जैसे ही यह हायर लेवल का थिंकिंग स्टार्ट होता है हमारे मां में दूसरे तरह का प्रश्न उद्धव होता है की मैं कौन हूं मेरी क्या गलती है मैं कहां से आया हूं मैं कहां जान वाला हूं तो यह हायर थिंकिंग यह प्रकृति का प्रभाव हमारे मां पर डालता है और इस तरह के विचार करने को हमको प्रेरित करता है और इसी में स्वामी जी ने आगे हमको नासदीय सुक्तम से कुछ हमको बताया की उन्होंने कहा की किस तरह से भारतीय हिंदू धर्म की सबसे पुरानी जो ऋग्वेद है ऋग्वेद की पुरानी रचनाओं में से एक यह जो नासदीय सुक्तम है हालांकि स्वामी जी ने नासदीय सुक्तम शब्द प्रयोग यहां पे नहीं किया है किंतु हमको पता है जो लोग स्वामी जी को पढ़ने हैं जो लोग हिंदू शास्त्रों को पढ़ने हैं उनको पता चल जाता है की स्वामी जी कहां से क्या को कर रहे हैं तो स्वामी जी क्या कहते हैं मोस्ट असिएंट कंपोजिशन ऑफ मोस्ट असिएंट ह्यूमन कंपोजिशन ऑफ डी वेद वे फाइंड डी से क्वेश्चन एस्क्ड मनुष्य के द्वारा सबसे बड़ा तन जो लिखा गया है टेक्स्ट उसमें भी हम लोग ये प्रश्न को पूछा हुआ देखते हैं वंस इसे दिस व्हेन देवर बाज नीदर वोट नोरोट और डार्कनेस वज हिडन इन डार्कनेस हूं प्रोजेक्ट दिस यूनिवर्स कहां से ये सृष्टि की रचना हुई उसे समय में जबकि कुछ नहीं था जबकि सख्त भी नहीं था असत भी नहीं था अंधकार से अंधकार गिरा हुआ था तब किसने इस सृष्टि का प्रादुर्भाव किया तो यह नासदीय सुक्तम के बड़े में मैंने कहा था की हम इसका अर्थ देखेंगे तो मैं अपना स्क्रीन शेर कर रहा हूं यहां पर मैंने यहां किया है मेरे पास में सुक्तम के बड़े में क्या कहा मंडल का 129 उत्तर से आरंभ होने के करण इसे नासदीय सुख तक कहा जाता है इसका संबंध ब्रह्मांड विज्ञान और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ है विद्वानों का विचार है की इस सूक्त में भारतीय तर्कशास्त्र के बीच छिपे हुए हैं नासदीय सूक्त के रचयिता ऋषि प्रजापति परमेष्ठी है इस सूक्त के देवता है अभी देखिए की जो स्वामी जी ने कहा यहां पे व्हेन तेरे बाज नीदर वोट नो नोट और डार्कनेस वैसे हिडन इन डार्कनेस तो यहां पर किस तरह से इसका वर्णन प्रथम उसके सूक्त में कहा गया है दादा अनिल आश्रित सत्नो आशीष उसे समय अर्थात सृष्टि की उत्पत्ति से पहले प्रलय दशा में असत अर्थात भावात्मक तत्व नहीं था सात अर्थात की भागवत तत्व भी नहीं था अर्थात की स्वर्ग लोक मृत्यु लोक और पाताल लोक भी नहीं थे अंतरिक्ष नहीं था और उससे पैर जो कुछ एवं भी नहीं था वह आवरण करने वाला तत्व कहां था और किसके संरक्षण में था हमारे गहन कठिनाई से प्रवेश करने योग्य गहरा क्या है और हमारे वेद की सर्व उम्र सबसे पुरातन सर्वोच्च रचनाओं में से एक माना जाता है इसके बाद में स्वामी जी कहते हैं इन डी क्वेश्चन है एस कम डॉ तू स ए डी प्रेजेंट टाइम यह प्रश्न की का था सस्ती की रचना से पहले उसे सत्य भी था असत भी था की नहीं था यह प्रश्न आज तक हमारे पास में चला हुआ ए रहा है तू बी आंसर अगेन इस प्रश्न के लाखों उत्तर दिए गए हैं और भविष्य में भी इसके लाखों उत्तर दिए जान वाले हैं आईटी इसे नोट डेट एच आंसर वज एन फेलियर ऐसा नहीं था की पहले जो लाखों उत्तर दिए गए वो गलत थे इसलिए नए लाखों उत्तर दिए जान वाले हैं ये बात नहीं है एवरी आंसर तू दिस क्वेश्चन कंटेंट अपार्ट ऑफ ट्रुथ इस प्रश्न के जितने भी उत्तर है सभी उत्तर अंतिम सत्य के कुछ कुछ तत्वों को अपने में आवर्त करते हैं कोई एक उत्तर संपूर्ण रूप से सत्य नहीं हो सकता सभी उत्तर मिलकर के एक संपूर्ण सत्य की रचना करते हैं इसीलिए हमारे रामकृष्ण संघ में कहा जाता है की जितनी भी नदियां हैं पानी के जितने भी प्रवाह है एक ही समुद्र की और हमको ले जाते हैं इसका अर्थ यह हुआ की कहानी पर भी ऐसा नहीं है की हां यह हिंदू धर्म कहो ना की इस्लाम कहो ना की क्रिश्चियनिटी कहो ना की हिंदू धर्म की जितनी हम लोग जो कहते हैं वही सत्य है और बाकी गलत इस तरह का फेनेटिसिजम नहीं ठाकुर एनकरेज करते थे नहीं स्वामी जी ने इन करेज किया नहीं यह हमारे हिंदू धर्म में इस तरह से सोचा जाता है एवरी आंसर इसे एन पार्ट एवरी आंसर इसे एन पार्ट ऑफ दिस अल्टीमेट ट्रुथ प्रत्येक उत्तर जो है वो अंतिम सत्य जो है संपूर्ण सत्य जो है उसका एक अंश प्रत्येक उत्तर में निहित है इसीलिए जितने भी प्रिमिटिव रिलिजन का हो जैसे की ये आदिवासियों के ये शरण धर्म है उसको कहो ना की हाईएस्ट पाब्दी फिलोसॉफिकल स्पैक्यूलेशन या तो फिर फिलोसॉफिकल रिलाइजेशन को हो अद्वैत वेदांत वह शरण से लेकर के अथवैत वेदांत तक की हमारी ये जो धार्मिक यात्रा है दर्शन की यह जो हमारी एक के बाद एक अनुभूतियां है सभी में ईश्वर का एक एक अंश निहित है कोई यह क्लेम नहीं कर सकता की हम ही सही है बाकी सब गलत ऐसा कहना हिंदू धर्म का जो मूल आधार है उसके ऊपर में आघात करने जैसा है आईटी इस नोट था एच आंसर वज एन फेलियर ऐसा नहीं था की प्रत्येक उत्तर एक गलत था एवरी आंसर तू दिस क्वेश्चन कंटेंट अपार्ट ऑफ ट्रुथ इस उत्तर के इस प्रश्न के प्रत्येक उत्तर में संपूर्ण सत्य का एक अंश निहित तथा स्ट्रैंथ इस टाइम रोल ऑन और यह जो अंतिम सत्य है वो जैसे-जैसे समय बीता जाता है वैसे वैसे ही एक प्रचंड शक्ति धरण करता है आई बिल ट्राई तू प्रेजेंट बिफोर यू डी आउटलाइन ऑफ डी आंसर डेट आई हैव गैदर फ्रॉम डी असिएंट फिलॉस्फर्स ऑफ इंडिया इन हार्मनी विद मॉडर्न नॉलेज मैं आपके सामने ये जो अंतिम सत्य है धर्म का मनुष्य के अंतिम मनुष्य के सही स्वरूप का यह उत्तर में आपके सामने रखना का प्रयास करूंगा किस परिप्रेक्ष्य में सनातन भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में और आधुनिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में दोनों का एक संयम करके इस प्रश्न का उत्तर में आपके सामने रखना का प्रयास करूंगा देखिए ये स्वामी जी यह जो बात कहते हैं यह बड़ा ही इंपॉर्टेंट है की ऐसा स्वामी जी क्यों कहते हैं की यह पुरातन भारतीय संस्कृति हमारा हिंदू धर्म उसके वेद और उपनिषद उसमें जो कहा गया है मनुष्य के सही स्वरूप के बड़े में वो हमको पता है की महावाक्य हम ब्राह्मणी तो ये तो मैं आपको कहूं बताऊंगा ही बताऊंगा किंतु साथ में ये जो आधुनिक विज्ञान या तो फिर ये आधुनिक चिंतन धारा फिलासफी या तो फिर साइंस इस विश्व के बड़े में क्या कहता है उसका भी एक आ अंश जो है इसके साथ में मिलित होगा बहुत सारे लोग कहते हैं की मनुष्य के आ आक्रमण के बड़े में धर्म के बड़े में दर्शन के बड़े में जो कुछ कहा जाना था वो हमारे प्रस्थान रहे में कहा गया है तो फिर यह आधुनिक विज्ञान कहो ना की आधुनिक दर्शनशास्त्र जिसको की हम वेस्टर्न फिलासफी कहते हैं तो उसका सहारा करके हमको यह प्रदर्शित करने की क्या जरूर पद गई की मनुष्य का सही स्वरूप क्या है एक के बाद एक स्वामी जी ने कहा है की विथ टाइम दिस ट्रुथ गाइड आई नॉर्म्स ट्रेड जैसे जैसे समय बिताता है वैसे वैसे ये जो धर्म का सत्य है वो प्रचंड शक्ति धरण करता है इसीलिए कपूर को अवतार वरिष्ठ था या कहा गया है जितने भी नए अवतार आते हैं उन सभी के भीतर में पुराने जितने भी अवतार थे उन सब की शक्ति एक अवतार में निहित है इसलिए सर्व देव देवी स्वरूपाय श्री राम कृष्णा जितने देवी देवता आज तक आए सब की अनुभूति सब की शक्ति सबकी आध्यात्मिक चेतन सबकी धार्मिक शक्ति ठाकुर के भीतर में विद्यमान है और इसीलिए हम देखते हैं की ठाकुर को जीसस का भी दर्शन हुआ था ठाकुर को मोहम्मद का भी दर्शन हुआ था और यह दोनों ठाकुर के श्री अंग में शरीर के भीतर में समाहित हो गए थे ठाकुर को चैतन्य महाप्रभु का भी दर्शन हुआ था ठाकुर को मां सीता का भी दर्शन हुआ था और लीला प्रसंग में हमने देखा था मां सीता की जब बात हम पढ़ रहे थे राधिका की आ श्रीमती राधा रानी की बात जब हम पढ़ रहे थे उसमें शरद महाराज ने लिखा है की जैसे जैसे ठाकुर को पहले दर्शन हुए थे उसे सभी दर्शनों में देवी या देवता की मूर्ति जो है ठाकुर के श्री अंग में समाहित हो गई थी वैसे ही राधा रानी की यह जो दर्शन या मूर्ति है ठाकुर में वो प्रवेश कर चुकी थी तो इसीलिए यह सत्य जो है मनुष्य सानो का असली स्वरूप का यह शक्ति ज्यादा से ज्यादा करण करण करता है समय बीतने के साथ क्यों क्योंकि पीछे जितने भी संत महापुरुष देवी देवता अवतार या तो फिर शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ है वो सभी ठाकुर के भीतर में विद्यमान है और इसीलिए ठाकुर जो कहते हैं वो अभी ये कहना ठीक नहीं होगा कोई कोई लोग ऐसा कहते हैं की वेद या तो उपनिषद में जो कहा गया है उससे भी ऊपर में ठाकुर की वाणी है की ठाकुर जो कहेंगे वो हमको अल्टीमेटली लेना है यदि उपनिषद में या वेद में हमको आप सरफेस में ऊपर ऊपर से कोई विरोधाभास दिखे कोई कांट्रडिक्शन लिखे तो ठाकुर का वचन जो है उसको हमको प्रमाण भूत मां करके हमको उसका सॉल्यूशन लाना है ऐसा मैं पर्सनली ऐसा सोचता ऐसा सोने की जरूर नहीं वेद में या तो खासकर के उपनिषद में ब्रह्मास्त्र में और गीता में मुझे ऐसा नहीं लगता की कोई कांट्रडिक्शन यदि हम दीप में स्टडी करें तो कोई कांट्रडिक्शन दिखे किंतु यदि दिखे जाता है तो उसका जो सॉल्यूशन है वो ठाकुर की वाणी से लाना है ये मेरा पर्सनल मेरा मानना है तो इसीलिए स्वामी जी यहां पे कहते हैं की अभी ये आधुनिक नॉलेज ये आधुनिक नॉलेज का दो अर्थ होता है की हमारे उपनिषद में से तो मनुष्य के स्वरूप की कल्पना क्या है मनुष्य के जो जीवात्मा या तो आत्मन का क्या असली रहस्य है वो उपनिषद में गीता में ब्रह्मास्त्र में तो बताया ही गया है हमारे पुराने शास्त्रों में तो यह लिखा ही गया है किंतु साथ-साथ में यह आधुनिक नॉलेज जो है उसका भी सहारा लेंगे इस प्रश्न का सॉल्यूशन लाने के लिए यहां पर स्वामी जी ऊपर ऊपर से पढ़ेंगे तो ऐसा लगेगा की स्वामी जी कहते हैं की यह वेस्टर्न फिलासफी क्या कहता है वेस्टर्न साइंस क्या कहता है इसका भी सहारा लेंगे किंतु मेरा पर्सनल यहां पे जो मानना है की ठाकुर जो कहते हैं उसको भी हमको अकाउंट में उसको भी हमको कंसीडरेशन में लेना चाहिए क्योंकि ठाकुर की अनुपूती की वेद या तो उपनिषद की ये जटिल संस्कृति जो है और उसका जो अर्थ गठन है उसमें से हमको रास्ता दिखा शक्ति है और उसका सबसे प्रमाण भूत ये एग्जांपल ये नासदीय सुक्तम ही है देखिए नासदीय सूक्त को पढ़ने का मैंने प्रयास किया है मैंने देखा है की इसका जो संस्कृत है उसका इतना दर्शन शास्त्र की दृष्टि से भी ग्रामर की दृष्टि से भी इतना जटिल है की इसके भीतर में छुपी हुए जो अर्थ है वह इतना आसानी से चम्मच में नहीं आते ऐसा एक समय था जबकि सतत भी नहीं था असत भी नहीं था अंधकार से अंधकार गिरा हुआ था अभी इसका क्या अर्थ करेंगे आप जी तरह से चाहे अर्थ कर सकते हैं भाष्यकर के ऊपर में आधार रख करके किंतु फिर ठाकुर की जो दर्शन है उसका भी हम सहारा ले सकते हैं ठाकुर ने एक बार जैसे पर एग्जांपल उसको मिलने के लिए गए देवेंद्र नाथ टैगोर को देवेंद्र नाथ ठाकुर यदि बंगाली में कहा जाए तो उनको मिलने के लिए गए और अभी उनको पूछा की अच्छा आप तो यह वेद वगैरा बहुत पढ़ने हैं मुझे उसमें से कुछ पढ़कर के सुनाइए तो देवेंद्र नाथ ने कहा की वेद में इस विशाल वृक्ष की कल्पना की गई है जिसमें की यह कहो की उसके पेट ना की फल या इसकी वजह एक के बाद एक लोक जो है वो प्रकाश के दिए की तरह प्रकाश पुंज की तरह टीम टीम मारा है जैसे की पुरी सृष्टि इस वृक्ष के ऊपर में लगी हुई हो ऐसा कुछ देवेंद्र नाथ ने ठाकुर को कहा तो ठाकुर ने कहा अरे अच्छा मुझे भी इस तरह का दर्शन हुआ था मैंने भी देखा की ये पूरा ब्रह्मांड वृक्ष है सरवलोकों का वृक्ष है एक के बाद एक लोक अस्तित्व में आते हैं और अस्तित्व अस्तित्व में से मिट्टी जाते हैं ऐसा मैंने भी देखा तो देखिए की वेदों की उपस्थापन वेदों का प्रमाणित करने सिद्ध किया अभी ठाकुर की बात के ऊपर में वेद का प्रमाणिया स्थापित करना वैसे ठीक नहीं रहेगा वेद का अपना एक आधार है किंतु हम लोगों के लिए जिन लोगों के लिए किस संस्कृत भाषा में दीप में जाना इतना संभव नहीं है वैसे मैंने जब स्कूल में था मैंने संस्कृत पढ़ा है किंतु संस्कृत में ने क्यों लिया था क्योंकि मैंने सुना था और यह मेरा अनुभव भी है की बोर्ड की एग्जाम में अभी तो आजकल यह रैंकिंग सिस्टम चला गया हमारे वो समय में बहुत था की फर्स्ट नंबर किसका आता है सेकंड किसका आता है और बोर्ड की एग्जाम के बेस पे ही तो आपको कॉलेज में या तो जब में एडमिशन मिलता है तो संस्कृत क्या है की वो एक इजी सब्जेक्ट गाना जाता था की संस्कृत सीखो तो फटाफट करके मार्क्स ए जाते हैं तो मैंने संस्कृत और टाइपिंग ये दो लिए थे वो मार्क्स ज्यादा लाने के लिए तो यह प्रैक्टिकल कंसीडरेशन था बाद में जब मैंने सही सही हमारे धर्म ग का अभ्यास आरंभ किया पुराण का उपनिषद का तब मुझे पता चला की मैंने यदि स्कूल में थोड़ा सा ज्यादा ध्यान दिया होगा हालांकि मेरे संस्कृत में 90 मार्क्स आए थे स्टैंडर्ड में नाइंथ में भी इतने ही आए थे उन्हें 1885 90 इतने ए जाता था मेरे संस्कृत में किंतु क्या था वह तो जी तरह से स्कूल में होता है वो बहुत हमें की इसको याद कर तो इसको याद कर दो यह नाम रूप है धातु रूप है चांद है चांद के जो मी है वो सब रात लो और परीक्षा में मार्क्स ले आओ क्योंकि बाकी सब सब्जेक्ट्स है की उससे तो ये बड़ा आसन है संस्कृत तो उसे तरह से मैं संस्कृत शिखा था थोड़ा बहुत बाद में मुझे उसको कम में लगा किंतु मेरी वो कैपेसिटी नहीं की मैं उपनिषद को उसके ओरिजिनल संस्कृत में पढ़ूं और उसके जो गहन अर्थ है उसका मैं अथॆघाटन करूं वो कैपेसिटी मेरे में नहीं है मुझे हमेशा ये भया कण के ऊपर में ट्रांसलेशन के ऊपर में आधार रखना पड़ेगा तो यह आधुनिक नॉलेज का हमको जरूर क्यों पड़ता है क्योंकि हम जैसे लोगों के लिए जिनको जिनके लिए यह शास्त्र में प्रवेश करना कठिन है हमारा जो थिंकिंग सिस्टम है बचपन से ही हम यह जो वेस्टर्न साइंस और वेस्टर्न थिंकिंग इसमें जो बड़े होते हुए आए हैं पलटे आए हैं तो उसे तरह उसमें से यदि कोई लॉजिकल एलिमेंट्स जो कोई लॉजिकल बिल्डिंग ब्लॉक लिए जाए और उसके आधार पर यह शास्त्रों को समझाया जाए तो शायद इसको समझना आसन होगा इसको ठाकुर जैसे की ठाकुर की उपमा है ठाकुर के ठाकुर का जो ऑब्जरवेशन पावर था कितना शार्प था कैसे-कैसे वो उपमा देते थे वो गांव में गए वो देखा की वो सटका कल सत्ता कल की जानो ठाकुर वो आश्रम महाशय को कहते हैं अर्थात की एक बस है बस को इस तरह से वो उसको ये करते हैं उसको झुका देते हैं और उसको बंद देते हैं अभी वो पास को बांध हुआ है और उसमें हक लगाया हुआ है पानी के भीतर में जैसे ही मछली वो हक में लगा हुआ वह कीड़ा वगैरा कुछ खाती है खींचती है वैसे ही ये मां सीधा हो जाता है और मछली जो है पानी के बाहर ए जाति है लिखी यह ऑटोमाइजेशन जिसको हम आजकल देख रहे हैं तो उसे समय ये सब ऑटोमाइजेशन पहले से ही था की ऑटोमेटिक मछली पकाने का यंत्र तो ठाकुर फटकार के ऑब्जरवेशन करके हमको ये बताते हैं तो उपमा देने के लिए आधुनिक ये विज्ञान या तो फिर इस सब चीजों की जरूर पड़ती है क्योंकि हम यह सब चीजों में देखें हुए हैं अच्छा अभी ये नासदीय सुक्तम इत्सेल्फ जो है इसके जो गहन अर्थ है उसके देखेंगे हम बाद में की एक के बाद एक स्वामी जी किस तरह से ये सब चीजों को समझते हैं है तो स्वामी जी कहते हैं इन हार्मनी विथ मॉडर्न नॉलेज यह आधुनिक जो विज्ञान है आधुनिक चिंता धारा है उसके प्रकाश में और हमारी परंपरागत भारतीय शास्त्र है इन दोनों के प्रकाश में वह इसको समझने का पर्यटन करेंगे स्वामी जी आगे कहते हैं वे फाइंड डेट इन दिस ओल्डेस्ट ऑफ क्वेश्चंस एन फू प्वाइंट्स हेड ऑलरेडी बिन सॉल्वड हम देखते हैं की किस तरह इस नासदीय सुक्तम में कुछ कुछ पॉइंट से उसका समाधान ऑलरेडी हो चुका है आगे कहते हैं डी फर्स्ट देवर वैसे टाइम व्हेन देवर बाज नेत्र और नूर सबसे पहले तो ऑलरेडी स्वीकृत किया जा चुका है की एक समय था जबकि सत्य भी नहीं था सत्य भी नहीं था भी नहीं था सत्य भी नहीं था व्हेन दिस वर्ल्ड डिड नोट एक्जिस्ट यह सृष्टि की रचना नहीं हुई थी सृष्टि का अस्तित्व नहीं था अगर मधुर अर्थ विथ सीएस इन ओशन और रिवर्स और माउंटेंस और सिटीज और विलेज ह्यूमन रिसोर्स एनिमल्स प्लांट्स बर्ड्स और प्लैनेट्स और लुमिनरीज जो दिस इंफिनिटी वैरायटी ऑफ क्रिएशन हेड नो एक्जिस्टेंस हमारी यह जो मातृभूमि ये पृथ्वी उसके ऊपर में रचे हुए ये समुद्र ये पहाड़ ये नदियां ये शहर ये गांव ये मनुष्य की सभ्यता पशु पंक्तियां ये पेड़ पौधे और ये आकाश में दिखने वाले प्लैनेट्स यानी की ग्रह तारे और ये इंफाइनाइट वैरायटी ऑफ क्रिएशन मैन यह सृष्टि का अनंत वैभव वैविध्य कुछ भी नहीं था देखिए स्वामी जी का कितना सुंदर पॉलीटिकल एक्सप्रेशन है जी तरह से यह नासदीय सुक्तम जिसको की फर्ज में लिखा गया है मैं हमेशा मानता हूं की स्वामी जी राइट्स शायरी इन परोस वर्ष और परोस अर्थात कविता में लिखी हुई रचना और परोस यानी की निबंध के रूप में लिखी हुई रचना स्वामी जी कविता लिखने हैं निबंध के रूप में इतना सुंदर वर्णन करते हैं और हमको संस्कृत नहीं आता इतना अच्छे से इसलिए नासदीय सुक्तम की जो ब्यूटी है वो हम इतना जितना दीपाली हमको फूल करनी चाहिए वो नहीं कर पाते किंतु हमको इंग्लिश आता है आजकल ज्यादातर लोगों को इसलिए हम स्वामी जी की ये जो रचना है उसको हम बड़े ही उसके मतलब अच्छे से हम उसका आनंद ग्रहण कर पाते हैं मेरी एक बार एक साधु के साथ बात हो रही थी उपनिषद वगैरा को लेकर के तो मैं फिलोसॉफिकल पॉइंट को बड़े में मैं आर्गुमेंट कर रहा था तो उन्होंने मुझे कहा की वो मेरे से जूनियर था तो उसने मुझे कहा की अरे महाराज आपसे फिलोसॉफ्ट ही देखते हैं उपनिषद की और वह संस्कृत और फिलासफी का मास्टर है तो इसलिए कहा की आप सिर्फ फिलासफी मत देखिए उसका शायरी देखिए उपनिषद के जो सूखता वगैरा है मंत्र उसकी शायरी इतनी दीप है की उसकी उसको पाठ करके उसका चिंतन मनन करके उसकी शायरी में ही आप इतने हो जाएंगे की धीरे-धीरे करके उसके जो फिलोसॉफिकल एस्पेक्ट है वो आप भूल जाएंगे तो अभी मैं तो उसकी तरह उतना ही संस्कृति ना ही दर्शन शास्त्र का विद्वान हूं की अंग्रेजी थोड़ा बहुत आता है तो इसीलिए स्वामी जी का यह जो निबंध के रूप में जो लिखने हैं उसका ब्यूटी में अनुभव कर सकता हूं पढ़कर के फिर से एक बार पढ़ना हूं कितना सुंदर लिखा है अगर मधुर अर्थ विद डी सीरीज और ओशन डी रिवर्स और माउंटेंस सिटीज और विलेज ह्यूमन रिसोर्स एनिमल्स प्लांट्स बर्ड्स और प्लैनेट्स और लुमिनरीज इंफिनिटी वैरायटी ऑफ क्रिएशन हेड नो एक्जिस्ट एस अंग्रेजी इत्सेल्फ इतना सुंदर है की इसको की इसका जो स्वामी जी जब बोलते होंगे देखिए की पढ़कर के हमको ये अनुभूति होती है बढ़कर के हमको इतना रोमांचक होता है तो स्वामी जी जब बोलते होंगे यह सब शब्द और सामने बैठे कर बैठे हुए उनके ऑडियंस में जो लोग सुनते होंगे स्वामी जी के खुद के मुंह से उनके खुद की श्री मुख से उनकी वाणी जब सुनते होंगे तो उनका क्या मतलब ऐसा लगेगा की उसे समय पहुंच गए हैं जबकि सृष्टि की रचना ही नहीं हुई है नहीं सत्य नहीं असत है अंधेरे से अंधेरा ढाका हुआ है उसे समय में उनका मां उठ चुका होगा और ये सही सही अनुभूति होती होगी मैंने बहुत सारे रिमेंशंस पड़े हैं स्वामी जी के क्लास के और सभी रिमेंशंस मैंने ये बात पाया है जो सुनने वाला खास करके अमेरिकन लो हमारे हम हिंदू लोगों को तो क्या है की ऑलरेडी हम वेदांत के साथ में भारतीय दर्शन के साथ में हिंदू धर्म के साथ में फैमिली है किंतु 18वीं साड़ी के 19वीं साड़ी के अंत में यह जो अमेरिकन लोग थे जिनको की हिंदू धर्म और वैदिक चिंतन धारा इसके साथ में कोई लेना देना कभी नहीं था ये लोग भी स्वामी जी के वचनों को वाणी को सुनकर के उसे स्थिति की कल्पना या तो फिर अनुभूति करते थे ये सही में एक आश्चर्यजनक बात है की स्वामी जी अपनी वाणी से अपनी अनुभूति ट्रांसमिट कर रहे हैं बात सिर्फ ये नहीं है की अपने शब्दों से हमको फिलासफी सीखने हैं अपने शब्दों से उनकी अनुभूति भी हमारे भीतर में वो प्रविष्टि करवाते हैं इसीलिए स्वामी जी बहुत तक जाते थे क्लास के बाद में और देखिए की स्टडी और स्वामी जी का कॉरेस्पोंडेंस से उसमें स्वामी जी कहते हैं की तुम लोगों ने तो मुझे जी तरह से रखा था मुझे ठीक तरह से नहीं मुझे खाने को देते थे नहीं मेरे लिए कुछ अच्छे घर की व्यवस्था की थी तो मैं उसे समय सोचता था की क्यों स्वामी जी इस तरह से बार-बार स्टडी क्या था वह वेजीटेरियन था वह सोचता था की मीत खाना मांस खाना ये गलत है साधु के लिए और यह सिगार धूम्रपान करना यह सब गलत चीज है यह स्वामी जी जो यह सब कर रहे हैं वह धीरे-धीरे करके उनके भीतर में करप्शन प्रवेश कर रहा है तो स्टडी ऐसा बोल रहा है स्वामी जी सामने स्वामी जी का रहे हैं की देखोगे इतना हार्ड क करता हूं की मुझे स्ट्रांग सस्टेनियस की ये नरेश मेट की जरूर है तो शरू-शरू में मैंने यह सब चोरास्पॉन्डेंस पढ़ना शुरू किया तब मुझे भी लगा की क्या स्टडी थोड़ा बहुत तो सही का रहा है यहां गुजरात में देखिए की वेजेटेरिएनिज्म का प्रभाव इतना है मेरे खुद के घर में सब समय वेजीटेरियन फूड ही बना है तो स्वामी जी जो नॉनवेज जो ग्रहण कर रहे हैं वो किस हद तक सही है किस हद तक गलत है मुझे क्या पता किंतु इतने सालों के बाद में मुझे धीरे-धीरे पता चल रहा है की स्वामी जी को स्ट्रांग नारिशमेंट की क्यों जरूर थी क्योंकि सिर्फ ऐसा नहीं था की वह क्लास कर रहे हैं जैसे की मैं क्लास कर रहा हूं उनका था की वह क्लास करने के समय उनकी वाणी के साथ में उनकी अनुभूति भी प्रधान करते थे जो की हम लोगों से संभव नहीं है इसलिए मैं प्रतिदिन भी यदि क्लास करूंगा तो मुझे कोई फर्क नहीं पढ़ने वाला किंतु स्वामी जी उनके अमेरिका के रिमेनिंग में पढ़ेंगे तो सत्ता में कर क्लास करते थे क्लास बड़े लंबे चलते थे क्लास के बाद में बड़े ही परिश्रांत हो जाते थे यह सब पढ़ने को आता है तो हमको समझना है की वो सिर्फ बोलते थे इसलिए नहीं तक जाते थे उनकी पुरी इतने इतने दोनों की जो आध्यात्मिक पहले सर्वप्रथम तो ठाकुर जो है भारत की हजारों सालों की आध्यात्मिकता के जीवन का मूर्तिमान प्रतीक है उनके खुद के शरीर के भीतर में हजारों सालों की आध्यात्मिक दर्शन आध्यात्मिक प्रताप उनके शरीर में खेल चुकी है वह अनुभूति ठाकुर ने स्वामी जी के शरीर में प्रवेश करवाई थी वो अनुभूति वीर स्वामीजी ने खुद ने तपस्या करके अपना बनाया निर्विकल्प समाधि उन्होंने प्राप्त की तो इतने हजारों सालों की अनुभूति स्वामीजी अपने शब्दों से ट्रांसमिट कर रहे थे अपने शब्दों से प्रधान कर रहे थे इसलिए वो इतने तक जाते थे तो ये जब रिमिनीसेंस हम पढ़ने हैं तो रिमिनीसेंस के साथ में स्मृति कथा के साथ में हमको यह फिलासफी पढ़ने की क्यों जरूर है फिलासफी नहीं पढ़ेंगे तो कभी-कभी ये रिमेंशंस का हम अलग गलत अथॆघाटन करें ऐसी पुरी संभावना हो जाति है जैसे की मैं खुद शुरू में ऐसा सोच रहा था की स्वामी जी जो बार-बार नॉनवेज खाने की उनकी जरूर है उसके ऊपर में एक खास करके एक स्टडी के साथ में जो उनका पोरस बोनस था वो ऐसा क्यों का रहे हैं क्यों ऐसा का रहे हैं की स्टडी जी तरह से वेजीटेरियन फूड का के र रहा है तो इस तरह से वह नहीं र पाएंगे तो यह स्मृति कथा जो है उसकी परिपुष्टि उसका परिवर्धन हमको दर्शन शास्त्र में मिलता है इसलिए दोनों को साथ-साथ में पढ़ने की हमको जरूर है ओम शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा