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Swami Vivekananda Great Summer ·

भव्य ग्रीष्म: रिजली मैनर में स्वामी विवेकानन्द 11 sep 2024

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ओ स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार वय म कृषणा यते शंकराचार्य उनका एक जो कांसेप्ट है कर्म और ज्ञान इन दोनों के बीच में जो व्यवधान है वो कभी खत्म नहीं होने वाला है जिसके भीतर में कर्मा है उसके भीतर में ज्ञान नहीं है और जिसके भीतर में ज्ञान है उसके भीतर में कर्म नहीं है ये थोड़ा सा क्रूडली वो पूरे एक आईडिया को बताना हुआ किंतु ये इस आईडिया को लेकर के रामकृष्ण संघ में कभी-कभी यह डिस्कशन होता है कि यदि सन्यास आश्रम हमने ग्रहण किया है सन्यास लिया है हमने वो भी शंकराचार्य के दश नामी संप्रदाय में यदि मान लीजिए कि जैसे दूसरे बहुत सारे संप्रदाय भी है वैसे त्यागियो के हम अपना खुद का एक संप्रदाय खड़ा कर सकते थे एक स्पेशल एक प्रोविजन रख कर के कि सेवा या तो यह कर्मयोग उसको और सन्यास आश्रम इन दोनों को हम इकट्ठा करते हैं किंतु स्वामी जी ने ऐसा नहीं करके शंकराचार्य के दशनामी संप्रदाय में उन्होंने सर्वप्रथम सन्यास ग्रहण किया था वराह नगर वराह नगर मठ में यह लोग जब रह रहे थे उस समय अभेदानंद जी महाराज भ्रमण के लिए गए थे और बराबर बोलकर के पहाड़ है वहां पर एक साधु के पास से उन्होंने यह सन्यास के मंत्र प्राप्त किए थे और दशनामी संप्रदाय में सन्यास की बात तो एक्चुअली ठाकुर से स्वयं प्रारंभ होती है ठाकुर ने ही तो तोतापुरी से अद्वैत वेदांत में संन्यास ग्रहण किया था संन्यास दीक्षा ली थी किंतु फिर ठाकुर ने तो फिर द्वैत में भी यानी कि मा मां की शक्ति साधना में भी दीक्षा ली थी फिर यह भाव साधना भी उन्होंने की थी तो ठाकुर की ठाकुर का तो हम उदाहरण नहीं दे सकते हमारे लिए कि चलो हम लोग शंकर को फॉलो करते हैं शंकराचार्य को तो बिकॉज ऑफ ठाकुर ठाकुर तो फिर चैतन्य देव को भी फॉलो करते थे ठाकुर तो फिर यह तंत्र साधना भी उन्होंने की थी तो हमने वो सब दीक्षा तो नहीं ली शक्ति साधना में या तो भाव साधना में हमने तो एक ही शाली है वह है शंकराचार्य के दशनामी संप्रदाय में तो यह दशनामी संप्रदाय के जो स्थापक है शंकराचार्य उनका यह सबसे इंपॉर्टेंट एक कांसेप्ट है कि ज्ञान और कर्म इन दोनों के बीच में विरोधाभास है सन्यास पथ है या तो फिर साधना पथ है ज्ञान पथ इसके साथ में आप कर्म को अटैच नहीं कर सकते तो फिर प्रश्न होगा कि स्वामी जी जिस तरह से अपने ऑर्डर में कर्म को लेकर के आए हैं क्या वह सही है या गलत है तो यहां पर थोड़ा सा डीपर हमको जाने की जरूरत है कर्म यानी कि यहां पर अपने मन की वृत्तियां यह जो योग में कहा गया है मन योगस चित्तवृत्ति निरोध अर्थात की चित्त की वृत्तियों का निरोध ही कर्म है जरा थोड़ा सा हम अपना खुद का एक एनालिसिस करें सुबह को उठकर के ही जैसे हम खड़े होते हैं अपने बिस्तर में देखिए कि दुनिया भर के विचार अपने मन में मंडराना शुरू हो जाते हैं आज क्या खाना बनाएंगे आज क्या काम करना है आज कहां पर बाहर में जाना है आज यदि कोई जॉब करता है या बिजनेस करता है तो वहां पर क्या करना है सतत इस तरह के विचार अपने मन में प्रारंभ हो ही जाएंगे दूसरा एक बहुत बड़ा एक सब्जेक्ट है जिसके प्रति हमारा विचार जाता है वह है अपने रिलेशनशिप किसके साथ में मेरा रिलेशनशिप कैसा है कोई व्यक्ति के साथ में मैं किस तरह से व्यवहार करता हूं या तो वह व्यक्ति मेरे साथ में किस तरह से व्यवहार करता है तो यह रिलेशनशिप और अपना कार्य यह दोनों हमारे विचारों को सबसे ज्यादा व मंथितौप्पू कोई हायर क्रिएटिव थिंकिंग किया जैसे कि कोई ऑथर है कोई पोएट है कोई आर्टिस्ट है ना कि कोई क्रिकेटर है तो ये आर्ट्स या तो स्पोर्ट्स या तो यह परफॉर्मिंग ये जो सब आर्ट्स वगैरह जो होती है इन सबके प्रति अपना मन इतना जल्दी नहीं जाता कि जितना अपने कार्य के प्रति या तो फिर हमारे साथ में जिनका जिनका रिलेशन है उनके प्रति अपना मन जाता है तो यह जो विचार होते हैं अपने मन में यह है कार्य या तो फिर यह है कर्म कर्म का टेक्निकल डेफिनेशन यह है और देखेंगे कि हम जितनी भी साधन पद्धति का इस्तेमाल करते हैं जितनी भी साधन पद्धतियां है वह सब क्या है पता है कि कर्म को काट कर के मन की एक शांत अवस्था बनानी है तो यह है कोई भी विचार कोई भी साधन पद्धति का उद्देश्य यदि मैं भक्ति मार्ग अपनाता हूं तो मैं यह जो मेरे कर्म है कर्म अर्थात कि मेरे विचार मेरे मानसिक वलन उसके द्वारा मैं श्री प्रभु का नाम गुणगान करूंगा उनकी भक्ति करूंगा उनके बारे में कोई ग्रंथ सद ग्रंथ पाठ करूंगा या तो फिर उनका नाम जप करूंगा प्रार्थना करूंगा सत्संग करूंगा तो यह सब कार्य मैं अपने मन से भक्ति मार्ग में करूंगा सेवा योग है या तो फिर कर्मयोग है कर्मयोग में यही जो मेरे विचार है इसी विचारों को मैं कार्यरत करके किसी दूसरों के कल्याण के लिए जैसे कि कोलकाता में सबसे पहला प्लेग रिलीफ हुआ था रामकृष्ण मिशन ने किया था तो यहां पे जैसे विशाखापटनम में यहां पे एक सीपी क्लिनिक है सेरेब्रल पाल्सी क्लीनिक तो यह कोई भी सेवा कार्य है तो अपने मन को अपने विचारों को सेवा कार्य में लगाना या तो फिर जैसे कि ज्ञान योग है तो यही विचारों के द्वारा यही मन के द्वारा यह चिंतन करना कि मेरा सही स्वरूप तो आत्मन है और यह जो कर्म का यह जो पर्दा मेरे सामने लगा हुआ है यह तो सिर्फ एक आभास मिथ्या भ्रम मात्र है या तो फिर कहेंगे कि इससे मुझे मुक्ति प्राप्त करनी है तो यह ज्ञान योग हो गया और राज योग है कि यही मन से यही विचारों को कोई भी एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में केंद्रित करना है तो देखिए कि अभी ये आउटलाइन किस तरह से बनता है साधन राज्य का यदि हम सोचे सर्वप्रथम तो साधना क्या है मनुष्य जीवन क्या है मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है तो मनुष्य जीवन है कि यह अपने विचार विचार ही हमको बनाते हैं मैं मेरे बारे में सोचता हूं मेरा यह नाम है मैं यह कार्य करता हूं मैं यह हूं जो कुछ भी मैं विचार करता हूं वो मैं हूं मान लीजिए कि ऐसा हो जाए कि कल कहीं जाकर के ये जो हार्ट ट्रांसप्लांट आजकल होता है तो मान लीजिए कि ऐसा ब्रेन ट्रांसप्लांट होता होगा तो मेरा ब्रेन काट करके दूसरे के सर में डाल दिया दूसरे का ब्रेन काट करके मेरे सर में डाल दिया यदि ऐसा ब्रेन एक्सचेंज होता होगा तो उसके विचार मेरे विचार इस शरीर में आ जाएंगे और मेरे विचार जो है वह उसके शरीर में आ जाएंगे अर्थात कि शरीर हमको डिफाइन नहीं करता हमको डिफाइन करते हैं हमारे विचार तो हमारे विचारों के ऊपर में ही विचार विरों की शुद्धि विचारों की शांति विचारों का एक पवित्रता पवित्र करण यही तो है साधन मार्ग आजकल देखिए कि जो कुछ आप देख रहे हैं एंटरटेनमेंट क्या है एंटरटेनमेंट है हमारे विचारों को एक तरह से एक आर्टिफिशियल आनंद प्रदान करना अभी मैं कोई एक मूवी देख रहा हूं या मैं थिएटर देख रहा हूं या तो मैं कोई कहानी की किताब पढ़ रहा हूं या तो मैं ये ओलंपिक्स वगैरह गेम है वह देख रहा हूं ना कि ये पॉलिटिकल डिबेट चलते है आजकल टीवी पे तो वह देख रहा हूं जितना समय में यह सब बाह्य चीजों को निहारू उनका निरीक्षण करूंगा उनसे आनंद प्राप्त करूंगा मुझे एक आर्टिफिशियल बूस्ट मिलता है जैसे कि विटामिन मान लीजिए विटामिन हमारे आहार में नेचुरल रूप से हमको मिलते ही मिलते हैं यदि आप संतुलित आहार ग्रहण करें जैसे कि वेजिटेबल है जैसे कि फ्रूट्स है यह सब ग्रहण करने से आपको विटामिंस प्रॉपर्ली मिलेंगे ही मिलेंगे किंतु ऐसा कभी-कभी होता है कि विटामिंस की डिफिशिएंसी हो जाती है और डॉक्टर आपको मल्टीविटामिन टेबलेट वो प्रिस्क्रिप्शन बूस्ट करना तो यह अपना मन अपने विचार सब समय आनंद चाहते हैं और आनंद मिलता नहीं है क्योंकि विचारों का एक स्वधर्म ही है कि जितना नेगेटिव हो पाए वह नेगेटिव होना जिससे कि हम लोग सब समय अलर्ट रहे तो यह नेगेटिविटी की ओर जाने वाले विचारों को रोक करके उसको हम एंटरटेनमेंट देते हैं और यह एंटरटेनमेंट की वजह से अपने विचारों को आर्टिफिशियल आनंद मिलता है आर्टिफिशियल विटामिन वो डोज मिलता उसको व बस्ट मिलता है तो अभी यह आर्टिफिशलिटी किंतु इसका प्रॉब्लम क्या है जितने क्षण तक हम टीवी देखेंगे जितने क्षण तक हम पॉलिटिकल डिबेट देखेंगे या जितने समय तक हम क्रिकेट मैच देखेंगे उतना समय हमारा मन उसमें एंगेज रहेगा आनंदित रहेगा किंतु आप रात को उठ कर के दूसरे दिन देखेंगे तो सुबह को वही विचारों का भ्रम विचारों की माया जाल विचारों के चक्रवात में आप फंसे हुए दिखेंगे वो जो आनंद है आर्टिफिशियल हमने प्राप्त किया है वो दूसरे दिन सुबह तक एक्सटेंड होता नहीं है दूसरे दिन के एंटरटेनमेंट के लिए मन को कहीं पे एंगेज रखने के लिए आपको कुछ ना कुछ कार्य करना ही पड़ेगा ये लोग क्या कहते हैं पता है कि मरते दम तक कर्म करना चाहिए कार्य करना चाहिए क्यों क्योंकि जैसे कि मां खुद कहती थी कि मन ना की मो तो हसती मन है ना कि पागल हाथी सब समय मन को किसी ना किसी कार्य में पो करके रखो किसी ना किसी कार्य में उसको एंगेज करके रखो जिससे कि मन पागल की तरह दुनिया भर के उल्टे पल्टे विचार नहीं करेगा तो यह मन को स्वस्थ रखना मन को हेल्दी रखना उसी के लिए आज के देखिए कि पूरा जिसको हम मॉडर्न लाइफ कहते हैं यह पूरा मॉडर्न लाइफ इसके ऊपर में बना हुआ है कि कैसे भी करके मन को किसी चीज में एंगेज रखो हो मन को फ्री मत होने दो जैसे ही मन आपका एक सेकंड के लिए भी फ्री हुआ वो ऐसा गड़बड़ मचाएगा आपके भीतर में या तो आप सुसाइडल थिंकिंग करना स्टार्ट कर देंगे या तो आप डिप्रेशन में चले जाएंगे या तो आप क्या से क्या नहीं हो जाएगा यानी कि जो एक आप देखिए कि ये जो एडवर्टाइजमेंट होती है ना एडवर्टाइजमेंट का उद्देश्य क्या है कि हमको कुछ चीज सेल करना जैसे कि मोबाइल है ना कि घड़ी है ना कि कार है किंतु यदि आजकल की साइकोलॉजी कैसी होती है जो यह एडवर्टाइजमेंट बनाते हैं उनको पता है कि जद यह गाड़ी का नाम लेंगे कि यह गाड़ी परचेस करो या तो फिर कहेंगे कि यह मोबाइल परचेस करो तो लोग बोलेंगे अरे मुझे क्या जरूरत है ये सब चीजों की किंतु यह लोग क्या करेंगे कि आपके सामने एक लाइफस्टाइल खड़ी करेंगे कि हां एक देखिए कि बड़ा सुंदर लाइफस्टाइल है किसी एक व्यक्ति का किसी एक कपल का कि वे लोग सुबह को उठ कर के ही एक्सरसाइज करते हैं उसके बाद में वो जॉब करते हैं तो जॉब में उनको बहुत सेटिस्फेक्शन मिलता है उसके बाद में वे लोग वेकेशन के लिए जाते हैं एक परफेक्ट लाइफ स्टाइल आपके सामने खड़ा करेंगे जो कि जिसमें ब्यूटी है जिसमें सेटिस्फैक्ट्रिली के साथ में यह घड़ी है या तो यह मोबाइल है यह परफेक्ट मैच हो रहा है तो आपको प्रलोभन हो जाएगा कि मुझे भी तो उस तरह का लाइफ स्टाइल चाहिए मेरा लाइफ कितना सिंपल है मेरा लाइफ कितना बोरिंग है मुझे तो एक्साइटिंग लाइफ चाहिए तो यह एक्साइटिंग लाइफ के लिए यदि मुझे ये घड़ी लेनी पड़े तो मैं ले लेता हूं मुझे लगता है कि ये घड़ी पहन के मुझे उन लोगों के वो जो मॉडल होते हैं ये जो फिल्म के हीरो हीरोइन होते हैं उनके जैसा लाइफस्टाइल एक्साइटिंग लाइफस्टाइल एक स्पीड एक एक फास्ट लाइफस्टाइल मेरा हो जाएगा तो यह पूरा प्रलोभन के ऊपर में हमारे जो सिटी है अपना जो सिविलाइजेशन है वो पूरा बना हुआ है इसके साथ में में आप कंपेयर कीजिए कि पहले के जो रूरल सिविलाइजेशन थी गांव की शांति थी यह सब चीजें मैंने देखी है अपनी नजरों से क्योंकि मेरा घर शहर में था किंतु वेकेशन में मैं अपने गांव में जाया करता था तो गांव में मैं देखता था कि लोगों का लाइफस्टाइल इतना फास्ट नहीं है एक प्रलोभन नहीं है कि मुझे मेरा जीवन और ज्यादा इंटरेस्टिंग बनाना है और ज्यादा मुझे मेरे जीवन में जो उसको मुझे फास्ट करना है ऐसा कोई मैंने बहुत ज्यादा टेंशन लेकर के ये लोग नहीं घूमते थे वहां पर हमारी एक छोटी सी दवा की दुकान थी तो मैं बैठा रहता था तो वहां प दुकान में जो लोग बैठे हैं वे लोग भी शांति से बैठे हैं जो कस्टमर भी आता है तो वो भी दो-तीन बातें करके गप लगा करके दवाई लेकर जाता है ऐसा नहीं कि वो जो लोग बैठे हैं वो वो सब समय किसी ना किसी एंजाइटी में है कुछ ना कुछ करना है कुछ ना कुछ करना है कस्टमर भी आएगा तो जैसे सिटी में हम देखते हैं दौड़ता दौड़ता आए मुझे ये चाहिए वो चाहिए फटाफट लेकर के चला जाएगा वो काउंटर के ऊपर में कौन बैठा है कौन है उसके साथ में कोई रिलेशन नहीं ज यदि वहां पर काउंटर के ऊपर में कोई रोबोट भी बैठा होता तो भी उसको कोई परेशानी नहीं है क्योंकि वह दवाई लेने के लिए आया है दवाई लेकर चला जाएगा किंतु गांव में होता है कि जद देखेंगे किसी के दुकान पर जाएंगे रास्ते में सब लोग यह देखते हैं कि सामने वाला जो व्यक्ति है ही इज अ ह्यूमन बीइंग वो मनुष्य है और उसके साथ में दो घड़ी खड़े रहकर बात कर करेंगे दुकान में भी जाएंगे तो थोड़ा सा रिलेशनशिप खड़ा होगा पहचान खड़ी होगी कि आप कहां से आए हैं क्या कर रहे हैं एक एक पॉजिटिव ह्यूमन रिलेशनशिप मैंने गांव में देखा है वहां पर मैंने देखा है कि मनुष्य सब समय एक एक्साइटमेंट या तो एक रश या तो फिर ये एक एक एंटरटेनमेंट के लिए वो व्याकुल नहीं होता यह जो स्लो लाइफस्टाइल था पहले के जमाने का वह देखेंगे आज धीरे-धीरे करके जा रहा है तो य यहां पे साधन पद्धति क्या है कि अपने मन को यह जो एकदम ओवर ड्राइव में चल रहा है ना फिफ्थ गियर में तो उसको धीरे-धीरे करके न्यूट्रल गियर में लाना यह है साधन पद्धति कि मैं अपने मन को कहूंगा कि सतत जो एक्साइटमेंट चाहिए सतत जो एक एंटरटेनमेंट चाहिए सतत एक किसी ना किसी तरह का कर्म चाहिए बिना काम के में दो मिनट भी नहीं बैठ सकता ठाकुर कहते हैं एक बार कि केशव सेन के वहां पर गए थे तो एक वृद्ध व्यक्ति था तो ठाकुर ने कहा कि वह वृद्ध व्यक्ति तो अभी उसकी उम्र हो गई है कहां वो बैठ कर के ईश्वर का नाम लेता नहीं वह ताश खेलता है ताश यानी कि पत्ते खेलता है और फिर कहता क्या है पता है मैं बिना काम के बिना कुछ किए हुए बैठ नहीं सकता आजकल सिटी में लोगों को यह कहते हुए बड़ा गर्व होता है कि मैं बिना काम के रह नहीं सकता क्योंकि सब समय यह देखा है हमने कि कर्म ही है जीवन का एक श्रेष्ठ मानदंड कि आप कितना ज्यादा कर्म करते हैं आपका कितना बड़ा बैंक बैलेंस है आपका कितना बड़ा मकान है घर है आपकी कितनी बड़ी गाड़ी है ये ये आपके सक्सेस के मेजरमेंट है यहां पे लोग यह नहीं सोचते कि कर्म बंद करके थोड़ा सा आंख बंद करके अपने मन को विश्राम दे और थोड़ा सा शांति से बैठे इस बात से यह लोगों को बड़ा डर लगता है और डर लगता है इसके पीछे का कारण भी है 1000 साल का तमस हमको 1000 साल की गुलामी में हमको डूबा कर के रखा था हमने जब ब्रिटिश लोगों को देखा हमने जब अमेरिकन लोगों को देखा जैसे स्वामी जी ने तो स्वामी जी आश्चर्य चकित हो गए स्वामी जी बार अपने उनके जो भाई थे जो महेंद्रनाथ दत्त वो स्वामी जी के साथ में लंडन में रहने के लिए गए थे कुछ समय के लिए तो उनकी इच्छा थी कि वहां पे लॉयर बनके वो लॉयर बने वहां पे स्टडी करके ब्रिटेन में तो स्वामी जी ने क्या कहा पता है कि हमारे पिताजी जो लॉयर थे ना यही कारण है कि हमारा पूरा परिवार उ मने वो उसका चौपट हो गया है उनके परिवार में तो कम कष्ट नहीं हुआ पिताजी का देहांत हुआ तो घर में खाने को भी कुछ नहीं था तो स्वामी जी कहते हैं जो यह बे ये जो बर्बादी हुई है हमारे परिवार की यह जो बेहाल हुई है उसके पीछे मुझे लगता है कि हमारे पिताजी लॉयर थे यह कारण है लॉयर को सब समय झूठ बोलना पड़ता है कुछ ना कुछ गड़बड़ सरब करनी पड़ती है तो स्वामी जी अपने छोटे भाई को कहते हैं कि तुम अमेरिका जाओ वहां पर जाकर इलेक्ट्रिकल इंजीनियर बनो और बार-बार कहते हैं स्वामी जी कि अमेरिका इज फुल ऑफ इलेक्ट्रिसिटी अमेरिका इज फुल ऑफ इलेक्ट्रिसिटी यानी कि वहां पे ऐसा उत्साह है एंथू सियाज म है एक्साइटमेंट है एक मन का आनंद है एक जोश है उत्साह है तो यह करेज है तो यह सब तुम इंबाइब करो लॉयर बनना यानी कि चोर उ चकों के साथ में काम करना अभी सभी लॉयर ऐसे नहीं होते और किंतु ये जस्ट एक स्वामी जी का एक व्यू पॉइंट था कि अपने भाई को इस तरह से समझाते हैं तो अभी देखिए कि ये हजार साल की गुलामी हजार साल तमस में डूबे रहे उसके बाद में अमेरिका यूरोप से सीखा हमने कि ये एक्साइटमेंट है या तो ये रश है या तो सतत कर्म करते रहना है यह है जीवन की निशानी और जैसे ही आप अपने हाथ पर हाथ रख के बैठ गए वैसे ही आपका तमस चालू हो गया आप विनाश की ओर जाना शुरू हो गए अभी इस बात में पूरा पूरा यह बात पूरी पूरी गलत नहीं है हमको पता है कि रजस यानी कि मन का कार्य आप जैसे ही रोकेंगे 99 पर प्रोबेबिलिटी है कि हम तमस में चले जाएंगे तमस में लगता तो है कि मन जैसे कि मैं फिजिकली कुछ कार्य नहीं कर रहा हूं किंतु तमस में होता क्या है शरीर कार्य नहीं कर रहा किंतु मन चिंता कर रहा एंड दिस इज वेरी डेंजरस शरीर काम नहीं कर रहा मन चिंता कर रहा है यह परिस्थिति इज वेरी डेंजरस फॉर ह्यूमन माइंड क्योंकि एक तो चिंता करेगा दूसरा कि वह वासना में डूबेगा यह पूरा मनुष्य को यानी कि शरीर भले अब जैसे देखिए तमस में क्या होता है कि शरीर चुपचाप बैठा है बिना किसी कार्य के किंतु मन हजार चिंता कर रहा है या तो हजार प्रलोभन के विषय में डूबा हुआ है रजस में क्या होता है रजस में शरीर कार्य करता है तमस में शरीर कार्य नहीं करता रजस में शरीर कार्य करता है कर्म करता है कुछ ना कुछ जैसे कि गृहिणी है तो खाना बनाएगी बच्चों की संभाल रखेगी पुरुष है या तो जो लोग जॉब या बिनेस करते हैं वह अपना बिजनेस करेंगे कार्य करेंगे रामकृष्ण मिशन में साधु लोगों को देखिए कोई पुजारी महाराज है तो दिन भर उनको मंदिर में कार्य रहता है अकाउंटेंट महाराज है तो उनको अकाउंट देखना है कोई डॉक्टर महाराज है तो डिस्पेंसरी देखते हैं पब्लिकेशन सेंटर है यह रूरल डेवलपमेंट है स्कूल है कॉलेजेस है कितना सब कुछ है तो साधु लोग भी कर्म करते हैं शरीर सतत कर्म करता रहे इससे मन क्या होगा कि मन फोकस्ड रहेगा मन का जो जो स्वभाव है चिंता में डूब जाना या तो फिर प्रलोभन में डूब जाना उससे वोह बचा रहेगा किंतु इससे भी हायर स्टेज है वो है सत्व सत्व में क्या होगा कि शरीर भले कार्य करता रहे किंतु मन स्थिर हो जाएगा मन में किसी भी तरह का विकार परिवर्तन नहीं होगा मन जैसे कि एक स्वच्छ काच की तरह आत्मा को प्रकाशित करेगा आत्मा का प्रतिबिंब वो फेंके यह किस तरह से संभव है पहले तो थिरी देख लेते हैं तमस में और सत्व में बाहर से तो लगता है कि शरीर कुछ नहीं कर रहा किंतु तमस में मन जो है वह कामना वासना चिंता टेंशन यह सब में डूबा हुआ है जबकि सत्व में भले ही चाहे शरीर कार्य करे ना करे कार्य करे तो अच्छा है कार्य ना करे तो भी अच्छा है डज नॉट मैटर किंतु मन एकदम दिए की वो बा होती है उसकी की तरह एकदम स्थिर धीर होकर के शांत होकर के शीतल प्रकाश दे रहा है यह है सत्व और रजस क्या है रजस में शरीर कार्य करता है और मन भी कार्य करता है किंतु रजस का फायदा अल्टीमेटली यह है कि मन जो कार्य शरीर कर रहा है उसमें डूबा हुआ है जिसकी वजह से वह कुछ क्रिएटिव कार्य करेगा अभी जैसे यह देखिए कि आजकल बड़े-बड़े सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स के बारे में हम देखते हैं जैसे कि ये माइक्रोसॉफ्ट कंपनी है या तो ये जो बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां है वे लोग कुछ ना कुछ इनोवेशन करती रहती है पहले तो कोई सर्च इंजन बना दिया फिर ये कुछ ऑपरेटिंग सिस्टम बना दी फिर ये आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बना रहे हैं मनुष्य को चांद के ऊपर में भेज रहे हैं स्पेस स्टेशन बना रहे हैं ये जीन एडिटिंग टेक्निक्स हमने सब डेवलप कर दी है क्रिस्पर जिसको कहते हैं नैनोटेक्नोलॉजी डेवलप की है मार्स यानी कि मंगल ग्रह के ऊपर में ईश्वर के द्वारा मंगल यान भेजा जाता है यह सब कर्म है और यह इस तरह के कर्म है जिसको करने से शरीर और मन दोनों उसमें लगे रहते हैं दोनों स्वस्थ रहते हैं तो यह रजस वैसे अच्छा है किंतु रजस को भी क्रॉस करके हमको सत्व में जाना होगा क्योंकि यदि नहीं जाएंगे हमको लगता है कि मैं रजस में ही रहूं चलो मुझे सत्व में जाने की क्या जरूरत है मैं तमस में तो नहीं हूं व हजार साल की गुलामी में सु मैं बाहर निकल गया हूं मेरा मन कोई चिंता या तो वासना या तो टेंशन यह सब में तो नहीं डूबा है सतत मैं तो कार्यरत रहता हूं किंतु एक बात याद रखनी है कि सतत कार्यरत रहने से मन भी थक जाता है जैसे कि एक गाड़ी है कार है कार ने आपको चला आप कार चलाते ही रहते हैं चलाते ही रहते हैं सतत चलाते रहते हैं मान लीजिए कि आपको यहां से अमेरिका जाना है गाड़ी में बैठ कर के कार में बैठ कर के और और मान लीजिए यह संभव भी है एटलीस्ट यहां से लंदन जाना तो संभव है क्योंकि वो कंटीन्यूअस लैंड है वो लैंड ब्रिज है यहां से लंदन के बीच में फ्रांस तक वो लंडन में जा सकते वो टनल है तो मान लीजिए कि हमने एक सप्ताह तक सतत कार चलाई फिर क्या होगा पता है गाड़ी वहां पर बिगड़ जाएगी आधे रास्ते में और आपको दुनिया भर का परेशानी खड़ा करेगी गाड़ी जद चलानी है तो छ सात घंटा गाड़ी चलाई फिर गाड़ी को एक दो घंटा तीन चार घंटा विश्राम दिया इंजन दिन को ठंडा होने दिया पेट्रोल भराया थोड़ा सा मेंटेनेंस वगैरह किया जो व्हील है उसमें हवा डाली यह सब करके गाड़ी जैसे ठीक हो गई फिर से उसको चलाओ यानी कि गाड़ी को भी छ सात घंटा आठन घंटा सतत चलाएंगे तो उसको विश्राम चाहिए किंतु मनुष्य का मन ऐसा हम लोग सोच कर के घूम रहे हैं मैं प्रतिदिन रजस में बताऊंगा और यदि रजस से मुझे मुक्ति पानी है तो मैं वेकेशन के लिए जाऊंगा मैं नहीं कोई मूवीज देखूंगा किंतु ये वेकेशन है यह मूवीज है ना कि क्रिकेट है यह सबसे आपका मन को विश्राम नहीं मिलने वाला है आपने एक तरह का रजस छोड़ कर के दूसरे तरह के रजस में प्रस्थान किया है इतना ही जॉब के ऊपर में आप बहुत काम करते थे आपने सोचा वीकेंड है तो मैं थोड़ा सा एंटरटेनमेंट के लिए रिलैक्स होने के लिए कहीं पे जाता हूं किंतु ये एंटरटेनमेंट इट सेल्फ इज अ डिफरेंट टाइप ऑफ रजस इससे आपके मन को कोई प्रॉपर शांति नहीं मिलने वाली रेस्ट नहीं मिलने वाला जो कुछ रे मिलता है वो नींद में मिलता है वो नींद भी एक ऐसा चीज है कि देखेंगे कि दुनिया भर के सपना दुनिया भर की बातें आपकी नींद में चलती ही रहेगी हमारे शास्त्र कहते हैं कि स्वप्न जागृत सुश उक्ति ये तीन अवस्थाएं है ये तीनों अवस्था रजस के भीतर ही है यदि मैं जागृत हूं जग रहा हूं कार्य कर रहा हूं तो भी मैं रजस में हूं जद मैं नींद में हूं तो भी मैं रजस में हूं तभी मैं माया के राज्य में हूं और यदि सुश पत हूं किसी भी तरह से बेहोश हो गया कोमा में चला गया ऐसा कुछ भी हुआ तो भी मैं रजस में ही हूं रजस में से निकलने के लिए स्वप्न जागृत सुषुप्ति से परे चतुर्थ अवस्था है जिसको तुरीय अवस्था कहते हैं वह है सही सही सत्व की अवस्था और वहीं पर हमारे मन को रियल बूस्ट मिलता है यह जो नेचुरल विटामिन जो कि हमको संतुलित आहार से मिलते हैं वो हमको सत्व की स्टेट में मिलते हैं सत्व की परिस्थिति में वो चीज हमको मिलती है तो यह हो गया साधना का रहस्य साधना एक्चुअली है क्या साधना का उद्देश्य तो है कि हां ईश्वर प्राप्ति ईश्वर को मुझे प्राप्त करना है या तो फिर यदि मैं अद्वैत हूं वेदांत वादी हूं तो मैं कहूंगा कि मुझे आत्म साक्षात्कार करना है आत्म दर्शन करना है जैन या बौद्ध हूं तो कहूंगा केवल स्थिति प्राप्त करनी है या तो निर्वाण प्राप्त करना है इसके लिए मैं साधना कर रहा हूं तो यह भी तो एक उद्देश्य है दूसरा है कि जैसे हमने कल डिस्कस किया था एक सन्यास आश्रम है एक गृहस्थ आश्रम है गृहस्थ आश्रम में यदि देखेंगे यदि आप नियमित रूप से साधना करते हैं तो उससे क्या होगा गृहस्थाश्रम के आपके अन्य जितने भी कर्म है उसमें आपको बूस्ट मिलेगा उसमें आपको एनर्जी नई एनर्जी प्रदान होगी अभी इसके पीछे में थिरी क्या है जैसे हमने देखा कि साधना चार तरह की होती है सर्वप्रथम तो उपासना टेक्निकल वर्ड है वेदांत में कहते हैं उपासना तो चार तरह से होती है एक तो है कर्म योग दूसरा है ज्ञान योग भक्ति योग और राज योग किंतु देखिए कि इन चारों के पीछे में सही सही एक लिमिटेशन क्या है पता है जैसे कि मान लीजिए कि एक स्वच्छ जलाशय है जिसमें कि बहुत ही स्वच्छ पानी है किंतु इस जलाशय के ऊपर में कादो का एक लेयर कीचड़ का एक लेयर इस स्वच्छ पानी के ऊपर में बन गया है अभी कैसे भी करके आपको चाहिए कि ये कीचड़ का ये जो सरफेस लेयर है उसको हटा कर के उसके नीचे में जो स्वच्छ सुंदर सुंदर पानी है निर्मल जल है वो आपको उसको जो जल पान करना है उसको आपको पीना है तो सबसे पहले तो कीचड़ को हटाना होगा साधन पद्धति एक्चुअली करती क्या है पता है कि वो जितने भी साधन हो वो करते क्या है कि कीचड़ जो है कीचड़ को ही किसी ना किसी तरह से वो रिअरेंज करते हैं कीचड़ को हटा नहीं देते क्यों प्रॉब्लम क्या है कीचड़ मान लीजिए कर्म है और ये जो स्वच्छ जल है वह है मेरा आत्मन या तो फिर यह मेरे भीतर में जो दिव्य उपस्थिति है दिव्य सत्ता है वो और यह कीचड़ है वो है कर्म अब ये कीचड़ रूपी कर्म को हटा कर के स्वच्छ जल रूपी आत्मन या तो स्वच्छ जल रूपी देवत्व उसका साक्षात्कार करना है उसका पान करना है तो इसका अभी ये जो कर्म के द्वारा जो साधन पद्धति है साधना जितनी भी है वो सब तो कर्म के द्वारा ही तो करनी है अर्थात कि कीचड़ से ही तो कीचड़ को हटाना है यह कैसा हो गया पता है कि कीचड़ को हटाना उसकी वजह हम कीचड़ को ही रिअरेंज करते जाते हैं जैसे कि कीचड़ के ऊपर में मैंने लिख दिया कि स्वच्छ जल चाहिए किंतु स्वच्छ जल चाहिए बोलकर के तो वो स्वच्छ जल मिलने वाला नहीं है कीचड़ को ही मैंने अलग-अलग शेप में डिवाइड करना शुरू कर दिया कीचड़ को ही मैंने अलग-अलग तरह से कलर करना शुरू कर दिया तो भी तो उसके नीचे का स्वच्छ जल नहीं मिलने वाला है यानी कि मैं कर्मा के द्वारा मन के द्वारा जो कुछ भी साधन करता हूं वो तो मुझे मन के राज्य पे ही कर्म के राज्य पे ही वो जो बांध कर के रखते हैं अभी मैं मान लीजिए कि मैं जप करता हूं तो जब भी तो एक कर्म है मन के द्वारा विचारों के द्वारा कर्म के द्वारा मैं जप करता हूं मैं कंसंट्रेट करता हूं किसी ऑब्जेक्ट के ऊपर में यह भी तो एक कर्मा है मन के द्वारा ही विचारों के द्वारा ही मैं उस ऑब्जेक्ट के ऊपर में कंसंट्रेशन करता हूं मान लीजिए मैं सत ग्रंथ पाठ करता हूं मान लीजिए मैं सत्संग करता हूं मान लीजिए मैं तीर्थ यात्रा करता हूं मान लीजिए मैं साधु लोगों की सेवा करता हूं जो कुछ भी करता हूं मन से ही तो करता हूं मैं कीच को ही रिअरेंज करता हूं कीचड़ को हटाता नहीं हूं अर्थात की साधन पद्धति हम मन के द्वारा करते हैं किंतु इसका उद्देश्य है मन की हत्या जब तक हम मन की हत्या नहीं करेंगे तब तक जब तक हम विचारों को रोकेंगे नहीं विचारों को मार नहीं देंगे तब तक विचारों के परे जो आत्मन है वह प्रकट नहीं होने वाला है मन के जैसे शुद्ध जलाशय है उसके ऊपर ऊपर में जो कीचड़ है उसको तो उठा कर के फेंक देना है तभी तो जाकर के कहीं पर शुद्ध जल निर्मल जल हमको उसका साक्षात्कार होगा हम उसका पान कर पाएंगे उसको हम पी पाएंगे तो वैसे ही जितनी भी साधन पद्धति है उसका उद्देश्य ही है कि जो साधन करता है उसकी हत्या करनी है यानी कि साधन पद्धति एक्चुअली सुसाइड का एक माध्यम है मैं अपने मन से सत ग्रंथ का पाठ करता हूं मैं अपने मन से ईश्वर को प्रार्थना करता हूं ईश्वर को प्रार्थना क्या करनी है पता है कि यह जो मैं हूं मैं मैं क्योंकि मैं तो मन ही हूं मैं तो अपने को आत्मा के रूप में आइडेंटिफिकेशन समाप्त कर दो तब तो कहीं जाकर के इसके पीछे का जो दिव्यत्वाची मेरे जीवन में यह शौक है मेरे जीवन में यह दुख है उस दुख की पूर्ति करो इस शोक को समाप्त कर दो यह मुझे चाहिए वो मुझे चाहिए अर्थात कि मन को और ज्यादा पुष्ट कर रहे हैं अर्थात कि जिस पाप से जिस कर्म से आप को मुक्ति पानी है उस कर्म को ही आप बढ़ावा दे रहे हैं भगवान से यह सब कुछ मांग करके मुझे यह दे दो मेरा यह दुख समाप्त कर दो अरे अभाव है दुख है तभी तो हमको पता चलेगा कि ये मन जो है हमेशा अभाव में और दुख में ही रहने वाला है यह मन के परे जाना होगा मन को मार देना होगा मन को शूट कर देना होगा तभी तो कहीं जाकर के मन के परे जो शुद्ध निर्मल पाप विध हम हमेशा पवित्र जो आत्मन है उसका साक्षात्कार होगा शुद्ध निर्मल जल प्राप्त होगा उसका पान करके आत्मन रिष्ट पुष्ट होगा तो वो तो तभी संभव है जब हम मन को मार दे जबक हम कर्म को समाप्त कर दे जब यह विचार अभी देखिए कि कैसे ठाकुर ने एक बार कहा था कि मुझे एक योगी का चित्र चाहिए एक योगी है वो दाढ़ी वाला है उने वो जटा जूट सब बन गया है जंगल में बैठा है और शांति से वह चिर छिली फूक रहा है छिली अर्थात की वो जो एक आता था ना वो स्मोकिंग करने के लिए पाइप जिसको कहते हैं तो स्मोक कर रहा है वो तमाकू का सेवन कर रहा है इस तरह का चित्र क्या मुझे लाकर के दोगे ऐसा उन्होंने ठाकुर ने मास्टर महाशय को कहा था एक दूसरा चित्र उनको ठाकुर को चाहिए था एक पंखी बैठा है अंडे के ऊपर में उसका पूरा ध्यान है कि अपने अंडे को वो से रहा है जिससे कि उसमें से बच्चा प्रकट होगा तो उसका पूरे जगत में से मन चला गया है सिर्फ अंडे के ऊपर में उसका मन है ठाकुर कहते हैं यह सब छवि अपने पास में रखनी चाहिए यह सब चित्र अपने पास में रखने चाहिए जिससे कि हमको उद्दीपन हो मन को उद्दीपन हो यह कहने का अर्थ क्या है हम ऐसे लोगों को देखते हैं जिनका कर्म समाप्त हो गया है एक योगी है बेफिक्र हो कर के वो धुम्रपान करता है जंगल में बैठ के उसको पूरे जगत की कोई फिक्र नहीं है उसका मन वैसे ही स्थिर बैठ कर के शांत है मान लीजिए हम लोग 10 मिनट स्थिर होकर के बैठने का प्रयास करेंगे तो क्या होगा दुनिया भर की चिंता दुनिया भर का यह टेंशन दुनिया भर की ये वासना है आकर के ऐसे अपने मन को घिर लेंगे कि हम लोग घड़ बड़ करके खड़े हो जाएंगे बोलेंगे मुझे कुछ ना कुछ करना पड़ेगा कुछ ना कुछ कार्य करना पड़ेगा वरना मैं पागल हो जाऊंगा जैसे कि ठाकुर ने देखा कि वो वृद्ध व्यक्ति है वो मृत्यु के समीप आकर के खड़ा है किंतु फिर भी पत्ते खेल रहा है क्यों क्योंकि पत्ते नहीं खेलेगा ताश नहीं खेलेगा तो वो पागल हो जाएगा ऐसा भीतर से सब वो प्रवाह ऐसा वो कचरा सब उसका मन उसके सर के ऊपर में डालेगा तो ये देखिए कि यहां पे एक योगी है जंगल में बिल्कुल स्थिर शांत होकर के बैठा है उसके हाथ में ये चिलम है चिलम है वो फूंक रहा है और नहीं भी फूंक रहा है जगत की उसको कोई परवाह नहीं उसका सब कर्म समाप्त हो गया है सबसे लकी पर्सन सबसे फॉर्चूनेटली की पर्सन कौन है सबसे फॉर्चूनेटली जिसका कर्म समाप्त हो गया है जिसके मन जिसके विचार शांत हो गए है वह यदि स्थिर होकर के बैठा भी रहेगा कुछ भी नहीं करेगा तो भी उसके मन में किसी भी तरह का विकार नहीं होगा अपने आप में एक तरह की शांति उसके मन में फैल जाएगी अभी हम लोग सोचते हैं कि मन में शांति आएगी साधन भजन करने से प्रार्थना करने से जप करने से किंतु यह साधन भजन प्रार्थना जप सद ग्रंथ का पाठ या तो यह सत्संग या तो फिर तीर्थ यात्रा या तो फिर यह नित्या नित्य वस्तु विवेक की यह शरीर अनित्य है मैं नित्य हूं इसके पीछे में जो आत्मन है जो कोई भी साधन पद्धति है वो एक्चुअली कर्म के ही भीतर है सही सही सक्सेस मनुष्य जीवन की क्या है सही सही सक्सेस साधन जीवन में क्या है कि जब आप साधना को भी त्याज दे साधना का भी आप त्याग कर दे साधना को भी आप तज दे उसके बाद में भी आपका मन स्थिर होकर के बैठा रहेगा वरना तो क्या होगा कि अभी देखिए कि कितने स्टेजेस है इस धन जीवन में या तो मनुष्य जीवन में एक तो स्टेज है तमस का तमस के स्टेज पर क्या होता है शरीर कार्य नहीं करता जैसे कि 1000 साल तक हम भारतीयों ने किया हाथ के ऊपर हाथ रख कर के बैठे रहे और सब विदेशी लोग आकर के हमारे पर राज करते रहे तो यह एक तमस की परिस्थिति हो गई हाथ पैर बिल्कुल पंगु होकर के बैठ गए हैं शरीर पूरा निकम्मा हो गया है किंतु मन पूरा पागल की तरह पूरी दुनिया में घूम रहा है पूरा कचरा उसके मन के भीतर में भरा है यह हो गई तमस की अवस्था इसके ऊपर में है र राजसिक अवस्था अर्थात कि मैं एक अच्छा कार्य करने के लिए मैं तत्पर हूं अच्छा कार्य कर रहा हूं जैसे कि मैं खेती कर रहा हूं जैसे कि मैं वाणिज्य व्यवहार यह सब कुछ कर रहा हूं अकाउंटेंट हूं साइंटिस्ट हूं टीचर हूं सोल्जर हूं डिप्लोमेट हूं कि इवन ड्राइवर हूं ना कि कुछ भी हूं मैं कुछ ना कुछ पॉजिटिव कार्य कर रहा हूं जिससे कि इस समाज को अपने फैमिली को मैं कुछ कंट्रीब्यूट कर पाऊं यह रजस की अवस्था है मन किसी टारगेटेड कार्य में लगा है और मन के साथ शरीर कोई कार्य कर रहा है और शरीर के साथ में मन भी उस कार्य में जुटा है उसके बाद में आती है सत्व की अवस्था सत्व में बाह्य कर्म धीरे-धीरे कम करके मन के द्वारा हम साधन भजन करेंगे म मन के द्वारा हम जप ध्यान करेंगे मन के द्वारा सद ग्रंथ का पाठ करेंगे मन के द्वारा सत्संग करेंगे मन के द्वारा मन और शरीर के द्वारा किसी की सेवा करेंगे किसी भी अच्छी जगह कोई संस्था में जाकर के आश्रम में जाकर के एज ए वॉलंटस ए डिवोटा हम वहां पर सेवा देंगे ये हो गई सत्व की परिस्थिति किंतु सत्व में भी देखिए मन जो नेगेटिव चीजों की ओर जा रहा है उसको खींच करके उसको जोर जबरदस्ती पॉजिटिव चीजों में लगाना है साधन भजन में लगाना है किंतु इसके परे तुरीय अवस्था है चतुर्थ अवस्था है उस अवस्था में शरीर कार्य करता है नहीं करता है डज नॉट मैटर मन बिल्कुल स्थिर हो गया है मन से किसी भी तरह का कार्य नहीं होता मन ना ही कामना वासना में लगा है मन ना ही कोई एजेंट डॉक्टर होकर के कार्य कर रहा है ना ही टीचर होकर के कार्य कर रहा है मन साधक भी नहीं साधना राज्य से भी हम ऊपर उठ चुके हैं साधन राज्य को भी हमने छोड़ दिया है उसके भी उर्ध्व उठ चुके हैं मन कुछ नहीं कर रहा मन बिल्कुल स्थिर होकर के बैठा है और यह परिस्थिति जब आएगी तब देखेंगे कि भीतर का सत्व भीतर की आत्मन भीतर का जो सिंह है वह जागृत हो जाएगा अपना मन खुशी आनंद संपूर्णता तृप्ति संतोष इससे भर जाएगा एक ऐसा करेज खड़ा होगा कि आपको लगेगा कि मैं सही पर पृथ्वी पर चलने वाला मनुष्य हूं किंतु इस मनुष्य में देवत्व का वास है देवत्व इस मनुष्य के भीतर में निवास कर रहा है मैं कुछ भी कर सकता हूं मेरे लिए कुछ भी असंभव नहीं किंतु साथ-साथ मैं सभी तरह के कार्यों से उर्ध्व जा कर के बैठा हूं जैसे यह पंखी की तरह उसका जगत पूरा शांत हो हो गया है मन स्थिर हो गया है या तो फिर यह जो साधु जो कि वह धुम्रपान कर रहा है जंगल में शांति से बैठ कर के राजा महाराज के ऐसे बहुत सारे चित्र है वो हुक्का पी रहे हैं किंतु हुक्का पास में पड़ा हुआ है और मन कहां वोह उर्ध्व शांति और आनंद में स्थित होकर के बैठा है कहीं मछली पकड़ रहे हैं जलाशय के किनारे बैठ कर के किंतु मछली हाथ में वो प लकड़ी है मछली पकड़ने वाली जिसके साथ में वो तार बंधा हुआ है पानी में जाकर के मछली को पकड़ेगा वो लकड़ी पकड़े हुए हैं किंतु मन बिल्कुल स्थिर हो गया है तो यह मन का स्थिर हो जाना या मन का सुसाइड या तो विचारों का समाप्त हो जाना यह है ज्ञान यह शंकराचार्य जो कहते हैं कर्म और ज्ञान दो चीजें हैं इस जगत में यदि आपको ज्ञान चाहिए तो आपको कर्म समाप्त करना होगा तो उसका अर्थ यह हो मन को स्थिर कर देना है मन को शांत कर देना है जैसे ही मन स्थिर हो गया मन समाप्त हो गया मन डिस्ट्रॉय हो गया साथ में ही भीतर का आत्मन बाहह करके वह एकदम खड़ा हो करर के हमारे पूरे मन देह को वह भर देगा तो यह हो गई सर्वोच्च अवस्था साधन जीवन की अभी देखिए कि कल हम क्या पढ़ रहे थे हमने यह जो द ग्रेट समर स्वामी जी अमेरिका आए हुए हैं रिजली मैनर में रह रहे हैं और निवेदिता के साथ में बात कर रहा है तो निवेदिता के साथ में बात करते करते स्वामी जी ने क्या कहा जो स्टेटमेंट उन्होंने दिया है प्रत्येक स्वामी जी का इस तरह के जो स्टेटमेंट होते हैं ना आप घंटों के घंटों बात कर सकते हैं तो स्वामी जी ने क्या कहा इवन मेडिटेशन वुड बी ए बेज टू द फ्री सोल जो एक मुक्त आत्मा है उसके लिए ध्यान भी एक बंधन है बट शिवा गोज ऑन एंड ऑन फॉर द गुड ऑफ द वर्ल्ड द इटरनल इनकार्नेसियों मग्न रहते हैं जगत के कल्याण के लिए फॉर मेडिटेशन इज द ग्रेटेस्ट सर्विस द मोस्ट डायरेक्ट दैट कैन बी रेंडर्ड क्यों क्योंकि ध्यान सर्वश्रेष्ठ सेवा है सबसे सीधी सहज सेवा है जिसको आप मनुष्य को दे सकते हैं देखिए इसके पीछे का रहस्य क्या है स्वामी जी कहते हैं जो मुक्त आत्मा है उसके लिए ध्यान भी एक बंधन है ध्यान बंधन क्यों है क्योंकि हम कर्म के द्वारा ध्यान करते हैं मन के द्वारा विचारों के द्वारा ध्यान करते हैं तो जब तक हम विचार के राज्य में है तब तक तो हम सत्व में ही है सत्व के परे तो गए नहीं है सत्व रजस में ही हम लोग वो झोला खा र कभी सत्व में आते हैं कभी रजस में आते हैं कभी तमस में चले जाते हैं उद्देश्य तो है मन का विनाश करना मन का नाश करना तो इसीलिए ध्यान भी मुक्त आत्मा के लिए बंधन है ऑन द अदर हैंड ऑन द अदर हैंड भगवान शिव सतत ध्यान मग्न है शिव तो स्वयं भगवान श मने सृष्टि के संहार करता है उने जद सृष्टि का प्रलय कर दिया जिसने जिन्होंने वो मन का प्रलय ने में मन का नाश करने में उनको कितने क्षण लगेंगे पूरा संसार जो तांडव नृत्य के द्वारा उसका संहार कर सकते हैं उसका नाश कर सकते हैं तो मन का नाश करना उनके लिए तो चपटी भर का कार्य है ऐसा पलक जबक के ही वो मन का नाश कर द के किंतु फिर भी वह इस मन को जीवित रख कर के ध्यान कर रहे हैं अर्थात कि ठाकुर ने जैसे कि कहा कि जब हम निर्विकल्प समाधि प्राप्त करते हैं तो निर्विकल्प समाधि के बाद में मां किसी किसी को जगत में रख देती है जनरली जैसे निर्विकल्प समाधि में मन का नाश होता है तो जैसे ही मन का नाश हुआ मन से तो मुक्ति और मन से ही तो बंधन है जैसे कि ठाकुर के पास में एक दिन समाचार आया दो साधक लड़के थे तो वो दोनों ठाकुर के पास में आया करते थे तो उसमें से एक ने कहा एक दिन कि अभी बस हो गया मेरा जीवन और अभी मैं आपके पास में नहीं आऊंगा तो ठाकुर भी एकदम भाव में आ गए तो उन्होंने कहा अच्छा ठीक है तुम जा रहे हो तो जाओ तुमको आशीर्वाद है मेरा ऐसा ही कुछ एग्जैक्ट शब्द अभी मुझे नहीं याद आ रहा है किंतु ऐसा ही कुछ ठाकुर ने कहा अभी कुछ दिनों के बाद में पता चला इस लड़के ने जिस लड़के ने ऐसा कहा था कि बस अभी मेरा कार्य समाप्त हो गया समय समाप्त हो गया मैं जा रहा हूं तो उस लड़के ने आत्महत्या कर दी अभी ये जोब समाचार ठाकुर के पास में आया तो दूसरे भी भक्त बैठे थे तो वे लोग बोल रहे हैं अरे हमको तो आत्महत्या की बात सुनकर के बड़ा ही डर लगता है इसने शरीर इस तरह से छोड़ दिया अब ये तो बड़ा ही गलत काम किया उस समय ठाकुर क्या उदाहरण देते हैं ठाकुर उदाहरण देते हैं एक वैध्य का वैध्य एक काच की बोतल में मकर ध्वज बनाता है अभी मकर ध्वज एक आयुर्वेदिक औषध है एक आयुर्वेदिक एक दवाई है जिसको कि काच की बोतल में सब फार्मूला डाल कर के सब डिफरेंट डिफरेंट वो जो औषध दिया है उसको काच की बोतल में डाल कर के रखा जाता है कुछ दिनों के बाद में की बोतल के भीतर में यह मकर ध्वज तैयार हो जाता है तो ठाकुर कहते हैं काच की बोतल के भीतर में काच की बोतल का उद्देश्य ही यही है कि उसके भीतर में मकर ध्वज रूपी औषध तैयार होना है जैसे ही यह औषध तैयार हो गया वैध्य क्या करेगा बोतल को तोड़ करके बोतल को ये करके उसके भीतर में से औषध निकाल देगा तो ठाकुर कहते हैं कि जब मकर ध्वज तैयार हो गया है तब यह काच की बोतल रही कि गई वै उसको रखे कि उसको तोड़ कर के उसके भीतर का मकर ध्वज ले ले ये उसका तो कोई बोतल का अपने से तो कोई उद्देश्य नहीं है बोतल का यही उद्देश्य है कि सब विभिन्न तरह की औषध को इकट्ठा करके फाइनली मकर ध्वज बनाना है जैसे ही उद्देश्य समाप्त हो गया बोतल का कार्य भी काच की बोतल का कार्य भी समाप्त हो गया वैसे ही मनुष्य देह का उद्देश्य यही है कि इसके भीतर जो मन है मन का विनाश करना है जैसे ही मन का विनाश हो गया ब्रह्मण में स्थित हो गए आत्मज्ञान की प्राप्ति हो गई उसके बाद में शरीर रहा कि गया डज नॉट मैटर कोई फर्क नहीं पड़ता किंतु फिर भी मां जगदंबा किसी किसी का शरीर रख देती है जैसे कि ऐसे ब्रह्मज्ञानी पुरुष संसार में रहकर हम जैसे आम आदमियों को सामान्य मनुष्यों को ईश्वर प्राप्ति का रास्ता दिखाए हमको मार्गदर्शन दे हमको प्रेरणा दे तो भगवान शिव भी वोह तो अपने मन का चुटकी भर में विनाश कर दे सकते हैं किंतु फिर भी इस मन को धारण करके इस मन के द्वारा सतत जब ध्यान करके मेडिटेशन करके हम सबको प्रेरणा दे रहे हैं तो यह प्रेरणा देने का कार्य निरंतर अवतार शिव जो है वह कर रहे हैं तो यह इसके पीछे का है इस सेंटेंस कितना सुंदर है फिर से एक बार पढ़ता हूं इवन मेडिटेशन वुड बी ए बेज फॉर द फ्री सोल बट शिवा गोज ऑन एंड ऑन फॉर द गुड ऑफ द वर्ल्ड द इटरनल इंकार्नेट इज द ग्रेटेस्ट सर्विस द मोस्ट डायरेक्ट ट कैन बी रेंडर तो स्वामी जी का यह जो एक तीन चार लाइन का यह जो मैसेज है संदेश है इसके पीछे इतना गहन फिलोसोफी है और भी हम चाहे तो बहुत कुछ डिस्कस कर सकते हैं किंतु वह से कर अमा यदि एक व्यक्ति ध्यान करता है तो उसके जो वाइब्रेशन है ध्यान के जो तन मात्राए है वह चारों दिशा में फैलती है और जिनको स्पर्श करती है उनका मन उर्ध्व मुख कर देती है उनके मन को ईश्वर की ओर ले जाती है जैसे कि लोग मंदिर में क्यों जाते हैं हमको लगे ईश्वर यदि सर्वत्र व्याप्त है तो हम अपने घर में बैठ कर या तो फिर बाजार में या तो फिर यह थिएटर में बैठ कर के मूवी थिएटर में बैठ के हम क्यों नहीं जब ध्यान करते किंतु वहां की तनमानिया तो फिर मूवी थिएटर में ऐसा क्या नहीं है जो कि मंदिर में है तो मंदिर में सिद्ध लोगों ने जो जप ध्यान किया साधन भजन किया प्रार्थना की उसके वाइब्रेशन वहां पर है जैसे ही आप वहां पर जाएंगे ऑटोमेटिक आपका मन शांत होगा इसलिए जप ध्यान मेडिटेशन विथ ग्रेटेस्ट सर्विस सबसे पहले तो अंडरलाइन थिरी देख लेते हैं तमस में जब होते हैं तो शरीर कार्य नहीं करता मन कचरे में डूबा होता है रजस में होते हैं शरीर कर्म करता है जैसे यह जो सॉफ्टवेर इंजीनियर है सब समय कुछ ना कुछ इनोवेशन करते रहते हैं ये ईश्वर के साइंटिस्ट है कुछ ना कुछ करते रहेंगे तो शरीर मन दोनों एक्टिव रहते हैं सत्व जो है सत्व में मन जो है वह जब ध्यान साधन भजन में लगा है यानी कि मन से हम साधना करते हैं शरीर उसको फॉलो करे ना करे शरीर से साधना हो कि ना हो डज नॉट मैटर मन साधना करता है अभी जो यह हो गया ट्रेडिशनल सात्विक मॉडल स्वामी जी हमको क्या कहते हैं स्वामी जी कहते हैं कि तुम्हारा मन भले साधना करे तुम अपने शरीर से भी साधना करो जैसे कि शरीर से तुम लोग मंदिर में जाकर के भगवान शिव को वो जलाशय जलाभिषेक करते हो तो अपने हाथों से ये रोगियों की सेवा करो अपने हाथों से तुम यह जो अनफॉर्चूनेटली ी पद दलित है उनकी सेवा करो यानी कि मन से तो साधन भजन करो ही करो किंतु ऐड एक्स्ट्रा डाइम मेंशन ऑफ फिजिकल साधना आल्सो तो यह स्वामी जी का प्लस वन मॉडल है राजा महाराज शंकराचार्य का जो ट्रेडिशनल मॉडल है स्वामी जी उसमें एक एक्स्ट्रा डायमेंशन ऐड करते हैं यानी कि अभी हम बहुत सारे लोग अभी तक ऐसा भी सोचते थे कि तमस में है तो चलो हम कुछ अच्छा कार्य करके रजस में जाएंगे तो वो भी तो स्वामी जी का आइडिया यहां पर भी काम करता है हमको तमस में से रजस में ले जाता है जस में से सत्व में भी ले जाता है स्वामी जी का मॉडल कि मन से साधन भजन करते रहो साथ से शारीरिक सेवा भी लोगों की करते रहो यहां से भी आगे जाकर के देखिए कि आपको सत्व में से तुरीय अवस्था में भी यह मॉडल ले जाता है कि मन आपका स्थिर हो गया किंतु हाथों से सेवा चालू रखो जैसे कि ये आप ठाकुर ने जैसे कि कहा कि निर्विकल्प समाधि होने के बाद में दो चीज होती है या तो फिर शरीर समाप्त हो जाता है मन का भी नाश हो जाता है 21 दिल में मृत्यु हो जाता है किंतु किसी किसी को मां छोड़ देती है कि शरीर उनका बना रहेगा मन तो सोने का हो गया है शरीर कार्य करता है ठाकुर का ही उदाहरण घर-घर जाकर के ईश्वरीय नाम उन्होंने प्रचार प्रसार किया था मां का उदाहरण कि आखिरी घड़ी तक उन्होंने ठाकुर के नाम की लोगों को दीक्षा दी थी तो ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने के बाद में भी शरीर कार्य करता रहता है तो स्वामी जी का जो मॉडल है वो तमस में किस तरह से उसका एप्लीकेशन है कि तमस में शरीर अच्छा कार्य करेगा तो मन भी उसको फॉलो करेगा रजस में आप दुनिया भर का काम करते हैं जैसे कि आप टीचर है जैसे कि आप डिप्लोमेट है तो आप एक काम कीजिए आप सेवा का कार्य कीजिए आपको कार्य तो करना ही है रजस में है तो आप सेवा का कार्य कीजिए सत्व में आपका शरीर क्या करता है क्या नहीं करता उसका ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आपका मन साधन जन में लगा है तो स्वामी जी कहते हैं कि एड एक्स्ट्रा डायमेंशन मन के द्वारा साधन भजन करते जाओ शरीर के द्वारा सेवा करते जाओ जैसे कि रोगी को मैं सेवा करता हूं तो उसके भीतर में मैं भगवान शिव का ईश्वर का ही दर्शन करूंगा यह मान कर के शरीर और मन दोनों से साधना करो और तुरीय अवस्था में है कि मन का विनाश हो गया है मन स्थिर हो गया है तो भले हो गया मन स्थिर शरीर तो स्थिर नहीं हुआ जब तक अन्न ग्रहण करते हैं जब तक सांस में सांस चलती है तब तक सेवा कार्य करते जाओ यानी कि स्वामी जी का जो मॉडल है सेवा कार्य का इट इज नॉट डिपेंडेंट अपॉन एनी वन स्टेज कोई भी स्टेज में है उस स्टेज में आप एक एडेड डायमेंशन ऐड कर सकते हैं इसको आप पुष्ट दे सकते हैं ये दिस इज स्वामी जीस मॉडल और मान लीजिए कि आप तमस और रजस में नहीं है मान लीजिए आप सत्व में आ गए और आप शंकराचार्य या राजा महाराज का मॉडल फॉलो करते हैं ट्रेडिशनल शंकराचार्य का मान लीजिए जैसे कि कि मैं साधन भजन करके मन को शुद्ध कर दूंगा तो स्वामी जी ने खुद ने भगवान शिव के बारे में क्या कहा यदि आप सिर्फ जब ध्यान भी करते हैं इवन दैट इज द ग्रेटेस्ट सर्विस अपने हाथों से किसी की सेवा करना इससे भी ग्रेटर सर्विस है मेडिटेशन तो डज नॉट मैटर जैसे कि वैद्य मकर ध्वज तैयार हो जाए उसके बाद में बोतल खोल कर के उसमें से मकर ध्वज निकाले ना कि बोतल तोड़ करके उसमें से मकर ध्वज निकाले बोतल का कार्य समाप्त हो गया है तो वैसे ही सत्व या तुर अवस्था में आप शारीरिक सेवा करें ना करें आपका मन है वह लोगों की सेवा करता है तो यह आप ये ऑप्शन है आपके पास में तुरीय अवस्था में सत्व अवस्था में कर्म करना चाहे तो करिए ना करना चाहे तो भी आप राजा महाराज जिस तरह से उन्होंने संग की जितनी सेवा की उतना और किसने की होगी हम लोग जो जितनी हम कहते हैं कि कोई एडिटर है कोई डॉक्टर है ना कि कोई क्या करता है हम लोगों हमारे जैसे लाखों लोग आ जाएंगे राजा महाराज जितनी से नहीं कर पाएंगे यानी कि तमस और रजस में ये स्वामी जी का कर्म योग कंपलसरी है सत्व और तुरीय में ऑप्शनल सत्व में कर्म ऑप्शनल हो जाता है य सत्व में आप आ गए तो आपका सात्विक मन इट सेल्फ सेवा करना चालू कर देता है तो शरीर से आप जो सेवा करते हैं वो बोनस है और ठाकुर कहते नाभी पेंशन खाता है बैठ कर के तो वो बोनस है या पेंशन है क्योंकि सात्विक मन यन हां सात्विक मन अ जैसे अब जैसे नरसिंह मेहता है मीराबाई है रामानुजाचार्य है ये कितने ही संत महात्मा भारत में हुए हैं जिन्होंने स्वामी जी के कर्मयोग को स्ट्रिक्टली फॉलो नहीं किया किंतु उन्होंने जगत का कितना कल्याण किया है है ना तो वो सात्विक मन होने से ऑटोमेटिक कल्याण चालू हो जाता है मेडिटेशन इज द हाईएस्ट सर्विस जो मन मेडिटेशन करता है वो ऑटोमेटिक सेवा कार्य चालू कर ही देता है सत्व गुण का तुरीय अवस्था में कोई लेना देना नहीं है क्योंकि सत्व गुण में भी जब तक हम है हमारा मन कार्यरत है या तो फिर हमारा हमारे विचार है वह सतत चलते रहते हैं उद्देश्य है साधन जीवन का कि विचारों का विनाश मन का नाश तो जब तक मन चलता रहेगा तब तक हम त्रिगुण अवस्था में ही है कभी रजस में कभी सत्व में कभी तमस में तो जब तक मन चलेगा जब तक विचार चलेंगे त्रिगुणा त्रिगुण अवस्था में ही है जब मन का विनाश होगा तब हम त्रिगुणा त अवस्था या तो फिर तुरीय अवस्था में जाएंगे तो उसका और गुणों की अवस्था यह तो ऐसा हो गया कि एक व्यक्ति है जिसने लॉटरी जीत ली और उसको एक दिन में सडली ₹ लाख मिल गए और एक राजा है जो कि पूरा धन के भीतर में ही उसका जन्म हुआ है धन को लेकर के ही उसका पूरा है तो ये ये डिफरेंस है एक व्यक्ति को एक्सीडेंटली कुछ मिल गया है और वह एक लाख रु मिला तो कहीं प जुगाड़ करके ना कि वो नशे में वो ₹ लाख रुपया खत्म कर देगा जबकि राजा जिसका कि जन्म ही धन के भीतर में वैभव के भीतर में हुआ है उसका पूरा लाइफ इस तरह से ओरिएंटेड है कि धन को किस तरह से मैनेज करना तो वैसे ही यदि आप हम सत्व रजस तमस के भीतर में है आज मैंने बहुत अच्छा एक सत्संग किया और उसके बाद में बैठ कर के मैंने बहुत जब ध्यान किया तो मेरा मन शांत हो गया बहुत अच्छा किंतु ये शांत मन आपका कितना दिन चलेगा वो दिन समाप्त होने से ही वोह शांति भी चली जाएगी दूसरे दिन आपको फिर से एकड़े एक से फर्स्ट स्टेप से स्टार्ट करना ही होगा जबकि तुरीय अवस्था में चले गए तो वह अनंत शांति है कुछ करने से कुछ भी करने से वह शांति का भंग नहीं होने वाला है तो दिस इज ग्रेट डिफरेंस बिटवीन त्रिगुणा त अवस्था एंड त्रिगुण अवस्था नहीं यहां पे है और एक थरी काम करती है थियोरेटिकली हम समझ सकते हैं करते हैं स्वामी जी कहते हैं जब तक पूरे संसार की मुक्ति नहीं होगी तब तक मेरी मुक्ति सही सही संभव नहीं है ये भगवान बुद्ध ने निर्माण प्राप्त करने के बाद में भी संसार में रहने का पसंद क्यों किया क्योंकि वह चाहते थे कि पूरा संसार की मुक्ति हो पूरे संसार को निर्वाण प्राप्त हो तभी तो कहीं जाकर के समष्टि निर्वाण प्राप्त होगा व्यष्टि निर्वाण से कार्य नहीं चलेगा तो ठाकुर जब यह कहते हैं कि मुक्ति के बाद की भी एक अवस्था है तो व्यष्टि मुक्ति तो मिल गई अभी तो समष्टि मुक्ति बाकी है किंतु देखिए ब्रह्म कुंडली का कांसेप्ट एक थोड़ा सा डिफरेंट हो जाता है समझ की मुक्ति से मैं सभी लोग इंडिविजुअल समस्त की बात कर रहा हूं वो कॉस्मिक समस्त एक हो गया कॉस्मिक समष्टि एक हो गई और एक इंडिविजुअल समष्टि एक जो होती है कि संसार में जितने मनुष्य है 30 करोड़ भारतीय है उस समय थे और 100 करोड़ जितने जो पृथ्वी पर होंगे सबकी मुक्ति के लिए कार्य करना सो ट इज वई ठकर जद स्वामी जी देखिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना नहीं करते तो साधन भजन का एक प्रवाह चला है एक सुंदर व्यवस्था हुई है इतने सारे श्रद्धालुओं को एक आनंद मिलता है यहां पर आकर फिर सिर्फ य रामकृष्ण मिशन नहीं तो इस मॉडल को देख के कितने ही ऑर्डर होंगे जिन्होंने प्रेरणा ली है और उस ऑर्डर के अंदर में जितने भी डिवटी आते होंगे उनको कितनी शांति मिली है ट इज ये संसार की उन्नति के लिए ठाकुर ने स्वामी जी को कहा ये मैंने का स्टेटस रखा था बहुत दिनों तक मैंने अभी मैंने चेंज कर दिया है स्वामी जी का एक ऐसा दूसरा एक बम शेल जैसा एक दूसरा स्टेटमेंट है जो कि अभी मैंने रखा है तो इससे पहले यह वाला था मेडिटेशन इज द हाईएस्ट सर्विस