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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः कंप्लीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद वॉल्यूम टू कल हमने कॉस्मस मैक्रो कोसम जो प्रवचन था स्वामी जी का वह समाप्त किया उसका आखिरी लाइन कल हमने पढ़ा और आज से हम स्टार्ट करते हैं स्वामी जी का इसी सीरीज का या तो फिर वह जो काकड़ी काट का जो अनुभव था स्वामी जी का उस अनुभव के आधार पर उन्होंने जो दो प्रवचन दिए थे उसमें से दूसरा प्रवचन कॉस्मो माइक्रो कजम उसका प्रारंभ हम आज करते हैं कंप्लीट वर्क्स का पेज नंबर है 212 तो स्वामी जी लिखते हैं दिस यह लेक्चर न्यूयॉर्क में दिया गया 26 जनवरी 18864 है वह नेचुरली बहिर्गमन ऑफ ऑर्गन्स द आइज मस्ट सी द ईयर मस्ट हियर द सेंसेस मस्ट सेंस द एक्सटर्नल वर्ल्ड आंख देखना चाहती है कान सुनना चाहते हैं इंद्रिया उपभोग करना चाहती है या तो फिर सेंस करना चाहती है द एक्सटर्नल वर्ल्ड यह जो बहिर्गमन चरली द ब्यूटीज एंड सब्लिमिटी ऑफ नेचर कैप्ट वेवेटोस अनुभव करते हैं उसको ग्रहण करते हैं उसको उसका ऑब्जर्वेशन करते हैं तो सबसे पहले हमको क्या नजर में आता है हमको जो सौंदर्य है वह हमारे मन को सबसे पहले लुभाता है फॉर एग्जांपल स्वामी जी यहां पर प्राकृतिक सौंदर्य के बारे में कह रहे हैं जब प्रकृति का सौंदर्य हम निहार प्रकृति का सौंदर्य हम अवलोकन करेंगे तो हमारा मन ऑटोमेटिक उसकी ओर धावित होगा द फर्स्ट क्वेश्चंस दैट अरोज इन द ह्यूमन सोल वेर अबाउट द एक्सटर्नल वर्ल्ड इंद्रियों के द्वारा जब बहिर जगत का अवलोकन करते हैं तो यह जगत क्या है यह प्रश्न अवश्य हमारे मन में सबसे पहले उद्भव हुआ होगा अभी देख लीजिए फॉर एग्जांपल बच्चा जब तक अपनी मां के गर्भ में रहता है तब तक उसका पूरा मन उसका पूरा जीवन एक अंत मुख तो नहीं कहेंगे किंतु एक एक सिक्लूडेड एक सेफ बबल में वो रहता है किंतु जैसे ही वह जन्म ग्रहण करता है उसकी इंद्रियों के द्वारा ये पूरा बहिर जगत उसके ऊपर जैसे कि एसॉल्ट करता है बच्चा रोता है तो अभी तक तो बड़ा सेफ था मां के भीतर में मां के प्रेम से वह चारों ओर वो लिप्त था किंतु अभी वह बाहर जगत में आ गया है वो देखते हैं वहां पर डॉक्टर होगी या नर्स होगी ना कि फिर उसके वह परिवार जन होंगे हां अपनी मां को बच्चा इंस्टिंक्टिवली पहचान लेता है किंतु मां के बाहर का जो जगत है उसके लिए थोड़ा सा डरावना आश्चर्य चकित करने वाला और भयावह होता है ऐसा हम अनुमान सहज कर सकते हैं और बच्चा बेचारा रोता है कि अरे मैं तो बड़ा गर्भ में बड़ा ही सुख चैन शांति से था यह कहां पे मैं जगत में आ गया क्योंकि जैसे ही जगत में आप आएंगे आपको संघर्ष तो करना ही है जन्म के साथ-साथ संघर्ष का प्रारंभ हो जाता है जब तक हमारा जन्म नहीं है या तो फिर गर्भ में है तब तक हम इतने सेफ और सिक्योर है ईश्वर की यह पूरी रचना है ईश्वर किस तरह से हमको सेफ्टी और सिक्योरिटी का एक आस्वादन भी करवाते हैं और फिर कहते हैं कि चलो बेटा अभी यह जो स्वर्ग है स्वर्ग में से जाकर के पृथ्वी लोक पर जाओ उसमें उसका संघर्ष देखो तब कहीं जाकर के तुमको यह स्वर्ग का जो महात्म है और तुम और अच्छे से समझ पा पाओगे यह जो मन अपना हमेशा एक स्पिरिचुअल सेफ्टी खोजता रहता है तो वो वही मां की गोद में वो उसका जो एकदम अंतरंग रूप से वो वो वहां पर था इतना सेफ था वही वह सबकॉन्शियसली उसी स्टेट में जाना चाहता है कि ईश्वरीय मां के गोद में बैठना ये जब ठाकुर वो मां काली के साथ में आलाप करते थे बातें करते थे वो मने खेलते थे वो ठाकुर ने कहा ना खेल खेल में उन्होंने मे मेरी उंगली मरोड़ दी तो ऐसा वो खेलते थे सब कुछ करते थे वो दैट इज अ रिफ्लेक्शन बैक टू अवर अर्ली रिलेशनशिप विथ अवर मदर क्योंकि उस समय हम सबसे ज्यादा सेफ थे उस समय हम सबसे ज्यादा सिक्योर थे उस समय हम सबसे ज्यादा हैप्पी थे कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं था कुछ नहीं था सर के ऊपर में जब रोओगे तो खाना मिल जाएगा जब चाहोगे वो मां दौड़ी या चली आएगी जब चिल्लाओ ग तो मां जो चाहिए वो दे देगी तो वो हमको एक कंप्लीट एक पैराडाइज में जैसे कि हम रहते थे यदि मुझे कुछ चाहिए तो उसके लिए मुझे कोई कार्य नहीं करना है मुझे उसके लिए कोई पैसा देना या तो फिर कोई रिस्पांसिबिलिटी अपने सर पे लेना तभी मुझे सामने यह मिलेगा ऐसा ट्रांजैक्शनल नहीं था वो पूरा हम लोग हमारे सर के ऊपर में मां का एक कंटीन्यूअस आशीर्वाद था तो व सेफ्टी और सिक्योरिटी में से बाहर आ कर के अपनी इंद्रियां इस जगत को जब अवलोकन करती है तब सबसे पहले मन में यह प्रश्न होता है कि अरे यह जगत क्या है यह प्रकृति क्या है और जैसे कि स्वामी जी ने पहले भी कहीं पर कहा है एक दो जगह पर खास करके लेक्चर फम कोलंबो टू अल्मोड़ा में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया है कि भारत देश जो है वह इतना सिक्योर है एक और हिमालय है दूसरी ओर हिंदू कुष पर्वतमाला है साउथ में जाएंगे तो अरेबियन सी है इंडियन ओशन है बे ऑफ बंगाल है तो इसकी वजह से भारतवर्ष चारों ओर से सिक्योर था खास करके वे वैदिक एज में जबकि यह कम्युनिकेशन के साधन इतना डेवलप नहीं ट्रांसपोर्टेशन इतना डेवलप नहीं हुआ था उस समय यह गंजे िक वैली है या तो फिर सिंधु वैली है या तो फिर कावेरी रिवर वैली है वहां पर बहुत ही प्रोस्पेरिटी थी हां शायद हम लोग आपस में कभी-कभी झगड़ते होंगे जैसे कि महाभारत में देखा जाता है कि भाई भाई के साथ में युद्ध करता है किंतु वो एसिस्टेंसिया था हां धर्म को लेकर के युद्ध था किंतु धर्म के ऊपर में युद्ध नहीं था कौन सही धर्म का पालन करता है वह देखने की बात थी धर्म ही पूरा गलत है ऐसा तो नहीं था वो बाहर से आक्रमण हुए वो तब स्टार्ट हुआ तो स्वामी जी कहते हैं कि जब इतना सिक्योर हमारा भारत देश था तो नेचुरली हमारा मन जो है अंतर्मुखी सिविलाइजेशन वहां पे नेचुरल चैलेंज थी तो वो नेचुरल चैलेंजेबल निकाला जाए उसके लिए उनका मन बहिर्मुखी बहिर्मुखी केमिस्ट्री बायोलॉजी मैथमेटिक्स वगैरह बहुत ही सुंदर रूप से डेवलप किया हमने भी किया किंतु फिर इवेंचर झोक स्पिरिचुअल साइंस की ओर ज्यादा चला गया हमने देखा कि यदि प्रकृति को सही रूप से जानना है तो बाह्य लॉज ऑफ डायनेमिक्स या तो फिर यह एलिमेंट्स केमिस्ट्री के जो एलिमेंटल डिकल टेबल है वगैरह वगैरह उसका आप जितना भी एक्सप्लोरेशन करते रहेंगे इवेंचर सब्जेक्ट के ऊपर में ही आ जाएगी यह जो दिस इज द अनदर ग्रेट डिवीजन ऑब्जेक्टिफिकेशन और सब्जेक्टिव ये ग्रीक सिविलाइजेशन ने ऑब्जेक्टिफिकेशन किया है नेचर को अपनी इंद्रियों के द्वारा जो देखते हैं उसका हम अवलोकन करके उसका निराकरण करने का हम प्र प्रयास करते हैं जबकि वैदिक सिविलाइजेशन में ऐसा हुआ कि अच्छा आप अपनी आंखों से ये हिमालय का दर्शन करते हैं अपने कानों से गंगा नदी का कलकल शब्द सुनते हैं अपने हाथों से यह जो पवित्र मिट्टी है उसमें आप धान उगाते हैं सब कुछ ठीक है किंतु यह दर्शन करने वाला यह श्रवण करने वाला यह कार्य करने वाला मैं जो हूं वो तो सबसे बड़ा मिस्ट्री है मने यह पानी का प्रवाह कहां से आ रहा है कहां जा रहा है ये हिमालय कहां से आया मिट्टी में से धान कैसे उत्पन्न होता है आकाश में से बारिश बारिश कैसे होती है वह सब तो मिस्ट्री है ही है किंतु यह मिस्ट्री को मिस्ट्री के रूप में समझने वाला इस प्राकृतिक सौंदर्य का उपभोग करने वाला रोमांचित होने वाला प्राकृतिक ये नजारों से यह जो मैं हूं य मैं इट सेल्फ इज अ बिगेस्ट मिस्ट्री मैं ही तो सबसे बड़ा रहस्य हूं मेरा सही प्र नेचर क्या है मेरा सही स्वभाव क्या है वो स्वभाव का वो स्वभाव का एक्सप्लोरेशन कर करने के लिए हम अंतर्मुखी कि एक तरह से देखा जाए तो ग्रीक भी साइंटिस्ट थे हम लोग भी साइंटिस्ट है क्यों हमने भीतर में हमने अवलोकन किया इंटरनल साइंस या तो फिर कहेंगे कि साइंस ऑफ कॉन्शसनेस वी डेवलप द साइंस ऑफ कॉन्शसनेस और यह हेलेनिक सिविलाइजेशन ग्रीक सिविलाइजेशन जो ग्रीक और ग्रीको रोमन सिविलाइजेशन या तो फिर मोर टेक्निकल उनके लिए वर्ड है हेलेनिक सिविलाइजेशन या तो फिर आजकल जैसे हम कहते हैं यूरोपियन या तो फिर वेस्टर्न सिविलाइजेशन इन अ वेरी ब्रॉड सेंस तो वेस्टर्न सिविलाइजेशन डेवलप द साइंस ऑफ नेचर प्रकृति के विज्ञान का उन्होंने आविष्कार किया उसका उन्होंने डेवलपमेंट किया और हमने ईस्टन सिविलाइजेशन कोहो सिर्फ भारत नहीं देखिए कि ये बुद्धिज्म जिस-जिस कंट्रीज में गया चाइना फिर यह पहले का सिलोन अभी का श्रीलंका तिबेट जापान यह साउ साउथ ईस्ट एशिया के जितने भी कंट्रीज है मलेशिया है इंडोनेशिया है थाईलैंड है म्यानमार है सब जगह पर आप देखेंगे कि हिंदुइज्म बुद्धिज्म और वहां की जो इंडिजिनियस थॉट सिस्टम है टेओ इजम है या तो फिर ये उनके जहन बुद्धिज्म है जन बुद्धिज्म तो खैर वो बुद्धिज्म का ही अल्टीमेटली डेवलप स्वरूप है तो यह जो ताओ चाइना का ताओ चाइना का ताओ कांटो तो यह जो इंजीनियस उनकी सिस्टम से सब ईस्टर्न सिस्टम्स आर कंसर्न विद दी अवर कॉन्शसनेस ह्यूमन कॉन्शियस हमारे भीतर में क्या चल रहा है हमारा सही स्वरूप क्या है प्रकृति का उपभोग करने वाला कौन है इसका अवलोकन उसका निरीक्षण और उसका एनालिसिस करने के लिए हम लोगों ने प्रयत्न किया और वह हेलेनिक वेस्टर्न सिविलाइजेशन है एक्सटर्नल नेचर को सो ये एनालिस स्वामी जी हमको देते हैं एक सुंदर उदाहरण मतलब जद छोटा सा उदाहरण यदि देखा जाए तो इसके बारे में लाटू महाराज को एक बार लाटू महाराज किसी एक दुकान के पास में से जा रहे थे मध्य जहां पर शराब बिकता है तो अभी तो आजकल क्या है कि थोड़ा लाइसेंस वाइसेंस का चलता है किंतु उस समय तो बड़ा ही ओपनली शराब बिकता था और खैर और किसी स्टेट में बिकता भी होगा भारत गुजरात में वो जो यह जो नशे बंदी है माने वो लीकर बेन है तो शायद हमको पता नहीं चलता तो लाटू महाराज जैसा जा रहे थे किसी शराब की दुकान के पास में से तो व शराब की गंध जो है अ तो उससे उनका मन थोड़ा सा विचलित हो गया वो क्या है कि वह समय ऐसा था कि शराब पीना मद्यपान करना विदेशी संस्कृति के प्रभाव में आकर के हम लोग बोलते थे कि ये यह सब विदेशी जो उनके जो कल्चर है उसका हमको अडॉप्ट करना चाहिए उससे हमारे भारत देश की हमारी संस्कृति की उन्नति होगी तो मध्य पान बड़ा ही वो प्रचलित था वहां के वो जो अपर कास्ट लोग जो अपर क्लास जो समाज था उस कोलकाता का सोसाइटी उसमें तो लाटू महाराज ने वो शराब की गंध से थोड़ा सा उनका मन विचलित हो गया फिर वह ठाकुर के पास गए तो दक्षिणेश्वर जाकर के ठाकुर का तो अत दृष्टि था तो देख लिया कि लाटू महाराज का मन थोड़ा सा विचलित हो गया है तो ठाकुर ने पूछा कि क्या रे क्या हुआ तो लाटू महाराज ने कहा देखिए महाशय मैं इस तरह से शराब की गंध मेरे उसमें गई मेरे मन में तो इससे मेरा मन थोड़ा सा यह हो रहा है तो ठाकुर ने कहा देखो कि यह सब जो है इस सब चीजों से तुम संपूर्ण रूप से दूर रहो यह मध्य पान है काम कांचन है यह तो हमारे लिए बड़े ही भयावह है जद तुम तुम्हारा उसके ऊपर में तुम्हारे मन में इसके ऊपर में थोड़ा सा भी आकर्षण है तो तुम्हारे लिए बड़ा ही डेंजरस है संपूर्ण रूप से त्याग करो काम कांचन जितना डेंजरस है उतना ही डेंजरस है मध्य पान है बिल्कुल तुम उसके भीतर में मत जाना तो टू महाराज ने सोचा कि जदी मैं शराब की दुकान के सामने से फिर से जाऊंगा और फिर से उसकी गंध आएगी तो फिर से शायद मेरा मन उसके ऊपर में आकर्षित हो जाए तो क्यों मैं शराब की दुकान के सामने से जाऊं तो फिर इस तरह से वो जो राम बाबू का घर था वहां से राम बाबू उनको कोई मिठाई फल वगैरह देकर के ठाकुर के पास भेजते थे और ठाकुर के पास से वो राम बाबू के घर वापस आते थे तो रास्ते में शराब की दुकान अवॉइड करने के लिए ऐसा उल्टा उल्टा घूम कर के उनको दक्षिणेश्वर आना पड़ता था कि बड़ा लंबा टाइम हो जाता था उसमें बीत जाता था तो वो राम बाबू ने लक्ष्य किया कि देखा कि ये तो उसको आने जाने में बड़ा टाइम लग रहा है क्या कर रहा है कहीं रास्ते में खड़ा होकर के किसी के साथ गप कर रहा है कि क्या कर रहा है तो राम बाबू ने पूछा लाटू महाराज को कि अरे इतना देरी तुमको क्यों हो रहा है तो लाटू महाराज ने कहा कि ठाकुर ने कहा है कि शराब की गंध बिल्कुल ग्रहण नहीं करनी है जहां पर शराब की दुखाने है उसके पूरा दूर रहना है तो राम बाबू ने जाकर के ठाकुर को कहा कि अरे ये देखिए कि यह लाटू क्या कह रहा है तो ठाकुर ने फिर लाटू को कहा कि देखो कि इस तरह से तुम शराब की गंध को अवॉइड करने के लिए शराब की दुकान को अवॉइड करोगे तो इसलिए इससे तो तुम्हारा इसके ऊपर में से जो आकर्षण है कभी नहीं जाएगा अपने मन को दृढ़ करो कि जितनी भी शराब की गंध तुम्हारे नाक में चली जाए तुम उससे विचलित नहीं होगे तो देखिए कि मैंने ये एक्सटर्नल वर्ल्ड का एनालिसिस और इंटरनल वर्ल्ड का एनालिसिस यदि हम वेस्टर्न सिविलाइजेशन की दृष्टि से देखेंगे कि शराब को अवॉइड करने के लिए क्या करना है तो वही वहां उसको छोड़ देना है उसका त्याग करना है उसके पास नहीं जाना है जबकि ईस्टर्न सिविलाइजेशन की दृष्टि से देखेंगे कि देखो कि अपने मन को दृढ़ करना है मन यदि दृढ़ रहेगा तो हम कहां पर भी रहेंगे किसी भी परिस्थिति में रहेंगे किसी भी तरह का आकर्षण हमको मोहित नहीं कर पाएगा तो मैंने एक छोटे से उदाहरण में यह दो व्यू पॉइंट कैसे दिख खते हैं तो स्वामी जी कहते हैं कि द फर्स्ट क्वेश्चन दैट अरोज इन द ह्यूमन सोल वेर अबाउट द एक्सटर्नल वर्ल्ड मनुष्य के मन के भीतर में सर्वप्रथम प्रश्न प्रकट हुए वह बाह्य प्रकृति के बारे में थे द सॉल्यूशंस ऑफ द मिस्ट्री वाज आस्क ऑफ द स्काई ऑफ द स्टार्स ऑफ द हेवनली बॉडीज ऑफ द अर्थ ऑफ द रिवर्स ऑफ द माउंटेंस ऑफ द ओशन एंड इन ऑल एंट रिलीजस वी फाइंड ट्रेसेस ऑफ हाउ द ग्रुपिंग ह्यूमन माइंड एट फर्स्ट कोट एट एवरीथिंग एक्सटर्नल स्वामी जी ये बोलते बोलते मैं नॉर्मल वॉइस में बोलते बोलते मैं थक गया इतना लंबा सेंटेंस है स्वामी जी को तो एकदम चिल्ला करके बोलना होता था क्योंकि उस समय तो यह माइक वगैरह कुछ नहीं था बड़ा सा कमरा रहता था उसमें जद वो ये तो क्लास था तो क्लास में 50 60 100 के आसपास स्टूडेंट रहते थे बड़ बड़ा होल था इतना जोर से चिल्ला करके बोलेंगे कि सबको सुनाई देना है तो देखिए कि स्वामी जी का प्राणायाम का प्रैक्टिस कितना था कि वह अपने लंग्स में इतनी हवा भर के इतना आराम से वो बोल सकते थे और फिर कुश्ती भी तो किया है ना उन्होंने तो क्या है कुश्ती करने से वो लंग्स का कैपेसिटी ये वो कैपेसिटी डेवलप होता है फिजिकल स्ट्रेंथ तभी तो इतना जोर-जोर से वो लेक्चर दे पाते हैं वरना तो कैसे इतना लंबा सेंटेंस बाप रे पूरा छोटा सा पैराग्राफ ही हो जाएगा फिर से एक बार पढ़ता हूं द सोल्यूशन ऑफ द मिस्ट्री वाज आस्क ऑफ द स्काई ऑफ द स्टार्स ऑफ द हेवनली बॉडीज ऑफ द अर्थ ऑफ द रिवर्स ऑफ द माउंटेंस ऑफ द ओशन एंड इन ऑल एंसटिटाइट [हंसी] नदी है यह पहाड़ है यह समुंदर है इन सबसे पूछा गया कि आपका रहस्य क्या है कहां से आए हैं कहां जाने वाले हैं क्या प्रयोजन है इस विश्व में और यह प्रश्न पूछने के बाद में ऑल एंट रिलीजस वी फाइंड ट्रेसेस ऑफ हाउ ग्रुपिंग ह्यूमन माइंड एट फर्स्ट कोट एट एवरीथिंग एक्सटर्नल यह जो ग्रोपियस शब्द प्रयोग किया है मुमुक्षु क्यूरियोसिटी आज का आज जितने भी वो मोटिवेशनल स्पीकर को पढ़ेंगे तो क्यूरियोसिटी है क्रिएटिविटी है ये सिलिकॉन वैली के जो बड़े-बड़े सीईओ सीटीओ उनका सब सुनेंगे आप मोटिवेशनल स्पीस या तो फिर उनके लेक्चर तो ऐसा बोलेंगे कि इनोवेट समथिंग माने मूव फास्ट एंड डिस्ट्रॉय थिंग्स मने वो फ का एक मोटो था कि मूव फास्ट एंड डिस्ट्रॉय थिंग्स समथिंग लाइक दैट मैं एजेक्ट भूल गया वडिंग मैंने हमेशा नया नया इनोवेशन करते रहना है आज google-chrome सच ए बिग थिंग कि माइक्रोसॉफ्ट इज अगेन इन द गेम अभी हमारा सर्च बिजनेस रहेगा कि नहीं रहेगा क्योंकि ये एआई जो है वो इतना पावरफुल हो गया है सडन ओवरनाइट तो यह टेक्नोलॉजी के वर्ल्ड में हमेशा नई-नई इनोवेशंस नई-नई टेक्नोलॉजीज को आपको डेवलप करना है वरना तो आप टिक नहीं पाएंगे तो ग्रोप ह्यूमन माइंड ये टेक्नोलॉजी डेवलप कैसे होती है हम लोग हमेशा कुछ ना कुछ व्हाट इज बियोंड दिस होराइजन आज हमने चांद पे रॉकेट भेजा तो अभी चलो मार्स पे रॉकेट भेजते हैं वो एलोन मस्क हमें सा मार्स मिशन की बातें करता रहता है तो मार्स पर रॉकेट भेजेंगे लेट अस बिकम इंटरप्लेनेटरी सिविलाइजेशन व्हाई शुड वी लिमिट अवर सेल्फ टू अर्थ पृथ्वी पर ही मनुष्य सभ्यता है मान लीजिए पृथ्वी कोई डिजास्टर हो गया तो संपूर्ण विश्व ब्रह्मांड में से मनुष्य सभ्यता नष्ट हो जाएगी लेट अस बिकम मनुष्य सभ्यता को ह्यूमन सिविलाइजेशन को दूसरे दूसरे ग्रह प विकसित करो भेजो तभी तो कहीं जाकर के एक ग्रह पर डिजास्टर होता है तो दूसरे ग्रह पर हम लोग हमारी लाइजेशन बची रहेगी हमारी यह अद्भुत संस्कृति हमारे पुरखों का यह ज्ञान यह सब दूसरे ग्रहो पर बचा रहेगा तो यह व्ट इज बियोंड होराइजन ये हमेशा देखने की ये जो ह्यूमन हैबिट व ग्रोप ह्यूमन माइंड ये हमेशा हम लोग य क्यूरियोसिटी एंड मुमुक्षु तोव ये वेस्टर्न सिविलाइजेशन इसको क्यूरियोसिटी के रूप में देखता है कि ये एक्सटर्नल नेचर में हमेशा नेक्स्ट क्या है और हम लोग मुमुक्षु के रूप में देखते हैं कि हां यह देवी देवता है देवी देवताओं के परे एक महादेव है महादेव के परे यदि देखें तो मेरे ही हृदय में महादेव विराजमान है मैं ही महादेव हूं ये अल्टीमेट अहम ब्रह्मास्मि वो हमारा जो रियलाइक्स और मुमुक्षु उव जिसको कि स्वामी जी यहां पर कहते हैं ग्रोपियस सब जगह पर उसने खोज लिया कि कहां पर सत्य है क्या इसके बियोंड क्या है इसका तात्पर्य क्या है इसका प्रयोग जन क्या है इसका पर्पस क्या है सब हमने खोज मारा फिर भारत में ऐसा हुआ एक जगह पर खास करके कि हमारा मन इंट्रोवर्ट होना शुरू हुआ स्वामी जी कहते हैं आगे देर वाज अ रिवर गॉड अ स्काई गॉड अ क्लाउड गॉड अ रेन गॉड एवरीथिंग एक्सटर्नल ऑल ऑफ व्हिच वी नाउ कॉल द पावर्स ऑफ नेचर बिकम मटा मेटामिनडी मैसेंजर्स यदि हमने यह देखने का प्रयत्न किया कि नदी का प्रयोजन क्या है पर्वत का प्रयोजन क्या है समुंदर का प्रयोजन क्या है तब हमने जाकर के ऐसा सोचने की शुरुआत की कि कुछ देवता है जो कि यह नदी के स्वरूप में बह रहे हैं तो नदी के देवता अवकाश के देवता पवन के वायु देव अग्निदेव वरुण देव इंद्रदेव बारिश के देवता इस तरह से हमने प्रकृति में से प्राकृतिक फोर्सेस जो है नेचुरल फोर्सेस उनको एक ह्यूमनाए ही सोचने वाले हालांकि मनुष्य से कहीं बेहतर बहुत ज्यादा इंटेलिजेंट बहुत ज्यादा पावरफुल बहुत ही ज्यादा स्पिरिचुअल किंतु अल्टीमेटली एसेंशियली ह्यूमन लाइक गॉड्स एंड गॉडेस है तो यह द क्वेश्चन वेंट डीपर एंड डीपर दिस एक्सटर्नल मेनिफेस्टेशंस फेल टू सेटिस्फाई द ह्यूमन माइंड एंड फाइनली द एनर्जी टर्न इन वर्ड एंड द क्वेश्चन वाज आस्ड ऑफ मैनस ओन सोल जब हम मनुष्य रूपी देवता नदी में देखते हैं मनुष्य रूपी देवता बारिश में देखते हैं मनुष्य रूपी देवता उस प्रकृति में जहां कहीं भी हम देखते हैं किंतु क्या यह देवता का फिर क्या प्रयोजन है क्या देवता मेरी क्यूरियोसिटी है मेरा मुमुक्षु अपव है उसको सेटिस्फाई कर सकते हैं कि नहीं तो पता चला नहीं एंड देन ह्यूमन माइंड टर्न इनवर्ट्स योग शास्त्र में यह टर्निंग इनवर्ट को कहते हैं प्रत्याहार बहुत ही सुंदर शब्द है इंद्रियों को हम आहार देते हैं जैसे कि मेरी आंखों का आहार है दृश्य कान का आहार है श्रवण जिहुआ का आहार है खाद्य आहार यानी कि फूड त्वचा का आहार है स्पर्श तो यह आहार हम इंद्रियों को देते हैं ये आहार को प्रति आहार कर देना है रिवर्स कर देना है व अभी आंखों का आहार होगा अभी आंख कान नाक जिवा या तो फिर त्वचा यह जद हम इंटरनलाइज करेंगे तो मन के भीतर में सब समाहित हो जाता है बाह्य इंद्रिया यदि यह सब है तो आंतरिक इंद्रिय है मन तो मन के द्वारा मन का आहार क्या है तो हमारे विचार हमारे इमोशंस हमारी हमारे कर्मों का ये जो प्रवाह है वो हमारे गुण हमारे स्वप्न हमारी डिजायर्स अवर एस्पिरेशंस अवर होप यह सब मन के आहार है तो आहार को प्रति आहार कर देना है इंद्रियों के आहार को मन के आहार द्वारा भीतर में ले जाना है भीतर में एक बहुत बड़ा स्ट्रगल है ऐसा नहीं है कि आंख बंद करके बैठेंगे तो हृदय के भीतर में जो ईश्वर बैठे सीधा उनका उनका दर्शन होगा ऐसा नहीं है यहां से दिल्ली जाना है तो सिर्फ दिल्ली की ओर नॉर्थ में देखने से नहीं चलेगा बहुत सारे उसमें हमको मने हमको कठिनाइया है रास्ते में बहुत लंबा सफर काटना है सिर्फ वो गिरीश घोष एक बार कहता था कि एक समय था कि कलकाता में इतने ज्यादा मकान या तो इतने हाई राइज नहीं थे तो मेरे घर में बैठ कर के दक्षिणेश्वर का वो ये है चुड़ा चुड़ा अर्थात कि गुंबज गुजराती में कहते हैं वो दिखता था तो अभी आज कलकाता में बैठ कर के सोच ही नहीं सकते कि वहां से आपको दक्षिणेश्वर का गुंबज दिखे तो ये अभी आजकल इतने सारे अंतराय बढ़ गए हैं तो वैसे ही दिल्ली की ओर देखने से या तो भीतर की ओर देखने से सीधा ईश्वर या तो आत्मन का दर्शन नहीं होने वाला है बहुत सारी कठिनाइया अड़चन है जिसको कि पार करके हमको वहां पर जाना है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु