प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन हम देख रहे थे और जिस तरह से हमने डिस्कस किया कि हम पीरियड वाइज स्वामी जी का लाइफ स्टडी करेंगे नहीं कि बुक वाइज तो इससे से यह एक बेनिफिट होगा कि जितनी भी किताबों में जितना भी मटेरियल अवेलेबल है उसको पीरियडिकली सजा करके हम थोड़ा सा कंपेयर कॉन्ट्रास्ट भी कर सकते हैं और जितना इन डेप्थ हो सके किसी भी एक इवेंट में हम जा सकते हैं। तो कल हमने देखा कि किस तरह से
अपने प्रामाणिक साहित्य में एक ही घटना को लेकर के विविध दृष्टिबिंदु पढ़ने मे आते है. वह सब सत्य है - जैसे की हिरे के विभिन्न पहलू.
और यह जो हमारा स्टडी स्टार्ट हो रहा है ठाकुर की महासमाधि के बाद से इनफैक्ट उसी रात से उसी दिन रात को जिस दिन रात को 16 अगस्त 1886 श्री रामकृष्ण देव ने महासमाधि ग्रहण की उसी दिन रात मां जब अपने श्रृंगार चूड़ियां वगैरह निकाल रही थी उसी समय ठाकुर ने आकर के उनको दर्शन देकर के कहा कि मैं क्या मर गया हूं तो कि तुम इस तरह से सधवा स्त्री के जितने भी आभूषण है वह सब निकाल दे रहे हो निकाल दे रही हो तो ऐसा जब ठाकुर ने कहा तो मां ने फिर वो अपने हाथों की चूड़ियां एक सिर्फ रख दी तो देखिए यहां पे एक कंपेयर करने की बात है कि युगना मां की जीवनी है गंभीरानंद जी द्वारा लिखित उसमें आप देखिए कि ठाकुर क्या कहते हैं आमी की मोरे छ जे तुम एो स्त्री जीनिस हाथ थेके खुले फेल छो मैं क्या मर गया हूं कि तुम यह सधवा स्त्री के सब आभूषण वगैरह हाथ में से निकाल रही हो तो इस तरह से तो उनको कहा किंतु यहां पर देखिए हमारे पास दो दूसरे डिस्क्रिप्शन भी है। एक तो है अद्भुतानंद जी का डिस्क्रिप्शन। दूसरा है अभेदानंद जी का डिस्क्रिप्शन। दोनों ने इस घटना के बारे में लिखा है और इन दोनों ने जो शब्द प्रयोग किए हैं वह देखिए कि ठाकुर क्या कहते हैं। अद्भुतानंद जी कहते हैं कि ठाकुर ने आकर के दर्शन देकर के कहा आमी की कोथाई ग छो ए तो रोए छ सुधु ए घर थे के ओ घरे ऐसे छ मैं क्या कहां पे गया हूं क्या मैं यहीं पर तो हूं बस इस घर में से उस घर में गया हूं तो देखिए कि गंभीरानंद जी जो डिस्क्रिप्शन देते हैं ठाकुर की वाणी का और उसमें अद्भुतानंद जी का किस तरह से डिफर होता है यहां पे काली महाराज का भी एक डिस्क्रिप्शन है उन्होंने अमार जीवन कथा बोलकर के जो एक किताब लिखी है उसमें से उसमें देखिए कि ठाकुर क्या कहते हैं आमी की कोथाऊ गछगा ए जेमन ए घर थे के ओई घर मैं क्या कहा पे गया हूं ये तो मेरा जाना तो ऐसा हुआ जैसे कि एक घर में से दूसरे घर में देखिए कि यहां पे अद्भुतानंद जी यानी कि लाटू महाराज और अभेदानंद जी यानी काली महाराज दोनों कि यह जो ठाकुर की बात का जो डिस्क्रिप्शन है वह मोर और लेस सिमिलर है। जबकि युगनायक में मां की जीवनी में थोड़ा सा डिफरेंट है। अभी इस तरह से जब हम कंपेयर करके पढ़ते हैं तो हमारे मन में एक प्रश्न होगा कि इसमें से सही कौन सा है? गलत कौन सा है? तो मैंने जिस तरह से हमारे साहित्य का अभ्यास किया है, मुझे लगता है कि इस तरह का प्रश्न नहीं करके कि कौन सही है और कौन गलत इस तरह से देखना चाहिए कि जैसे यह थाउजेंड फसेट डायमंड हजारों पासा वाला एक हीरा है। प्रत्येक फसेट को आप अपनी-अपनी दृष्टि से देख सकते हैं। और प्रत्येक फसेट अपने आप में सही है। तो वहां पे उस दिन रात को जो कॉम्प्लेक्स घटनावली एक के बाद एक हो रही थी उसके ऊपर में जितने भी ऑथेंटिक सोर्स है देखिए यहां पे हम इन ऑथेंट अनऑथेंटिक सोर्सेज को नहीं ले रहे हैं। कहीं कोई न्यूज़पेपर में कुछ आ गया ना कि मैंने कहां से सुना है बोलकर के मैंने आर्टिकल लिख दिया ऐसा नहीं। गंभीरानंद जी का ऑथेंटिसिटी के बारे में कोई प्रश्न ही नहीं है और साथ में ही लाटू महाराज और काली महाराज उस दिन वहां पर उपस्थित थे। तो भले ही चाहे ठाकुर आकर के मां का हाथ पकड़ के जो कहा उन्होंने प्रत्यक्ष दर्शन ना किया हो किंतु जहां यहां पर जैसे लिखा है दूसरे दिन गोलाप मां ने आकर के खबर दी। तो जो गोलाप मां से जो फर्स्ट हैंड सुनी होगी तो इन दोनों ने सुनी होगी। तो इन दोनों का भी ऑथेंटिसिटी है। उनका भी डिस्क्रिप्शन सही है। गंभीरानंद जी ने जो लिखा है वह उन्होंने पुराने साधुओं से सुनकर के या तो जो अपने संघ में जो कहानियां चली आ रही थी उस समय उनसे सुनकर के जो उन्होंने लिखा है तो सबको सही मान करके सबको एक अपने मन में एक जगह पर बिठा करके हमको इसको लेना है कि एव्री डिस्क्रिप्शन गिव्स अस अ यूनिक पर्सपेक्टिव प्रत्येक डिस्क्रिप्शन प्रत्येक कहानी कहानी प्रत्येक वाणी विभिन्न विभिन्न दृष्टिकोण से कही गई है और सुनी गई है, लिखी गई है, बताई गई है और प्रत्येक दृष्टिकोण को हमको सही मान करके चलना है और एक पूरा एक मुजाइक जैसे कि अपने माइंड में तैयार होता है। तो किंतु यह सही डिस्क्रिप्शन हमको सिर्फ ऑथेंटिक सोर्स को ही लेना है और किसी को नहीं। तो यह तो हो गया मां का एक दर्शन। मां को उसी दिन रात को दर्शन हुआ था। स्वामी जी को नेक्स्ट वीक दर्शन हुआ था। इसके बाद में
श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के बाद के विषादपूर्ण दिन
देखते हैं कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में जो कुछ दिन बीते हैं उसके बारे में हमारे पास में क्या विवरण है। देखिए कि हमको पता है जनरल बैकग्राउंड कि काशीपुर जो बागानवाड़ी उद्यान गृह था वो 16 अगस्त को जब ठाकुर की महासमाधि के बाद में इसको जो नरेंद्र वगैरह त्यागी संतानों का कहना था कि हम लोग तो अभी जैसे देखिए तारक है, लाटू है, बूढ़ो गोपाल है या तो फिर इवन मां है, मां शारदा हम लोग अभी कहां पे जाएंगे? आप लोगों का तो घर है। जैसे रामबाबू है, मास्टर महाशय वगैरह। आप लोग तो अपने घर चले जाएंगे। किंतु हमको तो सबको ठाकुर ने अंतर से त्यागी कर दिया है। हमारा तो घर के साथ में संबंध परिवार जनों के साथ में संबंध संपूर्ण रूप से विच्छेद हो चुका है। तो अभी हमारे लिए घर जाने को तो जगह नहीं है। तो आप ऐसा क्यों नहीं करते कि यहां पर जिस तरह से ठाकुर की सेवा चल रही थी काशीपुर में वैसी ही चलती रहे। वैसा ही हमारा यहां पर सब कुछ बना रहे। और मां को भी फिर मां शारदा देवी भी बेचारी कहां जाएगी? हमको तो पता है कि जब वह यहां से निकल कर के फिर वह आखिर में कामार पुकुर गई थी तो उनको कितना कष्ट सहन करना पड़ा था। तो यह नरेंद्र वगैरह का कहना था कि यह काशीपुर गार्डन को रख लिया जाए। यहीं पर ठाकुर की जिस तरह से सेवा चलती थी हम लोग वैसे ही सेवा करते रहेंगे और आप सब गृहस्थ भक्त जिस तरह से बीच-बीच में आकर के सत्संग का लाभ उठाते थे सत्संग वगैरह भजन कीर्तन करते थे वैसा ही चलता रहे। किंतु जब यह त्यागी संतानों की खास करके नरेंद्र की यह बात यह जो गृहस्थ भक्त थे उन्होंने स्वीकार नहीं की। गृहस्थ भक्तों में भी खास करके रामबाबू जो थे रामचंद्र दत्त उनका उनका कहना था कि सभी त्यागी संतान अपनेप घर चले जाए मां शारदा देवी अपने पित्रालय या तो फिर यह ससुरवाड़ी है कामारपुकुर या तो फिर इवन दक्षिणेश्वर है वहां पर वापस चली जाए और यह काशीपुर गार्डन का जो लीज है उसको समाप्त कर दिया जाए। बस यह जितने दिन रहता है लीज 1 महीने का वहीं तक यह रहेगा। उसके बाद में हम इसको रिन्यू नहीं करने वाले। और फिर यह जब यह ठाकुर के अस्थियों की बात आई तो रामबाबू कहते हैं कि मेरा जो गार्डन है काकुड़गाची वहां पर जाकर के अस्थियों को स्थापित करेंगे और फिर मैं ही वहां पर ठाकुर की नित्य नियमित पूजा करता रहूंगा। तो अभी इस तरह का मत सुनकर के दो बातें त्यागी संतानों को बड़ा बुरा लगा। पहले तो यह काशीपुर गार्डन हाउस का लीज खत्म हो जाएगा। सब अपनेप घर चले जाएंगे। तो एक संघ स्थापित करके गुरु भाइयों के भीतर में एक दिव्यता का एक वातावरण जिस तरह से ठाकुर ने खड़ा किया था। हो सकता है वह भंग हो जाए। एक बार घर गए तो मां-बाप तो छोड़ने वाले नहीं है। शादी करवाएंगे, नौकरी करवाएंगे, संसार में डालेंगे, सब कुछ होगा। जैसे योगेंद्र महाराज का हुआ था बेचारे का कि उनकी मां ने कहा कि देखो तुम शादी नहीं करोगे तो मैं आत्महत्या करूंगी। ऐसा करके कितना धमकाया, कितना वो रोया उनके सामने तब कहीं जाकर के योगेंद्र महाराज शादी करने को तैयार हुए। अभी शादी जब हो गई किंतु स्त्री के प्रति उदासीन है। नहीं नौकरी करने की कोई इच्छा है। तो उसकी मां ने उनकी मां ने कहा कि अरे तुमने शादी क्यों की? यदि तुमको अपनी पत्नी की खबर नहीं लेनी। यदि तुमको घर संसार नहीं चलाना। तो योगेंद्र महाराज ने कहा कि मैंने कहां शादी की है। आपके कहने पर मैंने शादी की है। तो उनकी मां एकदम उल्टा उत्तर दे दिया। तुम्हारे मन में यदि शादी करने की इच्छा नहीं होती तो तुम थोड़ी ना शादी करते। मेरे कहने पर तुम थोड़ी ना शादी करते। बेचारे योगेन महाराज तो आश्चर्यचकित हो गए, अवाक हो गए। देखिए मां-बाप की कैसी उनकी यह स्टाइल है, कैसी यह ट्रिक है। वो पहले तो बोला मैं आत्महत्या कर लूंगी। तो वो बोल करके मैंने शादी की। अभी बोलती है कि अभी तुम्हारी इच्छा नहीं होती तो तुम शादी करते ही क्यों? मेरे कहने पर तुम थोड़ी ना करते। तो देखिए कि यह सब तो अभी योगेंद्र महाराज जैसे ईश्वर कोटि वो फंस गए जब इसमें तो फिर बाकी की क्या बात है। तो इस तरह से सभी के मन में एक डर था कि जिस तरह से घर में जाएंगे संसार की जवाबदारी आन पड़ेगी। ठाकुर ने जो मोक्ष मार्ग प्रदर्शित किया है अद्वैत और द्वैत वेदांत का जो रास्ता इन लोगों के लिए उन्मोचित कर दिया है उन्मादिनी भक्ति और प्रचंड त्याग यह दोनों का समिश्रण स्वरूप एक नया संदेश ठाकुर ने जो जगत को दिया है नया संदेश नहीं कह के वही सनातन संदेश किंतु आज की आधुनिक भाषा में व्यक्त किया हुआ आधुनिक मन को जिस तरह से वह रुचिकर लगे। उस तरह से कहा हुआ यह संदेश ठाकुर ने जो हमको दिया है वह कहां पे हवा में बिखर जाएगा। तो यह डर इन लोगों को था और साथ में ही यह अस्थि वहां पर
श्रीरामकृष्ण की अस्थिओं को कहां स्थापित किया जाए उसको लेके त्यागी संतान और गृहस्थ भक्त रामचंद्र दत्त के बिच विवाद और नरेन का समाधान
काकुड़गाछी में स्थापित करने की बात तो सभी का तो मानना था कि हम तो चाहते हैं कि कहीं गंगा के किनारे एक मठ की स्थापना की जाए। वहां पर श्री रामकृष्ण देव के अस्थि स्थापित किए जाए। वहां पर श्री रामकृष्ण देव का मंदिर बनाया जाए। मंदिर का निर्माण किया जाए और फिर वहां पर नित्य सेवा पूजा चली जाए। और फिर वहीं पर हम जो भविष्य की एक जनरेशन है युवा साधुओं की वे लोग आत्मनो मोक्षार्थम यह जो एक पार्ट अभी तक वो जो समझे थे वो आत्मा के मोक्ष प्राप्ति के लिए नित्य नियमित साधना उपासना करें। तो यह त्यागी संतानों के मन में था। यहां पर रामबाबू ने कह दिया कि नहीं अस्थित्व में लेकर के जाऊंगा और फिर वहां पर काकुड़गाछी में स्थापित कर दूंगा। तो यह बात को लेकर के जब होने लगा कुछ विवाद तो उस समय मां ने एक बड़ी सुंदर बात कही थी। मां ने गोला मां को कहा था कि देखो ऐन सोनार मानुष चले गो एक एरा छाईनी झगड़ा कर छे। इस तरह से एक सोने का मनुष्य सोने का यानी कि गोल्डन एक गोल्डन हार्टेड पर्सन वह तो चले गए अभी ये लोग छाई यानी कि यह एशिस एिस लेकर के राख लेकर के झगड़ा कर रहे हैं। तो मां ने जो एकदम स्पष्ट भाषा में बिना किसी कहेंगे कि स्ट्रेट फॉरवर्ड लैंग्वेज में जो कहा यह स्वामी जी को भी समझ में आ गया था। स्वामी जी ने कहा कि अपने गुरु भाई जो कि बड़े उत्तेजित थे इस मामले के बारे में स्वामी जी ने समझाया कि देखो ठाकुर के उपदेशों को लेकर के ही हमको अपना जीवन गठन करना है। नहीं कि उनकी अस्थियों को लेकर के झगड़ा करना है। वरना तो जैसे हमेशा से चला आ रहा है। एक सद्गुरु का निधन जब हुआ उनकी महासमाधि जैसे ही हुई तो उनके उपदेशों को तो सब उनके चेले चपाटे जो भी है उपदेशों को तो गंगा में ये कर देंगे वो उसमें विसर्जित कर देंगे किंतु फिर उनका यह जो व्यवहृत वस्त्र उनकी गद्दी उनके अस्थि उनका शिष्य कौन उनका संघ का चालक कौन यह सब लेकर के झगड़ा करना शुरू करेंगे तो स्वामी जी ने कहा कि देखिए पूरे भविष्य की नजर हमारे ऊपर में है। इस संकट की घड़ी में रामकृष्ण संघ के यह जो प्रथम पंक्ति के यह जो सन्यासी है प्रथम जनरेशन के वे लोग किस तरह का आचरण करते हैं। पूरा भविष्य हमारे सामने देख रहा है। तो इसके लिए हमको अस्थियों को लेकर के झगड़ा नहीं करना। उनकी इच्छा है ले जाए स्थापित करें। हम रहे हमरा होलो नटो सन्यासी। हम हम है दिगंबर सन्यासी नंगे सन्यासी कहां रहेंगे कहां खाएंगे क्या पिएंगे कुछ ठिकाना नहीं हम लोगों के लिए नित्य सेवा वगैरह की किस तरह से हम बंदोबस्त कर पाएंगे तो यह पूरा अस्थि को लेकर के और काशीपुर गार्डन को लेकर के डिबेट हुआ था उस 15 दिन ठाकुर की महासमाधि के बाद के 15 दिन में इसके बारे में अपने साहित्य में क्या-क्या लिखा है थोड़ा सा एक बार पढ़ लेते युगनायक में गंभीरानंद जी लिखते हैं श्री श्री ठाकुर स्मृति बीजड़ी तो ए पुण्य भूमि परित्याग कथा भाभीते ओ युवक ब्रह्मचारी देर कष्ट होइते छिलो श्री श्री ठाकुर की स्मृति से रंजित स्मृति से पर भरपूर इस पुण्य भूमि की पुण्य भूमि का त्याग करने की बात सोचकर के भी यह युवक ब्रह्मचारियों को कष्ट होता था। यह पुण्य भूमि कौन सी? तो काशीपुर गार्डन हाउस किंतु निहंबल तहारा कीबा कोते पारेन किंतु इन लोगों के पास में तो कोई था नहीं धनबल नहीं था ना ही कोई जनबल था ना ही कुछ ऐसा था मां-पिताजी के अंडर में रहते थे तो यह लोग फिर क्या भी कर पाएंगे देखिए ठाकुर ने एक बड़ी सुंदर बात कही ठाकुर कहते हैं ना हमेशा सत्य वचन का पालन करना है तो फिर निरंजन ना कि किसी को किसी एक त्यागी संतान को ही ठाकुर ने पूछा अच्छा तुमने प्रॉमिस किया था तुम उस दिन आओगे फिर क्यों नहीं आए ऐसा ऐसा करके ठाकुर ने बोला तो सही किंतु फिर वहीं पर मास्टर महाशय बैठे थे वो मास्टर महाशय को कहा पहले तो कहा कि तुमने वचन दिया उसका पालन नहीं किया ये तो मिथ्या बात हो गई ना किंतु फिर साथ-साथ में ही उन्होंने मास्टर महाशय वहां पर बैठे थे उनको कहा कि देखो आ ये दिन मिथ्या कोथा धोरी ना केनो जे एरा स्वतंत्र नहीं वो मास्टर महाशय को कहते हैं कि देखो मैं इन लोगों की जो असत्य वचन है प्रोमिस देकर के नहीं आए इस बात को मैं असत्य वचन नहीं मानता हूं। क्यों? क्योंकि यह लोग स्वतंत्र नहीं है। यदि मैं स्वतंत्र हूं, मैंने अपना प्रॉमिस दिया है, मैं प्रॉमिस निभाने के लिए स्वतंत्र हूं, तो फिर मैं प्रॉमिस तोड़ने के लिए भी स्वतंत्र हूं और फिर मुझे आप दोषी ठहरा सकते हैं। किंतु जो माइनर है एज में मां-पिताजी के अंडर में रहते हैं। उनका आज्ञा का पालन करना है। वह तो आने जाने के लिए स्वतंत्र नहीं है। उन्होंने भले चाहे प्रॉमिस किया भी हो। यदि पिताजी ऐसा कहेंगे कि मत जाओ आज दक्षिणेश्वर में वह पागल ब्राह्मण के पास में तुम्हारा दिमाग बिगाड़ दे रहा है। ऐसा बोलकर के पिताजी यदि कहेंगे तो वह शायद नहीं भी आ पाएंगे। क्या करेंगे? राखाल महाराज स्वामी ब्रह्मानंद जी रामकृष्ण संघ के प्रथम प्रेसिडेंट ठाकुर के मानस पुत्र। उनके पिताजी थे जमींदार। बड़े धनी वैभवी व्यक्ति थे और राजा महाराज बार-बार ठाकुर के पास में आते थे। उनको बिल्कुल पसंद नहीं था। तो फिर आखिर में क्या किया? उनको कमरे में बंद करके रख दिया। अभी किंतु देखिए ठाकुर की कैसी है यह इच्छा या तो फिर ठाकुर कैसे सब खेल करते हैं। एक दिन वह बैठकर के कुछ लिख रहे थे। उसी समय राखाल महाराज भी बगल में बैठे थे और अभी वह उनके पिताजी मामले मुकदमे में इतने व्यस्त थे उस समय कि वह जो राखाल महाराज बैठे हैं और उसके प्रति थोड़ा सा भी ध्यान नहीं था। तो जैसे ही राखाल राजा महाराज ने देखा कि उनका ध्यान नहीं है। वहां से खड़े होकर के सीधा दौड़ना शुरू किया सीधा दक्षिणेश्वर तो देखिए कि वो बेचारे राजा महाराज यदि प्रॉमिस करते भी कि मैं मुझे मुझे इस दिन आना है नहीं आना है तो फिर वो प्रॉमिस का पालन भी नहीं कर पाते क्योंकि वह तो स्वतंत्र नहीं है। इसलिए यहां पे महाराज ने लिखा है गंभीरानंद जी ने किंतु निहंबल ताहारा कीबा कोते पारिततेन जिनके पास में कोई साधन नहीं है कोई कार्य करने के लिए कोई उपादान नहीं है कोई धन नहीं है वैभव नहीं है पैसा नहीं है या तो फिर वो एक ऑथॉरिटी नहीं है वे लोग फिर क्या कर सकते हैं अत ए बाकी जे कोई दिन हाथ छिलो सुध से समय जनो अनुरक्त भक्त दे केो केो दीारा रात्रो शेखाने थाकिया ठाकुर स्मृति गुली रखणा बेण जतनोपर होइलेन इसलिए जो 15 दिन बाकी थे लीस के काशीपुर गार्डन के उतने दिन वहां पे उनमें से जिनका भी समय मिला जिनको भी सुविधा हुई वे लोग काशीपुर में दिन रात वहां पे रहे और ठाकुर की जो स्मृति है और स्मृति चिन्ह है ठाकुर के व्यवहृत वस्त्र ठाकुर की पादुका का इन सब की रक्षा करने के लिए वे लोग दिन रात वहां पर रहे ताहार पुतास्थियो शजार ऊपर स्थापितोया भक्ति और यो पते थाकि लो ठाकुर के जो पूत अस्थि थे वह भी ठाकुर जिस शैया पे शयन करते थे उसी पर स्थापित हुए और उनकी नित्य नियमित पूजा प्रारंभ हुई। अवशिष्ट ब्रह्मचारीरा दिन अंतत एक बार शेखाने मिलत होते एवं अनेक समय रात्रि बास करते और बाकी जितने ब्रह्मचारी थे ठाकुर ने तो सबको त्यागी बना ही दिया था सभी लोग दिन में एक बार तो वहां पर इकट्ठा होते और अनेक समय रात को भी रह जाते दुई जोन एकत्र मिली तो होलेले ही ठाकुर अपूर्व लीला ओ वाणी आलोचित हो तो यदि दो गुरु भाई मिल गए तो ठाकुर की वाणी के अला अलावा और कोई बात होती ही नहीं थी। आर शधा समागमे शकले ध्याने बोते और शाम खोने से ही शाम होने से ही सभी लोग ध्यान करने के लिए बैठ जाते। पूजा पाठ ध्यान और समालोचनाएं दिनों कोनो दिख दिया काटिया जाए तो पूजा पाठ ध्यान और स्वाध्याय ईश्वर तत्व आलोचना लेकर के ही दिन जैसे कि पूरा समाप्त हो जाता। श्री गुरु अदर्शने ता दे मने जे वेदना अहरिश जागरूक छिलो ता होते निस्तार पब जनो तारा उन्मत्ते न्याय ठाकुर प्रदर्शितो साधन धाराए गा भाषायातेन ठाकुर के समाधि से ठाकुर के अदर्शन से ठाकुर के चले जाने से जिनके मन में जो दिन रात वेदना हुई थी उसके हाथ से मुक्ति पाने के लिए वे लोग उन्मत्त की तरह ठाकुर की प्रदर्शित साधन धारा में वे लोग डूब जाते थे गुरुही शिष्य देरो केो केहो माझ तहा देर शही तो मिली तो हो तेन गुरुही भक्त थे उनमें से भी कोईकोई वहां पे आते शेखानकार प्रति धुली कणा जे तहा देर निकट पवित्रो प्रति द्रव्यों को तो शुभ मुहूर्त स्मुति बोहन करतो वहां का प्रत्येक धुली कणा इन लोगों के लिए पवित्र था। वहां के प्रत्येक द्रव्य प्रत्येक चीज कितनी शुभ मुहूर्त की स्मृति वहन करता था। देखिए यहां पे एक प्रश्न हो सकता है। मुझे भी इनिशियली हुआ था कि यह जो दक्षिणेश्वर जहां पर ठाकुर इतने दिन रहे तो वह तो त्रैलोक्यनाथ था वहां का इंचार्ज। एस फार एस आई रिमेंबर उस समय तो उसने क्यों इस तरह का कुछ नहीं सोचा कि चलो यहां पर ठाकुर की चीजें रखी जाए। ठाकुर का कमरा तो था ही था जहां पर ठाकुर ने पूरा जीवन बिताया था कोलकाता काशीपुर में तो आखिरी आखिरी दिनों में ही आए थे तो क्यों नहीं दक्षिणेश्वर में ही ऐसी कुछ व्यवस्था की जाती ये रामबाबू वगैरह जो है उन्होंने आगे आकर के थोड़ा सा वो रासमणि के वारसदारों के साथ में इस तरह का बात क्यों नहीं किया मथुर बाबू और रानी रासमणि दोनों की तो बात जगजाहिर है कि ठाकुर के कितने बड़े भक्त थे किंतु फिर भी मैंने इस तरह से कहीं नहीं पढ़ा माने इवन स्पेककुलेशन भी नहीं पड़ा कि किसी ने इस तरह का प्रयास किया हो। ठाकुर के भक्तों में से कोई किसी ने प्रयास किया हो कि दक्षिणेश्वर में ठाकुर का एक परमानेंट मेमोरियल या तो श्राइन जैसा बनाया जाए ना ही रानी रासमणि के वारसदारों का कहीं कोई डिस्क्रिप्शन है कि इन्होंने इस तरह का कोई प्रपोजल किया हो। तो देखिए कि मथुर बाबू के साथ में जो ठाकुर की जो बात हुई थी कि तुम्हारे जाने के बाद में मैं यहां पर नहीं रह पाऊंगा। तब मथुर बाबू बड़े ही आतंकित हो गए थे। फिर कहा कि अरे बाबा आप चले जाएंगे तो क्या होगा? तो फिर उनकी विनती को सुनकर के हमने लीला प्रसंग में देखा था कि ठाकुर ने कहा कि अच्छा तुम्हारी पत्नी और तुम्हारा जो बड़ा पुत्र है द्वारिक वह जब तक रहेंगे तब तक मैं रहूंगा। तो इन दोनों के मृत्यु के कुछ ही समय तक ही फिर ठाकुर दक्षिणेश्वर में रुके थे और जो छोटा पुत्र था उनका मथुर बाबू का त्रैलोक्य उसके हाथ में जब से यह मंदिर के व्यवस्थापना आई तब से फिर ठाकुर ने जैसे कि वहां से अपने मन को समेट लेने की शुरुआत की थी। तो वि इज वेरी सैड एक्चुअली एक तरह से देखिए अ ये बहुत एक सैड चैप्टर है अपने भावधारा में कि रानी रासमणि के वारसदारों में ठाकुर के प्रति भक्ति तो जैसे कि कम हो ही गई नहीं हो गई। फिर उन लोगों के भीतर में यह संपत्ति को लेकर के वाद-विवाद भी बहुत हुआ था। यहां तक बात आ गई थी कि महापुरुष महाराज जब प्रेसिडेंट थे उस समय दक्षिणेश्वर से खबर आया कि वहां पर मां काली की पूजा और भोगराख भी ठीक से नहीं होता। ठाकुर की कोई स्मृति रखना तो छोड़ ही दीजिए। मां काली के नाम से मंदिर बना है। काली यदि प्रकोपित हो जाएगी तो पूरा परिवार ध्वंस कर देंगी। पूरा वंश उन लोगों का उजाड़ देगी तो उनकी भी सेवा पूजा ठीक नहीं हो रही है। यह समाचार महापुरुष महाराज के पास में आया था। तब से महापुरुष महाराज खुद कहते हैं कि मैं जब भी ठाकुर का भोग लगता है तो मैं साथ-साथ में ही दक्षिणेश्वर की ओर देख के मां काली को प्रार्थना करता हूं कि मां आप यहां पर आकर के अपना भोजन ठाकुर के साथ में बैठकर के ग्रहण कर लीजिए और इस तरह से मैं मां को प्रार्थना करता हूं। तो वह भी एक दिन गए हैं। अभी तो ठीक है ट्रस्ट वगैरह बन गया है व्हाटएवर किंतु दिस इज अ सेड चैप्टर इन आवर भावधारा। अच्छा अभी लाटू महाराज उसी दिनों के बारे में कहते हैं शुरू शुरू के ठाकुर की महासमाधि के बाद में ही अ उसी तीन-चार दिन के बाद में मां हामा के गोलाप मां के और लोखी दीदी के शंगे एक बार दक्षिणेश्वर गलेन शधा रागी तनी काशीपुर बागाने फिरलेन लाटू महाराज कहते हैं कि ठाकुर की महासमाधि के तीन-चार दिन के बाद में ही मां मुझे हम के ये लाटू महाराज का हिंदी मिश्रित बंगाली तो हामा के यानी कि मुझे गोलाप मां को और लक्ष्मी दीदी को साथ में लेकर के एक बार दक्षिणेश्वर गई किंतु संध्या के आगे ही काशीपुर बागान में फिरत आ गई सुने छची से दिन बिकेर दिखे रामबाबू बागान एसे छिलेन सुना है उस दिन शाम को रामबाबू बागान में आए थे दुपरे शशि भाई निरंजन भाई लोरेन भाई राखाल भाई और बाबूराम भाई ऐसे छिलो दोपहर को शशि शशि महाराज भाई यानी कि ये म ये सब तो गुरु भाई थे इसलिए लाटू महाराज कहते हैं शशि भाई यानी स्वामी रामकृष्णानंद निरंजन भाई निरंजनंद लोरेन भाई ये लोरेन यानी कि नरन नरन का अपभ्रंश करके इनको लोरेन कहते थे लाटू महाराज राखाल भाई बाबूराम भाई सब आए थे रामबाबू ना की आश्रम तुले दते छ और शकुल के निजे निजे बाड़ी फिरे जेते बोले छ रामबाबू ने कहा कि काशीपुर उद्यान गृह को भी बंद कर दिया जाएगा और जितने भी लड़के वहां पर रह रहे हैं सब अपनेप घर चले जाओ एक कथा सुने निरंजन भाई आ शशि भाई भारी दुख होए छिलो यह बात सुनकर के निरंजन भाई और शशि भाई को बड़ा दुख हुआ था तादेर इच्छे जैमोन चोलछे ठाकुर सेवा तेमनी रोजरोज चलू उनकी इच्छा थी कि जिस तरह से ठाकुर की सेवा चल रही है वैसे ही प्रतिदिन चले निरंजन भाई तो से रात बलराम बाबू बाड़ी गैो निरंजन भाई तो उसी दिन रात को बलराम बाबू के घर में चले गए पर दिन बलराम बाबू मां के लिए आश्वजन काशीपुर नीचे गि छिले दूसरे दिन बलराम बाबू मां को लेने के लिए काशीपुर आए थे श्री श्री माय शंगे ठाकुर कापड़ चोपड़ श बलराम बाबू बाड़ी ते पाठी देवा होलो मां के साथ में ही ठाकुर के जितने व्यवहत वस्त्र वगैरह थे बलराम बाबू के घर भेज दिया गया श्री श्री मां बलराम मंदिर चले गले हामी गोपाल दादा और तारक दादा बागाने रह गू दुपरे शबाई आश तो और रात होते चोले जे मां बलराम मंदिर में चली गई मैं गोपाल दादा यानी बूढ़ो गोपाल यानी कि अद्वैतानंद जी तारक दादा यानी स्वामी शिवंद महापुरुष महाराज यह लोग रह गए वहां पे और दोपहर को सब आते किंतु रात को सब चले जाते हैं। अच्छा तो यह कुछ उसी दिनों का डिस्क्रिप्शन अभी ठाकुर की अस्थि को लेकर के सही-सही में एक प्रश्न खड़ा होता है। तो अपने साहित्य में इसके बारे में क्या लिखा है? उसके बारे में थोड़ा सा पढ़ते हैं। अ सबसे पहले तो गंभीरानंद जी महाराज मां के जीवन में क्या लिखते हैं? तृतीय दिन मध्यने श्री श्री ठाकुर पुतास्थ पूर्ण कोलशी सम्मुख भोग निवेदितो होइलो ए के प्रवीण भक्तगण स्थिर को ले जे ठाकुर देहो त्यागे परे उद्यान बाटी राखार आर कोनो आवश्यकता नहीं अच्छा ये सब तो हमने डिस्कशन कर ही लिया है इसको फिर लाइन बाय लाइन पढ़ने की जरूरत नहीं है इसको स्किप करके यह जो थोड़ा सा डिस्क्रिप्शन मां की जो बात है वो थोड़ा सा देख लेते हैं मां ने कितना सुंदर कहा श्री मां एबीतर के रने खान शून्या छलेन माने यह जो वाद विवाद चल रहा था अस्थि को लेकर के उसमें से काफी कुछ सुना था किंतु प्रखोर वैराग्य प्रतिष्ठितो तहार मन कोनो पखो ग्रहण करते पारिलोना किंतु प्रखर वैराग्य में प्रतिष्ठित मां का मन किसी एक पक्ष का समर्थन न कर पाया माने न यह कहा कि रामबाबू सही है अस्थि को वहां पे भेज दो यह सन्यासी बेचारों यह लड़के के पास में खुद के खाने की फिक्र माने क्या है वह कुछ ठीक नहीं है। ठाकुर की नित्य पूजा कैसे करेंगे? ना ही रामबाबू के पक्ष में मां ने कुछ कहा, ना ही लड़कों के पक्ष में कहा कि जो त्यागी है वही ठाकुर का सही-सही वारसदार है। तो सही वारसदारों के पास में ही ठाकुर के अस्थियों को दिया जाए। तो यह बात भी मां ने नहीं की। त सुधु दीर्घ निश्वास त्याग करिया गुलाब मां के बोलीले ऐन सोनार मानुष चले गले देखे गुलाब छनी ये झगड़ा कर छे मां ने सिर्फ दीर्घ निश्वास डाल के मां गोलाप मां को कहा कि इस तरह का सोना सोने का मनुष्य चला गया गोल्डन हार्टेड पर्सन वो चले गए देखो गोलाप ये छाई लेकर के राख लेकर के झगड़ा कर रहे हैं ए रूप दुशः शोके ओ तहार दृष्टि जागतिक विवेचनार कतो उध्व प्रसारितो विचार बुद्धि कतो निरपेक्षो इस तरह से दुहस शोक इस भयानक शोक के भीतर में भी मां की दृष्टि ये जागतिक विवेचना यानी कि ये सांसारिक ये जो जगत को लेकर के जितना भी यह डिस्कशन है उससे कितनी ऊपर में उठती है उर्ध्व प्रसारितो कितनी ऊपर हवा में उड़ती है विचार बुद्धि कतो निरपेक्षो विचार बुद्धि कितनी निरपेक्ष है मां चाहती तो आराम से त्यागी संतानों का पक्ष ले सकती थी अभी यह बात ठीक है कि मां यदि कहती भी कि त्यागी संतानों को अस्थि दे दीजिए तो शायद हो सकता है कि रामबाबू वगैरह यह सब सुनते भी नहीं किंतु जो भी है मां ने इस तरह से पक्षपात नहीं किया यह बात देखने की है श्री मां काशीपुर त्यागे जन प्रस्तुत होया छिलेन और फिर मां काशीपुर त्याग के लिए प्रस्तुत हुई थी। तो देखिए कि यह अच्छा इसके बाद में युगनायक में जो डिस्क्रिप्शन है वह एक थोड़ा सा हम पढ़ लेते हैं। उसमें भी सब कुछ पढ़ने की जरूरत नहीं है। हमको यह बात तो पता है। इसको थोड़ा सा मैं ही बता देता हूं लाइन बाय लाइन पढ़ने की वजह कि फिर नरेंद्र नरेंद्र ने जब ऐसा कहा कि देखो कि हम लोग अच्छा नरेंद्र ने क्या कहा वो थोड़ा सा देख लेते हैं। नरेंद्र क्या कहता है आमादे एकू विबेचना कोरे चोला उचित हम लोगों को थोड़ा सा सोच समझ करके चलना चाहिए ओ भस्म परे जेनो लोके ना बोले जे रामकृष्ण चेलारा चिता भस्मनी ये ममारी कोे छो भविष्य में लोग जैसे कि न कहे कि रामकृष्ण के चेलो ने चिता भस्म लेकर के ममारी की थी ओ भस्म तादेरी नहीं जेते दाओ आमरा जेनो ठाकुर जेमन बोले गए छे तेमनी भावे जीवन गते पारी यह भस्म है उन्हीं को ले जाने दो। हम लोग ठाकुर ने जिस तरह से उपदेश दिया था उसके अनुसार हमारे जीवन का गढ़तर करते हैं। आमरा जो आदर्श मैंने चलते पाली चोलते पारी ता होले ही तो सब ओ सब स्मृति चिन्ह पूजा चे अनेक बोो काज होए जावे यदि हम लोग ठाकुर के कहे हुए आदर्श को मान करके चल पाए तो वह सब स्मृति चिन्हों की पूजा से अनेक बड़ी पूजा यदि अनेक बड़ा काम यदि हो जाएगा ठाकुर के अस्थियों को रख के ठाकुर के व्यवहृत वस्त्र को रख के ठाकुर की पादुका को रख के उनकी पूजा करते हो उससे से हजार गुना बेटर है कि सत्य और ब्रह्मचर्य दो आदर्श ठाकुर ने दिए हैं। इस दोनों आदर्श के ऊपर में हमारे जीवन का आधार बना करके हमारा आध्यात्मिक जीवन निर्माण करें। यह पादुका और भस्म की पूजा करने से लाखों गुना बेटर होगा। काजे कोश और हो गो किंतु निरंजन अतो सहजे छाड़ीते प्रस्तुत छिलो ना शशि तार शहीद सहमत छिलन किंतु निरंजन महाराज और शशि महाराज इन दोनों की इच्छा नहीं थी कि पूरे-पूरे अस्थि सब कुछ दे दिए जाए तो फिर उन्होंने क्या किया उन्होंने अति गोपने बड़े ही सीक्रेटली उस अस्थि में से ज्यादातर अस्थि निकाल दिए और फिर जो कलसी थी कलसी में जो कुछ अस्थि रख दिए दिए साथ में ही गंगा की मिट्टी भी उसमें भर दी और फिर वह जो कलश था वह फिर रामबाबू को देने का निश्चय किया था। यहां पे मुझे वो रेफरेंस अभी नहीं मिला जो कि मैंने एक बार पढ़ा था कहीं पे कि यह शशि महाराज और निरंजन महाराज उस कमरे में प्रवेश कैसे किए थे। एक्चुअली उस कमरे में जहां पे अस्थि रखे थे उसको लॉक कर दिया गया था। अभी इसका चाबी शायद रामबाबू के पास में हो ना कि किसके पास में हो। शायद उन लोगों को एक डर लग गया था, एक अंदाज आ गया था कि यह लड़के लोग कुछ गड़बड़ कर सकते हैं। जिस तरह से यह लोग आर्गुममेंट करते हैं कि ठाकुर की अस्थि को आपको नहीं देंगे बोल के। तो हो सकता है कि उन्होंने लॉक करके चाबी अपने पास में रख दी हो। तो इन दोनों ने क्या किया कि वहां पे उसी कमरे में एक स्काई लाइट है। स्काईलाइट अर्थात कि ऊपर में से एक खिड़की जो कि नीचे जनरली खिड़की कहां पे होती है? अपने जो अपनी आंखों के लेवल पर होती है किंतु स्काईलाइट यानी कि ऊपर में होती है खिड़की या तो वह छत पर होती है या तो फिर ये जो हमने देखा होगा कि जो दरवाजा है दरवाजे के ऊपर में एक छोटा सा खिड़की कभी-कभी बनाते हैं एयर सर्कुलेशन के लिए। तो अभी वहां पे लिखा है स्काईलाइट। तो अभी वो स्काईलाइट कौन सा होगा वो मुझे वहां पे जाके एक बार देखना होगा। जो भी है जिस तरह से मैंने डिस्क्रिप्शन पढ़ा कि कमरे को तो दरवा लॉक लगाया गया था। किंतु उस स्काईलाइट में से वो खिड़की में से यह दोनों भीतर में गए सन्यासी शिष्य ठाकुर के वहां के अस्थि निकाल ली और फिर गंगा की मिट्टी भर दी और फिर वहां से स्काईलाइट में से ही बाहर आ गए थे। तो ये सब देखिए कि विभिन्न विभिन्न जगहों पर किस तरह का यह डिस्क्रिप्शन है। अच्छा इसके बाद में देखिए कि लाटू महाराज का डिस्क्रिप्शन बड़ा सुंदर है। वो एक बार पढ़ लेते हैं। रामबाबू इच्छा छिलो जे से ठाकुर रस्त पूर्ण कलष्ट के काकुड़गाची बागाने समाधि पीठ बान रामबाबूर से कथा शशि भाई निरंजन भाई राजी होलो ना तारा बोलले हमरा कोलशी देवो ना तो उस समय जो नरेंद्र ने जो कहा था क्या कहा था देख कोलशीनी आमादे झगड़ा झटी करा उचित होबे ना देखो यह कलसी को लेकर के हम लोगों को झगड़ा करना उचित नहीं है आमरा के कोथाई थाकी तार कोनो ठिकाना नहीं हम लोग कहां पे रहेंगे उसका कोई ठीक ठिकाना नहीं है राम दादा तो तार बागान खानी ठाकुर नाम में लिखे देते चाचे श्री तो भो तो राम दादा तो उनका खुद का जो बगीचा है ठाकुर के नाम पे लिख देने को चाहते हैं तो वह तो अच्छा ही है से खाने ही ना हो तार पूजा कर लूं भले ही चाहे हम वहीं पे उनकी जाकर के पूजा करें आमी तो बुझी जे तार आदर्श जीवन घोड़े गड़े नीले आ दे उद्देश्य सफल है। मुझे तो ऐसा लगता है मैं तो यही समझता हूं कि ठाकुर के आदर्श के अनुसार जीवन गढ़ लेने से ही हमारा उद्देश्य सफल होगा। देखिए कंपेयर टू दिस कि गंभीरानंद जी ने किस तरह से नरेंद्र ने क्या कहा वो कहा है। तो म देखिए जितने भी पर्सपेक्टिव उस घटना के बारे में हमको मिलते हैं। एव्री पर्सपेक्टिव डिपेंड्स आवर अंडरस्टैंडिंग ऑफ दैट पर्टिकुलर इवेंट। अच्छा तो अभी इसके बाद में यह जो अपने काली महाराज अभेदानंद जी उनका भी एक डिस्क्रिप्शन है। तो यहां पे मैं रिलेवेंट पोर्शन पढ़ता हूं। रात्रि अधिक खोई लो रात हो चुकी थी। ये उसी दिन रात का डिस्क्रिप्शन है कि जिस दिन रात को उन्होंने एक काफी गंभीर ये सब घटना हुई है। बड़ी सुंदर जिस दिन रात को ये सब अस्थि निकाले गए उस दिन का एग्जैक्ट डिस्क्रिप्शन काली महाराज देते हैं। क्या कहते हैं? रात्रि अधिक खोई लो देरी रात हो चुकी थी। नरेंद्रनाथ प्रमुख आमरा शकोले निर्बा खोइया श्री श्री ठाकुर रस्त कलशर चतुरदी के बोशिया आकाश पाताल चिंता करेते छ हम लोग सब लोग निर्वाक होकर के ठाकुर के अस्ति कलश के चारों ओर बैठकर के आकाश पाताल चिंता करेते छ माने सब तरह की चिंता कर रहे हैं उसमें आकाश भी आ जाता है पाताल भी आ जाता है एवन समय निरंजनानंद बोलिलो हमरा ठाकुर पुतो अस्थि किछूते रामबाबू के दीबोना उस समय निरंजन यानी कि निरंजन जी ने कहा ठाकुर के पुत्र अस्थि किसी भी तरह हम रामबाबू को नहीं देंगे आमरा निरंजनेर शहीद एकमत होलाम हम सभी लोग निरंजन के साथ में एकमत हुए सहमत हुए नरेंद्रनाथ आमादे नाना कथाई सांत्वना दिया बोली लो नरेंद्र ने हमको विभिन्न बातों से सांत्वना देकर के कहा तो देर जा अभिमत आारो ताई तुम लोगों का जो मत है मेरा भी वही है देखिए अभी तक हमने जितना डिस्क्रिप्शन पढ़ा नरेंद्र सबको समझाता था अरे अस्थि देख के दे देने दो उनको ले जाने दो क्या है हम लोग आदर्श के अनुसार जीवन गठन करेंगे किंतु यहां पे थोड़ा सा एक्स्ट्रा डिस्क्रिप्शन हमको मिलता है तो नरेंद्र कहता है तुमका जो मत है मेरा भी यही मत है तो हमरा शकले स्थिर करलाम ठाकुर पवित्र अस्थिर बे अंश कलश हो ते बाई करिया एकटी कोटा ते राखिया कौटा बाग बाजारे भक्तो बलराम बाबू बाड़ी ते लुकाई राखा हो एवं राम बाबू जेनो घणाखरे से कथा कोनो रकम में जानते ना पारे तब हमने ठीक किया कि यह कलश में से ज्यादातर अस्थि निकाल करके उसको एक कलश में रखकर के बलराम बाबू को दे दे और रामबाबू जैसे किसी भी तरह इस बात को न जान पाए पर रामबाबू आशीले बाकी अस्थि कलश तहां के देवा होवे बाद में जब रामबाबू आएंगे तो यह जो अस्थि कलश है उनको दे देंगे जो बचा हुआ जो है आमादे सिद्धांत म तो तहाई करा हो से रात्रि कलश थे होते प्राय समस्त अस्थि बा करिया एकटा कोटा राखा हो एवं जत सामान्य अस्थिर गुंडा भस्म गंगा मृतिका का से तामार कोशते राख्या देवा हो उसी दिन रात को ज्यादातर अस्थि एक दूसरे पात्र में लेकर के थोड़े से अस्थि और गंगा मिट्टी यह जो जिस उस कलश में रख दी गई जो कलश रामबाबू को काकुड़गाछी के लिए देना था ताहार पर नरेंद्रनाथ बलि लो इसके बाद में नरेंद्रनाथ ने कहा देखो आमादे शरीर श्री श्री ठाकुर ठाकुर जीवंत समाधि स्थान देखो हम लोगों का शरीर ही तो है ठाकुर का जीवंत समाधि स्थान एशो आमरा शकले तार पवित्र देह भस्म एक करे खाई और पवित्र होई आओ हम सब लोग उनके देह के पवित्र भस्म थोड़ा सा खाए ग्रहण करें और पवित्र हो जाए नरेंद्रनाथ सर्वप्रथम कोलशी होई ते सामान्य अस्थिर गुंडा वो भस्म ग्रहण करिया जय राम कृष्ण बोलिया भखण कर लो ताहार और आमरा शकोली ताहा के अनुसरण करिया निजे देर धन्य ज्ञान कोलाम सर्वप्रथम नरेंद्र ने ही कलश में से थोड़ा सा अस्थि निकाल करके जय रामकृष्ण बोलकर के उन्होंने ग्रहण किया और फिर बाकी सभी गुरु भाइयों ने भी ऐसा किया और अपने को धन्य माना। देखिए यह एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट एक अह नरेन कहता है स्वामी जी कहते हैं भविष्य के स्वामी विवेकानंद कि हमारा शरीर है ठाकुर का जीवंत समाधि स्थान यानी कि ठाकुर के जाने के बाद में ठाकुर हम लोग कहते हैं ना ठाकुर सूक्ष्म देह से वर्तमान है किंतु देखिए कि ठाकुर सदै भी वर्तमान है। ये जो जितने भी डायरेक्ट डिसाइपल वहां पे लिखा नहीं है यह पूरा लिस्ट कि किन किन्होंने किन-किन ने यह सब अस्थि ग्रहण किए। किंतु हम मान लेते हैं कि जितने भी है डायरेक्ट डिसाइपल सभी लोग ठाकुर की जीवंत समाधि है। तो और इनका मन भी उस अस्थि को ग्रहण करके कितना पवित्र हो गया होगा। अच्छा अभी शिव आनंद महाराज का भी एक है डिस्क्रिप्शन उसमें अभी इसको नहीं पढ़ करके इसको स्किप कर देते हैं। अभी सीधा
23 अगस्त, 1886 जन्माष्टमी के दिन, कांकुरगाछी योगोध्यान में श्रीरामकृष्ण की अस्थि को स्थापित किया गया
चले आते हैं जन्माष्टमी को। 23 अगस्त को जन्माष्टमी थी। उस दिन को रामबाबू ने ठीक किया कि ठाकुर के जो अस्थि है उस अस्थि को कांकुड़गाची ले जाएंगे और वहां पे उनको स्थापित करेंगे। तो उस दिन के दो डिस्क्रिप्शन हमारे पास में है। एक तो लाटू महाराज का है अद्भुतानंद जी का। दूसरा है काली महाराज का आमरार जीवन कथा बोलकर के जो पुस्तक उन्होंने लिखा है उसमें है। यह दोनों डिस्क्रिप्शन को एक बार पढ़ लेते हैं। बड़ा ही सुंदर डिस्क्रिप्शन दोनों है। लाटू महाराज सर्वप्रथम क्या कहते हैं? जन्माष्टमी आगे दिन हमने रामबाबूर बाड़ी गूं। वही हिंदी मिश्रित बंगाली कि जन्माष्टमी के आगे के दिन मैं रामबाबू के घर गया शेखाने होते काकुड़गाची बागाने गू वहां से फिर काकुड़गाची बागान में गया परेर दिन शकाल बेला रामबाबू बाड़ी थे के कीर्तन करतेकरते शकोले मिले काकुड़गाछी ते गूम दूसरे दिन सुबह को रामबाबू के घर से कीर्तन करतेकरते सब मिलकर के काकुड़ गाछ गए शशि भाई निजे माथाई कोरे कोलशीनी गैलो शशि भाई ने स्वयं अपने सर पे कलशी को वहन करके गए थे। शेखा ने कोलशीर ऊपर माटी फेलते देखे शशि भाई कहदे उठ लो बल्ले वहां पे कलसी को स्थापित करके उनके ऊपर में कलसी के ऊपर में जब मिट्टी फेंक रहे थे उस समय शशि भाई रो उठे शशि भाई स्वामी रामकृष्णानंद भविष्य के रो उठे और कहा ओगो ठाकुर गाय बोो लाछे अरे ठाकुर के शरीर पर लग रहा है। यानी कि माने शशि भाई यानी कि शशि महाराज तो ठाकुर को जीवंत रूप में देखते थे ना। अस्थि को सिर्फ नहीं देखते थे। ठाकुर सदेह वर्तमान है। इस तरह से देखते थे। तो वही ठाकुर जो कि दक्षिणेश्वर में खड़े थे और वहां पे वो जो ग्रीन ग्रास ये जो नीला ये जो लीला घास जो उगा है उसको देख रहे थे। उसके साथ में इस तरह का तादात्म हो गया था ठाकुर का कि उस घास के ऊपर में से कोई पैर रखकर के चल रहा है तो ठाकुर के शरीर अंग के ऊपर में आघात के निशान हो गए। जैसे कि कोई उनके शरीर पर पैर रखकर के चल रहा हो। इतना सेंसिटिविटी ठाकुर का था। इतना उन्होंने जगत के साथ में अपने को एकाकार कर लिया था। ब्रह्मन और ब्रह्म और शक्ति ईश्वर और जगत एक ही है। यदि ईश्वर के साथ में एकाकार हुए तो पूरे विश्व के साथ में एकाकार हो जाएंगे। तो ठाकुर का यदि इतना सेंसिटिविटी उस समय था तो सोच लीजिए कि यहां पर शशि महाराज इस तरह से प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि ठाकुर को इस गड्ढे में सुला करके उनके देह पर मिट्टी डाल रहे हैं। इसीलिए वह बेचारे रो उठे कहा कि ठाकुर के शरीर में लग रहा है घाव हो रहा है। शशि भाई कथा सुने शकोलेर चोखे जोक झोल ऐसे छिलो शशि भाई की बात सुनकर के सभी की आंखों में आंसू आ गए थे शशान होते फेरबार समय ओपेन बाबू के श्राप केटे छिलो शशान से फिरने के समय में उपेन ये बसुमती का उपेंद्रनाथ मुखोपाध्याय उसको सांप ने काटा था नित्य गोपाल बाबू से जाएगा लोहा पुिए झांका दिए छिलो नित्य गोपाल जिसको कि बार-बार यह समाधि होती थी जिसको ठाकुर ने कहा था साधु सावधान उसने क्या किया एक लोहे को गर्म करके उनको वो दाम दिया था डाम दिया था जिससे कि वह सांप का जहर पूरे शरीर में ना फले से घा तखनो सुकोई नहीं तो वो घा अभी तक सूखा नहीं था यह काकुड़गाची की बात है वह तो ठाकुर को जब काशीपुर शशान में जब दाह करके आ रहे थे उस समय सांप काटा था किंतु वह घा जो था वह डाम दिया था लोहे का वह अभी तक यह सूखा नहीं था तब उपेन बाबू काकुड़गाची ते कीर्तन करते-करते गए छिलेन उसके बावजूद उपेन बाबू कीर्तन करतेकरते काकुड़गाचीछी गए थे त साधु संगो कोते बोलो बसतेन उनको साधु संग करना बड़ा अच्छा लगता था एक्चुअली देखिए लाटू महाराज उपेन बाबू के बारे में ये जो स्पेशली एक जो हमको फैक्ट दे रहे हैं बता रहे हैं इसका एक रीजन क्या हो सकता है पता है कि यह जो उपेन बाबू ने बसुमती प्रेस जो प्रारंभ किया था तो लाटू महाराज बहुत बार उसी बसुमती प्रेस में ही रहते थे। शुरू-शुर में तो कहीं रहने की वगैरह इतनी अच्छी जगह नहीं थी। वराह नगर मठ वगैरह तो था आलम बाजार मठ। किंतु लाटू महाराज का तो पता है ना कि उनका पूरा एकदम वो त्यागी थे। उनके वो सरल सहज हृदय था उनका। वो तो एक जगह पे सिस्टम में रह के सबके साथ में वो मिलकर के वो रहना वो सब थोड़ा सा उनका एक डिफरेंट टाइप का माइंडसेट था। तो वो क्या करते थे? मठ में नहीं रह के उपेन बाबू का जो प्रेस था बसुमती प्रेस वहां पे रहा करते थे और फिर वह खाना खाने में क्या खा खाते थे तो वह पूरी बनाया हुआ है लुची या आलू का सब्जी इस तरह से कुछ खा लेते थे तो इसलिए उन्होंने और उपेन बाबू के साथ में उनका काफी अच्छा मित्रता भी था तो इसलिए शायद हो सकता है कि उन्होंने इस तरह से उनका स्पेशल एक उल्लेख किया हो जो भी है काली महाराज का डिस्क्रिप्शन ऑलमोस्ट सिमिलर है उसको को पढ़ने की जरूरत नहीं है। इसके बाद में फिर देखिए कि यह अस्थि की तो बात यहां पर समाप्त हुई। किंतु यह जो ठाकुर की महा
महासमाधि के कुछ ही दिनों के बाद ठाकुर एक रामाइत साधु को दक्षिणेश्वर में दर्शन देते है
समाधि के बाद में जो ठाकुर ने जो दर्शन दिए थे दो पहले तो मां शारदा देवी को और उसके बाद में स्वामी जी को तो यह सभी और फिर यह जो घटना हुई कि स्वामी जी ने कहा सबको कि चलो ठाक हम ही लोग तो ठाकुर की जीवंत समाधि है। हमारे ही देह में ठाकुर के अस्थियों को रखा जाए। तो फिर इन लोगों को ने थोड़ा सा अस्थि ग्रहण किए थे। तो इन लोगों के हृदय को सांत्वनाथ अवश्य मिली थी। किंतु यह जो पूरा चैप्टर है 15 दिन का कि महासमाधि से लेकर के वो काशीपुर बागान का जो लिस्ट खत्म हुआ तब तक का इसका कंक्लूजन फिर मां तो उसी समय फिर वो नॉर्थ इंडिया पिलगिमेज के लिए चली गई थी क्योंकि मां को तो फिर दक्षिणेश्वर में वापस जाना शायद संभव नहीं था तो मां को तो कामार पुकुर ही जाना पड़ेगा किंतु अभी तो इतना बड़ा शोक हुआ है और इस अवस्था में यदि कामार पुकुर जाएगी तो और भी अकेली यदि वहां पर रहेगी तो और भी बड़े बड़े शोक में पड़ जाएगी। तो इसलिए उन्होंने यह उत्तर भारत बलराम बाबू वगैरह ने ठीक किया कि मां को उत्तर भारत तीर्थ यात्रा ले जाया जाए और साथ में ये काली वगैरह जो त्यागी संतान थे वे लोग भी गए थे। योगेन महाराज वगैरह गए थे। तो मां तो वहां पर गई किंतु इस चैप्टर का जो अंत है एक बड़ी सुंदर घटना है एक छोटी सी उससे लाते हैं कि तृतीय दर्शन उसी समय के दौरान का एक त्रिशरा दर्शन ठाकुर ने दिया था और ऐसे किसी को दिया था कि जिसका वैसे हमारे संघ के साथ में ऐसा कोई यह नहीं है कनेक्शन उस समय यह घटना हमको रामलाल दादा ने बताई है। रामलाल दादा यानी कि ठाकुर के भतीजे और वहां पे काली मंदिर में पुजारी का काम करते थे। तो रामलाल दादा के बारे में हम लोगों का है थोड़ा सा कंप्लेन कि मां की संभाल लेने से उन्होंने ज्यादा मां की जो संभाल लेना उनके लिए जितना उचित था उतना उन्होंने नहीं लिया था। ठाकुर जब आखिरी समय में कैंसर से कैंसर से ग्रस्त थे। वहां पे काशीपुर में रह रहे थे। तो फिर ठाकुर ने कहा रामलाल दादा को कि देख तो खुड़ी कामार पुकुर थाक में तू एक टू जतन कोरबी तुम्हारी चाची जो है वो कामार पुकुर में रहेगी। तुम थोड़ा सा उनकी संभाल रखना। तो रामलाल दादा ने कह दिया कि उनकी जहां भी इच्छा है वो रहे। तो ठाकुर एकदम उनके मन का भाव समझ गए और उनको डांट करके कहा तुम पुरुष किस लिए हुए हो? स्त्रियों घर की स्त्रियों की संभाल रखना तुम्हारी जवाबदारी है। तुमने ऐसा कैसे कह दिया कि जहां पर रहना चाहे रहे। यानी कि अपना हाथ धो दे रहे हैं वो मां की जिम्मा लेने से। तो ठाकुर को यह समय पता चल गया था। मां ने भी बहुत बाद में कहा था कि अभी यह बहुत बाद की बात है। जब उद्बोधन भवन का निर्माण हो गया था। मां के बहुत सारे भक्त आ जुटे थे। उस समय की बात है। मातृ पर्व की बात है। मां ने उस समय कहा कि देखो अभी यह जो रामलाल दादा है, लक्ष्मी है यह लोग कंप्लेन करते हैं कि मैं उनकी संभाल नहीं रखती हूं। तो यह लोग कंप्लेन करेंगे क्योंकि मां के पास में दुनिया भर के भक्त आते थे। दुनिया भर का यह जो मिठाई है, फल है, प्रणामी है, साड़ी है वगैरह आता था। तो इन लोगों के मन में थोड़ा सा तो लोभ था रामलाल दादा लक्ष्मी दीदी के मन में। तो इन्होंने इस तरह की कंप्लेंट करनी शुरू कर दी थी कि मां अभी हमारी संभाल नहीं रह रही है। हमारी देखभाल नहीं कर रही है। तो मां ने उस समय कहा था कि अभी आकर के ये लोग इतनी कंप्लेंट करते हैं। किंतु उन दिनों की बात ठाकुर की महासमाधि के बाद ये लड़के लोग जब सड़क गांव-गांव शहर-शहर घूम रहे थे। खाने को कुछ नहीं था। उस दिन उस समय उन्होंने मेरी तनिक भी चिंता नहीं की। थोड़ी सी भी संभाल नहीं रखी। तो यह मां को खुद को इस तरह से कंप्लेंट करनी पड़ी थी। तो जो भी है राजा महाराज का रामलाल दादा से काफी अच्छा पट्टा था। दैट इज़ अनदर मैटर। तो यह रही वही रामलाल दादा है। तो रामलाल दादा कहते हैं कि उसी समय दक्षिणेश्वर में अयोध्या से एक रामायित साधु आया। उसको ठाकुर ने कहीं से वो दर्शन दिया होगा, सुना होगा कि कोलकाता में यह रामकृष्ण परमहंस नाम के एक बड़े साधु हैं। तो उनकी खोज करते-करते वो दक्षिणेश्वर में आकर के उपस्थित हुए। और जैसे ही पूछा कि वह कहां पे हैं? तो कालीवाड़ी के लोगों ने कह दिया कि वह तो उन्होंने यही कुछ दिन हुए हैं। शरीर त्याग कर दिया है। तो यह सब बात सुनकर के साधु ने कहा कि हम इतना तकलीफ करके अयोध्या से उनको ओखा वही वास्ते पैदल आते हैं और वो शरीर छोड़ दिया कि मैंने अयोध्या से पैदल आया हूं उनके दर्शन करने के लिए और उन्होंने शरीर छोड़ दिया है और यही कुछ दिनों हुए हैं। मेरे लिए उन्होंने अपेक्षा भी नहीं की। यह बोल कर के खूब रोने लगा। तो फिर उसको कहा गया कि वह जो कालीवाड़ी का सदावृत्त है वहां से वह भिक्षा ग्रहण करें। किंतु उस साधु ने क्या किया कुछ नहीं खा के दो-तीन दिन पंचवटी के नीचे में पड़ा रहा। उस समय क्या हुआ देखिए ए समोय एक दिन रात्रे तनी देखे नबोते पासे बकुलतार घाट दिया ठाकुर गंगा थे के उलंग अबोस्थाए उठ लेन उस समय एक दिन रात को उसने देखा कि नबत के पास में बकुलतला का जो घाट है वहां से गंगा में से ठाकुर निवस्त्र अवस्था में दिगंबर अवस्था में गंगा में से बाहर आए उठे बोलले बाहर आकर के उनको कहा तू एक दिन खास नी ए पायस एनएची खा तुमने ये जो कुछ दिन खाया नहीं है मैं तुम्हारे लिए पायस लाया हूं यह पायस खाओ यह बोलकर के उनको पायस खिलाया और फिर ठाकुर अदृश्य हो गए फिर ये ये कहते हैं साथ में रामलाल दादा कि पोर दिन शोकायामी पंचवटी ते ये देखी साधु टिर खूब आनंद दूसरे दिन सुबह को पंचवटी में जाकर के देखा साधु बड़ा आनंदित है जिज्ञेश कोरलम तुम एतो दिन विमोश छिले हटात तुम्हारे एतो आनंद देखची केनो पूछा कि तुम इतने दिन इतने दुखी थे ठाकुर का दर्शन नहीं हो पाया आज एका इतने आनंदित क्यों हो गए तब ठाकुर ने पूरी बात करके कहा और फिर वो जो ठाकुर जिस पात्र में जो मिट्टी का जो पात्र था उसमें वो जो पायस लाकर के खिलाया वह पात्र भी दिखाया। फिर रामलाल दादा कहते हैं कि उन्होंने यह पात्र बहुत समय तक यत्न करके संभाल पूर्वक रखा था अपने पास में। बाद में पता नहीं कैसे नष्ट हो गया। तो देखिए कि उसी कुछ दिनों में ठाकुर ने तीन दर्शन दे चुके हैं। और दर्शन किसको-किसको दिए हैं वह भी एक बड़ा देखने की बात है। सर्वप्रथम दर्शन दिया उनके जो सबसे तकरीबी करीबी है जो उनकी जो धर्म संगिनी है उनको मां शारदा देवी को। दूसरा दर्शन दिया उनके जो प्रधान शिष्य हैं स्वामी विवेकानंद को और तीसरा दर्शन दिया पूरे जगत को जैसे कि यह रामायणित साधु की तरह हम जितने भी भक्तगण हैं वो रोते-रोते इस संसार की ज्वाला से परेशान होकर के ठाकुर के पास आते हैं तो हम सबको जैसे कि साधु को रिप्रेजेंटेटिव बना करके ठाकुर ने हम सबको तीसरा दर्शन दिया और यह वही कुछ दिनों की बात है महासमाधि के कुछ दिनों की बात अच्छा यह चैप्टर अभी समाप्त होता है। इसके बाद में यह जो वराह नगर मठ की स्थापना हुई तो किस तरह से हुई इसकी जो पूरी स्टोरी है वो अभी कल से हम देखेंगे आज तक। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम
प्रश्न: सारदाकोष क्या है?
कृष्णपणमस्तु। यह है शारदा कोष। यह एक पूरा एप्लीकेशन है। तो एप्लीकेशन में आप पूरा स्वामी जी, ठाकुर, जनरल जो कुछ भी है सब देख सकते हैं। और फिर जैसे कि स्वामी जी का है तो स्वामी जी का लाइफ राइट? तो स्वामी जी का लाइफ पूरा यहां पे आ जाएगा। पूरा स्टेप बाय स्टेप जितना भी लिटरेचर जहां पे जो कुछ भी मिला है, सब कुछ मैंने यहां पे डाला है एस फार एस पॉसिबल। अभी जैसे कि हम मान लेते हैं कि पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन 10th एंड 11th सप्टेंबर तो उस पर क्लिक करने से ही उस दिन की जितनी भी घटनाएं हैं वह सब हमारी नजर के सामने आ जाएगी। उस दिन स्वामी जी ने जो लेक्चर दिया वो वो यदि यह स्वामी जी का लेक्चर है 11th सितेंंबर को तो उस पर क्लिक करेंगे तो पूरा लेक्चर आ जाएगा सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका और पूरा रेफरेंस भी है कंप्लीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद वॉल्यूम वन पेज नंबर थ्री तो इस तरह से ये यहां पे डाटा एंट्री आप कर सकते हैं। अभी तो ये है पूरा जितना भी मेरे पास में था सब कुछ इसमें डाला हुआ है। इसी में ये पूरा एप्लीकेशन ही है। एप्लीकेशन ही है। जैसे लंदन में गए तो क्लिक किया तो लंदन की सब इवेंट आ गई। राइट? फिर अभी लंदन में उन्होंने लेटर लिखा है। स्वामी जीसस लेटर टू हेल सिस्टर फ्रॉम रीडिंग। तो लेटर पे क्लिक किया तो लेटर आ गया। एवरीथिंग इज विद इन द एप्लीकेशन। उसको इंस्टॉल करने से ही सब एक साथ में मिल मैंने यहां पर फोटोग्राफ भी डाले हैं। रिलेवेंट फोटोग्राफ्स जो है उस समय के इट्स अ लाइफ टाइम प्रोजेक्ट मैं मेरा प्रॉब्लम क्या है ना कि आई एम ऑलवेज कि इसको और परफेक्ट करना है और परफेक्ट करना है और परफेक्ट करना है। मैं जब टीसी में था तो इसका एक वर्जन सुहितानंद जी को दिखाया था। वो हमारे इंचार्ज थे। मुझे बोला तुम मुझे पूरा सीडी में दे दो मैं भेज देता हूं प्रबुद्ध भारत को वे लोग पब्लिश कर देंगे। मैंने कहा महाराज अभी थोड़ा सा रुक जाइए मुझे सब कंफर्म करने दीजिए। वो टीसी मेरा था 2010-12 में वो कुछ दिन अभी तक पूरे नहीं हुए। आई एम ऑलवेज डाउटफुल कि ये जो सी एनीथिंग रामकृष्ण अभी जैसे देखिए इंस्टट्यूट ऑफ कल्चर से रिसेंटली स्वामी जी का क्रोनोलॉजी पब्लिश हुआ दो वॉल्यूम में तो उस समय मैं बेलूर मठ में था सुितानंद जी जनरल सेक्रेटरी थे। मुझे बोला तुमने जो किया है सब वहां पर भेज दो। वे लोग क्रोनोलॉजी में डाल देंगे। तो मैंने कहा ठीक है महाराज आप बोलते तो मैं भेज देता हूं। तो ये पूरा डेटाबेस मैंने प्रिंट लेकर के वो कल्चर में भेज दिया था। फिर वो सुपर्णानंद जी ने मुझे एक पूरा लेटर लिखा था कि वी आर वेरी थैंकफुल फॉर योर हेल्प ऐसा करके। किंतु मैंने जब वो क्रोनोलॉजी खोल के देखा उसमें मेरा नाम कहीं मेंशन नहीं किया है। तो जो भी ये है डेस्कटॉप ऐप है और इसको अभी ये प्रॉब्लम क्या है ना मैं विजुअल बेसिक में बनाया था आज से 20 साल पहले। सो पूरा एक एनवायरमेंट इसको खड़ा करना पड़ता है। मैं मैंने जब वहां से राजकोट से यहां पर आया ना लैपटॉप में उसको इंस्टॉल करना मुझे और फिर यह पुराना है ना पूरा सिस्टम तो मुझे वो सब उसका फ्रेमवर्क इंस्टॉल करना पड़ा था। तब कहीं जाकर के ये चल रहा है। उसमें भी सभी फीचर अभी काम नहीं कर रहा है। सो आई वांट टू मॉडर्नाइज़। वही थिंग है कि आई मीन टाइम मिलना इतना और सब करना मैंने कहा ना शारदा कोश इज़ समथिंग लाइक कि आई थिंक आई विल डाई विथ इट। इसके लिए मुझे वापस आना पड़ेगा। मैंने आपके वो पीडीएफ शेयर किया था ना उसमें पीडीएफ में क्या था कि जैसे आप लेटर पे क्लिक करेंगे तो लेटर नहीं खुलेगा किंतु वहां तक आ गया था। आप देखेंगे पूरा 200 पेज का है पीडीएफ। सिर्फ आउटलाइन ही 200 पेज का है। जस्ट इमेजिन। अगेन थिंग इज़ दैट कि माय एक्सपेक्टेशन इज़ सो हाई कि इसको मैं कभी कंप्लीट नहीं कर पा रहा हूं। मेरा मुझे क्या करना चाहिए? आइडियली स्पीकिंग कि मुझे एक एक इनिशियल वर्जन पब्लिश करनी चाहिए। मुझे यह सर्वप्रियंद जी ने कहा था टीसी में ही कहा था और टीसी में उनको पता था मैं ये सब कर रहा हूं। तो मुझे बोला कि तुम एक काम करो। अब जैसे उन्होंने मुझे क्या एग्जांपल दिया पता है? हर्षानंद जी का दिया। हर्षानंद जी का एनसाइक्लोपीडिया ऑन हिंदूइज़्म इज इन वर्क फॉर अ लॉन्ग टाइम। किंतु वो क्या करते थे कि एक-एक आर्टिकल बना करके वो छोटी-छोटी किताबों के रूप में पब्लिश कर देते थे। बाद में जितने भी आर्टिकल्स सब एज ए एंट्रीज वो उसमें हुआ पब्लिश तो मुझे बोला तुम इसमें से छोटा-छोटा करके तुम कुछ-कुछ पीरियड्स पब्लिश करना शुरू कर दो। बाद में तुम जब उसको कंप्लीट करना। सो इस तरह से काफी एडवाइस आई है मेरे पास। सम हाउ आई डोंट नो कि मतलब ठाकुर की इच्छा नहीं है कि क्या है कि इसको मैं फाइनल वर्जन अभी तक पब्लिश नहीं कर पाया। अगेन अभी ये फिर से मैंने स्टार्ट किया है। राजकोट में फिर क्या हुआ था? मैं इतना बिजी हो गया था। किंतु अभी मैंने ये सब फिर से स्टार्ट किया है और अभी मैंने एक्चुअली मैं आपके साथ में लिंक शेयर करूं क्या? मैंने एक ऑनलाइन वर्जन बनाया भी है क्योंकि अभी एआई अपने हाथ में आ गया है ना। तो देखिए इसका ऑनलाइन वर्जन अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने इसको बनाया कि किस तरह से इसको आप कर सकते हैं। यस इवेंट व्यूअर यह शारदा कोष का एक इवेंट व्यूअर है। उसमें आप डेट, पर्सन, लोकेशन वगैरह पे आप सर्च कर सकते हैं। सो ये मैंने जो कमेंट बॉक्स है ना ये ना मैं कमेंट बॉक्स में डाल रहा हूं। ये लिंक भी मैंने डाल दिया और आपको मैं स्क्रीन शेयर भी करके दिखा रहा हूं। ये रहा यस ये स्क्रीन शेयर देख रहे हैं ना? ये सब मैंने यहां पे डाला हुआ है। और फिर क्या है कि अभी जैसे कि ऑल डेट्स या फिर ऑल पर्संस एंड ऑल लोकेशनेशंस। सो फॉर एग्जांपल ऑल पर्संस में मैं यदि देखूं कि अभी फ्रांसिस लेगेट तो उसे क्लिक करने से ही फ्रांसिस लेगेट रिलेटेड सब इवेंट्स आ जाएगी और फिर मैं क्या करूंगा अभी जैसे मैंने इवेंट को ये किया फ़्टर साथ में ही लोकेशन फ़िल्टर हो गया अभी सब लोकेशन मुझे नहीं दिखाएगा कुछ ही डेट और कुछ ही लोकेशन दिखाएगा तो यहां पे जैसे कि यह एक डेट को मैं ठीक करता हूं तो फिर यह फ्रांसिस लेगेट पर्सन और डेट ये दोनों को मिलकर के जो है वह यहां पे आ जाएगा। तो ऐसा फिर क्लियर करूंगा फ़्टर तो यह फ़्टर क्लियर हो जाएंगे। यह मैंने एक ही बार बैठकर के बनाया है। तो दिस इज़ अ वे फर्दर अहेड ओपन फॉर अस कि आजकल एआई में इतना डेवलपमेंट हो रहा है कि इवेंचुअली आई एम गोइंग टू डू दिस। सो मैंने ये लिंक शेयर किया है। बट दिस इज़ ओनली एन एक्सपेरिमेंटल बेसिस। इसको फुल करना है मुझे। फुलफिल करना है अभी तक। देखिए मेरा जो विजन है ना कि शारदा कोष का जो एक्चुअल विज़ है कि एक इवेंट को मैंने यहां पर रिप्रेजेंट किया। फिर उस इवेंट में कौन से पर्सन एसोसिएटेड है? कौन से पीरियड में वो हुई है। इवेंट घटना घटी है। उसके बाद में कौन से लोकेशन पे हुई है और फिर कहां पे उसके कौन से आइडियाज उसके साथ में एसोसिएटेड है। फिर एक माइंड मैप बनाया जाए। तो आइडियाज सब माइंड मैप में बने हुए हैं। माइंड मैप तो आपको पता होगा बेस्ट वे टू रिप्रेजेंट आइडियाज विजुअल रिप्रेजेंटेशन। फिर जिस आईडिया पर क्लिक करेंगे उसके रिलेटेड इवेंट ओपन कर देगा। फिर ये आपने यह विजुअल टाइमलाइन देखा होगा। काफी सुंदर टाइमलाइंस बनती है। तो आप उसको एक्सपैंड कर सकते हैं, कॉन्ट्रैक्ट कर सकते हैं। तो टाइमलाइन पे कौन सी लोकेशन पे आपने क्लिक किया उस टाइम का इवेंट्स आपको दिखा देगा। फिर एक इंटरेक्टिव मैप होगा पूरे वर्ल्ड का। तो अभी जैसे कामरार पुकुर पे मैंने क्लिक किया तो कामरारपुकुर में कौन सी घटना वही दिखा देगा। अब जैसे मैंने जूनागढ़ पे क्लिक किया तो जूनागढ़ में कौन सी इवेंट है वह दिखा देगा। फिर एक पर्संस का एक पूरा एक चार्ट बनेगा विजुअल चार्ट। उसमें अभी जैसे कि अब फ्रांसिस लेगेट ये पर्सन पे मैंने क्लिक किया तो रिलेटेड टू हिम सब इवेंट्स आ जाएंगे। सो आइडियाज आर मेनी एंड वी कैन मेक इट मच मोर विजुअली इंटरेस्टिंग। बिकॉज़ क्या है कि मुझे लगता है कि वी शुड हैव बेस्ट फॉर ठाकुर मां स्वामी जी। दैट टेक्नोलॉजी कैन ऑफर। तो वी शुड हैव मैंने जिस तरह से इसको बनाया है आप यदि आउटलाइन की प्रिंट आउट ही लेंगे तो 200 पेज होगा और पूरी कंटेंट की लेंगे तो आई थिंक 5000 पेज से ज्यादा होती है क्योंकि 4 5000 पेज तो कंप्लीट वर्क के डाले हैं। उसके बाद में स्वामी जी का लाइफ डाला है। उसके बाद में न्यू डिस्कवरीज डाला है। न्यू डिस्कवरीज आई थिंक 5 6000 पेज है। छह वॉल्यूम हो के तो इतना आपका प्रिंट आउट हो जाएगा यदि आप फुल प्रिंट आउट लेंगे तो एक्चुअली ये जो है ना परफेक्शन इसमें परफेक्ट होना चाहिए एक भी गलती नहीं होनी चाहिए ये एक जो हमारा होता है। सो दैट इज व्हाई कि इतना बड़ा प्रोजेक्ट हाथ में लेने के बाद में एक्चुअली राजकोट में मैंने देखा ना एक भी किताब छोटी सी भी किताब पब्लिश करनी है ना चार पांच लोगों का टीम रहता था उसको बार-बार रिवाइज करने के लिए तो एक प्रूफ रीडर एक किताब को पूरा पढ़ेगा फिर दूसरा प्रूफ रीडर पढ़ेगा ये दोनों ने जितनी गलती निकाली है तीसरा पढ़ेगा तो फिर उतनी ही गलती निकलेगी तो ये मेरा बड़ा लंबा अनुभव है तो मुझे यह डाउट हमेशा रखता है कि मैं अकेला इसको देख रहा हूं तो एक्चुअली दिस इज अ टीम वर्क वर्क इस तरह के एक्सपर्ट लोग होने चाहिए जो कि इसमें मुझे हेल्प करें। दर्शन तो बहुत दर्शन का तो भरमाल लग गया
प्रश्न: क्या ठाकुर ने उन शुरुआती दिनों के बाद भक्तों को दर्शन दिए हैं?
है। खास करके मां के साथ में मां ने जो ठाकुर के दर्शन वो कितने हैं माने गिनतेगिनते थक जाएंगे। वही वो वृंदावन यही बस किसी कुछ ही दिनों के बाद ही जो मां वृंदावन निकली वो गाड़ी में बैठी थी ट्रेन में हाथ ऐसा था तो एकदम वो खिड़की में से ठाकुर ने ऐसा मुंह करके कहा कि देखो हाथ में तावीज पहनाए निकल ना जाए। तो मां ने इमीडिएटली वो तावीज निकाल करके वो रख दिया था। फिर म वो साथ-साथ में ही वो दर्शन की परंपरा चालू हो गई थी। और फिर म सिर्फ दर्शन नहीं मां के ऊपर में ठाकुर का भर भी हुआ था। वही वृंदावन में मां इस एक दिन इस तरह से बात कर रही है जैसे कि ठाकुर खुद बात कर रहे हैं। तो वो योगिन मां ने वो प्रश्न किया तो एग्जैक्टली उसी तरीके से उत्तर दिया जिस तरह से ठाकुर देते थे। वो पान भी उसी तरह से खाया जिस तरह से ठाकुर खाते थे। बहुत बाद की बात है। यदि आप वो जो उस का जयराम बाटी के क्वालपाड़ा के दिन देखेंगे क्वालपाड़ा में मां कहती है कि एक बार मुझे ठाकुर का दर्शन हुआ किंतु फिर मैं यह कहूंगी ठाकुर का दर्शन हुआ तो फिर लोग हल्लागुल्ला करना शुरू करेंगे। तो लोगों को ऐसा कहा कि मुझे चक्कर आया इसलिए मैं सो गई। किंतु फिर बहुत दिन के बाद में अपने महासमाधि के कुछ ही दिनों पहले मां ने कहा था कि उस दिन ठाकुर मैं कहां ख्वालपाड़ा में बैठी हुई थी। दोपहर का समय था धूप था एकदम ठाकुर आए बाहर से और आकर के मेरे सामने बैठ गए बोला मुझे गम खिचड़ी बना के खिलाओ तो ऐसा जैसे वो ठाकुर ने कहा मैंने अपना आंचल ठाकुर के वो बिछाया जिसके लिए ठाकुर विश्राम कर सके और उनको हवा देने लगी और उसी समय मां को जैसा वो मतलब वो भाव में आती है तो कैसा ये हो जाती है इस तरह से हो गया था तो दर्शन की परंपरा स्वामी जी के जीवन में भी से बहुत है यदि ठाकुर के दर्शन उसको लेकर के ही आप किताब लिखेंगे तो कितना सब कुछ हो जाएगा। आइडियली स्पीकिंग शारदा कोष में ऐसा होना चाहिए कि वन कांसेप्ट इज दर्शन। तो उसके ऊपर में क्लिक करेंगे तो ठाकुर ने जितने भी दर्शन दिए सब एक साथ में आ जाएंगे। दो बात है। पहली बात तो है कि हम
प्रश्न: क्या आजकल भक्तों को ठाकुर के दर्शन मिलते हैं?
एनकरेज नहीं करते हैं दर्शन के बारे में बात करने को। तो अभी आजकल का हमारा मेंटालिटी ऐसा हो गया है कि जिनको दर्शन हुआ है कभी बोलेंगे नहीं। और जो बोल रहा है उसके ऊपर में शक होगा कि यह बोल रहा है उसका अर्थ है कि वह अपना बड़प्पन दिखा रहा है। इस तरह के दर्शनों के बारे में बहुत कुछ है। आप जितने साधुओं को पूछेंगे सभी साधुओं का कहीं ना कहीं किसी परिचय में है। किंतु जैसे मैंने कहा दर्शन के बारे में रामकृष्ण संघ का जो पॉलिसी है वह बड़ा क्लियर है। जिसको दर्शन होता है वह बोलता नहीं है और जो बोलता है उसके ऊपर में डाउट किया जाता है कि क्या उसको सही में दर्शन हुआ है ना कि अपनी बढ़ाई कर रहा है। सो दिस इज अ वेरी क्लियर पॉलिसी ऑन द देखिए जेन्युइन दर्शन होते हैं उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। दर्शन नहीं होते तो ठाकुर अवतार किस काम के हैं? राइट? किंतु अपना पॉलिसी यह है कि जैसे स्वामी जी ने उसी समय जो कह दिया था यह दर्शन है या अस्थि है या इवन रिलेटिव्स है। देखिए बाकी सब संघ में तो यह रिलेटिव्स को लेकर के कितना सब कुछ होता है। ये गुजरात का स्वामी नारायण संप्रदाय है तो उसमें तो ऐसा था बहुत लंबे समय तक कि उसके जो स्थापक थे नीलकंठ उनके परिवारजन जो थे वही लोग संघ के गुरु पद पर बैठते थे। अभी सोचिए कि संघ बना है सन्यासियों का किंतु उनके शीर्ष स्थान पे है एक गृहस्थ तो फिर तो आपको पता ही है क्या-क्या सब होने वाला है। अपने संघ में भी देखिए कि ये ठाकुर के रिलेटिव्स का कोई मतलब सम्मान है किंतु उनके सर पर बिठा के हम ये सब नहीं करते। ये कितनी बड़ी बात है। तो ये सब चीजें एकदम स्पष्ट है कि आदर्श को ले चलना है। नहीं कि यह सब बाकी सब अनरिलेटेड चीजों को
प्रश्न: अंततः हमें सभी अस्थियां प्राप्त हो गईं, क्योंकि कंकुरगाछी भी अब हमारे मिशन में है। उस उम्र में भी स्वामीजी कितने बुद्धिमान थे। बेहतर है कि हम ठाकुर की शिक्षाओं के अनुसार अपने जीवन को ढालें, बजाय उनके अस्थियों के बारे में झगड़ने के।
लेकर के देखिए अस्थि के बारे में एक बात कहूं कि ठाकुर की अस्थियों को इस तरह से जो डिवीजन किया गया तो आपने जैसे कहाकुड़गाची तो ऑलरेडी अपने हाथ में आ गया। साथ-साथ में ही जो अस्थि गुरु भाइयों ने ग्रहण की थी। तो सभी गुरु भाई का देह जो ये है वो जो चीता वहीं पे तो जलाई गई उनका देहत्याग भी तो बेलूर मठ में हुआ। उनकी समाधि भी बेलूर मठ में है। आई थिंक जिन गुरु भाई की समाधि बेलूर मठ में नहीं है वो त्रिगुणातिनंद जी कि वहां पर वो बम ब्लास्ट में गए। शशि महाराज भी इवन भले ही चाहे वहां पे साउथ इंडिया में थे वो आकर के देहत्याग तो उद्बोधन में ही किया था। और तो माने और ये तो मतलब काकुड़गाच भी आ गया। गुरु भाइयों के देह में जो अस्थि थी वह भी वही बेलून मट की मिट्टी में मिली है। और फिर साथ में देखिए मां के बारे में महापुरुष महाराज ने कहा था कि देखिए कि सती के देह का एक-एक अंग जहां पे गिरा वो 52 वो शक्तिपीठ हो गया। यहां पर देखिए कि सती का पूरा देह एक ही जगह पर बेलूर मठ में दाह किया गया है। अभी देखो कि बेलूर मठ कितना बड़ा शक्ति पीठ है। तो वो एक बात है। सेकंड थिंग इसके आपने नरेंद्र का जो कहा कि व्यू पॉइंट सिर्फ यह नहीं है कि लार्ज हार्टेडनेस थी कि आइडियल्स की ओर देखना है। वो कॉन्टेक्स्ट की ओर नहीं देखना है। कॉन्टक्स्ट ये जो वर्ल्डलीनेस की ओर नहीं देखना है। साथ में एक हिस्टोरिकल उनका आउटलुक था कि भविष्य में लोग क्या कहेंगे कि भविष्य में लोग यह कहेंगे कि रामकृष्ण के चेलों ने अस्थियों को लेकर के ममारी की है। वही वो फेमस घटना लाटू महाराज को भी जो कहना पड़ा था वो शशि महाराज और नरेंद्र का जो झगड़ा हो रहा था कि वो मंदिर है वो शराइन है। उसको रखे कि ना रखे वो नरेंद्र खड़ा होकर के मंदिर की ओर जा रहा है। कहता है ऐसे ठाकुर को फेंक दूंगा। फिर शशि महाराज झगड़ा करते हैं। उस समय लाटू महाराज कहते हैं कि ठाकुर सिर्फ अस्थियों को रख के गए। उसी में तुम इतना झगड़ा कर रहे हो। पैसा रख के जाते तो क्या करते? तो स्वामी जी का दिस इज अ क्लियर हिस्टोरिक अंडरस्टैंडिंग आल्सो कि भविष्य में क्या होगा यह भी अभी से सोच लीजिए कि हमको तो आदर्श स्थापित करके जाना है। आई
प्रश्न: तो ठाकुर की अस्थियों पर स्वामीजी की अंतिम राय क्या है?
डोंट थिंक एबल टू ना देखिए फाइनल पोजीशन के बारे में एक बड़ा इंटरेस्टिंग चीज बताऊं। एक समय में स्वामी जी ने कहा है कि ठाकुर के देह का जो हमने दहन किया ना वह बहुत गलत काम किया कि यह जो स्वामी जी का स्टेटमेंट है ना मैं अभी तक नहीं समझ पाया। मेरा जो इनिशियल एनालिसिस ऐसा था कि स्वामी जी शायद इस तरह से चाहते थे कि ठाकुर के शरीर को प्रिजर्व करके रखा जाए भविष्य के लिए। जैसे कि वो अगेन दिस इज़ नॉट अ कंपैरिजन वी शुड मेक। फिर भी मैं बन कर रहा हूं कंपैरिजन कि रशिया में जब लेनिन का डेथ हुआ तो स्टेलिन ने सोचा यदि इसको जला देंगे या दफन कर देंगे तो क्या होगा कि इसकी एक ऑथॉरिटी चली जाएगी स्टेट की तो स्टेट की ऑथॉरिटी बनाए रखने के लिए उसको एक करके वो रखा जाए उनके बॉडी को तो अभी भी वह रशिया का वो जो रेड चौक है रेड स्क्वायर वहां पे वो करके लेनिन का और अभी स्टेलिन का भी बॉडी रखा रखा गया है। सो इट्स अ सॉर्ट ऑफ़ अ लिविंग रिमाइंडर। तो हो सकता है कि सम हाउ स्वामी जी का इस तरह का कुछ आईडिया होगा कि ठाकुर के शरीर को करके भविष्य के लिए प्रिजर्व किया जाए। बट अगेन यह मेरा स्पेकुलेशन है। स्वामी जी ने इस तरह से और कहीं पे नहीं इस बात को रिपीट किया ना ही जब यह बात कही तो उन्होंने इसके बारे में कोई रीजन दिया। सो फॉर अस राइट नाउ नथिंग बट स्पेककुलेशन।