मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद ने भारत में जो प्रवचन दिए उसका सारांश इस पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन में है। यहां से पहले का हमने ऑलरेडी देख ही लिया है कि किस तरह से स्वामी जी एक के बाद एक पॉइंट लेकर के
स्वामी विवेकानंद की हुंकार: आओ, मिलकर रचें नया भारत
अवेकनिंग द जॉइंट स्वामी विवेकानंदास कॉल टू अ न्यू इंडिया। यह था फर्स्ट स्लाइड। यह हमने देख लिया और फिर यह भी देखा सेकंड स्लाइड में कि किस तरह से स्वामी जी भारत में आए और जहांजहां पर प्रवचन देने को गए उनको वेलकम दिया गया था। तो किस तरह का वेलकम तो वी डीम इट ए प्रिविलेज टू बी द फर्स्ट टू वेलकम यू ऑन योर रिटर्न होम यह जो वगैरह-वगैरह [गला साफ़ करने की आवाज़] और यह जो स्वामी जी को इतना जो ग्रांड रिसेप्शन मिला इसके रिप्लाई में स्वामी जी कहते हैं कि द रिसेप्शन वाज़ नॉट फॉर ए पॉलिटिशियन सोल्जर और मिलियनर बट फॉर ए बैगिंग सन्यासीन प्रूविंग दैट रिलीजन इज द बैकबोन ऑफ द नेशनल लाइफ इन इंडिया। दूसरे देशों में धनपतियों को, राजाओं को, सेनापतियों को हाईएस्ट सम्मान मिलता है। भारत में सन्यासी को मिलता है। फिर स्वामी जी क्या कहते हैं? थर्ड स्लाइड में इंडिया इज द पुण्य भूमि, द लैंड ऑफ स्पिरिचुअलिटी। यह जो मोस्ट फंडामेंटल कांसेप्ट स्वामी जी के टीचिंग्स का है कि बाकी सब देशों में आप देखिए पॉलिटिक्स है, इकोनॉमिक्स है, सोशल वेलफेयर है ना कि कॉनक्वेस्ट है, ना कि लस्ट एंड ग्रीड फॉर दिस मनी एंड वेल्थ है। भारत की जो की नोट है, भारत का जो मूल सिद्धांत है, वह है आध्यात्मिकता। और फिर देखा कि एवरी रेस हैज अ मिशन इंडियास इज द लाइट स्पिरिचुअल जो खाते हैं उसी चीज का ओकार आता है। ठाकुर जैसे कहते हैं तो वैसे ही जो नेशनल लाइफ है जिस फाउंडेशन पर बनी है उसी फाउंडेशन को हमको फिर फर्दर एक्सपान करना है। यह जो भारत की अधोगति जो हुई पिछले कुछ000 साल 1000 साल में उसके पीछे का रीजन एक यही था कि हमने अपना यह मिशन खो बैठे। कहां आध्यात्मिकता और स्पिरिचुअलिटी को स्प्रेड करते थे। एक समय भारत के जो ट्रेडर्स है, भारत के जो मिशनरीज है, वह सिल्क रूट के माध्यम से यहां यह चाइना, यह सेंट्रल एशिया, यह मिडिल ईस्ट, वेस्ट एशिया, यूरोप तक फैले थे। और यह जो स्पाइस रूट है समुंदर के माध्यम से तो यह जितने भी स्पाइस आइलैंड है साउथ ईस्ट एशिया है वहां से लेकर के यह स्वेस कैनाल से यह इजिप्ट मेडिटेरेनियन वगैरह तक गए थे तो कैसा भारत का एक लाइवली एक इंटरेक्शन था पूरे जगत के साथ में तो वह इंटरेक्शन तोड़ के हम लोगों ने अपने दरवाजे बंद कर दिए हमारे पास में जो ट्रेजर है जो कि हमारे पुरखों ने हमको दिया है। उसका उपभोग हम अकेले करेंगे। किसी को बांटेंगे नहीं। अभी धन है। धन आप ना बांटे अकेले उपभोग कर सकते हैं। किंतु आध्यात्मिकता एक ऐसी चीज है जिसको बांटने से बढ़ता है। वो जो जो मटेरियल वेल्थ है वो संग्रह करने से बढ़ता है और यह स्पिरिचुअल वेल्थ है। बांटने से बढ़ता है। हालांकि मटेरियल वेल्थ भी आजकल देखिए संग्रह करने की बजाय लोग शेयर मार्केट में इन्वेस्ट करते हैं। बट एनीवे फंडामेंटल कांसेप्ट यह है कि मटेरियल वेल्थ में आप इन्वेस्ट करो ना कि कुछ भी करो एट द एंड ऑफ द डे आपका वही एक टारगेट रहता है कि उसमें मुझे रिटर्न क्या मिल रहा है? आरओआई कहते हैं ना रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट। वो आरओआई क्या है इसमें? तो स्पिरिचुअलिटी में है देयर इज़ नो आरओआई। नो रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट और नो रिटर्न ऑन प्रोपगेशन। प्रोपेगेशन हो रहा है दूसरे लोगों को ठाकुर मास्वामी जी या तो वेदांत या तो यह भारत के आध्यात्मिक सनातन सत्य यह जो स्प्रेड हो रहे हैं हिंदू धर्म का यह जो विजय पताका विश्व में फैल रहा है यही मेरे लिए सबसे बड़े संतोष की बात है। तो वह हो गया आध्यात्मिक पॉइंट ऑफ व्यू। तो यहां पर भी स्वामी जी कहते हैं कि भारत का मिशन है आध्यात्मिकता का प्रचार और प्रसार। इसके बाद में स्वामी जी क्या कहते हैं? माने यह सब नोटबुक एलएम वो जो एआई है उसमें पूरा मैंने स्वामी जी का कोलंबो टू कोलंबो टू अल्मोड़ा पूरा लेक्चर उसमें बिठा दिया था। जितने भी लेक्चर है भारत में दिए हुए उसमें से उसने यह सिलेलेक्ट करके पॉइंट सेलेक्ट करके स्लाइड बनाया है। तो यह एआई क्या कहता है? द फाउंडेशन ऑफ आवर रिलीजन इज वेदांत। द नॉलेज पोर्शन ऑफ द वेदास। तो बेसिकली जो एक फंडामेंटल क्फ्लिक्ट उस समय के भारत में चल रहा था। यह अंधश्रद्धा है और यह पूरा हिंदू धर्म अंधश्रद्धा से भरा है। यदि हमको प्रगति करनी है देश के रूप में तो यह सभी अंधश्रद्धाओं को विसर्जन देकर के बलि प्रदत्त करके हमको यह वेस्टर्न थिंकिंग है, वेस्टर्न वे ऑफ लाइफ है, उसको होलसेल इंपोर्ट करना होगा। यह थिंकिंग अपने यह इंटेलेक्चुअल सर्कल में चल रहा था। आज भी चल रहा है। किंतु किंतु एटलीस्ट आज एक बहुत बड़ा एक वर्ग है हमारे समाज का कि जिसको पता है कि यह हिंदू सभ्यता, हिंदू संस्कृति, हिंदू शास्त्र, हिंदू पुराण, हिंदू साधु संत इनका क्या महात्म है। उस समय ऐसा था कि हिंदू धर्म का गुणगान गाने वाले जितने भी थे ज्यादातर लोग या तो एक ऑर्थोडॉक्स टाइप के नैरो माइंडेड शॉर्ट टेंपर्ड लोग थे जो कि किसी भी तरह का डिसेंट या तो किसी भी तरह का नया थिंकिंग सहन नहीं कर पाते थे। स्वामी जी खुद कहते हैं कि मैं साउथ इंडिया में गया था। विदेश में जाने के बारे में विदेश में जाकर के वेदांत का प्रचार करने के जो बेनिफिट्स है किसी पंडित के साथ चर्चा कर रहे थे। और यह पंडित जोर-जोर से चिल्ला चिल्ला के कहता था कदा पीना कदा पीना अब व्हाटएवर द टॉपिक एग्जैक्ट टॉपिक भूल गया क्या था स्वामी जी का किंतु स्वामी जी कहते हैं कि यह जो उसका जो चिल्ला चिल्ला करके वो बोलना कदापीना कदापीना मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा क्योंकि एक ऑर्थोडॉक्स माइंडसेट था कि एक तरह का रिजिड स्ट्रेटिफिकेशन सोसाइटी में कर देना है और इससे आगे कुछ भी सोचना नहीं है। कितना बड़ा ट्रेजडी कि निवेदिता जैसी निवेदिता स्वामी जी के पद कमल पे वह अनुसरण करती करती भारत आई भारतीय स्त्रियों और लड़कियों के लिए एजुकेशन का व्यवस्था करने के लिए स्कूल चलाने के लिए और उस समय के कोलकाता के जो तथाकथित भद्र लोग जो थे माने हाई कास्ट सवर्ण डिवोटी ठाकुर के वो निवेदिता को अपने घर में प्रवेश नहीं करने देते थे। यदि प्रवेश करेंगे तो फिर जैसे ही वहां पर वहां से निकलेगी निवेदिता तो वैसे ही वहां पर गंगाजल छिटकते थे मां ने कहा है देखे वो अनदेखा करे तो निवेदिता देख के भी अनदेखा कर देती क्योंकि भरत के प्रति उसकी इतनी सहानुभूति थी मां के खुद के घर में मां के उसकी इच्छा थी मां के साथ में रहे किंतु कुछ कुछ ही समय के बाद में उसको पता चल गया कि मां की जो संगिनियां है उनको पसंद नहीं कि एक म्लेच्छ ब्राह्मण के घर में रहे। तो ये सब एक क्या कहेंगे कि इतना एक टॉक्सिक एंड पोइजनस अपना सोशल सिस्टम हो गया था। देखिए कि बाद में आजकल एक ट्रेंड क्या चला है कि ये जो जितने भी ये इंस्टीटशंस है अमेरिका के उन लोगों को पता है कि इंडियन लोगों का यहां पे आने का कितना अट्रैक्शन है तो वे लोग क्या करेंगे कि इंटेंशनली ऐसे लोगों को लेंगे जो कि यह सोशल माइनॉरिटी में हो कास्ट लोअर कास्ट के हो इस तरह से जो हिंदू समाज से जो प्रताड़ित है इस तरह के लोगों को वहां के यह जो कॉलेज वगैरह में आईवी लीग इंस्टीट्यूशन में एडमिशन देंगे। फिर उनको तैयार करेंगे यह कहने के लिए कि ब्राह्मिनिज्म जो है इंडिया का पेट्रिय्की एंड ब्राह्मिनिज्म उसने इंडिया को खत्म करके रखा है। इसको तोड़ दो। ऐसा करके वे लोग वहां से प्रोपगेशन चालू करेंगे। और यहां पर भी एक है वर्ग जो कि एक मूर्ख वर्ग जो कि बिना सोचे समझे इस तरह के प्रोपेगेंडा में फंस जाएगा। अभी इसमें दोष किसको देना है? दोष तो हम ही को देना है। विदेशियों तो ईस्ट इंडिया कंपनी जब से आई है तभी से हमको पता है कि उनका एक ही मकसद है भारत को लूटने का। हम ही लोग तो मूर्ख की तरह यह सोचते हैं कि नहीं नहीं यह लोग गोरे लोग विष्णु के अवतार हैं। उनकी पूजा करनी चाहिए। वे तो हमारे ही माइंड में बैठा हुआ है। उन लोगों का तो एकदम स्पष्ट है। जो भी उनके सामने आए सबका शोषण करना है। तो फिर उनकी निंदा करने की वजह उनको क्रिटिसाइज करने की वजह भारत में हमने जिनको प्रताड़ित किया है जिनको पददलित किया है उनको इक्वल सम्मान देना चाहिए। तो वह जो पूरा एक थिंकिंग चल रहा था तो विदिन दैट परिप विदिन दैट कॉन्टेक्स्ट उस परिप्रेक्ष में किस तरह से हिंदू धर्म का पुनर्जागरण किया जाए तो स्वामी जी कहते हैं कि देखिए यह जो वेद है या तो यह जो हमारी जो स्पिरिचुअल फंडामेंटल टेक्स्ट है वह दो भागों में बंटी हुई है। कर्मकांड ज्ञानकांड। कर्मकांड में यह रिचुअलिस्टिक पोर्शन यह किस तरह से यह होम किया जाए। किस तरह से किस देवता को क्या ऑफरिंग किया जाए वगैरह वगैरह कर्मकांड में है। किंतु यह जो ज्ञान कांड जो है जहां पर आत्मन या तो ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने के बारे में बताया गया है। आत्मन के गौरव का महिमा गान किया गया है। ब्रह्म क्या है? और ब्रह्म ज्ञान जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। यह जो हमको दर्शित किया गया है, वही ज्ञान कांड ही असली हिंदूइज़्म है। तो यह एक फिर यह श्रुति और स्मृति का जो डेफिनेशन या तो डिवीजन स्वामी जी देते हैं कि स्मृति जो है हर एक युग में लिखी जाती है युग की आवश्यकता के अनुसार। जबकि श्रुति जो है हमेशा के लिए वह सच है। और श्रुति अर्थात कि यह उपनिषद पोर्शन जो है वह क्या है ब्रह्म ज्ञान के बारे में ही बात करता है। जो महावाक्य जो है उपनिषद का अहम ब्रह्मास्म या तो प्रज्ञानम ब्रह्म सर्वम खलविदम ब्रह्म यह जो सब जो उपनिषद के जो सनातन वाक्य जो है वही है यह श्रुति का सार इसके बाद में स्वामी जी कहते हैं एकम सद विप्रा बहुदा वदंती सत्य एक ही है। ऋषि मुनि अनेक नाम से पुकारते हैं। ब्रह्मण ही है। और इसके बाद में जितने भी देवी देवताएं कहे वो ना कि भगवान विष्णु ना कि भगवान शिव ना कि मां सरस्वती ना कि जितने भी आप कहे हिंदू धर्म हिंदू धर्म के बाहर के वो एक ही सुप्रीम रियलिटी ना कि एक ही एक स्पिरिचुअल सत्ता के विभिन्न विभिन्न मैनिफेस्टेशन है। तो यह एक देखा और फिर इसके बाद में स्वामी जी कहते हैं कि आत्मन के बारे में क्या व्हाट इज द नेचर ऑफ आत्मन? तो इटरनल एंड इमोर्टल यूनिवर्सल इनहरेंटली परफेक्ट एंड गोल ऑफ आत्मज्ञान इज टू अटेन द फ्रीडम। तो यहां तक हमने ऑलरेडी देख लिया है। इसके बाद में जो है यह नया स्लाइड स्वामी जी क्या कहते
विस्तार से संकीर्णता तक : जब हिंदू धर्म की व्यापक दृष्टि सिमटकर बन जाए छोटी सोच
हैं? द ग्रेट डेंजर आवर रिलीजन इज गेटिंग इनू द किचन। यह जो सबसे बड़ा खतरा है हिंदू धर्म के बारे में हिंदू धर्म के सामने हमारा जो धर्म है वो रसोई घर में घुस जा रहा है। अभी यह रसोई घर में धर्म के चले जाने का क्या अर्थ है? वी आर नाइदर वेदांतिश नर पौराणिक नर तांत्रिक। हम लोग ना ही वेदांती है ना ही तो हम पौराणिक है ना ही तांत्रिक है। वी आर जस्ट डोंट टचिस्ट। हम लोग है सिर्फ मुझे स्पर्श मत करो। बस यही हमारा धर्म हो गया है। आवर रिलीजन इज इन द किचन। हमारा धर्म है किचन के भीतर में। रसोई घर के भीतर में। आवर गॉड इज द कुकिंग पॉट एंड आवर रिलीजन इज डोंट टच मी। आई एम होली। हमारे देवता है यह बर्तन यह जो कुकर खाना बनाने के बर्तन और हमारा धर्म है मुझे स्पर्श मत करो। मैं होली हूं। मैं पवित्र हूं। देखिए यह जो स्वामी जी कह रहे हैं इसका क्या अर्थ है? बड़ा स्पष्ट है कि यदि सबके भीतर में वही आत्मज्ञान या तो फिर वही आत्मन वही ब्राह्मण वही ईश्वर विराजमान है तो आप लोगों में यह जो कास्ट को लेकर के इतना जो फनेटिसिज्म फैला हुआ है उसका क्या अर्थ है यह इसके साथ में शादी नहीं कर सकता यह इसके साथ में व्यवहार नहीं कर सकता यह इसके घर जाकर के नहीं खा सकता कथामृत में है वह जो ठाकुर के ही एक डिवोटी सुवर्ण मणिक ने कि ऐसे थे नाम भूल गया उनका तो उनके घर ठाकुर गए हैं तो खाने के लिए आह्वान दिया गया सबको तो एक ब्राह्मण था वहां पे तो वो वहां पर भीतर में नहीं जा रहा है तो ठाकुर ने देखा कि हां अरे वो नीच जाति का है तथाकथित उससे तो नीच है ब्राह्मण से नॉन ब्राह्मण है बोल करके वह भीतर नहीं जा रहा तो फिर ठाकुर ने कहा कि अरे इसमें क्या है तो देखिए कि मां के जीवन में भी काफी घटनाएं हैं। वह एक लेबरर मोस्ट प्रोबेबबली शायद अमजद ही मां के घर आया था। वहां पर वरांडा में बैठकर के खाना खा रहा था और नलिनी वहां पे दूर से वह रोटी फेंक फेंक करके उसको थाली में फेंक करके सर्व कर रही है। सामने जाकर सर्व नहीं करेगी क्योंकि वह तो नीची जाति का है। अब ब्राह्मी है। तो मां ने देखकर के मां मां ने जैसे ही देखा मां को गुस्सा आ गया कि अरे कि क्या करती हो? ऐसे क्या किसी को खाना परोसा जाता है? लाओ ऐसा करके उसके हाथ में से वह पात्र लेकर के मां ने पास में जाकर के अच्छे से उसको सर्व किया। तो क्या है कि यह जो फनेटिसिज्म था उस समय का वो इतना स्ट्रांग था कि और अभी भी देखिए अभी अभी क्या है पता है यह जो जातिवाद थोड़ा सा उसका स्वरूप बदल गया है। आज सोशल सेटिंग में आपको कास्ट को इतना शायद प्राधान्य नहीं दिखेगा। अब यदि आप कोई कंपनी में यहां पर जैसे कि आईपीसीएल है इंद्र इंडियन पेट्रोलियम केमिक कॉरपोरेशन लिमिटेड तो क्या है कि बहुत सारे डिवोटी इस तरह से इस तरह की कंपनी में ऑल इंडिया लेवल की कंपनी में काम करते हैं तो कभी-कभी यहां पे आते हैं तो उनको देख के आपको ऐसा नहीं लगेगा कि यह कौन सी कास्ट का है। वे लोग भी आपस में ये नहीं डिस्कस करेंगे कौन-कौन सी कास्ट का है वगैरह-वगैरह यहां पे नेवल हेड क्वार्टर भी है ईस्टर्न नेवी का तो क्या है ये सब एलिट इंस्टीटशंस है इस तरह के इंस्टीट्यूशन में कौन-कौन सी कास्ट का है इस तरह का कोई देखता नहीं और देखना उचित भी नहीं है तो हमको लगता है कि ओके चलो हम एक लेवल पर पहुंच गए हैं सोसाइटी में किंतु यह जो कास्टिज्म जो है अभी सोसाइटी में से यदि थोड़ा बहुत दूर हुआ है तो यह पॉलिटिक्स में प्रवेश कर गया है। यह जो वोट बैंक जो है यह यह कास्ट इसको वोट देगी। यह कास्ट इसको वोट देंगे। यह पूरा जो इतना भयानक एक मामला खड़ा हुआ है आजकल कास्ट को लेकर के कि कहां वो कंप्लीटली इरेज हो जाना चाहिए भारतीय समाज में से वो नहीं हो के उसने एक पॉलिटिकल स्वरूप धारण कर लिया है। वि इज वेरी डेंजरस। यह खतरा जो उस समय जितना था कास्ट को लेकर के उतना ही आज भी है। बीच में मैंने एक समय सोचना शुरू कर दिया था कि चलो यह कास्ट वगैरह जो है भारतीय समाज से निकल गया है। यह एक जो बहुत बड़ा दूषण था उससे हम लोग बच गए हैं। किंतु देखिए कि जैसे-जैसे थोड़ा पॉलिटिक्स समझता गया तब मुझे पता चला कि एक रूप से यदि निकला है तो दूसरे रूप से प्रवेश कर गया है। तो यह स्वामी जी कहते हैं ना कि इन एनी सोसाइटी द 50% इज गुड 50% इज इवल आप ऐसा कभी नहीं होगा कि जो 100% गुड हो जाए सब कुछ अच्छा हो जाए और जो दूषण है समाज का सोसाइटी का 100% दूर हो जाए। ऐसा कभी होने ही नहीं वाला है। रूमेटिज्म की तरह है। पैर में घुटन में दर्द हो रहा है तो वहां से निकलेगा तो गर्दन में जाएगा। गर्दन से निकलेगा तो कोहनी में जाएगा। तो ऐसा करके रूमेटिज्म रहेगा ही रहेगा। बस वह अपना स्थान परिवर्तन करता रहेगा। तो यहां पे कास्ट का यह जो एक कर्स कहो ना कि यह श्राप कहो जो भी है भारत के सीने पे ललाट पे जो लगा हुआ है तो वो वहां पे उस समय सोशल लेवल पे था। किसके साथ शादी करनी है, किसके साथ में खाना खाना है, कौन से किस तरह का तिलक लगाना है, कौन से हाथ से पानी पीना है, लेफ्ट हैंड से ना राइट हैंड से ना। ये जो सब किचन लेवल पे था। किचन लेवल का अर्थ है यह सोशल लेवल पे था। कम्युनिटी लेवल पे था। वह भी सिविलाइजेशनल लेवल पे पॉलिटिकल लेवल पे आ गया है। व्हिच इज एक्सट्रीमली डेंजरस। तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह स्वामी जी ठीक ही कहते हैं। जो एक दूषण है। दूषण को एक जगह से निकालेंगे तो दूसरी जगह जाएगा। दूसरी जगह से निकालेंगे तो तीसरी जगह जाएगा।
विश्व समस्याओं का समाधान: अंतरिक्ष में बसें मानव सभ्यताएँ
इंटरेस्टिंगली यहां पे देखिए ये जो सब हमारे भारतीय समाज के ही सिर्फ नहीं विश्व के भी जो ये सब समस्याएं हैं भारत में जो समस्याएं हैं वह हमको बड़ी लगती है क्योंकि हम भारत में रहते हैं किंतु आप वर्ल्ड लेवल पर जो समस्याएं देखेंगे ना तो उसके सामने हमारी समस्याएं कुछ नहीं है। देखिए थोड़ा सा अफ्रीका का स्टडी करके देखिए। यह जो यूरोप में जो फर्स्ट वर्ल्ड वॉर सेकंड वर्ल्ड वॉर हुआ था उसको स्टडी करके देखिए। यह रशिया में कम्युनिस्ट रेिवोल्यूशन जब आया था उस समय जो खुनामर की हुई थी यह अफगानिस्तान या तो यह यूक्रेन ना कि यह बाकी सब मिडिल ईस्ट क्या हो रहा है? हम तो देख ही रहे हैं। चाइना में यह कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन आया था और यह जो माओजे दोंग उसने ये जो सब पगलापन प्रारंभ किया था। करोड़ों-करोड़ों लोग मर गए थे। सो क्या है कि विश्व की दृष्टि से देखेंगे तो हम अपना थोड़ा सा व्यू पॉइंट विस्तृत करें। सिर्फ भारत की ही समस्या नहीं पूरे विश्व की समस्या को यदि देखें तो मैं एक बार बहुत पहले एक मैं जब स्कूल में था तो जैसा होता है ना सबका अपना-अपना एक एंबिशन होता है कि क्या करना है भविष्य में बड़े होके तो मेरा एक एंबिशन वैसे सेवरल एंबिशंस थी एक थी कि मुझे आइंस्टाइन की तरह एक साइंटिस्ट होना है जो कि फंडामेंटल डिस्कवरीज ऑफ नेचर यह करना है और एक ड्रीम था कि एक एस्ट्रोनॉट होना है। स्पेस एक्सप्लोर करना है। तो क्या है कि स्पेस एक्सप्लोरेशन एस्ट्रोनॉमी कॉस्मोलॉजी में स्कूल में जब से था तब से मेरा इंटरेस्ट है और बड़े लंबे समय से ऑलमोस्ट उसी समय से अह स्कूल में जब मैं पढ़ता था तभी से मेरे माइंड में एक आईडिया था। उसी समय तो मैं न्यूज़पेपर काफी पढ़ता था। तो उसी समय से मेरे माइंड में एक आईडिया था कि यदि विश्व के जो जितने भी प्रॉब्लम है इसका यदि कोई सॉल्यूशन लाना है तो क्या है कि हमको स्पेस में माइग्रेशन करना होगा। क्योंकि पृथ्वी पर जितना हम रहेंगे तो यह हजारों हजारों साल की ये जो अपनी संस्कृति या जो इतिहास है ना जिस एक तरह से जो हमारे मन को पोषण करती है आध्यात्मिकता हमको प्रदान करती है एक एक कल्चर प्रदान करती है हमको किंतु साथ-साथ में ही ना हमारे गले में पत्थर की तरह बंध गई है इसमें से कभी हम आगे ही नहीं आ पाएंगे जितना ही हम एडवांस होने का प्रयास करें। जहां पर जो प्रॉब्लम है वह एक न दूसरे तरह से बने ही रहेंगे। अब जैसे हम पिछले अब 5 साल पहले ही हम ऐसा सोचते थे कि बस अभी यह जगत में से किसी भी तरह का युद्ध जो है समाप्त हो गया है। कोई युद्ध करें। यह बात सोच कर के ही हमको लगता था कि यह असंभव है। तो देखिए कि विद इन लास्ट फाइव इयर्स अभी तीन युद्ध तो चल दो युद्ध तो ओपनली चल रहे हैं। और अभी यह चाइना ताइवान पे कब अटैक करेगा उसका कोई ठीक नहीं है। ट्रंप पगला क्या करेगा उसका कोई ठीक नहीं है। माने सडनली जो एक पीसफुल एटमॉस्फियर था उसमें से फिर से युद्ध वाले एटमॉस्फियर में हम लोग आ गए हैं। तो क्या है यह चाहे भारत की यह नात जात की समस्या हो ना कि यह इंटरनेशनल लेवल पे यह युद्ध की समस्या हो अह आज नहीं ना कल इसको तो किसी ना किसी फॉर्म से इसको मैनिफेस्ट होना ही है। तो यदि इफ वी माइग्रेट इनटू स्पेस वी विल हैव लार्जर एरिया टू एक्सप्लोर एज वेल एज टू मैनिफेस्ट आवर आत्मश्रद्धा एंड आवर डिविनिटी। सो एनीवे इस आईडिया को मैंने काफी एक्सप्लोर किया है। वी माइट डिस्कस अबाउट इट सम डे।
छोटी सोच और संकीर्णता धीरे-धीरे हमारी सोचने की क्षमता को खोखला कर देगी
यहां पे क्या कहते हैं स्वामी? ये एआई क्या कहता है स्वामी जी के आइडियाज के ऊपर में? द क्सक्यूंस। यह जो डोंट टचिज्म हमारा रिलीजन हो गया है। नात जात को इतना हमने भीतर में प्रवेश करवा दिया है। उसका क्सकुएंस क्या है? इफ दिस गोज ऑन फॉर अनदर सेंचुरी एवरी वन ऑफ अस विल बी इन अ ल्यूटिक अजाइलम। यदि और 100 साल ज्यादा चला तो हम सभी पागलखाने में भर्ती हो जाना पड़ेगा। इट इज अ श्योर साइन ऑफ सॉफ्टनिंग ऑफ द ब्रेन व्हेन द माइंड कैन नॉट ग्रेस द हायर प्रॉब्लम्स ऑफ लाइफ। यह जो जातपात का यह जो चिंतन है कि मैं बड़ा और दूसरे छोटे यह बस अपने मन की वीकनेस का ही साइन है और यह तभी होता है जब हमारा मन किसी हायर कांसेप्ट को पकड़ नहीं पाता। वो जो एक फेमस कोटेशन मैंने पहले भी कहा था एलियन और रुजवेल्ट उसको उसके नाम से है ये ग्रेट मैन दे डिस्कस आइडियाज जब जो ग्रेट मैन इकट्ठा होते हैं तो क्या डिस्कस करेंगे हायर आइडियाज डिस्कस करेंगे मीडियम पीपल दे डिस्कस इवेंट्स अर्थात कि जो रेगुलर लोग जो है वे लोग जब इकट्ठा होंगे तो वे लोग क्या करेंगे कि इवेंट्स डिस्कस करेंगे करेंगे कि अच्छा आज यूक्रेन में ऐसा हुआ, आज अमेरिका में ऐसा हुआ, आज एआई में ऐसा हुआ वगैरह-वगैरह इवेंट्स डिस्कस करेंगे। एंड जो मीडकर लोग जो है दे डिस्कस पीपल और जो निम्न कक्षा के लोग हैं वो दूसरे लोगों के बारे में चर्चा करेंगे। अच्छा इसने ऐसा किया उसने ऐसा किया यह ऐसा है वो ऐसा है यानी कि यदि हाईएस्ट ऑफ ब्रेन है अपना वी विल डिस्कस आइडियाज कि प्योर फिलॉसोफिकल आइडिया यदि मीडियम टाइप का ब्रेन है तो इवेंट्स डिस्कस करेंगे क्या-क्या घटनाएं हो रही है और निम्न कक्षा का ब्रेन है तो हम लोगों के बारे में डिस्कस करेंगे। स्वामी जी कहते हैं एक मित्र दूसरे मित्र के कान में एकांत में तीसरे किसी मित्र के बारे में कंप्लेन करता है। उसकी निंदा करता है। उसके बारे में रूमर मगरिंग करता है। तो दिस इज अ श्योर साइन ऑफ ब्रेकिंग ऑफ ऑर्गेनाइजेशन। कि इस तरह से करने से जो भी ऑर्गेनाइजेशन है वह टूटेगा ही टूटेगा। यह ऑर्गेनाइजेशन में बहुत बार ऐसा होता है। ग्रुप हो जाते हैं। एक ग्रुप के लोग जो है दूसरे ग्रुप की निंदा करते हैं। तो यह ग्रुपिज्म है। फिर यह दो लोग मिलकर के तीसरे की निंदा करें। यह जो सब है वो ऑर्गेनाइजेशन भी टूटता है, इंस्टीट्यूशन भी टूटता है, वह समाज भी टूटता है और ब्रेन भी टूट जाता है। जैसे यहां पे स्वामी जी कहते हैं कि यह जो ब्रेन जो है वह सॉफ्ट हो जाता है और माइंड जो है यह जो हायर प्रॉब्लम ऑफ लाइफ है उसको समझने में असमर्थ हो जाता है। द कॉज और इसके पीछे कारण क्या है? एट्रिब्यूटेड टू सेंचुरी पेंट डिस्कसिंग मीनिंगलेस क्वेश्चंस लाइक वेदर वी शुड ड्रिंक अ ग्लास ऑफ वाटर विद द राइट हैंड और द लेफ्ट स्वामी जी जो चाबुक की तरह जो कुछ-कुछ बातें करते थे स्वामी जी के लेटर्स जो है खास करके इंग्लिश में तो स्वामी जी के यह जो सब सेंटेंस है वह तो पावरफुल लगते ही है किंतु यदि स्वामी जी के जो बंगाली लेटर्स हैं गुरु भाइयों को लिखे उसमें तो चाबुक की तरह स्वामी जी वार करते हैं और इतना शार्प लैंग्वेज वह यूज करते हैं कि सही में अपना मन खुश हो जाए। जो लोग प्रोग्रेसिव है, जो लोग इस तरह से पूरे मनुष्य समाज के बारे में सोचते हैं, जो लोग की भारत देश की अवदशा के ऊपर में जिनका कि हृदय रोता है। स्वामी जी के यह जो शब्द है अमृत के समान लगते हैं। क्योंकि कितने दिनों तक हम विदेशियों को गाली देते जाएंगे। उन लोगों ने आकर यह किया, उन लोगों ने आकर यह किया। यदि थोड़ा सा अपने भीतर में भी देखिए कि पाकिस्तान की तरह पाकिस्तान में जो कुछ भी हो रहा है उसके पीछे इंडिया का हाथ है। तो आप खुद तो देखिए कि आपकी क्या परिस्थिति है। देखिए थोड़ा बहुत स्टडी करने से एक बहुत ही इंपॉर्टेंट फैक्ट नजर के सामने आता है कि कोई भी देश है हम कल जो डिस्कस कर रहे थे ना कि डेमोक्रेसी और ऑटोक्रेसी के बारे में कि कभी-कभी यह ऑटोक्रेसी है वह सेंट्रल लेवल पे ही होती है और कभी-कभी यह ऑटोक्रेसी लोकल लेवल पे भी हो जाती है। सेंट्रल लेवल पे है। उसका अर्थ है एक राजा है। सभी लोग जाकर के उसको नमस्कार करते हैं। उसकी ऑथॉरिटी स्वीकार करते हैं। यह जो लोकल लेवल पर ऑटोक्रेसी है इसका अर्थ है जो जमीन जो है जमीन के पार्सल कर दिए गए हैं और उसके ऊपर में एक जमींदार को बिठा दिया है। अभी यह जमीन की जो मालिकी है वह जमींदार की है। और यह जमींदार जो है वह किसानों को गुलाम की तरह रख करके उनके पास में कार्य करवाता है और जो उपज होती है उसका ज्यादातर हिस्सा वो छीन लेता है और किसान यदि देगा नहीं तो किसान पे अत्याचार भी करेंगे। यह जो वराह नगर मठ जो अपना था पहला वहां जो टाकी के जो जमींदार थे उन्हीं का था और वहां पे यही सब चलता था। जो किसान अपना जो कर देने में फसल देने में आनाकानी करेगा थोड़ा बहुत ये करेगा तो कहेंगे कि उसको वहां पर ले आओ फिर वहां पर जाकर उसकी पिटाई करते थे उसकी हत्या कर देते थे बोल के ही वह भूतिया मकान था तो एनीवे यह जो जमींदार जो है जब जमीन उसके कंट्रोल में होती है तब क्या होता है यह जो आम किसान है आम नागरिक है वह डिसएंपावर हो जाता है वह काम करता है गुलाम की तरह। फिर उसके भीतर में कोई तेज नहीं रहता, कोई उत्साह नहीं रहता, इनिशिएटिव लेने की क्षमता नहीं रहती, एंटरप्रेन्योरियल स्पिरिट नहीं रहता। तो, यह हो गया एक टाइप का सिस्टम। दूसरी टाइप का सिस्टम है कि यह जो लोकल लेवल पर फ्रीडम है जिसके पास में जमीन है जो जमीन की जो जमीन को जोतता है जो जमीन पर खेती करता है उसी की यह जमीन है। तो यह कहते हैं लोकल लेवल पे एंपावरमेंट। यह जो किसान है ही इज़ एन एंपावर्ड। मेरी जमीन है बोलकर के मुझे मेहनत करनी है। बोल के उसका एक एंटरप्रेन्योरियल स्पिरिट होगा। उसमें एक उत्साह होगा। एक उसके भीतर में एक जोम रहेगा। वो जो ठाकुर वो दो किसानों की कहानी कहते हैं ना कि एक किसान है वो इसने ठीक किया कि आज सुबह को मैं खेत में जाकर के नहर खोदना शुरू करूंगा। जब तक पानी नहीं आ जाएगा तब तक मैं नहर खोदता रहूंगा। तो कैसे भी करके रात तक उसने मेहनत करके जमीन काट-काट करके नहर बना दी। पानी खेत में आया। तब कहीं जाकर के वह अपने घर गया और खाना खाया और बजे मजे से विश्राम कर रहा है। दूसरा किसान है कि उसने थोड़ी देर काम करके सोचा कि अच्छा चलो दोपहर का खाने का समय हो गया। पहले खाना खा के आते हैं बाद में यह सब करते हैं। तो वो किसान है वो नहर खत्म पूरी नहीं कर पाया। पहले वाले किसान में खेत में पानी आने लगा। दूसरे वाले के नहीं। अभी देखिए यह थोड़ा सा सोशल सिस्टम में लगा के देखें यहां पे जो किसान अपने खेत पे काम करता है उत्साह से वो किसान का खेत उसका खुद का है बोलकर के करता है और वह जो किसान है वह जमींदार के खेत में काम करता है बोलकर के उसके भीतर में किसी तरह का उत्साह नहीं यानी यह उत्साह का नहीं होना या उत्साह का होना दो लेवल पर काम करता है दो फैक्टर है इसके एक तो उसके भीतर में जो एक सत्व है, शक्ति है, कार्य करने की, गोल अचीव करने की, वह इंडिविजुअल लेवल पर एक फैक्टर है। दूसरा कि खेत की मालिकी उसकी होनी चाहिए। अदरवाइज वह काम करने का कोई लाभ नहीं। मैं इतनी मेहनत करूंगा, जमींदार पैसा ले जाएगा तो मुझे क्या पड़ी है मेहनत करने की? यानी कि मेहनत के पीछे एक अधवसाय भी चाहिए, पुरुषार्थ भी चाहिए और खेत की मालिकी भी चाहिए। दूसरी ओर जो मेहनत नहीं करता उसके भीतर में तमस भी है। यह एक फैक्टर है। दूसरा एक फैक्टर हो सकता है जमींदार की के जमीन पे काम करता है। बोल करके उसको मेहनत करने का कोई इंसेंटिव नहीं है। तो ये जो पाकिस्तान का डिवीजन हुआ ना इसके पीछे रीजन क्या था पता है? एक बहुत बड़ा रीजन क्या था कि ये जो पंजाब के वो जो मुस्लिम जमींदार हैं उन लोगों को पता चल गया था। एक समझ आ गया था। गांधी जी और नेहरू वगैरह जिस तरह से बातें करते हैं कि ये भारत में से जमींदारी प्रथा जाने वाली है। ब्रिटिश लोगों ने ये जो जमींदारी प्रथा भारत में थोप करके रखी है वो प्रथा जाने वाली है। बोल कर के हमारा अथॉरिटी हमारा पावर जाएगा। तो बोल कर के उन्होंने यह पाकिस्तान मूवमेंट को बढ़ावा दिया कि हमारे लिए एक अलग से देश हो जहां पे यह जमीन की मालिकी हमारी ही रहे। यह लैंड रिफॉर्म ना हो। तो बोल के देखिए कि भारत आजाद भारत में आधुनिक भारत में लैंड रिफॉर्म हुआ। यह जो इंदिरा गांधी ने जो नियम बनाया कि जो किसान जिस जमीन पर खेती कर खेड़े एनी जमीन जो जोतता है जमीन को उसकी जमीन है और किसी की नहीं। तो यह जो किसानों को एंपावर किया। यह जो राजा फाजा थे उनका यह जो सब सलियाना वगैरह बंद करवा दिया। दैट इज अ ग्रेट कहेंगे कि आम जनता को एंपावर किया। जबकि पाकिस्तान है वहां पे जमींदारी प्रथा एक नहीं ना दूसरे फॉर्म में अभी भी है। जमीन की मालिकी जो है बड़े-बड़े लैंड लॉर्डर की है। बोल के वो जो देश है कभी डेवलप नहीं होगा। और फिर उस देश को इकट्ठा रखने के लिए आपको कोई ना कोई एक उद्देश्य देना पड़ेगा। वो वो जो किसान की बात है मेहनत करके खेती करता है। क्यों? क्योंकि जमीन उसकी है। अभी जमीन उसकी नहीं है तो मेहनत नहीं करेगा। तो इकोनमी तो डाउन होगा तो कैसे भी करके लोगों के पास में लोगों को एक मोटिव पावर भी तो देना है ना। तो भारत के साथ में दुश्मनी इटरनल दुश्मनी करके भारत का भय दिखा करके लोगों को कंट्रोल में रखते हैं। और फिर ये टेररिज्म एक घुसाया है। रिलीजियस फनेटिज्म। तो देखिए कि यह जो गुलाम मानस है यह गुलाम मानस में से क्या-क्या किस तरह से लोगों को गुलाम बनाया जाता है डिसएंपावर करके और किस तरह से गुलाम लोगों के मन में इस दुनिया भर की विकृतियां डाली जाती है। तो यह जब सब हम स्टडी करते हैं तब जब हम स्वामी जी को पढ़ते हैं हमको लगता है कि देखिए इस जगत में कोई तो है जो कि लोगों का भला चाहता है। लोगों का कल्याण चाहता है। अदरवाइज ये पाकिस्तान के ये जो जमींदार है इस तरह की मेंटालिटी होती कि कैसे भी करके जमीन की मालिकी हमारी ही रहनी चाहिए और इवेंचुअली इंडस्ट्रीज जितनी है उसकी मालिकी भी हमारी ही होगी। जो आम जनता है या तो वह गुलाम की तरह खेत जोतेगी या तो गुलाम की तरह फैक्ट्री में कार्य करेगी, मजदूरी करेगी। उससे ज्यादा उनका कोई आवश्यकता उनको कुछ देने की नहीं है। तब हम जब भारत की ओर देखते हैं हमारे मन में एक सधेरा बैठा है कि चलो भारत में ऐसे लोगों का अवतरण हुआ है। आविर्भाव हुआ है जो कि आम जनता के कल्याण के लिए जिनका हृदय रोता है। वेदांत सिर्फ फिलॉसोफी नहीं है। वेदांत सिर्फ यह जो हायर थिंकिंग या तो हायर डिस्कशन आर्गुममेंटेशन नहीं इसका एक प्रैक्टिकल एप्लीकेशन भी है। यदि सभी के भीतर में आत्मन ब्रह्मन या ईश्वर विराजमान है तो सभी को वही डिग्निटी देनी चाहिए। जो डिग्निटी मैं अपने लिए चाहता हूं। उनको भी वही एक एंपावरमेंट देना चाहिए। जो एंपावर में एंपावरमेंट मैं अपने लिए चाहता हूं उनको भी वही आत्मश्रद्धा देनी चाहिए जो आत्मश्रद्धा मैं अपने लिए चाहता हूं। यह जो फंडामेंटल कांसेप्ट है अप्लाइड वेदांत वह यहां पे स्वामी जी के प्रत्येक सेंटेंस में प्रत्येक आइडिया में हमको देखने को मिलता है। और इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि जितना हम इस तरह की दूसरे लोगों की निंदा करने में जाएंगे। मैं सुपीरियर हूं या मेरी कास्ट सुपीरियर है। बोल कर के हम एक दूसरों को नीचा दिखाने को जाएंगे। के साथ-साथ में ही देखिए सिविलाइजेशन इसी तरह से टूटती है। यह जमींदार लोग कहेंगे कि हमारे ही पास में ऑथॉरिटी और पावर रहना चाहिए और किसी को यह सब देने की जरूरत नहीं है। साथ-साथ में ही देखिए कि समाज का एक बहुत ही बड़ा वर्ग डिसइंपावर हो गया। गुलाम मेंटालिटी डेवलप कर दी और इस गुलामी में से टेररिज्म है, रिलीजियस पेनेटिसिज्म है, वही सब प्रकट होता है।
गुलामी: आज के भारत का सबसे बड़ा पाप
नया स्लाइड क्या कहता है? यह एआई स्वामी जी का सेंटेंस कोट करता है। इफ देयर इज एनी क्राइंग सीन इन इंडिया एट दिस टाइम इट इज दिस लेवरी। यदि भारत में एक महा भयानक दूषण है तो यह गुलामी है। किंतु यह गुलामी अर्थात कि कौन सी गुलामी की बात कर रहे हैं? वह गुलामी नहीं जो कि ब्रिटिश लोगों ने हमारे ऊपर में थोप दी है। वह गुलामी नहीं जो कि यह जमींदारों ने लोकल लेवल पे यह प्रजा के ऊपर में थोप के बिठाई है। गुलामी है जो कि यह सोशल स्ट्रेटिफिकेशन है वो है। यदि यह सोशल स्ट्रेटिफिकेशन जब तक हम नहीं तोड़ेंगे तब तक क्या होगा कि यह गुलामी हमारी जाएगी नहीं। पाकिस्तान की तरह ही हमारे साथ में ही उनको आजादी मिली। किंतु लैंड रिफॉर्म हुआ नहीं। लैंड रिफॉर्म क्यों नहीं हुआ? वहां पे ये जो जमींदार कास्ट है उन्होंने ठीक करके रखा कि हमारा कास्ट प्रिविलेज हम किसी के साथ में शेयर नहीं करेंगे। बोल कर के वे लोग पॉलिटिकली तो इंडिपेंडेंट हुए। सोशली इकोनॉमिकली वह अभी भी बहुत बड़ी प्रजा वहां की गुलाम ही है। तो भारत में देखिए फॉरर्चूनेटली वही जो हायर कास्ट ब्राह्मण लोग थे जिनके लिए यह कास्ट सिस्टम अच्छे से कार्य कर रही थी। वही ब्राह्मण लोगों ने कास्ट सिस्टम को अंडरमाइन किया है। वह जो चाहे चैतन्य महाप्रभु हो ना कि भगवान राम कृष्ण मां शारदा देवी हो या तो फिर यही ठाकुर के बड़े भाई रामकुमार जिन्होंने यह विधान दिया कि किस तरह से एक कैवर्त तथाकथित निम्न जाति की यह रानी रासमणि उसके द्वारा बनाए हुए मंदिर में एक ब्राह्मण पूजा कर सकता है। तो भारत का यह ग्रेट गुड फॉर्च्यून है कि जिनके लिए यह सिस्टम काम करती थी उन्होंने ही इस सिस्टम को अंडरमाइन किया है। देखिए गांधी जी का अ शुरू शुरू में जो हरिजन लोगों को आत्मसम्मान देना एंपावरमेंट देना उनको मंदिरों में आने का प्रवेश अधिकार देना गांव का जो कुआं है वो जो ये उच्च वर्णों के लिए यह बाकी सब के लिए वह जो सब डिवीजन था पानी को बांटने का वह जो सब खत्म करना वह कितना फंडामेंटल कार्य था यदि यह कार्य भारत में नहीं होता तो हमारी परिस्थिति भी बिल्कुल पाकिस्तान जैसी होती। यह देखिए आधुनिक युग का इतिहास आप पढ़ेंगे ना तो देखेंगे कि एक तो एक समय था जब यह फुडलिज्म चारों ओर फैल रहा था। फ्यूडलिज्म का क्या अर्थ कि ये जमीन की मालिकी जमींदारों की है। ये इंडस्ट्री जो इंडस्ट्री है उसकी मालिकी ये कैपिटलिस्ट की है। तो यह कैपिटलिस्ट और यह जमींदार ये लैंड लॉर्ड यही दो है कि समाज में एक बहुत ही अच्छे लेवल पर जो स्वामी जी का कहना था ना एक था कि क्षत्रिय एक ब्राह्मण युग था जहां पर कि ब्राह्मण लोगों का वर्चस्व था। फिर यह क्षत्रिय युग था जहां पर क्षत्रिय लोगों का वर्चस्व है। फिर यह वैश्य युग था जहां पर यह वैश्य अर्थात कि ट्रेडर है। जमींदार या तो फिर यह लैंड लॉर्ड या तो कैपिटलिस्ट इन लोगों का वर्चस्व है। फिर एक शूद्र युग आएगा। जबकि यह शूद्र लोग अपनी यह जंजीर तोड़ के अपने अधिकार के लिए युद्ध करेंगे। तो यह शूद्र युग आएगा। तो यह एक म दिस इज़ अ वेरी क्या कहेंगे? ओवर्टली सिंपलीफाइड कांसेप्ट। किंतु यह एक थिंकिंग है कि फ्यूडलिज्म में देखिए कि लैंड एंड इंडस्ट्री इसका जो कंसंट्रेशन हुआ था इससे तोड़ना है। इसको तोड़ना है। और इससे तोड़ने मुक्त होने के लिए अपने मन को यह जो जाति प्रथा है उसमें से निकालना है। वरना ऑलरेडी हम लोग कंडीशन होकर के बैठे हैं कि हमारी जाति जो है बाकी सब जातियों से बड़ी है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि लैंड एंड इंडस्ट्री जमीन और यह उद्योग इसकी मालिकी भी हमारी ही होनी चाहिए। निम्न जाति निम्न वर्णों को इसकी मालिकी या इसका अधिकार क्यों मिले? यहां से स्टार्ट होगा और फिर पॉलिटिकल पावर है वह भी हमारे ही हाथ में होना चाहिए। अदर वाइज निम्न वर्णों को पॉलिटिकल पावर देने से क्या लाभ है? आज भारत में देखिए इतना भयानक विषयस जाति प्रथा था। इसके बावजूद जब आजाद भारत का कॉन्स्टिट्यूशन बना वन एक नागरिक एक वोट वन सिटीजन वन वोट। यह जो इक्वेशन है भारत में देखिए यह कितने एडवांस इंडस्ट्रियलिस्ट वेस्टर्न कंट्रीज है। उनसे पहले भारत में यह कॉन्स्टिट्यूशन आया है। स्त्रियों को प्रत्येक स्त्री को एक वोट। यानी कि स्त्रियों को भी समान अधिकार मिल गया। ऐसा नहीं कि ब्राह्मण को 10 वोट। ब्राह्मण के पास में 10 वोट है देने के लिए इलेक्शन में। तो जो अब्राह्मी है, शूद्र है उनके पास में एक या दो ही वोट है इलेक्शन में देने के लिए। ऐसा सब पगलापन भारत में आजाद भारत में नहीं हुआ। स्वामी जी ने जब से यह मैसेज दिया कि यदि भारत का उत्थान होना है तो यह जो समाज में स्ट्रेटिफिकेशन है इसको तोड़ना होगा। इसके अलावा होगा क्या? ब्रिटिश लोग तो चले जाएंगे किंतु यह जमींदारी प्रथा वैसी की वैसी ही रह जाएगी। यह कैपिटलिस्ट है वे लोग वैसे के वैसे ही रह जाएंगे। यह ब्रिटिश राज चला गया। ईस्ट इंडिया कंपनी रह गई। इसके जैसा होगा। ईस्ट इंडिया कंपनी ओरिजिनली भारत में क्यों आई? भारत पे राज्य करने के लिए नहीं। किसको पड़ी है राज्य करने की? जब तक आप इस देश को लूट सकते हैं तब तक राज्य किसको करना है? झूठ-मूठ का रिस्पांसिबिलिटी क्यों लेना है? अकाल पड़ेगा तो भी हमको तो किसान के पास में से वही कर वसूल करना है। वो जिए कि मरे यदि राज्य शासन करते हैं तो किसान का रिस्पांसिबिलिटी आ जाएगा। सिर्फ ट्रेडिंग ही करते हैं तो हमको अनटू द डेथ उसका मृत्यु होगा तब तक हम उसको शोषण कर सकते हैं। बिना किसी माने टेंशन लिए हुए बिना किसी मोरल डलेमा में फंसे हुए। किंतु देखिए कि वो जो सब परिस्थिति एक के बाद एक हुई तो लोकल लोगों ने यहां पे जो थे ऑफिसर कुछ ईस्ट इंडिया कंपनी के उन्होंने इनिशिएटिव लेकर के राज्य शासन प्रारंभ तो कर दिया। तो इस राज्य शासन से हम लोग मुक्त भी हुए। किंतु फिर यह जो ईस्ट इंडिया कंपनी का जो मेंटालिटी है कैसे भी करके भारत और भारतीयों का शोषण करो वो मेंटालिटी भारत में रह जाती। यदि यह गोरे लोगों की ईस्ट इंडिया कंपनी गई तो यह अपने यह जो उच्च वर्णों की तथाकथित उच्च वर्णों की ईस्ट इंडिया कंपनी बन के रह जाती। यहां पे जिस तरह से आम नागरिक का शोषण उस समय होता था उसी तरह आम नागरिक का शोषण आज होगा। तो यह शोषण ना हो इसके लिए यह जाति प्रथा को टूटना अत्यंत अनिवार्य था। बोल के स्वामी जी कहते हैं कि यदि भारत का एक बहुत ही बड़ा दूषण है तो यह गुलामी है और यह गुलामी ब्रिटिश राज की गुलामी नहीं ईस्ट इंडिया कंपनी की गुलामी यह गुलामी पॉलिटिकल गुलामी नहीं यह गुलामी है यह सामाजिक गुलामी जो कि एक आदमी को कहता है कि तुम्हारे भीतर में चाहे जितना भी स्पिरिट हो जितना भी एडवेंचर हो जितना भी एंटरप्रेन्योरियल स्पिरिट हो जितना भी तुम्हारे में विज़ हो एक निम्न जाति के एक के घर में तुम्हारा जन्म हुआ है तो तुम्हारा जीवन भर यही काम है कि तुम टॉयलेट क्लीन करो इसके अलावा तुम्हारे लिए इस समाज में और कोई काम नहीं तो देखिए कि बेचारे का स्पिरिट किस तरह से क्रश हो जाता है तो उसको सही-सही में गुलामी में डालना हुआ वरना तो दिल्ली में कौन बैठता है? एक किसान को क्या फर्क पड़ता था? जैसे वह पहले के राजा बैठते थे, वैसे ही बाद में मुगल राजा बैठते हैं। मुगल राजा जैसे बैठते थे, वैसे यह ब्रिटिश राज का यह वायसराय बैठता है। तुम वो मुगल हो, ना कि ये ब्रिटिश वायसराय हो, ना कि यह गुप्त हो, ना कि मौर्य हो, ना कि कोई भी यह वंशी हो वहां पे। क्या फर्क पड़ता है एक किसान को? किसान को फर्क तो तभी पड़ेगा जब कि उसकी जो जमीन की मालिकी है उससे छीनी जाए। यह आम आदमी को फर्क तो तभी पड़ेगा जब उसके ऊपर में यह जाति का जुनून बिठा दिया जाए। यह उसको एक स्ट्रेटिफिकेशन में डाल दिया जाए कि जिस जाति में तुमने जन्म लिया उस जाति के आगे तुम कुछ नहीं कर पाओगे। तो वह गुलामी होगी। अदरवाइज दिल्ली में कौन बैठा है उससे? हमको क्या फर्क पड़ता है?
उपनिषदों का महामंत्र है : अभय
द कोर प्रॉब्लम क्या कहता है एआई? द कोर प्रॉब्लम इज वीकनेस। हमारा जो फंडामेंटल प्रॉब्लम है वह है कमजोरी। यह मानसिक कमजोरी। इफ देयर इज वन वर्ड दैट यू फाइंड कमिंग आउट लाइक ए बम फ्रॉम द उपनिषद। इट इज द वर्ड फियरलेसनेस। अभी ही यदि उपनिषद में से बमब की तरह [हंसी] एक्सप्लोजन की तरह कोई एक शब्द आप आते हुए देखते हैं तो वह शब्द है फियरलेसनेस। अभी ही देखिए यह फियरलेसनेस का अर्थ क्या है? आप पाकिस्तान के साथ में फाइट करने को जाएंगे, चाइना के साथ में फाइट करने को जाएंगे, एवरेस्ट सर करने को जाएंगे या तो फिर ये जो पूरे पृथ्वी का भ्रमण करेंगे। एक नौका में बैठकर के या एस्ट्रोनॉट होकर के चांद या मार्स पे जाएंगे। व्हिच रिक्वायरर्स ट्रेमेंडस करेज। किंतु देखिए कि वो सब करेज हमारे पास में आए। इससे पहले तो यह करेज होना चाहिए कि जिस तरह के स्ट्रेटिफिकेशन में समाज ने मुझे बिठा दिया है, उसको तोड़ करके मैं अपना सर उठाऊं। यह जंजीरों को तोड़ूं। जब तक मैं यह नहीं कर पाऊंगा तब तक आप समझ लीजिए कि मैं अपने जीवन में ज्यादा कुछ कर ही नहीं पाऊंगा। देखिए भारत कितना भारत का ग्रेट गुड फॉर्च्यून कितना है। जिन लोगों के फेवर में जाति प्रथा काम करती है उन्हीं लोगों ने यह जाति प्रथा को अंडरमाइन किया। अदरवाइज यह जो चाइना और रशिया दो उदाहरण आप देखिए। वहां के यह जो जमींदार वर्ग था। अ उन लोगों ने अपने हाथों से अपनी सत्ता कभी नहीं छोड़ी। वहां पे ग्राउंड लेवल पर प्रोलेटरिएट रेवोल्यूशन को आना पड़ा। एक आम नागरिक, एक कुचड़ा हुआ नागरिक, एक पद दलित नागरिक सब इकट्ठा होकर के रेवोल्यूशन लाते हैं। और जितने भी यह जमींदार थे, जितने भी यह कैपिटलिस्ट थे, लैंड ओनर थे, लैंड लॉर्ड्स थे, उन सबका हत्या कर देते हैं। उन सबका खात्मा कर देते हैं। तब कहीं जाकर के उस समाज में यह लैंड रिफॉर्म होता है। पाकिस्तान जैसे देशों में अभी तक लैंड रिफॉर्म नहीं हुआ। बिहार की यह जो अवनति है बिहार में लैंड रिफॉर्म प्रॉपर्ली हुआ ही नहीं। वहां पर लैंड रिकॉर्ड्स आप देखेंगे थोड़ा सा स्टडी करके कि वहां पे प्रॉपर लैंड रिकॉर्ड्स ही नहीं है। कौन सी जमीन किसकी मालिकी की है। लैंड सर्वे जो होता है। क्लेरिटी होती है कि किसकी जमीन किसके हाथ में है वो है ही नहीं। अभी तक नहीं है। आई थिंक इफ आई 1930 में लास्ट सर्वे जैसा कुछ हुआ है। भूल गया मैं एग्जैक्टली किंतु ऐसा ही कुछ है। तो जो भी देश है या भारत का जो भी राज्य है जब तक वो गरीबी की कक्षा से ऊपर नहीं आता है। उसका अर्थ ही समझ लीजिए कि वहां पे यह लैंड रिफॉर्म नहीं हुआ है। लैंड रिफॉर्म और इज़ अ फंडामेंटल मोस्ट रिक्वायरमेंट ऑफ कोई भी एडवांस कंट्री। भारत में इंडिपेंडेंस के समय से ही यह हो चुका है। बोलकर के हम लोग बहुत ही फॉर्चूनेट हैं। आज हम यह सब समस्या को फेस ही नहीं कर पा रहे हैं। माने हमको पता ही नहीं है कि यह समस्या है। जबकि स्वामी जी के समय में यह सब समस्याएं इतना विकट स्वरूप धारण करके खड़ी थी कि वे लोग इससे आगे कुछ देख ही नहीं पा रहे थे। ज्यादातर लोग। तो इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि देखिए जो तथाकथित पद दलित है उनके भीतर में यह फियरलेसनेस होनी चाहिए। उच्च वर्णों के भीतर में यह फियरलेसनेस होनी चाहिए कि उन्होंने जिस तरह से सामाजिक प्रथा का लाभ लेकर के लोगों को लूट लोगों का एक तरह से शोषण किया है उस प्रथा को वही लोग डिसॉल्व कर दें। अगेन मैं यह नहीं कहूंगा कि शोषण करने के लिए यह प्रथा बनी है। यह जो प्रथाएं बनी थी, उसका बहुत सारा पुराना इतिहास है जिसमें जाने की जरूरत नहीं है। एज ऑफ 19th सेंचुरी यह सब प्रथाएं शोषण में परिणत हो चुकी थी। उसका भले ही चाहे कुछ भी इतिहास हो तो बस वर्तमान परिस्थिति को ध्यान में रखते इस प्रथा का डिसोल्यूशन आवश्यक था। तो वह फियरलेसनेस होनी चाहिए। दोनों में उच्च वर्ण है उनमें यह फियरलेसनेस होनी चाहिए। यह प्रथा को डिॉल्व करो और जो पदलित है उनमें यह फियरलेसनेस होनी चाहिए कि अपनी आवाज उठाए। दोनों ओर से यह इनिशिएटिव लेना है। सो यह अभी ही यह जो निर्भयता निर्भयता है। स्वामी जी सेकंड टाइम अमेरिका जा रहे थे। वेस्ट अमेरिका में जा रहे थे। तो जहाज में देखा वो जो खलासी वर्ग है वह सब इंडियन थे। तो स्वामी जी ने देखा कि जब तूफान आता है तो गोरे लोग जो है शराब पीकर के मत्त हो जाते हैं। क्योंकि तूफान आएगा तो नौका डूबेगी तो मर जाएंगे। तो यह भय जो है मृत्यु भय उसका सामना नहीं कर पाते बोलकर के वे लोग मध्यपान करते हैं। किंतु यह जो हमारे भारतीय खलासी है कि जब भी तूफान आता है तो उसे म डट करके यह जो सड़ वगैरह जो है सेल वगैरह उसको उसको जिस तरह से मैनेज करना है वो तो पूरा मैनुअल था ना ऑटोमेटिक तो कुछ था नहीं। तो तूफान के सामने डट के खड़े रह के नौका को मैनेज करते हैं। तो स्वामी जी कहते हैं पहली बार मुझे एक नाज हुआ अपने खुद के देश बांधवों के ऊपर में कि इस तरह की मर्दानगी है हमारे भीतर में। वरना तो भारत में जाकर देखो ज्यादातर लोग तो नामर्द की तरह ही एक तरह की क्या कहेंगे? गुलाम मानस के साथ में जीते हैं। सो दिस वर्ड फियरलेसनेस कि मेरा जो अधिकार है उसको प्राप्त करने के लिए जो करना है वह करना है। वो पद दलितों के लिए और जो उच्च वर्ण है उनमें यह फियरलेसनेस होनी चाहिए कि देखिए यह जो सिस्टम है वह अभी रिप्रेसिव सिस्टम हो गया है। इसको डिसोल्व करना होगा। वरना तो भारत का कभी कल्याण नहीं होगा। यह करुणा रूपी फियरलेसनेस इन लोगों में होनी चाहिए। इसके बाद वाला जो है अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णारपणमस्तु
प्रश्न: ठाकुर केवल ब्राह्मण के हाथ का भोजन ग्रहण करते थे, और दूसरी ओर आप कहते हैं कि हमें जातिवाद को समाप्त करना चाहिए—ये दोनों बातें एक-दूसरे के विपरीत क्यों प्रतीत होती हैं?
वो एक दूसरा उसका मीनिंग हो गया कि आध्यात्मिक साधना करने के लिए जो मन की पोरिटी जो चाहिए वह हो गई वो तो ठाकुर तो किसी का शोषण करने के लिए तो यह सब नहीं करते थे कि मैं ब्राह्मण हूं बोल के मैं दूसरे लोगों का शोषण करूंगा। यह तो उनका भाव नहीं था। वो तो पूरा आध्यात्मिक लेवल पर थिंकिंग था। यहां पे उच्च वर्ण लोगों का शोषण ना करें इसको लेकर के सोशल लेवल पर हमारा थिंकिंग चल रहा है। नहीं कि आध्यात्मिक लेवल पर