Prayer
जब वह धूप धूना खोल कर तालव मध्य के मध्य में आरती के शेष भाग में चामर व्यजन करते करते भाव में उन्मत्त हो करके जय गुरुदेव श्री गुरुदेव बोलते बोलते भीषण हुंकार करते करते ताल ताल पे उद्धाम नृत्य करते करते एक ओर से दूसरी ओर नाचते-नाचते नृत्य करते करते फिरते तब सबके भीतर में क्या एक अपूर्व भक्ति भाव का आवेश होता वह बातों में प्रकाश नहीं कर सकते हैं कि मास्टर महाशय ठाकुर के नृत्य का वर्णन करते हैं। हम सबको पता है कि ठाकुर का कोमल अंग था और उन्होंने मधुर भाव की साधना की थी और ठाकुर हमको यह भी पता है जब नर्तकी का अभिनय करते हैं तो ये लड़के सब हंसते-हंसते जमीन पे रहने लगते जमीन पे लेट जाते हैं। इतना सुंदर रूप से ठाकुर माने वो नर्तकी का अभिनय कर सकते हैं। अर्थात की एक स्त्री सुलभ जो मधुरता और लालित्य जो होना चाहिए वो ठाकुर के श्री अंग में था ही था। अभी जब हम यह सोचेंगे कि ठाकुर नृत्य करेंगे तो कैसे करेंगे। हमको यही एक आएगा कि स्त्री सुलभ वो जो स्टाइल होती है उसी तरह से ठाकुर नृत्य करेंगे ना किंतु नहीं। देखिए कथामृतकार मास्टर महाशय स्पष्ट रूप से लिखते हैं। सिंह विक्रम से ठाकुर नृत्य कर रहे हैं। अर्थात कि ये जो महादेव का तांडव नृत्य किस तरह से होता है उस तरह से पौरुष से सभ नृत्य सिंह विक्रम वाला नृत्य ठाकुर कर रही थी। मां दो तरह के पान बना रही है। एक तरह का पान है जो सादा पान है। दूसरे तरह का पान है जिसमें कि इलायची है, किशमिश है वगैरह सब रखा हुआ है। तो योगिन मां ही मोस्ट प्रोबेब्ली वहां पे खड़ी थी। तो मां को पूछा कि मां यह सादा पान किस लिए और ये स्पेशल पान जो बनाया है वो भी किसके लिए है। तो मां ने कहा सादा पान है ठाकुर के लिए। वो तो अपने ही है। उनको तो सादा पान देंगे तो भी तो उनको कोई और कोई उपाय नहीं है। ठाकुर के पास में ऑप्शन नहीं है। मां पान देती है नहीं अच्छा लगता है तो मां बोली छठी और कहां से ले आओ अच्छा पान कहां जाएंगे बेचारे ठाकुर मां जो सेवा करती है ग्रहण करनी है। किंतु जब भक्त लोग हैं उनको तो हमको अच्छा पान खिला करके अपना बना लेना है। तो ये जितना भी विवरण पढ़ते हैं देखिए कि सिर्फ ठाकुर के समय के ही नहीं बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद बात बाद के समय की यह जो सब घटनावली है जितना ही हम पाठ करते जाएंगे। भले ही चाहे हमको यह सौभाग्य नहीं मिला कि शशि महाराज आरती करते हैं और हम वहां पर खड़े रहते देखते हैं। यह सौभाग्य यदि नहीं भी मिला है तो यह कहानियों का पाठ और श्रवण करने का जो सौभाग्य मिलता है हमको मुझे लगता है इसी से जो आधे पाप हमारे भाग जाएंगे। ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन उसका हम पाठ कर रहे हैं। वराह नगर मठ की घटनाएं चल रही है। कल हमने शशि महाराज का अवदान इसके
उदारता की पराकाष्ठा और त्याग की जीवंत प्रतिमा — रामकृष्णानंदजी
बारे में थोड़ा सा चर्चा किया था। हमने देखा कि शशि महाराज ने अपना जीवन त्याग कैसे किया था। स्वामी जी को जब जरूरत आन पड़ी कि साउथ इंडिया में ठाकुर का श्री रामकृष्ण देव का भाव प्रचार करने के लिए किसी को भेजने की तो स्वामी जी ने शशि महाराज को बुलाया और सब पता है वैसे तो स्वामी जी ने चेन्नई में कह ही दिया था कि आपके जितने ऑर्थोडॉक्स ब्राह्मण है उससे भी ज्यादा एक ऑर्थोडॉक्स मैं साधु को भेजूंगा किंतु साथ में ही हृदय कि वह इतने ही लिबरल होंगे। तो शशि महाराज की ये ऑर्थोडॉक्सी तो हम सबको पता है किंतु शशि महाराज लिबरल भी कितने थे उसकी भी कहानी हमको पता है। स्वामी जी को जब भेजना था देखिए कि ठाकुर का तो उदार भाव है। तो कोई भी एक धर्म या संप्रदाय या तो एक नैरो माइंडेड एक विधि विधान में तो ठाकुरबद्ध नहीं है। तो शशि महाराज हालांकि ठाकुर की विधिवत पूजा करते तो थे। ठाकुर की विधिवत पूजा के ऊपर में उनकी निष्ठा तो जगजाहिर है। किंतु साथ-साथ में ही स्वामी रामकृष्णानंद जी का शशि महाराज का हृदय कितना विस्तृत था। वह भी तो स्वामी जी को प्रूफ चाहिए होता था। तो स्वामी जी ने शशि महाराज को टेस्ट करने के लिए शशि महाराज को बुलाया। जब वह अमेरिका से वापस आ गए थे और चेन्नई में उनको भेजना था उससे पहले की बात तो स्वामी जी ने शशि महाराज को बुलाया और कहा कि एक मुसलमान की दुकान से बेकरी से एक पाव रोटी लेकर के आओ। तो अभी देखिए कि इतने आचारी ब्राह्मण तो किसी मुसलमान की बेकरी पर जाएंगे। वहां से पांव रोटी खरीदेंगे और लेकर के स्वामी जी के पास आएंगे। तो और कोई होता तो वह तो यही समझता कि उसका धर्म भ्रष्ट करने के लिए स्वामी जी उसको वहां पर भेजते हैं। किंतु हमको तो पता है कि ठाकुर ने महासमाधि से पहले सभी गुरु भाइयों को स्वामी जी के हवाले सुप्रत कर दिया था। तो यहां पर भी यह भी देखिए कि जिस तरह से गुरु भाइयों में ओबेडियंस था नरेंद्र के प्रति तो अपना एक खुद का जो एक सिद्धांत होता है उसको पकड़ करके स्वामी जी के साथ में फाइट करने की भी कैपेसिटी थी। वह भी हमने वह घटना देखी है कि प्रारंभ के दिनों में स्वामी जी चाहते थे कि ठाकुर घर या तो गर्भगह बना करके ठाकुर के अस्थि स्थापित करके नियमित पूजा वगैरह करना विधि विधान के अनुसार यह तो सन्यासियों का संग है। कब खाने को मिलेगा कब नहीं मिलेगा उसका तो कुछ ठीक नहीं है। तो इस तरह से गर्भ गुरु की स्थापना करना उसके भीतर में ठाकुर के अस्थि की स्थापना फिर विधि विधान के अनुसार पूजा यह तो ठीक नहीं है। यदि उसमें कभी भी इंटरप्शन होता है सेवा में तो तो सेवा अपराध लग जाता है। तो स्वामी जी ने जब यह कहा कि यह ठाकुर घर जो है उसको उठा दो उसको बंद कर दो तो यही स्वामी जी के सामने यही शशि महाराज लड़ चुके थे और यही स्वामी जी जब उनको यह कहते हैं कि एक मुसलमान की बेकरी से पाव रोटी परचेस करके ले आओ तो शशि महाराज साथ-साथ में ही वह पांव रोटी परचेस करके ले आते हैं। देखिए कि कैसा डिलीशियस कंट्रास्ट है। जहां ठाकुर घर के बचाव की बात थी वो ठाकुर के लिए लड़ रहे थे। ठाकुर की सेवा के लिए लड़ रहे थे। और यहां पे जब यह पाव रोटी परचेस करने की बात है तो वहां पे वो अपने खुद के भीतर में वो जो लिबरलिटी है कि नहीं? ठाकुर इतने लिबरल थे। सबको पता है। एक गोविंद राय बोलकर के जो मुस्लिम साधक था उनके पास में से उन्होंने इस्लाम साधना की थी। यह सबको पता है। मोहम्मद का दर्शन हुआ था उनको। यह बात उनको पता है। तो फिर इसी ठाकुर के चेले होते-होते इसी ठाकुर की अस्थियों की और उनके उनकी पूजा करतेकरते शशि महाराज के भीतर में एक तरह का धर्म जुनून या तो फेनेटिसिज्म कैसे आएगा? हो ही नहीं सकता है। यदि आप शशि महाराज की तरह स्वामी रामकृष्णानंद जी की तरह ठाकुर की निष्ठा पूर्वक पूजा करेंगे तो आपके भीतर में कभी भी किसी भी तरह का फनेटिसिज्म या तो धर्म जुनून आना है ही नहीं। तो यह बात तो सबको पता है। शशि महाराज को भी समझ में आ गया कि वह जो नरेंद्र के साथ में मैंने फाइट किया था वह ठाकुर सेवा को चालू रखने के लिए फाइट था। यहां पर जो नरेंद्र मुझे बता रहा है, स्वामी जी मुझे बता रहे हैं कि यह इस तरह से पाव रोटी परचेस करके आओ। यह मेरा लिबरलिज्म कितना है? उसकी परीक्षा है। मैं ठाकुर का चेला हूं। मेरे हृदय में धर्म जुनून कैसे हो सकता है? बोल के शशि महाराज पाव रोटी परचेस करके ले आए। तो स्वामी जी बड़े खुश हो गए। और फिर उन्होंने कहा देखो भाई मैं तुमको चेन्नई भेजना चाहता हूं। चेन्नई के ब्राह्मणों को तो पहचानते हो। इतने ऑर्थोडॉक्स है उसी ऑर्थोडॉक्स लोगों में लोगों के भीतर में जाकर के ठाकुर की सेवा ठाकुर की वाणी का प्रचार करना है और इतने सालों से जो सेवा करके आ रहे थे शशि महाराज बिना किसी और एक वाक्य का उच्चारण किए हुए बिना अपने लीडर का एक भी विरोध किए हुए वो इमीडिएटली तैयार हो गए चेन्नई जाने के लिए। तो देखिए कि स्वामी जी ने वैसे तो एक ऑर्थोडॉक्स ब्राह्मण को भेजा है किंतु उनका हृदय जो है ठाकुर की शिक्षा के अनुसार ही उदार हृदय था और यही शशि महाराज साउथ इंडिया में ठाकुर की वाणी और वचनों का कहानियों का जो प्रचार करते हैं वह तो आज जग जाहिर है। आप साउथ इंडिया में भ्रमण कीजिए। देखिए कि जो फाउंडेशन आज रामकृष्ण संघ का है उसका वैसे तो सीड्स जो यदि कहे ओरिजिनल जो एक कहे बैरियर तोड़ना वह तो स्वामी जी ने किया है। किंतु स्वामी जी के बाद में ही एक सस्टेंड लेवल पर लंबे समय तक कार्य करना। जैसे ब्रह्मा का उद्देश्य होता है जगत की रचना करना, सृष्टि करना। किंतु फिर भगवान विष्णु है जो कि जगत का पालन करेंगे। सिर्फ सृष्टि करके तो हो जाएगा नहीं पालन भी करना पड़ेगा भगवान विष्णु की तरह। तो साउथ इंडिया के संघ जो है अपना रामकृष्ण संघ उसकी सृष्टि अवश्य स्वामी जी ने की है। ब्रह्मा जी का कार्य किया है। किंतु भगवान विष्णु का कार्य पालन करने का कार्य किया है स्वामी रामकृष्णानंद जी ने। तो यही रामकृष्णानंद जी देखिए उनके आखिरी समय में बात हमको कल भी हमने डिस्कस किया था कि उनको टीबी डिटेक्ट हो चुका था। लंग्स की एक सीरियस बीमारी डिटेक्ट हो चुकी थी। किंतु फिर किसी को बिना बताए वो जो आयोजन चल रहा था मां शारदा और स्वामी ब्रह्मानंद जी के दक्षिण भारत में आगमन का वो आयोजन अभी इतना एडवांस हो चुका था कि उनको इमीडिएटली शशि महाराज को समझ में आ गया कि यदि अभी मैं अपना ट्रीटमेंट लेना चालू करूंगा और यह रोग की बात मां के पास में या राजा महाराज के पास में पहुंची तो वह लोग यहां पर आएंगे नहीं क्योंकि पता पता है कि उनकी उपस्थिति से उनका जो जिम्मा है पूरा मेरे सर के ऊपर में आ जाने वाला है। शशि महाराज ऐसा सोचते हैं तो मेरे सर पर जिम्मा आ जाए तो मेरी सेहत और बिगड़ेगी। यह सोच के वे लोग आएंगे ही नहीं। तो शशि महाराज ने अपनी बीमारी को छुपा करके रखा। ठाकुर राजा महाराज को मां को दोनों को दक्षिण भारत में ले आए। दिन रात उनकी सेवा की। पूरे दक्षिण भारत के तीर्थों का भ्रमण करवाया। मां के हाथों से 108 सुवर्ण बिल्व पत्रों की वहां पे रामेश्वरम में उन्होंने आहुति दिलवाई। सब कुछ करवाया। चढ़वाया शिवलिंग के ऊपर में सब कुछ करवाया। इसके बाद में जब दोनों वापस चले गए। एक साथ नहीं आए थे। अलग-अलग आए थे। ऑफ कोर्स। तो जब यह दोनों की यात्रा समाप्त हो गई, पिलगिरी में समाप्त हो गया। मां की तो जो हमको कहानी पता है साउथ इंडिया में मां कहती है कि मुझे तो बेंगलुरु की ही बात कि मुझे तो पता नहीं है वहां की लैंग्वेज वे लोग तो आकर के सिर्फ इतना कहते मंत्रम और दीक्षा और मैं भी समझ जाती कि क्या वो कहना चाहते हैं और देखिए कि इतनी सुंदर कहानियां बेंगलुरु की वगैरह की है कि मां वे लोग मां के साथ में कन्नड़ लैंग्वेज में वार्तालाप करते हैं या तेलुगु लोगों में वार्तालाप करते हैं। यहां पे मां बंगाली में बोलती है। अभी बीच में कोई इंटरप्रिटर होगा सही। किंतु मां कहती है कि इंटरप्रेटर की कोई जरूरत नहीं पड़ती थी। वे लोग जो बोलते हैं मैं समझ जाती हूं। मैं जो बोलती हूं वे लोग समझ जाते हैं। क्यों? क्योंकि यह तो वाणी की आपले नहीं हो रही है। भाव का आदान प्रदान हो रहा है। मां अपने बच्चे को देखिए बच्चा जब जन्म ग्रहण करता है उसको तो वैसे भी कोई लैंग्वेज नहीं आती। राइट? तो मां जैसे ही किंतु फिर भी बच्चा मां को समझता है। मां बच्चे को समझती है। बच्चे को मां की लैंग्वेज नहीं आती। मां को बच्चे की लैंग्वेज नहीं आती क्योंकि दोनों की लैंग्वेज डिफरेंट होती है। तो किंतु फिर भी स्नेह का जो संबंध है दोनों परफेक्टली एक दूसरे को समझते हैं। तो यहां पे भी यहां भक्त लोग आते मां कहती है एक बार मैं कहीं किसी जगह पर गई थी। वहां से मैं वापस आ रही हूं। देखा कि मठ के सामने इतने सारे डिवोटी खड़े हैं और जैसे ही मेरी गाड़ी वहां पे आई मठ के सामने सब लोगों ने एक साथ में प्रणाम किया। वो इतना सुंदर दृश्य था। मां खुद कहती है तो देखिए कि मां के दक्षिण भारत की यात्रा जो है बड़ी ही सुख रूप बड़ी ही सुंदर रही। इतने सारे डिवोटी ने मां का आशीर्वाद प्राप्त किया। किंतु देखिए कि इन सबका जो फाउंडेशन था वह था शशि महाराज का सैक्रिफाइस। आत्मबलिदान। यह जब दोनों वापस चले गए और फिर शशि महाराज ने ट्रीटमेंट लेना प्रारंभ किया तब डॉक्टर कहता है कि अरे आप इतना देरी से यहां पर क्यों आए? ट्रीटमेंट लेने के लिए। पहले यदि आते ना तो थोड़ा सा ट्रीटमेंट अच्छी होने से आप बच जाते। किंतु अभी यह बीमारी आपके लंग्स में इतनी फैल चुकी है। अभी आपके बचने की कोई आशा नहीं है। तो जब यह लेटर हेड क्वार्टर में अपने उद्बोधन उस समय तो हेड क्वार्टर था उद्बोधन जहां पे कि अपने जनरल सेक्रेटरी महाराज रहते थे तो शारदानंद जी महाराज तो उनके पास में बात गई राजा महाराज को पता चला दोनों ने कहा कि भाई तुम यहां पे आ जाओ ट्रीटमेंट के लिए कोलकाता में हम लोग तुम्हारी सेवा करेंगे। तो यहां पे चेन्नई से शशि महाराज निकले वहां पर जाने के लिए कोलकाता रास्ते में आता था ओसा ओसा में मोस्ट प्रोबेबबली कोठार वहां पे राजा महाराज उस समय वहां पे थे तो शशि महाराज का ट्रेन वहां पर रुका तो राजा महाराज उनको मिलने के लिए आए तो दोनों गुरु भाई का देखिए कि ये आखिरी मिलन तो राजा महाराज शशि महाराज को कहते हैं कि भाई तुम ए रकम करे देहोपात को ले भाई तुमने इस तरह से अपना देह क्षय किया इस तरह से तुमने अपना देहपात किया अर्थात कि सबको पता चल गया कि शशि महाराज को पहले से ही डिटेक्ट हो चुका था टीबी किंतु बिकॉज़ कि राजा महाराज और मां की यात्रा ठीक हो चुकी थी। उन्होंने उसको छुपा के रखा था। बाद में प्रकट किया तब तो यह आउट ऑफ कंट्रोल हो चुका है बोलकर के इनका मृत्यु निश्चित है। तो राजा महाराज कहते हैं उनको भाई तुमने इस तरह से अपना देहपात किया अर्थात कि हमारी यात्रा के लिए तूने अपने जीवन का बलिदान दे दिया। तो यह शशि महाराज क्या बोलेंगे? फिर वो गए उद्बोधन में वहां पर उनकी ट्रीटमेंट चली। किंतु हम सबको पता है कि वह ज्यादा दिन फिर नहीं टिक पाए। 1911 के आसपास में ही उनकी महासमाधि हो गई। तो देखिए कि यह थे शशि महाराज का सेल्फ सैक्रिफाइस। कभी-कभी हम उनकी ठाकुर के प्रति जो निष्ठा और जो भक्ति की कहानियां वराह नगर मठ के दिनों में जब पढ़ते हैं तो कभी-कभी ना हमारे मन में एक संदेह हो जाता है। जैसे कि स्वामी जी के मन में हो गया था कि एक गोंडा ब्राह्मण एक एकजन पुजारी माने अर्थात कि एक फनेटिक ब्राह्मण पुजारी जो कि अपने संघ का आदर्श बिल्कुल नहीं है। ठाकुर इतने आदर्श से इतने डडीिकेशन से मां काली की उन्होंने पूजा की है। किंतु फिर सभी धर्म पथों को उन्होंने स्वीकार किया है। भारत के भीतर में जितनी धर्म प्रणाली है जितनी भी आध्यात्मिक स्कूल्स है सबको उन्होंने स्वीकार किया है। उसकी साधना की है। वैष्णव फिर ये शाक्त वेदांत जनरली देखें तो इन तीनों का आपस में काफी झगड़ा चलता रहता है। इसके बावजूद अब जैसे ये रामचंद्र दत्त वो थे वैष्णव तो वहां पे काकुड़गाची में ठाकुर की स्थापना की गई है। उसकी अस्थियों की तो वहां पे सिर्फ निरामिश आहार ही चलेगा। माने वेजिटेरियन जो प्रसाद भोग है वही ऑफर किया जाएगा क्योंकि वह तो वैष्णव है। किंतु यहां पे देखिए कि ठाकुर ने इस तरह का वैष्णव शाक्त वेदांत इस तरह का डिवीजन जैसे अपने जीवन में नहीं रखा वैसे ही विभिन्न धर्मों के भीतर में भी इन्होंने किसी तरह का डिवीजन नहीं रखा। प्रत्येक स्कूल, प्रत्येक पंथ, प्रत्येक धर्म एक-एक रास्ता है। वही एक ईश्वर की ओर जाने का वही ब्रह्म साक्षात्कार करने का। तो इस ठाकुर के जो पूजक होंगे उनका भी एक उदार हृदय होना चाहिए। उनके भीतर में भी स्वार्थ परता का एक अंश भी नहीं होना चाहिए। तो यह बात हमको ठीक कर लेनी है। सबसे पहले शशि महाराज के बारे में। उसके बाद में अभी जो वराह नगर मठ में शशि महाराज का जो कंट्रीब्यूशन है उसका पाठ करना है। तो ऑलरेडी हमने कल देखा कि वह किस तरह से शशि महाराज थे मठ की मां और जब सभी गुरु भाई साधन भजन में डूबे हुए हैं तो कैसे भी करके कहां से भी शशि महाराज ठाकुर के लिए भोग का जुगाड़ करेंगे और फिर वो जो भोग का जो प्रसाद जब होगा वह सभी गुरु जो माने जो खाना खाने के लिए आएंगे तो वह तो ठीक है। जो साधन भजन कर रहे हैं तो उनका मुंह खोल करके जबरदस्ती खाना उनके मुंह में घुसा देंगे। इस तरह से शशि महाराज उनकी मतलब सिर्फ ठाकुर की नहीं सबकी जितने भी गुरु भाई हैं सबकी इस तरह से सेवा करते थे। तो कल हमने देखा कि किस तरह से मठ के पीछे में ही एक गार्डन था। इस गार्डन में एक उड़िया माली रहता था। उसका नाम था केलो। तो शशि महाराज जब देखते थे कि यह वेजिटेबल वगैरह कुछ है नहीं मठ में तो वह सीधा वो बंटी अर्थात कि वेजिटेबल कट करने का एक तरह का चाकू वो लेकर के वह बागान में चले जाते थे और वह फिर वह जो भी हाथ में आता यह ड्रम स्टिक है ना कि यह जो भी है वहां पे वह फटाफट चाकू से काट करके वह अपने अपने ही भाव में अपनी ही धुन में फटाफट करके वह मठ में चले आते हैं। और यहां पे यह केलो माली जो है वह चिल्लाता रहता। अरे अरे क्या कर लिया क्या सब चुरा लिया सब चुरा लिया। यहां से इस तरह से मत लेके जाओ। की करो की करो सब ले लिया। ऐसा करके वह चिल्लाता था और शशि महाराज इनको पूरा इग्नोर करते थे। किंतु हमको यह भी पता है कि यह केो माली इसका मठ के साथ में बड़ा प्रीति का संबंध था। मठ में जब भी सुविधा होती थी यह बलराम बाबू है ना कि ये मास्टर महाशय है उनके प्रताप से जब भी मठ में यह मिठाई वगैरह की सुविधा होती तो उस सबको यह केो माली जो है उसको दिया जाता एक्चुअली ऐसी ही कहानी म वो प्रसाद इस तरह से देकर के एक्स्ट्रा कुछ लेने की कहानी वो दक्षिणेश्वर में भी है वहां पे वो जो दूध देने वाला था उसको पता है कि परमहंस महाशय को तो दूध ज्यादा चाहिए मतलब भक्त लोग वहां पे आते हैं तो कुछ ना कुछ चलता रहता है तो वह आकर के मां को ज्यादा ज्यादा दूध दे देता था और फिर क्या कहता था कि मैं यदि यह ज्यादा दूध वहां पे वो ऑफिस जो है काली मंदिर की कचहरी वहां पे यदि दूं ऑफिस में तो वे लोग तो साले बदमाश है वो पता नहीं घर ले जाकर के किसको किसको खिलाएंगे सबकी तो एक-एक उपपत्नी है तो जाकर के उसको खिलाएंगे उसकी बजाय अच्छा है कि यहां पे नौबत मैं मां के पास में दूं तो ये ठाकुर की सेवा में लगेगा। ऐसा बोल के ज्यादा दूध देता था। और मां भी जब यह मिठाई वगैरह जो कुछ भी आता था वो सब इस दूध वाले को दे देती थी। तो देखिए कि यह जो माने यह ब्लैक इकोनमी जो है यह ब्लैक मनी ट्रांजैक्शन वह उसी समय से हमारा चला आ रहा है। तो देखिए कि इस तरह से और फिर अपने विजानंद जी महाराज उनका डिस्क्रिप्शन आगे चलता है। पहले तो हमने देख लिया कि किस तरह से ठाकुर घर के सामने संध्या के समय शशि महाराज धूप प्रज्वलित करते थे और इसका भी हमको पता है कि कोयला होता है या तो फिर यह नारियल जो होता है कोकोनट उसकी जो छाल जो होती है उसको जला करके एक पात्र में रख के उसके ऊपर में गुगड़ बोलकर के पाउडर आता है। उसको थोड़ा स्प्रिंकल किया जाता है। जिससे कि बड़ा ही सुंदर खुशबू प्रकट होता है। तो एक हाथ में लटन जैसा एक बत्ती लेकर के और दूसरे हाथ में यह पात्र लेकर के वो शश महाराज वो पूरा जो मठ है उसमें यह पात्र को घुमाते घुमाते जय गुरु महाराज श्री गुरु महाराज सिंह नाद से इस तरह का हुंकार करतेकरते घूमते और नेचुरली कि वहां पे जो लोग उस समय इस पवित्र दृश्य का दर्शन करने का सद्भाग्य मिला होगा। उन लोगों का मन संसार से कहां उर्ध्व जैसे कि हिमालय में कैलाश शिखर के ऊपर में भगवान शिव के सामने बैठकर के ध्यानस्थ हो गए हैं। इस तरह से सबको अनुभूति होती होगी।
वराहनगर मठ के आंतरिक भाग का विवरण
इसके बाद में थोड़ा सा इन्हीं का विजानंद जी का डिस्क्रिप्शन वही शशि महाराज का जो सेवा है इसके बारे में थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं। अ पहले तो मठ का थोड़ा सा डिस्क्रिप्शन और चलता है। कल तो हमने देख लिया कि किस तरह से मठ में जो घर भाड़ा लिया था मठ बनाने के लिए वो बाहर से नहीं दिखता था। आपको गेट क्रॉस करके एक खुला मैदान जैसा था। गार्डन जैसा चौगान जैसा था। उसको क्रॉस करके आपको मकान के भीतर में जाना है। तब कहीं जाकर के आपको यह सब मठ वगैरह दिखेगा। उसमें भी ग्राउंड फ्लोर था। वह तो पूरा जंगल बन चुका था। यह सियाल है ना कि सांप है वगैरह सब वहां पर रहते थे। किंतु फर्स्ट फ्लोर के ऊपर में कुछ रहने लायक कमरे थे। तो वहां पे मठ की स्थापना हुई थी। वहां पे थोड़ा सा आप देखेंगे कि ठाकुर घर था। फिर ठाकुर घर के लिए जो जुगाड़ करना होता है पूजा के लिए उसका एक घर कमरा था उसके बाद में किचन था फिर यह जो दानादेर घर अर्थात कि दानवों का कमरा जहां पे भी सभी गुरु भाई बैठकर के जब ध्यान साधन भजन चर्चा विचारणा वाद विवाद सब किया करते थे वो दानवों का कमरा था इसके बाद में एक अंधियारा पैसेज जैसा था वो क्रॉस करके जाएंगे तो टॉयलेट था और फिर नीचे जाने के लिए सीढ़ी जैसा था। तो यह एक डिस्क्रिप्शन हमने देखा कल। अभी यह जो और थोड़ा सा डिस्क्रिप्शन वीरानंद जी हमको कहते हैं क्या कहते हैं? होल घरे एक धारे एकटी काठेर तख्तापशेर ऊपर खानिक संस्कृत बांग्ला और किछू अंग्रेजी ब ऊपर ऊपर शारी करे राखा छिलो होल घर अर्थात कि यह दानवों का घर उसके एक कोने में एक लकड़ी की खाट के ऊपर में कुछ किताबें हैं। जैसे कि संस्कृत है, बंगाली है, कुछ इंग्लिश है। इस तरह की कुछ किताबें उसका एक ढग बना के एक जगह पे इसी लकड़ी के बेड के ऊपर में रखी हुई थी। बाकी टाई बाया तबला मृदंग खोल करताल था। तो यह जो बेड था लकड़ी का जो खाट थी लकड़ी की उसकी एक ओर किताबों का ढग पड़ा रहता था। तो दूसरी ओर दूसरी कॉर्नर में यह जो म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट है वो पड़े रहते थे। जिसमें कि तबला है, मृदंग है, खोल है, कर्ताल है वगैरह। और कहते हैं काछेर देवाले पेरे के टांगानो तानपुरा और पास की ही एक दीवार उसमें एक नेल मारा हुआ है। खिली मारी हुई है। उसके ऊपर में एक तान पूरा है। उसको टगाया हुआ है। होल घर साधु देर शयन घर छिलो। यह जो होल घर था दानवों का कमरा वही था साधुओं का शयन कक्ष दर्शक और भक्तरा ऐसे बसे कथा वार्ता हो तो यदि कोई दर्शक है या भक्त है वह आएगा तो वहीं पर बैठकर के वार्तालाप होगा परंतु उहाश काज व्यवहार हो तो अर्थात कि यह जो होलघर था वह सब कार्य के लिए वही व्यवहार होता था बिछानार मध्य मादुर ओ एकटी करे छोट बालिश किस तरह का बिछाना था तो एक कारपेट जैसा था और कारपेट के ऊपर में छोटे से यह बालिश अर्थात कि कुश ये कहते पिलो पिलो थे एक-एक जनेर शारी पाता था तो प्रत्येक का एक-एक पिलो था जो कि एक लाइन में उसको बिछाया हुआ था आगंतुक देर जन बा अन्नत्र बिछा बार जन दो चार खानी माधुर छिलो लो जो कोई गेस्ट आते थे या तो फिर और कोई पपस होता था उसके लिए जमीन पर बैठने के लिए दो-तीन और एक चटाई जैसा कुछ था बा तारा मेझेते ही बजते और चटाई की व्यवस्था नहीं होगी तो वैसे ही फर्श के ऊपर में ही बैठ जाते ठाकुर घरे माच खाने ठाकुर बिछाना भूमिर ऊपर मादुर गोदी बालिश चादर दिए करा छी लो ठाकुर घर अर्थात कि गर्भग्रह के भीतर में बीच में ही सेंटर में ही ठाकुर का बिछाना किया हुआ था। ठाकुर का बेड किया हुआ था। वह किस तरह से बेड बनाया था? सबसे पहले तो फर्श के ऊपर में एक चटाई बिछा दिया था। उसके ऊपर में गद्दी बिछा दी गई थी। उसके ऊपर में एक पिलो रखा था। और फिर इस पूरे को चद्दर से पूरा ढक दिया था। और ठाकुर फोटो छिलो और इसी के ऊपर में ठाकुर का फोटो रखा था बिछानार पाद देशे ठाकुर अस्थिर ताम्र कौटा ओ पादुका चौकीते राखा छिलो और यह जो बेड था उसके जो नीचे की साइड में पाद देशे अर्थात कि जहां पे सर रहता है सोने के समय जहां पे पिलो रखा है वहां पे यह पिलो के पास में ठाकुर का फोटोग्राफ था और उसका जो पैर रखने का जो साइड साइड था। वहां पे ठाकुर का जो यह यह था अस्थिर ताम्र कौटा अर्थात कि ठाकुर की अस्थि का जो जिस ताम्र के पात्र में ठाकुर की अस्थि रखी थी जिसको कि स्वामी जी आत्माराम कहते थे तो वह आत्मारामर कौटा या तो फिर आत्माराम का पात्र एक ताम्र का पात्र जिसमें कि ठाकुर की अस्थि रखी हुई थी वो वहां पर रखा था और फिर ठाकुर की पादुका जो है वो ये दोनों एक टेबल के ऊपर में रखे हुए थे। कोषाकुशी और ताम्रकुंडे सामने बोशे शशि महाराज नित्य पूजा आद करते और इसी के सामने कोषाक कुशी और ताम्रकुंड जो था उसके सामने बैठकर के शशि महाराज नित्य पूजा करते। यह हो गया वराह नगर मठ का डिस्क्रिप्शन समाप्त। अभी
भाव में मत्त आरती करते रामकृष्णानन्दजी ताल ताल पे हुंकार देते हुए उद्दाम नृत्य करते है
देखिए यही विजानंद जी शशि महाराज की आरती जो है उसका सुंदर डिस्क्रिप्शन देते हैं और इसीलिए देखिए शशि महाराज के बारे में जो प्रसंग है उसका पाठ करने से पहले पहले ही हमने देख लिया कि यहां पे जो उनकी इमेज प्रकट होती है तो उसका यह जो एक जो कहते [गला साफ़ करने की आवाज़] हैं ना सिक्के की दोनों साइड होती है। यहां पे गुरु महाराज को संपूर्ण जो लोग ने अपना आत्मसमर्पण कर दिया है। इस तरह के स्वामी रामकृष्णानंद और दूसरी ही ओर है अपना खुद का सेल्फ सैक्रिफाइस करना वह वाले शशि महाराज यानी सिक्के की दो बाजू है एक और है गुरु महाराज को ठाकुर को समर्पित शशि महाराज दूसरा कि आत्मबलिदान देते हुए शशि महाराज ये दोनों जो उन्हें जो साइड है उसको सामने रख के अभी ये डिस्क्रिप्शन पढ़ना है। क्या कहते हैं वीरजानंद जी महाराज? भविष्य के रामकृष्ण संघ के प्रेसिडेंट। वह क्या कहते हैं? उस समय ब्रह्मचारी ही थे। 1891 के आसपास का यह डिस्क्रिप्शन है। यह डिस्क्रिप्शन देने के समय स्वामी जी तो प्रवृज्जा के लिए निकल गए थे। किंतु हमको नहीं लगता कि वराह नगर मठ के प्रारंभ के जो दिन थे वहां से और यह 4 साल के बाद में बहुत ज्यादा कोई चेंज आया होगा। बोलकर के ही भले ही चाहे हम वराह नगर मठ के प्रारंभ के दिनों की ही चर्चा कर रहे हैं। 1891 की यह घटना यहां पे ही डिस्कस कर लेते हैं। क्या कहते हैं विजानंद जी? शशि महाराज संध्याय आरती कोरा एकटा अपूर्व व्यापार और देख बार जिन छिलो शशि महाराज की संध्या आरती करना एक अपूर्व घटना थी और देखने की एक घटना सुंदर एक देखने का नजारा था जोखन तनी धूप धना खोल करताल बा मध्य आरती शेष भागे चामर व्यजन करते भाे उन्मत्त होए जय गुरुदेव श्री गुरु गुरुदेव बोले भीषण हुंकार दिए ताले ताले उदाम नृत्य करे एक दिक थेके अन्य दिक परजन तो नेचे नेचे घरे फिरतेन तोखन शकले मध्य की एक अपूर्व भक्ति भाव आवेश होतो ता कोथाई प्रकाश करा जाए ना जब वो धूप धना खोल करताल वध्य के मध्य में आरती के शेष भाग में चामर व्यजन करते करते भाव में उन्मत्त होकर के जय गुरुदेव श्री गुरुदेव बोलते बोलते भीषण हुंकार करते करते ताल ताल पे उदाम नृत्य करते करते एक ओर से दूसरी ओर नाचते नाचते नृत्य करते करते फिरते तब सबके भीतर में क्या एक अपूर्व भक्ति भाव का आवेश होता वह बातों में प्रकाश नहीं कर सकते हैं। यहां पे वह हमको रामकृष्ण संग की संध्या आरती आपने अटेंड की होगी तो धे ध दे धे वह जो लंग रंग भंग बोल कर के वह जो चालू होता है हमको पता है कि स्वामी जी ने वो ध्रुपद जो ताल है उसमें वो जो स्टार्टिंग के जो कुछ तो श्लोक है खंडन भव बंधन वगैरह वो तो है धीरे से गाने वाले हैं वो तो ध्रुपद ताल के हैं किंतु उसके बाद में वो जो धे धे लंग रंग भंग वो जो चालू होता है तो यहां पे इसलिए लिखा है कि आरती के आखिरी भाग में जब यह खोल करता जोर-जोर से बजते बजने लगते तब जय गुरुदेव श्री गुरुदेव बोलते बोलते शशि महाराज जब चामर व्यजन करते तब किस तरह के उदाम नृत्य करते करते घूमते और शशि महाराज जो हुंकार देते देते जय गुरुदेव श्री गुरुदेव ऐसा जो हुंकार करते तो वो आरती देख के भक्तों के हृदय में किस तरह का भक्ति का संचार होता उसका वर्णन करना असंभव है। देखिए कि मास्टर महाशय ठाकुर के नृत्य का वर्णन करते हैं। हम सबको पता है कि ठाकुर का कोमल अंग था और उन्होंने मधुर भाव की साधना की थी और ठाकुर हमको यह भी पता है जब नर्तकी का अभिनय करते तो यह लड़के सब हंसते-हंसते जमीन पर रेंगने लगते जमीन पर लेट जाते। इतना सुंदर रूप से ठाकुर का वो नर्तकी का अभिनय कर सकते हैं। अर्थात कि एक स्त्री सुलभ जो मधुरता और लालित्य जो होना चाहिए, वो ठाकुर के श्री अंग में था ही था। अभी जब हम यह सोचेंगे कि ठाकुर नृत्य करेंगे तो कैसे करेंगे। हमको यही एक आएगा कि स्त्री सुलभ वो जो स्टाइल होती है उसी तरह से ठाकुर नृत्य करेंगे ना किंतु नहीं। देखिए कथामृतकार मास्टर महाशय स्पष्ट रूप से लिखते हैं सिंह विक्रम से ठाकुर नृत्य कर रहे हैं। अर्थात कि यह जो महादेव का तांडव नृत्य किस तरह से होता है उस तरह से पौरुष से सभ नृत्य सिंह विक्रम वाला नृत्य ठाकुर करते थे। अभी हमने देखा नहीं उस समय यह मोबाइल वगैरह तो थे नहीं कि उसका वीडियो ले ले। अभी हमको तो अनुमान ही करना है किस तरह का होगा। किंतु यह नृत्य ठाकुर का सिंह विक्रम वाला नृत्य शशि महाराज ने देखा था। बोलकर के यहां पे वो जो भीषण हुंकार करते-करते ताल ताल पे उद्दाम नृत्य कर रहे हैं। तो जिन्होंने ठाकुर का दर्शन किया होगा। ठाकुर के यह सिंह विक्रम वाला नृत्य का दर्शन करने का सौभाग्य मिला होगा। उनको बिल्कुल ऐसा लगता होगा कि वे लोग भी फिर से ठाकुर वहां पर उपस्थित हुए हैं और इनके भीतर में इनके माध्यम से ठाकुर स्वयं नृत्य कर रहे हैं। महादेव का वो डमरू वाला नृत्य नहीं कि ये स्त्री सुलभ जो नृत्य होते हैं। तो यहां पे भी इस तरह का पौरुष सबर इस तरह का साधन भजन से भरपूर त्याग वैराग्य से भरपूर उद्धाम नृत्य जब करते हुंकार देते देते जय गुरुदेव श्री गुरुदेव इसका नारा लगाते तो लोगों के हृदय में से दर्शकों के हृदय में से कामना वासना होगी वो कहां अदृश्य हो जाती देखिए आजकल हम लोगों को साल साल भर जप ध्यान करके जो थोड़ा बहुत पुण्य मिलता है। वह इस तरह का एक यदि आरती देख ले शशि महाराज का तो सालों सालों भर का जो हमारा जो दु अपना यह है दुष्कर्म जितना भी है यह कर्म का जितना संस्कार है दुसंस्कार है वह कहां कट जाएगा पता नहीं चलेगा तो यहां पे भी कथाई प्रकाश को जाएना अपूर्व भक्ति भाव आवेश हो तो इस तरह का अपूर्व भक्ति भाव का आवेश होता जिसको कि हम बातों में प्रकाश नहीं कर सकते हैं। शमोस तो बाटी थी मने हो तो जेनो कांप छे जैसे पूरा घर जो था ऐसा लग रहा था कि धुज रहा है। जैसे देखिए वराह नगर जो जो मकान था वो तो काफी बड़ा था किंतु इस तरह से शशि महाराज नृत्य करते कि जैसे कि पूरा मकान धुज रहा है। दर्शकरा पासे ठाकुर भांडार घोर होते तार शंगे समश्वरे जय गुरुदेव श्री गुरुदेव उच्चारण करते करते आबेगे नृत्य करते और फिर शशि महाराज ही नहीं जो लोग दर्शक थे वे लोग भी पास में ठाकुर का भंडार गह है वहां पर खड़े रहते रहते उनका दर्शन करते ठाकुर का और समरे एक स्वर में जय गुरुदेव श्री गुरुदेव का उच्चारण करते करते करते आवेग पूर्ण नृत्य करते परे शकले भूमिष्ट होए प्रणाम कोरे गुरु गीता होते अज्ञान तिरंदस्य ज्ञानजन शलाकया चक्षुर उन्मिलितम येनम तस्मै श्री गुरुवे नमः इत्यादि कटी श्लोक ओ शेषे पूजनीय स्वामी अभेदानंद जी बिरचित एक स्तबेर शेष अंश निरंजनम नित्यंम अनंत रूपम भक्तानुकंपा धृत विग्रहं व ईशावतारम परमेशम तम राम कृष्णम शीर्ष नमाम आवृत्ति करतेन और जय श्री गुरु महाराज जी की जय बोले शेष करते ये उस जब यह नृत्य वगैरह समाप्त हो जाता बाद में सब लोग भूमिष्ट होकर के साष्टांग प्रणाम करके उसके बाद में गुरु गीता में से अज्ञान तिरंदस्य ज्ञानजन शलाकया इत्यादि कुछ श्लोकों का पाठ करते आखिर में पूजनीय स्वामी स्वामी अभेदानंद जी रचित एकटी एक स्तव का आखिरी अंश निरंजनम नित्यम इसका पाठ करते और फिर जय श्री गुरु महाराज जी की जय बोलकर के आरती को समाप्त करते हैं। प्रथम प्रथम काशीर विश्वनाथर आरती भज शिव ओमकार इत्यादि स्टबोटी शकले सुर करे खोल कर्ताल शोकारे गायतेन चामर व्यजनेर समय थेके जय गुरुदेव श्री गुरुदेव बोले माता माती हो तो प्रथम प्रथम काशी विश्वनाथ की आरती का भज शिव ओमकार वगैरह स्तव सब लोग सुर करके खोल करताल के साथ गाते और जब चामर व्यजन चालू होता तब से लेकर के जय गुरुदेव देव श्री गुरुदेव बोलकर के मातामाती होती। यह माता-माती बंगाली शब्द है। अर्थात कि वहां से ही यह उदाम नृत्य भाव का जो आवेश है वो प्रारंभ होता। इसलिए कहते हैं तब से यह माता-माती स्टार्ट होती है। यह हो गया शशि महाराज का
वराहनगर मठ में रामकृष्णानन्दजी मन-प्राण समर्पित कर श्री रामकृष्ण की सेवा-पूजा करते है
डिस्क्रिप्शन। अभी देखिए कि इसी तरह से स्वामी जी के जो छोटे भाई हैं महेंद्रनाथ दत्त उनका भी इसी तरह का एक डिस्क्रिप्शन है शशि महाराज का तो उसका थोड़ा सा पाठ कर लेते हैं। क्या कहते हैं महेंद्रनाथ श्री श्री रामकृष्ण देव शरीर थाकी ते जे जे समय जे जे कारतेन एवं जे वस्तुटी भोजन कर तेन शशि महाराज तहां के प्रत्यक्ष सोशरे वर्तमान बोध करिया से रूप भावे भोग पान और तमाक देते लाले ठाकुर अपना देह रहते रहते जो जिस समय पे जो कार्य करते और जिस चीज का आहार करते जिस खाने का आहार करते हैं। शशि महाराज उनको इसी तरह से प्रत्यक्ष ठाकुर जैसे कि सशरीर वर्तमान है। इस तरह से उसी तरह जो ठाकुर की सेवा करते इसी तरह से भोग है, पान है, तंबाकू है वगैरह देने लगे। अर्थात कि शशि महाराज तो पता है कि ठाकुर का आखिरी दिनों में उनकी बहुत सेवा की है। तो ठाकुर का जो रूटीन था, जिस तरह से आहार का रूटीन था, जिस तरह से दैनिक रूटीन था, उसी रूटीन को जैसे कि शशि महाराज अब भी ठाकुर की सेवा उसी रूटीन के अनुसार करते हैं। जिस समय ठाकुर आहार करेंगे, जिस चीज का आहार करेंगे, उसी चीज को उसी समय प्रस्तुत रखेंगे। जिस समय ठाकुर पान खाएंगे, उस समय उनको वही पान देंगे। जिस समय तंबाकू का सेवन करेंगे उस समय उसी तरह तंबाकू उनके सामने प्रस्तुत करेंगे। तो जैसे कि ठाकुर सदैव वर्तमान है। इस तरह से शशि महाराज ठाकुर की सेवा करते थे। यह ठाकुर को पान देने की बात से वही मां वाली कहानी कि मां दो तरह के पान बना रही है। एक तरह का पान है जो सादा पान है। दूसरे तल का पान है जिसमें कि इलायची है, किशमिश है वगैरह सब रखा हुआ है। तो योगिन मां ही मोस्ट प्रोबेबबली वहां पर खड़ी थी। तो मां को पूछा कि मां यह सादा पान किस लिए? और यह स्पेशल पान जो बनाया है वह भी किसके लिए है? तो मां ने कहा सादा पान है ठाकुर के लिए। वो तो अपने है ही है। उनको तो सादा पान देंगे तो भी तो उनको कोई और कोई उपाय नहीं है। ठाकुर के पास में ऑप्शन नहीं है। मां पान देती है नहीं अच्छा लगता है तो मां बोलेगी अच्छा ठीक है और कहां से ले आओ अच्छा पान कहां जाएंगे बेचारे ठाकुर मां जो सेवा करती है ग्रहण करनी है। किंतु जब भक्त लोग हैं उनको तो हमको अच्छा पान खिला के अपना बना लेना है। तो यह मां का लॉजिक था। अभी ये शशि महाराज का क्या लॉजिक था पान देने में वो तो पता नहीं किंतु यहां पे इतना तो वर्णन है कि ठाकुर के रहते रहते जिस तरह का पान वो खिलाते थे उसी तरह का पान यहां पे भी शशि महाराज देते थे मंत्र होलो जय गुरुदेव श्री गुरुदेव जय गुरुदेव श्री गुरुदेव इत्यादि और जो भोग अर्पण करते हैं पान जो अर्पण करते हैं तो मंत्र पाठ तो करना पड़ेगा अपनी हिंदू विधि में तो ऐसा है कि प्रत्येक कार्य के साथ में एक मंत्र संश्लिष्ट रहता है। एक मंत्र एसोसिएट रहता है। तो मंत्र क्या है? जय गुरुदेव श्री गुरुदेव। जय गुरुदेव श्री गुरुदेव। यह लगता है कि शशि महाराज का स्टैंडर्ड मंत्र है। तो इत्यादि एवं गुरु स्तव पाठ करते। यह इस तरह का मंत्र और साथ-साथ में ही गुरु स्तव पाठ करते हैं। आर रात्रि काले शशि महाराज जोखन पंच प्रदीप नाड़ी तेन और मुखे जय गुरुदेव श्री गुरुदेव शब्द उच्चारण करी तेन तोखन ताहार कंठ होइते एक गंभीर नाद बाहिर हो तो और जब रात्रि के समय में संध्या के समय में शशि महाराज जब पंच प्रदीप घुमाते घुमाते आरती करते और मुंह से जय गुरुदेव श्री गुरुदेव का उच्चारण करते तब उनके कंठ से एक गंभीर नाद प्रगट होता तनी विभोर उन्मत्त गंभीर स्वरे शब्द टी ए रूप भा उच्चारण कर तेन जे दिन मंडल कंपित होई तो शशि महाराज भाव में विभोर होकर के भाव में उन्मत्त होकर के गंभीर स्वर से इस शब्द का इस मंत्र का इस तरह से उच्चारण करते कि जैसे कि पूरा आकाश और गगन मंडल जो है कंपित हो जाता एवं से गंभीर शब्द बहुर होते श्रुत हो तो और यही गंभीर शब्द है गंभीर निनाद जो है कहां दूरदूर से आपको श्रवण होता गृह प्राचर और जानाला समूह है शनाद प्रतिध्वन तो हो तो यह घर का यह जो दीवाल है यह जो खिड़की है उससे टकरा करके यही गंभीर निनाद जैसे कि प्रतिध्वनित होता ए रूप एकाग्र चित्ते उन्मत्त भावे पूजा करीते अति अल्प दृष्ट होए। इसी तरह एकाग्र चित्त से उन्मत्त भाव से पूजा करते हुए बहुत ही कम लोगों को देखा जाता है। शशि महाराज बोयस तो 25 26 वर्ष देहो लंबा और पातला शशि महाराज की उम्र थी उस समय 25 26 साल 25 26 के आसपास में देह था लंबा और पतला स्मशु अल्प अल्प आय अर्थात कि बियड जो है दाढ़ी के बाल जो है दाढ़ी और मूछ के बाल वो भी थोड़े-थोड़े से हैं एवं बर्ण गौर और देह था वो उज्जवल वर्ण था गौर वर्ण था शेष बयोश जे स्थूलका चेहारा जुबा ता छिलोना आखिरी आखिरी समय के शशि महाराज के जो फोटोग्राफ देखेंगे तो स्थूलकाय चेहरा और स्थूलकाय शरीर उनका दिखता है किंतु प्रारंभ के दिनों में इस तरह का नहीं था लंबे थे पतले थे और फिजिकली और मेंटली फिट भैरव की तरह थे तो देखिए कि यह शशि महाराज का वहां पे पूजा करने का आरती करने का सुंदर विवरण यह जितना भी विवरण पढ़ते हैं देखिए कि सिर्फ ठाकुर के समय के ही नहीं बात बाद बात बाद बात के समय की यह जो सब घटनावली है जितना ही हम पाठ करते जाएंगे भले ही चाहे हमको यह सौभाग्य नहीं मिला कि शशि महाराज आरती करते हैं और हम वहां पर खड़े रहते देखते हैं यह सौभाग्य यदि नहीं भी मिला है तो यह कहानियों का पाठ और श्रवण करने का जो सौभाग्य मिलता है हमको मुझे लगता है इसी से जो आधे पाप हमारे भाग जाएंगे तो ये शशि महाराज की आरती और इसके बाद में भी और भी बहुत सारी घटनाएं जो कि स्वामी जी का जो नेक्स्ट क्लास होगा उस समय हम देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु इंटरेस्टिंगली किसी ने मां को पूछा कि जिसका अपघात मृत्यु होता है और वह जो भूत बनता है और यह जो शिव के जो भूत थे वह एक ही की अलग-अलग तो मां कहती है नहीं बेटा बेटा वो अलग-अलग है। तो मुझे ऐसा लगता है कि शुरू शुरू में वह अपघात मृत्यु वाले भूत थे। बाद में सब यह शिव वाले भूत आ गए होंगे। [हंसी] जब योगेंद्र महाराज का महासमाधि हुआ था उस समय मां ने कहा था कि मकान की एक ईंट टूटी है। अभी धीरे-धीरे करके पूरा मकान टूट जाएगा। तो यह सेंटेंस हम जब डिस्कस कर रहे थे तो हमने कहा देखा था कि ऐसा नहीं है कि पूरा रामकृष्ण संघ गिर जाएगा। बात यही है कि जो ओरिजिनल डिसाइपल थे ठाकुर के उनके भीतर में अभी एक के बाद एक जाने का समय हो चुका है। तो शशि महाराज उसमें से एक नेक्स्ट कड़ी थे।