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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life & Teachings 20 may 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते

Saradakosh: Its scope and background

नमः हमने एक बार डिस्कस किया था शारदा कोष यह जो मेरा प्रोजेक्ट है लॉन्ग रनिंग प्रोजेक्ट कहो ना कि ऑब्सेशन कहो काफी लंबे समय से मैं यह सोच रहा था कि यदि रामकृष्ण विवेकानंद मां शारदा देवी का यह जो साहित्य है उनका जो लाइफ एंड टीचिंग्स है और फिर सिर्फ ठाकुर मां स्वामी जी ही नहीं बाकी जो जितने भी डायरेक्ट डिसाइपल है 15 डायरेक्ट डिसाइपल प्लस स्वामी जी तो देखिए कि इन 18 लोगों का लाइफ और टीचिंग्स उसको यदि हम सिस्टमेटिक स्टडी करें तो रामकृष्ण संघ के बारे में बहुत सारी इंसाइट्स हमको जानने को मिलेगी। अभी जो परिस्थिति है यह जितना भी साहित्य है बहुत सारी किताबों में वह बिखरा पड़ा हुआ है। ठाकुर का जीवन है ठाकुर की किताब में उनका टीचिंग्स वगैरह देखने को मिलेगा कथामृत में। लाइफ है लीला प्रसंग में। मां का जीवन है गंभीरानंद जी द्वारा लिखित श्री मां शारदा देवी। इसके अलावा भी अक्षय कुमार या तो फिर इस तरह से काफी मां के जीवन के बारे में लिखा गया है और मां के जो टीचिंग्स है उसका कलेक्शन मां की बातें या तो फिर यह मायर पदप्रांत या तो फिर मां के जो डिसाइपल्स है श्री मां ओ जय राम भाटी वगैरह जो किताबें हैं उसमें वो काफी कुछ बिखरा पड़ा हुआ है। स्वामी जी का तो पूछना ही नहीं है। स्वामी जी के ऊपर में ऑथेंटिक किताबें यदि हम देखें तो इतनी सारी है। पहले तो दो बायोग्राफी है। दोनों ऑथेंटिक है। एक तो इंग्लिश बायोग्राफी लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानंद बाय हिज ईस्टर्न एंड वेस्टर्न डिसाइपल्स। दूसरा कि बंगाली बायोग्राफी युगनायक विवेकानंद बाय स्वामी गंभीरानंद। इसके अलावा स्वामी जी के बारे में स्वामी जी के जो ऑथेंटिक टीचिंग्स हैं दे आर ऑल कलेक्टेड इन द कंप्लीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद। इसके अलावा देखें तो फिर स्वामी विवेकानंद इन द वेस्ट न्यू डिस्कवरीज के छह वॉल्यूम है। इसके बाद में रेमिनेशंस ऑफ स्वामी विवेकानंद है। बंगाली में भी है। इंग्लिश में भी है। तो और फिर स्वामी विवेकानंद इन इंडियन न्यूज़ पेपर वो एक काफी एक बहुत बड़ा कलेक्शन है। सो और फिर डायरेक्ट डिसाइपल के बारे में यदि आप जाएंगे तो इतनी सारी किताबें जिसको कि हम ऑथेंटिक कह सकते हैं रेमिनेशंस का कलेक्शन फिर यह प्रभानंद जी द्वारा लिखित जो दो मेजर बायोग्राफीस है शारदानंद चरित और ब्रह्मानंद चरित और इसके बाद में चेन्नई मठ ने भी रिसेंटली शशि महाराज स्वामी रामकृष्णानंद जी की उसके उपलक्ष में तिथि पूजा के उपलक्ष में यह एक पूरा कलेक्शन पब्लिश किया है। अखंडानंद जी के राइटिंग्स और लेटर्स का एक बहुत बड़ा कलेक्शन है। महापुरुष महाराज के बारे में महापुरुष महाराज की काफी स्मृति कथाएं देवलोके वगैरह किताबें हैं। सो हमको पता है कि हमारा साहित्य हमारी जो क्रोनोलॉजी है जो फर्स्ट 100 इयर्स की ठाकुर के जन्म से प्रारंभ करके 1836 1836 से प्रारंभ करके 1936 जबकि 1836 में श्री रामकृष्ण देव का जन्म हुआ। वह पृथ्वी पर अवतरित हुए और 1936 में बेलूर मठ में मुख्य मंदिर श्री रामकृष्ण देव का है मेन टेंपल यूनिवर्सल टेंपल उसका क्सिक्रेशन हुआ उसकी स्थापना हुई और फिर उसके बाद में कुछ ही समय के बाद में विज्ञानानंद जी महाराज और काली महाराज की महासमाधि हुई। इफ आई रिमेंबर करेक्टली विज्ञानानंद जी महाराज आई थिंक 19367 में ही चल बसे और फिर काली महाराज अभेदानंद जी 38 के आसपास में गए हैं। उनकी महासमाधि हुई है। काली महाराज इज द लास्ट डायरेक्ट डिसाइपल टू लीव हिज बॉडी। तो हम लोग किंतु यह कट ऑफ डेट 1936 तक का रखते हैं। 1836 टू 1936 तो जितने भी अपने हैं ठाकुर मां और 16 डायरेक्ट डिसाइपल इन सबका जीवन इन सबकी वाणी इन सबका उपदेश इन सबके रेमिनेशंस यदि आप विदिन वन सिस्टमेटिक फॉर्मेट आप यदि स्टडी करेंगे यदि आप उसको उसके बारे में चिंतन करेंगे तो रामकृष्ण संघ का जो फाउंडेशन है फिलॉसोफिकल स्पिरिचुअल बोथ फाउंडेशन स्प फिलॉसोफिकल एज वेल एज स्पिरिचुअल फाउंडेशन तो हमको काफी इंसाइट्स भी मिलेगी और अपना एक लाइफ टाइम का एक स्टडी भी हो जाएगा। आखिर में जो ठाकुर के जो डिसाइपल्स हैं, ठाकुर के जो शिष्य हैं, उनको आखिर में करना क्या है? यह लीला चिंतन ही तो है हमारी एक मुख्य साधना। तो इस तरह से यह प्रोजेक्ट या तो यह मेरा ऑब्सेशन यह काफी दिनों से चलता आ रहा है। मैं कभी-कभी इसके ऊपर काम करता हूं। कभी-कभी छोड़ देता हूं। व्हाटएवर अभी मैंने सोचा है कि फिर से इसके ऊपर में काम प्रारंभ किया जाए और स्पेसिफिकली यह जो स्वामी जी का जो जीवन है उसको एक बार लिया जाए क्योंकि सबसे ज्यादा देखिए कि किताबें या तो सबसे ज्यादा लिटरेचर स्वामी जी के लाइफ और टीचिंग के ऊपर में ही है। ठाकुर के बारे में जो कुछ भी ऑथेंटिक है वह तीनचार किताबों में ही आ जाएगा। सर्वप्रथम तो श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग उनका ऑथेंटिक बायोग्राफी और इसके साथ में श्री श्री रामकृष्ण पंथी को भी आप गिन सकते हैं और टीचिंग्स के बारे में यदि देखें तो श्री श्री रामकृष्ण कथामृत है और फिर एक और किताब है श्री रामकृष्ण के जय रूप देख श्री रामकृष्ण को जैसा हमने देखा जिसमें कि सभी काफी सारे रेमिनेशंस का कलेक्शन है इसके बाद में भी कुछ-कुछ रिसर्च सर्च बुक्स है ब्राह्म और क्रिस्टान अनुयाई दे चौके श्री रामकृष्ण ऐसा करके एक है कि ब्राह्म और ये जो बाकी जो डिसाइपल जो कि ठाकुर के समकालीन थे उन्होंने ठाकुर के बारे में क्या लिखा अपनी पत्र पत्रिकाओं में तो केशवसेन क्या लिखता था या तो फिर अन्य ब्राह्म समाज उनके बारे में क्या लिखते थे तो उनके एक दो कलेक्शन है इस तरह के तो दिस इज फेयरली लिमिटेड लिटरेचर ऑथेंटिक लिटरेचर उसके बाद के साधुओं ने चिंतकों ने फिलॉसोफर्स ने ठाकुर के बारे में जो लिखा है उसका तो अंत ही नहीं है किंतु जिसको हम प्राइमरी टेक्स्ट गिनेंगे कि जो कुछ भी आज मुझे ठाकुर के बारे में लिखना है बोलना है तो यही कुछ तीनचार किताबों के आधार करके ही कि तीनचार किताबों के ऊपर में भरोसा करके ही मुझे कुछ कहना पड़ेगा। मैं अपने दिमाग में से अपनी इमेजिनेशन में से नया कुछ प्रोड्यूस नहीं कर पाऊंगा। तो सिमिलरली मां का है मां के बारे में भी वैसे ठाकुर से तो ज्यादा किताबें हैं वो श्री मां ओ जय राम भाटी फिर यह जो मायर पद प्रांत के चार वॉल्यूम है फिर यह चेतनानंद जी का एक कलेक्शन है मां की स्मृति कथा का गंभीरानंद जी का तो है ही है और फिर यह मायर कथा भी है अक्षय कुमार का है तो अक्षय कुमार सेन हां अक्षय कुमार घोष व्हाटएवर तो उसका है तो अक्षय चैतन्य सॉरी अक्षय चैतन्य ब्रह्मचारी अक्षय चैतन्य तो इस तरह से मां का भी फेयरली लिमिटेड लिटरेचर है किंतु स्वामी जी का है कि विराट लिटरेचर है जिसको कि हम फिर भी ऑथेंटिक गिन सकते हैं। स्वामी जी के समय के ही न्यूज़ पेपर रिपोर्ट्स है। स्वामी जी के समय के इतने सारे रेमिनेशंस है। स्वामी जी के समय का कितना सब कुछ है जिसको कि हम प्राइमरी सोर्स गिन करके उसके ऊपर में अपने आइडियाज बिल्ड अप कर सकते हैं। तो मैंने सोचा कि क्यों नहीं स्वामी जी का लाइफ एक नया टॉपिक प्रारंभ किया जाए। किंतु जिस तरह से हम मां का लाइफ स्टडी करते आ रहे हैं अभी तक क्योंकि मां का जीवन तो एक ही प्राइमरी टेक्स्ट के ऊपर में डिपेंडेंट है गंभीरानंद जी का मां का जीवनी तो स्वामी जी का किंतु ऐसा नहीं है। पहले तो दो ऑथेंटिक बायोग्राफी वैसे भी है। एक बेंगली में है। एक इंग्लिश में है और इसके बाद में इतना सब कुछ लेटर्स और फिर ये राइटिंग्स और फिर ये लेक्चर्स और फिर ये न्यू डिस्कवरीज वगैरह-वगैरह रेमिनेशंसेस। तो मैंने सोचा कि स्वामी जी का जीवन यदि हम स्टडी करते हैं तो किसी प्राइमरी सिंगल टेक्स्ट के ऊपर में डिपेंड नहीं करके एज ए होल जितनी भी टेक्स्ट है उन सभी टेक्स्ट में से जो रिलेवेंट पैसेज है कोई भी रिलेवेंट इवेंट के साथ में इन सबको एक जगह पे कलेक्ट किया जाए और फिर उसका क्रोनोलॉजिकल एक सिस्टम बना करके उसको स्टडी किया जाए। यह जैसे कि शारदा कोष के पीछे का जो बेसिक आईडिया यही है। अभी आपको जैसे कि ठाकुर दक्षिणेश्वर में थे तो उस समय की यह जो आनंद यह जो आनंदेर हार्ट जो कि ठाकुर ने बिठाई थी आनंद का बाजार जो ठाकुर ने वहां पर बिठाया था दक्षिणेश्वर में उसके बारे में प्राइमरी सोर्स आपको बहुत सारे मिल जाएंगे। गंभीरानंद जी का यह जो भक्त मालिका है उसमें अभी देखिए प्राइमरी सोर्स के रूप में हमको तो पता है कि कथामृत है फिर लीला प्रसंग तो है ही है किंतु साथ-साथ में ही मां के जीवन मां का भी जीवन है। फिर यह स्वामी जी का भी जीवन है। फिर यह भक्त माली का भी है। फिर यह जो डायरेक्ट डिसाइपल के और जो रेमिनेशंस है कि हां हमने दक्षिणेश्वर में ऐसा किया दक्षिणेश्वर में ठाकुर के साथ में ऐसी सब बातें हुई थी। तो यदि हम सिर्फ एक ही पीरियड लें कि ये दक्षिणेश्वर में आनंद की हार्ट जो ठाकुर ने बिठाई थी उसके बारे में जितनी भी किताबें हैं उस सभी किताबों में से मटेरियल इकट्ठा करके हम एक साथ में यदि उसका स्टडी करें तो विल बी अ मच बेटर।

Two ways to study our literature: book by book or period by period

देखिए अपना लिटरेचर स्टडी करने के दो तरीके हो गए। एक तो है कि आप एक पर्टिकुलर किताब लेकर के उसको आप स्टडी करते हैं कि हां चलो लीला प्रसंग मैंने प्रारंभ किया तो उसका साधक भाव चल रहा है अभी हमारा तो साधक भाव को लेकर के हमने पूरा डिस्कशन किया फिर यह गंभीरानंद जी का मां का जीवन चल रहा है तो वो लेकर के स्टेप पेज आफ्टर पेज लाइन आफ्टर लाइन पैराग्राफ आफ्टर पैराग्राफ हम स्टडी कर रहे हैं स्वामी जी का यह जो है माय माय प्लान ऑफ कैंपेन जो भारत में दिए हुए भाषणों में से एक उसका स्टडी हम करते हैं। तो सेम मेथड लाइन बाय लाइन पैरा बाय पैरा पेज बाय पेज स्टडी करते हैं। सो दैट इज वन मेथड ऑफ स्टडी कि आप बुक बाय बुक स्टडी कीजिए। किंतु देयर इज़ अ सेकंड मेथड ऑफ स्टडी जो कि जिसके बेस के ऊपर में यह शारदा कोष बना है। कोई भी एक पीरियड ले लीजिए। फिर उस पीरियड के रिलेटेड अपने जितनी भी किताबें हैं उसमें कहां-कहां पे क्या-क्या लिखा हुआ है उन सबको एक जगह पर कलेक्ट कीजिए और फिर उस पीरियड को स्टडी कीजिए। यानी कि दो तरीके एक तरीका है किताब को स्टडी करने का। दूसरा तरीका है एक पीरियड को स्टडी करने का। व्हिच इज इंडिपेंडेंट ऑफ एनी बुक। तो फिर शारदा कोष में मैंने क्या किया है? इस तरह से जो पूरा 100 इयर्स हिस्ट्री है उसको मैंने पीरियड्स में बांट दिया है। फिर इस पीरियड को लेकर के जहां-जहां पे जो कुछ भी लिखा गया है वह सबको एक जगह पे कलेक्ट किया और फिर उस पीरियड को हम स्टडी कर सकते हैं। तो दिस इज आल्सो ए लेजिटमेट मेथड ऑफ स्टडी एंड रिसर्च। अभी देखिए कि स्वामी जी का जीवन हम प्रारंभ कर रहे हैं तो हम वही पीरियडिकल स्टडी वाली मेथड्स को अपनाएंगे। हम लोग प्रारंभ करेंगे ठाकुर की महासमाधि के बाद में क्योंकि उसके पहले का जो लिटरेचर है वह काफी लिमिटेड है और बड़ा इजीली आपको वो मिल जाएगा। दक्षिणेश्वर में क्या हुआ ऑथेंटिकली जानना है तो लीला प्रसंग कथामृत मां का जीवन मां के रेमिनेशंस डायरेक्ट डिसाइपल के रेमिनेशंस ईजीली आपको मिल जाएगा युगनायक वगैरह में से किंतु इसके बाद का जो पीरियड है वराहन ठाकुर की महासमाधि के बाद का वहां से सही-सही में लिटरेचर एक्सपैंड होता है खास करके स्वामी जी का तो मैंने सोचा कि ठाकुर की महासमाधि धि के बाद में से प्रारंभ करेंगे और स्वामी जी की महासमाधि तक जाएंगे। यह पीरियड हम पहले कवर करते हैं जिससे कि क्या होगा कि शारदा कोष का यह जो स्पेशलिटी है कि एक पीरियड को लेकर के जितना भी लिटरेचर है सबको इकट्ठा किया और फिर उस पीरियड को स्पेसिफिकली हमने स्टडी किया। तो यह उसका जो स्पेशलिटी या जो इसका पावर है वह हमको समझ में आए और फिर स्वामी जी के जीवन को हम बड़ी ही गहराई से इन अ ग्रेट डेप्थ समझ पाए एनालाइज कर पाए। तो स्वामी जी का जीवन हम और एक एक्स्ट्रा टॉपिक के रूप में ऐड करेंगे और मेथड होगा कि मैंने जिस तरह से पीरियड्स बनाए हैं तो पीरियड बाय पीरियड जाएंगे। सभी पीरियड में जितना भी रिलेवेंट लिटरेचर अपने संघ का है वह एक जगह पे इकट्ठा करेंगे और फिर उस पीरियड के बारे में इन डेप्थ थोड़ा सा डिस्कशन करेंगे। अच्छा तो ये तो हो गया। तो अभी मैंने यह जो डॉक्यूमेंट प्रिपेयर किया है यह शारदा कोष में से निकाल करके मैंने थोड़ा सा एक सेपरेट किया है जिससे कि हमको स्टडी करने में सुविधा हो। मैं मेरा स्क्रीन शेयर करता हूं यहां पर जिससे कि आप इसको देख पाए। हां जैसे देखिए कि हमको पहले तो यह बात पता है कि हमने किस तरह से यह जो अपना साहित्य है जो पूरे जो 100 इयर्स है उसको हमने पर्व में बांटा है। तो जो पहले वाला तो है बाल्य पर्व जो कि ठाकुर जब तक कामार पुकुर में थे जन्म से लेकर के कामार पुकुर वह घटनावली उसमें है फिर है साधन पर्व कोलकाता आए दक्षिणेश्वर काली मंदिर में उन्होंने प्रवेश किया वहां पर रहकर के साधना की तब से लेकर के शोडशी पूजा तक मां शारदा दक्षिणेश्वर आई ठाकुर ने उनकी पूजा करके साधना की समाप्ति की और धर्मचक्र प्रवर्तन का प्रारंभ किया। उसके बाद में है आनंद पर्व। आनंद पर्व हमको पता है कि किस तरह से ठाकुर ने मां की शोशी पूजा करके शक्ति जो प्राप्त की है। उस शक्ति से कोलकाता में घर-घर जाकर के विद्वानों के घर फिलॉसोफर्स को पकड़ कर के साधकों को पकड़ करके उन्होंने एक के बाद एक सबका मन लुभाना प्रारंभ किया। जो अपनी नई वाणी है वही सनातन धर्म किंतु युगोपयोगी करके उन्होंने सबको सुनाना शुरू किया। तो यह है आनंद पर्व। इसके बाद में देखिए कि आत्म प्रकाश पर्व। ठाकुर को कैंसर हुआ और कैंसर के बाद में उन्होंने स्पष्ट रूप से अपना जो सही स्वरूप है उस जगत के सामने रखना शुरू किया। और इस पर्व की जो सबसे इंपॉर्टेंट घटना है आत्म प्रकाश अभयदान जिसको कि शरद महाराज कहते हैं और इन जनरली हम लोग जिसको कल्पतरु दिन के रूप में पहचानते हैं 1 जनवरी 1886 इस दिन को ठाकुर ने उनके सामने जितने भी लोग आए सबको स्पर्श करके ठाकुर ने कहा तुम चैतन्य हो। इसके बाद में ठाकुर की महासमाधि के बाद में तपस पर्व प्रारंभ होता है। हमको पता है कि किस तरह से जितने भी डायरेक्ट डिसाइपल मां शारदा देवी स्वयं उनको शुरू शुरू में कितनी कठिनाई का सामना करना पड़ा था। मां को तीर्थ यात्रा करनी पड़ी। फिर वहां से आकर के कामार पुकुर में रहती थी। यहां पे यह गुरु भाई वहां पर वराह नगर मठ में रहते थे। किस तरह की परिस्थिति में रहते थे पता है हमको। उसके बाद में भारत पर्व स्वामी जी वराह नगर मठ छोड़कर के भारत के भ्रमण के लिए उन्होंने पूरा पूरे देश का भ्रमण करने के लिए वो वहां से निकले और शायद शुरू में उनका यह कांसेप्ट भी नहीं था। नहीं होगा कि देश का भ्रमण करना है। भारत की परिस्थिति देखनी है। उनके तो माइंड में यही था कि सीधा हिमालय में जाएंगे। समाधि में बूंद हो जाएंगे। किंतु जिस तरह से घटनावली चली स्वामी जी को हिमालय पर से नीचे आना पड़ा। भारत का भ्रमण करना पड़ा। विदेश में जाकर के जो सब कुछ उन्होंने देखा तो खैर किंतु विदेश में तो बाद की बात है। किंतु यह जो भारत पर्व है उसमें पूरे भारत भ्रमण के बारे में पूरा डिस्कशन। इसके बाद में विजय पर्व स्वामी जी अमेरिका गए। अमेरिका में वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में प्रवचन दिया। जो अमेरिका में रहकर के उन्होंने जो पूरा कार्य किया 1893 टू 1896 फिर नवोदय पर्व भारत में स्वामी जी वापस आए रामकृष्ण संघ की स्थापना की शिव ज्ञान जीव सेवा आत्मनो मोक्षार्थम जगत हितायच रूपी नया महामंत्र भारत को दिया और फिर स्वामी जी फिर अमेरिका दूसरी बार भी गए वहां कैलिफोर्निया का एक बड़ा यूनिक उनका एक मैसेज जो है फिर भारत भी वापस आए और फिर भारत आकर के 1902 में महासमाधि में मग्न हो गए। तो यह पूरा नवोदय पर्व उसके बाद में मातृ पर्व हमको पता है कि जब तक स्वामी जी थे जीवित तब तक मां बड़े ही अल्प लोगों को ही मिलती थी। मां का मन बड़ा ही अंतर्मुख रहता था। सब समय यही चिंतन कि ठाकुर ठाकुर के बारे में ही सब चिंतन और फिर जो ठाकुर के कुछ अंतरंग भक्त हैं वही मां के पास में जाकर के उनके आशीर्वाद लेते थे किंतु वह जो 1900 की साल में जो बड़ी इंपॉर्टेंट घटना हुई राधु का जन्म हुआ और ठाकुर ने कहा यह महामाया है इसका आश्रय करके तुम रहना तो राधु के जन्म के बाद में और खास करके स्वामी जी की महासमाधि के बाद में मां के ऊपर में पूरे संघ का लीडरशिप या तो फिर नेतृत्व आया। राजा महाराज यानी कि स्वामी ब्रह्मानंद, स्वामी शारदा, राजा महाराज थे प्रेसिडेंट, स्वामी शारदानंद जी महाराज थे जनरल सेक्रेटरी, स्वामी बाबू प्रेमानंद जी और स्वामी शिवनंद जी थे बेलूर मठ चलाते थे। यहां पर शशि महाराज, स्वामी रामकृष्णानंद दक्षिण के जितने भी राज्य हैं खास करके मद्रास में चेन्नई में ठाकुर ठाकुर और स्वामी जी की वाणी का प्रचार करते थे। यहां पे अमेरिका में देखिए कि त्रिगुणातीनंद जी थे, काली महाराज थे और फिर बाकी सब साधुओं को भी भेजना शुरू हुआ था। यहां पे कनखल में नया अपना सेवाश्रम प्रारंभ हो रहा है। वृंदावन है, काशी है और फिर यह इतने सारे पीरियडिकल हमारे प्रारंभ हुए थे। ब्रह्मवादीन है, प्रबुद्ध भारत है और साथ में ही 1905 के आसपास में यह बंगभंग मूवमेंट स्टार्ट हुई और यहां से स्वदेशी का एक जैसे कि ज्वार आया फ्रीडम मूवमेंट अपना जैसे कि नींद से जाग करके एकदम एक्टिव हो गया। तो एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट पीरियड था रामकृष्ण संघ के पूरे इतिहास में और इस पूरे पीरियड में 1902 से लेकर के 1920 मां की महासमाधि तक मां ने संघ का नेतृत्व किया और फिर मां की समाधि के बाद में स्वराज पर्व स्वराज यानी कि वह इंडिपेंडेंस नहीं स्वराज यानी कि अपने आत्मन की मुक्ति या तो फिर आत्मन का राज तो किस तरह से रामकृष्ण कृष्ण संघ रुष्ट पुष्ट होता गया। राम स्वामी ब्रह्मानंद 1922 तक थे। उसके बाद में महापुरुष महाराज प्रेसिडेंट हुए। उसके बाद में अखंडानंद जी प्रेसिडेंट हुए। और फिर आखिर में विज्ञानानंद जी प्रेसिडेंट थे। उस समय 1936 में रामकृष्ण संघ का हेड क्वार्टर बेलूर मठ में अपना यूनिवर्सल टेंपल ऑफ श्री रामकृष्ण उसका क्सक्रेशन हुआ। तो यह जो पूरा यह अपने जितने भी पर्व है तो हम प्रारंभ करेंगे ठाकुर की महासमाधि के बाद में वराह नगर मठ वहां से हम लोग प्रारंभ करेंगे। हमको पता है कि वराह नगर मठ में स्वामी जी 1886 से 1890 तक रुके थे और उस समय के दौरान उस समय के दरमियान उन्होंने तीन बार उत्तर भारत पर्यटन के लिए गए थे। तीनों बार वापस आ गए थे और फिर आखिरी चतुर्थ बार जो निकले वराह नगर मठ से तो फिर सीधा वो वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में सक्सेस होकर के भारत वापस आए थे। तो यह जो पीरियड है जिस पीरियड से हम प्रारंभ कर रहे हैं यह वराह नगर मठ वाला पीरियड है। देखिए कि मैंने इस पूरे पीरियड को किस तरह से यह लेवल वन, यह लेवल टू, लेवल थ्री, लेवल फोर और लेवल फाइव में बांटा है। एनीवे दिस इज़ अ टेक्निकल डिटेल। मेन चीज है हमारे सामने कि यह मैंने जितने भी पीरियड है उसको पांच लेवल में सब पीरियड में डिवाइड किया है। जो पीरियड हम प्रारंभ करेंगे आफ्टर द महासमाधि ऑफ श्री रामकृष्ण लास्ट डेज इन काशीपुर। ठाकुर की महासमाधि हुई 16 अगस्त 1886। उसके बाद में हमको पता है कि ऑलमोस्ट 30 या 31 अगस्त तक यह जो 1 महीने का जो भाड़ा दिया हुआ था काशीपुर का तब तक यह सभी त्यागी संतान और मां वहीं पर थे और उसी दिनों की कुछ-कछ महत्वपूर्ण घटनाएं हैं जो कि हम यहां पर डिस्कस करेंगे। इसके बाद में हमको पता है कि यह किस तरह से रामकृष्ण संघ का प्रथम जो मठ है प्रथम मठ को वैसे काशीपुरी कहा जाएगा किंतु वह तो ठाकुर के रहने रहते समय ठाकुर के जाने के बाद जो प्रथम मठ स्थापित हुआ वराह नगर उसकी स्थापना और फिर वहां पे बिफोर स्वामी जी फर्स्ट पिल्गिमेच के लिए निकले और वहां तक की घटना देखेंगे। तो देखिए कि यह जो वराह नगर मठ वाला पीरियड है उसको किस तरह से हमने बांटा है। पहले तो काशीपुर का दिन उसके बाद में वराह नगर मठ के अर्ली डेज उसके बाद में स्वामी जी का फर्स्ट पिल्गिमेच टू नॉर्थ इंडिया। उसके बाद में फर्स्ट पिल्लगिरी मैच के बाद में वराह नगर मठ वापस आए। सेकंड पिल्लगिरी मैच टू नॉर्थ इंडिया। फिर से वराह नगर मठ में वापस आए। थर्ड पिल्लगिरी मैच टू नॉर्थ इंडिया फिर से वराह नगर मठ में वापस आए और फिर जो वह निकले आखिर में चतुर्थ पिलगिरी मैच वो फिर सीधा भारत पर्व प्रारंभ होता है। तो यह वराह नगर मठ के इतने सब पीरियड्स हैं। उसमें से पहला जो पीरियड है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में काशीपुर में क्या हुआ? जितने दिनों तक काशीपुर का भाड़ा दिया गया था उतने दिनों तक काशीपुर में क्या हुआ वह हम देखते हैं। देखिए कि उस दिनों की घटनाएं वैसे ओवरऑल तो हमको अच्छे से पता ही है। सबसे इंपॉर्टेंट बात क्या है कि ठाकुर की जैसे ही महासमाधि हुई मां और यह त्यागी संतान और गृहस्थ संतान यह सभी लोग जैसे कि इतने गहरे शोक में डूब गए आंखों के सामने इस तरह का एक अंधेरा छा गया जिनको कि आपने अपने जीवन का ध्रुव तारा गिन करके जिनके सामने देखकर के आपने अपना पूरा जीवन बिताया था उस दिन तक का वो ध्रुव तारा ही जैसे कि अदृश्य हो गया तो ठाकुर कहते हैं जैसे कि यह बाउल दल एलो नाच लो और चले ग कोथाई चलो ग क्यों किु पूछते पार लो ना अर्थात कि यह बाउल यानी कि ये कीर्तनिया जो होते हैं ना वो जो पदावली कीर्तन करते हैं तो यह बाउल का दल आया उन्होंने कीर्तन वगैरह किया और फिर कहां चले गए कहां अदृश्य हो गए किसी को पता नहीं चला तो यह ठाकुर की भी लीला क्या ऐसी ही रहेगी कि ठाकुर आए पृथ्वी के ऊपर में भक्तों को लेकर के लीला की और जैसे ही ठाकुर चल बसे सब कुछ तितर-बितर हो गया। उनके पीछे में उनकी यादों के अलावा भक्तों के हृदय में उनके प्रति भक्ति के अलावा और कुछ रहा नहीं। यदि कुछ रहेगा तो यह ब्राह्म समाज के पीरियडिकल्स में उनके बारे में जो कुछ लिखा गया था और यह रामबाबू जैसे कुछ भक्तों ने ठाकुर के जो कुछ वचन है उनके कुछ उपदेश है और जीवन की कुछ घटनाएं हैं उनको कलेक्ट करके जो तीनचार किताबें उस समय पब्लिश हो रही थी या हुई थी इसके अलावा ठाकुर के बारे में कुछ रहेगा नहीं क्या पृथ्वी के ऊपर में भक्त जो थे मां मां थी त्यागी संतान थे। यह जो डेडिकेटेड गृहस्थ भक्त थे योगेन मां, गोलापमा, बलराम बसु मास्टर महाशय क्या उनके जीवन में फिर अंधेरा ही छा जाएगा? तो यह एक प्रश्न सबके मन में हो रहा था। उस समय किंतु दो घटनाएं ऐसी बनी जिससे कि सभी के हृदय में एक आशा का पुनः संचार हुआ। सबसे पहली घटना तो ठाकुर की महासमाधि की रात को ही बनी जब मां अपनी चूड़ियां निकाल रही थी। क्योंकि पता है कि भारत में जो विधवाओं के जो कठोर नियम है उसके अनुसार विधवाओं को किसी भी तरह के गहने नहीं पहनने। साज सजाई नहीं करनी है। श्रृंगार नहीं करना है। वस्त्र बड़े सहज रूप से पहनने हैं। सादे वस्त्र पहनने हैं। सफेद साड़ी पहननी है वगैरह-वगैरह। तो यह जो विधवाओं के कठोर नियम तो फिर वह मां भी उस नियमों का पालन करने के लिए चूड़ियां निकाल रही थी। उसी समय आकर के ठाकुर ने मां को कहा कि अरे मैं गया कहां पर हूं इस घर में से तो उस रूम में इतना ही तो तो यह जो ठाकुर का जो दर्शन उसी दिन रात को ही जब मां को हुआ सभी भक्तों के हृदय में एक आशा का संचार हुआ कि हां ठाकुर ने हमको संपूर्ण रूप से एबेंड ऑन नहीं कर दिया है। हमको संपूर्ण रूप से तज करके नहीं चले गए हैं। ठाकुर यदि सदैव वर्तमान नहीं है तो एटलीस्ट भक्तों के हृदय में तो वह रहेंगे ही रहेंगे। तो वह एक आशा बनी किंतु साथ-साथ में ही देखिए कि नरेंद्र को भी इसी तरह का एक दर्शन हुआ। काशीपुर उद्यान वाटी में ही विदिन वन वीक ऑफ ठाकुर समाधि। 16 अगस्त के एक सप्ताह के भीतर में ही नरेंद्र को भी यह दर्शन हुआ। तो यह दोनों दर्शन देखकर के फिर उसके बारे में सुनकर के सभी लोगों को यह तो भरोसा हुआ कि ठाकुर भले ही चाहे चले गए हो किंतु फिर ठाकुर के जो जिस तरह से सेवा हम लोग करते रहते थे काशीपुर में और दक्षिणेश्वर में वह सेवा अभी नित्य सेवा चलेगी नित्य कृष्ण नित्य लीला ठाकुर सदैव वर्तमान नहीं है किंतु स्मृति के रूप में उनके अस्थि के भीतर में अवश्य उनके जो आदर्श है, उनके जो टीचिंग्स है, उन्होंने जो जीवन घड़ किया है, मां का, डायरेक्ट डिसाइपल्स का, बाकी सबका, उसके भीतर में ठाकुर अवश्य वर्तमान है। एक बार शशि महाराज ने मैथमेटिकल फार्मूला देखकर के ठाकुर के बारे में समझाया था। हु इज ठाकुर? ठाकुर कौन है? तो स्वामी विवेकानंद प्लस ऑल द वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद। उन्होंने जो भी वाणी है उनके जो विचार है उनका जो जीवन है तो वह पूरा यानी कि पहले स्वामी विवेकानंद प्लस स्वामी विवेकानंद की वाणी मां मां का जीवन चरित्र मां की वाणी प्लस जितने भी डायरेक्ट डिसाइपल है वो ये सब इकट्ठा करेंगे देन इट इक्वल्स श्री रामकृष्णा तो यह शशि महाराज की मैथमेटिकल फार्मूला कि जितने लोगों को जितने गृहस्थ त्यागी गृहस्थ और त्यागी संत संतान और श्री मां शारदा देवी जिनका कि जीवन ठाकुर ने घड़ किया है उनकी जीवन और वाणी को समस्त जब इकट्ठा करें तब श्री रामकृष्ण को आप समझ पाएंगे। तो इस मैथमेटिकल फार्मूला के अनुसार फिर ठाकुर की नित्य पूजा वहां पर प्रारंभ हुई। तो आज है हम यह जो दो दर्शन है उसके बारे में एक बार देख लेते हैं। देखिए कि मैंने यहां पे जो सोर्स है वो सब सोर्स इकट्ठा किए हैं। जितने भी पॉइंट है उस पॉइंट्स के ऊपर में जितने भी सोर्सेज हैं इकट्ठा किए हैं। और यह सोर्स का रेफरेंस भी है। एमएसजी मींस मदर शारदा देवी मां शारदा बाय स्वामी गंभीरानंद। यह पेज नंबर है दैट इज 119। तो खैर दिस इज अ टेक्निकल डिटेल। तो ये दर्शन जो उसी दिन रात को जो मां को दर्शन हुआ उसके बारे में क्या लिखा है? ए दिके संध्या काले श्री मां देह होते एके एक अलंकार उन्मोचन करिया परिशेषे जोख सोनार बालाओ खुली ते उद्धत होइलेन तोख अकस्मात ठाकुर घो रोग पूर्वकार मूर्ति ते आविर्भूत होइया तार हाथ चापिया धरिया बोलीलेन आमी की मोरे छ जे तुम ए ओ स्त्री जिन हाथ थेके खुले फेलछो उस उसी दिन शाम को श्री मां अपने श्री अंग से एक के बाद एक अलंकार गहने निकाल करके आखिर में जब यह हाथों की चूड़ियां भी निकालने का प्रयास कर रही थी उस समय एकाएक ठाकुर पहले से जो गले में कैंसर हुआ था उसके पहले जो हृष्ट पुष्ट सदानानंदमय ठाकुर थे उसी मूर्ति में वो प्रकट हुए और फिर मां का हाथ पकड़ कर के कहा कि मैं क्या मर गया हूं कि तुम विधवाओं की तरह यह जो सधवा है यह सधवा जो जिस तरह का श्रृंगार करती है वो श्रृंगार तुम अपने शरीर से निकल अपने श्री अंग से निकाल दे रही हो तो इस तरह से जैसे ही ठाकुर ने कहा तो फिर क्या हुआ श्री मां आर बाला खुली लेना देखिए मां ने फिर चूड़ियां नहीं निकाली हालांकि हमको पता है कि मां काफी श्रृंगार वगैरह किया करती थी गंभीरानंद जी के जो जीवन कहानी है मां की उसमें हमने हमने देखा है कि ठाकुर कहते थे कि वह शारदा सरस्वती ताई साजते भलो बासे वो शारदा सरस्वती है इसलिए उसको श्रृंगार करना सजना धजना अच्छा लगता है हाथों में वह चूड़ियां पहनती थी फिर इतना तो पता है कि नाक में वह नथ पहनती थी वो नथ यानी कि वह जो ऐसा होता है जो नाक में और ठाकुर ने एक बार मजाक करके कहा भी था काशीपुर की ही घटना है कि जब मां मां एक बार ठाकुर के लिए दूध लेकर के जब ऊपर जा रही थी काशीपुर का हमको पता है कि ग्राउंड फ्लोर पर मां रहती थी ठाकुर का खाना पकाती थी और फर्स्ट फ्लोर पे ठाकुर का कमरा था। अभी जो सीढ़ी थी वो थोड़ी स्टिप थी। वो स्टेप्स उठने में थोड़ी दिक्कत होती थी। तो मां जैसे ही वह दूध लेकर के ठाकुर के कमरे में फर्स्ट फ्लोर पे जा रही है। एकाएक मां को चक्कर आया। मां गिर गई और जो पैर का जो हड्डी है थोड़ा सा खिसक गया तो फिर उसी दिन ठाकुर थोड़ा सा म अभी क्या है भक्तों के हृदय में तो ये छोटी-छोटी घटनाओं से आघात लगेगा तो वैसे ही देख रहे हैं कि ठाकुर की यह रुग्ण अवस्था है ठाकुर जैसे कि देह छोड़ ही देंगे ऐसा संकल्प करके बैठे हैं उसके ऊपर में मां के साथ में यह दुर्घटना हुई तो भक्तों के हृदय में तो यह आघात लगेगा ही तब भक्तों को सांत्वना देने के लिए हंसी मजाक करते-करते ठाकुर ने कहा था कि मां जैसे नाक में नथ पहनती है तो इस तरह से दो उंगलियों को इकट्ठा करके सर्कल बना करके नाक के पास में ले आ के ठाकुर ने कहा था कि ओरे बाबूराम तू की ओके झुड़ी करे ऊपर नहीं पारवी अर्थात कि तुम क्या इसको माने ये जो नाक नथ का इशारा करके यानी कि मां को एक झुड़ी में बिठा करके यानी झुड़ी यानी कि बास्केट बास्केट में बिठा करके बास्केट को अपने सर पर लेकर के क्या तू उसको को फर्स्ट फ्लोर पे ऊपर में ले आ पाओगे क्या? ऐसा जैसे ही ठाकुर ने कहा तो यह बाबूराम और जो त्यागी संतान बैठे थे वह बेचारे हंसते-हंसते जमीन पे आलोटने लगे। और देखिए यह तो अपने सनातन धर्म में इस तरह की कहानी है। श्रवण श्रवण जो वही श्रवण ही नाम है ना। तो जब वह अपने मां-पिताजी को तीर्थ यात्रा करवाने के लिए वह अपने कंधे पर वह एक बास्केट बना करके वह तुला जैसा बना करके वो वो अपने कंधे पर रख के दोनों को तीर्थ यात्रा करवाता है। तो यह तो सनातन धर्म में अपना है ही है। तो इस तरह से ठाकुर मजाक किया करते थे। तो वो जितने भी गहने थे बाकी सब गहने नाकों की नाक की ये नथ वगैरह सब तो वैसे मां ने निकाल दिया था। किंतु हाथों की चूड़ियां है वह ठाकुर ने निकालने को मना किया था। उसके बाद में देखिए किंतु एक बड़ी ही हृदय विदारक घटना बलराम बाबू तहार जनो सादा कापड़ की न्याया छिलेन बलराम बाबू विधवाओं के लिए जो सफेद कपड़े पहनने होते हैं वो खरीद करके आए थे उहा श्री मां के दीवार जोनो गोलाप मार हाथ दिलेले तनी आतंक बोलिया उठी लेन बाप रे ए शादा थान कापड़ के तार हाथ दीते जावे जब बलराम बाबू ने गोलाप मां को कहा कि यह सफेद वस्त्र मां को दे दो। तो फिर गोलाप मां बेचारी आतंक से एकदम डर गई कि कौन मां के हाथ में यह सफेद कपड़ा देने को जाएगा। देखिए कैसी परिस्थिति परे तनी श्री माय निकट गया देखन त निजो होस्ते कापड़गुली पाहाड़ छिड़िया शुरू करिया लिया छ जब बाद में गुलाब मां मां के पास में गई तो देखा कि जो मां ने जो साड़ी पहनी थी उसकी जो रेड बॉर्डर थी लाल किनारी जो उसकी धार उसको काट करके उसको पतली करके मां ने पहन के रखी है। तो देखिए मां का जो फोटो है आज हमारे पास में ये ऐसा ही है। सफेद मां का साड़ी है और फिर ये पतली सी लाल किनारी उसकी है। देखिए इसके बारे में बड़ा इंटरेस्टिंग एक स्टोरी है। मां के पास में बाद में जब यह डायरे त्यागी संतान लोगों ने आना रहना शुरू किया था। मां की सेवा करनी शुरू की थी। उस समय की बात है। जयराम भाटिया उद्बोधन की ही पाठ बात होगी। मां ने देखा कि एक ब्रह्मचारी अभी ब्रह्मचारी का तो वैसे ही सफेद धोती पहनते हैं। सफेद धोती पहनी है और उसकी जो बॉर्डर है ना वो बॉर्डर भी सफेद है। तो मां ने देखकर के ब्रह्मचारी को कहा कि अरे यह तो सफेद धोती ऊपर में से यह सफेद बॉर्डर इस तरह से कपड़े तुमने क्यों पहने हैं? ये कलर वाली बॉर्डर जो होती है उस तरह के कपड़े पहनो। या तो फिर यह तुम्हारा मन भी किस तरह से ना उदासीन हो जाएगा। देखिए कि कैसा यह इंटरेस्टिंग इनसाइट है मां का। हमको शास्त्रों के विधान जो है वह चाहे ब्रह्मचारी का तपस्यामय जीवन हो कि मां का एक विधवा का जो जीवन हो दोनों के जीवन में संयम अपने शास्त्रों में लिखा गया है। किंतु फिर इस शास्त्र का आंख बंद करके यदि आप फॉलो करने की शुरुआत करेंगे तो फिर क्या होगा कि तपस्या का भी एक लिमिट होता है। तपस्या माने तपस्या की वैसे लिमिट नहीं होती किंतु तपस्या लेने की अपनी एक लिमिट होती है। अपनी मां की अपने माइंड जो है अपना मन जो है उसकी ये जो तपस्या ग्रहण करने की लिमिट है विद इन दैट लिमिट हमको तपस्या करनी है। इसलिए मां ने इस ब्रह्मचारी को कहा कि कलर वाली किनारी हो इस तरह की धोती पहना करो। और इस तरह के और भी काफी उदाहरण है। कोई एक विधवा मां के पास में आई थी। यंग लड़की थी। छोटी उम्र में पति का निधन हो गया था। उस समय तो हमको पता है कि किस तरह से बाल्य विवाह प्रथा चलती थी। तो फिर उस समय वो विधवा जब मां के पास में आई तो उसको चक्कर भी आ रहे थे। उसका स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं था। मां ने देखा कि अरे तुमको इतना तो तुम्हारा हालत इतनी तुम्हारी जो स्वास्थ्य है इतना बिगड़ा हुआ क्यों है? तुम इतनी दुबली पतली क्यों हो गई हो? तो फिर जब उसने कहा कि यह एकादशी के दिन उपवास, यह उपवास, वह उपवास तब मां ने कहा कि इतना उपवास करने की जरूरत नहीं है। ठीक से खाना खाओ। और साथ में मां तो यह भी कहती है कि हमारे यहां पर यानी कि यह जो कामार पुकुर वगैरह जो एरिया है वहां पर तो विधवाओं को मछली खाने की भी वहां पे यह है म विधान है वरना बहुत सारी जगहों पे विधवा है तो आप कोई अच्छा खाना माने यह पोषक द्रव जो आहार है मछली वगैरह क्योंकि और तो कोई प्रोटीन का सोर्स नहीं है तो यह दूध वगैरह तो कोई पीता नहीं है जय राम बाटी का ही एक उदाहरण हमारे सामने सामने है वीरानंद जी महाराज जब वहां पर गए थे जयराम बाटी में जगत धात्री पूजा थी उस समय वीरानंद जी महाराज शरद महाराज और भी तीनचार लोग गए थे गोलापमा वगैरह भी थी उस समय जगत धात्री पूजा में पार्टिसिपेट तो किया किंतु कुछ दिनों के बाद में ही सबको मलेरिया हो गया सभी लोग मलेरिया से भुगत रहे हैं लेटे हुए हैं। उस समय मां बेचारी एक कटोरी लेकर के गांव में घर-घर जाकर के दूध भिक्षा करती थी। कहती थी मेरे बच्चों को बुखार हो गया है। उनको दूध साबू यानी कि ये दूध में यह जो साबूदाना है उसको मिलाकर के जो पौष्टिक द्रव्य उनको देना है। उसके लिए सहज सहज पाच्य और पौष्टिक यह दोनों उसकी होना चाहिए। तो इसके लिए मुझे दूध चाहिए। तो वीरजानंद जी महाराज कहते हैं कि वैसे ही तो गांव में कोई गाय रखता नहीं है। बैल रहते हैं। बेल का काम है खेत जोतना तो फिर बेल की कोई लोग संभाल रखते हैं। वरना गाय की ना ही संभाल रखते हैं ना ही ज्यादातर लोगों के पास में गाय है। जो कुछ गाय है वह है कंकाल सार यानी कि हड्डी पसली उनकी दिख रही है। जो छोटा बच्चा होता है उसके अलावा और कोई दूध नहीं पीता है। इसके लिए गायों की संभाल नहीं रखी जाती। तो जो भी है वो जो म यानी कि दूध नहीं मिलना तो फिर आपके लिए प्रोटीन का दूसरा सोर्स क्या है? तो वह तो मांस और मछली ही है। तो यदि आप यह कहेंगे कि विधवाओं को मछली नहीं खानी तो फिर तो प्रोटीन का सोर्स नहीं मिलेगा तो फिर तो शरीर और स्वास्थ्य कितना बिगड़ता जाएगा। तो फिर मां ने इस विधवा को कहा था कि तुम मछली भी खाओ। तो देखिए कि यह जो तपस्या कितनी हमको लेनी है। शास्त्र में शायद बहुत कुछ कहा गया होगा। हमको इतना ही करना है जितना कि हम सुख पूर्वक कर पाए। हालांकि तपस्या सुख पूर्वक करना दिस इज़ अ कंट्राडिक्शन इन टर्म्स। सुख पूर्वक होती तो तपस्या नहीं होती। जो भी है ये एक आइडियल बैलेंस हम सबको अपने जीवन में एस्टैब्लिश करना है। एक एक्सट्रीम में चले जाना जैसे कि भगवान बुद्ध शुरू-शुर में तो इतनी भयानक तपस्या की आखिर में वो बेहोश होकर के गिर पड़े और फिर आखिर में वो जो गोप बाला थी उन्होंने आकर के भगवान बुद्ध को खीर खिलाई और जब उनके देह में थोड़ा सा बल आया तब उन्होंने कहा कि एक्सट्रीम तपस्या किसी काम की नहीं है। मध्यम पंथा अवलंबन करना है। तो फिर अपने संघ में भी तपस्या के बारे में यह मध्यम पंथा है। जब ये गोला मां ये सादा कापड़ लेकर के सफेद वस्त्र लेकर के मां के पास में गई तो देखा कि मां ने ऑलरेडी जो सफेद उसकी लाल किनारी थी उसको फाड़ करके चीर करके पतली किनारी वाली साड़ी ऑलरेडी पहन रखी थी। देखिए आखिर में महाराज जी क्या लिखते हैं गंभीरानंद जी महाराज ठाकुर नित्य लीलार विराम नाय चिर सद्वा श्री मायरो शतकारे विच्छेदनाय ठाकुर की नित्य लीला का विराम नहीं है और चिर सद्वा श्री मां का श्री रामकृष्ण देव के साथ में जो संबंध है उसमें किसी भी तरह का विच्छेद नहीं है। किसी भी तरह का इंटरप्शन नहीं है। किसी भी तरह का ब्रेक नहीं है। तो यह पहला ही दर्शन ठाकुर की महासमाधि के बाद का ही इसके बाद में देखिए कि नरेंद्र को भी इस तरह से दर्शन हुआ। यह कहानी भी गंभीरानंद जी द्वारा ही लिखी गई है। युगनायक विवेकानंद में क्या लिखते हैं महाराज जी? ठाकुर तिरोधानेर एक सप्ताह मध्य एक आश्चर्यज व्यापार घटिलो। ठाकुर की महासमाधि के एक सप्ताह के बाद में ही एक बड़ी आश्चर्यजनक चीज हुई। एक बड़ी ही सुंदर घटना हुई से दिन रात्रि प्राय आठार समय ठाकुर भक्तों हरिशेर सहित नरेंद्रनाथ उद्यान बाटी सम्मुखस्तो पुकुरधारे दाणया कोथा कोहते छिलेन उस समय रात ऑलमोस्ट एक 8:00 बज गए थे ठाकुर का जो भक्त है गिरीश वही पगला हरीश हरीश वही पगला हरीश जो कि मां के पीछे में दौड़ता था जयराम बाटी में वही पगला हरीश के साथ में नरेंद्र वहां पे काशीपुर में ही उद्यान वाटी के सामने ही जो तालाब है वहां पे खड़ा हुआ था और उसके साथ में बात कर रहा था एवन समय देखले फोटो केयर द होते रास्ता धरिया ठाकुर मतो एक शुभ्र वस्त्रावतो उज्जल मूर्ति ता देर अभिमुख धीरे-धीरे अग्रसर होइते छे उसी समय देखा कि जो फटक है यानी कि यह जो बागानवाड़ी में प्रवेश करने का जो मेन गेट है वहां से और जो बाहर का रास्ता है वहां से ठाकुर के तरह ही शुभ्र वस्त्र परिहित सफेद वस्त्र उज्जवल वस्त्र परिहित एक मूर्ति गेट के भीतर में प्रवेश की और धीरे-धीरे करके उनके सामने आ रहे हैं। नरेनेर मने प्रश्न जागिलो ठाकुर नागी वो जैसे ही इस सुंदर एक पुरुष को देखा शुभ्रम मूर्ति को देखा वैसे ही उज्जवल मूर्ति को देखा नरेंद्र के मन में प्रश्न हुआ कि ये ठाकुर ही है कि नहीं हो सकता है कि अभी देखिए क्योंकि बात तो पता है कि मां को ऑलरेडी एक सप्ताह पहले दर्शन दे चुके हैं ठाकुर तो फिर यह ठाकुर फिर से आए हैं क्या उनको दर्शन देने के लिए भक्तों के हृदय की निराशा काटने के लिए दिन क पूर्व श्री मां जखुन हाथिर बाला खुलीते उदत होया छिल तो ठाकुर सशरी आविभूत होया त के रूप करते निषध करिया छिलन तो वही वो आगे की बात महाराज फिर से रिमाइंड करवाते हैं कुछ दिन पहले जब मां अपने हाथों की चूड़ियां खोलने को तैयार हो रही थी उस समय ठाकुर ने आकर के मां का हाथ पकड़ करके ऐसा करने से मना किया था ठाकुर तो जगत होते चिर विदाई ग्रहण को नहीं ठाकुर तो इस जगत से चिर विदाई ग्रहण नहीं किए हैं। हमेशा के लिए पृथ्वी लोक छोड़कर के नहीं चले गए हैं। हमेशा के लिए मानव सभ्यता का साथ उन्होंने नहीं छोड़ दिया है। वह तो यहीं पे है। देह में वर्तमान नहीं है। तो भक्तों के हृदय में वर्तमान है। तो श्री माय हाथ चापिया बलिया छिलनामी की मोरेची जे तुम हाथ के खुले फेलछो मां का हाथ पकड़ के कहा था मैं क्या मर गया हूं कि जो सधवाओं की ये जो चीजें हैं वो तुम निकाल दे रही हो। अत ए मां शधवार चिन्हो राखिया दिया छिले इसलिए मां ने सधवा के चिन्ह रख दिए थे एक बार जिननी आशिया छिले त आो तो आशिया भक्त दिगो के शोक मुक्त करते पारेन तो एक बार तो ठाकुर ने दर्शन ऑलरेडी दिया है तो दूसरी बार भी आकर के हो सकता है कि वह भक्तों को दर्शन दे और उनको शोक मुक्त कर पाए अतः नरेंद्र सम्मुख ताहार पुनरावीर्भाव असंभव नहे इसलिए नरेंद्र वगैरह त्यागी संतानों के सामने उनका आविर्भाव असंभव नहीं है। युक्तिवादी नरेंद्र तब चुप करिया रही लेन एवं भाभी त काल्पनिक किसु देखते छ ना तो किंतु ये तो थे युक्तिवादी नरेंद्र रेशनल नरेंद्र ये जो वेस्टर्न थिंकिंग जो जिसके भीतर में है ठाकुर खुद जिनकी मजाक करके कहते थे एक बार नरेंद्र जाकर के ठाकुर के सामने गीता श्रीमद्भगवत गीता की प्रशंसा कर रहे हैं। ठाकुर ने साथ-साथ में ही कह दिया कि लग रहा है कोई विदेशी गोरे पंडित ने गीता की प्रशंसा की है। इसलिए नरेंद्र कर रहा है प्रशंसा। तो भारतीय सभ्यता, सनातन धर्म इस सब के प्रति एक रैशनलिस्टिक एप्रोच नरेंद्र का तो था ही था। तो यह जो दर्शन है वो भी क्या उनके मन का कोई भ्रम तो नहीं है। यह सोच कर के नरेंद्र उस समय चुपचाप खड़ा रहा। सोचा कि वो कल्प काल्पनिक तो कुछ देख नहीं रहे हैं तो ऐन समय हरिशो श्री रामकृष्ण शदुष मूर्ति देखिया ईत कंपित कंठे फिश फिश करिया बोलीलेन ओ की नरेंद्र देखो देखो उसी समय हरीश ने भी श्री रामकृष्ण जैसी ही वह मूर्ति देखकर के थोड़े से कंपित स्वर में हल्के से माने फिसफिस करके बड़े ही नीची आवाज में उन्होंने उन्होंने विस्परिंग वॉइस उन्होंने कहा कि ओकी यह क्या है नरेंद्र देखो देखो नरेंद्र देखो देखो क्या हो रहा है यह तो नरेंद्र स्पष्ट स्वर डाकिलेन के ओखाने तब नरेंद्र ने एकदम स्पष्ट स्वर से पुकारा कौन है वहां पे ताहार गलार तिब्रो आवाज सुनिया अपोर शोले ध्रुतोप शेखाने आशिले किंतु किु ही देखी ते पायले ना नरेंद्र के गले की आवाज सुनकर के वहां काशीपुर उद्यान भवन में जितने भी बाकी त्यागी संतान हो गए गृहस्थ भक्त हो गए सब लोग दौड़ के आए किंतु देखा तो वहां पे कुछ नहीं है ओई मूर्ति नरेंद्र ओ हरीश जेखाने दाड़ाइया छिलेन उहार दोष गज दूरे एक जुई फुले झोप परजन तो आशिया मिलया गैो वो मूर्ति शुभ्र ठाकुर का यह जो सूक्ष्म देह में आगमन नरेंद्र और हरीश जहां पर खड़े थे वहां पास में आकर के जुई के फूलों की एक झाड़ी वहां पे थी वहां पे जाकर के अदृश्य हो गई तो लठोन आनिया चार दी तन्नो तन्नो करिया खोजा हो तब किुई पाबा गोना उस समय लटन लाकर के चारों ओर पूरे गार्डन में बड़े ही ध्यान पूर्वक खोजा गया किंतु कुछ भी मिला नहीं ए दटी नरेंद्र अंतोरे गंभीर रेखापात करियाो इस दर्शन ने नरेंद्र के हृदय में गंभीर एक छाप छोड़ी थी एवं उपस्थितो शकलेले विश्वास जन छिलो जे ठाकुर सुखो देह चिर विद्यमान रहया छ और उपस्थित सभी के एकदम विश्वास हो गया था कि ठाकुर सूक्ष्म देह में हमेशा से वर्तमान है फलत इहार परे इहारो परे श्री मां और ठाकुर कोनो कोनो भक्त तहां दर्शन लाभे कृतार्थ होइया छिले एवं अनेके एकनो होइया थाके ठाकुर सूक्ष्म रूप से वर्तमान है और इसीलिए मां अन्य त्यागी और गृहस्थ संतान सभी ठाकुर के दर्शन से कृतार्थ हो रहे थे और अभी भी काफी लोग ठाकुर के दर्शन पाकर के धन्य धन्य हो रहे हैं। तो यह थी ठाकुर की महासमाधि के बाद की दो दर्शन की कहानी। इसके बाद में हमको पता है कि वही काशीपुर उद्यान में ही रहते रहते पहले तो ठाकुर की नित्य सेवा है वह प्रारंभ हो गई। शशि महाराज जिस तरह से उन्होंने वराह नगर मठ में जो सेवा कार्य प्रारंभ किया था तो वहां काशीपुर में ही उन्होंने ठाकुर की नित्य पूजा प्रारंभ कर दी थी वो एक बड़ा इंपॉर्टेंट पॉइंट है और फिर ठाकुर की अस्थि को लेकर के जो कुछ भी हुआ वो दूसरा पॉइंट है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु