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आत्मश्रद्धा से जगत कल्याण 16 Feb 2024

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नम स्वामी विवेकानंद के बारे में स्वामी विवेकानंद का पत्र है उसका हम पाठ कर रहे थे स्वामी जी हमको बता रहे हैं अपने गुरु भाइयों को लिखे हुए एक बंगोली पत्र में लेटर लिखा गया है 18955 में तरह से परिवन करर के पूरे भारत में भ्रमण कर रहे थे स्वामी जी चाहते थे कि अभी वह फेज उनके जीवन का समाप्त हो गया रामकृष्ण संघ का वह फेज जिसमें कि सभी लोग मिलकर के सिर्फ तपस्या करते थे वह समाप्त हुआ और एक नया फेज एक नया युग आरंभ हो रहा है सिर्फ रामकृष्ण संघ में नहीं संघ में ही नहीं परंतु पूरे भारतवर्ष में भारतवर्ष का एक न चैप्टर ओपन हो रहा है यह चैप्टर ओपन होगा श्री राम कृष्ण देव के उपदेश श्री राम कृष्ण देव और साथ में ही मां और स्वामी जी के स्वामी जी हालांकि अपनी बात नहीं कहेंगे किंतु श्री रामकृष्ण देव के जितने भी उपदेश है भारत के जितने नर नारी अबालम वनिता जिस तरह से कहानियों में लिखते हैं अबालम वनीता अर्थात कि जो बच्चे हैं जो वृद्ध है जो स्त्री है अर्थात कि सभी के जीवन में श्री रामकृष्ण देव के उपदेश को प्रवेश होना है उनके जीवन को ट्रांसफॉर्म करना है जीवन को एक उर्ध्व गति देना है हम जिस एक बार ठाकुर बता रहे थे कि मैं कलकाता के रास्ते से जा रहा था देखा कि सभी की निम्न दृष्टि है सभी पेट की ओर देख कर के जा रहे हैं अर्थात कि ऐसा नहीं है कि सभी लोग इस तरह से एक्चुअली अपनी नजर अपने पेट पर रख कर के जा रहे हैं नजर तो सामने ही होती है किंतु ठाकुर के कहते है मेटाफोरिकली कि सबकी चिंता एक ही है कि पेट भरने की हालांकि कोई भी सिविलाइजेशन हो उसको यदि एडवांस होना है उसको यह सिविलाइजेशन की यह जो रेस है सिविलाइजेशन की ये मार्च है उसमें यदि उसको प्रथम आना है उसमें उसको विजय प्राप्त करनी है तो यह रोटी कपड़ा मकान से भी कहीं उच्च उठ कर के उसको सोचना होगा जैसे वेस्टर्न सिविलाइजेशन है किस तरह से साइंस टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्रियल इजेशन के माध्यम से वह आज इतने मने उसी समय से पूरे जगत पर राज कर रहे थे और उनको देख कर के वेस्टर्न यूरोप को देख कर के इस और है जापान ने भी इस तरह से इंडस्ट्रियल इजेशन अपनाया था और इस समय जब स्वामी जी जापान गए थे योकोहामा तो आश्चर्य चकित हो गए कि जिस तरह की फैक्ट्री जिस तरह का एक इंडस्ट्रियल मैनेजमेंट एक एक टीम वर्क एक लीडरशिप एक पर्पस इन लाइफ एक जी अपने हृदय में जोम हो उत्साह हो वो उन्होंने सोचा था कि यह तो यूरोपियन लोगों में ही होता है किंतु जापान जाकर के देखा कि अरे इन लोगों के भीतर में भी इन्होंने किस तरह से वेस्ट से वेस्टर्न यूरोप से यह सब वैल्यूज अपनाई है हालांकि बाद की हिस्ट्री थोड़ा सा देखें तो हमको यह भी पता चलता है कि स्वामी जी बाद में शुरू शुरू में तो स्वामी जी अपने भारत के युवाओं को प्रेरित करने के लिए कहते हैं कि हां तुम जापान के जैसा हो जापान की तरह जापान में जाकर के देखो कि किस तरह से वे लोग साइंस टेक्नोलॉजी में आगे बढ़ रहे हैं वगैरह वगैरह उन्होंने कहा है किस तरह से वे लोग वेस्टर्न यूरोप से सीख रहे हैं किंतु जब वह वेस्टर्न यूरोप में इट सेल्फ गए थे तब उनको पता चला था उन्होंने अपने से लिखा है कहा है कि यूरोप जैसे कि एक बहुत बड़े बारूद के पर्वत के ऊपर में बैठा है उसमें कब चिंगारी लगेगी कब विस्फोट होगा ठीक नहीं 50 साल में ही यह विस्फोट हो सकता है ऐसा स्वामी जी ने जो भविष्य वाणी की थी वो एक्चुअली सही निकली क्योंकि उसके बाद में ही हमको पता है कि 1914 में यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और 1940 में यह सेकंड वर्ल्ड वॉर यह फर्स्ट और सेकंड वर्ल्ड वॉर ने मिलकर के यूरोप में जो खूना मर की की है जो ब्लड शेड बहा है और इसके साथ में ही यह कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन यह फासिस्ट रेवोल्यूशन और यह कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन यह चाइना और रशिया यह दोनों में तो यह रेवोल्यूशन की वजह से ऑन वन हैंड और अदर हैंड यह वॉर की वजह से तो यही माने जापान ने क्या किया कि उन्होंने जो गलती कर दी कि यूरोप की वैल्यूज आंख बंद करके ले ली तो यूरोप का जैसे कि एक एडवांस माइंड सेट लिया एक साइंटिफिक टेंपरामेंट जो लिया साथ-साथ में ही यह मर्डर अस नेचर भी उन्होंने ले लिया कि किस तरह से दूसरे देशों के ऊपर में आक्रमण करके उनको एक्सप्लोइट करें वहां पर अपने इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन है उनके सर पर डाल दे और उनके नेचुरल रिसोर्सेस एक्सट्रैक्ट करें यह यूरोप का टेक्निक था यूरोप जो इंडस्ट्रियल इजेशन कर पाया था उसके पीछे ये कॉलोनाइजेशन एक बहुत बड़ा फैक्टर है कि अफ्रीका में जाकर के भारत में आकर के इवन शुरू में अमेरिका कनाडा यह सब कंट्रीज में जाकर के जो नेटिव पॉपुलेशन है उनका दमन किया उनका एक्सप्लोइटेशन किया वहां की मिट्टी में से जो कुछ भी एक्सट्रैक्ट कर सकते थे नेचुरल रिसोर्सेस वो किए और इसके बेस पर उन्होंने इंडस्ट्रियल इजेशन किया है अभी जापान ने यही सीखा और इसी वजह से जापान ने चाइना पर अटैक किया वहां साउथ ईस्ट एशिया के जितने भी कंट्रीज है वो पेसिफिक कंट्रीज सब पे अटैक किया मर्डर किया युद्ध किया और वहां से नेचरल रिसोर्सेस एक्सट्रैक्ट किए उनके सर के ऊपर में जापानीज इंडस्ट्रियल इजेशन बिठा दिया किंतु इससे यह बात किंतु स्वामी जी पहली बार के लेटर में नहीं लिखते योकोहामा के लिखा हुआ बाद बाद में यूरोप और अमेरिका का बड़ा ही अच्छा सा सर्वेक्षण करने के बाद में ऑब्जर्वेशन करने के बाद में उनको समझ में आ गया था कि इनकी जो वैल्यूज है उनके जो आइडियाज है वो आंख बंद करके जद ले लेंगे तो हम भी उनके जैसे राक्षस हो जाएंगे जापानीज आर्मीज ने जो अत्याचार किए हैं आजकल हम लोग जापान की यदि वर्ल्ड वॉर की बात करते हैं तो हम जितना दोष या तो तो फिर जितनी निंदा हम यूरोपियन कंट्रीज की करते हैं जापान की इतनी नहीं करते क्योंकि इनवे जापान के साथ में हमारा कनेक्शन था कि आजाद हिंद फोर्स जो फौज थी वह जापान के साथ में मिलकर के भारत पर अटैक करने को आ रही थी जिससे कि भारत को ब्रिटेन के चंगुल से बचाया जाए तो किंतु यहां पे हिस्टोरिकल देखिए कि जापान ने चाइना में और बाकी साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज में जो कहर बरसाया है वहां पर जो निर्मम लोगों का शोषण किया है दमन किया है हत्याएं की है उसका मैंने पैरेलल आपको इतिहास में वह जो मंगोल लोग थे जब मंगोल होर्ड अटैक करता था और गांव के जितने बूढ़े बच्चे सबको मर्डर कर देगा स्त्रियों को उठा के ले जाएगा वो किस तरह का एक जंगल राज था वो वही टाइप का जापान की आर्मी ने कहर यह सब देशों के ऊपर में बरसाया था यानी कि ये इंडस्ट्रियल इजेशन के जो बेसिक फिलोसोफी है वो जो कैपिटल का जो फाउंडेशन है वो इट डिपेंड्स अपॉन द एक्सप्लोइटेशन ऑफ पीपल जद आप लोगों को एक्सप्लोइट नहीं करेंगे तब तक यह 19th सेंचुरी कैपिट इज्म वह सक्सेसफुल नहीं होगा वो उसके डीएनए में ही था तो इसीलिए स्वामी जी को एक नए जगत की एक नई सिविलाइजेशन की रचना करनी थी इस सिविलाइजेशन का डीएनए 50 पर यूरोप में से लेंगे कि उनका साइंटिफिक टेंपरामेंट फॉरवर्ड लुकिंग माइंडसेट एक जो उत्साह जोश यह वहां से आएगा और भारत की जो सनातन संस्कृति है हृदय में प्रेम है समग्र संसार में जो कोई भी है सबके प्रति एक समभाव है सबको दोनों को मिक्स करके उनको एक नई ग्रेटर सिविलाइजेशन बनानी थी तो यह सिविलाइजेशन का फाउंडेशन किंतु कौन डालेगा यही 16 लोग जो कि स्वामी जी खुद और उनके गुरु भाई जिनको कि ठाकुर तैयार करके गए थे तो यह पूरा नया सिविलाइजेशन स्टार्ट करना है विश्व के इतिहास में मानव समाज के इतिहास में एक नया चैप्टर प्रारंभ करना है तो इसके लिए सबसे पहले आवश्यक है रामकृष्ण मिशन की स्थापना और इसी स्थापना के लिए स्वामी जी अपने गुरु भाइयों को बार-बार कहा करते थे कि अभी यह प्रव्रज्या का समय खत्म हुआ समाप्त हुआ तुम लोगों को जो ईश्वर प्राप्ति होनी थी ईश्वर के दर्शन होने थे आत्म साक्षात्कार होना था वह तो हो चुका अभी तो तुम लोग ठकुर को भी आदेश मिला था तोय भाव मुखे था अर्थात कि तुम भाव मुख में रहो अर्थात कि यह बॉर्डरलैंड बिटवीन नॉर्मल कॉन्शसनेस एंड सुपर कॉन्शसनेस इस बॉर्डरलैंड पर रहो और इस बॉर्डरलैंड पर रह कर के जितने भी ज्ञान पिपासु मुमुक्षु ईश्वर प्रार्थी जितने भी भक्त मुमुक्षु साधक तुम्हारे पास आते हैं इनको ज्ञान दो यह आदेश तो ठाकुर को प्राप्त हुआ था अर्थात कि ठाकुर के शिष्य पूरा समय पूरा जीवन यदि तपस्या में ही बिता दे तो फिर ठाकुर का यह जो आदेश है यह जो युग प्रयोजन है उसका साधन कौन करेगा कौन साधित करेगा तो इसीलिए स्वामी जी अपने गुरु भाइयों को गाली देकर के माने कभी-कभी चाबुक मार कर के कभी-कभी उनको प्रेरणा देकर के इकट्ठा करते हैं एक मठ में इकट्ठा होने के लिए साथ में रहने के लिए और ऑर्गेनाइजेशन की स्थापना के लिए तो इसीलिए कल स्वामी जी कहते थे कि हमने जैसे कि पढ़ा कि आमी किछु जानी ना आमी किछु ही नहीं व कौन दिशी बरगी आर बिनय है बाप मैं कुछ नहीं जानता हूं मैं कौन हूं कि ये पूरा युग प्रयोजन का साधन करूंगा साधित करूंगा मैं कौन होता हूं यह किस तरह का विनय है स्वामी जी कहते हैं रकम दिना हीना भाव के दूर करे देते होवे इस तरह के दीन हीन भाव को दूर कर देना होगा आमी जानी तो कौन साला जाने यदि मुझे नहीं पता है तो किस साले को पता है तुम जानो ना तो य तो काल कोरले की यदि तुमको नहीं पता है तो तुमने इतने दिन क्या किया ही सब नास्तिक कोथा लोखी छाड़ और विनय यह सब नास्तिक लोगों की बातें हैं कि मैं कुछ नहीं जानता मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा पूरे मानव समाज का एक नया चैप्टर स्टार्ट करना है यह लिखने का साहस मेरे में कहां से आएगा यह सब नास्तिक लोगों की बातें हैं और लखी छाड़ और विनय मने लखी छाडा अर्थात कि जिसका दरिद्र माइंड सेट है जो कि एक्चुअल दरिद्र नहीं है जिन लोगों में जो लोग दरिद्र होते हैं इनका भी विशाल हृदय होता है और जो लोग बड़े ही धनपति होते हैं समृद्ध होते हैं इनका भी हृदय बिल्कुल संकुचित होता है कभी-कभी ऐसा देखने को मिलता है नॉट एवरी केस किंतु ऐसा देखने को मिल जाता है लखी छाडा अर्थात कि जिसका दरिद्र का माइंड सेट माइंड से ही वह संकुचित है माइंड से ही वह सिकुड़ गया है अपने मन में ही वह सोचता है कि जो मेरे पास में है सिर्फ मेरा मैं और किसी को नहीं दूंगा अर्थात कि अभी गुरु भाइयों के मामले में पैसा नहीं देना है ऐसा नहीं किंतु यह जो आध्यात्मिक संपद उन्होंने बटोरी है जो कि उनको ठाकुर की कृपा से मिली है तो अभी समय आया है कि ये भंडार खोल कर के सबको जितना मुक्त हस्त हो सके दान दे देना अपनी बात तो करनी ही नहीं है ठाकुर की ही बात करनी है दो-तीन बार मैंने पढ़ा था कि महापुरुष महाराज के पास में कोई एक साधु आते हैं और विनय से पूछते हैं कि महाराज जी हमको बताया गया है कि कोई किसी सेंटर में हमको महंत होक के जाना है महंत अर्थात कि हेड ऑफ द सेंटर तो वहां पर अध्यक्ष के रूप में हम रहेंगे लोगों को तो हमको उपदेश देना है गीता भगवत रामायण य वेदांत वो सब सिखाना है ऐसा वे लोग हमको जद सिखाना पड़ेगा तो हम क्या बताएंगे हम लोग तो कोई इतने मतलब शास्त्रज्ञ नहीं है तो महापुरुष महाराज कहते हैं अरे भाई तुमको तो सिर्फ ठाकुर की ही बातें करनी है दो तीन बातें ठाकुर की कर दो वो भक्त खुश होक के चला जाएगा तो माने कोई ऐसा कोई बहुत बड़ा यह नहीं है कि हम लोग कहीं उपनिषद के सभी मंत्र मुख स्त कर दे या कि फिर भागवत में जितनी कहानियां है वह सब अपने मन में ठास दे और फिर उसके बारे में बोले वो सब करना यदि हम कर सकते हैं तो बहुत अच्छी बात है यदि नहीं हो सकता तो ठाकुर माहा स्वामी जी की बातें तो है ही जो कि सहज लव्य है सहजता से समझ पाते हैं सहजता से ग्रहण कर पाते हैं क्योंकि वह आज की भाषा में लिखी है और आज की परिस्थितियों को संबोधित करती है आज मैं 21 सेंचुरी में जो जी रहा हूं आज मेरे सामने जो समस्याएं हैं मेरी जो चैलेंस है मेरे यह जो सब ये डेफिशियेंसी है उसको वो एड्रेस करती है तो इसको पढ़ कर के समझ लेना बड़ा ही आसान है तो महापुरुष महाराज बोलते हैं कि कोई बहुत ज्यादा कुछ दूर सोचने की जरूरत नहीं ठाकुर मां स्वामी जी की बातें पढ़ लो और भक्तों को बता दो तो उसी से कम हो जाएगा तो यही स्वामी जी यहां पर कह र है कि बहुत कुछ तो हमको करना नहीं है ठाकुर के पास में दक्षिणेश्वर में जाकर के जो कोई बातें सुनी थी वही तो इनको बतानी है और ऐसा भी नहीं है कि अभी आप भूल गए इतने साल हो गए तो मास्टर महाशय ने तो कथामृत लिखने की शुरुआत कर ही दी थी तो वही कथामृत पढ़ कर के जितना याद हो जितना अनुभव से जो प्राप्त किया हो वही बता बताना है इसीलिए स्वामी जी कहते हैं कि तुम ही जानो ना तो य तो काल कोले की यदि तुम नहीं जानते तो इतने दिन तुमने क्या किया यह सब नास्तिक लोगों की बातें हैं दरिद्र लोगों का विनय है हमरा सब करते पारी सब करबो जर भाग्य आ से हमदर संगे हंकारे चले आश देखिए स्वामी जी क्या कहते हैं आमरा शोप करते पारी हम लोग सब कर सकते हैं शप करवो सब करेंगे भी हम सब कर सकते हैं और सब कुछ करेंगे भी जर भाग्य आ जिसके भाग्य में है जिसके नसीब में है से हमदर संगे हुंकारे चले आस वे लोग हमारे साथ में हुंकार करते चले चले आएंगे हुंकार करते चले आएंगे और लोखी छड़ा गुलो बेलेर मतो कोने बसे मेव मेव करवे और यह जो दरिद्र लोग है हृदय से दरिद्र लोग जो है वो एक कोने में बैठेंगे और बिल्ली की तरह म्याव म्याऊ करते रहेंगे कितना पावरफुल स्टेटमेंट स्वामी जी कहते हैं कि हम लोग सब कर सकते हैं सब करेंगे भी सही और जिसका नसीब है जिसका भाग्य है जो भाग्यवान है जिसको कि ठाकुर ने अपने हाथों से सिलेक्ट किया है ऐसे लोग हुंकार करते हुए हुंकार करते हुए हम हमारे साथ में आकर के मिलेंगे और जिसका हृदय सिकुड़ चुका है जो कि मन से दरिद्र हो गए हैं वे लोग एक कोने में बैठ कर के बिल्ली की तरह म्याव म्याव करते रहेंगे कितना पावरफुल स्टेटमेंट देखिए कि आज से 2000 साल पहले जब क्रिश्चियनिटी का फाउंडेशन लगाया गया क्रिश्चियनिटी की स्थापना हुई उस समय किसने सोचा था कि यह कुछ उस समय का विवरण जब पढ़ेंगे तो हमको लगेगा कि यह जो कौन क्रिश्चियन होता था माने ओरिजिनल जो पलेस्टाइन में जो क्रिश्चियनिटी डेवलप हुई वो जो जीसस और उनके जो प्रथम डिसाइल थे जो कि जू थे उनको छोड़ दीजिए पीटर और पॉल ये दो मेजर डिसाइल मेन डिसाइल जीसस के थे उन्होंने ठीक किया कि क्रिश्चियनिटी के दरवाजे जेंटा इल्स के लिए भी खोल दिए जाए जेंटा इल्स अर्थात कि जो लोग जू नहीं है जीसस अपने से जू थे यहूदी थे तो पहले डिसाइल तो यहूदी ही हुए किंतु उनके पीटर और पोल नाम के डिसाइल ने सोचा कि जो यहूदी नहीं है उनको भी तो क्रिश्चन होने का मौका दिया जाए क्यों इतना सुंदर उपदेश ये जो सर्मन ऑन द माउंट है इतना पावरफुल उपदेश है डू अन टू दाई सेल्फ व्ट यू डू अन टू दय नेबर व्हाट यू विल डू अन टू दई सेल्फ अपने पड़ोसी के साथ में वही करो जो कि तुम अपने साथ में करोगे गोल्डन रूल वगैरह जो मैंने बेस्ट ऑफ द क्रि जीसस के टीचिंग है वो क्यों हम जीसस तक हम यहूदी तक सीमित रखें सबको जो भी जो भी चाहे वो क्रिश्चियन हो सकता है सबको यह मौका दो तो जब शुरू शुरू में क्रिश्चियनिटी फैली पहले रोम वगैरह जो बड़े-बड़े सिटीज में तो कौन क्रिश्चन होते थे गुलाम होते थे और स्त्रियां होती थी जिनका कि रोमन सोसाइटी में कोई अधिकार नहीं था जिनको कि पूरा पशु वत ट्रीट किया जाता था जिनको के पास में सहारा उनको सध्या दे ने वाला कोई नहीं था पूरे जगत में मारे मारे फिरते थे ऐसे असहाय लोग पद दलित लोग इस तरह से ठुकराए हुए लोग इस तरह से नेगलेक्टेड जो है समाज के द्वारा जो कि समाज से बाहर कर दिए गए हैं ऐसे लोग सब जाकर के क्रिश्चियन होते थे तो उस समय के ये जो बड़े-बड़े सेनेटर होते थे रोमन सेनेटर या तो धनपति वे लोग क्रिश्चन लोगों के प्रति बड़ी घृणा की दृष्टि से देखते थे बोलते थे कि अरे क्रिश्चियन कौन होगा जिसका कुछ नहीं है जो दरिद्र है जो भिखारी है वह क्रिश्चियन होगा यह गुलाम लोग क्रिश्चियन होंगे ये स्त्रियां क्रिश्चियन होगी क्योंकि स्त्रियों के पास में कोई अधिकार नहीं गुलाम लोगों के पास में कोई अधिकार नहीं किंतु धीरे-धीरे करके क्रिश्चियनिटी जो फैली है एक समय ऐसा आया कि कंटेंटाइनसेट सोल्जर्स क्रिश्चन है तो उसने क्या किया बड़ी चालक कि से उसने कहा कि मैं जब आकाश की ओर देख रहा था तो मुझे एक बहुत बड़ा क्रॉस दिखाई दिया अर्थात कि ये जीसस का संदेश है कि हम लोग युद्ध में विजय होंगे और ऐसा करके उसने क्या किया अपनी आर्मी के सैनिकों के पास में जो शील्ड था ढाल थी तो ढाल के ऊपर में उ उसने क्रॉस की क्रॉस दरवा दिया क्रॉस पेंट करवा दिया इससे क्या होगा वैसे ही तो ज्यादातर सोल्जर क्रिश्चियन थे और फिर अपनी ढाल के ऊपर में तलवार और ढाल से लड़ना होता है है तो व जो अपने शील्ड के ऊपर में देखा कि क्रॉस का सिंबल है और देखा कि अपना जो एंपरर है तो उसको भी जीसस ने दर्शन दिया है तो इतने उत्साह से युद्ध किया कि सही में जीत गए अभी ये सब साइकोलॉजिकल ट्रिक होती है कि आप इस किसको इस तरह से प्रेरणा दो कि वो सही सही उसको सही मान ले तो जो भी है किंतु इस तरह से देखो कि कहां वो गुलाम लोगों की कहां वो मने भटके लोगों की कहां वो स्त्रियों की धर्म ता क्रिश्चियनिटी और आज ये सडन एंपरर और आर्मी अपने क्रिश्चियनिटी को अपना लिए हैं फिर ये जब कांस्टेंटिनॉपल नगर की स्थापना हुई और तब से लेकर के यह क्रिश्चियनिटी बिकम द स्टेट रिलीजन ऑफ रोमन होली एंपायर तो देखिए कि जिस तरह से धर्म में एक नया चैप्टर युग इतिहास में एक नया चैप्टर की रचना होती है तब आपको युद्ध में जीत कर के यह सब करना पड़ता है अभी उस समय तो एक्चुअल युद्ध होते थे आज इस तरह से युद्ध में विजय करने की जरूरत नहीं है माने बाह्य असुरों का संहार करने की जरूरत नहीं है यह तो हमने मां का जीवन में अवतरण का में देखा ही था कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि जिस तरह से मां जगदंबा का आगमन हुआ था शुंभ निशुंभ वगैरह राक्षसों का वध करने के लिए आज देखेंगे कि रक्त बीज वगैरह कंस रावण यह सब हमारे हृदय में ही है हमारी कु वृत्तियां ही है इसी के ऊपर में विजय प्राप्त करना है किंतु यह जो उत्साह देना चाहिए फाइट करने के लिए युद्ध करने के लिए वो उत्साह तो जिस तरह से वोह कंटेंटाइनसेट के हमारे सैन्य में मिलित हो जाएंगे जगत को विजय करेंगे और जो हृदय से दरिद्र है वो एक कोने में बैठ कर के चाहे निंदा करते रहे और ये जो एक कोने में बैठ कर के बिल्ली की तरह म्याव म्याऊ करने वालों में एक था ब्रह्मो समाज एक समय था कि ब्राह्मण समाज का बड़ा नाम था कोलकाता में वो ब्रह्म समाज के ये जो वि जो मजूमदार वगैरह जो अमेरिका यूरोप जाते थे तो उनका बड़ा सन्मान हुआ करता था एक थियोसोफिकल सोसाइटी थी और यह सब ये रमाबाई यह सब बहुत सारे लोग थे जो कि भारत को निंदा करके टू सेल इंडिया स्वामी जी कहा करते थे टू सेल इंडिया का क्या अर्थ है भारत को बेचा करता बेच कर के चने ले लेना माने चने खा जाना ऐसा एक कहावत है कि किसी को बेच कर के आप चने खरीद के खा जाते हैं अर्थात कि भारत की विदेश में जाकर के निंदा करना विदेशियों को यह सुनना अच्छा लगता है कि अरे हमारी सिविलाइजेशन कितनी एडवांस है हमारा क्रिश्चियनिटी कितना एडवांस है और ये सब लोग किस तरह के बर्बेरिस है चलो उनको सिविलाइजेशन की लाइट उनको दी जाए बोलक के वहां से पैसा देकर के मिशनरियों को भेजता है ये पूरा एक रैकेट चलता था एक पूरा स्केम चलता था तो ये स्कम को जाकर के स्वामी जी ने तोड़ दिया कि ये जो जिस भारत की निंदा कर रहे उसी भारत की मिट्टी में से यह स्वामी ठाकुर के जैसे महापुरुष का उदय हुआ यह जो कथामृत के स्टार्टिंग के चैप्टर है वहां पर मास्टर महाशय जो कुछ फुट नोट में लिखा है कि किस तरह से केशव सेन ठाकुर की प्रशंसा किया करता था तो केशव सेन अपने प एक न्यूजपेपर आर्टिकल में लिखता है कि जिस मिट्टी में से इस तरह के महापुरुष प्रकट हो सकते हैं उस मिट्टी की पवित्रता उसका नि सोच कर के हम लोग आश्चर्य चकित हो जाते हैं तो इस तरह से देखिए कि इस तरह के महापुरुष तो इस मिट्टी में से आए ही है तो अब जब स्वामी जी ने यह सब प्रचार करना शुरू कर दिया तो इन सबका बिजनेस बंद हो गया तो यह ये मजूमदार का ये ब्राह्मण समाज वाले ना कि ये थियोसोफिकल सोसाइटी वाले ना कि बाकी जितने भी थे वो सब बैठ कर के स्वामी जी की निंदा करना स्टार्ट कर दिए थे यहां तक कि कुछ कुछ न्यूज़पेपर ने कैंपेन की तरह स्टार्ट किया था कि कि हम लोग जाकर के रामकृष्ण मिशन की निंदा करेंगे वो जो उस समय की जो ओरिजिनल हिस्ट्री है 1920 1930 1940 वो जो समय जबकि ठाकुर महा स्वामी जी तीनों का महासमाधि हो जाने के बाद की बात है कि किस तरह से एक भयानक प्रचार शुरू हुआ था रामकृष्ण मिशन के अगेंस्ट में वो सब पढ़ा है मैंने वो पढ़ कर के हमको बड़ा आश्चर्य होता है कि जिनको कि हम इतने रिस्पेक्ट से देखते हैं ऐसे लोग भी रामकृष्ण मिशन की निंदा किया करते हैं क्या करेंगे किंतु क्या है कि ये पूरा स्केम स्वामी जी ने तोड़ दिया था और इसीलिए यह लोग बिल्ली की तरह कोने में बैठ कर के म्याव म्याऊ करते थे किंतु जब शेर जाता है या तो फिर हाथी जाता है बाजार से तो यह बिल्ली फिल्ली की क्या विसात है ठाकुर ही कहते हैं ना वो मास्टर महाशय जब उनको मिलने के लिए जाता है ठाकुर नरेंद्र से बात कर र है पूछ रहे है नरेंद्र का प्रथम बार मास्टर महाशय ने देखा था वो लिखते हैं कि ठाकुर एक बड़े ही उज्जवल चेहरे वाले उज्जवल आंखों वाले तेजस्वी युवान के सामने देख कर के पूछ रहे है बात कर रहे बड़े ही खुश हो हो करके बाद बाद में ठाकुर पूछते हैं कि अच्छा नरेंद तुम्हारे सामने लोग कोई तुम्हारी निंदा करे तो तुम क्या सोचोगे तुम क्या करोगे तो वो नरेद्र कहता है कि मैं सोचूंगा वो कुत्ते की तरफ भूक रहे हैं तो सब लोग हसने लगते तो ठाकुर कहते हैं अरे नहीं नहीं इतनी भी उनको घृण या तो तुच्छ करके नहीं देखना है सबके भीतर में आत्मन है यदि उनके भीतर में वोह इस तरह से वो जटिला कुटिला का मने उनको डीएनए उनके भीतर में गया तो वही सही मैंने इतना घ करके किसी को नहीं देखना तो किंतु देखिए कि स्वामी जी हमको किस तरह से उत्साह देते हैं युद्ध करने के लिए कि जोन लोगों में साहस है जिन लोगों का भाग्य है जो लोग भाग्यवान है जो लोग ठाकुर के कृपा पात्र है आशीर्वाद प्राप्त है वे लोग हुंकार करके हमारे साथ में आकर के मिलेंगे आगे स्वामी जी लिखते हैं एक महापुरुष लिखन अर्थात कि किसी ने कोलकात्ता से स्वामी जी को लेटर लिखा है तो उस लेटर में क्या लिखा है एक महापुरुष अर्थात कि स्वामी जी नाम नहीं देकर के कटाक्ष के रूप में उसको महापुरुष करके पुकारते हैं अब ये महापुरुष महाराज नहीं वैसे ही कटाक्ष में किसी व्यक्ति को उन्होंने महापुरुष करके लिखा है एक महापुरुष लिखन आर केनो हुज खूब हलो घरे फिरे शो एक महापुरुष लिखते हैं कि अभी और कितना बहुत हल्लागुल्ला तुमने मचा लिया बहुत तुमने शोर मचा लिया अब घर फिरे शो अभी घर वापस आ जाओ अभी क्या है कि यह जो व्यक्ति है वह कोई भी हो सकता है कोई डिवटी भी हो सकता है हो सकता है कोई गुरु भाई भी हो सकते हैं हमको पता नहीं किंतु स्वामी जी को एक कटाक्ष पूर्ण लेटर लिखते हैं कि यह जो साधु सन्यासी ठाकुर के बारे में हमने देखा वह तो कभी भी अपने बारे में बात ही नहीं करते थे सब समय मां का नाम लेते रहते थे और तुम अमेरिका जाकर के अपना खुद का प्रचार कर रहे हो यह आत्म प्रशंसा में इतने डूबे हुए हो और यह क्रिश्चन मिशनरी यह ब्र समाज वाले जो स्वामी जी की निंदा किया करते थे कि कहां वह व्यभिचार कर रहे हैं न कि कहां वह मांसाहार कर रहे हैं क्या क्या मैंने जितने भी व्यभिचार के आरोप है सब स्वामी जी के सर पर डाल दिए थे तो ये जो व्यक्ति था जिसको कि स्वामी जी कटाक्ष में महापुरुष करके पुकारते हैं तो यह व्यक्ति यह सब चीजों को जैसे कि सही मान लेता है और क्या लिखता है कि बहुत हल्लागुल्ला हो गया बहुत हुजुर चल घर वापस आ जाओ कलकाता वापस आ जाओ चुपचाप बैठ कर के एक कोने में बैठ कर के तपस्या करो माने देखो कि जदी किसी का उत्साह तोड़ देना है किसी को नगण्य तुच्छ ता छिल्यू को हतो उत्साह कर देना है तो हम किस तरह से उसकी उसको तुच्छ करके उसके साथ में बात करेंगे किस तरह से हम उत्साह को तोड़ देंगे कि अरे तुम तो निकम में हो तुमसे तो कुछ होता नहीं ये क्या सब हल्लागुल्ला मचा के रखा है ये क्या सब पागलपन करते हो चुपचाप बैठो मने कभी-कभी ऐसा होता है ना कि हमको किसी को इस तरह से यह करना है उसका उत्साह तोड़ देना है तो यहां पर भी यह बोलते हैं कि बहुत हल्लागुल्ला हो गया अभी घर वापस आ जाओ चुपचाप एक कोने में बैठ जाओ तुम्हारे में तो कुछ है नहीं तुम्हारे में कुछ सार नहीं है कुछ भी है नहीं बस यह ठाकुर का नाम है थोड़ा बहुत उसके ऊपर में तुम उछलते हो और सब झूठी मूठी बातें फैला करके अपना प्रचार करते हैं ऐसा कुछ उन्होंने लिखा होगा तो स्वामी जी क्या कहते हैं उसके बारे में बेकू बेवकूफ माने स्वामी जी अब उसको उत्तर देते हैं अभी उसको सामने क्या उत्तर दिया वह तो पता नहीं किंतु उसके पत्र के बारे में अपने गुरु भाइयों को स्वामी जी लिखते हैं कि बेवकूफ तोके मरद बोल तुम जदी एकटा घोर कोरे अमाई डकते पती मैं तुमको मरद कहता सही मरद कहता यदि तुम एक मठ बना कर के मुझे वापस बुला सकते हैं देखो कि उस समय की जो परिथि स्थिति थी ठाकुर की महासमाधि के बाद में कि वो वहां पर वो गार्डन में रहते थे काशीपुर गार्डन में वो तो भाड़े से लिया हुआ था जैसे ही ठाकुर की महासमाधि हुई वह तो भाड़ा देना बंद कर दिया तो जो कुछ चंद दिनों का भाड़ा था तो उतने दिन तो यह गुरु भाई सब वहां पर रहे लड़ त्यागी लड़के किंतु उसके बाद में कहां जाएंगे कहां पर सब लोग तो आधे लोग तो घर चले गए किंतु तारक लाटू बूढ़ो गोपाल इन तीनों को तो जाने के लिए कोई जगह नहीं थी तो क्या कर तो उस समय ठाकुर ने यह सुरेश मित्र को सपने में आकर के कहा था कि अरे मेरे बच्चे चारों ओर घूम रहे हैं और तुम तुम्हारे में साह कुछ है नहीं तुम उनको मदद करो तो इमीडिएट सुरेश मित्र ने आक के कहा कि हां मैं ठाकुर के काशीपुर गार्डन में जितना भाड़ा दिया करता था उतना ही भाड़ा में फिर से तुम लोगों को दूंगा तुम लोग एक मकान इस तरह से भाड़े प लेकर के रहो तो वो अपना वराह नगर मठ का प्रारंभ हुआ किंतु एक के बाद एक ठाकुर के जो रसदार थे एक तो बलराम बाबू थे फिर ये सुरेश मित्र थे वो सबका तो देहांत हो गया तो अभी मठ चलेगा कैसे तो बाकी के जो कुछ-कुछ लोग थे ठाकुर के भक्त वे लोग भक्ति तो बड़ी दिखाते हैं मुंह पे अच्छी-अच्छी बातें भी बड़ी करते हैं किंतु मठ में एक पैसा देने की बात नहीं करनी है गिरीश घोष वगैरह तो अभी गिरीश घोष मास्टर महाशय यह लोग तो क्या था कि वो ऐसा नहीं था कि ये लोग धनपति थे अपना घर ही बड़ा मुश्किल से चला पाते थे तो था शक्ति मठ में देते थे किंतु जिस तरह से बलराम बाबू और जिस तरह से ठाकुर के रसदार जो दे सकते थे उतना तो नहीं दे सकते तो मठ की इस तरह की परिस्थिति आ गई कि स्वामी जी ने फिर सभी गुरु भाइयों ऐ तो तो एक तो कोल ऑफ इटरनल एक होता है ना अनंत की पुकार कि हिमालय बुला रहा है साधु सन्यासी को तपस्या करने के लिए इसलिए भीतर में से तो एक पुकार आ ही रही थी कि चलो कहीं वन जंगल नदी और पहाड़ के ऊपर में हम नि संग विचरण करे ईश्वर का नाम लेते लेते वैद्य नारायण हरि ही औषध जानवी तोयं अर्थात की बीमार पड़ेंगे तो जहनवी अर्थात की गंगा नदी का पानी औषध है और वैद्य कौन है तो नारायण हरि वे हमारी चिंता करेंगे वो भिक्षा देंगे बीमार होंगे तो वही हमको दवाई देंगे चलो निकल पड़ो नि संग विचरण करने के लिए वो तो साधु के हृदय में वो एक हमेशा से होता ही है किंतु साथ-साथ में ऐसी भी बात थी कि वरा नगर मठ चलाना बड़ा ही मुश्किल हो गया था भी इतने सारे 1015 यंग लड़के एक साथ में रहते हैं तो खाना पना तो व्यवस्थित होना चाहिए तो अभी ठाकुर की सेवा ही मुश्किल से हो रही है तो इतने लोगों का खाने का जुगाड़ कैसे होगा तो स्वामी जी ने कहा कि चलो अभी पहले तो स्वामी जी सबको मना करते थे राजा महाराज की इच्छा थी कि मैं परिवलावे दर किंतु आखिर में स्वामी जी ने ही कहा कि चलो हम प्रव्रज्या के लिए निकल जाते हैं और मठ में उसके बाद में बस एक शशि महाराज रेगुलर रहे हैं ठाकुर की सेवा को लेकर के और कोई कोई गुरु भाई प्रव्रज्या करके वापस आता है तो वहां पर कुछ समय के लिए रहते थे तो उस तरह से जब मठ की हालत ऐसी थी सभी गुरु भाइयों को तपस्या करने के लिए चले जाने पड़ा तो उस समय तो यह भक्त लोग तो बड़ी अपनी जो दिखाते थे भक्ति वो तो कोई हेल्प करने को नहीं आए अभी स्वामी जी मदद मांगने के लिए मठ चलाने के लिए संघ की स्थापना करने के लिए मदद प्राप्त हेल्प मांगने के लिए जब अमेरिका आए हैं तो क्या बड़े-बड़े उपदेश दे रहे हैं कि ये अमेरिका में क्या कर रहे हो साधुओं का वहां पर क्या काम है चलो घर वापस आ जाओ चुपचाप एक कोने में बैठे रहो तो स्वामी जी कहते हैं बेवकूफ मैं तुमको मर्द कहता यदि तुम सही सही मेरे लिए एक मठ की एक स्थापना करके फिर मुझे बुला सकते हैं य यहां पर स्वामी जी ने कहा है कि एकटा घोर करे अमा के डकते पार दिश एक घर की व्यवस्था करके अर्थात की एक मठ की व्यवस्था करके तुम यदि मुझे बुला पाते तो मैं तुमको मरद कहता जब वराह नगर मठ में खाने का पैसा नहीं था कुछ भी करने का पैसा नहीं था तब तो बड़ी भक्ति दिखाते थे किंतु कुछ तो हेल्प नहीं किया अभी मैं हेल्प करने मांगने के लिए यहां पर आया हूं तो तुम मुझे वापस बुला रहे हो किस तरह का तुम बेवकूफ हो स्वामी जी से बेवकूफ शब्द यूज व सब आमी 10 बसोर देखे देखे पाका होए गे छी वो सब मैंने 10 साल देखा है और 10 साल यह सब देख कर के मैं घड़ गया हूं मेरा घडतर हो गया मैं पक्का हो गया हूं अर्थात कि मैं ये सब भुलावे में नहीं आऊंगा ये भक्ति बहुत दिखाते हो किंतु सहाय देने की बात आती है तो सब गायब हो जाते हैं उपदेश तो बड़े-बड़े देते हो किंतु मैं जद थोड़ा सा भी हाथ फैलाओ अपना कहूंगा कि ठाकुर के उत्सव के लिए गुरु भाइयों के भोजन के लिए आहार के लिए कुछ दे दो तो मिलेगा ठेंगा कुछ नहीं मिलेगा तो ये स्वामी जी कहते हैं कि यह सब मैंने 10 साल देखा है देख कर के मैं पक्का हो गया हूं अभी मैं यह भूलने में अभी मैं ये सब चीजों से भूलूंगा नहीं अभी ये सब चीजों से मैं मूर्ख नहीं बनूंगा कोथा आर चीड़ भेजे ना कथाई अर्थात बातों बातों से अभी यह पोहे भजने वाले होने वाले नहीं है यह जो पोहे होते हैं पोहा बटाका पोहा जिसमें से बनता है तो पोहा बनाने के लिए क्या करते हैं वो सूखा पहा होता है उसको पानी में डाला जाता है पानी में डाल कर के वह जब सॉफ्ट हो जाता है तो फिर उसमें से थोड़ा वगार करके वो पोहा बनता है बड़ा ही स्वादिष्ट नाश्ता होता है तो अभी पोहे को खाने के लिए उसको तो भिजा पड़ेगा उसको तो गीला पानी में डालना पड़ेगा गीला करना पड़ेगा तो स्वामी जी यह एक प्रवाद वाक्य जिस को कहते हैं बंगोली में एक प्रोवर्ब इंग्लिश में कहेंगे कहावत गुजराती में यदि कहेंगे तो गुजराती हिंदी में एक कहावत जैसा है कि कथाई आर चीड़ भेजे ना माने बातें करने से सिर्फ बातों बातों से ही यह चीड़ अर्थात कि पोहा वो भीग नहीं वो गिले नहीं होंगे अर्थात कि वो सूखे के सूखे ही रहेंगे माने क्या है कि यहां पर जो कहना चाहते हैं यह जो प्रोवर्ब है यह जो कहावत है इसका अर्थ यही है कि जद पोहे को भगाना है तो उसको पानी के नीचे में डालना पड़ेगा अर्थात की मेहनत करनी पड़ेगी एक पोहे का कटोरा में अपनी नजर के सामने बैठ कर के मैं गप लगा रहा हूं बोल रहा हूं मुंह से कि अरे इसके भीतर में पानी गिरे ये भीग जाए फिर इसमें वगार हो फिर इसका यह हो जाए बढ़िया स्वादिष्ट नाश्ता तो मैं बोलने से तो कुछ होने वाला नहीं मुझे खड़े होकर के किचन में जाकर के पानी में डालना होगा सब मेहनत करनी होगी बातों से कुछ होने वाला नहीं यह समझाने के लिए यह एक कहावत है कथाई चीड़ भेजे ना बातों बातों से पोहे भजने वाले भीगने वाले नहीं है जर मने साहस हृदय भालोबासा से आर संगे आसुक जिसके मन में साहस और हृदय में स्नेह और प्रेम है वह मेरे साथ में आए बाकी काव केमी चाइना और किसी को मुझे जरूरत नहीं और किसी की जरत नहीं है और किसी के और कोई मुझे चाहिए नहीं मार कृपा आमी एका एक लाख आछी 20 लाख होबो मां की कृपा से मैं अकेला एक लाख के बराबर हूं और 20 लाख के बराबर होऊंगा देखिए स्वामी जी का साहस स्वामी जी का सेल्फ कॉन्फिडेंस यह आत्म श्रद्धा स्वामी जी कहते हैं कि उपनिषद का असली संदेश क्या है उपनिषद का सार क्या है अमृत क्या है तो यह अमृत है आत्म श्रद्धा आप जो कुछ भी मैंने यह स्वामी जी कहते हैं ना दीना हीना भाव मैं दीन हूं मैं हीन हूं मैं कुछ नहीं हूं ऐसा जो सब समय अपने को कोसते रहते हैं जो लोग सब समय डिप्रेशन में रहते हैं जो लोग सब समय भय से जुड़े हुए रहते हैं सब चीजों में भय यह करने से क्या होगा वोह करने से मैं हर जाऊंगा मैं नहीं कर पाऊंगा मैं फेल हो जाऊंगा इस तरह का जो भाव है को दूर कर देना है आमी एका एक लाख आछी 20 लाख होबो मैं अकेला एक लाख के समान हूं और इतना ही नहीं 20 लाख के समान होंगा यह स्वामी जी कहते हैं कि जिसके हृदय में जिसके मन में साहस है हृदय में प्रेम है वह सब मेरे साथ में आए और बाकी किसी की जरूरत नहीं है यह कायर यह निंदू यह सब समय नेगेटिव सोचने वाले जिसका हृदय सिकुड़ गया है जो कि अपने स्वार्थ से एक कदम भी आगे जाकर के नहीं सोचते हैं जिनकी नजर के सामने भारत का दुख दारिद्र्य समस्या यह सब देख कर के उनके मन का पेट का पानी भी नहीं हिलता है उनको सिर्फ एक ही चीज की फिक्र है कि मैं किस तरह से अपना खुद का धन वैभव बढ़ाऊ मैं खुद किस तरह से अपने भोगों को मैक्सिमाइज कर पाऊं ऐसे लोगों की कोई जरूरत नहीं यहां पर सिर्फ वही लोग आएंगे जिनके मन में साहस है जो काम देंगे वो कर देंगे कहां वो शशि महाराज को एक बार स्वामी जी ने बुलाया शशि महाराज स्वामी राम कृष्णानंद जी जब विरजा होम हुआ था ठाकुर की महासमाधि के बाद में वराह नगर मठ में तो स्वामी जी ने एक बार ऐसा सोचा कि ठाकुर का नाम तो श्री राम कृष्ण है तो मैं उनका प्रधान शिष्य हूं ठाकुर ने तो मुझे प्रधान शिष्य के रूप में ट्रेन किया है तो यह नाम मैं लूं कि नहीं राम कृष्णानंद यह नाम मैं लूं कि नहीं फिर उन्होंने सोचा कि नहीं इस नाम का सबसे बड़ा अधिकारी है शशि शशि महाराज जिन्होंने एक निष्ठ ठाकुर की सेवा की है तो स्वामी जी ने यह नाम शशि महाराज को दिया स्वामी राम कृष्णानंद वरा नगर मठ में विरजा होम के बाद में अभी शशि महाराज ये जिस तरह से गुरु भाई पूरे भारत में पूरे विश्व में भ्रमण कर रहे हैं प्रव्रज्या कर रहे हैं नए-नए एक्सपीरियंस बटोर रहे हैं साधना कर रहे हैं उपदेश दे रहे हैं वह सब छोड़ कर के शशि महाराज ने जितने भी दिन वरा नगर मठ और बाद में आलम बाजार मठ था एक मुश्किल से कहीं गए होंगे कोलकात्ता में भी ज्यादा नहीं जाते थे बिना काम के सिर्फ एक निष्ठ ठाकुर की सेवा लेकर के रहे थे ठाकुर अर्थात की मंदिर में पूजा करके ठाकुर का जो अस्थि थे अस्थि की जो स्थापना की गई थी अस्थि की पूजा करके वो रहते थे एक दिन भी कहीं पर गए नहीं है मुश्किल से कहीं गए होंगे एक दो बार गए थे बस किंतु वापिस आ गए थे इमीडिएट तो यही शशि महाराज को स्वामी जी ने पुकार करके कहा स्वामी जी जब अमेरिका से वापस आए तब कि शशि तुमको मद्रास जाना होगा मद्रास में मैंने अपने डिसाइल्स को अपने भक्तों को मैंने वचन दिया है कि तुम लोग जिस तरह से ऑर्थोडॉक्स हो तुम लोग जिस तरह से रूढ़ चुस्त हो तुम लोग जिस तरह से ईश्वर में एक निष्ठ तुम लोगों की श्रद्धा है मैं आपके पास में मेरा ऐसा ही एक गुरु भाई भेजूंगा जिसका मन अटल अचल सुमेरु वत है जिसका हृदय श्रद्धा से एकदम स्ट्रांग हो गया ऐसा मैं गुरु भाई में आपको भेजूंगा तो शशि मैंने ठीक किया है कि तुमको जाना है तुम जाओ तो शशि महाराज इतने साल ठाकुर की जो पूजा लेकर के रहे थे एक क्षण में उन्होंने अपने गुरु भाई की बात स्वीकार कर ली और बिना कोई विविधा के बिना कोई प्रश्न किए साउथ इंडिया चले गए उस समय का मद्रास आज का चेन्नई वहां पर जाकर के मठ की स्थापना की और आगे के समय में जब स्वामी जी मद्रास जाते थे या चेन्नई जाते थे उस समय तो क्या कि हजारों लाखों लोग उनको मिलने के लिए आ जाते थे किंतु स्वामी जी की महासमाधि के बाद में यह सब अपना मठ मिशन चलाना थोड़ा सा मुश्किल हो गया था क्योंकि जो लोग पैसा देते थे डोनेशन देते थे वे लोग सोचते हैं कि स्वामी जी चले गए तो सब कुछ तो खत्म हो गया ये स्वामी जी के गुरु भाई कौन है स्वामी जी ने मठ स्टार्ट किया है वो क्या है आधे लोगों को तो पता नहीं आधे लोगों को फिक्र नहीं है जैसे बहुत सारे लोग तो वैसे ही आते हैं कि हल्लागुल्ला मचाने के लिए जहां पर बहुत सारे लोग इकट्ठा होते हैं वहां प इस तरह से कुछ कुछ लोग इकट्ठा हो जाते हैं और जैसे ही वहां से लोग चले जाते हैं ये लोग भी भाग जाते हैं तो जैसे ठाकुर को कैंसर हुआ था तो आधे लोग आना बंद हो गए थे कि ठाकुर अपनी खुद की ट्रीटमेंट नहीं कर पा रहे मुझे क्या हेल्प करेंगे यह सोच करके तो स्वामी जी की महासमाधि के बाद में ऐसा एक वातावरण कुछ समय के लिए खड़ा हो गया था कि स्वामी जी के साथ में ही यह सब मामला वहीं पर समाप्त हो गया तो यह मद्रास मठ चलाना शुरू शुरू में कितना कठिन था एक बार तो ठाकुर को भोग दे देने के लिए कुछ नहीं था शशि महाराज नाराज हो गए ठाकुर को बोले मने ठाकुर के संतान है ना हक है अपना तो ठाकुर खुद कहते हैं ना कि मां तो अपनी मां है तो शाली देवी नहीं ये रकम करे तुम मां के साथ में बात कर सकते हो कि क्या मुझे तुम ब्रह्मज्ञान नहीं दोगी क्या इस तरह से मां के साथ में झगड़ा कर सकते हो ठाकुर ने ही सिखाया तो वही ठाकुर के ही शिष्य शशि महाराज ठाकुर के साथ में झगड़ा करता हैं कि अच्छा भोग में कुछ खिलाने के लिए नहीं है तो ठीक है मैं आपको समुद्र के किनारे से रेती लाऊंगा रेती आपको खिलाऊंगा और मैं भी खाऊंगा कि मठ में तो और कुछ है नहीं ऐसा नाराज होकर के रेती लाने के लिए जा रहे थे वही एक भक्त आ गया और ये मिठाई पकवान अच्छी-अच्छी वानगी यां वो लाकर के ठाकुर को भोग के रूप में दी तब कहीं शशि महाराज भी आश्चर्य चकित हो गए देखिए कि ठाकुर का पावर कैसा है तो उस कठिन दिनों में उन्होंने साउथ इंडिया में पूरे साउथ इंडिया में दक्षिण भारत में ठाकुर के नाम का प्रचार किया था तो कैसा साहस चाहिए किस तरह के मने ने विचित्र लोग आते हैं सबके साथ में आपको आपको काम करना पड़ता है तो हृदय में कितना प्रेम चाहिए और साथ-साथ में ही वो हनुमान की तरह एक माने एक क्षात्र वीर्य चाहिए ब्रह्म तेज और क्षात्र वीर्य तो ये इस तरह से स्वामी जी कहते हैं कि ऐसा एक कर्मी भी यदि मिल जाए ऐसा एक कर्मयोगी भी मिल जाए तो स्वामी जी कहते हैं एक लाख के समान है और आगे आमी एका एक लाखी 20 लाख ऐसा एक एक कर्मयोगी एक एक लाख के समान है और कर्मयोग ठीक ठीक करता है तो 20 लाख के समान हो सकता है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु h