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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः कंप्लीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद वॉल्यूम टू ज्ञान योग की सीरीज इसमें से हम लोग पढ़ रहे हैं कॉस्मो द मैक्रो कोसम देखिए कल स्वामी जी ने जो हमको बताया कल स्वामी जी ने जो कंक्लूजन पर पहुंचे दैट वाज अभी तक उन्होंने जो एक आर्गुमेंट बिल्ड अप किया था उसका कंक्लूजन स्वामी जी इस स्टेटमेंट में हमको देते हैं स्वामी जी ने क्या कहा इट देर फोर फॉलोज एब्सलूट दैट द परफेक्ट मैन द फ्री मैन द गॉड मैन हु हैड गोन बियोंड द लॉज ऑफ नेचर यह साबित होता है कि परफेक्ट में बुद्धा मैन क्राइस्ट मैन या तो फ्री मैन जिसको योगी लोग कहते हैं जो कि मुक्त पुरुष है वह व्यक्ति वह पुरुष जो प्रकृति के नियम के परे चला गया है जन्म मृत्यु जरा व्याधि कर्म का यह जो चक्र है इसके जो परे चला गया है हुज गन बियोंड द लॉज ऑफ नेचर एंड डेथ दिस मैन कॉल्ड द क्राइस्ट मैन बाय द क्रिश्चियंस एंड द बुद्धा मैन बाय द बुद्धिस्ट एंड द फ्री बाय द योगी दैट परफेक्ट मैन हु इज एट वन एंड ऑफ द चेन ऑफ इवोल्यूशन वाज इवॉल्वड इन द सेल ऑफ द प्रोटोप्लास्मिक मैन है जिसको कि हम आज देखते हैं वही संपूर्ण पुरुषोत्तम वही जो भगवान बुद्ध भगवान गौरांग महाप्रभु भगवान जीसस क्राइस्ट जिनके ऊपर में हमारी श्रद्धा है या तो फिर मां काली जिनका की दर्शन ठाकुर को होता था यह सब सृष्टि के प्रारंभ में उपस्थित थे सृष्टि उन्हीं के भीतर में से प्रारंभ हुई है अदर वाइज तो फिर आप किस तरह से एक छोर पर उनको देखेंगे और दूसरे छोर पर ना देखें ऐसा हो ही नहीं सकता सो यह पूरा इवोल्यूशन का प्रवाह है उसके प्रथम भाग में भी वही भगवान उपस्थित थे या तो भगवान की जैसे गुणधर्म वाले महापुरुष उपस्थित थे और सृष्टि के आखिरी छोर में भी इवोल्यूशन के दूसरे अंत में भी वही भगवान रामकृष्ण उपस्थित है यह आर्गुमेंट स्वामी जी ने हमारे सामने रखा अभी स्वामी जी इसी बात को और थोड़ा सा डेवलप करते हैं किंतु देखिए एक चीज यहां पर देखना है मैं जब पढ़ता हूं हम लोग खास करके स्वामी जी को पढ़ कुछ कुछ चीजें हमको देखने को मिलती है जो जो हमको बोलने के समय स्वामी जी ने जो लिखा है या तो स्वामी जी जो बोले हैं स्वामी जी का प्रवचन उसको हम मुंह से बोलते हैं पाठ करते हैं तब एक चीज जानने को मिलता है कि स्वामी जी की कैपेसिटी लंबे-लंबे सेंटेंस फॉर्म करने की वह कितनी जबरदस्त थी वोह मैं यहां पर ब्रह्मचार्य का क्लास लेता हूं दोपहर को तो उनके साथ में भी मैंने वही कल परसों दिन डिस्कस किया था एक लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोडोवर नहीं हो पाता और वो भी देखिए कि आजकल तो अपने पास में माइक वगैरह सब कुछ है आप जब किसी बड़े होल में बात करते हैं तो आपके सामने लाउड स्पीकर वगैरह रहता है तो अपने नॉर्मल वॉइस प ही बोलना होता है उससे को हमको चिल्ला करके बोलने की जरूरत नहीं स्वामी जी के समय में तो यह माइक य लाउड स्पीकर वगैरह कुछ नहीं था यदि बड़े क्लास के सामने बड़े होल में बोलना है तो बड़े ही जोर से उनको आवाज निकालनी पड़ती होगी तभी तो सभी लोग सुन पाते होंगे तो इतनी जोर से बोलते भी हैं और इतने लंबे सेंटेंस भी फॉर्म करते हैं यह बिना प्राणायाम के अभ्यास के संभव ही नहीं हो पाएगा आप अपने फेसो में अपने लंग्स में इतनी हवा भरिए पहले इतनी कैपेसिटी बढ़ाइए और फिर उस हवा का उपयोग करके आप शब्द सेंटेंस फॉर्म करेंगे तो स्वामी जी को पढ़ कर के हमको लगता है कि वो प्राणायाम के अभ्यास में वो कितने एडवांस होंगे हम लोग अभी यह सेंटेंस सामान्य वॉइस में भी सामान्य वॉल्यूम लेवल पर ही बोलते हैं तो आधा सेंटेंस बोलते बोलते हम लोग थक जाते हैं यह पूरा सेंटेंस स्वामी जी का एक सुंदर ढब से बोलना वही एक भाव मेंटेन करके बोलना व बड़ा मुश्किल होता है अपने लिए तो दिस इज जस्ट एन ऑब्जर्वेशन साइड ऑब्जर्वेशन तो अभी यहां पर ज्ञान योग में देखिए कि स्वामी जी अभी इसी थीम को इसी टॉपिक को किस तरह से आगे बढ़ाते हैं स्वामी जी कहते हैं सेम रीजन टू द होल ऑफ द यूनिवर्स यह जो हमने रीजन दिया वो पूरे विश्व ब्रह्मांड को यदि अप्लाई करते हैं पूरे विश्व ब्रह्मांड के ऊपर में इसको उपस्प्रिंग का लॉर्ड लॉर्ड यानी कि अधिपति यदि हम इसको प्रॉपर जिस कांटेक्ट में लिखा गया है लॉर्ड उसको हम यदि हिंदी में ट्रांसलेट करेंगे तो विश्व ब्रह्मांड के अति अधिपति भगवान है द गॉड वी सी दैट इंटेलिजेंस मस्ट बी द लॉर्ड ऑफ क्रिएशन द कोज अभी देखिए कि यहां पर थोड़ा सा एक हमको सोचने की जरूरत है ज्ञान योग यदि प्रॉपर्ली देखा जाए तो अद्वैत वेदांत सिस्टम का पार्ट है और अद्वैत वेदांत में बेसिकली कहा गया है कि एक ब्रह्मण है या तो मन है और हमारे भीतर में मनुष्य के भीतर में या तो कोई भी जीवित व्यक्ति के भीतर में या तो किसी भी ऑर्गेनिक मैटर हो ना कि इन ऑर्गेनिक मैटर हो जिसको हम कॉन्शियस कहते हैं ऐसा कोई पदार्थ हो ना कि अनकॉन्शियस या तो सबकॉन्शियस कोई पदार्थ हो जैसे कि यह किताब है ना कि कोई मैं मनुष्य हूं ना कि कोई चिड़िया है ना कि कोई बिल्ली है हम सबके भीतर में वही ब्रह्मण का प्रकाश उसके भीतर में उसकी एक किरण गिर रही है इसकी वजह से हम लोग चेतन चेतन वंत बोध करते हैं जैसे कि च चांद है चंद्रमा है चंद्रमा का खुद का प्रकाश नहीं है सूर्य का प्रकाश चंद्रमा के ऊपर में गिरता है और उसका रिफ्लेक्शन हमको दिखता है तो बोलता है हम लोगों को चांद हमको प्रकाशित दिखता है जैसे मैं खुद यहां पर बैठा हूं तो यह लाइट का प्रकाश मेरे पर गिर रहा है तो मैं मैं आप आप मुझे देख सकते हैं क्योंकि प्रकाश हमारे पर गिरने से वो रिफ्लेक्शन होता है तो हमारे सबके भीतर में ब्रह्मण का रिफ्लेक्शन है ऐसा अद्वैत वेदांत कहते हैं किंतु यहां पर स्वामी जी ने जो शब्द यूज किया है लॉर्ड यानी कि ईश्वर या तो अधिपति यह ध्व वेदांत की सिस्टम से लिया गया हुआ शब्द है इसके अनुसार ध्व मत के अनुसार या तो विशिष्ट अद्वैत के अनुसार एक ईश्वर है और हम उनके संतान है हम जद बहुत सारी साधना करें तो जैसे कि एक पुत्र अपने पिता के जैसा गुणधर्म प्राप्त कर सकता है अपने जैसे कि एक मैं छोटा था तो एक बहुत मुझे कुछ एक सीरियस प्रॉब्लम था तो एक अच्छे एक कंसल्टेंट को हमने व दिखाया था अभी 10 155 साल बीत गए और वो मीनवाइल तो ये मेरा रोक ठीक हो गया और फिर से एक बार वो 1015 साल के बाद में वो स्टार्ट हुआ तो हम उसी डिस्पेंसरी में गए जहां पर उस कंसल्टेंट को दिखाया था मेरे साथ में मेरे अंकल थे अभी जाकर के देखा कि जो ओरिजिनल डॉक्टर थे जो कि बड़े ख्यातनाम थे इस पार्टिकुलर सब्जेक्ट के ऊपर में वो तो चल बसे हैं किंतु उनका लड़का जो है वह है उसको डिस्पेंसरी संभाल रहा है और उसके लड़के ने जो ट्रीटमेंट वगैरह दिया मुझे तो उससे वह फिर से ठीक हो गया तो मैं मेरे जो साथ में अंकल आए थे वो बोल रहे थे कि वो गुजराती में वो कहावत है कि मोरना इंडा ने चित्रवा नो पड़े अर्थात कि जो पीकॉक है मोर है उसका जो अंडा है उसको हमको पेंट करने की उसको ड्र ड्राइंग करने की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि पीकॉक का अंडा वो वही बिकॉज वो पीकोक जो है वह उसका उसके ऊपर में जो कलर है अंडे में ऑटोमेटिक आ ही जाएगा तो जो भी मैंने पीकोक का अंडा देखा नहीं यह कहावत है तो पिता के जो गुणधर्म है पुत्र यदि बहुत मेहनत करता है तो उस में वो गुणधर्म आएंगे किंतु वो पिता तो कभी नहीं बन पाएगा व पिता एक अलग ही है पुत्र अलग ही है तो ये अद्वैत वेदांत और द्वैत वेदांत इन दोनों के बीच में एक ब बहुत ही क्रूडली देखा जाए तो बहुत ही स्थूल दृष्टि से देखा जाए तो यह एक हमको डिफरेंस दिखता है तो अभी यह एक प्रश्न है कि स्वामी जी या तो ठाकुर या तो मां हम जब अपने ऑर्डर के कोई भी लिटरेचर को पढ़ते हैं तब हम कभी-कभी सोचते हैं कि क्लासिकली जिसको ट्रेडिशनल जिनको अद्वैत कहा जाता है वो हम हमारे ये ठाकुर महा स्वामी जी सिखाते हैं ना कि ये द्वैत या तो विशिष्ट अद्वैत सिखाते हैं कभी-कभी आत्मन और ब्रह्मण की बातें करेंगे तो कभी-कभी उसी सेंटेंस में उसी पैसेज में उसी लाइन में वो अद्वैत से द्वेत में चले आएंगे द्वेत में से अद्वैत में चले आएंगे तो हम लोग कभी-कभी कंफ्यूज हो जाते हैं अभी तक स्वामी जी ने जो कुछ भी कहा कि यह पूरा इवोल्यूशन का चैन है उसको एक ही कॉन्शसनेस के रूप में देखें उसको सिंगल यूनिट ऑफ लाइफ के रूप में देखिए तो यह तो क्लासिकल अद्वैद कांसेप्ट हो गया अभी यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि विश्व ब्रह्मांड के जो अधिपति है वह है लॉर्ड ऑफ क्रिएशन ये लॉर्ड शब्द कहां से आ गया यहां पर आप अद्वैत की बात कर रहे हैं कि ध्व की बात कर रहे हैं समझ में नहीं आ रहा क्लासिकल वेदांत पढ़ कर के जब हम अ ये स्वामी जी का ज्ञान योग खास कर के ज्ञान योग बाकी सब चीज जैसे कि लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा है या इवन राजयोग है या इवन कर्म योग है हम यह सब टेक्स्ट जो पर्पस के लिए लिखी गई है वो कोई पार्टिकुलर प्रैक्टिकल पर्पस को सिद्ध करने के लिए लिखी गई है कर्म योग को प्रतिपादित करने के लिए कि हां सेवा कार्य जो है वो जीवन में साधना का एक महत्त्वपूर्ण अंग होना चाहिए इट शुड बी एन इंपोर्टेंट पार्ट ऑफ अवर साधना तो वो सब टॉपिक प्रतिपादित करने के लिए स्थापित करने के लिए बाकी सब किताबें लिखी गई है किंतु ज्ञान योग सपोज टू बी बेस्ड ऑन वेदांत ज्ञान योग तो हम जब पढ़ेंगे तो तो हम आशा रखेंगे कि हां स्वामी जी हमको प्रॉपर्ली सिस्टमैटिक रूप से वेदांत सिखाएंगे किंतु यह नहीं होकर के ना कि स्वामी जी एक पैसेज में बोल रहा है अद्वैत के बारे में दूसरे पैसेज में बोल रहे हैं द्वैत के बारे में या तो विशिष्ट अद्वैत के बारे में तो यह कंफ्यूजन या तो मिक्स अप यह किस तरह से यहां पर हो रहा है य स्वामी जी डेलिबरेशन ऐसा कर रहे हैं या तो फिर स्वामी जी की समझाने की कोई पार्टिकुलर स्कीम है जो कि हम समझ नहीं पा रहे हैं मेरा पार्टिकल मेरा जो पर्सनल ओपिनियन है इस पॉइंट को लेकर के अपने ऑर्डर में बहुत सारे मत मता है जो एक स्टैंडर्ड व्यू हमारे सामने रखा जाता है वह कहता है कि अधिकारी भेद के अनुसार आपकी जो कैपेसिटी है उसके अनुसार आपको ग्रहण करना है ठाकुर महा स्वामी जी आपको अद्वैद के बारे में भी बताएंगे द्वैत के बारे में भी बताएंगे अ ज्ञान योग की साधना के बारे में भी बताएंगे कर्म और भक्ति के बारे में भी बताएंगे आपको जो आपको सूट होता है जो आपकी पर्सनालिटी ग्रहण कर सकती है जो जिस पर्टिकुलर साधना करने की आपकी कैपेसिटी है उसके अनुसार आप उसको ग्रहण कीजिए इसको लॉ ऑफ एलिजिबिलिटी रूल ऑफ एलिजिबिलिटी या तो फिर अधिकारी भाव कहते हैं अधिकारिक भाव कहते हैं तो ये एक पॉइंट है अभी एक दूसरा पॉइंट है जैसे कि आजकल एक हमारे आयन महाराज है हॉलीवुड में है और उन्होंने ऐसे इनफाइनों होती रहती थी उसने उस किताब में मेरा नाम भी मेंशन किया है उसने लिखा है कि कृष्ण सखानू मेंट करते हैं किंतु मैं इनकी आर्गुमेंट को रिजेक्ट करता हूं और मेरा ये ओपिनियन है तो खैर उसने किताब लिखी है तो मेरी आर्गुमेंट रिजेक्ट करेगा जो भी है मैं उसको बोलना उसका यह कहना है उसका जो पार्टिकुलर मत है कि द्वैत कहो न कि अद्वैत कहो दोनों ही एक अधिकारी भेद से नहीं लेना है क्रिश्चियनिटी या तो इस्लाम या तो जैनिज्म या तो बुद्धिज्म हमको इसको अधिकारिक भेद से नहीं लेना है इसको कहेंगे पेट्रोनाश में एक शब्द है पेट्रोनाश उदाहरण देते हैं ना एक पहलवान अपने शिष्य के साथ में वो पहलवान अपने शिष्य को कुश्ती सिखा रहा है तो व शिष्य अभी पहलवान के साथ में फाइट करेगा और सब समय हार जाएगा क्योंकि पहलवान तो शक्तिशाली भी है उस बहुत सारी स्किल्स भी है उसके पास तो पहलवान हर समय जीत जाएगा उसका गुरु तो शिष्य सीखेगा नहीं तो गुरु क्या करेगा बीच-बीच में वो खुद हार जाएगा जानबूझ कर के हारेगा गलती जानबूझ कर के करेगा जैसे कि शिष्य उसको हरा करके थोड़ा सा अपना आत्मविश्वास प्राप्त करे और समझे कि किस तरह की स्किल किस तरह के दाव पेज किस तरह की सिचुएशन में खेलने हैं तो यह हम कोई एक बड़े आदमी है और छोटे लोग जो है वो कुछ सक्सेस करते हैं जैसे टीचर कहता है ना बच्चा कोई अच्छे से होमवर्क करके लाता है तो वेरी गुड वेरी गुड ऐसा बोलते हैं टीचर को पता है कि मेरा इंटेलिजेंस और मेरा पोजीशन स्टूडेंट से कहीं ज्यादा आगे है अब जैसे वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन वो एक पेट्रोनाश था मैंने हिडन शो जिसको स्वामी जी कहते थे इट वाज सपोज टू बी अ हिडन विश्व को दिखाना था कि क्रिश्चियनिटी ने कितना डेवलपमेंट कर दिया है और बाकी जो जंगली रिलीजन बारबिक रिलीजन जो है हिंदुइज्म है बुद्धिज्म है और वो भी जो भी शमा निज्म जो भी बोलो वो सबको हम क्रिश्चियनिटी के साथ में रख कर के शोकेस करेंगे कि दिस आर द हिडन दिस आर द बर्बेरिस और हमको देखो हम कितने सिविलाइज है ऐसा करने को गए किंतु बैकफायर हो गया स्वामी जी कहते हैं कि ए देर घोरे बाग ढुके छ माने इन लोगों के घर में शेर घुस गया है बेचारे इस तरह से डर गए हैं मेरे से स्वामी जीी अपने खुद को बोलते हैं कि घर खोला और उसमें कोई बिल्ली है ना कि वो भेड़ बकरी है ऐसा बोल कर के घर खोला उसको बुलाएंगे किंतु घर का दरवाजा खोलने से ही शेर घुस गया उन सभी को खा जा रहा है स्वामी जी ने खुद ने अपने बारे में बुलाया तो उनलोगों को ऐसा डर गए बेचारे कि अरे ये तो मने सिर्फ स्वामी जी अनागरिकम पाल जो कि बुद्धिज्म का रिप्रेजेंटेटिव था उसको भी बहुत ही सन्मान मिला था उस समय जो भी ईस्टन रिलीजन जो आए थे स्वामी जी का तो कोई कैटेगरी ही पूरा अलग है अदर देन दैट आप वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन का वो जो ग्रुप फोटोग्राफ देखेंगे वो सिंटो धर्म के जापानीज वगैरह लोग भी आए थे और वो रिपोर्ट बेरोज का डॉक्टर बेरोज का रिपोर्ट पढ़ेंगे सभी धर्मों को ईस्टन धर्मों को वो जो भी बोलते हैं समझ में आता है कि नहीं आता है अमेरिकन जो लिसन थे वो जो पढ़ने श श्रोत वर्ग थे उन्होंने बड़े ही प्रेम से बड़े ही रिस्पेक्टफुली उनको सुना है और उनकी उनको रिस्पेक्ट दिया है सो दैट इज ग्रेटनेस ऑफ अमेरिका तो अभी ये क्रिश्चियन लोग तो इसको बोलते हैं पेट्रोनाश फुल कुछ अच्छा काम करता है तो उसके सर पर हाथ रख कर के शाबाशी देता है तो हमको यह पेट्रोनाश है बाकी के रिलीजन जो है वो मैं उनको सराह आता हूं क्योंकि वो भी दे आर लीडिंग अल्टीमेटली तो मेरे ही रास्ते पर उसको को आना है अधिकारिक वेद क्या कहता है आप निम्न अधिकारी है तो आप कर्मयोग कीजिए थोड़ा सा आपका अधिकारत्ती कैपेसिटी तप करने की संयम करने की साधना करने की बढ़ती है तब भक्ति योग कीजिए उससे भी यदि आपकी यदि तपश्चार्य की कैपेसिटी बढ़ती है मन की एकाग्रता बढ़ती है मन का पवित्रता मन की पवित्रता बढ़ती है तो फिर धीरे-धीरे करके आप राजयोग की साधना प्रारंभ कीजिए और फिर आपकी कैपेसिटी सर्वोच्च लेवल पर पहुंच जाती है आप यदि उच्च अधिकारी हो जाते हैं तो आप ज्ञान योग की साधना का प्रारंभ कीजिए और सेम विद अदर रिलीजन अद्वैत वेदांत सर्वश्रेष्ठ है और यह बुद्धिज्म है ना कि क्रिश्चियनिटी है ना कि कोई भी आप धर्म की फिलोसोफी को लीजिए वे अल्टीमेटली तो आपको एक स्टेप या दो स्टेप तक नीचे तक आपको ले आएगी आपको संपूर्ण रूप से जाना है सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करनी है तो अल्टीमेटली आपको अद्वैत तक आना ही पड़ेगा ये एक पेट्रोनाश वाद का तो आयन महाराज का का कहना है कि जितने भी मत है इनफा पाथ टू इनफा रियलिटी उसकी किताब का नाम है तो जितने भी मत है वो इक्वली वैलिड है मने दिस इज व्हाट स्वामी जी वांटेड टू एस्टेब्लिश कि जितने भी मत है वो इक्वली वैलिड है और सभी मत आपको अल्टीमेटली वही सर्वोच्च अद्वैत अनुभूति तक ले आएंगे आपको ऐसा नहीं है कि मैं ज्ञान की कर्म की साधना करता रहूंगा करता रहूंगा तो एक पॉइंट तक ले आ कर के फिर वो मुझे छोड़ दे फिर मुझे अद्वैत में आना होगा यदि मुझे उस पॉइंट से आगे जाना है उसका कहना है कि यदि मैं कर्म की साधना परफेक्ट रूप से करूं तो मैं वही अद्वैत अनुभूति प्राप्त करूंगा जो कि मुझे अद्वैत वेदांत में होती है तो यह एक मत है कि ऑल पाथ आर इक्वल और दूसरा मत है अधिकारिक भेद कि आप एक लेवल पर जाइए एक पार्टिकुलर फिलोसोफी को पढ़कर पकड़ कर के फिर आपकी उसकी यदि आपकी एलिजिबिलिटी आपकी कैपेसिटी आपकी आपका तपश्चार्य पवित्रता आपकी एकाग्रता वो एक बढ़ जाता है तो आप हायर पाथ एक उच्च तरह की साधना को स्वीकार कीजिए या तो उसमें आगे बढ़ी तो मेरा पर्सनल ये मानना है खुद का कि जो आयन कहता है आयन महाराज जो कहते हैं कि सभी पाथ जो है वह इक्वली वैलिड है और इक्वली वैलिड पाथ से यदि मैं भक्ति की भी साधना एकदम ठीक-ठीक करता हूं तो मैं वही अद्वैत अनुभूति तक जाऊंगा यदि मैं कर्म भी ठीक रूप से करता हूं जो कि कर्म योग में कहा गया है बिल्कुल बिना लोग कार्य करते हैं कर्म करते हैं तो एक घमंड आ जाता है उनको लगने लगता है कि मैं अकेला काम करता हूं और बाकी सब निकम में बैठे होते हैं मैं ऐसे बहुत लोगों को देखा है साधु भी और वॉलेट्स को भी और स्टाफ को भी बहुत काम करते हैं बहुत टैलेंटेड है बहुत उन लोगों में काम करने की कैपेसिटी है दिन रात काम करते रहते हैं कभी छुट्टी भी नहीं लेंगे किंतु धीरे धीरे-धीरे करके इन लोगों के मन में एक ऐसा एक कॉम्प्लेक्टेड हो बाकी लोग यह लोग जो बीच-बीच में छुट्टी लेते हैं या कि फिर 6 7:00 बजे अपने रूम में चले जाते हैं या तो फिर सुबह को ऑफिस में देरी से आते हैं या तो फिर ऐसा कोई काम करते हैं जिसका बाहर के जगत में कोई वैल्यू नहीं है जैसे कि पुजारी है भंडारी महाराज है तो उन लोगों की डेडिकेशन या तो उन लोगों की कार्यक्षमता मेरे से निम्न प्र का की है ऐसा एक कॉम्प्लेक्शन आउट करना है जैसे कि आप सर्फ डाल कर के ये वॉशिंग पाउडर डाल कर के वाशिंग मशीन में अपने कपड़े धले धोएंगे तो वह आपका जो चरित्र है आपका हृदय है उसको आपको क्लीन करना है उसको वश करना है यह कर्म कर्म रूपी ये वाशिंग पाउडर डाल कर के कर्म रूपी वाशिंग मशी मशीन में डाल कर के तो जद आप कर्म रूपी वाशिंग मशीन में डालेंगे अपने हृदय को और बाहर निकालेंगे और भी ज्यादा गंदा हो कर के आएगा तो वो वाशिंग मशीन किस काम का है तो जद ठीक-ठीक कर्मयोग करेंगे तो जो निरह काता एक उदारता एक करुणा एक कंपेज एंड एंपैथी जो बिल्ड अप होगा वही करुणा कंपेज एंपैथी पवित्रता आपके मन को इस हद तक एकाग्र कर देगा कि यदि आप बैठ कर के अकाउंटिंग भी करते हैं तो वही अकाउंट में आपको ब्रह्म दर्शन होगा यह मेरा पर्सनल मानना है माने दिस इज माय इंटरप्रिटेशन ऑफ ठाकुर मान स्वामी जी लिटरेचर अदर वाइज एक ही पैसेज में यहां पर अद्वैद की भी बात करते हैं द्वैत की भी बात करते हैं वो उस इस बात को आप किस तरह से जस्टिफाई करेंगे या तो फिर इनको जद अधिकारिक भेद या तो अधिकारिक वाद यह लोग स्वीकारते तो इनको ऐसा कहना था कि हां यह उच्च अधिकारी के लिए मैं इस तरह से बताता हूं और फिर निम्न अधिकारी जो है इनके लिए मैं इस तरह से बताता हूं ये लोग क्लियर डिफाइन करते हैं इन लोगों को तो पता है कि भाई अपनी कैपेसिटी बौद्धिक क्षमता कोई इतनी नहीं है कि हम लोग इतना कॉम्प्लिकेटेड सब्जेक्ट मैटर हमारे सामने प्रस्तुत करें तो हम इजली इसको समझ पाए ये तो जनसामान्य के लिए है वो भी अमेरिकन रीडर श्रोताओं के लिए जिनको कि भारतीय आध्यात्मिकता का कोई भी बैकग्राउंड नहीं है हम लोग को तो फिर भी बचपन में हमने पुराण पढ़े हैं चंडी पाठ या तो रामायण ये महाभारत की सीरियल देखिए कम से कम और कुछ नहीं किया होगा तो तो हमको तो फिर भी एक बैकग्राउंड अंडरस्टैंडिंग है हिंदू धर्म की ये विदेशी लोग जिनका बैकग्राउंड बिल्कुल जीरो है जो लोग की बिल्कुल डिफरेंट तरह की रिलीजियस ट्रेडिशनल को समझाना है और इनको समझाते समझाते यदि स्वामी जी यह ना कहे कि हां एक ही पैसेज में मैंने अद्वैत का भी उल्लेख किया है उसी पैसेज में मैंने द्वैत का भी भी उल्लेख किया है आपको अपनी कैपेसिटी के अनुसार लेना है स्वामी जी ने इतना सब कुछ क्लियर हमको बताया फिलोसोफी और यह क्रुशल पॉइंट छोड़ दे ऐसा मैं नहीं मानता हूं इसीलिए जो भी इंटरनल एविडेंस है मेरा खुद का जो रीडिंग है उसकी ओर से मुझे लगता है कि जो कोई भी पाथ आप सिलेक्ट करें वह जैनिज्म भी हो जैनिज्म का उपवास का पाथ भी क्यों ना हो हमारे यहां पर एक स्टाफ है वह और मैं काफी जैन लोगों को पहचानता हूं बीच-बीच में बड़ा सीरियसली बड़ा ही निष्ठा पूर्वक उपवास वगैरह करेंगे मुझे कभी-कभी लग मैंने भी किया है अपने समय में किंतु मुझे लगता नहीं था कि इससे कुछ होने वाला है किंतु आज मुझे लगता है स्वामी जी को पढ़ कर के कि कोई भी पाथ क्यों ना हो वो आपको जैसे वो कता भज एक संप्रदाय इसके बारे में मैंने पहले भी कहा था कर्ता भजामि घोष कटाक्ष करके कह रहे हैं कि मैं उनके ऊपर में नाटक बनाऊंगा अभी कर्ता यानी कि गुरु और जीवंत गुरु है मनुष्य गुरु उसको आप भगवान मान कर के उसकी पूजा और उसकी प्रशंसा करना आरंभ कर देंगे तो घमंड उसके सर में चला जाएगा क्या ना क्या व्यभिचार आरंभ कर देगा तो ऐसा होता भी था कि कर्ता भज वाले जो भी थे गुरु कुछ स्त्रियों को लेकर के व्यभिचार करते थे शिष्या बना कर के स्त्रियों को तो गिरीश घोष ने कहा कटाक्ष के रूप में कि मैं इनके ऊपर में इनका भांडा फोड़ने के लिए एक नाटक बनाऊंगा तो ठाकुर ने क्या कहा नहीं वो भी एक पात है उसका भी सम्मान करना चाहिए वो अचलानंद तांत्रिक दक्षिणेश्वर में आता था तो ठाकुर कहते हैं कि इन लोगों ने आकर के मुझे बोला कि कारण वारी पान कीजिए कारण यानी कि शराब इनकी भाषा में तो ठाकुर बोलते हैं कि नहीं भाई मैं तो शराब को जो अपने सिर प तिलक कर सकता हूं या तो मुंह पे उंगली से स्पर्श करवा सकता हूं सर पे तिलक का तो याद नहीं किन तुम मुंह पे उंगली से स्पर्श करवा सकता हू ऐसा ठाकुर ने कहा इससे ज्यादा मैं कारण वारी पान नहीं कर सकता फिर ठाकुर ने देखा कि ये लोग शराब पी कर के नशे में मत्त होकर के क्या से क्या पागलपन कर किंतु एक अचलानंद है ठाकुर ने कहा कि वह स्थिर होकर के बैठ कर के जप करता है वोह एक देखा कि उसके ऊपर में शराब का य नेगेटिव असर नहीं होता तो यह शक्ति साधना तंत्र साधना जिसको कि सामान्य समाज की नजर में एक व्यभिचार का पथ माना जाता है ओरिजिनल साधना में कोई गड़बड़ी नहीं थी किंतु उसको उसका प्रैक्टिस करने वाले लोगों ने उसको बिगाड़ दिया है वरना तो ठाकुर ने भी शक्ति साधना की है ठाकुर ने भी वीर भाव की साधना की है कहां उस में कुछ गलत था किंतु जो लोग प्रैक्टिस करते हैं उन लोगों ने इसको बिगाड़ दिया है तो इवन उस तरह की साधना को भी ठाकुर यथेष्ट सम्मान देते थे तो अपने ऑर्डर का जो कुछ वो पढ़ कर के अ ओके मेरे और आयन महाराज के बीच में जो डिफरेंस था वो बेसिकली मैं शुरू में मानता था अधिकारिक भेद को लेकर के वो मेरा पॉइंट ऑफ व्यू था तो मैंने उसको कहा कि देखो तुम जो भी कुछ कहो ठीक है मलब अपना जो भी बुद्धि तुम चलाओ अल्टीमेटली देखो कि एक स्वामी जी ने मायावती से मां को पत्र लिखा है वो बड़ा ही फेमस पत्र है कि जब स्वामी जी वहां पर गए तो उन्होंने देखा कि ठाकुर की फोटो रख कर के पूजा आरंभ कर दी है तो ठाकुर के स्वामी जी क्या कहते हैं बूढ़ो खाने चले लो की मैंने बूढ़ा यहां प भी चलाया कि स्वामी जी ने कहा था कि एक सेंटर ऐसा हो अद्वैत भाव की साधना करेंगे तो वही मायावती जाकर के देखते हैं कुछ साधु लोगों ने ठाकुर का फोटो रख दिया है और कोई पूजा वगैरह कर दिए तो स्वामी जी ने ठाकुर का फोटो हटा दिया यह देख कर के एक साधु को बड़ा ही आघात हुआ उसने मां को पत्र लिखा कि उसने मां को लिखा कि अच्छा मां स्वामी जी जो ऐसा कह रहे हैं कि अपना तो सिर्फ अद्वैद भाव ही है तो यह तो गलत नहीं हुआ क्या ठाकुर खुद तो मां के पुजारी थे तो उसने ऐसा करके व प्रश्न किया कि क्यों स्वामी जी अद्वैत भाव को इस तरह से बढ़ा रहे हैं तब मां ने प्रश्न के उत्तर में कहा था कि हां बेटा हम सब लोग अद्वैत तुम्हारे गुरु भी अद्वैत थे और हम भी अद्वैत है तो जब मैंने आयन को यह कहा कि तुम कोई भी इंटेलेक्चुअल आर्गुमेंट करो किंतु मां की यह बात जो है उसको तुम किस तरह से काटोगे तो वह क्या कहता है कि मां को फिलोसोफी नहीं समझ में आती थी इसलिए उनकी बात लेने की जरूरत नहीं मैंने कहा अरे सार पागल क्या बात कर रहे हो मा को तो इस तरह से हमारे दो तीन पॉइंट ऑफ व्यू थे जो कि बड़े ही डिफर करते थे अल्टीमेटली देखिए कि मैं पहले से ही उसके साथ में सहमत था और अभी भी हूं किंतु जिस तरह से वह चीजों को डिराइवर करता है जिस तरह से वह आर्गुमेंट बिल्ड अप करता है उसके साथ में मेरा थोड़ा ऑब्जेक्शन था तुम मां की बात को इस तरह से नहीं काट सकते हो वरना फिर वोह सीधा सधी तुम्हारा आर्गुमेंट का पावर जो है वो खत्म हो जाएगा तुम कोई भी साधु को ऐसा कहोगे कोई भी डिवोटा को ऐसा कहोगे कि मां को फिलोसोफी नहीं आती इसलिए मां की बात लेने की जरूरत ग्रहण करने की जरूरत नहीं तो तुम्हारी आर्गुमेंट का वैलिडिटी बिल्कुल जीरो हो जाएगा तुम ऑक्सफोर्ड में जाकर के ना विदेश में जाकर के आर्गुमेंट करोगे वो फिलोसोफर को समझाओ ग वो सब ठीक है व वे लोग मान लेंगे हम लोग इसको कभी स्वीकार नहीं करेंगे यू विल हैव टू हैव प्रॉपर आर्गुमेंट यू विल हैव टू हैव प्रॉपर काउंटर्स टू एवरी आर्गुमेंट अदर वाइज रामकृष्ण मिशन में इसका कोई स्थान नहीं रहेगा लोग बोलेंगे इ अ वेरी गुड बुक ऑक्सफर्ड से पब्लिश हुई है क्या है ठीक है चलो किंतु इससे ज्यादा फिर इसको कोई यह नहीं होगा हम लोग इसको ग्रहण नहीं करेंगे तो दैट वाज द पॉइंट ऑफ डिफरेंस और उसका कहना है कि मैंने इनके साथ में आर्गुमेंट किया है और मैं जीत गया हूं तो ठीक है वो किताब लिखे तो जीत मुझे पता भी नहीं था उसने मेरा नाम मेंशन मुझे थर्ड पर्सन से पता चला कि वह किताब में आपका नाम है तो मैंने उसको मैसेज किया मैंने कहा क्या रे तम मुझे बिना बताए मेरे सा मेरे नाम पर सब लिख रहे हो ठीक है वो मित्र है व हम लोगों का ऐसा चलता रहता है अभी वो बहुत बड़ा आदमी हो गया है व मैसेज करने से रिप्लाई भी नहीं देता लास्ट टाइम मैंने मैसेज किया तो बोला मैं झुर में हूं बाद में बात करता हूं मैंने कहा ठीक है अच्छा सो अप्लाइड रीजन टू द होल ऑफ द यूनिवर्स वी सी दैट इंटेलिजेंस मस्ट बी द लॉर्ड ऑफ क्रिएशन ये इंटेलिजेंस या तो कॉन्शसनेस है वो विश्व ब्रह्मांड का अधिपति है इसी इंटेलिजेंस में से कॉस्मिक कॉन्शसनेस में से इस विश्व ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है और बिकॉज कि हम लोग यहां तक आए हैं इंटेलिजेंस विश्व ब्रह्मांड का लॉर्ड ऑफ क्रिएशन है ऐसा स्वामी जी ने कहा है इसलिए गीता का एक श्लोक अहम आत्मा गुड़ा केश सर्व भूता शय स्थित अह माद च मध्यम च भूता नाम अंत ए वच भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि हे गुड़ाकेश मैं सभी के हृदय में स्थित हूं गुड़ाकेश अर्थात की जिसने नींद के ऊपर में विजय प्राप्त कर ली है मैं ही आदि हूं मैं ही मध्य हूं और मैं ही अंत हूं भगवान कृष्ण स्वयं गीता में ऐसा कहते हैं तो आगे हम कल देखते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु