Transcript
ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः स्वामी जी का पत्र पढ़ रहे थे स्वामी जी जैसे कल हमने देखा कि स्वामी जी के हृदय में भारत के प्रति जो प्रेम है और जो उनके हृदय में एक कष्ट होता था कि भारत की दुरावस्था देख कर के उस समय के भारत की तो वह कभी-कभी यह सहन नहीं कर पाते थे कि वह जितना चाहते हैं कि जितना रेपिडली भारत का विकास हो जितना रेपिडली श्री रामकृष्ण देव के संतान शिष्य भक्तगण इकट्ठा मिलकर के एक संघ की स्थापना करें और यह संघ भारत भ वर्ष के कल्याण के लिए और सिर्फ भारत के नहीं पूरे विश्व के कल्याण के लिए कार्य करें यह चाहते थे कि बहुत ही रेपिडली हो किंतु स्वामी जी की जितनी इच्छा थी इतनी इच्छा से इतना तीव्र गति से इतना स्पीडली कार्य नहीं हो पा रहा था और इसीलिए स्वामी जी कभी-कभी दर्द के मारे कुछ ऐसा कह देते थे कि जिसको पढ़ने को वैसे हमको आनंद तो बड़ा आता है किंतु कभी-कभी दुख भी होता है कि स्वामी जी ऐसा कहते हैं किंतु जो भी है याद रखना है कि यह सब भारत के बारे में उन्होंने यह जो बातें कही है वह उस समय के गुलाम भारत के बारे में थी आज का भारत स्वामी जी की इच्छा के अनुसार चाहे स्वामी जी ने जितना सपना देखा होगा या तो फिर आशा रखी होगी इतना रेपिडली तो डेवलप शायद नहीं किया होगा किंतु एटलीस्ट 10 पर भी जद स्वामी जी का जो विजन है उसके साथ में हम कदम मिलाकर चल सक तो मुझे लगता है कि वी विल गो फार अवे फार अहेड और मुझे लगता है कि ऑलरेडी हमने बहुत सारा अचीवमेंट कर लिया है तो इसीलिए स्वामी जी जब कल कहते थे ए देशर लोके इकट्ठा हुए काज कोरे और आदर सकल काज बैगी हिंसा प्रवृति मध पड़े चोरमार ए देशर अर्थात की अमेरिका के लोगों का साथ में मिलकर के काम करने की प्रवृत्ति वृत्ति बड़ी है जबक भारत में साथ में मिलकर के काम करने की बारी आएगी तो ईर्षा और अकर्मण्यता काम चोरी इसमें पढ़ कर के सब सत्यानाश हो जाएगा आगे स्वामी जी लिखते हैं हरमोहन मध्य मध्य एक दिग्गज पत्रों लेखन हरमोहन स्वामी जी का एक मित्र था ठाकुर का भक्त था व स्वामी जी कहते हैं बीच बीच में एक दिग्गज अर्थात कि एक बहुत बड़ा पत्र लिखता है ता आमी अध पढ़ते पारी ना इतना लंबा पत्र लिखता है और इसमें इस तरह से उसके हैंडराइटिंग है स्वामी जी कहते हैं मैं आधा पढ़ नहीं पाता इहा अर पखे परम मंगोल और यह जो लंबा पत्र लिखता है उसका आधा स्वामी जी नहीं पढ़ पाते स्वामी जी कहते हैं यहा आमार पखे परम मंगोल यह मेरे लिए बड़ा मंगल प्रद है क्यों कारण अधिकांश खबरो डोले क्यों क्योंकि ज्यादातर जो है जो खबर देता है इस तरह की होती है किस तरह की जो था अमुक मोरार दो काने बसे अमुक लेरा अपनार विरुद्ध ही सकल कथा बोते लो अर्थात की किसी मोदी की दुकान पर बैठ कर के कुछ लड़के आपके बारे में इस तरह की बातें कर रहे थे आर ताते असच बोधे ताहर सहीत कोलो करलाम इति तो यह लोग आपके बारे में ऐसी कोई निंदा वाद या तो कटू कथा कहते थे तो वह सुनकर के मुझे बड़ा ही असह्य बोध हुआ मैं बड़ा ही परेशान हो गया और मैंने डट के इन लोगों का मुकाबला किया अर पक्ष समर्थन जन तहा के अनेक धन्यवाद स्वामी जी कहते हैं कि मेरे पक्ष समर्थन के लिए उसको बहुत धन्यवाद किंतु जेले आर संबंध के की बोली इहा स विशेष सुनि बार विशेष बाधा ई ज स्वल पश्च कालो बहु विजना किंतु यह छगन मगन मेरे बारे में क्या कुछ कह रहे हैं इसके बारे में विस्तार से सुनने के विरुद्ध में यह बड़ी बाधा है यह बड़ा प्रॉब्लम है स्वल्प कालो बहुवचना काल अर्थात कि समय अल्प है और बहुत सारी बाधा विपत्तियों को पार करके ठाकुर का कार्य समाप्त करना है देखिए कि अ इस तरह के बहुत सारे उदाहरण है अपने संघ में ठाकुर का ही देखिए कि निरंजन महाराज एक बार आ रहे थे नौका में दक्षिणेश्वर सुना के कुछ लोग ठाकुर की निंदा कर रहे हैं तो सुनकर के निरंजन महाराज बड़े ही नाराज हो गए और वे तो बलिष्ठ थे उन्हे तो कुश्ती भी सीखते थे तो उने नौका उल्टा देने के बारे में व तैयार हो गए इतने नाराज होकर बोले कि नौका को उल्टा दूंगा और मैं तो तेर के गंगा के सामने पर चला जाऊंगा किंतु तुम लोग जो है वो डूब जाओगे तो सामने वाले बेचारे जो ठाकुर की निंदा करते थे वो शांत हो गए अभी यह बात जब ठाकुर को पता चली तो ठाकुर बड़े ही नाराज हो गए बोला कि अरे तुमको किसने बोला था मुझे डिफेंड करने को और फिर इस तरह का क्रोध ठाकुर यह शब्द यूज करते हैं क्रोध चंडाल क्रोध है वह बड़ा ही भयावह है हमारे मन को वह क्या करता है एक वशीभूत कर देता है हिप्नोटाइज कर देता है हम उसकी असर में आकर के जैसे नशा किया हुआ व्यक्ति उसके नशे की असर में क्या बोलता है अच्छा बुरा सही गलत इसका विवेक उसका चला जाता है वैसे ही क्रोध है क्रोध में आकर के हम अपना विवेक बैठते हैं सही गलत की व्याख्या विस्मृत हो जाती है तो क्रोध चंडाल ठाकुर कहते हैं निरंजन महाराज को कभी भी इस तरह से क्रोध मत करो और सामने ही योगेन महाराज थे बाबूराम महाराज थे मोस्ट प्रोबेबली बाबूराम महाराज थे कि इस तरह से किसी ने ठाकुर की निंदा की और वह चुपचाप सुन कर के वापस आ गए तो ठाकुर ने कहा अरे तुमने गुरु निंदा सुन कर के कोई प्रतिवाद नहीं किया यह तो ठीक नहीं है तो अभी क्या था कि बाबूराम महाराज का नेचर थोड़ा सा सॉफ्ट था तो इसलिए उनको थोड़ा सा मने रजस उनमें बढ़ाने की जरूरत थी तो ठाकुर ने उनको इस तरह से बताया और निरंजन महाराज में रजस बहुत ज्यादा था तो थोड़ा सा रजस को शांत करने की जरूरत थी इसलिए ठाकुर ने उनको इस तरह से उपदेश दिया यहां पर क्या है यह हरमोहन अभी ये जितने भी उपदेश है सभी डिपेंडेंट अपॉन द पर्सन कि कौन सामने वाला पर्सन जो यह सब कर रहा है उसके ऊपर है अभी निरंजन महाराज और बाबूराम महाराज दोनों ही तो क्या बड़े उच्च कक्षा के साधक थे अभी किंतु ये हरमोहन जो है हरमोहन क्या था इज गुड बॉय अपने जिस तरह से इंग्लिश में एक शब्द है गुड बॉय गुड बॉय का क्या अर्थ है जैसे गुजराती में शब्द है वेदियो वेद अर्थात कि एक अच्छा आदमी है किंतु क्या है कि कुछ कार्य शक्ति उसके भीतर में नहीं है बोलकर के शांत हो जाता है और यहां पर स्वामी जी को चाहिए थे कर्म तत्पर जिसके हृदय में क्षत्र वीर्य हो प्रचंड उत्साह हो प्रचंड विल पावर हो और ऐसे गुड बॉय जो होते हैं इन लोगों के भीतर में क्या होता है सत्व अर्थात की नीतिमत्ता की राह पर चलने की वैसे इच्छा तो बड़ी होती है किंतु कार्य शक्ति या तो फिर विल पावर इन लोगों में नहीं होता अर्थात कि कोई भी काम करने को बोलेंगे 10 बहाने निकालेंगे या तो फिर किसी ना किसी अर्था या तो फिर यदि काम स्टार्ट भी करेंगे तो अधूरा छोड़ देंगे हरमोहन थोड़ा सा इस तरह का था अच्छा आदमी था अच्छा मैंने स्वामी जी का बड़ा सुंदर अच्छा मित्र था और स्वामी जी जब भारत वापस आए थे तो उसको हरमोहन को स्वामी जी ने हेल्प भी किया था पैसा देकर के तो वह सब कुछ है किंतु अभी तो स्वामी जी अमेरिका थे उस समय स्वामी जी को जरूरत थी कि जिसका एक प्रचंड विल पावर हो तत्पर कार्य करने की शक्ति हो ऐसे लोग जो कि एकदम एक बार फाउंडेशन लग जाए रामकृष्ण संघ का तो फिर धीरे-धीरे करके वो सिर्फ वो चलता रहेगा ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम किंतु जब फाउंडेशन इट सेल्फ जब लगना होता है तब स्ट्रांग कार्य तत्पर लोगों की जरूरत होती है तो इसीलिए हरमोहन उसमें से नहीं था इसलिए स्वामी जी यहां पर लिखते हैं और स्वामी जी की इच्छा थी कि उनके जितने भी मित्र है ठाकुर के जितने भी डिसाइल है सभी के भीतर में यह प्रचंड उत्साह प्रवेश करें यह प्रचंड देश प्रेम यह मानव कल्याण के लिए एक कंपेज एक सहानुभूति यह उनके हृदय में जाए सभी को आत्मवृत्त कर दे व्यष्टि साधना को समष्टि साधना में परिणत कर दे यह स्वामी जी चाहते थे मैं आत्म स्वरूप का या तो ईश्वर का दर्शन मेरे हृदय में ही क्यों करूं मैं सभी के भीतर में आत्म दर्शन करूंगा सभी के भीतर में मैं ईश्वर दर्शन करूंगा तभी तो अभी क्या होता है कभी-कभी कि मैं जब तक एक अकेला बैठा हूं गुफा में या तो एक एकांत में मंदिर है गांव के बाहर में और वहां पर मैं अकेले बैठ कर के शिवलिंग के सामने या तो महावीर की मूर्ति के सामने ध्यान कर रहा हूं जप कर रहा हूं तब तक तो ठीक है जैसे कि तोतापुरी का था कि तोतापुरी वैसे तो वेदांत की बड़ी-बड़ी बातें किया करते थे किंतु एक दिन क्या हुआ वोह अग्नि प्रकट करके बैठे थे अभी वो वो जिस पंथ के थे उन लोगों का था कि अग्नि को बड़ा ही पवित्र मानते थे और अग्नि को प्रकट करके उसकी वह उसके भीतर में कुछ ऑफि वगैरह भी किया करते थे तो इस तरह से अग्नि प्रकट करके बैठे थे पवित्र अग्नि वहां पर एक आदमी आया उसको वो चिलम वगैरह कुछ पीना था चिरू वगैरह तो या तो फिर यह बीड़ी सिगरेट तो जैसे ही उसने देखा कि अग्नि प्रकट रहा है उसने उसमें वो चिलम जलाने के लिए डाला तो जैसे ही ये तो पुरी ने देखा इतना क्रोधित हो गए और उसको मारने को तोड़े दौड़े तो ठाकुर हंसने लगे कि देखो तुम अभी बोलते हो कि सभी के भीतर में आत्मन है ब्रह्मण है सभी कुछ ब्रह्ममयम लोगों के संपर्क में नहीं आते हमको लगता है कि हम सभी लोग ब्रह्मज्ञानी हो गए हैं जैसे ही लोगों के संपर्क में आते हैं हमारा ब्रह्मज्ञान कहां अदृश्य हो जाता है पता ही नहीं चलता फट कर के भीतर के जो ईर्षा द्वेष यह काम चोरी य किसी को हेल्प नहीं करना यह जितने भी ये क्लेश कहा जाता है योग की लैंग्वेज में कहेंगे पंच क्लेश अविद्या अस्मिता राग द्वेष और अभिनिवेश यह पंच क्लेश कहां से आकर के हमारे सर पर सवार हो जाएंगे हमको पता भी नहीं चलता इसीलिए यह जब तक हम यह व्यष्टि साधना से ऊपर आकर के थोड़ा सा समष्टि साधना नहीं करेंगे तब तक हमारा एक प्रॉपर असेसमेंट नहीं होगा कि मैं कहां तक पहुंचा हूं ऐसा ही लगेगा कि मुझे ब्रह्मज्ञान मिल गया है तो यह जो था यह हरमोहन इसी टाइप का एक था विल पावर वीक है थोड़ा सा मने कार्य करने की शक्ति भी इतनी नहीं है किंतु फिर स्वामी जी को लंबा-लंबा लेटर लिखता है और लेटर में लिखता है कि मैं एक किसी की दुकान पर बैठा था वह करियाणा की दुकान पे नहीं कि कहां पे वहां पे कुछ लड़के आपकी बड़ी निंदा कर रहे थे तो ये मैं से देखा नहीं गया और मैं उनका बड़ा डट करके उनका प्रतिवाद किया तो स्वामी जी कहते हैं कि अभी मुझे यह सब लोग मेरी क्या निंदा करते हैं क्या बोलते हैं यह सब डिटेल में जानने के विरुद्ध में अभी एक ही बड़ा प्रॉब्लम है स्वल्प कालो बहुवचना अल्प समय है और बहुत सारा कार्य करके जाना है स्वामी जी कहते हैं कि देखो इसमें जद यह शक्ति है कि कोई मेरे बारे में कुछ भी भी बोलता है तो फट करके डिफेंड करने को चलाता है तो इसको जो मैं जो कहता हूं वो करने में उसको क्यों दिक्कत होता है यह करने में उसका क्या प्रॉब्लम है माने यदि हम कोई किसी को कहते हैं कि अच्छा कि मुझे यह चीज बड़ी पसंद है या तो फिर मैं जैसे वो ठाकुर कहते हैं ना कि एक चोर को किसी ने कह दिया कि ये बगल वाला जो कमरा है उसमें बहुत सारा बहुत सारा धन पड़ा हुआ है सोना मोहोर जवाहरात हीरे वगैरह पड़े हुए हैं तो अभी यह चोर जो है इसको विश्वास कब होगा इसके ऊपर में कि हां यह व्यक्ति जो बोल रहा है वह सही है कि गलत है यदि उसको लगेगा कि यह जो सामने वाला बता रहा है उसकी क्रेडिबिलिटी कोई बहुत ज्यादा नहीं है हो सकता है कि वो वैसे ही गप मार रहा हो तो वो बोल के बोलेगा अच्छा ठीक है चलो होगा हिरा जावत मुझे क्या है और यदि वो उसको सामने वाले की क्रेडिबिलिटी पर विश्वास होगा तो वो क्या करेगा उसका जो चोर चोरी करने की जो उसकी प्रवृत्ति है वो इतनी प्रबल हो जाएगी उसका धन के प्रति लोभ है वह इतना जागृत हो जाएगा कि कैसे भी करके इस कमरे का दरवाजा तोड़ करके कितना ही परिश्रम करके दरवाजा इंजेन लगा कर के दरवाजा तोड़ के भीतर का हीरा जवारा चोरी करने के लिए रेडी हो जाएगा तो यह देखिए कि यहां पे हरमोहन है ऐसे बहुत सारे लोग थे कि वो वर्बल तो स्वामी जी को सपोर्ट करते हैं किंतु जब कार्य करने की परिश्रम करने की बात आती है सभी लोग एकदम डर जाते हैं कि अरे परिश्रम करना परिश्रम क्या है वर्बल सपोर्ट कर देंगे वर्बल यह कर देंगे वर्बल वो कर देंगे वर्बल स्वामी जी के लिए झगड़ा कर देंगे किंतु स्वामी जी का काम करने के लिए गरीब आदमी है उसको कुछ सिखाना उसको पढ़ाई लिखाई सिखाना या तो उसको कुछ दान देना यह करना कौन करेगा माने यही है कि आपकी स्वामी जी के प्रति क्या आपका विश्वास या श्रद्धा कितना है ये इससे पता चलता है कि स्वामी जी जी जो कहते हैं व करने की हम हम रेडी है कि नहीं उसको करने की क्षमता है कि नहीं वो करने की तत्परता है कि नहीं यदि करने की तत्परता नहीं सिर्फ वर्बल हम लोग सब बातें करते हैं तो इसका अर्थ यही हुआ कि हम मुंह से चाहे जो भी बोलते हो स्वामी जी के ऊपर में अपना श्रद्धा विश्वास और निष्ठा कमजोर है वह 100% नहीं आया सिर्फ 10 पर 20 पर आकर के वहीं पर रुक गया है स्वामी जी आगे लिख हैं एकटा ऑर्गेनाइज्ड सोसाइटी चाहि शशि घोर कोन्ना देखु नाल टाका कोड़ी बाजार पत्रे भार निक स्वामी जी कहते हैं एक ऑर्गेनाइज्ड सोसाइटी चाहिए शशि घोर कुन्नार भार निक घोर कोन्ना अर्थात की यह जो मेंटेनेंस है किचन है आहार बनाना है वगैरह वगैरह वह उसका भार लेगा उसका रिस्पांसिबिलिटी लेगा शशि सान्याल टाका कोड़ी बाजार पत्र अभी सान्याल महाशय वैसे तो थे ठाकुर के भक्त थे और बाद में थोड़ा सा गेरुआ पहन कर के शरत महाराज वगैरह के साथ में तीर्थ भ्रमण भी बहुत किया था किंतु अभी मुझे उनकी लाइफ के बारे में इतना डिटेल नहीं पता किंतु यह बात मुझे पक्का पता है कि बाद में वह अपने सघ में सन्यासी के रूप में रहे नहीं थे क्योंकि ज्यादातर मैं स्मृति कथाएं पढ़ता हूं तो वहां पर सान्या महाशय करके ही उनके नाम का उल्लेख है सान्याल महाराज करके वह कहीं पर मैंने नहीं देखा गेरवा लिए थे उनके साथ में गुरु भाइयों के साथ में आलम बाजार मठ में उद्बोधन में रहे भी थे और शायद वरा नगर में तो नहीं किंतु उद्बोधन में तो रहे ही थे और इनके साथ में भ्रमण भी किया था किंतु आखिरी तक वह संपूर्ण रूप से सन्यास नहीं ले पाए थे और कहीं पर अधूरा छोड़ दिया था यह मेरी धारणा है क्योंकि अपनी सभी स्मृति कथाओं में इनका नाम सान्याल महाशय के रूप में ही उल्लेखित है तो यह अभी किंतु सान्याल इन लोगों के साथ में रह रहे थे सानियाल महाशय इसलिए स्वामी जी कहते हैं कि सानियाल टाका कोड़ी और बाजार पत्रे भारक अर्थात कि ये अकाउंट और परचेसिंग शॉपिंग एंड अकाउंट यह दोनों का रिस्पांसिबिलिटी सानियाल को दो शरत सेक्रेटरी होक अर्थात चिट्ठी पत्र शोभ लेखा इत्यादि शरद होगा सेक्रेटरी और सेक्रेटरी का क्या अर्थ है चिट्ठी पत्र लिखना अर्थात की कोस्पेसस महाराज को सेक्रेटरी बनाना है और बाद में क्या हुआ था पता है जब महा राजा महाराज की महासमाधि हुई थी इसके बाद में मीटिंग हुई सभी ऑलमोस्ट बहुत सारे सेंटर से सीनियर साधु आए थे वो मीटिंग में यह डिस्कस होना था कभी राजा महाराज के बाद में नेक्स्ट प्रेसिडेंट रामकृष्ण संघ का कौन होगा तो ज्यादातर जो डेलिगेट्स आए थे इनकी इच्छा थी कि शरत महाराज प्रेसिडेंट हो क्योंकि उद्बोधन में रहकर के शरत महाराज ने इतना सुचारू रूप से संघ को चलाया था मां के द्वारी थे मां की इतनी एकनिष्ठ सेवा की थी मां का आशीर्वाद उनके ऊपर था तो बोलकर के सभी की इच्छा थी कि शरत महाराज अपने संघ को अपने जितने जितने ब्रांच सेंटर है वहां पर जो एक्टिविटीज है जितने भी नए आए हुए ब्रह्मचारी सीनियर साधु सबके साथ में उनका परिचय है उनकी वृत्ति उनकी प्रवृत्ति क्या है यह उनको पता है किसका पोस्टिंग कहां पर करना है किस सेंटर में क्या कार्य अच्छा करना उचित है नया सेंटर लेना नहीं लेना यह सब डिसीजन तो शरत महाराज का था तो शरत महाराज इज अ परफेक्ट पर्सन टू सीट इन द चेयर ऑफ द प्रेसिडेंट ऑफ रामकृष्ण ऑर्डर किंतु उस समय शरत महाराज ने कहा था कि नहीं देखो कि स्वामी जी मुझे सेक्रेटरी बना कर के गए हैं मैं सेक्रेटरी ही रहूंगा महापुरुष महाराज होंगे नए प्रेसिडेंट तो शरत महाराज ने उस समय यानी देखिए कि यहां पर वो जो ठाकुर ने काशीपुर में एक चिट्ठी में लिखा था नर शिखे देवे जखन घरे बायरे हाक देवे अर्थात की नरें शिक्षा देगा नर जगत को सिखाएगा उपदेश देगा वेदांत की शिक्षा देगा तो ठाकुर ने जिस तरह से नरेद को लिख कर के यह जो पावर ऑफ एटर्नी दिया था यहां पर भी स्वामी जी ने इस पत्र में लिख कर के शरद महाराज को पावर ऑफ एटर्नी एज अ सेक्रेटरी ऑफ अवर ऑर्डर दे दिया है कि शरत सेक्रेटरी होगा अर्थात कि कॉरेस्पोंडेंस का पूरा जिम्मा उसके सर पर रहेगा एकटा ठिकाना करो मछे हंगाम की कोरचो अर्थात कि यह जो हरमोहन की तरह यह जो हल्लागुल्ला करके घूमते रहते हो यह सब बंद करो मछे हंगाम अर्थात की बिना मतलब का हल्लागुल्ला हंगामा बंद कर दो एक ठिकाना करो अर्थात कि एक रहने की ठीक ठीक जगह करो बुझते पारले कि ना स्वामी जी कहते हैं समझते हो कि नहीं खबरेर कागज ढेर होए गे छ एक खोने आर दरकार ई खबर के कागज में निकालना कि हां स्वामी विवेकानंद भारत से गए हैं हमारे रिप्रेजेंटेटिव है यह सब बहुत हो गया अभी यह सब जरूरत नहीं है एक खोने तोमरा किछु करो देख देखी अर्थात कि अभी तुम लोग कुछ करके दिखाओ अभी तक तो यह हो गया कि मीटिंग बना कर के रेजोल्यूशन करना या तो फिर यह किराने की दुकान पर बैठ कर के लोगों से भिड़ जाना जो कि मेरी निंदा करते थे यह सब तो बहुत हो गया शाब्दिक व्यवहार बहुत हो गया अभी कुछ करके दिखाओ जोद एकटा मोठ बनाते पारो तबे बोली बहादुर नले घोड़ार डीम जद तुम लोग एक मठ बना सकते हो तभी मैं कहूंगा तुम बहादुर हो ना जो या तो फिर यह सब है घोड़ा डीम घोड़ार डीम अर्थात की घोड़े का अंडा घोड़ा कभी अंडा नहीं देता मुर्गी जिस तरह से अंडा देती है घोड़ा तो अंडा नहीं देता वो तो एक बच्चे को प्रसव करता है तो इसलिए घोड़े का अंडा होता ही नहीं इसलिए बंगोली में यह एक कहावत है कि जिस चीज का कोई अस्तित्व ही नहीं है या तो फिर जिस जो चीज बिल्कुल एक मिथ्या है उसको कहते हैं घोड़ार डीम अर्थात कि घोड़े का अंडा तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि यदि तुम लोग एक मठ बना सको तो मैं तुमको बहादुर कहूंगा या तो फिर यह सब हो गया तुम लोगों की जो बातें हैं घोड़े के अंडे जैसी है सब व्यर्थ है सब मिथ्या है किसी काम की नहीं है मंद्र लोकर संगे जुक्ति करे काज करबे अर्थात की मद्रास के लोगों के साथ में मिलकर के काम करो यह सब ब्रांच सेंटर है देखिए पहले कैसा होता था भारत में वैसे मठ तो थे ट्रेडिशनल मठ किंतु एक ऑर्डर होना एक बिल्कुल डिफरेंट चीज है जिस तरह से बुद्धि ऑर्डर हुआ करते थे जिस तरह से क्रिश्चियन ऑर्डर है रामकृष्ण ऑर्डर इज समथिंग डिफरेंट देन य ट्रेडिशनल मठ ट्रेडिशनल मठ में क्या होता है जैसे कि मैं ओमकारेश्वर गया था कुछ दो-तीन महीने रहने के लिए मैं 2015 की बात है उस समय की बात है वहां पर सामने ही यह मार्कंडेय है वो यह रामानंद सरस्वती ने इस आश्रम की स्थापना की बहुत सुंदर आश्रम है रामानंद सरस्वती ने वेदांत के ऊपर में बहुत सारे प्रवचन दिए वेदांत के प्रचार में उनका एक बड़ा ही हिंदी भाषी विस्तार में बड़ी भूमिका है उनकी तो ये आश्रम इतना सुंदर वहां पर विद्या चर्चा होती है बहुत सारे साधु जाकर के रहते हैं और जहां पर भी आप जाएंगे सन्यासी जाता है तो उनको कुछ काम करेगा बिना काम के खाना नहीं है यह उचित नहीं है तो जो वहां पर जाएगा रहेगा सबको कुछ ना कुछ छोटा-छोटा वो काम देंगे कर्म देंगे तो सेवा सेवा देंगे तो कोई किचन में रोटी बनाएगा कोई झाड़ू पोछा लगाएगा ऐसा कोई कुछ ना कुछ सभी लोग सेवा करके रहेंगे तो आश्रम बड़ा सुंदर है किंतु उस आश्रम में और मैं बहुत ऑलमोस्ट रेगुलरली जाया करता था मुझे बड़ा अच्छा लगता था बड़ा सुकून मिलता था व सुबह का नाश्ता वगैरह हो गया फिर अपने यहां जैसा नहीं रामकृष्ण मिशन में चलो अभी दौड़ो ऑफिस में जाना है काम करना है ये ड्यूटी है वो ड्यूटी है ऐसा नहीं वो पेड़ के नीचे बैठे हैं तो बढ़िया मजे से गप लगा रहा है तो मुझे वहां प जाना बड़ा अच्छा लगता था इन लोगों के साथ गप लगाना तो उसमें वो मारकंडे आश्रम वो ट्रेडिशनल मठ की तरह जो कार्य करता है और रामकृष्ण मिशन इज एन ऑर्डर ऑर्डर और यह ट्रेडिशनल मठ में बहुत बड़ा डिफरेंस है ऑर्डर एक ओवरऑल उसके सामने एक डायरेक्टिव होता है ओवरऑल इसके सामने एक फंक्शन होता है जबकि मठ क्या है वो इंडिविजुअल साधुओं का समूह है सभी साधु अपने अपने हिसाब से साधना तपस्या करते हैं और उनको जो तपस्या करने के लिए साध ना करने के लिए जो एक फैसिलिटी चाहिए रोटी कपड़ा मकान बीमार हो गए तो ट्रीटमेंट और यदि थोड़ा बहुत विद्या अभ्यास अपने साथ में दूसरे साधक हैं उनके साथ में बैठ कर के गप लगाना वगैरह यह जो उनको कुछ फैसिलिटी चाहिए यह फैसिलिटी मठ से उनको मिलती है तो इसीलिए यह मठ होता है इसके लिए इंडिविजुअल साधकों की तपस्या करने के लिए और ऑर्डर होता है ऑर्डर का एक एम एंड ऑब्जेक्टिव होता है ऑर्डर का एक मिशन होता है और सभी साधु इस मिशन को कार्यरत करने के लिए जुड़े होते हैं और यह मिशन को संपादित करना ही उनकी साधना है बाकी ट्रेडिशनल साधना तो है ही है किंतु ऑर्डर का अर्थ ही है कि ऑर्डर का जो कार्य है वह कार्य यह करें यह उनकी सबसे बड़ी साधना है तो दिस इज द डिफरेंस बिटवीन ट्रेडिशनल मठ एंड अ ऑर्डर एक जिस तरह से एक मठ रहता है बहुत सारे मठ है आप उत्तराखंड में जाएंगे काशी में जाएंगे साउथ इंडिया में भी जाएंगे ये शंकराचार्य के जो मठ है वो सब मठ बौद्ध मठ थे पहले वो मठ थे किंतु अपने ऑर्डर यह जो ऑर्डर का जो सिस्टम है वैसे स्वामी जी ने विदेश से सीखा है ऐसा आप कह सकते हैं किंतु साथ-साथ में ही देखिए कि मैंने भारत का आप हिस्ट्री पढ़ेंगे इस तरह से बहुत बार हुआ है कि ऋषि मुनियों ने इकट्ठा होकर के जैसे पराशर मुनि का आश्रम था वेदव्यास के पिताजी तो वहां पर सभी मुनियों ने ऋषियों ने इकट्ठा करके इकट्ठा हो कर के यह चर्चा की कि अभी कलयुग आ रहा है कलयुग में वेद जो है वह लुप्त हो जाएगा ऐसी संभावना है तो भविष्य की पेढ़ हों के लिए वेद को सुरक्षित रखना है तो हमको क्या करना होगा चलो वेद को इसकी उसके ऊपर में विद्या चर्चा उसका ऊपर में अध्ययन उसका प्रॉपर एनालिसिस उसका प्रॉपर यह डिसेक्शन यह सब हम आरंभ कर देते हैं तो उसी ट्रेडिशनल वेद व्यास ने वेदों का विभाजन किया टॉपिक अनुसार और हमेशा के लिए अपनी भारतीय संस्कृति को पुराणों की रचना करके उन्होंने सुरक्षित रख कर के छोड़ा तो यानी कि देखिए कि सिर्फ आज ऐसा नहीं हुआ कि हम एक पार्टिकुलर मिशन के लिए इकट्ठा हुए और यह मिशन स्वामी जी ने विदेश से सीखा नहीं हमारे ऋषि मुनियों ने भी इसी तरह से एक पराशर मिशन कहो ना कि व्यास मिशन कहो वेद मिशन कहो इस तरह से वहां पर एक था वहीं से यह सब पुराणों की रचना हुई वहीं से यह ब्रह्मसूत्र की रचना हुई वहीं पर यह वेदों का विभाजन होकर के सुरक्षित रखे गए हजारों हजारों सालों के विदेशी आक्रमण के सामने भी बिना किसी लिपिबद्ध किए हुए बाकी सब जगह पर देखिए फेरोस के पिरामिड है वहां पर यह दीवारों के ऊपर में सब लिखा हुआ है या तो फिर मेसोपोटामिया मेसोपोटामिया में जाएंगे तो वहां पर वह जो मिट्टी की टेबलेट्स होती है कोनि फॉर्म लैंग्वेज इसको कनि फॉर्म स्क्रिप्ट उसको कहते हैं उसमें वह सब लिखा हुआ है हिब्रू स्क्रोल से वे लोग स्क्रॉल होता है अर्थात कि पेपी रस का पेपर उसमें यह सब लिख करके रखते हैं तो तो ये टेबलेट कहो ना कि ये पेपी रस स्क्रोल्स कहो ना कि पिरामिड की दीवार पर लिखना कहो ये सब समय के गर्त में समय के साथ-साथ यह सब विलुप्त हो गया किंतु भारतीय वेद को इस तरह से प्रिजर्व करके रखा यह ब्राह्मण एक के बाद एक शाखाओं में यह परिवार में यह जो एक पिता पुत्र परंपरा के साथ में यह जो गुरु शिष्य परंपरा ये गुरुकुल की परंपरा के द्वारा भारतीय विद्या को किस तरह से पुनर जीवित रखा गया यह एक आश्चर्य की बात है कि इतना सारा आक्रमण हुआ उसके बाद में भी आज हमारी विद्या वेद या तो फिर पुराण या तो फिर यह ब्रह्मसूत्र यह हमारे सामने अकब मौजूद है जैसे थे वैसे के वैसे ही और फिर आखिर में शंकराचार्य ने आकर के उनके ऊपर में भाषा लिखा और फिर उसका और ज्यादा प्रचार किया एक सुंदर दृश्य है शंकराचार्य के जीवन में कि वेदव्यास आकर के उनको दर्शन देते हैं तो देखिए कि यहां पे है एक कोने पे कलयुग के प्रारंभ में वेदव्यास और यह कलयुग का अस्त हो रहा है क्योंकि अभी तो भगवान श्री राम कृष्ण का जन्म होने वाला है अवतरण होने वाला है तो यह कलयुग का अस्त कलयुग के आरंभ में थे वेदव्यास और कलयुग के अस्त के समय थे यह शंकराचार्य और श्री रामकृष्ण तो यह शंकराचार्य और वेदव्यास का वेदव्यास ने उनको दर्शन दिया था बड़ी सुंदर एक एक दृश्य है वहां पे तो देखिए कि यह बात जो है कि एक मिशन बना कर के एक ऑर्डर बना कर के एक महत कार्य हाथ में लेकर के पूरे देश को एक नई दिशा देना यह बात स्वामी जी ने सिर्फ विदेश से नहीं सीखी थी यह बात अपनी हिंदू परंपरा में भारतीय वैदिक परंपरा में पहले से ही यह प्रेजेंट थी स्वामी जी ने सिर्फ इसको एक नव क्लेवर दे दिया है क्योंकि यह ब्रिटिश लॉ एंड ऑर्डर जो था यह ब्रिटिश कांस्टिट्यूशन जो था या तो फिर यह ब्रिटिश जस्टिस सिस्टम जो थी इसके अनु इसके भीतर में इसको कार्य करना है इसीलिए यह जो ट्रस्ट एक्ट जो था 18620 जो मॉडर्न अकाउंटिंग में थड है इसको स्वामी जी ने अडॉप्ट किया है ऐसा कितनी बार हुआ है कि स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों को बार-बार चेतावनी दी है कि अकाउंट में एक पैसा भी यदि इधर से उधर हुआ तो भक्त लोगों का आपके ऊपर में से विश्वास चला जाएगा जैसे कि मास्टर महाशय ने कथामृत के प्रारंभ में लिखा है जब कथामृत लिखते थे तब वह क्या करते थे पता है कोर्ट में जाकर के देखते थे कि ये जो कोई व्यक्ति वहां पर जाकर के एज विटनेस एज ए साक्षी रूप जाता है तो उसके ऊपर में जज का भरोसा कितना होता है कितना नहीं होता है तो मास्टर महाशय लिखते हैं कि मैंने देखा कि ये जो विटनेस है या तो साक्षी है वो जद 10 बातें भी सही बोलेगा और एक बात भी जद गलत बोलेगा तो जज को उसके ऊपर में संदेह हो जाएगा कि उसका एक झूठ तो पकड़ा गया है तो बाकी 10 चीजें उसने जो कही वो सही होगी गलत होगी किसको पता अर्थात कि जब वो साक्षी वो एक बार शपथ ग्रहण करता है कि मैं जो कुछ कहूंगा सत्य ही कहूंगा तो शपथ ग्रहण करने के बाद में उसको बहुत ही केयरफुल होना है कि थोड़ा सा भी मिथ्या वचन गलती से भी ना हो जाए माने जानबूझ करते तो नहीं हो किंतु गलती से भी ना हो जाए इसके बारे में बहुत ख्याल रखना है तो मास्टर महाशय ने यह देखा और फिर उन्होंने कहा कि कथामृत में मैं बहुत ही केयरफुल हूं कि कहीं से भी थोड़ा सा भी मिथ्या वचन गलती से भी ना चला जाए जो कुछ लिखा है मैंने खुद ने विटनेस किया है और जो मैंने विटनेस नहीं किया अर्थात कि ये अश्विनी कुमार का पत्र तो उनके नाम से लिखा है कि हां उन्होंने इस तरह से ठाकुर के बारे ठाकुर हिमसेल्फ वाज वेरी क्लियर कि इस जब भी वो उपदेश देते थे तो उल्लेख करते थे कि कैप्टन ऐसा कहता था कि गौरी पंडित ऐसा कहता था कि वह हलधार ऐसा कहता था माने वो नाम देकर के बोलेंगे कि यह मैंने नहीं कहा ये उन्होंने कहा ये एट्रबीक राज ठाकुर के उपदेशों का एक संग्रह एक छोटी किताब में किए हैं तो उस समय वह क्या करते थे कि वह लिखते थे व लंबी वो देरी रात तक हो सकता है कि लिखते रहते थे तो एक बार क्या हुआ कि वो वैसे लिखते लिखते वो सो गए तो सपने में ठाकुर ने आकर के कहा कि अरे तुमने यह जो बात मेरे नाम से कही है वो मैंने नहीं कही वो उसी ने की है उसने कहा है अभी वो किसने कहा वोह नाम में भूल गया क्योंकि क्या है कि ठाकुर तो बहुत कुछ बोलते थे किंतु वो एटिबल करते थे कि ये मैंने नहीं उसने कहा है तो तुमने यह बात भले ही चाहे मेरे मुंह से सुनी हो किंतु यह मेरी बात नहीं है तो इमीडिएट राजा महाराज जग गए और उन्होंने जो करेक्शन करना था कर दिया तो यहां पर भी ऐसा है अकाउंट में भी ऐसा है यदि भक्तों ने भरोसा करके पैसा दिया अभी आप चाहे ₹ लाख रप ठीक-ठीक इस्तेमाल करें किंतु ₹1 भी आपने गलत इस्तेमाल किया और यह चोरी पकड़ी गई तो सभी का अविश्वास आपके ऊपर में हो जाएगा कि रामकृष्ण संग में ऐसा ही चलता है गड़बड़ गड़बड़ वहां पर पैसा देने की जरूरत नहीं ऐसा लोग 10 मुंह से बोलना शुरू कर देंगे आपकी 100 अच्छी बातें भूल कर के एक बुरी बात याद रखेंगे तो इसीलिए माने यह तो समय की रीति है हम खुद मैं खुद भी ऐसा ही करता हूं क्या इस ह्यूमन नेचर क्या करेंगे तो अभी इसीलिए स्वामी जी वाज एक्सट्रीमली केयरफुल कि अकाउंट वगैरह जो है एकदम परफेक्ट टू परफेक्ट मेंटेन होना चाहिए इसलिए स्वामी जीी जी कहते हैं कि जद एकटा मठ बनाते पारो ता हले बुझी बहादुर ना होले घोड डीन यदि एक मठ बना सको तो कहूंगा कि तुम लोग बहादुर हो वरना तो फिर घोड़े के अंडे की तरह सब कुछ मिथ्या मद्रास के लोगों के साथ में मिलकर के काम करो एक ऑर्डर की रचना करनी है नहीं कि एक इंडिविजुअल इंडिविजुअल आश्रम या तो इंडिविजुअल मठ की स्थापना ऑर्डर बनाना है तादिर काज कोबार अनेक शक्तिया स्वामी जी कहते हैं कि मद्रासी लोगों की काम करने की कर्म करने की अनेक शक्ति है ए बार कार महोत्सव एमनी हुजू करे करबे जे एमन आर कखन होई नहीं इस बार का महोत्सव अर्थात की ठाकुर की तिथि पूजा का उत्सव ऐसा मुजुक करके ऐसा हल्ला गुल्ला मचा करके ऐसा बड़े पैमाने पर करना है कि जैसा पहले कभी हुआ नहीं है खावा दा हुजू जोतो कम होए ततो ही भलो किंतु उत्सव बड़े पैमाने पर करना है किंतु क्या है कि आध्यात्मिक आहार प्रदान करना है ये खाने पीने का जो मामला है वह जितना कम हो इतना ही अच्छा है दाड़ा प्रसाद मालसा भोग थेट हो खड़े-खड़े जो प्रसाद वितरण हो सकता है वो और मालसा भोग इतना होने से ही इनफ है यथेष्ट है इनफ है देखिए ये मालसा भोग दाड़ा प्रसाद में तो यह खिचड़ी वगैरह होता है और यह मालसा भोग का एक इतिहास सुंदर है कि ये जो चैतन्य महाप्रभु के ये जो उत्सव वगैरह होते हैं उसमें एक हांडी होती है हांडी में ये जो दही के साथ में केला है या तो फिर मिठाई है या तो फिर ये जो पोहा है पोहा ये पोहा भिजा करके दिया जाता है तो इसके पीछे एक कहानी है कि यह सुदामा जब भगवान कृष्ण को मिलने के लिए जा रहे थे तो अभी भगवान को मिलने के लिए जा रहे हैं हैं और इतना उनका मित्रता है सौद्ध है तो उनको तो साथ में कुछ गिफ्ट कुछ उनको भेट तो जाकर के साथ में देना है उनको तो कुछ ऑफर तो करना है वैसे ही खाली हाथ अपने इतने पुराने मित्र को जाकर के मिलेंगे तो कैसे चलेगा तो वो सोच रहे हैं कि मैं क्या दूं क्या दूं घर तो कुछ पूरा घर खाली है शिव का संसार है वो पूरा घर उनका तब कहीं जाकर के उनकी पत्नी ने क्या किया बोलती है कि मैं जाकर के गांव में से भिक्षा कलेक्ट करके आती हूं तो भिक्षा करके आई तो उनको भिक्षा में मिले चार मुट्ठी पोहा और कुछ नहीं तो यह सुदामा बेचारे क्या करेंगे एक पोटली में पोहा बांधे और वह भगवान कृष्ण को मिलने के लिए मथुरा जा रहे हैं पोरबंदर से तो अभी जाते-जाते बेचारे की आंखों से आंसू निकल रहे हैं सोच रहे हैं कि भगवान कृष्ण इतने धनी है राजा है इतनी इतनी रानियां है इतना धन वैभव सोना महर है उनके पास में और मैं हूं एक दरिद्र ब्राह्मण और उनको क्या दूंगा ये एक सखे पोहे दूंगा यह मेरी औकात है उनके सामने तो मने प्रेम जो होता है तो प्रेम इतना प्रकट करने के लिए मेरे पास में कोई साधन भी नहीं है तो आंखों से आंसू आते हैं और आंसू से ये जो सूखे पोहे हैं वो भग जाते हैं भग जाते हैं तो अभी ये पोहे की पोटली लेकर के वो जाते हैं भगवान कृष्ण को मिलने के लिए आशा तो नहीं रखी थी कि वो बुलाएंगे या तो याद रखेंगे किंतु भगवान को जैसे ही पता चला कि सुदाम आए हैं तो इतना प्रेम से बुलाया सभी रानियों को कहा कि सेवा कीजिए और आखिर में फिर पूछा कि अरे तुम तो आए हो तो मेरे लिए क्या लाए हो बताओ कुछ तो लाए होंगे तो बेचारे सुदामा अपनी पटली को छुपा कर के वो क्या कहेंगे कि कुछ नहीं है भीगे पोहे हैं थोड़े से तो भगवान को जैसे ही पता चला खींच कर के पोहे ले लिए और पटली खोल के देखा कि उनके आंसुओं से भिजे हुए पोहे तो वो उन्होंने बड़े ही प्रेम से खाए और बहुत ही सुंदर बातें की और तो कुछ बोला नहीं फिर वो कुछ समय हुआ तो सुदामा वापस गए उन्होंने सोचा कि अरे भगवान ने पूछा भी नहीं कि तुम्हारी आर्थिक अवस्था कैसी है क्या है तुम्हारे साथ में कुछ तो पूछा नहीं और यह भी ऐसे सरल हृदय है कि सामने से कुछ ऐसा नहीं कहा पत्नी ने कहा था जाकर के कुछ पैसे मांग लेना तो सुदामा तो बेचारे कुछ बोले नहीं किंतु जब वापस आए तो पता चला कि जो गरीब की कुटिया थी बहुत बड़ा एक धनवान महल बनकर के रह गया और कितने नौकर चाकर है कितना पैसा वगैरह है उनकी पत्नी कितने अच्छे गहने पहन के बैठी है तो यह है भगवान की कृपा तो यह जो भीजे पोहे थे वह भगवान को ऑफर करने की यह वैष्णव प्रथा जो है एक हांडी में पोहे लेंगे और फिर उसके साथ में धीरे-धीरे करके बहुत कुछ मिलाना शुरू हुआ दही मिलाएंगे कुछ केला मिलाएंगे या तो कुछ मिठाई डालेंगे तो इसको कहते हैं मालसा भोग तो स्वामी जी कहते हैं कि इस बार का उत्सव इतने बड़े पैमाने पर करो कि लोग हमेशा के लिए याद रखें किंतु यह खाना पना जो है इसमें बहुत ज्यादा पैसा मत डालना यह खड़े रह कर के जो हाथ में कुछ खिचड़ी प्रसाद दे सकते हैं वह देना और मालसा भोग देना इतना ही यथेष्ट है इससे ज्यादा और कुछ देने की जरूरत नहीं तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु