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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 16 Dec 2025

Prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः

अध्याय 3 : वराहनगर मठ के दिनों की कहानियाँ

स्वामी विवेकानंद का लाइव हम जो डिस्कस कर रहे थे ठाकुर की महासमाधि के बाद से स्वामी जी का जीवन देखना हमने प्रारंभ किया है और वराह नगर मठ के दिनों की घटनाएं इसका हम कुछ देख रहे हैं चर्चा कर रहे हैं। यह जो मटेरियल है मैंने विभिन्न सोर्सेज से इकट्ठा किया है। और यह जो पीरियड्स, यह चैप्टर्स, यह पॉइंट, यह डिवीजन जो है यह स्ट्रक्चर जो है वह मैंने अपने से बनाया है। तो यह लाइफ इन वराह नगर मठ इस पीरियड को हम देख रहे हैं। ऑलरेडी हमने देख लिया कि विजानंद जी ने वराह नगर मठ का किस तरह से डिस्क्रिप्शन दिया। किस

श्रीरामकृष्ण की भक्ति: दीनता नहीं, दिव्य उल्लास—रोने की नहीं, आनंद में डूब जाने की साधना

तरह से शशि महाराज मठ में सभी की सेवा करते थे। ठाकुर की सेवा तो करते ही थे। किंतु सभी गुरु भाइयों का भी किस तरह से ख्याल रखते थे। पीछे में एक बागान था। वहां पर सब्जियां वगैरह उगती थी। तो जब मठ में कुछ खाने के लिए नहीं रहेगा तो शशि महाराज वहां गार्डन में जाकर के वह सब्जी वगैरह काट के ले आएंगे। वहां पर एक उड़िया माली भी रहता था। वह चिल्लाता भी था कि अरे अरे क्या कर रहे हो? सब खा लिया सब ले लिया। मत लो मत लो। ऐसा बोल के चिल्लाता भी था। तो किंतु फिर भी शशि महाराज उसको नजरअंदाज करके उसको इग्नोर करके अपने आनंद में गो भरे बांग्लादेश के तो वो अपने आनंद में वो मठ में चले आते थे तो अभी क्या है कि उस उड़िया माली का वैसे हमारे साथ में अच्छा रिश्ता था मठ के साथ में जब भी मठ में प्रसाद मिठाई वगैरह कुछ होता था तो उसको भी दिया जाता था तो वह एक हमने देखा और फिर देखा कि साथ में ही किस तरह से गंभीरानंद जी शशि महाराज की आरती का वर्णन करते हैं। बड़ा ही सुंदर और गंभीरानंद जी की माने क्लासिक गंभीरानंद जी की स्टाइल में यह जो पूरा सेंटेंस लिखा है उन्होंने क्या कहा है उन्होंने जोख्तिनी धूप धुना खोल करताल बाध्य मध्य आरती शेष पागे जब शशि महाराज धूप धुना खोल करताल यह सब वाद्य यानी कि यह संगीत के वाद्य उनके साथ में आरती के आखिरी समय में समय में चामर व्यंजन करतेकरते भाव में उन्मत्त होकर के जय गुरुदेव श्री गुरुदेव कहते कहते भीषण हुंकार देते ताले ताले उदाम नृत्य करते करते एक ओर से दूसरी ओर नाचते नाचते फिरते नृत्य करते करते फिरते तब जो आरती देख रहे थे उनके मध्य में उनके के हृदय में यह एक अपूर्व भक्ति भाव का आवेश होता। किस तरह के [हंसी] एक अपूर्व भक्ति भाव का आवेश होता वह हम बातों में कथा में शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते हैं। देखिए कितना सुंदर विवरण है कि चामर व्यजन करते करते जय गुरुदेव श्री गुरुदेव भीषण हुंकार देते देते देते ताले ताले उदाम नृत्य करते करते यानी इतना सुंदर मैंने लिटररी दृष्टि से भी देखिए और देखिए कि साथ में ही शशि महाराज अर्थात स्वामी रामकृष्णंद जी का जो भक्ति भाव है किस तरह से इसमें प्रकट होता है। देखिए कल भी हम डिस्कस कर रहे थे। एक तो है कि दीन हीन भक्ति जो कि हमको कहती है कि मैं कुछ नहीं हूं। मैं कीट की तरह हूं। मैं एक मेरा कोई अस्तित्व नहीं। मैं एक पापी हूं। मेरा माने क्या है कि अपने भीतर में एक हीन भाव प्रकट करना जिससे कि मेरा अहंकार वो नष्ट हो जाए और अहंकार नष्ट हो तभी तो मैं आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ सकता हूं। तो यह अहंकार नष्ट करने की यह अपना ईगो है। उसको खत्म करने की यह जो प्रक्रिया है उसमें हमने जैसे ही अपने को दीन हीन मैं कुछ नहीं मैं पापी मैं नगण्य मैं ईश्वर का एक भक्त ऐसा भक्त जो कि कुछ नहीं है। यह जो भाव परंपरा हमने प्रकट करना शुरू किया उसी समय से देखिए कि भारत में जैसे कि एक तरह का अप एक तरह का का पुरुषत्व स्वामी जी की लैंग्वेज में कहे तो एक तरह का कावडाइस कहो ना किेंस भारत में आकर के बैठ गया और इसका परिणाम यह आया आध्यात्मिक जीवन में कितना हमारा प्रगति हुआ आध्यात्मिक जीवन में हम कितना आगे बढ़े वह तो पता नहीं किंतु यह जो जागतिक जगत है यह जो मटेरियल वर्ल्ड है उसमें तो हम हार ही गए तो जितने भी आक्रमणकारी आए उनके सामने हम अपनी स्वरक्षा भी ना कर पाए तो वह एक भावधारा थी वह एक साधना का एक रास्ता था किंतु देखिए कि रामकृष्ण संघ में यह महावीर की भक्ति यह ऊर्जा िता भक्ति भाबे हाशे कांधे नाचे गाय भाव में आकर के हंसता है रोता है नाचता है और गाता है तो इस तरह से भीतर में से उल्लास उत्साह जुनून एक तरह का एक एक्ससी एक आनंद अब इस तरह से अपने मन को भर देना है यदि अपने को छोटा भी बनाना है अहंकार को खत्म करने के लिए तो यह कहना है कि मैं मां का संतान हूं हूं और जिस तरह से एक छोटा बच्चा उसके हृदय में ना ही पाप होता है ना ही अहंकार होता है ना ही उसके भीतर में किसी भी तरह का विकार होता है। पंच कक्लेश नहीं होता। षड रिपु नहीं होते। अष्टपाश नहीं होते। यह काम कांचन के प्रति लालसा नहीं होती। इस तरह का एक सरल निर्दोष बालक अपने को बना देना है। यदि हमको अपने अहंकार से मुक्ति पानी है तो तो यह जो उदाम नृत्य करते हैं। भीषण हुंकार करतेकरते उदाम नृत्य करना। जय गुरुदेव। श्री गुरुदेव। यह है हमारे संघ की भक्ति। हमारे संघ में ऐसा कभी भी नहीं आपको यदि ऐसा पढ़कर के लगता है देखिए मैं यह जो मूवीज वगैरह होती है ना ठाकुर के ऊपर में बनाते हैं मैं उसको कभी नहीं देख पाता कोई मुझे रिकमेंड करता है कि अच्छा यह मूवी देखिए उसमें उसने अच्छा एक्टिंग किया है या तो वो एनिमेशन देख लीजिए वह अच्छा है मैं देख ही नहीं पाता क्यों क्योंकि ठाकुर को एक रोते-रोते दीनहीन तरह से वो वो इस तरह से दिखाते हैं। वो देखकर के ही ना मुझे ऐसा लगता है कि हे राम यह लोग ठाकुर के भाव को समझे ही नहीं है। वह जैसे कि एक गरीब आदमी पैसों के लिए रोता है। इस तरह से ठाकुर को मां के लिए रोता हुआ दिखाया। हां ठाकुर मां के लिए रोते हैं। किंतु वो सीन यदि आपको ठीक-ठीक डिपिक्ट करना है, ठीक-ठीक उसको आपको यह करना है, प्रोजेक्ट करना है, तो ना ठाकुर के हृदय में साथ-साथ में ही यह उल्लास और आनंद भी दिखाना होगा। एक तरह का आत्म आत्मश्रद्धा स्वामी जी का जो मूल मंत्र है, महामंत्र है, यह आत्मश्रद्धा से भरी यह ठाकुर की भक्ति थी। हां। अब पहला जो दर्शन था ठाकुर ने मां का प्राप्त किया था। ऐसे ही प्रार्थना करके रोके ही प्राप्त किया था। किंतु देखिए कि ठाकुर में इतनी तो आत्मश्रद्धा थी। इतना तो उनमें यह एक भीतर चरित्र की इतनी शक्ति तो थी कि यदि मां का दर्शन नहीं होता है तो जीवन का अंत ला देंगे। यह जो आत्मश्रद्धा कि या तो मां का दर्शन प्राप्त हो या तो फिर मैं अपने जीवन का अंत ला दूं। यह जो एक्सट्रीम भाव है यह दीनहीन भक्ति से कभी नहीं आएगा। वह दीनहीन व्यक्ति हमेशा डरपोक रहेगा। हमेशा एक तरह का कावडाइस उसके सर के ऊपर में सवार रहेगा। वो भगवान के लिए यदि रोता भी है तो किंतु यह भगवान प्राप्त करने के लिए ईश्वर साक्षात्कार करने के लिए जो अंतिम स्टेप है अपने खुद की आहुति दे देना वह स्टेप वो साधक नहीं ले पाएगा। देखिए इंटरेस्टिंगली ये पौहारी बाबा स्वामी जी पौहारी बाबा का दर्शन करने के लिए जाते हैं और फिर आशा रखते हैं कि वह उनसे कुछ योग वगैरह सीखेंगे। स्वामी जी के लेटर्स की सीरीज जिसने पढ़ी होगी उनको पता होगा कि कुछ समय के बाद में स्वामी जी थोड़े से डिसअपॉइंट हो जाते हैं। कहते हैं अपने लेटर में लिखते हैं कि सब समय पारी बाबा ऐसा कहते रहते हैं कि इस दास को क्या पता इस दीन को क्या पता मुझे क्या आता है। ऐसा करके सब समय दीनता प्रकाशित करते रहते हैं। तो शुरू-शुर में तो हमको अच्छा लगता है कि चलो साधक तो दीन ही होना चाहिए। किंतु कुछ समय के बाद में दो दो रीजन है। पहला तो फेमस रीजन है कि क्यों स्वामी जी पवहारी बाबा को छोड़कर के चले गए। वो फेमस रीजन कि ठाकुर का दर्शन हुआ था। स्वामी जी लेटे हुए थे। ठाकुर उनके सामने आकर खड़े रहते हैं। तो फिर स्वामी जी भी सोचते हैं कि अरे ठाकुर का दर्शन हो रहा है। बार-बार हो रहा है। इसका अर्थ कि ठाकुर चाहते नहीं कि मैं पौहारी बाबा से योग की दीक्षा लूं। तो वह तो एक फेमस रीजन है ही है। किंतु साथ में ही स्वामी जी अपने लेटर में लिखते हैं कि क्यों एक तरह से वह डिसएपॉइंट हो गए, डिसइचेंटेड हो गए पवहारी बाबा से। क्योंकि यह सब समय दीनता प्रकट प्रकाशित करते रहना दीनता प्रकट करते रहना कि मुझे कुछ नहीं आता इस दास को क्या आता है तो स्वामी जी बोलते हैं कि यदि उनको नहीं ही आता है नहीं ही सिखाना चाहते हैं ऊपर से कभी-कभी तो ऐसा लगता था वह स्वामी जी से पूछ रहे हैं कि इसका क्या अर्थ है उसका क्या अर्थ है तो यदि मुझसे ही सीखना चाहते हैं तो फिर इनके पास में पड़े रहने से क्या लाभ है ऐसा एक डिसअपॉइंटमेंट स्वामी जी अपने पत्र में व्यक्त करते हैं किंतु देखिए आखिर में यही पौहारी बाबा है कि उनका मृत्यु कैसे हुआ तो हमको पता है कि एक बार उनकी गुफा में से यह धुआ निकलने लगा। लोग जा लोगों ने जाकर के देखा तो उन्होंने अपनी खुद की यह अग्नि में समाधि दे दी थी। तो देखिए कि भले ही चाहे पौहारी बाबा दीनता प्रकट करते हो। भले ही चाहे स्वामी जी उनसे डिसअपॉइंट हो गए हो। उनमें यह आखिरी स्ट्रेंथ बची थी कि ईश्वर प्राप्ति के लिए या तो फिर जिस तरह की साधना के मुकाम पर वह पहुंचे होंगे वहां पर उनको ऐसा लगा होगा कि हां अभी आत्मबलिदान देने की आवश्यकता है तो उन्होंने आत्मबलिदान भी दे दिया। उससे वह थोड़े से भी झिझके नहीं थोड़े से भी उनको हेसिटेशन नहीं हुआ। तो देखिए कि यह आत्मबलिदान दे देना यह आध्यात्मिक जीवन की यह जो एक सर्वोच्च साधना के रूप में है वह कब होगा जबकि मेरे भीतर में वो एक भयानक एक स्ट्रेंथ ऑफ कैरेक्टर होगी यदि यह स्ट्रेंथ ऑफ कैरेक्टर नहीं होती है ठाकुर जिसको कहते हैं मन मुख एक करना जो मन में एक बात रखते हैं मुंह में दूसरी बात कहते हैं इस तरह के लोगों के भीतर में चरित्र की शक्ति नहीं होती। हिंदी में जो कहावत है मुंह मुख में राम बगल में छुरी अर्थात कि मुंह से तो राम राम का नाम लेता रहेगा किंतु उसने अपनी बगल में एक छुरी छुपा करके रखी है। जैसे ही आपकी पीठ उसकी ओर हुई सीधा उसने पीठ में छुरी मार दी। तो इस तरह के जो चरित्रहीन व्यक्ति हैं वे लोग चाहे जितना ही मुंह से राम राम बोलते रहे वह आध्यात्मिक जीवन में बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगे। जबकि यह मन मुख एक करना मन में जो है वही मुंह पर बोलना यदि मन में ऐसा आया आध्यात्मिक इस मंजिल पर पहुंचे हैं कि अभी आत्मबलिदान देने की आवश्यकता है उस दिन उन्होंने आत्मबलिदान यदि दे दिया तो फिर देखिए कि वह जो साधक है सर्वश्रेष्ठ साधक है तो ठाकुर जिस तरह से अपना गला काटने को प्रस्तुत हो गए थे। यह पहारी बाबा ने जिस तरह से वास्तव में चिता में अपनी आहुति दे दी, अग्नि में आहुति दे दी अपने देह की वैसे ही शशि महाराज को शशि महाराज की कहानी हमको पता है कि मां शारदा और स्वामी ब्रह्मानंद राजा महाराज इनको दक्षिण भारत में लाने के लिए उन्होंने इतना उद्यम किया, इतना उन्होंने परिश्रम किया और उसी समय उनके लंग्स का यह जो रोग है टीबी वह पकड़ में आ गया था। किंतु उन्होंने सोचा कि यदि मैं अभी प्रकाश करता हूं अभी मैं सबको बताता हूं कि हां मुझे यह रोग हो गया है तो राजा महाराज या मां वहां पर आएंगे नहीं तो फिर क्या होगा कि साउथ भारत साउथ इंडिया में इनका पदार्पण हो। यह साउथ इंडिया के भक्तों को उनका आशीर्वाद मिले। यह जो उनकी मंगल कामना थी शशि महाराज की वह पूर्ण होगी नहीं। तो उन्होंने अपने देह का बलिदान देकर के भी अपने स्वास्थ्य का बलिदान देकर के भी मां और राजा महाराज का दक्षिण भारत में तीर्थ यात्रा उन्होंने करवाया और फिर आखिर में जब वो बीमा ये जो दोनों वापस चले गए इसके बाद में जब उनकी बीमारी बढ़ना शुरू हो गया जब बेलूर यहां उद्बोधन अभी तो हमारा हेड क्वार्टर बेलूर मठ है तो हम लोग कहते हैं बेलूरमठ को पता चला बेलूर मठ ये करे करेगा। किंतु उस समय उद्बोधन था हेड क्वार्टर क्योंकि शरद महाराज हमारे जनरल सेक्रेटरी महाराज वहां पर बैठते थे। तो जब उद्बोधन को पता चला उद्बोधन में पता चला शरद महाराज को तो उन्होंने कहा होगा कि भाई यहां पे आ जाओ ट्रीटमेंट के लिए। तो उस समय जब शशि महाराज कोलकाता वापस आ रहे थे। वहां ओसा में कहीं पे कोठार मोस्ट प्रोबेबबली वहां पे राजा महाराज के साथ में मुलाकात हुई। गाड़ी जब रुकी तो राजा महाराज उनको उनके साथ में बात करने के लिए आए तो राजा महाराज ने कहा भाई तुम यह रकम करे निज देहोपात को करे छो भाई तुमने इस तरह से अपना देह पात कर दिया अपने स्वास्थ्य का बलिदान दे दिया तो उसमें अभी शशि महाराज क्या कहेंगे जो आध्यात्मिक जीवन में आत्मबलिदान देने की चरित्र की शक्ति जिसमें हो वही ठीक-ठीक भक्ति का अधिकारी है। वरना तो फिर मैं उनका दास हूं। मैं उनका सेवक हूं। ऐसा हजार बोलते रहेंगे और यदि ईश्वर की आज्ञा हो गई कि हां इस कार्य के लिए अपना बलिदान देना होगा। आत्मबलिदान तो फिर उसमें डर गए तो फिर वो भक्ति वो दासत्व वो कहां से कहां पर रह गया आपका? तो यहां पे भी यह जो उदाम नृत्य करते थे भीषण हुंकार करते थे। यह जो उन्मत्त होकर के भीषण हुंकार और तालेता उद्दाम नृत्य यह शशि महाराज को शोभा देता है। क्यों? क्योंकि उनके भीतर में वह चरित्र की शक्ति भी थी। आत्मबलिदान देने की क्षमता भी थी और साथ में ठाकुर की यह उर्जिता भक्ति यह उन्होंने ठीक-ठीक अपने में उन्होंने ग्रहण की थी। वरना तो फिर यह मूवी के ठाकुर को देखकर के ना कि मां काली के सामने वह दीन होकर के एक बूढ़ा आदमी एक गरीब आदमी पैसों के लिए जिस तरह से रोता है इस तरह से ठाकुर को जो दिखाते हैं मूवी में जिसके चरित्र की कोई स्ट्रेंथ नहीं दिखाई देती चेहरे पे ना ही जिनके यह एक डिटरमिनेशन भीतर में आत्मश्रद्धा आत्मबलिदान देने की कैपेसिटी वो स्ट्रेंथ दिखाई ही नहीं देती देती एक रोते हुए ठाकुर को रिप्रेजेंट डिपिक्ट करना है। उनको दिखाना है वो पर्दे के ऊपर में सिनेमेटिक स्क्रीन के ऊपर में तो बस जैसे एक आम आदमी रोता है वैसे ही किसी एक रोते हुए एक्टर को लाके बिठा दिया। तो देखिए इंटरेस्टिंगली गिरीश घोष का बुद्ध चरित बोल के एक नाटक था। बुद्ध चरित एक से आई थिंक वही नाम था। तो इस नाटक का जो यह एक्टर था जो भगवान बुद्ध का अभिनय करता था तो उसका काफी एक हो गया था कि बहुत अच्छा अभिनय करता है तो अभी हुआ ऐसा यह वही वराह नगर मठ के दिनों की ही घटना है ठाकुर की महासमाधि के बाद की ही घटना है तो गिरीश घोष अपने घर में बैठा है और यह जो बुद्धदेव का जो अभिनय कर रहा वह एक्टर भी वहां पर बैठा है और स्वामी जी भी वहां पर थे तो यह तो नरेंद्र उस समय का माने स्वामी जी का नाम तो सन्यास तो ले लिया है किंतु यंग थे स्पिरिट में और एज में भी और नहीं स्नान करना रेगुलरली नहीं ठीक-ठीक कपड़े पहनना नहीं खाना ठीक से मिलता था तो चेहरा एकदम रुक्ष हो गया था बाल भी रुक्ष हो गए थे ऐसा लगता था जैसे कि एक अघोरी बैठा हो ना इस तरह से स्वामी जी को देख के लगता था तो वैसे स्वामी जी वहां पर बैठे हैं तो यह बुद्धदेव का अभिनय करने वाला अभिनेता ये जो अपने अघोरी का स्वांग रचे हुए स्वामी जी और यह गिरीश घोष तो एक आदमी आया वहां पे तो उसने देखा अभी कोई गिरीश का ही मित्र ना कि ऐसा ही कुछ होगा तो उसने यह अभिनेता को जैसे देखा तो उसने कहा कि अच्छा ये तुम तो बहुत अच्छा अभिनय करते हो। फिर ऐसा करके उसने क्या किया कि कुछ बुद्धदेव के बारे में उस अभिनेता को पूछा कि अच्छा बताओ तो उनका क्या भाव ना कि ऐसा कुछ तो उसने सोचा होगा यह जैसे बैठ जाता है ना लोगों के मन में कि इसका अभिनय करता है तो उसका फिलॉसोफी भी वह समझता होगा ऐसे किसी किसी के मन में बैठ जाता है तो इसके मन में भी बैठा होगा तो उसने पूछा इस अभिनेता को कि अच्छा बताओ तो बुद्धदेव के बारे में ऐसा कुछ तो यह कलाकार देखिए उसमें इतनी तो अकल थी कि कौन कहां पर किसका क्या स्टेटस है। तो बड़ा ही संकुचित होकर के बोला कि अरे भाई मैं तो भांड हूं। भांड अर्थात कि अभिनेता एक अपभ्रंश एक कोलोक्युअल वर्ड जिसको कहते हैं ना तो वो कोलोक्युअल वर्ड है अभिनेता के बारे में जो नाटक में जो अभिनय करते हैं उनको तो ये कहता है ये कलाकार कहता है कि देखो मैं तो भांड हूं। मुझे क्या पता? मुझे तो यह सब पता नहीं। आप इनको पूछिए। यह नरेंद्र की ओर इशारा कर गया। तो यह आदमी सोचता है कि देखो अभी देखिए भगवान बुद्ध का अभिनय करना इस तरह का जो अभिनेता होता है वह देखने में तो थोड़ा सा अच्छे ही दिखते हैं। कलाकार जो होते हैं वह तो उनका देखाव भी अच्छा होता है। चेहरा भी अच्छा होता है। उनका अभिनय भी अच्छा होता है। मतलब उनका यह जो पूरा एक देखेंगे उनको देखकर के ही लगता है कि हां वह एक है और कहां यह अघोरी का स्वांग रचे हुए स्वामी जी बाल वृक्ष है। पता नहीं कितने दिनों से स्नान नहीं किया। एक एक वर्णन है स्वामी जी के ही छोटे भाई मोहिन बाबू इस वर्णन वो लिखते हैं कि एक बार यह महापुरुष महाराज आए वहां पे स्वामी जी के घर उस समय तो क्या था यह सब लगा रहता था आपस में इतना मित्रता एक नेटवर्क इतना स्ट्रांग था तो तो महापुरुष महाराज तारकदा आए स्वामी जी के घर पे तो यह स्वामी जी के छोटे भाई वो कहते हैं कि थोड़ा स्नान बान तो कर लीजिए आप इतना मिट्टी लगा हुआ है आपके देह पे तो ऐसा बोल के वो एक पानी का एक नल होता है। उसके नीचे में उनको बिठा के वो एक पत्थर होता है ना वह जो शरीर को घिसने वाला स्नान के समय में ऐसा एक पत्थर लेकर के उनके देह को ऐसा घिसना शुरू किया। तो वो लिखते हैं कि पूरा आधा इंच मिट्टी का यह जो लेयर था लगा हुआ था। जितना मैं पत्थर घिसता हूं उतना ही ये मिट्टी और यह कचरा निकल रहा है देह से। तो देखिए कि इस तरह से कभी-कभी ये गुरु भाई रहते थे। तो कहां ये वो बुद्ध देव का अभिनय करने वाला एक सुदृष्ट एक सुंदर अभिनेता और कहां यह अघोरी का स्वांग रचे हुए स्वामी जी तो यह जो आगंतुक व्यक्ति था वो इतना आश्चर्यचकित हो गया तो उसको देख के फिर गिरीश भी हंसने लगा तो देखिए कि ये जो बाह्य देखाव है ये जो बाह्य आचरण है और फिर ये भी आध्यात्मिक जीवन में मतलब कोई इंडिकेशन नहीं है कि आप कहां पे हैं और साथ में ही खास करके यह जो भक्ति के बारे में अपना जो चल रहा है चिंतन कि एक आम आदमी को जैसे ही पूछेंगे कि मां के लिए भगवान के लिए यह साधक रोता है तो साथ में ही उसको एक हीन चरित्र या तो फिर यह कमजोर चरित्र का व्यक्ति है। ऐसा ही एक मन में भाव होता है। और इस तरह के अभिनेता जो कि ठाकुर का यह रोल करते हैं और फिर यह मां काली के लिए रोते हैं तो उनके भीतर में ना चाहे दिखने में कितने ही अच्छे हो चाहे अभिनय का कितना ही कौशल उन लोगों में हो चाहे कितना ही अच्छा यह सिनेमेटोग्राफी कहो ना कि यह वेल डायरेक्टेड कहो ना कि जो कुछ भी कहो जो कि एक स्टैंडर्ड मूवी का होता है। मैं मैं उसको देख ही नहीं पाता हूं। एक बार मैं नजर भी डालता हूं ना आधी सेकंड के लिए तो ऐसे लोगों के भीतर में चरित्र की वीकनेस छोड़कर के और कुछ मुझे दिखता ही नहीं। तो देखिए कि यह जो वर्णन है भाव में उन्मत्त होकर के जय गुरुदेव श्री गुरुदेव भीषण हुंकार देते देते देते ताल ताल में उदाम नृत्य करते हुए यह अपने शशि महाराज तो यह है कि सही-सही उर्जिता भक्ति का लक्षण यह यही सही-सही है कि चरित्र की शक्ति स्ट्रेंथ ऑफ कैरेक्टर। यह स्ट्रेंथ ऑफ कैरेक्टर यदि होगी तभी हम यह इस तरह की भक्ति के अधिकारी है। वरना तो फिर यह चरित्र की शक्ति नहीं है। दीन हीन बनकर के बैठे हैं। थोड़ा सा भी सच बोलना। जैसे कि फॉर एग्जांपल चरित्र की शक्ति को क्या कहते हैं? सत्य वचन। तो

सत्य-वचन पालन की एक कहानी

सत्य वचन की एक कहानी मैं बताता हूं। साधु होने को मैं गया था उस समय बेलूर मठ में तो एक ब्रह्मचारी की कहानी कि अब ये ब्रह्मचारी के साथ में क्या हुआ कि आपको शायद पता ही होगा कि यहां पे जॉइ करने के लिए यदि आप आते हैं तो फिर होता क्या है कि एक पूरा मेडिकल चेकअप होता है। यदि मेडिकल चेकअप में पास होते हैं तभी आपको मिशन में एडमिशन मिलेगा एज ए नोवििस ब्रह्मचारी। मेडिकल चेकअप में आप पास नहीं होते तो आपको एडमिशन नहीं मिलेगा। अभी यह जिस ब्रह्मचारी की बात कर रहा हूं एक फिजिकल डिफेक्ट था। किंतु इस तरह से है कि आपको वैसे पता नहीं चलेगा। किंतु यह इस तरह का डिफेक्ट है कि यह आपको यदि पता चला डॉक्टर को तो आपको डिसक्वालीफाई कर देगा। तो ठीक है। अभी यह इसका हुआ मेडिकल चेकअप। में डॉक्टर ने चेकअप वगैरह किया और यह जो कॉलम था जिसमें इस पर्टिकुलर चीज के बारे में लिखना था तो डॉक्टर ने ऐसा ही एक ओवरऑल ऑब्जरवेशन करके लिख दिया ओके मैंने ठीक है तो अभी यह ब्रह्मचारी को तो उस समय तो पता नहीं चला वह तो वापस आ गया किंतु बाद में जब यह मेडिकल रिपोर्ट उसके हाथ में आया सबमिट करने से पहले उसके हाथ में आया और फिर कहा कि यह शाम को जाके वहां पे सबमिट कर देना है ऑफिस में तुम्हारा रिपोर्ट रिपोर्ट में सब ओके हो गया है मेडिकल िकल एग्जाम तुमने पास कर लिया है। तो यह ब्रह्मचारी देख रहा है रिपोर्ट तो उसमें वह जो पर्टिकुलर कॉलम आया कि जहां पर डॉक्टर ने एक जनरल ऑब्जरवेशन करके ओके लिख दिया था वो तो एक्चुअली ओके नहीं है। उसको दैट पर्टिकुलर प्रॉब्लम वाज़ देयर किंतु वो जनरल ऑब्जरवेशन से नहीं पता चलेगा। एक स्पेशल एक डायग्नोसिस ना कि एग्जामिनेशन करेंगे तभी पता चलेगा। तो ये ब्रह्मचारी गया डॉक्टर के पास में। वह जाकर कहा कि आपने यहां पर यह जो लिखा है कि यह पास यह एग्जामिनेशन किंतु यह ठीक नहीं है। मुझे यह प्रॉब्लम है। तो डॉक्टर ने उसको कहा ब्रह्मचारी को कि आर यू श्योर कि तुम जो मुझे कह रहे हो क्योंकि यह कोई ऐसा प्रॉब्लम नहीं है कि तुमको काम करने में कोई दिक्कत हो। मिशन में तो क्या है? मेनली आप सबको ड्यूटी दी जाती है। तो ड्यूटी आपको ठीक-ठीक से करना है। साधन भजन ठीक-ठीक से करना है। मेडिकल एग्जामिनेशन का यही तो अल्टीमेटली तात्पर्य है ना। वरना तो देखो ना 10-15 साल हो गए कुछ ना कुछ बुखार होगा यह होगा वो होगा सभी साधुओं को कुछ ना कुछ तो फिजिकल प्रॉब्लम स्टार्ट हो ही जाते हैं। दैट इज नथिंग टू बी अशेम्ड ऑफ कोई ऐसा टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। एक तो सिंपल एक फॉर्मेलिटी के लिए यह सब रिपोर्ट वगैरह है। तुम यदि कहते हो तो मैं उसको इग्नोर कर सकता हूं। तो ये ब्रह्मचारी कहता है कि नहीं मतलब साधु होने को आया हूं। सत्य वचन से साधु होना है। यदि झूठ बोल के साधु होना तो फिर साधु लाइफ का क्या अर्थ है? ठाकुर ने कहा कि सत्य वचन है कल की तपस्या। तो झूठ बोल के ही यदि मैंने सन्यास जीवन का प्रार देखिए यदि ब्रह्मचारी कहता है मुझे यदि नहीं पता होता कि आपने ऐसा लिखा है या ऐसा ऑब्जरवेशन किया है। सीधा-सीधी रिपोर्ट सबमिट हो जाता तो फिर मुझे उसमें कुछ कहना नहीं था। किंतु बिकॉज़ कि यह रिपोर्ट मेरे हाथ में आया है। मैंने देखा है कि यह जो आपने लिखा है वह गलत है। तो फिर मैं इस बात को कैसे अपने नजरअंदाज कर दूं। मुझे तो सत्य वचन कहना ही पड़ेगा। तो डॉक्टर कहता है ठीक है। मैं यहां पे लिख देता हूं कि ये एग्जामिनेशन इसने पास नहीं किया और साथ में ही मैं कमेंट को फिर से लिख देता हूं। डिसक्वालीिफाइड टू बिकम ए मक इन रामकृष्ण ऑर्डर। रामकृष्ण संघ में साधु होने के लिए डिसक्वालीफाई हो गए हैं। ऐसा बोल के वह मेडिकल रिपोर्ट उसको दे दिया। तो यह ब्रह्मचारी जाकर ऑफिस में जाकर सबमिट करके आया। अभी ऑफिस में जिन लोगों का यह रिस्पांसिबिलिटी था यह मेडिकल रिपोर्ट वगैरह देख के उसको एक फॉर्मेलिटी के रूप से प्रोसेस करने का। उन्होंने देखा कि ये मेडिकल रिपोर्ट में तो डिसक्वालीिफाइड हो गया है। तो वे लोग तो एकदम टेंशन में आ गए। क्योंकि प्रोसेस ऐसा है कि यदि कोई डिसक्वालीफाई होता है तो पहले एक इनफॉर्मली बताना पड़ता है। आप एक रिटर्न रिपोर्ट सबमिट कर देंगे तो क्या होगा? फिर तो एकदम ऑफिशियल प्रोसेस चालू हो जाएगा। फिर कोई कुछ नहीं कर सकता। और यह तो कोई आर्मी नहीं है कि आपको इतना हार्ड एंड फास्ट यह सब फॉलो करना है। यह जो सीनियर साधु होते हैं तो उन्हें डिस्क्रिमिनेटरी पावर होता है कि हां इसको हम इग्नोर कर सकते हैं। हां इसको हम यह कर सकते हैं। तो पहले तो इनफॉर्मली बताना होता है कोई डिसक्वालीफाई होता है तो। तो तो इनफॉर्मली बताओ आकर के सीनियर साधुओं को। फिर यह महाराज जी सीनियर जो स्वामी है वह डिसाइड करेंगे कि क्या उसको रखना है कि नहीं रखना। और बहुत बार ये लोग रख भी लेते हैं। कर लेंगे उसको ट्रीटमेंट का खर्चा हम दे देंगे। ऐसा बोल के रख भी लेते हैं और फिर उस समय एक स्पेशल डॉक्टर के पास जाकर के दूसरा एक रिपोर्ट करवाना होता है जिसमें कि यह दूसरे डॉक्टर जो होते हैं वो ऐसा लिखेंगे कि अलाउड टू कंटिन्यू इंस्पाइट ऑफ दिस लिमिटेशंस ही इज़ अलाउड टू कंटिन्यू ऐसा एक स्पेशल रिपोर्ट निकलता है। देखिए रामकृष्ण मिशन में ऐसा ब्यूरोक्रेसी है व्हिच इज़ गुड इन अ वे तो ऐसा एक करना है। किंतु यह तो सीधासीधी यह रेगुलर डॉक्टर के पास में से रिपोर्ट ले आया कि डिसक्वालीिफाइड टू कंटिन्यू इन रामकृष्ण मिशन तो अभी तो हम कुछ नहीं कर पाएंगे। इसको तो निकालना ही पड़ेगा। तो बोला वो जो पीपीटीसी में उसको बोल दिया गया इस ब्रह्मचारी को कि अभी तुमको तो जाना पड़ेगा। तुम्हारा मेडिकल रिपोर्ट गलत आ गया। ये तो एक चीज दूसरा कि उसको डांटा बुला करके कि क्यों भाई तुमने डायरेक्ट डॉक्टर को जाकर ऐसा कहा। तुम तो पहले हमको बताना चाहिए ऐसा कुछ है तो फिर हम लोग डिसाइड करेंगे डॉक्टर ने इस तरह का दे दिया सर्टिफिकेट अभी हम क्या करें बोल के तो ठीक है अभी ब्रह्मचारी भी क्या बोलेगा तो ये सब चल रहा है उसी बीच में फिर वो जो साधुओं का सीनियर जो अपने थे एडमिनिस्ट्रेशन में उनका एक मीटिंग हुआ बोलते हैं कि चलो इसको रख लेते हैं ऐसा कोई सीरियस कुछ नहीं है स्पेशल एग्जामिनेशन करेंगे और फिर डिसाइड करेंगे तो स्पेशल एग्जामिनेशन करवाया दूसरे डॉक्टर से वो जो दूसरा वाला सर्टिफिकेट है वो करवाया कि हां इंस्पाइट ऑफ दिस लिमिटेशन ही इज़ अलाउड टू कंटिन्यू इन आवर ऑर्डर। तो देखिए यह पूरा मामला चल रहा है। तो जो एक रिस्पांसिबल जो स्वामी जी थे जो रिस्पांसिबल महाराज ये सब चीजों के पीछे में कि जिनका कि की डिसीजन होता है वह और किसी साधु को कहते हैं कि देखिए यह लड़का यदि चाहता तो इसको छुपा भी सकता था। जो छुपाया नहीं सत्य वचन कहता है तो उसका अर्थ है कि उसके भीतर में यह चरित्र की शक्ति है। देखिए चरित्र की शक्ति कब प्रकट होती है? सत्य वचन हम कहते हैं। हां कहो। किंतु आपको इस समय सत्य वचन कहना है कि जबकि उसके परिणाम स्वरूप आपको नुकसान भी हो सकता है। उस समय यदि आप सत्य वचन कहते हैं तभी तो आपके चरित्र की शक्ति है। वरना तो फिर हम बोलेंगे कि हां जब तक मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं होता है तब तक मैं सत्य वचन का पालन करूंगा। दूसरों को प्रॉब्लम होता है तो होने दो। किंतु जैसे ही सत्य वचन कह के मुझे कोई नुकसान होता है तो वहां पर मैं मिथ्या बातें झूठ बोलना शुरू कर दूंगा। तो यह तो कोई आपका सत्य वचन पालन हुआ नहीं। यह कोई चरित्र की शक्ति का यह कोई यह हुआ नहीं प्रदर्शन। तो यहां पे भी [गला साफ़ करने की आवाज़] यह उदाम नृत्य करना फिर यह भाव में उन्मत्त होना इस तरह की भक्ति उन्हीं को शोभा देती है जिनके भीतर में इस तरह की चरित्र की शक्ति हो। आत्मबलिदान देने की कैपेसिटी हो। यदि आत्म बलिदान देने की कैपेसिटी नहीं है तो वे लोग इस तरह की भक्ति के अधिकारी नहीं है। तो यह पूरा एक हमारा वराह नगर मठ का डिस्क्रिप्शन। अभी इसी कहानी में थोड़ा सा आगे देखते हैं। मास्टर महाशय का आगमन होता है वराह नगर मठ में। अभी देखिए कि मास्टर महाशय लास्ट टाइम ठाकुर को मिले थे। आई थिंक अप्रैल कि ऐसा ही कुछ उनका लास्ट रिकॉर्ड था काशीपुर का। ठाकुर की महासमाधि हुई 16th अगस्त को और कथामृत में जो लास्ट रिकॉर्ड है ठाकुर के साथ में वार्तालाप करने का आई थिंक एग्जैक्ट डेट मैं भूल गया हूं। किंतु अप्रैल महीने का वह डेट है। तो यह अप्रैल से लेके मई, जून, जुलाई, अगस्त यह चार महीनों का रिकॉर्ड मास्टर महाशय ने ठाकुर के आखिरी चार महीनों का रिकॉर्ड नहीं रखा है। और हम अनुमान कर ही सकते हैं कि ठाकुर की जो अवस्था दिन प्रतिदिन इतना कष्टकर होती जाती थी, फिर तो मुंह से आवाज भी नहीं निकलती थी। तो वह देखकर के उनके हृदय में इतना कष्ट होता होगा कि वे अभी यह सब घटनावली मास्टर महाशय लिपिबद्ध ही नहीं कर पाए थे। बोल के उन्होंने यह चार महीनों का विवरण छोड़ दिया है। शरद महाराज ने भी काशीपुर के दिनों का वर्णन किया ही नहीं है। भक्तों के हृदय में इतना कष्ट यदि याद करके भी इतना कष्ट होता था तो उपस्थित रह के ठाकुर की परिस्थिति देखकर के तो कितना कष्ट होता होगा। तो यह घटनाओं का काशीपुर के दिनों की घटनाओं का अल्प ही विवरण अपने पास में है। तो अप्रैल से लेकर के मास्टर महाशय ने अपनी डायरी में जो गैप लगाई है वेकेशन लिया है उसको लिखने में तो सीधा आता है अभी वराह नगर मठ में 21 फरवरी शिवरात्रि के दिन की बात। वराह नगर मठ की स्थापना तो अगस्त में ही हो गई थी। किंतु फिर देखिए कि अप्रैल से लेकर के स्टार्ट करके सीधा फरवरी तक यह पूरा गैप मास्टर महाशय के कथामृत के विवरण में है और फिर यह महाशिवरात्रि से फिर से उनका विवरण कुछ दिनों तक का हमको मिलता है। तो वही मास्टर महाशय का विवरण फिर से यहां पर हम थोड़ा देखते हैं कि क्या कहते हैं। मास्टर महाशय

वराहनगर मठ में शिवरात्रि पूजा

लिखते हैं कथामृत में वराह नगर मठ। श्रीजुक्तो नरेंद्र राखाल प्रभुति आज शिव रात्रि उपवास करिया आन श्रीजुक्तो नरेंद्र राखाल वगैरह गुरु भाई आज शिवरात्रि का उपवास उन्होंने किया है दुई दिन पर ठाकुर जन्मतिथि पूजा होइबे दो ही दिन के बाद में ठाकुर की जन्मतिथि पूजा होगी अभी यहां पे बेलूर मठ में भी यह जो शिवरात्रि ठाकुर की तिथि पूजा और पब्लिक सेलिब्रेशन पब्लिक सेलिब्रेशन आपको पता होगा कि ठाकुर की तिथि पूजा तो कहीं पर मंडे ट्यूसडे को ना कि ऐसा कुछ आती है। किंतु फिर ज्यादा लोग समावेश हो ठाकुर की तिथि पूजा का आनंद प्राप्त करने के लिए ठाकुर के पृथ्वी पर अवतरण का आनंद उठाने के लिए जो लोगों का समावेश बेलूर मठ में ज्यादा करके हो बोल कर के एव्री संडे नेक्स्ट संडे तिथि पूजा के बाद का जो पहला संडे आता है वह पब्लिक सेलिब्रेशन होता है और पब्लिक सेलिब्रेशन यदि बेलू मठ का आपने देखा होगा तो इतना आनंद इतना आनंद ये जैसा एक मेला होता है ना मेले में क्या है खाने खाने पीने के सब स्टॉल लगते हैं तो यह सब स्टॉल वगैरह वहां पर लगाए जाते हैं गंगा के किनारे पूरे बेलूर मठ में वहां प्रारंभ होकर के पूरा गेट से प्रारंभ होकर के गंगा के किनारे तक और पूरे गंगा के किनारे पर खाने-पीने के यह सब खिलौने के सब स्टॉल लगते हैं और फिर हजारों हजारों लोग वहां पर उस दिन सुबह से लेकर के रात तक इकट्ठा होते हैं और रात को होती है आतिशबाजी फायर वक्स अभी तो आई थिंक फायर वक्स बंद कर दिया ट्रेजडी एनीवेयर किंतु मैं जब था बेलूर मठ में तो उस समय तो नया चालू मैं जब पहली पहली बार पहली बार मैंने पब्लिक सेलिब्रेशन देखा था मैं बेलूर मठ में ज्वाइन करने के लिए गया था उस समय क्या था कि मां का जो मंदिर है उसके सामने में जो खुली जगह है वहां पे हम साधु ब्रह्मचारी ही यह पटाखे फोड़ा करते थे यह फायर वक्स हम लोग हम ही लोग किया करते थे। किंतु मैं जब टीसी में गया था आई थिंक टीसी में ही आई थिंक पहली बार मैंने देखा कि फिर कॉन्ट्रैक्ट दे दिया है फायर वर्क सा एक पूरी जहाज को गंगा के बीच में लाकर के खड़ा कर देते हैं एक या दो जहाज को और फिर वहां से ये हवाई जो है रॉकेट्स जो है उसको फोड़ते हैं और ये रॉकेट्स हवा में उड़कर के इतना सुंदर ये सब दिख जो इंडिपेंडेंस डे सेलिब्रेशन होता है ना अमेरिका में एक कोई भी एक सेलिब्रेशन होता है तो कैसे रॉकेट वगैरह फोड़ते हैं। ऐसे बहुत सारे वीडियो आपने देखे होंगे। तो वैसे ही ऑर्केस्ट्रेटेड फायर वर्क्स एकदम ब्यूटीफुली मैनेज प्रोफेशनलली ऐसा वो उस समय होता था गंगा के बीच में ही और गंगा के दोनों साइड आप देखेंगे हजारों हजारों लोग खड़े हैं उस फायरवक्स को देखने के लिए। तो हम में भी मेरा एक फिक्स जगह था कि वो फायरवक्स देखने के लिए। स्वामी जी का जो बेडरूम है उसके सामने स्वामी जी का जो घाट है गंगा के किनारे वहां पर मैं जाकर बैठ जाता था। वो जो स्टेप्स होते हैं गंगा में जाते हैं तो सबसे लास्ट स्टेप अभी लास्ट स्टेप का भी डेफिनेशन चेंज होता है। गंगा का पानी ज्यादा होगा तो आपको ऊपर थोड़ा बैठना होगा। गंगा का पानी कम होगा। थोड़ा नीचे होगा लास्ट स्टेप। किंतु वो लास्ट स्टेप जैसे कि मैं अपने पैरों को गंगा के पानी में रख सकूं। तो इस तरह से लास्ट स्टेप पर जाके मैं बैठता और यह पूरा फायर वक्स देखता। इट्स अ वन ऑफ द मोस्ट ब्यूटीफुल साइट बेलूर मठ का यदि आप कहे तो अनफॉर्चूनेटली अभी यह एनवायरमेंट एनवायरमेंट के चक्कर में आई थिंक कि इसको बंद कर दिया गया है। किंतु बट एनीवे यह पब्लिक सेलिब्रेशन इज़ वन ऑफ़ द मोस्ट मेमोरेबल सेलिब्रेशन इन बेलूरमड़। यदि दो मेमोरेबल सेलिब्रेशन कहे एक तो है कुमारी पूजा जो कि इट्स अ पार्ट ऑफ दुर्गा पूजा और दूसरा है पब्लिक सेलिब्रेशन और तीसरा यदि कहे तो ऑफ कोर्स कल्पतरु दिन जो कि काशीपुर उद्यान गुरु में होता है। तो यहां पे भी और ये ठाकुर की तिथि पूजा महाशिवरात्रि का और भी एक सिग्निफिकेंस है कि फिर वो सन्यास सेरेमोनी होता है ठाकुर की तिथि पूजा की मध्य रात्रि को तो शिवरात्रि के दिन से आगे ही फिर यह श्राद्ध हो जाता है। फिर यह मुंडन होता है। फिर यह पूरा सन्यास का कैंप स्टार्ट हो जाता है। सन्यास के मंत्र जो है वह सन्यास के आचार्य महाराज सन्यास के मंत्र का आपको क्लासेस होंगे जो कैंडिडेट है उनके और फिर ठाकुर की तिथि पूजा के दिन मध्य रात्रि को फिर यह सन्यास सेरेमोनी प्रारंभ होगा 2:00 बजे ना 3:00 बजे तक ऐसा कुछ होता है एग्जैक्ट टाइम मैं भूल गया तो इस तरह से प्रारंभ होता है और फिर अर्ली मॉर्निंग को सन्यास सेरेमोनी समाप्त हो जाता है और रिवियर्ड प्रेसिडेंट महाराज का जो क्वार्टर है वहां पर सब नए नवसन्यासी नवसन्यासी वहां पर इकट्ठा होते हैं और फिर महाराज जी उनको सन्यास नाम उनको प्रदत्त करेंगे। तो ये पूरा सुंदर सेरेमोनी उसके बाद में तीन दिन भिक्षा करनी होती है। ये ये जो सिलाई किए हुए वस्त्र नहीं पहनने हैं। पैरों में जूते नहीं पहनने हैं। और फिर यह मठ में जो मठ का जो खाना बनता है वह आहार नहीं करना। भिक्षा का अन्न खाना है। तो वेरी ब्यूटीफुल वेरी इंस्पायरिंग सेरेमनी और फिर उसके बाद में यह पब्लिक सेलिब्रेशन। सो बेस्ट सेवन एट डेज इन बेलूर मठ फॉर अस साधुस। सो यहां पे भी मास्टर महाशय शिवरात्रि के दिन वहां वराह नगर मठ में आए हैं। गुरु भाइयों ने उपवास करके रखा है। दो दिन के बाद में ठाकुर की जन्मतिथि पूजा होगी। वराह नगर मठ शबे पांच मा स्थापित होइया छे वराह नगर मठ अभी पांच महीने हुए स्थापित हुआ है ठाकुर श्री रामकृष्ण नित्य धाम में बेश दिन जानना ठाकुर श्री रामकृष्ण नित्य धाम में गए हुए ज्यादा दिन नहीं हुए लिटरली देखिए कितना सुंदर है नित्य धाम ठाकुर अपने नित्य धाम में गए उस बात को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए नरेंद्र राखाल प्रवृत्ति भक्तो देर तीव्र वैराग ो नरेंद्र राखाल वगैरह भक्तों के हृदय में गुरु भाइयों के हृदय में तीव्र वैराग्य है। एक दिन राखाल पिता बाड़ी फिरिया जाो राखाल के अनुरोध करीते आशिया छले एक दिन राखाल के पिताजी अपना लड़का अपने घर वापस आ जाए ऐसा समझाने के लिए राखाल को अनुरोध करने के लिए आए थे। राखाल बोलीले राखाल ने कहा राखाल राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद ठाकुर के मानस पुत्र रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट वैसे सर्वप्रथम प्रेसिडेंट स्वामी जी ही थे किंतु टेक्निकली देखे तो स्वामी ब्रह्मानंद तो वही राखाल ने कहा केनो आपनारा कष्ट करे आन क्यों आप कष्ट करके यहां पे आते हैं आ एकने बेश मैं यहां पे आनंद में हूं एक आशीर्वाद कर जेनु आपनारा आमाई भूले जान अब आप आशीर्वाद कीजिए कि आप लोग मुझे भूल जाए आराम अपना के भूले जाए आप मुझे भूल जाए और मैं आपको भूल जाऊं ऐसे ही आशीर्वाद कीजिए देखिए सुंदर ये राखाल महाराज और उनके पिताजी का किंतु उनके जो पिताजी है हमको पता है कि अपने दक्षिणेश्वर में भी जाते आते जाते रहते थे और वराह नगर मठ में भी वह आते जाते रहते थे बात बाद बात की एक दिन की घटना है कि वह एक दिन आए थे और गुरु भाइयों के साथ में अच्छा उनका रिलेशन हो गया था। बैठकर के गप लगा रहे थे। तो किसी ने कहा पूछा उनको कि अभी आप आप भी यहां पे ही रह जाइए ना। अभी आप घर क्यों जाते हैं? आपका लड़का जैसे यहां पर रह गया आप भी रह जाइए। तो फिर उनके पिताजी कहते हैं कि देखो भाई मैं तो जमींदार हूं। मैं तो यह लग्जरी वगैरह जो है उसका अभ्यस्त हूं। पानी गर्म करने के लिए मेरे पास में नौकर है। खाना बनाने के लिए नौकर है। यह सेवा करने के लिए लोग है। तो मैं यहां पे आकर रहूंगा तो कौन मेरे लिए मेरी यह सेवा कौन करेगा? बोल के मैं यहां पर नहीं रह पाऊंगा। तो इनके पिताजी का भी आना जाना लगा रहता था और गुरु भाइयों के साथ में ठाकुर के साथ में जिस तरह से अच्छा रिलेशन था गुरु भाइयों के साथ में भी अच्छा रिलेशन था। शकले तीव्र वैराग्य सबके हृदय में तीव्र वैराग्य सर्वदा साधन भजन लया छ सब समय साधन भजन को लेकर के ही रहते हैं एक उद्देश्य किसे भगवान दर्शन होए एक ही उद्देश्य है कि कैसे ईश्वर का दर्शन हो नरेंद्र आदि भक्तरा कखनो जप ध्यान कोन कखनो शास्त्र पाठ कोन नरेंद्र आदि भक्त गुरु भाई कभी जब ध्यान करते हैं। कभी शास्त्र पाठ करते हैं। नरेंद्र बोले अभी

गीता का निष्काम कर्म क्या पूजा, जप और ध्यान — बस यही है?

यह नरेंद्र जो कहता है उसको लेकर के थोड़ा चिंतन करना होगा। गीताएं भगवान जो निष्काम कर्मो करते बोलेन से पूजा जप ध्यान एप कर्मो अन्य कर्मो ना है। गीता में भगवान ने जो निष्काम कर्म करने को कहा है वह यही सब पूजा जप ध्यान वगैरह और कोई कर्म नहीं। देखिए यह स्वामी जी ने बाद में जो कुछ कहा है और इवन गीता का भी कर्सरी रीडिंग करने से भी हमको जो पता चलता है उसके साथ में यह स्टेटमेंट का कहीं पर भी मिल नहीं हो रहा है कि गीता में भगवान ने किस तरह का निष्काम कर्म करने को कहा है तो पूजा जप ध्यान वगैरह और कुछ नहीं देखिए यहां पर हमको बहुत बहुत कुछ कहना होगा कि नरेंद्र ने ऐसा क्यों कहा गीता पढ़कर के ऊपर पर ऊपर से ही लगता है कि भगवान ने एक्चुअली अर्जुन को युद्ध करने के लिए उपदेश दिया था। नहीं कि पूजा जब ध्यान करने के लिए कर्म योग की बात कही थी। निमित्त मात्रम भवसव्य साचीन इसका अर्थ क्या है कि मैंने ऑलरेडी इनकी हत्या कर दी है। शत्रु सैन्य की तुम तो सिर्फ मेरे लिए निमित्त मात्र हो। तो यह निमित्त मात्र होना यह सिर्फ इसके लिए नहीं कि जब ध्यान पूजा पाठ किंतु क्षत्रिय धर्म करने के लिए भगवान अर्जुन को तैयार कर रहे हैं। हमने गीता के बारे में एक बार जब डिस्कशन हुआ था तो बात हुई थी कि गीता अब जैसे कि यह गांधी जी ने अनासक्ति योग बोल के गीता के बारे में लिखा है। किंतु मुझे ऐसा लग रहा है कि अनासक्ति योग यदि गीता का कोई एक सार आपको निकालना ही है तो मेरी दृष्टि आप सबकी अपनी-अपनी दृष्टि है। ऑफ कोर्स ऐसा कहना उचित नहीं है कि मैंने ही गीता को ठीक समझा उन्होंने नहीं समझा। इतना विशाल महासागर की तरह है। किंतु यदि जहां तक यह कोर भगवान कृष्ण का पपस जाता है। क्यों गीता कही गई अर्जुन को युद्ध करने के लिए तैयार करना है मानसिक स्वरूप से जिससे कि वह बिना झिझक के अपने जो रिलेटिव्स है अपने जो संबंधी है उनका भी हत्या करने के लिए वह तैयार रहे। तो यह जो स्वधर्म पालन करने का उपदेश है यह भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया है। तो मुझे ऐसा लगता है कि यह स्वधर्म पालन का उपदेश यही गीता का हार है। यदि आप ब्राह्मण है तो ब्राह्मण धर्म का पालन कीजिए। क्षत्रिय है तो क्षत्रिय धर्म का पालन कीजिए। ब्राह्मण को क्षत्रिय धर्म का पालन करना उचित नहीं। इस अर्थ में कि जिनके पास में यह एडमिनिस्ट्रेटिव वगैरह जो रिस्पांसिबिलिटी है उनको फिर यह डिसीजन मेकिंग पॉलिसी मेकिंग में नहीं आना चाहिए और जिन लोगों का यह जो लोगों की रक्षा करने का भाव जो है क्षत्रिय का उनको यह वैश्य शूद्र धर्म अपनाने से यह साधक के रूप में बात करने से उनका धर्म भंग ही होगा। उनको पाप ही लगेगा। तो यह स्वधर्म पालन यही मुझे लगता है कि गीता का मुख्य उपदेश है। तो यहां पर भी पता नहीं कि स्वामी जी ने किस तरह किस भाव में यह सब बातें कही थी। क्योंकि हमको पता है कि स्वामी जी ने खुद ने जब अमेरिका से वापस आकर के भारत में जिस तरह से दरिद्र नारायण की सेवा का जो महामंत्र दिया था वह तो एकदम इस बात से अलग पड़ता है। गीता का नाम करके खास करके जब स्वामी जी यह कहते हैं तो फिर हमको स्वामी जी के ही जो चार प्रैक्टिकल वेदांत के जो प्रवचन है उसको याद करना चाहिए। स्वामी जी कहते हैं कि भारत में इतना फिलॉसोफी इतना फिलॉसोफी बढ़ गया है। भारत जितना अच्छा ये उच्च कक्षा का फिलॉसोफी और किसी देश में नहीं मिलेगा। और फिर भारत में ही ये मानव अधिकारों का जिस तरह से यह जो यह जात वो जात निम्न जात ऐसा बोलकर के हनन किया जाता है। ऐसा भी और कहीं देखने को नहीं मिलेगा। तो स्वामी जी के वो सब विचार थे। तो यह स्वामी जी ने यह जो कहा किस दृष्टि से कहा है वह भाव में आकर के माने भक्ति के भाव में आकर के उन्होंने यह कहा ऐसा मैं अनुमान कर लेता हूं क्योंकि अगेन वही फेमस बात कि शरद महाराज कहते हैं आई थिंक योगानंद जी को ही कि नरेंद्र जब जिस बात को कहता है उसको इस तरह से बड़ी करके कहता है कि ऐसा लगता है बाकी सब गलत और यही एक सत्य तो फिर योगेन महाराज ने शरथ महाराज को क्या कहा भाई तुम मां की शरण में आओ मां जो कहेगी वह सब ठीक-ठीक कहेगी। तुमको इस तरह का कोई भी फिलॉसोफिकल इंटेलेक्चुअल कंफ्यूजन नहीं होगा। तो यहां पे भी मुझे लगता है कि यह नरेंद्र भाव में आकर के और इस बात को इतना बड़ा करके कह रहा है क्योंकि उस समय नरेंद्र भी भाव पूजा जप ध्यान पूजा तो नहीं वैध पूजा तो नहीं किंतु एटलीस्ट जप ध्यान को लेकर के रहता था। बोल के उसी को इतना बड़ा करके कहता है कि बाकी सब चीजें छोटी लग जाती है। और मास्टर महाशय जो है वो नरेंद्र के इस हिप्नोटिज्म में फंस गए हैं। बोल कर के उन्होंने इसको लिख लिया है। देखिए मास्टर महाशय की ये जो कशमकश है उनके मन की कि ये सब समय आखिरी तक जैसे कि ये कर्म योग करना कितना उचित है वो लेकर के उनके मन में जो चल रहा था। तो उनका भी कंक्लूजन मां ने ही दिया। जिस तरह से शरद महाराज के मन में ये चल रहा था कि ये नरेंद्र जब जिस समय जो कहता है इतना बड़ा करके कहता है कि उस ऐसा लगता है कि बाकी सब उसके सामने तुच्छ है। यदि कर्म की प्रशंसा करेगा तो ऐसी करेगा कि लगेगा भक्ति और ज्ञान किसी काम का नहीं। ज्ञान की प्रशंसा करना ज्ञान के बारे में बोलना यदि प्रारंभ करेगा तो लगेगा कर्म करना बिल्कुल किसी काम का नहीं। तो फिर उसका कंक्लूजन जैसे कि मां की सेवा से उनके मन को एक इंटेलेक्चुअल स्टेबिलिटी मिला तो वैसे ही मास्टर महाशय का भी अगेन फेमस घटना है। काशी गए थे। मां भी थी उस समय वहां पे मां सेवाश्रम का दर्शन करने के लिए आई। बड़ी खुश हो गई। फिर वह जो लक्ष्मी निवास गई वहां से ₹10 मां ने दक्षिणा के रूप में भेजा। और यह बात जब राजा महाराज को पता चली तो बड़े ही खुश होकर के कहा कि बुलाओ मास्टर महाशय को। तो मास्टर महाशय आए राजा महाराज ने कहा कि देखिए मां ने दक्षिणा भेजी है ₹10 तो फिर मास्टर महाशय भी कहते हैं कि अभी ना स्वीकार करने का कोई उपाय नहीं है एक ना माना और कोनो जो ना आई अभी तो स्वीकार करना ही पड़ेगा तो माने जिस तरह से शरद महाराज के मन का समाधान किया था ये मास्टर महाशय के मन का भी समाधान माने ही किया था तो इसलिए यहां पे मास्टर मास्टर महाशय लिखते हैं कि नरेंद्र कहता कहता है कि गीता में भगवान जो निष्काम कर्म करने को कहते हैं वह यही सब है। पूजा जप, ध्यान वगैरह और कुछ नहीं। तो इसके बाद जो है मास्टर महाशय का विवरण अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

बाबूराम महाराज (स्वामी प्रेमानन्द) स्वामी विवेकानन्द के कर्म योग के बारे में

ना किंतु क्या है कि ये लोग जिस तरह से बात करते थे कोई भी कंफ्यूज हो जाएगा ना मास्टर महाशय तो चलो लिख देते थे किंतु बाकी गुरु भाइयों के मन में संदेह था ये तो जग जाहिर है मैंने यह बाबूराम महाराज ने खुद ने यह बात कही है। बाबूराम महाराज का भी सेम कि वो काशी गए थे। मोस्ट प्रोबेबबली काशी ही गए थे 191 के आसपास में। तो बाबूराम महाराज कहते हैं उस समय मैंने स्वामी जी का कंप्लीट वर्क्स बड़े ध्यान से पढ़ा और तब कहीं मैं जाकर कन्विंस हुआ स्वामी जी के कर्म योग के बारे में। किंतु देखिए यही बाबूराम महाराज अगेन कि जब वह ढाका गए हैं तो वह निखिलंद जी वह तो उस समय स्टूडेंट है रेवोल्यूशनरी आकर के उनको कहते हैं कि आपको समझ में नहीं आ रहा है कि स्वामी जी क्या कहना चाहते हैं तो बाबूराम महाराज इतना गुस्सा हो गए क्रोधित हो गए कि हमने जिनके साथ में घर किया जिनके साथ में रहे सोए खाए आनंद किया वार्तालाप किया साधन भजन किया तुम बोलते हो साले कि हम ही को वो समझ नहीं आते हैं चलो तुम घोड़ा बनो मैं तुम्हारी पीठ पर चढ़ता हूं [हंसी] तो निखिलनंद जी लिखते हैं जैसे जैसे उनको घोड़ा बना के उनकी पीठ पे उठे बाबूराम महाराज उनके मन का सब संदेह भंजन हो गया।

श्रीरामकृष्ण ने साधना के विभिन्न मार्गों की कोई खिचड़ी नहीं बनाई; उन्होंने प्रत्येक मार्ग को उसके मूल स्वरूप में ही प्रमाणित किया

ये ठाकुर कहते हैं ना कि ये क्या है कि जो भी पंथ पकड़ते हैं उस पंथ में निष्ठा 100% होनी चाहिए। तो अह चैतन्य महाप्रभु गधे को भेक पहना करके गधे को प्रणाम किए थे। अर्थात कि जो वैष्णव का यह जो पोशाक धारण करेगा भेक यानी कि पोशाक माला वो चंदन का वो ये होता है तिलक वो जो वैष्णव का एक ये रहता है बाह्य आवरण बाह्य देखाव तो गधे को इस तरह से पहना करके उसको भी महाप्रभु ने प्रणाम किया दिखाना क्या चाहते हैं कि यदि आप साधना करते हैं तो उसका यह जो बाह्य जो कुछ भी यह है उपकरण उसको भी आपको ग्रहण करना है तो ठाकुर ने इस तरह से साधना में निष्ठा दिखाई है आप एक बार आपने अद्वैत में सिद्ध सिद्धि प्राप्त कर दी तो फिर यह क्रिश्चियन गॉड या इस्लामिक गॉड भी तो पार्ट ऑफ द सेम ब्राह्मण तो मैं उसका उनको यदि मैं यह करता हूं उपासना तो आई डोंट हैव टू डेविएट आउट ऑफ माय वे किंतु ऐसा नहीं माने वो साधना की है तो साधना का भेक भी धारण किया है बाह्य उपकरण है उसके सहित साधना की है यानी कि उस साधन परंपरा में जो कुछ भी कहा गया है एग्जैक्टली उसको फॉलो किया है सिर्फ ऊपर ऊपर से साधना नहीं की या तो फिर जैसे कि मेरा धर्म सही और बाकी सब धर्म है मेरे धर्म में आने के लिए स्टेपिंग स्टोन है। यह जो स्वामी जी ने कहा ना कि व्हाट वास द वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन इट वाज़ अ हिडन शो अर्थात कि यह हिन जो नॉन क्रिश्चियन है वो किस तरह के उटपटांग हरकतें करते हैं। लोगों को दिखाने के लिए यह पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन बुलाया गया। फिर उनको पता ही नहीं था कि ये हिन शोभ करने के समय में ऐसे सब हिन आ जाएंगे। क्रिश्चियनिटी को ही हिला के रख देंगे। [हंसी] उपकरण सहित पूजा करनी है। बाह्य वो भेक भी धारण करना है। दैट इज दैट इंटीग्रिटी ऑफ साधना कि हमने उसको संपूर्ण रूप से स्वीकार किया है। हमने ऐसा नहीं कहा कि अद्वैत वेदांत में जाने के लिए द्वैत एक स्टेप है। नहीं द्वैत का अपने आप में एक इंडिपेंडेंट अस्तित्व है। उसको फॉलो करके आप वही निर्गुण निराकार ईश्वर तक पहुंच सकते हैं। जहां पे आप ज्ञान मार्ग से पहुंच सकते हैं। सो प्रत्येक मार्ग का इंडिपेंडेंट अस्तित्व उन्होंने एस्टैब्लिश किया है। सिर्फ बात यह नहीं है कि सर्वधर्म समन्वय किया है। प्रत्येक मार्ग को उन्होंने वैलिडेट किया है। यानी कि आप सिर्फ क्रिश्चियन रहकर के भी साधना करना चाहते हैं। इफ यू आर ऑनेस्ट यू कैन डू दैट। सिर्फ मुस्लिम रह के करना चाहते हैं। इफ यू आर ऑनेस्ट यू कैन डू दैट। स्वामी जी ने कहा ना कि क्रिश्चियन इज़ नॉट टू बिकम अ बुद्धिस्ट। बुद्धिस्ट नॉट टू बिकम ए हिंदू बट ए बुद्धिस्ट हैज़ टू बिकम अ बेटर बुद्धिस्ट। क्रिश्चियन हैज़ टू बिकम अ बेटर क्रिश्चियन। प्रत्येक मार्ग को ठाकुर वैलिडेट करके गए हैं। वि इज हिज ग्रेटनेस। मनमुख एक करना। अब स्वामी जी कहते हैं कि भारत में देखिए सब कुछ धर्म के आधार पर होता है। एक लुटेरा एक लुटेरे का दल बनाता है और लोगों को लूटने के लिए जाता है। उसको भी एक धार्मिक फिलॉसोफी चाहिए। वो डाकात काली वो जो वहां पे थी ना तेलो भेलो के मैदान में जहां पे मां को ये डाकात बाबा ये लुटेरे वो उनका दर्शन हुआ था। उनका एनकाउंटर हुआ था। तो वही लुटेरों की मां काली उनको भी आपको बलि चढ़ाना है और फिर यदि यह फिलॉसोफी है आप उसको फॉलो करते हैं लुटेरे की काली को डाकात काली को तो यू डू इट सिंसियरली अब कर्ता भजा संप्रदाय है तो वहां पे क्या था कि गुरु की पूजा ईश्वर के रूप में करनी है। अब मनुष्य को ईश्वर के रूप में पूजा करेंगे तो करप्शन तो आने ही वाला है। उसका घमंड कितना बढ़ जाएगा। तो यह ठाकुर एक और उनकी मजाक भी करते हैं और सामने जब गिरीश कहता है कि मैं उनके ऊपर में एक नाटक लिखूंगा ठाकुर साथ-साथ में कहते हैं अरे नहीं वह भी तो एक मार्ग है। इफ यू आर सिंसियर इवन दैट मार्ग तो भी आपको ईश्वर साक्षात्कार होंगे। यह जो तांत्रिक लोग शक्ति साधक वहां पे जो बैठकर के शराब पी के फिर वह जो सब नाटक वगैरह करते थे म भ्रष्टाचार करते थे तो ठाकुर [गला साफ़ करने की आवाज़] कहते हैं वो अचलानंद ने किया अचलानंद मोस्ट प्रोबेब्ली वो वो जब शराब पीता है तो स्थिर बैठ के जप करता है। सो प्रत्येक मार्ग जो आपने ईश्वर के लिए डिवाइस किया है। इफ यू आर सिंसियर यू कैन अटेन गॉड थ्रू दैट मार्ग ओनली। ये जो हम कहते हैं ना कि सर्वधर्म समन्वय करना है। खिचड़ी धर्म बनाना है। या तो फिर कि बाकी जो धर्म है वो यहां पे आने के लिए स्टेपिंग स्टोन है। दैट इज नॉट अ करेक्ट इंटरप्रिटेशन ऑफ़ ठाकुर। करेक्ट इंटरप्रिटेशन इज ठाकुर प्रत्येक पाथ को वैलिडेट करके गए। मां ने और भी एक बात कही है व्हिच इज मोर रिलेवेंट टू अस राइट नाउ कि ठाकुर की इच्छा थी कि प्रत्येक धर्म मार्ग से ईश्वर साक्षात्कार करें। प्रत्येक धर्म मार्ग में वर्णित ईश्वर जो ईश्वर प्राप्ति का जो आनंद है उसका भोग करें। उसके लिए ठाकुर ने यह सब किया है। माने ऐसा नहीं कहा कि प्रत्येक धर्म सही है। एक ही ईश्वर के या एक ही अल्टीमेट रियलिटी के ये डिफरेंट-डिफरेंट यह है। वो है कि प्रत्येक धर्म मार्ग पे जिस तरह से ईश्वर की वर्णना की गई है। उस ईश्वर वर्णना का वो आनंद उठाए। माने मां का अंडरस्टैंडिंग भी कितना सटल है यहां पर।

प्रश्न: यहाँ स्वामीजी गीता के कर्मयोग को केवल पूजा-पाठ और ध्यान तक सीमित बताते हैं; परंतु आगे चलकर वे ‘शिव-ज्ञाने जीव-सेवा’ को कर्मयोग का स्वरूप कहते हैं। इससे लगता है कि प्रव्रज्या के समय उनके विचार क्रमशः विकसित होते गए।

ना यस यस एक्चुअली अपना यह जो जिस तरह से मैंने क्लास को कंडक्ट करूंगा देखेंगे कि माइलस्टोन हम स्टडी करेंगे खूब डिटेल में। सो व्हाट इज अ माइलस्टोन दैट एट दिस पॉइंट स्वामी जीसस लाइफ एंड हिज फिलॉसोफी टूक ए डिसाइडेडली मेजर टर्निंग एक मेजर अपग्रेडेशन या लिप ऑफ इवोल्यूशन उनके थिंकिंग में आया है। सो दैट विल बी द एक्चुअल थीम ऑफ आवर ऑनगोइंग क्लासेस। सो उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है कि स्वामी जी के जीवन में जो इवोल्यूशन हुआ उनकी अंडरस्टैंडिंग का वो दैट इज अ कोर पार्ट ऑफ स्वामी जीसस आईडियोलॉजी। आप स्वामी जी की क्या बात करते हैं? ठाकुर माने आई मीन हार्ड कोर जो अपना जो ये है किताब वो है लीला प्रसंग। माने जितना कंजर्वेटिव हो सकता है कंजर्वेटिव मोस्ट यदि कोई एक ये है किताब दैट इज श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग। तो शरद महाराज लिखते हैं कि और यह घटना तो इवन कथामृत में भी है कि केशव के कुछ चेलों ने केशव का बायोग्राफी लिखा उसमें कहा कि केशव से ठाकुर ने सीखा कि किस तरह से गृहस्थ आश्रम में रह के ईश्वर प्राप्ति हो। तो फिर ये गिरीश वगैरह ने ठीक करके रखा है कि वो अमृत उनका अमृत ना कि कोई जो वहां का जो आएगा उसके सामने ये पढ़ के उनको कहेंगे ठाकुर के सामने ही कि क्या बात कर रहे हो? ठाकुर ने क्या केशव से सीखा है? क्या उल्टा पुल्टा आपने किताब में लिखा है तो ये सीन है वर्णन है पूरा और ये बोलते भी है ठाकुर जब ये डिस्कशन हो रहा है गिरीश घोष किताब पढ़ के उनको कहते हैं ठाकुर वहां पे बैठे हैं ठाकुर सुन रहे हैं और फिर कहते हैं देखो कि तुम लोगों का ये जो थिंकिंग है ना कि गृहस्थ आश्रम गृहस्थ आश्रम ये जो काम कांचन त्याग नहीं करोगे ईश्वर प्राप्ति नहीं होगी ठाकुर ने देखिए सी ठाकुर इज वेरी क्लियर ठाकुर कहते हैं कि गृहस्थ आश्रम में रह के ईश्वर प्राप्ति होगी किंतु ये केशव के चेले कहना क्या चाहते हैं बिना काम कांचन के त्याग किए गृहस्थ आश्रम में रह के प्राप्ति होगी। जबकि ठाकुर कहते हैं कि एक बार राजा जनक की तरह सर नीचे पैर ऊपर करके उर्ध्वासन में आप तपस्या कीजिए। बाद में गृहस्थ आश्रम कीजिए। सो ठाकुर थिंकिंग त्याग इज फंडामेंटल। इवन गृहस्थ आश्रम में भी प्राप्ति होगी। तो त्याग करने के बाद में प्राप्ति होगी। दैट ठाकुर क्लियर करते हैं। किंतु यह जो थिंकिंग है कि केशव से ठाकुर ने सीखा, केशव से ठाकुर ने सीखा। ये चलता आ रहा है। तो लीला प्रसंग में शरद महाराज लिखते हैं कि हां केशव से ठाकुर ने सीखा मैं स्वीकार करता हूं। तो हमको लगेगा कि ये ठाकुर से भी ऊंधा मतलब ठाकुर ने तो स्पष्ट कर दिया है कि मैं ऐसा कहा है कि त्याग ही फाउंडेशन है। तो शरद महाराज ऐसा क्यों लिखते हैं? तो शरद महाराज लिखते हैं उसका एक्सप्लेनेशन देते हैं कि देखिए कि केशव रिप्रेजेंट्स अ मॉडर्न वर्ल्ड। अब जैसे कि अपना ये मथुर बाबू भी तो वैसे अंग्रेजी शिक्षा वगैरह करके आया है और ठाकुर ऐसे लोगों को मिले भी थे। है वो देवेंद्र वगैरह देवेंद्रनाथ टैगोर किंतु एक जो एक मिडिल क्लास एजुकेटेड यूथ जो कि ठाकुर के पास में अल्टीमेटली आने वाला था केशव इज रिप्रेजेंटेटिव ऑफ दैट क्लास और केशव से ठाकुर ने सीखा कि ऐसे लोगों के साथ में कैसे बात करना है तो दैट ठाकुर ने केशव से सीखा ये मैं स्वीकार करता हूं शरद महाराज स्वयं लीला प्रसंग में लिखते हैं सो स्वामी जी को तो छोड़ ही दीजिए निर्विकल्प समाधि के बाद में ठाकुर का भी विचारों का इवोल्यूशन हुआ है कंजर्वेटिव मोस्ट किताब जो है उसमें यह स्वीकार किया गया है। सो उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। पर दूसरा आपने जैसे वह रीडिंग किया ना सो लेट मी रीड वन पैसेज। आई होप कि यह है। मैं आज सुबह ही पढ़ रहा था। स्वामी जी का लेटर है। हां यस यस यस। हां स्वामी जी जोसेफाइन मैक्लॉर्ड को लिखते हैं। फेमस लेटर है एक्चुअली पढ़ा ही होगा कि 18th अप्रैल 1900 का है। वो जो पता है ना वो सब झमेला चल रहा था न्यूयॉर्क में काली महाराज ने आकर के वो जो सब चेंजेस किए उसमें फिर ये फ्रांसिस लेगेट वगैरह निकल गए थे कमेट में से वगैरह। तो स्वामी जी ये लेटर लिखते हैं। वेरी ब्यूटीफुल लेटर जस्ट थोड़ा सा पार्ट करता हूं। आफ्टर ऑल जो माने सब कुछ कह के कि स्वामी जी कहते हैं कि अभी मैं सब चीजों से मुक्ति हो गया हूं। अभी मुझे उसमें जाना ही नहीं है। काली को जिस तरह से चलाना चाहे अभेदानंद जी को चलाए। फिर क्या लिखते हैं? आफ्टर ऑल जो आखिर में जो यानी जोसेफ एंड मैकउड आई एम ओनली द बॉय हु यूज्ड टू लिसन वि रेप्ट वंडरमैन टू द वंडरफुल वर्ड्स ऑफ रामकृष्णा। आखिर में तो मैं वही लड़का हूं जो कि आनंद से भरपूर होकर के आश्चर्यचकित होकर के श्री रामकृष्ण देव की वाणी का श्रवण किया करता था। अंडर द बनियन एट दक्षिणेश्वर। दक्षिणेश्वर में पंचवटी के नीचे बैठ के ठाकुर की वाणी का आश्चर्य रूप आनंद से श्रवण किया करता था। दैट इज माय ट्रू नेचर। वही मेरा सही स्वभाव है। वर्क्स एंड एक्टिविटीज डूइंग गुड एंड सो फॉरर्थ आर ऑल सुपरइंपोजिशंस। ये वर्क और एक्टिविटी अच्छा करना यह सब ये सब सुपरइंपोजशन ये जो स्वामी जी ने कहा ना कि गीता का अर्थ क्या है तो यही जप ध्यान करना दैट जो उन्होंने वरा नगर में कहा था कि वो अपने आखिरी आखिरी लेटर में सेम चीज कह रहे हैं नाउ आई अगेन हियर हिज वॉइस मैं फिर से उनका वही वाणी श्रवण कर पा रहा हूं द सेम ओल्ड वॉइस थ्रिलिंग माय सोल वही वो पुराना आवाज जो कि मेरे हृदय को झंझोल करके रख देता है बोंड्स आर ब्रेकिंग लव डाइंग वर्क बिकमिंग टेस्टलेस द ग्लैमर इज ऑफ लाइफ ओनली द वॉइस ऑफ द मास्टर कॉलिंग आई कम लॉर्ड आई कम स्वामी जी रिप्लाई लेट द डेट बरी द डेट फॉलो धाऊमी आई कम माय बिलोवेड लॉर्ड आई कम सो म स्वामी जी ने जो कहा कि जप ध्यान वगैरह दैट इज द अल्टीमेट मीनिंग सो आखिर में आकर के वही बात करता है जावत पाची तावत सीखी जावत बाची तावत सीखी ओम