मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपि अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाय नमः
असली तपस्या का रहस्य (1)
महापुरुष महाराज काशी गए थे तो केदार बाबा एक साधु है बूढ़ो बाबा सब कहते हैं उनको उनके साथ में बैठे हैं तो वहां वो काशी में वह जो नॉर्थ इंडियन साधु होते हैं ना तो ऐसा कोई एक वो हाथ देखते हैं ज्योतिष और आपका बताएंगे भविष्य। पहले तो बहुत सारे लोग ऐसा ही सोचते थे कि साधु का अर्थ यही है कि वह कौपिन पहनेगा। फिर वो हाथ में एक चिमटा रखेगा। फिर उसकी जटा होगी और फिर वह ऐसा अगड़म बगड़म कुछ बोलता रहेगा। बेलूर मठ में एक बहुत सालों के बाद में अपने ही ऑर्डर के एक सीनियर स्वामी ने एक सीनियर महाराज ने रेमिनेशंस लिखा है बेलूर मठ का महापुरुष महाराज का प्रथम दर्शन किया था बेलूर मठ में तो तीनचार डिवोटी वो तो उस समय गृहस्थ ही थे यंग लड़के थे कॉलेज में पढ़ते हुए तो वहां पर राह देख रहे हैं कि महापुरुष महाराज कब आएंगे कब दर्शन करेंगे अभी पता नहीं कि यह लड़के को जो कि भविष्य में अपने संघ में साधु हुआ वो लड़के को पता नहीं साधु कैसे होते हैं। वो वैसे ही साधु देखना है तो चलो किसी ने जैसे मास्टर महाशय को उनके कजिन था ना सिद्धू वो दक्षिणेश्वर ले आया था तो ऐसे ही कोई मित्र इनको ले आए होंगे तो वहां पर सब राह देख रहे हैं। कुछ 10-15 मिनट राह देखने के बाद में महापुरुष महाराज आए कमरे में प्रवेश किए तो यह जो लड़का था भविष्य में साधु होगा वो बड़ा ही निराश हो गया बोला ना ही कोपिन पहना है ना ही जटा है ना ही कोई भूत भस्म अपने देह के ऊपर में लगाया है और ना ही कोई अगड़म बगड़म बातें करते हैं। पैर में जूते पहने हैं। बढ़िया सा सुंदर कपड़े पहने हैं। हालांकि धोती ही है। गेरू है किंतु फिर भी वो कपड़े तो अच्छे ही है और बड़े म नॉर्मल पर्सन की तरह बात करता है तो ये लड़का लिखता है कि मैं बिना प्रणाम किए ही वापस आ गया क्योंकि इस तरह का साधु कभी देखा नहीं था इस तरह के साधु होते हैं यह भी पता नहीं तो यह काशी की बात जनरली जो साधु बोलकर के एक जनसाधारण में प्रचलित था ऐसा एक साधु काशी अपने जो आश्रम है वहां पर गया तो कौन वगैरह पहन करके वह जैसा भी होता है तो यह केदार बाबा महापुरुष महाराज दोनों बैठे हैं केदार बाबा का कहते हैं कि यह साधु कि आपका हाथ दिखाइए आपका हाथ देख के मैं आपका भविष्य बताता हूं तो ये दोनों भी थोड़ा हंसी मजाक में बोले अच्छा ठीक है दिखा देते हैं हाथ तो केदार बाबा का हाथ देख के यह साधु कहता है कि आपको ईश्वर दर्शन होगा तो केदार बाबा कहते हैं वेरी गुड बहुत अच्छा फिर यह साधु महापुरुष महाराज को कहता है कि अभी आप अपना हाथ दिखाइए। तो महापुरुष महाराज ने हंसते-हंसते अपना हाथ दिखा दिया। अभी यह साधु ने सोचा कि यह दोनों को देखकर के वैसे कोई भी समझ जा सकता है कि महापुरुष महाराज का जो स्टेटस है जो स्ट्रेचर है इस हायर तो केदार बाबा से तो म उनका जो स्पिरिचुअल डिग्निटी है वगैरह तो ये साधु ने सोचा केदार बाबा को तो बोला है कि इष्ट दर्शन होगा अभी इनको कहते हैं कि ब्रह्म साक्षात्कार होगा तो वो हिंदी भाषी तो महापुरुष महाराज का हाथ देखकर के कहता है कि आपको ब्रह्म दर्शन हो जाएगा। तो महापुरुष महाराज हंसते-हंसते कहते हैं होगा क्या? जी बोलो हो गया। देखिए कि अपने साधुओं के भीतर में ये जो डेप्थ ऑफ स्पिरिचुअलिटी है इट्स इन अ कंप्लीटली डिफरेंट ऑर्डर कि उस समय जिस तरह से एक साधारण आम धारणाएं थी। एक महाराज अपने ही ऑर्डर के कनखल सेवा आश्रम में उस समय तो कल्याणानंद जी थे वहां पे उनके साथ में ही वो सेवा दे रहे थे अपने ही साधु फिर कुछ समय के बाद में उन्होंने ठीक किया कि उत्तराखंड वगैरह भ्रमण करके थोड़ा बहुत तपस्या करेंगे तो कनखल तो वैसे ही उत्तराखंड में है तो हिमालय में दो-तीन कुटियाओं में रहकर के उन्होंने तपस्या की। फिर तपस्या करके वह जब बेलूर मठ वापस आए तो महापुरुष महाराज के साथ में वार्तालाप हो रहा है। महाराज को प्रणाम करने को गए होंगे। तो महापुरुष महाराज ने पूछा कि अच्छा भाई बताओ तुम तो उत्तराखंड, हिमालय वगैरह सब तपस्या करके आए। तुम्हारा क्या ओपिनियन है वहां के बारे में? तुमने क्या देखा वहां के साधुओं में? थोड़ा बताओ तुम अपना एक्सपीरियंस, अपना ओपिनियन तो यह महाराज जो कि तपस्या करके वापस आए थे। उन्होंने कहा कि यह तो मैं नहीं बता पाऊंगा कि उनकी तपस्या या तो फिर उनका जो आध्यात्मिक डेवलपमेंट आध्यात्मिक प्रोग्रेस कितना है। यह तो भीतर की बात है ना। बाहर से कौन बता पाएगा। तो उन्होंने ऐसा स्पष्ट कह दिया कि यह पता नहीं कि भीतर में कितना डेवलपमेंट हुआ है। किंतु बाहर से जो मुझे दिखा वो मैं बताता हूं। महाराज कहते हैं कि देखिए हमको कहीं पर भी जाना है तो यह बिस्तर यह अपना बैग एंड बैगेज वगैरह सब ले जाते हैं। फिर यदि अपने आश्रम में कहीं जाना है तो पहले से ही कॉरेस्पोंडेंस करके परमिशन लेना है। यदि कुछ भी काम करना है तो अपने ये जो सीनियर साधु है उनकी परमिशन चाहिए। यदि ट्रैवल करना है तो गाड़ी में ट्रैवल करना है तो वह सब एक टिकट का वो सब टेंशन है वगैरह वगैरह अपना जो लाइफ है वह काफी मॉडर्नाइज है और ऐसा लगता है जैसे गृहस्थ लोगों के जैसा है जबकि यह जो उत्तराखंड के साधु है वह कऊ पिन वगैरह पहनते हैं ना ही उनका कोई लगेज होता है ना ही कोई सामान रहता है उनके पास में यह अपरिग्रह जैसे वह शास्त्र में कहा है किसी भी तरह का कोई भी चीज अपने पास में नहीं रखते। जीवन धारण करने के लिए जो मिनिमम चाहिए एक दो जोड़ी कपड़े शायद होंगे उनके पास में कमंडलू होगा। बस वही तोतापुरी तो दिगंबर ही घूमते थे। उस समय के हमको पता है। तो इस तरह से जो मिनिमम चीजें उनके पास में होती है जब जहां पर जाना हो वहां पर चले जाते हैं। ना ही रिजर्वेशन का कोई टेंशन ना ही परमिशन का कोई चिंता और बिल्कुल माने मस्त फकीर की तरह यह लोग रहते हैं। तो दैट इज वन डिफरेंस मैंने देखा उनके भीतर में और हमारे में हम लोग बहुत ही ज्यादा यह सब मॉडर्न लाइफ यह दुनियादारी में फंस गए हैं। हमको सब कुछ सिस्टमेटिक करना है। हमारी लाइफ़ में रैंडमनेस अह या तो फिर सरप्राइज़ ऐसा कुछ नहीं है। सब कुछ जैसे कि सिस्टमेटिक है। सब कुछ प्रेडिक्टेबल है। तो महापुरुष महाराज ने थोड़ी देर यह सब सुना फिर कहते हैं कि देखो भाई कि ये तुमको बाहर से यह सब अच्छा लगता है। अ वेरी गुड कि इस तरह से संपूर्ण रूप से ईश्वर के ऊपर में निर्भर जीवन हो। गुरु भाइयों ने खुद देखिए कि वह जो प्रवरज्या के दिन है इस तरह से ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण निर्भर होकर के दिन बिताए थे। औषधम जाहनवी तोयं वैद्यो नारायणो हरिह अर्थात बीमार होते हैं। तो दवाई क्या है? औषध क्या है? तो जहानवी अर्थात कि गंगा का जल और वैद्य कौन है? डॉक्टर कौन है? तो नारायण हरि तो संपूर्ण रूप से ईश्वर के ऊपर में भरोसा रखकर के संपूर्ण रूप से ईश्वर के आश्रित होकर के जो प्रवृजिया करनी है वह गुरु भाइयों ने यथेष्ठ की है। माने इनफ की है उन लोगों ने। किंतु क्या है कि जो ठाकुर की शिक्षा है वह बताती है कि बाहर का जो दिखावा है एक तरह का दिखावा ही कहेंगे। बाहर का जो कुछ भी है वो दैट इज नॉट दैट इंपॉर्टेंट जितना कि भीतर का है भीतर में यह जो मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा ये सत्य अहिंसा अस्तेय अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधान यह जो सब पॉजिटिव वैल्यूस जो है वह हमको इंकल्केट करना है। दैट इज द मेन पपस ऑफ साधु लाइफ नहीं कि यह जो कुछ फार्मूलाज़ है उसको हम ब्लाइंडली फॉलो करते रहे। साधु हुए हैं तो कौपिन पहनना ही है। साधु हुए हैं तो जटा रखनी ही है। साधु हुए हैं तो अपरिग्रह करना ही है। करना चाहिए। ऐसा कोई नहीं कहता कि नहीं करना चाहिए। किंतु फिर यह सब क्रॉस करके बिय्ड दिस जो है उसकी ओर भी जाना होगा। ऐसा कहीं ना हो जाए कि उसी में कहीं अटक जाए। स्वामी जी
स्वामीजी ने की सूत्ररूप में ग्रंथ-रचना
एक बार लेटर में लिखते हैं कि लिखने का उनको एक बार ऐसा हो गया कि लिखना है कुछ लिखना है। तो स्वामी जी अपने एक लेटर में लिखते हैं कि मैं नया कलम ले आया। फिर यह जो उस समय तो आज की तरह यह बोल पेन वगैरह तो नहीं था। वह जो इंक का एक बोतल होता है। इंक के बोतल में कलम को आपको डुबोना है। फिर यह उसके बाद में वो कलम थोड़ा सा भीगेगा इंक से। उसकी टिप जो है फाउंटेन पेन की तरह थोड़ी सी भीगे वो इंक से। फिर आपको वो जो पार्चमेंट या पेपर है उसके ऊपर में लिखना है और साथ में ब्लोटर चाहिए। ब्लोटर यानी कि इंक जो है वह बहुत ज्यादा स्प्रेड हो जाती है। तो उसको स्टॉप करने के लिए। तो स्वामी जी कहते हैं एक डेस्क है। फिर यह ब्लोटर है। फिर यह इंक का बोतल है। फिर यह पेन है। सब कुछ मैं ले आया। बढ़िया मजे से बड़ा सुंदर दिख रहा है। किंतु जब लिखने का शुरू करते हैं तब वो फिर वो जो एक इंस्पिरेशन आना चाहिए वो कहां पे है? तो क्या है कि ऑफ कोर्स स्वामी जी ने कितने लेटर लिखे? प्रॉब्लम क्या था स्वामी जी का? स्वामी जी को बोलना एकदम ही इज परफेक्ट। वो कहते हैं कि जब एक मुझे एक ग्रुप ऑफ मुमुक्षु जो है वह मेरे सामने रख दो। मैं एकदम आई कैन टॉक फायर वि देम। किंतु यह जो बैठकर के लिटरेरी वर्क करना है, कोई ग्रंथ की रचना करनी है, वह स्वामी जी ने लेटर्स बहुत लिखे हैं। आर्टिकल सीरीज ऑफ आर्टिकल्स लिखे हैं। किंतु एक जो एक सिस्टमेटिक ग्रंथ की रचना करनी चाहिए। वो स्वामी जी ने नहीं की है। हालांकि उन्होंने अपने लेटर्स में कई बार कहा भी है कि मैं चाहता हूं कि एक चैटी समथिंग चैटी अर्थात कि वार्तालाप की स्टाइल में कुछ समथिंग यानी कुछ एक वार्तालाप की स्टाइल में छोटा सा कुछ इंडिया के ऊपर में ऐसा कुछ लिखना चाहता हूं। तो स्वामी जी ने आर्टिकल्स काफी लिखे। स्पीचेस काफी दी। लेटर्स उनके बहुत ही इंस्पायरिंग है। किंतु ग्रंथ जो है उसकी इस तरह से कोई रचना नहीं कर पाए हैं। हालांकि इंटरेस्टिंग थिंग कि ग्रंथ की रचना करने के लिए सूत्र के रूप में उन्होंने लिस्ट ऑफ एक पूरा लिस्ट बना करके रखा था। कंप्लीट वर्क्स में है। सूत्र के रूप में ही है। जैसे योग सूत्र के सूत्र है ना अथः योगानुशासनम योग चित्तवृत्ति निरोध वगैरह-वगैरह एक-एक लाइन के पांच छह शब्द के एक-एक सूत्र तो इसी तरह स्वामी जी ने पूरी सूत्रावली बना के रखी है। तो यदि इसको वो मैं टीसी में था मेरा प्लान कि यदि उसको मैं एक्सपैंड कर पाऊं एक-एक सूत्र पे। कंप्लीट वक्स तो है स्वामी जी का। स्वामी जी ने बोला बहुत है। सीक्रेट कुछ नहीं है स्वामी जी की लाइफ में। ऐसा कुछ नहीं कि यदि हम जानना चाहते हैं कि इस टॉपिक पे स्वामी जी का क्या ओपिनियन है तो ना पता चले ऐसा नहीं है। स्वामी जी ने इंटरव्यू्यूज दिए हैं। स्वामी जी के ऊपर में रेमिनेशनंसेस लिखे गए हैं। न्यूज़पेपर आर्टिकल है। स्पीचेस है, आर्टिकल्स खुद के लिखे हुए हैं। लेटर्स है। तो इनफ मटेरियल है कि कोई भी टॉपिक के ऊपर में स्वामी जी क्या कहते हैं वह हम जान पाए। किंतु जो सिस्टमेटिक एक करके फ्रॉम स्टार्टिंग फ्रॉम द फर्स्ट प्रिंसिपल जो एक डिराइव करने की बात है एक ग्रंथ लिखना ऐसा स्वामी जी ने स्वयं किया नहीं किंतु यह जो सूत्र के माध्यम से उसका जो स्केलेटन है उसका यह जो आउटलाइन है वह रेडी करके गए हैं और मैंने देखा मैं टीसी में था तो मैं उसको पढ़कर के सोचता था कि आउटलाइन इज कंप्लीट माने स्वामी जी ने कुछ छोड़ा नहीं है सब कुछ उस आउटलाइन के भीतर में डाल दिया है। यदि उस आउटलाइन के प्रत्येक सूत्र पे हम व्याख्या या भाष्य या तो फिर स्वामी जी उसी टॉपिक के बारे में क्या कहते हैं उसके पूरा कंप्लीट वर्क्स में से कलेक्ट करके प्रत्येक सूत्र के नीचे में उसका कंप्लीट एक्सप्लेनेशन दे तो एक ग्रंथ की रचना हो जाएगी। यह ग्रंथ स्वामी जी के ही जो पूरा आउटलाइन है उसी के ऊपर में ही बना है और स्वामी जी की इच्छा के अनुसार ही बनेगा। स्वामी जी के शब्दों में ही बनाना है। तो जैसे एक टॉपिक है तो स्वामी जी ने एक सूत्र लिखा तो उस सूत्र को लेकर के कंप्लीट वक्स में कहां-कहां पे इस इसके बारे में स्वामी जी ने क्या-क्या कहा? उसका स्वामी जी के ही शब्दों का कंपाइल करके उस सूत्र के नीचे में दे दिया। फिर दूसरा सूत्र फिर तीसरा सूत्र। तो ऐसा करके कंप्लीट ग्रंथ की रचना हो जाएगी। तो एनीवे हमारा जो टॉपिक चल रहा था तो ये एक्सटर्नलिटी स्वामी जी बोलते थे बार-बार कि ग्रंथ लिखना है वगैरह वगैरह तो ये उसके एंटीिसिपेशन में ये इंक बोतल भी ले आए। पेन भी ले आए। फिर ये ब्लॉटर पेपर सब ले आए। ग्रंथ लिखा नहीं। ग्रंथ का आउटलाइन लिख दिया। बहुत सारे लेटर्स लिख दिए। किंतु ग्रंथ लिखना नहीं हुआ। महापुरुष
असली तपस्या का रहस्य (2)
महाराज जो कहते हैं यह जो एक्सटर्नलिटीज है ना हम उसी में उलझ जाते हैं। गेरवा वस्त्र पहनना है या तो फिर जटांग रखनी है या तो फिर अपरिग्रह करना है। अभी अपरिग्रह करना यानी गांधी जी के बारे में पता है ना वह सरोजिनी नायडू ने कहा। गांधी जी हमेशा थर्ड क्लास में मुसाफरी करेंगे ट्रेन में क्योंकि वह तो भारत के प्रतिनिधि हैं। तो गांधी जी को थर्ड क्लास में मुसाफरी करवाने के लिए उनको कोई असुविधा ना हो इसके लिए कांग्रेस के एटलीस्ट हाफ ए दर्जन आधे दर्जन ना एक दर्जन कार्यकर्ता गांधी जी के साथ में ट्रैवल करते थे। तो सरोजनी नायडू ने कहा, इससे बेटर है कि यदि वो फर्स्ट क्लास में मुसाफिरी करते तो हमको सस्ता पड़ता। तो एनीवे नो डिसरिस्पेक्ट टू गांधी जी पर किंतु यह कभी-कभी हो जाता है। हम लोग एक्सटर्नलिटीज जो ऑब्जर्व करने का प्रयास करते हैं तो उसमें होता क्या है कभी-कभी कि स्पिरिट जो है वो स्पिरिट लॉस्ट हो जाता है। सो दैट इज व्हाट महापुरुष महाराज का कहना था इस साधु को कि देखो बहुत अच्छा है कि वहां पे तुम गए यह सब देखा बट ऑलवेज रिमेंबर कि यह जो तुम देख रहे हो ट्रेडिशनल साधुओं को उस समय के याद रखना कि बिय्ड एक्सटर्नलिटीज जो रियल स्पिरिचुअल लाइफ है दैट बिगिंस बिय्ड एक्सटर्नलिटीज। सो एक महापुरुष महाराज की एक किताब है शिवंद स्मृति संग्रह वो मैं पढ़ रहा था तो उसमें से यह सब थोड़ा सा अच्छा स्वामी विवेकानंद
कथामृत में मास्टर महाशय का ध्यान तथ्य-प्रस्तुति पर है, अतिशयोक्तिपूर्ण स्तुति पर नहीं (1)
का लाइव मास्टर महाशय आए हैं वराह नगर मठ में अगले दिन रात को शिवरात्रि की पूजा समाप्त हो चुकी है। फिर दूसरे दिन सुबह की बात है कि स्वामी जी स्नान करके नव गेरवा वस्त्र नवगैरिक वस्त्र धारण करके वहां जो दानादेर घर अर्थात कि दानवों का कमरा जो है वहां पर प्रवेश करते हैं। और फिर मास्टर महाशय कि जिन्होंने ठाकुर का दर्शन किया है। ठाकुर की देह कांत ठाकुर की आध्यात्मिक वैभव आध्यात्मिक उल्लास का जिन्होंने दर्शन किया है वही मास्टर महाशय देखिए कथामृत का एक आपको दिखेगा देयर इज नो हाइपर बोली इस अर्थ में कि कभी-कभी भक्त लोग जो है वो हमारे प्रभु ऐसे हैं हमारे प्रभु ऐसे हैं बोल के वो जो एक ओवर द टॉप उनकी प्रशंसा करना शुरू कर देते है ना कथामृत एक ऐसा ग्रंथ है कि ठाकुर के शब्दों के एग्जैक्ट फॉलो करता है। ठाकुर की ऐसी महिमा है। हमारे ठाकुर तो ऐसे हैं। वो चतुर्भुज होकर के दर्शन देते हैं। लोगों को स्पर्श करेंगे तो यह हो जाएगा। वगैरह वगैरह यहां पे कुछ नहीं है। नो एनीथिंग नॉट अ सिंगल वर्ड एक्स्ट्रा। बस ठाकुर ने ऐसा कहा। ठाकुर ने ऐसा कहा यह भक्त ने यह प्रश्न किया उसके उत्तर में ठाकुर ने यह कहा और फिर यदि कुछ कॉन्टेक्स्ट बनाने के लिए आज कौन सी तिथि कौन सा वार कौन सा नक्षत्र कौन सा दिन कौन सा डेट और फिर लोकेशन क्या है कौन-कौन उपस्थित है ठाकुर कहां पर बैठे हैं किस ओर उनका चेहरा है किस डायरेक्शन में बैठे हैं यह जो एक कॉन्टेक्स्ट यदि आप नाटक पड़ेंगे ना तो तो यूजुअली हम लोग नोवेल पढ़ते हैं, आर्टिकल पढ़ते हैं। आजकल बहुत कम लोग नाटक पढ़ते हैं। किंतु नाटक यदि पढ़ेंगे ना तो प्रथम अंक एक्ट वन फिर पर्दा उठता है। तो यह लोकेशन है। यह समय है। यह एक्टर है। फिर ऐसा करके वो स्टार्ट होगा। फिर यह डायलॉग स्टार्ट होंगे। उसमें और कुछ नहीं रहेगा। यदि आप नवेल पढ़ेंगे या स्टोरीज पढ़ेंगे तो उसमें बहुत कुछ ऐड होता है कि इसका ऐसा एक्सप्रेशन था। उसने इस तरह से बोला वो जो इमोशंस को डिपिक्ट करते हैं लोग और भी बहुत कुछ स्टोरीज में होता है डायलॉग के साथ में किंतु कथामृत लिखा गया है जैसे कि एक नाटक लिखा गया है इस स्टाइल में कि रंग मंच के ऊपर में इस तरह का सेटअप है यह ठाकुर का कमरा है यह तिथिवार नक्षत्र डे डेट टाइम यह एक्टर से उपस्थित इस पा अभिनय करने के लिए इस प्रथम अंक में और ठाकुर इस तरह से बैठे हैं। एक भक्त यह प्रश्न करता है। ठाकुर यह उत्तर देते हैं। यह प्रश्न होता है। यह उत्तर देते हैं। बस यहीं तक सीमित है। नो हाइपरबॉली नो ओवर दी टॉप एक्सेसिव डिस्क्रिप्शन किसी का रेयर कुछ-कुछ जगहों पे मास्टर महाशय अपने खुद के मन की बात कहते हैं। फिर लिखते हैं सेवक हृदय में। ऐसा करके मास्टर महाशय लिखेंगे कि मन होता है कि यही दक्षिणेश्वर के जो ये धुली कण है यह जो गार्डन है दक्षिणेश्वर का उसका जमे इसकी जो धुली कण है प्रत्येक उसमें मैं साक्षात साष्टांग नमस्कार करूं साष्टांग प्रणाम करूं क्यों? क्योंकि इसी धुली कणों के ऊपर से होकर के श्री रामकृष्ण देव यातायात करते हैं। यही जो पेड़ पौधे हैं इनको आलिंगन करूं। क्यों? क्योंकि इसी पेड़ पौधों ने ठाकुर का प्रतिदिन दर्शन किया है। यह जो गंगा है, ऐसा मन में होता है कि बागान के एक कोने में खड़े रहकर के बस गंगा जी का दर्शन करता रहूं। क्योंकि यही गंगा, यही आकाश, यही उद्यान, यही उद्यान के प्रत्येक धुली कण, यही पेड़, पौधे, फूल, पशुपंखी इन लोगों के साथ में श्री रामकृष्ण देव स्वयं निवास करते हैं। तो ऐसा सुंदर कवित्वमय वर्णन किंतु रेयरली पूरा इतना मोटा सा जो बेंगली कथामृत है। रेयरली आपको कहीं पर इस तरह का कवित्वमय वर्णन देखने को मिलेगा। तो ये मास्टर महाशय कीप्स हिमसेल्फ स्ट्रिक्टली टू द फैक्ट्स एंड नथिंग बट फैक्ट्स। वो जैसे वो हिंदी मूवीज में आप अदालत का सीन देखते हैं ना सत्य ही बोलना है। सत्य के अलावा और कुछ नहीं बोलना। वो जो सब सीन होते हैं ना अदालत के तो यहां पे भी आप कथामृत में आप एनालिसिस करेंगे। मास्टर महाशय जो फैक्ट ऑब्जर्व किया है वो फैक्ट के अलावा रेयरली कभी इधरउधर जाकर के यह जो स्वामी जी एक लेटर में लिखते हैं वो
विवेकानन्द हमें आत्मगौरव सिखाते हैं, खुशामद नहीं
क्वीन विक्टोरिया ना कि वो प्रिंस वो भारत की मुलाकात के लिए आ रहे हैं। तो रामकृष्ण मिशन का प्रारंभ तो हो चुका है। तो जितनी भी संस्थाएं हैं मानपत्र प्रदान करेंगी। तो रामकृष्ण मिशन को भी मानपत्र प्रदान करना चाहिए। एक्स एक कन्वेंशन है, एक एटीिकेटी है। तो ओके चलो स्वामी जी ने एक लेटर में लिखा मान पत्र प्रदान करो। स्वामी जी जो इंस्ट्रक्शन है दैट इज वेरी इंपॉर्टेंट। किंतु याद रखना कि यू हैव टू बी पोलाइट। किंतु हम लोग हिंदुओं का जो है कि आप ही हमारे मां और पिताजी है। आप ही हमारे देवता और ईश्वर है। हम आपकी प्रजा है। और आपके आशीर्वाद के नीचे हम लोग रहते हैं। बोलकर के जो एक टिपिकल हिंदू ओवर द टॉप प्रशंसा करनी है। उनके सामने उनके पैरों के सामने लेट जाना है। ऐसा सब नाटक मत करना। मानपत्र देना है तो पोलाइट होना चाहिए। उसमें कोई प्रश्न नहीं है। बट डोंट बी ओवर द टॉप हिंदू जैसा टिपिकल एक हिंदू है। इस तरह का बिहेव मत करना। स्वामी जी अपने लेटर में लिखते हैं तो दैट इज माने और जो एक टिपिकल हिंदू बिहेवियर कि सीधा वो चरणों में लेट जाना। स्तवस्त स्तुति करते रहना। आपके बिना मैं अधम हूं। मैं पापी हूं। आपकी एक नजर मेरे पर गिर गई तो मेरा सात जन्म सार्थक हो जाएगा। ऐसा ठाकुर के साथ में हमारा ऐसा बिहेवियर होना ही चाहिए। कोई प्रश्न ही नहीं है। ठाकुर ठाकुर है और वो जो ब्रिटेन का वो किंग ना क्वीन जो भी है वो वो है। सो देयर इज नो कंपैरिजन हियर। किंतु फिर
कथामृत में मास्टर महाशय का ध्यान तथ्य-प्रस्तुति पर है, अतिशयोक्तिपूर्ण स्तुति पर नहीं (2)
भी जो हमारा एक टिपिकल होता है कि ओवर द टॉप प्रशंसा करना, चरणों में लेट जाना, अपने को ही दीन हीन अधम बताना वो जो है वो दैट इज एब्सोल्यूटली एब्सेंट इन कथामृत। मास्टर महाशय देखिए ऑन वन हैंड मास्टर महाशय का शरणागति संपूर्ण था। किंतु मास्टर महाशय शरणागति को जो एक्सप्रेस करते हैं वो भी कितनी डिग्निफाइड लैंग्वेज में करते हैं। वही जो द्वितीय दर्शन के समय वो ठाकुर के साथ में वो जो उनका जो वार्तालाप हुआ मास्टर महाशय कहते हैं वो ठाकुर पूछते हैं कि तुम्हारी स्त्री कैसी है? विद्या स्त्री है ना कि अविद्या है। अविद्या शक्ति है। तो मास्टर ने कहा हां अच्छा वो अच्छी है वैसे मेरी वाइफ वो अविद्या है। तो ठाकुर ने अज्ञानी है। तो ठाकुर ने नाराज होकर कहा तो तुम क्या ज्ञानी हो? तो मास्टर महाशय लिखते हैं अभी तक तो उनको यही पता था कि ये ज्ञान और अज्ञान किसको कहते हैं? तो यह यूनिवर्सिटी की डिग्री वगैरह वह यदि होती है तो वह ज्ञानी है। अदरवाइज अज्ञानी है। यह नहीं पता कि ईश्वर दर्शन या तो ईश्वर की साधना जो करता है वह ज्ञानी है। तो वो जो मास्टर महाशय लिखते हैं कि अभी इनका अहंकार जो है चूर्ण हो रहा है। फिर दूसरा प्रश्न किया तो अहंकार थोड़ा सा चूर्ण हुआ और फिर यह जो पूरा जब हो गया वार्तालाप तो साथ में ही मास्टर महाशय ने लिखा है कि इस दिन के बाद से मास्टर का तर्क का घर बंद हो गया। इस दिन के बाद से ठाकुर के साथ में कभी तर्क किया नहीं। प्रश्न किए हैं। तर्क नहीं किया। तो देखिए कि शरणागति इतना इजीली मास्टर महाशय में आया है किंतु डिग्निफाइड वे में उन्होंने इसको लिपिबद्ध किया है। ऐसा नहीं कि मैं अधम पापी उनके चरणों में गिर गया फिर आशीर्वाद ये वो जो सब एक टिपिकल आपको एक भक्ति शास्त्र में दिखता है। एवरीथिंग इज सो डिग्निफाइड। तो यही मास्टर महाशय जो ही मेंटेंस इट फक्चुअल डिग्निटी थ्रूउ हिज राइटिंग इन कथामृत वो यहां पे नरेंद्र का जो वर्णन करते हैं तो फर्स्ट टाइम ऐसा लगता है कि क्या वो म वो अपना जो स्टाइल है डिग्निफाइड फक्चुअल राइटिंग उसको छोड़कर के क्या पहली बार एक हाइपरबली में जो प्रवेश कर रहे हैं क्या किंतु देखिए कि फैक्ट होगा तभी तो मास्टर महाशय ने लिखा है कि जो वस्त्र का सौंदर्य है उसके साथ में नरेंद्र के चेहरे का और देह का तपस्या संभूत अपूर्व स्वर्गीय पवित्र ज्योति जैसे कि मिक्स हो रही है। वस्त्र के सौंदर्य के साथ में वदन मंडल तेज परिपूर्ण है और फिर प्रेमानुरंजित भी है। जैसे कि अखंड सच्चिदानंद सागर की एक किरण ज्ञान भक्ति सिखाने के लिए देव देह धारण किया है। अवतार लीला में सहाय करने के लिए जो देख रहा है वो अपनी नजरों को फिरा नहीं पा रहा है। तो व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग कि पूरे कथामृत का जो स्टाइल है फ़क्चुअल डिग्निफाइड रिपोर्टेज तो उसको फॉर सम मोमेंट मास्टर महाशय ब्रेक करके जैसे कि अहो भाग्य अहो भाग्य ऐसा करके सडनली ईश्वर का दर्शन होता है तो भक्त के मुंह में से हृदय में से कैसा एक आनंद और एक तरह का विस्मय प्रकाशित होता है। सो वो आनंद और विस्मय फॉर वन मोमेंट मास्टर महर्षि की लेखनी में वो नरेंद्र को देखकर के यहां पर प्रकाशित हो रहा है। और फिर लिखते हैं नरेंद्र का उम्र है ठीक 24 साल और इसी साल में इसी उम्र में चैतन्य महाप्रभु ने संसार त्याग किया है। इसके बाद का विवरण अभी हम थोड़ा सा आगे
स्वामीजी ने की ठाकुर की नकल... और वराहनगर मठ में छा गई आनंद की लहर
पढ़ते हैं। क्या कहते हैं मास्टर महाशय? भक्तों दे पारण जन श्रीक्त तो बोलराम तार बाटी होते फल मिष्ठान आदि पूर्व दिन पाठाया छ भक्तों के पारण के लिए वह तो शिवरात्रि की रात को शिवरात्रि के दिन को तो सब उपवास करते हैं तो उपवास जब वो समाप्त करके वह जो प्रथम आहार ले जाता है पारण करना तो पारण के लिए श्रीक्त बलराम ने उनके घर से फल और मीठा मिठाई अगले ही दिन यानी कि शिवरात्रि के दिन ही भेज दी थी। बेलूर मठ में जब शिवरात्रि का दिन होता है तो वह किचन बंद ही रहता है। वह खाना बनता नहीं है। और यह जो बेल फल है उसका शरबत सबके लिए वहां पर रखा रहता है। तो बेल फल का शरबत आप पान कर सकते हैं। यदि आपको भूख ज्यादा लग जाता है तो तो बहुत साधु लोग क्या करते हैं? वहां डाइनिंग हॉल है। तो आप लोगों को तो जाने का मौका नहीं मिला होगा। सिर्फ साधु लोगों के लिए डाइनिंग हॉल है। विराट डाइनिंग हॉल है। आई थिंक 200 300 साधु आराम से बैठकर के जमीन के ऊपर में पंगत लगती है ना एक लाइन में जो बैठते हैं। तो इस तरह से 200 आई थिंक 250 साधु आराम से वहां पर बैठकर के आहार कर सकते हैं। तो इतना बड़ा डाइनिंग हॉल अभी पंगत तो है नहीं कि सब साधु लोग लाइन में तो बैठे नहीं है। साधु ब्रह्मचारी किंतु वहां पर जाकर के ग्रुप बना करके सर्कल में वो बेल शरबत का पान करेंगे और हंसी मजाक करेंगे गप लगाएंगे। तो ये ये देखिए कि वहां पे शिवरात्रि के दिन के दौरान और क्या करना है? सुबह को जो है कल्याणश्वर शिव है बेलूर मठ के पास में। वहां पर सभी लोग दर्शन के लिए जाते हैं। रास्ते में आते-आते कहीं इधर-उधर और कोई मंदिर में जाना हुआ। वहां पे बेलूर मठ के पास में ही एक गंगा के किनारे छोटा सा मंदिर जैसा है एक दो जगह पे तो काली मंदिर का ही रेप्लिकेशन जैसा तो यदि वहां पे जाना हुआ तो हुआ अदरवाइज वापस आ गए 9 10 बजे के आसपास में वो डाइनिंग हॉल है वहां पे इकट्ठा होके गप लगा रहा है थोड़ा बहुत बेल का शरबत पान कर रहा है तो इट्स अ वेरी ब्यूटीफुल डे भोजन तो करना नहीं है पेट खाली रात को फिर पूरा रात वो चार प्रहर की पूजा होगी तो उपस्थित रहना है तो कोई थोड़ा विश्राम कर लेता है तो यहां पर भी उस दिन अगले दिन तो सभी ने उपवास किया है फिर बलराम बाबू ने पारण के लिए फल और मिठाई भेज दिया है राखाल प्रभुति दुई एक्ट भक्तों शंगे नरेंद्र घरे दानया दाणाया किंचित जलजोग करते छे राखाल वगरा दो एक भक्तों के साथ में नरेंद्र घर में खड़े-खड़े थोड़ा बहुत जल योग कर रहे हैं। अर्थात कि थोड़ा बहुत पारण कर रहे हैं। मिठाई या तो फिर यह फल है वह आहार कर रहे हैं। जलजोग का अर्थ होता है स्नेक आहार भोजन नहीं स्नेक एकटी दुटी खाई आनंद कोते कोरते बोलते छ धन्य बोलो राम धन्य बोलो राम शकले रह हास्य एक दो मिठाई या फल खाकर के ही आनंद करतेकरते नरन कह रहे हैं धन्य बलराम धन्य बलराम अभी देखिए नरेंद्र नाटक कर रहा है सब समझ में आ गया नरेंद्र का वो जो एक अभिनय करने का कैपेसिटी मिमिक करने का कैपेसिटी कभी-कभी ठाकुर को मिमिक करते हैं। सो देखिए सब लोग हंस रहे हैं। ए बार नरेंद्र बालक के न्याय रहस्य को रीते छे इस अभी नरेंद्र जैसे कि एक बालक की तरह रहस्य करना अर्थात कि हंसी मजाक करना मजाक कर रहे हैं। रसगुल्ला मुखे कोरिया एके बारारे स्पंदोहीन रसगुल्ला जो है मुंह में डालकर के स्पंदहीन अर्थात कि स्थिर हो गए। देखिए ठाकुर को विवेक कर रहा है। रसगुल्ला मुंह में डाला और जैसे कि समाधिस्थ हो गए। ठाकुर को था ना ऐसा कोई भी ईश्वर का उद्दीपन होने वाला कुछ भी उनकी नजर के सामने आएगा तो फट करके ठाकुर समाधस्त हो जाते थे। उद्दीपना उनको चाहिए। यहां पे ऐसे हंसी मजाक कर रहे हैं। वार्तालाप कर रहे हैं। एकाएक ऐसा हुआ कि ऐसा कुछ किसी ने उद्दीपनामय कह दिया तो ठाकुर समाधिस्थ था। तो जैसे कि रसगुल्ला जैसे कि ईश्वर रसगुल्ला का टेस्ट इतना मधुर है कि जैसे कि ईश्वर का उद्दीपन हो गया। तो नरेंद्र निमिक करता है ठाकुर को एकदम स्पंदहीन हो गया है स्थिर हो गया है चक्षु निमेश शून्य आंख ऐसा आंखों की ये जो ये है वो स्थिर हो गई है नरेंद्र अवस्था देखिया एक जो भक्तों भान करिया तहां के धारण कर ले पाे पिया जान नरेंद्र की अवस्था देख के एक भक्त उनको ऐसा धारण करके के रहता है जैसे गिर ना जाए। जैसे पूरा ठाकुर ठाकुर जब समाधि में जाते थे तो उनके चक्षु निमेश शून्य हो जाते थे। वो स्थिर हो जाते थे। आनंद सागर में जैसे कि वो मछली की तरह वो विचरण कर रहे हैं। चेहरे पर वो आनंद का भाव सब कुछ ठाकुर का वो ये तो भक्त लोग देखते ही है। ठाकुर के इतने साल दर्शन किए। अभी नरेंद्र जैसे कि वह ठाकुर को मिमिक कर रहा है। तो दूसरा एक भक्त वहां पर खड़ा था। उसने जाकर के नरेंद्र को ऐसा करके उनके हाथ ऐसे करके पकड़ लिया। सपोर्ट दे रहा है। धारण करना अर्थात कि सपोर्ट दे रहा है। जैसे कि ठाकुर गिर ना जाए। वो जो फेमस फोटोग्राफ है वो केशव के ही घर में वो ठाकुर ऐसा करके खड़े हैं और जो हृदय है हृदय पीछे से ठाकुर को सपोर्ट दे रहा है। क्यों? ठाकुर कहीं गिर ना जाए। तो देखिए ठाकुर के चेहरे का जो उल्लसित भाव है देह जैसे कि स्थिर हो गया है। यह जो चक्षु है वह भी स्थिर हो गए हैं। फिर हृदय उनको पीछे से सपोर्ट दे रहा है। इस तरह का तो बहुत बार ठाकुर को समाधि में जाते और ठाकुर के किसी भक्त को अंतरंग शिष्य को उनको सपोर्ट करते हुए बहुत लोगों ने देखा है। तो नरेंद्र भी जैसे एग्जजेक्टली मिममिक कर रहा है। पीछे पड़िया जान कहीं गिर ना जाए। कित खण पर नरेन रसगुल्ला मुखे रहया छ चोख चाहििया बोलते छ आमी भो आ शकले रहस्य कुछ देर के बाद में नरेंद्र रसगुल्ला अभी भी मुंह में है थोड़ा सा चोक अपनी आंखों को खोल के कहता है मैं अच्छा हूं जैसे वो ठाकुर एग्जजेक्टली जैसा करते थे शकोलेर हास्य सब लोग हंस रहे हैं मास्टर प्रवृत्ति के सिद्धि और प्रसाद मिष्ठानो वितरण करा हो मास्टर वगैरह को सिद्धि अर्थात कि भांग और प्रसाद मिष्ठान वितरण करना हुआ उनको डिस्ट्रीब्यूट करा गया मास्टर आनंदे हार्ट देखते छ मास्टर यह आनंद का बाजार देख रहे हैं भक्तराज जय ध्वनि करते छे भक्त लोग जय ध्वनि कर रहे हैं जय गुरु महाराज जय गुरु महाराज देखिए कितना मधुर दृश्य है नारायण ठाकुर को मिमिक कर रहा है। किंतु देखिए अभी ये जो मास्टर महाशय ने ये ओवर द टॉप डिस्क्रिप्शन जो दिया था पहले वो पता है अभी रिलेवेंट क्यों लग रहा है यह सेकंड सीन देखने के बाद में कि ठाकुर को मिमिक करना यानी कि सिर्फ यह नहीं है कि ठाकुर जिस तरह से खड़े थे जिस तरह से देह स्थिर उनके नेत्र स्थिर और फिर कोई उनको धारण करके सपोर्ट देकर खड़ा है। सिर्फ बात वह नहीं है। मास्टर महाशय ने ठाकुर के चेहरे पर समाधि के समय जो दिव्य आनंद जो दिव्य आभा दर्शन की थी वही दिव्य आनंद और दिव्य आभा उनको नरेंद्र के भी चेहरे पर दिखी होगी। किंतु बिकॉज़ कि नरन एक तरह का एक आनंद का वातावरण खड़ा कर रहा है। उस आनंद के वातावरण को भंग करके मास्टर महाशय जो लिखते हैं लॉजिकल लिखते हैं जब हंसीज़ाक का सीन है तो ही कीप्स इट टुवर्ड्स द लेवल ऑफ ह्यूमर। ह्यूमर ही तो इंटेंडेड है। तो ह्यूमर के लेवल पे ही लिखते हैं। यहां पे ऐसा नहीं लिखते। भले ही चाहे नरेंद्र ठाकुर की नकल कर रहा है। भले ही चाहे नरेंद्र एक हंसी मजाक का आनंद का बाजार जैसे कि खड़ा कर रहा है। किंतु नरेंद्र के चेहरे पर जो भाव है वह वैसे ही दिव्य भाव है जैसे कि ठाकुर के चेहरे पर समाधि में हमको दिखाई देते थे। इस तरह का वर्णन मास्टर महाशय ने नहीं किया। क्योंकि वह फिर ह्यूमर जो है इंटेंडेड जो एक भाव है इस पूरे सीन का वह भंग हो जाएगा। इसकी वजह से ठाकुर ने वो जो नरेंद्र की दिव्यता का वो जो डिस्क्रिप्शन है पहले ही दे दिया। फिर जब यह जो ह्यूमरस पैसेज स्टार्ट होता है तो अपनी इमेजिनेशन के ऊपर में उन्होंने छोड़ दिया है कि जो दिव्य कांत नरेंद्र जब यह दानवों के कमरे में प्रवेश करने के समय पहली बार जब प्रवेश किया और मास्टर महाशय ने चेहरे पर जो दिव्य कांत दिखी थी तेज पूर्ण उनका चेहरा और फिर तेज पूर्ण ही नहीं तपस्या संभूत ही नहीं प्रेम अनुरंजित यह जो उनका का जो चेहरा वदन मंडल है इसी चेहरे और वदन मंडल से वह समाधि में गए हैं। इस तरह का मिमिक करेंगे तो वो चेहरा और भी तो उद्दीपित हो जाएगा। यह मास्टर महाशय ने अपनी इमेजिनेशन पर छोड़ दिया है। रेदर देन कि उसको एक ब्लंट ब्लंटली वर्णन करने की वजह अपनी सली उसको वर्णन किया है नरन की दिव्यता का कि पहले पैसेज में दिव्यता के बारे में लिख दिया वि इज धीर गंभीर पैसेज है और सेकंड पैसेज विच इज ए ह्यूमरस पैसेज तो उसको ह्यूमर के लेवल पर ही रखा है और फिर अपने पे छोड़ दिया है वन प्लस वन टू करने का कि इवन दो दिस सीन इज ह्यूमरस इवन दो नरन इज मिमिकिंग श्री रामकृष्ण चेहरे का जो भाव है बिल्कुल श्री रामकृष्ण की ही तरह दिव्य कांत से प्रकाशित झलमल सा दिखाई दे रहा था। सो मास्टर महर्षी की जो एक लिटरली लिटरली एक स्किल है वो यहां पे पता चलती है। यह सीन समाप्त होता है और फिर अभी मास्टर महाशय फिर से एक बार दक्षिणेश्वर वराह नगर आते हैं। अह उस दिन का वर्णन वहीं पर समाप्त हो जाता है 22nd मार्च का।
वराहनगर मठ: त्याग, तपस्या और भाईचारे के वे दिन
अभी 25th मार्च का वर्णन है 1887 का मास्टर महाशय फिर से आए हैं। यानी कि वह जो शिवरात्रि के दिन के दो-तीन दिन के बाद की बात क्या लिखते हैं मास्टर महाशय? वराह नगर मठ वराह नगर का मठ ठाकुर श्री रामकृष्ण अदर्शन पर नरेंद्र आदि भक्तरा एकत्र होइया छेन श्री राम ठाकुर श्री रामकृष्ण के अदर्शन के बाद अदर्शन अर्थात कि त्याग के बाद प्रकट लीला जिस तरह से शरद महाराज लीला प्रसंग में लिखते हैं प्रकट लीला का अवसान हुआ प्रकट लीला समाप्त हुई अर्थात की अपनी नजरों से हम जो देख सकते हैं वह लीला समाप्त हुई। अभी लीला अप्रकट लीला अर्थात कि हृदय में भक्तों के हृदय में लीला चलने वाली है। तो वह जो प्रकट लीला का अवसान वही यहां पे मास्टर महाज लिखते हैं ठाकुर श्री रामकृष्ण के अदर्शन के बाद महासमाधि के बाद नरेंद्र वगैरह भक्त एकत्र हुए हैं। सुरेंद्र साधु इच्छाए बराह नगर ता देर थाकीब एकटी बासुस्थान होइया छे सुरेंद्र की साधु इच्छा से शुभ इच्छा से वराह नगर में उनके रहने के लिए एक निवास स्थान हुआ है। वो फेमस कहानी कि सुरेंद्र अपने ठाकुर घर में बैठ रहा बैठा था। पूजा कर रहा था। ठाकुर ने आकर के दर्शन देकर कहा कि अरे देखो मेरे भक्त मेरे संतान इधर-उधर भटक रहे हैं। तुम यहां पर बैठे हो। तो जाओ कुछ व्यवस्था करो। तो वो सुरेंद्र दौड़ता दौड़ता आया। वो तो नरेंद्र तो उसी गली में सिमुलिया स्ट्रीट उसी में रहता था। तो आकर के कहा भाई तुम लोग रहने की व्यवस्था करो एक साथ में। मैं काशीपुर में जितना देता था उतना ही आपको प्रत्येक महीने देता रहूंगा। तो सुरेंद्र की साधु इच्छा से वराह नगर में सभी त्यागी संतानों के रहने का एक निवास स्थान हुआ है। से स्थान आज ही मठे परिणतो वही स्थान आज एक मठ में परिणत हुआ है। पहले तो एक कमरा था। पहले तो एक मकान था, बिल्डिंग था। बिल्डिंग मठ में परिणत हुआ है। कोई भी एक जगह मठ में कब परिणत होती है? जहां पर जब तपस्या होती है वहां पर साधन भजन चलते हैं। ईश्वर की आराधना होती है। तो ईश्वर आराधना से वही जगह आज मठ में परिणत हुई है। ठाकुर घरे गुरुदेव ठाकुर श्री रामकृष्ण नित्य सेवा ठाकुर घर में गुरुदेव ठाकुर श्री राम कृष्ण की नित्य सेवा है। नरेंद्र आदि भक्तरा बोलीले आर संसारे फिरीबो ना त जे कामिनी कांचन त्याग को ते बोलिया छे आमरा की कोरे आर बाड़ी ते फिरिया जाए नरेंद्र वगैरह सब भक्त कह रहे हैं अभी और संसार में फिरेंगे नहीं तीन अर्थात कि ठाकुर ने जो कामिनी कांचन त्याग करने को कहा है हम लोग कैसे हम लोग कैसे क्या करके घर वापस फिर घर में वापस चले जाए शशि नित्य पूजा भार लया छ शशि अर्थात स्वामी रामकृष्णंद जी ने नित्य पूजा का जिम्मा लिया है नरेंद्र भाई देर तत्वावधान कोते छेन नरेंद्र भाइयों का तत्वावधान का अर्थ है टू लुक आफ्टर उन देखभाल करना उनकी देखभाल कर रहा है दैट इज बेसिकली मैनेजमेंट और एडमिनिस्ट्रेशन भाई राव तहार मुख चाहिए था केके लेकिन ये भाई लोग भी ये जो जितने भी गुरु भाई हैं नरेंद्र का चेहरे नरेंद्र के चेहरे की ओर देख के रहते हैं। इसका अर्थ यह है कि नरेंद्र की लीडरशिप सभी ने स्वीकार कर ली है। नरेंद्र जो कहता है वैसा सब लोग करेंगे। किंतु एग्जजेक्टली नरेंद्र को फॉलो करना यह भी नहीं होता है। यह शशि महाराज की बात तो आ ही गई। नित्य पूजा को लेकर के नरेंद्र की इच्छा नहीं थी। स्वामी जी की इच्छा नहीं थी कि बहुत ज्यादा कुछ ठाकुर पूजा ले किया जाए। जबकि शशि महाराज की इच्छा थी कि नहीं जिस तरह से ट्रेडिशनली ईश्वर की आराधना होती है वैसे ही ठाकुर की जैसे ठाकुर सदेह वर्तमान जब थे प्रकट लीला जब चल रही थी तब उनकी जिस तरह से शशि महाराज सेवा करते थे एग्जैक्टली उसी तरह की सेवा वो यहां पे भी कर रहे हैं और देखिए ऐसा नहीं है कि शशि महाराज का जो डिसओबेडियंस है नरेंद्र की ओर वो कोई अपना खुद का है। ठाकुर ने स्वयं कहा है कि ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में यदि कोई बाधा स्वरूप बनता है तो उनको आप नकार सकते हैं। उनको आप डिसओबे कर सकते हैं। उनके प्रति डिसओबेडियंस दिखा सकते हैं। ध्रुव ने पिताजी की बात नहीं सुनी, विभीषण ने बड़े भाई की बात नहीं सुनी। ऐसा करके ठाकुर पूरे एग्जांपल देकर के कहते हैं कि यदि अपना जो जेष्ठ है अपने उम्र से बड़े अपने जो पूजनीय है उनकी बातों को भी आप जैसे कि त्याग सकते हैं डिसओबे कर सकते हैं। किंतु यह कहने के बाद में ठाकुर स्पष्ट कहते हैं। किंतु ईश्वर प्राप्ति की बात को छोड़कर के जितनी भी बाकी बातें हैं उसमें संपूर्ण रूप से आपको आज्ञा वह रहना है। मास्टर महाशय जो अपने पिताजी का घर छोड़कर के अलग से रहते थे तो मास्टर महाशय ठाकुर उनको कहते थे कि क्यों तुम पिताजी के पास में नहीं रहोगे तुम अपने घर वापस चले जाओ क्यों तुम अपना एक दूसरा घर करके रहते हो तो मास्टर महाशय कहते हैं कि उस घर में मुझे बहुत कष्ट मिला है यदि मैं उस घर में वापस जाऊंगा तो मैं चैन से जी नहीं पाऊंगा तो इतना कहने के बावजूद ठाकुर उनको बार-बार कहते हैं जाओ तुम पिताजी के पास में जाकर वापस रहो तो देखिए कि यदि यदि मां पिताजी पत्नी ठाकुर के पास में जब आना है ऐसा कहेंगे कि ठाकुर के पास मत जाना तो ठाकुर कहते हैं इस बात को तुम इग्नोर कर सकते हो किंतु अदर देन दैट बाकी जितनी भी बातें हैं तुम लोगों को आज्ञावर्ती होकर के रहना है तो शशि महाराज भी भले ही चाहे नरेंद्र ने मना किया हो या तो कहा हो कि इतना बाड़ा-बाड़ी कोरा दरकार नहीं अर्थात और ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं ठाकुर पूजा में तो वह यदि शशि शशि महाराज ने इग्नोर किया है। तो स्वामी जी जब किंतु यह कहते हैं इतने सालों की तपस्या पूजा छोड़कर के मद्रास चले जाओ वहां पर चार्ज लेना है। इंस्टेंटली शशि महाराज एग्री हो जाते हैं। तो ठाकुर ने जैसा कहा ईश्वर प्राप्ति में यदि कोई बाधा स्वरूप बनता है तो इग्नोर कर सकते हो। किंतु अन्य सभी बातों में संपूर्ण रूप से आपको आज्ञा वह होकर रहना है। ऑफ कोर्स स्वामी जी कोई ईश्वर प्राप्ति में बाधा नहीं थे। किंतु वही बात है कि शशि महाराज के मन का जो भाव था कि ट्रेडिशनल रूप से ठाकुर की पूजा होनी चाहिए तो वो अपने भाव के प्रति शशि महाराज की निष्ठा संपूर्ण थी वो निष्ठा की बात है नहीं कि और कोई नरेंद्र बोलीन साधन करवे नरेंद्र ने कहा साधना करनी होगी ताहा ना होले भगवान के पावा जाए बेना यदि ऐसा ना करे तो ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाएंगे तीन निजे ओ भाई राना बिदो साधन आरंभ को लेन उन्होंने स्वयं और गुरु भाइयों ने भी विभिन्न तरह की साधन प्रणाली प्रारंभ की वेद पुराण और तंत्र मते मनेर खेद मिटाइबर बार जनो अनेक प्रकार साधनेर प्रवृत्त होले वेद पुराण और तंत्र मत से मन का यह खेद खेद अर्थात कि कहेंगे शोक ईश्वर प्राप्ति नहीं हुई। इस बात का शोक इसको मिटाने के लिए अनेक तरह की साधना में प्रवृत्त हुए। देखिए यह जो मास्टर महाशय यहां पर लिखते हैं वेद, पुराण और तंत्र मत से तो हमको तो शायद पता ही होगा कि तंत्र को लेकर के बहुत ज्यादा कुछ हालांकि ठाकुर ने तंत्र साधना की थी, शक्ति साधना की थी। ठाकुर ने उस बात को कोई बहुत ज्यादा प्राधान्य अपने शिष्यों के जीवन में नहीं दिया। उन्होंने ऐसा नहीं कहा तुम लोग इस तरह से तंत्र साधना करो। इसके बावजूद जो थोड़ा बहुत शायद उन्होंने किया ही होगा। ठाकुर ने शायद बताया ही होगा। और इसीलिए मास्टर महाशय ने यहां पर लिखा है कि वेद पुराण और तंत्र मत से उन्होंने साधना की। और यहां पर बाद में भी मास्टर महाशय लिखते हैं कखोन कखोन निर्ज वृक्षो तले कखनो एकानी एकाकी शशान मुद्दे कखनो गंगा तीरे साधन करें कभी-कभी निर्जन में वृक्ष तले अर्थात कि पेड़ के नीचे में कभी-कभी अकेले शशान में कभी-कभी गंगा तीर गंगा के किनारे पर साधन करते हैं। यहां पे श्मशान का नामोल्लेख तो किया है किंतु जो विधिवत जिसको तंत्र साधना कहते हैं पूर्णा अभिषेक जिस तरह से वेदांत साधना करनी है तो विजा होम करके सन्यास दीक्षा लेनी पड़ती है तंत्र साधना करने के लिए जो दीक्षा है उसको कहते हैं पूर्णा अभिषेक तो पूर्णा अभिषेक ठाकुर ने किसी को करवाया हो मुझे नहीं पता बस एक शरद महाराज के बारे में है कि उन्होंने पूर्णा अभिषेक करके तंत्रमत से साधना की थी। अह किंतु यह बहुत सालों के बाद की बात है। आई थिंक इवन स्वामी जी की महासमाधि के बाद की बात है। जबकि उनको लगा होगा शरद महाराज को कि मां का मां की जो सेवा है अभी उनको करनी होगी। तो शायद हो सकता है कि उन्होंने तंत्र मत में इस तरह से दीक्षा ली हो। इसके बारे में हम बात करेंगे। वो मा शरद महाराज ने जो मां का जो लीला प्रसंग जो लिखा है लीला प्रसंग में जो शक्ति साधना का जो वर्णन जब आता है उस समय यह सब डिस्कशन हम करेंगे कि इवन शरद महाराज स्वयं ये शक्ति साधना में किस तरह से उन्होंने क्या किया था। वो भारत में शक्ति साधना बोलकर के शरद महाराज की एक किताब भी है। तो ही हैज़ डन इनफ रिसर्च एंड इनफ साधना इन दिस। किंतु इनके अलावा और किसी ने पूर्णाभिषेक किया हो और विधिवत तंत्र साधना की हो दैट आई डू नॉट नो। तो जो भी है मास्टर महाशय को कुछ तो पता होगा। तभी उन्होंने यहां पर लिखा है मठेर मध्य कखनोबा ध्यानेर घरे एकाकी जप ध्याने दिनो जापन करें मठ के भीतर में कभी-कभी ध्यान करने का जो कमरा है वहां पे या तो फिर अकेले-अकेले जप ध्यान में दिन बिताते हैं। आ कनो भाई दे संग एकत्र मिलत होया कीर्तनंदे नृत्य करते थाकेन और कभी-कभी गुरु भाइयों के साथ में सब मिलकर के कीर्तन के आनंद में संकीर्तन के आनंद में नृत्य करते हैं। शकुले सब कोई विशेषतः नरेंद्र ईश्वर लाभ जन व्याकुल सभी लोग किंतु विशेषतः नरेंद्र ईश्वर लाभ के लिए व्याकुल है कखनो बलेन प्रायोपवेशन की करीबो कभी-कभी कहता है कि प्रायोपवेशन करूंगा प्रायोपवेशन का अर्थ है धीरे-धीरे करके आहार कम करते रहना है वो जो हत्या देना वो मां गई थी तो तारकेश्वर हत्या देने पहले वो सिंह वाहिनी के सामने हत्या दी थी अपने स्वास्थ्य के लिए फिर तारकेश्वर गई थी मां ठाकुर के आरोग्य कामना के लिए हत्या देने के लिए हत्या में क्या होता है कि बिल्कुल प्रारंभ से ही सब तरह का खाना पीना बंद कर देना है भगवान के सामने पड़े रहना है या तो भगवान आपकी मनोकामना पूर्ण करेंगे या तो फिर बिना आहार पानी के आपका देह त्याग होगा उसको कहते हैं हत्या देना और यह प्रायोपवेशन का अर्थ है मैं इतना डिटेल मुझे नहीं पता मैं किंतु जो पढ़ा है ऊपर ऊपर से उसका यही अर्थ है कि धीरे-धीरे करके आहार कम करते रहना। यानी कि इवेंचुअली एक ऐसा समय आएगा कि या तो ईश्वर दर्शन होगा या तो देह त्याग होगा। तो यहां पे नरेंद्र कहता है क्या प्रायोपवेशन करूं कि उपाय तहां के लाभ करीब वो किस उपाय से ईश्वर प्राप्ति करें? देखिए इन लोगों को तो ईश्वर प्राप्ति खास करके नरेंद्र को निर्विकल्प समाधि हो ही गई है। इसके बाद में भी इतनी व्याकुलता इतना मुमुक्षत्व वि इज वेरी सरप्राइजिंग इसको लेकर और डिस्कशन करेंगे अभी अपने नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: आश्चर्य की बात है कि निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने के बाद भी ठाकुर स्वामीजी की उस अनुभूति पर ताला लगा सके। क्या इसका अर्थ यह है कि निर्विकल्प समाधि प्राप्त हो जाने पर भी पूर्ण मुक्ति नहीं होती?
वो ठाकुर ने कहा ना कि अभी ताला लगा दिया है चाबी मेरे पास है वि कैन कंट्रोल यू ना या तो फिर कहेंगे कि उन्होंने यह स्वीकार किया है यह ऑथॉरिटी है स्वामी जी ने स्वीकार की है यह भी तो कह सकते हैं अदरवाइज स्वामी जी कहेंगे कि नो आई डोंट बिलीव इन यू तो उनको तो रोकने वाला कोई नहीं था म देखिए कि हाउ ठाकुर और स्वामी जी का रिलेशन पहले से ही कैसा है सप्तऋषि तपस्या क्या कर रहे हैं? छोटा सा बालक जाकर के स्नेह से उनको खींच करके ले आया है। नहीं कि सप्तऋषि को नारायण ने दर्शन दिया और आज्ञा दी कि तुम आओ। राइट? वो ऑथॉरिटी से उनको नहीं बुलाया। स्नेह से परवश होकर बुलाया है। तो स्वामी जी ने उनको स्वीकार किया है गुरु के रूप में। नॉट बिकॉज़ कि हायर स्पिरिचुअल अथॉरिटी है। दैट इज ट्रू। किंतु यह स्नेह का बंधन है बोल के। और यह स्नेह का बंधन नहीं रहता। सिर्फ अथॉरिटी दिखा दी होती तो निर्विकल्प समाधि के बाद में स्वामी जी थोड़ी ना वो फिर कोई हायर ऑथॉरिटी को स्वीकार करने वाले हैं। इसलिए कि नारायण बनके नहीं उनके सामने प्रकट हुए। बालक के रूप में प्रकट हुए। ना स्वामी जी ने स्वीकार किया ना स्वामी जी ने स्नेह का बंधन स्वीकार किया है बोल के तो यह पूरा मामला है
प्रश्न: निर्विकल्प समाधी का वर्णन सिर्फ ठाकुर और स्वामीजी के जीवन में मिलता है, माँ या अन्य गुरुभाईओ के जीवन में क्यों नहीं?
यू आर राइट कि एक सेमिनल इवेंट क्योंकि जिस तरह से शास्त्र में निर्विकल्प समाधि का वर्णन है और जिस तरह से जो अपना भी फ्रेमवर्क है ठाकुर के बेस पे ब्रह्म शक्ति या अभेद दैट मींस यदि आप यह कहे कभी-कभी कि ना ईश्वर इज ग्रेटर देन ब्रह्मन जो भी कोई कुछ कहना चाहता है अपनी फिलॉसोफी के अनुसार। सो अपने यहां पे तो मामला स्पष्ट है। ब्रह्म शक्ति वन एंड द सेम। राइट? तो देयर इज नथिंग हायर देन अ स्टेट इन व्हिच यू आर ब्रह्मन। ब्रह्मविद ब्रह्मव भवती। नथिंग इज हायर देन दैट। सो अब जैसे कि देखिए ठाकुर को निर्विकल्प समाधि में यह दिव्य वाणी उनके मन में से प्रकट हुई। तो ये भाव मुख्य था। अभी इसकी क्या व्याख्या है? कभी-कभी यदि हम यह सोचेंगे परहप्स शक्ति इज इवन ग्रेटर देन ब्रह्मन किंतु वो ठाकुर के ही वाणी से यह बात को आप नकार सकते हैं। ब्रह्म शक्ति आर ऑन द सेम पेडेस्ट सेम ऑथॉरिटी वर्किंग एंड स्टैटिक डायनेमिक एंड स्टैटिक सेम ऑथॉरिटी। सो यहां पे अगेन सेम एक्सप्लेनेशन कि ठाकुर जिस तरह से नरेंद्र ने स्वीकार किया ठाकुर की अथॉरिटी को और अपने आप को बांधने दिया वो जैसे हनुमान जी लवकुश को कहते हैं ना धरा ना दिलेले धरित पारिश्रे कुशी लव माने लवकुश हनुमान जी को बांध के ले जाते हैं तो हनुमान जी कहते हैं यदि बांधने नहीं देता तो बांधने तुम बांध पाते क्या मुझे सो बोथ कि उसका भी सेम एक्सप्लेनेशन यह भी सेम एक्सप्लेनेशन कि उन्होंने अपने आप को बांधने दिया है। बट यू आर राइट कि जो सेमिनल एक्सपीरियंस है साधक के जीवन में कि हां निर्विकल्प समाधि हुई उसके बाद में सब जैसे कि जगत में सब उनको जो पूर्ण ज्ञान है प्राप्ति हो गई। उनका जो चेहरा है वह बदल गया। उनका चाल चलन बदल गया। ईश्वरीय भाव अभी स्पष्ट रूप से दिख रहा है। ऐसा नहीं मां के जीवन में ऐसा आता है ना ही और किसी के जीवन में राजा महाराज के बारे में इनफेंस अनेक है। स्वामी जी के छोटे भाई महेंद्रनाथ वो जब राजा महाराज प्रवरज्या से वापस आते हैं। तब वो लिखते हैं कि अभी वह पहले का राखाल नहीं रहा। चेहरा धीर गंभीर शांत प्रशांत बातें करने में एक डिग्निटी एक डिवाइन विज़डम ठाकुर का सही मानस पुत्र अभी लग रहा है तो ऐसा वर्णन वो करते हैं बट दैट इज इनफर्ड वर्णन राइट ऐसा नहीं है कि इस दिन को इस मोमेंट को निर्विकल्प समाधि हुई और जैसे जगत जैसे कि प्रलय हो गया सो जो कि जनरली यू आर राइट कि हम पढ़ते हैं। सो यस दैट वे ना ही इवन मां के जीवन में इस तरह का वर्णन है ना ही और किसी के जीवन में ऐसा भी हो सकता है कि हाईएस्ट जो है वो उनको शायद मृत्यु के समय में हुआ हो प्राप्त विदेह जिनको कहते हैं ना जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति जीवन मुक्ति अर्थात कि जिंदा रहते रहते निर्विकल्प समाधि हो गई वापस आए राइट देखिए ठाकुर का भी म अल्टीमेटली निर्विकल्प समाधि के बाद में प्रश्न है वापस आना निर्विकल्प समाधि होते तो हो गई। वापस कौन आएगा? ठाकुर को तो मां का आदेश हुआ। यहां पर स्वामी जी को ठाकुर का आदेश हुआ। सो दे इन टर्न वापस आ गए। किंतु और किसी को यदि निर्विकल्प समाधि होती तो वापस आना भी तो एक तो यह हो जाता। सो हो सकता है कि विदेह मुक्ति हुई होगी। यानी मृत्यु के समय निर्विकल्प समाधि। देखिए यहां पर बैठकर के आपको एवरेस्ट है, नंदा देवी है या तो फिर यह अमरनाथ है। एक ही हाइट के दिखेंगे। म बहुत ऊपर में है। वहां पे जाएंगे तो पता चलेगा कि अमरनाथ से ऊपर भी एवरेस्ट है। राइट?
प्रश्न: ठाकुर की साधना में इतनी आध्यात्मिक विविधता दिखाई देती है, लेकिन बाद में रामकृष्ण संघ में एक ही प्रकार की स्टैण्डर्ड साधना क्यों दिखाई देती है?
ये ये साउथ इंडिया में जितनी भी डिश है वो राइस रहेगा। वो भात को ऐसे बनाना है। भात को ऐसा। मैंने कहा स्पेशल क्या है? तो बोला वो कर्ड राइज़ है। बोला वो तो बात ही है। थोड़ा स्पेशल है ना वो तो सादा होता है आज कर्ड गोल घुमा करके एवरीथिंग अराउंड दैट ना फॉर दैट इफ यू वांट टू ब्लेम समवन कोर्ट अनकोट ब्लेम। सो फॉर दैट रिस्पांसिबल पर्सन इज मदर एंड राजा महाराज। क्योंकि इवन स्वामी जी को भी देखिए। ठाकुर को तो छोड़ ही दीजिए वैविध्य के बारे में। इवन स्वामी जी को भी देखेंगे तो जिस एक्सट्रीम में कर्मयोग उन्होंने प्रीच किया है उस एक्सट्रीम में हमारे साधु कभी नहीं जाते। जैसे आपने कहा एक स्वीट स्टैंडर्डाइजेशन दैट स्टैंडर्डाइजेशन हैज़ बीन मेड बाय राजा महाराज एंड मदर। क्योंकि क्या है कि अगेन रीज़न इज़ दैट वी हैव टू लिव अ इंस्टिट्यूशनल लाइफ। स्वामी जी पूरा सिविलाइजेशनल लेवल पे सोचते थे। ठाकुर सोचते थे वो इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी के लेवल पे। प्रॉब्लम इज दैट वी आर नाइदर लिविंग ऑन एन सिविलाइजेशनल स्केल नर आर वी लिविंग इन हिमालय कंप्लीटली अलोन कंप्लीटली अब्सॉर्ब्ड इन तपस्या वी आर लिविंग अ इंस्टीट्यूशनल कम्युनिटी लाइफ सो इंस्टीट्यूशनल कम्युनिटी लाइफ के अपने वो जो अधिष्ठात्री देवता है मां सो मां ने जो कम्युनिटी लाइफ के लिए इंस्टीट्यूशनल लाइफ के लिए जो मेथड बता के गई है वही हम सभी लोग फॉलो कर रहे हैं। इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी जैसे आपने कहा सब साधु लोग अपने कमरे में क्या करते हैं बोलना मुश्किल है। हाउ मच दे आर फॉलोविंग ठाकुर हाउ मच ऑफ अदर बाबास दे आर फॉलोविंग दैट ऑल रिमेंस इन देयर ओन रूम नेवर कम्स आउट मने वने और कोणे राइट सो दैट इज़ हिडन एवरीथिंग देयर सिविलाइजेशनल स्केल पे पूरा ऑर्डर कार्य कर रहा है। नॉट एनी सिंगल इंडिविजुअल। सो पूरा ऑर्डर एंटायर ऑर्डर इज़ वर्किंग सिविलाइजेशनल स्केल। सो किंतु यह जो प्रकाश आप जो देखते हैं साधु को दैट यू सी देयर इंस्टीट्यूशनल कम्युनिटी लाइफ। सो दिस लाइफ इज स्टैंडर्डाइज्ड बाय मदर एंड राजा महाराज। सो दैट इज व्हाट इज विज़िबल। वन थर्ड वो कहते हैं ना समुंदर के ऊपर है। टू थर्ड अभी हिडन है। सो दैट इज लाइक दैट। ठाकुर और स्वामी जी वाला स्वामी जी वाला ऑर्डर के स्केल पे चल रहा है कार्य। और ठाकुर वाला जो है वह कमरे में मने वने और कोने में चल रहा है। एस फार एस इट इज विज़िबल कम्युनिटी इंस्टीट्यूशनल लेवल पर जो विज़िबल है दैट इज एंटायरली मदर्स इन्फ्लुएंस मदर एंड राजा महाराज।
प्रश्न: शशि महाराज ने अच्छा किया स्वामीजी की बात को अस्वीकार कर ठाकुर की पूजा चालू रखी। मिशन की सेवा-गतिविधियाँ भले ही अत्यन्त विविध हों, पर दिन के अंत में सभी साधु मंदिर में एकत्र होते हैं। यही मंदिर हमारे आध्यात्मिक जीवन का केन्द्र है, जिसने संकट और उथल-पुथल के समयों में भी संघ को स्थिर और एकसूत्र में बाँधे रखा है।
हां यू आर राइट। मैं रांची में इतना कार्य करता था। सुबह को निकल जाता था। रात को आता था। बट दिस मंगल आरती और इवनिंग आरती इट यूज्ड टू एंकर माय लाइफ। अह आई रेयरली यूज़्ड टू मिस दैट कि दिन में आप जितना भी घूमो इवनिंग के टाइम पे ऐज़ फार ऐज़ पॉसिबल इवनिंग आरती में उपस्थित रहना है और मंगल आरती तो है ही है वो तो अर्ली मॉर्निंग है उसको मिस नहीं करना है। सो दैट यूज्ड टू कीप मी अंकर्ड। सो दैट वे यू आर राइट कि जितना ही चाहे और अल्टीमेटली क्या है ना कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान चारों का कॉम्बिनेशन ही तो अपने लोगो में ही है। राइट? सो स्वामी जी ने खुद ने किया है वह लोगो बनाया है। प्रत्येक गुरु बाई ठाकुर का एक-एक एस्पेक्ट का वो एक रिप्रेजेंटेशन है। सो अद्भुत आनंद जी फॉर एग्जांपल कि ट्रेडिशनल सेंस में विद्या नहीं प्राप्त की किंतु यही अगेन महेंद्रनाथ ही वर्णन करते हैं मोहिन बाबू स्वामी जी के छोटे भाई कि लाटू महाराज को देखा था पहले कि जब वो रामबाबू के वो जो ये थे उनके नौकर थे तब देखा था ठाकुर के पास में भी उनको देखा था कि किस तरह से अपने को एक तरह का नीचा करके चलते थे क्योंकि पता है वह नौकर है तो नौकर का एक जो आचरण होता है कि स्वीकार कर लेना ऑर्डर लेकर के कार्य करना वगैरह वगैरह और काशीपुर में गए थे तो ठाकुर को कैंसर हो गया है। अभी तो सभी लोग जो परमानेंट उनका ग्रुप बन गया है। वहां पे लाटू महाराज को देखा। वो पहले वाले लाटू महाराज नहीं है। वो नौकर लाटू महाराज अभी नहीं रहे। अभी जैसे कि धीर गंभीर प्रशांति उनके भीतर में आ गई है। नरेंद्र के साथ में डर कर के बात नहीं करते। या तो नरन एक म एक नॉर्मल पर्सन है वो नौकर है उसके साथ में इक्वली बात करते हैं ऑन इक्वल फुटिंग पे तो ये परिवर्तन देखकर के मैं आश्चर्यचकित हो गया सो यू सी दैट एव्री डायरेक्ट डिसाइपल इन अ वे रिप्रेजेंट्स वन ऑफ द एस्पेक्ट ऑफ श्री रामकृष्णा सो शशि महाराज देखिए ठाकुर का तो ब्राह्मण संस्कार था आखिरी घड़ी तक वो जो ब्राह्मण के हाथ का ही खाना पकाया जो खाना है वगैरह-वगैरह इनफैक्ट महासमाधि का जो एक लक्षण है ठाकुर की जिसजिस के हाथ से मैं खाऊंगा यानी जो चीज आज हम बिल्कुल सामान्य समझते हैं होटल में जाकर खाना खाना वगैरह ठाकुर कहते हैं ऐसी परिस्थिति आई दैट मींस कि मेरा महासमाधि अभी निश्चित है। सो दैट ट्रेडिशनल ब्राह्मण संस्कार दैट इज रिप्रेजेंटेड इन शशि महाराज जीसस लाइफ। एंड दैट इज व्हाई स्वामी जी डिडंट इंसिस्ट अपॉन बियों्ड वन पॉइंट। स्वामी जी ऑर्डर कर सकते थे। यदि चाहते तो टू पुट हिज फुट डाउन। इंग्लिश में कहते हैं ना कि ना बस यह फाइनल ऑर्डर है। अभी तुम बंद कर दो। और शशि महाराज हो सकता है कि ऑर्डर को स्वीकार कर भी लेते। किंतु स्वामी जी का खुद का जो संदिग्धता थी कि नहीं वो जो कर रहा है इज दैट बिकॉज़ ऑफ दिस रिप्रेजेंटेशन ऑफ वन ऑफ द एस्पेक्ट ऑफ ठाकुर वो एक डाउट शशि महाराज ने पकड़ लिया होगा। बोल के उन्होंने फिर उसको पुश कर दिया अपना। सो
प्रश्न: रामकृष्ण-पुथी अत्यन्त भक्तिमय ग्रंथ है, जबकि लीलाप्रसंग अपेक्षाकृत अधिक विश्लेषणात्मक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लिखा गया है। शायद यही कारण है कि लीलाप्रसंग का अधिक उपयोग दिखाई देता है, है न?
ना प्रॉब्लम क्या है? पुंथी इज अ वेरी ट्रेडिशनल बंगाली टाइप ऑफ लिटरेचर जो कि बंगाली में ही अच्छा लगता है। ट्रांसलेशन बहुत ही बेकार है। इस अर्थ में कि वो भाव नहीं आएगा। और दूसरा कि बंगाली में प्रभानंद जी उसको बार-बार कोट करते हैं। वन ऑफ द ग्रेट इंटेलेक्चुअल्स ऑफ आवर ऑर्डर प्रभानंद जी के जितने भी बेंगली वर्क है पंथी को कोट करना ही करना है उनको। सो दैट वे पुंथी इज मच मोर रिलेटेड फॉर बंगाली लिटरे। अभी जैसे ये तुलसीदास के दोहे हैं। उसको आप इंग्लिश में बंगाली में ट्रांसलेट करेंगे तो कैसा विचित्र विचित्र लगेगा। उसका जो भाव जो है ना इस क्लोजली रिलेटेड विद द लैंग्वेज। है ना? पोएम का अर्थ ही वही है। कोई भी पोएम को आप ट्रांस अभी जैसे वो जो काली कीर्तन है यह आगमनी के गीत है। हमने उसके ऊपर क्लास लिया था। ट्रांसलेट करने से आधा भाव तो वहीं पर खत्म हो जाता है। सो दैट इज व्हाई दैट इज द रीजन पोएटिक फॉर्म में बोल के नॉन बंगाली लिटरेचर में ज्यादा कोटेशन नहीं है। ये जो अपने ये महाराज थे ना क्या नाम उनका मलाई महाराज रामकृष्ण पुराण पंथी का ट्रांसलेशन किया। फिर वो जो राजकोट में एक दो डिवोटी थे जीतू भाई वगैरह तो ग्रुप बना करके कोई गाएगा कोई तबला बजाएगा ऐसा करके एक पूरा गायक मंडली बनाया था और विभिन्न डिवोटी के घर में वो ऐसा करते थे एक दिन यहां पे एक दिन यहां पे पुंथी का गान और उसके ऊपर में व्याख्या वगैरह तो मले महाराज का ऐसा बड़ा था कि पंथी को पॉपुलराइज करना है किंतु जैसे ही मले महाराज गए साथ में वो पूरा प्रोग्राम भी वो मैं पब्लिकेशन का चार्ज लिया तो पूरा पूरा कमरा भर के रामकृष्ण पुराण पढ़े हैं। ऐसे बड़े-बड़े दो वॉल्यूम मैंने कहा हाय रे मैं क्या करूंगा इसके साथ? हां रामकृष्ण पुराण इसलिए तो रामकृष्ण पुराण के दो वॉल्यूम है ऐसे मोटे-मोटे ऐसा और इतना मोटा ज्योत की साइज का ये जो प्रबुद्ध भारत है ना उस साइज के इतने मोटे-मोटे दो वॉल्यूम है हां हां हां और ये कहा ना कि ग्रुप बनाया था कि डिवोटी के घर-घर जाकर के पंथी का गान करना थोड़ी व्याख्या करनी तो मले महाराज का बहुत था कि कैसे भी करके पंथी को पॉपुलराइज करना है किंतु जैसे ही वो गए क्योंकि मले महाराज बीइंग बंगाली वो एप्रिशिएट कर सकते हैं। मुझे बंगाली आता है बोल के मैं एप्रिशिएट कर सकता हूं। किंतु ऐसे तो और कितने लोग हैं? ओम