मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार [गाना गाने की आवाज़] वरिष्ठाय राम कृष्णाायते [गाना गाने की आवाज़] स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन भारत में दिए हुए भाषणों में से एक यह सीरीज हमारा चल रहा था तो उसमें बीच में हमने में एक स्लाइड शो जो कि मैंने एआई में बनाया था उसको हम देख रहे थे। तो अ इसमें फर्स्ट स्लाइड फिर ये सेकंड थर्ड ऐसा करके ये जो फोर्थ स्लाइड है इसको हम देख रहे थे। इस फोर्थ स्लाइड में भी जो टॉपिक है
भारत की नियति है विश्व को आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित करना
एव्री रेस हैज़ अ मिशन इंडियास इज द लाइट स्पिरिचुअल। विश्व की जितनी भी जनसमुदाय जितनी भी सभ्यताएं जितने भी महान राष्ट्र है उन सबके एक-एक मिशन होता है। पृथ्वी पे जन्म लेने का उनके पीछे का एक पर्पस होता है। तो भारत का पपस है लाइट स्पिरिचुअल अर्थात कि पूरे विश्व में आध्यात्मिकता का फैलावा करना। यहां पर जिस तरह से स्वामी जी का यह कोटेशन दिया हुआ है। पॉलिटिकल ग्रेटनेस और मिलिटरी पावर इज नेवर द मिशन ऑफ आवर रेस। पॉलिटिकल ग्रेटनेस यानी कि राजनैतिक महानता या तो फिर जिसको आजकल हम लोग कहते हैं हार्ड पावर। ये हार्ड पावर यानी कि यह पॉलिटिकल पावर, मिलिटरी पावर यह सब हमारे देश की कभी भी यह मेन उद्देश्य नहीं रहा। मिलिट्री पावर या पॉलिटिकल पावर हमारे देश का उद्देश्य नहीं रहा। बट देयर हैज़ बीन द अदर मिशन गिवन टू अस। किंतु हमको और एक मिशन सुपृत किया गया है। व्हिच इज टू कंजर्व ऑल द स्पिरिचुअल एनर्जी ऑफ़ द रेस एंड दैट कंसंट्रेटेड एनर्जी इज टू पोर फोर्थ इन अ डल्यूज ऑन द वर्ल्ड। हमको क्या मिशन दिया गया है? हमारी रेस की, हमारे देश की, हमारी सभ्यता की जितनी भी आध्यात्मिक शक्ति है उसको जैसे कि कंजर्व करना, प्रिजर्व करना और फिर यह प्रिजर्व हुई एनर्जी को एक कंसंट्रेटेड प्रवाह में बहा देना जिससे कि पूरे जगत को वो अपनी शांति और यह अमर प्रेम के आंचल में आवृत कर दे। यह जैसे डैम बनाते हैं ना नदी के ऊपर में सबसे पहले तो नदी के पानी को डैम करते हैं रोक देते हैं और एक बहुत बड़ा सरोवर बनाते हैं। जैसे गुजरात में वो जो नर्मदा सरोवर है सरदार सरोवर है। तो सरदार सरोवर में क्या है कि नर्मदा रिवर पे डैम बनाया गया है। फिर उसका पानी प्रिजर्व करके सरदार सरोवर में डाला गया है। फिर वही सरदार सरोवर में से चैनल्स बना करके जहां-जहां पे कि बारिश नहीं होती है वहां वहां पे वो पानी भेजा जाता है। तो ये जिस तरह से ये नदी को डैम करके एक रिजवायर बना करके उसमें से पानी को जहां पे ड्राई एरियाज है चैनलाइज करते हैं। एग्जैक्टली यही कार्य भारत को करना है कि भारत की आध्यात्मिकता 10 दिशाओं में बिखर ना जाए इसके लिए सर्वप्रथम तो भारत की आध्यात्मिकता को एक तरह से डैम करके एक तरह से रिजर्व में बना करके फिर उसको इस तरह से चैनेलाइज करना है कि जहां पर आध्यात्मिकता का अभाव है या तो फिर जहां के लोग आध्यात्मिक संदेश के लिए तड़प रहे है तो यह भारत का मिशन है। अभी देखिए कि इसको डिस्कस करने के टाइम में हमने और एक पॉइंट ऐसा देखा था पिछले क्लास में आप देखेंगे कि हम लोगों के पास में आध्यात्मिकता को ऐसा नहीं है कि ठाकुर के आने से आई है। यह तो वही भगवान राम, भगवान कृष्ण, यह मुनि वशिष्ठ, यह सुखदेव, यह व्यास इन लोगों की भूमि है। उपनिषदों का गान यहां पे ही हुआ। गीता का अमर संदेश युद्ध क्षेत्र में यहीं पे सुनाया गया। तो फिर इतनी आध्यात्मिकता थी। इसके बावजूद भारत में 1000 साल की गुलामी क्यों आन पड़ी थी? और यह एक प्रश्न हम उनको हुआ था। और इसके साथ में ही इसका पैरेलल दूसरा प्रश्न जो हो सकता है वो यह है कि क्या स्वामी जी की यह बात सुनकर के कि भारत का मिशन आध्यात्मिक है क्या हम वही एक पिटफॉल में वही ट्रैप में क्या फिर से फंसने को जा रहे हैं कि हमने पॉलिटिकल पावर है मिलिट्री पावर है उसको इग्नोर करके सिर्फ स्पिरिचुअलिटी पे ध्यान दिया आखिर में हम 1000 साल गुलाम रहे अभी कैसे से भी करके ये 20थ सेंचुरी में हमको फिर से फ्रीडम तो मिला है। किंतु फ्रीडम प्राप्त करने के बाद में हमको ऐसा लग रहा है कि हमारी ये पॉलिटिकल और मिलिट्री स्ट्रेंथ आज जितनी होनी चाहिए इस क्रूल जगत में टिकने के लिए उतनी नहीं है। और फिर वही हम यह आध्यात्मिकता और धर्म की ओर इस तरह से मुड़ रहे हैं कि जैसे कि कोई हम पे हमला करें तो फिर से कहीं हम लोग गुलाम ना बन जाए। ये देखिए वेनेज वेनेजुएला के साथ में क्या हुआ। अमेरिका ने उसके प्रेसिडेंट को किडनैप करके उठा लिया। वे लोग कुछ बोल भी नहीं पाए। यह जो शक्ति का इमंबैलेंस जो है कितना बड़ा है आज अमेरिका और दूसरे राष्ट्रों के बीच में। आज हम अमेरिका और भारत की तुलना करें। चलो आज तो नॉमिनली हम फ्रेंड है। किंतु वह पगला कब क्या करेगा उसका तो कुछ ठीक नहीं है। तो आज हम देखें कि पावर इमंबैलेंस कितना बड़ा है। उनकी जो मिलिट्री टेक्नोलॉजी उनका ये कंप्यूटिंग एआई साइंस उनका ये जो स्पेस टेक्नोलॉजीस वेपंस टेक्नोलॉजी उसके सामने तो इंडिया क्या कहेंगे? 20% है 30% है एट द मोस्ट। तो फिर देखिए कि इतनी बड़ी महासत्ता जब तक अमेरिका अच्छा था तब तक अच्छा था। अब जब बिगड़ेगा तो लोगों को इस तरह से फिर ये टेरर करने का प्रयास करेगा। एक दूसरा पाकिस्तान यदि हो जाएगा अमेरिका तो देखिए कि हमको तो बड़ी मुसीबत आन पड़ने वाली है। उस समय स्वामी जी ऐसा स्वामी जी के समय की एक बात थी। एक अमेरिका था कि अमेरिका जाकर के स्वामी जी ने उनको स्पिरिचुअलिटी का संदेश दिया। वेदांत का संदेश दिया और वहां से यहां वहां से कुछ-कुछ अच्छे स्वामी जी के फॉलोअर्स भारत आए और भारत में आकर के उन्होंने स्वामी जी के कार्य में सहायता की। तो वह जो अमेरिका था आज से 100 साल 150 साल पुराना और आज का जो अमेरिका है उसमें तो आसमान जमीन का अंतर है। आज हम स्वामी जी की यह बात हम मान करके बैठे रहे कि प्रत्येक देश को एक मिशन के रूप में प्रत्येक देश का एक मिशन है। भारत का मिशन आध्यात्मिकता है। पॉलिटिकल पावर या मिलिट्री पावर में हमको नहीं जाना है। तो एक बहुत भयानक डर हमको लग जाता है कि अमेरिका और यहां पे चाइना है। आज चाइना का भी देखिए ना अभी रिसेंटली पढ़ रहा था कि उन्होंने यह बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स है जो उन लोगों की वहां पे उन्होंने रोबोट को इंट्रोड्यूस करना शुरू करवाया है। अभी उनके रोबोट है। बॉर्डर पे वे लोग ये करेंगे पहरेदारी करेंगे। अभी ये पहरेदारी करने में से अटैक करने में कब कन्वर्ट हो जाएंगे? वो तो एक ही स्टेप है ना। ये रोबोट आर्मी लेके कम हमला करेंगे तो फिर हम लोगों की 10 लाख की सेना हो ना कि कितनी बड़ी सेना हो रोबोट के सामने हम क्या कर लेने वाले हैं तो देखिए कि खास करके आजकल की पॉलिट ग्लोबल अफेयर्स जो होते हैं ना उसमें कहते हैं जी टू अर्थात कि ग्रुप ऑफ टू चाइना और अमेरिका ये दोनों का अभी देखिए कि चारों ओर जितने भी हाईटेक फील्ड है उनमें इन दोनों का है वर्चस्व है तो भारत हमको बेचारा कहीं दिखाई ही नहीं दे रहा। तो अभी जब तक यह अमेरिका या चाइना हमारे मित्र थे या तो फिर एटलीस्ट नॉन अग्रेशन था चाइना के साथ में तब तक तो हमने ये जितना नाती जाति पॉलिटिक्स पॉलिटिक्स करना था मंडल कमंडल करना था सब कर लिया। किंतु आज जो परिस्थिति है नहीं चाइना के साथ में अच्छे रिलेशन तो कभी थे ही नहीं। एट द मोस्ट सीजफायर वाली सिचुएशन थी। किंतु अमेरिका के साथ में फ्रेंडशिप थी तो वह पगला अभी जितनी भी फ्रेंडशिप है सबको आग लगाने को बैठा है क्योंकि उसको पता चल गया है। ये यूरोप में भी ऐसा ही हुआ। यूरोप में भी ये आइडेंटिटी पॉलिटिक्स करके उन लोगों ने अपना साइंस और टेक्नोलॉजी में आग लगा दी। साइंटिफिक और टेक्नोलॉजिकल प्रोग्रेस में। इतने सारे रूल्स एंड रेगुलेशन बना दिए हैं कि वहां की टेक इंडस्ट्री जैसे कि स्मूदर हो गई। तो अभी देखिए कि यूरोप को भी यह भी नींद से जग जाना पड़ा है कि अमेरिका के सहारे अभी तक यह करते रहते थे आइडेंटिटी पॉलिटिक्स। किंतु अमेरिका ही यदि उनके विरुद्ध में जाएगा तो ये आइडेंटिटी पॉलिटिक्स पूरा उनका खत्म हो जाएगा। उनके देश को खत्म कर देगा। तो ये भारत में भी आइडेंटिटी पॉलिटिक्स चला है। पिछले 30-40 साल यूरोप में भी चला है। अभी अमेरिका ने दोनों को लात मारी है। दोनों की नींद खुली है। किंतु नींद खुलने के बाद में क्या हमारे जितने सर्वश्रेष्ठ माइंड है भारत के वे लोग तो एक हायर आइडियल को प्राप्त हायर आइडियल को फॉलो करना चाहते हैं। तो अभी बात यह है कि हाईएस्ट आइडियल है भारत देश में। वो है स्वामी विवेकानंद। अभी स्वामी विवेकानंद ही जब हमको ऐसा कहते हैं कि पॉलिटिकल ग्रेटनेस और मिलिट्री पावर भारत का उद्देश्य कभी नहीं था। हमारा उद्देश्य तो है कि स्पिरिचुअलिटी को एक रिजर्व में कलेक्ट करना है। फिर इस रिजवायर में से ये सरदार सरोवर में से फिर पूरे विश्व में ये नर्मदा की कैनाल जो है नर्मदा की चैनल्स के माध्यम से आध्यात्मिकता को फैलाना है। तो यदि स्वामी विवेकानंद हमको इस तरह का उपदेश देते हैं तो फिर प्रश्न एक ऐसा होगा कि भारत का भविष्य क्या है? क्या हम स्वामी जी के विचारों को ऐसा बोल करके स्वीकार अस्वीकार कर दे कि अच्छा ठीक है चलो 18थ सेंचुरी में 19थ सेंचुरी में जबकि ये सब चीजें शायद थोड़ी बहुत शक्य थी या तो थोड़ी बहुत सही थी। आज के विश्व में यह सब चीजों का कोई प्रयोजन नहीं है। आज भारत को आंख बंद करके चाइना और अमेरिका ये जी2 उनकी तरह ही पॉलिटिकल और मिलिट्री पावर के पीछे दौड़ना है। तो यह कंक्लूजन इजीली हमारे माइंड में आता है। [गला साफ़ करने की आवाज़] प्रॉब्लम यही है कि अब जैसे हम लोग तो है स्वामी जी के फॉलोअ। तो स्वामी जी ने जब यह बात कही है तो हमको इसका एक लॉजिक भी तो समझना होगा कि इसके पीछे का लॉजिक क्या है। तो देखिए मैं रिसेंटली एक थ्यरी डेवलप
evolution: of species and of consciousness (jiva) - उत्क्रांति: प्रजातियों की और मानव-चेतना की
कर रहा हूं। तो मेरा जो थ्यरी है वो इस तरह से है कि देखिए मनुष्य सिविलाइजेशन या ह्यूमन स्पीशीज एंड ह्यूमन सिविलाइजेशन ये किस तरह से इवॉल्व होती है। इसके पीछे में बेसिक इवोल्यूशनरी फैक्ट हमको देखना है। देखिए कि इवोल्यूशन है इस बात में तो कोई यह संदेह नहीं है। यहां पे विदेश में या तो फिर कहेंगे कि ये साइंस की दृष्टि से ये ऑर्गेनिज्म जो है या स्पीशीज जो है उसमें जो इवोल्यूशन होता है वो हमको साइंस समझाता है कि हां पहले सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिज्म थे। उसमें से मल्टीसेल्यूलर ऑर्गेनिज्म हुए। उसमें से ये जलचर प्राणी अर्थात कि पानी में तैरने वाले प्राणी हुए। उसमें से यह स्थलचर यानी कि यह जमीन पे रेंगने वाले यह प्राणी हुए। उसमें से फिर जमीन में जो चल रहे थे वह सब तो ठंडे खून वाले थे। अभी तक का जो इवोल्यूशन हुआ है जितने प्राणियों का पशुओं का स्पीशीज का वो सब ठंडे खून वाले थे। तो ये जिनको कि इस ठंडे खून वाले में से बने रेप्टाइल्स। ये रेप्टाइल का सबसे बड़ा इवोल्यूशन सबसे माने एडवांस स्पीशीज है डायनासोर। तो यह रेप्टाइल डायनासोर ठंडे खून वाले थे। उसमें फिर यह उल्कापात हुआ। फिर उल्कापात में यह माने मिडराइट स्ट्राइक हुआ। पृथ्वी पे आधा माने पूरा पृथ्वी ये बारिश आग की बारिश और ये घने काले बादलों से ढक गया। उसमें ये रेप्टाइल हो गए खत्म। और जो मैमल्स थे अर्थात कि गर्म खून वाले ये प्राणी वे लोग बच गए। उन्होंने सर्वाइव किया। फिर यह गर्म खून वाले मैमल्स में से धीरे-धीरे करके एप और एप में से ह्यूमन का इवोल्यूशन हुआ। तो यह एक साइंटिफिकली इवोल्यूशन ऑफ स्पीशीज का ये सिद्धांत है। और हमारे हिंदू धर्म के अनुसार इवोल्यूशन ऑफ दी जीवात्मा अर्थात कि हमारे भीतर में जो चेतन सत्ता है जो कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से बनी हुई है। उसकी ये जो सब मिलकर के जो एक चेतन सत्ता है वो बर्थ आफ्टर बर्थ प्रत्येक जन्म के बाद में जन्म मृत्यु जरा व्याधि की यह साइकिल से गुजरते गुजरते एक के बाद एक नए देह धारण करती जाती है। उसमें सिर्फ ये मनुष्य देह ही नहीं ये पूरी पृथ्वी पे जितने भी स्पीशीज है कोई भी देह धारण कर सकती है। मछली का हो, बंदर का हो, हाथी का हो, घोड़े का हो, इवन ये पेड़ पौधे का हो वो देह धारण करेगी। पेड़ पौधे का तो खैर ठीक है। किंतु जहां तक यह लिविंग बॉडीज का प्रश्न है, खास करके ह्यूमन बॉडी का प्रश्न है, कर्म के अनुसार उसका नया जन्म होगा। यह इवोल्यूशन ऑफ दी जीवात्मा यहां पे इस तरह से चलता है। अच्छे कर्म का अच्छा फल, बुरे कर्म का बुरा फल। तो अच्छे कर्म किए तो अच्छे घर में अच्छे इंसान हो के जन्मेंगे। बुरे कर्म किए तो फिर वही वो वहां तक पहुंच जाएंगे। पेड़ पौधे पशुपंखी तल ये कथामृत में एक इंटरेस्टिंग कहानी है। म एक घटना है। तो ये जो है अपने डॉक्टर सरकार ठाकुर को कैंसर हो गया था। डॉक्टर सरकार ठाकुर की ट्रीटमेंट करने के लिए आते थे। कथामृत पढ़ा होगा तो डॉक्टर सरकार के साथ में ठाकुर के वार्तालाप वार्तालाप का बड़ा ही रोचक प्रसंग है। बहुत सारे वो वार्तालाप मास्टर महाशय ने रिकॉर्ड किए हैं। तो उसमें एक था कि ये डॉक्टर सरकार की ये जो हैबिट थी ना आध्यात्मिकता के बारे में धर्म के बारे में ठाकुर के दर्शन के बारे में अपना एक स्पष्ट ओपिनियन अह व्यक्त करना बिना किसी लाज शर्म के। तो किसी ने कहा होगा कि ये जो है डॉक्टर वो हो सकता है ना कि ये दूसरा जन्म है वो ये जन्म में ठाकुर के सामने मुंह फाड़ इस तरह से बोलते हैं उनको दूसरे जन्म में अभी ये जन्म के बाद में दूसरा जन्म लेंगे तो उनका तो डिवोल्यूशन होगा तो हो सकता है कि पशु पक्षी के रूप में उनको जन्म लेना पड़े तो और किसी ने कहा कि वह इतना मुंह फाट बोलते हैं कि वो सिर्फ पशु-पक्षी नहीं ईंट पत्थर से उनको शुरुआत करनी पड़ेगी। तो डॉक्टर सरकार हंसते-हंसते क्या कहते हैं पता है कि ठीक है चलो मैं ईंट पत्थर से शुरू करूंगा किंतु इवोल्यूशन होते फिर से जैसे ही मनुष्य का देह धारण करूंगा फिर से मैं ऐसी ही बात करूंगा तो फिर वे लोग कहते हैं कि फिर से आपको ईंट पत्थर से शुरुआत करनी पड़ेगी तो ये लोग हंसते हैं इस तरह से किंतु देखिए दिस इज द बेसिक आइडिया ऑफ द इवोल्यूशन ऑफ जीवात्मा यहां पे है इवोल्यूशन ऑफ स्पीशीज यहां पे है इवोल्यूशन ऑफ कॉन्शियसनेस चलो एक इंग्लिश नाम देते कॉन्शियसनेस। तो यह कॉन्शियसनेस का अर्थ क्या करेंगे? बेसिकली वेदांत में जिसको जीवात्मा कहा गया है चेतन तत्व है जो कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से जड़ित हुआ है। इसको यदि हम कॉन्शियसनेस की उपमा दें तो यह इवोल्यूशन ऑफ कॉन्शियसनेस जो कि आज मेरा कॉन्शियसनेस ह्यूमन बॉडी में है। अच्छे कर्म करने से अच्छा और ज्यादा अच्छा जन्म मिलेगा। बुरे कर्म करने से फिर वही ईंट पत्थर से शुरू करना पड़ेगा डॉक्टर सरकार की लैंग्वेज में और फिर वह कर्म का जो दुष्कर्म का जो फल था वो यदि कट जाएगा तो फिर से यह मनुष्य देह प्राप्त होगा फिर से मेरे हाथ में यह चांस आएगा कि मैं उन्नति करना चाहता हूं कि अवनति करना चाहता हूं। ये बेसिकली दो कांसेप्ट है। इवोल्यूशन ऑफ स्पीशीज और इवोल्यूशन ऑफ कॉन्शियसनेस। अभी देखिए कि पिछले 1000 साल से खास करके क्या हुआ है। यूरोप में हमने देखा क्या रेनेसा आया रिब्थ ऑफ लर्निंग हुआ और साइंस और टेक्नोलॉजी में इतना डेवलपमेंट हुआ। भारत में देखिए कि एक स्पिरिचुअल रहने सा आया है। यह भगवान शंकर शंकराचार्य है, रामानुजाचार्य है, वल्लभाचार्य है, मीराबाई है। फिर ये सूरदास है। फिर ये जो तुलसीदास है। ये एक के बाद एक संतों ने भारत में जन्म ग्रहण किया। और हमारे यहां पर एक स्पिरिचुअल रहने सा आया है। स्पिरिचुअल रिब्थ ऑफ लर्निंग हुआ है। जो बुद्धिज्म की अवनति के बाद में भारत में एक स्पिरिचुअल वैक्यूम जो क्रिएट हुआ था वो ये भक्ति मूवमेंट है, वेदांत मूवमेंट है, शक्ति साधना है, यह शैव साधना है। यह इन सब ने इस वैक्यूम को फिल किया है और एक ठाकुर के आने तक इस तरह का इवोल्यूशन किया है कि ठाकुर को साधना के प्रत्येक क्षेत्र में श्रेष्ठतम टीचर उनको मिल गए थे। शक्ति साधना की सर्वश्रेष्ठ टीचर थी यह भैरवी ब्राह्मणी उनको गुरु के रूप में मिली थी। वेदांत साधना के सर्वश्रेष्ठ टीचर उस समय के तोतापुरी जी ठाकुर को गुरु के रूप में मिले थे। वैसे ही प्रत्येक साधना के बारे में। तो यहां पर देखिए कि वेस्टर्न साइंस का कलमिनेशन यदि हम आइंस्टाइन में करें कहे कि उसका जो इक्वेशन है e = mc² तो उसने हमको दिया क्या? E = MC² के ऊपर में से ही ये एटम बम बना है। माने मोस्ट डिस्ट्रक्टिव पावर है जो कि ये साइंटिफिक इवोल्यूशन ने प्रोड्यूस किया है। उसने और भी बहुत अच्छी चीजें प्रोड्यूस की है। इलेक्ट्रिसिटी है। ये टेलीग्राम है। ये कंप्यूटर साइंस है। कम्युनिकेशन के ये जो है ट्रांसपोर्टेशन के ये जो मींस है ये ग्रीन रेवोल्यूशन है। जेनेटिक साइंस है, मॉडर्न मेडिसिन है। ये कितना सब कुछ मॉडर्न साइंस ने प्रोड्यूस किया है। किंतु साथ-साथ में ही उसने ये वेपन्स ऑफ़ मास डिस्ट्रक्शन भी तो प्रोड्यूस किया है। ये न्यूक्लियर वेपन है, केमिकल वेपन है, बायोलॉजिकल वेपन है। वो भी तो उसी साइंस की पैदाइश है। वॉर मॉडर्न वॉर जो कि इतनी भयानक डिस्ट्रक्टिव है। वो भी तो ये मॉडर्न साइंस का ये कंट्रीब्यूशन है। तो एक और देखिए कि मॉडर्न साइंस ने हमको मींस दिए हैं, टूल्स दिए हैं। किंतु यह टूल को यूज़ करने के लिए आपको एक एथिक और मोरल पर्सन चाहिए। अभी चाकू है तो चाकू एक सर्जन के हाथ में भी रह सकता है। एक मर्डरर के हाथ में भी रह सकता है। मर्डरर उसी चाकू से लोगों का गला काटेगा। सर्जन उसी चाकू से सर्जरी करके लोगों को आरोग्य प्रदान करेगा। तो चाकू चाकू है। इट्स जस्ट अ टूल। उसको यूज करने वाला कौन है? मर्डरर है ना कि सर्जन है? उसी के ऊपर में सब डिपेंड है कि चाकू का क्या यूज़ होने वाला है। तो यह जो एथिक्स और मोरालिटी वाला जो एस्पेक्ट है वो इवॉल्व होते-होते पिछले 1000 साल में ठाकुर के रूप में कलमिनेट हुआ है। तो देखिए कि यह दो इवोल्यूशनरी ब्रांचेस पिछले 1000 साल में नेचर ने जैसे कि इसको एक्सक्लूसिवली यूरोपियन सिविलाइजेशन वेस्टर्न सिविलाइजेशन के पास में से एक्सक्लूसिवली साइंस और टेक्नोलॉजी का डेवलपमेंट करवाया तो हमारे पास में एक्सक्लूसिवली ये स्पिरिचुअलिटी का इवोल्यूशन करवाया। तो क्या है कि यह जब इवोल्यूशन होता है देखिए आप इवोल्यूशनरी साइंस पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि इवोल्यूशन के समय में ना कैटालिज्मिक इवेंट्स होती है। भयानक प्रेशर आप पे डाला जाता है। तभी तो हम अपने को कंप्लीटली ट्रांसफॉर्म करेंगे। यदि मैं खाद म गुजराती में कहते हैं खाते पीते सुखी अर्थात कि माने खाने में और पीने में और रहने में यदि मैं सुख पूर्वक सब कुछ कर पाता हूं तो फिर मेरे पास में ऐसा क्या है कि मुझे मैं कंप्लीटली अपने को ट्रांसफॉर्म करूं यदि मेरे पास में सब तरह की जीवन जीने की सुविधाएं हैं तो मैं ठाकुर की तरह प्रचंड तपस्या क्यों करूं आइंस्टाइन की तरह इतना सारा मैं मेंटल एनर्जी किसी थ्यरी के डेवलपमेंट में क्यों व्यय करूं? मुझे क्या पड़ी है वह सब करने की? मैं जैसे हूं वैसे आनंद से रहूंगा। तो फिर क्या है कि यदि मैं आनंद से रहता हूं। मेरे ऊपर में कोई भयानक प्रेशर नहीं है। मैं अपने को ट्रांसफॉर्म नहीं करूंगा। यह ट्रांसफॉर्मेशन या तो इवोल्यूशन तभी संभव है जबकि मेरे पे भयानक प्रेशर क्रिएट होता है। तभी मैं अपनी लाइफस्टाइल को कंप्लीटली चेंज कर पाऊंगा। तो अभी देखिए कि इवोल्यूशन के समय में जो लोग जिंदा रहते हैं जो स्पीशीज या तो जो ऑर्गेनिज्म या तो जो ह्यूमन बीइंग उनको भयानक प्रेशर में चक्की में जैसे कि भगवान पिसते हैं और चक्की में पिसाई करके आखिर में ठाकुर वो गिरीश घोष को कहते हैं फेमस कहानी कि वह कटोरी में से लहसुन की बदबू कब जाएगी तो उसको अग्नि में तपाना पड़ेगा अग्नि में जलाना पड़ेगा तभी वह लहसुन की गंध कटोरी में से जाएगी। तो वैसे ही यह पिछले 1000 साल में यह इवोल्यूशनरी लिप लिया है मनुष्य सभ्यता ने। सिर्फ यहां पे ईस्टर्न और वेस्टर्न का नहीं है। मनुष्य सभ्यता ने दो इवोल्यूशनरी पैरेलली लिए हैं। वेस्टर्न हेमिस्फयर में उन्होंने साइंस और टेक्नोलॉजी को जन्म दिया है। ईस्टर्न हेमिस्फयर में स्पेशली भारत में स्पिरिचुअलिटी को उन्होंने सर्वोच्च लेवल पे लाके रखा है। निर्विकल्प समाधि श्री रामकृष्ण देव की निर्विकल्प समाधि तक लाके रखा है। तो ये दोनों इवेंट है। मान लीजिए कि यहां पे क्वांटम डायनेमिक्स है और रिलेटिविटी है और आज का एआई है। यहां पे ठाकुर है, मां है, स्वामी जी है और फिर रामकृष्ण संघ है। और फिर इस तरह से काफी संस्थाएं आजकल अच्छी चलती है। तो देखिए कि ये दो कलमिनेशन तक पहुंचने के लिए हमको भयानक एक तरह से कहे कि प्रेशर में से प्रेशर कुकर में से ये भट्ठी में से गुजरना पड़ा था। अम अह वेस्टर्न कंट्रीज़ में देखिए वहां पे कहीं कम कष्ट नहीं हुआ है। प्रत्येक अह 30-40 साल पे बड़ा युद्ध हुआ है। यह नेपोलियनिक वॉर्स है। ये अमेरिका में देखिए सिविल वॉर है। ये यूरोप में बाद में देखिए कि ये कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन है। उसके बाद में देखिए फर्स्ट वर्ल्ड वॉर है। सेकंड वर्ल्ड वॉर है। उनको कोई कम कष्ट नहीं हुआ है। ऐसा नहीं है कि उनको सब कुछ बैठे-बैठे सब कुछ मिल गया है। यह जो एज ऑफ़ नेविगेशन प्रारंभ हुआ था पूरे पृथ्वी के समंदरों को छानबीन करते हुए उन्होंने जो जहाज भेजे थे तो वह भी तो कितना बड़ा कष्ट था कि अनचार्टेड टेरिटरी में आप उस समय के लकड़ी के जहाज लेके जा रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि उस समय के जो जहाज जाते होंगे समुंदर में उसका सक्सेस रेट कोई 30 40% से ज्यादा होगा। इस अर्थ में 10 जहाज जाते हैं तो उसमें से पांच या छह तो वहीं पे समुंदर में ही पेरिश हो जाते होंगे। या तो पायरेट्स अटैक करेंगे या तो फिर यह कहीं चट्टान के साथ में टकरा गए या तो कहीं वह तूफान में फंस गए और तहसनहस हो गया। ये टाइटेनिक का उदाहरण जग जाहिर है। वो बर्फ के साथ में टकराया और ज्यादातर लोग पानी में डूब गए। तो क्या है कि यह भी तो उनका कष्ट तो कोई कम कष्ट नहीं है। मेहनत करके, परिश्रम करके, पसीना बहा करके उन्होंने यह इवोल्यूशन किया है। तो देखिए कि एक प्रचंड प्रेशर कुकर में एक भयानक तपती हुई ये अग्नि की ज्वाला के भीतर में ये नेचर ने प्रकृति ने या तो भगवान ने ये दोनों सिविलाइजेशन को फेंका है। इन दोनों सिविलाइज़ेशन का कलमिनेशन है उन लोगों के पास में साइंस और टेक्नोलॉजी और हमारे पास में है यह स्पिरिचुअलिटी स्पेशली एस रिफ्लेक्टेड इन द लाइफ्स ऑफ़ ठाकुर मां स्वामी जी। तो देखिए कि ये ठाकुर मां स्वामी जी रूपी जो स्पिरिचुअलिटी जो हमको एक वेल्थ मिली है ये 1000 साल की ये जो तपस्या है, कष्ट है, इसका यह पर्पस था। यह नहीं होता तो आज ठाकुर मां स्वामी जी का जन्म नहीं होता। एक प्रचंड प्रेशर कुकर, एक भयानक भट्ठी प्रकट नहीं होती कि इस भट्ठी में तप करके यह तीन जो स्पिरिचुअल जॉइंट से वो प्रोड्यूस हुए हैं वो नहीं होते। तो अभी तक भारत के साथ में जो हुआ वो इसके पीछे एक पर्पस था और पर्पस था ठाकुर मां स्वामी जी को प्रोड्यूस करने का। तो अभी फ्यूचर क्या होना चाहिए? क्या जिस भठी में से हम गुजरे हैं उसी सिचुएशन को उसी परिस्थिति को फिर से कंटिन्यू करना है कि मिलिटरीली पॉलिटिकली हम लोग बिल्कुल ही जैसे कि खत्म हो चुके थे किंतु हम लोग अपनी प्राणशक्ति जो है पूरी स्पिरिचुअलिटी में डाल दी थी। क्या इसी सिचुएशन को फिर से कंटिन्यू करना है? मुझे लगता है माय मेरा एनालिसिस जो है कि यह जो दो ब्रांचेस है ना वेस्टर्न ब्रांच जो कि एक्सक्लूसिवली साइंस टेक्नोलॉजी डेवलप की है और ईस्टर्न इंडियन ब्रांच जिसने कि एक्सक्लूसिवली स्पिरिचुअलिटी को डेवलप किया है। मुझे लगता है कि नाउ इट्स टाइम टू हील द गेट। यह जो दो ब्रांच को मिला देने का संगम करने का समय आ चुका है। एक नया सिविलाइजेशन प्रोड्यूस हो जिसमें कि ये इंडियन स्पिरिचुअलिटी और ये वेस्टर्न साइंस दोनों एक साथ-साथ में चले। जैसे कि हमारा जो फ्रेमवर्क है ठाकुर मां स्वामी जी तो ठाकुर रिप्रेजेंट्स एनर सर्च। मनुष्य की जो कॉन्शियसनेस है जीव ब्रह्म ऐ सर्वोच्च आध्यात्मिक तथ्य है, सत्य है, उसको प्रूव करना, उसको रियलाइज करना। ये जो मनुष्य का जो इनर स्पिरिचुअल स्ट्रगल है उसको ठाकुर रिप्रेजेंट करते हैं। ये जो कम्युनिटी लाइफ है कि किस तरह से अपने रिलेटिव्स हैं, फ्रेंड्स है, कलीग्स है, क्लासमेट है, बैचमेट है, नती है, ऑफिस के वर्कर्स है उन लोगों के साथ में वन टू वन जो इंटरेक्शन जो होता है वो किस तरह से करना दैट रिप्रेजेंट्स बाय मां शारदा। और स्वामी जी का है कि यह सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट कि यह राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन क्यों होता है? कैसे होता है? तो इसके साथ में ही यह जो सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट है उसी में हम यह साइंस एंड टेक्नोलॉजी को भी जोड़ दें तो भी देखिए कि एक कंप्लीट होल हमको मिलता है। यहां पे ठाकुर का स्पिरिचुअलिटी मां का ये सोशल कम्युनिटी लाइफ और ये स्वामी जी का अंडरस्टैंडिंग ऑफ राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन। इन तीनों को कंबाइन करके एक नया सिविलाइजेशन बने व्हिच एक्सेस इन एवरीथिंग। कि जिस तरह से स्पिरिचुअल अथॉरिटी उसके पास में है, मोरल अथॉरिटी उसके पास में है, वैसे ही उसके पास में यह मॉडर्न टेक्नोलॉजी भी है। देखिए, आप प्रश्न एक हो सकता है। अभी जैसे कुछ समय पहले हमने वो जो एज ऑफ डिस्क्लोज़र ये जो डॉक्यूमेंट्री है उसके बारे में हमने चर्चा की थी कि इस इस तरह के एविडेंस है कि दूसरे ग्रह से लोगों ने आकर के किसी एलियंस ने आकर के भारत की पृथ्वी की मुलाकात ली हो। इस तरह की वो पॉसिबिलिटीज है। सही कितना, गलत कितना, मिसइफेशन कितना, लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास कितना वो तो नहीं पता। किंतु अभी इस तरह का डॉक्यूमेंट्री बना है और अमेरिका के जो इतने नाम किए हुए लोग उसमें बोल रहे हैं कि हां कुछ ना कुछ एविडेंस है इस तरह के। तो लेट अस फॉर वन मोमेंट बिलीव कि हां दूसरे ग्रह पे जीवन होगा और वहां पे भी इस तरह की एडवांस टेक्नोलॉजी होगी। एडवांस टेक्नोलॉजी होगी बोल के ही तो वो इतने लाइट इयर्स क्रॉस करके पृथ्वी पे आ पाए हैं। सो लेट अस इमेजिन कि इस तरह का कोई सिनेरियो है तो यदि इस तरह के कोई स्पीशीज एलियंस है पृथ्वी पे हमला करें तो हमारे पास में इस तरह का एक सिविलाइजेशन होना चाहिए जिसके पास में स्पिरिचुअल पावर भी है और ये मटेरियल पावर भी है इस तरह के एलियंस का सामना करने के लिए ये तो एक प्रश्न है एक तो एक पॉइंट है दूसरा मेरे पास में एक दूसरे कांसेप्ट को मैं रिसेंटली डेवलप कर रहा हूं रहा हूं। इस
Ethics filter: तकनीक के शिखर पर पहुँचे, पर नैतिकता खो दी—तो विनाश तय
कांसेप्ट को मैं नाम देता हूं एथिक्स फ़िल्टर। अभी यह साइंस फ़िक्शन का कांसेप्ट है और यह मेरा ओरिजिनल नहीं है। मैंने इंडिपेंडेंटली सोचा है इसके बारे में किंतु रिसर्च करते-करते पता चला कि दूसरे लोगों ने भी इस तरह के कांसेप्ट के बारे में सोचा है। तो एनीवे ये जो कांसेप्ट मैं डेवलप कर रहा हूं, इसका मैंने नाम दिया है एथिक्स फिल्टर। अभी जैसे मैंने कहा कि यह कांसेप्ट इज़ नॉट एक्सक्लूसिव टू मी। दूसरे लोगों ने भी इसको डेवलप किया है। एक वर्जन ऑफ दिस कांसेप्ट डेवलप किया है। अभी मैंने थोड़ा रिसर्च करके उनके कांसेप्ट को देखा। उन्होंने किस तरह से इसको डिफाइन किया है। तो वो उन्होंने अपने हिसाब से किया है। मैं अपने हिसाब से जो मैंने डेवलप किया है वो मैं बता रहा हूं। व्हाट इज द मीनिंग ऑफ़ दिस एथिक्स फिल्टर? मुझे ऐसा लग रहा है कि मान लीजिए ईश्वर या तो फिर कोई एक सुपर कॉन्शियसनेस है। अ कॉस्मिक कॉन्शियसनेस है। तो ये कॉस्मिक कॉन्शियसनेस एक तरह का फिल्टर बनाती है। ये फिल्टर का अर्थ क्या है? आपने ये कंप्यूटर के लैंग्वेज में फिल्टर देखा होगा तो बहुत सारा डेटा है। जैसे कि आप एक्सेल में फिल्टर करते हैं डेटा को। अ मुझे कहना है कि मेरे पास में डेटा है पिछले 1 महीने का। तो 1 महीने के डेटा में से मुझे सिर्फ आज की डेट में जो इंफॉर्मेशन है वही देखनी है। डेट वाइज मुझे फिल्टर करना है। तो मैं फिल्टर में डेट इक्वल्स टुडे करूंगा। तो डेटा फ़्टर हो जाएगा। पिछले 30 दिन का जो इंफॉर्मेशनेशन है उसमें से सिर्फ आज का इंफॉर्मेशनेशन दिखेगा। बाकी का फ़्टर आउट हो जाएगा। इसको फ़िल्टर कहते हैं कि बहुत सारा डाटा में से एक ही कुछ-कुछ हमको फ़्टर करके देखना है। जैसे कि ये आप कोई भी ये ई-कॉमर्स की वेबसाइट पे जाएंगे। मोबाइल आपको परचेस करना है तो मोबाइल को आप स्पेसिफिकेशन के अनुसार फ़िल्टर करेंगे। अब जैसे मैं कहूंगा कि मुझे मेरा एज बजट है 10,000 के भीतर का या 15,000 के भीतर का। तो मुझे 10 से 15,000 के बीच वाले मोबाइल दिखाओ। ऐसा करके मैं जैसे प्राइस रेंज फ़्टर करूंगा तो उतना ही मोबाइल दिखेंगे जो कि 10,000 से 15,000 के बीच में है। इसके बाद में मैं कहूंगा कि मुझे कैमरा का क्वालिटी अच्छा चाहिए। एटलीस्ट 40 मेगापिक्सल इतना कैमरे का क्वालिटी चाहिए। तुम्हें जैसे कैमरा की क्वालिटी पे फ़्टर मारा तो फिर इतना ही मोबाइल दिखेंगे जो कि ये 10,000 से 15,000 के बीच में है और कैमरे का क्वालिटी इतना है। तो ऐसा करके करके फ़्टर करते-करते मैं चारप रिजल्ट पे आ जाऊंगा जिसमें से कि मैं एक मोबाइल सेलेक्ट करूंगा। तो ये फ़्टर का बेसिक मीनिंग है। अब ये एथिक्स फ़िल्टर क्या है? अब जैसे मान लीजिए कि जितनी भी स्पीशीज है पूरे विश्व ब्रह्मांड में मान लीजिए कि दूसरे ग्रह पर भी जीवन है वहां पर भी ये कोई ना कोई ऑर्गेनिज्म या तो कोई ना कोई स्पीशीज इवॉल्व हुई है। जैसे कि पृथ्वी पे एक स्पीशीज इवॉल्व हुई है। ह्यूमन स्पीशीज तो दूसरे ग्रहों पे भी कोई ना कोई स्पीशीज इवॉल्व हुई है। अभी ये कॉस्मिक एथिक्स फिल्टर है। वो क्या करता है? एक लेवल पर सिविलाइजेशन जब आ जाता है या स्पीशीज आ जाता है टेक्नोलॉजिकल लेवल पर उसके बाद में ना यह एक एक तरह का उनके मन के भीतर में भ्रम प्रकट कर देता है। उनके मन के भीतर में कुछ विकार प्रकट कर देता है और इस विकार के मारे ये लोग आपस में लड़ना शुरू करते हैं और लड़ते लड़ते वे लोग खत्म हो जाएंगे। अभी कौन बचेगा इसमें से? जब मन में विकार प्रकट किया गया है उस समय इस विकार के सामने जो लोग जीत पाए जो लोग इस मन के जो प्रॉब्लम्स है मन के भीतर में ये काम कांचन रूपी विकार प्रकट हुआ है ये अष्टि षडरिपु रूपी जो विकार प्रकट हुआ है अष्टपाश रूपी जो विकार है पंच कक्लेश रूपी जो विकार है वो जैसे ही मन में प्रकट होता है तो उसके सामने यदि मैं लड़ पाऊं इस विकार के सामने जीत पाऊं तो फिर मैं यहां पर टिक पाऊंगा। वरना तो फिर क्या होगा कि मैं पैसों के पीछे में, धन दौलत के पीछे में, पावर के पीछे में, ये ऑयल के पीछे में आजकल ना कि ये माइक्रोपर के पीछे में इस तरह से यह रेयर अर्थ मिनरल है। इस सबके पीछे मैं इस तरह से अंधा होकर के दौडूंगा कि फिर यह ऑयल एक्सट्रैक्ट करने के लिए ना कि ये रेयर अर्थ मेटल एक्सट्रैक्ट करने के लिए या तो फिर ये मिलिट्री डोमिनेंस बिठाने के लिए मैं सबके साथ में युद्ध चालू कर दूंगा और ये युद्ध है जो कि इन टर्न मुझे भी खा जाएंगे। ये हिटलर ने युद्ध तो किया यूरोप के जितने भी कंट्रीज है उसके साथ में आखिर में देखिए कि जर्मनी के साथ में क्या हुआ एक समय था जबकि एक-एक रात में एक 1000 बमबर प्लेन जर्मनी में आकर के बॉम्बिंग करते थे। बम बरसाते थे। जस्ट इमेजिन कि 1000 बमबर्स आकर के आपके ऊपर में अटैक करते हैं। क्या हालत होगी उस देश की? एक-एक एक सिटी पे 1000 बमबर आकर के पूरी रात भर बम बरसाए। है वो भी इंस इंसेडियरी अर्थात कि ये जो अग्नि जलाते हैं इस तरह के बम पूरा सिटीज आफ्टर सिटीज जला के राख कर दिया था जापान के साथ में भी ऐसा ही हुआ एटम बम तो फेंका ही गया किंतु इससे पहले इंसडियरी बम्स फेंके थे ये टोक्यो के ऊपर में तो टोक्यो तो लकड़ी का बना है तो ये अग्नि प्रकट करने वाले बम फेंके तो आधा टोक्यो ऑलमोस्ट पूरा टोक्यो जल के राख हो गया था तो क्या है युद्ध चालू करना तो आसान है कोई गारंटी नहीं है कि आप ही जीतेंगे मार भी खा ले वो भी हो सकता है। तो क्या है सिविल वॉर या तो फिर वॉर के भीतर में लोग लड़ के मर जाएंगे। यानी कि यह एथिक्स फ़िल्टर क्या है? कि टेक्नोलॉजी के एक लेवल पर जब हम पहुंच गए तो यह कॉस्मिक इंटेलिजेंस है वो यह षड रिपु का एक बीज जो है इन लोगों के भीतर में छोड़ देती है। वैसे तो षडरी है वो सबके भीतर में होते ही होते हैं। किंतु यह जो कॉस्मिक इंटेलिजेंस एक लेवल पे पहुंचने के बाद में स्पीशीज़ के टेक्नोलॉजिकल एक लेवल पे पहुंचने के बाद में इस तरह से उनके भीतर में ये विकार प्रकट करती है कि ये लोग अंधे होकर के युद्ध की ओर आगे बढ़ते हैं। उस समय इन लोग बिकॉज़ कि इनके पास में टेक्नोलॉजिकल स्ट्रेंथ इतना है। अभी जैसे कि न्यूक्लियर वेपन है। अभी ये उन्होंने न्यूक्लियर वेपन फेंकना शुरू कर दिया एक दूसरे के सामने। दैट मींस कि संपूर्ण सिविलाइजेशन खत्म हो गई। यानी कि यह फिल्टर करता है। यह कॉस्मिक इंटेलिजेंस है ना स्पीशीज को फिल्टर करता है। जिस स्पीशीज के पास में ये मोरल स्ट्रेंथ नहीं होगी ना वे लोग ये न्यूक्लियर थ्रेशहोल्ड से आगे ही नहीं बढ़ पाएंगे। जैसे ही न्यूक्लियर वेपन डेवलप किए वैसे ही उनके भीतर में ये विकार फेंको। यदि वो विकार को जीत पाए तो फिर उनको इवोल्यूशन के नेक्स्ट स्टेज तक जाने दो। यदि वह विकार को जीत नहीं पाते हैं तो उनको वहीं पे खत्म कर दो। किंतु यह कॉस्मिक इंटेलिजेंस खुद हमको खत्म करने को नहीं आएगी। हम ही लोग आपस में हमारी ही टेक्नोलॉजी से एक दूसरे का गला काटेंगे। तो इसको मैं कहता हूं एथिक्स फिल्टर। ऐसी ही सिविलाइजेशन इवॉल्व होगी एक लेवल के बाद में जो सिविलाइजेशन जो स्पीशीज एक मोरल फाइबर डेवलप करती है। एक कैरेक्टर डेवलप करती है। एक मोरल अथॉरिटी डेवलप करती है। एथिक्स और मोरालिटी इनके भीतर में होती है। तभी इस तरह की सिविलाइजेशन या इस तरह की स्पीशीज इवोल्यूशन के नेक्स्ट स्टेप को ले पाएगी। वरना क्या होगा कि प्रत्येक स्टेप पर इवोल्यूशन के प्रत्येक स्टेप पर आप देखेंगे कोई ना कोई एक्सटिंशन इवेंट होता है जो कि उस स्पीशीज को खत्म कर देता है। आप पृथ्वी का एक्स इवोल्यूशन का हिस्ट्री पढ़ेंगे ना तो पता चलेगा कि पांच ना छह मेजर एक्सटिंशन इवेंट हुई है। एक्सटिंशन का अर्थ क्या है? पूरा पूरा स्पीशीज साफ हो गया है। अभी इसके पीछे का रीजन कुछ भी हो सकता है। मिटराइट स्ट्राइक हो सकती है ना कि यह क्लाइमेट चेंज हो सकता है ना कि कुछ भी हो सकता है। किंतु पांच से छह बार मेजर एक्सटिंशन इवेंट पृथ्वी पे हुए हैं। यह एक्सटिंशन इवेंट का अर्थ है कि जो स्पीशीज यह बदलते समय के साथ में कदम ना रख बढ़ा पाए तो उसका एक्सटिंशन हो जाएगा और वो दूसरी जो स्पीशीज है जो कि एडवांस हो रही है समय के साथ में उसको फैलाने के लिए जगह तैयार कर देगा। यानी कि ऐसा नहीं है कि जो इवोल्यूशन चल रहा है सबको समान एक अधिकार मिलते हैं। ऐसा नहीं है। आपको समय के साथ में एथिक्स और मोरालिटी को अपनाना होगा। इवॉल्व होना होगा। यदि नहीं हुए तो एक्सटिंशन आपके सामने है। सो दिस इज़ माय थ्यरी। दो थ्यरी है बेसिकली। बेसिकली एक ही थ्यरी है एथिक्स फिल्टर वाली। और यह एथिक्स फ़िल्टर वाली थ्यरी हमको क्या कहती है कि यह है कि हमने साइंस और टेक्नोलॉजी को भी डेवलप किया। स्पिरिचुअलिटी को भी डेवलप किया। भारत का पिछले 1000 साल का जो हमारा कष्ट था, गुलामी थी उसके पीछे एक पर्पस था। और वो पर्पस था स्पिरिचुअलिटी को डेवलप करने का। ये जो विदेश में वॉर एंड सिविल वॉर होती रही उसके पीछे एक पर्पस था साइंस और टेक्नोलॉजी को डेवलप करने का। अभी देखिए कि भारत के सामने मिशन है यह साइंस, टेक्नोलॉजी और स्पिरिचुअलिटी दोनों को इकट्ठा करने का। किंतु ये इकट्ठा होने के बाद में ना ये एथिक्स फिल्टर वाला इवेंट खड़ा होगा। ऑलरेडी आप देखिए कि अमेरिका के साथ में क्या हो रहा है। ये विकार जो है वहां पे प्रकट हो गया है। क्योंकि वो इवोल्यूशन के एक स्टेप पे जाके पहुंचा है। सोवियत यूनियन के साथ में वही हुआ। सोवियत यूनियन डिसइीग्रेट हो गया। जर्मनी के साथ में वही हुआ। जर्मनी थर्ड रैंक माने हिटलर का जर्मनी वो जर्मनी डिसइीग्रेट हो गया। आज अमेरिका के साथ में वही हो रहा है। एक लेवल पर पहुंच गया है। तो लेवल पर पहुंचने के बाद में एथिक्स फिल्टर लगेगा। यानी कि उनके भीतर में विकार प्रकट होंगे। अभी वो विकार को जीत लेते हैं इनर पावर से तो वो सिविलाइजेशन और एक नेक्स्ट स्टेप पे इवॉल्व होगी। और यदि नहीं जीतते हैं पागल की तरह युद्ध करने में लग जाते हैं तो वह सिविलाइजेशन जो है डिसइीग्रेट हो जाएगी। उसके बाद में भारत का नंबर आएगा क्योंकि भारत नेक्स्ट है। हम लोग उस लेवल पे धीरे-धीरे पहुंच रहे हैं। हमारे ऊपर में जब यह एथिक्स फ़िल्टर लगेगा तो फिर हम पागल की तरह अंधे हाथी की तरह मदमस्त हस्ती की तरह अपने जो पड़ोसी है दूसरे देश है उनपे अटैक करेंगे ना कि वी विल ट्रांसेंड दैट एथिक्स फ़िल्टर। अभी देखिए ठाकुर मां स्वामी जी के आने का प्रयोजन ही यही है कि एटलीस्ट भारत को सिलेलेक्ट कर दिया गया है इस एथिक्स फ़िल्टर को क्रॉस करने का जिससे कि हम ये इवोल्यूशनरी नेक्स्ट स्टेप ले पाए। तो मुझे ऐसा लग रहा है कि ये जो पिछले 1000 साल की गुलामी थी इसका एक पर्पस यह सॉल्व होता है कि ये जो एथिक्स फ़्टर हम पे लगेगा जब तो उसको हम क्रॉस कर पाएंगे। क्योंकि हमारे पास में स्पिरिचुअल मोरल फाइबर कैरेक्टर इतना स्ट्रांगली हमने डेवलप कर दिया है कि मुझे नहीं लगता कि ये विकारों के फंदे में फंस के भारत देश ऐसा कोई कदम ना उठा ले नहीं उठाएगा जो कि भारत देश को खत्म कर देगा जो कि हमने पृथ्वी पे बार-बार होते हुए देखा है। ये इंपीरियल जापान ये थर्ड रक हिटलर का ये सोवियत यूनियन है। ऐसे कितने ही देश है। पाकिस्तान की हालत देखिए। अमेरिका अभी ये एथिक्स फिल्टर के कुछ झपट में आ रहा है। ऐसा दिख रहा है। सो देखिए कि दिस इज़ माय थ्यरी। ये मैंने डेवलप की है। क्योंकि देयर हैज़ टू बी सम रीज़ कि पिछले 1000 साल में क्या हुआ? ठाकुर मां स्वामी जी के आने का अर्थ क्या था? भविष्य क्या है? और सिर्फ भविष्य हमको भारत ना भारत का नहीं देखना। भविष्य हमको सिर्फ पृथ्वी का भी नहीं देखना। मैं कहता हूं कि आत्मन यदि टाइम और स्पेस के परे है तो व्हाई कैन व्हाई डू वी थिंक एनीथिंग बिलो दैट माने मैं ऐसा अपने विचारों को ये जो जियोग्राफिकल लिमिटेशन है उसमें बांध के क्यों रखूं यदि मेरी आत्मा जो है वो जियोग्राफी की किसी भी लिमिटेशन के परे है तो फिर व्हाई शुड आई बाइंड माय इमेजिनेशन ओनली टू दिस जियोग्राफिकल टाइम पीरियड व्हाई कैन नॉट आई एक्सपैंड माय इमेजिनेशन थ्रूआउट द कॉस्मोस टू अंडरस्टैंड हाउ दिस कॉस्मोस वर्क्स हाउ दिस कॉस्मिक प्रिंसिपल्स कोपरेट। तो इस पूरे जो चर्निंग चल रहा था मेरे माइंड में उसमें से मैंने ये कांसेप्ट डेवलप किया है एथिक्स फिल्टर का। अभी इस थ्यरी को लगा के आप एटलीस्ट पृथ्वी का इतिहास रिसेंट हिस्ट्री आप देखिए कि हर समय ऐसा ब्रिटेन। ब्रिटेन को आप देखिए भारत पे राज कर रहा था। ब्रिटेन के बारे में कहा जाता था कि सन नेवर सेट्स ऑन ब्रिटिश एंपायर। ब्रिटिश एंपायर पे सूर्यास्त कभी होता नहीं है। क्यों? क्योंकि आज ब्रिटेन में माने इंग्लैंड में यदि सूर्यास्त हुआ तो हांगकांग और भारत में सूर्योदय चल रहा है। दो दोपहर चल रही है। आज भारत या हांगकांग में यदि सूर्योदय रात है तो कहां वो अमेरिका है ना कि ये साउथ अफ्रीका है ना वहां पे कहीं दिन चल रहा है। यानी पूरी पृथ्वी को घिरा हुआ ब्रिटिश एंपायर था बोल कर के एक पूरे ब्रिटिश एंपायर में एक साथ में सूर्योदय सूर्यास्त कभी नहीं होने वाला। आज देखिए वही ब्रिटिश एंपायर मध्य रात्रि में चला गया है। ब्रिटिश एंपायर डिसइीग्रेट हो गया है। तो क्यों? क्योंकि इन लोगों के ऊपर में जब एथिक्स फिल्टर लगा उन लोगों में वो मोरल कैपेसिटी नहीं थी। स्पिरिचुअल स्ट्रेंथ नहीं थी कि वे लोग वॉर है, रेवोल्यूशन है। फिर ये जेलसी है, ये जो पेटी माइंडेडनेस है उससे ऊपर हो के ये सिविलाइजेशन के इवोल्यूशन के नेक्स्ट स्टेप तक जा पाए। वो स्ट्रेंथ उनमें नहीं थी बोल के ब्रिटिश एंपायर डिसइीग्रेट हो गया। भारत के साथ में क्या होगा? जस्ट इमेजिन कि हम लोग वैसे तो डेवलप कर रहे हैं अपने को। एक समय आएगा कि हमने डेवलपमेंट के एक लेवल को अचीव कर लिया है। उसके बाद में अपने पर यह एथिक्स फिल्टर लगेगा। फिल्टर लगने के बाद में क्या हम लोग ब्रिटेन की तरह माने कॉलोनियल ब्रिटेन की तरह या तो फिर यह थर्ड रेक की तरह हिटलर के ना कि ये इंपीरियल जापान की तरह ना कि ये आजकल के अमेरिका की तरह मदमस्त हो के मदमस्त हस्ती की तरह हो के पागल की तरह लोगों पे हमला बुलाएंगे। लोगों का शोषण करेंगे। लोगों पे अत्याचार करेंगे। क्या ऐसा करेंगे और वी विल बिकम अ रिस्पांसिबल सुपर पावर एथिक्स मोरालिटी कैरेक्टर और स्पिरिचुअलिटी उसके आधार पे हम लोग अपना डेवलपमेंट करेंगे क्या होगा हमारे साथ मुझे लगता है आंसर इज वेरी क्लियर ठाकुर मां स्वामी जी आए हैं बोल के हम लोग ये जो नेक्स्ट एथिक्स फिल्टर है उसको तो क्रॉस कर लेंगे। सो दिस इज ऑल मैं बैठ के सोच रहा था। अभी यह तो ऑब्वियसली आप समझ रहे हैं कि स्पेककुलेशन ही है। किंतु फिर भगवान ने जो बुद्धि दी है उस बुद्धि का हम कहीं कुछ ना कुछ स्पेककुलेशन करने में यूज़ ना करें तो बुद्धि किस काम की? तो अभी नेक्स्ट हम अगले क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: बहुत दिनों तक हम आध्यात्मिक रहे, पर व्यावहारिक नहीं — इसी कारण हम लंबे समय तक गुलाम रहे। अब समय है दोनों का समन्वय करने का। यह कैसे होगा?
हां मैंने देखिए ठाकुर रिप्रेजेंट्स इनर स्पिरिचुअल लाइफ मदर रिप्रेजेंट्स कम्युनिटी स्वामी जी रिप्रेजेंट्स ह सिविलाइजेशनल स्ट्रेंथ तो ऑलरेडी ये ठाकुर मां स्वामी जी में कॉम्बिनेशन हो ही चुका है। हमको जैसे आपने कहा नेशनल कॉन्शियसनेस पे इस रियलाइजेशन को ज्यादा प्रोपगेट करना है। तो यू आर राइट। वो जो भी प्रणाम करता है ना तो एक फोटो देते हैं। मैं यदि फोटो है तो मैं बताता हूं आपको जस्ट मिनट। ये फोटो ठाकुर है मां है और पीछे में ये दोनों चरण है इनके। सो नाइस फोटो प्रॉब्लम ये है कि स्वामी जी मिसिंग है [हंसी] वो तीनों साथ में होने से अच्छा है किंतु इस तरह से जो भी अटेमप्ट है तीनों को सेपरेट करने का दैट इज व्हाट वी शुड अवॉयड दैट इज व्हाट आई थिंक ना देखिए मैं मेरा जिस तरह से मानना है कि तीनों भावों को लेना है ठाकुर के मां के और स्वामी जी के बस वही है कि यह बैक ऑफ द आवर माइंड क्लियर होना चाहिए कि तीनों एक्सक्लूसिव नहीं है। अब दिन के देखिए जीवन में ऐसे पड़ाव आते हैं कि हमको रिट्रीट करना अच्छा लगता है ये जगत की रिस्पांसिबिलिटीज से तो वो रिट्रीट कर लिया। अ फिर ऐसे समय आते हैं जबकि ये रिस्पांसिबिलिटी लेके काम करना है तो वो भी कर लिया। युद्ध के समय युद्ध कर लिया रिट्रीट के समय रिट्रीट कर लिया। सो यह जितने भी भाव है वह भले ही चाहे आपातत कंट्राडिक्टरी दिखे किंतु एक लाइफ टाइम में सभी भाव की आवश्यकता है। यदि ऐसा हम कहेंगे कि रिट्रीट करने की आवश्यकता ही नहीं। सब समय कर्म करते रहो वो भी तो हम लोग नहीं कर पाएंगे। अ ह्यूमन माइंड ले नहीं पाएगा। सो दैट इज नेसेसरी इन देयर प्लेस। दिस इज़ नेसेसरी इन इट्स प्लेस। दोनों का साथ में आवश्यकता है। अब जैसे खाना खाते हैं तो हम सिर्फ भात अकेला थोड़ी ना खाते। बाद में दाल मिलाते हैं, आचार लेते हैं, पापड़ लेते हैं, कढ़ी लेते हैं, सब्जी लेते हैं, मिठाई लेते हैं तभी तो पूरा खाना बनता है। तो खाने में ही यदि हमको इतना वैविध्य चाहिए तो भावों का तो हमारे जीवन में कितना वैविध्य चाहिए। कोई भी मनुष्य सिर्फ एक भाव लेकर के पूरा जीवन नहीं काट सकता। ठाकुर कहते हैं ना क्यों क्यों शहनाय शुद्ध पों आ जाए, अर्थात कि शहनाई का सिर्फ एक ही राग बजाते हैं। मैं तो सप्त राग रागिनी बजाता हूं। तो यह सभी भावों का संगम यह है ठाकुर का माने यह असली भाव। यह कहना कि उपनिषद के भाव का त्याग करो वो भी गलत है। और यह कहना कि सिर्फ उपनिषद ही सही है। यह भी गलत है। उपनिषद का भाव रखो। ये मायावती में रिट्रीट होती है। सुधीर महाराज करते हैं। वहां पे भी जाइए। और फिर घर आकर के किसी ब्रांच सेंटर में जाकर के वहां कर्म योग भी कीजिए। बोथ आर नेसेसरी फॉर आवर लाइफ। यह हमको क्लेरिटी रखनी है कि नन ऑफ देम आर म्यूचुअली एक्सक्लूसिव।
प्रश्न : पिछले कुछ समय से हम बहुत ज़्यादा धार्मिक हो गए हैं। अब हमें धर्म और वेदांत को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लाने की ज़रूरत है। we need to make it practical.
ओवरडीड व्हाई? क्योंकि हम जैसे हमने अभी डिस्कस किया कि वो आवश्यक था। एक्सट्रीम प्रेशर आवश्यक था जिससे कि उस इवोल्यूशनरी लेवल पे हम पहुंचे। तो दैट वाज़ वन पार्ट कि क्यों हुआ? पिछले 1000 साल का इतिहास क्यों इस तरह से हुआ? बिकॉज़ दैट वास नेसेसरी। तो ओके चलो वो तो हो गया सो हो गया। अभी उसका मोमेंटम चल रहा है। नो डाउट रामकृष्ण मिशन की स्थापना ही तो इस तरह से हुई है ना। और देखिए सिर्फ रामकृष्ण मिशन ही नहीं जैसे आपने ये प्रेमानंद जी के बारे में कहा तो बहुत सारे जो इस तरह के मोटिवेशनल स्पिरिचुअल स्पीकर है दे आर ट्राइंग टू प्रोपगेट दिस आईडिया। तो बात सही है। देखिए आपको भी अपने लेवल से जो कुछ बन पड़ता है करना है क्योंकि सिर्फ हमारे पर तो यह रिस्पांसिबिलिटी डालने से नहीं चलेगा। अब जैसे उस दिन हमारी बात हुई थी ये किताबें छोटी-छोटी है अपने घर में रखनी है। वी हैव टू डिस्ट्रीब्यूट देम। राइट? अभी ये मुनमुन ने अच्छा एक प्रयास किया है किताब छापने का। गुड वेरी गुड। व्हाटएवर हम सबसे देखिए पूरे समाज का रिस्पांसिबिलिटी कि ये आप किसी एक इंडिविजुअल या ऑर्गेनाइजेशन पे डाल देंगे। इट इज नॉट गोइंग टू वर्क। सो हां एफिशिएंसी इन गवर्नेंस सबसे इंपॉर्टेंट है। आप एफिशिएंसी इन गवर्नेंस नहीं होगी तो अल्टीमेटली कुछ नहीं होगा। और यदि गवर्नमेंट एफिशिएंटली गवर्नमेंट ऑर्गन्स एफिशिएंटली वर्क करते हैं तो प्रत्य अभी जैसे कि एकेडमिया है, कॉलेज है। मैं यहां पे बीच-बीच में कॉलेज में जाना होता है। तो मुझे देख के ना निराशा ये होती है कि लड़कों में उत्साह तो बहुत है। मैं जब फुल ऑफ लाइफ ये स्टूडेंट्स को देखता हूं। किंतु कितने कॉलेज है जो कि कुछ एक्चुअल कंट्रीब्यूट कर पाते हैं। विदेश में आप देखेंगे ना प्रत्येक कोई बड़ी-बड़ी कॉलेज जो होती है तो नोबेल प्राइज विनर्स की पूरी लाइन लग जाती है कि हमारे कॉलेज ने इसको प्रोड्यूस किया, इसको प्रोड्यूस किया। फिर ये एमआईटी का ये मीडिया लैब है। इट्स अ स्टोरीड इंस्टीट्यूशन कि इतने सारी इनोवेशंस वहां से हुई। इतने सारे रिसर्च पेपर कंट्रीब्यूट किए गए। अपना एकेडम या हायर एजुकेशन सिस्टम है ना इट्स अ कंप्लीटली रिडल विथ इनफिशिएंसी ना ही कोई ओरिजिनल रिसर्च माने बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी म हजारोंज़ों स्टूडेंट पढ़ रहे हैं क्या पढ़ रहा है क्या [गला साफ़ करने की आवाज़] आउटपुट है कुछ नहीं है वो चाइना का वो सिंगुआ यूनिवर्सिटी है देखिए एक के बाद एक रिसर्च पेपर कंट्रीब्यूट कर रहा है अभी तो रिसेंटली एक स्टैटिस्टिक्स पढ़ा माने चाइना एआई फील्ड में जो रेफरल जर्नल्स है वो वो देश लेवल की वो विलेज लेवल की वो स्ट्रीट लेवल की जर्नल नहीं रेफरल लेवल्स जो जर्नल है नेचर है वगैरह माने पूरे विश्व का जितना आउटपुट है एआई पेपर्स में इससे ज्यादा चाइना का है। जस्ट इमेजिन सो [हंसी] इंडिया इस पूरी रेस में कहीं नहीं है। बिकॉज़ ऐसा नहीं है कि अपने स्टूडेंट्स में क्षमता नहीं है। अपने इंस्टटशंस रिडल विद इनक्रेडिबल मासिव इनफिशिएंसी। ओम