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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 29 Jan 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का लाइव हम लोग देख रहे थे ठाकुर की महासमाधि के बाद में वराह नगर मठ की स्थापना हो चुकी है और जो मुख्य-मुख्य इंसिडेंट थे प्रारंभिक दिनों के कि आठपुर जाकर के क्रिसमस युव के दिन वो धूमि प्रज्वलित करके वो रात्रि के आकाश में महानिशा में वो खुले प्रांतर में बैठकर के वो जो त्याग और सेवा और समर्पण और संघ होकर कार्य करना यह आदर्श गुरु भाई ने स्वीकार किया। वह एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट टर्निंग पॉइंट माइलस्टोन है अपनी हिस्ट्री में। उसके बाद में देखा कि कोलकाता आकर के विजा होम किया है। सभी गुरु भाइयों ने विधिवत सन्यास ग्रहण किया है। वह हमने देखा और उसके बाद में अभी धीरे-धीरे करके देखिए कि वह जो कुछ साल कि स्वामी जी वराह नगर मठ में रहे। ठाकुर की महासमाधि से लेकर के 1886 से प्रारंभ करें। तो 1889 तक स्वामी जी वहां पर रहे हैं। दो-तीन बार वह यात्रा के लिए गए हैं। किंतु वह हर समय वापस आ चुके। किंतु फिर जो आखिर में मां का आशीर्वाद लेकर के उन्होंने जो प्रवरज्या प्रारंभ किया वह सीधा वह रिटर्न आए थे अमेरिका से वापस आने के बाद में। तो यह जो पीरियड है हम यहां पर डिस्कस कर रहे हैं। वराह नगर मठ के दिनों की घटनाएं। यह वह पीरियड है जबकि स्वामी जी मोर और लेस परमानेंटली मठ में रहे हैं। बीच-बीच में उनके घर में जो एक रिस्पांसिबिलिटी था एक तो कोर्ट केस चल रहा है। फिर मां और भाइयों और बहनों को खाने की तकलीफ है। उनकी संभाल रखने वाला कोई नहीं। तो वह सब देखने के लिए स्वामी जी को कभी-कभी घर जाना पड़ता था। और यह जो नॉर्थ इंडिया पिलगिरी में बीच-बीच में भागलपुर है। फिर वहां पर स्वामी जी जो गए थे काशी वगैरह तो वह कुछ दिन बात करके ज्यादातर समय तो स्वामी जी मठ में ही रहे हैं। बड़ी सुंदर घटनाएं हैं उस समय की। अनफॉर्चूनेटली उस समय की घटनाओं का कोई ज्यादा विवरण हमको नहीं मिलता है। स्वामी जी एक बार जब मठ छोड़कर के निकलेंगे और फिर जो पत्र लिखना प्रारंभ करेंगे प्रमदादास मित्रा को या फिर इस तरह से उसमें कुछ-कुछ उन दिनों का जो संघर्ष है गुरु भाइयों का उसका एक आभास हमको मिलता है। अदर देन दैट हमको पता है कि यह वीरजानंद जी वगैरह जो सेकंड जनरेशन ऑफ़ मक्स उन्होंने जब आना प्रारंभ किया तब कहीं जाकर के फिर से एक डिटेल इंफॉर्मेशन हमको मिलता है। तो अनफॉर्चूनेटली यह जो क्रूशियल डेज़ थे क्रुसिबल मैं बेलूर मठ से आई थिंक बेलूर मठ से ही एक किताब पब्लिश हुई है। वराह नगर मठ के बारे में क्रुसिबल ऑफ़ रामकृष्ण ऑर्डर मोस्ट प्रोबेबबली ऐसा ही कुछ टाइटल है। तो देखिए कि रामकृष्ण

रामकृष्ण मिशन अहंकार को कुचलने वाली मशीन है।

संघ का जो पूरा फाउंडेशन है। ऑफ़ कोर्स संघ का फाउंडेशन तो ठाकुर की तपस्या ठाकुर का अवतारत्व है। मां शारदा की कृपा मां शारदा का जगदंबा स्वरूप है। वह तो संघ का फाउंडेशन है। उसमें कोई प्रश्न नहीं है। किंतु यह जो इंस्टीट्यूशनल लाइफ जो है साथ में मिलकर के रहना जब साथ में मिलकर के आप रहते हैं तो देखिए कि मैं मेरा जो एक ऑब्जरवेशन है रामकृष्ण मिशन है ईगो क्रशिंग मशीन अभी जैसे कि मोस्टवे प्रेसिडेंट महाराज यहां पे आए थे तो सभी साधुओं का कुछ ना कुछ ड्यूटी होता है आश्रम का इसको यह करना है उसको यह करना है वगैरह अभी आप 10 लोग जब साथ में मिलके काम करेंगे और एक हाई प्रेशर एनवायरमेंट में क्योंकि मोस्ट रिवेट प्रेसिडेंट महाराज का इस सेंटर में आगमन मोर देन 30 इयर्स 30 साल से भी ज्यादा समय के बाद में हुआ है। लास्ट टाइम प्रेसिडेंट महाराज आए थे अपने संघ के जबकि यहां के मंदिर का क्सिक्रेशन हुआ था। इसके बाद में अपने संघ के संघ गुरु इस आश्रम में पधारे हैं। तो एक मेंटल प्रेशर रहता है। एक अपेक्षा रहती है सबकी कि यहां पर हमको बेस्ट फुट फॉरवर्ड हमको बेस्ट अपना दिखाना है विशाखापट्टनम आश्रम का कि संघ गुरु जब आते हैं तो उनको भी लगे कि हां आश्रम व्यवस्थित एफिशिएंटली इफेक्टिवली चल रहा है। तो वह एक प्रेशर भी होता है। तो इस प्रेशर में और जितने भी साधु होते हैं हाईली टैलेंटेड होते तो हाईली टैलेंटेड यंग सब ये साधु एक साथ में काम करेंगे तो कहीं ना कहीं ईगो क्लेश होने ही वाला है तो उस समय कि मेरा यह स्टेटस है मेरा यहेंस है मुझे यहेंस क्यों नहीं दिया गया ऐसा बोलकर के यदि कोई नाराजगी व्यक्त करेगा कोई झगड़ा करेगा तो क्या है कि एक तो अपना खुद खुद का जो है साधु लाइफ उस अपना जो आध्यात्मिक जीवन उसमें भी एक तरह से अंतराय खड़ा होता है। दूसरा क्या है कि मोस्ट प्रेसिडेंट महाराज के सामने एक बड़ा ही बुरा इंप्रेशन जाता है। तो क्या है कि यदि ऐसी कोई घटना होती है जो कि हमको पसंद नहीं है तो अपने ईगो को कंट्रोल करके अपने ईगो को क्रश करके हमको यहां पर रहना है। तो रामकृष्ण मिशन में जब ट्रेनिंग सेंटर में था हमारा 2 साल का ट्रेनिंग होता है जब नए आए हुए ब्रह्मचारी 3 साल के बाद में जॉइनिंग के 3 साल के बाद में बेलूर मठ में भेजे जाते हैं। वहां पे हमारा ट्रेनिंग सेंटर है। सो ट्रेनिंग सेंटर इज सेम थिंग कि आपका ईगो क्रशिंग मशीन है। आप कॉलेज में जाते हैं। आपको कॉलेज लाइफ का एक एक्सपीरियंस है। कॉलेज लाइफ में क्या है? एकेडमिक एक्सीलेंस पे काफी आपको भार देना होता है। उसकी काफी चिंता करनी होती है। और फिर कैंपस पॉलिटिक्स तो होता ही है। हमको तो पता ही है। अभी देखिए वो एक मेंटालिटी कैंपस क्या है? कैंपस लाइफ क्या है? वो एक अपेक्षा रख के यदि हम बेलूरमठ ट्रेनिंग सेंटर में जाएंगे तो वह काम नहीं होने वाला। क्योंकि यहां पर एकेडेमिक एक्सीलेंस की वजह लाइफ ट्रांसफॉर्मेशन पर ज्यादा भार दिया जाता है। आपने वेदांत कितना समझते हैं? कठोपनिषद मुखस्थ किया कि नहीं? गीता आप कंठस्थ किया कि नहीं? यह जो सब कमेंट्रीज है वह आपने पढ़ी कि नहीं पढ़ी? संस्कृत कितना आता है? रामः रामौ रामः आपने किया कि नहीं? वह सब चीजें है। उसका भीेंस है। बट फार मोर देन दैट ट्रेनिंग सेंटर में आवश्यकता है। अपने ईगो को क्रश करके यह जो समष्टि है इस समष्टि में इस समष्टि प्रवाह में अपने को बहा देना। यह इंडिविजुअलिटी है अपनी। मेरा एक इंडिविजुअल प्रेफरेंस है। वह सब आपको भूल जाना है। वह दो साल संपूर्ण रूप से संघ को आत्मसमर्पण कर देना है। अभी ऐसा नहीं कि मैं बोल रहा हूं तो मैंने कुछ माने इतना कोई आत्मसमर्पण करने में सक्षम हुआ था या सफल हुआ था। मुझे अच्छे से याद है ट्रेनिंग सेंटर के दिनों का स्ट्रगल मेरा रहा और यह रामकृष्ण मिशन में रहकर के यह ईगो ग्राइंडिंग मशीन में रहकर के ऐसा हर कुछ समय में ऐसी कुछ ना कुछ घटनावली होगी कि म फाइट और फ्लाइट जैसे कहते हैं या तो अपने ईगो को कंट्रोल करके अपने ईगो के साथ में फ्लाइट करके यहां फाइट करके यहां पे रहिए या तो फ्लाइट फ्रॉम फ्रॉम रामकृष्ण मिशन निकल जाइए यहां से बहुत सारे लोग संघ से चले जाते हैं। संघ को गाली देकर जाते हैं। कहते हैं कि संघ का पतन हुआ है। रामकृष्ण मास्वामी जी ठाकुर की भावनाओं को भूल करके आप लोग सब काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है। किंतु यह फाइट और फ्लाइट अपने ईगो के साथ में फाइट करना है। सक्सेसफुल रहे तो आप यहां पर रह सकते हैं। वरना संघ से फ्लाइट हो जाएंगे। वो भाग जाना पड़ेगा। सो दैट इज देखिए कि यह ईगो क्रशिंग मशीन वराह नगर मठ भी आप देखेंगे। अभी यहां पे आगे में ही आप देखिए कि काली काली महाराज और यह स्वामी जी नरेंद्र इन दोनों का आर्गुममेंट होता है। तो देखिए एक तो है कि काली महाराज का नरेंद्र के ऊपर में काफी श्रद्धा था स्वामी जी के ऊपर में। इससे आगे भी हमने देखा कि किस तरह से त्रिगुणातीतानंद जी महाराज पूरे देह पर मिट्टी लगा करके स्नान करने के जाने के पहले अपेक्षा कर रहे थे। जैसे ही नरेंद्र आया स्नान करके गंगा स्नान करके साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और फिर वह भी गंगा स्नान के लिए जाएंगे। तो गुरु भाइयों का वैसे यह नरेंद्र पे श्रद्धा तो अवश्य था। किंतु यह जो पाजी अहंकार है अपना वह बीच-बीच में सर उठाता है। तो ऐसा यह जो इस तरह के हाई प्रेशर एनवायरमेंट में रहना और अपने ईगो को कंट्रोल करना और साथ में ही क्या है? देखिए यह तो ईगो का

अहंकार और आत्मश्रद्धा एक ही जैसे दिखते है किन्तु भीतर से है बिलकुल विपरीत

कंट्रोल यह तो दोधारी तलवार है ना। एक और आध्यात्मिक जीवन में हम देखते हैं कि हां आपके अहंकार को काबू में रखना है। ईगो को कंट्रोल में रखना है वगैरह। किंतु फिर आखिर में ऐसा हुआ एक समय कि हम ईगो बहुत बड़ा एनिमी है। ईगो बहुत बड़ा एनिमी है। ए ऐसा सोचते-सचते हम लोग कहीं ईगो को कंट्रोल करतेकरते सत्व में जाने की वजह तमस में चले गए। और फिर जब यह विदेशी आक्रमण प्रारंभ हुए तो उसके सामने हम बिल्कुल बेबस और लाचार हो गए। हाथ भी नहीं उठा सकते अपनी आत्मरक्षा। तो यह एक बात है कि ईगो को कंट्रोल करना इसका अर्थ यह नहीं है कि आत्मश्रद्धा को खो बैठना। अहंकार से मुक्ति पाप प्राप्त करनी है। नहीं कि आत्मश्रद्धा से। बहुत बार ऐसा होता है कि आत्मश्रद्धा और अहंकार दोनों एक ही जैसे दिखते हैं। यदि आपको प्रॉपर एक सेल्फ रिफ्लेक्शन नहीं किया आपने तो आपको ऐसा ही लगेगा कि मेरे भीतर में आत्मश्रद्धा है। मेरे भीतर में आत्मश्रद्धा है। आत्मश्रद्धा नहीं अहंकार है। और फिर एक दूसरा एक्सट्रीम चला जाएगा कि अहंकार को काटना है। अहंकार को काटना है। बोल के हमने आत्मश्रद्धा का भी बलिदान दे दिया। तो परिणाम आया पूरे तमस में जाकर डूब गए। सो यह अहंकार और आत्मश्रद्धा दोनों एक ही जैसे दिखते हैं। आपको एक सेल्फ रिफ्लेक्शन डेवलप करना है। यह अपने भीतर में क्या चल रहा है? मेरे माइंड व्हाट इज द डायनेमिक्स ऑफ माय कॉन्शियसनेस। ये क्वांटम डायनेमिक्स है ना? वैसे ही यह कॉन्शियसनेस डायनेमिक्स। मेरा माइंड किस तरह से कार्य करता है? मेरे मन में जो यह विचार प्रकट होते हैं, भावनाएं प्रकट होती है, आइडियाज एंड आइडियल्स जो खड़े होते हैं, एंबिशन जो है मेरे जीवन की डिजायर्स जो है मेरी लाइफ के गोल्स जो है तो वो ईगो अहंकार के द्वारा वह चालित है ना कि आत्मश्रद्धा से वह चल रहे हैं। आज देखिए एक ही एक ही कार्य है। एक व्यक्ति सोचता है कि मुझे एक ऐसा थ्यरी खोजना है जो कि मुझे समझाए कि यूनिवर्स कैसे काम करता है। दूसरा एक आदमी है। अब अभी यह जो जैसे कि एक साइंटिस्ट है सोचता है कि मुझे यह थ्यरी डेवलप करनी है। अह व्हिच इज़ वेरी गुड। एंड व्हाट ड्राइव्स हिम टू डेवलप दैट थ्यरी इट इज़ हिज क्यूरियोसिटी। साइंटिफिक क्यूरियोसिटी साइंटिफिक मुमुक्षुत्व कि मुझे यह थ्यरी यह पार्टिकुलर चीज कैसे कार्य करती है यह मुझे खोज निकालना है। वो जो पेटेंट ऑफिस क्लार्क फेमसली अल्बर्ट आइंस्टाइन वो पेटेंट ऑफिस में क्लार्क था और वह वहां पर बैठे-बैठे सोचता था कि क्या होगा जब मैं प्रकाश के किरण के साथ में ही गति करूं। क्या मुझे प्रकाश का किरण स्थिर दिखाई देगा? वेरी सरप्राइजिंगली आंसर इज नो काउंटर इंटूटिव आंसर। उसके बाद में देखिए किंतु उन्हें व्हिच इज़ वन ऑफ़ द ग्रेटेस्ट साइंटिफिक डिस्कवरी सर आइंस्टाइन की दूसरी एक इंसाइट थी कि यह यदि एलिवेटर है एलिवेटर में मैं नीचे आता हूं तो मुझे यह वेटलेसनेस का अनुभव होता है। तो वो वेटलेसनेस और यह जो आउटर स्पेस वेटलेसनेस है इज़ थिर इक्वल और सेपरेट। तो पता चला कि बोथ आर सेम। दैट मींस ग्रेविटी एंड लेक ऑफ़ ग्रेविटी इज़ अ स्टेट ऑफ़ फ्री फॉल। नथिंग मोर देन दैट। अह सो, दीज़ आर द ग्रांड इंसाइट्स। पूरे मनुष्य सभ्यता की हिस्ट्री लिखी जाएगी, तब यह जो सब पावरफुल फ्लैशिज़ ऑफ़ इंसाइट है, उनका एक स्थान होगा। अभी यही आइंस्टाइन व्हिच इज़ कंसीडर्ड टू बी वन ऑफ द ग्रेटेस्ट फिजिसिस्ट इन द वर्ल्ड। उसने जब एक कंप्लीटली डिफरेंट टाइप का थ्यरी देखा ये क्वांटम डायनेमिक्स स्पेसिफिकली ये कोपन हेगन इंटरप्रिटेशन ये नेल्स बोहर है फिर ये वार्नर हजनबर्ग है उन लोगों ने जो क्वांटम डायनेमिक्स का इंटरप्रिटेशन आइंस्टाइन के सामने रखा तो यही आइंस्टाइन उस उस जो थ्यरी है उसको एक्सेप्ट नहीं कर पा रहा है। वन आफ्टर अनदर वह उसके सामने ऑब्जेक्शन खड़ा करता है। अभी नो डाउट साइंस के जगत में आपको ऑब्जेक्शन खड़ा करके थ्यरी को तोड़ देना है। अदरवाइज तो क्या है एक सही साइंटिस्ट रियल साइंटिस्ट है तो 1 लाख निकम्मे जो दो नंबरी लोग भी है जो कि झूठ-मूठ की अपनी थ्यरी चलाना चाहते हैं। क्विक वो पॉपुलैरिटी प्राप्त करना चाहते हैं। तो जब भी कोई भी एक रेडिकल प्रपोजिशन साइंटिफिक प्रपजीिशन आपकी नजर के सामने आएगी तो उसको काउंटर आर्गुममेंट करके करके आपको पूरा तोड़ने का प्रयास करना है। जब वो खड़ी रहेगी वह इंटरप्रिटेशन तभी उसको स्वीकार करना है। यह उत्तर पक्ष पूर्व पक्ष जो है वह अपना वो वेदांत का एक एक्सेप्टेड नॉर्म है। कोई भी थ्यरी प्रपोज होती है तो वह जैसे शंकराचार्य है वह दिग्विजय करने को निकलते हैं। सबके साथ में आर्गुममेंट करते हैं, वाद-विवाद करते हैं। अपनी थ्यरी का प्रतिपादन करते हैं। व्हिच इज एन एक्सेप्टेंट नॉर्म ऑफ प्रपोजिंग एनी न्यू रेडिकल इंटरप्रिटेशन। सो देखिए किंतु आइंस्टाइन के केस में कभी-कभी ऐसा लगता है कि एट वन पॉइंट वो क्वांटम डायनेमिक्स का विरोध कर रहा है। वो अहंकार के मारे कर रहा है। नहीं कि वो उसकी साइंटिफिक मेरिट के ऊपर में कि मेरी जो थ्यरी है उससे यह थ्यरी काफी डिफरेंट है और लगता है कि जैसे कि मेरी थ्यरी को यह काउंटर कर रही है। मेरी थ्यरी के अपोज में जा रही है। तो अभी यह तो मेरा एक अंडरस्टैंडिंग है कि आइंस्टाइन के मन में शायद एट वन पॉइंट अहंकार जैसा कुछ हुआ होगा। एक हर्ट फीलिंग जैसा हुआ होगा कि यह थ्यरी मेरे थ्यरी से बिल्कुल ऑोजिट में क्यों। सो एनीवे देखिए कि एक ही व्यक्ति जो कि एक बहुत ही अच्छा कार्य करता है वो आत्मश्रद्धा से भरपूर होकर के इस तरह की बातें वो जब लोगों के सामने रखता है जिसको कि किसी ने न भूतो न भविष्यति सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा हो सकता है। वही साइंटिस्ट जब एक डिफरेंट टाइप का इंटरप्रिटेशन उसके सामने रखा जाता है तो उसके भीतर में थोड़ा सा अहंकार जागृत हो जाता है। अपने यहां पे भी मैंने देखा है कि हम जब जूनियर होते हैं तो हम सोचते हैं कि मुझे बिल्कुल विनम्र होकर रहना है। किंतु फिर जैसे-जैसे सीनियर होते जाते हैं और फिर अपने जूनियर को देखते हैं और यह देखते हैं कि जूनियर लोग मुझे इतना रिस्पेक्ट नहीं देते जितना रिस्पेक्ट मैं जब जूनियर था और अपने सीनियर को देता था। तब एकदम क्रोध प्रकट हो जाता है। अच्छा वह अपने आप को क्या समझता है? मैं जब उसकी उम्र का था, मैं जब उसकी सीनियोरिटी का था तो मैं यह करता था, मैं वह करता था। और आजकल की जनरेशन को देखिए बिल्कुल निकम्मे है। यह वो ये एक्चुअली क्या है पता है? यह सब अहंकार के ऊपर में आघात होने से इस तरह का रिएक्शन होता है। तो यह चीज जो है संघ होकर के ठीक-ठीक कैसे रहा जाए? एक सेल्फ रिफ्लेक्शन का एक हमको हैबिट डेवलप करना होगा। मेरी यह जो एक्शन या रिएक्शन या जो बिहेवियर है उसको कौन ड्राइव करता है? आत्मश्रद्धा के आत्मश्रद्धा से भरपूर होकर मैं यह कार्य करता हूं ना कि अहंकार के बारे में यह कार्य करता हूं। मैं यह शब्द उच्चारित करता हूं कि मेरे मन में यह विचार आता है। यह जो सेल्फ रिफ्लेक्शन है वह करना सीखना होगा। यदि हम यह नहीं कर पाएंगे तो फिर क्या होगा? दो-तीन चीजें हो। एक बार सेल्फ रिफ्लेक्शन नहीं किया और अहंकार को खुला डोर मिल गया। माने उसको फ्री रेन मिल गया तो अहंकार फिर अपने मन के ऊपर में वह कब्जा जमा लेगा और हमारी पूरी साधना को तहसनहस कर देगा। बाहर से सबको ऐसा लगेगा कि नहीं यह तो रूटीन फॉलो करते हैं। यह नॉर्म्स एंड प्रोसीजर फॉलो करते हैं। उसमें क्या दिक्कत किंतु भीतर में जो लोगों की अंतर्दृष्टि होती है वे लोग समझ जाते हैं कि इनकी आध्यात्मिक जीवन बिल्कुल जैसे कि तहसनहस हो गया है। तो वह तो एक चीज होता है। अहंकार को खुला दौर दे देने से। दूसरा कि अहंकार को तोड़ ही देना है। अहंकार को तोड़ ही देना है। ऐसा एक ऑब्सेसिव थिंकिंग अपने मन के भीतर भीतर में बैठ गया तो फिर क्या होगा? अहंकार के साथ में आत्मश्रद्धा को भी तोड़ देंगे। वह थ्रो द बेबी अलोंग विद द बाथ वाटर। वो जो फेमस एक सिमाइल है एक छोटे से बाथ टब में एक छोटे शिशु को स्नान करने के लिए बिठाया। उसमें पानी डाला। शिशु को स्वच्छ किया गया। उस पानी से। अभी वह पानी फेंक देना है वह तो भी गंदा हो गया है। तो पानी जैसे फेंका टब के साथ टब में से तो उसमें पता चला कि वह बच्चा भी उसी में था और उसको भी फेंक दिया। तो ऐसा कहीं ना हो जाए थ्रोइंग द बेबी अलोंग विद द बाथ वाटर कि अहंकार को तोड़ने को गए तो आत्मश्रद्धा ही खत्म होगी। तो यदि संघ में रहना है यह सेल्फ रिफ्लेक्शन होना आवश्यक है कि मेरे क्रियाकलाप मेरी एक्शनंस मेरा बिहेवियर इसको ड्राइव कौन करता है? आत्मश्रद्धा करता है ना कि अहंकार करता है। तो यह जो

रामकृष्ण मिशन के संघबद्ध जीवन की नींव रखी गई वराहनगर मठ में

फाउंडेशन है इंस्टीट्यूशनल लाइफ का उस वो प्रारंभ हुआ है वराह नगर मठ में। बहुत अच्छा होता कि यदि हमको गुरु भाइयों के भीतर में क्या डायनेमिक्स चल रहा है, क्या अंडर करंट्स चल रहे हैं, क्या संघर्ष चल रहा है, वह जानने को मिलता। अनफॉर्चूनेटली देखिए हमारे यहां पे एक ऐसा है कि कोई भी प्रॉब्लम होता है ना उसको छुपा के रख देना है। आपने प्रॉब्लम का सॉल्यूशन लाया बात खत्म हो गया। इस प्रॉब्लम को रिकॉर्ड नहीं करना है। इससे बहुत बार ऐसा होता है कि जब हम इतिहास पढ़ते हैं तो हमको सब कुछ परफेक्ट दिखता है। अरे वाह। और हम कभी-कभी ना इस तरह का परफेक्ट हिस्ट्री पढ़कर के मायूस हो जाते हैं कि अरे भाई उस समय के जो साधु थे उनका बिहेवियर इतना परफेक्ट बिहेवियर था और मेरे बिहेवियर में इतने सारे प्रॉब्लम है। काम कांचन से मैं मारा। इतने सालों के बाद भी जैसे कि मैं उसकी यह जो पाशवी यह जो यह है ग्रिप उससे मुक्त नहीं हो पा रहा हूं। मैं अपने अहंकार को नहीं काबू में ला पा रहा हूं। बीच-बीच में यह मैं मायूस हो जाता हूं। डिप्रेस हो जाता हूं। पहले के साधुओं को देखिए। या तो नृत्य कीर्तन करते हैं, ना तो गप लगाते हैं, हंसी मजाक करते हैं, ना कि कभी वह अखंडानंद जी की तरह गांव-गांव जाकर के अनाथ लोगों की सेवा करते हैं ना कि कहीं स्वामी जी की तरह निर्विकल्प समाधि में मत्त हो जाते हैं। यह तो साधु जीवन है। यह असली साधु है। उन लोगों के सामने मेरी कीमत एक फूटी खोड़ी की भी नहीं है। ऐसा एक हमारे मन में हो जाता है। सो अभी देखिए कि परफेक्शन इंपपरफेक्शन को आप यदि प्रोजेक्ट करने को जाएंगे तो दूसरा एक प्रॉब्लम यह होगा कि लोगों को ना अश्रद्धा हो जाएगी। अच्छा ऐसा साधु है इसको हमको क्या रिस्पेक्ट करना अभी लोगों को अश्रद्धा हो जाएगी। लोगों को डर लग जाएगा हमारे से। लोग हमारे से दूर चले जाएंगे। यह भय कोई भी इंस्टीट्यूशन हो रामकृष्ण मिशन हो, कैथोलिक चर्च हो, कोई भी इंस्टीट्यूशन आप देखिए स्टैंडर्ड इंस्टीट्यूशन होते हैं। अपने इंपपरफेक्शन को छुपाना चाहते हैं। अपने परफेक्शन को प्रोजेक्ट करना चाहते हैं। प्रॉब्लम यहां पे एक ही होता है। भक्तों के लिए आप यह सब कर रहे हैं ना। भक्तों को अश्रद्धा ना हो जाए हमारे ऊपर में। प्रॉब्लम यह होता है जो साधक जो होते हैं ना वे लोग बेचारे कुछ सीख नहीं पाते हैं। वे लोग बेचारे कहीं से यह ड्रॉ नहीं कर पाते हैं इंस्पिरेशन। अच्छा दिस इज वन ऑफ दोस इलस्ट्रियस स्वामी अपने संघ के। उनको भी यह संघर्ष का सामना करना पड़ा। और उन्होंने इस तरह से उसको माने उस पर विजय प्राप्त किया। तो यदि वो कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकता? ठाकुर मां स्वामी जी डायरेक्ट डिसाइपल यह तो बहुत बड़े आइडियल है। उन्होंने क्या संघर्ष किया? क्या उसका सॉल्यूशन निकाला? हमारे साथ में दूरदुरा का कोई लेना देना नहीं है। निर्विकल्प समाधि में जाने से पहले मां का दर्शन हो जाता है। तो मां को काटना है तो कैसे काटेंगे? तोतापुरी आपके वो कपाल के ऊपर में कांच का एक टुकड़ा चुभो देंगे। बोले अभी इसके दर्द के ऊपर में मेडिटेशन करो। उसके ऊपर में मन को एकाग्र करो। उस पर मन एकाग्र किया। मां का जैसे ही दर्शन हुआ ठाकुर ने वह खड़ग से तलवार से मां को काट दिया। मन हू हू करता निर्विकल्प समाधि में चला गया। अब यह पढ़ने से मुझे क्या लाभ है? मैं तो कहता हूं मां का निर्विकल्प समाधि तो छोड़ ही दीजिए। मां का दर्शन यदि हो जाता है इस जीवन में तो उससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहिए। निर्विकल्प समाधि के लिए बाद में कभी सोच लेंगे। तो क्या है? फिर ठाकुर मां स्वामी जी उनके प्रॉब्लम भी बड़े कॉस्मिक लेवल के थे। उनके सॉल्यूशन भी कॉस्मिक लेवल मेरा यह जो ह्यूमन लेवल पर जो प्रॉब्लम है और यह जो ह्यूमन लेवल पर सॉल्यूशन है, आई नीड दैट कि कहां से मैं इंस्पिरेशन ड्रॉ करूं। मैंने भी यह फेलियर्स देखना है। फेलियर्स में से रास्ता निकाला है, वह मुझे देखना है। आप यदि इवन ह्यूमन लेवल पे भी चलो आप ठाकुर मां स्वामी जी में इंपपरफेक्शन था। उसको प्रोजेक्ट नहीं करते हैं। या तो कहेंगे इंपपरफेक्शन था ही नहीं। इंपपरफेक्शन दिखता था। अब जैसे वह आजकल के कम्युनिस्ट लोग हैं ठाकुर पर आक्षेप करते हैं कि वह अपने वो मां शारदा देवी को उन्होंने अपमान किया था। मां शारदा देवी का प्रॉपर केयर नहीं किया था। वगैरह-वगैरह वो है वो बंगाल में कुछ एक पूरा दल है। मां का नाम ले ठाकुर को क्रिटिसाइज करने वाले। तो ऐसे पगलों की बात छोड़ दीजिए। जिनका काम ही है हिंदू धर्म को क्रिटिसाइज करना। किंतु एक जेन्युइन एक जो होता है कि हां जैसे हमने देखा था कि मां आई है दक्षिणेश्वर ठाकुर तो हृदय के अंडर में थे। ठाकुर खुद कहते हैं आमी तो हृदय अंडर छिलम। तो फिर हृदय ने जब मां का अपमान करके वहां से जाने को कहा तो श्यामा सुंदरी देवी मां की मां अपनी बच्ची को लेकर के चल पड़ी वहां से। बोली कि यहां कहां अपनी बिटिया को रख के जाएंगे। किसके हाथ? इसको सुपृत करके जाएंगे। तो ठाकुर ऐसे हृदय के अंडर में थे। डर के मारे कुछ बोल नहीं पाए। तो अभी यह पढ़कर के हमको तो नाराजगी तो होगी ही ठाकुर के ऊपर में मां का पक्ष ले हम तो ठाकुर के साथ में झगड़ा करेंगे ही कि मां के साथ में क्यों ऐसा किया? कौन है हृदय? हु इज हृदय अल्टीमेटली उसको एक आप डांट लगाए। एक आप वो अपना मां ने जब बगला स्वरूप प्रकट कर दिया। ठाकुर क्या नहीं वो भैरव स्वरूप प्रकट कर सकते हैं। सो सी पर इंपपरफेक्शन नहीं है। जब बट फॉर द सेक ऑफ लीला हम यह सब आरोप करते हैं जिससे कि लीला पुष्टा आई ठाकुर कहते हैं ना जटिला कटटीला क्यों है तो लीला पुष्ट आई अर्जनो ये अर्थात कि ये सिमिंग इंपपरफेक्शन अवतार के जीवन में क्यों है जिससे कि हम उसकी चर्चा करें उसमें से रस प्राप्त करें और अपने मन को परिपुष्ट करें उसके लिए अवतार के जीवन में सिमिंग इंपपरफेक्शन है तो वह बात छोड़ दीजिए किंतु ह्यूमन लेवल पे मेरे तरह के जो सीनियर थे। उन लोगों ने किस तरह से स्ट्रगल किया? हाउ दे ओवरकम देयर प्रॉब्लम्स एंड फाउंड वे आउट। वो यदि मुझे जानने को मिलता है इट विल वेरी हेल्पफुल टू मी। बट क्या करें कि वराह नगर मठ के दिनों की आप देखेंगे हम जितना पाठ करेंगे बहुत कम हमको स्ट्रगल दिखाई देता है। बहुत कम हमको संघर्ष दिखाई देता है। गुरु भाइयों के भीतर में। माने आउटर स्ट्रगल तो है ही है। खाने का प्रॉब्लम है। लोगों एक तरह से क्या कहें कि कुछ-कुछ भक्तों का ही ठाकुर के एक विदूप भाव है मटके भाइयों के ऊपर में वो तो था किंतु वििन देम क्या अंडर करंट्स थे? क्या स्ट्रगल था? उसका रेयर कहीं कोई नामोल्लेख है। नामोनिशान है। एक लेटर में स्वामी जी लिखते हैं तुम लोगों ने राजा महाराज राजा महाराज के बारे में स्वामी जी लिखते हैं। ऐसा कोई न्यूज़ गया अमेरिका थे स्वामी जी कि राजा महाराज के पास में से किसी ने बहुत ज्यादा कोई काम करवा लिया होगा। अभी क्या है कि आइडियली स्पीकिंग आप एक संग एक मठ में रहते हैं तो सभी को इक्वल अमाउंट ऑफ वर्क डिस्ट्रीब्यूट होना चाहिए। किंतु क्या है कि राजा महाराज का तो एक स्टेटस था। ठाकुर के मानस पुत्र थे तो वराह नगर मठ में रहते-रहते ही एक दिन की घटना है। स्वामी जी ने देखा कि किसी ने राजा महाराज को एक बहुत बड़ा हांडी धोने को दिया है। तो स्वामी जी ने कहा अरे तू राजा को क्यों दिया ये? मुझे दो। तुमको नहीं धोना है। तुम लोगों को मुझे दो। मैं दो दूंगा। राजा को मत दो। तो यह स्वामी जी राजा महाराज को इस तरह से प्रोटेक्ट करते थे। तो एक दिन की बात है। उस समय स्वामी जी अमेरिका थे। तो न्यूज़ आया कि इसी तरह से किसी ने राजा महाराज के पास में कुछ ज्यादा काम करवा लिया। तो स्वामी जी ने एक लेटर में लिखा कि याद रखना कि राजा ठाकुर भालू भाषा जिनिश छिलो। याद रखना कि मने राखवे याद रखना कि राजा ठाकुर के प्रेम का पात्र था। ऐसा कह के स्वामी जी छोड़ देते हैं। फिर कहते हैं अच्छा ठीक है चर्बी चले जावे। माने चर्बी अर्थात कि ये फैट है वो बंद हो जाएगी। म स्वामी जी ऑन वन हैंड ये भी कहते हैं कि देखो राजा महाराज के पास में से और कोई एक्स्ट्रा काम मत करवाना। किंतु अभी करवा ही दिया है तो ठीक है। चलो यह फैट बंद हो जाएगा। चर्बी पुड़े जावे। ऐसा ही कुछ लिखा है। चर्बी शब्द यूज़ किया है। जल जाएगी उसके लिए क्या मैं भूल गया। किंतु ऐसा ही कुछ कहा है स्वामी जी ने। तो देखिए कि दिस इज हाउ कि इन लोगों के भीतर में भी एक तरह से डायनेमिक्स जिसको कहते हैं किस तरह से डेवलप हुआ है क्योंकि यह नॉर्म्स एंड प्रोसीजर्स जो है जो कि वराह नगर मठ में डेवलप हुई है वही आज चली आ रही है। संघ के अध्यक्ष हैं। उनको सर्वोच्च सम्मान देना है। तो राजा महाराज संघ के अध्यक्ष होंगे। अभी राजा महाराज का नेचर इतना सॉफ्ट था कि वह माने सामने से आकर के लीडरशिप लेना वह खुद तो कभी नहीं करेंगे। यूजुअली वराह नगर मठ में देखिए लीडरशिप के रोल में स्वामी जी तो है ही है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु अदर देन स्वामी जी शशि महाराज है महापुरुष महाराज है वे लोग एक तरह से लीडर जैसे थे कि शशि महाराज है वह मठ की मां जैसे हमने देखा कहां से भी भिक्षा करके कैसे भी करके ठाकुर के लिए नैवेद्य है भोग है उसका जुगाड़ करेंगे और यह गुरु भाई कौन कहां बैठ के तपस्या कर रहा है तो वहां जाकर के जबरदस्ती उनके मुंह में अन्न अन्न बिठा के आएंगे। सो वो एक लीडरशिप रोल हमको शशि महाराज का दिखता है। महापुरुष महाराज भी मठ में काफी सब चीजें देखते थे। राजा महाराज अपने को सब समय बैकग्राउंड में ही रखना चाहते थे। किंतु देखिए कि किसका क्या आध्यात्मिक स्टेटस है। उस अनुसार उसको यह एडमिनिस्ट्रेटिव पोजीशन संघ में दी जानी चाहिए। यह वन ऑफ द नॉर्म्स जो कि डेवलप हुआ है। अह सो दैट इज़ वन नॉर्म। उसके बाद में यदि संघ गुरु के लेवल का यदि उनका स्टेटस है तो फिर उनको उस तरह से रिस्पेक्ट भी मिलना चाहिए। आध्यात्मिक एटेनमेंट है तो सामने रिस्पेक्ट भी उनको इतना मिलना चाहिए। यह जितना भी मैनुअल वर्क है, जैसे 10 साधु करते हैं, वैसे ही इनके पास में भी इस तरह का काम करवा लो। ऐसा नहीं होना चाहिए। तो अपने यहां पर

रामकृष्ण भावधारा में शक्ति की गरिमा

देखिए डेमोक्रेसी नहीं है। अपने यहां पर है कि यह शक्ति को स्वीकार कर डिक्टेटरशिप स्वामी जी डिक्टेटरशिप वर्ड यूज करते हैं। मुझे यह डिक्टेटरशिप वर्ड इसलिए अच्छा नहीं लगता क्योंकि स्वामी जी के समय में तो उसको यूज करना कोई बहुत बुरा नहीं था। किंतु यह 20th सेंचुरी में यह हिटलर है। यह सब जो पगले है कुछ आजकल का ट्रंप है। उन्होंने यह डिक्टेटर शब्द का इतना मिसयज किया है कि फिर उसके ऊपर में घृणा जैसा हो गया है ज्यादातर लोगों को। इसीलिए कोईकोई जब यह इंटेलेक्चुअल होता है ना अगेन ये कम्युनिस्ट, लेफ्टिस्ट, लिबरल लोग रामकृष्ण संघ का यह हिस्ट्री पढ़ के कहेंगे कि यह जैसा हिटलर डिक्टेटरशिप खड़ा करके गया है। स्वामी जी यहां पे डिक्टेटरशिप खड़ा कर गए। अभी वो एक अलग बात है। यहां पे एक अलग बात है। यहां पे शक्ति का कांसेप्ट रेदर देन कि डिक्टेटरशिप आई विल लाइक टू यूज़ द वर्ड शक्ति। ठाकुर ने इनको कहा था विद्यासागर को। हम तुमको देख हम तुमको मिलने के लिए क्यों आए हैं? क्या तुम्हारे सर पर दो सिंह निकले हैं? क्या? नहीं। तुम्हारे भीतर में शक्ति है। भगवान ने ईश्वर ने दी है। ये विद्यासागर जब ठाकुर ठाकुर खुद कहते हैं विद्यासागर ने मुझे पूछा कि महाशय भगवान ने क्या किसी को ज्यादा शक्ति दी है। किसी को कम शक्ति दी है। ऐसा क्यों है? सबको तो समान अधिकार मिलना चाहिए। उस तरह का जो लिबरल थिंकिंग था तो ठाकुर ने कहा कि देखो विभु रूप से तो सबके हृदय में विराजमान है तब की शक्ति का तारतम्य है मैनिफेस्टेशन किसका ज्यादा है किसका कम है ठाकुर विद्यासागर को कहते हम तुमको मिलने के लिए क्यों आए हैं तुम्हारे सर पर क्या दो सिंह निकले हैं कि मैं दक्षिणेश्वर से इतना लंबा सफर करके तुमको मिलने को आऊं कोलकाता में लाखों लाखों लोग रहते हैं कहां मैं दूसरों के घर जाता हूं तुमको मिलने आया हूं तुम्हारे तुम्हारे में शक्ति विशेष है बोल के मिलने को आया आया नहीं कि तुम एक सर्कस के प्राणी की तरह उस सर्क पे उस सिंह निकले बोल के वो सर्कस देखने को जाते हैं ना सर्कस में ये सब तरह के चित्रविचित्र चीजें रखते हैं तो आउट ऑफ क्यूरियोसिटी लोग जाते हैं देखने के लिए तो इस तरह से तुमको आए हो मिलने के लिए तो यह शक्ति का तारतम्य है और जिसको जो शक्ति अभी शक्ति यानी पॉलिटिकल पावर नहीं फिजिकल पावर नहीं मनी पावर नहीं यह वो सब नहीं धन बल जन बल वो सब नहीं आध्यात्मिक शक्ति जो आध्यात्मिक जगत में जितना डेवलप हुआ है उसको उसके अनुसार रिस्पेक्ट मिलना चाहिए।

एक संस्था की उत्पत्ति, विकास और परिवर्तन के चरण

तो यह नॉर्म्स एंड प्रोसीजर जिसके ऊपर में आज का संघ हमारा चल रहा है वो सब नॉर्म्स एंड प्रोसीजर एस्टैब्लिश हुए थे वही वराह नगर मठ में। तो ये सब जो उन दिनों की घटनाएं हैं आई विश कि हमारे पास में बहुत ही एक्सटेंसिव रिकॉर्ड रहता। तो प्रत्येक घटना को हम बहुत ही डिटेल में डिस्कस करके समझ पाते हैं कि किस तरह और दूसरा क्या है पता है यह कोई एकेडेमिक एक्सरसाइज नहीं है। देखिए जैसे-जैसे समय जाता है ना देखिए कैथोलिक चर्च का ही एक उदाहरण कि जब प्रारंभ के दिनों में चर्च में तपस्या थी। चर्च फादर जिनको कहा जाता था। उनका एक ब्रिलियंट स्पिरिचुअल लाइफ था। किंतु जैसे-जैसे वह अगेन 1926 जो रामकृष्ण मिशन का जो फर्स्ट कन्वेंशन हुआ था सभी साधुओं को इकट्ठा किया गया था। उसमें शरद महाराज ने एक स्पीच दिया है। तो शरद महाराज कहते हैं देखिए संघ के जीवन में किस तरह से ये जो स्टेजेस है एक संघ के किस तरह के स्टेजेस आते हैं। एक बार संघ का गठन करेंगे ना लोग आपको इग्नोर करेंगे। वह बोलेंगे अरे कुछ पगले लड़के हैं। वह इकट्ठा होकर के वहां एक भूतिया मकान में रह रहे हैं। वो छोड़ो उन लोगों को वो इग्नोर करेंगे। फिर आपको रिडिक्यूल करेंगे मतलब आपके ऊपर में कटाक्ष करेंगे हंसी मजाक करेंगे देखो मां पिताजी की सेवा करने की वजह वो वहां पर भूतिया मकान में रह रहा है और वह भिक्षा मांग के खा रहा है वो जो योगेंद्र महाराज ना कि किसी की कहानी है इसी तरह से एक महिला के वहां पे म वो भिक्षा मांगने को गए हैं किसी के घर में गए घर के सामने वो जाकर खड़े रहे कहा भिक्षा न देही ओम नमो नारायण कि ऐसा जो कुछ कहा वो महिला भीतर में से देख के कहती है कि अरे हट्टे-खट्टे नवयुवान हो तुम मेहनत करके मजदूरी करके खाने की बजाय भिक्षा करने को आए हो यहां पे ऐसा वो उसने डांट दिया तो योगेंद्र महाराज बेच बड़े भीतर में से तो हंसी आती है ना कि वो हमको क्या समझती है कहां वो योगेंद्र महाराज का स्टेटस स्पिरिचुअल स्टेटस और वो है कि उनको एकदम एक निकम्मा भिक्षुक मान लेती है तो जो भी है तो ये जो रिडिक्यूल है सोसाइटी कि ये लोग हट्टे कट्टे नवयुवान है गुजराती में कहावत है युवान छोकरों पत्थर ने पाटू मारी ने पानी निकाला यंग लड़का जो होता है पत्थर को लात मार के उसमें से पानी निकाल सकता है अर्थात कि उसकी अर्निंग कैपेसिटी उस तरह की होती है तो कहां वो एक एक्सेप्टेड सोशल नॉर्म है उसमें बैठना है ना कि यह सब पागलपन करना है पहले इग्नोर करते हैं फिर रेडिक्यूल करते और उसके बाद में ऑोजिशन होता है जब हमारे संघ लोगों के रिडिक्यूल से डर करके हम लोग भाग खड़े नहीं होते हैं। डटे रहते हैं तपस्या में। तब चारों ओर से ऑोजिशन आना शुरू होता है। वही वरह बेलूर मठ के प्रारंभिक दिनों की ही बात है कि उस समय का जो वायसरॉय था उसने दरबार में कह दिया कि रामकृष्ण मिशन ये रेवोल्यूशनरियों को पनाह देता है। क्रांतिकारियों को वो रेफ्यूज देता है। तो जैसे ही ऐसा वह डिक्लेअर किया साथ में ही संघ के बहुत सारे भक्त डर गए कि अरे अभी सरकार की वक्र दृष्टि रामकृष्ण मिशन पर पड़ी है तो साधुओं को भी पकड़ के ले जाएंगे और मारेंगे पीटेंगे भक्तों को भी पकड़ के ले जाएंगे तो ऐसा डर डर का वातावरण फैल गया किंतु उसके बाद में फिर राजा महाराज की तपस्या है तपस्या थोड़ी ना ब्रिटिश राज उसके सामने कुछ करने वाला है कि अल्टीमेटली एस फार एस आई रिमेंबर कि जोसेफाइन मैक्लाउड ने फिर वहां जाकर के कुछ प्रेजेंटेशन किया था। बोलकर के ये सब मामला ठीक हो गया और वायसरॉय ने कह दिया दरबार में कि नहीं नहीं मेरा यह कहने का इंटेंशन नहीं था कि रामकृष्ण मिशन रिवोल्यूशनरी ऑर्गेनाइजेशन है। बस वही है कि रामकृष्ण मिशन अपने वहां पे जो साधु ज्वॉइ करने को आते हैं उनका प्रॉपर वेटिंग करें। आज की लैंग्वेज में वेटिंग माने वो प्रॉपर उनका ये प्रोफाइल देख करके उनको ले कि ये भूतकाल में ये रेवोल्यूशनरी था कि नहीं। मेरा बस इतना ही कहना है। तो सी कि इस तरह का भयानक ऑोजिशन ये ब्रिटिश राज जिसके सामने हमारे सब राजा रजवाड़ा वो नतमस्तक हो गए थे इस तरह का वायसरॉय जब रामकृष्ण मिशन को इस तरह से एक्यूज करेगा कि ये रेवोल्यूशनरी ऑर्गेनाइजेशन है तो कितना भयानक एक परिस्थिति खड़ा होगा। तो देखिए ऑोजिशन होता है। फर्स्ट होता है लोग इग्नोर करते हैं। फिर लोग रिडिक्यूल करते हैं। फिर भयानक ऑोजिशन स्टार्ट होता है। किंतु जब यह ऑोजिशन का दौर पार करके आप स्टेबल हो जाते हैं तब आता है एक्सेप्टेंस एंड एडमिरेशन। कि यह जो एक्सेप्टेंस जब

किसी संगठन के विकास में स्वीकृति और प्रशंसा सबसे खतरनाक चरण होते हैं

आता है, एडमिरेशन जब आता है तब रियल डेंजर स्टार्ट होता है। किस तरह से? कि अभी हम रिलैक्स हो जाते हैं। यह जो स्पिरिचुअल डिसिप्लिन हमने मेंटेन करके रखा था इन द फेस ऑफ द एडवर्सिटी वो डिसिप्लिन धीरे-धीरे करके रिलैक्स हो जाता है। बस अभी तो हम जीत ही गए हैं। अभी यह एकदम हार्ड एक डेडिकेटेड मोनेस्टिक लाइफ मोनेस्टिक वैल्यूज़ फॉलो करने की क्या जरूरत है? अभी अपने आइडियल्स को रिलैक्स होने दो। अभी अपने आइडियल्स को लूज़ कर हो जाए अपने आइडियल्स। ऐसा मान लेकर के होगा क्या कि फिर आध्यात्मिक पतन प्रारंभ होता है। तो यह 1926 के फर्स्ट कन्वेंशन ऑफ रामकृष्ण मिशन कि जहां पे सब साधु इकट्ठा होते हैं। शरद महाराज ने यह बात पहले आता है इग्नोरेंस फिर आएगा रेडिक्यूल। उसके बाद में आएगा ऑोजिशन। और फिर जब किंतु यह यह जब तक रिडिक्यूल है, जब तक इग्नोरिंग जब तक चल रहा है, लोग आपको इग्नोर कर रहे हैं। जब तक लोग आपको रिडिक्यूल कर रहे हैं। जब तक लोग आपको अपोज कर रहे हैं, तब तक आपका स्पिरिचुअल लाइफ ठीक रहेगा। क्योंकि आपको पता है कि मेरे स्पिरिचुअल डिसिप्लिन पे ही मुझे फेस करना है। मेरे पास में ना ही जनबल है, ना ही धनबल है, ना ही ऐसा कुछ है। मेरे पास में आर्मी नहीं है कि ब्रिटिश गवर्नमेंट ने सीआईडी के गुप्तचरों को स्पाई को भेज दिया तो मैं अपनी आर्मी बना करके उनसे फाइट करूंगा। मेरे पास में आध्यात्मिक पावर के अलावा कुछ नहीं। वो फेमस घटना थी। एक दिन बेलून मठ में समाचार आया कि उस समय का सीआईडी का जो मेन था उसका यह ऑफिसर वो पूरा एक लेकर के ऑफिसर्स को लेकर के आ रहा है बेलूर मठ पे रेड करने के लिए। तो गुप्तचर विभाग में होंगे कुछ अपने डिवोटी तो रात को आकर के राजा महाराज को समाचार दिया कि आज मध्य रात्रि को सीआईडी वाले आ रहे हैं रेड करने के लिए तो तो एकदम मठ में सन्नाटा छा गया डर का माहौल फैल गया क्योंकि एक बार ये लोग आएंगे वो तो अभी साधुओं को पकड़ के ले जाए या मारपीट करे दैट इज वन थिंग ये जो शाइन है अपना उसको यदि अपवित्र कर दे तो तो कितना बुरा होगा तो डेसीग्रेट कर दे यदि शाइन को व्हिच वा वेरी बैड। सो राजा महाराज के सामने सब जाके बैठे हैं। चुपचाप सब मध्य रात्रि का टाइम है। एकाएक राजा महाराज ने गंगा की ओर ऐसा करके ना कि कुछ हवा में कुछ सिंबल ड्रॉ किया। ऐसा एक थोड़ी देर के लिए किया। फिर चुपचाप शांत बैठ गए। सबने देखा किंतु इसका क्या सिग्निफिकेंस है समझ नहीं आया किसी को। सब चुपचाप बैठे हैं। रात पूरी बह गई। कोई आया नहीं सीआईडी वाला। तो फिर वह जो आदमी था वह भीतर का जो समाचार लाया था उसने जाकर थोड़ा सा इन्वेस्टिगेशन किया पता चला कि वे लोग सीआईडी वाले नौका में बैठकर के निकल चुके थे बेलूर मठ आने के लिए गंगा में किंतु समहाऊ आधे रास्ते पे आकर के वे लोग फिर गए वापस और चले गए और उसके बाद में फिर कभी वापस नहीं आए तो देखिए कि यह जो राजा महाराज की शक्ति थी हवा में ऐसा लिख करके ही सीधा उनको भगा देने की यह तो आध्यात्मिक शक्ति है ना राजा राजा महाराज के पास में ना ही ऐसे कोई गवर्नर ना कि ऐसा कोई बड़े पॉलिटिकल कांटेक्ट थे ना ही ऐसा कोई भीतर का कोई था उनका जो कि प्रोटेक्ट करे बस पूरे ठाकुर पे भरोसा रख के ही उन्होंने मठ को बचाया तो जब तक लोग रेडिक्यूल करते हैं जब तक अपोज करते हैं तब तक क्या है हम लोग अपना आध्यात्मिक जीवन को पूरा पक्का रख कि बिना आध्यात्मिक जीवन के हम लोग मर जाएंगे यह समाज यह सोसाइटी यह इवोल्यूशन नेचर हमको क्रश कर देगा। किंतु जैसे ही सक्सेस होते हैं तब लगता है अरे भाई इतना हार्ड डिसिप्लिन फॉलो करने की क्या जरूरत है? थोड़ा यहां पे रिलैक्स कर दो। थोड़ा वहां पे रिलैक्स कर दो। थोड़ा यहां पे रिलैक्स कर दो। किंतु ऐसा थोड़ा थोड़ा थोड़ा करके कब गहरे गड्ढे में जाके गिरेंगे। वो ठाकुर कहते हैं ना कलमबाड़ा रास्ता स्लोपिंग स्लोप। ना माने वो जो स्लोप है वो एक फोर्ट था किला वहां पे गए तो स्लोप है तो उस समय पता नहीं चला कि नीचे जा रहे हैं। पीछे देखा तो पता चला अरे कितना नीचे आ गए हैं। सो ही इज़ अ स्लोपिंग ये पाथ कि एक बार रिलैक्स करना शुरू किया पता ही नहीं चलेगा कितने नीचे चले गए हैं। सो एक्चुअली क्या है? देखिए यह जो फाउंडेशनल डेज है उसकी उस समय की घटनाएं उस समय की ये जो सिचुएशन उसको ठीक-ठीक स्टडी करके हमको पता चलता है कि हम आज प्रेजेंट युग में जो जी रहे हैं उस समय हमारे साथ में जो हो रहा है, हम जिस तरह से संघ को चला रहे हैं। मैं जिस तरह से संघ में अपने को एडजस्ट करने का प्रयास कर रहा हूं। मैं जिस तरह से अपने आध्यात्मिक जीवन को गठित करने का प्रयास कर रहा हूं वह सब ठीक कर रहा हूं कि नहीं। अगेन कथामृत में ठाकुर का बहुत कुछ है जो ठाकुर का सब कुछ कॉस्मिक लेवल पर है। तो मां का भी बहुत कुछ है अपने पास में मटेरियल किंतु मां क्या है? एक कम्युनिटी लाइफ में रही है तो कभी-कभी वो हमको ऐसा लगता है कि एज ए मक एक साधु को संग में कैसे रहना वो आइडियल मुझे कहां से सो वो आइडियल मिलना चाहिए वराह नगर के प्रारंभिक देखिए बादबाद में तो बहुत बड़ा लिटरेचर है एक बार विजानंद जी है शुद्धानंद जी है उनका आना प्रारंभ हुआ उसके बाद में संघ खास करके देखिए यह राजा महाराज जब प्रेसिडेंट है 1900 की साल से लेकर के 1922 साल तक 20 प्लस इयर्स बहुत ही सुंदर घटनाएं हैं कि संघ किस तरह से चला है किस तरह से राजा महाराज और फिर शरद महाराज शरद महाराज थे जनरल सेक्रेटरी राजा महाराज थे प्रेसिडेंट और बाबूराम महाराज स्वामी प्रेमानंद जी थे बेलूर मठ के मैनेजर तो इन लोगों ने किस तरह से संघ का फाउंडेशन है संघ के कन्वेंशन है उसको फॉर्म किया है यहां पे शशि महाराज थे साउथ इंडिया में तो किस तरह से यह मिशनरी एक्टिविटीज प्रचार कार्य साधुओं का जीवन किस तरह से गठित हुआ है बहुत ही डिटेल में अपने पास रिकॉर्ड है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं बट आई विश कि वराह नगर मठ के बारे में हमारा डिटेल और भी नॉलेज होता इट वुड हैव बीन वेरी यूज़फुल प्रत्येक घटना को हम यह मैग्नीिफाइंग ग्लास के भीतर में रख के हम डिटेल में डिस्कस करते हैं और इसमें से बहुत कुछ सीखते भी सही। सो एनीवे कुछ-कुछ घटनाएं हैं जो कि हम डिस्कस करेंगे मास्टर महाशय आए हैं बेलूर मठ में वराह नगर मठ में और शिवरात्रि के दिनों का शिवरात्रि के दिन का वो डिस्क्रिप्शन हमको दे रहे हैं जो कि अभी हम कल से पढ़ना प्रारंभ करेंगे। अनफॉर्चूनेटली अभी दो ही दिन है इस सप्ताह के स्वामी जी की लाइफ के एक आज का और एक कल का। सो एनीवे नेक्स्ट जब चांस आएगा तब डिटेल में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम ॐ