Transcript
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार षय राम कृष्णाय नम वैसे कल जो हमारा बात हो रहा था डे टू डे वेदांत मेरी दृष्टि में और एक ट्रांसलेशन जिस तरह से कल हमने देखा ना कि बंगोली में से गुजराती में ट्रांसलेट किया है तो उसमें किस तरह का एक क्रिटिकल डिटेल छोड़ दिया है कि मां अपने बच्चे के लिए दूध की बाटी लेकर बैठी है वह तो लिखा है किंतु वह बिल्ली को भगाने के लिए साथ में डंडा रखा है वह बात नहीं की है तो ऐसा ही एक दूसरा डिस्क्रिपेंसी मेरी नजर में आया अभी कुछ समय पहले स्वामी जी का वर्णन है बहुत सुंदर है ऐसा ही एजेक्ट हुबहू ऐसा है स्वामी जी का कि इंग्लिश में कि स्वामी जी वहां पर बेलूरमठ में पूरा विश्व विजय करने के बाद में जैसे अभी आखिरी दिन है उनके देखिए उन्होंने कितनी तपश्चार्य की कितना परिश्रम किया तब कहीं जाकर के बेलूरमठ की स्थापना हुई है और बेलूरमठ की स्थापना के लिए जो फंड कलेक्ट करना था उसको लेकर के भी कितना सारा कंट्रोवर्सी हुआ स्वामी जी ने अपने देह का एक एक बिंदु रक्त पूरा बहा करके वो फंड कलेक्ट किया है किंतु जब यह फंड बेलूरमठ में पहुंचा तब कुछ-कुछ ब्रिटेन के कुछ लोग थे उनके डिसाइल जैसे कि ईटी स्टर्डी या मिस मूलर उनको यह मन में प्रश्न होने लगा जब वो बेलूरमठ आए स्वामी जी के साथ में तो उन्होंने क्या देखा जैसे वह हमारे भारत में वो ब्राह्मण लोग देखते थे ना कि यह स्वामी जी लोग तो है नाम के सन्यासी किंतु बड़े ही भोग सुख में रह रहे हैं तो वैसे ही यह इट स्टडी और मिस मूलर इनका भी एक ऐसा आईडिया बन गया स्वामी जी और उनके गुरु भाइयों के बारे में और बेलूरमठ के बारे में कि यह लोग बहुत ही ज्यादा सुख और ऐश और आराम से रहते हैं त्यागी सन्यासी को तो यह सब चीजों की क्या जरूरत है माने स्वामी जी एक चिरू पीते थे वो स्मोकिंग करते थे तो उसको लेकर के स्टर्डी ने इतना हल्ला मचा दिया था कि आप एक एक पाउंड का चिरू पीते हैं तो स्वामी जी ने फिर उसका जो उत्तर दिया था डांट करके उसको बोला कि देखो मैं मेहनत करके पैसा अर्जन कर रहा हूं भारत में कार्य करने के लिए और फिर देखो देह को चलाने के लिए जो कुछ आवश्यकता है जो पौष्टिक आहार है या और कुछ भी उसके लिए तो पैसा मैं अर्जन कर रहा हूं मैं सब मेहनत कर रहा हूं तुमने जो थोड़ा पैसा दिया है उसको लेकर के तुम इतने चिल्लाते क्यों हो तुमने जिस पर्पस के लिए पैसा दिया पैसा तो उसी पर्पस के लिए जा रहा है ऐसा करके बहुत सारा कंट्रोवर्सी हुआ था बहुत लंबी कहानी है इन दोनों की स्वामी जी को कितने लोगों ने धोखा दिया कितने लोगों ने उनको पीछे से उनकी निंदा की ऐसे लोगों की कमी नहीं है कहानियों का अंत नहीं है किंतु जब सब कुछ समाप्त हो गया स्वामी जी बेलूरमठ की स्थापना कर दिए और अपने शयन गृह में यदि आप बेलूरमठ गए होंगे तो स्वामी जी का शयन गृह देखा होगा तो वहां पर बैठ कर के स्वामी जी जब अपने अंतिम दिनों में अंतिम सांसे गिन रहे थे उस कुछ दिनों का वर्णन एक एक जगह पे किया है अ उनकी लाइफ में कि शाम का समय है और स्वामी जी के कमरे में बत्तियां बहुत ही धीरे-धीरे जल रही है बहुत ही कम प्रकाश से और ऐसे लगता है जैसे कि तपोवन जैसा बना हुआ है और स्वामी जी ध्यान में मग्न है कभी-कभी भजन गुनगुनाते हैं स्वामी जी तो बहुत अच्छे सिंगर थे कभी-कभी भजन गाया करते थे तो गुनगुनाते हुए कभी भजन गा रहे हैं तो कभी कहीं ध्यान कर रहे हैं तो कभी कोई किताब हाथ में लेकर के कोई शास्त्र अपने हाथ में लेकर के पन्ने उल्टा रहे तो ऐसा सुंदर सुहाना वातावरण है और इस तरह से अच्छा वर्णन है सुंदर वर्णन है आखिर में किंतु फिर मैं उसका गुजराती सामने सामने देख रहा था और ट्रांसलेशन भी अच्छा किया है प्रत्येक सेंटेंस बाय सेंटेंस वर्ड बाय वर्ड किंतु जब वो पैराग्राफ के आखिर में पहुंचा तब मैंने देखा कि एक सेंटेंस जो ओरिजिनल लाइफ में है वो गुजराती में छोड़ दिया है वो सेंटेंस क्या है कि पहले तो इतना जैसे स्वर्ग जैसा वातावरण की कल्पना कर रहे हैं कि बेलर मर्ट जैसे कि ऋषि मुनियों की पावन भूमि ऋषि मुनियों का तपोवन फिर से गंगा के किनारे पुनर्जीवित हो उठा है वगैरह वगैरह इतना सुंदर वर्णन और आखिर में वह लिखते हैं ओरिजिनल लाइफ में लिखा है सिर्फ देयर इज ओनली वन डिस्कडमी कि डिस्टरबेंस जैसी सिर्फ एक ही बात है नोट यानी कि जद आप राग या तो फिर सूर का अभ्यास करते हैं म्यूजिक का तो कोई डिस्कॉर्डेंट नोट अर्थात कि कोई बेस बूरा कोई सडन गा दे तो बसूरी आवाज तो क्या है जो जो म्यूजिक की प्रैक्टिस करता है या तो गाना गाता है उसको कितना वो एक शौक जैसा लगता है तो इसको डिस्कॉर्डेंट नोट कहते हैं एक डिस्टर्बिग सूर ज बेसुरा सूर तो ये पूरे सुंदर वातावरण में सिर्फ एक बेसुरा सूर है कि गंगा में यह जो सब टीम लॉन्च बीच-बीच में से जाती है वो अपनी जोर-जोर से विसल बजाती है और उसका वो जो मशीन का जो आवाज है उसका वो वो एक बीच-बीच में एक डिस्टरबेंस खड़ा करता है बेसुरा सूर खड़ा करता है ऐसा पूरा पैराग्राफ में सुंदर वर्णन करने के बाद में ओरिजिनल लाइफ में यह आखिरी एक सेंटेंस लिखा है गुजराती में मैंने देखा कि ये आखिरी सेंटेंस मिस कर दिया है और जिन लोगों ने ट्रांसलेट किया होगा वे लोग यह सोचते होंगे कि अरे इतना सुंदर नंदनवन जैसा ऋषि मुनियों का तपोवन का सुंदर यहां पे वा व यह दिया है डिस्क्रिप्शन और फिर गंगा में यह सब टीम लॉन्च चल रही है और उसकी विसल ये सब दिखा कर के इसको क्यों बेसुरा बनाया जाए इतना सुंदर सूर में जब सब कुछ चल रहा है स्वामी जी अपने आखिरी दिनों में विश्राम जब कर रहे हैं ऋषि मुनि स्वयं तो उनको जबी जब ध्यान कर रहे हैं या तो फिर चिंतन मनन कर रहे तो उसमें बेसुरा सुर क्यों हम इंट्रोड्यूस करें तो इस खिरी सेंटेंस को हम निकाल देते हैं मैं ऐसा अनुमान करके सोच रहा हूं कि गुजराती में ट्रांसलेट करने वालों ने ऐसा सोचा होगा अभी देखिए कि मैं जैसे मैंने कहा था कल कि बहुत सारी चीजें हम पढ़के व इतना स्ट्राइक नहीं होता जब वो हमको तब स्ट्राइक होता है जब हम उसको नहीं पढ़ते हैं या तो फिर उसको मिस कर देते हैं तो मैंने जब ये ओरिजिनल वर्णन पढ़ा था तो इ क्या है कि परफेक्टली मैच हो जाता है मेरे खुद के एक्सपीरियंस के साथ में बेल मठ में मैं भी रहा हूं बहुत सुंदर वातावरण है और बीच-बीच में वो गंगा में वो लॉन्च वगैरह चलता रहता है स्टीम बोट वगैरह जो भी है उसकी आवाज और उसका डिस्टरबेंस यह सब तो हमने भी सहन किया है हमने देखा भी है तो तो इट परफेक्टली मैचेस विथ अवर एक्सपेक्टेशन एंड अवर एक्सपीरियंस तो हमने इसके बार मैंने इसके बारे में ज्यादा कुछ सोचा नहीं मैंने सिर्फ इतना सोचा था जब पहली बार पढ़ा था ये वर्णन कि अच्छा अच्छा तो स्वामी जी के समय में भी ऐसा ही था जैसे हम लोग आज जो एक्सपीरियंस कर रहे हैं आजकल तो क्या है वो पार्टी बोट चलती है बड़ी-बड़ी वहां पे वो लाइट और वो सब जोर-जोर से म्यूजिक बजता है बेलू मट के सामने ही लाकर के ये सब करते हैं जानबूझ करके करते होंगे पता नहीं शायद किंतु तो ये सब हमने देखा है तो मैंने सोचा कि इसका आरंभ स्वामी जी के समय में ही हो गया होगा तो ऐसा मैंने सोचा था किंतु जब मैं गुजराती में देखा कि देखिए कि जनमानस की जो एक्सपेक्टेशन होती है भक्तों की जो एक्सपेक्टेशन होती है वो क्या है कि एक सुंदर सुरीला जीवन आध्यात्मिक जीवन हो उसमें एक भी बेसुरा सुर ना हो उसमें एक भी डिस्कॉर्डेंट नोट ना हो उसमें थोड़ा सा भी डिस्टर्बिग कोई भी प्रसंग ना हो कोई भी विचार ना हो संपूर्ण रूप से सुख पूर्वक ये हमारा आध्यात्मिक जीवन चलता रहे और जब हमारे जीवन में नहीं होता तो हम एक प्रोजेक्शन करते हैं अपनी एक्सपेक्टेशन को कि हां बेलूर मठ में जो साधु लोग रहते होंगे या कोई बड़े-बड़े आश्रम है अच्छे-अच्छे आश्रम वहां पर जो साधु सन्यासी साधक लोग रहते होंगे उनका जीवन कितना सुंदर सुचारू रूप से चल रहा है सब कुछ जैसे सूर ताल लय में बंधा हुआ और एक ही सूर ता लय जो कि ईश्वरीय भजन ईश्वरीय गान करता है उसमें कभी भी थोड़ा सा भी डिस्टरबेंस नहीं होगा ऐसा हम एक एक्सपेक्टेशन रखते हैं ऐसा हम एक इमेजिनेशन करते हैं फिर हम सोचते हैं कि अरे मेरा जो डे टू डे लाइफ है उसमें मैं साधना करने का जो प्रयास कर रहा हूं दिन प्रतिदिन मैं जो स्मरण मनन चिंतन यह सब करने का प्रयास कर रहा हूं किंतु इसमें क्या है कि मुझे तो पूरे संसार की जवाबदारी मेरे सर के ऊपर में है तो मैं तो यह सक्सेस पूर्वक नहीं कर पाऊंगा साधु लोगों की बात अलग है जो लोग जिस तरह से आश्रम में तपोवन में रहते हैं उन लोगों की बात अलग है मेरे लिए मेरे से यह सब नहीं होगा उनसे यह सब भले हो किंतु देखिए जो एक्सपेक्टेशन या इमेजिनेशन है उससे रियलिटी कितना डिफरेंट है स्वामी जी के खुद के जीवन में ऋषि होने के बावजूद भी सप्तऋषि से अवतरण किए हुए ऋषि शिव के अंश स्वयं होने के बावजूद भी उनके जीवन में इतना स्ट्रगल इतना परिश्रम आखिर में क्या क्या हुआ था पता है स्वामी जी अमेरिका से रुपया लेकर आए पहले तो उनके घर में से उनके माताजी और पिताजी को निकाल दिया था उनके पिताजी ने घर बनाया था और दया करके अपने भाइयों को वगैरह को रखा था जब पिताजी का देहांत हो गया तो भाइयों ने क्या किया कि स्वामी जी और उनके परिवार को घर में से निकाल दिया सबसे पहले तो इतना बड़ा उनके साथ में अन्याय हुआ उसके बाद में स्वामी जी इतना परिश्रम करके अमेरिका से हजार 6000 ना कितना कुछ 000 लेकर के वो मकान खरीदा तब उन लोगों ने क्या किया कि पजेशन नहीं दे रहे तो अभी तो कोर्ट में केस होगा और स्वामी जी लिखते हैं कि यह लोग क्या सोचते हैं पता है कितने चालाक है वे लोग सोचते हैं कि मैं अभी इतना ख्यातनाम हूं और सन्यासी हूं तो मैं लोक लाज से लोक लज्जा के भई से मैं कोर्ट में नहीं जाऊंगा किंतु मैं क्या करूं मेरे तो रुपए भी गए और मकान भी नहीं मिला और मेरी मां को तो इतनी मेरी मां इतनी बुरी परिस्थिति में है कैसे भी करके कोर्ट केस करना पड़ेगा और मकान का पोजीशन लेना पड़ेगा तो यह सब स्वामी जी के साथ में हो रहा था ऑन वन हैंड पूरे विश्व में वेदांत की स्थापना करना जो अमेरिका जाकर के कितने प्रचंड सब विद्वान है प्रोफेसर है उन लोगों के साथ में आर्गुमेंट करके उनके प्री कंसीव नोशंस जो है रिलीजन और स्पिरिचुअलिटी के बारे में उसको तोड़ करके वेदांत का यह विजय ध्वज वहां पर स्थापित करना यह एक कार्य अपनी खुद की एक खुद का एक टेंडेंसी है कि सब समय मन अंतर्मुखी स्वामी जी बैठते हैं वैसे ही वह अल्मोड़ा में हुआ वो लेख मिशिगन के किनारे पर हुआ जहां जहां पर भी स्वामी जी थोड़ा सा भी बैठते हैं आंख बंद करके थोड़ा सा सुकून से इमीडिएट उनका मन निर्विकल्प समाधि की ओर दौड़ता है तो जोर करके मन को नीचे रखना फिर ये एक कोर्ट केस तो देखिए कि जब कोई भी ऐसा सोचता है कि मेरी लाइफ में बहुत सारे समस्याएं हैं बहुत सारे डिस्टरबेंस है बोल कर के मैं साधना नहीं कर पा रहा हूं और इस तरह क्या सोचना भी कोई अर्थ विहीन है पहले तो मेरे बाह्य जीवन में सब कुछ शांत हो जाए फिर मैं आंतरिक जीवन के बारे में कुछ सोचूंगा पहले तो मेरा सांसारिक जीवन या पारिवारिक जीवन या तो आर्थिक परिस्थिति सब कुछ एक लेवल पे चली जाए उसके बाद में मैं सोचूंगा कि किस तरह से नियमित रूप से साधन भजन करना है तो यह सोचना कैसा है पता है ये ऐसा सोचना है कि पहले मैं स्विमिंग सीख लूं उसके बाद में मैं पानी में कू दूंगा या तो फिर मैं पानी में जाऊंगा ऐसा होने ही नहीं वाला है जब तक आप पानी में नहीं जाएंगे पानी में प्रवेश नहीं करेंगे तब तक आप तैरना सीखेंगे ही नहीं तो किनारे बैठ कर के यह सोचना जब पहले मैं तैरना सीख लू बाद में मैं पानी में जाऊंगा तो यह ऐसा हो गया कि बाह्य जीवन में स्थिरता आने के बाद में मैं साधन भजन स्टार्ट करूंगा तो ऐसा होने ही नहीं वाला है वो कभी भी बाह्य जीवन में स्थिरता आएगी नहीं माया का यह चक्र है वो अस्थिरता अनियमितता यह दुष्टता यह सब कुछ संसार के साथ में जड़ित है कभी कुछ ना कुछ आ ही जाएगा कि यह सोच कर के साधना में विक्षेप साधना में विराम साधना में बेसुरा सूर ना आ जाए यह ध्यान में रखना अपना कर्तव्य है तो दिन प्रतिदिन के जीवन के बारे में यह एक मतलब विचार जो मैं कल सोच रहा था उसके बाद में क्या है पता है कि हम लोग सोचते हैं जैसे मां के जीवन के बारे में सोचते हैं या स्वामी जी के के ठाकुर के बारे में कि ये लोग जब कर्म करते हैं तो क्या उनका मन सब समय ईश्वर में संलग्न रहता है ईश्वर के स्मरण मनन में सब समय लगा रहता है जैसे ठाकुर कहते थे कि एक काम वाली है एक बाई है किसी धनी के घर में काम कर रही है तो वह देखती है कि उसका यह धनी व्यक्ति का लड़का अपने जहां पर वह एंप्लॉयर है उसके उसका लड़का उसको मेरा रामू मेरा बच्चा मेरा लड़का ऐसा करके वह सब समय पुकारती है किंतु उसके मन में यह बात सब समय ठीक है कि उसका खुद का लड़का तो कहीं गांव में है कहीं धूल में खेल रहा है उसका केयर करने वाला भी कोई होगा कि नहीं मां शहर में है तो मां के अलावा बच्चे की कौन केयर करेगा उसको कोई ठीक से नियमित रूप से खाना भी खिलाता होगा कि नहीं वह रोएगा तो अपनी गोद में बिठा करके उसको शांतोना देने वाला भी कोई होगा कि नहीं मां को तो सब समय अपने बच्चे की फिक्र है किंतु फिर भी मुंह पर हासी रख कर के अपने एंप्लॉयर का जो लड़का है उसको वो अपना बेटा समझ कर के उसका उसका लालन पालन करती है तो ठाकुर कहते हैं कि इस तरह से 90 पर 80 पर अटेंशन ईश्वर में रखना चाहिए बाकी 10 पर 20 पर से संसार का कार्य करना चाहिए जैसे एक दूसरा उदाहरण ठाकुर देते हैं दांत में सब समय दर्द हो रहा है तो दांत का दर्द एक ऐसी चीज है कि आप जितना ही कार्य क्यों ना करें आपका मेजोरिटी ऑफ आपका जो माइंड का जो अटेंशन है वो तो आपके दांत के दर्द के ऊपर में ही रहेगा तो वैसे एक हाथ से ईश्वर को लेकर के दूसरे हाथ से संसार का कार्य करना चाहिए ठाकुर की यह बात है किंतु इस बात को हम मां और स्वामी जी के जीवन में देखते हैं तो हमको लगता है कि ठीक-ठीक से ये हमको एगजैक्टली ये नहीं मैच हो रहा है मां के जीवन में देखिए कि मां कहती है किसी ने मां को पूछा था कि सब समय अपना स्वरूप याद रहता है मां ने कहा नहीं किंतु जब मैं इच्छा करती हूं फट करके वोह स्वरूप याद हो जाता है स्वामी जी का कल हमने देखा कि स्वामी जी कहते हैं कभी-कभी इतने परेशान हो जाते थे कभी इतने ये हो जाते थे एजिटेटेड हो जाते थे कि वो एजटेक के वो क्रोध में आकर के कुछ भी बोल देते थे वो जो एक फेमस प्रसंग विज्ञानानंद जी महाराज और राजा महाराज का कि स्वामी जी ने उनको कहा कि गंगा के घाट पे गंगा के किनारे एक सुंदर घाट बनाया जाए तो राजा महाराज और विज्ञान महाराज दोनों रेडी हो गए फिर क्या हुआ किंतु विज्ञान महाराज स्वामी विज्ञानानंद जी महाराज वो तो एक आरके इंजीनियर थे सिविल इंजीनियर थे वो ब्रिटिश गवर्नमेंट में उनको जॉब था उनका एज अ डिस्ट्रिक्ट इंजीनियर के रूप में तो उनका तो बड़ा ही यह सब बातों के ये सब बातों में उनकी बड़ी ही दक्षता थी बड़ा ही एक्सपीरियंस था इसके बावजूद उन्होंने जो एस्टीमेट निकाला कि गंगा के किनारे पे घाट बनाने में कितना खर्च होगा तो एक्चुअल खर्च एस्टीमेट से कहीं ज्यादा बढ़ गया तो विज्ञान महाराज जाकर के राजा महाराज को बोला कि महाराज जी अभी तो मैं तो बड़ा ही डर गया हूं एक्सपेंसेस तो खर्चा तो बढ़ता ही जा रहा है पता नहीं स्वामी जी के जानने में यह बात आएगी तो स्वामी जी क्या कहेंगे तो राजा महाराज ने कहा सब जिम्मा मेरे सर पर छोड़ दो तुम निश्चिंत रहो अब जब स्वामी जी के जानने में आया कि सही में पैसा कुछ इस तरह से हुआ है एस्टीमेट जितना था उससे एक्चुअल एक्सपेंस बहुत ज्यादा बढ़ गया है तब स्वामी जी ने गुस्से में आकर के राजा महाराज को जो गाली दी है जो उनको मैंने उनको उन्होने डांटा है इतना जोरों से डांटा है बेचारे राजा महाराज जाकर के अपने में बैठ कर के अपने बिस्तर में बैठ कर के रोना शुरू कर दिए इतना डांटा था राजा महाराज को और मीनवाइल स्वामी जी को धीरे थोड़ी देर के बाद में एकदम व जिस तरह वो एजि एजिटेटेड हो गए थे उसमें से वो फिर से वो शांत हो गए और तब उनको पछतावा हुआ पश्चाताप हुआ कि अरे यह तो ठाकुर का मानस पुत्र वो तो मेरा गुरु भाई मुझे मुझे इतना प्रेम करता है मुझे इतना स्नेह करता है मेरी इतनी केयर करता है मर्ट मिशन की पूरी जवाबदारी इसके सर के ऊपर में है उसको मैंने इस तरह से डांटा तो स्वामी जी दौड़ के गए राजा महाराज के कमरे में और उनको आलिंगन बद्ध करके खुद से रोना शुरू कर दिया कि राजा मुझे क्षमा कर दो मैंने तुमको गुस्से में आकर के क्या सब उल्टा पुल्टा बोल दिया तुमको तो देखिए कि स्वामी जी तो जद इस तरह के मैंने इतने सारे प्रसंग पढ़े हैं कि स्वामी जी कभी एजिटेटेड हो जाते हैं कुछ भी बोल देते हैं किंतु बाद में फिर से उनको इस तरह से क्षमा भी मांग लेते हैं और शांत भी हो जाते हैं आशीर्वाद भी दे सब कुछ होता है मां के जीवन में भी देखेंगे कि राधू माकू नलिनी पागली मामी अपने भाई काली मामा वर्धा मामा फिर यह पागल डिवटी वो सबको लेकर के मां का संसार था उनके साथ में वोह कभी-कभी इस तरह से मां बेचारी परेशान हो जाती थी कुछ बोल भी देती थी वो पागली मामी ने मां को एक बार क्या कुछ बोल दिया था वो मार मारने को गई थी मां को तो माने बोल दिया कि पागली तोर हाथ खश पड़ पागली तुम्हारा हाथ जो है वो गल के गिर जाएगा और सही में वो हुआ कि पागली मामी को कुष्ठ रोग हो गया था अभी हम सोचेंगे कि मां श्राप देगी ऐसा कभी सोच सकते हैं तो किंतु देखिए कि यह सब घटनाएं हम इनके जीवन में देखते हैं तब प्रश्न होता है कि क्या दिन प्रतिदिन प्रत्येक सेकंड ईश्वर का स्मरण मनन इनको नहीं होगा और अपना सही स्वरूप है वह तो देवी है मां जगदंबा स्वयं है स्वामी जी शिव के अंश है ये ये बात क्या उनको उस समय स्मरण नहीं होगी जब ये लोग तरह से आदर क्रोधित हो जाते हैं या तो फिर थोड़े से एजिटेटेड हो जाते हैं उस समय उनको यह बात नहीं स्मरण होगी तो देखिए कि मेरा जो जिस तरह का रीडिंग है अपने लिटरेचर का और आध्यात्मिक जीवन का मैंने इस तरह से मैं एनालिसिस किया है कि देखिए कि अष्टांग योग जब आप पढ़ेंगे राजयोग में तो पहले तो यम है नियम है फिर आसन प्राणायाम प्रत्याहार और फिर धारणा ध्यान समाध है तो यम और नियम अर्थात कि यह एथिक्स एंड मोरालिटी आप अपने मन को किस तरह से डिसिप्लिन करते हैं और आप जगत के साथ में किस तरह से बिहेव करते हैं सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप सोच संतोष स्वाध्याय और ईश्वर प्रितान 10 यम और नियम है अपने माइंड को डिसिप्लिन रखना और लोगों के साथ में एक कंपैशनेट बिहेवियर करना एथिक्स और मोरालिटी जिसको हम आज की भाषा में कहेंगे तो यह दिन प्रतिदिन का हमारा जो व्यवहार है उसमें ठाकुर महा स्वामी जी या तो डायरेक्ट डिसाइल किसी को भी देखिए वो शायद मोमेंट उनको अपना स्वरूप विस्मृत हो गए होंगे किंतु कभी भी उन्होंने अन एथिकल बिहेवियर नहीं किया इम्मोरल बिहेवियर उन्होंने कभी नहीं किया हो ही नहीं सकता ठाकुर के जीवन में एक सुंदर घटना कि वह शंभू मल्लिक के वहां गए थे पेट का दर्द था शंभू मलिक ने कह दिया वह दक्षिणेश्वर के पास में उनकी बागान वाड़ी है तो शंभू मलिक ने कह दिया कि उनके घर में एक चेरीटेबल डिस्पेंसरी चलती है वहां से थोड़ा अफीम ले लीजिएगा अफीम खाने से पेट का दर्द शांत आराम हो जाएगा तो ठाकुर ने तो कहा जो भी कहा होगा उस समय ठीक है अब जब निकलने लगे तो याद आया कि अरे अफीम लेना तो मैं भूल गया हूं तो वापस गए वापस गए तो शंभू मलिक तो चला गया था अपने कमरे में किंतु जो डिस्पेंसरी देख रहा था वह आदमी वहां पर था ठाकुर का बड़ा ही भक्त था तो जैसे ही उसने सुना कि ठाकुर को अफीम चाहिए तो फट कर के उन्होंने ठाकुर को एक छोटी सी पोटली में अफीम दे दिया अभी ठाकुर चलते हुए दक्षिणेश्वर वापस आ रहे हैं एकाएक रास्ते में देखा कि सब कुछ उनको अंधेरे की तरह दिखाई दे रहा है पेर भी कहां इधर-उधर जा र है सीधे गंगा की ओर जा रहे है और बोल रहे हैं कि मां मैं क्या गंगा में गिर जाऊंगा क्या मैं पानी में डुब जाऊंगा क्या ऐसा ठाकुर बोल रहा है तो ठाकुर भी समझ नहीं पा रहे कि ऐसा क्यों हुआ फिर उनको याद आया कि अरे यह जो अफीम जो लिया है वो तो शंभू मलिक को बोल कर के या तो शंभू मलिक ने बोला था कि आप ले जाइए किंतु उसको पता नहीं है कि मैंने लिया है तो बिना किसी मालिक की परमिशन के कोई चीज लेना इग्नोर से में जानकारी नहीं है वो चीज लेना ये तो चोरी हो गई तो ये तो इमीडिएट ठाकुर वापस मुड़े जैसे ही वापस ग मुड़े व शंभू मलिक के घर की ओर तो रास्ता साफ दिखने लगा फिर ठाकुर को समझ में आ गई कि ऐसा क्यों हो रहा है शंभू मलिक के घर गए और देखा अभी इस बार देखा जाकर के तो शंभू मलिक तो चला ही गया था किंतु जो आदमी ये डिस्पेंसरी चला रहा था जिसने अफीम दिया था वो भी चला गया था तो ठाकुर ने क्या कहा किया कि गेट बंद था तो उन्होने जोर से चिल्ला करके ये शंभू यह रहा तुम्हारा अफीम ऐसा करके वो अफीम का वो जो छोटी पटली थी वो भीतर में फेंक दी घर के भीतर में और वापस मुड़े तब जाकर के दक्षिणेश्वर की ओर का रास्ता उनको स्पष्ट दिखने लगा तो देखिए कि बेचा हो पाने अनजाने हो मां बेचा पा पड़ते देवेना ठाकुर कहते हैं कि बिना जद गलती करके भी मां उनको गलती नहीं करने देगी वो सुंदर दूसरी एक कहानी है कि ठाकुर जब बीमार थे तो कोई एक फल लाना था तो योगेन महाराज ने कि कोई वो फल लाते थे किसी बागान में से बगीचे में से तो एक दिन लाए फल तो ठाकुर खा नहीं पाए तो ठाकुर ने पूछा अरे ये क्यों मैं खा नहीं पा रहा हूं जाकर के देखो तो क्या प्रॉब्लम है तो योगेंद्र महाराज ना कि जो भी महाराज जी होंगे वह वापस गए देखा कि जो बगीचा जो है जहां से फल तोड़ते थे उसकी मालिक और किसी को ट्रांसफर हो गई थी उसका ओनरशिप और किसी के हाथ में चला गया था तो अभी पुराने मालिक को तो बोल कर के फल ले रहे हैं किंतु नए मालिक को बिना अभी पता ही नहीं है कि मालिक नया आ गया है तो ऑफकोर्स उनका तो परमिशन लिया नहीं है तो यह तो चोरी हो गई तो इसीलिए ठाकुर को पता ही नहीं है कि ऐसा सब हुआ है किंतु फिर भी वह फल नहीं खा पा रहे तो देखिए कि एथिक्स और मोरालिटी इनके जीवन में प्रति क्षण आप देखेंगे कि ऐसा कोई भी कार्य उन्होंने नहीं किया जो कि इम्मोरल हो या तो अन एथिकल हो तो दिन प्रतिदिन की आध्यात्मिकता के बारे में यदि हम सोचेंगे तो ठाकुर की बात तो एक हो गई कि चलो वह 90 पर माइंड ईश्वर में रख कर के कार्य करेंगे और ईश्वर गलती से भी उनको गलती नहीं होने देंगे हमारा तो ऐसा नहीं है हम तो जा बूझ कर के कभी-कभी ये सब तरह का बिहेवियर करते हैं तो हम लोगों के लिए यदि आध्यात्मिकता स्पिरिचुअल लाइफ वेदांत दिन प्रतिदिन के क्षण क्षण में यदि उसको परो देना है यदि क्षण क्षण हमको वेदांत को लेकर के रहना है मेडिटेशन या तो स्पिरिचुअलिटी को लेकर के रहना है तो उसका एक उपाय है कि हम कभी भी कोई भी अन एथिकल कार्य ना करें किसी भी तरह का इम्मोरल कार्य ना करें यदि हम बाह्य जीवन में इस तरह से रह पाएंगे तो फिर दिन के आखिर में या तो फिर सुबह को अपने मन को शांत करके जो भी कुछ क्षण के लिए बैठते हैं व सार्थक होगा वरना हम यह सोचेंगे कि अच्छा डे टू डे लाइफ में स्पिरिचुअलिटी किस तरह से हो तो कोई कोई बोलता है कि मैं माला लेकर के घूमू चारों ओर व जप करता रहूंगा आजकल वह क्या है पता है वो अंगूठी की तरह एक पहनने का आता है मशीन उसके ऊपर में एक बटन रहता है ब दबाते रहिए वो जप चलता रहेगा तो यहां पर कोई कोई डिवोटा आते हैं मंदिर की परिक्रमा करते हैं लोगों के साथ में गप लगाते हैं और हाथ में वो मशीन से जप करते रहते हैं और फिर कभी-कभी कहते हैं हमने तो इतने लाख जप कर लिए मुंह से सब गप लगाते रहते हैं पूरी संसार की बातें चलती रहती है ठाकुर ने क्या कहा कोली काता ते लोकेरा लखो लोखो जॉब करे नहीं खान की पजत जॉब करेने इे माने कलकाता में लोग लाखों लाखों जप कर लेते हैं वो मछली का भावता करते हैं वो बाजार में गए हैं कोई कोई चीज खरीदनी है वो भावता उसका करते है एक हाथ से जब चल रहा है दूसरे हाथ से वो भावता चल रहा है जिसका चरित्र अच्छा नहीं ऐसे लोग भी कितना लखो जप कर लेते हैं से जप करने से क्या हुआ यदि एक घड़ा है घड़े में काना है नीचे में एक होल है और घड़े में आप पानी डालते हैं तो वो काने में से होल में से सब पानी गिर जाएगा वो घड़ा भरेगा नहीं तो वैसे ही ये एथिक्स और मोरालिटी जो है वो हमारा एक इंटीग्रिटी है अपने जीवन में जो जब ध्यान हम करेंगे वो इस घड़े में जद हम को भर करके रखना है आज मैंने 10 मिनट किया तो घड़े में रहा 10 मिनट कल मैंने दूसरा 10 मिनट इस घड़े में डाला जब तो वो जब पहले का 10 मिनट और आज का 10 मिनट मिला करर के 20 मिनट हुआ यदि घड़े में इस तरह से होल है तो आज का 10 मिनट जैसे ही डाला फिर खड़े होकर के मैं बाहर निकला अपने कमरे से और 10 मिनट बह गया कल उठ कर के मैंने दूसरे 10 मिनट डाले तो परसों दिन देखा कि वो भी बह गए हैं तो ये 10 मिनट करके आपको लाखों जप अपने जीवन में करने हैं तो एथिक्स और मोरालिटी जो है वो डे टू डे लाइफ में होनी चाहिए डे टू डे लाइफ में वेदांत क्षण प्रति क्ण में वेदांत इसका जो मेरा रीडिंग है वह यह है कि यह नहीं कि आप प्रत्येक क्षण ईश्वर का नाम लेते रहे या तो प्रत्येक क्षण आप सो हम जो अजपा जब जिसको कहते हैं वो चलता रहे वो आएगा किंतु वो बहुत एडवांस परिस्थिति है जब आज हम प्रारंभिक अवस्था में है या तो माध्यमिक अवस्था में है साधना की उस समय हमको क्या चाहिए कि दिन जब हम बाह्य जो भी व्यवहार करते हैं उसमें एथिक्स और मोरालिटी को बनाए रखें और जब हमारी आंतरिक साधना है इससे क्या होगा एथिक्स और मोरालिटी से यम और नियम का यथा साध्य यथा साध्य ऐसा नहीं है कि 100% पालन करें वह तो किसी से भी संभव नहीं इतना उच्च आदर्श हमारे सामने ऋषि मुनियों ने रख दिया है हम लोग जद ऐसा सोचेंगे अरे बाप इतना 100% सच बोलना संभव नहीं है तो ओके जितना हो सके उतना बोलिए मैंने शुरुआत तो करना वो हमारा कर्तव्य है तो यथा साध्य यम और नियम का पालन करते जाना यह हुआ डे टू डे लाइफ में वेदांत डे टू डे लाइफ में क्षण प्रतिक्षण में आध्यात्मिकता स्पिरिचुअलिटी बाद में हम एक आंतरिक जीवन अपना पैरेलल चलता है वो सुबह को शाम को 10 मिनट 15 मिनट वो चलता रहे तो यह मैंने वो थोड़ा सा इसके बारे में सोचा था मेरा खुद का रीडिंग अभी देखिए कि सबका अपना अपना एक एनालिसिस होता है किंतु मैंने जो अपने खुद के एक्सपीरियंस से देखा वो मैंने इस तरह से सोचा अच्छा अभी थोड़ा सा पाठ कर लेते हैं कॉस्मस माइक्रो कजम प्रवचन में से स्वामी जी का हम देख रहे थे स्वामी जी क्या कहते हैं कल तो हमने देखा कि वो प्रश्न सनातन प्रश्न का सनातन उत्तर कि मृत्यु के बाद में चिता के भस्मी भूत हो जाने के बाद में पंच महाभूत का चीता में भस्मी भूत हो जाता है तो फिर कुछ रहता है कि नहीं रहता क्या मैं जन्म मृत्यु जरा व्याधि में चक्र में पिसता ही जाऊंगा कि कुछ मेरे भीतर में दिव्यत्वाची मैं यह पंच महाभूत का बना हुआ शरीर नहीं यह मन बुद्धि चित्त अह अकार रूपी अंतःकरण भी नहीं मैं इन सबके परे एक अनंत अजर अमर आत्मन हू जिसका ना ही अंत है ना ही मने स्पेस और टाइम से ऊपर है यानी अंत आरंभ यह सब तो स्पेस और टाइम के कांसेप्ट है मुंह से जो कुछ भी बोला जाता है नेति नेति नेति जो जो भी आपने बोला क्या आत्मन अमर है तो नेति क्या आत्मन का प्रारंभ नहीं है नेति माने अर्थात क्या है कि हमारे स्पेस और टाइम के भीतर स्पेस टाइम एंड माइंड स्पेस टाइम पोजीशन एंड माइंड कॉन्शसनेस स्पेस टाइम पजेशन एंड कॉन्शसनेस ये चार कांसेप्ट की फ्रेमवर्क के भीतर में हम रहते हैं एंड आत्मन गोज बियोंड द फ्रेमवर्क ऑफ स्पेस टाइम कोजन एंड कॉन्शसनेस तो अभी उसके बारे में बोलना सोचना बातें करना लिखना सब कुछ माने वो एक आभास मात्र है आत्मन क्या है सच्चित आनंद स्वरूप अभी सच्चित आनंद भी तो ये चार के भीतर में हमारे वो मटेरियल इसिक फ्रेमवर्क के भीतर में है आत्मन का सही स्वरूप क्या है उसका उत्तर हमको पहले से ही ऋषि मुनियों ने दे दिया है हमारे शास्त्र में किंतु आधुनिक समय के अनुसार इस प्रश्न को सब समय सनातन प्रश्न का सनातन उत्तर आधुनिक समय के अनुसार समय समय के अनुसार उस समय की भाषा में दिया जाता है ऐसा स्वामी जी ने कहा इसके बाद में अभी स्वामी जी डिटेल में जाते हैं अभी एक्चुअल एक्सपोजिशन स्टार्ट होता है स्वामी जी का क्या कहते हैं आई एम लुकिंग एट यू मैं आप लोगों के सामने देख रहा हूं हाउ मेनी थिंग्स आर नेसेसरी फॉर दिस विजन यह दृश्य जो है मैं आपको देख रहा हूं यह दृश्य को सार्थक होने के लिए कौन-कौन सी चीजें चाहिए मैं आपको देख पा रहा हूं यह देखने की क्रिया के लिए क्या-क्या चाहिए फर्स्ट द आईज देखने के लिए सर्वप्रथम तो आंख चाहिए फॉर इफ आई एम परफेक्ट इन एवरी अदर वे एंड यट हैव नो आइज आई शल नॉट बी एबल टू सी यू जद मैं संपूर्ण रूप से परफेक्ट हूं मेरे सशक्त शरीर है मेरे बहुत ही अच्छे सुनने के लिए कान है मेरे बहुत ही सुंदर मेरा मन है मने मेमोरी पावर स्मृति शक्ति सब कुछ है किंतु मेरी आंखें नहीं है तो मैं आपको नहीं देख पाऊंगा देखने के लिए आंखों की आवश्यकता है यदि मैं बाकी सब तरह से परफेक्ट हूं किंतु आंख नहीं तो मैं नहीं देख पाऊंगा सेकंड द रियल ऑर्गन ऑफ विजन अभी हमको पता अभी स्वामी जी उस समय पता नहीं किस तरह से यह सब उन्होंने सोच करके रखा आज हमको पता है कि यह जो बाह्य लेंस जो है वह तो एक्चुअली देखता नहीं है या तो फिर यह तो सब लाइफ लाइट कैप्चर करता है लाइट को इंटरप्रेट करता है यह हमारे ब्रेन के भीतर में जो विजन का वो पार्टिकुलर ये पोर्शन है विजन का जो एल्गोरिदम जद कहेंगे वो इस लाइट को इंटरप्रेट करता है जैसे कंप्यूटर में होता है ना मैंने यहां से कुछ इनपुट डाला तो इनपुट का क्या अर्थ समझने के लिए कंप्यूटर में एक ऐप होता है सॉफ्टवेयर होता है तो यह सॉफ्टवेयर जो है यह हार्डवेयर है अपनी आंख लेंस जो कि विजन कलेक्ट करता है सॉफ्टवेयर है अपने ब्रेन के भीतर में यह एल्गोरिदम जो कि लाइट को इंटरप्रेट करते हैं कहते हैं कि हां मैं जो देख रहा हूं यह किताब है यह जो मैं देख रहा हूं यह कंप्यूटर है यह जो मैं देख रहा हूं मेरा हाथ है यह जो मैं देख रहा हूं मेरे वस्त्र है ये इंटरप्रिटेशन करता है भीतर का सॉफ्टवेयर सेकंड द रिय रियल ऑर्गन ऑफ फिजन फॉर द आईज आर नॉट द ऑर्गन्स दे आर बट द इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ फिजन एंड बिहाइंड देम इज द रियल ऑर्गन द नर्व सेंटर इन द ब्रेन दूसरा चाहिए यह ब्रेन के भीतर में जो इसको इंटरप्रेट करने वाला न्यूरल नेटवर्क है वो क्यों क्योंकि आंख जो है वो तो सिर्फ एक इंस्ट्रूमेंट है और इसके भीतर में रियल ऑर्गन रियल अपने ब्रेन रियल न्यूरल नेटवर्क है जो कि सिग्नल को इंटरप्रेट करता है इफ दैट सेंटर बी इंजर्ड अ मैन मे हैव द क्लीयरेस्ट पेयर ऑफ आइज यट ही विल नॉट बी एबल टू सी एनीथिंग यदि हमारे ब्रेन में जो न्यूरल नेटवर्क है जो यह विजुअल क्यूज को इंटरप्रेट करता है जो प्रकाश कलेक्ट करता है अपनी आंखें उसको इंटरप्रेट करने के लिए ब्रेन में जो न्यूरॉन्स है उसको यदि हो जाए उसमें जद इंजरी हो जाए तो आंख जितना ही चाहे वह प्रकाश कलेक्ट करती रहेगी कुछ दिखने वाला नहीं सो इट इज नेसेसरी ट दिस सेंटर और द रियल ऑर्गन बी देर तो आंखों के आंखों से भी ज्यादा इंपॉर्टेंट है न्यूरल नेटवर्क अपने ब्रेन में जो कि वहां पर हो आंखों के सिग्नल को हमारे लिए इंटरप्रेट करे दस विथ ऑल अवर सेंसेस यह जिस तरह से आंख के बारे में में सही है वैसे ही हमारी सभी इंद्रियों के लिए सही है जीवा का स्वाद मेरी जीभ तो है उसमें मैं मिठाई तो खाता हूं किंतु ब्रेन में यह मीठा है यह तीखा है यह तेता है इस तरह के सिग्नल इंटरप्रेट करने वाले न्यूरॉन को जद इंजरी हो जाए उसमें डैमेज हो जाए तो मैं कितना ही चाहे वो मीठा तीखा तेता खाता रहूंगा वो मुझे समझ में ही नहीं आएगा कि मैं क्या खा रहा हूं वो सेंस ऑफ टेस्ट है ना वो कभी जैसे कोरोना में बहुत सारे लोगों को हुआ था कि सेंस ऑफ स्मेल चला जाता है व यहां पर अगरबती यहां पर भाई आते हैं उनको कोरोना में वो स्मेल का उनको चला गया सेंस तो बहुत सुंदर अगरबत्ती भी जलाई है तो वो बोल र है कि क्या आपने अगरबत्ती जलाई मुझे तो समझ में नहीं आ रहा कि किस तरह की स्मेल है तो कोरोना में बहुत सारे लोगों को ऐसा हुआ था तो क्या है कि नाक तो है हवा तो भीतर में जा रही है किंतु हवा वो उसकी सुंदर खुशबू है कि बदबू है ये इंटरप्रेट करने वाला जो न्यूरल नेटवर्क है ब में वो डैमेज हो गया है द एक्सटर्नल ईयर इज द इंस्ट्रूमेंट फॉर कैरिंग द वाइब्रेशन ऑफ साउंड इनवर्ट टू द सेंटर जैसे एग्जांपल के रूप में स्वामी जी कहते हैं बाहर का जो हमारा कान है वहां से यह जो साउंड सिग्नल जो है वह भीतर में वो कलेक्ट करता है और ब्रेन की ओर भेजता है यट दैट इज नॉट सफिशिएंट किंतु सिर्फ सिग्नल कलेक्ट करना सफिशिएंट नहीं है सपोज इन योर लाइब्रेरी यू आर इ टली रीडिंग अ बुक एंड द क्लॉक स्ट्राइक्स यट यू डू नॉट हियर इट मान लीजिए कि आप लाइब्रेरी में बैठ कर के बड़े ही तन्मयता से एक किताब पढ़ रहे हैं और यहां पर आजकल तो वो जो ग्रैंडफादर क्लॉक जिनको कहते थे ना कि एक एक घंटे प टिंग टिंग करके आवाज आती है वो पेंडुलम घूमता था अभी ग्रैंडफादर क्लॉक्स रही नहीं है किंतु उस समय ऐसी क्लॉक्स थी कि जैसे ही एक घंटा हुआ तो वो पेंडुलम घूमता रहता है जैसे ही एक घंटा हुआ तो टिंग करके वो एक घंटा बजेगा कुछ आवाज आएगी किंतु मैं यदि बड़ी ही तन्मयता से किताब पढ़ रहा हूं तो घंटी बजने का जो आवाज है व मुझे नहीं सुनाई देगा द साउंड इज देयर द पल्सेशन इन द एयर आर देयर द ईयर एंड द सेंटर आर आल्सो देयर एंड दिस वाइब्रेशंस हैव बीन कैरिड थ्रू द ईयर टू द सेंटर एंड यट यू डू नॉट हियर इट आवाज है आवाज की तरंगे है कान कान में से यह तरंगे कलेक्शन होती है ब्रेन की ओर भेजी भी जाती है सब कुछ होता है किंतु फिर भी हम नहीं सुन पाते क्यों क्योंकि अपना माइंड वहां पर नहीं है व्हाट इज वांटिंग स्वामी जी कहते हैं क्या कमी है द माइंड इज नॉट देयर अपना मन वहां पर नहीं है मन किसी और जगह पर केंद्रित है द वी सी दैट द थर्ड थिंग नेसेसरी इज दैट द माइंड मस्ट बी देयर इस तरह से हम देखते हैं कि तीसरी चीज जो है जो आवश्यक है वह है मन यदि मैं देखता हूं किंतु मेरा मन अंतर्मुखी कह दिया और फिर भी मेरी नजर नहीं पड़ी मेरे साथ में एक्चुअली ऐसा हुआ है बेलर मठ में था नया-नया गया था एक महाराज जाकर के गुजराती हूं तो वहां पर गुजराती महाराज थे तो आकर के मुझे मिले कि अरे तुम गुजरात से आए हो कैसे हो क्या है सीधा गुजराती में बात करना शुरू कर दिया मुझे इतना अच्छा लगा था कहां मैं बंगोल में हूं सभी लोग बंगोली में या तो इंग्लिश में बातें कर रहे हैं और एक एकदम एक स्वामी जी मिल गए जो कि गुजराती में बात कर रहे हैं मुझे इतना अच्छा लगा खड़े रह कर के रात्रि में रात को परिक्रमा करते हैं ना वहां पे सब मंदिरों की तो करते-करते उनके साथ मुलाकात हो गई थी आरती के बाद का समय था 8 9 बजे 8 8:30 बजे का भोजन के पहले का तो खड़े-खड़े मंदिर के सामने मां के मंदिर के सामने आधा घंटा तक बात किया तो मुझे बहुत अच्छा लगा फिर यह स्वामी जी ने कहा कि मैं भी तो इसी समय प्रणाम करने के लिए आता हूं तो तुमसे मुलाकात होगी तो हम बातें करेंगे मैंने कहा अच्छा महाराज जी बिल्कुल कीजिए मुझे भी बहुत अच्छा लगेगा अभी दूसरे दिन क्या हुआ मैं प्रणाम कर रहा हूं और मेरा अटेंशन जो है वो पूरा वो मां की इमेज है राजा महाराज है वहां पे स्वामी जी का समाधि वो मंदिर है तो मेरा इस तरह के अटेंशन उनके ऊपर है कि यह स्वामी जी कल ही मुझे मिले हैं मेरी नजर के सामने से मैं जा रहा हूं वो खड़े रह गए मुझे ऐसा करके ऐसा मेरे सामने कर रहे हैं किंतु फिर भी मैंने उनको देख देखा नहीं मैं सीधा-सीधा आगे चला गया फिर तीसरे दिन मैं देख अभी उस दिन तो क्या था मैं इस तरह से सोच रहा था कुछ ऐसा मंदिर में क्या है सब देख रहा था नया नया गया हूं तो बेलूरमठ का एटमॉस्फियर ऐसा ओवर वेल्मिनिक के सोच रहा हूं अरे वो स्वामी जी कहां गए उन्होंने तो कहा था यहां पर खड़े रहेंगे वेट करेंगे कहां मुझे दिखाई नहीं देते चौथे दिन भी नहीं मिले तो फिर मैंने सोचा कहीं वो मेरे से नाराज तो नहीं हो गए पांच में दिन मैंने उनको कहीं पर जाते हुए देखा तो मैं दौड़ के गया महाराज महाराज आप तो बात करने वाले थे मेरे साथ में क्या हुआ मैंने कहा तो उन्होंने मुझे कहा अरे तुम तो बड़े घमंडी हो तुम मैंने तुम्हारे सामने देख कर के ऐसा भी हाथ भी किया तुम देख नहीं पा रहे हो तो अभी मैं महाराज को क्या बोलू कि मैं सब चीजों में बड़ा ये हो गया था इव मैंने झूठ बोल दिया कि ना एक्चुअली ये बात सही थी जो मैंने उत्तर दिया वो सही था मैंने कहा महाराज मैंने चश्मे नहीं पहने थे उस समय और इसलिए मैं आपको ठीक से नहीं देख पाया हालांकि मैं बिना चश्मे के भी देख पाता हूं किंतु मैंने ऐसा आधा सच आधा झूठ वाला अपना एक एक्सक्यूज देकर के उस दिन वो बच गया मैं फिर वो महाराज के साथ में फिर से नियमित बातें होने लगी तो यहां पर स्वामी जी क्या कहते हैं विजन है या तो फिर साउंड है तो ये दोनों को कोई भी इंद्रियों को हमको उसका जो ग्रहण करना है तीन चीजें चाहिए देखना है तो आंखें चाहिए सुनना है तो कान चाहिए ऑफकोर्स इसके बिना तो जो विज प्रकाश है या तो ये जो साउंड के जो किरण है वह हमारे भीतर में ब्रेन की तक जाएंगे नहीं दूसरा चाहिए ब्रेन में वह न्यूरल नेटवर्क जो कि यह विजुअल और ऑडिटरी क्लूज को इंटरप्रेट करते हैं सॉफ्टवेयर जो कि बताता है कि यह लाल है यह लीला है यह पीला है यह मंदिर है यह महाराज है वह आंख क्या देखती है वह बताता है यह साउंड है तो यह कोई मुझे बुला रहा है म्यूजिक चल रहा है क्या है वो मुझे वो ब्रेन में इंटरप्रिटेशन होता है तीसरा है मन मन है जो इस इंटरप्रिटेशन को ग्रहण करता है व मैं उसको तब कहीं जाकर के ग्रहण करता हूं अदर वाइज यदि आंखों से सब देख रहा हूं ब्रेन में उसका इंटरप्रिटेशन भी हो रहा है किंतु मेरा मन कहीं और है तो मैं ना देख पाऊंगा ना ही सुन पाऊंगा तो आजही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु