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meditation ·

ध्यान के सोपान simple steps of meditation 25 jun 2025

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ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः कल एक डिवोटी के साथ में जब ध्यान को लेकर के चर्चा हो रहा था तो थोड़ा सा वो जो डिस्कशन था उसका एक थोड़ा मैं आपके साथ शेयर करता हूं। एक्चुअली देखिए कि जब भी हम अपने मन को एकांत में ले जाकर के ठाकुर के पास में ले जाकर के ठाकुर का नाम स्मरण मनन करने का प्रयास करते हैं तो साथ-साथ में ही हमको पता है कि कितनी सारी चैलेंजेस हमारे सामने आकर खड़ी होती है। किंतु यदि हम थोड़ा सा यह जो तत्व है कि अंतर जगत क्या है? साधना क्या है? थोड़ा सा इसका जो हम सीक्रेट जान लें, थोड़ा सा इसका हम यदि अंडरस्टैंडिंग पा लें और थोड़ा सा रेगुलर प्रैक्टिस करें, तो यह कोई चीज असंभव नहीं है कि हम रेगुलर रूप से अच्छे से जब ध्यान कर सके और जब ध्यान से जो उत्पन्न होता है जो आनंद जैसे कि चंदन को जितना घिसेंगे उतना ही उसकी खुशबू आएगी। तो वैसे ही जितना जप ध्यान करते जाएंगे उतना ही प्रेम रूपी इष्ट और यह आनंदमय आत्मन इन दोनों का जो सार तत्व है प्रेम और आनंद यह हमारे हृदय में वह प्रकट होगा। हमारे हृदय में वो सुवास की तरह फैलता जाएगा। सौरभ की तरह हमारे हृदय में से प्रकट होकर के पूरे देह में पूरे अंतर्मन में अंतर जगत में वह फैलता जाएगा। कोई बहुत डिफिकल्ट कार्य नहीं है। देखिए हम यदि यह प्लान करते हैं कि अच्छा अभी मुझे सीरियसली एज ऑफ टुडे आज से लेकर के मुझे सीरियसली साधना करनी है तो हम किस तरह से यह जो मेरा एक ओपिनियन आपको बता रहा हूं जब ध्यान के जगत में तो आपको पता है कि लाखों लाखों रास्ते हैं ईश्वर के पास जाने के आत्म साक्षात्कार प्राप्त करने के तो मैंने जो अपने जीवन में प्रैक्टिकल जो मैंने खुद ने जो अनुभव किया है। उसमें से यह एक मेथड मैं आपको बता रहा हूं। देखिए कि अपनी साधना को तीन स्टेज में बांट सकते हैं। सर्वप्रथम तो है पाठ। देखिए कि कथामृत जो है वह इस युग के लिए सर्वोत्तम आध्यात्मिक पुस्तक है। जितना ही हम कथामृत का पाठ करेंगे उतना ही जैसे कि हमारा हृदय पवित्र होता जाएगा। जन्म जन्मांतर के जितने भी संस्कार इकट्ठा हुए हैं, वह सब धुलते जाएंगे। यानी कि कथामृत का पाठ वह हमारे आध्यात्मिक जीवन में एक बहुत ही आवश्यक एक साधना है। किंतु देखिए कि हम कथामृत जो पढ़ते हैं, उससे भी एक स्टेज आगे जा सकते हैं। जैसे कि यह जो मैंने पहले कई बार बताया है कि जब ठाकुर के नाम का जप करते हैं, एक हाथ से यदि माला पकड़ के या कर जप करते हैं तो दूसरे हाथ में हम कथामृत रख सकते हैं। जिस क्षण माला में या कर जप में हमारा मन न लगे वो निरस लगने लगे वैसे ही कथामृत पाठ प्रारंभ कर दिया और जैसे ही कथामृत में हमारा मन लग जाए उसमें से रस प्राप्त होना शुरू हो जाए तो फिर से हम जप में आ गए। यानी कि ये जो आप गाड़ी चलाते हैं तो यहां से मान लीजिए विशाखापट्टनम से यहां पे एक दो-ती घंटे की दूरी पर कोकिनाडा बोल के एक जगह है तो वहां पे आप गए तो फिर आपने दो घंटा जो गाड़ी चलाई तो पेट्रोल तो खत्म हो गया होगा या आधा हो गया होगा तो फिर वहां पर पेट्रोल पंप में जाकर के आपने पेट्रोल पुरवा लिया और फिर वहां से आप वापस आ गए तो यह देखिए कि आप गाड़ी चलाते आते हैं तो पेट्रोल खर्च होता है। फिर आप पेट्रोल स्टेशन पर आकर के पेट्रोल भरवा देते हैं। गाड़ी को फिर से रिफिल कर देते हैं। तो यह जप करना और साथ में यह ठाकुर का कथामृत पाठ करना। जप करतेकरते मन ना लगे तब की यह बात है। ऑफ कोर्स जब जप करते-करते मन लग जाए तो फिर यह कैसा होगा? पता है यह सेल्फ चार्जिंग कार की तरह है। आप जितना जप करते जाएंगे उतना ही यह आपका जो पेट्रोल का यह जो टंकी है वह भरता जाएगा भरता जाएगा। यानी कि यह चमत्कार की तरह होगा। तो यह एक हमने डिस्कस किया था। किंतु इससे भी आगे बढ़कर के और एक मेथड है। वह है ठाकुर के सामने बैठकर के कथामृत का पाठ ठाकुर को सुनाना। जैसे कि हम एक पाठक होता है ना पाठक को आप अभी तो बंगाल में खास करके इस तरह से होता है कि ये भागवत का जो कथाकार है वह भागवत कथाकार को बुलाते हैं। फिर वो वहां पर 101 लोग इकट्ठा हुए होंगे। भागवत कथाकार कथा कहते हैं। सभी लोग सुनते हैं। बंगाल में ही नहीं। ये तो बहुत सारी जगह पर होता है। तो वो जो एक्चुअली देखिए कि ये कथा कहने का जो ढंग है कभी-कभी बहुत ज्यादा नाटकीय हो जाता है। बहुत ज्यादा ड्रामेबाजी उसमें चलता है। ठाकुर ऐसे लोगों को पकड़ करके उनकी काफी मजाक किया करते थे। तो इस तरह से ज्यादा ड्रामेबाजी नहीं करके एक सरल सुंदर रूप से कथामृत का पाठ यदि हम ठाकुर को सुनाएं तो देखिए कि यह जो बोलने की जो क्रिया है हमारी ठाकुर के ऊपर में हम तन्मय हैं। हम मान रहे हैं कि हमारे सामने ठाकुर स्वयं आकर के खुद की लीलाओं का श्रवण कर रहे हैं। तो जैसे-जैसे हम पाठ करते जाएंगे, जैसे-जैसे हम ए वैसे ही हमको ऐसा लगता जाएगा कि हमारे सामने ठाकुर जैसे कि जीवंत आकर के बैठे हैं और हमारा पाठ श्रवण कर रहे हैं। तो इस तरह से यदि हम करें तो क्या होगा? पता है कि एक आप आपका मन जो है बड़ा ही इजीली ये सब चीजों पर लग जाएगा। यह जो पाठ पाठ करने में तो कोई बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं है। हम मैं बोल रहा हूं मेरी इंद्रियां जो है उसमें एंगेज हो रही है। तो यदि ये जितनी ही मेरी इंद्रियां उसमें एंगेज होगी उतना ही आप देखेंगे कि मेरा मन जो है वो उतना ही उसमें एंगेज होगा। ये एक साइकोलॉजी है। ये एजुकेशन साइकोलॉजी में इस तरह से कहते हैं कि किस तरह से कि आप बच्चे को क्लास में बिठा देते हैं और टीचर बच्चे को पढ़ा रहा है। अभी होगा ऐसा कि टीचर बोल रहे हैं और बच्चा सुन रहा है। अभी ये बच्चे का जो उसके जो कर्म कर्मेंद्रियां है ज्ञानेंद्रियां है जो 10 ज्ञानेंद्रियां 10 कर्मेंद्रियां उसमें से सिर्फ उसके श्रवण की और दृश्य की ही तो उसका यूज होता है इंद्रियों का वो आंखों से देख रहा है चक्षुओं से देख रहा है कानों से श्रवण कर रहा है यानी कि उसकी जो इंद्रियां है उसमें से बहुत कम इंद्रियां इस कार्य में व्यापुत है तो क्या होगा कि उसका मन मन भटकना शुरू हो जाएगा। तो इसलिए एजुकेशन थ्यरी क्या कहता है? बच्चे को सीखने के लिए एक्टिविटी दीजिए। कोई एक्टिविटी करेगा तो उसकी और ज्यादा इंद्रियां उसमें शामिल होगी। तो जितनी इंद्रियां वो हाथों से कुछ एक्टिविटी करेगा, पैरों से इधर-उधर जाएगा। जैसे कि आप एग्री हमारे यहां पे मैं दिव्यान में था तो दिव्यान में ऐसा था कि आप क्लासरूम में बिठा करके बच्चे को बताते हैं कि यह जो फ्लोरीकल्चर है फॉर एग्जांपल फूलों की खेती करनी है तो आप क्लासरूम में बताएंगे बच्चे को फूल की खेती कैसे करनी है तो वह बहुत कम उसमें से समझ पाएगा किंतु उसको एक्चुअली गार्डन में ले जाइए एक्चुअली उसके पास में से फूल का पौधा है जमीन में गड्ढा करके उसका रोपण करवाइए उसका मावजत करवाइए। उसका जो केयर है उसके पास में करवाइए। तो उसके हाथ है, उसके कान है, नाक है, उसकी वाणी है, सब तरह की इंद्रियां उस कार्य में व्यापृत होगी। तो जितनी व्यापृत होगी, जितनी सारी इंद्रियां कर्मेंद्रियां और ज्ञानेंद्रियां उतना ही उसका अटेंशन जो है उसका मन जो है वह उसके ऊपर में आता जाएगा। यही थरी हमारी पूजा के लिए है। यदि आप सिर्फ बैठकर के ध्यान करेंगे, जप करेंगे तो आपकी कितनी इंद्रियां इस कार्य में व्यापृत है। तो बहुत कम सिर्फ मन ही इसमें लगता है। तो इसके लिए क्या करना है कि जितनी इंद्रियों को हम ठाकुर की ठाकुर के ऊपर में एकाग्र कर सके उतना ही मन हमारा इसके साथ-साथ में जुड़ता जाएगा। तो जैसे पूजा के पीछे में थरी यही है। पूजा में आप पुष्प चयन करते हैं। फिर यह बिल्व पत्र का चयन करते हैं। बिल पत्र को धोते हैं। धोकर के वह जो पूजा का जो थाला है उसमें उसको अच्छे से सजा करके रखते हैं। फूल रखते हैं। चंदन घिसते हैं। चंदन घिस के वह जो छोटी-छोटी कटोरी है उसमें रखते हैं। अपने हाथों से यह माला गांथते हैं। तो यह माला बनाते बनाते ठाकुर कहते हैं कि जब माला बनाते हो तो जितने भी फूल है वह आप उसमें परो रहे हो धागों में उतने ही आपके मंत्र का जप चलना चाहिए। यानी कि यह पूजा की थ्यरी क्या है कि जितनी भी इंद्रियां है कर्मेंद्रियां ज्ञानेंद्रियां एज मेनी एस पॉसिबल हम इस कार्य में लगाए। तो हम अपने हाथों से ठाकुर को देखेंगे। उसके बाद में जब पुष्प का थाला पूजा का थाला तैयार हो गया तो फिर हम ठाकुर के सामने बैठेंगे। फिर पूजा के थाले में से यह धूप है, दीप है उसको प्रज्वलित करेंगे। ठाकुर के सामने ऐसा करके घुमाएंगे और ठाकुर को ऑफर करेंगे। तो जितना ही हम ठाकुर फिर उसके बाद में यह जो पुष्प है पुष्प को चंदन में डुबोएंगे। फिर वह पुष्प ठाकुर को अर्पण करेंगे। यानी अपने हाथ है और फिर मंत्रो उच्चारण करेंगे साथ-साथ में तो यह जो अपनी वाणी है अपना अपना दृश्य है माने देखने की शक्ति उसके बाद में अपने हाथ है सभी कुछ इस कार्य में इस साधना में लगते हैं। तो जब भी हम प्रारंभ करते हैं साधना का और जब जप करने को बैठते हैं, ध्यान करने को बैठते हैं और लगता है कि यह मन हमारा आज साथ नहीं दे रहा है तो इसके लिए लॉन्ग टर्म आपको ना इस तरह से ज्यादा से ज्यादा इंद्रियों को इसमें लगाने की आवश्यकता है। तो यह एक पूजा का पार्ट हो गया। देखिए मैं मेरा खुद का बताता हूं कि मैं जब शुरू-शुर में यहां पे आया था या तो फिर कहेंगे कि रामकृष्ण मिशन का ही नहीं जैसे मैंने शुरू-शुर में ये फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग मेरी डेवलप हो रही थी। उस समय मुझे लगता था कि अरे यह पूजा पाठ भजन यह सब क्या नौटंकी है? भगवान बुद्ध की तरह भगवान महावीर की तरह आपको बस ध्यान में मग्न हो जाना है और ध्यान में मग्न होकर के निर्वाण प्राप्ति कर लेनी है। यह जो कमजोर मन के लोग होते हैं या तो फिर जिन लोगों में संकल्प शक्ति या तो फिर यह पवित्रता बिल्कुल जीरो होती है। यही यह सब नौटंकी करेंगे। और यह सब नौटंकी का एक ही माने प्रयोजन है लोगों को मूर्ख बना करके उनके पैसे छीन लेना। तो कैसे भी करके उनके पास में से पैसे ले लेना। तो यही सब मेरे मन में चल रहा था। किंतु देखिए कि यह सब को मैं क्या कहता हूं पता है आजकल लग्जरी ऑफ बिलीफ यानी कि जिसको साधना करनी ही नहीं है वे लोग इस तरह से काफी नेगेटिव भाव पोषण करेंगे। वे लोग बोलेंगे कि जो हाईएस्ट साधना है यदि उनको थोड़ा बहुत भी पता होगा आध्यात्मिक जगत के बारे में तो वे लोग कहेंगे कि हम निराकार साधना करते हैं। वे लोग कहेंगे भगवान बुद्ध की तरह हम मेडिटेशन करेंगे। किंतु वो सब करने के लिए जो प्रचंड संकल्प शक्ति चाहिए जो संपूर्ण पवित्रता चाहिए वो है कहां हमारे में? किंतु ये लोग फिर भी ऐसा सोचते हैं। क्यों सोचते हैं? क्योंकि उनको कुछ करना ही नहीं है। वो आर्म चेयर स्ट्रेटजिस्ट एक शब्द है वह स्ट्रेटजी के वर्ल्ड में जो लोग एक्चुअल पॉलिटिक्स में नहीं होते जो लोग एक्चुअल जनरल नहीं होते वे लोग अपने कमरे में अपनी कुर्सी पर बैठकर के पूरे जगत को सलाह देते रहते हैं। आजकल यह Twitter पर चलता है। किसी को कुछ समझ में नहीं आता। फिर भी यह अमेरिका में क्या हो रहा है? वहां पे क्या हो रहा है? अपना-अपना विचार वह ट्वीट के माध्यम से रजू करेंगे। जिसमें ना ही कुछ बेस सिर पैर वाली बातें सब हवाहवा में। क्यों? क्योंकि उनको प्रैक्टिकली तो कुछ करना नहीं है। बैठ-बैठ के लोगों को उपदेश ही देना है। और एक शब्द है बैक सीट ड्राइविंग। इसका भी ऐसा ही अर्थ होता है। वह खुद तो ड्राइविंग करता नहीं है। वो गाड़ी में पीछे की सीट पर बैठे रह के जो एक्चुअल ड्राइवर है उसको उपदेश देता रहता है। अभी जो एक्चुअल ड्राइवर है उसको पता है कि रोड की कंडीशन कैसी है? गाड़ी की कंडीशन कैसी है? वो ब्रेक कैसे लगानी है, क्लच कैसे यूज़ करना है, एक्सीलरेटर, स्टीयरिंग वो तो ड्राइवर को ही पता है ना। ही इज़ एक्चुअली इन टच विद द प्रैक्टिकल सिचुएशन। वो आप पीछे में बैठकर के को उपदेश देंगे तो थोड़ी ना चलेगा। सो दैट इज व्हाई कि मेरा भी एक ऐसा था यह आर्म चेयर स्ट्रेटजिस्ट की तरह ना कि यह बैक सीट ड्राइवर की तरह मैं ऐसा सब सोचता रहता था। मेरे पास में वो सब लग्जरी ऑफ बिलीफ थी। जो सोचूं वो करूं। मतलब मैं जो चाहे वह सोचूं। क्या फर्क पड़ता है? प्रैक्टिकल तो कुछ करना नहीं है। किंतु जैसे-जैसे यह प्रैक्टिकल करने का प्रारंभ किया तब पता चला कि यह जो पूजा है ये पुष्प चयन देखिए मैं जब नागपुर में था तो जैसे देखिए रामकृष्ण मिशन में ये जो विज़डम जो है ना विज़डम कैसा है उदाहरण देता हूं। मेरे मन में एक बैठ गया था कि मुझे गांव में जाकर सेवा करनी है। ठीक है? मैंने गांव में जाकर सेवा की। अपने मन को संतुष्ट हुआ तब तक मैंने सेवा की। फिर जैसे परिस्थिति ऐसी खड़ी हुई कि ठाकुर कान पकड़ करके फिर से संघ में वापस ले आए। अभी मुझे संघ में वापस ले आए हैं। मैं सुहितानंद जी वो सुहितानंद जी हमारे इंचार्ज थे। उन्होंने ही मुझे रांची भेजा था और उन्होंने ही रांची से वापस लाने की व्यवस्था की थी। अभी मैं फिर से मैं बेलूर मठ में हूं, रह रहा हूं। रूटीन फॉलो कर रहा हूं। और जो मन के भीतर में जो रजस था, मन के भीतर में जो कर्म करने की इच्छा थी, वह तो धीरे-धीरे करके समाप्त हो गई रांची में। तो अभी मैं वैसे ही ठाकुर कहते हैं ना ये झूठो पाता पातार मतन ये हवा में ये जो ये जो जिस हम जिसमें खाना खाते हैं ना पत्ते में जिसमें खाना खाते हैं पतराल कहते हैं गुजराती में। तो उसमें हम खाना खाते हैं। फिर वह कैसे हवा में उड़ता जाता है? जहां पर हवा उसको ले जाए वैसे वह उड़ता है। जैसे बिल्ली का बच्चा ठाकुर का दूसरा उदाहरण उसकी मां उसको जहां पर उठा के रखेगी वहां पर वो रहेगा। यदि उसको अपनी मां उठा के अपनी गोद में रखेगी तो गोद में रहेगा। उठा के यह बेड के ऊपर में रखेगी तो उस पर रहेगा। तो वैसा था मेरा। अभी कुछ वासना रह नहीं गई है। तो मठ में रह रहा हूं। फिर मेरा पोस्टिंग का समय आया क्योंकि मठ में तो रहना नहीं है सेंटर में जाना है तो सुितानंद जी ने मुझे बुलाया पोस्टिंग से पहले पोस्टिंग तो अनाउंस करेंगे जनरल सेक्रेटरी महाराज वो उस समय थे स्मरणानंद जी किंतु प्रैक्टिकली स्पीकिंग सुितानंद जी क्योंकि हम लोग तो छोटे बच्चे हैं ना स्मरणानंद जी का तो सब हायर लेवल का थिंकिंग है उनको तो पूरे मठ मिशन की चिंता करनी है यह 2025 बच्चे क्या करते हैं कहां जाते हैं उसका कितना वो टेंशन लेंगे तो फॉर ऑल प्रैक्टिकल पर्पस सुतितानंद जी सब मैनेज करते थे हमको तो उन्होंने अगले दिन मुझे बुलाया फिर कहा ना पहले तो पोस्टिंग अनाउंस हो गया उसके बाद में उन्होंने मुझे बुलाया मुझे कहा कि देखो मैं तुमको तुमने तो सुना ही जीएस महाराज के मुंह से कि तुमको हम नागपुर भेज रहे हैं मंदिर में काम करने के लिए उस समय नागपुर के नए मंदिर का उद्घाटन होने वाला था क्सिक्रेशन होने वाला था उसके आगे मुझे भेजा गया तो मुझे बोला कि तुम समझ रहे हो तो मैं तुम इतना तुम ट्राइबल एरिया में तुमने काम किया और फिर अभी मैं तुमको मंदिर में काम करने के लिए क्यों भेजता हूं? तो मैंने कुछ उत्तर दिया नहीं। वैसे तो मैं समझ गया कि रामकृष्ण मिशन में जो काम देते हैं वह करना है। उसके अलावा तो कोई प्रश्न नहीं है और मैं उसके लिए रेडी हूं बोलकर के मैं वापस आया हूं। तो उन्होंने कहा कि नहीं देखो यह जो साधना है साधना का यह माध्यम है। इस माध्यम को यदि तुम नहीं अपनाओगे ना इसके प्रति तुम्हारे मन में यदि तुच्छता रहेगी क्योंकि वह समझ गए मेरे माइंड मैं एक फिलॉसोफर एक सिंपल लिविंग हाई थिंकिंग उस टाइप का मेरा माइंड है और यह जो सब ट्रेडिशनल साधनाएं हैं उसके प्रति मेरे मन में एक तरह का तुच्छ भाव है। तो वह समझ गए थे। मुझे बोला कि देखो यदि तुम इस तरह की लाइफस्टाइल को इस तरह की साधनाओं को नहीं अपनाओगे तो तुम कभी भी ना अपने संग में शांति से रह नहीं पाओगे। हमेशा तुमको ऐसा लगेगा कि मेरी यहां पर जरूरत नहीं है या तुम आई एम एन एलियन हियर अर्थात कि यहां का जो भाव है ना उसमें तुम कभी एडजस्ट ही नहीं होगे। आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों तुमको फिर से छोड़ के जाना पड़ेगा। तो बेटर है कि तुम्हारा यह ट्रेडिशनल साधनाओं में ओरिएंटेशन हो। इसलिए मंदिर में काम करने के लिए हम तुमको भेज रहे हैं। तो मैंने कहा ठीक है अब तो जाना ही तो है। आर्गुममेंट करने से तो कोई लाभ नहीं है। तो मैं गया अब देखिए कि मैं नागपुर में हूं। दिन रात मंदिर में काम कर रहा हूं। कहां वो रांची में कि वो सुबह से लेकर के रात तक मैं गाड़ी लेकर के वालंटियर्स के साथ में ट्राइबल एरिया में घूमता रहता था। वो 10 तरह के पागलों के साथ में रोज काम करना होता था। किसके साथ में झगड़ा हो जाता है? किसको मैं डांट रहा हूं? किसको यह कर रहा हूं। कितना एक्टिव और अग्रेसिव लाइफ था। और यहां पर मंदिर है। कुछ किसी का संपर्क नहीं है। किसी के साथ में कोई वार्तालाप नहीं करना। मैंने खुद ने इस तरह से ठीक किया कि यदि मंदिर में काम करना है तो मंदिर की तरह काम करके दिखा देंगे। ठाकुर कहीं कल जाकर के ऐसा ना कह दे कि भाई तुम मंदिर में काम कर रहे थे तो इस तरह से रह रहे थे कि तुम जैसे रांची में रह रहे हो। ऐसा कोई मुझे बोल ना जाए। तो जैसे मंदिर में काम होता है ट्रेडिशनली वैसा ही करेंगे। तो उस समय मैंने पाया क्योंकि यह जो लग्जरी ऑफ बिलीफ है चंदन घिसना यह जो फूल चयन करना यह माला बनाना यह फ्लावर वास बनाना प्रत्येक बार मैं यह सब करता था मेरे मन में रेजिस्टेंस प्रकट होता था अरे फ्लावर वास कौन बनाएगा वर्कर के पास में से बना लेते हैं अरे यह चंदन कौन घिसेगा किसी के पास में घिसवा लेते हैं यह सब करना है तो एक रोबोट को बिठा दो एक रोबोट बढ़िया मजे से कर लेगा एक आदमी की क्या जरूरत है यहां पे यह तो वेस्टेज हो गया मेन पावर का अननेसेसरी ये सब बहुत चलता था मेरे माइंड में किंतु फिर भी मैंने अपने को प्रॉमिस किया है कि यदि वापस आना है संघ में तो संघ की जो आइडियोलॉजी है संघ का जो आदर्श है उसी की तरह रहना है भले ही चाहे भीतर में से कितना रेजिस्टेंस हो तो धीरे-धीरे करके मैं नागपुर में दो साल जो रहा ये मेरा रेजिस्टेंस जो है ना प्रत्येक स्टेप पर मुझे फाइट करना पड़ा है वो किंतु ये रेजिस्टेंस टूट गया और फिर मैंने यह पाया आया कि यह जो जितनी भी यह ट्रेडिशनल पद्धतियां है देखिए ठाकुर को वस्त्र पहनाना मैं मैं नागपुर में था तो पूजा के रिलेटेड जो भी कुछ करना है सब किया दो चीज नहीं किया था ठाकुर को वस्त्र पहनाना वो मैंने नहीं किया था क्योंकि वहां पर हमारे एडिटर महाराज थे नागपुर तो पब्लिकेशन सेंटर है तो मराठी एडिटर महाराज वो वस्त्र पहनाते थे उनको बड़ा अच्छा लगता था बड़ा सुंदर रूप से ठाकुर को सजाते थे तो वो एक उन्होंने किया और पूजा ऑब्वियसली वहां के जो सन्यासी महाराज हैं वो करेंगे करेंगे। वहां पर नियम ऐसा था कि जो ब्राह्मण है वही पूजा करेगा। यानी ब्राह्मण नहीं है तो सन्यासी होना चाहिए या तो फिर ब्रह्मचर्य की दीक्षा होनी चाहिए। तो मैं ब्राह्मण भी नहीं और मुझे ब्रह्मचर्य की दीक्षा भी उस समय नहीं हुई तो वो तो टीसी के बाद होगी। तो पूजा में नहीं कर सकता था। तो यह दो छोड़कर के मंदिर में जो कुछ करना है मैंने सब किया था। बर्तन धोना है। वहां पे जो कुछ भी करना है। फल काटना है। फल काट के सजाना है। प्रत्येक स्टेप पे मुझे रेजिस्टेंस फेस करना पड़ा है। फल काट के मैं वो पूजा के थाले में सजा रहा हूं तो फटाफट करके काट करके मैंने रख दिए। फिर मुझे पुजारी महाराज ने कहा देखो ऐसा नहीं करते हैं। फल को अच्छे से सजा करके रखते हैं। ब्यूटीफुली सजाते हैं। और इस तरह से ठाकुर को ऑफर करना है। मैंने कहा अभी मैं मुंह से तो बोलता नहीं था क्योंकि प्रॉमिस किया है अपने को कि सब कुछ ठीक-ठीक करना है। फिर झूठ-मूठ का ये सब नहीं करना। वे लोगों को समझ में आता था कि मेरे माइंड में रेजिस्टेंस है। उन इस तरह का ब्रह्मचर्य शायद उन्होंने नहीं देखा होगा। जो भी है किंतु मैंने ठीक किया है कि भले ही चाहे अह मुझे यह ठीक ना लगे करेंगे। तो देखिए कि अभी यह जैसे कि यह एप्पल है। एप्पल को काट करके एक-एक स्लाइस मैं काट रहा हूं। मेरा मन उसी के ऊपर में है। एक-एक स्लाइस को मैं प्लेट के ऊपर में अच्छे से सजा करके रख रहा हूं। तो चारों ओर एक स्लाइस की तरह सजा करके रख दिया। तो ऐसा लगेगा जैसे यह कमल का यह पत्ते जैसे कि गोल फैला करके रखे क्योंकि एप्पल का जो स्किन होता है रेड होता है। वैसे कभी-कभी स्किन भी निकाल देते थे। स्किन रखते नहीं थे। तो किंतु जो भी है वह एक रेडिश टाइप का एक होता है एप्पल का जो ये पेटल्स की तरह गुलाब की पेटल्स की तरह उसमें फिर यह चीकू है फिर यह आम होता है जो कुछ भी होता है सबको सजा सजा करके रखना है टाइम जाएगा जो चीज मैं फटाफट करके कर दूं खत्म कर देना है तो मैं 10 मिनट में कर सकता हूं सजा करके ध्यान से करना है तो पूरा 1 घंटा उसमें जाएगा चंदन घिसना है जैसे कि मैं फटाफट करके कर दूं तो वही वह 10 मिनट में वह दो छोटी-छोटी कटोरी भर दूंगा। एक रेड चंदन, एक वाइट चंदन। किंतु यदि ठीक-ठीक करना है तो फिर आपको धीरे-धीरे करके घिसना है। उसमें घर्षण होता है, पानी डालना है। एकदम थिक पेस्ट होना चाहिए। पेस्ट का जो कंसिस्टेंसी है थ्रूउ सेम होना चाहिए। आज मैंने जो चंदन घिसा 10 दिन के बाद में वह आज मैंने चंदन घिस के पेस्ट आपको दिखाई। उसकी जो कंसिस्टेंसी है, उसकी यह जो थिकनेस है, आप 10 दिन के बाद में मैं चंदन घिस के आपको दिखाऊंगा। तो आप इमीडिएटली आपको पता चल जाना चाहिए मेरा ही चंदन घिसा हुआ है। क्यों? क्योंकि मैं ऐसे ही घिसता आ रहा हूं। वरना तो फिर बिना बेसिर पैर के घिसना शुरू किया। कभी थिक हो जाएगा, कभी गाढ़ा हो जाएगा, कभी पतला हो जाएगा। कभी यह हो जाएगा, कभी वह हो जाएगा। ऐसा नहीं कंसिस्टेंट होना चाहिए। इतना गाढ़ा मुझे बताया गया है। पुजारी महाराज ने कहा कि इतना गाढ़ा करना। इससे ज्यादा करोगे तो वह भी नहीं चलेगा। इससे पतला करोगे तो वह भी नहीं चलेगा। तो ये कंसिस्टेंसी होनी चाहिए। तो वह भी एक आर्ट फॉर्म है। तो अभी यह पुष्प का थाला सजाना है। आप वैसे ही सब चीजों को रख सकते हैं। किंतु एक सुंदर रूप से पूजा का थाला सजाया हुआ इतना सुंदर लगता है। यहां पे यह जो प्रदीप पड़ा हुआ है। यहां पे यह केमफोर का कटोरी है। चंदन का कटोरी है। यह फूल जो है अपने विभिन्न तरह के फूल अपनेप ग्रुप में सजा करके रखें। जासवंत का फूल है, जासमीन है। जो जो फूल है अपनेप ग्रुप में सजा के रखे हैं। वो थाला देखकर के पुजारी महाराज का मन प्रसन्न हो जाना चाहिए। बहुत अच्छे से तुमने सजाया है। यह थाला ले जाकर के ठाकुर के सामने आप रखेंगे। ठाकुर का मन प्रसन्न हो जाना चाहिए। तो यह जो है अपनी सभी इंद्रियों को इस कार्य में लगाना। यह है साधना का फर्स्ट स्टेज। जितना जितना हम इसमें अपने मन को डालते जाएंगे, जितना जितना अपने मन को इसके भीतर में ढालते जाएंगे, उतना ही देखेंगे कि हमको भी आनंद आता है और पूरा जगत चला जाता है। शुरू-शुरों में मुझे ऐसा इतना होता था। अरे यार यहां पे एक घंटा मैंने ठाकुर भंडार में बिताया। इससे बेटर है कि मैं एक घंटा लाइब्रेरी में जाकर के पढ़ाई करूं। किंतु नहीं जो करना है सिस्टमेटिक करना है। तो फिर धीरे-धीरे करके 2 साल के बाद में ऐसा परिस्थिति आ गया कि एक घंटा डेढ़ घंटा दो घंटा ठाकुर भंडार में मैं जो बैठता हूं जो करता हूं ऐसे चला जाता है कि जैसे पता नहीं चलता। तो जब भी हम यह साधना प्रारंभ करते हैं हमेशा ध्यान में रखिए कि जितनी भी इंद्रियों को हम ठाकुर की सेवा में लगाएंगे उतना ही हमारा मन जो है वो एकाग्र होता जाएगा। उसके बाद में बाहर में क्या हो रहा है धीरे-धीरे करके आप सब भूल जाएंगे। तो यह एक बहुत बड़ा लेसन है कि उसके बाद में देखिए आपके घर में यदि इस तरह से आप पूजा की व्यवस्था कर सकते हैं। खर्चा करने की कोई जरूरत नहीं है। मिनिमम वो ठाकुर कहते हैं ना तुलसी और पानी इतना भी यदि आप इकट्ठा करके तुलसी का पौधा लगाया हुआ है अपने प्रांगण में उसमें से दो-तीन तुलसी के पत्ते चुन लिए। उसको अच्छे से धो दिए। फिर यह तुलसी की भी आप माला बना सकते हैं। फूलों की माला बनती है। वह भी अच्छा है। नहीं है तो तुलसी की भी माला बना सकते हैं। यह पत्तों की भी माला बना सकते हैं। वहां पे जो नागपुर में वैसे तो मैंने राजकोट में भी था। बहुत सारे सेंटर में था। किंतु फिर क्या है कि मंदिर के साथ में मेरा कोई ऐसा फिर बाद में रिश्ता रहा नहीं। नागपुर का मुझे मंदिर में सबसे ज्यादा काम किया बोल के मुझे पता है। एक लेडी डिवोटी आती थी। पत्तों की माला बनाती थी। इतना सुंदर बनाती थी माला कि आपको लगेगा कि बाजार में आप इस तरह की माला लेने को जाएंगे तो आपको कितनी महंगी लगेगी किंतु कुछ नहीं है। उन्होंने अपने घर में बैठकर के सामने जो पेड़ है पौधे हैं उसमें से वो वो ऐसा तोड़-तोड़ करके बनाई है माला तो वो भी एक आर्ट फॉर्म है। आप थोड़ा सा भी किसी को जिन लोगों को ये सब चीजों की माहती है जानकारी है थोड़ा सा आप सीख लेंगे तो आप भी यह सब सीख जाएंगे। कितने सुंदर रूप से माला बनाना। तो यह माला बना करके आप ठाकुर को पहना सकते हैं। ठाकुर को वस्त्र पहना सकते हैं। कोई खर्च नहीं करना है। एकद वस्त्र ला के रख दिए। तो वो प्रतिदिन उसको अल्टरनेट करके करते जाना है। नॉट नेसेसरी कि आप प्रत्येक दिन के लिए नए-नए वस्त्र लाएं। तो यह जितनी भी इंद्रियों को फिर अपनी जो रामकृष्ण पूजा पद्धति किताब है वह ले लेनी है। उसमें पूरी पूजा पद्धति दी हुई है। तो ठाकुर के सामने बैठकर के आराम से मंत्र मैं तो मैंने बाद में लिमड़ी में आकर के मुझे पूजा करनी पड़ी थी। तो मैं तो ऐसे ही पूजा करता था शुरू-शुर में। कौन मंत्र याद रखेगा? किताब हाथ में रखी है। किताब में देखकर के मंत्र का पाठ करता था। वहां जो मेथड दी गई है उसको फॉलो करता था। एक दो साल में ऐसा हो गया कि फिर एक दो साल कहां पांच छ महीने में ही ऐसा हो गया कि अभी वह किताब को फिर से स्पर्श करने की जरूरत नहीं है। मैं वैसे ही पूजा कर रहा हूं। तो देखिए कि जितनी भी हमारे हाथ है, हमारे पैर है, हमारे कान है, हमारी आंखें हैं, हमारी जीहवा है या अपना जितनी भी इंद्रियों को हम इसमें लगा सके, ठाकुर की सेवा में देखेंगे कि उतना ही मन हमारा एकाग्र होता जाएगा। तो, यह एक स्टेप हुआ। इसके बाद क्या करना है? ठाकुर के सामने बैठकर के ठाकुर को कथामृत सुनाना है और जितना आप सुनाते जाएंगे ना जितना आप पाठ करते जाएंगे वैसा ही लगेगा कि जैसे कि ठाकुर आराम से आपके सामने बैठकर अपने खुद की ही वाणी श्रवण कर रहे हैं। जैसे कि ठाकुर कभी-कभी मास्टर महाशय को कहते हैं। अच्छा बताओ तो मैंने आज दोपहर को ना कि यह जो भक्त आए थे उनके साथ में बात करते-करते मैंने क्या कहा? तो मास्टर महाशय सब रिकाउंट करेंगे। ठाकुर सुनेंगे और जहां पर मास्टर महाशय की गलती होगी उनको करेक्ट कर देंगे। क्यों ऐसा ठाकुर करते थे? एहसान इसलिए नहीं कि वह अपनी खुद की प्रशंसा सुनना चाहते थे। नहीं वह पता है उनको कि मास्टर महाशय को कथामृत लेख लिखना है। तो वह फिर उनकी गलती ना हो जाए इसलिए उनके पास में यह सब रिकाउंट करवाते थे। तो देखिए कि ठाकुर अपनी खुद की वाणी सुनते हैं। यह हमारे पास में कंक्रीट प्रूफ है। ऐसा वह थ्योरिटिकल नहीं है। रियली रियली ठाकुर अपनी खुद की वाणी सुनते हैं। तो फिर ठाकुर के सामने बैठकर के कथामृत का पाठ करना है और सुंदर रूप से करना है। वैसे रोबोट की तरह पढ़ भी नहीं जाना है और बड़ा ड्रामेबाजी भी ज्यादा नहीं करना है। तो अब जैसे कि मैं एक एक पैसेज आपके सामने पाठ करके सुनाता हूं। बड़ा सुंदर पैसेज है। कथामृत में से ही बंगाली में है क्योंकि मैं बंगाली में पढ़ता हूं तो बंगाली में से किस तरह से आप सुनाएंगे? अभी ये मेरा है। आप अपना-अपना मेथड डेवलप कर सकते हैं। एकदम सोबर और भावमय रूप से सुनाना है। अ देखिए ठाकुर अ श्री रामकृष्ण शिखो के प्रति प्रतिमा पूजा ते दोष की वेदांत बोले जेखाने औष्टि भाति आर प्रिय शेखाने तार प्रकाश ताई तनी छाड़ा कोनो जिनिश ही नहीं आ देखो छोटो मेरा पुतुल खेला कतो दिन कोरे जतो दिन ना विवाह होए और जतो दिन ना स्वामी सहवास करे विवाह होले पुतुलगुली पेट्रा तले फले ईश्वर लाभ होले आर प्रतिमा पूजा की दरकार मण दिके चाहिया बोलते छ अनुराग होले ईश्वर लाभ होए खूब व्याकुलता चाहिए खूब व्याकुलता होले समस्त मौन ताते गतो होए एक जोने एकटी मे छिलो खूब अल्पो बोश मेटी विधवा होएगी छिलो स्वामी मुख कनो देखे नहीं अन्न मेर स्वामी आश से देखे से एक दिन बोलले बाबा अमर स्वामी कोई तार बाबा बोलले गोविंदो तुम्हार स्वामी ताके डाक ले त देखा मेटी वही कथा सुने घरे ध दिए गोविंद के डाके और कादे बोले गोविंदो तुम एसो आमा के देखा तुम कैनो आशो ना छोटो मेटी से कान्हा सुने ठाकुर थकते पारले ना ताके दिखा दिले। देखिए बहुत ज्यादा ड्रामेबाजी भी नहीं करनी है और बहुत ज्यादा रोबोट की तरह वो पढ़ भी नहीं लेना है। थोड़ा सा भाव उसमें डालना है और ठाकुर को सुनाना है। जितना हम ठाकुर को सुनाते जाएंगे उतना ही ठाकुर आनंद से उसको सुनेंगे। तो यह हो गया प्रथम चरण कि पूजा करनी है और पाठ करना है। या तो फिर कहेंगे दो चरण में उसको बांट लेते हैं। प्रथम स्टेप हो गया पूजा। द्वितीय स्टेज हो गया पाठ और तृतीय स्टेज है कि जप नाम जप। अभी देखिए मेरा खुद का अनुभव से मैं बताता हूं। मैं पहले कर जप ही करता था। जब तक मैं ट्रेनिंग सेंटर में नहीं गया था। जब तक मैं नागपुर में था। किंतु टीसी में क्या है कि बाकी सब ब्रह्मचारियों को अभी देखा होता है ना लड़कों में तो ऐसा होता है वह उसके पास में माला है तो मुझे भी माला चाहिए ठाकुर कहते हैं ना वो केशवसेन और ये विजय कृष्ण गोस्वामी को एटा समाज अ छे हमारो एकटी दरकार यानी कि इसका एक ब्राह्म समाज है तो मुझे भी एक समाज चाहिए बोल के वो विजय कृष्ण गोस्वामी ने अपना एक अलग से ब्राह्म समाज बनाया खैर बहुत सारे कॉम्प्लेक्स कारण थे किंतु ठाकुर इस तरह से मजाक करके कहते थे एक ह्यूमन साइकोलॉजी है दूसरे ब्रह ब्रह्मचारियों को माला जप करके देखता हूं तो मैंने सोचा मुझे भी माला चाहिए तो ठीक है बेलूर मठ में तो सहज है वहां से माला खरीद ना माला मुझे खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी थी वो प्रेसिडेंट महाराज थे अपने पूजनीय आत्मस्थानंद जी महाराज तो फिर उनके सेक्रेटरी महाराज तापस महाराज तो अपने ही है जाकर के महाराज को बोल दिया महाराज मुझे एक माला चाहिए तो महाराज कहते अच्छा ठीक है इस दिन रात को आना मुझे समय दे दिया तो 7 ना 8:00 बजे मैं प्रेसिडेंट महाराज के क्वार्टर में गया महाराज जी खुद बैठे हुए थे पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज उन्होंने अपने हाथों से एक माला मेरे हाथ में दी और पता है ना अपने संघ में ऐसा है पूजा की जो माला होती है म जप करने की माला पहले तो पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज अपने हाथों से एक बार जप कर लेते हैं। इसको कहते हैं माला शोधन करना। फिर वह हमको देते हैं। तो वह शोधन की हुई माला महाराज जी ने अपने हाथों से मुझे दी और फिर मैं उसके ऊपर जप कर रहा हूं। जैसे ही मैंने उसके ऊपर मैं जप करना प्रारंभ किया ना सडनली मुझे लगा कि यह मैं कैसी मूर्खामी कर रहा था इतने दिनों तक यह जो रेजिस्टेंस बना हुआ है ना मेरे माइंड में सभी चीजों के प्रति ये अरे यह सब नाटक है ये नौटंकी है यह पागलपन है तो यह माला के प्रति भी मेरे माइंड में इस तरह का रेजिस्टेंस था। ठाकुर की कृपा से वो प्रेसिडेंट महाराज पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज के हाथों से जो माला मिली वो जप करते-करते वो भी आखिरी रेजिस्टेंस चला गया। सही में बहुत आनंद आता है। मैं सबको रिकमेंड करूंगा कि यदि आप जप करते हैं तो माला पे जप कीजिए। इसके बाद में ओवर ए पीरियड ऑफ टाइम मैंने कुछ-कुछ मेथड डेवलप की है। मैं क्या करता हूं कि जो एक विधिवत जप करना होता है सुबह शाम जैसे कि अपने गुरु महाराज कहते हैं तो उसके लिए जो शोधन की हुई माला है उससे जप करना है। इसके बाद में ये जो 54 ये जो बीड्स वाली मणका वाली माला मिलती है तो वह छोटी रहती है। तो, उसमें क्या है कि मैंने फिर ऐसी दो-तीन माला खरीद ली थी और मैं उसको बाद में अपने पॉकेट में रखता था। वह शोधन की हुई माला है। उसको तो आप बैठकर के ही जप कीजिए। इधर-उधर मत ले जाइए। किंतु यह जो 54 वाली ना कि इवन 108 जैसी आपकी सुविधा हो। पॉकेट में रहनी चाहिए जो कि शोधन नहीं की हुई है। यदि खो भी जाए डैमेज भी हो जाए तो हमको कोई दिक्कत नहीं है। तो उसको एक ले जाकर के सब समय में अपने पॉकेट में रखता था। अभी आजकल नहीं रखता किंतु वो जो उस समय जब ये नया-नया ये सब मेरे मन में उत्साह प्रारंभ हुआ था उस समय में रखता था कुछ भी होता था अपने पॉकेट में हाथ डाल करके वो मैं उसको जप करता रहता था घूमते फिरते बैठते चलते कुछ भी करते तो ये क्या है कि अभी नॉट नेसेसरी कि आप माला के माध्यम से करें आप कर जप भी कर सकते हैं और मन में मन में भी जप कर सकते हैं। एसेंशियल जो है बहुत सारे लोगों के मन में ऐसा होता है कि जब तो हमको ठाकुर के सामने बैठकर के स्नान करने के बाद में जो शोधन की हुई माला है वैसे उसी से करना है। एक्चुअली प्रॉब्लम क्या होता है आज के युग में कि इस तरह से समय ज्यादा नहीं मिलता रेगुलर नहीं मिलता। तो फिर वो जप होता ही नहीं है। तो बेटर है कि इस तरह से विधिवत जप जितना हो कर लीजिए। इसके बाद में यह जो चलते फिरते जो भी है सोते-सोते मैं सोते-सोते भी जप करता हूं। दोपहर को लेटे हैं तो अभी क्या है सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठ जाते हैं तो थोड़ा सा दोपहर को रेस्ट करना पड़ता है। किंतु बहुत बार नींद नहीं आती। तो क्या है कि वह मैं माला लेकर के जप करता रहता हूं सोते-सोते। तो कैसी भी अवस्था है आपको लंबी यात्रा में जाना है। बहुत सारे लोगों को क्या है कि वह कम्यूट करना पड़ता है प्रतिदिन। घर से जॉब पे जाएंगे। जॉब से घर पे आएंगे। स्कूटर चला है तो चलाते हैं तो मन में मन में जप करना है। बस में बैठे हैं तो वह वही वो पॉकेट में हाथ डाल करके वह माला से जप करते रहना है। कहने की बात यह है कि जप आप जितना करें उतना अच्छा है। वह एक मन में ग्रंथि बांध करके मत बैठ जाइएगा कि वह एक विधिवत जो होता है जब वही करूं और बाकी सब करने की जरूरत नहीं है। तो वह है जप जितना कर सके कीजिए। दो मालाएं रखना चाहते हैं तो रखिए और दूसरी माला जो है बिना शोधन की हुई कहां पे भी ले जा सकते हैं कहीं पे भी उसको जप कर सकते हैं। मिस भी हो जाती है तो कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। तो वो एक है। इसके बाद में आता है ध्यान। देखिए ध्यान के लिए मेन तो हमको पता है देश बंद चित्तस्य धारणा तत प्रत्यय एकतानता ध्यानम अर्थात कि कोई भी एक ऑब्जेक्ट है उसके ऊपर में अपने मन को एकाग्र करना वो हो गया धारणा और फिर उस ऑब्जेक्ट के प्रति एकतानता शब्द जो यूज किया है तत प्रत्यय एकतानता अर्थात कि यह सिंगल माइंडेडनेस अटेंशन यह जो हार्मोनियस अटेंशन उसके उसके ऊपर में आता है। दैट इज कॉल्ड ध्याना। उसको ध्यान कहते हैं। तो क्या है कि ध्यान कैसे करना है? तो बैठ जाना है ध्यान की मुद्रा में और फिर अपने हृदय में इमेजिन करना है कि ठाकुर वहां पर बैठे हुए हैं। तो जिसको कि हम कहते हैं कंस्ट्रक्ट। और यदि कोई बड़ा इस तरह का डरावना शब्द ना भी यूज करें। आईडिया बड़ा सिंपल है कि बस वही दक्षिणेश्वर में ठाकुर के कमरे में हम बैठे हैं। संध्या का समय है। कथामृत में बहुत सारे ये सीन दिए हुए हैं। एक दो बार दक्षिणेश्वर विजिट कर लिया तो यह पूरा नक्शा फिट हो जाता है अपने माइंड में। फिर उसको इमेजिन करना है कि वहां पे यह कंस्ट्रक्ट खड़ा करना है कि मैं वहां पे बैठा हूं ठाकुर के कमरे में। ठाकुर का जो अपनी खाट पर ठाकुर बैठे हैं। पास में ही एक छोटी खाट है। वहां पर मां बैठी हुई है। यह सभी डायरेक्ट डिसाइपल बैठे हैं। सब लोग ध्यान कर रहे हैं। और मैं भी वहां पर बैठ के ध्यान कर रहा हूं। यहां पे सुंदर गंगा बह रही है। ठाकुर के घर में धूप किया हुआ है। धु धुना लगाया हुआ है। तो उसकी खुशबू आ रही है। ऊपर में चांदनी है। बाहर में फूलों के पौधे हैं तो फूलों की खुशबू आ रही है। गंगा नदी का पवित्र कलकल शब्द बह रहा है। वह आ रहा है। इतने सुंदर वातावरण में मैं बैठा हुआ हूं। यह पिक्चर फ्रीज हो जाना चाहिए। और फिर यह ध्यान सक्सेसफुल हो उसका सबसे बड़ा कंडीशन है कि उसमें से भाव प्रकट होना चाहिए। या तो शांत भाव प्रकट हो ना कि संतान भाव प्रकट हो ना कि यह जो गुरु भाई है उनके प्रति सख्य भाव प्रकट हो जो भी है एक भाव प्रकट होना चाहिए। तो जैसे ही यह चित्र है। चित्र को आपने फोटोग्राफ लेकर के अपने हृदय में बिठा दिया और उसके ऊपर में मन को एकाग्र करतेकरते जैसे ही आपका मन स्थिर हो गया वैसे ही उसमें से भाव प्रकट होने लगेगा। यह उसकी यह जो सौरभ है उसकी जो स्वास है अपने देह में फैलने लगेगी। और यह जो भाव जो है ना अल्टीमेटली हमारी विल पावर को स्ट्रेंथन करता है। विल पावर किस चीज को लेकर के परिपुष्ट होता है? तो वह भाव को लेकर के। तो जितना ही भाव यह प्रकट होगा शांत भाव या तो संतान भाव उतना ही हमारा विल पावर स्ट्रें स्ट्रांग होता जाएगा और यदि विल पावर स्ट्रांग होगा तो हम ज्यादा लंबे समय तक इस पिक्चर के ऊपर में इस चित्र के ऊपर में मन को एकाग्र रख सकेंगे इसको कि वर्चुअस साइकिल कहते हैं। फीडबैक साइकिल जितना ही विल पावर बढ़ेगा उतना ही मन एकाग्र होगा। जितना ही मन एकाग्र होगा उतना ही उसमें से भाव प्रकट होता जाएगा। जितना भाव प्रकट होगा उतना ही संकल्प शक्ति विल पावर बढ़ेगा। उतना ही मन ज्यादा अच्छे से एकाग्र होगा। तो यह वर्चुअस साइकिल स्टार्ट हो जानी चाहिए। तो यह हो गई एक पूरी मेथड जो कि मैंने अपने खुद के जीवन में प्रैक्टिकल अनुभव करके देखी है कि बड़ी सहज रूप से आप इसको फॉलो कर सकते हैं। तो अभी अल्टीमेटली कि यह जो पूरा सुनने के बाद में हमको करना क्या है? देखिए प्रतिदिन आप पूजा कर सकते हैं तो अच्छी बात है। प्रतिदिन आप ठाकुर के सामने बैठकर के कथामृत का पाठ कर सकते हैं तो वह भी अच्छी बात है। प्रतिदिन जप कर सकते हैं तो भी अच्छा है। प्रतिदिन ध्यान कर सकते हैं तो भी अच्छा है। प्रॉब्लम ऐसा होता है कि बहुत बार हमारे पास में इतना समय ही नहीं मिलता है। तो फिर क्या करना है? यह रिट्रीट रिट्रीट हमको ठीक कर लेना है कि सप्ताह में एक दिन ना जब भी टाइम मिले दो-ती घंटे मुझे अपने लिए निकालने हैं और यह जो रिट्रीट अपने घर में ही करनी है। उसमें यह पूरा टाइम टेबल बना देना है। और टाइम टेबल बनाने की कोई जरूरत नहीं। ये सब स्टेप्स एक के बाद एक फॉलो करना है। पूजा की तैयारी करनी है। मान लीजिए ठाकुर के लिए यदि खीर पका सके आप तो भी बहुत अच्छा है। नागपुर में यह खीर बनाने के लिए ये पायस बनाने के लिए हमारे भंडारी महाराज आते थे। तो वो वहां पे वो खीर बना रहे हैं। पायस बना रहे हैं और हमारे साथ में गप लगा रहे हैं। बड़ा पवित्र वातावरण बनता था। तो अपने हाथों से यह पायस बना रहे हैं, फूल चयन कर रहे हैं, माला बना रहे हैं। ठाकुर को वस्त्र पहना रहे हैं। धूप दीप लगा रहे हैं ठाकुर के सामने और फिर जो पूजा पद्धति है उसमें से एक के बाद एक मंत्र बोलते बोलते सब कुछ ठाकुर को ऑफर कर रहे हैं। और जैसे ही पूजा समाप्त हुई, इसके बाद में कथामृत वहीं पर है। कथामृत का पाठ करके ठाकुर को सुना रहे हैं। वो ठाकुर को पाठ सुना दिया। उसके बाद में बैठकर के जप किया और फिर जैसे जप समाप्त हुआ जितनी अपनी कैपेसिटी है 108 108 10000 जितनी भी अपनी कैपेसिटी है उतना जप किया और फिर आखिर में बैठकर के ध्यान किया तो यह जो पूरी पूर्व भूमिका बनाने के बाद में यदि आप ध्यान करेंगे तो देखेंगे कि आपका मन बड़े ही सहज रूप से एकाग्र हो जाएगा और यदि यह सब नहीं करके थ्योरेटिकली आप सोचेंगे बैठकर के कि हां अभी अभी मेरी संकल्प शक्ति जागृत हो गई है और अभी मैं बैठकर के ध्यान करूंगा तो हो सकता है पॉसिबिलिटी है कि इतना अच्छे से हम ध्यान ना कर पाए ध्यान बीच-बीच में भंग होता रहे और 10 तरह के उल्टे-पुल्टे विचार मेरे मन में आते रहे तो उसका काउंटर है यह पूरी पूर्व भूमिका बनानी है। धीरे-धीरे करके देखिए कि जितनी ज्यादा इंद्रियों को हम एंगेज कर रहे हैं यह रिवर्स डायरेक्शन में जा रहा है। धीरे-धीरे करके जब हम पूजा करते हैं, अपने हाथ और पैरों की भी आवश्यकता पड़ती है। किंतु जब हम पाठ कर रहे हैं, सिर्फ यह श्रवण है, वाणी है और चक्षु है। इतना ही हमको यूज़ करना पड़ता है। उसके बाद में जब जप करेंगे तो जप में फिर वह सब मन में ही मन में जप चलेगा। हालांकि आप वो माला लेकर के हाथ से जप कर रहे हैं तो हाथ का आवश्यकता है किंतु पूजा में जितनी है उतनी नहीं। वो इंद्रियों का एंगेजमेंट धीरे-धीरे कम हो रहा है। मन का एंगेजमेंट बढ़ रहा है। और बाय द टाइम आप ध्यान तक आएंगे आपकी बाकी जो इंद्रियां है वह धीरे-धीरे करके उसको डिसएंगेज हो जाएगी और मन ही है जो कि ठाकुर के चित्र पे ठाकुर के भाव में लगा हुआ है। यानी कि यह पूरी जर्नी है। सिस्टमेटिक स्टेप बाय स्टेप करनी है। प्रतिदिन कर पाए बहुत अच्छा है। ना कर पाए तो एक रिट्रीट के रूप में जब भी समय मिले वंस इन अ वीक सप्ताह में एक बार या तो फिर व्हनेएवर जब भी समय मिले एक ठीक कर लेना है कि दो-ती घंटे का रिट्रीट आज मुझे अपने ही घर में बैठ के कर लेना है और यह पूरी मेथड को मुझे फॉलो करना है। करके देखेंगे। जितना आपका यह बढ़ता जाएगा उसका फ्रीक्वेंसी प्रैक्टिस जितनी बढ़ती जाएगी वैसे ही यह पूरी मेथड के आखिर में जब ध्यान करने को बैठेंगे तो ध्यान सहज रूप से हो जाता है। तो वो एक लर्निंग है और यह तो ठाकुर का हो गया। मां भी तो कोई कम नहीं है। तो फिर ये मां की पूजा कर सकते हैं। मां की ये जो वाणी है गंभीरानंद जी की जीवनी या तो फिर मायर कथा श्री श्री मायर कथा बंगाली में है। उसका गुजराती मां की बातें उसका हिंदी है मां की बातें। तो वह बड़ी सुंदर किताब है। तो यह दो में से कोई भी एक किताब का मां के सामने पाठ करना है। मां के नाम का यदि जप करना है। आपने यदि मंत्र लिया होगा तो अच्छा है। वरना तो मां ने खुद ने कहा है। मां या तो फिर राधा ये दोनों मंत्र से आप मेरी मेरा जप कर सकते हैं। मां ने खुद ने कहा है। तो मैं बहुत बार यह मां मां करके वो जप करता हूं। बड़ा अच्छा लगता है। तो वह हो गया। और फिर जब ध्यान करते हैं तो वही हम वहां पे जय राम बाटी चले गए। वहां पे मां बैठी हुई है। वह चित्र था ना हमने देखा था कि मां के सामने दूध की एक कटोरी है। वह दूध की कटोरी लेकर के मां अपेक्षा कर रही है कि उनका संतान त्यागी संतान काम के लिए बाहर गया है। वह वापस आएगा तो मां उसको दूध पिलाएगी। बोलकर के दूध की कटोरी को लेकर के मां बैठी है। तो हम भी वहां पर सामने बैठे हैं। सुंदर वातावरण गांव का वातावरण है। पास में ही पुण्य पुकुर है। वही राममामई महाराज वगैरह ने वहां पर फूलों के पौधे भी लगाए हैं। तो उसकी खुशबू आ रही है और कोई डिस्टरबेंस नहीं है शहर की तरह। तो गांव है छोटा सा और मां स्वयं वहां पर बैठकर के संतान की चिंता कर रही है। तो यह और फिर यह ठाकुर का चित्र तो है ही है जिसकी मां पूजा करती है जय राम भाटी में तो सब कुछ तो छोटे कमरे में ही है। तो वो एक सुंदर एक चित्र हम खड़ा कर सकते हैं। तो यह चाहे हम ठाकुर को फॉलो करें ना कि मां को फॉलो करें कि दोनों को एक साथ में। कभी मां का ध्यान, कभी ठाकुर का ध्यान जो भी है यह पूरी मेथड को फॉलो करने से एट द एंड ऑफ द हम जब ध्यान करने को बैठेंगे देखेंगे कि बहुत अच्छे से ध्यान होता है। तो यह पूरा एक मेरा जो अनुभव है वो मैंने शेयर किया। अभी इसके बाद में आगे कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु। देखिए आई आई कॉल दिस अ लग्जरी ऑफ़ बिलीफ। इन दैट सेंस इफ वी ट्रूली वांट टू प्रोग्रेस इन आवर स्पिरिचुअल लाइफ वी विल बी एबल टू फाइट एनीथिंग एंड ओवरकम एनी चैलेंजेस। बट इफ वी डोंट वांट टू प्रोग्रेस इफ वी जस्ट वांट टू सीट इन अ कॉर्नर एंड जस्ट इमेजिन दैट आई एम प्रोग्रेसिंग इन दैट केस आई विल नेवर बी एबल टू फाइट एनीथिंग। सो वी नीड टू रियली प्रोग्रेस मुमुक्षुत्व। दैट इज़ द ओनली कंडीशन दैट मुमुक्षुत्व मोर मुमुक्षुत्व आई हैव ग्रेटर द एंबिशन आई हैव टू प्रोग्रेस इन स्पिरिचुअल लाइफ। दिस मुमुक्षुत्व दिस एंबिशन दिस डिजायर सात्विक डिजायर दैट इज द ओनली थिंग दैट विल हेल्प मी टू ब्रेक डाउन दिस वॉल्व्स ऑफ रेजिस्टेंस। देखिए जप करने में ऐसा कोई पहले भी हमने एक बार डिस्कस किया था कि नियम क्यों होते हैं? नियम होते हैं हमको गाइड करने के लिए। हमको आगे बढ़ाने के लिए यदि यही नियम बैरियर बन जाए, बाधा बन जाए कि मैं स्नान नहीं किया है तो मैं जप नहीं करूंगा। तो यह तो फिर उल्टा हो गया ना कि जो नियम हमको आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ाने के लिए कहे हैं वही हमको ये कर दे रहे हैं। आगे नहीं बढ़ने देते हैं। राइट? तो स्नान करके जप करना बहुत अच्छा है। किंतु यदि स्नान ना कर पाए सिर्फ गंगाजल छिटक दिया तो भी चलेगा। मेन है कि जप करना है। स्नान वगैरह कोई एसेंशियल पार्ट नहीं है साधना का। करें तो बहुत अच्छा है ना हो पाए तो जैसी ठाकुर की इच्छा। ठाकुर के सामने क्षमा प्रार्थना कर देनी है कि ठाकुर ने आपने जो मेथड कही है नहीं कर पा रहा हूं। जितना हो सकता है वो ठाकुर ने खुद ने कहा है ना कि वो क्या कि छोटा बच्चा है तो छोटा बच्चा बाबा ऐसा पूरा नहीं बोल सकता है। तो सिर्फ बा बोलेगा। बड़ा बच्चा है तो वो बाबा बोलेगा। छोटा बच्चा सिर्फ बा बोलेगा। तो फिर पिताजी को तो पता है कि बच्चा छोटा है बोलकर के सिर्फ बाप बोलता है तो उसके ऊपर नाराज थोड़ी ना होंगे। उसकी जो कैपेसिटी है उसके अनुसार वह बोलता है। तो ठाकुर को तो यह सब पता है। देखिए जहां तक पूजा का प्रश्न है अब जैसे कि जो पुजारी महाराज होते हैं उनको तो पूजा करना ही है। इट्स अ पार्ट ऑफ ह ड्यूटी। अभी ऐसा होना नहीं चाहिए कि उनको पूजा के अलावा और कोई इतना बड़ा काम आ जाए कि फटाफट करके पूजा खत्म करनी पड़े। किंतु जैसे अभी मैं खुद का उदाहरण बना बताता हूं। मैं लिमड़ी में था तो लिमड़ी में दो ही लोग थे। मैं और बापा। तो अभी ऐसा होता है कि बीच-बीच में हमको गांव में जाना है। वह जलाशय योजना हमारी थी तो जलाशय खुदवाने हैं। फिर गाय डिस्ट्रीब्यूट करते थे। तो उस दिन बाबा कहते थे कि तुम पूजा थोड़ी जल्दी खत्म कर दो। आज हम जल्दी निकल जाएंगे। गांव में लंबा रास्ता है फिर वापस भी तो आना है ना संध्या आरती से पहले क्योंकि हम दोनों चले गए हैं तो फिर तो आश्रम में तो कोई नहीं है तो उस दिन फटाफट करके पूजा खत्म करके माने ऐसा नहीं है कि पूजा के जो अंग है उसमें हम फांकी मार रहे हैं किंतु ज्यादा जल्दी चालू कर दिया और थोड़ा सा जो फल काटना वगैरह थोड़ा सा कम कर दिया और निकल गए गांव में फिर रात शाम को आ गए जितना जल्दी हो सके क्योंकि संध्या आरती का तैयारी करना है तो अभी क्या है कि इस तरह से हमको एडजस्ट करना पड़ता यह मेरा ड्यूटी था। ये दोनों मेरा ड्यूटी है। दोनों एक्चुअली ठाकुर की ही सेवा है। किंतु आप जब पूजा करते हैं तो आपके लिए तो यह साधना है। आपके लिए यह कहना कि समय नहीं है तो मैं फटाफट कर दूं। यह तो कंट्राडिक्शन हो गया। आपने समय निकाल करके ही पूजा करने की शुरुआत की है। तो मान लीजिए कि आपके पास में 3 घंटा समय है तो उस तरह से पूजा कीजिए। उस तरह से उसको विस्तृत कीजिए। आधा घंटा है तो उस तरह से उसको संक्षिप्त कीजिए। किंतु जो कुछ करते हैं उसमें पूरा मन लगाकर कीजिए। उसको पूरा परफेक्ट कीजिए। यानी कि मुझे मेरे पास में तीन-चार घंटा है तो मैं खीर भी बनाऊंगा। माला भी उसका मैं करूंगा, गांथूंगा, वस्त्र भी पहनाऊंगा। किंतु यदि मेरे पास में आधा ही घंटा है तो ना ही मैं खीर बनाऊंगा, ना ही मैं माला बनाऊंगा, ना ही मैं वो वस्त्र पहनाऊंगा। सिर्फ मैं धूप लेकर के छोड़ दूंगा। किंतु वो जो धूप दीप जो देता हूं दैट माय माइंड शुड बी कंप्लीटली देयर। क्योंकि मैं ड्यूटी के रूप में नहीं कर रहा। मैं तो साधना के रूप में कर रहा हूं। राइट? तो समय के अनुसार उसको विस्तृत करना है। संक्षिप्त करना है। किंतु फांकी नहीं मारनी है। इस अर्थ में कि संपूर्ण मन उसमें रहना चाहिए। यह सब चीजों को ना विधिवादी नहीं बना देना है। अब जैसे कि अपने मिशन में आपको विधिवादी पूजा करनी ही है। उसमें आप बांधछोड़ नहीं कर सकते हैं। किंतु आप तो साधक हैं। अपनी मन की इच्छा पूर्ति के लिए आप यह सब कर रहे हैं। अभी मैंने ठीक किया। मैं प्रतिदिन पूजा करूंगा एक घंटा। ठीक है? मैंने वचन ले लिया। आई मीन प्रॉमिस कर दिया अपने को। बहुत सारे लोग जब मंत्र प्राप्त होता है ना उसके बाद में बहुत सारे वो प्रॉमिस कर लेते हैं कि मैं यह करूंगा वो करूंगा। वो उत्साह रहता है ना वो गुरु शक्ति प्रसारित हुई है भीतर में तो वो उत्साह बढ़ जाता है। एक ही सप्ताह में आधा सब ठंडा हो जाता है। फिर वो कटिंग को कॉर्नर कट करना शुरू कर देते हैं। अच्छा इसमें ये एक्सक्यूज, इसमें ये एक्सक्यूज तो ये सब करना और फिर क्या है? गिल्ट फीलिंग होता है। जैसा आपने कहा कि अरे मैंने तो यह प्रॉमिस किया था किंतु नहीं कर पा रहा हूं। यह मुझे मैंने खीर बनाने का सोचा नहीं बना पा रहा हूं। वस्त्र पहनाने का सोचा नहीं कर पा रहा हूं। तो यह सब गिल्ट फीलिंग से यह सब मत कीजिए। ड्यूटी के रूप में मत कीजिए। इसको कीजिए कि मेरा ठाकुर के प्रति प्रेम है। उससे मैं कर रहा हूं। आपको संक्षिप्त में करना पड़ेगा। कीजिए। संक्षिप्त में कीजिए। किंतु वि नो गिल्ट फीलिंग। बिना किसी गिल्ट फीलिंग के, बिना किसी कॉर्नर कटिंग के आप कीजिए। संक्षिप्त कर लीजिए जो कुछ भी करना है किंतु उतना ही ध्यान लगा के कीजिए जितना आप ज्यादा समय रहने से करते हैं क्योंकि आप तो कोई नियम के अनुसार ड्यूटी के लिए नहीं कर रहे हैं ना ना मैंडेटरी नहीं ए शुप अपना के बोलना मेरा खुद का एक्सपीरियंस बताया कर जप से जप करते हैं कोई गलत नहीं है वह सबका अपना-अपना एक डेवलप होता है मैं सिर्फ मेरे एक्सपीरियंस शेयर कर रहा जैसे अभी मैंने यह गीतानंद जी का बताया ना कि वह माला करते हैं जप किंतु इस तरह से जप करेंगे जैसे कि हाथ में माला है किंतु हाथ में माला है नहीं तो आप ऐसा सब नियम देखिए मैं कहूंगा कि कर सकते हैं तो बहुत अच्छा है माला से क्योंकि मेरा खुद का अनुभव ऐसा कहता है किंतु जैसे कि राम हिंदू धर्म के साथ में जो कोई भी थोड़ा बहुत भी वाकिफ है थोड़ा बहुत भी फेमिलियर है सबको पता है कि यहां पे हार्ड एंड फास्ट ऐसा कुछ नहीं है जैसा कि दूसरे धर्मों में होता है। आपको एग्जजेक्टली इसी मेथड को फॉलो करना है। वरना नरक में जाएंगे। ऐसा यहां पर कुछ नहीं है। देखिए आप आप जब शोधन की हुई माला होती है ना उसको आप अभुक्त नहीं रख सकते हैं। किंतु जैसे मैंने कहा मेरे पास में दो-तीन तरह की माला है। तो शोधन तो सिर्फ मैंने एक ही करवाई है। बाकी तो मैं वैसे ही अपने पास रखता हूं। तो वैसे ही बिना शोधन की हुई माला अपने पास रख सकते हैं। उस पर जप कर सकते हैं। देखिए मैं बार-बार कहता हूं नियम है हमारे आध्यात्मिक विकास के लिए। नियम हमारे रास्ते में बाधा नहीं बनने चाहिए। देखिए दो होता है नॉलेज और विज़डम। नॉलेज हम दूसरे को दे सकते हैं। विडम कभी नहीं दे सकते क्योंकि विडम हमको प्रैक्टिकल करके अर्जन करना है। तो एक्चुअली मेरा जो विडम है ना आपके लिए नॉलेज है क्योंकि मैंने जो जीवन भर जो किया उसका जो मुझे एक विज़डम प्रकट हुआ आपको मैं दिया तो ऐसा नहीं है कि आप एग्जैक्टली ऐसा कर पाएंगे। आप इस नॉलेज को लेकर के जैसे डेवलप करेंगे ना आपका खुद का एक विज़डम जन्म लेगा। व्हिच विल बी वेरी डिस्टिंक्ट फ्रॉम माय। किंतु नॉलेज शेयर मतलब विज़डम को शेयर करना चाहिए। वो बहुत बार हम ऐसा डरते क्यों हैं? पता है? हमको ऐसा लगता है जैसे मैं गुरु भाव में आकर के मेरा विज़डम शेयर कर रहा हूं। एक्चुअली मैं विज़डम नहीं शेयर कर रहा हूं। हालांकि मैं विज़डम शेयर कर रहा हूं। आपके पास आते-आते वो नॉलेज ही हो जाता है। अब अब जैसे देखिए मैं रामकृष्ण संघ में रहा। इतनी किताबें पढ़ी। इतने सीनियर साधुओं के वार्तालाप सुने तो उन्होंने तो अपना विज़डम ही बताया है ना। लीला प्रसंग कथामृत ये सब क्या है? इज़ अ आउटपोरिंग ऑफ विज़डम। मास्टर महाशय ने जीवन भर जो साधना की वो विस्टम कथामृत में है। शरद महाराज ने जीवन भर साधना की उसका विस्टम लीला प्रसंग में है। स्वामी जी के पूरे जीवन का विडम हमको कंप्लीट वर्ष में मिलता है। क्योंकि मेरे तक आते-आते वो नॉलेज ही हो जाता है। वो मुझे उनका प्रैक्टिस मुझे किसी काम में नहीं लगने वाला है। मुझे उसको अनुसार प्रैक्टिकल करना होगा। देन इट विल कन्वर्ट फॉर मी इनू विडम। योग सूत्र में ऐसा ही है ना कि अह प्रत्याहार जो है बीच में तो बहिरंग योग और अंतरंग योग इन दोनों के बीच में ब्रिज है प्रत्याहार प्रति आहार इंद्रियों का जो बाह्य आहार है हम आसन कर रहे हैं प्राणायाम प्राणायाम कर रहे हैं यम नियम कर रहे हैं वो तो पूरे देह से कर रहे हैं अह किंतु जैसे ही हम अंतरंग योग में आते हैं धारणा ध्यान समाधि तो बहिरंग योग और अंतरंग में वो ब्रिज है प्रत्याहार प्रति आहार इंद्रियों का आंखों का आहार है बाहर देखना। तो उसको मैंने रिवर्स करके अंतर में आत्म तत्व देख रहा हूं। तो दिस जैसे आवृत्त चक्षु तो यह प्रतिआहार एग्जैक्टली फिट बैठ जाता है। एक कर्म योग जो है कर्म योग क्या है? पूजा का ही तो एक्सटेंशन है ना। यह ट्रेडिशनल पूजा हम कर रहे हैं। स्वामी जी ने क्या कहा? जिस शिव को आप मंदिर में देखते थे, उसी शिव को लोगों के हृदय में देखिए। डॉक्टर होता है वह ट्रीटमेंट करता है तो वह रोगियों की पूजा ही कर रहा है। इंजीनियर होता है वह बिल्डिंग कंस्ट्रक्ट कर रहा है तो शिव के लिए ही कर रहा है। यानी कि हमारी तरह आप निष्काम सेवा नहीं भी करते हैं तो भी इवन आप बिजनेस करते हैं, स्टॉक मार्केट में जाते हैं, जॉब करते हैं, जो भी कुछ करते हैं, सोचिए कि आप ईश्वर की सेवा कर रहे हैं। कन्वर्ट द वर्ल्ड इनू डिविनिटी। है ना? दिस इज द अल्टीमेट आईडिया। यह हम बैठकर के पूजा क्यों करते हैं? देखिए, मैंने जैसे कहा कि मेरे माइंड में यह सब रेजिस्टेंस बहुत था। मैं ट्राइबल लोगों की सेवा कर रहा हूं। उससे बड़ी पूजा क्या है? राइट? ऐसा मैं सोचता था। किंतु इवेंचुअली मुझे पता चला कि जैसे-जैसे हम जब ध्यान करने के लिए बैठते हैं ना तो इंद्रियों को रिट्रीट करना होगा। तो ट्राइबल एरिया में जाना मेरा जितना इंद्रिय खर्च होता था उससे बहुत कम पूजा में जाता है। ध्यान से तो ज्यादा है किंतु वो ट्राइबल एरिया से तो बहुत कम है। तो धीरे-धीरे करके इंद्रियों को रिट्रीट करते जाना है। पूजा किया फिर और रिट्रीट करते-करते फिर पाठ किया और रिट्रीट करते-करते जप किया। सो द साधन वर्ल्ड साधना का जगत इज नथिंग बट इंद्रियों का रिट्रीट। तो यही हमको ध्यान में रखना है। आइडियल बहुत सारे हैं इस जगत में। राइट? और आइडियल इतने सारे हैं, आदर्श इतने सारे हैं कि हम एक मनुष्य कभी भी संपूर्ण आदर्श फॉलो नहीं करने वाला है। ठाकुर मां स्वामी जी को छोड़कर के मैं कहूंगा कि अपने संग में इंक्लूडिंग डायरेक्ट डिसाइपल 100% सभी आदर्श का पालन किया हो। ऐसा खोजना मुश्किल है। अपनी क्षमता के अनुसार हमको जो होना है वह करना है। जैसे अभी वह उदाहरण कि बड़ा बच्चा है वह बाबा करके पुकारेगा। छोटा बच्चा है वह बा या पा करके पुकारेगा। उसकी क्षमता ही नहीं है बेचारा क्या करेगा। राइट? तो जितनी क्षमता है उतना सुख पूर्वक कीजिए। और फिर देखिए अब ठाकुर रोते-रोते मां के पास में क्रंदन करतेकरते वो मां को पुकारते थे। मां दर्शन देना ही होगा। नहीं दोगी तो आखिर में वह अपना खुद का गला काटने को गए थे। तो वो क्या है कि अपना मुमुक्षुत्व यानी कि दो चीजें हैं। आप गृहस्थ हैं तो तो आपको सुविधा भी देखनी है, मुमुक्षुत्व भी देखना है कि मेरा इतना मुमुक्षुत्व है, मेरी इतनी सुविधा है तो मैं उससे इतना करता हूं। सुविधा बढ़ती है, मुमुक्षुत्व बढ़ता है तो मैं और ज्यादा आगे करता हूं। ठीक है ना? यह सब नियम हमारे रास्ते में बाधा नहीं बनने चाहिए। आदर्श विपरीत नहीं हो जाना चाहिए। गिल्ट फीलिंग रिग्रेट नहीं खड़े करने चाहिए। यह ध्यान में रख के सब करना है। जितना हुआ उतना कीजिए। जितना हुआ उतना सुख पूर्वक कीजिए। ठाकुर पे मन लगा के कीजिए।