मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः
मृत्यु के द्वार पर खड़े साधु को हुए स्वामी ब्रह्मानन्द के दिव्य दर्शन
राजा महाराज उस समय चेन्नई गए थे उस [संगीत] समय का मद्रास साउथ इंडिया पिलगिरी मैच के लिए शशि महाराज ने उनको इनवाइट किया था। तो एक दिन हुआ ऐसा कि राजा महाराज का एक सेवक वो बहुत ही बीमार हो गया और उनको हॉस्पिटल में एडमिट किया गया। अभी बीमारी इस तरह का था कि जीवन की कोई आशा नहीं थी। बचने की कोई आशा नहीं थी। तो अभी शशि महाराज डेली इस साधु को हॉस्पिटल में एडमिट किया है तो डेली उसको मिलने के लिए जाते थे। अ एक दिन इस साधु ने कहा कि देखिए अभी तो मेरा आखिरी समय आ चुका है और मैं आखिरी एक बार राजा महाराज का दर्शन करना चाहता हूं। तो वह तो यहीं पे है। मद्रास मठ में ही है। तो आप कृपा करके उनको यहां पर आने को कहिए। और राजा महाराज है ना बालक भाव तो कभी-कभी नर्वस हो जाएंगे कभी-कभी एशस हो जाएंगे। ठाकुर का कैसा बालक भाव था। तो वैसा ही राजा महाराज का भी बालक भाव। तो यह सेवक महाराज कहते हैं कि देखिए मुझे पता है कि उनको यदि हॉस्पिटल में आने को कहूंगा भीतर में तो वह नर्वस हो जाएंगे कि यहां पे तो इतने सारे पेशेंट है। पेशेंट के बीच में आने से फिर वो कहीं उनको कोई रोग ना लग जाए, इंफेक्शन ना हो जाए। तो इसलिए वह भले ही चाहे भीतर में ना आए गाड़ी में ही बैठे रहे मैं खिड़की में से एक बार उनका आखिरी दर्शन कर लूंगा क्योंकि अभी मुझे पता है कि मेरा अभी ज्यादा दिन नहीं हूं मैं पृथ्वी पे तो ठीक है शशि महाराज ने जाकर के राजा महाराज को कहा कि देखो तुम्हारा ही सेवक है मटका ही साधु है आखिरी माने मृत्यु शैया पे है और एक बार तुम्हारा दर्शन करना चाहता है तो तुम एक बार आओ गाड़ी में ही बैठे रहना वह खिड़की में से तुमको देख लेगा। तो राजा महाराज कहते हैं क्या कहते हो शशि भाई? मैं वहां पे जाऊंगा हॉस्पिटल के पास में जाने से ही पता नहीं मुझे इंफेक्शन हो जाएगा तो मैं बीमार हो जाऊंगा तो क्या हो जाएगा मेरे साथ में? तो शशि महाराज बड़े दुख करके कहते हैं कि अरे अपना ही एक भाई है। हॉस्पिटल में है। उसका आखिरी समय है। उसको एक बार दर्शन देना है। उसमें इतना भय किस चीज का है? तो राजा महाराज बोलते हैं नहीं नहीं मैं नहीं जाऊंगा। तो शशि महाराज दूसरे दिन गए। उस साधु को कहा कि नहीं राजा महाराज तो आना नहीं चाहते हैं। तो साधु वो फिर से एक बार रिक्वेस्ट करता है कि उनको कहिए भीतर में मत आए। दूर से ही खड़े रहे। दूर से गाड़ी में ही मैं एक बार खिड़की से बस देख लूंगा। तो फिर से शशि महाराज राजा महाराज को कहते हैं। राजा महाराज फिर से मना कर देते हैं। ऐसा दो-तीन बार होता है। मीनवाइल साधु का देहांत हो गया। तो शशि महाराज आकर के राजा महाराज को बड़े दुख पूर्वक कहते हैं थोड़ा सा नाराजगी पूर्वक कि राजा यह अपना ही साधु है अपना ही भाई है और इस तरह से तुमको आखिरी एक बार तुम्हारा दर्शन करना चाहता था तुमने उसको एक बार आखिर में दर्शन भी ना दिया किस तरह के क्रूर हो तुम किस तरह के निष्ठुर हृदय हो जब शशि महाराज ने ऐसा नाराज होकर के गुस्से से दुख पूर्वक कहा तो एकाएक एक राजा महाराज का जो बालकपन था वो एकदम नर्वसनेस और ए्जायटी जैसा वह छोटा बच्चा दिखाता है कभी-कभी तो एकदम अदृश्य हो गया। एकदम सीरियस हो गए और सीरियस होकर के बोलते हैं अरे शशि भाई इस नजरों का देखना ही क्या देखना होता है? इसके अलावा भी तो म और सारे लेयर्स है एग्जिस्टेंस के। यह तो मेरा शब्द है। उनका नहीं। उन्होंने सिर्फ इतना कहा नजरों से देखना भी क्या देखना होता है? तो शशि महाराज समझ गए कि राजा महाराज ने आखिरी समय में जाकर के इस साधु को सूक्ष्म रूप से दर्शन दिए होंगे। तो जैसे ही राजा महाराज ने गंभीर होकर कहा ऐसा साथ में ही शशि महाराज उनके चरणों में साष्टांग हो गए और कहा राजा तुम्हारी लीला कैसी है वह तुम्हारे अलावा ठाकुर के अलावा और कौन पहचानेगा? तो देखिए
बागान और पशुओं को लेकर विवेकानन्द–ब्रह्मानन्द में छिड़ गई मज़ेदार तकरार!
के खास करके ठाकुर मां स्वामी जी राजा महाराज जैसे-जैसे उनका उम्र बढ़ता जाता है तो वैसे ही एक तरह का बचपना जो है एक तरह का बालक भाव है उनमें प्रकट होता था वो शशि राजा महाराज की और स्वामी जी का झगड़ा तो वर्ल्ड फेमस है वो बेलूर मठ में दोनों का कमरा पासपास में तो अभी यहां पे राजा महाराज का गार्डन है यहां पे वह स्वामी स्वामी जी के वो बतख है। फिर वो कुत्ता है वगैरह उन्होंने अपने कुछ-कुछ पाल के रखे हैं पशुओं को। अभी यह स्वामी जी के ये जो पशु है वो राजा महाराज के बागान में घुस के वो कभी-कभी फूल खा जाएंगे, कभी कुछ खा जाएंगे, कभी क्या कुछ गड़बड़ कर देंगे। तो राजा महाराज और स्वामी जी दोनों एक झगड़ा करेंगे। राजा महाराज कहते हैं कि अरे आप अपने उनको संभालिए। वो यहां पर आकर मेरे बागान में आकर ये सब गड़बड़ कर रहा है। और स्वामी जी कहते हैं तो यह पशु है। उसको बेचारे को थोड़ी ना समझ में आएगा कि यह तुम्हारा गार्डन है। वह तो अपना स्वभाव अनुसार बिहेव करेंगे ही करेंगे। तो फिर उन्होंने बीच में एक रेखा दौड़ दी। यह इस साइड का जमीन मेरा राजा महाराज का गार्डन का और इस साइड का जमीन स्वामी जी के पशुओं का। इसको इसमें नहीं आना है। माने पशुओं को यहां गार्डन में नहीं आना। और राजा महाराज को वहां पे स्वामी जी की जमीन पे कोई पौधा नहीं लगाना। तो यह दोनों को देखकर के मठ के साधु आश्चर्य प्रकट करते हैं कि किस तरह का बचपना दोनों गुरु भाइयों में है।
तरकारी में माचिस की तीली देखकर ब्रह्मानन्द की बालसुलभ नाराज़गी
एक बार राजा महाराज का एक सेवक तो राजा महाराज के लिए खाना बनाता है। तो खाना बनाते बनाते अभी क्या है उस समय का तो पता है ना वह आजकल की तरह गैस वगैरह तो है नहीं वो मिट्टी का चूल्हा या तो यह स्टव होगा केरोसिन वाला ऐसा कुछ उसके ऊपर में वो जो दिया सलाई जो होती है ना मैच स्टिक तो मैच स्टिक से उसमें अग्नि प्रकट करना है और फिर उसमें वह जो चूल्हे के ऊपर में आपको हांडी रख के भात तरकारी वगैरह बनाना है तो एक दिन हुआ ऐसा कि राजा महाराज का यह जो सेवक है उनके लिए तरकारी बना रहा है। तो चूल्हा जलाने के लिए वह दिया सलाई जो है मैच स्टिक जो है यूज किया होगा और इस तरह की मैच स्टिक क्या है? किचन में आप जाएंगे तो पड़ी रहती है चारों ओर इधरउधर थोड़ा बहुत तो उसमें से गलती से एक मैच स्टिक का टुकड़ा राजा महाराज के लिए जो तरकारी बनाई थी उसके भीतर में रह गया। तो अभी सेवक महाराज को पता नहीं कि इस तरह से रह गया है तो लेकर के राजा महाराज के पास जाता है। तो राजा महाराज ने देखा उसके भीतर में वो मेज टिक का एक टुकड़ा है। अभी हुआ ऐसा कि जिस सेवक ने तरकारी की थी वो नहीं ले जाकर के दूसरे एक महाराज राजा महाराज के लिए तरकारी लेकर गए थे। तो जैसे ही राजा महाराज ने तरकारी के भीतर में दिया सलाई का टुकड़ा देखा मैचिक का टुकड़ा वो एकदम जो ले आया था तरकारी उसको डांटना शुरू कर दिया और राजा महाराज की डांट माने कच्चे पोछो का माने कोई कच्चा पोछा होता वीक हार्ट का उसका हार्ट ही मतलब ये बैठ जाएगा इतना डांटेंगे वो तो राजा महाराज डांट रहे हैं किंतु ये जो जो महाराज है तरकारी लेके आए हैं वह यह नहीं कहते कि यह तो खाना तो मैंने बनाया नहीं। खाना तो दूसरे ने बनाया है। उसको आप डांटिए। वो अपने सर पर लेकर के जिम्मा वो चुपचाप डांट सुन रहा है। तो मीनवाइल जिस सेवक महाराज ने तरकारी बनाई थी उनको आवाज सुनाई दी राजा महाराज की डांट की और समझ गए कि क्या हुआ है। तो वह दौड़ के आए और राजा महाराज को कहते हैं अरे महाराज आप इसको क्यों डांट रहे हैं? तरकारी तो मैंने बनाई है। गलती तो मेरी है कि इसके भीतर में यह मैच स्टिक रह गई। तो राजा महाराज नाराज होकर बोलते हैं तुमको दिखता नहीं है क्या कि तुम इस तरह से खाना बनाते हो कि इसके भीतर में मेस्टिक रह जाती है दिखा नहीं क्या तुमको तो वो सेवक महाराज भी थोड़ा सा सामने उत्तर दे दिया दिखता तो क्या मैं इसके भीतर में रहने देता दिखता तो मैं निकाल नहीं लेता तो जैसा ही ऐसा कहा राजा महाराज और भी नाराज होकर के बगल में ही महापुरुष महाराज का कमरा है दौड़ के वहां पर गए और महापुरुष महाराज को बड़े ही उत्तेजित होकर के बोल रहे महाराज जी देखिए ये तारकदा तारकदा देखिए ये लोग मुझे पोइजन करने का ट्राई कर रहे हैं। तो महापुरुष महाराज एकदम आश्चर्यचकित हो गए हैं कि क्या पागल जैसी बात कर रहे हो महाराज ये लोग थोड़ी ना आपके सेवक है। आपके संतान है। आपके शिक्षित आपके दीक्षित ये शिष्य है। ये थोड़ी ना आपको पोइजन करेंगे। क्या पागल की तरह बक रहे हो? तो वहां पे तो दाल गली नहीं। तो राजा महाराज आए वापस अपने कमरे में। और फिर जैसे बिल्कुल बच्चे की तरह उन्हें जिस सेवक महाराज उनकी प्रतिदिन सेवा करते हैं जो उनकी तरकारी जिन्होंने बनाई है उसके उनके साथ में बात करना बंद कर दिया। जैसे छोटे बच्चे होते हैं ना वो खेलते खेलते यदि नाराज हो जाते हैं तो बात नहीं करेंगे तो ऐसा बोल के बात करना बंद कर दिया। अभी यह सेवक महाराज जो है वह राजा महाराज के घर का सब काम कर रहे हैं। राजा महाराज एकदम मुंह गंभीर करके बैठे हैं और मठ में बात फैल गई है। तो ये सब चीजें तो एकदम वाइल्ड फायर की तरह फैलती है ना। सब लोग देख रहे हैं किस तरह का बचपना है महाराज का। एकदम चुपचाप बैठे हैं। इसके साथ बात ही नहीं करेंगे और फिर और किसी को बोलेंगे जो जो उनको प्रणाम करने को आएगा ना दूसरे साधु तो वो बोलते हैं उनको बताएंगे कि कोई मेरी सेवा नहीं करेगा तो मुझे कोई गम नहीं है। मेरे ठाकुर है। मेरे ठाकुर है। मुझे और किसी की चिंता नहीं। भले मेरी सेवा कोई ना करे। तो जैसे वो छोटा बच्चा कहता है ना दूसरे बच्चे से नाराज हो कि मेरी मां है। मैं मां को बोल दूंगा जाकर के। तुम क्या कर लोगे? तो वैसे ही राजा महाराज अभी देखिए संघ के अध्यक्ष है सर्वशक्ति ऑल द पावर्स ऑफ ऑर्गेनाइजेशन उनके पीछे में खड़ा है। वह जो चाहे वह कर सकते हैं। संघ के जनरल सेक्रेटरी स्वामी शारदानंद जी बिल्कुल उनके अनुगत है। जो राजा महाराज कहेंगे सब कुछ करेंगे। इसके बावजूद वो सेवक महाराज जिसका कोई मतलब ऑर्गेनाइजेशनल ऑथॉरिटी नहीं है उसके साथ में इस तरह से बिहेव कर रहे हैं। बात नहीं करेंगे और बीच-बीच में कहेंगे मेरे तो ठाकुर है। मुझे और किसी की चिंता नहीं। कोई भले चाहे मेरी सेवा ना करें। तो अभी सेवक महाराज भी बेचारे क्या बोलेंगे? वो सेवा कर रहे हैं। कर रहे हैं। उनको पता है। राजा महाराज के ये सब जो मूड जो है ना वो चेंज होते रहते हैं बीच-बीच में। कभी बचपना है, कभी इस तरह का है। तो सेवक महाराज भी कुछ बोल नहीं रहे। वह चुपचाप जो काम करना है सब कर रहा है। फिर एक दिन अपने कमरे में वो रात को पूरा दिन काम करके बैठे थे। तो फिर एकाएक राजा महाराज आए उनके कमरे में। अच्छा तुम क्या कर रहे हो? तो सेवक महाराज ने बोला अभी तो कुछ नहीं कर रहा। तो राजा महाराज बोले ठीक है आओ मेरे कमरे में। तो वो गए उनके पीछे पीछे उनके कमरे में। फिर राजा महाराज कहते हैं अच्छा ठीक है जो एक काम है मेरा यह कर दो तुम। ऐसा बोल करके उसके साथ में बात करना शुरू कर दिया। तो देखिए यह जो बचपना
ठाकुर, माँ और स्वामीजी की दिव्य-मधुर लीलाओं का आस्वादन ही सहज ध्यान है हमारे लिए
है इन लोगों का जब आप आध्यात्मिक एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं जबकि यह जगत जो है आपको एक लीला के समान दिखता है। तो यह लोग भी फिर इसी लीला में इस तरह से कभी बालक भाव है, कभी परमहंस भाव है। ठाकुर कहते हैं ना कभी जड़वत, कभी पिशाचवत, कभी बालकवत। इस तरह के विभिन्न लीलाएं किया करते हैं। क्योंकि पता है कि अभी हम सामान्य जो कुछ भी कर्म करते हैं क्या है? उसके पीछे में एक उद्देश्य रहता है। उसके पीछे एक एम रहता है। अभी इस एम को प्राप्त करने के लिए आप कार्य करते हैं। किंतु जब आप आध्यात्मिक एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंच जाएंगे जबकि इस जगत के सभी एम्स एंड ऑब्जेक्टिव्स, गोल्स एंड पपजेस है वह सब अदृश्य हो जाएंगे। इसके बाद में ऐसा कुछ नहीं जिसको प्राप्त करने के लिए आपको कुछ कर्म करना पड़े। आप आपका काम हो गए हैं। जो कुछ भी प्राप्त करना था जीवन में वह प्राप्त कर लिया है। ईश्वर दर्शन कहो ना कि फिर यह आत्मज्ञान कहो ना कि ब्रह्म ज्ञान कहो वो हमको प्राप्त हो चुका है। तो इसके बाद में जीवन में फिर और कुछ प्राप्त करने को बचता नहीं। तो फिर क्या जीवन का पर्पस क्या है? जीवन है सिर्फ लीला। देह धारण सिर्फ इसीलिए करना है जिससे कि आपकी उपस्थिति से लोगों का कल्याण हो। तो इस तरह की एक के बाद एक लीला करेंगे और इस लीला का यह अनुधावन करके लीला का आनंद लेकर के जो भक्तगण है उनके हृदय तृप्त होते जाएंगे। यह मैं बार-बार कहता हूं कि रामकृष्ण संघ के जो भी डिवोटी है उन लोगों के लिए ध्यान करना आध्यात्मिक साधना करना सहज है। बहुत ही सहज है। कुछ डिफिकल्ट नहीं है। एक हाथ में आपको कथामृत रखना है। एक हाथ में जप की माला रखनी है। जहां तक हो सके एकाग्र होकर के आपको जप करना है। यदि मन जप में एकाग्र ना हो तो इमीडिएटली कथामृत पढ़ना शुरू करना है। अभी यह कथामृत शब्द मैं यूज़ कर रहा हूं। किंतु यहां पे आपको सिर्फ कथामृत नहीं लेना। माने कथामृत पढ़िए। कभी कभी मां का जीवन या मां के रेमिनेशन से कभी ये राजा महाराज स्वामी जी स्वामी जी थोड़ा सा राजसिक हो जाएंगे कभी-कभी। तो राजा महाराज है, महापुरुष महाराज है, खास करके बाबूराम महाराज है। इन लोगों के जो रेमिनेशंस जो है वो आप साथ-साथ में पढ़ेंगे ना तो देखेंगे कि आपका मन एकदम एकाग्र हो जाएगा। अभी ये कुछ दिनों से मैं जप करने के साथ में राजा महाराज के जो रेमिनेशंस है वो चेतनानंद जी द्वारा वो जो कलेक्शन इतनी बड़ी किताब में जो किया गया है वो मैं पढ़ रहा हूं। तो देखिए कि दोनों साथ-साथ में पैरेलल चलते हैं। जैसे ही जप करने में मन थोड़ा सा भी भटका इधर-उधर गया। इमीडिएटली मैंने एक दो रेमिनेशंस पढ़ लिए। जैसे ही रेमिनेशंस पढ़ लिए तो मन ऐसा एक प्रफुल्ल चित्त हो गया। ये मन के भीतर में जो भी अपना रिग्रेट्स होता है जो भी एक अपना रिग्रेट्स सी जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे रिग्रेट्स बढ़ती जाएगी। आप जितना पीछे देखेंगे उतना ही देखेंगे कि आपकी उम्र बढ़ी हुई है और जितना आगे देखेंगे उतना देखेंगे आप यंग है। सो यह ओल्ड एज का एक यह क्या है? साइन क्या है? कि हम हमेशा पीछे देखते रहते हैं और जीवन के पीछे हुई घटनाओं को लेकर के हम रिग्रेट करते रहते हैं। जितना हम पीछे देखेंगे अपने इतिहास में देखेंगे इतिहास में हुई घटनाओं को लेकर के डिप्रेस होते रहेंगे उतना ही हमारा उम्र बढ़ता रहेगा। उतना ही एजिंग जो है होता रहेगा। और जितना आप फ्यूचर की ओर देखिए, फ्यूचर में होने वाली आध्यात्मिक सक्सेस के बारे में आप इमेजिन कीजिए, उतना ही आप यंगर होते रहेंगे। दिस इज द साइन ऑफ एजिंग प्रोसेस। तो क्या है कि यह जप करने के समय खास करके ना हमारा यह जो एक शील्ड होता है यूजुअली हम लोग कहते हैं ईगो को तोड़ देना है आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने के लिए किंतु इससे प्रॉब्लम क्या होता है पता है ईगो एक शील्ड है ईगो एक प्रोटेक्शन डिवाइस है अपने लिए एक प्रोटेक्टिव आवरण है इस आवरण के रहते रहते हम हमारे साथ में यदि कुछ बुरा भी होता है। हम हम किसी फेलियर का सामना करते हैं। लाइफ में यदि चैलेंजेस आ जाती है तो बिय्ड वन पॉइंट हम लोग डिप्रेस नहीं होंगे। बियों्ड वन पॉइंट जो है अपना माइंड निराशा या हताशा में नहीं जाएगा। क्यों? क्योंकि यह ईगो ने एक फ्लोर क्रिएट करके रखा है कि हां मैं एक हूं। मेरा यह अस्तित्व है। मेरी यह सिद्धि है। मेरा यह फैमिली है। मेरा यह फ्रेंड सर्कल है। मेरा यह बैंक बैलेंस है। समथिंग इज देयर जो कि मुझे बल देता है। भले ही चाहे यह आध्यात्मिक दृष्टि से गलत हो किंतु संसार में रहना है। सांसारिक चुनौतियों का सामना करना है। तो इस तरह का एक फ्लोर चाहिए। बी बिनीथ दिस फ्लोर हमको गिरना नहीं है। तो इसके लिए यह ईगो है। ईगो इज़ नथिंग बट अ मेंटल प्रोटेक्शन डिवाइस। यह करोड़ों साल का जो अपना इवोल्यूशन है, यह इवोल्यूशन ने यह सब प्रोटेक्टिव लेयर्स अपने ब्रेन के भीतर में बिठाए हैं। आध्यात्मिक जीवन में जैसे ही प्रवेश करेंगे, आपको यह सब प्रोटेक्टिव लेयर्स को तोड़ देना है। उसको काट देना है और अपने माइंड को पूरा फ्री फॉल में ला देना है। कि अभी यदि आपके सामने चैलेंज आती है तो आपका ईगो भी नहीं है। आपको बचाने के लिए ईश्वर मात्र है आपकी रक्षा करने के लिए। किंतु प्रॉब्लम बहुत बार ऐसा होता है कि ईगो तो हमने तोड़ दिया। यहां पे ईश्वर पे विश्वास जो है वह पूरा हुआ नहीं। यानी कि जो सिंसियर साधक होता है उसके जीवन में एक ऐसा पीरियड आता है जबकि वह कंप्लीटली वलनेरेबल हो जाता है। चैलेंजेस आती है, डिफिट आती है या तो फिर एक तरह से निराशा आती है जीवन में रिग्रेट्स आती है तो उसका माइंड जो है सीधा जो नीचे गिरना शुरू करेगा कहां पे जाके अटकेगा उसका कोई ठीक नहीं। डीप डिप्रेशन है या तो फिर सुसाइडल थिंकिंग है उसके भीतर चला जाता है। कोई कोई डिवोटी आकर के मुझे कहते हैं कि महाराज हम लोग इतना डिप्रेस हो जाते हैं कि हमारे पास में फिर एक ही उपाय बचता है यदि सॉल्यूशन नहीं मिलेगा इसका तो फिर यह गंगा में जाकर के डुबकी मार देने का गंगा में जाकर के झंपला देने का तो ये सुनकर के थोड़ा डर तो लगता है हमको कि अरे भाई ऐसा कुछ मत कर दो वरना फिर क्या है कि फिर से वही आपको इसी पृथ्वी पर आना है और फिर से यही सब भोग करना है माने यही सब चैलेंज का आपको मुकाबला करना है। तो क्यों नहीं आप अपने माइंड को इस तरह से ट्रेन अभी से करना शुरू कर दें कि आपको यह जो जन्म का जो सफरिंग है अननेसेसरी आपको नेक्स्ट जन्म में कैरी फॉरवर्ड ना करना पड़े। माने आपको सफर तो होना ही है। जो डिप्रेशन है, रिग्रेट है, चैलेंजेस है, स्ट्रेस जो है लाइफ के आपको फेस तो करने ही है। तो अब क्यों नहीं अभी कर दें रेदर देन कि आप नेक्स्ट जन्म के लिए कैरी फॉरवर्ड करके जाए। तो इस तरह से समझाता हूं। किंतु इसके पीछे का साइंस यही है कि यह ईगो है प्रोटेक्टिव डिवाइस। जैसा ही आध्यात्मिक जगत में प्रवेश किया। चारों ओर से सुन तो लिया है कि ईगो को काटना है, ईगो को हटाना है, ईगो को हटा दिया। किंतु फिर ईश्वर पर जो विश्वास है जिसको कि इसको रिप्लेस करना है, वह इतना नहीं होता। और फिर इसके बाद में अपना माइंड जो है पूरा फ्री फॉल में आ जाता है। छोटी-छोटी चैलेंज आने से छोटे-छोटे ग्रीफ आने से नजर के सामने सीधा जो माइंड है एकदम रसातल में जाकर के गिरता है। तो ऐसा ना हो इसके लिए हमको ईश्वर पे विश्वास चाहिए। किंतु ये विश्वास जो है वो मुंह से बोलने से नहीं आता। उसके लिए आपको कुछ कंक्रीट चाहिए। तो जो रामकृष्ण भावधारा को फॉलो करते हैं रामकृष्ण संघ के जो डिवोटी है इन लोगों के लिए किंतु यह कोई मुश्किल नहीं है। यह जो रेमिनेशंस जो है उसको आप पढ़िए। देखिए आपका मन एक दो रेमिनेशंस पढ़कर के ही जैसे कि वो जो आप ये बूस्टर टेबलेट जो लेते हैं ना वो एनर्जी बूस्ट टेबलेट्स जो आती है या एनर्जी ड्रिंक्स आते हैं आजकल वो अमेरिका में एक चलता है रेड बुल वॉल करके तो यहां पे भी वो एनर्जी ड्रिंक आते हैं। तो ऐसा एनर्जी ड्रिंक की तरह यह काम करेगा। जैसे ही आपने दो-तीन रेमिनेशंस पढ़े राजा महाराज
फूलों और बगीचों से स्वामी ब्रह्मानन्द का अनोखा अनुराग
का ही एक है। उस समय राजा महाराज का गार्डन के बारे में बहुत ही एक प्रेम था। हमेशा गार्डन में घूमते रहेंगे। देखते रहेंगे कि उनका जो पौधों की मावजत है जो पौधों की केयर करनी है वो ठीक से होती है कि नहीं। तो एक दिन एक ब्रह्मचारी को देखा कि मंदिर के लिए गुलाब के फूल तोड़ रहा है। तो जाकर के देखा कि कैसे तोड़ता है। तो फूल ऐसे तोड़े इस ब्रह्मचारी ने कि जो खिला हुआ जो गुलाब का फूल था उसके साथ में दो-तीन जो ये छोटी-छोटी कलियां जो होती है वो भी आ गई। तो राजा महाराज ने साथ में उसको डांट दिया। अरे तुमको किसी ने फूल तोड़ना भी नहीं सिखाया है। जो खिला हुआ फूल है उसको तोड़ो। ये छोटी-छोटी कलियां जो तुमने तोड़ दी है वो कल परसों कहीं जाकर के पूर्ण ये जो गुलाब के रूप में प्रस्फुटित होती तो वो हमको आनंद आता उसको देखने का तुमने कलियों को क्यों तोड़ दिया तुम्हारे में इतनी भी अकल नहीं है ऐसा बोल के उसको डांटते हैं। फिर यदि और कोई ब्रह्मचारी ठाकुर के लिए मंदिर के लिए फूल तोड़ रहा है तो पास में जाकर खड़े रह गए। देख रहे हैं, ऑब्जर्व कर रहे हैं कि कैसे फूल तोड़ता है। तो कुछ देर तो देखा फिर कहा देखो यह जो पेड़ जो है ना पेड़ में से सभी फूल नहीं ले लेने हैं। ये तो पेड़ के ऊपर में फूल है तो भगवान को भगवान स्वयं उसको देखते हैं तो ये माने विराट जो ईश्वर है उनके लिए तो ये फूलदानी की तरह है ना। मंदिर में एक जैसे हम फूलदानी सजाते हैं, फ्लावर वास सजाते हैं। तो ऐसे ही विराट ईश्वर के लिए विराट ये फ्लावर वास सजाए हैं। तो तुमको फूल तोड़ना है। तो इस तरह से तोड़ो कि जैसे वो जो नीचे है फूल साइड में जो है पत्तों से ढक गए हैं। इस तरह के फूल तोड़ो और ऊपर ऊपर के फूलों को रहने दो। उसको छुओ मत। तो सभी लोग जो कि इस तरह से गार्डन में काम करते हैं। वह सब लोग थोड़े से अलर्ट रहते थे। कब राजा महाराज कहीं उनकी हमारे पर नजर पड़ जाए और कब कहीं आकर के कुछ डांट ना दे। तो एक दिन ऐसा एक महाराज जो है जो बबूल का जो पेड़ है उसकी छाल निकाल रहे थे। तो देखा कि राजा महाराज वहां पे दूर से वो वॉकिंग कर रहे हैं। टहल रहे हैं। तो उन्हें पेड़ के पीछे में छुप करके वो छाल निकाल रहे हैं पेड़ की वो चाकू से। तो डर यह है कि राजा महाराज कहीं देख ना ले। तो ऐसा कर रहा है। एकाएक राजा महाराज का आवाज आया। क्या कर रहे हो? तो एकदम चमक गए। देखा पीछे में ही खड़े हैं। वो राजा महाराज ने देख लिया होगा कि वह छुप छुप करके कुछ कर रहा है। तो पूरा गोल घूम करके पीछे से जाकर के उसको पकड़ा और जोर से बोले क्या कर रहे हो? तो वो महाराज एकदम वो डर गए चौंक गए और फिर खड़े होकर कहे कि देखिए यह जो मोहिन बाबू जो है स्वामी जी के छोटे भाई महेंद्रनाथ दत्त। तो मोहिन बाबू कविराज जी औषध लेते हैं तो उसमें साथ में ही यह बबूल की पेड़ का छाल जो है उसका पान माने उसका रस निकाल करके उसका पान करने को कविराज ने कहा है तो मोहिन बाबू उस समय मठ में ही रह रहे थे कुछ दिनों तो उन्होंने इस महाराज को कहा होगा कि इस तरह से पेड़ की छाल मेरे लिए ले आना तो इसलिए मैं पेड़ की छाल तोड़ रहा हूं तो राजा महाराज थोड़ा तो सुने फिर जैसे बचपना कहो कि जो भी कहो इतना बड़ा रामकृष्ण मठ मिशन है। इतनी सारी ब्रांच सेंटर बाय दैट टाइम ऑलरेडी हो चुके हैं। अभी यह महाराज क्या कर रहे हैं? तो पेड़ की छाल निकाल रहे हैं। जिसका क्या वैल्यू है? कुछ नहीं। तो राजा महाराज बड़े ही गंभीर होकर के बोलते हैं देखो यह मठ में जो कुछ भी तुम देख रहे हो यह सब संपत्ति इसका मालिक है। मठ के अध्यक्ष। मठाध्यक्ष तो तुमको मठाध्यक्ष को बोले बिना यह पेड़ की छाल भी नहीं लेनी है। समझ गए क्या? तो वह महाराज बेचारे डरते डरते कहते हैं अच्छा ठीक है महाराज वो बिना आपके बताए आपकी अनुमति लिए बिना इस तरह से पेड़ की छाल नहीं लूंगा। तो राजा महाराज संतुष्ट हुए कि उसको समझ में आ गया है कि अभी क्या करना है। तो बोल के वहां से चले गए। तो देखिए सच एन इंटरेस्टिंग स्टोरी। इसमें ऐसा नहीं है कोई कोई बहुत बड़ा वेद वेदांत है। इसमें ऐसा नहीं है कि आपको कोई बहुत बड़ा एक इंसाइट मिल जाता है लाइफ के ऊपर में आध्यात्मिक जीवन के ऊपर में कुछ नहीं। बस एक राजा महाराज की लीला है, बचपना है और इसका आस्वाद करते-करते ही इसका आनंद लेते लेते ही हमको ऐसा एक भीतर में से एक उतफता प्रकट होती है। राजा
जब स्वामी ब्रह्मानन्द ने बच्चों के खेल में कर दी मज़ेदार 'चीटिंग'!
महाराज बलराम भवन में रहते हैं कभी-कभी तो बलराम बाबू तो ठाकुर के इतने बड़े भक्त ठाकुर के आधे रसददार हाफ रसददार तो आधे रसददार बलराम बाबू और आधे वो सुरेश बाबू तो ऐसा करके 50-50 तो ये ठाकुर के रसददार स्वयं और ठाकुर के प्रति उनका पूरा फैमिली जो है संपूर्ण रूप से वो निष्ठावान ठाकुर के ऊपर में तो राजा महाराज वहां पर जाकर बीच-बीच में रहते हैं। फिर वह कभी-कभी गोलोक धाम खेलेंगे। अब यह गोलोक धाम क्या है? एग्जैक्टली यह वह जो सांपसीडी जो आती है ना स्नेक एंड लेडर उसी के टाइप का रहता है। वो जो उसका जो डेस्टिनेशन होता है उसको कहते हैं गोलोक धाम। और आपका यह जो ये है डाइस जो आपका उसको वहां तक पहुंचाना है। तो कभी-कभी बीच में कहीं नर्क आएगा। जैसे वो स्नेक एंड लेडर में स्नेक आते हैं ना स्नेक आएगा तो आप पीछे चले आएंगे और लेडर आएगा तो आप ऊपर चले जाएंगे तो ऐसा ही कुछ है कभी नर्क आएगा कभी यह आएगा कभी वो आएगा सब क्रॉस करके आपको गोलोक धाम जाना है तो वो जो डाइस जो होती है डाइस फेंकना है तो डाइस में जितना नंबर आता है 1 2 3 उसके अनुसार आपको इतना स्टेप्स आगे जाना है तो जैसे वो स्नेक एंड लेडर है उसी टाइप का मोर और लेस तो राजा महाराज ने ठीक किया गोलोक धाम हम खेलेंगे दोद की पेयर में खेलना है तो राजा महाराज और उनके साथ में सेवक महाराज ये दो है एक साथ में और फिर ये उनकी जो दो लड़कियां है बलराम भवन में ही छोटी लड़कियां है दोनों एक का नाम है चीनी और एक का नाम है महामाया तो ये दोनों लड़कियों को बुलाया और बस परिवार में तो सभी का राजा महाराज पे इतना स्नेह वो छोटी लड़कियां है वो हल्लागुल्ला करेंगी चीखेंगी चिल्लाएंगी चारों ओर दौड़धाम करेगी और जैसे जैसे छोटी बच्चियों का होता है और राजा महाराज पे उन दोनों का बड़ा स्नेह है। तो महाराज ने बुलाया दोनों को चलो हम गोलोक धाम खेलते हैं। तो सामने यह दो लड़कियां है यहां पे राजा महाराज और सेवक महाराज। अभी वो जो डाइस फेंकना है तो जैसे ही डाइस को फेंका राजा महाराज का जब टर्न आया तो जैसे ही डाइस फेंका तो राजा महाराज ने क्या किया? देखा कि वो एक नंबर आता है या दो नंबर आता है। तो महाराज ने ऐसा हाथ से उसको छह या आठ कर दिया। तो ये तो तो लड़कियां देख के चिल्ला उठी। अरे महाराज ये आप क्या कर रहे हैं? तो चीटिंग कर रहा है। डाइस में आप फेंकेंगे तो एक आया या दो आया उसके अनुसार आपको एक स्टेप या दो स्टेप आगे जाना है। तो आप अपने हाथों से उसको चेंज करके डाइस को सिक्स ना एट कर दे रहे हैं। ये तो चीटिंग है। ऐसा थोड़ी ना चलेगा। तो राजा महाराज बोलते हैं अरे तुमको खेलना नहीं आता इसलिए तुम ऐसा चिल्ला रही हो। देखो ऐसा ही खेला जाता है। तो यहां पे दो छोटी बच्चियां है। यहां पे राजा महाराज है और झगड़ा कर रहा है कि किस तरह से खेला जाए। राजा महाराज बिंदास चीटिंग कर रहा है। ऐसा नहीं कि छुपा करके ऐसा नहीं कि चोरी छुप के चीटिंग करना माने एकदम खुलेआम चीटिंग कर रहा है। और जब ये लड़कियां चिल्लाएंगी तो उनके सामने ऊपर से चिल्लाएंगे। तुमको खेलना नहीं आता इसलिए तुम झगड़ा करती हो। तो देखिए माने इस पूरे खेल में ऐसा कुछ नहीं है कि जो कि जिससे कि राजा महाराज को कुछ मिलने वाला है। चीटिंग करके ऐसा करके ऑलरेडी गोलोक धाम प्राप्ति उनकी हो चुकी है। इसके बाद भी देखिए किस तरह का बचपन आप एक बार राजा
स्वामी ब्रह्मानन्द को प्रसन्न करने के लिए स्वामी रामकृष्णानन्द जानबूझकर ताश में हार जाते है
महाराज गए हैं चेन्नई तो मद्रास उस समय का शशि महाराज है वहां पे यतिश्वरानंद जी है भविष्य के वाइस प्रेसिडेंट और वन ऑफ द ग्रेट साधुस ऑफ आवर ऑर्डर तो यतिश्वरानंद जी और राजा महाराज और शशि महाराज तो वो एक खेल खेल रहे हैं पत्तों का तो राजा महाराज का यह सब है पत्तों के ताश खेलना है कोई कोई महाराज को कहेगा महाराज आप तो राम राम कृष्ण मिशन के अध्यक्ष है। आप ताश खेलेंगे और कोई डिवोटी आकर देखेगा तो बड़ी आपकी निंदा करेगा। मिशन का वो नाम बदनाम होगा कि मिशन के प्रेसिडेंट ताश खेल रहे हैं। तो राजा महाराज को तो ये सब चीजों से कोई परवाह नहीं थी। और सब तो लीला है ना। उनके लिए तो ये सब चीजों का कुछ नहीं है। वो जो ठाकुर की वो कहानी है ना कि केशव सेन को देखने मिलने को गए। देखा उसका एक रिलेटिव है ताश खेल रहा है। तो किसी ने पूछा इस उम्र में ताश खेल रहे हो? तो वो बैठा कि वो बिना काम के मैं बैठ नहीं सकता इसलिए मैं ताश खेल रहा हूं। तो ठाकुर कहते हैं कि देखो उसको शर्म भी नहीं आती। यह ईश्वर का नाम लेने का समय है। वो छोड़ के ताश खेल रहा है। तो वो उसके लिए है संसारी के लिए। यहां पर राजा महाराज का प्रॉब्लम यह है कि माइंड ऑलरेडी इतना ब्रह्मलोक में चला जाता है कि जोर जबरदस्ती पकड़ करके पृथ्वी पर रखना है। तो पृथ्वी पर रखने के लिए उनकी लीला चलती रहे और उसका श्रवण दर्शन करके भक्तों का हृदय निर्मल होता रहे। इसलिए कुछ ना कुछ छोटी कामना वासना को लेकर के कुछ ना कुछ लीला करके रहना है। तो राजा महाराज इसलिए ताश खेल रहा है। तो मद्रास की बात यहां पे शशि महाराज और यतीश्वरानंद जी दोनों लोग पैर बनाकर के खेलना है यहां पे भी। तो एक और राजा महाराज और और कोई साधु होंगे यहां पर यतिश्वरानंद जी और शशि महाराज दोनों का पैर सामने-सामने तो यतिश्वरानंद जी ने ठीक किया कि कैसे भी करके राजा महाराज को पत्तों में ताश में हराना है तो वो एकदम माने डिटरमिनेशन से खेल रहे हैं और खेलतेखेलते दोनों पार्टनर होते हैं तो पार्टनर को साथ-साथ में कोऑर्डिनेट करके स्ट्रेटजी बना करके यह खेलना है ताश तो देख रहे हैं किंतु वह खुद जितना मेहनत करते हैं सामने शशि महाराज इतना माने मूर्ख की तरह खेल रहे हैं जो अच्छे-अच्छे पत्ते हैं सब फेंक दे रहे हैं और इसको देखकर के राजा महाराज जीत जा रहे हैं और राजा महाराज और राजा महाराज देख रहे हैं कि एक और यतीश्वरानंद जीतने के लिए जी जान प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर यहां पे शशि महाराज है। रामकृष्णानंद जी अच्छे-अच्छे पत्तों को फेंक दे रहे हैं। जैसे कि उनको कुछ समझ में ही नहीं आ रहा हो। जैसे कि एक नंबर के मूर्ख हो। तो राजा महाराज को इतना हंसी आ रहा है। इतना खुशी हो रहा है कि इनकी यतिश्वरानंद जी की इतनी मेहनत के बावजूद वो हार जा रहा है। तो यतिश्वरानंद जी बार-बार शशि महाराज को कहते हैं महाराज जी आप इस तरह से मत खेलिए। थोड़ा सा ध्यान से खेलिए। अच्छे-अच्छे पत्तों को आप फेंक दे रहे हैं। राजा महाराज जीत जा रहे हैं। ऐसा खेल थोड़ी ना चलेगा। आप थोड़ा सा ध्यान देकर खेलिए। जितना वो उत्तेजित हो रहे हैं, उतना ही शशि महाराज मूर्ख की तरह खेल रहे हैं। उतना ही अच्छे-अच्छे पत्ते फेंक रहे हैं। और राजा महाराज का आनंद जैसे कि वो उनके हृदय में नहीं समा रहा। ऐसा हंसहंस करके दोनों की ठट्टा मजाक कर रहे हैं। उन दोनों के ऊपर में कटाक्ष की बारिश बरसा रहे हैं। देखा तुम लोगों को खेलना ही नहीं आता। देखा मैं कैसा जीतता जा रहा हूं। तो यह हुआ। यह तो पूरा पत्तों का खेल समाप्त हुआ। इसके बाद में जब राजा महाराज ने आखिर में वहां से कमरे में से बाहर निकले तो यतिश्वरानंद जी शशि महाराज पे बिगड़े कि महाराज आप इस तरह से क्यों खेलते हैं? इस तरह से आप खेल रहे हैं जैसे कि आपको कुछ आता ही नहीं हो। तो अभी तक तो शशि महाराज चुपचाप बैठे थे। अभी किंतु बिगड़े है। ऐसा नाराज होकर के यतिश्वरानंद जी को धमकाया कि मूर्ख तुमको समझ में नहीं आता है। मैं जानबूझकर के हार जा रहा था। देख नहीं रहे थे कि जीत के राजा महाराज के चेहरे पर आनंद जो है कितना वो भरपूर आनंद उनके चेहरे पर दिखाई दे रहा था। आनंद की बारिश जैसे कि चारों ओर हो रही थी। तो तुम मूर्ख हो। तुम क्या प्रोफेशनल खिलाड़ी हो कि राजा महाराज के सामने जितनातना चाहते हो। तुम्हारे में इतनी भी अकल नहीं। बोल के उनको जो डांटा है यतिश्वरानंद जी स्वयं यह रेमिनेशनंस लिखते हैं। कहते हैं कि देखिए यह राजा महाराज के साथ में ताश खेलना इसके पीछे इतने सारे सीक्रेट भी होंगे तो वह भी मुझे नहीं पता थे। तो
ठाकुर, माँ और स्वामीजी की दिव्य-मधुर लीलाओं का आस्वादन ही सहज ध्यान है हमारे लिए 2
देखिए यह सब बचपना यह जो लीला है ये लीला आप दो-तीन आप रेमिनेशनंस पढ़ेंगे ना इमीडिएटली क्या होगा? आपका मन जो है वो एकाग्र हो जाएगा। इमीडिएटली क्या होगा? मन के जो संताप है, दुख है, मन के भीतर में यह जो निराशा है, हताशा है, इमीडिएटली दूर हो जाएगी और फिर आपका मन जो है फिर से जप करने के लिए या ध्यान करने के लिए तैयार हो जाएगा। तो फिर से जप ध्यान करना प्रारंभ कर दीजिए और देखिए जितना चलता है खींचते जाइए और फिर यदि जप करने में ध्यान करने में यदि फिर से ये कोई ना कोई यदि चैलेंज आती है कोई ना कोई यदि प्रॉब्लम खड़ा होता है मन फिर से भटकना शुरू करता है फिर से आप रेमिनेशंस की ओर चले आइए कथामृत माने कथामृत मैं नाम दे रहा हूं किताब का किंतु कथामृत की जगह मां के जीवन है। मां के रेमिनेशनंस है। राजा महाराज के बाबूराम महाराज के महापुरुष महाराज के अपना जो साहित्य है भरपूर साहित्य है जिसको रेमिनेशंस साहित्य कहते हैं। फिलॉसोफी को इस समय आप मत छुइए। फिलॉसोफी अलग समय के लिए है। यह रेमिनेशंस या तो कहानियां या तो फिर जनरल उपदेश जैसे कथामृत में है। इसको सिर्फ पढ़िए। देखिए कि इमीडिएटली माइंड फ्रेश हो जाएगा और फिर से आप जब ध्यान का सेकंड फ़ज़ स्टार्ट करने के लिए रेडी हो जाएंगे। तो मैंने सोचा कि थोड़ा सा इसके बारे में डिस्कस करते हैं। अच्छा अभी हम स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन उसके रिलेटेड कुछ जो स्लाइड शो है वह देख रहे थे। मैं आपके साथ में यह स्लाइड शो शेयर करता हूं। यस।
अद्वैत वेदांत से जागती है आत्मश्रद्धा और मन की असीम शक्ति
यह 11 नंबर का स्लाइड है। आधा हमने ऑलरेडी देख लिया कि व्हाट आवर कंट्री नाउ वांट्स आर मसल्स ऑफ आयरन एंड नर्व्स ऑफ स्टील जगेंटिक वेल्स व्हिच नथिंग कैन रेजिस्ट दैट कैन ओनली बी क्रिएटेड बाय अंडरस्टैंडिंग एंड रियलाइजिंग द आइडियल ऑफ द अद्वैत दैट आइडियल ऑफ द वननेस ऑफ ऑल। देखिए यह इसके ऊपर थोड़ा सा डिस्कशन कल भी हुआ था कि यह अद्वैत जो है हाउ कैन इट गिव यू नर्व्स ऑफ स्टील एंड मसल्स ऑफ आयरन? यहां पे क्या है? पहली तो बात है कि सिर्फ यह नहीं समझना है कि यह फिजिकल स्ट्रेंथ देता है। यह अद्वैत का जो आइडियल है वह हमको आत्मश्रद्धा देता है। जैसे हमने अभी देखा कि आध्यात्मिक जीवन में कोई भी एक जनरल पर्सन जो होता है ना उसको एक मेंटल प्रोटेक्टिव शील्ड चाहिए ही चाहिए। क्योंकि लाइफ ऐसा चैलेंज से भरा हुआ है। लाइफ ऐसा स्ट्रेस से भरा हुआ है। लाइफ इस तरह की पराजय से भरा हुआ है। कभी जीत होती है, कभी पराजय होता है। कभी विजय तो कभी यह हार होती है। तो यह हार और जीत, विजय और पराजय की यह जो श्रृंखला है, अपने जीवन में चलती ही जाती है। हमारा ह्यूमन माइंड जो है ना अनफॉर्चूनेटली क्या करता है? यह यदि जीत और हार दोनों होता है ना तो जीत को कभी-कभी हम भूल जाते हैं। यह हार को ही पकड़ के रखते हैं। मैं कभी-कभी अपने इतिहास मेरा जो लाइफ है ये ऑलमोस्ट 50 इयर्स का मैं कभी-कभी भूतकाल में देखता हूं। मैंने देयर आर सो मेनी विक्ट्रीज़, सो मेनी सक्सेसेस, सो मेनी पॉजिटिव इवेंट्स आर देयर इन माय लाइफ। कि मैं रांची में था। रांची में ट्राइबल एरिया में मैं काम करता था। तो काम फिर जो ट्राइबल लोगों के साथ में जो मेरा फ्रेंडशिप था वो कभी-कभी ग्रेटट्यूड्स दिखाते थे कि हां कि हम लोग इस तरह से मेहनत करके गांव में जाते हैं उनके लिए काम करते हैं तो उनको कितना बेनिफिट होता है। पब्लिकेशन में था तो सीनियर साधुओं के साथ में चर्चा होती थी। कोई फिलॉसोफिकल पॉइंट को लेकर के व्हिच वाज़ अ ग्रेट अपॉर्चुनिटी फॉर मी। इट्स अ ग्रेट यू कैन से कि ब्लेसिंग्स ऑफ माय लाइफ। और फिर पब्लिकेशन में ही जब किताबें अच्छी-अच्छी पब्लिश करते हैं तो कोई रीडर्स जो होता है एप्रिशिएट करता है कि हां महाराज अच्छा आर्टिकल लिखा अच्छी किताबें पब्लिश की। सो देयर आर सो मेनी पॉजिटिव थिंग्स आर देयर। और साथ में ही जब कहीं-कहीं पे अपने सामने चैलेंज है। कहीं-कहीं पे सेट बैक है। कहीं-कहीं पे ऐसी घटनाएं हुई जिससे कि हमारे मन को दुख हुआ, हमारे मन को ठेस पहुंचा। तो प्रॉब्लम क्या होता है? बहुत बार कि हम जब इतिहास में देखेंगे अपने खुद के तो यह निराशाजनक जो घटनाएं हैं हमारे मन को ठेस जिस घटना ने पहुंचाया है हमारे मन को आघात जिस घटना ने पहुंचाया है वही घटनाएं याद रहती है और जो जिस घटना ने हमारे मन को परिपुष्ट किया है। जिस घटना से हमको एक भीतर में शांति प्राप्त हुई है। जिस घटना को हम अपना ब्लेसिंग्स के स्वरूप में देखते हैं। वो घटना कभी-कभी भूल जाते हैं। दिस इज अ ह्यूमन माइंड कि एक सर्वाइवल इंस्टिंक्ट हम सब में होती है। तो सर्वाइवल इंस्टिंक्ट का अर्थ ही है कि जो कि हमको कष्ट दे सके उसको सबसे पहले नजर में सामने रखना है और उसको उसके सामने कोई ना कोई डिफेंस खड़ा करना है। तो ये जो सर्वाइवल इंस्टिंक्ट है ये डिफेंसिव मैकेनिज्म है जो कि इवोल्यूशन ने अपने ब्रेन के भीतर में खड़े किए हैं। ओवर अ टाइम स्केल ऑफ़ लाख्स एंड लाख ऑफ़ इयर्स। लाखों लाखों सालों की ये जो समय के अनुसार समय के दौरान ये जो मैकेनिज्म जो खड़े हुए हैं अपने माइंड के भीतर में तो क्या है कि उसकी वजह से आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने से क्या होता है कि अपना ईगो धीरे-धीरे करके कमजोर होता है और फिर यह फ्री फॉल में आ जाता है। कभी-कभी छोटी सी छोटी बातें जो है हमारे मन को इतना ठेस पहुंचाती है। इतना दुख पहुंचाती है कि कभी-कभी उस दुख से हम बाहर ही नहीं आ पाते। उस समय मन को स्ट्रेंथन करने के लिए यह जो ईश्वर पर विश्वास है, आत्म तत्व जो है, वह हमको चाहिए। उपनिषद का पाठ करके जो एक बात सर्वश्रेष्ठ रूप से स्पष्ट हो जाती है, वह है कि मेरा स्वभाव है आत्मन। मैं हूं सतचित आनंद। नहीं कि यह रोटी, कपड़ा, मकान, आहार, निद्रा, भय, मैथुन के पीछे दौड़ने वाला एक पशु। वो पशु मेरा स्वभाव नहीं है। पशुत्व मेरा स्वभाव नहीं है। देवत्व है मेरा स्वभाव। यह जो मेरे भीतर में देवत्व अंतर्निहित है। पोटेंशियली आई एम डिवाइन। यह जो भाव जो है वह मुझे स्ट्रेंथन करता है भीतर से। वो मुझे एक फ्लोर देता है। बीथ दिस फ्लोर कितना ही मेरे सामने सेटबैक आ जाए, कितनी भी डिफिट आ जाए, कितना ही मेरे मन को ठेस पहुंचे, कितना ही मेरे सामने जीवन मरण का प्रश्न खड़ा हो जाए, बिनीथ दिस फ्लोर, मैं और ज्यादा नहीं गिरूंगा। वह एक फ्लोर तैयार करता है। वह एक प्रोटेक्टिव शील्ड खड़ा करता है। तो, यह जो नर्व्स ऑफ स्टील एंड मसल्स ऑफ आयरन इज़ बेसिकली ए मेंटल फिनोमिना। भीतर में से एक ऐसी आत्मश्रद्धा प्रकट होगी कि जीवन के जितने भी चैलेंजेस है, जीवन के जितने भी हमारे सामने कर्म है, जितनी भी रिस्पांसिबिलिटीज है, उसको हम बखूबी निभाएंगे। एट द सेम टाइम हमारे आसपास में जो लोग रहते हैं वे लोग भी हमारा सत्संग प्राप्त करके वे लोग बेनिफिट प्राप्त करेंगे। वरना किसी किसी का आप देख के आप उनको अवॉइड करना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि उनके चारों ओर ना इर्दगिर्द एक हताशा का एक क्लाउड जो है बादल जो है वो मंडराता रहता है। वो देखकर के ही ऐसा लगता है कि वह आदमी खुद हताश है और उनको देखकर के हम लोग उनके साथ में बात करके हम लोग हताश हो जाएंगे। तो देखिए कि एक ही जो एक साधक है मैंने उनको दोनों परिस्थिति में देखा। एक तो एक पॉजिटिव एनर्जी थी उनके भीतर में और उनका संग करने से मुझे भी आनंद होता था और एक समय ऐसा आया कि जैसे वो डिस्पेयर हो गए हैं। वो जैसे कि डिप्रेस हो गए हैं। हताशा निराशा में ऐसे डूब गए हैं कि फिर उनको मैं अवॉइड ही करता था। सामने से कभी जाकर बात नहीं करता था। तो यह देखिए कि मन का जो उत्साह है, मन की जो उतफुल्लता है, मन का यह जो उत्साह, यह जो क्या कहेंगे कि चीयरफुलनेस है, यह है हमारे जीवन का सबसे बड़ा एसेट। यह सबसे बड़ा यह जो धन कहते हैं, संपद कहते हैं। वो ये ये है चीयरफुलनेस। यह चेयरफुलनेस जो है एक उत्साह जो है वह बनाए रखने के लिए हमको भीतर में से स्ट्रेंथ चाहिए और वो स्ट्रेंथ है या तो आत्मश्रद्धा या तो अहंकार दो में से कुछ भी। देखिए ये जो धनी लोग होते हैं उनका संग करके आपको अच्छा ही लगेगा। क्यों? क्योंकि पॉजिटिव एनर्जी से भरे एनर्जी से भरे हुए हैं। यह जो बड़े पॉप स्टार है, यह जो क्रिकेटर है, यह जो फिल्म स्टार्स है, पॉलिटिशियंस है, उनको आप जाके मिलिए। उनका एक मैग्नेटिक पर्सनालिटी रहता है। वो सबको आकर्षित करते हैं। यहां पे पिछले साल कुछ फंक्शन था तो यहां पे जो लोकल एमपी है उनको हमने इनवाइट किया था। तो मैं गया था एक बार उनको साथ में बात करने के लिए। मैं देखा काफी हाइट है उसकी। 6 फुट जितनी हाइट है और बड़ा ही हैंडसम दिख रहा है और बात कर रहा है ऐसे बात कर रहा है कि आपको लगेगा आप सुनते ही जाइए सुनते ही जाइए वो जैसे आपको हिप्नोटाइज कर देता है देखिए ऐसा पर्सनालिटी नहीं रहने से आप वोट कैसे लेंगे राइट आजकल कंपटीशन जिस तरह का है तो हिप्नोटाइज कर लेगा आपको आप उसकी बात सुनते ही जाएंगे सुनते ही जाएंगे हम लोग वहां पे भीतर में बैठे थे और बाहर में पूरा वो जो मीटिंग हॉल जैसा था उसका ऑफिस जहां पे है जिसको भी कुछ भी काम है पिटीशन लेकर के वहां पर आएंगे तो एटलीस्ट 100 150 लोग बाहर में बैठे होंगे और वह हमारे साथ बात कर रहा है तो मैं और दूसरे महाराज थे हम लोग एकदम मंत्रमुग्ध होकर के सुन रहे हैं कि अच्छा देखो तो यह कितनी अच्छी बात करता है कैसा पर्सनालिटी है उसका ये ये क्या है वो भयानक ईगो है उसके भीतर में कोई प्रश्न ही नहीं है वो बड़ा ही धनपति है बहुत बड़ी कॉलेज का वो मालिक है और फिर एमपी होना आज भारत में कितने 500 एमपी है तो उसमें में से एक होना। दैट मींस यू हैव अ लॉट ऑफ़ पावर एंड लॉट ऑफ़ प्रेस्टीज। तो ऐसा जो होता है, पावर है, प्रेस्टीज है, धन है, रिस्पेक्ट है, उसका भीतर में से एक उत्साह आता है। उसमें से एक चीयरफुलनेस आती है। यह एक हो गया सांसारिक दृष्टि से। और फिर यदि आप ईश्वर की ओर आगे बढ़ेंगे, यह धन तुच्छ हो जाएगा, सांसारिक रिस्पेक्ट तुच्छ हो जाएगी। यह जो समाज में हमको एक हमारा एक ये रहता है पकड़ रहती है लोगों के ऊपर में लोगों को हिप्नोटाइज करने की ये जो मोहिनी शक्ति है वह सब तुच्छ हो जाएगा और ईश्वर के श्री चरणों में हमारा मन शरणागत होता जाएगा। जब ऐसा होगा तो फिर से एक दूसरे टाइप का एक पॉजिटिव एनर्जी भीतर में से प्रकट होगा। यह पॉजिटिव एनर्जी किस चीज का है? कि मैं एमपी हूं। मैं एक बहुत बड़ी कॉलेज का मालिक हूं। मुझे मिलने के लिए डेली 200 300 लोग लाइन में खड़े रहते हैं। मुझे मिलने के लिए इवन रामकृष्ण मिशन के साधु लोग वहां पर हाथ जोड़ के खड़े हैं लाइन में कि मैं कब उनको टाइम दूं। कब आकर के मुझसे वह रिक्वेस्ट करें। यह सब चीजों का घमंड नहीं। अभी यह है कि मैं ईश्वर का दास हूं। ईश्वर का संतान हूं। ईश्वर ही मेरे सर्वस्व है। इस बात का उत्साह, इस बात का चेयरफुलनेस, ईश्वर है। ईश्वर के अलावा और कुछ नहीं है। या तो फिर सतित आनंद है मेरा सही स्वभाव। यह जो उत्साह, यह जो ओजस, यह जो चीयरफुलनेस है, दैट इज अ स्पिरिचुअल चीयरफुलनेस। राजा महाराज के
कल्पतरु स्वामी ब्रह्मानंद का ऐसा आध्यात्मिक तेज कि सब खिंचे चले आते थे
आसपास में इस तरह की स्पिरिचुअल चीयरफुलनेस हुआ करती थी। उनका संग छोड़कर के जाने को आपको इच्छा नहीं होगी। एक दिन की बात है वहां पर मठ में ही एक महाराज थे तो नए जॉइ करने को आए थे तो उनका टेंपर थोड़ा सा ज्यादा था। बात बातबात में गुस्सा हो जाएंगे और किसी किसी के साथ में उन्होंने मारपीट भी कर दी थी। तो बाबूराम महाराज स्वामी प्रेमानंद मठ में सब मैनेज करते हैं। तो और बाबूराम महाराज का भी यदि टेंपर जाएगा तो किसी को छोड़ेंगे नहीं। वह भी चिल्लाएंगे और यह जो नया आया है जो महाराज वह भी चिल्लाएंगे। तो ऐसा एक दो बार हुआ। फिर एक दिन राजा महाराज मठ में थे तो यह जो महाराज आए नए वाले ठाकुर भंडार में काम कर रहे हैं। तो एकाएक बाबूराम महाराज गए वहां पे। बोला चल बेटा तुमको राजा महाराज के पास ले जाता हूं। तो ऐसा पकड़ के उसका हाथ पकड़ कर के खींचते खींचते धक्का मारते मारते राजा महाराज के पास ले गए। और जाकर के जैसे ही राजा महाराज के कमरे में प्रवेश किया ये नए वाले महाराज को धक्का मार के राजा महाराज के पैरों के सामने फेंक दिया और बोला महाराज इसके सर पर थोड़ा सा हाथ फेराइए यह बहुत ही ज्यादा गुस्सा करता है। बात बातबात में चिल्लाता है। झगड़ा करता है। मारपीट करता है। उसका दिमाग ठिकाने नहीं है। उसके सर पर आप हाथ फेराइए सब ठीक हो जाएगा। तो राजा महाराज ने पहले तो कहा अरे बाबूराम दा आप ही उसके सर पर हाथ फेरा दीजिए। क्या है? तो बाबूराम महाराज के नहीं नहीं महाराज आपको इसके सर पर हाथ फेराना ही होगा। इसको कैसे भी करके ठीक करना होगा। तो राजा महाराज थोड़ी देर के बाद गंभीर हो गए और थोड़ा तो अपने हाथ में अपने हाथ की ओर ऐसा ऐसा करके देखा। फिर धीरे-धीरे करके ये जो महाराज थे उनके सर पर हाथ फरा दिया। तो जैसे ही अभी हंसी मजाक चल रहा है। बचपना जैसा सब चल रहा है। एकाएक राजा महाराज ऐसे गंभीर हो गए और ऐसा शांति से उसके सर पर हाथ रखा जैसे कि एक आध्यात्मिक डायनेमो आपने टर्न ऑन कर दिया ना स्विच ऑन कर दिया हो और उसका करंट जो है हवा में फैलता है। ऐसा स्पिरिचुअल डायनेमो का करंट एकदम फैलना शुरू हो गया। राजा महाराज के भीतर में से प्रवाहित हो रहा है। तो फिर जैसे ही बाबूराम महाराज ने यह देखा तो वह दूसरे महाराज दूसरे वाले महाराज को धक्का मार के हटाया। खुद राजा महाराज के सामने नतमस्तक हो गए। कहा महाराज मेरे ही सर पर सर आपका हर हाथ फरा दीजिए। मैं ही झूठमठ का ची चीख करके चिल्ला करके इन लोगों का सर बिगाड़ता हूं। इसीलिए ये लोग नाराज हो जाते हैं। अब मेरे ही सर पर पहले हाथ फिरा दीजिए। तो राजा महाराज तो अभी एकदम हाई वो स्पिरिचुअल स्टेट में चले गए। तो डायनेमो स्टार्ट हो गया है। स्पिरिचुअल करंट बहना स्टार्ट हो गया है। तो अभी बाबूराम महाराज के सर पर हाथ रखा तो एकदम भीतर से पता चलता है कि आपके संस्कार जो बाबूराम महाराज के भीतर में संस्कार है ही नहीं ईश्वर कोटि है किंतु फिर भी उन्हें आध्यात्मिक जीवन में तो कोई लिमिट नहीं है ना। राजा महाराज ने खुद कहा है निर्विकल्प समाधि के बाद में तो आध्यात्मिक जीवन स्टार्ट होता है। तो आध्यात्मिक जीवन में ऐसा नहीं है कि ईश्वर कोटि हो गए तो सब कुछ हो गया। कि राजा महाराज का स्टेटस उससे भी ऊपर था। तो जैसे ही राजा महाराज ने हाथ रखा बाबूराम महाराज के सर पे महाराज समझ गए कि महाराज आज एक अलग ही मूड में है। तो फिर बाबूराम महाराज जाकर के चीखना चिल्लाना शुरू कर दिए। अरे तो कोथा आशीष आए रे राजा महाराज आज के कल्पतरु हुए से अरे तुम लोग कहां पे हो? आओ राजा महाराज आज कल्पतरु हो गए हैं। तो जैसे ही बाबूराम महाराज ने चिल्लाना शुरू किया मठ में जितने भी साधु थे सब दौड़ते दौड़ते आकर के राजा महाराज के सामने नतमस्तक हो रहे हैं चरण के सामने प्रणाम करके और राजा महाराज सबके सर पर हाथ घुमा रहे हैं। जिसके सर पर हाथ रखा उन सबको लगा कि पता नहीं जन्मा जन्मांतर के जितने भी संस्कार है सब जैसे कि हवा में विलीन होते जा रहे हैं जल जा रहे हैं। आखिर में मठ में एक डॉक्टर था। अभी वह उस समय शौच करने के लिए गया था। बाबूराम महाराज देख रहे हैं कि कौन-कौन है? वो जो चाकर है, वो माली है, वो रसोया है, सबको चिल्ला-चिल्ला करके बुला रहे हैं। और किंतु वो डॉक्टर नहीं आ रहा। तो बाबूराम महाराज दौड़ के गए उसको बुलाने के लिए। क्या कर रहे हो? तो प्रॉब्लम क्या था? डॉक्टर गया था शौच के लिए। शौच करके बाहर आया हाथ पर माटी लगा रहा है। और फिर क्या है? उसका पैर जो है वो अर्थराइटिस की वजह से है ना कि यह किसी भी तरह की वजह से पैर में थोड़ा सा डिफेक्ट था ठीक चल नहीं पा रहा था तो बाबूराम महाराज ने उसका हाथ पकड़ा बोला छोड़ो माटी फाटी लगाना छोड़ो यह सब चलो खींच खींच करके राजा महाराज के कमरे में लेके आए किंतु बाय दैट टाइम ये सबके सर पर हाथ रख के राजा महाराज अभी फिर से स्वाभाविक अवस्था में आ गए तो बाबूराम महाराज ने डॉक्टर को फेंका उनके पैर के पीछे ऊपर में महाराज इसको तो फिरा दीजिए। अकेला रह गया है। तो राजा महाराज ने अपने हाथ की ओर देख के कहा जो आया था सो चला गया। हिंदी में कहते हैं जो आया था सो चला गया। ऐसा बोल के राजा महाराज उठ गए वहां से। सो देखिए एक तो है यह जो मैंने एमपी को देखा। उसका एक मैग्नेटिक पावर था। लिटरली मैग्नेटिक पावर था। और म वो आप किसी आप उसके साथ में बात करने से आपको वो हिप्नोटाइज कर देगा। वो उसका एक पावर है। यहां पे राजा महाराज का स्पिरिचुअल डायनेमो है। सो यह जो जर्नी है अपना ये सांसारिक जगत हमको एक मेंटल प्रोटेक्शन देता है ईगो के रूप में। और यह आध्यात्मिक जगत है वह हमको प्रोटेक्शन देता है ईश्वर पे शरणागति और आत्मश्रद्धा के रूप में। तो इस जर्नी को हमको करना है। सो इसके बाद में अभी देखेंगे कल। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम