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और आज का जो टॉपिक है जयराम बाटी और कोवाल पाड़ा अभी देखिए कि ठाकुर के पास में जो लड़के आए थे वह कौन थे तो स्वामी जी ने एक बार कहा कि जीसस के पास में यही यह मछुआरे हैं ये फिर ऐसे लोग सब गए थे किंतु ठाकुरर काछ यूनिवर्सिटी पड़ा दाना दती छले बांगलादेश स्वामी जी कहते हैं कि ठाकुर के पास में जीसस के पास में वो मछवा है ना कि ऐसे लोग सब गए थे किंतु ठाकुर के पास में ये यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले ये सब भैरव जो भूत भैरव जो थे वो सब ठाकुर के पास में आए थे अभी इसमें डिफरेंस क्या है यदि आपके भीतर में एक सरल श्रद्धा भक्ति विश्वास है जैसे कि एक मछुआरे में होता है तो आप बहुत ही आसानी से किसी भी अवतार का उपदेश ग्रहण कर लेंगे क्योंकि आखिर में किसी को भी आपकी श्रद्धा भक्ति यदि आपको अर्पण करनी है तो उनके प्र उनके भीतर में आपको क्या देखना है उनके भीतर में आपको देखना है कंपैशन मनुष्य का हृदय जो है वो करुणा और प्रेम इसके वश हो जाता है जिसके प्रति आप थोड़ा सा भी अपने मन से करुणा या प्रेम दिखाएंगे वह व्यक्ति हमेशा आपका गुलाम हो जाएगा जैसे कि मैंने जगन्नाथ महाराज का उदाहरण दिया उन्होंने मुझे इतना मित्रता से मैं उनसे वो तो मेरे से बहुत सीनियर है किंतु फिर भी वो चाहते थे तो मुझे डांट करके भी मेरी गलतियों के प्रति डांट करके भी बात कर सकते थे किंतु हमेशा मित्रता से मेरे से बात की है तो जब आप किसी को भी अपने हृदय की मित्रता और करुणा प्रदर्शित करेंगे उनके प्रति वो आदमी हमेशा आपका गुलाम हो जाएगा किंतु जिन लोगों में बुद्धि बहुत ज्यादा है वह इजली आपकी अथॉरिटी या तो आपके उपदेश ग्रहण नहीं करेंगे वो पद प्रति पद प्रत्येक स्टेप पर आपको प्रश्न करते रहेंगे प्रश्न करते करते जब उनके संदेह का समाधान होगा तब कहीं जाकर के वह आपको स्वीकार करेंगे स्वामी जी को देखिए स्वामी जी को स्वयं देखिए वो यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे यह कांट और ये हेजल वगैरह यह जो जितने भी ये यूरोपियन पंडित थे फिलोसोफर थे इंडियन फिलोसोफी जो थी वो सब स्वामी जी ने पढ़ करके रखी थी उनका कॉलेज का जो नाम था बचपन का नर आप सबको तो पता ही है तो नरेंद ठाकुर के पास आता था हमेशा ठाकुर को प्रश्न करके विवत परेशान करता रहता था आखिर यहां तक कि ठाकुर जब मृत्यु शैया प शात है कैंसर से पूरा शरीर अस्थि चर्म सार हो गया है उस समय भी नरेंद मनम मन में सोच रहा है कि यदि वो इस समय कहे कि मैं अवतार हूं तो मैं उनकी बात मानो और उसी समय ठाकुर ने नरन के मन की बात समझ कर के इमीडिएट कहा जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण किंतु तो वेदांत दिख दिए नाई जो राम है जो कृष्ण थे वही श्री राम कृष्ण है किंतु तुम्हारी वेदांत की दृष्टि से नहीं वेदांत कहता है हम सबके भीतर में आत्मन है तो वह राम के भीतर में भी आत्मन थी प्रभु श्री राम के भीतर में वही आत्मन मेरे में है उस दृष्टि से नहीं जो ईश्वरीय अवतारी तत्व प्रभु श्री राम के रूप में अवतरित हुआ था पृथ्वी पर जगत कल्याण के लिए वही तत्व वही दिव्य सत्ता अभी श्री राम कृष्ण के रूप में हमारे बीच में विराजमान है तो यहां तक स्वामी जी ने संदेह किया था फिर आखिर में ठाकुर को स्वीकार किया था तो अभी प्रश्न होता है अभी स्वामी जी के खुद के साथ में सेम चीज हुआ है निवेदिता को देखिए निवेदिता प्रत्येक स्टेप पर स्वामी जी को प्रश्न करती है यहां तक कि अमरनाथ गुफा में गए अमरनाथ गुफा में जहां पर उनको दिव्य अनुभूति हुई थी दिव्य अनुभूति के बाद में भी निवेदिता सब समय स्वामी जी को प्रश्न करती रहती है और आखिर में सब प्रश्नों का समाधान होता है तब कहीं जाकर के निवेदिता स्वामी जी को अपने गुरु के रूप में स्वीकृत करती है तो यह हो गया कि ठाकुर और स्वामी जी के पास में आने वाले भक्त अभी प्रश्न होता है मां के पास में कौन आया था कौन आता था अभी यह सब तो सही ही सही वही निवेदिता वही जोसेफाइन मैक्लाउड वही स्वामी जी वही राजा महाराज जो कि ठाकुर और स्वामी जी के जो भक्त थे वह तो मां के पास में आते ही थे किंतु मां के पास में आने वाला एक रवाज अ सेकंड क्लास ऑफ डिवोटा एक एक विशिष्ट वर्ग था जो कि मां के पास में आता था आया था और मां को अपने गुरु के रूप में अपने जीवन के तारणहार के रूप में जिन्होंने स्वीकृत किया था वो कौन थे तो अभी यह भी एक बात है कि मां के पास में अपने खुद के भक्तों का आगमन प्रारंभ कब हुआ जब तक ठाकुर थे जब तक स्वामी जी थे तब तक तो मां ने अपनी शक्ति का बही प्रकाश किया ही नहीं था ज्यादातर भक्त ऐसा ही मानते थे कि ये लड़के लोग मां को इतना श्रद्धा इसलिए करते हैं क्योंकि ठाकुर की पत्नी है तो गुरु पत्नी के हिसाब से उनको जो श्रद्धा मिलनी चाहिए वो है किंतु मां स्वयं जगदंबा और जगदंबा के हिसाब से ठाकुर से भी ज्यादा जिनके पितर में ये आध्यात्मिक शक्ति है वो ये स् ये अनुभूति या तो फिर ये रियलाइफ स्वामी जी को हुआ था और स्वामी जी ने ही मां की महत्ता का प्रचार किया था किंतु मां ने खुद ने अपनी शक्ति का बही प्रकाश कब किया जबकि स्वामी जी का देहांत हुआ स्वामी जी की महा समाधि हुई और उसके बाद में जब मां जयराम बाटी से नियमित कलकत्ता आने लगी उस समय की यह बात है कि जिन्होंने माने अपनी शक्ति का प्रकाश किया था तो अभी जैसे ही मां की शक्ति का प्रकाश हुआ मां ने अपनी आध्यात्मिकता प्रकट करनी शुरू की वैसे ही मां के पास में इन भक्तों का मां के खुद के भक्तों का त्यागी एज वेल एज गृहस्थ दोनों प्रकार के भक्तों का मां के पास में आगमन प्रारंभ हुआ और ये जो आगमन हुआ है मां के पास में भक्तों का उसमें एक विशेष प्रकार के एक विशेष कक्षा के भक्त थे वो थे कोवाल पाड़ा के कोआलपाड़ा में केदार बाबू बोलकर के एक मास्टर महाशय थे और उनके कुछ लड़के थे उनके स्टूडेंट तो उस समय यह स्वदेशी का युग था और स्वदेशी युग के अनुसार जिन लोगों के भीतर में थोड़ा सा भी आदर्श है वे लोग चाहते थे कि हम लोग अपने देश की उन्नति के लिए अपने देश को मुक्त करने के लिए ऐसा कुछ करते हैं जिससे कि ब्रिटिश यह विदेशी राज्य के चंगुल से अपने को बचा पाए तो उन्होंने एक स्वदेशी एक आश्रम प्रारंभ किया था और इसी आश्रम में वह यह चरखा ये चरखे से ये उनके वस्त्र बनाना यह सब स्वदेशी कार्यक्रम व चलाते थे और साथ-साथ में ही उन्होंने ठीक किया कि आध्यात्मिक धार्मिक कुछ तो हमारा एलिमेंट होना चाहिए हमारे जीवन में तो उन्होंने साथ-साथ में ही गीता है महाभारत है योग वशिष्ट है वगैरह कुछ-कुछ धर्म ग्रंथों का पाठ करते थे एक दिन की घटना है वे उनका एक छोटा सा एक घर भाड़े करके वे लोग वहां पर प्रतिदिन शाम को प्रार्थना सभा के लिए इकट्ठा होते थे कुछ ना कुछ धर्म ग्रंथ के पाठ होता था चर्चा होती थी और आखिर में चर्चा होने के बाद में वे लोग थोड़ा बहुत ध्यान जप वगैरह करते थे तो उस दिन वे लोग पाठ कर रहे थे एकाएक वहां से गुलाब के कमल के फूलों की बहुत ही सुंदर खुशबू उस कमरे में छा गई तो सभी लोग सोचते हैं कि यह तो कमल का सीजन है नहीं कमल के फलों की फूलों की खुशबू कहां से आ रही है तो किसी ने कहा कि पीछे में जलाशय है एक वहां से शायद हो सकता है कुछ कमल खिले हो वहां से खुशबू आ सकती है तो उन्होंने जाकर के देखा किसी ने बाद में तो वहां पर भी कमल तो नहीं खिले थे तो देखिए कि एक प्रारंभ होने वाला था एक ऐसी दिव्य घटना परंपरा का कि जिसका यह प्रथम सूचना था एक दिव्य एक अवसर एक दिव्य प्रसंग कि वो कमल के खुलो की खुशबू उनको प्राप्त हुई इसी घटना के कुछ दिन बाद में ये केदार बाबू थे उनको पता चला कि श्री रामकृष्ण देव की सहधर्मिणी अभी भी जीवित है और वो जयराम बाटी में रहती है निवास करती है और जयराम बाटी कोआलपाड़ा के पास में ही है तो इमीडिएट केदार बाबू अपने कुछ ये स्टूडेंट्स को लेकर के मां को मिलने के लिए गए और जैसे ही मां के साथ में मुलाकात की मां का दर्शन किया मां को प्रणाम किया ऐसा एक अद्भुत आध्यात्मिक उनको अनुभूति हुई कि ऐसा लगा कि हां मां के पास आना ही जैसे कि अपने जीवन का एक सर्वोच्च उद्देश्य था अभी तक हम जो कुछ भी कर रहे थे यह दल एक ग्रुप बना कर के ये धर्म ग्रंथों का पाठ करके ये स्वदेशी आंद सब कार्य करके तो उसका आखिर में यही उद्देश्य था कि हमको मां के पास आना था तो जो भी है मां के पास में आ गए मां के साथ में सब बात हुई उन्होंने कहा कि मां आप भी क्वाल पाड़ा आइए तो मां भी स्वीकृत हो गई मां ने कहा कि हां ठीक है कि मैं कोलकाता से जयराम बाटी बीच-बीच में तो मां आती जाती रहती है भक्त लोग जब मां को बुलाते हैं तो मां कलकाता जाती है और बीच बीच में मां जयराम पाटी वापस आ जाती है तो कोआलपाड़ा रास्ते में आता है तो रास्ते में मां कोवाल पाड़ा में विश्राम करेगी यह बात मां ने स्वीकार की तो यहां से मां का कोवाल पाड़ा के साथ में एक दूट अचर संबंध बन गया सबसे पहली बार जब मां क्वाल पाड़ा आने वाली थी उस समय मां ने कहा था कि देखो कि तुम लोग यह सब स्वदेशी कार्य वगैरह करते हो यह ठीक है अच्छी बात है किंतु ये एक बात याद रखना कि जब तक आध्यात्मिकता ठाकुर स्वयं आपके वहां पर विराजमान नहीं होंगे तब तक यह सब चीजों में कोई सफलता नहीं मिलेगी इसलिए तुम एक काम करो तुम लोग एक छोटा सा श्राइन बनाओ मैं वहां पर आकर के ठाकुर के फोटो को रख कर के जाऊंगी अपने हाथों से स्थापित करके जाऊंगी तो सब लोग स्वीकार हो गए सब लोग खुश भी हो गए चलो मां स्वयं आ रही है और मां ठाकुर के फोटो को रखेगी तो अभी ऐसा सब चल रहा था उस समय एक दो बार शरत महाराज मां को लेने के लिए कलकाता लेने के लिए आए थे तो अभी यह घटना ऐसी हुई कि शरद महाराज मां को लेक आए हैं कलकाता जाने वाले हैं और बात हो रही है कि नेक्स्ट टाइम जब मां आएगी तो फोटो वगैरह रखेंगी उस समय संध्या हो गई संध्या हो गई तो अभी इन लोगों को जाने की बड़ी जल्द ल मने शरत महाराज बार-बार कह रहे हैं अरे चलो चलो जाने का समय हो गया है संध्या हो गई है तो सब क्वाल पाड़ा के जो सब डिवोटा थे वे लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि इतना संध्या हो गई है तो जाने की जल्दबाजी क्यों कर रहे हैं जो भी है वे लोग जल्दी-जल्दी निकल तो गए दूसरे दिन समाचार आया कि शरत महाराज ने कहीं पर रास्ते में गाड़ी को रुकवा करके एक एक दुकान थी बंद दुकान थी वहां पे दुकान को खुलवाया यहां से कुछ आटे का व्यवस्था किया और सबके लिए खाना बनाया तब कहीं जाकर के सबने आहार करके कलकाता गए हैं तो यह बात जब कोवाल पाढ में आई तो ब लोग बड़े ही शर्मिंदा हो गए कि बात ऐसी हुई थी कि मां आएगी शाम को और शाम को थोड़ा सा नाश्ता करके चली जाएगी आते हुए देरी हुई मां को तो किसी ने यह सोचा नहीं कि अरे मां को आते हुए देरी हुई तो रात का आहार का व्यवस्था कहां करेंगे ये लोग तो अच्छा है कि गांव में ही मां को भोजन करवा दे बाद में मां को भेजे तो देखिए कि बाद बाद में क्वाल पाड़ा का जो इवोल्यूशन हुआ है उसमें ये पहला जो एक घटना है कि ये लोग ये भी भूल गए कि मां को आहार करके भोजन करके भेजना है तो ये धीरे-धीरे करके ये इवोल्यूशन उनका हो रहा है ये सर्वप्रथम बाद में जब मां कोवाल पाड़ा आई थी तो मां ने अपने हाथों से ठाकुर को वेदी पर स्थापित करने का निश्चय किया था किंतु वरदा महाराज जो कि वहां के ही एक स्टूडेंट है केदार बाबू के और उन्होंने ठीक उन्होंने पूरा रेमसंस लिखा है तो उनके रेमसंस में वर्धा महाराज कहते हैं कि हमको पता है कि सशक्ति अवतार की पूजा करना ही हिंदू शास्त्र का विधान है इस हिसाब से हमने मां का फोटो भी तैयार रखा था और जब मां आई तो उन्होंने अपने हाथों से ठाकुर का फोटो भी स्थापित किया और उसके साथ में अपना खुद का फोटो स्थापित किया अभी देखिए कि यह घटना का इंपॉर्टेंस कैसा है जैसे कि एक अवतार जगत जननी स्वयं अपने हाथों से अपना फोटो स्थापित करें अपनी पूजा का प्रारंभ करें यह मुझे लगता है कि आध्यात्मिक जगत में सर्वप्रथम ऐसी एक घटना हुई होगी तो जो भी है उस समय से किंतु मां का कोवाल पड़े में आगमन नियमित रूप से होने लगा अभी देखिए कि ये जैसे-जैसे ये लोग मां के पास में आते गए उन लोगों का चरित्र देखिए जो लोग ठाकुर के पास में आते थे जो लोग स्वामी जी के पास में आते थे ये कुवाल पाड़ा के लड़के इन लोगों में डिफर फ्रेंड्स देखिए इन लोगों में किसी भी हालांकि वे लोग स्कूल में पढ़ते थे ये लोग ग्रेजुएशन भी किए थे बहुत सारे इन लोगों में से किंतु ये जो एक मॉडर्न संशय राक्षस जो है जो कि आज की वेस्टर्न एजुकेशन सिस्टम में पढ़ कर के हमारे हृदय में बैठ जाता है कि सभी चीजों को एक तरह के संदेह से देखना तो यह संदेह राक्षस संशय राक्षस इन लोगों के हृदय में आकर के नहीं बैठा था इन लोगों ने मां के भीतर में वो अपार करुणा देखी प्योर लव शुद्ध भालो भाषा बांगला ते जाके बोले तो वो शुद्ध प्रेम इन्होंने मां के भीतर में देखा और यह प्रेम और करुणा से ही दया से ही ये लोग मां के वश हो गए थे मां के भक्त हो गए थे तो ये एक डिफरेंस है क्वाल पाड़ा के भक्तों का त्यागी संतानों का और ये स्वामी जी और ठाकुर के जो त्यागी और गृहस्थ भक्त थे इन लोगों में तो ये हो गया कि अ और यह जो कहानी है कि क्वाल पाड़ा के यह जो लड़के किस तरह से मां की उन्होंने सेवा की किस तरह से मां के पास में वो नियमित रूप से जयराम बाटी में आते थे एक सब धीरे-धीरे करके ऐसा होने लगा कि मां का संसार तो बढ़ने ही लगा कलकाता से ज्यादा से ज्यादा भक्त लोग मां के पास आ रहे हैं तो मां की अभी सेवा कौन करेगा अभ संसार का पूरा कार्य कौन चलाएगा बार-बार बाजार करना पड़ता है परचेस करनी पड़ती है सब चीजें तो कहां से करेंगे जयराम बाटी तो छोटा सा गांव गाव है वहां पे एक छोटी सी दुकान है वहां पे आप एक दो किलो का आटा खरीदेंगे तो पूरी दुकान का सब आटा खत्म हो जाएगा वो दुकान ही बंद करके वो तो चला जाएगा अपने घर तो वो जो आसपास के जो टाउन थे वहां से विष्णुपुर वगैरह वहां से वो बाजार करके लाना पड़ता था वहां से चीजें खरीद के लानी पड़ती थी सब्जी हो आटा हो कभी-कभी दूध हो ये सब जो कुछ भी है वो वहां से लाना पड़ता था तो ये सब मां का कार्य कौन करेगा मां को कितनी सारी रोटी बनानी होती थी व अभी रोटी की बात से एक बात की एक वरदा महाराज उस समय वही एक आई थिंक ट वास गौरी स्वरानंद जी महाराज गौरी स्वरानंद जी महाराज तो वो एक बार मां के साथ में रोटी बना रहे थे अभी देखिए कि यह जो मैं एक के बाद एक प्रसंग कहता जाऊंगा इस प्रसंगों के भीतर में मां का जो चरित्र है मां का ये जो उनकी एक दिव्यता है कैसे प्रकट होती है तो अभी ये महाराज जी मां के साथ में रोटी बना रहे थे साथ में नलिनी दीदी थी और ऐसा ठीक हुआ कि नलिनी दीदी जो है वो रोटी को सेके गी और मां और यह महाराज जी ये दोनों लोग रोटी को बनाएंगे जो वो जो बेल बेलना कहता है रोटी बैलेंग और नलिनी दीदी रोटी को सेके गी तो अभी ऐसा ठीक हुआ कि मां और ये जो रोटी बेलने का जो प्रसंग था उसके पहले की एक घटना ऐसी है कि एक डिवटी वहां पे मां के पास में एक लेडी डिवोटा मां के पास में कुछ दिनों के लिए रहने के लिए आई थी तो उनके पास में महाराज जी ने ऐसा देखा कि वो एक साथ में दो-दो तीन-तीन रोटी बेलती है तो महाराज ने पूछा कि अरे आप ऐसा कैसे कर सकती है कि एक साथ में दो-तीन रोटी बेलना तो ये लेडी डिवटी ने कहा कि देखिए कि जो आटा होता है उसके ऊपर में थोड़ा सा ड्राई आटा उसके ऊपर में डाल दीजिए उसके ऊपर में दूसरा आटा फिर उसके ऊपर में फिर से थोड़ा सा ड्राई और फिर तीसरा ऐसा करके तीन लेयर बनाइए बीच में ड्राई आटा है तो अभी इसको आप बेलिए तो इससे क्या होगा कि तीन रोटियां एक साथ में बेल भी पाएंगे और जब रोटियां ये हो जाएंगी परफेक्ट राउंड शेप उनका हो जाएगा आप इनको सेपरेट भी कर पाएंगे तो ये महाराज जी ने प्रयास किया कुछ दिनों तक इस तरह से करने का और कुछ ही दिनों में उने महारथ भी प्राप्त कर ली माकी यहां पे बहुत सारे भक्त आते हैं बहुत सारे डिवटी आते हैं तो इस तरह से बहुत सारी रोटी बनानी होती है तो एक साथ में यदि तीन-तीन रोटिया बना पाए तो इससे अच्छी बात कौन सी है तो ऐसा करके महाराज जी सीख लिए अभी दूसरे तीसरे दिन क्या हुआ कि फिर भी बहुत सारे डिवोटा आ गए हैं महाराज जी और मां स्वयं दोनों रोटी बेल रहे हैं और नलिनी दीदी है रोटी सेक रही है मां एक एक करके रोटी बनाती है और महाराज जी एक साथ में तीन-तीन करके रोटी बनाते हैं और तीन करके रोटी और मां दो दोनों अपनी अपनी रोटियां नलिनी दीदी को सेकने के लिए देते हैं सेकते सेकते नलिनी दीदी ने एकाएक कहा अभी नलिनी दीदी यानी कि मां के भाई की लड़की तो नलिनी दीदी ने कहा एकाएक कि मां आप जिस तरह से रोटी बनाती है वो इतनी अच्छी नहीं फूलती जितनी कि यह महाराज जी की फूलती है महाराज जी की रोटी पूरी गोल हो जाती है आपकी रोटी इतनी फूलती नहीं है इतनी अच्छे से गोल नहीं होती तो जैसे ही नलिनी दीदी ने ऐसा कहा मां बड़ी नाराज हो गई मां ने कहा कि अरे मैं बूढ़ी हो गई रोटी बनाते बनाते और यह दो दिन का बच्चा है मैंने छोटे बच्चे होते हैं तो क्या हम दूध पीते हैं तो यह इतना छोटा है अभी तक मेरे से उम्र में कि उसका गला दबाए तो वो दूध बाहर आ जाएगा और आप तुम कहती हो कि वो मेरे से अच्छी रोटी बनाती है जाओ मैं रोटी नहीं दे लूंगी ऐसा करके मां नाराज हो कर के बैठ गई बिल्कुल जैसे कि एक बचपन आ ठाकुर का एक ऐसा प्रसंग है ना कि वो एक ठाकुर अपने एक बास्केट में एक जलेबी लेकर के खाते थे एक 5 साल का बच्चा आ गया दक्षिणेश्वर की बात है वो ठाकुर के भीतर में एकदम बचपना का उदय हुआ बालक भाव का और ठाकुर ने क्या किया वो जो जलेबी थी अपने पीछे में छुपा दी और बिल्कुल भाव समाधि में चले गए तो ये लोग जो होते हैं वो बालक वत कभी-कभी हो जाते हैं महापुरुष तो मां के भीतर में बिल्कुल वही बालक वत उनके मां का वो भीतर में से एक भाव प्रकट हुआ और यह देख कर के महाराज जी बड़े नाराज हु गए महाराज कहते हैं कि अरे नलिनी दीदी को नाराज हो कर के कहते हैं कि तुमको क्या पता कि ये हम दो इतनी सारी रोटियां तुम्हारे इस पात्र में डाल रहे हैं तो मेरी कौन सी है और मां की कौन सी है बिना सोचे समझे इस तरह का स्टेटमेंट क्यों देती हो मां की माफी मांगो तब तो फिर नलिनी दी ने मां की माफी मांगी तो मां ठीक से वो शांत हो करके फिर से रोटी बनना शुरू किया तो देखिए कि ये जो मां का जो भाव था बचपना फिर एक सरलता एक सरल मातृ हृदय ये जयराम बाटी में ही आपको सबसे ज्यादा जयराम बाटी कोवाल पाड़ा में दिखेगा जब भी मां उद्बोधन आती थी कोलकात्ता आती थी उस समय मां को घिर कर के सब लोग उनके जितने भी सेवक थे जितने साधु स्या थे ये शरत महाराज स्वयं शरत महाराज अर्थात की स्वामी शारदानंद जी महाराज रामकृष्ण संघ के सेक्रेटरी जिनको कि जनरल सेक्रेटरी कहते हैं हम आज तो वही राम कृष्ण संपूर्ण रामकृष्ण संघ का जिनके जिम्मा जिनके सर पे हैं वह स्वयं मां के द्वारी होकर के वहां पर खड़े रहेंगे जिससे कि मां को कोई भी असुविधा ना हो किंतु इससे क्या होता था पता है मां को सब समय घुटा लगा के रहना पड़ता था अपने घर से बाहर नहीं जा पाएंगी और जो भी मां के पास में बात करने को आएगा तो पहले जितने भी सेवक है उनकी परमिशन लेकर के मां के पास में आना है वो प्रणाम करके इमीडिएट चले जाना है वो मां के पास मां इतनी बिजी है इतने सारे डिवोटा लाइन लगा कर के प्रणाम करने के लिए बैठे हैं कि मां के पास में बैठ कर के बात करने का सुकून से एक अपने हृदय की बात बताने का मां का परामर्श लेने का सलाह लेने का समय किसके पास में है तो मां को ऐसा लगता था कभी-कभी कि जैसे वो मां को पिंजरे में भर दिया हो एक बार ऐसा हुआ था कि क्वाल पाड़ा में मां जब जब गई एक ऐसा हुआ कि कोलकात्ता से शरद महाराज ने किसी साधु को भेजा महाराज को कि जाओ जाकर के मां को कलकाता ले आओ कोई काम है तो तो मां ने अभी जयराम बाटी से कोआलपाड़ा आई है कलकाता के रास्ते में कोवाल पाड़ा में विश्राम करेंगी उस समय कुछ डिवोटा थे जैसे कि केदार बाबू थे उनकी मां ने कहा कि चलिए आप हमारे घर चलिए आश्रम में आप रुकी है तो थोड़ा सा हमारे घर में भी चले आईए तो मां उनके घर जा रही थी तो पैदल चल के चलके सब लोग जा रहे थे अभी महाराज जी को जब पता चला जो कि मां को रिसीव करने के लिए गए थे मां को एक्सपोर्ट करने के लिए उनको जैसे ही पता चला कि यहां के भक्तों ने मां को पैदल चला कर के अपने घर लेकर गए हैं वैसे ही बड़े नाराज हो गए चिल्ला चिल्ला के कहने लगे कि अरे तुम लोगों में बिल्कुल अकल नहीं है मां को पैदल चला कर के ले गए मां को तो पालखी में ले जाना है मां की एक गरिमा है मां की एक महत्ता है पैदल चला कर के आप लोग लगे ले गए ऐसा करके नाराज होकर के पालकी लेकर के वो डिवटी के केदार बाबू के मां के घर गए और जब मां वापस आ रही थी आश्रम जाने के लिए तो महाराज जी ने कहा मां पालकी में बैठ जाइए आप पैदल क्यों जा रही है तो मां थोड़ी सी नाराज होकर के पालखी में बैठी तो सही किंतु जब आश्रम वापस आए तब मां ने कहा कि देखो ये कुवाल पाड़ा है जयराम बाटी है यह तो मेरा घर है यहां पे मैं स्वच्छंद होकर के घूमू गी फिरू गी तुम लोग कलकाता मुझे लेकर के जाके जाते हो वहां पे पिंजरे में जैसे पंखी को बंद कर देते हो इस तरह से मुझे कैद में रहना पड़ता है यदि वही व्यवस्था तुम लोग यहां पर करोगे तो मैं तुम्हारे साथ में नहीं जा पाऊंगी जाओ तुम जाकर के शरद को कह दो तो जैसे ही माने ऐसा नाराज हो कर के कहा तो महाराज जी एकदम उनके पैरों में गिर गए कहा कि मां शरद महाराज ने कहा था कि आपका बड़ा ही जतन करके बड़ी ही संभाल पूर्वक आपको ले आना है जिससे कि आपको कोई भी कष्ट ना हो तो आप पैदल गए तो मुझे लगा कि मेरी गलती थी इसलिए मैं नाराज होकर के इनके साथ में झगड़ रहा था किंतु मां अभी आपकी जैसी इच्छा होगी वैसी ही वैसा ही करेंगे तो वो कोवाल पाड़ा और जयराम बाटी कि जहां पर मां स्वच्छंद होकर के ग्राम्य बाला की तरह रहती थी जितने भी भक्त आते थे सीधे मां के कमरे में मां का जो घर था मां के घर में जाएंगे मां को प्रणाम करेंगे मां के सामने बैठेंगे मां स्वयं इनके लिए आहार की व्यवस्था करेंगी अपने हाथों से इनको खिलाएंगे जब वोह भोजन के लिए जो सब ये रखे जाते हैं थाल बाटी वगैरह तो एकदम एक लाइन में रखने हैं वो बीच में डिस्टेंस इक्वल रखना है एक थाला आगे एक थाला पीछे दो थाला के बीच में कम डिस्टेंस दूसरे दो थाल के बीच में ज्यादा डिफरेंस ऐसा डिस्टेंस ऐसा नहीं एक ही लाइन में सब थाल रहेंगे सब पात्र रहेंगे उनमें इक्वल डिस्टेंस होगा और मां स्वयं अपने हाथों से परोसें उनको और जब आहार समाप्त हो जाएगा तब भक्त लोग पूछेंगे कि मां अभी ये पात्र वगैरह है ये जो जमीन है उसको हम आपको मदद करते हैं सहाई करते हैं साफ करने के लिए क्लीन करने के लिए तो मां क्या कहती थी पता है मां कहेगी कि नहीं नहीं आपको यह सब चिंता करने की जरूरत नहीं है इसके लिए लोग एटर जनन लोक राखा है इसके लिए लोग रखे हुए हैं वो लोग आकर के सब क्लीन कर देंगे तो जो कलकाता से जो जाते थे वो सोचते थे कि हां किसी वो बाई को रखा होगा कोई होगी कोई वहां पे डिवटी वगैरह वो लोग सब यह साफ करती होंगी तो वे लोग निश्चिंत मन से बाहर में चले जाते थे मां के जनरली जो गांव के घर होते हैं उसमें देखा होगा आपने एक रा एक एक को ऐसा रहता है एक कंपाउंड जैसा एक रहता है जहां पे भीतर में स्त्रियों के लिए परिवार जनों के लिए रहने का कमरा होता है और बाहर से जो पुरुष लोग आते हैं तो बाहर में उनके ठहरने के लिए विश्राम के लिए कमरा रहता है तो यह लोग सब आराम से भोजन करके बाहर में चले जाते थे कमरे में विश्राम करने के लिए यहां पे मां स्वयं अपने हाथों से सब कुछ साफ करेगी ये लोग राखा मने लोग रख हुए ये लोग कौन है तो लोग है मां स्वयं एक बार शरद महाराज के साथ में कुछ साधु कलकाता से गए हैं जयराम बाटी तो एक साधु ने देखा अभी तो कोलकाता से जो गए हैं नए-नए जवाइन किए हैं एकदम एक उत्साह रहता है तो अपनी देखा कि मां अपने हाथों से वही वो रामदे में वो झाड़ू लगा रही है तो वो तो एकदम आश्चर्य चकित हो गया अरे मां स्वयं यहां पर कार्य कर रही है जगत जननी स्वयं जिनकी हम पूजा करते हैं अरे अरे ऐसा कैसे होगा मां के पास जाकर के कहा कि मां मां मुझे दो मैं झाड़ू लगाता हूं आप हमारे रहते आप ये सब क्या करेंगी तो ये देख कर के शरद महाराज नाराज हो गए शरद महाराज कहते हैं देखो जराम बाटी में आकर के मां के हाथ से काम छीन मत लो मां को इससे मां इससे नाराज हो जाएगी तो ये देखिए कि ये कोलकात्ता और जयराम बाटी और ग्वालपाड़ा के बीच में फर्क है ग्वालपाड़ा और जयराम बाटी में मां जैसे कि अपने घर की मां है वो हमारे लिए खाना बनाएगी हमको खाना परोसे गी वो साफ करेगी भोजन बना सबको एक बार ऐसा हुआ कि कलकाता से कुछ डिवटी गए हैं तो देखा कि बहुत ही अर्ली मॉर्निंग उठ कर के उन्होंने सोचा कि चलो पास में एक जलाशय है एक तालाब है वहां से हम लोग पद्म फूल एक कमल के फूल संग्रह करके ले आते हैं और मां जब उठेगी मां जब बाहर आएगी अपने कमरे से तो हम उनके पैरों में यह कमल के फूल रख कर के उनकी पूजा करेंगे ऐसा बोल कर के यह दो तीन साधु वो फूल चुनने के लिए निकले रास्ते में अर्ली मोर्निंग है अभी सूर्योदय भी नहीं हुआ रास्ते में सब अंधेरा है एकाएक उन्होंने देखा कि दो स्त्रियां सामने से आ रही है तो सामने से आ रही है तो ऐसा जैसे ही साधुओं को देखा उसमें से एक स्त्री जो थी वो दूसरी स्त्री के पीछे में छुप गई और जैसे कि कोई उनका चेहरा ना देख ले फिर जैसे ही दोनों स्त्री चली गई तो ये दो साधु थे उसमें से एक साधु ने दूसरे साधु को पूछा कि तुमको पता चला कि वो कौन था तो पहले वाला साधु पूछता है नहीं मैंने तो इतना ध्यान से देखा भी नहीं इतना अधर है में तो तो उन्होंने कहा कि वो थी मां स्वयं यह बगल वाले गांव में जाकर के हम लोग सुबह-सुबह ये जो चाय वगैरह पीते हैं यह जो नाश्ता करते हैं तो हमारी सुविधा के लिए हम हमको भोजन करवाने के लिए मां स्वयं इतना जल्दी से उठ करर के यह सब बाजार वगैरह करती है परचेस करके ले आती है चीजों को जिससे कि हमारे लिए खाना वगैरह बना पाए तो दूसरे साधु ने जब ये पहले साधु ने ये बात सुनी तो तो बड़ा ही आश्चर्य चकित हो गया सोच रहा है कि इस ऐसा होने से तो हम जयराम पाटी में ज्यादा नहीं रुक सकते यदि हमारे लिए मां को इतना कष्ट करना पड़ेगा तो कैसे चलेगा तो और ऐसा कितनी ही बार हुआ है ये कलकाता के भक्तों को जो भी साधु है डिवोटा है वो जयराम बाटी गए हैं उनको सुबह को उठकर के चाय पीने का हैबिट होता है हम सबको जैसे कि चाय पीने का हैबिट होता है अभी जयराम बाटी में दूध कहां से मिलेगा तो मां क्या करती थी एक पात्र लेकर के घर-घर घूमती थी दूध की भिक्षा करने के लिए यह कहते हुए कि कलकाता से मेरे बच्चे आए हैं उनको चाय पीनी है तो उसके लिए दूध चाहिए छोटा सा गांव है गाय वगैरह तो इतना है नहीं तो कहीं से आधा कप दूध मिलता था तो कहीं से पौना कप दूध ऐसा इकट्ठा करते-करते मां दूध भिक्षा करके लेके आती थी और उनके लिए सुबह को चाय बनाती थी तो ये डिफरेंस है कि अपने घर की मां की तरह जयराम बाटी में मां रहती थी और वहां पर जैसे कि कलकाता जाएगी तो जैसे कि फुल सिक्योरिटी वो आजकल वो कहते हैं ना व जड प्लस सिक्योरिटी वगैरह इस तरह से शरत महाराज की आज्ञा के बिना किसी को ऊपर जद उद्बोधन जद आपने देखा होगा तो ग्राउंड फ्लोर पर शरद महाराज की ऑफिस है और फर्स्ट फ्लोर पर मां का निवास है तो पहले तो ग्राउंड फ्लोर पर जो भी डिवटी आएंगे मां को प्रणाम करने के लिए नया होगा कोई भी डिवटी तो महाराज उसको प्रश्न करेंगे भाई क्यों आए हो क्या है क्या प्रयोजन है संतुष्ट होंग तभी सबको वो लाइन में खड़ा रख देंगे एक निश्चित समय होगा कि जब मां दर्शन देगी तो यह निश्चित समय के दौरान ही सब भक्त लोग तब तक लाइन में वेट करना है जैसे ही समय हुआ मां के कमरे का दरवाजा खुलेगा और अपनी यह गुलाप मां वहां पे वो बॉडीगार्ड की तरह खड़ी रहेगी और वहां प जैसे भक्त लोग आते जाएंगे मां कहेगी गुलाब मां कहेगी चलो चलो जल्दी करो जल्दी करो इतने सारे डिवोटा है सबको प्रणाम करना है फटाफट चलो और यदि कोई डिवटी थोड़ा सा वहां प देरी करेगा तो गुलाप मां बड़ी नाराज हो जाएगी और ऐसा नाराजगी का प्रयोजन भी था कोई कोई भक्त ऐसा नाटक करते थे एक बार ऐसा हुआ कि गोलाप मा को किसी कार्य अभी प्रणाम चल रहा है लाइन लगी है भक्तों की और सभी लोग फटाफट प्रणाम करके जा रहे हैं कोई हो सकता है कि एक दो प्रश्न करेंगे मां इमीडिएट उत्तर देंगी और बात समाप्त हो जाएगी तो सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है तो गुलाप मां ने सोचा चलो एक छोटा सा काम है मैं करके आती हूं वो काम करके वापस आ कर के देखा तो एक भक्त वहां प बैठा था वो भक्त क्या कर रहा था पता है कि वो जैसे कि वो मां की पूजा करने के लिए वो जो ये जो ये जो प्राणायाम वगैरह करना होता है ये वगैरह करके वो विधिवत मां की पूजा करना आरंभ कर दिया था अभी मां एक तो गर्मी के दिन है फिर मां जब भक्तों को सामने जब भक्तों को दर्शन देगी तो पूरा एक मोटा मोटी चादर से अपने पूरे शरीर को आवृत कर लेगी एक पूरा घुटा टान कर के रखेंगी तो इस तरह से बेचारी एकदम स्थिर होकर के बैठी है और इतने गर्मी के दिन पसीना पसीना हो जा रहा है और यहां पर वह भक्त जैसे की पूजा कर रहा है तो इमीडिएट गोलाप माने चिल्ला करके उसका हाथ पकड़ कर के खड़ा करके कहा कि अरे मूर्ख तुमको समझ में नहीं आ रहा है क्या पत्थर के भगवान दिखते हैं क्या तुमको मां के भीतर में कि वो बैठ कर के तुम पूजा वगैरह चालू कर दिए देख नहीं रहे हो कि मां को पसीना हो रहा है मां इतनी परेशान हो गई है ऐसा करके भक्त को भगा दिया तो वो एक था कि कलकाता में जिस तरह से था व्यवस्था वहां पे उस इस तरह से और जयराम बाटी कोवाल पाड़ा में इस तरह से तो अच्छा तो मां का वो एक मातृ स्वरूप था और मां का एक बाल्य रूप भी था और यह बाल्य स्वरूप जो था एक सहज सरल बालिका की तरह जो कि हमको ठाकुर के जीवन में बार-बार देखने को मिलता है ये आपको कलकाता में उद्बोधन में कभी भी नहीं दिखेगा क्योंकि इतना सब कुछ वहां पर सिस्टमिक है किंतु जयराम बाटी में बार-बार मां का यह मातृ स्वरूप ये बालक स्वरूप बाली का स्वरूप व वो छलक करके दिखता था एक बार ऐसा हुआ कि राधू बड़ी ही बीमार है तो अभी वह प्रेग्नेंट भी थी तो अभी क्या करेंगे वो सब डॉक्टर को दिखा रहे हैं कुछ परिणाम नहीं आ रहा है मां जैसे कि बालिका की तरह अधीर हो रही है अरे राधु को ऐसा है तो क्या करेंगे राधु को ऐसा है क्या करेंगे तो किसी ने कहा कि एक काम करो वहां पर एक वो जो उपदेश ये जो सलाह देने वाले 10 लोग मिल जाते हैं ना ऐसे समय कोवाल पाड़ा की ही बात है राधू प्रेग्नेंट हो करर के पड़ी है वहां पे और यहां मां 10 लोगों को जो भी आता है पूछ रही है कि क्या करेंगे क्या करेंगे ठाकुर का ऐसा बचपना था ना सबको पूछते थे अरे ये गले में दर्द हो रहा है क्या करेंगे तो सुबोधनंद जी खोका महाराज अपने वो भी बच्चे ठाकुर भी बालक तो खोका महाराज जाकर के ठाकुर को कहते हैं महाशय काम कीजिए आप चाय पीना शुरू कीजिए तो जिस हम लोगों को गले में तकलीफ होता है तो हम चाय पीते हैं तो ठाकुर तो मैंने बप बच्चे जैसे हैं वो कोई भी उनको कुछ भी कहेगा तो बड़ा ही सीरियसली ले लेंगे तो अभी राजा महाराज वहां पर खड़े थे वो समझ गए कि भी ठाकुर कुछ भी कर सकते हैं तो वो एकदम सीरियसली हो कर के बोले कि देखिए कि महाशय चाय तो गर्म होती है आपके गले में ऑलरेडी खाव हुआ है कैंसर की वजह से तो आप गर्म चाय पिएंगे तो दर्द और भी बढ़ जाएगा तो जैसे कि बच्चे को एक लॉजिक देकर के बचपना वाला लॉजिक दे कर के समझाना होता है तो ठाकुर भी ऐसे हां हां हां बड़ा मान ली बात को फिर वो खोखा महाराज को सामने से समझाते हैं अच्छा देखो मैं तो चाय नहीं पी पाऊंगा और राखल बोलता है वो ठीक ही बोलता है तो ये जो बचपना कि वो बाली का भाव जब प्रकट होता है तो जो कोई भी कुछ भी बोलेगा मां स्वीकार कर लेगी तो मां 10 लोगों को पूछती है कि अरे राधू बीमार है क्या करेंगे राधू बीमार है क्वाल पाड़ा की बात है तो किसी ने कहा कि एक काम करिए वो तिरोल की तिरोल बोल करर के एक जगह है वहां पर एक मां काली का मंदिर है वहां पर लोग इस तरह से किसी को एक मानसिक बीमारी या या गांव में तो क्या है कि शहर की तरह वो क्वालिफाइड डॉक्टर वगैरह मिलना तो मुश्किल है बीमारी जब बढ़ जाएगी तो क्या करेंगे किसी काली के मंदिर में भगवान शिव के मंदिर में जाएंगे मिन्नत मानेंगे ऐसा कुछ करेंगे यही तो गांव वालों के पास में उपाय था उस समय आज भी बहुत सारी जगह पर शायद ऐसा ही होगा तो वहां पर मां कालिका मंदिर है वहां पर जो लोग पागल होते हैं उन लोगों के लिए मिन्नत मानी जाती है और इतना ही नहीं यह राधु की मां जो है जिनको कि हम पागली मामी कहती है वही पागली मामी का पागलपन ही वो राधू के भीतर में आया था तो पागली मामी के लिए हमने मिन्नत मानी थी मिन्नत मान कर के वहां पर चूड़ियां दी जाती है वो चूड़ी मां काली को दिखा कर के जो स्त्री को इस तरह से पागलपन का दौरा पड़ा होता है उस स्त्रियों को उस चूड़ियां पहनाई जाती है तो पागली मामी को इस तरह से चूड़ी पहनाई गई थी मिन्नत मान के तो उनका माथा थोड़ा ठंडा हुआ था राधू के लिए भी ऐसा कुछ करते हैं अब ये सलाह देने वाली थी नलिनी और नलिनी और ये पागली मामी इन दोनों के बीच में साप और नेवला की तरह वो वेर माने दुश्मना वट तो जैसे ही नलिनी ने ऐसा कहा जैसे ही राधु के लिए वो चूड़ियां मंगाई गई और राधु ने चूड़ियां पहनी राधू का पागल न तो कम नहीं हुआ वो पागली मामी अर्थात कि राधो की मां का पागलपन बढ़ गया और वो चिल्ला चिल्ला के बोलती है कि अरे वो मेरी लड़की को पागल बता रही है क्या नलिनी इसके लिए वो मा काली का इस तरह से चूड़ी लाकर के उनको पहनाया बोलक के इतनी नाराज हुई कि फिर वो चूड़ियों को निकाल देना पड़ा अच्छा तो अभी और किसी ने आकर के मां को उपदेश दिया कि मां एक काम करो य चूड़ी पहनाने से तो कुछ लाभ नहीं हुआ मां काली की अभी एक काम करो उसके सर पर बर्फ लगाओ तो बर्फ लगा आंगे तो वो थोड़ी सी पागल ठीक हो जाएगी तो भी मां बिल्कुल बालिका की तरह वो कहीं से बर्फ मंगवाया वरदा महाराज को सब समय वर्धा महाराज बेचारे पकड़ में आ जाते थे वर्धा को वर्धा महाराज को बोलते जाओ जा कर के बर्फ लेके आओ वर्धा महाराज की साइकिल भी नहीं चल रही 10 12 किलोमीटर जाकर के बर्फ लेकर आना है वो भी गर्मी में है वो कितना वो जल्दबाजी करके लाना पड़ेगा तो बर्फ लाए और वो मां बड़े ही मने जैसे कि उत् फुल हो कर के छोटे बच्चे को खिलौना दे देते हैं तो ऐसे ही वो कितना वो खुश हो जाता है मां भी जैसे वो बड़े ही खुश मन से बड़े उत् फुल्ल होकर के राधू के सर पर बलफ लगा रही है उस समय वो जयराम बाटे से काली मामा आए काली मामा अर्थात कि मां के छोटे भाई काली मामा ने आकर के जैसे ही देखा कि वो प्रेग्नेंट है राधू उसके सर पर बर्फ लगा रही है तो चिल्ला के बोल उठे अरे दीदी क्या कर रही हो लड़की के सर पे प्रेग्नेंट लड़की के सर पे बर्फ लगा रही हो वो बुखार वगैरह हो जाएगा अ बर्फ मत लगाओ तो माने तो बिल्कुल बचपन की तरह मां बोलती है अच्छा अच्छा बड़ा सीरियस हो कर अभी क्या करना चाहिए तो काली मामा कहते हैं कि एक काम करो वहां पर एक तांत्रिक है वो तांत्रिक को बुला कर के ले आओ सूचने गड़े ना कि ऐसा कोई नाम था गांव का वहां से उस तांत्रिक को ले आओ वो तांत्रिक जो है वो बड़ा ही वो कार्यक्षम है वो इस ये सब चीजों में बड़ा ही माहिर है तो फिर वो वरदा महाराज को लेकर के काली मामा दोनों लोग तांत्रिक को लेने के लिए गए अभी ये तांत्रिक लोग भी क्या है कि वो मूर्खता के ऊपर में ही तो उनका वो बिजनेस चलता है ना जो लोग तांत्रिक के पास कौन जाएगा सब जगह से वो निराश हो गया है वो तांत्रिक के पास आएगा और उसको भी पता है जो मेरे पास में आएगा सब लोग मूर्ख ही है थोड़ा सा एक नाटक करके उनके पास में से पैसा निकालो तो अभी वर्धा महाराज को सब समझ में आ रहा है किंतु ये काली मामा और मां दोनों लगे हैं कि नहीं तांत्रिक को तो बुलाना ही है तो वर्धा महाराज किंतु बड़ा ही लॉजिकल वो डिस्क्रिप्शन देते हैं वो बोलते हैं कि जैसे ही हम गए तांत्रिक ने अपना नाटक चालू किया वो जो जव वगैरह होते चारों ओर फेंका पहले तो नाटक करते करते फिर कहा कि हां मुझे पहले से ही पता था कि आप लोग आने वा हैं इस दिन को मैं आपके वहां पर आऊंगा सब ठीक कर दूंगा मुझे पता है क्याक गड़बड़ है तो वरदा महाराज तो कुछ बोल नहीं रहे और काली मामा बड़े ही प्रभावित होकर के व क्वाल पाड़ा करके मां को कहते हैं कि मां वो तांत्रिक आ रहा है उसने सब कुछ ठीक कर दिया है वोह सब ठीक कर देगा तो मां तो बड़ी आश्वस्त हो गई वो जिस दिन तांत्रिक को आना था मां बड़ी ही उत्कंठा से राह देख रही है जैसे ही तांत्रिक आया मां दो हाथ जोड़ कर के इस तरह से उसके साथ में विनती कर रही है कि बिना तांत्रिक के कोई उद्धार ही नहीं है मां बड़े ही दया पूर्ण भाव से कहती है कि आप आइए देखिए मेरी बच्ची को क्या हो गया है आप यदि कुछ ठीक नहीं करेंगे तो क्या होगा व तांत्रिक भी समझ गया कि हां तो आज मिलने वाला है अच्छा सा माल मिलेगा इनको लूटू मैं तो सब नाटक करके कह रहा है कि हां ये चंड है वो वो उसको मैं भगा दूंगा फिर बड़ी अच्छे से वह दक्षिणा लेकर के उसने जो विधि विधान जो बताए कि एक इस तरह की जगह से एक तरह की धातु लानी है वो कहां से जो एक पार्टिक टाइप का ऑइल लाना है सबको मिलाकर के औषध बनाना है और औषध उसको खिलाना है और तांत्रिक भी बड़ा चालाक है यदि ऐसा कुछ औषध देगा जो कि औषध हाथ में दे देगा और औषध का प्रयोग करके पता चला औषध काम नहीं करेगा तो उसका तो पकड़ में आ जाएगा उसका सब उसकी चालाकी तो इस तरह से वो सब औषध कलेक्ट करने को बोल रहा है कि वो जगह प आप जा ही नहीं सकते और यदि आप चले भी गए तो वहां प वो चीज आपको मिलेगी ही नहीं तो कुछ दिन तक तो माने बड़ा ही वो उत्साह दिखाया बड़ा ही आतुरता दिखाई क्या अरे वो अदम्य जगह है कैसे भी करके जाकर के वहां से वह औषध कलेक्ट करना है जड़ीबूटी कलेक्ट करनी है किंतु कुछ ही दिनों के बाद में मां को भी समझ में आ गया इतना बचपना था फिर भी कि नहीं उस जगह पर जा नहीं सकते और उस जगह से कुछ भी कलेक्ट नहीं कर सकते तो जो है ये ये मां का एक बचपना देखिए और ये इतना मधुर है यह भाव जो है बहुत बार हम लोग सोचते हैं मुझे कोई कोई पूछता है कि ये जो स्ट्रेस है जीवन में यह जो चिंता है इससे हम लोगों की सेहत प बड़ी ही बुरी असर होती है तो ये स्ट्रेस से किस तरह से मुक्ति पाई जाए आज का जो जीवन है इतना टेंशन हमारे जीवन में मुक्ति कैसे मिले तो उसके लिए वैसे उपाय है कर्म योग है ज्ञान योग है भक्ति योग है राज योग है सब विधि विधान है सब साधन पद्धतियां है उसको आप कीजिए आपको मन को शांति मिलेगी किंतु पता है क्या है वो सबके लिए ना आपको कुछ ना कुछ पुरुषार्थ करना पड़ेगा आपके भीतर में एक विल पावर चाहिए वो विल पावर जद होगा आपके भीतर में शक्ति होगी तभी आप साधन भजन कर पाएंगे किंतु जिसका कि विल पावर बड़ा ही कमजोर है जैसे कि मैं हूं तो अभी करेंगे क्या अपना विल पावर नहीं है साधन भजन करने की क्षमता नहीं है कितने जन्म जन्मांतर के कर्म अपने सर पर बैठ कर के नाच रहे हैं और क्या करेंगे क्या नहीं करेंगे तो उस समय यह जो लीला प्रसंग जो है ये लीला कथाएं है यह माधुर्य मय प्रसंग ठाकुर महा स्वामी जी के उनका श्रवण मनन और चिंतन करेंगे तो अपने हृदय को इतना सुकून पहुंचेगा कि धीरे-धीरे करके हृदय के भीतर में जितना भी यह टेंशन है स्ट्रेस है धीरे-धीरे करके गलते गलते वो साफ होता जाएगा चित्त शुद्धि होती जाएगी फिर जब चित्त शुद्धि होगी मन की प्रसन्नता होगी विल पावर बढ़ेगा और आप कुछ ना कुछ उससे वो विल पावर को लेकर साधन भजन करें तो वो एक अच्छी बात है किंतु शुरुआत कैसे करें तो यह सब माधुर्य मय प्रसंगों से करनी है देखिए मां के भीतर में सिर्फ बचपना भी नहीं था जब दोनों बातों का संगम था कि एक गुरुत्व जगदंबा की शक्ति थी और एक बालिका सहज भाव था तीसरा एक मातृत्व का भाव था तीनों भावों का संगम मां के भीतर में था जब कलकाता से कोई बड़े-बड़े डिवोटा आते थे तो मां खुद कहती है कि लोग मुझ में ऐसा तो क्या देखते हैं कलकाता से जब लोग आते हैं बड़े-बड़े तो मैं पूछती हूं कि भाई तुम कौन हो क्या करते हो मेरे प पैरों में गिर कर के दीक्षा मांगने के लिए रोते हैं तो मैं पूछती हूं तो पता चलता है कोई क्यों हाकिम ना क वकील मा कहती है कोई वैद्य है तो कोई वकील है माने उस समय के जो प्रोफेशनल वर्ल्ड के जो टॉप लेवल के लोग आज हम कहेंगे सीईओ है क्या सीएफओ है ऐसा यदि हम आज कहते हैं तो उस समय वकील होना या वैद्य होना ये बड़ा ही प्रेस्टीजियस समझा जाता था तो मां कहती है जब मेरे पैरों में आकर के रोते हैं दीक्षा मांगने के लिए मैं पूछती हूं तुम लोग कौन हो तो कोई कहता है मैं वैद्य हूं तो कोई कहता है मैं वकील हूं तो मां सोचती मां अपने मुंह से यह कहती है कि मैं तो सोचती हूं कि मैं तो वही राम मुख ज की बेटी हूं जो कि इसी जयराम बटी गांव में बाकी सब लड़कियों के साथ में खेल रही थी मुझ में ऐसा तो ये लोग सब क्या देख लेते हैं कि मेरी मेरे पास में आकर के इतनी विनती करते हैं राममय महाराज गौरेश्वर आनंद जी महाराज तो रामय महाराज एक बार कहते हैं कि मैं जब मां के पास में यह लोग बड़े बड़े बड़े वीआईपी लोग आकर के मां के पास में प्रार्थना कर रहे हैं धर्म जगत के गुण तत्व मां को पूछ रहे हैं कि मां ऐसा करने से क्या होगा या मुझे ऐसा सपना आया है उसका क्या अर्थ है तो मैं मन में मन में बड़ा ही भयभीत हो जाता हूं सोचता हूं कि अरे आपको यह सब प्रश्न करने तो जाओ कलकत्ता जाओ वहां प महापुरुष महाराज है वहां पर शरद महाराज है जाओ उनको प्रश्न करो मां के पास में आकर के ये सब क्या पूछते हो किंतु मैं देखता हूं कि मां इतने जटिल प्रश्नों का भी इतना सहज सरज सहज सरल निराकरण देती है कि जो मां को प्रश्न करता है बड़े-बड़े जो विद्वान लोग है बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी की डिग्रियां लेकर बैठे हैं वे लोग भी बड़े ही परितृप्ति होकर के घर वापस जाते हैं तो मुझे भी बड़ा आश्चर्य होता है कि वैसे तो मां दिखती है इतनी सहज सरल हमारी हमारे लिए खाना बनाती है और एक और ऐसी मां और दूसरी ओर ऐसे विद्वान लोगों के प्रश्नों का ऐसा करके निराकरण करती है जैसे कि कोई प्रश्न मां के लिए बड़े सहज सरल हो एक बार यही राममय महाराज व मां के घर के पास में केले का पौधा लगा रहे थे तो साथ में ज्ञान महाराज थे अभी ज्ञान महाराज माने वो बड़े ही बलिष्ट दृष्ट बलिष्ट अशिष्ट हो दृष्ट हो बलिष्ट हो जैसा वो स्वामी जी कहते हैं ना साधु कैसा होना चाहिए तो प्रचंड श्रद्धा भक्ति होनी चाहिए प्रचंड दहिक शक्ति होनी चाहिए स्ट्रांग मसल होने चाहिए और सेवा करने के लिए हमेशा तत्पर होना चाहिए तो वो थे हमारे ज्ञान महाराज तो ज्ञान महाराज और रामय महाराज दोनों मिलकर के मां के बगीचे में पुण्य पुकुर यदि आप जनं बाटी गए होंगे तो देखा होगा मां के घर के पास में पुण्य पुकुर है वहां पर वो एक बगीचा बना कर के केले के पौधे वगैरह लगा रहे थे अभी भोजन का समय हो गया मां ने चिल्ला करके बोला अरे ज्ञान हे राममय चलो खाने का समय हो गया है घर चले आओ तो ज्ञान महाराज एकदम ना को छुपे एकदम हल्के शब्दों में कहते हैं हल्के स्वर से रामई महाराज को कि देखो मां बुला रही है खाने के लिए किंतु मां की बात का हमको देखो मां की मां का जो आदेश है उसका उल्लंघन कभी नहीं करना प्रश्न ही नहीं होता ज्ञान महाराज तो मतलब सेवा के एकदम मूर्तिमंत स्वरूप थे गुरु के आदेश का उल्लंघन तो संभव ही स्वपने में भी संभव नहीं कब कर सकते हैं जब आप गुरु का खुद का जब कार्य कर रहे हो तो गुरु के कार्य को समाप्त करने के लिए परिपूर्ण करने के लिए आप गुरु के आदेश को अवगणना कर सकते हो तो ज्ञान महाराज राममय महाराज को कहते हैं देखो मां तो बुलाएगी वो तो मातृ हृदय है उनका खाने के लिए किंतु हम जब तक तब तक नहीं जाएंगे जब तक ये पूरा गार्डन में जितने भी बोधे लगाने वो पूरे ना हो जाए मां का ही कार्य है तुम चिंता मत करो कुछ होगा नहीं तुमको तो अभी वो राममय महाराज वो काम कर रहे हैं अभी मां दूसरी बार चिल्लाई फिर भी ये लोग नहीं आ रहे हैं तो मां समझ गई कि अभी ये ज्ञान महाराज जो है वही राममय महाराज को ब्रेन वाश कर रहे है तो माने अभी ज्ञान महाराज को छोड़ कर के राममय महाराज को ही चलाना शुरू कर दिया अरे राममय इधर आओ चले आओ चले आओ ये सब क्या कर रहे हो पहले खाना खा लो खाना ठंडा हो रहा है बाद में जाके काम करना तो जैसे ही मां ने ज्ञान महाराज को छोड़ के राम महाराज का नाम लेना शुरू किया राममय महाराज अपना वो जो सब वो सब था काम वो छोड़ के दौड़ के मां के पास में गए और मां को कहा कि अच्छा चलो मैं पहले आहार कर लेता हूं तो देखिए ये अभी ये दोनों एटीट्यूड है मां के प्रति मां का जो मातृत्व है उससे तो मां आपको पुकारेगी तो मां का कार्य प्रथम ना कि मां का आदेश प्रथम दोनों मॉडल है आपके पास में हम लोग जद होते तो हम लोग कौन सा मॉडल सिलेक्ट करते यहां पर आपको यह भी कहना मुश्किल है कि कौन सही कौन गल दोनों का अपना अपना भाव है एक एक बालक भाव भी है संतान भाव भी है मां की ओर और फिर जैसे एक महावीर का भी भाव है कि नहीं मां का कार्य जब तक समाप्त नहीं होगा तब तक मैं वो मां के पास में आहार करने के लिए नहीं जाऊंगा तो ये ये सब घटना परंपराएं आपको यह सब जयराम बाटी में देखने को मिलेगी और अभी तो समय भी समाप्त हो रहा है तो आखिरी घटना कि मां का आखिरी विदाई जयराम बाटी से उस दिन मां ऑलरेडी बहुत बीमार थी और कलकाता से बार-बार यह लोग कह रहे थे कि मां आप बीमार है ऐसा समाचार हमारे पास में आ रहा है आप कैसे भी करके कोलकात्ता वापस चली आइए हम आपकी ट्रीटमेंट की अच्छी सी व्यवस्था करेंगे तो मां ने ठीक किया कि अच्छा चलो कोलकाता जाते हैं सब लोग इतना बुलाते हैं तो व जयराम बाटी छोड़ कर के कोलकाता का जाने का दिन जब वह आया उस दिन गांव वालियों को गांव वासियों को सम हाउ ऐसा पता चल गया था कि ये माकी गांव से आखिरी विदाई है तो सभी गांव वासी मां को विदाई देने के लिए वहां पर इकट्ठा हो गए थे ठीक हुआ था कि मां पालखी में जाएगी और बाकी जितने भी सेवक हैं वो बेलगाड़ी में जाएंगे तो मां पालखी में जब प्रवेश करके जब प्रस्थान करेगी सब गांव वासी वहां पर इकट्ठा हो गए हैं हाथ जोड़ के मां को कह रहे हैं कि मां आप अवश्य वापस आना हम आपका इंतजार करेंगे हम बड़ी आतुरता से आप की राह देखेंगे वो मां भी करुणा पर्वश हो गई आंखों से आंसू आ रहे हैं मां कहती है कि नहीं नहीं मैं अवश्य वापस आऊंगी फिर ऐसा करके जब विदाय लेने की घड़ी आई झुक कर के गांव की मिट्टी को स्पर्श करके कहा जननी जन्मभूमि च स्वर्गा तप गरीयसी जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महत है गरिमामय है ऐसा करके गांव की मिट्टी को प्रणाम किया और वहां से निकले सर्वप्रथम गए कोवाल पाड़ा पाड़ा में विश्राम किया और फिर वहां से जा रहे हैं तो अभी यहां पर भी एक एक घटना सुंदर है पालखी में बैठ कर के जा रहे हैं वरदा महाराज साथ-साथ में चल रहे हैं और पालखी चलाने वाले जो बिहारा बांगला शब्द है बिहारा हिंदी में भूल गया अभी जो कि पालखी को वहन करते हैं पालखी वहन करने वाले तो अभी जो बिहारा जो था जो पालखी वहन करने वाले का सर उसका नाम था जोगे दूले तो जोगे दूले पास का ही गांव का था और मां का पक्का भक्त बिल्कुल महावीर की तरह तो अभी यह पालकी जंगल से जा रही है और पता नहीं यहां पर ऐसा डर था कि डाकू चोर वगैरह यहां पे आते हैं तो ऐसा भय था तो सब लोग जल्दी-जल्दी जा रहे हैं उसी समय मां ने पालकी में से वरदा को वरदा महाराज को कहा कि देखो इस पालकी में राधू वगैरा के गहने हैं तो तुम तुम लोग थोड़ा सावधान से चलना तो अभी वो बर्दा महाराज थोड़ा सा टेंशन में आ गए अरे तो गहने भी है और फिर ये जंगल में से जा रहे हैं डकेट आ जाएंगे तो क्या होगा तो जोगे दूले को बुला कर के कहा कि देखो मां के पास में गहने हैं और मां को दी भी मां के साथ में है तो थोड़ा सा सावधान से चलना तो ये जोगे दूले वो तो मां का भक्त वो कहता है कि अरे आप चिंता मत कीजिए हम लोग 16 लोग है पालखी वहन करने वाले और हम सभी की एक एक मजबूत लाठी इस पालखी के नीचे में सजा करके रखी हुई है जब तक हमारा प्राण हमारे शरीर में प्राण है किसका साहस है कि मां के सामने वो आंख उठा कर के भी देखे तो उसने ऐसा जोर से यह बात कही कि वर्धा महाराज थोड़े से आश्वस्त हुए अभी वो जा रहे हैं रास्ते से देखा एक जलाशय है जलाशय के पास में एक छोटी सी दुकान है अभी दुकान के पास में 32 लोग कुछ 32 30 32 लोग मजदूर जैसे लोग जैसे कि उनका पहर वेश वगैरह ऐसा लगता था कि मैंने ये लोग ती होंगे ऐसा उनका वो चेहरा देख कर के लगता था जैसे 32 लोग 30 32 लोग मिलकर के गप लगा रहे थे और वहां पर पास में जलाशय भी था अभी जैसे ही जलाशय के पास में आए तो माकू दी ने कहा कि अरे आप थोड़ा सा पालकी को खड़ा रखिए मुझे बड़ी ही प्यास लगी है मैं जलाशय में जाकर के पानी पिऊंगी तो मां ने भी ये सुन कर के कहा हां हां ठीक है चलो ना पालकी को रोको हम लोग मैं भी थोड़ा सा मेरे लिए मुड़ मुड़ा वगैरह कुछ लेके आओ दुकान में से मैं भी थोड़ा सा वो खाऊंगी और मैं भी पानी पिऊंगी थोड़ा सा मैं भी पैर वो पालकी में तो लंबा सफर करने से मां को तो आर्थराइटिस था तो थोड़ा सा वो पैर भी वो पैरों को भी विश्राम मिलेगा पालकी कोरो को थोड़े समय के लिए तो जैसे ही मां ने ऐसा कहा तो वरदा महाराज तो बड़े ही टेंशन में आ गए देख रहे है कि 30 22 लोग गुंडे जैसे बैठे हैं और वहां पे ही मां को पालकी रुकवा नहीं है तो वरदा महाराज वो बहाने बनाते हैं जैसे कि वो बच्ची छोटे बच्चे को मनाते हैं अरे मां क्या कहती हो जलाशय का पानी तो अच्छा नहीं लग रहा है ये जो दुकान है दुकान अच्छी नहीं लग रही रही है मुझे नहीं लगता यहां पे ऐसा कुछ मिलने वाला है ऐसा स्पष्ट नहीं कहते है कि ये जो लोग बैठे हुए हैं यहां पे उसका डर है वे लोग डकती करेंगे कुछ करेंगे तो क्या करेंगे हमसे डबल संख्या है भले चाहे पालखी वहन करने वाले 16 लोग हैं वे लोग तो हमसे डबल है संख्या में तो डर के मारे किंतु भीतर से डर रहे है किंतु मां ना डरे इसके लिए मुंह पे और ही बहाने बना रहे हैं तो मां कहती है अरे नहीं नहीं वो जलाशय का पानी अच्छा ही है चलो चलो जाओ तुम पालकी रोको माकू को पाली पानी पिलाओ मेरे लिए कुछ खाने को ले आओ मा ऐसा भार दे कर के कहती है तो यह लोग भी बेचारे क्या करेंगे पालकी रोकी गई वो जलाशय में वो माको को पानी पिलाने के लिए वर्धा मरा स्वयं ले गए वो वहां से कुछ खाने के लिए लाया गया मां को भी पैरों को थोड़ा सा विश्राम मिला यह सब कुछ हो रहा है किंतु वरदा महाराज का हृदय धकधक कर रहा है वो सोच रहे है कि अभी यहां पर कुछ हो गई दुर्घटना तो क्या होगा किंतु आखिर में कुछ हुआ नहीं और वही पालकी में बैठ कर के उन लोगों ने वहां से प्रस्थान किया तो देखिए कि जो जगदंबा स्वयं है जो पूरे जगत की रक्षा करने के लिए जगत का कल्याण करने के लिए जगत के भीतर में मनुष्य के भीतर में संदेह राक्षस है उसका वध करने के लिए जिन्होंने पृथ्वी पर जन्म धारण किया है शरीर धारण किया है उन्हीं की रक्षा करने के लिए वर्धा महाराज बड़े ही परेशान है यह तो ऐसा हो गया कि वो स्वामी जी वहां पर गए हैं खीर भवानी और मां का भग्न प्राय मंदिर देखकर के स्वामी जी बड़े स्वामी विवेकानंद बड़े ही दुखित होकर कहने लगे कि मां यदि मैं उस समय सद है वर्तमान रहता तो किसी का साहस नहीं था कि आपका मंदिर नष्ट करने की तो माने प्रकट होकर के स्वामी जी को क्या कहा अरे बेटा तुम्हारी रक्षा मैं करूंगी कि मेरी रक्षा तुम करोगे तो वैसा ही यहां पर जगत जननी जगदंबा स्वयं पृथ्वी पर आई है हमारा कल्याण करने के लिए तो वह हमारी रक्षा करेंगी कि हम उनकी रक्षा करेंगे किंतु फिर भी यह लीला एक ऐसा है कि यहां पर सब तरह की घटना होती है क्यों होती है जिससे कि यह सब घटनाओं को पढ़ कर के हमारे हृदय को सुकून मिले हमारे हृदय को शांति मिले तो ये यदि सब कुछ स्पष्ट होता कि मां जगत जननी स्वयं है हमको तो सिर्फ उनकी आराधना ही करनी है तो ना ही लीला होगी और ना ही ऐसे प्रसंग होंगे सुमिस मधुर प्रसंग जिसको पढ़ कर के श्रवण करके हमको आनंद मिलेगा तो इसलिए लीला में थोड़ा सा एक अज्ञान रहता है जिन लोगों ने लीला में हिस्सा लेना है तो वरदा महाराज को वैसे तो पता है कि किनके लिए उन्होंने घर छोड़ा है किनको उन्होंने अपना जीवन सर्वस्व समर्पण किया है किंतु फिर भी वह भीतर में है छुपा हुआ है वह ज्ञान ब्रह्म ज्ञान ठाकुर ने जैसे स्वामी जी को कहा स्वामी जी को निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने के बाद में काशीपुर में कि अभी यह चाबी लगा दी है चा ताले की चाबी मेरे पास में रहेगी ताला लगा कर के चाबी मेरे पास में रहेगी जिससे कि क्या होगा कि तुमको ठाकुर का मां का काम समाप्त करना है तो वैसे ही यह जब तक लीला समाप्त नहीं होगी तब तक ये जो हृदय में जो ज्ञान छुपा हुआ है कि मां का असली स्वरूप क्या है वह प्रकट नहीं होता जिससे कि लीला माधुर्य चलता र तो वह मां की आखिरी यात्रा फिर यह लोग कलकत्ता आए फिर मां का ट्रीटमेंट वगैरह हुआ किंतु हमको पता है कि 1920 में मां ने महा समाधि ग्रहण की फिर से कभी मां जयराम बाटी का जयराम बाटी कोवाल पाड़ा और कमार पुकुर कभी नहीं गए किंतु यहां पर भी एक बात है मां ने एक वचन दिया था एक बार था कि जगत धात्री पूजा के बारे में हम सबको पता है कि जयराम बाटी में मां की मां श्यामा सुंदरी देवी जगत धात्री पूजा का अनुष्ठान किया था और प्रति साल प्रत्येक साल बड़ा ही धाम धूम से बड़ा ही आयोजन पूर्वक उसका पालन होता था अभी कोवाल पाड़ा के लड़कों ने एक बार की जगत धात्री पूजा में ऐसा हुआ कि कोवाल पाड़ा के लड़कों ने इतना मेहनत किया इतना मेहनत किया जी झान लगा दी वो जगत धात्री पूजा को सफल करने के लिए किंतु मां के कुछ कुछ भक्त ऐसे थे कि वो मने एक बुद्धि होती है ना तो उन्होंने कहा कि क्वाल पाड़ा के लड़के हैं वो लोग मूर्ख है अनपढ़ है वे लोग क्या मां की सेवा करेंगे अभी इस बार जब मां कलकाता से जयराम बाटी आएगी तो उनको दूसरे रास्ते से लेकर आएंगे उनको क्वाल पाड़ा से नहीं लाएंगे ऐसा कुछ ये लोग बोल रहे हैं तो यह बात अभी ये लड़कों ने सुन ली तो वो लोग बड़े ही दुखित हो गए सोचा कि मां के लिए इतना जे जान मेहनत किया और आखिर में हमको गाली मिल रही है तो ठीक है चलो जब तक उत्सव चलता रहा तब तक तो ये लोग मेहनत करते रहे किंतु जैसा ही उत्सव समाप्त हो गया कुछ दिन जिस दिन उत्सव था जिस दिन पूजा स्वयं थी उस दिन कोई भी क्वाल पाड़ा से वहां पर नहीं गया भीतर में बड़ी नाराजगी थी कार्य पूरा समाप्त कर लिया बैकग्राउंड में जो करना था सब कर लिया उत्सव के दिन नहीं गए अभी जिस दिन उत्सव के दिन मां बार-बार पूछ रही है कि अरे कोवाल पाड़ा से क्यों नहीं आया ये लड़के लोग कहां गए तो फिर उसके उत्सव समाप्त होने के दूसरे दिन मां का कार्य तो चलता ही रहेगा ये वरदा महाराज जब वहां पे गए वरदा महाराज एक दो साधु वहां से त्यागी संतान मां ने पूछा अरे कल तो पूजा थी तुम लोग पूजा में क्यों नहीं आए इतना मेहनत करके काम पूरा किया पूजा में क्यों नहीं आए तो अभी ये लोग लड़के लोग तो क्या बोलेंगे नलिनी दीदी ने बोल दिया कि अरे वो जो डिवटी थे वो लोग कह रहे हैं कि क्वाल पाड़ा के लड़के ठीक से काम नहीं कर रहे वगैरा वगैरा और इस बार जब आप कोलकाता से जयराम बाटी आएगी आपको क्वाल पाड़ा से नहीं दूसरे रास्ते से लेके आएंगे तो यह बात सुन कर के ही मा का वो एक क्रोधित हो गई बड़े ही क्रोध पूर्वक कहा कि वे लोग कौन होते हैं ये कहने वाले कि मैं कहां से किस रास्ते से आऊंगी किस रास्ते से जाऊंगी किसकी सेवा ग्रहण करूंगी किसकी नहीं करूंगी क्वाल पाड़ा से मुझे चीर काल आना पड़ेगा और जाना पड़ेगा यह बात माने कही और अभी मां का देह नहीं है किंतु हम लोग बड़े ही विश्वास पूर्वक कह सकते हैं कि जब भी मां क्वाल पाड़ा से कलकत्ता आएगी जाएगी वो जयराम बाटी से कलकत्ता आएगी जाएगी क्वाल पाड़ा में ही विश्राम करेगी और वहां के भक्तों की आरती भक्तों की प्रार्थना स्वीकार करे एक बहुत ही सुंदर घटना है शिवुदा ठाकुर के भतीजे वह एक बार मां के साथ में वो कहीं पर गए थे तो वापस आ रहे हैं जयराम बाटी अभी रास्ता तो जयराम बाटी का तो पता ही है खुले खेत है जंगल है नदी है वहां से पसार होना है और अंधेरा भी हो रहा है तो एकाएक रास्ते में शिवुदा खड़े हो गए और मां को कहा कि मां तुम तो वो काली ही हो ना तो मैं तो तुमको काली समझ के ही आपकी तो मैं आपको मानता हूं तो मां ने कहा कि हां हां चलो चलो यह सब बातें अभी यहां रास्ते में अभी अंधेरा हो रहा है चलो चलो हम आगे चलते बाद में करेंगे तो अभी शिवुदा एका एक वो वहां से जाएंगे ही नहीं हिलंग ही नहीं कहे कि पहले तुम अपने मुंह से स्वीकार करो कि तुम काली हो तभी मैं यहां से जाऊंगा तभी मैं यहां से चलूंगा अभी मां भी बड़ी परेशान हो गई है मां कह रही कि अरे अंधेरा हो रहा है देखिए वही बात वो पता है कि व जगत जननी है किंतु अंधेरे से डरती है व कुछ हो ना जाए रास्ते में तो मां कहती है जितना ही मां कहती है कि चलो शिबू घर चलते हैं बाद में सब बात करते हैं और मां इजली तो स्वयं मुंह से स्वीकार नहीं करेगी ना ये तो मां के मुंह से स्वीकार करवाना बड़ा ही मुश्किल है तो जितना ही मां कहती है इतना ही शिवुदा अड़क हो कर के बैठे हैं कि नहीं नहीं मैं तब तक नहीं जाऊंगा तब तक अपने मुंह से तुम स्वीकार नहीं करोगी तो आखिर में मां ने कहा कि हां मैं वही हूं ऐसा जैसे ही माने स्वीकार किया तब शि बुद्ध मां के साथ में चलने लगे और घर वापस आए तो ऐसी घटना है की अपने मुसे स्वीकार करना देखिए कि कितनी बड़ी बात है ठाकुर ने अपने जीवन के आखिरी समय में कहा कि जो राम जो कृष्णा वही राम कृष्णा तो मां ने यह कहा कि हां मैं ही वो हूं जिसके बारे में तुम कह रहे हो वो कितना बड़ा एक कितनी बड़ी घटना है और दूसरा कि एक हां एक दूसरी भी एक घटना है क्वाल पाड़ा की है क्वाल पाड़ा में एक बार क्या हुआ कि मां बहुत ही बीमार थी और धूप भी उस दिनों में बड़ी थी तो वैसे ही मां बड़ी परेशान थी कि धूप है और बीमारी है क्या करेंगे वैसे ही मां बिस्तर पर लेटी हुई है और उस थोड़ा सा खड़ी होकर के मां ने कुछ अभी मां तो बिना काम के तो रहेगी नहीं तो सोचा कुछ सिलाई वगैरह करती है तो सोय है सोय के भीतर में धागा जो कोरोना होता है तो ऐसा कुछ कर रही थी एका एक मां ने देखा कि ठाकुर वहां पे आकर के वो बरामदे में बैठ गए हैं और बैठ कर के कहते हैं बड़ी धूप लग रही है तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा तो मां अपने आंचल से ठाकुर को हवा करने लगी और अभी यह तो पूरा भाव में हो रहा है समाधि में हो रहा है मां समाधि में चली गई है और यहां पे हल्लागुल्ला मच गया है अरे मां को समाधि हो गई मां को समाधि हो गई क्या करें क्या करें तो मां जब समाधि में से वापस आई तो मां ने सोचा कि अभी मैं यह कहूंगी कि ठाकुर का दर्शन हुआ ये लोग बिना मतलब हल्ला करेंगे तो मां ने कहा अरे नहीं नहीं कुछ नहीं हुआ है ये सुई में भागा पोने गई थी उसी में मेरा सर घूम गया और मुझे ऐसा कुछ मैं बेहोश हो गई ऐसा माने कहा किंतु अपने जीवन के आखिरी समय में वरदा महाराज को कोलकाता में मां कहती है कि उस दिन वही मुझे ठाकुर का दर्शन हुआ था तो और एक तीसरी भी एक घटना है वो हरीश की वो ठाकुर का डिवोटा था और कामर कुकुर गया था और उसके सर के ऊपर में पता नहीं किस तरह का पागलपन सवार हो गया था एका एक मां के पीछे में दौड़ने लगा तो मां भी वो दौड़ने लगी किंतु कितना अपने को बचाएगी कितना दौड़ पाएगी मां तो आखिर में मां ने एकदम अपना बगला स्वरूप वो धारण करके उसको हरीश को धक्का मार के जमीन पर गिराया उसके छाती पर अपना पैर रखा और उसकी झप खींच कर के उसको जोर से चापट मारना शुरू किया और इतना मारा उसको कि उसका पूरा दिमाग ठा हो गया तो वो जो बगला स्वरूप मां का तो वो हमको दिखाई दिया और बचपन की एक घटना है कि मां जब जगत धात्री के सामने बैठी है जगत धात्री पूजा थी मां छोटी बच्ची ही थी मां के सामने बैठी है मां ध्यान कर रही है और बगल वाले गांव से एक व्यक्ति ने आकर के देखा कि कौन जगत धात्री है मूर्ति में जगत धात्री है कि मां के भीतर में है तो अपना स्वरूप इस तरह से मां ने प्रकट किया है वहां पे देखिए एक शरणागति आध्यात्मिक जीवन का एक बहुत ही बड़ा गुण है ये भगवान के साथ में दुकानदारी क्यों करनी की भाई मैं आपको इतनी पूजा करूंगा इतना मंदिर में जाऊंगा सामने में आप मुझे बदले में इतना कुछ दे दीजिए और जैसे कि वो बाजार में जाते हैं 50 का एक किलो आलू ना कि जो भी मार्केट रेट हो अभी तो 50 दिया एक किलो आलू खरीद लिया ऐसा वो भाव तोल थोड़ी ना ठाकुर के साथ में करना है ठाकुर को जाकर के उनके सामने शरणागत हो जाना है कि ठाकुर मैंने ये जीवन सर्वस्व आपके श्री चरणों में मैंने अर्पित कर दिया अभी आपको जो करना है करो वो आप मुझे रखो ना कि मारो ना कि मेरी समस्याएं बढ़ा दो कि समस्याएं कम कर दो वो सब आपके हाथ में है मेरे हाथ में जो है वो शरणा वो मैंने आपको मैंने प्रदान की है तो यह सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है और मैं तो कहता हूं समस्या का विवरण भी क्या ठाकुर को नहीं दिखता है क्या ठाकुर को सब कुछ दिखता है दिखता सब कुछ है उनको जो करना है वो करेंगे हमको सिर्फ शरणागति जैसे कि वो ठाकुर जब काशीपुर में थे तब वो जो घटना हुई थी ना कुछ भक्तों ने जाकर के दक्षिणेश्वर में ठाकुर के ठाकुर को मिलने के लिए गए थे ठाकुर का दर्शन करने के लिए देखा कि ठाकुर वहां पर नहीं है कैंसर की वजह से ट्रीटमेंट के लिए कलकाता लाया गया है तो उन्होंने क्या किया कि ठाकुर के फोटो के सामने उन्होंने कुछ चीजें अर्पित करके उसको भोग दे कर के उसका प्रसाद बना कर के घर ले गए अभी यह बात कलकाता में जब मां को पता चली मां और ठाकुर दोनों थे वहां पे तो मां को जैसे ही पता चली मां बेचारी बड़ी ही थोड़ी सी ये परेशान हो गई यह सोच कर के कि जीवित व्यक्ति के फोटो की पूजा करना फोटो को भोग लगाना माने पूजा करना ही हो गया एक तरह से तो जीवित व्यक्ति के फोटो की पूजा करना यह तो अशुभ है अशुभ कहा जाता है तो ठाकुर वैसे ही बेचारे को कैंसर हो गया ऊपर से लोगों ने उनके फोटो की पूजा करना शुरू कर दी तो या कुछ उसमें कुछ अशुभ तो नहीं होगा हानि तो नहीं होगी तो उस दिन रात को मां जब ठाकुर के पास में बैठी हुई थी तब ठाकुर ने मां को क्या कहा था कि देखना कि एक ऐसा समय आएगा जबक घर घर इस फोटो की पूजा होगी अभी वही मां वही मां अपने हाथों से अपने फोटो को स्थापित कर ती है अी इन दोनों के बीच में कहां पर मिल हमको दिखेगा कि वहां पर ठाकुर जीवित होकर के ठाकुर की फोटो की पूजा की मां बेचारी बड़ी ये हो गई कि अभी क्या होगा आशंकित हो गई यहां पे अपने ही हाथों से अपने फोटो को स्थापित करती है तो अभी इसका कोई व्याख्या करना बड़ा ही मुश्किल है इसके पीछे में मुझे तो ऐसा ही लगता है कि एक समय आ गया था जबकि अपनी प्रतिभा अपनी दिव्यता को प्रकट करने का वो अपने को छुपा करके रखने का समय चला गया है अभी जगत के सामने यह आध्यात्मिक प्रवाह जो कि ठाकुर ने बहाया है उसको अभी प्रकट करना है तो प्रकट करने के लिए अभी अशुभ विशु वो सब अभी भूल जाना है जगदंबा को वो सब चीजें कभी नहीं लगती वो अवतार को भी नहीं लगेगी जगदंबा को भी नहीं लगेगी जब तक अपने को छुपा के रखना है तभी तक ये सब बहाने हैं कि अपने जीवित होकर के फोटो की पूजा नहीं करनी जैसे ही समय आ जाता है सब विधि विधान नियम कानून के परे जाकर के ये लोग कार्य करते हैं