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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः यहां पर काली पूजा थी और काली पूजा बहुत ही अच्छे से समाप्त हुई बहुत सारे डिवोटा आए थे राजकोट का मंदिर आपको पता होगा शायद बहुत बड़ा है तो पूरा मंदिर भर गया था और साधु ब्रह्मचार्य के साथ में वो भजन कीर्तन पूरी रात भर चला पूजा भी बहुत अच्छे से हुई तो वह एक राजकोट का एक बड़ा सा एक त्यौहार है यह काली पूजा मैं जनरली अभी मंदिर में नहीं जाता मैं अपने रूम में ही रहता हूं मेरा रूम मंदिर के पास में ही है तो जो भजन वगैरह होते हैं इतना सुंदर सुनाई देता है तो अंधेरा होता है चारों ओर और रूम में में लाइट बंद करके खिड़की के पास एक कुर्सी है उसमें मैं बैठा रहता हूं तो मुझे वही अच्छा लगता है मुझे पता नहीं कि यह इवोल्यूशन है ना कि डिवोशन है एक्चुअली होना ऐसा चाहिए कि जैसे जैसे समय बीतता है सन्यास जीवन में आपको यह जितने भी हमारे उत्सव वगैरह है उसका जो आनंद है वह भीतर में से स्वयं प्रकट होना चाहिए तो उसके लिए मंदिर में जाने की जरूरत है कि नहीं या तो फिर अपने रूम में ही बैठ कर के होगा यह सब सभी साधुओं का अपना एक निज स्व मत है बहुत कम साधु इस तरह से रूम में बैठते हैं किंतु जो भी है मुझे लग रहा है कि मेरे लिए यही उचित है तो एनीवे हम लोग जो पाठ कर रहे थे वैसे इस बार यह सप्ताह ज्ञान योग का है किंतु मैंने सोचा कि उत्सव में बहुत दिन हमने यह हेवी सब खाया है और आज तो क्या था कि संडे को पूरी रात जगे भी थे काली पूजा के दिन तो मेरा ऐसा होता है कि ऐसे इतने सारे साधु आए हैं किंतु फिर भी मैं अकेला अकेला बहुत ज्यादा समय रहता हूं तो ऐसा एक कभी-कभी मुझे डर लगता है कि मैं बात करना भूल ना जाऊं तो यह सुबह का जो क्लास है क्लास में बोल कर के वह फिर से मुझे वो हैबिट हो जाता है फिर से कि चलो फिर बात करें मेरा काम भी इस तरह का है पब्लिकेशन में क्या होता है ऐसे कोई लोगों का आना जाना तो होता नहीं है जय मां जय राम कृष्ण तो क्या होता है कि हम लोग अकेले बैठ कर के काम करते रहते हैं तोय सुबह का क्लास एक ऐसा है कि मैं कुछ मैंने किसी के साथ में इंटरेक्शन होता है या तो फिर मैं कुछ बोलता हूं अदर वाइज तो क्या होगा मैं सिर्फ किताब पकड़ कर के पढ़ता रहूंगा या तो कुछ ना कुछ लिखता रहूंगा या तो कुछ ना कुछ काम करता रहूंगा तो मैंने सोचा कि आज क्लास करना है कि नहीं करना क्योंकि एक थोड़ा सा एक यह भी था थकावट जैसा भी था और रात को जगह थे वो अभी नींद वो ठीक से हुआ नहीं है वह नींद का साइकल पूरी रात जगने के बाद में कि मैंने सोचा स्मृति कथा लेते हैं लाइट कुछ लेते हैं हेवी कुछ लेने से फिर वह सोचना पड़ेगा स्वामी जी का ज्ञान योग नहीं मा की वो अवता राण का वो इतना हेवी फिलोसॉफिकल है कुछ लाइट लेते हैं जिससे कि वो बोलने में भी सुविधा रहे और आप लोगों को सुनने में भी बड़ा ही आसान रहे और यह मेरी बात करने की प्रैक्टिस चालू रहे वरना तो फिर मैं सुबह का क्लास ये तीन-चार दिनों से नहीं ले रहा था तो मैं वैसे ही रूम में बैठा रहता था किसी के साथ बिना बात कीए तो एटलीस्ट मुझे यह बोलने का हैबिट फिर से आ जाएगा तो जो स्मृति कथा थोड़ा सा हम आज देखेंगे स्वामी विशुद्धानंद जी महाराज ने स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज के साथ में जो समय उनका व्यतीत हुआ उनकी आश्रय में उनके उनके स्नेह के उनके आश्रय में उसके बारे में यह स्मृति कथा है विशुद्धानंद जी महाराज यानी कि जितेंद्र महाराज इनके बारे में हमको पता है कि रामकृष्ण संघ के आठवें परमा थे आठवें परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज थे मां के शिष्य थे अब जब जवाइन करने को वो आए तो और बाद में जब साधु सन्यासी होने के बाद में सन्यास प्राप्त होने के बाद में रांची में भी थे मायावती में भी थे और फिर वाइस प्रेसिडेंट और प्रेसिडेंट भी हुए किंतु जॉइन करने के लिए गए थे चेन्नई तो चेन्नई के यह कुछ दिन है कि राजा महाराज वहां पर जाते हैं और राजा महाराज के साथ में उन्होंने जो वह साउथ इंडिया में दक्षिण भारत में जो समय बिताया उसके यह कुछ सुंदर कुछ स्मृति कणिका आए हैं विशुद्धानंद जी महाराज कहते हैं कि जब सर्वप्रथम ब्रह्मानंद जी महाराज यानी कि राजा महाराज ठाकुर के मानस पुत्र और रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट वह जब दक्षिण भारत में आए तो शशि महाराज प्रतिदिन चेन्नई मठ में रह रहे हैं शशि महाराज प्रतिदिन राजा महाराज को साष्टांग प्रणाम करते थे और राजा महाराज भी बिना किसी द्विधा के शशि महाराज के प्रणाम ग्रहण करते थे ये सुनकर के प्रश्न होगा कि अरे यह दोनों तो गुरु भाई है ठाकुर के साथ में साथ-साथ में ही जाते थे उनका सन्यास भी तो एक ही साथ में हुआ है वराह नगर मठ में विरजा होम करके स्वामी जी के साथ में सभी ने एक साथ में सन्यास ग्रहण किया है इन लोगों में सीनियर जूनियर जैसा तो कुछ है नहीं तो फिर शशि महाराज राजा महाराज को प्रणाम क्यों करते हैं किंतु देखिए कि सर्वप्रथम तो है कि शशि महाराज की अपनी जो निष्ठा है जिनको कि ठाकुर ने खुद ने अपने मानस पुत्र के रूप में चिन्हित किया है उनके प्रति शशि महाराज की जो निष्ठा उसकी वजह से वह ऐसा करते थे अदर वाइज देखिए कि वरा नगर मठ का जो हम ओरिजिनल जो कुछ कुछ डिस्क्रिप्शन पढ़ते हैं हमको लगता है कि शशि महाराज वो मठ के करता थे करता न कि मां मठ की मां कहो ना कि मठ के व जो कार्य वधान जो होते हैं मैनेजमेंट एडमिनिस्ट्रेशन होता है वह जनरली शशि महाराज के कंधों पर रहता था क्योंकि बाकी सब गुरु भाई साधन भजन करने में ही इतने मशगूल रहते थे इतने ही व्यस्त रहते थे कि फिर वह ठाकुर के लिए भोग लगाना है ठाकुर के लिए जो सब्जी तरकारी वगैरह गुरु भाइयों के लिए खाना करने खाना बनाने के लिए जो सब परचेस करना है जो थोड़ा बहुत पैसा अकाउंट का मैनेजमेंट करना पड़ेगा यह गुरु भाई लोग कहां कुछ करने वाले हैं शशि महाराज ही यह सब तत्वावधान करते थे शशि महाराज ही यह सब मैनेजमेंट करते थे तो अभी शशि महाराज का वह जो रोल था कि एक महंत की तरह थे और यहां दक्षिण भारत में अब उस समय राजा महाराज भी वहां पर थे तो राजा महाराज भी जनरली शशि महाराज के ऊपर में ही यह सब चीजों के लिए डिपेंडेंट रहते थे तो वहां से लेकर के अभी तक का शशि महाराज चेन्नई में आए वराह नगर मठ से लेकर के चेन्नई मठ तक की जो शशि महाराज की जो स्पिरिचुअल इवोल्यूशन है वह भी हमको यहां पर समझ में आता है कि शशि महाराज एक एक इंसिडेंट है ना कि एक बार किसी ने यह लिखा है कि शशि महाराज गए थे कहां पर प्रवचन देने के लिए और वापस आ रहे हैं सर के ऊपर में पगड़ी बंदी है और गले में माला है और सभी लोग उनके साथ में जो संगी थे वो लोग जय श्री राम कृष्ण जय श्री राम कृष्ण के ना नारे लगा रहे थे तो इस तरह से इतना सम्मानित होकर के शशि महाराज मठ में लौटे चेन्नई मठ में वहां पर स्वामी विवेकानंद का एक बड़ा सा फोटो था तो शशि महाराज स्वामी राम कृष्णानंद जी महाराज उस फोटो के सामने दो हाथ जोड़ करके खड़े रहे और स्वामी जी को बड़े ही कातर पूर्वक बड़े ही विनय नम्रता पूर्वक श्रद्धा भक्ति से कहा देखो भाई यह जो सफलता है उसका घमंड कहीं मेरे सिर पर ना उठ जाए इसका ध्यान रखना तो देखिए कि शशि महाराज की विनम्रता और ठाकुर के ठाकुर ने जिनको उनके नेता के रूप में स्थापित किया था स्वामी जी जो गुरु भाइयों के नेता थे और अपने मानस पुत्र के रूप में जिनको चेनिन किया था राजा महाराज या तो स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज इन दोनों के प्रति इनकी निष्ठा कितनी थी यह हमको इस बात से पता चलती है तो जो भी है राजा महाराज चेन्नई आए शशि महाराज प्रति दिन उनको साष्टांग प्रणाम करते थे किंतु अभी ऐसा नहीं है कि वह राजा महाराज जो कुछ कहेंगे शशि महाराज वैसे ही स्वीकार भी कर लेंगे बीच-बीच में थोड़ा बहुत आर्गुमेंट होता भी था किंतु ज्यादातर बातों में शशि महाराज की राजा महाराज के ऊपर जो श्रद्धा भक्ति थी वह कितनी गहन थी उसके कुछ कुछ उदाहरण विशुद्धानंद जी महाराज जितेंद्र महाराज हमको देते हैं एक उदाहरण में वह कहते हैं कि उस समय चेन्नई मठ का जो अकाउंटिंग पैसों की लेनदेन यह सब विशुद्धानंद जी महाराज के जिम्मे में थी तो विशुद्धानंद जी महाराज कैश रखा करते थे बैंक वगैरह में जो रुपए होंगे थोड़े बहुत तो उसका भी वह जिम्मा इनके पास में था और शशि महाराज को जो भी खर्चा करना था तो विशुद्धानंद जी महाराज के पास से रुपया ले लेते थे एक दिन ऐसा हुआ कि राजा महाराज वहां पर बैठे हैं और शशि महाराज ने जितेंद्र महाराज से पैसा चाहा तो जितेंद्र महाराज ने अपने केश में से जो ब है कैश का उसमें से पैसा निकाल कर के महाराज को दे दिया तो यह देख कर के राजा महाराज जितेंद्र महाराज को कहते हैं कि अरे देखो तुम शशि महाराज को जो पैसा देते हो उसका कोई तुम रिसिप्ट रखते हो कि नहीं कि इस तरह से मैंने आपको इतना रुपया दिया एडवांस उसका उसके सामने यह रिसिप्ट है शशि महाराज ने पैसा ग्रहण किया तो रिसिप्ट के ऊपर में साइन करेंगे जैसे रामकृष्ण मिशन में अभी होता है हमको कोई भी काम के लिए पैसा चाहिए तो हम एड ले लेते हैं अकाउंट सेक्शन में जाकर के वह अकाउंटेंट महाराज हमारे पास में एक वाउचर पर साइन करवाएंगे कि हां मैंने इतना 000 000 00 एडवांस लिया जैसे पब्लिकेशन में होता है हमारी किताबें अहमदाबाद में छपती है और अहमदाबाद से छप जाने के बाद में बड़ी ट्रक में राजकोट आती है अभी राजकोट का ऐसा है वो जो की नियम कि दिन के दौरान शहर के भीतर में बड़ी ट्रकों को आने की मनाई है यानी वह सुबह को 9:00 बजे से रात को 9:00 बजे तक नहीं ऐसा कोई एक टाइम रखा है तो ट्रक जब आएगी तो अर्ली वो पूरी रात भर ट्रक चलाएगा और अर्ली मॉर्निंग आश्रम में आ जाएगी ट्रक 6:00 बजे का टाइम होगा 5:00 बजे का टाइम होगा उस समय ट्रक आएगी सभी किताबों को अपने गोडाउन में निकाल लेना है फिर वह जो ट्रक वाला जो है उसको हमको वो जो देना होता है ना कि 89000 ना कि ऐसा कुछ वो हमको देना पड़ता है तो तो उस समय हम क्या करते हैं कि जबी पता है कि अहमदाबाद से गाड़ी में व किताबें आ रही है पहले से ही अकाउंट सेक्शन में जाकर के 10000 ना कि इतना कुछ रख लेते हैं एडवांस वो अकाउंटेंट महाराज वाउचर पर साइन करवाएंगे और कहेंगे कि ये लो 10000 तुमको एडवांस दिया फिर ट्रक आएगी ट्रक वाला हमको पक्का बिल देगा तो वो पक्का बिल देकर के जब अकाउंट में जमा करवाएंगे तो सामने वो जो हमने एडवांस लिया था एडवांस वाउचर वो कैंसिल हो जाएगा ये बिल के अगेंस्ट में और जो एक्स्ट्रा मनी होगा वह वापस देक के वह वाउचर कैंसल हो जाएगा तो यह सबको जो भी फाइनेंशियल कैश ट्रांजैक्शन होता है बिना साइन के एक भी कैश ट्रांजैक्शन नहीं होना है यह बात स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों के मन में एकदम पक्का डाल दी थी तो राजा महाराज को तो पता है हमने व एक दो बार डिस्कस भी किया था कि अकाउंट को लेकर के राजा महाराज को स्वामी जी ने जो डांट सुनाई थी बाप रे राजा महाराज ने कमरे में चले गए और जाकर के रो रहे हैं उस समय विज्ञानानंद जी महाराज थे वहां पर बात ऐसा था कि बेलूर मठ में वो जो घाट बनाना है पोस्ता बांगला ते बोले तो घाट बनाने के लिए विज्ञान महाराज को कहा गया विज्ञान महाराज ने कुछ एस्टीमेट दिया और राजा महाराज ने का जिम्मा था राजा महाराज का क्योंकि उस समय स्वामी जी के अंडर में राजा महाराज मठ का पूरा काम बैलून मटका देख रहे थे अभी कुछ दिनों के बाद पता चला विज्ञान महाराज को कि जो एस्टीमेट दिया है उससे कहीं ज्यादा खर्चा ज्यादा हो जाएगा तो डरते डरते राजा महाराज को कहा कि अरे हमने तो स्वामी जी को जो एस्टीमेट दिया है उससे तो एक्चुअल एक्सपेंस एस्टीमेट से ज्यादा है तो यह बात सुनकर के राजा महाराज ने कहा ठीक है स्वामी जी नाराज होंगे तो वो नाराजगी में अपने सर पे ले लूंगा डजन मैटर तुमको चिंता करने की जरूरत नहीं है तो अभी कुछ दिनों के बाद में स्वामी जी अकाउंट रिव्यू कर रहे थे देखा कि जो एस्टीमेट से ज्यादा खर्चा हो रहा है राजा महाराज को बुलाया कि अरे भाई तुमने जो इतना एस्टीमेट दिया था उसके सामने खर्चा घाट बनाने का खर्चा इतना ज्यादा क्यों हो रहा है तो राजा महाराज बेचारे बड़े ही डरते डरते कहे कि एस्टीमेट बनाने में जो गलती हमारी थोड़ी हो गई थी वो एक्चुअल एक्सपेंस उससे ज्यादा होने वाला उन्होंने ऐसा नहीं कहा राजा महाराज ने कि विज्ञान महाराज की ये गलती थी गलती अपने सर पे ले ली जैसे ही ये गलती उन्होंने स्वीकार की स्वामी जी ने राजा महाराज को जो डांटना शुरू किया है वो भयानक डांट ऐसी डांट कि बाप रे बाप राजा महाराज चुपचाप सब कुछ सुन लिए और कुछ समय के बाद में अपने कमरे में चले गए यहां पर स्वामी जी थोड़ी देर के बाद में सडली उनके मन में हुआ कि अरे ये मैंने क्या कर दिया ठाकुर के मानस पुत्र उनके इतने प्रिय गुरु भ्राता उनको मैंने इस छोटी सी पैसों के लिए इतना डांटा यह तो उचित नहीं हुआ बड़े ही अधीर होकर के विज्ञान महाराज को बुलाया पैशन पैशन देखो राजा क्या कर रहा है उनका जो नाम था हरि प्रसन्न महाराज तो विज्ञानानंद जी महाराज का तो स्वामी जी उनको पैसन करके बुलाते थे तो बो देखो देखो क्या कर रहे हैं राजा महाराज राजा क्या कर रहा है जा कर के देखो तो एक्चुअली राजा महाराज का राजा नाम भी स्वामी जी ने दिया था जिस दिन ठाकुर ने कहा कि राखल एक राज्य चला सकता है तो उसी दिन स्वामी जी ने क्या कहा आज से हम राखल को राजा कहेंगे तो जो राज्य चला सकता है वो एक पो एक घाट बनाने में छोटा सा गलती क्या कर दिया एस्टीमेट का मैंने इतना डांट दिया और हमको पता है जो लोग कंस्ट्रक्शन का काम करते एस्टीमेट में गलती फलती तो होती रहती है तो स्वामी जी बड़े ही अधीर होकर के विज्ञान महाराज को बोले जाओ जा करर के देखो राजा क्या कर रहा है तो विज्ञान महाराज ने जाकर के देखा पहली बार तो दरवाजा खटखटाया कोई उत्तर नहीं मिला स्वामी जी के पास वापस आए स्वामी जी ने डांट कर के कहा अरे मैंने तुमको कहा कि खबर लेकर आओ ऐसा बिना मतलब क्यों वापस आए कि वो दरवाजा नहीं खोल रहा है जाओ दरवाजा खुलवा हो खबर लो जाकर के फिर से दरवाजा खटका हया राजा महाराज ने दरवाजा खोला वो बेड में अपने बिस्तर में लेटे लेटे रो रहे थे यहां पर स्वामी जी पीछे पीछे आ गए और कमरे में आकर के देखा कि राजा महाराज की आंखों में आंसू है तो ऐसे देख कर के स्वामी जी ने राजा महाराज को ऐसा अपने दोनों हाथों में उनको आलिंगन किया और इतना जोर-जोर से रोना शुरू किया स्वामी जी खुद रो रहे हैं अनुमान करके देखिए पूरे विश्व के ऊपर में विजय प्राप्त करने वाले अमेरिका जाकर के पादरी पादरियों को ठंडा कर देने वाले मिशनरियों के साथ में उनके घर में जाकर के झगड़ा करने वाले स्वामी जी यहां पर राजा महाराज को आलिंगन बद्ध करके उनके कंधे पर सर रख कर के बच्चे की तरह रो रो रहे हैं तो रो ही रहे हैं अरे राजा महाराज खुद डर गए कि स्वामी जी का स्वामी जी का हेल्थ भी उस समय बहुत ही बुरा था और स्वामी जी का जो गुरु भ्राता के प्रति प्रेम जो है अभी उनको मन में ऐसा हो गया कि अरे मेरी वजह से बिना मतलब राजा को कष्ट हुआ है और यदि शरीर त्याग ना कर दे कहीं सोच और इसकी वजह से गिल्ट की वजह से तो फिर राजा महाराज उल्टा राजा महाराज को स्वामी जी को शांत रखना पड़ा तो यह अपने ऑर्डर में था कि जब पैसों का ट्रांजैक्शन करते हैं तो एकदम परफेक्ट होना चाहिए आइडियल है परफेक्ट हो जितना हो सकता है अपने से तो यहां पर राजा महाराज ने देखा कि जितेंद्र महाराज केश रख रहे हैं चेन्नई मठ में शशि महाराज जब भी आते हैं एडवांस में रुपया लेकर जाते हैं तो राजा महाराज ने जितेंद्र महाराज को कहा कि देखो तो जब भी शशि महाराज पैसा लेते हैं तुम उसको उनके पास में रिसिप प साइन करवा लो तो यहां पे तो जितेंद्र महाराज बड़े ही टेंशन में आ गए शशि महाराज गुरु भाई राजा महाराज के ठाकुर के त्यागी संतान और वो इतने सीनियर और जितेंद्र महाराज इतने जूनियर अभी तो जॉइन करने के लिए आए हैं शशि महाराज के पास में किस मुंह से रिसिप्ट मांगे तो जब उन्होंने ऐसी आशंका प्रकट की राजा महाराज ने कहा अच्छा ठीक है कोई टेंशन मत लो मेरा नाम करके बोलना राजा महाराज ने बोला है कि आपको रिसीप्ट देनी पड़ेगी पैसों के अगेंस्ट में तो जितेंद्र महाराज ने बड़े ही डरते डरते जब नेक्स्ट टाइम शशि महाराज आए रुपया लेने के लिए तो जितेंद्र महाराज ने कहा कि राजा महाराज ने कहा है कि आपको पैसों के अगेंस्ट में रिसीप्ट साइन करनी पड़ेगी तो शशि महाराज ने ये सुनकर के अच्छा अच्छा राजा ने बोला है अच्छा ठीक है इमीडिएट रिसीप्ट साइन कर दी तो यहां पे जितेंद्र महाराज को बड़ा ही सदरा हुआ अभी इस घटना के कुछ समय के बाद में जितेंद्र महाराज का पोस्टिंग हुआ बेंगलोर में तो जितेंद्र महाराज ने शशि महाराज को कहा कि देखिए अभी तक मैं कैश देख रहा था तो अभी कैश का जिम्मा पूरा आप ले लीजिए अकाउंट का और मुझे छोड़ दीजिए ऐसा जो रिस्पांसिबिलिटी का जो हैंड ओवर होता है यह बड़ा ही सिस्टमिक होता है अपने ऑर्डर में मेरा जो भी रिस्पांस पब्लिकेशन में मेरी जगह कोई भी आएगा तो मुझे सब कुछ उसको समझा देना है कि कौन सी किताब का ट्रांसलेशन हो रहा कौन सी किताब प्रिंट में जा रही है मैगजीन के लिए कितने आर्टिकल रेडी है सब कुछ मुझे समझा करके चार्ज हैंड ओवर करके फिर यहां से निकलना है तो वैसे ही जितेंद्र महाराज ने कहा कि अकाउंट का जिम्मा ले लीजिए और मुझे छोड़ दीजिए अब शशि महाराज ने जब अकाउंट देखना शुरू किया तो शशि महाराज के नाम के अगेंस्ट में जो उन्होंने जो एडवांस लिए हैं उसकी जो रकम है वह देख कर के शशि महाराज कहते हैं अरे मैंने इतना सारा एडवांस कब लिया है मैंने इतना सारा पैसा तुमसे कब लिया है मैंने तो मुझे नहीं लगता कि मैंने तुमसे इतना पैसा लिया है तो यहां पर जितेंद्र महाराज ने फौरन जो सब रिसीप्ट थी शशि महाराज ने स्वयं साइन की थी वो सब उनके सामने रख दी और रिसीप्ट का टोटल और अकाउंट में शशि महाराज के नाम नाम के सामने जो कैश था वो टेली हो जाता है तो अच्छा तो शशि महाराज ने कहा अच्छा अच्छा वो ये बात है ठीक है तो अब शशि महाराज तो उस समय मान गए यहां पर जितेंद्र महाराज का जो हृदय के धपरे जो बढ़ गए थे कि शशि महाराज बोल रहे हैं कि मैंने इतना ऐसा कहां पर लिया तो अभी तो यह तो इंप्लीकेशन हो जाता है ना अकाउंट में गड़बड़ हुई है और गड़बड़ का जिम्मा तो जितन महाराज का है किंतु यहां पर राजा महाराज की बात सुनकर के जो रिसिप्ट रखी तो रिसिप्ट के अगेंस्ट में अकाउंट टेली हो जाता है तो उनको बड़ा ही सधे हुआ कि हां मैं बच गया तो देखिए कि जितेंद्र महाराज कहते हैं कि सन्यासी होने के बावजूद यह जो प्रैक्टिलिटी जो है रामकृष्ण मिशन में कितना है और हमको पता है यह पुरानी पुरानी स्मृति कथाएं पढ़ कर के कि ये प्रैक्टिकली थ उस स्वामी जी ने जो जोरों की डांट लगाई थी अपने गुरु भाइयों को तब से ये स्टार्ट हुई है आज हम सोच भी नहीं सकते कि पैसों का ट्रांजैक्शन हो और उसके अगेंस्ट में कोई ना कोई डॉक्यूमेंट रिसीप्ट या वाउचर ना हो वो हम आज सोच ही नहीं सकते इतना टाइट अपना अकाउंट है तो ये एक अच्छा सा एक स्मृति कथा और एक है शशि महाराज के साथ में और राजा महाराज के दोनों का जो संबंध था वो कितना सुमधुर संबंध था उसके बारे में विशुद्धानंद जी महाराज कहते हैं एक बार ऐसा हुआ कि देव माता जो कि स्वामी जी स्वामी जी को उन्होंने देव माता ने देखा था और फिर बाद में अभेदानंद जी की शिष्या थी वो और अमेरिका में वो रहती थी अमेरिकन थी व सन्यास तो ग्रहण किया था कि नहीं मुझे पता नहीं अभी किंतु ब्रह्मचारिणी के रूप में देव नाता देव माता नाम उनको दिया गया था भारत में आकर के मद्रास मठ में रह रही थी उन्होंने ने स्वामी जी की जो किताब है इंस्पायर्ड टॉक उसका संपादन किया था उसका एडिटिंग किया था और वह किताब जो है वो उस समय मद्रास मठ से पब्लिश हुई थी और मद्रास मठ के मद्रास के जो न्यूज़पेपर थे कुछ-कुछ तो उन्होंने बहुत ही सुंदर रिव्यू लिखा था देव माता की यह इंस्पायर्ड टॉक किताब का तो राजा महाराज शशि महाराज को कहते हैं कि एक काम करो बमबे बंबे बहुत बड़ा महानगर है वहां के न्यूज़पेपर में यदि इस किताब का रिव्यू पब्लिश होता है तो किताब का और अच्छे से प्रचार होगा तुम एक काम करो यह मद्रास के यह जो उस समय का मद्रास यहां पर मद्रास लिखा है बोलक के मैं यह मद्रास बोलता रहता हूं यह मद्रास के न्यूजपेपर में जो देव माता की इंस्पायर्ड टक किताब का यह है रिव्यू तुम बमबे भेजो अी मुंबई हो गया है किंतु यहां पर सब बमबे लिखा है तो बम्बे भेजो तुम और वहां के न्यूजपेपर मद्रास के न्यूजपेपर का रिव्यू देख कर के उनको समझ में आएगा कि किताब अच्छा है तो शशि महाराज ने कहा राजा देखो बम्बे के न्यूज़पेपर वोह सब अपना अपना एक एक खुद का एक रहता है ना घमंड रहता है कि मद्रास के न्यूज़पेपर का रिव्यू देख करके हम थोड़ी ना अपना रिव्यू अपना ओपिनियन लिखने वाले हैं हम किताब का इंडिपेंडेंट रिव्यू करेंगे और अपना ओपिनियन प्रदर्शित करेंगे हमको कोई मद्रास के न्यूज़पेपर से रिव्यू देखने की जरूरत नहीं है ऐसा ही घमंड रहता है उनका मद्रास के न्यूजपेपर का रिव्यू उनको भेजने की जरूरत नहीं मैं सिर्फ किताब ही भेजता हूं वो अपना ओपिनियन अपने से लिखे ये ज्यादा प्रैक्टिकल है तो यह बात सुनक के राजा महाराज को थोड़ा सा नाराज हो गया थोड़ी देर के बाद में उन्होंने अपने सेवक को बोला जाओ तो ये पंजी लेकर के आओ तो पंजी यानी कि वो पंजी का ये जो ये होती है ना ज्योतिष शास्त्र की वो किताब मैं हिंदी नाम मुझे याद नहीं आ रहा है तो जिसमें जो सब ये मुहूर्त लिखे होते हैं शुभ मुहूर्त कु मुहूर्त ये सब मुहूर्त लिखे होते हैं ऐसी वो ज्योतिष शास्त्र की वो किताब वो लेकर के आओ अर्थात कि राजा महाराज ट्रेवल करते थे तो वो पंजिका में देख कर के वो ज्योतिष के अनुसार शुभ मुहूर्त देख कर के ट्रैवल करने वाला है अभी राजा महाराज शशि महाराज के सामने वह पंजिका मंगवाए उसका अर्थ यही हुआ कि वो ट्रेवल करने के लिए शुभ मुहूर्त खोज रहे हैं शशि महाराज ने चुपचाप सब कुछ देखा कुछ बोले नहीं उसके बाद में राजा महाराज ने एक पत्र लिखवाया अपने एक पूरी के एक जगन्नाथ पुरी में उनके भक्त को कि हम लोग इस तारीख को इस समय यहां से ट्रेन में रवाना होकर के पूरी आ रहे हैं तो शशि महाराज ने सब देख लिया राजा महाराज नाराज हुए हैं और चेन्नई मठ से मद्रास मठ से चले जाना चाहते हैं और पंजिका में देख रहे हैं शुभ मुहूर्त क्या है पूरी के भक्त को लिख रहे हैं कि मैं इस दिन को निकल रहा हूं यानी कि अपना विजिट वो कट कर देना चाहते हैं तो शशि महाराज ने सब कुछ देख लिया कुछ बोले नहीं फिर राजा महाराज ने जितेंद्र महाराज को पत्र दिया पुरी के भक्त को जो लिखा था कि जाओ ये ये पत्र तुम वो पोस्ट में बॉक्स में डाल कर के आओ अभी जितेंद्र महाराज पत्र लेकर के गए देखा कि वो पोस्ट बॉक्स के सामने शशि महाराज खड़े थे वो पैदल वहां पर पाय चारी कर रहे थे तो शशि महाराज ने कहा लाओ पत्र मुझे दे दो तो जितेंद्र महाराज थोड़े टेंशन में आ गए राजा महाराज ने कहा है पत्र को बॉक्स में डालना है वो वो जो पोस्टमैन उसको पत्र को लेकर जाएगा पूरी तो अभी शशि महाराज को दे देंगे तो राजा महाराज नाराज हो जाएंगे तो शशि महाराज बोलते कुछ नहीं लाओ पत्र सब मेरा शशि महाराज ने पत्र लेकर के अपने पॉकेट में रख दिया राजा महाराज के पास गए सीधे साष्टांग राजा महाराज के चरणों में गिर कर के एकदम विनम्र भाव से बोल रहे हैं कि अरे राजा मेरी गलती हो गई है मुझे क्षमा कर दो मैं देखिए राज राजा महाराज और शशि महाराज का जो डिस्कशन है बंगाली में यहां पर लिखा है राजा महाराज बोलते हैं कि भाई तोमरा विद्वान बुद्धिमान कतो बड़ो बड़ो काज करछ राजा महाराज कहते हैं भाई तुम लोग तो विद्वान हो बुद्धिमान हो कितना बड़ा बड़ा काम करते हो आमरा तो अक्रमण मूर्ख हो हम हम लोग तो जो है बिना काम के मूर्ख लोग है आदर की बुद्धि शुद्धि की छु आछ हम लोगों की क्या बुद्धि शुद्धि कुछ है यानी कि मने बच्चे जैसा बिलकुल अब कौन से न्यूज पेपर में साथ में किस तरह से डीएल करना चाहिए शशि महाराज का प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस ज्यादा था राजा महाराज तो ऐसे एडमिनिस्ट्रेशन में थे स्वामी जी ने खुद कहा है कि राजा एक राज्य चला सकता है किंतु फिर भी क्या है कि वो आध्यात्मिक राज्य में इतने डूबे हुए रहते थे कि ये बाह्य संसार की क्या वो इतनी फिक्र करेंगे तो किंतु शशि महाराज की बात सुन लेने की बजाय बिल्कुल बच्चे की तरह मैं यहां से चला जा रहा हूं वो पूंजी देख रहे हैं शुभ मुहूर्त निकाल रहे हैं शशि महाराज के सामने ही जैसे ही बड़े ही नाराज होकर के बच्चा जैसे नाराज होता है ना अपनी मां के साथ में मां उसको बुलाती है तो बोलता है मैं नहीं बात करूंगा तुम्हारे साथ ऐसा ऐसा किस तरह से बिल्कुल सुमधुर एक उसका एक बिहेव होता है तो वैसे ही यहां पर राजा महाराज शशि महाराज को बोल रहे हैं तुम लोग तो बड़े-बड़े काम करते हो बड़े विद्वान हो मैं तो मूर्ख हूं मेरी बात सुनने के लिए तुम्हारी क्या जरूरत है शशि महाराज कातर हुए बोलेन शशि महाराज बड़े ही विनम्र भाव से बड़े ही अधीर होकर के बोलने लगे राजा तुम्ही निज गुण आमा के खमा करो राजा तुम अपने खुद का जो गुण है क्षमा करने का उसकी वजह से मुझे क्षमा करो ऐसा नहीं कि मैं क्षमा के योग्य हूं किंतु क्षमा करने का तुम्हारा स्वभाव है इस स्वभाव का आरोपण करके स्वभाव का आसरा लेकर के तुम मुझे क्षमा करो आमी जानी तुम्हार पायर धुला थे के सतो शशर उद्भव होते पारे मुझे पता है कि तुम्हारे पैर की धुल से सैकड़ों सैकड़ों शशि हों शशि उद्भव हो सक हैं आमी ना बुझे तोमार चरणे महा अपराध करे फेले छ तुम आमा के क्षमा करो क्षमा करो मैंने बिना सोचे समझे तुम्हारे श्री चरणों में यह अपराध कर लिया है तुम मुझे क्षमा करो क्षमा करो जब महाराज ने इस तरह से शशि महाराज की बिनती सुनी तब वह शांत हुए और फिर वह वहां से पूरी रवाना होने वाला पूरा प्रोग्राम कैंसिल किया देखिए दोनों गुरु भाई के भीतर में आपस में किस तरह का एक सुंदर सुमधुर संबंध एक दूसरे के प्रति श्रद्धा भक्ति कितना एक घन भाव है ये छोटे-छोटे उदाहरणों से पता चलता है दूसरा एक उदाहरण है बहुत ही सुंदर है मद्रास मठ में एक बार वही मद्रास मठ का ही विवरण है उसी दिनों की घटना है विशुद्धानंद जी महाराज लिख रहे हैं कि हम लोगों ने तास खेलने की शुरुआत की पत्ता खेलने की अभी राजा महाराज जैसे अभी आजकल हमको लगता है ना पत्ता कौन खेलेगा ता कौन खेलेगा जिसका कि चरित्र कोई इतना अच्छा ना हो बिना काम धाम का बैठा हो किंतु राजा महाराज का ऐसा था कि इतने उच्च आध्यात्मिक शिखर पर विराजमान थे कि जैसे ठाकुर का था कि समाधि में से नीचे आने के बाद में बोलते थे अ तामा खाबो अमी ल खाबो अर्थात कि मैं थोड़ा सा तमा तमाकू खाऊंगा या तो फिर थोड़ा सा कुछ पानी पिऊंगा या नाश्ता करूंगा या कुछ खाना खाऊंगा भाजे जाओ मैं सोच के लिए जाऊंगा ऐसा बोल कर के ठाकुर अपने मन को ऊपर से नीचे लेने का प्रयत्न हम लोगों का है जन्म जन्मांतर चले जाते हैं थोड़ा बहुत समाधि प्राप्त करने के लिए थोड़ा बहुत आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने के लिए इन लोगों का है कि आध्यात्मिक इस तरह की ऊंचाई पर बैठे कि जोर करके खींच करके मन को नीचे ले आना पड़ता है तो राजा महाराज का ऐसा था कि अपना उनका मन इस तरह से भाव राज्य की ऊंचाई में उड़ता था जैसे कि एक एक बाज पक्षी है वो किस तरह से ईगल जैसे है कि किस तरह से खुले आसमान न में मुक्त मन से विहर विहर रहा है वैसे ही राजा महाराज का मन आध्यात्मिक भाव राज्य में पंखी की तरह वो उड़ता था तो उस मन को नीचे खींच लाने के लिए कभी-कभी वह मछली पकड़ते थे बेलूर मठ में वह तालाब के किनारे बैठ कर के वो जो मछली पकड़ने वाला जो है उस दोरी को व पानी में डाल कर के ऐसा लकड़ी हाथ में लेकर के बैठे हैं और समाधि मग्न हो गए हैं राजा महाराज का एक फोटो है देखा होगा मेरा इतना प्रिय फोटो है कुर्सी पर बैठे हैं आराम कुर्सी पर मुंह में वो हुक्का का यह है नल है और वहीं पर समाधि मग्ना हो गया तो ऐसे ही मन को खींच कर के जमीन पर लाने के लिए उनको यह सब सामान्य सब चीजें करनी पड़ती है जिनको कि हम लोग जनरली सांसारिक चीजें कहते हैं तो ऐसा सांसारिक कार्य तो ऐसा ताश खेलना पत्तो पत्ते खेलना इस तरह से वो राजावा अपने मन को थोड़ा जमीन पर रखते थे जिस तरह से भक्तों के साथ में बात हो पाए ठाकुर ने क्या कहा मां को मां आमी चीनी होते चाइना चीनी खेते बालो बासी अर्थात कि मैं मां मय नहीं हो जाना चाहता हूं काली मय नहीं होना चाहता हूं जिससे कि क्या होगा ईश्वर मय हो जाने से समाधि में ही मग्न रहेंगे ईश्वर का भक्त होना चाहता हूं ईश्वर के साथ में भक्ति भक्त का संबंध लेकर के रहना चाहता हूं जिससे कि मैं लोगों के साथ में हंसी मजाक कर सकूं गप लगा सकूं भक्तों के साथ में मैं सत्संग कर सकूं तो ईश्वर मय हो जाना यह त है और ईश्वर के साथ में भक्ति भक्त का संबंध रखना द्वैत का द्वैत भूमि का वोह है तो यहां पर वो राजा महाराज ईश्वर मय ना हो जाए ईश्वर के साथ में भक्ति भक्त का संबंध हो जिससे कि पृथ्वी पर हमारे साथ में रह कर के हमको आशीर्वाद दे पाए इसलिए वोह ताश वगैरह खेलना उनका था तो राजा महाराज शशि महाराज और जितेंद्र महाराज तीनों ताश खेल रहे है अभी जितेंद्र महाराज के मन में आ गया दोदो लोगों की टीम टी रहती है ना तो राजा महाराज के साथ में और एक सन्यासी थे यहां पर जितन महाराज और शशि महाराज ये दोनों की टीम थी अभी दोनों की टीम के सामने वो ताश खेल रहे हैं जितेन महाराज के मन में आ गया कि कैसे भी करके मुझे ताश में जीतना है राजा महाराज को तो हराना ही ऐसा होता है ना कभी नए नए साधु ब्रह्माचारी आते हैं तो प्रेसिडेंट महाराज ठाकुर के मानस पुत्र इनके साथ में ताश खेल रहे हैं जद जीत जाऊंगा तो मैं जब बूढ़ा होऊंगा तो मैं अपने नए नए आए हुए ब्रह्मचार्य को बोलूंगा कि ने राजा महाराज के साथ में ताश खेला था और मैं जीत गया था वो सुंदर एक स्मृति कथा होती है हम साधु ब्रह्मचारी भी ऐसे आतुर रहते सीनियर साधु आने से महाराज को पुरानी कुछ बातें बताई है हंसी मजाक वाली हुई तो और भी मजा आएगा वो उपदेश वगैरह वेदांत वगैरह तो ठीक है तो बहुत सुनते हैं ऐसी हंसी मजाक वाली बातें हमको सुनने का बहुत मजा आता है तो जितेंद्र महाराज के मन में हो गया बस राजा महाराज को ताश में हराना है किंतु देख रहे हैं कि उनके जो पार्टनर है शशि महाराज बार-बार इस तरह से कुछ ना कुछ गलती कर दे रहे हैं कि राजा महाराज हर बार जीत जा रहा है यहां पर जितेंद्र महाराज बड़े ही नाराज होकर के शशि महाराज को कहते हैं महाराज जी आप थोड़ा सा तो संभल कर के खेलिए हम बार-बार हार जा रहे एक बार तो हम जीते और शशि महाराज यह बात समझ नहीं पा रहे हैं कि वोह जान व उनका ताश खेलने की उनकी जो स्किल है वो बहुत ही वीक है ताश खेलना नहीं जानते पता नहीं बार-बार वो हार उनकी गलती की वजह से वो उनका टीम हार जा रहा है और जितेंद्र महाराज की यह जो नाराजगी है शशि महाराज के प्रति या तो आतुरता है राजा महाराज को हराने की वो देख कर के राजा महाराज इतना खुश हो रहे हैं छोटे बच्चे की तरह छोटा बच्चा पता है ना वो कोई चीज को लेकर के खुश हो जाता है तो कैसा वो हासी अपना आनंद व्यक्त करता है तो राजा महाराज एकदम बढ़िया हंसते हंसते आनंद करते करते ये जितेंद्र महाराज को कहते देखा देखा फिर से तुम हार गए देखा मैंने कैसे तुमको हरा दिया बिल्कुल छोटे बच्चे जैसा सुमधुर व्यवहार जितेंद्र महाराज बेचारे बड़े ही नाराज हो गए पत्ता ताश खेलना जब समाप्त हुआ तो शशि महाराज को बोले महाराज जी आपने इस तरह से इतना बुरा खेला हम हर बाजी में हार गए आपने एक बार भी हमको नहीं जीतने दिया यह बात सुनक के आखिर में शशि महाराज ने जितेंद्र महाराज को लेकर के वह भंडार गुरु में गए जहां पर और कोई नहीं था और ले गए और फिर जितेंद्र महाराज को जो डांटने की शुरुआत की है पूरा जो वर्णन है शशि महाराज जो उनको कहते हैं यहां पर जितेंद्र महाराज ने लिखा है शशि महाराज कहते हैं अहमक तुम ज रीति में तो पेशा दार खिलवाड़ होए उठे छ अहमक अर्थात की महामूर्ख तुम ये पूरे एक प्रोफेशनल ताश खेलने वाले हो गए हो क्या देख देखी मैंने मैं देख रहा हूं कि एक प्रोफेशनल जैसे पत्ता खेलता है एक पैशा दार इस तरह से तुम पेशा दार ताश खेलने वाले हो गए हो क्या महामूर्ख भेबे छो बुझ आमी महाराजे संगे नी छोक ताश खेलते बोसे लाम तुम क्या सोचते हो मैं वैसे ही महाराज के साथ में ताश खेलने के लिए बैठा था एक बारो चे देखोनी आमा देर हारिए दिए तार कतो आनंदो तुमने एक बार भी ठीक से अवलोकन नहीं किया कि हमको हरा करके राजा महाराज का क्या आनंद व्यक्त हो रहा है मुख खानी ते केमोन स्वर्गीय आभा फूटे उठे छीलो उनके चेहरे पर किस तरह से एक स्वर्गीय भाव एक स्वर्गीय प्र वो खिल उठी है निखर उठी है देव शिशु मो तोन सुंदर और पवित्रो से हासी बारबार देखे हमार शद मीटे लोना देव शिशु की तरह सुंदर और पवित्र हास्य उनके श्री चेहरे पर देख कर के बारबार देख कर के भी मेरी आस पराती नहीं थी अहमक महा मुरक भालो भालो ताश आमी तो जेने सुने छेड़ दला महा मूरख येय जो जो अच्छे अच्छे पत्ते हैं जानबूझ कर के मैं छोड़ देता था ताके आनंदे रखाई अर एकमात्र लोखो राजा महाराज को आनंद में रखना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है इन्हीं की साधारण राजा महाराज क्या सामान्य है आमा देर कल्याण जन्नई र शरीर धारण हमारे कल्याण के लिए ही इनका शरीर धारण है तुम की कोरे बुवे तार र तो कृपा करुणा तुम किस तरह समझोगे कि उनकी कृपा करुणा कितनी है क्या किस तरह की तो यह सुनकर के विशुद्धानंद जी महाराज लिखते हैं आमी तो होतो भमो मैं तो अबाक हो गया महापुरुष देर ताश खेलर मतो गभीर तात्पर्य जो थकते पारे कखन तो का कल्पना कोरी नहीं महापुरुषों के ताश खेलने के भीतर में इतना गंभीर तात्पर्य हो सकता है सपने में भी सोचा नहीं था बाबा शशि महाराज की गोभीर प्रेम भक्ति हे भगवान अरे भगवान शशि महाराज की प्रेम भक्ति कितनी गहन है कितनी गंभीर है ता देर उन तोरे राग द्वेष स्थान छिलना ए स्वीकृति स्वयं महाराज इन लोगों के अंतर में कहीं पर भी राग द्वेष नहीं था यह स्वीकृति स्वयं राजा महाराज की है देखिए वो ताश भी खेलते हैं पत्ते भी खेलते हैं तो इसके भीतर में इतना सब गंभीर तात्पर्य रहता है इतना डीप उसका मीनिंग रहता है महाराज कहते हैं आज पहली बार मुझे पता चला और भी कुछ सुंदर कहानियां है वह हम कल देखेंगे आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम श्री राम कृष्णर्पण मस्तु