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Swami Vivekananda' Complete Life ·

Swami Vivekananda: Life and Teachings 12 Nov 2025

Prayer

जिस घर में स्वामी जी रहते थे वहां पे एक फुल साइज मिरर था। माने फ्लोर टू सीलिंग मिरर जिसको कहते हैं ना जमीन से लेकर छत तक का इतना बड़ा एक मिरर था। तो स्वामी जी कमरे में टहल रहे हैं और बीच-बीच में इस आईने के सामने मिरर के सामने देख रहे हैं और देख के रुक जाते हैं। फिर अपने ही चेहरे के सामने देखते रहते हैं। कुछ सोचते रहते हैं। फिर से टहलते हैं। तो अब ये मिस वोल्डो वहां पे सामने ही बैठी है। तो उनको सडनली यह डर लग गया कि नाउ द बबल इज गोइंग टू बस्ट। अभी यह जो बबल जो है ना वो बस्ट होने वाला है इस अर्थ में कि जो डिफेक्ट उन्होंने अभी तक छुपा के रखी थी वो अभी बाहर आ जाएगी। सबके तो उन्होंने देखा कि जितने भी टीचर पहले के सबके चरित्र में कहीं ना कहीं एक डिफेक्ट थी तो अभी ये स्वामी जी के चरित्र की डिफेक्ट बाहर आएगी वो बहुत ही ज्यादा वेन है अपने खुद के अपीयरर्स के बारे में। तो थोड़ी देर के बाद में टहलते टहलते रुक-रुक करके आईने में देखना ऐसा करके कुछ समय के बाद में स्वामी जी ने कहा एलन अर्थात ये सारा एलन वाल्डो इनका नाम था फर्स्ट नेम था एलन। तो स्वामी जी कहते हैं एलन मुझे यह याद ही नहीं रहता है कि मैं कैसा दिखता हूं। जितनी ही बार मैं आईने में देखता हूं तो मैं अपने को देखता तो हूं किंतु जैसे ही मैं अपना पीठ उसकी ओर घुमा लेता हूं। आईना छोड़ करके चला जाता हूं। जब मेरी नजर के सामने आईना नहीं रहता है। मैं कंप्लीटली भूल जाता हूं कि मैं कैसा दिखता हूं। ये कैसे संभव है? यह जो ह्रदय था हृदय शंभू मलिक के पास में पैसा मांगने को जाता है। किसी कारण से उसको पैसा चाहिए था। सहाय चाहिए थी तो उसको पैसा चाहिए। तो शंभू मलिक के पास में गया। तो शंभू मलिक कहता है तुम तो हट्टेट नवयुवक हो। तो तुम मेहनत करके पैसा कमाओ। मैं तुमको क्यों दान करूंगा? दान तो मैं उसको करूंगा जो कि लंगड़ा है, लूला है, अंधा है। उसको मैं दान करूंगा। माने जिसका कोई अंग जो है काम नहीं करता है दिव्यांग जिसको हम कहते हैं आजकल उसको मैं दान करूंगा ना। तुमको मैं थोड़ी ना दान करूंगा। ऐसे हट्टेट हो जाओ काम करके तुम पैसा कमाओ। तो हृदय सामने में कहता है कि महाशय मुझे भी आपके पैसों की जरूरत नहीं है और आपको भी मुझे पैसे देने की जरूरत नहीं है। मुझे आपसे पैसे लेने की जरूरत नहीं और आपको मुझे पैसे देने की जरूरत नहीं। भगवान ना करे कि मुझे लंगड़ा लूला अंधा होना पड़े। ऐसा बोल के वो हृदय वहां से चला गया। ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का जीवन और उपदेश इसका हम पाठ कर रहे थे। हमने ऑलरेडी देख लिया कि किस तरह से आठपुर में सभी गुरु भाइयों ने इकट्ठा होकर के क्रिसमस की पूर्व संध्या को संकल्प लिया कि वे लोग संगबद्ध जीवन जिएंगे। अपने जीवन को ठाकुर के उपदेश अनुसार गठित करेंगे और ठाकुर का उपदेश पूरे विश्व में फैलाने का कार्य करेंगे। इसके बारे में इसी घटना को याद करके महापुरुष महाराज शिवंद जी बाद में उन्होंने कहा था आठ पुर आमादे शंघोबद्ध हो संकल्प दृढ़ हो आठपुर में ही हमारा संघ होने का संकल्प दृढ़ हुआ ठाकुर तो आमादे सन्यासी कोरे दिए छिले नहीं ठाकुर ने तो हमको सन्यासी बना ही दिया था वही भालो आर वही भाव आरो पाका होलो आठपुर किंतु यह भाव आठपुर में और भी दृढ़ीभूत हुआ तो यह महापुरुष महाराज स्वयं बाद में यह बात करते हैं तो उसके बाद में गुरु भाई कोलकाता वापस आए और जनवरी के थर्ड वीक में उन्होंने विजा होम करके विधिवत [गला साफ़ करने की आवाज़] सन्यास लिया। तो यह तीन घटनाएं हैं जो कि रामकृष्ण संघ का जो वेरी फाउंडेशन जो है उसमें यह तीन घटनाओं काेंस है। ठाकुर ने अपने त्यागी संतानों को गेरुआ वस्त्र प्रदान किया और फिर आठपुर में उन्होंने संघ होने का दृढ़ संकल्प लिया और फिर कोलकाता आकर के विजा होम करके विधिवत सन्यास ग्रहण किया। यह तीन है हमारे संघ की फाउंडेशनल इवेंट्स। इसके बाद में किंतु देखिए कि देखिए कि जब नरेंद्र भविष्य के स्वामी विवेकानंद अपनी उद्दीपनामई वाणी से जब गुरु भाइयों को प्रेरित करते हैं। ठाकुर की सब कहानियां उनको याद करवाते हैं। दक्षिणेश्वर के वह पवित्र सुनहरे दिन उसको जब यह सब मिलकर के याद करते हैं तो उनका हृदय हर्षोल्लास से भर तो जाता है किंतु जब वे लोग वास्तविकता की ओर वापस आते हैं तब पता चलता है कि उनके सपने तो बड़े हैं किंतु सपनों को वास्तव में रूपांतरण करने के लिए साधन अल्प मात्रा में ही है या तो कहेंगे कि नहीं वत थे। देखिए कि इन सबका सपना था कि बेल गंगा के किनारे एक जगह पे मठ प्रारंभ करके ठाकुर की अस्थियों को स्थापित किया जाए और फिर ठाकुर की वहां पे नित्य पूजा की जाए। और फिर जैसे स्वामी जी का था कि यह जो मठ होगा वह विद्या और साधना का केंद्र बिंदु होगा और वहां से ही पूरे विश्व में आध्यात्मिकता की तरंगे एक के बाद एक फैलती जाएगी। तो अभी कहां वह गंगा के किनारे जमीन लेना उसके लिए जो रुपया चाहिए कौन देने वाला है इतने साधु भी तो आपको चाहिए क्योंकि यह 16 डिसाइपल से अपने से तो होने वाला नहीं है जिस तरह की कल्पना थी हजारों हजारों नवयुवक जो कि अपने घर को त्याग करके अपने हृदय में साधनोज्जल एक प्रतिज्ञा करके यहां पर साथ में रहने को आए जितने भी कष्ट सहन होते हैं कष्ट को सहन करके अपने चरित्र का गठन करें और फिर आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च इस कार्य के लिए अपना जीवन न्योछावर करें तो यह यंग मैन भी कहां से आने वाले हैं पैसा भी कहां से आने वाला है यह सब कुछ तो ठीक नहीं था किंतु यह था कि हृदय में आत्मश्रद्धा भरी हुई थी तो यह डिसाइपल यह ठाकुर के त्यागी संतान, गुरु भाई सब यहां पर वराह नगर मठ में रह रहे हैं। और उसके बाद में उनके सामने जो चैलेंज आती है उसका थोड़ा सा विवरण हमको गंभीरानंद जी महाराज की युगनायक पुस्तक में मिलता है। थोड़ा सा उसमें से पाठ करते हैं।

संन्यास के बाद भी पारिवारिक दायित्व: कोर्ट केस में उलझे स्वामी विवेकानंद

नरेंद्र संभवत 1887 ख्रिस्ताब् के जून जून माशेर पूर्वो होइते स्थाई भाबे मठे बास करते थाके नरेंद्र संभवतः 1887 ख्रिस्ताब् के जून मास के पहले से ही मठ में नियमित रूप से निवास करने लगे थे। देखिए इस यह जो टाइमलाइन यदि हमको पता होगा 1886 1886 के अगस्त महीने में ठाकुर की महासमाधि हुई। यह उसी 1886 के बस अगस्त ना सितंबर के महीने में ही यह वराह नगर मठ की स्थापना हुई और फिर दिसंबर में यह लोग आठपुर गए। दिसंबर में क्रिसमस की पूर्व ई को पूर्व संध्या को उन्होंने संघ होने का निर्णय लिया। उसके बाद में जनवरी महीने में विजा हो हुआ और फिर उसी साल के जून महीने के पहले ही नरेंद्र नियमित रूप से मठ में रहने लगा। प्रश्न होगा कि वराह नगर मठ की स्थापना तो वही सितंबर के आसपास में हो चुकी थी। तो नेक्स्ट ईयर के जून महीने तक नरेंद्र क्यों वहां पर नियमित रूप से नहीं रहता था? तो उसका उत्तर भी तो वैसे तो हमको पता ही है कि नरेंद्र के घर में जिस तरह से सब आर्थिक संकट आ पड़ा था। उनकी माताजी उनके छोटे भाई और बहन उनको अपने ही घर में से निकाल दिया गया था। और फिर उनके पिताजी के निधन के बाद घर में ठीक से खाने के लिए भी जो सब नहीं था। यह सब प्रॉब्लम्स की वजह से ऐसा हुआ था कि नरेंद्र को अपने घर की संभाल लेने के लिए वहां पर बीच-बीच में जाना पड़ता था। और फिर यह जो कोर्ट में जो मुकदमा चल रहा है, कोर्ट केस चल रहा है, उनके घर की मालिकी को लेकर के उसमें भी नरेंद्र को उपस्थित रहना पड़ता था। तो वही उनके भाई महेंद्रनाथ उनके विवरण में एक जगह पर आता है कि यह जो नरेंद्र के भीतर में एक स्प्लिट बन गया था। एक और है कि वहां पर मठ का अति पवित्र शुद्ध वातावरण और यहां पर है कि बीच-बीच में यह कोर्ट में जाकर के जितने भी चोर उचक्के हैं कोलकाता के सब लोग वहां पर इकट्ठा होते हैं। उन लोगों के साथ में बैठकर के और फिर जज के सामने वह केस प्रस्तुत करना वगैरह। आप इमेजिन कर ही सकते हैं कि कितने फंडामेंटली ऑोजिट यह दोनों जगत है। तो इसके साथ में जो है नरेंद्र को रिकंसिलिएशन करना था। बोल कर के उनको उस समय सीवियर हेडेक प्रारंभ हो गया था। तीव्र माइग्रेन प्रारंभ हो गया था। तो ठीक है। अभी देखिए कि स्वामी जी जैसे स्वामी जी यह सब संभाल सकते हैं। हम लोगों का तो यहां पर कोई काम ही नहीं है। मैं कभी-कभी यहां पर स्कूल कॉलेज में जाना होता है। तो वैसे तो मैं जाता हूं। ड्यूटी है जाना पड़ता है। किंतु अभी मेरी अवस्था ऐसी हो गई है कि आश्रम छोड़कर के कहीं पर भी जाने की बात आती है तो मैं एकदम टेंशन में आ जाता हूं। तो देखिए कि क्योंकि आश्रम में एक जगह पर आप रहते हैं इतने समय से साधन भजन को लेकर के उसके बाद में ऐसे लोगों से मिलना कि जिनका एक मटेरियलिस्टिक आउटलुक है। जिनका एक सांसारिक आउटलुक है। तो फिर इन लोगों के साथ में डीएल करके ना हम लोगों को बड़ा कष्ट होता है। भक्तों की बात अलग है। भक्त और वालंटियर की बात अलग है। वे लोग तो रामकृष्ण भावधारा के साथ में ही जुड़े हुए हैं। किंतु जैसे इसके पास में कुछ परचेस करना है, कोई गवर्नमेंट ऑफिस में जाना है या इस तरह के कोई कार्य है तो सही में बड़ा ही मुश्किल होता है। तो मैं कभी-कभी सोचता हूं कि हमारे सामने तो यह सब मुश्किल कुछ भी नहीं है। कंपेयर टू स्वामी जी। वही कोर्ट में जाकर के बार-बार दलील प्रस्तुत करना और विरोध पक्ष वाले सब समय आपकी संपत्ति लूट लेना चाहते हैं। उसके सामने आपको बचाव करना अपने फैमिली का वो कितना कठिन कार्य होगा। वैसे फिजिकली स्ट्रेन्यूस नहीं है किंतु मेंटली जबरदस्त स्ट्रेन्यूस है। इसलिए हम यह सब देखते हैं। अच्छा इसके बाद में आगे देखते हैं क्या कहते हैं महाराज? वही भूपेंद्रनाथ जो स्वामी जी के छोटे भाई थे। वह एक जगह पर कहते हैं नरेंद्रनाथ संसार त्याग करिया साधु होइले आमादे माताम ही रघुमणि देवी छिलेन आमादे प्रधान भरोसा स्थल नरेंद्रनाथ ने जब संसार त्याग करके सन्यास ग्रहण किया उस समय हमारी नानी जो थी मातामही अर्थात कि मां की मां रघुमणि देवी वह थी हमारी प्रधान भरोसा के स्थल अर्थात कि उन्हीं के ऊपर में भरोसा करके अभी स्वामी जी की मां और उनके भाई-बहन रहते थे। ताहार शहीद तामरा 1903 ख्रिष्टाब् परजन तो बास करी। उनके साथ में हम लोगों ने 1903 तक निवास किया था। 1903 अर्थात कि स्वामी जी की महासमाधि के बाद का भी एक साल। स्वामी जी की महासमाधि हुई 1902 अर्थात कि स्वामी जी के जीवन में स्वामी जी के रहते-रहते उनकी मां और भाई-बहन उनकी नानी के वहां पे रहते थे। ए विषय तहा देर मध्यम भ्राता महेंद्रनाथ लिखिया छिलेन इस विषय के बारे में स्वामी जी के जो मध्यम भ्राता है बीच वाले जो भाई है वो महेंद्रनाथ ने लिखा था आमरा 1887 ख्रिस्ताब्दी जून मासे आमादे माता महर सात नंबर राम तनु बसु लेनेर बाड़ीते जया बास करीते था हम लोग 1887 के जून मास में 1887 के जून महीने में हमारी मातामही हमारी नानी के घर जो कि सात नंबर रामतनु बसु लेन में था वहां पे जाकर के निवास कर रहे थे निवास करना प्रारंभ किया था अवश्य नरेंद्रनाथ सन्यास ग्रहण ए गृह परिवर्तनर कारण छिलोना अवश्य नरेंद्रनाथ का सन्यास ग्रहण इस गृह परिवर्तन का एकमात्र कारण नहीं था यदि आप यह कहे कि वे लोग जहां पर रहते थे वहां से उनको अपनी नानी के वहां पर जाना पड़ा। भुवनेश्वरी देवी को अपनी मां के साथ में फिर से रहने को जाना पड़ा। इसके पीछे का यह कारण था कि उनका बड़ा लड़का नरेंद्र अभी सन्यासी हो गया है। तो और कहीं रहने की जगह नहीं है। तो इसके पीछे में महेंद्र महेंद्रनाथ कहते हैं कि और भी कारण था। गंभीरानंद जी कहते हैं कि और भी कारण थे। विश्वनाथ बाबू जीवन काले ही पारिवारिक कलह फले त भाड़ा बाड़ी ते चलिया जान विश्वनाथ बाबू के जीवन काल में ही पारिवारिक कलह की वजह से अर्थात कि संसार में झगड़े होने की वजह से उनका फैमिली है तो उनके भाई वगैरह के साथ में झगड़े होने की वजह से वह अपने जीवन काल में ही एक भाड़ा वाले घर में चले जाते हैं। एक भाड़े के घर में रहने को चले जाते हैं। से एक कारण एवं संपत्ति लया मुकदमा चलीते थाकाय भुवनेश्वरी देवी के स्वामीर देह त्यागे परो बाहिरे बास करते हो यही कारण की वजह से और संपत्ति को लेकर के मुकदमा चल रहा था बोलकर के भुवनेश्वरी देवी को स्वामी के देह त्याग के बाद में भी बाहर में रहना पड़ा था। नरेंद्रनाथर 47 89 तारीख पत्रे उई प्रकाश अर्थात कि नरेंद्र ने एक लेटर लिखा था। इसमें यह बात उन्होंने कही थी। ओई मुकदमा मिटिया छिलो बहुत बाद में फिर यह 89 की साइल में यह मुकदमा जो मिटा था एवं उहाते दत्त परिवार सर्वशवांत होया छिले और इस मुकदमे की वजह से दत्त परिवार है वह पूरा बैंककरप्ट हो गया था। देखिए इस कहानी को लेकर के हमने पहले भी थोड़ा सा चिंतन किया है कि किस तरह से यह जो महापुरुष होते हैं इनके जीवन में बाधाएं जो होती है आध्यात्मिक जीवन में वह भी तो इतनी बड़ी-बड़ी आती है। माने इन लोगों के पास में आध्यात्मिक शक्ति जिस तरह से प्रचंड है तो इस आध्यात्मिक शक्ति की जो पूर्ण अभिव्यक्ति है फुल मैनिफेस्टेशन है उसके रास्ते में विपद जो है वह भी तो इतनी भयानक होती है। स्वामी जी को यदि खुला छोड़ दिया जाए उनको यह कह दिया जाए कि और ज्यादा कुछ टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। अपना जीवन जो है अपनी इच्छा के अनुसार बिता सकते हो। मां-पिताजी घर बार भाई-बहन उन लोगों की अच्छे से व्यवस्था है। तुमको चिंता करने की जरूरत नहीं। तो नरेंद्र जो है वह कहां वो जप ध्यान में अपना पूरा जीवन बिता देता। किंतु ऐसा नहीं होकर के महादेव स्वयं पृथ्वी पर आए हैं। किंतु फिर देखिए कि इनको कष्ट कितना है और कोई भी होता सोच के देख लीजिए कि अपने मां-पिताजी, भाई-बहन इस तरह से भयानक कष्ट में रहते हो। यदि उनको खाने की भी तकलीफ हो रहने के लिए घर भी ना हो और यह लड़का घर सब छोड़कर के उनकी जिम्मा जवाबदारी छोड़कर के साधु हो जाए। यह के कितने विरल लोग यह बात कर पाएंगे। कितने अल्पसंख्यक होंगे इस पूरी पृथ्वी पे जो कि इस तरह का त्याग और वैराग्य का प्रकाश कर पाएंगे। किंतु देखिए कि जितना चैलेंज स्वामी जी के सामने में था वह सिर्फ यह बात नहीं है। मैं पहले इस तरह से सोचता था कि जैसे चैलेंज आती है, संघर्ष आता है तो हमारे जीवन में क्या है कि वह संस्कार के वाशिंग मशीन के रूप में कार्य करता है। इससे कि हमारे संस्कार कट जाते हैं। जितना भी चैलेंज फेस करेंगे उससे। किंतु फिर प्रश्न तो वही है ना स्वामी जी को संस्कार काटने की ऐसी तो कौन सी जरूरत आ पड़ी है जो कि वही नर नारायण ऋषि के एक अंश के रूप में उन्होंने जन्म ग्रहण किया है। जन्म जन्मांतर से प्रत्येक अवतार के पृथ्वी पर आगमन के साथ में अवतार के पार्षद के रूप में जिनका आगमन होता रहा है। उनको कौन से संस्कार को काटना है। किंतु देखिए कि यहां पे यह जो चैलेंजेस है अब मेरी दृष्टि से मुझे ऐसा लग रहा है कि इन लोगों का जो एक उर्ध्वगति जो मन होता है ना हमेशा वो हिमालय की ऊंचाइयों की ओर दौड़ता है। हमेशा निर्विकल्प समाधि की ओर दौड़ता है। हमेशा यह जगत के जगत से विमुख होकर के त्याग और वैराग्य की ओर दौड़ता है। किंतु यदि ऐसा होगा तो फिर इनके जगत में आगमन का तो प्रयोजन ही नहीं रहेगा ना। ब्रह्मा की वही कहानी कि ब्रह्मा ने वह चार कुमारों को प्रथम भेजा पृथ्वी संसार की सृष्टि करने के लिए चारों कुमारों को पता है सनक सनंदन सनातन वगैरह कि सृष्टि जो है यह संसार जो है वह तो मिथ्या है। ब्रह्म ज्ञान ही तो असली है। तो उन्होंने समाधि साधन भजन करके ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करके देह त्याग दिया। तो फिर ब्रह्मा ने सोचा इस तरह से तो सृष्टि की रचना होगी नहीं। तो फिर उन्होंने 12 प्रजापतियों को भेजा। तो अभी देखिए कि प्रजापतियों ने संसार की रचना की। परिवार अपना चला करके संसार की रचना की। तो देखिए कि स्वामी जी का मन जो है दोनों देखिए कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी जी और मां दोनों का मन उर्ध्वगति की ओर जा रहा था। मां बार-बार कहती है कि वह तो चले गए। अभी इस देह को धारण करने का अर्थ ही क्या है? किंतु फिर स्वामी ठाकुर आकर के वही राधु का वह जिम्मा मां के सर पर डाल देते हैं। ठाकुर कहते हैं कि यह योग माया है। इसका आश्रय करके रहो। तो कैसे भी करके मां के मन को पकड़ कर के संसार में रखना था। बोलकर के मां इस संसार के प्रति अपनी करुणा का प्रवाह धावित करें। यहां पे भी स्वामी जी के जीवन में देखिए कि यह जो संसार की मायाजाल उन्होंने अनुभव की है बोलकर के हम जिस हम हम जैसे जितने भी पापी तापी हैं उन सबके प्रति उनकी करुणा प्रवाहित हुई है। वही फेमस लेटर कि वह रामदयाल बाबू बोलकर के एक स्वामी जी को लिखते हैं कि वहां पर ठाकुर की तिथि पूजा तो बहुत अच्छे से दक्षिणेश्वर में सेलिब्रेट हो रही है। हम भी जाना चाहते हैं किंतु जिनका चरित्र अच्छा नहीं इस तरह की स्त्रियां भी वहां पर जाती है बोल कर के हम अपने घर की बहुओं को लेकर के वहां पर नहीं जा सकते। तो स्वामी जी ने क्रोधित होकर के पत्र लिखा कि जिनका मन इस तरह की पवित्र जगह पर जाकर के दक्षिणेश्वर जैसी कि जहां पे ठाकुर ने साधन भजन समाधि सिद्धि प्राप्त की है उस जगह पर जाकर के यह यह जाति का है यह वह जाति का है। इसका चरित्र ऐसा है। उसका चरित्र ऐसा है। यह जब जो सोचता रहे ऐसे लोगों को दक्षिणेश्वर जाने की जरूरत ही नहीं है। इस तरह के सो कॉल्ड भद्र लोग इस तरह के सो कॉल्ड जेंटलमैन जितना दक्षिणेश्वर में ना जाए उतना ही अच्छा है ठाकुर आए हैं पापी तापी पद दलितों के लिए जिनका चरित्र अच्छा नहीं है। जिन लोगों पर अत्याचार किया गया है। जिन लोगों पर दमन किया गया है। जिन लोगों को दमन किया गया है। ऐसे लोगों के लिए तो ठाकुर आए हैं। उन्हीं के उद्धार के लिए तो ठाकुर आए हैं। इन लोगों को जिन लोग भी बड़े अच्छे घर के हैं। अपने को एक जेंटलमैन समझते हैं। वह अपने घर में ही बैठे रहे। वे लोग दक्षिणेश्वर मत जाए। तो यह स्वामी जी का जो एक पूरे जगत के प्रति करुणा वो किस तरह से चालू हुई प्रारंभ हुई। यह तो अपने खुद के घर में यह सब देखा उन्होंने फिर वहां पे आखिर में यह जो मुकदमा समाप्त हो गया कोर्ट केस 89 की साल में और फिर उन्होंने ठीक किया कि बस अभी मैं हिमालय जाता हूं। हिमालय में बैठकर के जप ध्यान साधन भजन करके समाधि में प्रवेश कर जाऊंगा और वहीं पर शरीर त्याग कर दूंगा। बोल के वह अल्मोड़ा की गुफा में तपस्या करने को तो गए हिमालय में। वह वही लेटर आया कि उनकी बहन ने आत्महत्या की है। तो फिर से वही बात आ गई कि जितनी बार स्वामी जी का मन उर्ध्वगति करना चाहता है उतनी ही बार जैसे कि उनका यह संसार जो है उनको पकड़ कर के पृथ्वी पर वापस ले आता है। देखिए एक सुंदर

देहाभिमान से मुक्त संन्यासी — विवेकानंद

कहानी है मिसरा एलन वोल्डो वही जो इंस्पायर्ड टॉक जिसने लिपिबद्ध किया थाउजेंड आइलैंड पार्क में और जो स्वामी जी की सेक्रेटरी थी और राजयोग भी स्वामी जी ने इन्हीं को डिक्टेट करवाया था न्यूयॉर्क में। तो अभी यह मिस व्ल्डो जो है वो एक्चुअली क्या है स्वामी जी के आने से पहले ही उनके मन में इस तरह से यह जो ईस्टर्न स्पिरिचुअलिटी है उस सब के प्रति उनका एक आकर्षण था और उस समय न्यूयॉर्क में इस तरह के जो कोई टीचर आते थे अमेरिका में क्या है कि इस तरह के बहुत लोग आते रहते हैं उटपटांग पूरी पृथ्वी में कोई उनको पत्ता नहीं देगा न्यूयॉर्क एक ऐसा सिटी है जो कि सबको अपने बाहों में आकर्षित कर लेता है तो यह एक न्यूयॉर्क लिबरल है इतना न्यूयॉर्क सिटी तो न्यूयॉर्क में इस तरह के बहुत सारे टीचर आते रहते हैं। बहुत कुछ उटपटांग बोलते भी रहते हैं। तो अभी क्या है कि ईस्टर्न स्पिरिचुअलिटी को पढ़ने के पढ़कर के थोड़ा बहुत इनकी इच्छा थी कि इस तरह का कोई टीचर मिले। तो जो कोई भी आता था न्यूयॉर्क में सबके प्रवचन सुनने को जाती थी और यदि कोई टीचर अच्छा लगे तो उनके उनको हेल्प करना उनके साथ में एज ए डिसाइपल एज ए वॉलंटियर काम करना यह सब उनका स्वभाव पहले से ही था। तो किंतु अनफॉर्चूनेटली यह मिस व्ल्डो जितने भी टीचर के साथ में एसोसिएट हुई थी उन सभी के भीतर में कुछ समय शुरू शुरू में तो सब लोग बड़े अच्छे दिखते हैं आपको पर्सनालिटी भी मैग्नेटिक होता है। फिर बातें भी बड़ी चतुर बातें करते हैं और फिर कांसेप्ट भी इस तरह के मिथिकल फिलॉसोफिकल कांसेप्ट लेके आएंगे कि लोगों का मन मोहित हो जाएगा। किंतु मिस वल्डो थोड़ा सा भी उनके साथ में अपना एसोसिएशन बढ़ाती तो पता चलता कि इन सभी के चरित्र में ना कहीं ना कहीं सीरियस डिफेक्ट है। कोई बहुत ज्यादा पैसों का लोभी है। किसी का स्त्रियों के प्रति ज्यादा लोभ आकर्षण है। किसी का चरित्र जो है वह कमजोर है। कोई मतलब कुछ ना कुछ एक डिफेक्ट जो है फेटल डिफेक्ट जो है इन सब में मिस वोल्डो को दिखती थी और फिर वो जो है इस तरह के टीचर का त्याग कर देती थी। अभी जब स्वामी जी न्यूयॉर्क में आए और मिस व्डो उनके साथ में एसोसिएट होना शुरू हुआ कि उनके मन में ना सब समय यह डर बैठा रहता था कि इतना तो स्वामी जी अच्छे हैं। माने बातें इतनी अच्छी करते हैं। व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली है। मैग्नेटिक उनका यह पर्सनालिटी है। उनका चरित्र भी देखिए कि स्त्रियों के प्रति अननेसेसरी उन लोगों उनका कोई एक अट्रैक्शन नहीं है। जो क्लास के दौरान जो इंटरेक्शन होता है, वर्क को रिलेटेड जो इंटरेक्शन होता है, वही किंतु इससे बिय्ड स्वामी जी अपने चरित्र की मर्यादा का कभी भंग नहीं करते। तो यह सब और पैसों का लोभ नहीं है। तो यह सब मिस वर्ल्डो देख तो रही है किंतु बेचारी को गुजराती में एक कहावत है कि दूधनो दाझेलो छास फूंकी ने पीवे ताकि जो गर्म दूध पीते-पीते जिसका जो उंगली है वह जल गया है वो क्या करेगा जब छास भी होती है यह जो बटर मिल्क उसको भी वह फूंक मार के पीता है उसको डर लग जाता है सफेद जितना भी है सब गर्म है तो उन्होंने सोचा कि पहले वाला वाले टीचर जितने भी थे उन सबके भीतर में कहीं ना कहीं फेटल एक मिस्टेक था। एक फेटल एक फौल्ट था। तो स्वामी जी में भी ना कहीं ना कहीं आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों ऐसा कोई फौल्ट निकल के आएगा। इस डर में सब समय मिस वोल्डो रहती है। तो एक दिन सही में हुआ भी सही कि जिस घर में स्वामी जी रहते थे वहां पे एक फुल साइज मिरर था। माने फ्लोर टू सीलिंग मिरर जिसको कहते हैं ना जमीन से लेकर छत तक का इतना बड़ा एक मिरर था। तो स्वामी जी कमरे में टहल रहे हैं और बीच-बीच में इस आईने के सामने मिरर के सामने देख रहे हैं और देख के रुक जाते हैं। फिर अपने ही चेहरे के सामने देखते रहते हैं। कुछ सोचते रहते हैं। फिर से टहलते हैं। तो अब यह मिस वोल्डो वहां पे सामने ही बैठी है। तो उनको सडनली यह डर लग गया कि नाउ द बबल इज गोइंग टू बस्ट। अभी यह जो बबल जो है ना वह बस्ट होने वाला है इस अर्थ में कि जो डिफेक्ट उन्होंने अभी तक छुपा के रखी थी वो अभी बाहर आ जाएगी। सबके तो उन्होंने देखा कि जितने भी टीचर पहले के सबके चरित्र में कहीं ना कहीं एक डिफेक्ट थी। तो अभी यह स्वामी जी के चरित्र की डिफेक्ट बाहर आएगी। वह बहुत ही ज्यादा वेन है अपने खुद के अपीयरेंस के बारे में। कोई कोई होता है ना कि सब समय आईने में देखकर के बाल ठीक करते रहता है। अपने खुद के सौंदर्य के मोह में पड़ जाता है। इसको कहते हैं वेनिटी अर्थात कि अपने खुद के सौंदर्य के मोह में पड़ना। तो स्वामी जी जिस तरह से बार-बार आईने के सामने देख रहे हैं, जिस तरह से बार-बार वहां पर जाकर के खड़े रहकर के सोच रहे हैं। उससे लगता है कि वह अपने खुद के सौंदर्य के मोह में पड़ गए हैं। और यह जो है उनके चरित्र की डिफेक्ट उसकी वजह से मुझे स्वामी जी को भी त्याग करना पड़ेगा। तो यहां पे मिस वोल्डो इस टेंशन में बैठी हुई है। सोच रही है कि अभी स्वामी जी क्या कहते हैं? उनको भी अपना सेल्फ डिफेंस का एक तक दिया जाए। भी कि मैं उनको छोड़कर के चली जाऊं। इससे पहले उनको एक चांस दिया जाए कि वह क्यों ऐसा करते हैं। तो थोड़ी देर के बाद में टहलते टहलते रुक-रुक करके आईने में देखना ऐसा करके कुछ समय के बाद में स्वामी जी ने कहा एलन अर्थात ये सारा एलन वाल्डो इनका नाम था फर्स्ट नेम था एलन। तो स्वामी जी कहते हैं एलन मुझे यह याद ही नहीं रहता है कि मैं कैसा दिखता हूं। जितनी ही बार मैं आईने में देखता हूं तो मैं अपने को देखता तो हूं किंतु जैसे ही मैं अपना पीठ उसकी ओर घुमा लेता हूं आईना छोड़कर के चला जाता हूं जब मेरी नजर के सामने आईना नहीं रहता है। मैं कंप्लीटली भूल जाता हूं कि मैं कैसा दिखता हूं। यह कैसे संभव है? अभी देखिए स्वामी जी की यह बात पढ़कर के हमको थोड़ा सा आश्चर्य तो होगा जिसको कि कहते हैं कि सेल्फ अवेयरनेस या तो बॉडी कॉन्शियसनेस। यह बॉडी कॉन्शियसनेस हम सबका होता है। हम सबको इंस्टिंक्टिवली पता होता है कि हम लोग कैसे दिखते हैं। देखिए मैं ट्रेनिंग सेंटर में था तो ट्रेनिंग सेंटर में क्या है कि जब समाप्त होता है तो एक ग्रुप ब्रह्मचर्य के बाद ब्रह्मचर्य सेरेमोनी के बाद में एक ग्रुप फोटो लिया जाता है। तो क्या है कि बहुत सारे ब्रह्मचारी होते हैं उसमें। तो अ मैं एक ग्रुप फोटो ले लिया गया और फिर मैं और मेरा एक मित्र ब्रह्मचारी हम दोनों लोग फोटो के सामने देख रहे थे। तो अभी क्या है कि हमारे हाथ में उसी टाइम फोटो आया था और उसी टाइम हमने फोटो देखने का प्रारंभ किया था। अभी आप समझ सकते हैं कि 50 के आसपास वो ब्रह्मचारी थे हम लोग उस फोटो में और मुझे बाय द टाइम मुझे फोटो मेरे हाथ में आया। मैं मुझे यह एग्जैक्टली याद नहीं था कि फोटो लेने के समय मैं कहां पे खड़ा था या कहां पे बैठा था। जो भी है। जैसे ही फोटो मेरे हाथ में आया ना इंस्टेंटली मेरा नजर जो है मेरी ओर गया फोटो में मेरा जो चेहरा था और वैसे इमीडिएटली मैंने उसके ऊपर में उंगली रखी। मैंने कहा यह हूं मैं। तो मैंने विद इन वन मोमेंट कि जैसे फोटो आया 50 लोग बैठे हैं खड़े हैं लाइन में। मुझे खोजने की जरूरत नहीं पड़ी कि मैं कहां पे हूं। इंस्टिंक्टिवली मेरी नजर और मेरी उंगली सीधे मेरे मेरा जो चेहरा है उसकी ओर गई। तो यह जो मेरा फ्रेंड था ब्रह्मचारी वो कहता है कि देखो ये साइकोलॉजी वो थोड़ा सा साइकोलॉजी पढ़ता था तो मुझे बताया उसने कि ये साइकोलॉजी में एक ऐसा कांसेप्ट है बॉडी कॉन्शियसनेस कि यदि आप अपने को इतने बड़ी भीड़ में भी देखते हैं माने आपके फोटो को या तो आपके पेंटिंग को तो इमीडिएटली ना आपकी नजर आप ही के चेहरे की ओर ही जाएगी। यह अपना बॉडी कॉन्शियस जो साइकोलॉजी है वो इस तरह से काम करता है। दूसरे को खोजना आपको पड़ेगा। अभी जैसे यह मेरा फ्रेंड था उसको मुझे खोजना पड़ा कि 50 लोगों में कहां पे है। किंतु जैसे ही मेरा फोटो मेरे हाथ में आया इंस्टेंटली मेरी नजर और मेरी उंगली सीधा मेरे चेहरे की ओर गई। सिर्फ इतना नहीं कि अह जो मक्स कॉन्फ्रेंस होती है ना बेलूर मठ में तो ऑलमोस्ट 400 500 साधु उसको अटेंड करते हैं। तो मैंने इस तरह का एक मक्स कॉन्फ्रेंस अटेंड किया था। उसके बाद में ग्रुप फोटो लिया जाता है। तो ग्रुप फोटो कहां लेते हैं? मेन टेंपल का जो स्टेप्स जो होते हैं वहां पे वो जो पहली लाइन में सेंटर में रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज बैठेंगे उनकी दोनों ओर रिवर्ड प्राइस वाइस प्रेसिडेंट महाराज जी बैठेंगे और फिर उसी लाइन में जनरल सेक्रेटरी महाराज है असिस्टेंट सेक्रेटरी महाराज है वे लोग बैठेंगे और फिर स्टेप्स जितने भी होते हैं बेलूर मठ का मेन टेंपल देखा होगा तो पता होगा स्टेप्स है काफी स्टेप्स है तो सभी स्टेप्स के ऊपर में हम ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी तो नहीं अटेंड करते सिर्फ साधुओं के लिए होता है। तो सभी साधु वहां पर बैठ जाते हैं। और इस तरह का ग्रुप फोटो आपने शायद देखा भी होगा। सोशल मीडिया पे काफी चलता है मक्स कॉन्फ्रेंस का। तो उसमें जो 400 500 साधु है उसमें भी मैंने देखा कि बाय दैट टाइम फोटो जो मेरे हाथ में आया था मुझे एग्जैक्टली याद नहीं था कि मैं स्टेप्स पे कहां पे बैठा था। किंतु अगेन कि जहां पे मेरा चेहरा है इमीडिएटली मेरी नजर वहां पे चली गई थी। वह बहुत ज्यादा मुझे खोजने की जरूरत नहीं पड़ी। इसको क्या कहते हैं कि हम लोगों का एक बॉडी कॉन्शियसनेस होता है। एक सेल्फ इमेज होता है। यह सेल्फ इमेज इतना स्ट्रांग होता है कि बहुत सारे लोग एक साथ में फोटो में यदि है भी सही तो हमको हमारा चेहरा इंस्टिंक्टिवली हमको एक पॉइंट हो जाता है कि हां यही है मेरा चेहरा। यहीं पे मैं बैठा हूं। यदि आप भूल भी गए होंगे कि इस फोटो लेने के समय आप कहां बैठे थे कि कहां पर खड़े थे तो वह हम जैसे सामान्य लोगों के साथ में किंतु यह तो है स्वामी जी स्वामी जी कहते हैं कि एलन मुझे यह याद ही नहीं रहता कि मेरा चेहरा कैसा दिखता है। जब तक मैं आईने में दिखता हूं तब तक लगता है कि हां यह मैं हूं। किंतु जैसे नजर के सामने से आईना चला जाता है, वैसे ही मैं अपना यह जो बॉडी कॉन्शियस या सेल्फ इमेज है, अभी ये दो शब्द मैं यूज़ कर रहा हूं। स्वामी जी नहीं यूज़ करते। किंतु आज की मॉडल लैंग्वेज को थोड़ा यूज़ करके कह रहा हूं कि स्वामी जी ऐसा कहना चाहते हैं कि यह मेरा जो बॉडी कॉन्शियस है या तो फिर यह सेल्फ इमेज है वो मेरे माइंड में टिकता ही नहीं है। तो यह बात सुनकर के मिस व्डो इतना आश्चर्यचकित हो गई। इसके बाद में उन्होंने और कुछ नहीं कहा। किंतु मुझे ऐसा लग रहा है कि शायद मिस वर्ल्डो का यह जो भय था, डर था कि नाउ द बबल इज गोइंग टू बस्ट। नाउ द बबल इज गोइंग टू बस्ट। आज ना आज कुछ स्वामी जी ऐसा कुछ करेंगे जैसे कि उनके चरित्र की कमजोरी बाहर आ जाएगी। कल स्वामी जी ऐसा कुछ करेंगे कि उनकी कैरेक्टर वीकनेस बाहर आ जाएगी। मुझे ऐसा लग रहा है कि इस घटना के बाद में शायद मिस वर्ल्डो का यह भय चला गया होगा। देखिए देह धारण करने से चरित्र की कुछ ना कुछ वीकनेस सभी के भीतर में रहती है। यह मैंने बहुत सारे लोगों को स्टडी करके यह बात मैं बता रहा हूं। 100% परफेक्ट कोई नहीं होता है। 100% परफेक्शन की आकांक्षा हम लोग सिर्फ ठाकुर मां और स्वामी जी से ही रख सकते हैं। तो देखिए कि ऑलरेडी स्वामी जी का बॉडी कॉन्शियसनेस बिल्कुल नहीं है। सेल्फ इमेज उनका बिल्कुल है ही नहीं। मन सब समय यह निराकार ब्रह्म तत्व है। उसी की ओर धावित होता है। इसके बावजूद कैसे उनके मन को पकड़ करके इस पृथ्वी पर रखा जाए जिससे कि वो लोक कल्याण के कार्य में अपना जीवन बिताए नहीं कि वहां पर हिमालय की गुफा में बैठकर के ध्यान में मग्न हो जाए। तो इसलिए यह जो स्ट्रगल जो था स्वामी जी के जीवन में वह बड़ा ही कारण भूत था। बाद बात बाद बात बादबाद में भी देखिए कि स्वामी जी जब सेकंड टाइम अमेरिका गए थे तो जो वेरी इंटरेस्टिंगली कि स्वामी जी लेटर में लिखते हैं कि अभी मैं बहुत थक गया हूं। अभी मुझे प्रवचन देने की कोई इच्छा नहीं। इसके बावजूद वह कैलिफोर्निया के जो प्रवचन है वह उन्होंने दिए हैं। और बात सिर्फ यह नहीं है कि कैलिफोर्निया के जो कुछ-कुछ डिवोटी इससे बहुत ही लाभान्वित हुए हैं। जैसे कि यह एलिस हेंसब्रो है जो तीन मिड सिस्टर्स थी। मिस्टर एंड मिसेज एलन है या तो फिर यह जो आइड आंसल है यह जो उस समय के कैलिफोर्निया के जो डिवोटीज थे स्वामी जी से बहुत ही उनको लाभ मिला था आध्यात्मिक सिर्फ यह बात नहीं है अमेरिका का कैलिफोर्निया शहर कैलिफोर्निया राज्य जो कि भविष्य में साइंस टेक्नोलॉजी एडवांस थिंकिंग में इतना इंपॉर्टेंट रोल उसका होने वाला था उसकी भूमि में स्वामी जी वेदांत का झंडा गाड़ के आए हैं। सिर्फ इतना ही नहीं किंतु वह जो कैलिफोर्निया के उनके प्रवचन की जो नोट्स है आज जो हमारे पास में है व्हिच आर सम ऑफ द बेस्ट ऑफ व्हाट स्वामी जी डिलीिवर्ड एनीवेयर इन द वर्ल्ड। तो देखिए कि यह जो पूरा कार्य था उस समय स्वामी जी ऑलरेडी एग्जॉस्टेड हो चुके थे। किंतु फिर भी ही वेंट ऑन गिविंग लेक्चर्स। पता है क्यों? क्योंकि उन्होंने जब पहली बार अमेरिका से भारत गए और अमेरिका से जो उनके डिवोटीज ने उनके डिसाइपल्स ने जो मटके प्रारंभ करने के लिए जो पैसा दिया था उसमें से ₹5000 स्वामी जी ने उधार लेकर के अपनी मां के लिए जो कुछ घर की वगैरह की व्यवस्था करनी थी उसके लिए यूज किया था। तो अभी ₹5,000 मठ से लिया है तो तो ऋण हो गया। ऋण तो वापस करना है। बोलकर के सेकंड टाइम स्वामी जी यह जो प्रवचन पर प्रवचन दे ही जा रहे हैं। सब समय कैलकुलेट करते हैं। कब यह ₹5,000 का ऋण मैं वापस दे पाऊं बेलूर मठ को। ऐसा कैलकुलेशन करके जब 5000 हो जाते हैं तभी वह बेलूर मठ वापस आते हैं तभी इंडिया वापस आते हैं। देखिए कि पैसा उनके खुद के हृदय के रक्त को उन्होंने बहा करके अपना खुद का खून पसीना बहा करके इकट्ठा किया है फर्स्ट विजिट में। इसके बावजूद सब कुछ मठ को दे दिया। ऐसा नहीं सोचा कि 5000 मैं अपने लिए रख देता हूं। बाकी के मैं सब मठ को दे देता हूं। ऐसा नहीं सब दे दिया। उसमें से 5000 अपने ऋण लिया और ऋण को देने के लिए चुकने के लिए उन्होंने कैलिफोर्निया में प्रवचन किया। मैं कभी-कभी सोचता हूं स्वामी जी के सर पर यदि यह ऋण नहीं होता या तो फिर अपने घर की इतनी चिंता नहीं होती तो स्वामी जी कितने दिन प्रवचन देते? स्वामी जी कितने दिन इस पृथ्वी पर टिके रहते? किसको पता? तो देखिए कि यह सब जो चैलेंजेस है महापुरुषों के जीवन में आती है उसका एक ही पर्पस होता है कि कैसे भी करके इनको पकड़ करके संसार में रखा जाए जिससे कि उनकी उपस्थिति उनके आशीर्वाद उनके उपदेश से हमारा कल्याण हो

संन्यास के बाद भी गेरुआ क्यों नहीं पहना? कोर्ट केस में उलझे स्वामी विवेकानंद

वराह नगर मठे बाश कर ते थाकिले ओ विश्वनाथ जष्ठ पुत्र ओ संपत्ति शबालक मालिक हिसाबे नरेंद्रनाथ के हाई कोर्ट जया मुकदमात तदवीर करते हो तो वराह नगर मठ में रहने के बावजूद विश्वनाथ के जष्ठ पुत्र होने की वजह से और संपत्ति के सबालक मालिक होने के वजह से यानी कि अभी तो वह एडल्ट हो गए हैं और विश्वनाथ के बड़े पुत्र हैं बोलकर के नरेंद्रनाथ को ही हाई कोर्ट में जाकर के मुकदमे के बारे में जो विधि करनी है वह करनी पड़ती थी ए कार सुविध आर अपरे बथा औत्सुक्य ओ प्रश्नादि एाई बार अभिप्राय एवं सन्यास ग्रहण फले पैतृक संपत्ति हो ते वंचित होइया छ शत्रु देर ए रूप जुक्ति हो ते रखा पब उद्देश्य तहार पखे तोखन गेरुवा परिधान ना करा बा सन्यास नाम व्यवहार ना करार एकटा विशेष जुक्ति अच्छी लोग देखिए कि कोर्ट में जाकर के उनको कोर्ट केस चलाना पड़ता था। इस कार्य में सुविधा हो गेरवा पहन के कोर्ट में जाएंगे तो फिर लोग भी क्या सोचेंगे? तो इस कार्य में सुविधा हो उसलिए फिर दूसरे लोगों का वृथा उत्सुक्य माने बिना मतलब के यह लोगों की क्यूरियोसिटी होती है ना लोगों की क्यूरियोसिटी देखिए कि इसी डायरेक्शन में जाती है अच्छी कुछ बात बताएंगे तो वे लोग सोचेंगे देखेंगे नहीं सुनेंगे नहीं किंतु ऐसा गड़बड़ वाला कुछ मसाला वाला कुछ बताइए तो देखिए कि वे लोग सब समय उसको पढ़ना चाहते हैं ये उसको कहा जाता है येलो जर्नलिज्म अभी आजकल ये वर्ड ज्यादा नहीं यूज़ होता। पहले बहुत यूज़ होता था। येलो जर्नलिज्म अर्थात कि टेबलइड्स जो होते हैं ना ब्रिटेन में खास करके तो उनमें क्या होता है सोसाइटी की सब गोसिप कि ये जो आपका ये बड़ा आदमी है ये लॉर्ड ना ये लेडीज ना ये सर ना ये सब ड्यूक ना वगैरह-वगैरह जो नोबिलिटी है यूरोप की ब्रिटेन की इन्होंने आज ये कोभांड किया कल ये भ्रष्टाचार किया कल यहां पे फंसे तो लोगों को यह सब पढ़ने में इतना आनंद आता है कि एक पूरा जर्नलिज्म का स्टाइल ही जो है इस तरह से था। टेबल इसको कहते थे येलो जर्नलिज्म। यही सब सोसाइटी की गोसिप ही उसमें आती रहेगी। अच्छी बातें उसमें कुछ होगी ही नहीं। तो यहां पे भी के कहते हैं गंभीरानंद जी कि नरेंद्र जो है क्यों यह गेरुआ वस्त्र नहीं पहनता था उस समय और क्यों अपना सन्यास नाम नहीं यूज करता था। उसके लिए जो कुछ कारण बताए हैं उस कारण में सबसे पहले तो है कि विश्वनाथ के जष्ठ पुत्र होने की वजह से कोर्ट में जाकर के मुकदमा लड़ना है बोल के उसमें एक सुविधा हो फिर मुकदमा लड़ने के लिए कोर्ट में जाएंगे। फिर वहां पर अननेसेसरी लोगों की क्यूरियोसिटी जागृत ना हो। इसके लिए वह गेरुआ नहीं पहनते थे। और फिर तीसरा एक प्रैक्टिकल एक रीजन यह था कि यह जो शत्रु पक्ष है जो उनका वह ऐसा दलील इस तरह का एक आर्गुममेंट न प्रस्तुत करें कि नरेंद्र तो अभी सन्यासी हो गया और हिंदू धर्म के ट्रेडिशन के अनुसार सन्यासी किसी भी तरह की संपत्ति का अधिकारी नहीं है। तो नरेंद्र के हाथ में किसी भी संपत्ति देने का कोई आवश्यकता नहीं। अनफॉर्चूनेटली उस समय जो सब था कि स्त्रियों के इस तरह के अधिकार होते नहीं थे और स्वामी जी के जो छोटे भाई-बहन थे वे तो अभी एडल्ट नहीं थे। वो तो बच्चे थे। तो बच्चे और स्त्री या तो फिर यह विधवा ये जो ऑर्फन एंड विडो इन लोगों को कानून की नजर में बहुत ज्यादा अधिकार नहीं थे। यदि घर को लेना है अपने पिताजी का घर यदि वापस लेना है अपने का चाचा है उन सबके हाथों में से तो स्वामी जी को यह दिखाना होगा कि वह एडल्ट है विश्वनाथ की संपत्ति के असली वारसदार है और घर उनको मिल रहा है बोलकर के एक प्रैक्टिकल कंसीडरेशन था वो यदि ऐसा कह दे कि मैं वो यदि गिरवा पहन के आए और अपना सन्यास नाम यूज करें तो फिर कोर्ट में यह दलील चालू हो जाएगा कि यह जो एडल्ट सन है वह संपत्ति को स्वीकार करने के लिए इन एलिजिबल है। तो फिर यह जो विधवा एक जो है और उसके जो बच्चे हैं वे तो वैसे भी कानून की दृष्टि से बहुत ज्यादा कोई उनको मान्यता नहीं है। उनके अधिकार ज्यादा नहीं है। बोल के उनको संपत्ति देना उनको घर देना किसी भी तरह की आवश्यकता नहीं है। तो इस तरह की आर्गुममेंट ना हो बोलकर के नरेंद्र कोर्ट में जाने के समय यह बात प्रकाशित नहीं करता था कि मैंने सन्यास धारण किया है। मैं गेरुआ पहनता हूं मठ में और मेरा नाम परिवर्तित हो के मुझे सन्यास नाम मैंने ग्रहण किया है। इस सब चीजों की वजह से सन्यास नाम घेरवा परिधान ना करा बा सन्यास नाम व्यवहार ना करार एकटा विशेष चुक्ति छिलो यह सब कारणों की वजह से गिरवा वस्त्र परिधान न करना और सन्यास नाम व्यवहार न करना इसके पीछे में एक विशेष युक्ति थी। अभी देखिए यह जो पूरा टॉपिक

वराहनगर मठ में नवदीक्षित संन्यासियों पर पड़ोसियों का क्रूर उपहास

हमने कल भी डिस्कस किया था कि किस तरह से बंगाल में खास करके यह जो दशनामी संप्रदाय है उसके प्रति एक तरह का अज्ञता थी एक तरह का इग्नोरेंस था और थोड़ा सा विद्वेष भाव भी था। अ इसके बारे में अभी हम गंभीरानंद जी हमको थोड़ा विस्तृत रूप से बताते हैं। पहले तो कल हमने ऑलरेडी देख लिया कि यह गुरु भाई थे वराह नगर मठ के भीतर में तो गेरुआ पहन के रहते थे किंतु जब बाहर में जाएंगे तो फिर जिस तरह से गृहस्थ लोगों के कपड़े होते हैं इस तरह के कपड़े पहन लेंगे। और कल हमने यह भी देखा कि महापुरुष महाराज ने जब गंगाधर महाराज को अखंडानंद जी को लेटर लिखा उसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि तुम जब हमको लेटर लिखो तो वह हमारे घर के नाम पे ही एड्रेस करना। यह जो सन्यास नाम के सन्यास नाम से हमको एड्रेस मत करना। क्योंकि फिर वही बात है कि सामाजिक जो एक तरह का विद्वेष था और फिर स्वामी जी भी इस तरह से मुकदमे में पड़े थे। तो बोलकर के बाहर में बहुत ज्यादा इस बात का प्रचार प्रसार ना हो तो ही अच्छा है। तो क्या-क्या वह सब था उसके पीछे का थिंकिंग गंभीरानंद जी और थोड़ा सा डिटेल में बताते हैं। आर एक्ट जुक्ति छिलो दशनामी संप्रदाय भुक्तो सन्यासी देर संबंधे बंगोदेश अज्ञता और एक रीजन था दशनामी संप्रदाय के भुक्त अंतर्भक्त अर्थात कि दशनामी संप्रदाय के सन्यासियों के सामने सन्यासियों के बारे में बंग समाज की अज्ञता या तो फिर इग्नोरेंस बंगाली लोगों को पता ही नहीं था बहुत ज्यादा कुछ डिटेल में कि यह दशनामी संप्रदाय क्या है और फिर शंकराचार्य ने क्यों इसको प्रारंभ किया है और इसकी कैसी एक भव्य इसकी एक हिस्ट्री है एक पूरी विचार सरणी है बंगाल में किसी को पता ही नहीं था हो तो बा अंग्रेज सरकारों शिक्षित जुबक दे इ रूप आचरण विरोधी छिलेन हो सकता है कि इंग्लिश गवर्नमेंट ब्रिटिश गवर्नमेंट भी पढ़े लिखे लड़कों के इस तरह के आचरण की विरोधी थी कौन गेरुआ पहनेगा कौन भेक्षा करेगा जिसके पास में और कोई उपाय नहीं है। अ यह जो हृदय था हृदय शंभू मलिक के पास में पैसा मांगने को जाता है। किसी कारण से उसको पैसा चाहिए था। सहाय चाहिए थी। तो उसको पैसा चाहिए। तो शंभू मलिक के पास में गया। तो शंभू मलिक कहता है तुम तो हट्टे-खट्टे नवयुवक हो। तुम मेहनत करके पैसा कमाओ। मैं तुमको क्यों दान करूंगा? दान तो मैं उसको करूंगा जो कि लंगड़ा है, लूला है, अंधा है। उसको मैं दान करूंगा। माने जिसका कोई अंग जो है काम नहीं करता है। दिव्यांग जिसको हम कहते हैं आजकल उसको मैं दान करूंगा ना। तुमको मैं थोड़ी ना दान करूंगा। ऐसे हट्टे कट्टे हो जाओ काम करके तुम पैसा कमाओ। तो हृदय सामने में कहता है कि महाशय मुझे भी आपके पैसों की जरूरत नहीं है और आपको भी मुझे पैसे देने की जरूरत नहीं। मुझे आपसे पैसे लेने की जरूरत नहीं और आपको मुझे पैसे देने की जरूरत नहीं। भगवान ना करे कि मुझे लंगड़ा लूला अंधा होना पड़े। ऐसा बोल के वो हृदय वहां से चला गया। तो देखिए कि वो समाज में ऑलरेडी एक था कि यदि किसी को सहाय करनी है तो यदि अंधा है, हाथ पैर टूटे हुए हैं, कटे हुए हैं जो कि अपने से मेहनत करके नहीं खा पा रहा है। ऐसे लोगों को ही भिक्षा देनी है। हाथ पैर चल रहे हैं। ऐसे लोगों को थोड़ी ना भिक्षा देनी होती है। यह लोग तो आलसी है, निकम्मे है। हो सकता है चोर है। भिक्षा के बहाने दिन के समय में आ करके सब देख के जाएंगे कि कौन से घर में क्या है और फिर रात को आगे आएंगे चोरी करने के लिए। तो यही एक लोगों के मन में था बोल कर के यहां पे महाराज कहते हैं कि बंग समाज जो है वहां पे वैसे ही सन्यास प्रथा के बारे में इग्नोरेंस था। दूसरा कि ब्रिटिश गवर्नमेंट भी उनको यह पसंद नहीं था। और ये लोग विरोध करते थे कि पढ़े लिखे हट्टे-कट्टे नवयुवान नौकरी नहीं करके भिक्षा मांग के सन्यास लेकर के रहते हैं। क्योंकि कल भी हमने जैसे डिस्कस किया था कि 1857 का जो हमारा फर्स्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस उसके बाद में उसमें हारने के बाद में बहुत सारे हमारे जो सिपाही हैं वो भारत देश में तितर-बितर हो गए थे। बिखर गए थे और उसमें से कोई-कोई इस तरह से सन्यास लेकर के रेवोल्यूशनरी आइडियाज प्रीच करते थे। गांव-गांव जाएंगे, भिक्षा ग्रहण करेंगे और जो रेवोल्यूशनरी आइडियाज है कि ब्रिटिश गवर्नमेंट को मार भगाना है। हमको फिर से इंडिपेंडेंस चाहिए वगैरह वे लोग यह सब लोगों को सिखाते थे। बोल के वहां का जो गुप्तचर जो डिपार्टमेंट था उनकी जो स्पाई सीक्रेट सर्विस ब्रिटिश गवर्नमेंट की सीआईडी तो क्रिमिनल क्राइम इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट तो वे लोग भी इस तरह के साधुओं से बड़े ही नाराज रहते थे। बांग्ला समाज तखनकार दिन शंकराचार्य अनुमोदित वैदिको सन्यासो अद्वैत वेदांतो मते शहीद तेमन परिचित छिलोना बांग्ला समाज उस दिनों में शंकराचार्य के द्वारा प्रारंभित वैदिक सन्यास और अद्वैत वेदांत के मत के साथ में इतना परिचित नहीं था। महाप्रभु श्री चैतन्य प्रवर्तितो श्वेतो वस्त्र परिहितो बैरागी संप्रदाय के तहारा चिनीतो महाप्रभु श्री चैतन्य देव के द्वारा प्रवर्तित श्वेत वस्त्र परिहित अर्थात कि सफेद कपड़े पहने हुए वैरागी संप्रदाय को वे लोग पहचानते थे। गंगा सागर यात्री बा जगन्नाथ यात्री जटाजूत धारी नागादेर अथवा गेरवा बस्त्रा छादित दुई चारजन सन्यासी के तहारा देखिया छे गंगासागर में जाने वाले गंगासागर की यात्रा करने वाले जो यात्री थे या तो फिर जगन्नाथ महाप्रभु का दर्शन करने के लिए जाने वाले जो यात्री थे इस तरह के कुछ जटाजूट धारी नागा अथवा तो सामान्य गेरुआ वस्तु पहनने वाले दो चार सन्यासियों को उन्होंने देखा था। चोड़ो केर सन्यासी ओ बिरल मुष्टि में कोल सन्यासी के तहारा चिनीतो चड़क अभी यह क्या है पता नहीं जगह है ना कि मंदिर है जो भी है वहां के सन्यासी और कुछ विरल मुट्ठी भर कौल सन्यासी थे उनको यह लोग पहचानते थे किंतु शिक्षितो मध्यबित परिवार जुबा केरा दले दले मां बाबा के कांदा और सांसारिक शलता के पाए ठेलिया संघ भावे मठ जीवन जापन करबे एवं गुरु पूजा रूप भाज्या अनुष्ठान मात्र अवलंबने वेदांत सम्मत साधन मार्ग अग्रसर होइबे ही हा एक नवीन अभिज्ञता किंतु शिक्षित और मिडिल क्लास फैमिली के मध्यव वित्त परिवार अर्थात कि मिडिल क्लास फैमिली के युवक दलदल में अपने मां-पिताजी को रुला के सांसारिक सच्छता अर्थात कि सांसार ारी सुख सुविधा को पैर से लात मार के संगबद्ध रूप से मठ जीवन यापन करें और फिर सिर्फ गुरु पूजा रूपी बाह्य अनुष्ठान के अवलंबन से वेदांत सम्मत साधन मार्ग में अग्रसर हो आगे बढ़े यह एक नवीन अभिज्ञता थी। यह एक नवीन एक्सपीरियंस था। जिनके घर में खाने-पीने को भी है, मां-पिताजी का प्रेम भी जिनको मिला है, जिनका करियर जो है, वह बन सकता है। इसके बावजूद इन सबको पैर से लात मार के घर छोड़कर के मां-पिताजी को रुला के मठ में आकर के संघ रूप से रहे और सिर्फ गुरु पूजा रूपी एक बाह्य अवलंबन को धारण करके वैदिक विधि अनुसार सन्यासियों का जीवन बिताए जीवन जिए। यह वहां के समाज के लिए एक बिल्कुल नई एक्सपीरियंस था। ए ध पुष्टिते समाज कल्याण ना होया बरम अकल्याण होवार आशंका छिलो यह धारा यदि पुष्टि प्राप्त करती है ज्यादा पॉपुलर हो जाती है वायरल हो जाती है तो फिर इससे समाज का कोई कल्याण तो होगा ही नहीं ऊपर से अकल्याण होगा इस तरह की धारणा उन समय के लोगों में थी सुतरान प्रथम अवस्थाएं श्री रामकृष्ण मठ जनप्रिय होए ना उहा इहा आमरा सहजे बुझते पारी इस सब की वजह से प्रारंभ में रामकृष्ण मठ ज्यादा जनप्रिय नहीं हुआ था। यह बात हम लोग सहज से अनुमान कर सकते हैं। इसके बाद का भी नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

आख़िर क्यों अद्वितीय है श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग?

या तो फिर अब जैसे जीसस के बारे में ही कि जिन्होंने वो जो गोस्पेल लिखे हैं वो सभी लोग में से किसी ने भी जीसस का डायरेक्ट दर्शन नहीं किया था। ये मैथ्यू है, ल्यूक है वगैरह कि वो डायरेक्ट डिसाइपल्स नहीं थे। उन्होंने बाद में सब ट्रेडिशंस जो चल रही थी कही सुनी बातें वहां से उन्होंने यह सब लिखा है। सो आई थिंक दिस मस्ट बी फर्स्ट टाइम कि अब जैसे वाल्मीकि ने रामायण लिखा या तो वेदव्यास ने महाभारत लिखा वो सभी चीजें बाद में हुई है। अब दिव्य चक्षु कहो ना कि डिवाइन इंस्पिरेशन कहो जो भी है रामचरितमानस वगैरह सब कुछ इसी तरह से लिखा गया है। आई थिंक ठाकुर एक पहले इस तरह के अवतार होंगे कि जिनको पहचानने वाले लोगों ने उनके बारे में जो मुख्य बायोग्राफी लिखी है व्हिच इज़ यस यस यस फिलॉसोफिकल फिलॉसोफिकल और बातबात में शरद महाराज डिस्क्लेमर मतलब बीच-बीच में कहते रहते हैं कि हमारे गुरु है बोलकर के प्रशंसा कर रहे हैं। ऐसा नहीं आप अपने से देखिए फिलॉसोफिकल थिंकिंग करके देखिए कि उनकी क्या ग्रेटनेस है।

हँसी में छिपा ज्ञान: स्वामी विवेकानन्द के रोचक किस्से

स्वामी जी जा रहे हैं तो धीरे-धीरे मतलब बादशाह ही चाल से चल रहा है। तो लोग बोल रहे हैं स्वामी जी जल्दी कीजिए ट्रेन चली जाएगी। स्वामी जी कहते हैं तुम लोग समय के गुलाम हो। समय मेरा गुलाम है। [हंसी] मुझे मुझे जो कहानी पता है इस तरह से देरी होने की स्वामी जी स्टेज पर आ ही नहीं रहे। आ ही नहीं रहे। तो सब लोग दौड़ादौड़ी कर रहे हैं कि कहां है स्वामी जी? कहां है स्वामी जी? तो किसी ने बोला कि वह जो स्टेज के पीछे में जो गेस्ट लोगों के लिए जो स्पीकर के लिए जो कमरा होता है ना उसमें स्वामी जी बैठे थे अकेले तो कमरे में से शायद निकले नहीं है। तो उन्होंने कमरे में जाकर देखा ना तो जिस कुर्सी पे वह जो पता है कैनवास की कुर्सी आती है माने वह लकड़ी का फ्रेम होता है उसमें वो कैनवास से बिछा दिया है तो कैनवास पे बैठना है आपको तो इस तरह की कुर्सी थी कैनवास की कुर्सी स्वामी जी बैठे थे तो स्वामी जी तो फिर हैवी वेट थे ना थोड़े तो कैनवास फंस गया और लकड़ी की फ्रेम में स्वामी जी फंस गए तो बाहर ही नहीं निकल पा रहे [हंसी] और [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] अनफॉर्चूनेटली चिल्ला रहे तो वहां पे सुनने वाला कोई नहीं था। [हंसी] फिर इन्होंने जाके स्वामी जी को रेस्क्यू किया। स्वामी जी कहते हैं ना अपने लेटर में मेरा जो हार्ट है ना वही सब प्रॉब्लम की जड़ है। तो गुरु भाइयों को डांटते थे ना बेलूर मठ में तो उन्होंने मिसेज ओलीबुल को कंप्लेन कर दिया शरद महाराज ने तो मिसेज बुल स्वामी जी को लेटर लिखती है तो स्वामी जी को डांटती है कि आपको शर्म नहीं आती आपके गुरु भाइयों को डांटते हो बीच-बीच में इस तरह से इतना बुरी तरह से वे लोग बेचारे इतना मेहनत कर रहे हैं इतना त्याग तपस्या कर रहे हैं तो क्यों डांट रहे हो इस तरह से तो स्वामी जी सामने लेटर लिखते हैं कि देखिए कि मेरा हृदय जो है ना वह सब समय मेरे हृदय ने मुझे तकलीफ पहुंचाई है। मैं चाहता हूं कि मैं तो ज्यादा दिन रहने वाला नहीं तो ये लोग जल्दी से अपने पैरों पर खड़े हो जाए। गुरु महाराज का जो मिशन दिया है हमको उसको वो लोग अपने कंधे पर ले ले और मुझे छोड़ दे। बोल करके मैं इनको डांटता हूं। जैसे कि वे लोग मतलब वो रेडी हो जाए रिस्पांसिबिलिटी लेने के लिए। वो प्रवज्जा प्रवरज्या बहुत किए हैं ना तो अभी भी इनके मन में वैराग्य का भाव है तो वैराग्य का भाव थोड़ा सा दूर हो थोड़ा सा जिम्मा लेने का शुरू करें इसलिए मैं उनको डांटता हूं हर बार किंतु मेरे हृदय ने मुझे इस तरह से तकलीफ पहुंचाई है मैं खुद छोड़ के जाना चाहता हूं किंतु गुरु भाइयों के प्रति जो प्रेम है मेरा वो मुझे बांध के रखता है तो स्वामी जी के साथ में कि उनका हृदय जो था वही जो काशी में गए तो पता न्यूज़ आया कि बलराम बाबू का निधन हो गया तो स्वामी जी आना चाहते थे कोलकाता तो बलराम प्रमदादास मित्र कहते हैं कि आप इतने बड़े त्यागीश्वर परमहंस होकर के गुरु भाइयों के प्रति आपकी ममता है यह तो पूरा गलत है आप क्यों वहां पर जाते हैं तो स्वामी जी कहते हैं कि हमने हमारे गुरु ने हमको इस तरह से स्नेह के सूत्र में बांधा है तो फिर मैं क्या कर सकता हूं बताइए इवन ठाकुर को इस तरह के उपदेश देने वाले थे वो कौन सा एक पंडित ठाकुर के पास आया ठाकुर की बातें सुनकर के बड़ा ही प्रभावित हो गया और फिर ठाकुर को कहता है कि मैं भक्तों का संग करूं। यह वासना को भी आप छोड़ दीजिए। वरना विभिन्न तरह के उटपटांग लोग आकर के आपके पास में आएंगे और आपका पूरा बेनिफिट ले जाएंगे। इसलिए यह वासना भी आप त्याग कीजिए। तो मां के प्रति स्नेह, गुरु भाइयों के प्रति प्रेम, यह जो यह जो था स्नेह का बंधन इसी ने तो संघ को टिका करके रखा है ना। ये नहीं होता तो हम लोग कहां देखिए एक-एक गुरु भाई एक-एक महामंडलेश्वर हो सकता है। जैसे ये शंकराचार्य ने चार दिशाओं में चार मठ स्थापित किए तो प्रत्येक मठ का एक-एक शंकराचार्य तो प्रत्येक गुरु भाई एक 16 जगह पे जाकर के 16 मठ चालू कर देते अपने से एक-एक शंकराचार्य हो जाते हैं। तो फिर संघ जो है आज जिस एक उसकी एक फाउंडेशन है वह कभी टिकता नहीं इसका।

हमारे क्लास के बारे में

मेरे मेरे लिए बेनिफिट यही है कि मेरा लाइफ एक डिसिप्लिन में रहता है। देखिए जीवन में पर्पस चाहिए। मैं राजकोट में था जब तक तब तक मेरा पर्पस बड़ा क्लियर था कि पब्लिकेशन मेरा जीवन सर्वस्व है। किंतु यहां पे जब से मैं आया हूं यहां पे ऐसा कुछ नहीं है। जो कि मेरी टैलेंट को मैं जहां पे यूटिलाइज कर पाऊं तो फिर यदि यह क्लास नहीं रहता और मेरा जो राइटिंग है यह दो प्रोजेक्ट लेकर के मैं रहता हूं। यदि ये दो नहीं रहता ना तो मेरी लाइफ में ऐसा ना डिसिप्लिन पूरा चला जाता। फिर अभी देखिए मंगल आरती संध्या आरती तो अटेंड करना है। इसके बाद में फिर घर में आकर के मैं करूंगा क्या? लेटा रहूंगा कुछ पढ़ता रहूंगा मतलब अननेसेसरी कुछ मतलब ऐसा एक डिसोल्यूट लाइफ हो जाता। किंतु बिकॉज़ दिस क्लास है और मेरा राइटिंग है। इन दोनों ने मुझे मेरा डिसिप्लिन जिस तरह का इवन मैं बेलूर मठ में जिस तरह से डिसिप्लिन में रहता था मतलब टाइम टू टाइम मेरा पक्का रूटीन रहता था बेलूर मठ में जब मैं था उसी तरह का रूटीन मैं अभी भी मेंटेन कर पाया हूं। और मैं रियली बताता हूं जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाएगी ना 50 जैसे क्रॉस होगा ना यह रूटीन मेंटेन करके रखना बहुत ही डिफिकल्ट है। बहुत ही डिफिकल्ट है। क्योंकि सन्यास जीवन के जितने भी उद्देश्य है सब कुछ हमने फुलफिल कर लिया है। जब तक सन्यासी नहीं थे ब्रह्मचारी थे तब तक यह सब टारगेट रहते थे। इसको अचीव करना है, उसको अचीव करना है। बट बाय द टाइम यू आर 50 आपने सब कुछ अचीव कर लिया है जो कि जनरली एक होता है। तो फिर है क्या कि जिसके लिए आप सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठकर के दिन भर काम करें। सो दिस क्लासेस गिव मी दैट पर्पस।

स्वामी ब्रह्मानन्द के सेवक महाराज की कहानी

ये ये फेमस कहानी है। इसके साथ में ना एक दूसरी कहानी भी है। अनरिलेटेड स्टिल फनी। अ राजा महाराज के तो सेक्रेटरी थे अमूल्य महाराज बाद में स्वामी शंकरानंद जी अपने प्रेसिडेंट भी हुए थे तो अमूल्य महाराज को एकाएक ऐसा लगा कि राजा महाराज को क्या है ना उनके पास में साइन करवाना यह सब बहुत सारा झमेला का काम है झंझट का काम है तो उन्होंने अपना एक ऐसा बनाया स्टैंप बनवाया प्राइवेट सेक्रेटरी टू स्वामी ब्रह्मानंद और स्वामी शंकरानंद ऐसा बोल के एक स्टैंप बनवाया और उन्होंने ऐसा एक दो लेटर पे ऐसे स्टैंप लगा करके उन्होंने भेज भी दिए। बाद में यह यह बात राजा महाराज को पता चली। तो उन्होंने शंकरानंद जी को बुला के जो डांटा है जो डांटा है जो लेफ्ट राइट लिया है कि किसको पुश करके तुमने ऐसा साहस किया? किसको किसकी परमिशन से तुमने अपना इस तरह का स्टैंप बनाया। ये वो करके ऐसा डांटा है बाप [हंसी] ने। राजा महाराज अपने से तो वो साइन कर ही नहीं पाते थे। दूसरों को भी नहीं करने देते थे। [हंसी]

संन्यास की महिमा की कहानी

ये जो ठाकुर की एक कहानी है ना कि एक ये मतलब कुछ समय के लिए सन्यास होना रिलेटेड टू दैट कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] वो एक नाटक है। नाटक में एक आदमी साधु सजा है। तो सेठ जी लोग नाटक देखने को गए तो उनको बड़ा अच्छा लगा। तो वह जो साधु बना था वह आदमी वह जब स्टेज में से नीचे आया तो उसको पैसा देने को गए कि हमको अच्छा लगा यह बखशीश तुम्हारे लिए। तो वह साधु जो बना था वो ऐसा मुंह घुमा करके चला गया। तो सेठ जी को थोड़ा सा गुस्सा आ गया नाराज हो गया कि मैं उसको पैसा दे रहा हूं। पैसा नहीं ले रहा है। अच्छा ठीक है चलो जरूरत नहीं है तो नहीं है। फिर कुछ समय के बाद में वो आदमी वापस आया। अब जब जा रहा था तो साधु के कपड़े पहने वो स्टेज पे जो सजा था फिर वापस आया तो सामान्य कपड़े पहन के बोलता है अभी सेठ जी अभी रुपया दीजिए तो सेठ जी बोलते हैं उस समय तुमको रुपया दिया तुमने लिया नहीं तो वो कहता है उस समय तुम्हें साधु सजा था ना साधु को तो पैसा लेना नहीं है इसलिए मैंने रुपया लिया नहीं अभी तो मैं सामान्य गृहस्थ सज गया हूं तो अभी आप दीजिए पैसा [हंसी] तो माने यदि इतने समय के लिए भी सन्यासी होते हैं तो उस समय के लिए तो आपको सन्यास व्रत जितना हो सके उतना पालन करना है वरना क्या है फिर गेरवा का अपमान होता है ओम