Prayer
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः स्वामी विवेकानंद का माय प्लान ऑफ कैंपेन इस प्रवचन को हमने कुछ पॉइंट्स में बांट दिया है। पॉइंट्स मैंने ही दिए हैं। किंतु प्रवचन का स्वामी जी का जो वर्ड्स है वह एज इट इज है। उसमें मैंने कोई भी चेंज नहीं किया है। तो 18th पॉइंट हमारा चल रहा था हाउ टू बेटर इंडिया ग्लोरी ऑफ दी आत्मन। तो इसमें देखिए कि स्वामी जी कहते हैं पिछली बार हमने जो पढ़ा था उसको मैं थोड़ा सा रिपीट कर लेता हूं। क्या कहते
विवेकानन्द के उपदेश का हार्द : सेवा और आत्मश्रद्धा
हैं? सर्वप्रथम तो वही है बात कि स्वामी जी का जो क्विंटसेंशियल मैसेज है यूजुअली हम स्वामी विवेकानंद बोलकर के क्या समझते हैं? तो प्रचंड आत्मश्रद्धा प्रचंड आत्मविश्वास देश के प्रति जैसे कि अपना संपूर्ण जीवन न्योछावर कर देने की तमन्ना। यही तो स्वामी विवेकानंद का एक यूनिक उनका कैरेक्टरिस्टिक है। अदरवाइज उन्होंने भक्ति योग के बारे में जो कहा वह तो आपको नारद भक्ति सूत्र है या तो फिर ठाकुर है, मां है। उनके जीवन में गुरु भाइयों के जीवन में देखने को मिल ही जाएगा। कर्म योग के बारे में उन्होंने जो कहा वह तो आपको सब कुछ गीता में लिखा हुआ मिल ही जाएगा। राजयोग के बारे में जो कहा वह सब आपको जनरली हमारे जो स्क्रिप्चर्स है वेदांत है ज्ञान योग है उन सब में सब कुछ बिखरा हुआ है ही है बस वही है कि स्वामी जी एक नया डायमेंशन ऐड करते हैं जो कि अपने पुराने स्क्रिप्चर स्क्रिप्चर को कभी पुराने नहीं कहते पुराना उसको कहते हैं जिसका एक्सपायरी डेट होता है। स्क्रिप्चर का एक्सपायरी डेट होता नहीं है। स्क्रिप्चर सनातन ही होते हैं। तो जो भी है कि हजारों सालों पहले लिखे गए स्क्रिप्चर्स में शास्त्रों में जो बातें हैं तो क्या था कि जिसने जिस शास्त्र को डेवलप किया उसी एक पर्टिकुलर स्कूल तक वह सब सीमित था। अभी आधुनिक युग में श्री रामकृष्ण देव ने प्रत्येक संप्रदाय की प्रत्येक पंथ की साधना करके प्राप्त किया। अनुभूति की उपलब्धि की रियलाइज्ड दैट एव्री पाथ ऑफ साधना इट लीड्स अस टुवर्ड्स द सेम गोल सुप्रीम प्रत्येक पथ जो है भारतीय शास्त्रों में दिखाया गया है वर्णित किया गया है। प्रत्येक उपासना प्रत्येक योग मार्ग हमको वही एक ही ईश्वर की ओर वही एक ही ब्रह्मन या तो आत्मन की ओर ले जाता है। तो यह जो कॉम्प्रहेंसिव अंडरस्टैंडिंग टू ब्रिंग टुगेदर सभी पथ को सभी संप्रदायों को सभी साधनाओं को सभी अवतारों की सभी प्रकार की शिक्षाओं को एक ही प्लेटफार्म पर ले आना उसमें हार्मोनी बिठाना यह ठाकुर ने भी किया मां ने भी किया और स्वामी जी ने भी किया तो इसको एक छोड़ दे या तो फिर इसको इंक्लूड करके दूसरा जो इंपॉर्टेंट कैरेक्टर िस्टिक स्वामी जी का है तो वह वही है। एक तो है देश प्रेम दूसरा है आत्मश्रद्धा। या तो फिर इन दोनों को ब्लेंड करके कहेंगे कि आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च। अभी आत्मनो मोक्षार्थम करने का जो मार्ग है स्वामी जी कहते हैं आत्मश्रद्धा बहुत ही इंपॉर्टेंट इंग्रेडिएंट है। दूसरा कि यदि मेरा देश बांधव मेरा भाई मेरी बहन यदि वो भूखे गरीब वो जमीन के ऊपर में सोते हैं तो मैं किस तरह से लग्जरी में रह सकता
अमेरिका की आध्यात्मिक उन्नति में विवेकानन्द का अवदान
हूं और स्वामी जी का तो एक विश्वव्यापी हृदय था। हमने पिछली बार भी देखा था कि किस तरह से वैसे तो स्वामी जी अमेरिका में गए हैं वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में भारत के लिए सहाय मांगने के लिए और स्वामी जी यह बात को कहेंगे भी सही कि कौन चिंता करता है वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन की जब अपने घर में आग लगी हो तब सभी धर्मों को एक साथ लिया करके उनमें क्या हार्मोनी बिठानी है क्या नहीं बिठानी इतनी सब चिंता कौन करता है। मेरा तो सबसे पहला मकसद यही था कि यह जो भूखे जो पद दलित दिन प्रतिदिन जो लोग निराशा हताशा की खाई में डूबते जा रहे हैं। इस तरह के मेरे देश बांधवों के लिए सहाय मांगने के लिए वहां पर जाने का मेरा उद्देश्य था। ऐसा स्वामी जी स्पष्ट रूप से स्वीकार भी करते हैं। इसके बावजूद जब अमेरिका में गए दुनिया का सबसे धनी देश उस समय का और आज का भी और वहां पर जाकर के स्वामी जी ने देखा कि जो डिस्पेरिटी जो अमीर और गरीब इन दोनों के बीच की जो गहरी खाई जिस तरह से भारत में थी जिस तरह से यह राजा रजवाड़े जो सब है जमींदार है एक और ब्रिटिश लोगों की गुलामी करके ब्रिटिश लोगों की प्रशंसा करके देश को जैसे कि एक वैंपायर की तरह देश का खून चूस रहे थे। यहां पर उनके यही लाखों करोड़ों सब्जेक्ट जो उनके थे राज्य के उनकी जो प्रजा थी वो भले ही चाहे वो उनका शोषण होता हो उसकी कोई चिंता जैसे भारत में नहीं करते थे राजा लोग तो वैसे ही अमेरिका में भी बहुत हद तक ऐसा ही था। भारत में जिस तरह की कास्ट सिस्टम है वहां पर वह डॉलर कास्ट सिस्टम है जिसके पास में धनी है और जो गरीब है इनमें एकदम क्लियर सोशल डिफरेंस दिखाई देगा और यदि आपने यदि चार्ली चैप्लिन की मूवीस देखी होगी मैं जब छोटा था तो मैं देखा करता था कि किस तरह से अमीर और गरीब का भेद एकदम कॉमेडी के माध्यम से दिखाया गया है। स्पष्ट दिखता है कि अमेरिका का समाज आप देखिए जो आदमी धनी है वो कितना क्रूरता से वो गरीब लोगों को ट्रीट करते हैं। तो उस समय के समाज की प्रति छवि जो कि स्वामी जी ने देखी थी आपको यह चार्ली जैबलिन की मूवीज में देखने को मिलेगी। तो जो भी है जैसे ही स्वामी जी वहां पे गए वहां की अवनति वहां की अवदशा देखी तो स्वामी जी का हृदय जैसे कि उनके लिए भी धावित करुणा उनके हृदय में से उनके प्रति भी धावित होने लगी और जो पैसा उन्होंने भारत में गरीब लोगों के उत्थान के लिए ये किया था कलेक्ट किया था वही पैसे में से जैसे कि वो वहीं पर डोनेशन देना शुरू कर दिए। देखिए स्वामी जी को भी इस तरह का उनका हृदय था। कहां अपना पूरा जीवन अपना स्वास्थ्य अपनी तपस्या पर्यंत वो न्योछावर करके अमेरिका गए हैं। वो बूढ़ो बाबा स्वामी सच्चिदानंद एक बार स्वामी जी बेलूर मठ की बात है स्वामी जी अमेरिका से भारत लौट आए थे उस समय की तो उन्होंने कहा बूढ़ो बाबा ने स्वामी जी को कि आपको हमको आपको मुझे निर्विकल्प समाधि देनी होगी। आपके पास में तो वह शक्ति है। तो स्वामी जी ने कहा अरे भैया इस तरह की शक्ति वो तो सब जो थी मेरी तपस्या की अमेरिका में काम करके सब खर्च हो गई। अभी यदि लोगों को निर्विकल्प समाधि देने की शक्ति मुझ में फिर से जागृत होनी है तो मुझे फिर से वो कोपिन पहन के तपस्या करनी पड़ेगी। तो स्वामी जी ने अपना स्वास्थ्य, अपनी आध्यात्मिक शक्ति सब कुछ जैसे कि अमेरिका में न्योछावर कर दिया। वो कहां भारत के लिए वो हेल्प लाए थे अवश्य आज का बेलूर मठ है आपको पता ही होगा कि यह अमेरिकन भक्तों की आर्थिक सहाय के ऊपर में ही बना है। जमीन भी जो उसमें भी मिस मूलर एक थी। यह सारा ओलीबुल एक थी। इन दोनों की मुख्यतः आर्थिक सहाय प्रारंभ में रही और उसके बाद में हमको पता है कि निखिलंद जी मोस्ट प्रोबेबबली वही थे। दो अमेरिकन लेडी डिवोटी को भारत में ले आए थे। उन्होंने जो पैसा दिया था उसमें से यह मेन टेंपल जो है आज का श्री रामकृष्ण देव का वो बना है। स्वामी जी ने स्वयं कहा था कि मेरे कार्य के लिए सहानुभूति तो बहुत है भारत में किंतु भारत में से कोई भी इस कार्य की प्रगति के लिए कार्य के विकास के लिए पैसा देना नहीं चाहता है। क्योंकि यह गुलाम प्रजा थी। आपस में ईर्ष्या इतनी थी तो वैसे जो गरीब है वह वैसे भी नहीं दे पाएंगे और जिनके पास में पैसा है उनका मन इतना संकुचित हो गया है कि अपने खुद के देश के उत्थान के लिए वह ज्यादा कुछ करने को तैयार नहीं है। बोलकर के इनिशियली स्वामी जी को वहां यूरोप अमेरिका से सहाय प्राप्त करनी पड़ी थी। किंतु यह सहाय जो उन्होंने प्राप्त की मोनेरी जो हेल्प वहां से मिली इन टर्न स्वामी जी ने कितनी आध्यात्मिकता वहां पर स्प्रेड की है अमेरिका की आज की सक्सेस यदि आप मेरी लुईस का न्यू डिस्कवरी पढ़ेंगे मैंने जब पहली पहली बार पढ़ना शुरू किया था मेरी लुईस के बारे में तो आपको पता ही होगा अशोकानंद जी की डिसाइपल थी और अशोकानंद जी वैसे तो रहते थे यहां पे कैलिफोर्निया में और इसका जॉब था मेरी लुईस का कैलिफोर्निया यानी कि हो गया वेस्ट कोस्ट पेसिफिक ओशन के ऊपर में और यह मैरी लुईस थी उसकी जॉब थी ईस्ट कोस्ट पे या न्यूयॉर्क या न्यू जर्सी वहां पे कहीं पे तो वो निखिल अशोकानंद जी को मिलने के लिए आई अशोकानंद जी ने उसको इंस्पायर किया कहा कि यह जॉब वगैरह है और उस समय उसका एक हस्बैंड भी था मेरी लुईस का। तो यह जॉब है, हस्बैंड है। वह तुम वहां पे रहती हो पूरे ईस्ट कोस्ट पे। तो कहां तुम्हारा आध्यात्मिक विकास होगा? तुम एक काम करो। वह सब छोड़ के यहां पे आ जाओ। कैलिफोर्निया में वेदांता सोसाइटी ऑफ नॉर्दन कैलिफोर्निया दैट इज सैन फ्रांसिस्को। यहां पे आ जाओ। मुझे हेल्प करो। तो ऐसा बोल के उसको एनकरेज किया। तो मेरी लुई सही में वह सब इष्टको पर उसका हस्बैंड है उसकी जॉब है छोड़कर के वहां पर आ गई और इनके साथ में उनके मार्गदर्शन में वेदांतिक साधना करने लगी और फिर उसी को अशोकानंद जी ने इंस्पायर किया कि स्वामी जी ने अमेरिका में जो कुछ किया वह तो टीप ऑफ द आइसबर्ग ही हमको पता है। इतना सब कुछ और पड़ा है उनके बारे में खोजने के लिए। तो तुम वह सब खोजना शुरू करो। तो वही मेरी लुईस ने एक के बाद एक न्यूज़ रिपोर्ट है। फिर यह लोग जो लोग जीवित थे उनके साथ में वार्तालाप किया। रेमिनेशंस जो बिखरे पड़े थे सब कलेक्ट करके सिक्स वॉल्यूम में न्यू डिस्कवरी स्वामी विवेकानंद इन द वेस्ट न्यू डिस्कवरीज छह वॉल्यूम लिखे। उस वो जब मैं बिल्कुल पहली बार पढ़ रहा था। मैं उस समय नागपुर में था। ट्रेन मैं बेलूर मठ में रांची के बाद में बेलूर मठ जॉइ करने के के लिए गया था पीपीटीसी में प्री प्रोबेशनर्ल्स ट्रेनिंग सेंटर वहां से मेरा पोस्टिंग हुआ था नागपुर में नागपुर में 2006 में नया मंदिर बना बन रहा था उस समय तो फिर जब मंदिर बन जाएगा तो फिर वहां पर भंडार में काम करने के लिए ब्रह्मचारी चाहिए तो उन्होंने कहा था कि जाओ तुम मंदिर का काम सीख लेना पुराने मंदिर में फिर नया मंदिर जैसे ही बन जाएगा वहां पर काम करना तो मुझे याद है आई थिंक 200 सिक्स के ही दिसंबर महीने में नए मंदिर का क्सक्रेशन हुआ था और मेरा पोस्टिंग हुआ था आई थिंक अक्टूबर ना कि सितंबर महीने में तीन-4 महीने पहले तो उस समय नया मंदिर बन रहा है बन गया है और वहां पर मैं काम कर रहा हूं वॉलंटियर्स बहुत थे नागपुर में वो एक है महाराष्ट्र में इन जनरल बहुत सारे वालंट ंटियर है तो भंडार में काम करने के समय इतना कोई ज्यादा प्रेशर नहीं रहता जो कि अदरवाइज होता नए मंदिर में बहुत काम रहता है किंतु मैं थोड़ा सा उस समय मेरे पास में समय रहता था तो मैंने पढ़ाई लिखाई सीरियसली शुरू किया अपना जो साहित्य है अच्छा फिफ्थ सिक्स्थ फरवरी अच्छा अच्छा तो मैं अपना जो साहित्य है उसको मैंने सीरियसली स्टडी करना उस समय स्टार्ट किया था उस समय मैं यह न्यू डिस्क डिस्कवरीज पढ़ रहा था। तो जब मैं बिल्कुल पहली बार पढ़ा सम ऑफ द कंक्लूजंस जो कि मेरी लुईस कहती है वो मुझे इतने आश्चर्यचकित आश्चर्यजनक लगे क्योंकि देखिए स्वामी जी अपने हैं इंडियन तो अपने इंडियन लोगों की ग्रेटनेस हम क्लेम करेंगे। उसमें कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। किंतु यहां पे एक अमेरिकन डिवोटी मेरी लुईस वो कहती है कि स्वामी जी के लेवल के एक महापुरुष का चरण रज अमेरिका में पड़ा। इसकी वजह से ही अमेरिका की आज की जो आर्थिक उन्नति है वह स्वामी जी के आशीर्वाद के परिणाम स्वरूप है। तो इट इज सच अ स्टार्टलिंग स्टेटमेंट हमको कभी लगेगा कभी इसको है ना हम इंडियन
माँ शारदा का जूठी प्रशंसा पर क्रोध
लोग इसको हाइपरबोली कहते हैं ना इन जनरली इसको हाइपरबोली कहा जाता है। इस अर्थ में कि कोई आदमी बड़ा है तो उसकी उतनी ज्यादा प्रशंसा कर दो। उसको इतना सर पर चढ़ा दो वो जिससे कि हो सकता है कि उनकी प्रशंसा करके हमको कुछ प्राप्त हो जाए। जनरली इन लोगों को स्वयं को इस तरह की प्रशंसा पसंद नहीं होती है। मां का ही एक उदाहरण है। मोस्ट प्रोबेबबली उद्बोधन की कहानी है। एक लेडी डिवोटी मां के पास आई और मां की प्रशंसा करना शुरू कर दिया कि मां आप ही तो जगदंबा है। आप ही तो सरस्वती है। आप ही तो जगत धारिणी है। आप ही की वजह से तो हम लोगों हमारी आध्यात्मिक उन्नति है। वगैरह-वगैरह। तो इतनी बेशर्मी से उसने प्रशंसा करना शुरू किया कि मां नाराज हो गई। मां ने नाराज होकर के कहा कि ठाकुर ने दया करके अपने चरणों में स्थान दिया है। बोलकर के मेरी शक्ति भक्ति जो कुछ है वो है। तुम झूठमठ की प्रशंसा क्यों करते हो? बेरो थे के निकलो यहां से। ऐसा करके मां ने उसको डांट दिया था। तो क्या है कि एक तो हमारी एक एबिट रहती ही है खास करके इंडियन लोगों की हम भारतीयों की कि यदि कोई बड़ा आदमी होता है तो उसकी बढ़चढ़ के प्रशंसा करना तो हो सकता है बड़े आदमी की नजर में हम आ जाए और हमारा कुछ काम कर ले वो हमको कुछ ना कुछ दे दे अपने हाथों में भिक्षा के रूप में तो एक अपनी इंडियन टेंडेंसी है यह किंतु एक अमेरिकन जब ऐसा कहता है कि स्वामी जी के आशीर्वाद की वजह से ही अमेरिका अमेरिका में इस तरह से आर्थिक या तो फिर यह पॉलिटिकल डेवलपमेंट हुआ है तो हमको एक तो सीरियसली समझना होगा। सीरियसली सोचना ही होगा। देखिए हम लोग ठाकुर
भारत की लोकशाही और अर्थनीति के मूल में है श्री रामकृष्ण का आशीर्वाद
मास्वामी जी के डिवोटी है बोलकर के हम तो क्लेम करेंगे कि हां ठाकुर आए हैं बोलकर के भारत को आजादी मिली है। वरना गांधी जी कौन थे? वरना कांग्रेस कौन थी? ये फ्रीडम फाइटर्स कौन थे? उनकी तो अपनी तो शक्ति नहीं है। ठाकुर मां स्वामी जी की शक्ति से भारत को आजादी मिली। और देखिए यह पूरा साउथ एशिया देखिए, ईस्ट एशिया देखिए, अफ्रीका देखिए या तो फिर यह ईस्टर्न यूरोप देखिए, रशिया देखिए, साउथ अमेरिका देखिए। जहांजहां पे भी ये नए डीलोनाइज नेशंस थे ये सभी में कहीं पे भी डेमोक्रेसी पनपा नहीं है। ये ईस्ट एशिया है या तो फिर ये मिडिल ईस्ट है, नॉर्थ अफ्रीका, साउथ अफ्रीका जहां पे भी देखिए जिन-जिन देशों को यह 20थ सेंचुरी में फ्रीडम मिला है। सब के सब या चाहे या तो फिर वो डिक्टेटरशिप में डूब गए हैं या तो फिर यदि डेमोक्रेसी हुई है तो डेमोक्रेटिक लीडर इतने करप्ट हुए हैं कि जिन्होंने पूरे देश को आर्थिक बेहाली में डाल दिया है। अपना ही नेबरहुड जो है अपने पड़ोसी देश हम तो प्रतिदिन न्यूज़ पेपर में पढ़ ही रहे हैं क्या हो रहा है। उस समय हाय भारत एक ऐसा देश है कि हमको हमने आजादी के बाद में इंडिपेंडेंस के बाद में डेमोक्रेसी को सिलेलेक्ट किया और इतना ही नहीं अपनी डेमोक्रेसी मॉडरेटली सक्सेसफुल भी है। ऐसा नहीं कहेंगे कि हाईली सक्सेसफुल है क्योंकि चाइना भी तो बैठा है बगल में। ये ईस्ट एशिया के जो छोटे-मोटे कंट्रीज हैं साउथ कोरिया, जापान, सिंगापुर, ताइवान। तो इन सबका उदाहरण है कि यदि हाइली सक्सेसफुल कैसा हुआ जाता है तो हम लोग हाईली सक्सेसफुल नहीं हुए हैं। वे लोग हाईली सक्सेसफुल इसलिए हुए क्योंकि उनकी डिक्टेटरशिप कुछ समय तक काम की है। चाइना का आप देखिए इंडिपेंडेंस या तो फिर जब ये मार्क्सिस्ट रूल कम्युनिस्ट रूल जब से एस्टैब्लिश हुआ तब से आप देखिए कि भयानक खुनामर की हुई है। 1015 करोड़ अपने ही देश बांधवों को माओझेदोंग था। वहां का पगला उसने मार डाला है। तो इस हद की खुनामर की जापान का इतिहास देखिए। अभी तो जापान बड़ा ही शांतिदूत बनकर के घूम रहा है। सेकंड वर्ल्ड वॉर ने सेकंड वर्ल्ड वॉर में जापान ने जो तबाही बरसाई थी। जहांजहां पर भी जापानीज आर्मी गई है नशंस हत्याकांड उन्होंने किया है। बेरहमी से लोगों की कत्ल की है। लोगों पर अत्याचार किया है। तो इन लोगों में जो एक पागलपन जो आया साउथ कोरिया नॉर्थ कोरिया आप जितने भी आज एशियन कंट्रीज को देख लीजिए यह ताइवान ताइवान का वो जो था चियांगकाई शेख वो सब के सब पगले थे। अपने ही देश बांधवों में से करोड़ों-करोड़ों की हत्या करके आखिर में आज यह लोग कुछ प्रोस्पेरिटी पर बैठे हैं। भारत में वो एक्सट्रीम्स नहीं आए। एक एक्सट्रीम में हमने 10 करोड़ को मार दिया और फिर दूसरे एक्सट्रीम में हम लोग इकोनॉमिकली प्रोस्पर हो गए। इस तरह का वाइल्ड स्विंग भारत में नहीं आया। एक मॉडरेट लेवल का जो स्टेडी स्लो एंड स्टेडी सक्सेस पर हम चल रहे हैं। एक और डेमोक्रेसी है। हाउएवर आप कहें कि डेमोक्रेसी काम नहीं करती। यह वो किंतु वो है बहुत बड़ा ब्लेसिंग है। और दूसरा कि इकोनॉमिक सक्सेस कोई हमको बिल्कुल नहीं मिली। ऐसा भी नहीं है। तो देखिए कि डेमोक्रेसी होना एक मॉडरेट इकोनॉमिक प्रोग्रेस होते रहना यह सब कैसे संभव है? यह तो तभी संभव है जब कि यह ठाकुर मां स्वामी जी का आशीर्वाद हो। वरना पॉलिटिकल लीडर का अपने आप में ऐसा कोई क्षमता नहीं है। तो भारत के बारे में हम जिस तरह से
अमेरिका की आध्यात्मिक उन्नति में विवेकानन्द का अवदान
क्लेम कर सकते हैं इवन हम लोग क्लेम करेंगे क्योंकि हम लोग ठाकुर मां स्वामी जी के डिसाइपल हैं। किंतु इवन ठाकुर मां स्वामी जी के डिसाइपल होकर के भी हम लोग स्वामी जी ने अमेरिका जाकर के इस तरह का कंट्रीब्यूशन कर दिया कि अमेरिका की आज की जो उन्नति है वह उनकी वजह से है। यह इस तरह का क्लेम तो इवन हम लोग भी नहीं करेंगे। इस तरह का जो एक दावा है हम लोग भी 10 बार सोच करके समझ करके करेंगे। तो देखिए कि इवन हम लोग जो बात नहीं करेंगे जिस तरह का दावा जिस तरह का क्लेम करने में हम लोग हिचकिचाएंगे तो इवन मेरी लुईस जो है उसने उस तरह का क्लेम कर दिया है तो व्हाटएवर
ब्रिटिश राज की शक्ति का रहस्य
मेन जो अपना थीम है कि स्वामी जी ने अमेरिका में जाकर के जो कंट्रीब्यूशन किया उसके बाद में भारत में आकर के उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना कि भारत के लिए जो उनका प्लान था उसके बारे में डिटेल में यहां पे हमको देखने को मिलता है। वो और मेन इंपॉर्टेंट पॉइंट था कि स्वामी जी का हृदय जो है सबके लिए रोता है। सिर्फ भारतवासियों के लिए ही नहीं इवन अमेरिका के लिए। इवन वही ब्रिटेन में स्वामी जी गए थे। स्वामी जी एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट देते हैं। कहते हैं कि मेरे स्टूडेंट डेज में यह ब्रिटिश एंपायर या ब्रिटिश लोगों ने भारत पे जो शोषण किया भारत का यह सबको लेकर के मैं बड़ा ही क्रोधित रहता था। किंतु जब से मैं ब्रिटेन में आया हूं तब से मैंने ब्रिटिश लोगों का जो कैरेक्टर देखा है उसको देखकर के मुझे बड़ी खुशी हुई है और कुछ-कुछ ब्रिटिश लोग मेरे बहुत अच्छे मित्र भी हो गए हैं। वही कैप्टन सेवियर सोच लीजिए कि यही कैप्टन सेवियर अमेरिका ब्रिटेन की ओर से भारत में आए थे। सपोजेडली ब्रिटिश आर्मी का काम क्या है? भारत को गुलाम बनाए रखना। तो वही ब्रिटिश आर्मी के कैप्टन होने के बावजूद वो कैप्टन सेवियर और उनकी वाइफ मिसेज सेवियर स्वामी जी के बहुत ही अच्छे क्लोज डिसाइपल फ्रेंड हो गए थे। तो स्वामी जी कहते हैं कि मैं जब यहां पर आया तो इन लोगों का जब मैंने कैरेक्टर देखा इन लोगों का जब मैंने यह देखा कि मेहनत करने की कैपेसिटी स्वामी जी कहते हैं जब जब तक डिबेट के लेवल पर रहता है सब लोग डिबेट करेंगे। जब तक आपको पॉलिसी प्लानिंग करना है कि अच्छा हमको इस देश पर किस तरह से आक्रमण करना है या क्या करना है, कैसे करना है तब तक सभी लोग अपना-अपना मंतव्य रजू करेंगे। किंतु जिस क्षण यह ठीक हो गया कि हां इस तरह से यह काम करना है तो सब डिबेट बंद हो जाएगी और सभी लोग अपने लीडर का अनुसरण करना शुरू कर देंगे। स्वामी जी कहते भारत में आखिरी घड़ी तक जब प्लानिंग स्टेज में होता है तब भी हम आर्गुमेंट करते हैं। इंप्लीमेंटिंग स्टेज में आ जाता है। प्रैक्टिकल स्टेज में आ जाता है तब भी हम लोग आर्गुममेंट करते रहते हैं। आर्गुमेंट ही आर्गुमेंट करते रहते हैं और कुछ करते ही नहीं है। मिलकर के काम करना साथ में एक लीडर को फॉलो करना एक एक लीडर पे अपना विश्वास रखना यह सब चीजें जैसे कि है ही नहीं भारत में। तो देखिए कि स्वामी जी वैसे तो भारत को हेल्प करने के लिए विदेश में गए थे। उन्होंने विदेश को भी उतना ही हेल्प किया था जितना कि उन्होंने भारत में किया था।
सत्य है संस्कृति, सत्य है शक्ति
तो फिर यह सब एक बैकग्राउंड है। और बैकग्राउंड के बाद में स्वामी जी क्या कहते हैं यहां पे? हियर इज द टेस्ट ऑफ ट्रुथ। एनीथिंग दैट मेक्स यू वीक फिजिकली, इंटेलेक्चुअली एंड स्पिरिचुअली रिजेक्ट एस पोइजन। यह है सत्य की परीक्षा जो कोई भी हमको फिजिकली यानी कि शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनाती है उसको जहरवत ततक्षणात त्याग करो। देयर इज नो लाइफ इन इट। इट कैन नॉट इट कैन नॉट बी ट्रू। इस तरह में इस तरह की कोई भी फिलॉसोफी है, इस तरह का कोई भी सत्य है, इस तरह का कोई भी उपदेश है, उसमें किसी भी तरह का प्राण नहीं है। वो कभी भी सत्य नहीं हो सकता। ट्रुथ इज स्ट्रेंथनिंग, ट्रुथ इज प्योरिटी, ट्रुथ इज ऑल नॉलेज। ट्रुथ मस्ट बी स्ट्रेंथनिंग, मस्ट बी एनलाइटनिंग, मस्ट बी इनविगोरेटिंग। सत्य है शक्ति सत्य है पवित्रता सत्य है सर्वज्ञत्व सर्व सब तरह का ज्ञान सत्य में निहित है सत्य हमको सशक्त बनाता है हमको आध्यात्मिक एनलाइटनमेंट प्रदान करता है हमको मानसिक और शारीरिक रूप से सशक्त करता है इनविगोरेटिंग करता है और हमने पिछली बार यह भी देखा था कि सत्य का अर्थ यहां पर स्वामी जी क्या करते हैं तो किसी किसी भी तरह का तरह का कल्चर या तो फिर माइंड सेट या तो फिर यह इंस्टीट्यूशनल सेटअप या तो फिलॉसोफी या तो फिर धर्म व्हाटएवर मनुष्य को अल्टीमेटली क्या चलाता है? हार्डवेयर एंड सॉफ्टवेयर आज की लैंग्वेज में यदि कहे तो हार्डवेयर क्या है? तो यह फिजिकल बॉडी यह जो हमारे ऑर्ग्स है यह ऑर्गन्स कलेक्ट हो के एक बॉडी बनाता है। ब्रेन है, ज्ञानेंद्रिय है, कर्मेंद्रिय है। यह सब कुछ अपने शरीर को ये हो गया अपना हार्डवेयर। सॉफ्टवेयर क्या है? मेरे पास में क्या सॉफ्टवेयर है? तो वह मेरा स्किल, मेरा नॉलेज, मेरा कल्चर, मेरा फिलॉसोफी, मैं जिस इंस्टीट्यूशन का पार्ट हूं या कम्युनिटी का पार्ट हूं, किस तरह की मेरी स्पिरिचुअल बिलीफ है, वो सबको यदि हम एक वर्ड में यदि हम यह करना चाहे, डिस्क्राइब करना चाहे तो वो वर्ड है कल्चर। तो मेरा कल्चर क्या है? मेरा कैरेक्टर क्या है? कैरेक्टर और कल्चर। तो सत्य अर्थात कि मेरा कैरेक्टर और मेरा कल्चर और मेरी स्किल। तो यदि यह अच्छा है या बुरा इसका प्रमाण क्या है? यदि वो कैरेक्टर जो स्किल जो कल्चर मुझे शक्ति प्रदान करता है जो मेरे हृदय में पवित्रता स्थापित करता है जो मेरे शरीर और मन को स्ट्रेंथन करता है मुझे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है वही स्किल वही कल्चर और वही कैरेक्टर ठीक-ठीक है सत्य है बाकी सब असत्य है। ठाकुर कहते हैं ना शा की चातुरी अर्थात कि चालाकी या तो फिर विद्या सही विद्या क्या है जो कि हमको ईश्वर प्राप्ति करवाए बाकी सब विद्याओं का क्या अर्थ है ठाकुर कहते हैं ना चाल कोला बाधा विद्या चाइना अर्थात कि इस तरह की विद्या जो कि चाल और कोला दे सामने में चाल अर्थात कि धान फूड ग्रेन और कोला अर्थात कि बनाना आज एक ब्राह्मण है किसी के घर में विधि करने को लोग जाएगा तो उसको वे लोग दक्षिणा में सामने में चावल भी देंगे यानी कि राइस देंगे और फिर सामने कला बनाना है। इस तरह के फ्रूट देंगे और थोड़ी पैसों में दक्षिणा देंगे। तो ठाकुर कहते हैं इस तरह की विद्या मुझे नहीं चाहिए जो कि मुझे दक्षिणा दे। चाल कोला बांधा विद्या। तो यहां पे जब ठाकुर कहते हैं शाचातुर चातुर वही चातुरि शा चातुरि यानी कि वही चातुराई चतुराई या तो फिर विद्या चातुरि अर्थात कि वही विद्या सही विद्या है। शा चातुरि चातुरि अर्थात वही विद्या ही सही विद्या है। तो कौन सी सही विद्या है? तो यहां पे जो स्वामी जी कहते हैं हमको वो सही विद्या की डेफिनेशन देते हैं। ईश्वर दर्शन तो पता नहीं बहुत दूर है हमारे लिए किंतु अब ऐसा हो गया ना कि आज मैंने ठाकुर को फॉलो कर रहा हूं। कोई है कि कोई वेस्टर्न फिलॉसोफर को फॉलो करता है। कोई है कि ये अपने इंडिया में ही बहुत सारी तरह की ये पथ है। ये सब कुछ है। उसको फॉलो करता है। हम लोग सक्सेसफुल होते हैं कि नहीं उसका अल्टीमेट यदि एक टेस्ट होगा कि ईश्वर दर्शन है तो मैं सत्य के रास्ते पर हूं। को तो ईश्वर दर्शन कब होगा? कैसे होगा? कहां पर होगा? इस जन्म में होगा कि हजार जन्म के बाद होगा किसको पता अभी यह भैरवी चक्र यह तंत्र साधना या तो कर्ता भजा स्त्रियों को ले साधना मैं कर रहा हूं चलो किसी ने मुझे बताया यह सब करना चाहिए अभी सत्य का यदि यही एक अल्टीमेट टेस्ट है कि ईश्वर दर्शन होगा तब यह सत्य है तो अभी यह सब लेकर के ईश्वर दर्शन होगा कि नहीं होगा किसको पता कौन से जन्म में होगा मुझे एज ऑफ नाउ विद इन अ फ्यू डेज पता चल जाना चाहिए कि मैं जिस रास्ते पर हूं वह रास्ता सही है कि नहीं है। तो वह जो एक इंस्टेंट आपको टेस्ट करना है ठाकुर का जो टेस्ट है कि ईश्वर दर्शन हुआ तो यह सही रास्ता है। वह तो जन्म जन्मांतर के बाद में पता चलेगा। किंतु एक इंस्टेंट टेस्ट करना है। तो यह स्वामी जी का इंस्टेंट टेस्ट है कि जो सत्य है वह शक्तिप्रद है। जो सत्य है वह पवित्रता दाई है। जो सत्य है सब तरह का ज्ञान हमको प्रदान करता है। सत्य सशक्तिशाली बनाता है। सशक्त बनाता है। आध्यात्मिक उन्नति देता है और शारीरिक मानसिक रूप से हमको तरोताजा करके एंथूजियाज्म विम विगर एंड वाइटालिटी इंग्लिश में जिसको कहते हैं वो प्रदान करता है। सो यह सब हमने ऑलरेडी पढ़ लिया था और मैंने वो स्कूल का भी एक उदाहरण दिया था कि मैं जब स्कूल में जाता था अभी जैसे कि मैं कॉलेज में जाता हूं तो देखता हूं दो तरह की कॉलेज जहां पे कि स्टूडेंट्स को थोड़ा सा भी क्वेश्चन करने की इच्छा नहीं या पता नहीं किस जगत में रहते हैं जब मैं बोलता हूं तो और दूसरी एक कॉलेज में गया था। इतने सारे प्रश्नों की भरमार चल गई थी कि जैसे मुझे सामने से कहना पड़ा कि अच्छा अभी बस करो मुझे मेरा जाने का समय हो गया है तो यह भीतर में से जो आपके मन में मुमुक्षुत्व प्रकट करता है वह सही एजुकेशन है और जो हमारी क्यूरियोसिटी को अपनी क्रिएटिविटी को अपनी एक जस्ट फॉर लाइफ इसको मार देता है वो एजुकेशन किसी काम का नहीं है। और
रहस्यवाद और अंधश्रद्धा का त्याग करो
फिर स्वामी जी क्या कहते हैं? दिस मिस्टिसिज्म इनस्पाइट ऑफ सम ग्रेंस ऑफ ट्रुथ इन देम आर जनरली विकनिंग। यह जो मिस्टिसिज्म है, रहस्यवाद है, तंत्र मंत्र यह सब कुछ है, उस सब में भले ही चाहे एक अंश हो सत्य का, सम ग्रेन ऑफ ट्रुथ। एक अंश हो सत्य का। भले ही चाहे किंतु इन जनरल वो हमको कमजोर ही बनाते हैं। हमको डिप्रेशन की ओर ही ले जाएंगे। ओ बिलीव मी आई हैव अ लाइफ लॉन्ग एक्सपीरियंस ऑफ इट। मेरे पर विश्वास करो। मुझे जीवन भर का अनुभव है इन सब चीजों का। एंड द वन कंक्लूजन दैट आई ड्रॉ इज दैट इट इज विकनिंग। और जो एक कंक्लूजन मैं इसमें से निकालता हूं वो वही है कि यह हमको कमजोर ही बनाता है। आई हैव ट्रेवल्ड ऑल ओवर इंडिया सर्च ऑलमोस्ट एव्री केव हियर एंड लिव्ड इन द हिमालयज। मैंने पूरे भारत में भ्रमण किया है। भारत की सभी ये हिमालय में भ्रमण किया है। सभी गुफाओं को छानबीन कर दी है। किंतु क्या है? आई नो हु पीपल हु लिव देयर ऑल देयर लाइफ्स। मैं ऐसे लोगों को पहचानता हूं जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिमालय में गुफाओं में बिताया है। आई लव माय नेशन। आई कैन नॉट सी यू डिग्रेडेड विकंड एनी मोर देन यू आर नाउ। मैं अपने देश को प्रेम करता हूं। मैं आपको पद दलित आपको मायूस होता हुआ आपको यह अंधश्रद्धा में डूबता हुआ नहीं देख पाऊंगा। ऑलरेडी आप विकन हो चुके हैं। ऑलरेडी आप कमजोर हो चुके हैं गुलामी की वजह से। देयर फॉर आई एम बाउंड फॉर योर सेक एंड फॉर ट्रुथ सेक टू क्राई होल्ड। इसीलिए आपके लिए भी और सत्य रक्षा के लिए भी मेरी यह कहने की फर्ज है कि ठहरो। अंधश्रद्धा की ओर मत जाओ। एंड टू राइज माय वॉइस अगेंस्ट दिस डिग्रेडेशन ऑफ माय रेस। और मेरी जो प्रजाति है, मेरी जाति जो है, मेरा देश जो है, उसकी यह अवनति हो रही है। दिन प्रतिदिन उसके सामने मुझे अपनी आवाज खड़ी करनी है। तो यह देखिए मिस्टिसिज्म के बारे में भी हमने काफी चर्चा की थी। ऑन वन हैंड हमने यह देखा था कि ठाकुर यह सब मिस्टिसिज्म को एकदम आउट ऑफ हैंड उड़ा देते हैं। जैसे भैरवी चक्र है या तो फिर यह कर्ता भजा है। स्त्रियों को लेकर साधना करनी है वगैरह-वगैरह यह हलधारी की बात
हलधारी के श्राप की कहानी
हमने कही थी कि हलधारी इसी तरह से एक साधना में फंस गया था और किंतु और सभी लोग बातें तो आपस में करते हैं कि यह हलदारी ऐसा कर रहा है। स्त्रियों को लेकर साधना कर रहा है। किंतु उसके मुंह पर बोलने का साहस किसी का नहीं था क्योंकि यह बात प्रसिद्ध थी कि वह वाक्य सिद्ध है। अर्थात कि वह जो श्राप दे देगा वो श्राप फलीभूत होगा बोलकर के किसी का साहस नहीं था। अभी ठाकुर तो यह सब चीजों से डरने वाले नहीं है। उन्होंने सोचा कि मेरा यह जो यह है रिलेटिव उसके बारे में यदि लोग इस तरह की बात करते हैं तो उसको अलर्ट करना मेरी रिस्पांसिबिलिटी है। और यदि यह बात सही है तो उसको यह कहना उचित है कि भाई इस तरह की साधनाओं में तुम आगे मत बढ़ो। तो जो भी है यह सब सोच कर के ठाकुर उसको कहने को गए। हलधारी नाराज हो गया। कहा मेरे से तुम उम्र में छोटे हो, कनिष्ठ हो और तुमने ऐसा कहने का साहस कैसे किया मुझे? बोलकर के श्राप दे दिया कि तुम्हारे मुंह से रक्त निकलेगा। तो उस समय हुआ भी सही। कुछ दिनों के बाद में ठाकुर अपने कमरे में बैठे हुए थे। संध्या का समय था। एकाएक मुंह में से रक्त निकलना शुरू हो गया। गाढ़ा रक्त काले कलर का इतना थिक कि वो जब मुंह से निकलता है तो जम गया पूरा एक जैसे कि स्ट्रिंग्स बनकर के। तो ठाकुर फिर हलधारी आया दौड़ा दौड़ा। उसको देखकर के ठाकुर ने रोते-रोते कहा कि भाई मैंने तो तुम्हारे कल्याण के लिए ही कहा था। अभी तुमने जो श्राप दिया देखो मेरी ये कैसी अवस्था हो गई। तो हलदारी भी रोने लगा बेचारा मुंह से तो उस समय निकल गया था। किंतु ठाकुर का इतना नादान इतना इनोसेंट चरित्र था कि उनको इस तरह से सफर करते हुए देख के कौन सहन कर सकता है? तो लकीली उस समय एक साधु था। वहां पर पंचवटी में रह रहा था। उसने आकर के एग्जामिन करके कहा कि देखिए आप जड़ हठ योग की साधना कर रहे थे तो यह रक्त यह जो कुंडलिनी है आपके मस्तिष्क की ओर सहस्त्रार चक्र की ओर जा रही थी उसके बाद में आपको समाधि हो जाती 21 दिन में आपका मृत्यु हो जाता किंतु जगदंबा की इच्छा है कि आपको जीवित रखे किसी महतकाज संपन्न करने के लिए और इसीलिए जो यह एनर्जी है रक्त के माध्यम से आपके मुंह से निकल गई तो अभी जड़ समाधि होगी नहीं। आपका जो जीवन है बच जाएगा। तो ऐसा करके यह सब हुआ था। तो एक ओर जो है ठाकुर एकदम क्लियर इस तरह के जो रहस्यवाद है इस तरह की जो डीजनरेट प्रैक्टिस है उसके अगेंस्ट में थे। तो दूसरी ही ओर यही ठाकुर हमने देखा कि किस तरह से ये टिक टिकी परजन तो मैनेज है। मां ने कहा था ना कि ठाकुर टिक टिकी परजन तो मैनेज है। यानी कि यह जो गिलहरी है वगैरह वो गिरती है तो उससे यह अपशुकन होगा। वही मां की कहानी कि मां जय राम बाटी आई। ठाकुर का हाथ वो फ्रैक्चर हो गया था। ठाकुर ने कहा कौन से मुहूर्त में वहां से निकली थी। तो मां ने कहा बृहस्पतिवार बारबेला तो ठाकुर ने कहा जाओ तुम यात्रा बदल करके आओ। तो फिर ठाकुर कहते हैं कि राखाल आ रहा है सोच के मैंने अमुक का चेहरा देख लिया सुबह को। तो यह सब चीजें जिस तरह से ठाकुर मानते थे मां के जीवन में भी देखा कैसा डिलीशियस कंट्रास्ट मां का बाली का भाव कि राधु बीमार थी तो वो तांत्रिक को बुलाती है। तो वो वो सब हमने देखा। तो अगेन कि रिकंसिलिएशन कहां है? रिकंसिलिएशन ऐसा ही है कि देखिए कि एक बार अपने हृदय में प्योरिटी आ जाए। एक बार अपना कैरेक्टर एक स्ट्रांग फाउंडेशन पर आ जाए तो फिर आप हजार तंत्र है। हजार ये सुपरस्टिशन है। विश्वास कीजिए ना कौन मना करता है। पर हमको तो यह भी पता है कि देखिए ठाकुर और मां सिर्फ दिखाने के लिए नहीं आए थे। वो सिंसियरली यदि कोई चीज पर विश्वास करेंगे तभी वह लोग उसका आचरण करेंगे। तो ऐसा नहीं है कि समाज में तंत्र या तो फिर अंधश्रद्धा प्रसिद्ध है तो चलो हम तो भांगने के लिए आए नहीं है। गढ़ने के लिए आए हैं। डिस्ट्रॉय करने के लिए नहीं आए, कंस्ट्रक्ट करने के लिए आए हैं। तो लेट अस फॉलो ऑल द सुपरस्टिशन। ऐसा भी नहीं है। सिंसियरली यदि नहीं विश्वास करते तो वे लोग उसको फॉलो नहीं करते। तो वो एक देखा और स्वामी जी यहां पर कहते भी है कि इनस्पाइट ऑफ सम ग्रेंस ऑफ ट्रुथ इन देम। इन सब चीजों के भीतर में सत्य का एक अंश अवश्य है। किंतु इन जनरल वह हमारे चरित्र को कमजोर बनाता है। तो एक बार यदि चरित्र की शक्ति आ गई अपने भीतर में कैरेक्टर एक स्ट्रांग फाउंडेशन के ऊपर में आ गया तो फिर आप इस तरह की हजार अंधश्रद्धाओं को मानिए स्वीकार कीजिए फर्क नहीं पड़ता। तो ठाकुर और मां के लिए यह सब शोभा देता है कि तांत्रिक को बुला करके राधु की ट्रीटमेंट करवाना या तो बृहस्पतिवार की बारबेला यह सब में विश्वास करना हमारे लिए यह सब शोभा नहीं देता क्योंकि एज इट इज कि अपना कैरेक्टर कमजोर है। स्वामी जी ने कहा ना कि आई कैन नॉट सी यू डिग्रेडेड विकंड एनी मोर देन यू आर नाउ। आप ऑलरेडी जो कमजोर हो गए हैं उससे ज्यादा कमजोर होता हुआ मैं आपको नहीं देख पाऊंगा। ऑलरेडी अपना चरित्र इतना कोई खास है नहीं उसमें टू राइट होम अबाउट ऑलरेडी ऐसा कोई हमने कोई यह नहीं कर दिया है तोप फोड़ दी है साधना उपासना करके ऊपर में से यदि अंधश्रद्धा में विश्वास करने लगे तो कब हम इस गड्ढे में से निकलेंगे जिसमें हम पिछले 1000 साल से गिरे हुए हैं तो स्वामी जी कहते हैं कि आपके लिए और सत्य के लिए दोनों के लिए मुझे चिल्लाना पड़ेगा ओल्ड ठहर जाओ इससे आगे इस अंधश्रद्धा में जाने की जरूरत जरूरत नहीं है। तो यहां तक हमने ऑलरेडी देखा था और उसके बाद में स्वामी जी क्या कहते हैं? इस पॉइंट का 18थ पॉइंट का
रहस्यवाद और अंधश्रद्धा का त्याग करो और उपनिषद् को अपनाओ
यह लास्ट पैराग्राफ है ग्लोरी ऑफ द आत्मन का गिव अप दिस विकनिंग मिस्टिसिज्म एंड बी स्ट्रांग। यह कमजोर बनाने वाले चारित्र की यह कमजोरी लाने वाला यह मिस्टिसिज्म यानी कि रहस्यवाद और अंधश्रद्धा है। उसको छोड़ो। उसका त्याग करो और सशक्त बनो। बी स्ट्रांग। गो बैक टू योर उपनिषद। अपने उपनिषद में वापस जाओ। द शाइनिंग, द स्ट्रेंथनिंग, द ब्राइट फिलॉसोफी, प्रकाशमान शक्तिदाई प्रकाशित यह जो फिलॉसोफी है, इस तरह की उपनिषद की फिलॉसोफी की ओर वापस जाओ। एंड पार्ट फ्रॉम ऑल दिस मिस्टीरियस थिंग्स ऑल दिस विकनिंग थिंग्स। और यह जो रहस्यवाद है शारीरिक मानसिक कमजोरी देने वाला जो कुछ भी है उन सब से दूर चले जाओ। टेक अप दिस फिलो। अच्छा अब अच्छा अभी हम कह सकते हैं पूछ सकते हैं कि अच्छा वो तो गुलाम भारत था। बहुत ज्यादा अंधश्रद्धाएं प्रसिद्ध थी। आज के आधुनिक या तो फिर यह जो मुक्त भारत में कौन सा इस तरह का अंधश्रद्धा है जिससे हमको मुक्ति पानी चाहिए? तो देखिए कि आजकल इस तरह की अंधश्रद्धा एक ओवर एक अंधश्रद्धा होती है सुपरस्टिशन वो शायद ना देखने को मिले किंतु अंधश्रद्धा का जो छोटा भाई जो है कि एंप्टी बिलीफ इसका किस तरह से करेंगे कि हम विधि विधान तो सब तरह के कर रहे हैं किंतु इस पे विश्वास नहीं है। यह अंधश्रद्धा का जो भाई जो है वह अविश्वास यह अविश्वास आकर के हमको घेर लिया है। यह अविश्वास और अंधश्रद्धा ये सुपरस्टिशन और डिसबिलीफ या तो फिर ये स्केप्टिसिज्म सुपरस्टिशन और स्केप्टिसिज्म ये दोनों एक ही कोइन के दो पहलू है। एक मैंने कहा था ना एक बार कि किसी के साथ में मेरी बात हो रही थी। एक डिवोटी के साथ में मुझे कहते हैं कि आज की यंगर जनरेशन को हमको ठाकुर की ओर लाने के लिए क्या करना चाहिए? तो मैंने कहा म धर्म की ओर लाने के लिए क्या करना चाहिए? तो मैंने उत्तर दिया कि देखिए हमारी तो वही प्रार्थना रहेगी कि उनको धर्म की ओर आना ही ना पड़े। क्यों? धर्म कौन करता है? एक तो जगत से हार गया है, डिप्रेस हो गया है या तो फिर कोई एक यू नो कोई एक बेनिफिट प्राप्त कर लेना चाहता है पूजा करके वगैरह मेरे बिजनेस में सक्सेसफुल हो जाए ये वगैरह करके तो ऐसा इस ये सब करने के लिए यदि वो धर्म करता है तो ये तो ऐसा हो गया ना कहना कि वो अपने सांसारिक जीवन में निष्फल हो तो वो धर्म करेगा। जब तक सांसारिक जीवन में सफल है कौन धर्म करने को जाता है? हम लोग सब लिप सर्विस तो पे कर देंगे जो साल में जो तीन-चार उत्सव है मंदिर में जाना मैंडेटरी है सोशल एक ऑब्लिगेशन है वो चले गए एक लिप सर्विस दे दिया वापस आ गए बाकी भीतर में से तो पूरी अंधश्रद्धा है मैं खुद अपने बचपन में देखा है मंदिर में जाकर के कि जैसे मंदिर में गए अभी क्या है स्त्रियों को ये सब चीजों में थोड़ा सा ज्यादा इंटरेस्ट रहता है पुरुष लोग ऐसा बगल में खड़े रह के वही अपना धंधा बिजनेस की बातें करते रहेंगे कि मैंने यह परचेस किया वह कहता है मैंने नई दुकान ली। दूसरा कहता है मुझे एक नया एजेंसी मिला। चौथा कहता है मुझे इतना लॉस बेनिफिट हुआ। ठाकुर कहते हैं ना वहां वाराणसी ना कि काशी जाकर के कि वहां पर जाकर के वो ये जो थे मथुर बाबू और उनके जो कुछ फ्रेंड वहां पर बैठकर के इतना नुकसान हुआ, इतना लाभ हुआ। यह सब चर्चा कर रहे हैं। तो ठाकुर रोते-रोते मां को कहने लगे जगदंबा को कि मां तुम मुझे यहां पर क्यों लाई? मैं वहां दक्षिणेश्वर में ही तो ठीक था। तो देखिए कि धर्म स्थान पे जाकर के ये जो आपके धंधा बिजनेस की बातें करना ऐसा बहुत ही कॉमन है। जो पुरुष लोग आते थे मेरे रिलेटिव्स बाकी जो थे वो ऐसा वो जो क्रिया चल रही है पूजा चल रही है ऐसा कोई इंटरेस्ट ही नहीं है। वो बिल्कुल साइड पे बैठे हैं। खाना जैसे हो गया सामूहिक भोजन वे लोग निकल पड़े। तो देखिए कि ये जो अंधश्रद्धा का जो दूसरा पहलू है अश्रद्धा स्केप्टिसिज्म वो आजकल समाज में बहुत ही ज्यादा फैल गया है। बेटर है कि आप धर्म ना करें। माने कमजोर होकर के सांसारिक जगत में कमजोर होकर के हार मान के डिफिट होकर के आप धर्म की ओर आए। बेटर है कि धर्म ना करें। धर्म क्यों किया जाता है? ईश्वर के प्रति प्रेम है। अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म करना है। त्याग तपस्या की ओर आगे बढ़ना है। यह सब चीजों के लिए धर्म करना है। नहीं कि मेरा बिजनेस में डेफिशिट हो गया। ये हो गया, नुकसान हो गया तो चलो मैं जाकर के इतना चढ़ावा दे देता हूं तो मुझे वहां पर यह ठीक हो जाएगा बिजनेस। घर में इतना बीमारी आ गया है, प्रॉब्लम आ गया है। वह मंदिर में जाकर के मिन्नत मान लेता हूं तो यह सब ठीक हो जाएगा। मैंने बताया था ना कल्पतरु दिन की घटना कि बिल्कुल पहली बार हम लोग ट्रेनिंग सेंटर से कल वहां काशीपुर हमको ले गए थे फर्स्ट जनवरी को तो हम सभी ब्रह्मचारी पूरा उत्सव खत्म हो गया फिर वहां पे बहुत सारे लोगों ने वहां काशीपुर के गार्डन में ही पेड़ के ऊपर में फिर वो जो जगहजगह पर वह अपनी मिन्नत जो अपनी प्रार्थना करके ठाकुर को एक पेपर के ऊपर में लिख करके बांध करके वहां पर रख दिया था तो हमारा काम था उसको हटाना सबको क्लीन करना तो मैंने कुछ-कुछ खोल करके पढ़ के देखा तो वही सब बातें कि मेरे घर में इतनी गरीबी है छोटा भाई बीमार है पिताजी के साथ में यह हो गया है मैं अकेली हूं काम कर रही हूं जॉब कर रही हूं कोई सहारा नहीं हेल्प कर दो अभी देखिए आप ठाकुर के पास में या भगवान के पास में इस तरह की प्रार्थना करें उसमें गलत कुछ नहीं है किंतु यह प्रार्थना तक हम अटक ना जाए वह मेरे कहने का आशय है। आप ईश्वर के पास में ना मांगेंगे तो किसके पास मांगेंगे? बेटर है कि आप ईश्वर के पास में आकर प्रार्थना कीजिए। रेदर देन कि बहुत सारे लोग क्रिमिनल हो जाते हैं। एक क्राइम की टेंडेंसी उनमें प्रकट हो जाती है कि सही रास्ते पर नहीं मिल रहा है तो गलत रास्ते पर जाकर कुछ कर ले। तो बेटर है कि गलत रास्ते पर ना जाए। ईश्वर के पास आए। ईश्वर के पास मांगे। इतना तो चलो हम सभी लोग एक्सेप्ट करेंगे। बट ईश्वर के पास में आने के बाद में यहीं तक हम अटक ना जाए। दैट इज द मेन थिंग कि दिस इज द बिगिनिंग एंड एंड ऑफ रिलीजन। ईश्वर के पास में मिन्नत मांगना मिन्नत सक्सेसफुल हो जाती है। इसलिए डाब चीनी ऑफर करना ठाकुर ने किया था ना कि वो सिद्धेश्वरी में जाकर डाब चीनी ऑफर किया है। डाब अर्थात कोकोनट चीनी अर्थात कि ये शुगर। तो ये कोकोनट और शुगर ऑफर किया है कि केशव सेन ठीक हो जाए। तो ठाकुर करते हैं उसमें कोई दिक्कत नहीं है। क्योंकि ठाकुर का धर्म वो डाब चीनी यानी शुगर और कोकोनट तक सीमित नहीं था। और भी उन्होंने बहुत कुछ किया था। तो यह ना करें ऐसा नहीं है। स्वामी जी ने ऑलरेडी कह दिया है कि यह सब चीजों में कुछ ना कुछ तो सत्य है। तो इसको संपूर्ण रूप से रिजेक्ट कर देना यह बात नहीं है। बट गो बियों्ड इट।
जीवन का परिवर्तन है सच्ची आध्यात्मिकता
ठाकुर जी जैसे कहते हैं कि वो वो कठवारा जो है वो लकड़ी काटने वाला जब जंगल में जाता है तो वो कोई उसको कहता है कि और भी थोड़ा आगे जाओ तो चंदन की लकड़ियां मिलेगी। और भी थोड़ा आगे जाओ तो रूपा का वो माइन मिलेगा। वो सिल्वर माइन मिलेगी। और थोड़ा सा आगे जाओ गोल्डन माइन मिलेगी। और थोड़ा सा आगे जाओ डायमंड माइन मिलेगी और आज की लैंग्वेज में कहे तो और थोड़ा सा आगे जाने से यह रेयर अर्थ मेटल मिल जाएंगे। तो और आगे बढ़ो और आगे बढ़ो। दैट इज द मेन थिंग कि वो लकड़ी काट के ले आए वहीं पे अपना बिगिनिंग एंड एंड ना हो जाए स्पिरिचुअल लाइफ का। सो आज उस के समय में उस युग में जो एक अंधश्रद्धा का एक बहुत ही ज्यादा आवेश हो गया था। भारतीयों के ऊपर में आज के युग में अश्रद्धा का आवेश हो गया है कि लिप सर्विस तो पूरा देते हैं। बाह्य जो भी ऑब्लिगेशन है सोशल रिलीजियस ऑब्लिगेशन वो फुलफिल भी पूरा करते हैं। किंतु हृदय में श्रद्धा नहीं है। यदि हृदय में सही में श्रद्धा आएगी तो हम अपना लाइफ ट्रांसफॉर्म करना शुरू करेंगे। धर्म का प्रारंभ वहीं से होता है। नहीं कि भगवान के पास प्रार्थना करके पूजा विधान विधि करके वहां पे नहीं धर्म का रियल प्रारंभ तभी होता है जब मैं अपनी हैबिट्स जो है उसको मॉडिफाई करना शुरू करूं। जब तक मैं अपने जीवन को चेंज नहीं करता हूं। ट्रांसफॉर्म नहीं करता हूं। तब तक धर्म में धर्म के रास्ते पर आध्यात्मिकता के रास्ते पर मैंने पैर ही नहीं रखा है। वह सब बाहर बाहर से उपलक सब कुछ है। तो स्वामी जी कहते हैं कि उपनिषद की ओर वापस जाओ। उपनिषद में यही शाइनिंग ब्राइट फिलॉसोफी है। उपनिषद आपको कभी यह नहीं कहेगा कि यह यज्ञ करने से यह लाभ होगा। हालांकि कहते हैं उपनिषद भी कहते हैं नचिकेता यज्ञ तो यमराज ने दे ही दिया। उसका अनुष्ठान करने से यह यह बेनिफिट होगा वगैरह-वगैरह। किंतु क्या है ना यह प्रीलिमिनरी स्टेजेस है। उसके बाद में सही प्रश्न तो बाद में प्रारंभ होता है कि मृत्यु के परे क्या है? सो दैट द ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ लाइफ यदि मृत्यु के परे हम अनंत जीवन में फंस जाएंगे। जन्म मृत्यु जरा व्याधि की तो उससे बेटर है कि यह जो चक्र है संसार चक्र भवसागर उसको तोड़ करके भवसागर को पार करके उसके परे जो है वो जो अमृतत्व जो है उसको प्राप्त किया जाए तो वह कब होगा तो काम कांचन त्याग करके अष्टपाश से मुक्त होकर के षड रिपु से मुक्त होकर के यह जो सब पंच कक्श से मुक्ति प्राप्त करके साधना उपासना का मार्ग पर आगे बढ़ेंगे तब कहीं जाकर के हम अमृतत्व का संधान करने में सक्सेसफुल होंगे। सो गो बियों्ड द प्रीलिमिनरी स्टेजेस ऑफ रिलीजन गो बियों्ड द प्रीलिमिनरी स्टेजेस ऑफ साधना एंड गो डिपर डव डिपर विद इन द स्पिरिचुअलिटी डीप स्पिरिचुअलिटी उपनिषद में आत्मज्ञान की जो बात कही गई है उसको अपनाएं और देखिए आजकल
today, in the age of nuclear weapons, spirituality is not optional—it is essential.
यह सब थ्यरी नहीं है आजकल यह सब ऑप्शन नहीं है कि हां ठीक है आत्मज्ञान अपनाया तो अपनाया नहीं अपनाया तो नहीं अपनाया अमेरिका में कहां कोई आत्मज्ञान की बात करता है बहुत सारे अरे बिलियनरयर है ट्रिलियनर अभी तो एलॉन मस्क ट्रिलियनर होने को जा रहा है तो इस तरह के जो लोग हैं कहां उनके जीवन में कहीं कोई त्याग नहीं दिखाई देता और इतने मजे से वे लोग रह रहे हैं और हम लोग जो धर्मधर्म करके गड्ढे में गिरे हुए हैं तो ऐसा नहीं है क्या कि चलो एक बार पूरा भोग कर ले उसके बाद में धर्म के बारे में देखा जाएगा किंतु इस तरह का ऑप्शन आज के युग में नहीं है क्यों नहीं है आज अमेरिका की अवस्था देखिए ऑलरेडी एक पागल वहां वहां पर प्रेसिडेंट बना हुआ है। अमेरिका के पास में 10,000 से ज्यादा न्यूक्लियर वेपन है। अभी यह पागल तो है किंतु एटलीस्ट उसकी इतनी तो अकल है कि वह युद्ध करना नहीं चाहता। दूसरे देश पे एटम बम फेंकना नहीं चाहता। किंतु एक सही में पागल आ जाए हिटलर जैसा। वो कहेगा कि या तो मेरी बात स्वीकार करो या तो फिर मैं आपके देश पर एटम बम फेंकता हूं। तो क्या होगा? एक बार एटम बम फेंकना शुरू कर दिया हमने न्यूक्लियर वेपंस यूज करना शुरू कर दिया सामनेसामने तो पूरी पृथ्वी का सफाया हो जाएगा मनुष्य सभ्यता यहीं पर समाप्त हो जाएगी तो आज के यह न्यूक्लियर वेपंस के युग में इस ऐसा कहना कि स्पिरिचुअलिटी यदि करें तो भी ठीक है नहीं करें तो भी ठीक है तो यह ऑप्शन हमारे पास में नहीं है वो चाहे अमेरिका हो चीन हो रशिया हो, भारत हो, जो भी न्यूक्लियर कंट्रीज है उन सबका यह ऑब्लिगेशन है कि वहां के प्रजा का चरित्र जो है उसको इंप्रूव किया जाए। बहुत बार वो पॉलिटिकल लीडर नहीं चाहने से भी यह पब्लिक प्रेशर होता है। फेंको एटम बम फेंको एटम बम ऐसा करके वो लोग चालू कर देंगे तो फिर आपके पास में पॉलिटिकल लीडर के पास में ऑप्शन कम हो जाएंगे। यानी कि देखिए कि जापान पे एटम बम फेंकने का निर्णय किया गया। ठीक है? तो उस समय मैंने एक आर्टिकल में ना कहीं पर पढ़ा था कि वैसे तो हिटलर इतना वहां पर यूरोप में अत्याचार कर रहा था। उस समय शायद एटम बम रेडी हो भी गया था। किंतु उन्होंने ठीक किया कि यूरोप में एटम बम नहीं फेंकेंगे। क्यों? क्योंकि यूरोप में यदि न्यूक्लियर वेपन यूज हुआ और उससे जो ये न्यूक्लियर रेडिएशन जो है वो यदि चारों ओर फैलना शुरू हुआ तो यही ब्रिटेन और फ्रांस जो कि अमेरिका के फ्रेंड थे वहीं पे तो ये न्यूक्लियर फॉल आउट होगा ना तो एशिया में फेंकते हैं जापान बहुत दूर है यूरोप और अमेरिका से तो टेस्ट हो जाएगा कि ये जो रेडिएशन फॉल आउट है वो यूरोप और अमेरिका तक तो नहीं आएगा टेस्ट कर लेंगे कितने लोग मरते हैं क्या असर होता है तो उन्होंने एशिया पे टेस्ट किया न्यूक्लियर वेपन यूरोप में टेस्ट नहीं किया। भले ही चाहे हिटलर इतना पगला हो किंतु है तो आखिर में वह यूरोपियन ही तो। तो यह तब कैलकुलेशन रहते हैं उन लोगों के। तो इस तरह के कैलकुलेशन रख के यदि ये हमने न्यूक्लियर वेपन फेंकना शुरू किया तो आजकल तो इवन टेररिस्ट भी है वो कहां से भी न्यूक्लियर वेपन बना सकता है। ये तो 1940 की टेक्नोलॉजी है। 1930 की टेक्नोलॉजी है। आपको इंटरनेट पे ये सब फार्मूला फार्मूला ईजीली मिल जाते हैं। ब्लैक मार्केट में सब मिलता है कि पागल टेररिस्ट के हाथ में न्यूक्लियर वेपन आ गया तो फिर आप सोच लीजिए क्या होगा? यानी कि इस युग में स्पिरिचुअलिटी इज़ नॉट एन ऑप्शन। यह कहना कि मैं भले ही चाहे मटेरियलिज्म में डूबा रहूं। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? हम लोग गरीब ही होंगे उतना ही तो। किंतु सिर्फ गरीब नहीं होंगे। हम मटेरियलिज्म में एक बार डूब गए तो हजार साल की गुलामी आन पड़ी। दूसरी बार यदि डूबेंगे तो क्या होगा? संपूर्ण रूप से सफाया हो जाएगा। न्यूक्लियर वेपन यदि युद्ध में यूज़ होना शुरू हुए तो। सो दैट इज व्हाई कि गो बैक
practical vedanta
टू उपनिषद द शाइनिंग द स्ट्रेंथनिंग द ब्राइट फिलॉसोफी एंड पार्ट फ्रॉम ऑल दिस मिस्टीरियस थिंग्स ऑल दिस विकनिंग थिंग्स टेक अप दिस फिलॉसोफी। यह उपनिषद की फिलॉसोफी को स्वीकार करो। द ग्रेटेस्ट ट्रुथ आर द सिंपलेस्ट थिंग्स इन द वर्ल्ड। जो जगत में सर्वश्रेष्ठ सत्य होते हैं। वो सहज और सरल ही होते हैं। सिंपल एज योर ओन एकिस्टेंस। मैं जीवित हूं। कोजिटो एगोसम। आई थिंक देयर फॉर आई एम यह जो सिंपल एक सत्य है उतना ही सत्य यह स्पिरिचुअल ट्रुथ भी है कि इफ आई एम इफ आई एम अलाइव दैट मींस आई एम आत्मन तो मैं जीवित हूं। यह जितना सिंपल है सोचने के लिए उतना ही सिंपल यह सोचने के लिए है कि यह देह, यह मन, प्राण, यह इंद्रियां, यह सब मैं नहीं हूं। मैं हूं आत्मन, मैं हूं ब्रह्मन। द ट्रुथ्स ऑफ द उपनिषद्स आर बिफोर यू। उपनिषद के सत्य आपके सामने है। टेक देम अप। उनको स्वीकार करो। लाइव अप टू देम। उनको अपने जीवन में परिणत करो। एंड द सल्वेशन ऑफ इंडिया विल बी एट हैंड। और भारत की मुक्ति, भारत की प्रगति, भारत की उन्नति अपने हाथ में आ जाएगी। यदि हम उपनिषद को अपने जीवन में यदि हम प्रैक्टिकली अप्लाई करते हैं। स्वामी जी का वो जो लेक्चर सीरीज है प्रैक्टिकल वेदांत उसको कभी हम देखेंगे बहुत ही सुंदर है। तो स्वामी जी कहते हैं कि यदि भारत की उन्नति करनी है तो आत्मन की जो शक्ति है उसी से होगी। इसके बाद के जो पॉइंट है अभी हम नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु